भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Tuesday, August 12, 2008

स्वतंत्रता दिवसपर १.चन्दा झा २.श्री आरसी प्रसाद सिंह -प्रस्तुति गजेन्द्र ठाकुर

१.चन्दा झा (१८३१-१९०७), मूलनाम चन्द्रनाथ झा, ग्राम- पिण्डारुछ, दरभंगा। कवीश्वर, कविचन्द्र नामसँ विभूषित। ग्रिएर्सनकेँ मैथिलीक प्रसंगमे मुख्य सहायता केनिहार।
कृति- मिथिला भाषा रामायण, गीति-सुधा, महेशवाणी संग्रह, चन्द्र पदावली, लक्ष्मीश्वर विलास, अहिल्याचरित आऽ विद्यापति रचित संस्कृत पुरुष-परीक्षाक गद्य-पद्यमय अनुवाद।



स्वतंत्रता दिवसपर

1
न्यायक भवन कचहरी नाम।
सभ अन्याय भरल तेहि ठाम॥
सत्य वचन विरले जन भाष।
सभ मन धनक हरन अभिलाष॥
कपट भरल कत कोटिक कोटि।
ककर न कर मर्यादा छोटि॥
भन कवि ’चन्द्र’ कचहरी घूस।
सभ सहमत ककरा के दूस।
2
रतिया दिन दुरगतिया हे भोला!
गैया जगतक मैया हे भोला
कटय कसैया हाथ
हाकिम भेल निरदैया हे भोला
कतय लगायब माथ
बरसा नहि भेल सरसा हे भोला
अरसा कए गेल मेह
रतिया दिन दुरगतिया हे भोला
जन तन जिवन संदेह
मुखिया बड़ बड़ सुखिया हे भोला
अन्नबक दुखिया डोल
के सह कान कनखिया हे भोला
सुखिया बिरना टोल



२.श्री आरसी प्रसाद सिंह (१९११-१९९६), एरौत, समस्तीपुर। मैथिली आऽ हिन्दीक गीतकार। मैथिलीमे माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी प्रकाशित। सूर्यमुखीपर १९८४क साहित्य अकादमी पुरस्कार।

जन्मभूमि जननी

जन्मभूमि जननी!
पृथ्वी शिर मौर मुकुट
चन्दन सन्तरिणी
जन्मभूमि जननी।
वन-वनमे मृगशावक,
नभमे रवि-शशि दीपक,
हिमगिरिसँ सागर तक
विपुलायत धरणी,
जन्मभूमि जननी।
दिक्-दिक् मे इन्द्रजाल,
नवरसमय आलवाल,
पुष्पित अंचल रसाल,
नन्दन वन सरणी,
जन्मभूमि जननी।
शक्ति, ओज, प्राणमयी,
देवी वरदानमयी,
प्रतिपल कल्याणमयी
दिवा अओर रजनी,
जन्मभूमि जननी।



सत्यमेव जयते
***ई प्रस्तुति समर्पित अछि अभिनव बिन्द्राक नाम, जे भारतक लेल ओलम्पिक्समे २८ साल बाद स्वर्ण पदक जितलन्हि, आऽ ई स्वर्ण-पदक आइ धरिक ओलम्पिकक व्यक्तिगत-स्पर्धाक भारतक पहिल स्वर्ण-पदक अछि। हुनकर पिता श्री ए.एस.बिन्द्रा आऽ माता श्रीमति बबली बिन्द्राकेँ देशक एहि पुत्रक सफलतापर शुभकामना।
सत्यमेव जयते

Thursday, July 24, 2008

१/५- १-देव दिनेश, २-जय दिवाकर, ३-गणेशगीतम्, ४-शक्तिगीतम्, ५-कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि -कवि चन्द्र/ प्रस्तुति-गजेन्द्र ठाकुर


कवि चन्द्र (चन्दा झा)

१.देव दिनेश

पालय पालय देव दिनेश।
कमलज कमलनाथ महेश।
जय जय तिमिर विनाशन दक्ष।
सतत गगन चर सकल समक्ष॥

कृत पङ्कज कुल ललित विकास।
जगदुद्धारक विश्वनिवास॥
जय जय चन्द्र विवधित सत्त्व।
विश्वविलोचन पूर्णमहत्त्व॥

२. जय दिवाकर


जय दिवाकर विश्वलोचन,
पाप-तिमिर समस्त मोचन,
हृत्कमलकुल-मुखविकोचन,
धर्म-रोचन हे॥

अखिल भुवन तुषार नाशन,
वृष्टिदायक सृष्टि-शासन,
गगन कृत टाटा सुख विलासन,
वह्निलोचन हे॥

जय सकल-जन-पालनापर,
सतत निर्जर गगन विस्तर,
विश्व बोध निदान सुखकर,
व्याधिमोचन हे॥

चक्र कातरता निवारक
जय विभो प्रणतार्ति-हारक,
जय सदैव हि विश्वधारक,
दीन शोचन हे॥

३. गणेशगीतम्

भज भज भज गजवदनम्।
गिरिजा-सुत-गुणसदनम्॥
सुकृतरतँ नितमदनम्।
कृत-पातक-तति-कदनम्॥
अहमीडे मृडबालम्।
खर्वं कुक्षिविशालम्॥
सेवक-जनचय-पालम्।
'चन्द्रं' कलाञ्चित-भालम्॥

४.शक्तिगीतम्

रिपुनिधन- कराले बगले! हे॥
कनक-कुण्डले गौरि, सुषमा-विशाले हे।
राकेश-समानने सुजन-चय-पाले हे॥
अधि सुधोदधि मणि, मण्डमुदारे हे।
पीताम्बरे रत्नवेदि, सिंहासनाधारे हे॥
वामेन करेण, क्तजनमन: पूर्ते हे।
आदाय जिह्वाग्रमप्रियस्य रोषमूर्ते हे॥
मुद्गरं विपक्षजिह्वां हस्तेनाऽऽश्रयन्ति हे।
दक्षिणे च कराभिघातैररिं पीडयन्ति हे॥
पीताभरणाञ्चिताङ्गि पालय वदान्ये हे।
चन्द्रकविं किङ्कर-विधीश-वृन्द-मान्ये हे॥

५. कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि

जय जय कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि।
विन्ध्यनिवासि! दुर्जन-खण्डिनि॥
जय जय कंसकरच्युत चरणे।
सततं कृतसेबक- जन- भरणे॥
जय जय महिषासुर संहारिणि।
मत्त-निशुम्भ-शुम्भ-रणमारिणि॥
संकटहारिणि जय शाकम्भरि।
चन्द्रसूर्यनयने विश्वम्भरि॥




नमस्कार। चन्दा झाक पाँच गोट रचना लए हम प्रस्तुत भेल छी। अनुज जीतूक उत्साह/सदाचार/शिष्टाचार हमरा बाध्य कए देलक एहि मंच पर अएबाक लेल। अहाँ लोकनिकेँ जौँ ई रचना सभ नीक लागत, तँ हम आर पुरान मैथिली साहित्य लए कए आयब।-गजेन्द्र ठाकुर

A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4]

  A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह ...