भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Wednesday, November 05, 2008

भाग्य अप्पन अप्पन- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक बेर देशमे के की–की कऽकऽ जीवन यापन कऽरहल अछि ताहि बातक पत्ता लगाबऽलेल राजासाहेब अप्पन राजकुमारके देशमे सर्बेक्षण करऽलेल पठौलनि । देशमे के केहन प्रकारक रोजगार कऽकऽ अप्पन जीवनयापन करैत अछि, से विषयक सर्वेक्षणमे राजकुमार सबहक आङन जा–जाकऽ प्रजासबहक रोजगारक बारेमे सर्वेक्षणक श्रीगणेश कएलनि ।
सर्वेक्षणक क्रममे जखन ओ एकटा आङन पहुँचलनि त देखलखिन दू भाइमे झगडा होइतछल । जाहिमेसँ एकटा भाइ जे जेठ छल ओ रहैथ केश कटौने जेना किनको स्वर्गबास भऽगेल छलैन । आ, दोसर भाइ जे छोट छलैथ ओ लाल धोती पहिरने छलाह जे देखिकऽ लगै नव बियौहती बर । राजकुमार ई देखिकऽ हरान भऽगलैथ जे एकहि आङनमे एना किए छै ? आङनमे ओ दूनु राजकुमारके देखियोकऽ चुप नहि भेल । हँ, स्वभाविक छै, कहाँदोन पित्तमे लोक आन्हर भऽजाइछ । राजकुमार लगलैथ दूनुमे भऽरहल बातचित सुनऽ । बड़का भाइ बेर–बेर कहै —‘रे तोरा लेल हम नौह–केश करालेली..हमरालेल तो मरिगेले ।’ एहन किसीमके बात सुनिकऽ हुनको बरदास नहि भेलनि माय ओ जोरसँ कहलैथ–‘अहाँसब चुप होएब कि जेल अखने पठादिअ ।’बास्तवमे लोक कहैछै –‘माइरके डरसँ भुत पराए’, ठिक ओहने भेलै । दूनु भाइ चुप भगेल तखन राजकुमार छोटका भाइसँ पुछलखिन –‘अहाँ कहु अहाँ एहन कोन गलती कएलहुँ जे घरमे एहन कल्लह भऽरहल अछि ? कि अहाँके एते बुझल नहि अछि जे कलहके कारणसँ घरक सब किछु कमजोर भऽजाइछ ?’ राजकुमारक प्रश्न सुनिकऽ बड़ विनम्र भऽओ जवाब देलनि –‘हम आठ बर्ष पहिनेसँ जाँहि लड़कीसँ प्रेम करैछलहूँ ओकरेसँ हम बियाह कएलहूँ अछि । ताहिलेल ओ हमरा पर खिसियाएल छथि ।...हुनका तिलकके माध्यमसँ आबऽवाला आम्दनी नहि भेटलनि ते ओ बिभिन्न बहन्ना बनाकऽ हमरासँ झगडा कऽरहल छथि ।’
भाइके मुँहसँ एहन बात सूनिकऽ ओ पिताकऽ कहलैथ –‘बियाहमे सबसँ पहिने देखलजाइछ लड़कीक खन्दान, जाति आदि ।’ जातिके नाम सुनिते छोटका भाइ कहलकै –‘हम जातिके बाह्मण होइतो जँ चौकपर जाकऽ जुत्ता सियब त लोक हमरा चमार कहत, अर्थात मतलव साफ छै आदमी अप्पन कर्मसँ नमहर आ छोट होइछ ,... किनको माथपर नहि लिखल रहैछनि कि ओ कोन जाति छथि ।....रैहगेल खन्दानक बात त थाल आ कमलके फूलवाला कहाबत अहाँ पक्का सुनने हाएब ठिक तहिना जँ हम बाहरमे कतौ फेकल पथ्थरपर भगवानक मूर्ति गढ़िक मन्दिरमे राखि दिऐ त लोक ई नहि पुछ अएतै जे ई पथ्थर कतऽके छै ओ सिधा पूजा करतै ......लोक डुबैत सूरजके एकहि दिन प्रनाम करैछैक मुदा उगैत सूरजके सब दिन ।’ एते बातक बादो जेठ भाई फेर कहलखिन –‘रे, कमसे कम ओकर संस्कृती पर त बिचार करऽके चाही ।’ संस्कृतीक नाम सुनिते छोटका भाइ हसिकऽ बाजल –‘महाभारतमे भिम सेहो एकटा राक्षसनीसँ बियाह कएलकै जेकर पुत्र घटोत्कच छलैक ।....आप करे त रास लिला आ हम करे त कैरेक्टर ढिला, नहि ।’ फेर ओ शान्त भऽकऽ कहलखिन–‘देखु भैया, बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
दूनु भाइमे भऽरहल बातचित सुनिकऽ राजकुमारके सेहो किछु नहि फुराति छलैन । उदाहरण एकहुटा काटऽवाला नहि रहैक । ते ओ बिचमे किछु बाजऽ सेहो नहि चाहलखिन । ते ओ हुनकासभसँ बिनाकिछु पुछने –‘अहाँसभ झगड़ा नहि करु’ कैहकऽ बिदा भऽगेलैथ ।
राजकुमार ओतऽसँ कनिके आगु बढ़लैथ त देखलखिन एकटा बोर्डपर लिखल रहै “भविश्यवाणी” । बहूतो लोकसभक ओतऽ भिड़ लागल रहै । लोक सबहक भिड़भाड़ देखिकऽ ओ आश्र्यमे परिगेलैथ । केओ अनाज, केओ किछु– केओ किछु केओ रुपैया दऽकऽ भविश्यवाणी सुनऽ आएल रहे । राजकुमार पण्डितजी लग जाकऽ पहिने ओ अप्पन सर्वेक्षणक सम्बन्धमे आय–ब्यय सभ किछु पुछिलेलाक बाद ओ भविश्यवाणीक सम्बन्धमे सेहो किछु पुछलखिन किए त हुनका दिमाग पर नचैत छलैन एकहिटा बात जे ओतऽ छोटका भाइ बाजल छल –‘ बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
राजकुमार अप्पन बिवाहक सम्बन्धमे पण्डितजीसँ पुछलखिन कहु –‘हमर बियाह केकरासँ कोन जातिमे होएत ?’ पण्डितजी हुनक माथक रेखा देखिकऽ पहिनही बुझिगेल छलैथ कि ओ एहि देशक भावी राजा छथि । मुदा बियाहक सम्बन्धमे ओ देखलथिन त हुनका भेटलनि कि हुनक बियाह ओही गाँमक चमनिके संग । पण्डितजी राजकुमारसँ कहलखिन–‘अहाँक बियाह एहि गाँमक चमनिसङ होएत ।’ ई बात सुनिते राजकुमार पितागेलैथ आ पुछलखिन –‘जँ नहि भेलै त ?’ राजकुमारक प्रश्नके ओ हसैत उत्तर देलैथ–‘जँ नहि भेल त अहाँ हमरा जे कहब मानिजाएब ।’ राजकुमार सर्वेक्षणक काज छोड़िकऽ दरवार फिर्ता भऽ चिन्तीत भऽ अप्पन कक्षमे जाकऽ सुतिरहलैथ ।
देशक प्रधान सेनापत्ति राजकुमारक एकटा बहुत निक मित सेहो छलखिन । राजकुमारके चिन्तीत मुद्रामे देखि ओ हुनकाँसँ पुछलखिन –‘मित, अहाँके कि भेल, अहाँ एना चिन्तीत किए छी ?’ राजकुमार सेनापत्तिलग अप्पन मनक बात पूर्ण रुपसँ निकजकाँ सम्पूर्ण घटना सुनौलखिन । ओहि गाममे एकहि घर चमनि होबऽके कारणसँ सेनापत्तिके ओकरा सबहक बारेमे सेहो निकजकाँ बुझलरहे । सेनापत्ति अप्पन बिचार प्रस्तुत कएलानि –‘चमनिके एकहिटा जे बेटी छैक ओकरा मारिकऽ नदिमे फेक देल जाए ।
राजकुमारक आज्ञा अनुसार सेनापत्ति अप्पन किछु सेनासहित जाकऽ ओइ लड़कीके जंगल दिश लगेल । बिच जंगलमे जे एकटा नदि परै ओतै ओकरा लऽजाकऽ एकटा सेना ओकरा पाछुसँ एक तलवार मारिदेलकै । ओ लड़की ओतै बेहोस भऽगलै । मरलसन देखिकऽ ओकरासभके भेलै जे ओ लड़की मरिगेल ते ओकरा नदिमे फेककऽ सेनासभ अप्पन देश फिर्ता चलिआएल ।
ओ लड़की दहाकऽ एकटा दोसर राज्यमे पहुचगेल । नदिक किनारके ओहि देशक राजा रहैथ स्नान करैत तखने हुनका ओ बेहोस लड़कीपर नजड़ि पड़लनि । राजा अपनेसँ जाकऽ ओ लड़कीके कोरामे उठाकऽ लैलथि । श्वास त ओकर चलिते रहै ते राजा अप्पन दरवार लऽजाकऽ ओकर ईलाज राजबैद्यसँ करौलनि । राजाके अप्पन कोनो सन्तान नहि होबऽके कारण राजा ओइ लड़कीके अप्पन राजकुमारी घोषणा कएलनि । किछु समयक बाद राजकुमारीके बियाहक प्रशंगमे राजा एकटा सभाक आयोजना कएलनि । आ, आहि सभामे बिभिन्न राज्यक राजा तथा राजकुमारसभके आमन्त्रित सेहो ।
शभामे उपस्थित राजा–महाराजा लग घोषणा कएलगेल –‘राजकुमारीके जे लड़िका पसन्द एतै, ओ ओहि लड़काके वरमाला पहिरादेत आ ओहि लड़कासँ राजकुमारीक बियाह सेहो कएलजाएत । घोषणा पश्चात राजकुमारी शभामे वरमाला लऽकऽ उपस्थित भेली । राजकुमारी कोनो स्वर्ग परीसँ कमजोर नहि बुझाई । राजकुमारीके देखिकऽ सबहक मोनमे रहे –‘हम राजकुमारीसँ बियाह करितहुँ ।’ ओ चारु दिश घुमिकऽ ओही राजकुमारक गरदनिमे माला पहिरादेली । राजकुमार सेहो बड़ खुस भेल किए त हुनका भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितके जबाव देबऽके छलनि ।
बियाह भेलनि । राजकुमार राजकुमारीके लऽकऽ अप्पन राज्य अएलनि । बियाहक सब बिध समाप्त भेलाक बाद ओ अप्पन सेनापत्तिके बजाकऽ ओ भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितसँ भेटवाक इच्छा प्रगट कएलनि । मित तथा राजकुमारक इच्छा अनुसार ओइ पण्डितके राजकक्षमे उपस्थित कराओल गेल । राजकुमार आदेश देलनि –‘ई पण्डित दोसरके मात्र ठकैय । भविश्यवाणीक नाम पर सभके धोखा दैय ते एकरा सजाय मृत्यु देल जाए ।...... जँ हिनका अप्पन सफाइके लेल किछु कहऽके छनि त कैह सकैछथि ।’ राजकुमारक बात सुनिकऽ ओ कहलखिन–‘राजा साहेब आइ तक किनको हम नहि ठकलीयनि । रहल बात अपनेके त अपने जाकऽ ई देखलजाए कि अपनेक रानीक गरदनिके पाछु कातसँ अपनेक सेनापत्ति द्वारा मारलगेल तलबारक निसान अछि कि नहि ।’ ई बात सुनिक राजकक्षमे रानीके सेहो उपस्थित कराओलगेल आ ओतै सभक सामनेमे जखन ओ माथ परसँ नुवा हटाकऽ पाछुतकलखिन त बास्तवके तलबारक निसानी रहबे करै । सभगोटेके छक्क पड़ैत देखिकऽ पण्डितजी कहलनि–‘होइहे वही जो राम रचि राखा ....।’