भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार
लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली
पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor:
Gajendra Thakur
रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व
लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक
रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित
रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक
'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम
प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित
आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha
holds the right for print-web archive/ right to translate those archives
and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).
ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/
पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन
संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक
अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह
(पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव
शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई
पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
Monday, July 28, 2008
'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )४.महाकाव्यमहाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ)
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) ------
५.उद्योग पर्व
करए लगलाह पांडव युद्धक तैयारी विराट द्रुपदक संग पाबि
लगाए कुरुक्षेत्र लग पांडव रुकलाह शिविर पसारि।
दुर्योधनकेँ जखन लागल खबरि ओहो कएलक तैयारी,
संदेश पठाओल राजा सभकेँ कौरव पांडव तखन,
अपन पक्षमे करबा लेल युद्ध शुरु होएत जखन।
कुरुक्षेत्रक स्थलीमे सभटा जुटान लागल होए शुरू,
यादव गणकेँ पक्ष करबा लए दुर्योधन द्वारका गेल स्वयं।
पहुँचि दुर्योधन गेल देखल कॄष्ण छलाह सुतल ओतए,
अर्जुन सेहो पहुँचल पैर दिशि बैसि गेल ओऽ ओतए।
कृष्ण जखन उठि देखल अर्जुन छल ओतए,
कहू वत्स की चाही अहाँ आयल छी एतए।
युद्धमे संग अहाँक हमरा चाही हे नारायण,
अर्जुनकेँ बजिते दुर्योधन टोकल अएलहुँ पहिने एतए।
कृष्ण कहल हम शस्त्र नहि उठाएब युद्धमे,
नारायणी सेना चाही वा हमरा करब अँह पक्षमे।
दुर्योधन नारायणी सेना चुनि भेल संतुष्ट ऒऽ,
अर्जुनकेँ नारायण भेटल छल प्रफुल्लित सेहो।
पांडव मामा छलाह शल्य माद्रीक भाइ जे,
आबि रहल युद्धक लेल दुर्योधन सुनि गेल ओतए।
रस्तामे व्यवस्था-बात कएल तेहन छल,
शल्य कहल अछि मोन पुरस्कृत करी काज जकर।
दुर्योधन भेख बना जाए रहल छल ओतए,
प्रकट भए माँगल युद्धमे होऊ साहाय्य हमर,
एहि सभ व्यवस्थाक छी हमही निर्माण कएल।
शल्य दए स्वस्ति पहुँचलाह जखन कुरुक्षेत्र,
युधिष्ठिर सुनू छल भेल हमरा संग अतए।
कौरवक पक्षमे युद्ध करबा लए वचन बद्ध,
कहू कोन विध होए साहाय्य अहाँक व्त्स।
युधिष्ठिर कहल बनू सारथी कर्णक आऽ कर्रू,
हतोत्साहित कर्णकेँ गुणगान गाबि पांडवक।
शल्य कौरवक शिविर दिशि चललाह तखन,
युद्ध सन्निकट अछि कृष्ण अएलाह जानि सेहो,
एतए सुनल द्रुपदक पुरहित गेल छल धृतराष्ट्र लग।
संधिक प्रस्ताव पर देलक क्यो नहि टेर ओतए,
दुर्योधन कहल राज्य छोड़ू सुइयाक नोक देखने छी?
नहि भेटत पृथ्वी ओतबो राज्यक तँ छोड़ू बात ई।
युधिष्ठिर कहल श्रीकृष्णकेँ आध राज्य छोड़ैत छी,
जाऊ कृष्ण पाँच गाम दुर्योधन देत जौँ राखू ई प्रस्ताव,
ओतबहिमे करब हम सभ भाँय मायक संग निर्वाह।
सात्यकीक संग कृष्ण हस्तिनापुरक लेल चलला जखन,
द्रौपदी कहलन्हि देखू केश फुजले अछि ओहिना धरि एखन,
कानि कहल सँधि होयत युद्ध बिन खुजले रहत वेणी तखन।
कृष्ण कहल मानत नहि सँधिक गप कखनहु दुर्योधन,
युद्ध अछि अनिवार्य मनोरथ पूर्ण होयत द्रौपदीक अहँक।
कृष्ण जखन गेलाह हस्तिनापुर सभ प्रसन्न छल,
धृतराष्ट्र, दुःशासन-दुर्योधनक संग स्वागत कएल।
मुदा कृष्ण ओतए नहि ठहरि दीदी कुन्तीक लग गेलाह,
विदुरक गृहमे छलीह ओतए गप विस्तृत भेल आब।
कहल कुन्ती दीदी जाऽ कए कर्णकेँ परिचए दिअ,
आबि जाएत भ्रातृ-पाण्डव लग सत्य ओऽ जानि कए।
दोसर दिन सभामे पहुँचलाह कृष्ण छल ओतए मुदा,
दुर्योधन विचारल बान्हि राखब कृष्णकेँ अएताह जौँ।
भीष्म धृतराष्ट द्रोण कृप कर्ण शकुनि दुःशासन ओतए,
कृष्ण कहल शकुनिक चौपड़ दुर्योधनक दिशिसँ फेकब,
अन्यायपूर्ण छल ओहिना द्रौपदीक अपमान छल करब।
विराट पर आक्रमण पाण्डवकेँ सतेबाक उपक्रम बनल,
आध राज्य जौँ दए दी तखनो शान्तिसँ रहि सकैछ सभ।
सभ कएल स्वागत एकर दुर्योधन मुदा क्रोधित बनल,
कृष्णकेँ बन्हबाक आज्ञा देलक भीष्म तमसयलाह बड़।
तेज कृष्णक मुखक देखि कौरव भयसँ छल सिहरल।
दुर्योधन कहल पिता ज्येष्ठ हमर अंध छलाह से राज्य नहि भेटलन्हि,
हुनक पुत्र ज्येष्ठ हम से अधिकार हस्तिनापुर पर अछि सुनलहुँ।
पाण्डव अन्यायसँ लए राज्य करए छथि तैय्यारी युद्धक,
कृष्ण अछि पाछाँ ओकर हम तँ रक्षा राज्यक करए छी।
कृष्ण कहलन्हि तखन पाँच गाम दिअ करबाऽ लए निर्वाह,
मुदा दुर्योधन कहल राज्यक भाग नहि होएत गए आब।
कृष्ण बाजि जे हे दुर्योधन मदान्ध छी बनल अहाँ,
पाण्डवक शक्त्तिक सोझाँ नाश निश्चित बुझू अहाँक।
कुन्ती बादमे गेलीह कर्णकेँ कहल दुर्वासाक मंत्र भेटल,
पढ़ल सूर्यकेँ स्मरण कए पुत्र हमर भेलहुँ अहाँ तखन।
प्रणाम कएल माताकेँ कर्ण तखन बजलीह सुनू ई,
ज्येष्ठ पाण्डव छी अहाँ राज्य युधिष्ठिर देत अहीकेँ।
जखन नहि मानल कर्ण कुन्ती पुछल मातृऋणसँ,
उबड़ब कोना कर्ण बाजल हे माता तखन सुनू ई।
अर्जुनकेँ छोड़ि चारू पाण्डवसँ नहि लड़ब पूर्ण शक्त्तियेँ,
अर्जुनकेँ मारब तखन बनब पुत्र अहीकेँ।
वा मरब हम पुत्र तैयो पाँच टा रहबे करत,
ई प्रतिज्ञा हम करए छी माता कुन्ती अएलीह घुरि।
कृष्ण आबि घुरि पहुँचि शिविर पाण्डवक जखन,
पाण्डव युद्धक कएल प्रक्रिया शुरू ओतए तखन।
सात अक्षौहिणी सेना घोड़ा, रथ, हाथी, सैनिकक,
अर्जुन भीम सात्यिकि धृष्टद्युम्न द्रुपद विराट लग।
कौरव सेहो एगारह अक्षौहिणी सेना कृपाचार्य शल्य भूरिश्रवा,
भीष्म द्रोण कर्ण अश्वत्थामा जयद्रथ कृतवर्मा भगदत्त छल।
धृष्टद्युम्न सेनापति पाण्डवक भीष्म कौरवक बनल,
कर्ण शस्त्र नहि उठेबाक कएल प्रतिज्ञा
भीष्म यावत युद्धक्षेत्रमे रहताह गए।
भीष्म कहल मारब नहि पाण्डवकेँ एकोटा,
सेनाक संहार करब यथा संभव होएत।
ब्यास धृतराष्ट्रक लग गेलाह कहल ब्यासजी सुनू,
अंधत्व भेल वर हमर कुल संहार देखब नहि किएक।
मुदा वीरक गाथा सुनबाक अछि इच्छा बहुत,
ब्यास देल योगसँ दिव्यदृष्टि संजयकेँ कहल,
बैसले-बैसल देखि संजय वर्णन करताह युद्धक,
बाजि ई ब्यास बिदा भए गेलाह ओतएसँ।
६. भीष्म पर्व
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )४.महाकाव्य/ महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) ------
सैरन्ध्रीक प्रति भए श्रद्धा दुनू पसरल,
दुर्योधन छल बुझल अज्ञातवासक कथा,
छल ताकिमे तकबाक पाण्डवक पता,
छी ई द्रौपदी सैरन्ध्रीक भेषमे अभरल।
पाण्डव छद्म-भेष बनओने छथि गांधर्वक,
कीचकसँ अपमानित राजा त्रिगर्त देशक,
मिलि दुर्योधनसँ कए गौ-हरणक विचार
विराट राजसँ ओऽ लेत बदला आब।
दुर्योधन लए संग भीष्म,द्रोण,कृप, कर्ण,
आक्रमण विराट पर लए अश्वत्थामा संग।
त्रिगर्त राज सुशर्मा घेरि गौ-विराटराजक,
बान्हि विराटकेँ जखन ओऽसोझाँ आयल।
ललकारि कएल भीमकेँ सोर युधिष्ठिर-कंक,
वल्लभ-भीम ग्रंथिक-नकुल तंत्रिपाल-सहदेव।
खोलि बन्धन विराटक बान्हि देल सुशर्मन्,
वृहन्नला बनि सारथी पुत्र विराटराज उत्तमक।
रथ आनल रणक्षेत्र उत्तमकुमार भेल घबरायल,
गेल अर्जुन शमी गाछ लग उतारि शस्त्र आयल,
गाण्डीव अक्षय तुणीर आनि परिचय सुनाओल।
उत्तमकुमार बनल सारथी वृहन्नला-अर्जुनक संग,
वेगशाली रथ देखि दुर्योधन पुछल हे भीष्म।
अज्ञातवासक काल भेल पूर्ण वा न वा कहू,
भीष्म कहल पूर्ण तेरह वर्षक अवधि भेल औ।
अर्जुन उतारल अपन रोष कर्ण पुत्र विकर्ण पर,
मारि ओकरा बढ़ल आगाँ कर्णकेँ बेधल सेहो।
द्रोण भीष्मक धनुष काटल मूर्च्छित कएल सेना सकल,
द्रोण-कृप-कर्ण-अश्वत्थामा-दुर्योधनक मुकुट वस्त्र सभ,
उत्तमकुमार उतारल सभटा गौ लए नगर तखन घुरल।
मूर्च्छा टूटल सभक जखन कहल करब युद्ध पुनः,
भीष्म नहि मनलाह दुर्योधन घुरु बहु भेल आब अः।
उत्तमकुमार नहि करब प्रगट भेद हमर अर्जुन कहल,
विराट भेल प्रसन्न वीरता सुनि उत्तमक आबि घर।
पञ्च पाण्डव द्रौपदीक तखन परिचय हुनका भेटल,
प्रस्ताव कएल पुत्री उत्तराक विवाह अर्जुनसँ करब।
अर्जुन कहल पढ़ेने छी हमर शिष्या अछि ओऽ रहल,
पुत्र अभिमन्युसँ होयत विवाहित उत्तरा ई प्रस्ताव छल।
कृष्ण-बलराम द्वारकासँ बरियाती अभिमन्युक लए अएलाह,
उत्तराक विवाह अभिमन्युक संग भेल बड़ टोप-टहंकारसँ।
५.उद्योग पर्व
छलाह आएल राजा वृन्द अभिमन्युक विवाह पर,
भेल राजाक सभा जतए कृष्ण कएल विनती ओतए।
द्यूत खेल शकुनीक अपमान द्रौपदीक कएल जे,
दुर्योधन छीनल राज्य युधिष्ठिरक अधर्मसँ से।
बाजू प्रयत्न राज्य-प्राप्तिक कोना होयत वा,
दुर्योधनक अत्याचार सहैत रहथु पाण्डव सतत।
द्रुपद उठि कहल दुराचारी कौरवकेँ सभ जनञ छथि,
कर्तव्य हमरा सभक थिक सहाय बनी पाण्डव जनक।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Sunday, July 27, 2008
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ ४.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ)
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) ------
४.विराट पर्व
पूर्ण भेल वनवासक वर्ष बारह अतीत,
एक वर्षक छल अज्ञातवास बड़ कठिन,
दुर्योधनकेँ यदि हुनक संकेतक चलए पता,
पुनि द्वादश वर्षक वनवासक छल प्रथा।
प्रातःकाल सभ विदा भेलाह विराट नगर दिशि,
कंक नाम्ना धर्मराज ब्राह्मण वेश धारित मिलि।
कौड़ी आऽ चतुरंग गोटीसँ विराटराजक मोन लगाएब,
भीम बनि पाचक नाम वल्लभक पाकशाला सम्हारथि।
विराटक पुत्रीकेँ संगीत नृत्य अर्जुन,
नारी वृहन्नला बनि सिखाबथु,
ग्रंथिक नामसँ नकुल अश्वक करए रखबारि,
सहदेवक नाम तंत्रपाल भेल करथि चरबाहि।
रानीकेँ सजाबथि द्रौपदी नाम धरि सैरन्ध्रीक।
सभ ई सोचि नुकाओल अस्त्र-शस्त्र,
शाखा बिच शमी-वृक्ष एकटा विशालमे।
जखन वेश धरि पहुचलाह विराट राजा लग,
स्वीकारलन्हि ओऽ सभटा प्रार्थना स्वतः।
दिन छल बीति रहल मुदा रानी सुदेष्णाक,
भाय छल कीचक दुष्ट देखि सैरन्ध्री भेल मुग्ध।
बहिनसँ पूछल कोन देशक राजकुमारी छथि ई,
कहल बहिन नहि, छी निकृष्ट दासी ई।
मुदा कीचक पहुँचि द्रौपदी लग बाजल,
सुन्दरी दास बनाऊ हम मुग्ध पागल।
सैरन्ध्री कहलन्हि, हम विवाहिता एकदासी,
अहाँक पालिता छी नहि पुनि गप ई बाजी।
मुदा कीचक बहिनिसँ पुनि अनुरोध कएलक।
पर्व दिन सुदेष्णा किछु वस्तु अनबा हेतु कहलक,
सैरन्ध्रीकेँ कीचक लग जाए तकरा आनए पठेलक।
मुदा ओतए देखि वासनाक आँखि भागलि,
भीमसँ जाए बाजलि धिक पाण्डवकेँ कहलि।
भीम बाजल आब जे ओऽ भेँट होअए,
नाट्यशालामे बजाऊ आध राति सोचब फेर ई,
हमरा की करबाक अछि ओहि दुष्टकेँ ओतए।
कीचक विराटक सेनाक प्रमुख सेहो छल,
सैरन्ध्रीक आमंत्रणकेँ नहि बूझि पहँचल अभागल।
स्त्री वेष धरने भीम ओतए प्रतीक्षित,
केश पकड़ि पटकल, लात हाथ मारल खीचककेँ ओतहि।
भोर होइत ई गप पसरि गेल चारू दिशि,
कीचककेँ मारल गंधर्वपति सैरंध्रीक।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ४.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा)
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ------
३. वन पर्व
पाबि युधिष्ठिरक आज्ञा चललाह अर्जुन,
पर्वत कैलास पर पार कए कऽ गंधमदन।
तूणीर आऽ धनुष हुनकर संगमे छल,
साधु जटाधारी तपस्वी अर्जुनसँ पुछल।
ई छी तपोभूमि शस्त्रक काज नहि कोनो,
अर्जुन कहल हम क्षात्र धर्म कहाँ छोड़ल।
तावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि,
प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।
माँगू वत्स वर हमरासँ प्रसन्ना छी हम,
शिक्षाक संग दिव्यास्त्र भेटय एहि क्षण।
अर्जुन अहाँक ई लालसा पूर्ण होयत मुदा,
जाऊ शिवकेँ प्रसन्न कए पाशुपत पाऊ।
फेर देवगण देताह दिव्यास्त्र अहाँकेँ,
ई शस्त्र सभ मानव पर चलायब अछि वर्जित,
कहू अहाँ पाबि करब की दिव्यास्त्र सभ ई।
शक्त्ति-संचय अछि हमर उद्देश्य मात्र देव,
कौरव छीनल अछि राज्य छलसँ परञ्च,
नहि करब एकर कोनो कुप्रयोग नहि हम।
इन्द्रक अन्तर्धान भेलाक उत्तर अर्जुनक,
शिव तपस्या कठोर छल होमय लागल।
तखन पार्वती संग शिव चललाह तपोभूमि,
अर्जुन पुष्प बीछि रहल छलाह अबैत क्षण,
वाराह वनसँ निकलि कए सम्मुख आएल।
जखनहिँ तूणीर धनुष राखि संधान कएलक,
किरात वराहकेँ लक्ष्य कएने दृष्टि आएल।
दुनू गोटे चलाओल वाण वाराह मारल,
एहि बात पर दुहू गोटे झगड़ा बजारल।
अर्जुनक गप पर जखन ठठाइत किरात,
अर्जुन ओकरा पर तखन वाण चलाओल,
परञ्च देखि नहि घाव कोनो प्रकारक,
अर्जुन किरात पर छल तलवार भाँजल।
मुदा किरातक देहसँ टकाराइत देरी,
भेल अर्जुनक खड्गक टुकड़ी छुबैत देरी।
मल्ल युद्ध शुरू भेल भेल अचेत अर्जुन,
उठल जखन शुरू कएल पूजन कुलदेवक ओ;,
पुष्प पहिराए शिवकेँ उठल गर छल ओऽ माला,
किरातक गरदनि मध्य, देखि साष्टांग कएल तहिखन।
किरात वेशधारी शिव कहल वर माँग अर्जुन,
पाशुपत अस्त्र माँगल छोड़ब रोकब सीखल पुनि।
शिव कहल बुझू मुदा ई तथ्य अछि जे,
मनुष्यक ऊपर एकर प्रयोग कखनहु करब नञि।
तखन अर्जुन निकलि गेल इन्द्रलोक दिशामे,
पाबि दिव्य अस्त्रक शिक्षा मारल असुर ओहिसँ।
एक दिनुक गप उर्वशा आयलि करैत याचना प्रेमक,
अर्जुन कहल अहाँ तँ छी अप्सरा गुरु इन्द्रक।
माता तुल्य भेलहुँ ओहि संबंधसँ अहाँ हमर,
आयल छी हम एतय शिक्षा प्राप्तिक लेल शस्त्रक,
तपस्या नृत्यक आऽ संगीतक करए भोग नहि,
ताहि दृष्टिये अहाँ भेलहुँ हमर माता गुरु दुनु।
उर्वशी तखन देलक ओकरा शाप ई टा,
कामिनीक अहाँ शाप सुनू निर्वीर्य रहब अहाँ,
वर्ष भरि मुदा किएक तँ कहल माता,
शाप ई पुनि बनत वरदान नुकि सकब अहाँ।
पाण्डव जन सेहो पाबि रहल ऋषि मुनिसँ शिक्षा,
समाचार देलन्हि नारद अर्जुनक कहल आएत,
लोमश ऋषि आबि समाचार अर्जुनक सुनाएत।
किछु दिनमे लोमश ऋषि अएलाह ओतए,
कहल प्राप्त कए पाशुपत शिवसँ कैलासमे,
अर्जुन देवलोकमे प्राप्त दिव्याशस्त्र कएल,
नृत्य संगीतक शिक्षा अप्सरा गंधर्वगणसँ
लए रहल शिक्षा अर्जुन देवलोकमे सनजमसँ।
तखन ऋषि तीर्थाटन कराऊ हमरा लोकनिकेँ,
लोमश तखन गेलाह नैमिषारण्य पाण्डव संग।
प्रयाग गया गंगासागर पुनि टपि कलिंग पहुँचल,
पच्छिम दिशि प्रभासतीर्थ यादवगण जतए छल।
स्वागत भेल ओतए सुभद्रा मिललि द्रौपदीसँ,
बलराम कृष्णक सांत्वना पाबि बढ़ल आगाँ,
सरस्वती पार कए कश्मीर आऽ गंधमादन पर्वत,
पार कए चढ़ल पर्वत एक वर्षा आऽ शिलापतन बिच।
पहुँचि गेलाह बदरिकाश्रम विश्राम कएल ठहरि।
ओतहि दुःशला पति जयद्रथ काम्यक वनसँ,
छल जाऽ रहल देखल द्रौपदीकेँ असगर ओतए,
पाण्डवगण गेल छल शिकारक लेल तखन।
बैसल कुटीमे विवाह प्रस्ताव देल द्रौपदीकेँ,
नीचता देखि द्रौपदी कठोर वचन जखन कहल,
रथमे लए भागल अपहरण कए दुष्ट जयद्रथ।
आश्रम आबि पाबि समाचार भीम ओकरा पर छुटल,
तखनहि अर्जुन सेहो आएल पाछू जयद्रथक गेल,
युधिष्ठिर कहल प्राणदान देब पति दुःशलाक छी ओऽ,
जयद्रथ देखल अबैत दुनू भाएकेँ द्रौपदीकेँ छोड़ि भागल,
भीम पटकि बान्हि आनल ओकरा द्रौपदीक सोझाँ,
द्रौपदी अपमानित कए छोड़बाओल ओकरा।
शिवक तपस्या कएल जयद्रथ वरदान माँगल,
जितबाक पाँचू पाण्डवसँ कहल शिव ई,
नहि हारब अहाँ कोनो भाएसँ अर्जुनकेँ छोड़ि।
कर्ण छल तपस्या कए रहल अर्जुनकँ हरएबाले,
इन्द्र सोचल शरीरक कवच कुण्डल अछैत ओऽ,
हारत नहि ककरहुसँ दानवीर पराक्रमी ओऽ छल।
सोचि ओकरासँ हम माँगब कवच कुण्डल,
देखि ई सूर्य कएलन्हि होऊ सचेत अर्जुन,
आबि रहल इन्द्र छद्म वेषमे याचना करत ई,
कवच कुण्डल छोड़ि किछु माँगत नहि ओऽ।
कहल कर्ण याचककेँ हम नहि नञि कहब प्रण,
प्रण हमर नहि टूटत चाहे जे परिणाम होमए।
तखनहि विप्र वेशमे इन्द्र आबि दुहु वस्तु माँगल,
ठोढ़ पर मर्मक मुस्की कर्णक हाथ शस्त्र आयल,
काटि देहसँ कवच कुण्डल समर्पित कएल तखनहि,
इन्द्र देल वर माँगू छोड़ि ई वज्र हमर आर किछुओ,
अमोघ शक्त्ति माँगल कर्ण इन्द्र देलन्हि कहि कए,
मारत जकरा पर चलत पुनि घुरत लग हमर आयत।
शनैः-शनैः छल बीति रहल बारह वर्ष एहिना,
एक वर्षक अज्ञातवासक विषयमे विचारि रहल,
विचारि युधिष्ठिर रहल भाय आऽ द्रौपदीक संग,
तखने कनैत खिजैत एकटा विप्र आएल,
कहल अरणीक लकुड़ी छल कुटीक बाहर टाँगल,
हरिण एक आबि कुरयाबय लागल ओहिसँ,
जाए काल सिंहमे ओझरायल अरिणी ओकर,
विस्मित भागल ओऽ लए हमर लकुड़ी,
कोना कए होमक अग्नि आनब चिन्तित छी।
विप्रक संग पाँचो भाँय हरिणकेँ खेहारल,
मुदा छल ओऽ चपल भए गेल ओझल।
वरक गाछक नीचाँ ओऽ सभ लज्जित पियासल,
ठेहिआयल बैसल नकुल गेल सरोवर पानि आनए।
एकटा ध्वनि आएल ई चभच्चा हमर छी,
उत्तर हमर प्रश्नक बिनु देने पानि नञि भेटत ई।
नहि कान देल ओहि गप पर हकासल पियासल,
पानि जखने पिएल अरड़ा कए मृत ओऽ खसल।
सहदेवक संग सेहो एहने घटना घटल छल,
अर्जुन जखन आएल फेर वैह ध्वनि सुनल,
शब्दभेदी बाण छोड़ल मुदा नहि कोनो प्रतिफल,
पानि पीबैत देरी ओहो मृत भए खसल छल।
युधिष्ठिर भए चिन्तित भीमकेँ पठाओल ताकए,
पानि पीबि मृत भए नहि घुरल ओतए।
युधिष्ठिर जखन वन बीच सरोवर पहुँचल,
मृत भाए सभकेँ देखि व्याकुल पानिमे उतरल।
वैह ध्वनि आएल उत्तरक बिना प्यासल रहब,
होएत एहि तरहक परिणाम जौँ धृष्टता करब।
ई अछि कोनो यक्ष सोचि युधिष्ठिर बाजल,
पुछू प्रश्न उत्तर सम्यक देब शुरू भेल यक्ष।
मनुष्यक संग के अछि दैत? प्रथमतः ई बाजू,
धैर्य टा दैछ संग मनुक्खक सदिखन सोकाजू।
यशलाभक अछि कोन उपाय एकटा?
दान बिनु यश नहि भेटैछ कोनोटा।
वायुसँ त्वरित अछि कोन वस्तु?
मनक आगाँ वायुक गति नहि कतहु ।
प्रवासीक संगी अछि के एकेटा?
विद्याक इतर नहि संगी एकोटा।
ककरा त्यजि कए मनुक्खकेँ भेटैछ मुक्त्ति?
अहं छोड़ल तखन भेटत विमुक्त्ति।
कोन वस्तुक हराएलासँ नहि होइछ मन दुःखित?
क्रोधक हरएलासँ किए होयय क्यो शोकित।
कोन वस्तुक चोरिसँ होइछ मनुक्ख धनिक?
लोभक क्षति बनबैछ पुष्ट सबहिँ।
ब्राह्मण जन्म, विद्या, शील कोन गप पर अवलम्बित?
शील स्वभाव बिनु ब्राह्मण रहत नहि किछु।
धर्मसँ बढ़ि अछि की जगतमे?
उदार मनसि उच्च पदस्थ सभसँ।
कोन मित्र नहि होइत अछि पुरान?
सज्जनसँ कएल गेल मित्राताक कोना अवसान।
सभसँ पैघ अद्भुत की अछि एहि जगमे?
मृत्यु सभ दिनु देखनहु अछैतो जीवन लालसा,
एहिसँ बढ़ि अद्भुत आश्चर्य अछि की?
प्रसन्नचित्त भए यक्ष कहल युधिष्ठिर कहू,
कोनो एक भाएकेँ हम जीवित कए सकब।
तखन नकुलकेँ कए दिअ जीवित,
सुनि यक्ष पूछल कहब तँ भीम अर्जुन कोनोकेँ,
जीवित करब जकर रण कौशल करत रक्षा।
धर्मराज कहल धर्मक बिना नहि होइछ रक्षा,
कुन्ती पुत्र हम युधिष्ठिर जिबैत छी,
माद्री मातुक पुत्र जिबथु नकुल सैह उचित।
सुनि कहल हिरण वेशधारी यमराज हे पुत्र,
पक्षपात रहित छी अहाँ तेँ सभ भाए जीबथु।
पुत्रकेँ देखि मोन तृप्त भेलन्हि यमक,
पाण्डव गण तखन घुरि द्रौपदीक लग गेलाह।
४. विराट पर्व
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 4.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा)
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ------
2.सभा पर्व
संतोष भेलन्हि पाण्डव-जनकेँ ई सुनि,
कथा धृतराष्ट्रक घुरलाह इन्द्रप्रस्थ पुनि।
दुर्योधन दुःखित मंत्रणा कएल शकुनिसँ,
संग दुःशासन कर्णक मंत्रणा फेर जुआक,
विनाशक हस्तिनापुरक छल बेर खराप।
एहि बेरक नियम राखल हारत जे से करत,
बारह वर्षक वनवास आऽ एक वर्ष अज्ञातवास।
धृतराष्ट्र दूत पठाओल हस्तिनापुर फेर।
युधिष्ठिर घुरलाह भायक संग बेर-अबेर,
सुनाओल गेल शर्त्त सभ रोकल एक बेर।
मुदा भाग्यराजक आगाँ ककर अछि चलल,
नहि मानल कएल युधिष्ठिर भाग्यक खेल।
चलि फेर पासा दुर्योधनक,वैह खेरहा,
फेंकि गोटी जिताओल शकुनि ओकरा।
हारि हारल राज्य, पाओल छल बनबास,
युधिष्ठिरक भाग्य चालि कुचालिक जीत,
राज्यक निर्णय जुआक गोटीक संगीत,
की होएत से नञि जानि सुन्न अकास।
३. वन पर्व
धर्मराज सभ हारि,
चलल फेर वैह पथ,
धर्मक आ’ शान्तिक,
छोड़ि सभ बिसारि।
माता कुन्ती छलि वृद्धा भेलि कहल,
कहल धर्मराज नञि जाऽ सकब अहाँ,
विदुर काक केर घर जा’ रहब,
जाएब कर्म भोगए हम सभ।
द्रौपदीक पाँचू पुत्र आ’ पुत्र अभिमन्युक,
सुभद्रा जएतीह अपन नैहर द्वारकापुर।
धौम्यक पुरहित संग द्रौपदी आऽ चारू भाए,
काटब हम संग तेरह वर्षक वनवास जाय।
नगरवासी सुनि गमनक ई समाचार,
कएलन्हि दुर्-दुर दुर्योधनक अत्याचार।
जाएब हमहुँ सभ संग,धर्मराज आइ,
धर्मराज घुराओल सभकेँ बुझाए जाए।
सभ घुरि गेल मुदा,नहि घुरल ब्राह्मण जन,
पुरहित कहलन्हि उपासना सूर्यक एहि क्षण।
वैह दैत छथि अन्न-फल समग्र आर्य,
उपासनाक उपरान्त प्रगट भेलाह सूर्य।
देलन्हि अक्षय पात्र नहि कम होयत अन्न,
द्रौपदी सभ ब्राह्मणकेँ आऽ पाण्डवकेँ खोआबथि,
फेर खाथि, सभ अघाथि, नञि होए खतम,
जखन नञि होए खतम पात्रसँ खाद्यान्न।
युधिष्ठिर पहुँचि सरस्वती धारक कात,
काम्यक वनमे कएलन्हि निवास।
एहि बीच सुनैत पाण्डव-प्रशंसा मुँहसँ विदुरक,
धृतराष्ट्र निकालि हटाओल विदुरकेँ दरबार-मध्य।
ओहो आबि लगलाह रहए काम्यकवनमे,
पुनि पठाओल धृतराष्ट्र ओतए संजयकेँ।
पाण्डव-जनक बुझओला उत्तर विदुर,
धृतराष्ट्र सँग गेलाह पुनि दरबार घुरि।
ऋषि-मुनिक सत्संगसँ लैत शिक्षा आऽदीक्षा,
सुनैत छलाह कथा सरिता नल दमयन्तीक,
अगस्त्यक,ऋषि श्रृंग,अष्टावक्रक,लोपामुद्राक।
कृष्ण आबि बुझाओल ब्यास अएलाह,
ब्यास कहल युद्धक हेतु करू तैय्यारी,
बिनु इन्द्रक अमोघ शिवक पाशुपत्याह,
कोना लड़ब संग भीष्म द्रोण महारथी।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 5.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा)
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ------
2.सभा पर्व
भय मदान्ध दुर्योधन कहल हे विदुर,
जाऊ समाचार ई द्रौपदीकेँ जाए सुनाऊ।
छथि ओ’ हमर दासी झाड़ू-बहारू करथि,
महलमे आबि हमर ई आदेश सुनाऊ।
विदुर कहल औ’ दुर्योधन घमण्ड छोड़ू,
स्त्रीक जुआरी अहाँ हमरा नहि बुझू।
देखि विदुरक ई रूप पठाओल विकर्णकेँ,
जाऊ दासी द्रौपदीकेँ जाय आनू गय,
विकर्ण ई द्रौपदी लग कहि सुनाओल।
चकित द्रौपदी कहल स्वयंकेँ जे हारल,
युधिष्ठिर कोनाकेँ अधिकार ई पाओल,
अपन हारिक बाद होयत क्यो सक्षम,
दोसरकेँ हेतु जुआमे लगाबए केहन।
ई प्रश्न जखन राखल विकर्ण सभा बीच आबि,
दुर्योधन कहल दुःशासन जाऊ पकड़िकेँ लाऊ।
बुझाओल द्रौपदी दुःशासनकेँ , जखन ने मानल,
भागलि गांधारीक भवन दिशि, दौगल दुःशासन,
खूजल केशकेँ पकड़ि घिसिअओने छल आनल।
सभा भवन महापुरुष नहि थोड़ जतय छल।
भीष्म, विदुर, द्रोण,कृपा लाजक लेल गोँतने,
गाड़ि माथ देखि रहल द्रौपदीक अश्रुपात।
सिंहनादमे भीम तखन ई बाजल,
सूर्य देवतागण रहब साक्षी अहाँ सभ,
हाथसँ दुःशासन केश द्रौपदीकेँ धएने,
उखाड़ि फेंकब हाथ ओकर ओ दूनू।
कौरव भय सँ भीत भेलाह नादसँ भीमक,
दुर्योधन देखल मुदा देखि ई छल बाजल,
जाँघ पर दैत थोपड़ी करैत घृणित इशारा,
द्रौपदीकेँ बैसबा लए ओतय कहैत छल।
गरजि कहल भीम अधम दुर्योधनसँ,
तोहर जाँघकेँ तोडब प्रचण्ड गदासँ।
खिसियाकेँ दुर्योधन देलक ई आज्ञा पुनः ई,
चीर-हरण करू दुःशासन द्रौपदी दासी छी।
द्रौपदी कएलन्हि नेहोरा श्रेष्ठ लोकनिसँ
विनय ई,लाज बचाऊ करैत छी विनती।
सभ क्यो झुका माथ अपन ओहि सभामे,
कृष्णा छोड़ल सभ आश सभ दिशासँ,
भक्त्त वत्सल अहाँसँ टा अछि ई आशा।
कोहुना राखू हमर ई लाज अछि प्रत्याशा।
आर्द्र-स्वरसँ छलि रहलि पुकारि द्रौपदी,
गोहाड़ि खसलि सभा-बिच, मूर्च्छित ।
लागल खीचय द्रौपदीक वस्त्र दुःशासन,
सभासद देखल चमत्कार ई प्रतिपल,
यावत रहल खिंचैत वस्त्रकेँ दुःशासन,
बढ़ैत रहल वस्त्र द्रौपदीक तावत खन।
थाकि-हाँफि बैसल जखन दुःशासन,
कहल भीम सुनू सभ एहि भवनमे,
यावत फाड़ि छाती दुःशासनक ऊष्म रुधिरकेँ,
पीयब, नहि पियास मेटत मृत्यु भेटत नहि।
सुनि प्रतिज्ञा ई सभ भयसँ थड़थड़ाय लागल छल।
धृतराष्ट्र देखि दुर्घटना द्रौपदीकेँ लगमे बजाओल,
सांत्वना दए शांत कएल युधिष्ठिरसँ छल बाजल,
बिसरि जाऊ इन्द्रप्रस्थ सुख-शांतिसँ रहए जाउ,
जे हाड़लहुँ,से बुझू देल हम ठामहि लौटायल ।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Saturday, July 26, 2008
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 3. महाकाव्य महाभारत (आँगा)
क्रोधित हृदय ईर्ष्याक वशमे छल दुर्योधनक,
शकुनि संग मंत्रणा कए क’ एकटा विचारल,
सोझे युद्धमे पांडवकेँ हरेनाइ अछि मुश्किल,
सोचि ई दोसर व्यूह रचलन्हि दुष्ट शकुनि।
भव्य सभा भवन एकटा हम सभ बनायब,
पाण्डव-जनकेँ देखबा लेल सेहो बजायब,
द्यूत खेलक छी महारथी हम गांधारवासी,
धृतराष्ट्रकेँ कहि आमंत्रित कराऊ बजाऊ।
भवन बनि कय तैयार भेल एके निसासी।
द्यूत खेलक आमंत्रणक हेतु धृतराष्ट्र विचारल।
विदुर कहल राजन् खेल करत विनाश सभकेँ,
दुर्योधनक अंधप्रेममे धृतराष्ट्र मुदा नहि मानल।
स्वयं विदुर गेलाह देबय निमंत्रण इंद्रप्रस्थ
, पाण्डव जनकेँ अयला पर भेल प्रेम-मिलन।
मुदा हृदयक विष बहराइत जल्दी कोना कए,
दुर्योधन लय गेलाह युधिष्ठिरकेँ सभा भवनमे।
द्यूतक चर्च सगरय होमय लगल छल ओतय,
शुकिनि माटि फेंकि कहल युधिष्ठिर भ’ जाय,
सकुचाइत छी क्षत्रिय भ’ करय छी अनुचित।
युधिष्ठिर तैयार जखने भेलाह,दुःशासन कहल,
ई खेल होयत यधिष्ठिर आ’ दुर्योधनक बिच,
मामा शकुनि पास फेंकताह दुर्योधनक दिशिसँ,
हुनक हारि जीत मानल जायत दुर्योधनक से,
दोसर दिन खेल भेल सभा भवनमे भारतक हे।
सभा भवन दर्शकसँ छल भरल,छल ओतय,
भीष्म,द्रोण,कृपाचार्य,विदुर,धृतराष्ट्र उपस्थित।
पहिने रत्नक बाजी,फेर चानी-सोनक लागल,
फेर छल सभक अश्व-रथ लागल जुआ पर ।
मुदा जकन तीनू टा बाजी युधिष्ठिर हारल,
सौँसे सेना लागाओल दाँव पर ओ’अभागल।
फेर बेर आयल राज्यक फेर चारू भाँय केर,
युधिष्ठिर बाजल नहि बचल लग हमरा लेल।
शकुनि कहल छथि द्रौपदी अहाँक बिचमे।
एहि बेर जौँ जीतब अहाँ, दए देब हम सभ,
भाइ,राज्यसेना,अश्व-रथ,रत्न चानी सोन सभ।
युधिष्ठिर सुनि ई भ’ गेल छल तैयार जखने,
हा। धिक्। पापकर्म की भय रहल अछि ई।
सभा बिच उठि पड़ल सभक नाद ई सभ।
युधिष्ठिर सेहो कहल हम की ई कएलहुँ।
आनन्द मग्न कौरव छल, मुदा संतप्त एकेटा,
दुर्योधन-भ्राता युयुत्सु छल शोकाकुल सएहटा,
शकुनि आब एहि सभक बीच, फेकलक पासा,
ई बाजी हमर,हुंकारलक शकुनि हारल युधिष्ठिर,
द्रौपदीकेँ हारि ठकायल ठाढ़ छल सभा बिच।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Friday, July 25, 2008
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 3. महाकाव्य महाभारत (आँगा)
बीच यज्ञमे उठल छल प्रश्न अग्र-पूजाक ,
भीष्मक सम्मति युधिष्ठिर पुछलन्हि जा’,
भीष्म कहल छथि श्रेष्ठ कृष्ण नृप बीच,
सहदेव सुनि वचन चरण पखारय लाग।
चेदिराज शिशुपालसँ सहल नहि भेल,
अपशब्द कृष्ण-भीष्मकेँ देब’ लागल,
दुर्यओधन-भ्राता प्रसन्न छल भेल,
भीमक क्रोध बढ़ल छल ओ,झपटल,
भीष्म रोकि शांत छल ओकरा कएल।
शिशुपालक गारि सुनियो छल कृष्ण प्रशांत,
छलाह किएकतँ ओ’पिसियौत कृष्णक,
दिन बीतल कृष्ण देलथि वचन दीदीकेँ एक,
सय अपराध क्षमा हम करब ओकर।
सय गारि सुनलाक उपरांत चलल सुदर्शन,
चक्र कएलक चेदिराजक शिरोच्छेद तखन,
सभा मध्य शांति – पसरल छल जाय,
शिशुपाल पुत्रकेँ चेदिक गद्दी पर बैसाय।
यज्ञक क्रिया निर्विघ्न संपन्न छल भेल,
सभ राजाकेँ ससम्मान विदा कएल गेल।
सभा भवनक चामत्कृत्यक भेल चर्चित,
दुर्योधन-शकुनि भवनकेँ देखल चकित।
नीँचा देखि मृग-मरीचिका बान्हल फाँढ़,
पानि नहि छल हसलि द्रौपदी ई जानि,
अयना सोँझा पारदरर्शी नहि ई देखल,
ओ’ चोटिल भीमक अट्टहाससँ विकल।
आँगा स्फटिक फर्श छल जकरा बुझल,
पानि भरल भीजल छल सभ हँसल।
अपमानित छल लय युधिष्ठिरसँ आज्ञा,
चलल हस्तिनापुर शीघ्रहि सभ भ्राता। (अनुवर्तते)
Thursday, July 24, 2008
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 3. महाकाव्य महाभारत (आँगा)
महाभारत (आँगा) ------
2.सभा पर्व
मय दानव छल कय रहल नव निर्माण,
सभा भवनक दिन-राति लागि उत्थान।
स्फटिकसँ युक्त शीसमहल सन कौशल,
युधिष्ठिर ओतहि तखन सिंहासन बैसल।
ऋषि नारदक आगमन भेल ओतय जाय,
देलन्हि करबाक यज्ञ जे राजसूय कहाय।
बजाओल द्वारकासँ कृष्णकेँ समाद पठाय,
कृष्ण कहलन्हि सभा भवनमे आबि कय,
जरासंध मगधक नरेश रहत गय यावत।
राजसूय सफल नहि होमय देत तावत।
बंदी बनेलक राजा लोकनिकेँ ओ’हराय,
आक्रमण ओकर भेल मथुरा पर बड्ड ,
हारि द्वारका राजधानी बनाओल जाय ।
युधिष्ठिर बात सुनैत भेलथि हतास सन,
भीम अर्जुन आशा बन्हेलन्हि भ्राता सुन।
क्षत्रिय-धर्म अछि शत्रुके वशमे करय,
कृष्ण,अर्जुन-भीम संग राजगृह चलल।
ब्राह्मण वेशधारी राजगीरक प्राचीर लाँघि,
पहुँचल सभ सोझे सभा-भवन जी-जाँति।
सत्कार करय चाहलक जरासंध बुझि विप्र,
ललकारा देलक किंतु भीम द्वंद-युद्धक शीघ।
दिन बीतल खत्मक नाम नहि लैछ ई युद्ध,
कृष्णक संकेत पाबि चीरल ओ’शरीर संधिसँ,
भीम तोड़ल शरीर जरासंधक उनटि फूर्त्तिसँ,
शरीर फेंकल दुहू दिशि उनटि एम्हर-ओम्हर,
मुक्त कएल कारागारसँ बंदी गण राजा सभकेँ।
जरासंध-पुत्र सहदेवकेँ दय मगध राजक गद्दी,
आपस भेलाह इंद्रप्रस्थ घुरलाह तीनू व्यक्त्ति।
पूर्व दिशि भीम उत्तर अर्जुन नकुल दक्षिण ,
सहदेव पश्चिम दिशा दिशि दिग्विजय खातिर।
विजय रथ नहि क्यो रोकि सकल हुनकर,
धन-धान्यसँ परिपूर्ण सभ आबि कएल तैयारी,
राजसूय यज्ञक भेल राजा सभक प्रस्थमे बजाही।
राजा लोकनि केँ दय समुचित कार्यक भार,
भीष्म-द्रोणकेँ यज्ञ-निरीक्षणक देल प्रभार।
कृष्ण विप्र चरण-धोबाक लेलन्हि काज ।
हस्तिनापुरसँ भीष्म,
द्रोणक संग भेल आगमन,
धृतराष्ट्र विदुर कृप अश्वत्थामा दुर्योधन दुःशासन।
(अनुवर्तते)
11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)
11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS ( VOLUME I TO XXII )
-
"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
-
उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...
-
जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन...