भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, November 10, 2008

हमरा याद अछि - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

हमरा याद अछि

हम आठमे पढैतछलहु बात त तहिएके थिक । दोसर–दोसर स्कूलसँआयल नयाँ–नयाँ विद्यार्थी तिनटा साथी स परिचय भेल । आ, ई, तिनु सँ परिचय भेलाक बाद हमहु पहिल–दोसर ब्रिन्चि पर बैसनाइ छोरिक अन्तिम ब्रिन्चि पर ओकरा सब साथे बैस लगलहुँ । अन्तिममे वैसकऽ अनेक प्रकारक गप होइछलै । ताहिक्रममे लैरकी सबकेँ बात बेशी होइक । ई सब हमरो सुनऽ मे बड निक लागे । एक दिन हमरा सबकेँ क्लाशमे चौथी ब्रिन्चिपर बसैल भाटारंगकऽ कपडा पहिरने लैरकिकेँ वारेमे गप चलऽ लगलैक । शिक्षक चैलअएलनि सब चुप मुदा शिक्षककेँ गेलाक बाध फेरु ओकरे बारेमे गप । ओ रहवो करै एते सुन्दर जे लगै चन्द्रमा मेँ स टुटल टुक्रासँ ओकर मुह बनल होइक । क्लाशक प्रायः लैरका सब ओकरेपर तकै । आब ओकर नाम कि थिक ? पत्ता लगाब परलैक । मुदा हम अपन साथी सबके हम कहलहु "आहा सब ई काज...... हमरापर छोरिदिअ"सब नाम पत्ता लगाब बाला काज हमरापर छोरिदेलक जखन टिपिन भेलैक । सबगोटा बाहर चैलगेलैक त ओकर किताब–कापी उल्टाकऽ देखलहु । आ ई पत्ता लागलजे ओकर नाम मनोरमा छैक । आब बात रहल ओकर घर पत्ता लगाबकेँ । त आनदिन जैतहु त अबेर भजाइत । ताहि सँ हम आ हमर साथी जगत शुक्र दिनक ओकरा पाछा करैत गेलहँ । घर पत्ता लागिगेल । अहि सब किछ केँ बारेमे हम संजयके सुनैलहूँ । ई सब त हम करैछलहुँ हमर मित संजय ला मुदा मनोरमाकेँ धीरे–धीरे हमरा सँ लगाब होबऽ लगलैक । मनोरमा के हमरा सँऽ लगाब देखिकऽ संजय हमरा सँऽईर्शा करऽ लागल ।मनोरमाकें नजरिमे हमरा गीराबऽ लेल आ अपने निक बनऽलेल अर्धवार्षिक परिक्षाक अन्तिम दिन हमरा पर हात उठेलक अपना साथीमे सबसँ कमजोर हमही रही ताही सँ हमरा माइर खाए परल आ कपार से हो फूटिगेल । बाबुजीक डर सँ घर नहि जाकऽ हम मन्दिरपर वैसल छलि । करिब १५–२० मिनटकेँ बाद मनोरमा ओत पहुचली आ हमरा कहलगली "एना डरपोक भऽ कऽ नहि चलत,.......... आहाँ कँराटे सिखु आ....... किछ करु ।"ई वात सुनिकऽ , हम बड सोचलँहु । कि, ओ ठिक कहलीअ कि बेजाय । ओहि दिन साँझ सँऽ हमहुँ कराँटे खेलगेलहँु । आ, ३ महिना पहुचैत– पहुँचैत हम अपना क्लबके एकटा निक खेलाडी बैनगेलहु । दशमी आएल । स्कुलमें सबसाथी एकआपसमे शुभकामना आदन–प्रदान केओ मुह सँऽ आ केओ पोष्टकार्ड आ ग्रिटीङ्ग कार्ड सँ । हमरो एकटा ग्रिटीङ्ग कार्ड मनोरमाके तर्फ सँ भेटल । जे कार्ड सायत संजय के कहलापर अरुण चोरालेलक । मुदा, फेर छुट्टी कालमे संजय अपनाके हिरो बनाबऽकेँ लेल हमरा पर हाथ उठौलक मुदा हम ओते आब आशान नइ रैहगेलरही । हमरा दुनुके बराबर माइर चलल आ, पुनः हमरा कपार फुटिगेल । तावते स्कुलकें एकटा शिक्षिका आबिक झगडा छोरादलनि । आ ओ ई हो कहलनि जे एहन जँ आदत रहतौ तऽ जीवनमे कहियो आगु बढल पार नहि लगतौ । ई आठ –दश वर्गक विधार्थी कही एहन भेल । फेर, विद्यालय खुजल । सबगोटाके तँऽ बुझले छलैक हमर आ मनोरमाक प्रेमके बारेमेँ ई चर्चा कने बेशिए भऽ गेलैक । एक दिन मनोरमा हमरा स्कुल छोरिकऽ सिनेमा देखला कहलनि । हम आ मनोरमा आशा हलमे अमानत फिल्म देख गेलहु । वै के वाद ई क्रम चलैत रहलै । समय वितते गेलैक । हम सब एस.एल.सी. दैत रही त हमरा मालुम भेल कि मनोरमाके विवाह फागुनमेँ छैक । ई सुनिक हमरा शारीरक रक्त सञ्चार बन्द भऽगेल । हमर सोचन शक्ति हेरागेल । आ एकटा एहन अवस्था चैलआयल जतऽ नहि त हम कानि सकतछी नहि हम हसिसकैत छि । मुदा एतऽ कि करु हम बुझऽ नहि सकलहुँ । ई सुनिकऽ हमरा हृदयके से हो कने चोट पहुँचल किछ दिन बाध ओकर सहेली संकटमोचन लग भेटलनि आ कहलनि "कल्हि खन ३ बजे आँहा राम मन्दिर अवियौ ।"हमरा किछ अवेर भऽगेल करिब पौने चारि बजे ओत पहुँचलहु । ओ सब तिनो बजेसँ पहिले आएल रहैक । हमरापर ओ खुब जोइ सँ खिसएली । मुदा हम किछ जबाब नहि देलियनि । अन्ततः ओ एतवे कहलनि जे हम सब किछ लऽकऽ चैल आएल छि आ अपने सब भागु । हिम्मत काज नहि केलक जे दुनु अदमी भागी जाई । हम नहि छोरिक आइ किछ जबाब नहि देबऽ सकलहुँ । ओना तखन तऽ हम पुरा होशमें छलहुँ । भागीकऽ विवाह करऽ बालाकऽ तिन पुस्ता बखाद भऽ जाइतैछक । ताही सँ ई मनक बातमे हम दिमागक प्रवेश कऽ कऽ हम अन्तोतक नहि मात्र जबाब देलीयनि । एतेक बात मात्र भेलैक मुदा साँझके सात कोना बाजिगेल बुझ नहि सकलहु । जाए कालमे ओ कहली "अमर ............... हम आहाके श्राप त नहि दऽ सकैतछि मुदा एकटा शिख जरुर देब जे.................. एहन काज कहियो नहि करब जै सँ केकरो मनमे दुःख लगै ।"आ ई बात हमरा अखनो याद अछि ।

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