भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Wednesday, February 18, 2009

पहिल डेग-उपेन्द्र दोषी

आ तीनू गोटे बड़ी काल धरि चलैत रहल। चुपचाप। नि:शब्द। आगू-आगू मङर मने सुक्कल मङर, बीच मे चिना माय, सुक्क्लल मङरक घरनी आ तकरा पाछू कल्लर ठाकुर – गामक अधलाह काज मे बाँहि पुरनिहार।
पीच रोडक दुबगली घर सभ रेखैत कल्लर चौंकल –आरे तोरी के! मङर, थुम्हा आबि गेलै हो।
मङर हँ हूँ किछु नहिं बाजल। बस, खाली डेग दैत बढैत रहल। निसाभाग राति मे अनठिया लोक आ लोकक बोली सुनैत दोकानक आगू मे ओङहाइत मोर पाँचेक कुकूर दौड़लै झाँऊ-झाऊँ करैत्। चिनिया माय डरे सहमि गेलि आ मङरक लग चलि आएल। ओकरा कुकूर आ चोर दुनूक बड डर होइत छैक्। लगै जेना ओ जोर स चिचिआय लागति। ओकरा थरभस लागि गैलै आ मङरक लग ठाढि जकाँ भ गेलि। ओकर जाँघ जेना लोथ भ गेलैक आ पायर बान्हल सन बूझना गैलैक। पाछू-पाछू चलैत कल्लर ताबत लग आबि गैलैक –“चलू ने मङराइन चलू! कुकूर तँ एहिना भूकत! हाथी चलय बजार कुकूर भूकय हजार! चलू!”
मुदा पसेना स तीतलि चिनिया-माय की बाजौ? ओकर कंठ जेना फुजबे ने करैक। ताबत किछु आर कुकूर संग भ क तीनू गोटेक आगू पाछू भूक लगलै। कुकूर सभ भूकैत-भूकैत जखन आसमान माथपर उठाब चाहलकै त मङर अपन ठेंङा रोड पर पटकैत – फट-फट क कुकूर के डाँट लगलै, मुदा कथी लै कुकूर सभ गुदानतैक। तहन कल्लर उसाहलक अपन ठेंङा आ झटहा जका फेक क चाहलक कि कुकूउर नांङरि सुटका भागल दोकान दिस। थोड़ेक फरा कजाक फेर भूक लागल। चिनिया-माय के जेना जान मे जान अयलै। ओ फक द निसास छोड़लक। खा पोसनिहार सब के! चिनिया माय डेराइते बाजलि।
-- चुप रह चल चुपचाप। मङर धोपि देलकै।
-- मौगि कथु जाति, अपन सोभाव नहि बिसरति। मङरक स्वर मे सह दैत कल्लर समर्थन कयलकै।
-- सैह न कह्। कहलकै जे चालि, प्रकृति, बेमाय, तीनू संगहि जाय। त अनेरे तखनी स घाठि फेनने छै। चिनिया माय खौंझाइत कहलकै।
-- रौ बहिं…हमरे धोपै-ए! कल्लर? सुनहक! कहलकै जे अहीर बुझाबय से मर्द। गै, अखनी जे तू गारि पड़लीही से जँ सुनितौ रहे, आ आबि क चारि सटका पोनपर ध दितौ त केहन लगितौक।“मङर फेर चिनिया माय के रेवाड़लक।
--छोड़ि दहक मङर, तोंहि चुप भ जाह। कथी लै लगैत छह मौगी स। मौगी होइ-ए धीपल खापड़ि। एक मुट्ठी बातक तीसी जहाँ पड़ल की लागल चनचनाय।“ कल्लर स्थितिके सम्हारैत बाजल।
--मर, हम त कुकूर के कहलिएक। लोक के कहलिएक थोड़े! कहलकैक जे –घेघ छल तोरा, उछटे गेल मोरा – चिनिया माय साँचे चनचना उठल।
-- खैनी खेबहक मङर? – गप्प आ स्थिति के दोसर दिस मोड़ैत कल्लर पुछलकै।
--ओह बहिं। कुकूरो सभ किछु आँखि देखलक-ए! देख ने कोना हवाइ लुटने अछि। मङर कुकूर दिस फेर ठेङा उसाहलक।
कुकूरक अनवरत भूकब सूनि एकटा दोकानदार बल स उकासी आ खखास कैलक। सड़कक दोसर कातक दोकानदार टार्चक रोशनी एहि तीनू गोटेपर फेकलक आ पुन: सूति रहबाक उपक्रक कर लागल। पानवाला झाजीक निन्न सेहो टूटि गेलैक।
--की छिऐ हौ सुमरित? कुकूर बड़ लगै छै? झाजी ओंङ्घायल स्वर मे पुछलकै।
--नै कुच्छो! बटोही बाबा। सुमरित बातके अनठबैत कहलकै।
--एते रातिक बटोही? झाजी फेर टोकारा देलकै। खौंझा गेल सुमरित्। इह! इहो बुढबा जे है। सुतत से नै, त कथी है करै-ए। मुदा झाजी के मुँह पर की कहौ? तह दैत बाजल – हौतै कोई, साथमे एकटा जनानियो हई।
--आँय! जनानियो है? – झाजी जेना के जेना धरती पर स्वर्ग भेटि गेलनि। जरूर ई उढरा-उढरी होयत। जरूर ककरो ल क पड़ायल होयत। झाजी फनिक क गुमटी सँ आबि गेल। कुकूर सभक आ झाजीक कोरस सूनि लगभग पूरा थुम्हा बजार जागि गेलै। बजारे कोन? गोट तीसेक घर कुल मिला क। पीच रोडक दुबगली। धिया-पूताक धरिया जका पसरल।
से झाजी सङ झटकल चारि गोटे आर। दौड़ल तीनू के रोकय लेल। कल्लर पाछू तकलक आ सहमि क ढाढ भ गेल।
--कहाँ रहै छ? ढाढ रह – झाजी डपटि क बाजल। चिनिया माय आसन्न भय स प्रकम्पित भेलि मोने-मोन गोहारि कर लागल -- जय हो खेदन बाबा, जय कारू बाबा!
--कहाँ रहै छह? – चाहबला छौड़ा बाजल।
-- रामनगर। -- कल्लर बाजल।
-- कोन रामनगर? – झाजी डपटैत पुछलकै।
-- हरदी-रामनगर। मङर पाछू घुनैत उत्तर देलकै।
-- जेब कहाँ? – सुमरित चिनिया माय के मुँह पर टार्च बारि क रोशनी फेकैत पुछलकै।
-- सुपौल जयबै बाबू। -- कल्लर मिरमिराइत बाजल।
सुमरित आ झाजी चिनिया माय के देखलक आ सोचऽ लागल। गोर अदक देह। छाती आ बाँहि गोदना सँ छाड़ल। नाक मे करीब एक भरिऽक लोलक निचला ठोर पर लटकैत। करीब चालीसक वयस, मुदा शरीर कटगर। झाजी जखन-जखन एहन लोक के दैखैत अछि – लोलऽक लेल सोचऽ लगैत अछि। सैह, ई मौगी खाइत होयत तँ लोलक मुँहमे नहिं चल जाइत होयतैक? थूक फैकैत होयत तँ लोलक पर सभाटा लटकि जाइत होयतैक? मुदा झाजी एखन किछु नहिं सोचलक। बाजल – सो सभ कुछ नहीं होगा। हम निगरानी समिति का सेकरेटरी है। रात भर तुम लोग हियाँ रुक जाव। भोर मे जहाँ जाना है चला जाव। एतना रात को जाने नहीं देगा। रात को औरत लेके चलेगा? की हौ छब्बू?
--हँ मालिक! – चाहबला छौंड़ा हुँकारी भरलकै।
-- से की हम कोनो अनकर मौगी लऽ कऽ जाई छियै? अपन घरनी के लऽ कऽ जाइ छी।
-- चोप! तामस चढाता है, घरनी का भरुआ। एतना रात को चलेगा? झाजी फेर दबारलक।
मुदा बाह रे कल्लर! दिमाग मे जेना प्रश्नऽक सही उत्तरि भेट गैलै। ओ कने एकांत भऽ गेल। आ एक दू गोटे के अपना दिस बहटारि लेलक। बाजल – असल मे मङराइन के केन्सर के बीमारी भेल छै। ब्लाकऽक डाकटर कहलकै जे पटना मे जल्दी देखा ले। सम्भव आगूओ जाय पड़त। तेँ बाबू भोरका गाड़ी पकड़ऽ लेल धड़फड़ायल छिए। नहिं त रामनगर आ सुपौल कोन दूर? दू-अढाई घंटाक रास्ता।
-- केन्सर? – सभ फुसफुसायल अपना मे। सुमरित पहिने हनछिन-हनछिन करैत रहय। भारी बीमारीक नाम सुनि छौंड़ो सभ पाछू हटऽ लागल। तखन झाजी बेचारे की करत? – अच्छा रमनगर के गंगाधर झा के चिन्हैत छहका?
-- ओ तऽ हम पड़ोसिये छथि! – कल्लर बाजल।
-- आ राजीन्दर बाबू के?
-- ओ हम्मर पड़ोसी – मङर बाजल। हबैन तक हम हुनके हऽर जोतैत छलियैन।
बड़ बेस, जाह। मुदा देखऽ रातिकऽ चलै छह, नीक नहिं करै छह। -- झाजी हारल जुआरी जकाँ बाजल।
-- की करबै मालिक! कोनो की सऽखसँ रातिकऽ चलै छी? जाउ आहाँ सुतू गऽ। परनाम! कल्लर पिण्ड छोड़बैत बाजल।
-- अच्छा, सुनऽ, गाँजा-बाजा तऽ ने छऽ संग मे? – फेर झाजी पुछ्लकैक।
-- नहिं मालिक, जाउ निचैन भेल।
झाजी अपन गुमटी मे फिरि आयल आ अंङैठी-मोड़ देबऽ लागल। हाँफी। हाँफी पर हाँफी।
कुकूरो सभ अपना सीमान सऽ टपल बूझि चुप भऽ गेल। थुम्हा बजारा से इहो तीनू टपि गेल। आब कारी स्याह पीच रोड आ रोडक दुबगली बबूरक बोन। रातुक अन्हार मे कारी सड़क आर कारी लागऽ लगलैक। भारि अकास जनेरक माबा जकाँ तरेगन छिड़िआयल रहैक आ भिखमंगाक फाटल कंबल सन सहस्त्राक्ष लगैक।
बबूरोबोनि जखन टपि गेल तऽ तीनू कने आफियत अनुभव कयलक्। भीड़ स बेदाग निकलि कऽ चलि आयल तकर प्रसन्नता सबऽ सऽ बेसी कल्लर के छलैक। कारण स्थितिक गंभीरताके वैह बुझने रहैक। मङर- मङराइनक हेतु धन-सन। जेना अदना सन गप्प भेल होइक। कल्लर प्रसन्नता सँ उठौलक पराती – तीन देखहुँ जात, सखि हे तीन देखहुँ जात! कमल नयन, विशाल मूरति, सुन्दरी एक साथ! सखि हे! इह! बरगाही भाइ, ठकुरबो जे है, अतत्तह करैए। अरे दुपहरिया राति मे पराती गबै-ए चलऽ की चुपचापे! – मङर अकछाइत बाजल।
-- आब की राति धयले छै? भोर त भऽ गेलै। -- कल्लर बाजल।
-- “रौ बहिं, डंडी-तराजू माथ सऽ कनिये हठ भेलै आ भोर भऽ गेलै? कम सऽ कम एखन एक पहर राति आर छै। देखहक—“ मङर कल्लर के बहटारलक आ आकास मे उगल त्रिशंकु दिस इशारा करऽ लगलैक।
-- अच्छा छोड़ऽ -- कल्लर अनठबैत कहलकै।
-- ‘तखन तेजू मिसर की सभ केलक मङराइन?”
-- मङराइन जे मानसिक रुपे गाम आ बथान मे ओझड़ायल छलि, साकांक्ष होइत बाजलि – ओना परोछक बात छै, लेकिन हमरा तेजू मालिक किछु नै कहलक। हमर हाथो नै धयलक। बाटे धयने आयल, बाटे धयने गेल।“
-- सुनलहक मङर? भऽ गेलऽ! लड़ि लेलऽ मोकदमा? हम तऽ पहिने कहलियऽ, मौगीक विसबास नहिं।“ – कल्लर स्पष्ट कऽ देलकै।
मङर अपन फराठी सम्हारैत लागल रेड़ऽ -- गय मौगी, तेजुआ…! गय, हाकीम पुछतौ तऽ इहे कहबही। गाम आ सुपौल सभ घिनाओत ई मौगी। देखि ले डांङ। ठीक-ठीक जे कल्लर सिखौलकौ, हाकिम लग कहऽ पड़तौक। ने तऽ देखि ले। एही डाङ सऽ डेंङा देबौ। सुक्कल मङर के तों एखन चिन्हले कहाँ? – मङर हकमि जकाँ गेल।
-- कुच्छो करऽ, हमरा लाज होइ-ए। ई बात हमरा हाकिम लग कहल पार नहिं लागत्। हम गामे सऽ कहैत अबै छियऽ। मारि देबऽ तऽ मारि दऽ। चढा दऽ चाँपे। मुदा हमरा बुते ककरो आगि उठाओल पार नहिं लागत। बेचारा हमर किछु बिगाड़बो नै केलक तऽ हम अनेरे कथी लेल दोख दियौक। झूठ बाजि कऽ की?” – चिनिया माय घनघनाइत कहलकै।
-- गय, सोनाक टुकड़ी खेत कबुआ लेलक। मालक बथान लेल मोंछ पिजबै-ए आ तों कहै छे हमर कुच्छो नै बिगाड़लक? दही न अथी कराकऽ ओकर रुप्पैया, जे करजा सधाकऽ खेत छोड़ायब।“—मङर चिनिया माय के गरिअबैत बाजल।
-- “दौक ने देह बेचिकऽ टाका जहाँ सँ होई छै तहाँ से। करजा खेलकै ई, एकर बाप, आ देबै हम?” – चिनिया माय बिक्ख होइत लोहछैत बाजल।
-- “गय, तों हमरा बापके कहबे?” फटाक- फटाक। -- आ मङर बैसा देलकै दू डाङ चिनिया माय के पोन पर।
-- “मङर, हम पहिने कहलियऽ। एकरा बूते नहि होएतऽ। ई तऽ तेजुएक राज़ी छऽ। ओकर सिकैत बजतऽ? ई तऽ गोटे दिन तोरे माहुर खोआ देतऽ।“ – कल्लर ललकारा देलकै।
-- “रै कोढिया! पुतखौका ! तोरे घरनी सन सभ छै? तोरे घरनी जेना जुगल सिंह सङे फँसल छौ, तहिना बुझै छिही। बड़ पूर बनऽ चलला-हे। हम जेना जनिते नहि छियनि?” – चिनिया माय कसिकऽ कल्लर ठाकुर पर प्रहार कयलकै।
कल्लर ठाकुर एहन प्रहारक कल्पनो नहिं कयने छल। तिलमिला गेल। “तखन लिहऽ खेतक साँती बाप बलाऽ…।“ – कल्लरो ताव मे आबिकऽ बाजल। “मङर एहिसँ नीक तँ चिनिया। तोहर बातो मानैत छह। फट फट जबाबो दितैक हाकिम के। इह। पौ बारह!”
-- रौ कलरा, किछु भऽ जाउ, हम अपना बेटी के बजार नहिं चढायब। एखन ओकर गौना करबाक अछि। ओकरा हाकिम लग ठाढ करबै तऽ हम रहब कहीं के? गौना होयतैक? कुटुम की कहत? नहिं ई नहिं होएत। ओ तऽ पाहुन थिक। हमर लोक थिक थोड़े? ई जे हमर लोक अछि तकर ई हालति …।“ --- कहैत कहैत मङर पित्ते लह-लह करऽ लागल।
बेटीक मादे सुनैत देरी चिनिया माय जेना उग्र भऽ गेलि। ओकर सौंसे देह काँटो-काँट भऽ गेलैक। उनटि कऽ ओ कोन फुर्ती सऽ कल्लरक पेट हबकि लेलकै से कल्लरो के पता नहिं चललैक। कल्लर बफारि तोड़ऽ कानऽ लागल। आ, पेट मे दाँत गड़ौने चिनिया माय संज्ञा शून्य भऽ गेलि। बड़ी का पर होश भेलै तऽ तर मे कलराक ऊपर सऽ स्वयं के पड़ल देखि हड़बड़ा गेलि चिनिया माय। उठलि आ लागलि बड़बड़ाय – हम अनकापर पाथर नहिं फेकबै, नहिं फेकबै। किन्नहु नहिं, किन्नहुं नहिं। बताहि भऽ गेलि चिनिया माय। मङर बामा हाथे फराठी आ दहिना हाथे माथ पकड़ि बैसि गेल। खन कल्लर के देखय, खन चिनिया माय के। डंडी तराजू पछिमा अकास मे लटकि गेल रहैक। त्रिशंकुक निचला तारा जका मङर लटकि गेल रहय। की करौ? की करौ ओ?

चिनबारक दीप–उषा किरण खान

समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक। नबका अटैची के राग तर नीक जऽका दाबि लेलकै। डिब्बा मह’क सभटा यात्री तऽ भरि दिनुक चीन्हले-जानल छैक। भतीजीक विवाह छैक से गाम जाइत छैक। ओ अगिले टीसन पर उतरि जयतैक। ताहि सऽ बगलबला बाबू कोनो लड़िकाक उदेस मे पटना गेल छलैक्। आ गेट लग ठाढ बाबू भारी गुम्मा छैक। टोकलो पर नै बजै छैक। कोन टीसन जैतै, की करतै। एक्को बेर मुँह पर मुसकियो ने अयलै। ठोरो नै पटपटौलकै। “बाप रे बाप, एतीकाल धरि जौं हम चुप रहि जाई त मुंहे फरि जायत। गे दाई!” मोने-मोन विचारलक। मोन भेलै कहै – “हो बाबू, निम्मन से बैठू ने, हबा नै लगइये”। मुदा चुप्पे रहल।

महेसरीक घरबला एकटा कुमारि आ एकटा बियाहलि बेटी लऽ कऽ गामे मे रहै छलै। जवानी समय मे रिक्शा चलबैत रहै आ महेसरी दाइक काज करैत रहय। सुख सऽ रहय। ससुर मुइलैक तखन जमीन बाँट-बखरा भेलै आ बिगहा डेढक एकरो हिस्सा भेलैक। ससुर जा जिबैत छलै एकटा खुद्दियो नई परि लागऽ देलकै। नबकी बहु संग सभटा जमीन लऽ कऽ आतरि-चातरि भेल रहैक। मुइला पर कामति गाम नहिं छोड़ैत छल। एकटा बेटीक बियाह तऽ पहिने कयने रहे, दोसर बेटिक बियाहक सरंजाम जुटबऽ लेल महेसरी गाम छोड़ि पटना सेवने छल। पटना मे मारे इतियौत-पितियौत भाइ-बहिन सभ रहैत छैक। तकरे संगे रहि छौ डेरा मे चौका-बर्तन करैत अछि महेसरी।

“हे गे बहिन, अपन समान सब ठीक सऽ रखिहैन आब। अइ गाम जाएबला गाड़ी मे ने बिजली छै ने बत्ती”। -- सगबे भाइ कहकै।
“ठीक से हय हमर समान”। -- महेसरी घोकरी लगा लेलक।
“है तऽ सेहे”। -- दोसर भाइ बजलै।
“रे बाबू गरीब आदमी छी, डेरा मे कमा कऽ जमा कैली इ सब सरंजाम के लेत हमर समान?”
“की सभ समान? तोरा सभ के तऽ बेसी लगै छऽ नहिं” – सामनेबला बाबू पुछलखिन।
“यौ बाबू, हमर जे जमाय हय ने, से दमकल के मिस्तिरी हय। तनी-मनी जमीनो-जाल है मरदाबा के। से ओक्कर मुंह बड़का गो है। घड़ी-साइकिल-रेडियो। लत्तो-कपड़ा खपसूसरत कहै छै”।
“तऽ देबही से सब?” – दोसर यात्री पुछलखिन।
“हँ सरकार, एगो मलकीनि है, से हरदम डिल्ली जाइत रहै छै, कल-पुरजा के कारबार हई। ओकरे से घड़ी आ रेडियो मंगबेलियै। पटना से आधा दाम मे हो गेलै”।
“बाह, तखन तऽ लेलहक समान”।
“त ए सरकार, एगो मलकिनिया हय मरबारिन। तऽ ओकर बक्सा मे कोंचल हय रंग-बिरंग के सरिया। ऊहे हमरा एगो जरी के काम कएल साड़ी देलक। पीयर टूह। हम कहली जे होली-दसहारा के साड़ी न दिऊ, ई साड़ी दे दिऊ। आ बाकी मलकिनियाँ सब से साड़ी ले-ले कऽ रखले रही से सब ले जाइ छी। बेटी के सांठे के न परबाह हय”।
आ लड़का के कपड़ा? से तऽ कीनने हेबहऽक”? --- बाबूक जिज्ञासा रास्ता कटबाक साधन सेहो छलनि।
“लड़िका के कपरा किन लेलियै। बेटी के लेल एगो पायल आ बालचानी के किनलियै। बड़ा महग हो गेलै…”।

दरबज्जा लग ठाढ अरुणक कान मे सभटा पड़ैत छैक आ कनपट्टी पर धम-धम होमय लगैत छैक। आइ तीन बरख पर गाम जा रहल अछि अरुण। बाबू बीमार छथिन आ बहिनक द्विरागमन हेतै। बाबू बड़ कलपि कऽ लिखने छथिन आबऽ लेल। सरंजामक ओरियान कऽ नेने छथिन, खाली घड़ी आ रेडियो तों नेने अबिहक --- से बाबू लिखने छलखिन। अपना जेबी के टेबलक अरुण। मात्र डेढ सै टाका छैक। एकटा निसास छोड़लक। गाम मे बीए पास कऽ क बैसल रहय तखन बाबू केहन-केहन कटुक्ति सब कहि मोन बताह कैने रहथिन। एत्तुका लोक के नोकरी भेटै छै कि नय? अरुण सबटा बर्दाश्त कऽ खेत-पथार जाइते रहल। एक्केटा पुत्र रहथिन। बूझथि बाबू स्नेह सऽ कहैत छथि। कनियाक द्विरागमन भेला पर अरुण के कटुवचन अखरय लगलनि। बाबू दिनानुदिन बेसी कटु भेल जाइत छलखिन। माय सेहो थारी संग पहिने उपदेश पाछा उलहन आ आब गारि परसऽ लागल छलथिन। तखन अरुण हारि कऽ गाम छोड़ि देलक। तीनटा ननदि सबहक बीच एकटा भाउजि अरुणक कनिया नैहर चल आयलि छलीह। आ एमहर-ओमहर एँड़ी घसैत अरुण कोनो खानगी व्यापारी ओतय टाइपिस्ट भऽ गेल छलाह। कनिया सेहो संगे रहय लागल छलखिन। छौ मास पहिने कनिया के एकटा बच्चा नष्ट भऽ गेल छलनि। ओ अत्यन्त रुग्ण भऽ गेल छलखिन। अरुणक सीमित आमदनी ओही मे स्वाहा भऽ जाइत छलनि। कतेक पाइ हथपैंच भऽ गेल छलनि।

“दुनू परानी मिलि कऽ कमयली ए बाबू, तब न बेटी के आइ साँठ-राज करै छी। की बरक-बरका लोक करत ऐसन साँठ-राज”। --- महेसरी जोर-जोर सऽ बजै छल। आ अरुणक कान मे अपना कनियाक कुहरनाइ धमकऽ लगलनि। कोनो काजक नहिं छथि। अरुण मोनेमोन विचारय लागल। गामक साधारण घरऽक बेटी छथि, मुदा दुनू बेकतीक काजो नै सपरै छनि। मोनेमोन खौंझाहटि उठलनि। फेर विचारय लगलाह। ओहि मे हुनकर कोन दोख। जेहने शिक्षा-दीक्षा भेटतनि तेहने बुद्धि-अक्किल हेतनि। बिसरल-भटकल कत्तहुँ सऽ कहियो कोनो चिट्ठी अबै छलनि। परसू चिट्ठी भेटलनि बाबूक तऽ बड्ड अचरज भेलनि। क्षणहि मे अचरज बिला गेलनि। छोटकी बहिन प्रमिलाक द्विरागमन मे बच्चा आ कनियाँ के बाबू बजौने छथिन। अरुण पत्र पढि चिन्तित भऽ उठल छल। कतऽ सऽ ओ बाबूजीक फरमाइश पूरा करथिन?

“ई पहिले पहिल बाबू मुँह खोलि कऽ किछु मंगलनि अछि। की करबैक”? – पत्नी सारगर्भित विचार प्रकट कैलथिन।
“हुनका मंगबाक आवश्यकता की छलनि?” – अरुण कहने छलखिन।
“तें ने, आब भेलनि अछि तऽ मंगैत छथि। जैयौ, सर सरंजाम सेहो करऽ पड़त” – कहलखिन पत्नी। अरुण सक किछु पार नै लगलै तऽ अपने पेटी मे सऽ नूआ बहार कऽ ननदि लेल देलखिन आ नोर पोछैत विदा कयलखिन।
“लोक की कहत? अन्तिम ननदिक दुरागमन छल” --- भरल कंठ सऽ बजली।
“की कहत? हम नै लऽ जाएब। हमहीं जाइ छी से बहुत करै छी” – डपटि देने छलखिन अरुण।

आ डेढ सै टाका जेबी मे नेने जाइ छथि। जिद्द करथिन तऽ अपना हाथऽक घड़ी दऽ देथिन। आर की? लोक की कहतै? गामक लोकक सोझाँ कोन मुँह देखौथिन। ई साधारण दाइ-खबासिनी घड़ी आ रेडिओ नेने जाइ छै। मुदा अरुण की करतै। एकर पत्नी तऽ परिवार मे दाइक पाइ बचौतैक ताहू जोग नहिं छैक। बाबू गामहि रहऽ दितथि …तऽ की? कोना रहय दितथि, लोक की कहितैन। फेर ओएह गाम, समाजक लोक आ लोकापवाद चारुकात सऽ घेरि लैत छैन। बीए पास कऽ कऽ गाम मे घरुला बनल छथि। आ लैह। रहऽ शहर मे। करह नोकरी। एकटा बेटा, माय-बाप कतहु, अपने कतहु। ऐ बेर तऽ बाबूक चिट्ठी मे स्वर बड़ कमजोर बुझना गेलनि। रुग्ण छथि, आब होएत होतनि बेटा संगे रहितौं। किंवा बेटेक संगे अपने रहथि।

महेसरीक गर्वोक्ति सुनि-सुनि अरुणक खून गरम होबय लगैत छनि। दृष्टि महेसरीक राग तर दाबल अटैची पर जाइत छनि – नव ललौन अटैचीक चमकैत हैन्डिल एम्हरे छैक। ओइमे घड़ी आ रेडियो छैक, चानीक पायल आ दोसर बस्तु-जात सभटा छैक। के जानय महेसरी ई सब मालिक-मलिकाइन सबहक ओतय से चोरा कऽ जमा केने हो, के जानए। ई सब बड्ड चालाक होइत अछि। विचारलनि अरुण – फुसिये ठकि रहल अछि जे छौ-छौ डेरा मे काज करैत छी। खाली फाजिल गप्प। जरुर ई चोरौने जाइ छैक। कहुना लऽ जाइ छै। अरुण तऽ कहुनो नय नेने जाइत छथि। गाम मे माय-बाप आ बहिन रास्ता तकैत हेतैनि – अरुण औताह आ सबटा दुःख दूर कऽ देता। स्वर तऽ तेहने रहनि पिताक पत्रक। एकटा छोट-सन स्टेशन आर तकर बाद अरुणक स्टेशन । वस्तुत: दुनू स्टेशनक बीचहि मे अरुणक गाम पड़ै छनि। एक बेर फेर अरुणक दृष्टि महेसरीक अटैचीक हैन्डिल पर पड़लनि। एक झटका मे अटैची घीचि तेज होइत गाड़ी स अरुण उतरि कऽ पड़ा जाथि तखन की? विचारैत काल शरीर मे रक्त तेजी सऽ दौड़य लगलनि। स्टेशन पर सऽ गाड़ी ससरऽ लगलै। अरुण अझक्के अटैची घीचि लेलखिन। महेसरी मुंह बौने रहि
गेल। छि: ई की करै छी हम? एकटा चौका-बरतन करऽवाली स्त्रीक सामग्री चोरबै छी? ई विचारि मोन मे अबिते अरुणक आगू बढल पैर ठमकि गेलनि। मुँह बौने महेसरी आ आगू बढैत ओकर संगबे अन्हार मे तकित रहलै आ अरुण अटैची महेसरीक कोरा मे पटकि एकटा खाली हँसी हँसऽ लागल।

“एह, हम तोरा ई बुझबा लेल अटैची घिचलिअऽ जे खाली बात पर नहि रहऽ समानक रक्षा सेहो करऽ।“
“ए बौआ, हमर तऽ जिउए हाथ हेरा गेल। बड़ कठिन कमाइ के है” – महेसरी कँपैत स्वर मे कहलकै।
“नहिं नहिं, डेरै के बाते नै छै, बाबू देखतहिं सुधंग लगै छथिन” – ठिसुआएल एकटा संगबे बजलै महेसरी सऽ।

अपन अशुद्ध मोन पर संस्कारी शुद्ध मोनक विजय बड़ सुखकर लगलै अरुण के। जाड़ो मे पसीना छुटि गेलै। तरहत्थी भीज गेल छलै। कंठ सुखा गेलै। मुदा माथ एखन खाली छलै। एकदम्म शून्य। किछु नै छलै। गाड़ी दोसर स्टेशनऽक लग आबि गेल छलै। पुक्की पारय लगलै। अन्हार दिस तकैत अरुणक आँखि एकटा खोपड़ीक चिनवार पर चलि गेल। चिनवार पर दीप जरै छलै।

कतेक डारिपर पुरस्कृत



जितेन्द्र झा. १७ फरबरी २००९ । नयाँ दिल्ली
मैथिली भाषाक कतेक डारिपर संस्मरण कृतिके एहिबेरके साहित्य एकेडमी पुरस्कार 2008 देल गेल अछि । भारतक राजधानी नयाँ दिल्ली स्थित साहित्य एकेडमीद्वारा आयोजित एक समारोहमे विभिन्न 23 भारतीय भाषाक कृतिके पुरस्कृत केएल गेल अछि । साहित्य एकेडमी पुरस्कार अन्तर्गत 50 हजार भारतीय नगद आ ताम्रपत्रसं सर्जकके सम्मान कएलक । मैथिली भाषाक संस्मरण कृति कतेक डारिपरके लेखक मन्त्रेश्वर झा के इ सम्मान देल गेलन्हि । एहि पोथीमे झा अपन प्रशासनिक जीवनक अनुभव सहेजने छैथ । झा मैथिली साहित्यिक, सांस्कृतिक अभियानमे सक्रिय छैथ ।
झा मैथिली साहित्य समृद्धिक लेल पाठक संख्या बढएबापर ध्यान देल जएबाक चाही कहलनि । मन्त्रे·ार झा पटनावि·ाविद्यालयसं स्वर्ण पदक आ राजनीतिमे स्नातकोत्तर कएने छैथ । हिनक अन्चिन्हार गाम, बहसल रातिक इजोत, कांटक जंगल आ पलाश, चाही एकटा नोकर जेहन कृति प्रकाशित छन्हि । हिनक जन्म सन् 1944 मे बिहारक मधुवनी जिलामे भेल छन्हि ।
सन 1972 में झाक प्रथम कृति खाधि कविता संग्रह प्रकाशित भेल रहनि । एखनधरि हिनक 25 टा कृति प्रकाशित भ चुकल छन्हि । पुरस्कृत पोथी मैथिलीमे नव आयामक पहिल आत्म कथा मानल गेल अछि ।