भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, September 07, 2009

नेना भुटका - दयावान बालकक कहानी

दयावान बालकक कहानी

फ्रांस शहरमे एकटा लड़का आर एकटा ओकर बहिन छल। दुनू भाइ-बहिनक बीचमे बड़ प्रेम छल। लड़काक नाम नेपोलियन छल आर लड़कीक नाम इलायजा छल। दुनू गोटे बड़ नटखट छल। एक दिन दुनू भाइ-बहिनक बीचमे तय भेल जे सभसँ तेज के दौड़ब।
ई बातपर दुनुक बीच तय भेल जे- जे जीतब से पार्टी देब। दुनू भाइ-बहिन दौड़ै लागल। दौड़ैत-दौड़ैत दुनू गोटे एकटा लड़कीसँ टकरा गेल। से ऊ लड़की केर माथापर एकटा टोकरी छल। लड़की आर ओकरा माथापरक टोकरी जकरामे फल सब रहै से रोडपर खसि गेल। लड़कीकेँ क्सि कए चोट लागल। दुनू भाइ-बहिन मिलि कऽ ऊ लड़की केँ उठेलक आर पुछ्लक- चोटो लगल ये अहाँकेँ। ई बातपर लड़की कहलक जे कसि कऽ लागल छल। दुनू भाइ-बहिन मिलि केँ लड़की केर टोकड़ी आर ओकरामे फल छलै सेहो, सभकेँ उठाय, ओकरा अपन संगे अपन घर लेलै चल गेल। ओतए ओकर माँ छै, से कहलक जे ई अहाँ ककरा अपन संगमे लेले ऐलो ये। तँ दुनू भाइ बहिन कहलक जे हम दुनू गोटे दौड़ैत छलौ, ई हमरासँ टकरा गेल आर एकर माथा परक टोकरीमे छ्लै फल, सब सड़कपर बिखरि गेल आर एकरा चोट सेहो लागि गेल छलै। से हम एकरा अपन संगेमे लेले ऐलोँ। एकरा एकर फलक पैसा दऽ दियौ। ई बातपर हुनकर माँ गुस्सा गेल आर कहलक- एना अहाँ सब किए करैत छी। आर घरक अन्दर गेल, पैसा आनिकऽ ऊ लड़कीकेँ दैत पुछलक जे अहाँ एतना कम उम्रमे एहन भारी समानकेँ ठा कऽ कतए जाइ छलौँ। तँ जाएकऽ लड़की कहलक- हमर बाबू बड़ बीमार छल। एकरा बेच कऽ हम अपन बाबूकेँ डॉक्टरक पास लै जेतौँ। लड़कीकेँ ई बात सुनिकऽ दुनू भाइ-बहिन आर हुनकर माएकेँ बड़ दया लागल आर कहलक जे अहाँ केर घर कतए ये, से हम सब अहाँक संगमे अहाँक घर चलब। ई बातपर लड़की केर आँखिमे आँसु आबि गेल आर कहलक- चलू, अहाँ सभ हमर घरक लेल। दुनू भाइ-बहिन, हुनकर माए, ऊ लड़की केर संग बिदा भेल आर लड़कीक घर पहुँचल तँ देखलक जे एकटा अधवयसू आदमी एकटा चौकीपर सुतल ये आर खाँसि रहल ये, जकरा देखने से लागैत छल जे ई आब नै बचत। दुनू भाइ-बहिन आर हुनकर माए ओकरा अपन गाड़ीमे डालि कऽ अस्पताल लेले गेल। ओकरा अस्पतालमे भरती करबाएकऽ कहलक- जे खर्च आएत हिनका ठीक होएबाकमे, सब हम देब। आर दुनू भाइ-बहिन मिलिकऽ हुनकर खूब सेवा कएलन्हि। लड़कीक बाबू जल्दीए ठीक भऽ गेलाह आर अपनासँ चलिकऽ घर पहुँचलाह। आर ऊ दुनू भाइ-बहिनकेँ ओ सभ बड़ आशीर्वाद दैत छलै। ई लड़का आगू चलै केर बाद फ्रांस देशक शासक बनल। आर बहुत दिन तक राज केलक।





आशिष चौधरी गाम – चरैया,
जिला – अररिया।

निवेदन:-

१.धीमेश्वर स्थान- बनमनखीसँ उत्तर ३ किलोमीटरपर धीमा गाँव अछि। एहि स्थानक बारेमे जे ई बहुत पुरान अछि, से सुनै छी। पहिले एतए मन्दिर नै रहै मुदा बादमे एत्तऽ विशाल मन्दिर बनल आर एकटा पोखरि सेहो अछि। आर एक बात जे ई अपने आप प्रकट भेला-ए। ई मन्दिरसँ सटल एकटा माँ दुर्गाक सेहो प्राचीन मन्दिर ये। जे मन्दिरक बारेमे ओइ अगल-बगल गामक लोक सब कहै ये जे कोनो प्रार्थना अगर मनसँकरल जाइ-ए, ते माँ भगवती जरूर पूर्ण कए दैत अछि।

२.अररिया जिलासँ ३० किलोमीटरपर भरगामा प्रखण्ड अछि। वैह प्रखण्डमे भरगामा गाममे एकटा चण्डी स्थान बाधमे अछि, जकर बारेमे बुजुर्ग सभ कहै ये जे ई अपने-आप प्रकट भेल अछि आर ओए ठाम कोनो प्रार्थना आइ तक पूरा नञि होबए के प्रश्न ने अछि। एकटा खास बात ये जे ओइ ठाम के भगवती के गेट मंगलवार दिन टा खुलै ये। आर गाछ सभ जे ये, अगर ओकरा कियो काटए के कोशिश करै ये से खुन बहे लगे ये, जेना मनुखक खून बहै ये ओहिना। ओत्तऽ आइ वरु जेना मन्दिर बनल अछि वैहने। ओत्तऽ मंदिर अगर बनाबे चाहे ये ते नै बनबे सके ये।
हुनके समर्जपित, जय मां।

नेना भुटका - किसानक कहानी

किसानक कहानी

एकटा किसान ओर किसानक कनियाँ छलै। किसानक शादी केर बहुत दिन बीतल लेकिन किसानक कनियाँ केर बाल-बच्चा नहि होबैत छलाह। दुनू गोटे ई बात लक बड परेशान रहैत छलाह। बहुत मन्नत माँगेक केर बाद किसानक कनियाँ केर एकटा बेटा भेल जकर नाम सौरभ राखलक। जे कुछ दिनक बाद बीमार पडल, ओर फेरो बाद में मरि गेल। ई बात सँ किसान ओर किसानक कनियाँ बड दुःखी रहै छलै। एक दिनक बात अछि एकटा साधु-महात्मा किसानक घर आएल ओर किसानक कनियाँक केर कहलक जे अहाँ चिंता नहि करू अहाँक चारिटा बेटा होएत, लेकिन ओकर सभक नाम अहाँक बिगाडि के राखय पडैत अगर अहाँ ऎना नहि करब तँ अहाँ केर बेटा फेर नहि बचत। ई गप्प पर किसान कहलक बाबा अहाँ जे कहलो हम दुनू गोटे वैह करब हम अपन बेटा केर नाम बिगाडि केर राखब। सँ साधु बाबा ठीके कहलक छलै जे अहाँ केर चारिटा बेटा हैत। किसानक कनियाँक एक-एक करि चारिटा बेटा भेल जकर नाम किसान ओर किसानक कनियाँ दुनू गोटे मिलकेर नाम राखलक। पहिल केर नाम छलै- ‘टुटल’, दोसेर केर नाम छलै- ‘सडल’, तेसिर केर नाम छलै- ‘फाटल’ ओर चारिम केर नाम छलै- ‘पंक्चर’। किसानक चारो बेटा जब पैघ भेल तँ किसान ओर किसानक कनियाँ बड चिंता होबे लागल जे एकर सभक बियाह कोना हैत। कुछ दिनक बाद एकटा लडकी बला किसानक घर पर आयल तँ किसान कँ लागल जे आब हमर बेटा सभक बियाह भ जाएत। से किसान अपन पहिल बेटा केर आवाज लगेलक ‘टुटल’ कुर्सी लाबु। ई बात सुनि केर लडकी बला कहलक नहि नहि हमरा सभ नहि बैठब तँ किसान कहलक एना कोना हैत अहाँ सभ मिठाई खाय लिअ ओर अपन दोसेर बेटा केर आवाज देलक ‘सडल’ मिठाई लाबु तँ लडकी बला कहलक हमरा सभक चीनीक बीमारी छलै सँ हमरा सभ मिठाई नहि खायब। तँ लडकी बला कहलक जे आबि हमरा सभ घर लेल जायब से हमरा सब के बिदा करू। किसान कहलक पहिले हम अहाँ सभक बिदाई करब तबने किसान अपन तेसिर बेटा केर आवाज देलक ‘फाटल’ धोती लाबु तँ लड्की बला के भेल ई हमरा फाटल धोती बिदाई करत से लडकी बला कहलक नहि नहिफेर आयब नहि वैह दिन बिदाई करब आय हमरा सभके बिदा करू। तँ किसान अपन चारिम बेटा जे कि सबसे छोट छलै ओकरा आवाज देलक ‘पंक्चर’ गाडी निकालु ओर हिनका सभ केर छोडि आबु। तँ लडकी बला के भेल जे ई हमरा पंक्चर गाडी में बिदा करत। सँ लडकी बला ओतए सँ भागि गेल। किसान अपन माथा पर हाथ धरि कए कहैत छलै जे आब हमर बेटा सँ बियाह के करत।

आशिष चौधरी गाम – चरैया,
जिला – अररिया।

नेना भुटका - नढियाँ – खढियाँक कहानी

नढियाँ – खढियाँक कहानी

एकटा छलै नढिय़ाँ, एकटा छलै खढियाँ। दुनू गोटे में बड नीक दोस्ती छलै। दुनू गोटेक खाना संगेक में बने छलै। दुनू सभ दिन नीक-नुकून खाएक छलै। एक दिन दुनूक ईच्छा भेल जे आए खीर खायल जाए। सँ दुनू मिलकेर खीर सामग्री आनलक ओर दुनू मिलकर खीर बनोलक खीर बनलाक बाद नढियाँ कहलक जे आबि खीर परोसु तँ खढियाँ छलै बड तेज से खढियाँ कहलक जे हम दुनू गोटे बड नीक सँ खीर बनोले छलौ से दुनू गोटे चलु नहायक लेल नहायक बाद दुनू गोटे मिलकर खीर खायब नढियाँ कहलक ठीके कहै छलै। चलु नहायक बाद खीर खायब सँ दुनू गोटे गेल नहायक लेल पोखेर गेल। दुनू गोटे पानी केर अंदर गेल तँ खढियाँ पानी केर अंदरे-अंदर अपन घर पँहुच केर सभटा खीर खाय लेलक ओर वैह खीरक बर्त्तन में पैखाना करि देलक। ओर उ बर्त्तनक ढक्कन वैह ना राखि देलक जैहना पहिले सँ राखल छलै। फेर पानी केर अंदरे-अंदर पोखरि के अंदर पँहुचि गेल जतै नढियाँ पहिले सँ नहाय रहल रहै। फेर खढियाँ कहलक चलु आब खायक लेल। फेर दुनू गोटे घर पँहुचल तँ खढियाँ कहलक नढियाँ सँ अहाँ खीर परोसु बड जोर सँ भुख लागल अछि। नढियाँ गेल बर्त्तनक ढक्कन जैहना हटैलक तँ नढियाँ केर होंशि उडि गेल ओर ओकरा बड जोरक गुस्सा आएल सँ नढियाँ कहलक खढियाँ सँ ऎना कोना भेल, ऎना के कयलक। वैह दिन सँ नढियाँ – खढियाँक दोस्ती टुट गेल जे आइ धरि तक नहि जुटल अछि।

आशिष चौधरी गाम – चरैया, जिला -= अररिया।

Thursday, August 27, 2009

नेना-भुटका-डॉक्टर

ऊँटनीसँ खेत जोतल जाइ छैक हरियाणामे। आरिपर जालक गाछ सेहो रोपल जाइत छैक। एहि जालक गाछमे लू बहलापर पीअर फर सेहो लगैत अछि।

एहने वातवरणमे एक गोट किसान ऊँटनीसँ हर जोइत रहल छल। हर जोतैत-जोतैत ऊँटनी अपन नमगर गरदनि नमराय जालक गाछसँ पात खा लेलक। मुदा संजोग जे पात गोलठिया कऽ ओकर गरदनिमे अँटकि गेलैक।

तखने एक गोटे जे ओहि खेतक आरि देने कतहु जा रहल छल आएल आ पुछलक जे की भेल।

किसान कहलक जे ओकर ऊँटक गरदनिमे किछु अँटकि गेल छैक आ हर जोतब छोड़ि बेचैन अछि।

ओ व्यक्ति पुछलक जे ई हर जोतैत-जोतैत दहिना कात गेल छल की?

-नञि।

-उत्तर।

-नञि।

-दक्षिण।

-नञि।

-वाम।

-हँ।

-फेर ओ जालक पातपर मुँह मारने रहए की?

-हँ।

-कोनो गप नहि।

ई बाजि ओ व्यक्ति ऊँटक गरदनिपर एक हाथ मारलक। नुरिआएल जालक पात ऊँटक गरदनिसँ बाहर आबि गेल आ ओ निकेना भऽ गेल।

किसान पुछलक जे अहाँ ई करएमे कोना सक्षम भेलहुँ।

ओ व्यक्ति कहलक जे हम डॉक्टर छी। तेँ।

किसान कहलक- अच्छा। तखन तँ हमहुँ डॉक्टरी कऽ सकैत छी।

ओ गाम गेल। ओतए एकटा बुढ़िया सूतल रहए। ओकर मोन खराप रहए।

ई चिकरैत घूमि रहल छल जे हम डॉक्टर छी। ककरो जे इलाज करेबाक होअए तँ हमरा लग आऊ आ इलाज कराऊ।

बुढ़ियाक परिवारजन एहि डॉक्टरकेँ बजा कऽ अनलक।

डॉक्टर पूछब शुरू कएलक।

- बुढ़ी दहिना कात गेल छलीह की?

-नञि।

-उत्तर।

-नञि।

-दक्षिण।

-नञि।

-वाम।

-नञि।

- एक बेर हँ कहि कऽ तँ देखू।

ओकर परिवार बला सभ हँ कहि देलक।

फेर जालक पात खेलन्हि की? एहि प्रश्नक उत्तरमे सेहो परिवार बला सभ आश्चर्य व्यक्त कएलक जे मनुक्ख जालक पात किएक खाएत?

मुदा एहि डॉक्टरक कहलापर ओ सभ हँ कहि देलन्हि।

आब डॉक्टर बुढ़ीक गरदनिपर मारलक। ओ तँ लटकले छलीह। से हुनकर प्राण निकलि गेलन्हि।

आब घरमे मात्र तीन गोटे रहथि से बूढ़ीकेँ कन्हा देबाक लेल डॉक्टरोकेँ जाए पड़लैक, लहास उघि कऽ डॉक्टर बेसुध भऽ गेल। बूढ़ीक अन्तिम क्रिया भेल आ तखन जे डॉक्टर फीस मँगलक तँ ओ सभ ओहि डॉक्टरपर मारि-मारि कए छुटल।

डॉक्टर ओतएसँ भागि दोसर गाम पहुँचल आ फेर इलाज कराऊ, इलाज कराऊ, ई कहि चिकरय लागल।

एक गोटे अएलाह।

-चलू। हमर बाबूजीक मोन खराप छन्हि। इलाज कए दियन्हु।

-इलाज तँ हम कए देबन्हि। मुदा लहासकेँ कान्ह हम नहि देबन्हि।-डॉक्टर बाजल।

Friday, August 21, 2009

नेना-भुटका- सच्चा मित्रक कहानी

आशीष चौधरी, गाम-चरैया, पोस्ट-मंगलवार, जिला-अररिया।


एकटा छलै मोर, एकटा छलै कछुआ। दुनू गोटे मे बड़ प्रेम छलै। मोर जंगलक कहानी आर कछुआ पानी केर अंदरक कहानी एक-दुसराकेँ सुनबैत छलाह। एक दिन केर घटना छलै जे एकटा शिकारी मोरकेँ पकड़ि लेलक आर कहलक जे आब तँ राजा हमरा ढेर रास पाइ देत, किए तँ राजाकेँ मोरक मसुआइ बड़ नीक लगैत छलै। ई बात सुनि कऽ कछुआकेँ मोरक प्रति दया लागल आ कहलक जे हम अहाँकेँ हीरा दै छी। अहाँ हमर मित्र (मोर)केँ छोड़ि दियौ। ई बात सुनि कऽ शिकारी रुकि गेल आ कहलक- अहाँ हीरा दिअ, हम अहाँक मित्रकेँ छोड़ि देब। कछुआ पानि केर अन्दर गेल आर एकटा हीरा निकालि कऽ शिकारीकेँ दऽ देलक आर कहलक- अहाँ हमर मित्र मोरकेँ छोड़ि दिअ। शिकारी बात नै मानलक आर ओतएसँ चलि देलक। ई सभ बात देखि कऽ कछुआक मोनमे बड़ दुख भेलैक। से कछुआ कहलक जे हम अहाँकेँ एकटा आर हीरा देब से अहाँ हमर मित्र (मोर) केँ छोड़ि दिअ । तँ शिकारी रुकि गेल आ कहलक- तब तँ हम अहाँक मित्रकेँ निश्चित छोड़ि देब। तँ कछुआ कहलक- जे अहाँ हमरा ऊ हीरा दिअ, हम एकहि नापक हीरा निकालए छी। तँ शिकारी ऊ हीरा कछुआकेँ दऽ देलक आर कहलक जे अहाँ हीरा निकालू। हम अहाँक मित्रकेँ छोड़ि देब। तेँ कछुआ पानिमे गेल आर हीरा लऽ कए निकलल आ कहलक जे अहाँ हमर मित्रकेँ छोड़ि हमरा लग आऊ। तँ शिकारी मोरकेँ छोड़ि कऽ आगाँ बढ़ल तँ मोर उड़ि गेल आर कछुआ सेहो पानिमे चलि गेल। शिकारी हाथ मलैत रहि गेल। से ई बात पर ऊ कहलक, लालचसँ सभ नाश भऽ जाइत अछि। आब हम लालच नहि करब।

Wednesday, August 12, 2009

दू टा मैथिली अगड़म - बगड़म



माछ - भात तीत भेल,
दही- चिन्नी मिठ्ठ भेल,
खाकऽऽ टर्रर छी ।


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कारी मेघ ,
कादो थाल,
झर झर बुन्नी,
चुबैत चार ।



Wednesday, July 01, 2009

बाल कथा- राजा ढोलन

राजा ढोलन
गढ़ नारियलक राजा दक्ष रहए। ओ राजा बड्ड प्रतापी छल। मुदा ओकरा राज्यमे कोनो हाट-बजार नहि रहए। राजा सोचलक जे हमर राज्यमे हाट कोना लगत? से राजा अपन राज्यमे ढोलहो पिटबा देलक जे हमरा राज्यमे हाट लागत आ जकर जे समान नहि बिकाओत से हम कीनि लेब। सम्पूर्ण राज्यक लोक आबए लागल आ हाट लगबए लागल। एहि प्रकारेँ सभ दिन हाटमे जे समान बचि जाइत छल, तकरा राजा कीनि लैत छल। एहिना कतेक दिन बीति गेल। एक बेर एकटा सूतबला सूत बेचए लेल ओतए आएल मुदा तावत हाट उठि गेल रहए आ ओकर सूता नहि बिकाएल। राजा ओकर सूत सेहो कीनि लेलक।
मुदा जहियासँ राजा सूता किनलक तहियेसँ ओकर अबस्था घटए लागल। किछु दिनुका बाद राजाक हालति गरीब जेकाँ भऽ गेल। राजा अपन स्त्रीसँ कहलक-अम्बिका सुनू। अपन राज्यमे गरीबी पसरि गेल अछि। आब अपन राज्य रहबा योग्य नहि रहल। ओतए सँ राजा बिदा भेल आ जाइत-जाइत कोनो देशमे पहुँचल। ओहि देशक नाम गढ़पिंगल रहए। ओतुक्का राजाक नाम सेहो देशक नामपर छल। गढ़पिंगल राजाक ओही नगरमे गढ़नारियल राजा घुमैत-घुमैत पहुँचि गेल आ कहए लागल जे हे भाइ हमरा कियो नोकरी राखत ? राजा कहलक-हँ। हमरा एकटा नोकरक जरूरी अछि। एकरा राखि लिअ। गढ़पिंगल राजाकेँ एक सए नोकर रहए आ ओकरा एकटा आर नोकरक आवश्यकता रहए कारण ओकरा लग १०१ टा घोड़ा रहए। ओ राजाक एहिठाम रहि गेल आ सभ दिन घोड़ाक घास लेल जाए लागल आ घास छीलि कए आनए लागल। गढ़नारियलक राजा दक्षक स्त्री गर्भवती रहए आ गढ़पिंगलक राजाक स्त्री सेहो गर्भवती रहए। आ संयोग एहन रहल जे दुनू राजाक स्त्री एक्के दिन जन्म दैत अछि। पिंगलक राजा ब्राह्मण बजा कए ज्योतिष देखेलक आ राजा अपन पुत्रीक नाम राखलक आ कहलक जे एकर नाम मडुवन किएक अछि। ब्राह्मण कहलक जे एकर बियाह छठी रातिकेँ होएत। राजा ओही दिनसँ अपन राज्यमे ताकैत-ताकैत थाकि गेलथि मुदा हुनका ओ नहि भेटल। राजाक खबासिनी कहलक जे अहाँ सभ चिन्ता किएक करैत छी। राजा साहब पछिला बेर जे नोकर रखने छथि हुनका एहिठाम एकटा लड़का जन्म लेने अछि। ओकरे संग बियाह करा देल जाए। ओहि बच्चाक नाम राशिक अनुसार राजा ढोलन राखल गेल छल। गढ़पिंगलक राजा सोचलक जे ई बड्ड नीक गप अछि, जखन ई लगेमे अछि तँ ओकरे संग बियाह करा देल जाए। दिन तँ ताकले रहए से ओही छठिक रातिमे बियाह भए गेल। किछु दिनुका बाद राजा दक्ष कहलक जे आब एतए रहबाक योग्य नहि अछि। आब अपन देश जएबाक चाही।
राजा जाहि साढ़ीनपर चढ़ि कए आएल रहथि ओहि साढ़ीनकेँ कहलन्हि जे साढ़िन आब अपन देश चलू। आब साढ़ीपर चढ़ि कए राजा-रानी बिदा भेलाह। किछु दूर रस्तामे गेलाह तँ एकटा बोन भेटलन्हि। ओहि बोनमे रस्ताक कातमे एकटा पोखरि रहए। ओही पोखरिक महारपर दू टा बाघ-बाघिन रहैत छल। राजा सोचलक जे हमर सभक बच्चा जखन एहि रस्तासँ अपन सासुर जएताह, तखन ई बाघ हमर बच्चा सभकेँ खा जाएत। ताहि द्वारे एकरा मारि देनाइ ठीक होएत। राजा बाघकेँ मारि देलक आ आगाँ चलल तँ बाघिन कहलक जे राजा तूँ हमरा जेना राँड़ कए जा रहल छह, ओहिना तोहर बेटा जखन अपन सासुर जेतह तँ गढ़पीपली राजमे ओकर कनियाँकेँ हमहू राँड़ कए देबैक।
बाघिनक ई अबाज मात्र राजा सुनलक। राजा अपन घर पहुँचि कए ई गप ककरो नहि कहलक। ओ अपन साढ़िनकेँ एकटा पैघ खधाइ खूनि कए ओहिमे धऽ देलक कारण बाहर रहलासँ ओ ई गप ओकर बच्चाकेँ सुना दैत। ओही समय छोट बालककेँ अपन फुलवाड़ीक रेखा-पेखा मालिनक संग दए देलक। ओकर दुनू बहिन ओकरा बड्ड नीक जेकाँ सेवा करए लगलीह। एहिना करैत किछु दिन बीति गेल तँ ई बच्चा समर्थ भऽ गेल आ तखनो ओकरा किछु बूझल नहि भेलैक। ओम्हर ओ मड़ुअन कन्याँ सेहो पैघ भऽ गेलि। कन्या युवा भऽ गेलि तँ ओहि सखी सभक घुमैत फिरैत हुनका कोनो संगी कहलक जे हे बहिन। आब अहाँ समर्थ भऽ गेलहुँ। अहाँक पिताजी अहाँक बियाहक विषयमे किछु नहि सोचि रहल छथि। ई बात सुनि कए कन्याँ बड़ चिन्तामे पड़ि गेलीह। अपन महलमे जा कए ओ पलंगपर पड़ि रहलीह आ खेनाइ त्यागि देलन्हि। एहिपर ओकर माए कन्या लग जाए कहलक, बेटी अहाँ खेनाइ किएक नहि खाइत छी ?
कन्याँ बाजलि-माए। सखी सभ बड्ड किचकिचबैत अछि। ताहि द्वारे हमरा भूख नहि लगैत अछि। माए कहलक- अहाँकेँ की कहि किचकिचबैत छथि?
कन्याँ बाजल-ओ सभ हमरा कहैत छथि जे अहाँक पिताजीकेँ कोन चीजक कमी अछि, जे अहाँक पिताजी अहाँक बियाह नहि करा रहल छथि?
माए कहलक- – बेटी अहाँक बियाह छठीक रातिमे भए गेल अछि। अहाँक सासुर गढ़नारियलमे अछि। नहि जानि ओ किएक नहि अबैत छथि?
ई सुनि कन्याँ कहलक जे हमरा जबुनाक कातमे एकटा मकान बना दिअ आ सभ वस्तुक व्यवस्था कए दिअ। हम बारह बरिख धरि सदाव्रत बाँटब। एतेक सुनि राजा ओहिना कएलक। मड़ुवन कन्याँ जबुनाक कातमे सदाव्रत बँटनाइ शुरू कए देलक।
बनिजारा सभ वाणिज्य करबाक लेल गढ़नारियलसँ गढ़-पिन्गल जा रहल छलाह। बनिजारा सभ जखन गढ़-पिन्गल पहुँचलाह तँ जबुना धारक कातसँ होइत आगाँ बढ़ि रहल छलाह। जाइत-जाइत ओ सभ ओहिठाम पहुँचलाह जतए मड़ुवन कन्या सदाव्रत बाँटि रहल छलीह। ओ कन्याँ पुछलक-अहाँ सभ कतए जा रहल छी आ कतएसँ आएल छी। बनिजारा बाजल-हम सभ गढ़नारियलसँ आएल छी आ गढ़पिन्गलमे हीरा-मोतीक वाणिज्य करैत छी। कन्याँ बाजल-अहाँ वाणिज्य कए घुरब तँ हमर एकटा पत्र लए जाएब?
बनिजारा बाजल-अहाँ पत्र लिखि कए राखब, हम जरूर लए जाएब। बनिजारा जखन घुरल तँ ओ पत्र लए चलि गेल आ जखन गढ़ नारियल पहुँचल तँ हरेबा-परेबा जे दुनू बहिन छलि-आ बड्ड पैघ जादूगरनी छलि- ओ जादूक जोरसँ पता लगा कए राजाकेँ खबरि कएलक आ बनिजारासँ ओ पत्र लऽ कऽ ओकरा आगिमे जरा देलक आ ओहि राजाक बेटाकेँ एकर पता नहि चलए देलक। कन्याँक ई पत्र मारल गेल। ओ बेचारी बाट तकैत रहल। किछु दिन बीतल। ओ कन्याँ एकटा सुग्गा पोसने छलीह। ओ सुग्गासँ पुछलक-की तूँ हमर पत्र लए जा सकैत छह। सुग्गा बाजल-हँ। हम पत्र राजाकेँ दए देब। कन्याँ पत्र लिखि कए सुग्गाक गरदनिमे लटका देलक आ कहलक- जाऊ।
सुग्गा ओतएसँ बिदा भेल। सुग्गा आकासमे उड़ि बिदा भेल आ पहुँचल गढ़नारियल राज्य जतए हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहथि। सुग्गा उड़ि कए ओकर कान्हपर बैसि गेल, ठोंठसँ सूता काटि कए खसेलक। ओहि समय हरेबा-परेबा राजा ढोलनक फुलवारीमे बैसल रहए। ठंढ़ीक मौसम छल। आगि पजारि कए बैसल छल। जखने ओ पत्र खसेलक तखने मालिन ओहि पत्रकेँ आगिमे धऽ देलक। राजा ढोलनकेँ बड्ड तामस उठलैक। दुनूकेँ दू-दू चमेटा मारलक आ कहलक जे तूँ दुनू गोटे एतएसँ चलि जो। दुनू बहिन पकड़ि कए ओकरा मनाबए लागल। कन्याँक ओहो पत्र खतम भए गेल। कन्याँ बहुत चिन्तामे पड़ि गेल। बहुत समय आर बीति गेल।
एक दिन जबुनाक किनारसँ एकटा महात्मा जोगी रूपमे जा रहल छल। कन्याँक नजरि ओहि महात्मापर पड़ि गेल। कन्याँ बड्ड चिन्तित भए कानि रहल छलीह। ओ साधु महात्मा कन्याँक कननाइ सुनि अएलीह आ कारण पुछलक।
कन्याँ सभटा हाल बतेलक ।
महात्मा कहलक जे तूँ एकटा पत्र लिखि कए हमरा दे आ हम ओ पत्र ओतए पहुँचाएब।
कन्याँ पत्र लिखि कए महात्माकेँ देलक। महात्मा ओतएसँ बिदा भेल।
कन्याँ महात्माकेँ गाँजा,भाँग आ हफीम देलक। महात्मा ओकरा खाइत-पिबैत ओतएसँ बिदा भेल। किछु दिनुका बाद महात्मा गढ़नारियल पहुँचल, जतए हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहए। ओ फुलबारीक बीचमे अपन डेरा खसेलक। रातुक मौसम छल। भोर होइ बला छल। ओही समय महात्मा एकटा मोहिनी बाँसुरी निकाललक आ बजबए लागल। ओहि बाँसुरीक अबाज सुनि राजा ढोलन उठल आ चलबा लए तैयार भेल तँ दुनू बहिन ओहि बाँसुरीपर बहुत रास जादू-गुण चलेलक। मुदा महात्माक किछु नहि बिगड़ल। राजा ढोलन उठल आ दुनूकेँ दू-दू लात मारि महात्मा लग गेल। साधुजी ओहि पत्रकेँ निकालि कऽ राजा ढोलनकेँ देलन्हि। आर से पढ़ि राजा ढोलन तामसे विख-सबिख भए गेल आ ओतएसँ घर गेल आ एकटा तलबार लए पितासँ पूछए लागल जे बताऊ जे ई हमर बियाह कतए भेल अछि ? पिताकेँ ओ बाघिन मोन पड़ि गेलैक से ओ झूठ बाजल आ कहलक जे हम तोहर बियाह नहि करबेने छियहु।
तामसे भेर भए ओ ओहि पत्रकेँ राजाक सोझाँ राखलक। राजा ओ पढ़ि बड्ड चिन्तामे पड़ि गेल।
ओ अपन बेटाकेँ कहलक। देखू बेटा। अहाँक बियाह हम छठीक राति कएने छी आ गौना एहि द्वारे नहि कएलहुँ कारण अबैत काल हम एकटा बाघकेँ मारि देलहुँ। फेर ओ सभटा खिस्सा कहि सुनेलक आ कहलक, जे ओ डरे ओकर गौना नहि करेलक।
ढोलन बाजल-हमर सवारी कतए अछि। हमर सवारी दिअ।
राजा कहलक-साढ़नी तँ तरहाराक नीचाँ अछि। ओ जीवित अछि वा मरि गेल से नहि जानि।
राजा ढोलन तरहराक नीचाँ सँ साढ़िनकेँ बहार कएलक तँ साढ़िनक देहमे पिल्लू लागि गेल छल। ओ ओकरा साफ कएलक आ ओकरा चना-चबेना खुअएलक। खुआबैत-खुआबैत ओ पहिने जेकाँ तन्दरुस्त भए गेल।
राजा ढोलन बाजल-साढ़िन, तोहर पैर बहुत दिनसँ बान्हल छह। तूँ चौदह कोसक रस्ताकेँ एक दिनमे चारि चौखड़ लगा दिअ तँ हम बुझब। हम सभ फेरसँ गढ़पिंगल पहुँचब। साढ़िन अपन चालि एक दिनमे बना लेलक। राजा ढोलन अपन सासुर बिदा भेल। साढ़िनपर स्वार भए अपन कान्हपर बन्दूक लेलक आ बिदा भेल। चलैत-चलैत ओ ओही बोनमे पहुँचल। ओही रस्तासँ ओ सभ जा रहल छल, जतए ओ बाघिन रहैत छलीह। बाघिनकेँ राजा ढोलन देखलक आ ओहि बाघिनकेँ मारि देलक। फेर ओ अपन सासुर गढ़पीपली गेल आ फूल बगानमे डेरा खसेलक। साढ़नीकेँ ओ ओतहि छोड़ि फूल-बगानकेँ तोड़ि-तारि कए तहस-नहस कए देलक। मालिन कहलक जे तोरा राजासँ पिटान पिटबेबउ आ जतेक तोँ बरबादी कएने छँह तकर हरजाना लेबउ। राजा ढोलन बाजल- जो तोरा जे करबाक छौक कर।
मालिन तामसे बिदा भेलि आ राजा लग गेलि। राजासँ कहलक।
राजा पुछलक जे ओ कतुक्का अछि।
मालिन कहलक जे ओ अपन घर गढ़नारियलक बतेलक अछि।
राजा अपन सिपाही सभकेँ पठेलक। ओ सभ ढोलनकेँ पुछलक-अहाँ कतुक्का छी आ कतएसँ आएल छी।
ढोलन बाजल- हमर घर गढ़ नारियल अछि आ हम अपन सासुर गढ़पिंगल- ओतहिसँ आएल छी।
सिपाही सभ ई गप राजाकेँ जा कए कहलक।
राजा प्रसन्नतासँ स्वागत कए डोलीमे बैसा कए ढोलनकेँ अपना घर अनलक। किछु दिनुका बाद राजा अपन बेटी-जमाएकेँ गढ़-पिंगलसँ गढ़ नारियलक लेल बिदा केलक। ओतए सँ राजा ढोलन आ ओ मड़ुवन कन्याँ अपन घर गेल आ अपन राज्य करए लागल।

Saturday, April 18, 2009

नेना भुटका लेल दू टा नाटक -1.अपाला आत्रेयी आ 2.दानवीर दधीची : गजेन्द्र ठाकुर

नेना भुटका लेल दू टा नाटक -1.अपाला आत्रेयी आ 2.दानवीर दधीची : गजेन्द्र ठाकुर



1.अपाला आत्रेयी

पात्र: अपाला: ऋगवैदिक ऋचाक लेखिका अत्रि: अपालाक पिता

वैद्य 1,2,3: कृशाश्व: अपालाक पति।

वेषभूषा

उत्तरीय वस्त्र (पुरुष), वल्कल, जूहीक माला(अपालाक केशमे), दण्ड।

मंच सज्जा

सहकार-कुञ्ज(आमक गाछी), वेदी, हविर्गन्ध, रथक छिद्र, युगक छिद्र, सोझाँमे साही, गोहि आ’ गिरग़िट।


दृश्य एक

(आमक गाछीक मध्य एक गोट बालिका आ’ बालक)।

बालिका: हमर नाम अपाला अछि। हम ऋषि अत्रिक पुत्री छी।अहाँ के छी ऋषि बालक।

बालक: हम शिक्षाक हेतु आयल छी। ऋषि अत्रि कतए छथि।

अपाला: ऋषि जलाशय दिशि नहयबाक हेतु गेल छथि, अबिते होयताह। (तखनहि दहिन हाथमे कमंडल आ’ वाम हाथमे वल्कल लेने महर्षि अत्रिक प्रवेश।)

अत्रि: पुत्री ई कोन बालक आयल छथि।

अपाला: ऋषिवर। आश्रमवासीक संख्यामे एक गोट वृद्धि होयत। ई बालक शिक्षाक हेतु...

बालक: नहि। हमर अखन उपनयन नहि भेल अछि। हम अखन माणवक बनि उपाध्यायक लग शिक्षाक हेतु आयल छी। ई देखू हमर हाथक दण्ड। हम दण्ड- माणवक बनि सभ दिन अपन गामसँ आयब आ’ साँझमे चलि जायब। हम वेद मंत्रसँ अपरिचित अनृच छी।

अत्रि: बेश तखन अहाँ हमर शिष्यक रूपमे प्रसिद्ध होयब। दिनक पूर्व भाग प्रहरण विद्याक ग्रहणक हेतु राखल गेल अछि। हम जे मंत्र कहब तकरा अहाँ स्मरण राखब। पुनः हम अहाँक विधिपूर्वक उपनयन करबाय संग ल’ आनब।

बालक: विपश्चित गुरुक चरणमे प्रणाम। (पटाक्षेप)

दृश्य दू

(उपनयन संस्कारक अंतिम दृश्य। अपाला आ’ किछु आन ऋषि बालक बालिकाक उपनयन संस्कार कराओल जा चुकल अछि।)

अत्रि: अपाला। आब अहाँक असल शिक्षा आ’ विद्या शुरू होयत।

(पुनः आन विद्यार्थी सभक दिशि घूमि।) अहाँ सभकेँ सावित्री मंत्रक नियमित पाठ करबाक चाही। ॐ भूरभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्। सविता- जे सभक प्रेरक छथि- केर वरेण्य- सभकेँ नीक लागय बला तेज- पृथ्वी, अंतरिक्ष आ’ स्वर्गलोक-सर्वोच्च अकाश-मे पसरल अछि। हम ओकर स्मरण करैत छी। ओ’ हमर बुद्धि आ’ मेधाकेँ प्रेरित करथु।

अपाला: पितृवर।“ ॐ नमः सिद्धम” केर संग विद्यारम्भक पूर्व शिक्षाक अंतर्गत की सभ पढ़ाओल जायत।

अत्रि: वर्ण, अक्षर-स्वर-, मात्रा- ह्र्स्व,दीर्घ आ’ प्लुत- बलाघात- उदात्त, अनुदात्त, स्वरित- शुद्ध उच्चारण, अक्षरक क्रमिक विन्यास- वर्त्तनी-, पढ़बाक आ’ बजबाक शैली, एकहि वर्णकेँ बजबाक कैकटा प्रकार, ई सभ शिक्षाक अंतर्गत सिखाओल जायत। साम संतान- जेकि सामान्य गान अछि- केर माध्यमसँ शिक्षा देल जायत।

अपाला: गुरुवर। आश्रमक नियमसँ सेहो अवगत करा देल जाय।

अत्रि: वनक प्राणी अवध्य छथि। आहारार्थ फल पूर्व-संध्यामे वन-वृक्षसँ एकत्र कएल जायत। प्रातः आ’ सायं अग्निहोत्र होयत, ताहि हेतु समिधा, कुश, घृत-आज्य-, एवम् दुग्धक व्यवस्था प्रतिदिन मिलि-जुलि कय कएल जायत। हरिणकेँ निर्विघ्न आश्रममे टहलबाक अनुमति अछि। कदम्ब, अशोक, केतकी, मधूक, वकुल आ’ सूदकारक गाछक मध्य आश्रममे यद्यपि कृषिक अनुमति नहि अछि, परञ्च अकृष्य भूमि पर स्वतः आ’ बीयाक द्वारा उत्पन्न अकृष्टपच्य अन्नक प्रयोग भ’ सकैछ।

बालक: हम सभ एकहि विद्यापीठक रहबाक कारण सतीर्थ्य छी। गुरुवर। दण्ड आ’ कमण्डलक अतिरिक्त्त किचुउ रखबाक अनुमति अछि?

अत्रि: कटि मेखला आ’ मृगचर्म धारण करू आ’ अपनाकेँ एहि योग्य बनाऊ, जाहिसँ द्वादशवर्षीय यज्ञ सत्रक हेतु अहाँ तैयार भ’ सकी आ’ महायज्ञक समाप्तिक पश्चात् ब्रह्मोदय, विदथ परिषद आ’ उपनिषद ओ’ अरण्य संसदमे गंभीर विषय पर चर्चा क’ सकी। (पटाक्षेप)

दृश्य तीन

(कुटीरमे ऋषि अत्रि कैक गोट वैद्यक संग विचार-विमर्श कए रहल छथि।)

अत्रि: वैद्यगण। बालिका अपालाक शरीरमे त्वक् रोगक लक्षण आबि रहल अछि। शरीर पर श्वेत कुष्ठक लक्षण देखबामे आबि रहल अछि।

वैद्य 1: कतबा महिनासँ कतेको औषधिक निर्माण कए बालिकाकेँ खोआओल, आ’ लेपनक हेतु सेहो देल।

अत्रि: अपाला आब विवाहयोग्य भ’ रहल छथि। हुनका हेतु योग्य वर सेहो ताकि रहल छी।

वैद्य 2: कृशाश्वक विषयमे सुनल अछि, जे ओ’ सर्वगुणसंपन्न छथि, आ’ वृद्ध माता-पिताक सेवामे लागल छथि। ओ’ अपन अपालाक हेतु सर्वथा उपयुक्त वर होयताह। अत्रि: तखन देरी कथीक। अपने सभ उचित दिन हुनकर माता-पितासँ संपर्क करू।

दृश्य चारि

(आश्रमक सहकार-कुञ्जमे वैवाहिक विधिक अनुष्ठान अछि। वेदी बनाओल गेल अछि, आ’ ओतय ऋत्विज लोकनि जव-तील केर हवन क’ रहल छथि।)

अपाला(मोने मोन): माथ पर त्रिपुंडक भव्य-रेखा, आ’ शरीर-सौष्ठवक संग विनयक मूर्त्ति, ईएह कृशाश्व हमर जीवनक संगी छथि। (तखने कृशाश्वक नजरि अपालासँ मिलैत छन्हि, आ’ अपाला नजरि नीँचा कए लैत छथि।। मुदा स्त्रीत्वक मर्यादाकेँ रखैत ललाट ऊँचे बनल रहैत छन्हि।)

अत्रि: उपस्थित ऋषि-मण्डली आ’ अग्निकेँ साक्षी मानैत, हम अपाला आ’ कृशाश्वक पाणिग्रहण करबैत छी। (अग्निक प्रदक्षिणा करैत काल कृशाश्वक उत्तरीय वस्त्र कनेक नीँचा खसि पड़ल आ’ अपालाक केशक जूही-माला पृथ्वी पर खसि पड़ल।)

दृश्य पाँच

(अपालाक पतिगृह।वृद्ध माता-पिता बैसल छथिन्ह आ’ अपाला घरक काजमे लागल छथि।)

अपाला: प्रिय कृशाश्व।एतेक दिन बीति गेल। पतिगृहमे हम कोनो नियंत्रणक अनुभव नहि कएलहुँ। हमरा प्रति अहाँक कोमल प्रेम सतत् विद्यमान रहल। मुदा श्वेत श्वित्रक जे दाग हमरा पर ज्वलन्त सत्ताक रूपमे अछि, कदाचित् वैह किछु दिनसँ अहाँक हृदयमे हमरा प्रति उदासीनताक रूपमे परिणत भेल अछि।

कृशाश्व: हमर उदासीनता अपाला?

अपाला: हँ कृशाश्व। हम देखि रहल छी ई परिवर्त्तन। की एकर कारण हमर त्वगदोषमे अंतर्निहित अछि?

कृशाश्व: हे अपाला। हमरा भीतर एकटा संघर्ष चलि रहल अछि। ई संघर्ष अछि प्रेम आ’ वासनाक। प्रेम कहैत अछि, जे अपाला ब्रह्मवादिनी छथि, दिव्य नारी छथि। मुदा वासना कहैत अछि, जे अपालाक शरीरक त्वगदोष नेत्रमे रूपसँ वैराग्यक कारण बनि गेल अछि।

अपाला: पुरुषक हाथसँ स्त्रीक ई भर्त्सना। कामनासँ कलुषित पुरुष द्वारा नारीक हृदय-पुष्पकेँ थकूचब छी ई। हम वेदक अध्ययन कएने छी। चन्द्रमाक प्रकाशक बीचमे ओकर दाग नुका जाइत अछि, मुदा हमर ई श्वेत श्वित्र दाग हमर विशाल गुणराशिक बीचमे नहि मेटायल। (कृशाश्व स्तब्ध भय जाइत छथि, मुदा किछु बजैत नहि छथि।)

अपाला: सबल पुरुषक सोँझा हम अपन हारि मानैत, अपन पिताक तपोवन जा रहल छी, कृशाश्व।

दृश्य 6

(अपाला प्रातः कालमे समिधासँ अग्निकुण्डमे होम करैत इन्द्रक पूजा आ’ जपमे लागि गेल छथि। कुशासन पर बैसलि छथि।)

अपाला: धारक लग सोम भेटल, ओकरा घर आनल आ’ कहल जे हम एकरा थकुचब इंद्रक हेतु, शक्रक हेतु।गृह गृह घुमैत आ’ सभटा देखैत, छोट खुट्टीक ई सोम पीबू,दाँतसँ थकुचल, अन्न आ’ दहीक संग खेनाइमे प्रशंसा गीत सुनैत। हम सभ अहाँकेँ नीक जेकाँ जनबाक हेतु अवैकल्पिक रूपसँ लागल छी, मुदा क्यो गोटे अहाँकेँ प्राप्त नहि क’ सकल छी। हे चन्द्र, अहाँ आस्ते-आस्ते आ’ निरन्तर ठोपे-ठोपे इन्द्रमे प्रवाहित होऊ। की ओ’ हमरा लोकनिक सहायता नहि करताह, हमरा लोकनिक हेतु कार्य नहि करताह। की ओ’ हमरा लोकनिकेँ धनीक नहि बनओताह? की हम अपन राजासँ शत्रुताक बाद आब अपना सभकेँ इन्द्रसँ मिला लिय’। हे इन्द्र अहाँ तीन ठाम उत्पन्न करू। हमरा पिताक मस्तक पर, हुनकर खेतमे आ’ हमर उदर लग। एहि सभ फसिलकेँ ऊगय दियौक। अहाँ हमरा सभक खेतकेँ जोतलहुँ, हमर शरीरकेँ आ’ हमर पिताक मस्तककेँ सेहो। अपालाकेँ पवित्र कएल। इन्द्र! तीन बेर, एक बेर पहिया लागल गाड़ी, एक बेर चारि पहिया युक्त्त गाड़ीमे आ’ एक बेर दुनू बरदक कान्ह पर राखल युगक बीच। हे शतक्रतु! आ’ अपालाकेँ स्वच्छ कएल आ’ सूर्यसमान त्वचा देल। हे इन्द्र!


दृश्य 7 (महायज्ञक समाप्तिक पश्चात ब्रह्मोदयक दृश्य।)

अत्रि: एहि विशाल ऋत्विजगणक मध्य ऋकक मंत्रमे अपालाक ऋचाकेँ हम सम्मिलित कए सकैत छी, कारण ई स्वतः स्फुटित आ’ अभिमंत्रित अछि। अपालाक चर्मरोग एहिसँ छूटि गेल, एकर ई सद्यः प्रमाण अछि। अपाला एहि मंत्रक दृष्टा छथि। ऋषिगण: अत्रि, हमरा सभ सेहो एहि मंत्रक दर्शन कएल। अहो। सम्मिलित करबाक आ’ नहि करबाक तँ प्रश्ने नहि अछि। ई तँ आइसँ ऋकक भाग भेल। (एहि स्वीकृतिक बाद ब्रह्मोदय सभामे दोसर काज सभ प्रारम्भ भ’ जाइत अछि। कृशाश्व विचलित मोने अपालाक सोझाँ अबैत छथि।)

कृशाश्व: अपाला। हम दु:खित छी। अहाँक वियोगमे।

अपाला: हे कृशाश्व। इन्द्रक देल ई त्वचा योगक परिणाम अछि। अहाँक उपेक्षा हमरा एहि योग्य बनेलक, मुदा आब एहि पर अहाँक कोनो अधिकार नहि।

(दुनू गोटे शनैः-शनैः मँचक दू दिशि सँ बहराए जाइत छथि।)

(पटाक्षेप)_




2. दानवीर दधीची

मंच सज्जा

अम्र वन, पोखरि आ’ युद्ध स्थल


वेष-भूषा

अधो वस्त्र- आश्रमवासीक हेतु

आश्विनक हेतु वैद्यक श्वेत वस्त्र

आ’ इन्द्रक हेतु योद्धाक वस्त्र

रथ आ’ अस्त्र शस्त्रक चित्र पर्दा पर छायांकित कएल जा’ सकैत अछि।



प्रथम दृश्य


( महर्षि दध्यङ आथर्वन दधीचीक तपोवनक दृश्य। सूर्योदयक स्वर्णिम आभा, फूलक गाछक फूलक संग पवनक प्रभावसँ सूर्य दिशि झुकब। यज्ञक धूँआसँ मलिन भेल गाछक पात। महर्षि सूर्योदयक दृश्यक आनन्द लए रहल छथि। मुदा दृष्टिमे अतृप्त भाव छन्हि। ओहि आश्रमक कुलपति थिकाह महर्षि, दस सहस्र छात्रकेँ विद्यादान करैत छथि, सभक नाम, गाम आ’ कार्यसँ परिचित छथि। से ओ’ तखने प्रवेश करैत एकटा अपरिचित आगंतुकक आगमन सँ साकांक्ष भ’ जाइत छथि।)



दध्यङ आथर्वन दधीची: अहाँ के छी आगंतुक?


अपरिचित: हम एकटा अतिथि छी महर्षि, आ’ कोनो प्रयोजनसँ आयल छी। कृपा कए अतिथिक मनोरथ पूर्ण करबाक आश्वासन देल जाय।

दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि आश्रमसँ क्यो बिना मनोरथ पूर्ण कएने अहि गेल अछि आगंतुक। हम अहाँक सभ मनोरथ पूर्ण होयबाक आश्वासन दैत छी।


अपरिचित: हम देवता लोकनिक राजा इन्द्र छी। अहाँसँ परमतत्त्वक उपदेशक हेतु आयल छी।एहिसँ अहाँक कीर्त्ति स्वर्गलोक धरि पहुँचत।


(दध्यङ आथर्वन दधीची सोचमे पड़ल मंच पर एम्हरसँ ओम्हर विचलित होइत घुमय लहैत छथि। ओ’ मंच पर घुमैत मोने- मोन, बिनु इन्द्रकेँ देखने, बजैत छथि, जे दर्शकगणकेँ तँ सुनबामे अबैत अछि, मुदा इन्द्र एहन सन आकृति बनओने रहैत छथि, जे ओ’ किछु सुनिये नहि रहल छथि, आ’ मंचक एक दोगमे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।)

दध्यङ आथर्वन दधीची: (मोने-मोन) हम शिक्षा देब तँ गछि लेने छी, मुदा की इन्द्र एकर अधिकारी छथि। बज्र लए घुमए बला, कामवासनामे लिप्त अनधिकारी व्यक्त्तिकेँ परमतत्त्वक शिक्षा? मुदा गछने छी तँ अपन प्रतिज्ञाक रक्षणार्थ मधु-विद्याक शिक्षा इन्द्रकेँ दैत छियन्हि।


इन्द्र: कोन सोचिमे पड़ि गेलहुँ महर्षि।


दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र हम अहाँकेँ मधुविद्याक शिक्षा दए रहल छी। भोगसँ दूर रहू। नाना प्रकारक भोगक आ’ भोज्यक पदार्थ सभसँ। ई सभ ओहने अछि, जेना फूल सभक बीचमे साँप। भोगक अछैत स्वर्ग अधिपति इन्द्र आ’ भूतलक निकृष्ट कुकुरमे कोन अंतर रहत तखन?

( इन्द्र अपन तुलना कुकुरसँ कएल गेल देखि कए तामसे विख-सबिख भ’ गेल। मुदा अपना पर नियंत्रण रखैत मात्र एक गोट वाक्य बजैत मंच परसँ जाइत देखल जाइत अछि।)

इन्द्र: महर्षि अहाँक ई अपमान तँ आइ हम सहि लेलहुँ। मुदा आजुक बाद जौँ अहाँ ई मधु-विद्या ककरो अनका देलहुँ तँ अहाँक गरदनि पर ई मस्तिष्क जकर अहाँकेँ घमण्ड अछि, एहि भूमि पर खसत।



दृश्य 2:


( ऋषिक आश्रम। आश्विन बन्धुक आगमन।महर्षिसँ अभिवादनक उपरान्त वार्त्तालाप। )


आश्विन बन्धु: महर्षि। आब हम सभ अहाँक मधु विद्याक हेतु सर्वथा सुयोग्य भ’ गेल छी। हिंसा आ’ भोगक रस्ता हम सभ छोड़ि देलहुँ। इन्द्र सोमयागमे हमरा लोकनिकेँ सोमपानक हेतु सर्वथा अयोग्य मानलन्हि, मुदा हमरा सभ प्रतिशोध नहि लेलहुँ। कतेक पंगुकेँ पैर, कतेक आन्हरकेँ आँखि हमरा सभ देलहुँ। च्यवन मुनिक बुढ़ापाकेँ दूर कएलहुँ। आ’ तकरे उपकारमे च्यवन हमरा लोकनिकेँ सोमपीथी बना देलन्हि।


दध्यङ आथर्वन दधीची: आश्विनौ। ब्रह्मज्ञानककेँ देब एकटा उपकारमयी कार्य अछि, आ’ अहाँ लोकनि एहि विद्याक सर्वथा योग्य शिक्षार्थी छी। इन्द्र कहने अछि, जे जाहि दिन ई विद्या हम कहियो ककरो देब तँ तहिये ओ’ हमर माथ शरीरसँ काटि खसा देत। मुदा ई शरीरतँ अछि क्षणभंगुर। आइ नहि तँ काल्हि एकरा नष्ट होयबाक छैक। ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक।


आश्विनौ: महर्षि अहाँक ई उदारचरित! मुद हमरो सभ शल्यक्रिया जनैत छी आ’ पहिने हमरा सभ घोड़ाक मस्तक अहाँक गरदनि पर लगाए देब। जखन इन्द्र अपन घृणित कार्य करत आ’ अहाँक मस्तककेँ काटत तखन अहाँक अस्ली मस्तक हमरा सभ पुनः अहाँक शरीरमे लगा देब।

(मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर घोड़ाक गरदनि लगओने महर्षि आश्विन बन्धुकेँ शिक्षा दैत दृष्टिगोचर ओइत छथि।)

दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि जगतक सभ पदार्थ एक दोसराक उपकारी अछि। ई जे धरा अछि से सभ पदार्थक हेतु मधु अछि, आ’ सभ पदार्थ ओकरा हेतु मधु। समस्त जन मधुरूपक अछि। तेजोमय आ’ अमृतमय। सत्येक आधार पर सूर्य ज्योति पसारैत अछि एहि विश्वमे, आ’ चन्द्रक धवल प्रकाश दूर भगाबैत अछि रातिक गुमार आ’ आनैत अछि शीतलता। ज्ञानक उदयसँ अन्हारमे बुझाइत साँप देखा पड़ैत अछि रस्सा। विश्वक सूत्रात्माकेँ ओहि परमात्माकेँ अपन बुद्धिसँ पकड़ू। जाहि प्रकारेँ रथक नेमिमे अर रहैत अछि, ताहि प्रकारेँ परमात्मामे ई संपूर्ण विश्व।


( तखने मंचक पाछाँसँ बड्ड बेशी कोलाहल शुरू भ’ जाइत अछि। तखने बज्र लए इन्द्रक आगमन होइत अछि। एक्के प्रहारमे ओ’ महर्षिक गरदनि काटि दैत छथि। फेर इन्द्र चलि जाइत छथि। मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर महर्षि पुनः अपन स्व-शरीरमे देखल जाइत छथि। ओ’ बैसले छथि आकि इन्द्र अपन मुँह लटकओंने अबैत अछि।)


इन्द्र: क्षमा करब महर्षि हमर अपराध। आइ आश्विन-बन्धु हमरा नव-रस्ता देखओलन्हि। गुरूसँ एको अक्षर सिखनहार ओकर आदर करैत छथि मुदा हम की कएलहुँ। असल शिष्य तँ छथि आश्विन बन्धु।


दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। अहाँकेँ ताहि द्वारे हम शिक्षा देबामे पराङमुख भए रहल छलहुँ। मुदा अहाँक दृढ़निश्चय आ’ सत्यक प्रति निष्ठाक द्वारे हम अहाँकेँ शिक्षा देल। हमरा मोनमे अहाँक प्रति कोनो मलिनता नहि अछि।

इन्द्र: धन्य छी अहाँ आ’ धन्य छय्हि आश्विनौ। आब हम ओ’ इन्द्र नहि रहलहुँ। हमर अभिमानकेँ आश्विनौ खतम कए देलन्हि।


(इन्द्र मंचसँ जाइत अछि। परदा खसैत अछि।)



दृश्य 3:


( स्वर्गलोकक दृश्य। चारू दिशि वृत्र आ’ शम्बरक नामक चर्चा करैत लोक आबाजाही कए रहल छथि। ओ’ दुनू गोटे आक्रमण कए देने अछि भारतक स्वर्गभूमि पर। इन्द्र सहायताक हेतु महर्षिक आश्रम अबैत छथि।)


इन्द्र: वृत्र आ’ शम्बरक आक्रमण तँ एहि बेर बड्ड प्रचंड अछि। अहाँक विचार आ’ मार्गदर्शनक हेतु आयल छी महर्षि।


दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। कुरुक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि, जकर नाम अछि, शर्यणा। अहाँ ओतए जाऊ, ओतय घोड़ाक मूड़ी राखल अछि, जाहिसँ हम आश्विनौकेँ उपदेश देने छलहुँ। ब्रह्मविद्या ओहि मुँहसँ बहरायल आ’ ताहि द्वारे ओ’ अत्यंत कठोर आ’ दृढ़ भ’ गेल अछि। ओहिसँ नाना-प्रकारक शस्त्र बनाऊ, अग्नि आश्रित विध्वंसकक प्रयोग करू, त्रिसंधि व्रज, धनुष, इषु-बाण-अयोमुख-लोहाक सूचीमुख सुइयाबला आ’ विकंकतीमुख- कठोर कन्ह सन एहि तरह्क शस्त्रक प्रयोग करू, कवच आ’ शिरस्त्राणक प्रयोग करू, अंधकार पसारयबला आ’ जड़ैत रस्सी द्वारा दुर्गंधयुक्त्त धुँआ निकलएबला शस्त्रक सेहो प्रयोग करू आ’ युद्ध कए विजयी बनू।


इन्द्र: जे आज्ञा महर्षि।


( परदा खसैत अछि, आ’ जखन उठैत अछि, तँ पोखडिक कातमे घोड़ाक मूड़ीसँ इन्द्र द्वारा वज्र आ’ विभिन्न हथियार बनाओल जा’ रहल अछि, फेर परदा खसि क’ जखन उठैत अछि तँ अग्नियुक्त शस्त्र, जे फटक्काक द्वारा उत्पन्न कएल जा’ सकैत अछि, देखबामे अबैत अछि आ’ मंच धुँआसँ भरि जाइत अछि। फेर परदा खसैत अछि आ’ मंचक पाछाँसँ सूत्रधारक स्वर सुनबामे अबैत अछि।)


सूत्रधार: इन्द्रक विजय भेलन्हि आ’ दुष्ट सभ गुफामे भागि गेल। ईएह छल वैदिक नाटक बादमे एहि अर्थकेँ अनर्थ कए देलन्हि पौराणिक लोकनि, जाहि कथामे दधीचीक हड्डीसँ इन्द्रक वज्र बनएबाक चर्च कएल गेल अछि।


(पर्दा ओ’ ई असल बात अछि केर फुसफुसाहटिक संग खसले रहैत अछि, आ’ लाइट क्षणिक ऑफ भेलाक बाद ऑन भए जाइत अछि।)

Thursday, April 16, 2009

२० टा बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर

२० टा बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर

1.बगियाक गाछ


एकटा मसोमात छलीह आ’ हुनका एकेटा बेटा छलन्हि। ओ’ छल बड्ड चुस्त-चलाक।

एक दिनुका गप अछि। ओ’ स्त्री जे छलीह, अपना बेटाकेँ बगिया बना कए देलखिन्ह। ओहि बालककेँ बगिया बड्ड नीक लगैत छलैक। से ओ’ एहि बेर ओ’ एकटा बगिया बाड़ीमे रोपि देलक। ओतए गाछ निकलि आएल। बगियाक गाछ, नञि देखल ने सुनल।

माय बेटा ओहि बगियाक गाछक खूब सेवा करए लगलाह। कनेक दिनमे ओहि गाछमे खूब बगिया फड़य लागल। ओ’ बच्चा गाछ पर चढ़ि कए बगिया तोड़ि कए खाइत रहैत छल।

एक दिनुका गप अछि। एकटा डाइन बुढ़िया रस्तासँ जा’ रहल छल। ओकरा मनुक्खक मसुआइ बना कए खायमे बड्ड नीक लगैत रहैक। से ओ’ जे बच्चाकेँ गाछ पर चढ़ल देखलक, तँ ओकर मोन लुसफुस करए लगलैक। आब ओ’ बुढ़्या मोनसूबा बनबए लागल जे कोना कए ई बच्चाकेँ फुसियाबी आ’ एकरा घर ल’ जा कए एकर मसुआइ बना कए खाइ।

बच्चाकेँ असगर देखि ओ’ लग गेल आ’ बच्चाकेँ कहलक-

“ बौआ एकटा बगिया हमरा नहि देब। बड्ड भूख लागल अछि।

बच्चा ओकर हाथ पर बगिया देबय लागल।



“बौआ हम हाथसँ कोना लेब बगिया हथाइन भ’ जायत”।

बच्चा बगिया माथ पर राखए लागल।

“हँ हँ माथ पर नहि राखू। मथाइन भ’ जायत”।

बच्चो छल दस बुधियारक एक बुधियार। खोइछमे बगिया देबए लागल।

”ई की करैत छी बौआ। बगिया खोँछाइन भ’ जायत, अहाँ झुकि कए बोरामे दए दिअ”।

मुदा बच्चा तँ छल गोनू झाक बुझू जे गोनू झाक मूल-गोत्रेक।

बाजल-

“नञि गए बुढ़िया। तोँ हमरा बोरामे बन्द कए भागि जेमह। माय हमरा ठग सभसँ सहचेत रहबाक हेतु कहने अछि”।

मुदा बुढ़ियो छल ठगिन बुढ़िया। ठकि फिसिया कए बोली-बाली दए कए ओकरा मना लेलक। जखने बच्चा झुकल ओ’ ओकरा बोरामे कसि कए चलि देलक। बुढ़िया रस्तामे थाकि कए एकटा गाछक छहरिमे बैसि गेलि।

कनेक कालमे ओकरा आँखि लागि गेलैक। बच्चा मौका देखि कोनहुना कए ओहि बोरासँ बाहर बहरा गेल आ’ भीजल माटि, पाथर आ’ काँट-कूस बोरामे ध’ कए ओहिना बान्हि कए पड़ा गेल।

बुढ़िया जखन सूति कए उठल आ’ बोरा ल’ कए आगू बढ़ल तँ ओकरा बोरा भरिगर बुझएलैक। मोने-मोन प्रसन्न भ’ गेलि ई सोचि जे हृष्ट-पुष्ट मसुआइ खएबाक मौका बहुत दिन पर भेटल छैक ओकरा। रस्तामे भीजल माटिसँ पानि खसए लागल तँ ओकरा लगलैक जे बच्चा लगही कए रहल अछि। ओ’ कहलक जे-

”माथ पर लहुशंका कए रहल छह बौआ। कोनो बात नहि। घर पर तोहर मसुआइ बना कए खायब हम”।


कनेक कालक बाद काँट गरए लगलैक बुढ़ियाकेँ। कहलक-

”बौआ। बिट्ठू काटि रहल छी। कोनो बात नहि कतेक काल धरि काटब”।

बुढ़्याक एकटा बेटी छलैक। गाम पर पहुँचि कए बुढ़िया ओकरा कहलक, जे आइ एकटा मोट-सोट शिकार अछि बोरामे। माय बेटी जखन बोरा खोललक तँ निकलल माटि, काँट आ’ पाथर। कोनो बात नहि।

बुढ़िया भेष बदलि पहुँचल फेरसँ बगियाक गाछ तर।

एहि बेर बच्चा ओकरा नञि चीन्हि सकल। मुदा जखन ओ’ झुकि कए बगिया बोरामे देबाक गप कहलक तँ बच्चाकेँ आशंका भेलैक।

”गए बुढ़िया। तोँही छँ ठगिन बुढ़िया”।

मुदा बुढ़िया जखन सप्पत खएलक तँ ओ’ बच्चा झुकि कए बगिया बोरामे देबए लागल। आ’ फेर वैह बात।

एहि बेर बुढ़िया कतहु ठाढ़ नहि भेल। सोझे घर पहुँचल आ’ बेटी लग बोरा राखि नहाए-सोनाए चलि गेल।बेटी जे बोरा खोललक तँ एकटा झँटा बला बच्चाकेँ देखलक। ओ’ पुछलक-

”हमर केश नमगर नहि अछि किएक”।

”अहाँक माय अहाँक माथ ऊखड़िमे दए समाठसँ नहि कुटने होयतीह। तैँ”।बच्चा तँ छल दस होसियरक एक होसियार तैँ।



बुढ़ियाक बेटी अपन केश बढ़ेबाक हेतु अपन माथ ऊखड़िमे देलन्हि, आ’ ओ’ बच्चा ओकरा समाठसँ कॉटए लागल। ओकरा मारि ओकर मासु बनेलक। बुढ़िया जखन पोख्रिसँ नहा कए आयल तँ बुढ़ियाक आगू ओ’ मासु परसि देलक।

जखने ओ’ खेनाइ पर बैसलि तँ लगमे एकटा बिलाड़ि छल से बाजि उठल-

”म्याँऊ। अपन धीया अपने खाँऊ।म्याँऊ”।

”बेटी एकरा मासु नहि देलहुँ की।तँ बाजि रहल अछि”।

ओ’ बच्चा बिलाड़िक आँगा मासु राखि देलक मुदा बिलाड़ि मासु नहि खएलक।

आब बुढ़ियाक माथ घुमल। ओ’ बेटीकेँ सोर कएलक तँ ओ’ बच्चा समाठ ल’ कए आयल आ’ ओकरा मारि देलक।

फेरसँ बच्चा बगियाक गाछ पर चढ़ि बगिया खए लागल। बड्ड नीक लगैत छल ओकरा बगिया।




2.ज्योति पँजियार



ज्योति पँजियार छलाह सिद्ध।पम्पीपुर गामक। तंत्र-मंत्र जानएबला।धर्मराज रहथि हुनकर कुलदेवता। ज्योति पँजियारक पत्नी छलीह लखिमा।

एक बेर साधुक वेष धय धर्मराज भिक्षाक हेतु अएलाह। ज्योति पँजियार लखिमाक संग गहबर बना रहल छलाह। माय सूपमे अन्न लए क’ अयलीह। मुदा साधु कहलखिन्ह जे हम तँ भीख लेब ज्योति पँजियारक हाथेटा सँ। ज्योति पँजियार मना कए देलखिन्ह जे हम गहबर बनायब छोड़ि कए नहि आयब।साधु श्राप दए देलखिन्ह जे निर्धन भ’ जयताह ज्योति पँजियार, कुष्ठ फूटि जएतन्हि हुनका।

आस्ते-आस्ते ई घटित होमय लागल। ज्योति पँजियार बहिनिक ओहिठाम चलि गेलाह। मुदा ओतय अवहेलना भेटलन्हि। ज्योति ओतय सँ निकलि गेलाह। ओइटदल गाम पहुँचि गेलाह अपन संगी लगवारक लग। एकटा त्तंत्रिक अएलाह। कहल- बारह वर्ष धरि कदलीवनमे रहए पड़त। धर्मराजक आराधना करए पड़त। गहबड़ बनाए करची रोपी ओतए। बाँसक घर बनाऊ धर्मराजक हेतु। धर्मराज दर्शन देताह, अहाँ ठीक भ’ जायब। पँजियार चललाह, रस्तामे सैनी गाछ भेटलन्हि, ओकर छहमे सुस्तेलाह पँजियार, मुदा ओ’ गाछ सुखा गेल, अरड़ा कए खसि पड़ल।कोइलीकेँ कहलन्हि जे पानि आनि दिअ, ओ’ उड़ल तँ बिहाड़ आबि गेल। कोइली मरि गेल।पँजियार उड़ि कए पहुँचि गेलाह कदली वनमे। एकटा महिसबार कहलकन्हि जे अछ्मितपुर गाम जाऊ। महिसबार छलाह धर्मराज, बनि गेलाह भेम-भौरा। एकटा व्यक्त्ति भेटलन्हि। ओ’ कहलकन्हि जे आगू वरक गाछ भेटत, ओकर पात तोड़ू।ओहि पर अहाँक सभ प्रश्नक उत्तर रहत। ई कहि ओ’ परबा बनि गेल। वरक पात तोड़लन्हि ज्योति तँ ओहि पर लिखल छल, यैह छी अछ्मितपुर। ओतुक्का राजाकेँ बच्चा नहि छलन्हि। ज्योति आशीर्वाद देलन्हि। कहलन्हि, एकटा छगर ओहि दिन पोसब जाहि दिन गर्भ ठहरि जाय। हम कदली वनसँ आयब तँ ई छगर स्वयं खुट्ट्सँ खुजि जायत। 12 बरखक बाद ज्योति कदली वनसँ चललाह। कोइलीकेँ जीवित कए देलन्हि। सुखायल धारमे पानि आबि गेल। सैनीक गाछ हरियर कचोर भ’ जीबि उठल। अछ्मितपुर गाममे राजा कहलन्हि जे छागर आ’ पुत्र दुनू एकहि दिन मरि गेल। पँजियार पाठाकेँ जिआ देलन्हि, कहलन्हि जो तोँ कदलीवनक धारमे नाओ पर चढ़ि जो, मनुक्ख रूप भेटि जयतौक। तावत राजाक पुत्र सेहो कदलीवनसँ शिकार खेला’ कए घोड़ा पर चढ़ि कए आबि गेल। ज्योति पँजियार गाम पहुँचि गेलाह गमछामे गहबर लेने।


3.राजा सलहेस


राजा सलहेस सुन्दर आ’ वीर छलाह। मोरंग नेपालमे रहैत छलाह। ओ’ दुसाध जातिक छलाह आ’ दबना नामक मोरंग राजाक मालिन सलहेससँ प्रेम करैत छलि। राजक वैद्य ओकरासँ प्रेम करैत छलाह आ’ दबनाक अस्वीकृतिसँ ओ’ आत्महत्या कए लेलन्हि। सलहेस छलाह मोरंगक तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाक सिपाही। सलेहस छलाह मोनक राजा। सभकेँ विपत्तिमे सहायता दैत रहथि। ताहि द्वारे दबना दिशि हुनकर कोनो ध्यान नहीं छलन्हि। सभ हुनका राजा कहैत छलन्हि, से ओ’ तालुकदारकेँ पसिन्न नहीं पड़ल। एक दिन दरबारमे ओ’ सलहेसकेँ पुछलक- अहाँक नाम की? सलहेस कहलन्हि- हमर नाम छी राजा सलहेस। तखन थापा कहलकन्हि, जे अहाँ अपन नाममे राजा नहीं लगाऊ। सलहेस कहल्न्हि, जे ई पदवी छी, जन द्वारा देल पदवी। कोना छोड़ब एकरा। हमारा चोड़ियो देब लोक तँ कहबे करत।तखन थापा कहलकन्हि जे लोककेँ मना क’ दियौक। सलहेस कहलन्हि जे लोककेँ कोना मना करबैक। लोकक मोन जे ओ’ ककरा की बजाओत। निकलि गेलाह सलहेस ओतयसँ। आब नहि निमहत ई नोकरी। आइ कहैत अछि नाम छोड़य लेल, काल्हि किछु आर कहत। पितियौत बहिन रहैत छलन्हि मुंगेरमे। बहिनोइ राज दरभंगाक नोकरीमे छलाह। एम्हर कुसमी दबनाकेँ कहि देलक जे सलहेस जा’ रहल अछि मोरंग छोड़ि कय। दबना छलि कमरू-कमख्यासँ तंत्र-मंत्र सिखने। कहलक ओ’ सलहेसकेँ जे हम राजाक दरबारमे सात सय सिपाहीक सरदार चूहड़मलकेँ हटबा क’ अहाँकेँ सरदार बना देब। सैह भेल। बड़का जलसा देलक दबना, गेलक गीत-

रौ सुरहा,

बारह बरस तोरा लेल आँचर बन्हलौँ।


मुदा, केलक चोरि चूहड़मल, चोरेलक नौ लाखक रानीक हार आ’ नुका देलक सलहेसक ओछैनमे। राजाकेँ कहलक चूहड़मल जे सलहेसक घरक तलासी लेल जाय।सलहेसक गेरुआक खोलसँ खसल हार।

दबना काली मन्दिरमे तंत्र साधना शुरू कएलक। भूत-प्रेतकेँ नोतलक। खून बोकरबेलक चूहड़मलसँ।

चूहड़मल सभटा बकि देलक।

सलहेसकेँ जेलसँ छोड़ि देल गेल आ’ ओकर ओहदा बढ़ा देल गेल। चूहड़मलकेँ भेलैक जेल।

दबना आ’ सलहेस विवाह कए खुशीसँ रहय लगलाह।


4.बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल


एकटा छलि बहुरा गोढ़िन आ’ एकटा छलाह नटुआ दयाल।

बहुरा गोढ़िन नर्त्तकी छलि आ’ ओकरा जादू अबैत छलैक।

नटुआ दयाल बहुरा गोढ़िनक प्रशंसक छल किएक तँ ओ’ छल प्रेमी, बहुरा गोढ़िनक पुत्रीक।

छल ओहो तांत्रिक।


कमला-बलानक कातक केवटी छलि बहुरा, बखरी, बेगूसरायक रहनिहारि।

हकलि छलि ओ’ कमरू सँ सीखलक जादू।

दुलरा दयाल छल मिथिला राज्यक भरौड़क राजकुमार, ओकरे नाम छल नटुआ दयाल।

नृत्य जे ओ’ बहुरासँ सिखलक तँ सभ नामे राखि देलकैक ओकर नटुआ।

नटुआ दयालक गुरू छलाह मंगल।

सिद्ध पुरुष।

अकाशमे बिन खुट्टीक धोती टँगैत छलाह, सुखला पर उतारैत छलाह।

बहुरा गाछ हँकैत छलि, जकरासँ झगड़ा भेल ओकरा सुग्गा बना पोसि लैत छलीह।

कमला कातमे रहैत छलाह आ’ भजैत छलाह,


कमलेक आसन,ओहीमे बास हे कमला मैय्या।


बहुरा वरकेँ मारि सीखने छल जादू। राजकुमारक विवाहक प्रस्तावकेँ नहि ठुकरा सकलि मुदा। बरियाती दरबज्जा लागल तँ भ’ गेलैक कह सुनी आ’ सभकेँ बना देलक ओ’ बत्तु।

मंत्री मल्लक एक आँखिक रोश्नी खतम।आहि रे बा।

व्यापारी जयसिंह छल मोहित महुराक बेटी पर,ओकरे खड्यंत्र।आहि रे बा।

गुरू लग गेल राजकुमार आ’ आदेश भेलैक, जो कामाख्या, सीखय लेल

षट् नृत्य, आ’ जादू।

चण्डिका मंदिरमे योगिनीसँ षट्नृत्य सिखलक आ’ आदेश भेलैक संरया ग्रामक भुवन मोहिनीसँ षट् नृत्यक एक अंग सीखबाक।

ओहि गामक सिद्ध देवी रहथि वागेश्वरी।

नरबलि चढैत छल ओतय। दैत्य अबैत छल ओतय।

सिखलक राजकुमार सिद्ध नृत्य अनहद आ’ आज्ञा चक्र।

करिया जादूकेँ काटय बला मंत्रफुकलक राजकुमारक कानमे।

कमला बलानमे आयल राजकुमार।

बहुरा सुखेलक धारक पानि।

राजा पता लगेलक जूकियासँ, अनलक बहुराकेँ, मुदा ओ’ तँ लगा देलक दोष राजकुमार पर। यज्ञ भेल तैयो कमलामे पानि नहि आयल, नटुआ पठेलक सभटा पानिकेँ पताल?

नटुआकेँ पकड़ि कय आनल गेल। ओ’ अपन नृत्यसँ जलाजल केलक कमलाकेँ।मुदा कहलक बहुराकेँ माफी दियौक।

बहुरा कहलक आब तोँ भेलह हमर बेटीक योग्य।

आबह बरियाती ल’कय।

नटुआ बरियाती ल’ क’ पहुँचल।

तीटा पान अयलैक,एक कमलाक पानिक हेतु,दोसर बहुराकेँ माफ करबाक

हेतु।

आ’ तेसर ओकर बेटीसँ व्याह करबाक हेतु।

तीनूटा पान उठेलक नटुआ आ’ शुरू भेल गीत-नाद।

पियास लगलैक नटुआकेँ शिष्य झिलमिलकेँ पठेलक इनार पर।

डोरी छोट भय गेलैक। अपने गेल नटुआ डोरी पैघ भ’ गेलैक।

फूलमती छलि ओतय,पतिक प्रतिभासँ प्रसन्न छलि ओ’।

मल्लक आँखि ठीक कएलक बहुरा।

कमला पहुँचल कनियाँक संग नटुआ, मुदा आहि रेबा।

नटुआकेँ चक्कू मारलक बहुरासँ दूर भेल ओकर शिष्य।


मुदा नटुआ चढ़ेने छल पटोर कमला मैय्याकेँ।


कमलाक धार खूने-खूनामे।


मुदा कामाख्याक जदूगरनी अयलीह आ’ जीवति कएलन्हि नटुआकेँ।


दुश्मनक बलि चढ़ेलक कमलाकेँ।



5.महुआ घटवारिन



महुआ घटवारिन परी जेकाँ सुन्दरि छलीह,जेना गूथल आँटामे एक चुटकी केसर, मुदा सतवंती छलीह। बाप गँजेरी शराबी आ’ माय सतमाय,मैभा महतारी, नजरि चोर। घरमे सतमायक राज छल। सोलह बरखक भय गेल रहथि मुदा हुनकर बियाहक चिंता ककरो नहि रहैक। परमान नदीक पुरनका घाटक मलाह प्र्रर्थना करैत छथि जे महुआक नावकेँ किनार लगा दियौक।

साओन-भादवक, भरल धार,

कम वयसक महुआ नहि जाऊ,

एहि राति खेबय लेल नाव।

एहने साओन-भादवक रातिमे सतमाय घाट पर उतरल वणिक् केँ तेल लगेबाक हेतु महुआकेँ पठबय चाहैत अछि, आ’ ओ’ जाय नहि चाहैत अछि। अपन मायकेँ यादि करैत अछि,

नोन चटा केँ किए नहि मारलँह,

पोसलँह एहि दिन खातिर।

मुदा सतमाय साओन-भादवक रातिमे पथिककेँ घाट पार करबाबय लेल महुआकेँ पठा देलक। महुआ बिदा भेलि आ’ बीच रस्तामे अपन सखी-बहिनपा फूलमतीसँ भरि राति गप करैत रहल।

केहन माय अछि जे रातिमे घाट पार करेबाक लेल कहैत अछि। माय ईहो कहलक जे पथिक पाइबला होय आ’ बूढ़ होय तँ ओकरा तेल-मालिस करबामे कोनो हर्ज नहि। ओकर मोनमे जे होय भेल तँ ओ’ पिते समान, ओकरा जेबीसँ चारि पाइ निकालि लेल जाय, अहीमे बुधियारी अछि। फूलमती कहलक- घबरायब नहि। जरेने रहू प्रेमक आगि , ओकरा लेल जे मोरंगमे आँगुर पर दिन गानि रहल अछि।

मोरंगक नाम सुनि महुआ उदास भय गेलि। ओ’ फागुनमे आयत।

भोरहरबा ओ’ गामपर पहुँचल आ’ माय दस बात कहलकैक। बाप नशामे आयल तँ माय ओकरो लात मारि भगा देलकैक। तखने हरकारा आयल आ’ मायक कानमे संदेश देलक। महुआ मायकेँ कहलक जे अहाँ जे कहब से हम करब। वणिक् क आदमी आयल छल,ओकरा संग महुआ घाट पर पहुँचल। वणिक् दू सिपाहेक संग नावमे बैसल। महुआ नाव खेबय लागलि। मुदा ओकरा नहि बूझल रहय जे ओकरा बेचि देल गेल छैक। सिपाही ओकरासँ पतवारि छीनि लेलक। सौदागर ओकरा कोरामे बैसाबय चाहलक, तँ ओ’ छरपटाय लागलि। सिपाही कहलक जे सभटा पाइ चुका देल गेल अछि, अहाँकेँ कोनो मँगनीमे नहि लय जा रहल छथि। महुआ स्थिर भय गेलीह। ओ’ सभ बुझलक जे महुआ मानि गेल अछि। तखने महुआ धारमे कूदि पड़लि। उल्टा धारमे मोरंग दिशि निकलि जाय चाहलक महुआ, जतय ओकर प्रेमी अछि, ओकरा लेल सात पालक नाव लेने। सौदागरक छोटका सिपाही महुआकेँ प्रेम करय लागल छल, ओहो कूदि गेल कोशिकीक धारमे, दूनू डूबि गेल।

अखनो साओन-भादवक धारमे कोनो घटवारकेँ कखनो देखा पड़ैत छैक महुआ। कोनो खिस्सा वचनहारकेँ देखा जाइत अछि ओ’, आ’ शुरू भय जाइत अछि , एकटा छलीह महुआ घटवारिन..............................।




6.डाकूरौहिणेय

मगध देशमे अशोकक पिता बिम्बिसारक राज्य छल। संपूर्ण शांति व्याप्त छल मुदा एकटा डाकू रौहिणेयक आतंक छल।ओकर पिता रहय डाकू लौहखुर। मरैत-मरैत ओ’ कहि गेल जे महावीर स्वामीक प्रवचन नहि सुनय आ’ जौँ कतओ प्रवचन होय तँ अप्पन कान बन्द क’ लय, अन्यथा बर्बादी निश्चित होयत। रौहिणेय मात्र पाइ बला के लुटैत छल आ’ गरीबकेँ बँटैत छल,ताहि द्वारे गामक लोक ओकर मदति करैत रहय आ’ ओ’ पकड़ल नहि जा सकलछल। एक बेर तँ ओ’ अप्पन संगीक संग वाटिकामे पाटलिपुत्रक सभसँ पैघ सेठक पुतोहु मदनवतीक अपहरण कय लेलक, जखन ओकर पति फूल लेबाक हेतु गेल रहय। जखन ओकर पति आयल तँ रौहिणेयक संगी ओकरा गलत जानकारी दय भ्रममे दय देलकैक। ओकरा बाद सुभद्र सेठक पुत्रक विवाह रहय।बराती जखन लौटि रहल छल तखन रौहिणेय सेठानी मनोरमाक भेष बनेलक आ’ ओकर संगी नर्त्तक बनि गेल।नकली नर्त्तक जखन नाचय लागल, तखन रौहिणेय भीड़मे कपड़ाक साँप चूड़ि देलक। रौहिणेय गहनासँ लदल वरकेँ उठा निपत्ता भय गेल। राजा शहरक कोतवालकेँ बजेलक।ओ’ तँ रौहिणेयकेँ पकड़बामे असमर्थता व्यक्त कएलक,आ’ कोतवाली छोड़बाक बातो कएलक। मंत्री अभयकुमार पाँच दिनमे डाकू रौहिणेयकेँ पकड़ि कय अनबाक बात कहलक। राजा ततेक तामसमे छलाह जे पाँच दिनका बाद डाकू रौहिणेयकेँ नहि अनला उत्तर अभयकुमारकेँ गरदनि काटि लेबाक बात कहलन्हि।

डाकू रौहिणेयकेँ सभ बातक पता चलि गेल छलैक।अभयकुमार जासूस सभ लगेलक। रौहिणेयकेँ मोनमे अयलैक जे सेठ साहूकार बहुत भेल आब किए नहिराजमहलमे डकैती कएल जाय। ओ’ राजमहल रस्ता पर चलि पड़ल। रस्तामे वाटिकामे महावीरस्वामीक प्रवचन चलि रहल छल। रौहिणेय तुरत अपन कान बन्द कए लेलक। मुदा तखने ओकरा पैरमे काँट गरि गेलैक। महावीर स्वामी कहि रहल छलाह-“देवता लोकनिकेँ कहियो घाम नहि छुटैत छन्हि।हुनकर मालाक फूल मौलाइत नहि अछि,हुनकर पैर धरती पर नहि पड़ैत छन्हि आ’ हुनकर पिपनी नहि खसैत छन्हि। “

तावत रौहिणेय काँट निकालि कान फेर बन्न कए लेलक आ’ राजमहलक दिशि चलि पड़ल।राजमहलमे सभ पहड़ेदार सुतल बुझाइत छल।मुदा ई अभयकुमारक चालि रहय।ओकर जासूस बता रहल रहय जे डाकू नगर आ’ महल दिशि आबि रहल अछि।

जखने ओ’ महलमे घुसैत रहय तँ पहरेदार ललकारा देलक। ओ’ छड़पिकय कालीमंदिर मे चलि गेल। सिपाही सभ मंदिरकेँ घेरि लेलक। ओ’ जखन देखलक जे बाहरसँ सभ घेरने अछितँ सिपाहीक मध्यसँ मंदिरक चहारदिवारी छड़पि गेल।मुदा ओतहु सिपाही सभ छल आ’ ओ’ पकड़ल गेल। राजा ओकरा सूली पर चढ़ेबाक आदेश देलकैक।मुदा मंत्री कहलन्हि जे बिना चोरीक माल बरामद केने आ’ बिना चिन्हासीक एकरा कोना फाँसी देल जाय।रौहिणेय मौका देखि कय गुहार लगेलक जे ओ’ शालि

गामक दुर्गा किसान छी,ओकर घर परिवार ओहि गाममे छैक।ओ’तँ नगर मंदिर दर्शनक हेतु आयल छल,ततबेमे सिपाही घेरि लेलकैक। राजा ओहि गाममे हरकारा पठेलक,मुदा ग्रामीण सभ रौहिणेयसँ मिलल छल।सभ कहलकैक जे दुर्गा ओहि गाममे रहैत अछि मुद तखन कतहु बाहर गेल छल। अभयकुमार सोचलक जे एकरासँ गलती कोना स्वीकार करबाबी।से ओ’ डाकूकेँ नीक महलमे कैदी बनाकय रखलक।डाकू महाराज ऐश आराममे डूबि गेलाह।

अभयकुमार एक दि न डाकूकेँ खूब मदिरा पिया देलन्हि।ओ’जखन होशमे आयल तँ चारू कातगंधर्व-अप्सरा नाचि रहल छल।

ओ’ सभ कहलकैक जे ई स्वर्गपुरी थीक आ’ इन्द्र रौहिणेयसँ भेँट करबाक हेतु आबत बला रहथि। रौहिणेय सोचलक जे राजा हमरा सूली पर चढ़ा देलक।मुदा ओ’ सभतँ मंत्रीक पठाओल गबैया सभ छल। तखने इंद्रक दूत आयल आ’ कहलक जे रौहिणेयकेँ देवताक रूप मे अभिषेक होयतैक,मुदा ताहिसँ पहिने ओकरा अपन पृथवीलोक पर कएल नीक-अधलाह कार्यक विवरण देबय पड़तैक।तखन रौहिणेयकेँ भेलैक जे सभटा पाप स्वीकार कय लय।मुदा तखने ओ देखलक जे दैव लोकक जीव सभ घामे-पसीने अछि,माला मौलायल छैक,पैर धरती पर छैक आ’पिपनी उठि-खसि रहल छैक।ओ’ अपनपुण्यक गुणगाण शुरू कए देलक।अभयकुमार राजाकेँ कहलक जे अहाँ जौँ ओकरा अभयदान दय देबैक तँ ओ’ सभटा गप्प बता देत। सैह भेलैक। रौहिणेय नगरक बाहरक अपन जंगलक गुफाक पता बता देलकैक,जतय सभटा खजाना आ’ अपहृत व्यक्ति सभ छल। राजा कहलन्हि जे किएक तँ ओकरा अभयदान भेटि गेल छैक ताहि हेतु ओ’ सभ संपदा राखि सकैत अछि।मुदा रौहिणेय कोनोटा वस्तु नहि लेलक।ओ’ कहलक जे जाहि महावीरस्वामीक एकटा वचन सुनलासँ ओकर जान बचि गलैक,तकरदीक्षा लेत आ’ ओकर सभटा वचन सुनि जीवन धन्य करत।


7.मूर्खाधिराज

एकटा गोपालक छल। तकर एकटा बेटा छल। ओकर कनियाँ पुत्रक जन्मक समय मरि गेलीह। बा बच्चाक पालन कएलन्हि। मुदा ओऽ बच्चा छल महामूर्ख। जखन ओऽ बारह वर्षक भेल तखन ओकर विवाह भए गेल। मुदा ओऽ विवाहो बिसरि गेल।
बुढ़िया बाकेँ काज करएमे दिक्कत होइत छलन्हि। से ओऽ बुझा-सुझाकेँ ओकरा कनियाकेँ द्विरागमन करा कए अनबाक हेतु कहलन्हि। बा ओकरा गमछामे रस्ता लेल मुरही बान्हि देलन्हि। रस्तामे बच्चाकेँ भूख लगलैक। ओऽ गमछासँ मुरही निकालि कए जखने मुँहमे देबए चाहैत छल आकि मुरही उड़ि जाइत छल। बच्चा बाजए लागल- आऊ, आऊ उड़ि जाऊ।
लगमे बोनमे एकटा चिड़ीमार जाल पसारने छल, मुदा बच्चाक गप सुनि कए ओकरा बड्ड तामस उठलैक। ओकरा लगलैक जेना ई बच्चा ओकर चिड़ैकेँ उड़ाबए चाहैत अछि। चिड़ीमार बच्चाकेँ पकड़ि कए पुष्ट पिटान पिटलक। बच्चा पुछलक- हमर दोख तँ कहू? चिड़ीमार कहलक- एना नहि। एना बाजू। आबि जो। फँसि जो।
आब बच्चा सैह बजैत आगू जाए लागल। आब साँझ भए रहल छल। बोन खतम होएबला छल। ओतए चोर सभ चोरिक योजना बनाए रहल छलाह। ओऽ सभ सुनलन्हि जे ई बच्चा हमरा सभकेँ पकड़ाबए चाहैत अछि। से ओऽ लोकनि सेहो ओकरा पुष्ट पिटान पिटलन्हि। बच्चा फेर पुछलक- हम बाजी तँ की बाजी? चोरक सरदार कहलक- बाज जे एहन सभ घरमे होए।
आब बच्चा यैह कहैत आगाँ बढ़ए लागल। आब श्मसानभूमि आबि गेल। एकटा जमीन्दारक एकेटा बेटा छलैक। से मरि गेल छल आऽ सभ ओकरा डाहबाक लेल आबि रहल छलाह। ओऽ लोकनि बच्चाक गप पर बड़ कुपित भेलाह आऽ ओकरा पुष्ट पिटलन्हि। फेर जखन बच्चा पुछलक जे की बाजब उचित होएत तँ सभ गोटे कहलखिन्ह जे एना बाजू- एहन कोनो घरमे नहि होए। बच्चा यैह गप बाजए लागल। आब नगर आबि गेल छल आऽ राजाक बेटाक विवाहक बाजा-बत्ती सभ भए रहल छल। बरियाती लोकनि बच्चाकेँ कहैत सुनलन्हि जे एहन कोनो घरमे नहो होए तँ ओऽ लोकनि क्रोधित भए फेर ओहि बच्चाकेँ पिटपिटा देलखिन्ह। जखन बच्चा पुछलक जे की बजबाक चाही तँ सभ कहलकन्हि जे किछु नहि बाजू। मुँह बन्न राखू।
बच्चा सासुर आबि गेल। ओतए नहिये किछु बाजल नहिये किछु खएलक, कारण खएबामे मुँह खोलए पड़ितैक। भोरे सकाले सासुर बला सभ अपन बेटीकेँ ओहि बच्चाक संग बिदा कए देलन्हि। रस्तामे बड्ड प्रखर रौद छलैक। ओऽ सुस्ताए लागल। मुदा कलममे सेहो बड्ड गुमार छलैक। कनियाकेँ बड्ड घाम खसए लगलैक आऽ ताहिसँ ओकर सिन्दूर धोखरि गेलैक। बच्चाकेँ भेलैक जे सासुर बला ओकरासँ छल कएलक आऽ ओकरा भँगलाहा कपार बला कनियाँ दए जाइ गेल अछि। एहन कनियाँकेँ गाम पर लए जाय ओऽ की करत। ओऽ तखने एकटा हजामकेँ बकरी चरबैत देखलक। ओकरासँ अपन पेटक बात कहबाक लेल अपन मुँह खोललक आऽ सभटा कहि गेल। हजाम बुझि गेल जे ई बच्चा मूर्खाधिराज अछि। ओऽ ओकरा अपन दूध दए बाली बकड़ीक संग कनियाँक बदलेन करबाक हेतु कहलक। बच्चा सहर्ष तैयार भए गेल। आगू ओऽ बच्चा सुस्ताए लागल आऽ खुट्टीसँ बकड़ीकेँ बान्हि देलक। बकड़ी पाउज करए लागल तँ बच्चाकेँ भेलैक जे बकड़ी ओकर मुँह दूसि रहल अछि। ओऽ ओकरा हाट लए गेल आऽ कदीमाक संग ओकरो बदलेन कए लेलक। गाम पर जखन ओऽ पहुँचल तँ ओकर बा बड्ड प्रसन्न भेलीह। हुनका भेलन्हि जे कनियाँक नैहरसँ सनेसमे कदीमा आएल अछि। मुदा कनियाँकेँ नहि देखि तकर जिगेसा कएलन्हि तँ बच्चा सभटा खिस्सा सुना देलकन्हि। ओऽ माथ पीटि लेलन्हि। मुदा बच्चा ई कहैत खेलाए चलि गेल जे कदीमाक तरकारी बना कए राखू।


8.कौवा आ फुद्दी

एकटा छलि कौआ आऽ एकटा छल फुद्दी। दुनूक बीच भजार-सखी केर संबंध। एक बेर दुर्भिक्ष पड़ल। खेनाइक अभाव एहन भेल जे दुनू गोटे अपन-अपन बच्चाकेँ खएबाक निर्णय कएलन्हि। पहिने कोआक बेर आयल। फुद्दी आऽ कौआ दुनू मिलि कए कौआक बच्चाकेँ खाऽ गेल। आब फुद्दीक बेर आयल। मुदा फुद्दी सभ तँ होइते अछि धूर्त्त।
“अहाँ तँ अखाद्य पदार्थ खाइत छी। हमर बच्चा अशुद्ध भए जायत। से अहाँ गंगाजीमे मुँह धोबि कए आबि जाऊ”।
कौआ उड़ैत-उड़ैत जंगाजी लग गेल-
“हे गंगा माय, दिए पानि, धोबि कए ठोढ़, खाइ फुद्दीक बच्चा”।
गंगा माय पानिक लेल चुक्का अनबाक लेल कहलखिन्ह।
आब चुक्का अनबाक लेल कौआ गेल तँ ओतएसँ माटि अनबाक लेल कुम्हार महाराज पठा देलखिन्ह्। खेत पर माटिक लेल कौआ गेल तँ खेत ओकरा माटि खोदबाक लेल हिरणिक सिंघ अनबाक लेल विदा कए देलकन्हि। हिरण कहलकन्हि जे सिंहकेँ बजा कए आनू जाहिसँ ओऽ हमरा मारि कए अहाँकेँ हमर सिंघ दऽ दए। आब जे कौआ गेल सिंघ लग तँ ओऽ सिंह कहलक- “हम भेलहुँ शक्त्तिहीन, बूढ़। गाञक दूध आनू, ओकरा पीबि कए हमरामे ताकति आयत आऽ हम शिकार कए सकब”।
गाञक लग गेल कौआ तँ गाञ ओकरा घास अनबाक लेल पठा देलखिन्ह। घास कौआकेँ कहलक जे हाँसू आनि हमरा काटि लिअ।
कौआ गेल लोहार लग, बाजल-
“हे लोहार भाञ,
दिअ हाँसू, काटब घास, खुआयब गाय, पाबि दूध,
पिआयब सिंहकेँ, ओऽ मारत हरिण,
भेटत हरिणक सिंघ, ताहिसँ कोरब माटि,
माटिसँ कुम्हार बनओताह चुक्का, भरब गङ्गाजल,
धोब ठोर, आऽ खायब फुद्दीक बच्चा”।
लोहार कहलन्हि, “हमरा लग दू टा हाँसू अछि, एकटा कारी आऽ एकटा लाल। जे पसिन्न परए लए लिअ”।
कौआकेँ ललका हाँसू पसिन्न पड़लैक। ओऽ हाँसू धीपल छल, जहाँ कौआ ओकरा अपन लोलमे दबओलक, छरपटा कए मरि गेल।


9.नैका बनिजारा

शोभनायका छलाह एकटा वणिकपुत्र। हुनकर विवाह तिरहुतक कोनो स्थानमे बारी नाम्ना स्त्रीसँ भेल छलन्हि। शोभा द्विरागमन करबा कए कनियाँकेँ अनलन्हि, आऽ बिदा भए गेलाह मोरंगक हेतु व्यापार करबाक लेल। पत्नीक संग एको दिन नहि बिता सकल छलाह। रातिमे एकटा गाछक नीचाँमे जखन ओऽ राति बितेबाक लेल सुस्ता रहल छलाह, तखन हुनका एकटा ध्वनि सुनबामे अएलन्हि। एकटा डकहर अपन भार्याक संग ओहि गाछ पर रहैत छल। दुनू गोटे गप कए रहल छलाह, जे ओऽ राति बड़ शुभ छल आऽ ओहि दिन पत्नीक संग जे रहत तकरा बड्ड प्रतिभावान पुत्रक प्राप्ति होएतैक।
ई सुनतहि शोभा घर पहुँचि गेल भार्या लग। लोकोपवादसँ बचबाक लेल पत्नीकेँ अभिज्ञानस्वरूप एकटा औँठी दए देलन्हि आऽ चलि गेलाह मरंग। ओतए १२ बर्ख धरि व्यापार कएलन्हि, आऽ तेरहम बर्ख बिदा भेला घरक लेल।
एम्हर ओकर कनियाक बड़ दुर्गति भेलैक। ओऽ जखन गर्भवती भए गेलीह, सासु-ससुर घरसँ निकालि देलकन्हि हुनका। मुदा ओकर दिअर जकर नाम छल चतुरगन, ओकरा सभटा कथा बुझल छलैक। ओतए रहय लगलीह ओऽ। जखन शोभा घुरल तखन सभ रहस्य बुझलकैक आऽ सभ हँसी खुशी रहए लागल।
तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना।
दुर्गा गे स्वामी के लैके कोहबर घर लेवा ने
केलही रे ना।
कोहबर घर से हमरो निकालियो देलकइ रे ना
दुर्गा गे केना बचबै अन्न-पानी बिन केना
रहबइ रे ना।


10.डोकी डोका

एक टा छल डोका आऽ एकटा छल डोकी।
दुनूमे बड्ड प्रेम। डोकी कहए तरेगण लए आऊ, तँ डोका तरेगण आनएमे सेकेण्डक देरी भए जाए तँ ठीक मुदा मिनटक देरी नञि होमय दैत छल।

सियारकेँ रहए ईर्ष्या दुनूसँ। से ओऽ कनही सियारिनसँ मिलि गेल आऽ एक दिन जख्नन डोका आऽ डोकी एक्के थारीमे भोजन कए रहल छल, तखन डोकाकेँ बजेलक। एम्हर-ओम्हरक गप कए ओकरा बिदा कए देलक। फेर डोकीकेँ बजेलक ओऽ सियरबा। पुछलक जे अहाँ दुनू गोटेमे बड़ प्रेम अछि, मुदा डोका जे कहलक ताहिसँ तँ हमरा बड़ दुःख भेल। लागए-ए जे ओकर मोन ककरो आन पर छैक। आर किछु पूछए लागल डोकी तावत ओऽ सियरबा पड़ा गेल।

आब डोकी घरमे हनहन-पटपट मचा देलक। डोका लकड़ी काटय बोन दिशि गेल। घुरल नहि। भोरमे एकटा जोगी आएल तँ ओकरासँ डोकी पुछलक जे ई की भेल? जोगिया कहलक जे ई अछि पूर्व जन्मक सराप। जखने अहाँ डोकी पर विश्वास छोड़ब डोका छोड़ि कए चलि जाएत मुदा सातम दिन भेटि जाएत।
मुदा डोकी निकलि गेलि डोकाकेँ ताकए। बगुला भेटलैक डोकीकेँ कहलकैकरुकि जाऊ एहि राति। फेर सियरबा, वटवृक्ष, मानसरोवरक रस्तामे बोनमे हाथी सभ कहलकैक जे एक एक राति रुकि कए जाऊ मुदा डोकी नहि रुकलि। फेर भेटल मूस। ओऽ कहलक जे हमरा संग चलू, हम महल लए जायब, खिस्सा सुनाएब छह रातिक बाद सातम राति बीतत आऽ डोका भेटत। खिस्सा सुनबैत महल दिशि विदा भेल दुनू गोटे। मूस कहलक जे अहाँ हँ-हँ कहैत रहब खिस्साक बीचमे। मूसक खिस्सा कनेक नमगर रहए। डोकी बीचमे हँ कहब बिसरि गेलि। आऽ तकर बाद मूस सेहो खिस्सा बिसरि गेल। कतबो मोन पाड़य चाहलक मुदा मोन नहि पड़लैक। फेर आगू बढ़ल दुनू गोटे। एकटा दीबारिमे भूर कए दुनू गोटे सुरंगमे पहुँचल, तँ दू राति धरि चलैत रहल तखन महल आयल। ओतए डोकी हलुआ बनबए लेल लोहियामे समान देलक आऽ कनेक पानि आनए लेल बाहर गेल तँ मूसकेँ रहल नञि गेलैक आऽ ओऽ लोहियामे मुँह दए देलक आऽ मरि गेल। डोकी घुरि कए ई देखलक तँ कुहड़ि उठल।
बगुला छोड़ल सियरबा छोड़ल
छोड़ल वटक वृक्ष
हाथी सन बलगर
पकड़ल ई मूस।
मूस भैयाक संग लेल बीतल छह राति,
सातम रातिमे ओऽ प्राण गमेलन्हि
आऽ ओकर साँस टुटए लगलैक, मुदा तखने दरबज्जा खुजल आऽ कुरहड़ि लेने डोका हाजिर।


11.रघुनी मरर

चित्र: ज्योति झा चौधरी
देवदत्त, काशीराम आऽ रघुनी मरर तीन भाँय। गाय चराबए जाथि। एक बेर अकाल आयल तँ रघुनी भागि कए सहरसाक बनमां प्रखण्डक बिदिया बरहमपुर गाममे अपन डेरा खसेलन्हि।एतए जमीन्दार रहथि जुगल आऽ कमला प्रसाद। जुगल प्रसाद एक बेर दंगल करेने छलाह, ओहि दंगलकेँ जितने छलाह रघुनी। रघुनी हुनके लग गेलाह। एक सय बीघा जमीन देलन्हि जुगल प्रसाद हुनका। सुगमां गाममे बथान बनओलन्हि रघुनी। खेती करथि आऽ परिवारसँ दूर सुगमा गाममे रहथि।

एम्हर जुगल प्रसादक घरमे कलह भेल आऽ अपन जमीन-जत्था ओऽ गागोरी राजकेँ बेचि देलन्हि। रघुनीकेँ जखन ई पता चललन्हि तँ हुनका बड्ड दुख भेलन्हि।

एक दिन संगीक संग रघुनी नाच देखबाक लेल सिमरी गामक चौधरीक दलान पर गेल। चौधरी नाचक बाद नटुआकेँ औँठी आऽ दुशाला देलखिन्ह। रघुनी नटुआकेँ कहलखिन्ह जे बथान परसँ अपन पसिन्नक एक जोड़ी गाय हाँकि लिअ। नटुआ खुशीसँ दू टा निकगर गाय हाँकि अनलक आऽ खुशीसँ चौधरीकेँ देखेलक। मुदा चौधरीकेँ बुझेलए जे रघुनी हुनका नीचाँ देखबए चाहैत छथि। मुदा सोझाँ-सोँझी भिरबाक हिम्मत तँ छलए नहि।

से चौधरी देवी उपासक जादूक कलाकार मकदूम जोगीसँ भेँट कएलक। ओऽ जोगीकेँ कहलक जे रघुनीकेँ हमर नोकर बना दिअ। जोगी सरिसओ फूकि छिटलक मुदा रघुनी छल देवी भक्त से जोगीक जादू नहि चललैक।

चण्डिकाक सिद्धि कएलक जोगी आऽ रघुनी पर जादू सँ सए टा बाघसँ घेरबा कए मारि देलक। मुदा भक्त छल रघुनी से चण्डिकाक बहिन कामाख्या आबि रघुनीकेँ जिया देलन्हि। दोसर जादू लेल जोगी सरिसओ मन्त्राबए लेल जे सरिसओ मुट्ठीमे लेलक तँ मुट्ठी बन्दक-बन्दे रहि गेलैक।
फेर चौधरीकेँ पता चललैक जे रघुनी गागोरी राजाक लगान नहि देने अछि। से ओऽ राजा लग गेल आऽ कहलक जे रघुनी ने तँ अपने लगान देने अछि आऽ उनटले लोक सभकेँ लगान देबासँ मना कए रहल अछि।

गाम पर रघुनी नहि रहए आऽ सिपाही सभ ओकर भाए देवदत्त मररकेँ लए विदा भए गेलाह। रस्तामे केजरीडीह लग देवदत्त रघुनीकेँ देखलन्हि, रघुनी सेहो देवदत्तकेँ देखलन्हि। मुदा सिपाही सभ रघुनीकेँ नहि देखि सकलाह। मुदा जखन राजा देवदत्तकेँ काल कोठरीमे दए सिपाही सभकेँ ओकरा मारबाक लेल कहलक तँ उनटे जे कोड़ा चलबय तकरे चोट लागए। फेर राजा देवदत्तसँ कहलक जे गलती भेल आब अहाँ जे कहब सैह हम करब। देवदत्तक कहला अनुसार जे रैयत लगान नहि भरलाक कारणसँ जहलमे रहथि से छोड़ि देल गेलाह आऽ राजा रघुनी मररसँ सेहो माफी मँगलन्हि।


12.जट-जटिन

महाराज सिव सिंह (१४१२-१४४६) मिथिलाक राजा छलाह। विद्यापति हुनके शासनकालमे भेल छलाह आऽ राजा शिव सिंह आऽ हुनकर रानी लखिमा रानी हुनकासँ बड़ प्रेम करैत रहथि। एक टा जयट वा जट नाम्ना बड़ पैघ संगीतकार सेहो छलाह ओहि समयमे। राजा शिव सिंह हुनकासँ विद्यापतिक गीतकेँ राग-रागिनीमे बन्हबाक लेल कहने रहथि। वैह जयट जट-जटिन नाटकक रचना कएलन्हि आऽ जटक भूमिका सेहो कएने छलाह। साओन-भादवक शुक्ल-पक्षक रातिमे ई नाटक स्त्रीगण द्वारा होइत अछि।
जट छथि पहिरने पुरुष-परिधान आऽ जटिन पहिरने छथि छिटगर नूआ। आऽ देखू दुनू गोटे अपना संग अपन-अपन संगीकेँ लए आबि गेल छथि।
बियाहक पहिल सालक साओन, जटिन जाए चाहैत छथि नैहर मुदा धारमे बाढ़ि छैक, हे माय कोनो नौआ-ठाकुर-ब्राह्मण आकि पैघ भाए केर बदलामे छोटका भायकेँ पठबिहँ बिदागरीक लेल नञि तँ सासुर बला सभ बिदागरी आपिस कए देत। जाहि नवकनियाँकेँ नैहर नहि जाय देल गेल ओऽ अपन पतिकेँ कहैत छथि जे जट-जटिनक नृत्यमे तँ भाग लेबए दिअ। मुदा वर झूमर खेलाएबसँ मना कए दैत छथि, तखन ओऽ घामक बहन्ना बनाए दूर भए जाइत छथि।
जट-जटिन बीचमे छथि आऽ दुनूक संगीमे बहस चलि रहल अछि।
-चलू झूमर खेलाए।
-कोन पातपर चढ़ि कए।
-पुरैनीक।
जट-जटिनमे विआह होए बला अछि, मुदा जट किछु बातपर अड़ि गेल, जेना धानक शीस जेकाँ लीबि कए चलत जटिन, किछु देखावटी विरोधक बाद जटिन सभटा मानि जाइत छथि। फेर दुनू गोटे विआह कए लैत छथि। फेर भोर होइत अछि, जटिन कहित छथि जे जाए दिअ, अँगना बहारबाक अछि, मुदा जटा कहैत छथि जे अँगना मए-बहिन बहाड़ि लेत।
फेर दिन बितैत अछि तँ जटिन कहैत छथि जे गहना किएक नहि बनबाए रहल छी हमरा लेल, आर बहन्ना करब तँ हम सोनारक घर चलि जाएब।
जटिन ततेक खरचा करबैत छन्हि जे जटाक हाथी तक बिकाऽ जाइत छन्हि आऽ हाथीक सिकड़ि मात्र बचल रहि जाइत छन्हि।
जटिन कहैत छथि जे हमरा नैहर जएबाक अछि, तँ जटा कहैत छथि जे धानक फसिल तैयार अछि, तकरा काटि कए जाऊ। जटिन नहि मानैत छथि कहैत छथि जे एहि बेर जे हम जाएब तँ घुरि कए नहि आएब। मुदा सौतिनक गप सुनि कए डेराए जाइत छथि। बीचमे स्वांग जेना कोनो रोगीक इलाज आदि सेहो होइत रहैत अछि।
जट मोरंग बिदा भए जाइत छथि कमाए। जटिनकेँ सोनार प्रलोभन दैत छन्हि गहनाक, मुदा जटिन जटाक सुन्दरताक वर्णन करैत छथि।
फेर जटा घुरि अबैत अछि। एक दिन दुनू गोटेमे कोनो गप लऽ कए झगड़ा भए जाइत छन्हि। जट छौँकीसँ जटिनकेँ छूबि दैत छथि। जटिन रूसि कए घर छोड़ि दैत छथि। जटा गोपी, मनिहारिन आऽ आन-आन रूप धरि ताकैत छथि हुनका। मुदा जटाक घरमे झोल-मकड़ा भरि जाइत छन्हि आऽ अंगनामे दूभि उगि जाइत छन्हि। तखन जटिन हुनका
लग आबि जाइत छथि। फेर स्त्रीगण लोकनि बेंगकेँ एकटा खद्धा खुनि कए ओहिमे दए दैत छथि आऽ ऊपरसँ ओकरा कूटैत छथि आऽ मरल बेंगकेँ झगराहि स्त्रीक दरबज्जपर फेकि अबैत छथि। ओऽ स्त्री भोरमे मरल बेंगकेँ देखला उत्तर जतेक गारि पढ़ैत छथि, ततेक बेशी बरखा होइत अछि।


13.बत्तू

एकटा बकड़ी छलि। ओकरा एकटा बच्चा भेलैक। मुदा ओऽ छागर मात्र ४ मासक छल आकि दुर्गापूजा आबि गेल। दुर्गापूजामे छागरक बलि देबाक कियो कबुला केने छलाह। से बकड़ीक मालिकक लग आबि छागरक दाम-दीगर केलन्हि। संगमे पाइ नहि अनने छलाह से अगिला दिन पाइ अनबाक आऽ चागर लए जएबाक गप कए चलि गेलाह। बकड़ी ई सभ सुनैत छलि ओऽ अपन बच्चाकेँ कहलन्हि जे भागि जाऊ जंगल दिस नहि तँ ई मलिकबा काल्हि अहाँकेँ बेचि देत आऽ किननहार दुर्गापूजामे अहाँक बलि दए देत। छागर राता-राती जंगल भागि गेल। २-३ साल ओऽ जंगलमे बितेलक, मोट-सोट बत्तू भए गेल, पैघ दाढ़ी आऽ सिंघ भए गेलैक ओकरा। एक दिन घुमैत-घुमैत ओऽ दोसर जंगलमे चलि गेल। ओतए एकटा बाघ छल, बत्तू बाघकेँ देखि कए घबड़ा गेल। बाघ सेहो एहन जानवर नहि देखने छल, से ओऽ अपने डरायल छल। ओऽ पुछलक-
नामी नामी दाढ़ी मोंछ भकुला,
कहू कतएसँ अबैत छी, नञि तँ देव ठकुरा।
बत्तू कहलक-
अर्चुन्नी खेलहुँ गरचुन्नी खेलहुँ, सिंह खेलहुँ सात।
आऽ जहिया दस बाघ नञि होए, तहिया परहुँ ठक दए उपास।

ई सुनि बाघ पड़ाएल। मुदा रस्तामे नढिया सियार ओकरा भेटलैक आऽ कहलकैक जे अहाँ अनेरे डरैत छी। चलू आइ तँ नीक मसुआइ होएत। ओऽ तँ बकड़ीक बच्चा अछि। बाघ डराएल छल से ओऽ सियारक पैरमे पैर बान्हि ओतए जएबा लेल तैयार भए गेल। आब बत्तू जे दुनूकेँ अबैत देखलक तँ बुझि गेल जे ई सियरबाक काज अछि। मुदा ओऽ बुद्धिसँ काज लेलक। कहलक-
“ऐँ हौ, तोरा दू टा बाघ आनए ले कहलियहु आऽ तोँ एकेटा अनलह”।

ई सुनैत देरी बाघ भागल आऽ सियरबा घिसिआइत मरि गेल।


14.भाट-भाटिन

एकटा छल भाट आऽ एकटा छलि भाटिन।
भाटिन एकटा मणिधारी गहुमनसँ प्रेम करैत छलि। ओऽ साँप लेल नीक निकुत बनबैत छलि आऽ भाटकेँ बसिया-खोसिया दैत चलि। भाट दुबर-पातर होइत गेल। मुदा भाटिन ओकरा जिबए नहि दए चाहैत छलि से ओऽ साँपकेँ कहलक भाटकेँ डसि लए लेल।
आब साँप भाटकेँ काटए लेल ताकिमे रहए लागल। एक दिन जखन भाट धारमे पएर धोबए लेल पनही खोलि कए रखलक तखने साँप ओकर पनहीमे नुका गेल। भाट आएल आऽ पहिरबाक पहिने पनही झारलक तँ ओऽ साँप खसि पड़ल। भाट पनहीसँ मारि-मारि कए साँपक जान लऽ लेलक आऽ ओकरा मारि कए वरक गाछपर लटका देलक।

भाट जखन गामपर पहुँचल तखन ओऽ अपन कनियाँकेँ सभटा खिस्सा सुनेलक। आब भाटिनक तँ प्राण सुखा गेलैक। ओऽ भाटक संग वरक गाछ लग गेल आऽ अपन प्रेमी साँपकेँ मरल देखि कए बेहोश भऽ गेल। भाट ओकरा गामपर अनलक। भाटिन दुखी भऽ असगरे वरक गाछपरसँ साँप उतारि ओकरा नौ टुकड़ा कए घर आनि लेलक। भाटिन साँपक चारि टा टुकड़ी चारू खाटक पाइसक नीचाँ, एकटा मचियाक नीचाँ, एकटा तेलमे, एकटा नूनमे, एकटा डाँरमे आऽ एकटा खोपामे राखि लेलक। फेर भाटकेँ कहलक जे खाट, मचिया, नून-तेल, डाँर आऽ खोपामे की अछि से बता नहि तँ भकसी झोका कए मारबौक। भाट नहि बता सकल आऽ ओऽ कहलक जे मरबाऽ सँ पहिने ओऽ बहिनसँ भेँट करए चाहैत अछि आऽ ताहि लेल दू दिनुका मोहलत ओकरा चाही। भाट अपन बहिन लग गेल तँ ओऽ अपन भाइक औरदा जोद्इ रहल छलि। सभ गप जखन ओकरा पता चललैक तखन ओऽ कहलक जे ओहो संग चलत ओकर। रस्तामे एकटा धर्मशालामे रातिमे दुनू भाइ-बहिन रुकल, मुदा बहिन चिन्ते सुति नहि सकल। तखने धर्मशालाक सभटा दीआ एक ठाम आबि कए गप करए लागल। भाटक बहिनक कोठलीक दीआ कहलक जे भाटिन अपन वर भाटकेँ मारए चाहैत अछि आऽ ओऽ जे फुसियाहीक प्रहेलिका बनेने अछि, से ओकर प्रेमी मरल गहुमनकेँ ओऽ टुकड़ी कए ठाम-ठाम राखि देने अछि आऽ तकरे प्रहेलिका बना देने अछि। आब भोरमे जखन दुनू भाइ बहिन गामपर पहुँचलि तँ बहिन अपन भौजीकेँ कहलक जे ओऽ सेहो प्रहेलिका सुनए चाहैत अछि। भाटिन कहलक जे जौँ ओऽ प्रहेलिका नञि बुझि सकल तखन ओकरो भकसी झोँका कऽ ओऽ मारि देत। तखन ननदि कहलक जे यदि ओऽ प्रहेलिकाक उत्तर दए देत तखन भौजीकेँ भकसी झोका कए मारि देत। आब जखने भाटिन प्रहेलिका कहलक तखने बहिन सभटा टुकड़ी निकालि-निकालि कऽ सोझाँ राखि देलक आऽ भौजीकेँ भकसी झोका कऽ मारि देलक।

15.गांगोदेवीक भगता

गांगोदेवी मलाहिन छलीह। एक दिन हुनकर साँय, अपन भाय आऽ पिताक संग माछ मारए लेल गेलाह। साओनक मेला चलि रहल छलैक आऽ मिथिलामे साओनमे माँ खाइ आकि बेचएपर तँ कोनो मनाही छैक नहि। गांगोदेवीक वर सोचलन्हि जे आइ माछ मारि हाटमे बेचब आऽ साओनक मेलासँ गांगो लेल चूड़ी-लहठी आनब।
धारमे तीनू गोटे जाल फेकलन्हि सरैया पाथलन्हि मुदा बेरू पहर धरि डोका, हराशंख आऽ सतुआ मात्र हाथ अएलन्हि। आब गांगोक वर कनियाँक नाम लए जाल फेकि कहलन्हि जे ई अन्तिम बेर छी गांगो। एहि बेर जे माँछ नहि आएल तँ हमरा क्षमा करब। आब भेल ई जे एहि बेर जाल माँछसँ भरि गेल। जाल घिंचने नहि घिंचाए। सभटा माँछ बेचि कए गांगो लेल लहठी-चूड़ीक संग नूआ सेहो कीनल गेल।
अगिला दिन गांगोक वर गांगोक नाम लए जाल फेंकलन्हि तँ फेर हुनकर जाल माँछसँ भरि गेलन्हि मुदा हुनकर भाइ आऽ बाबूक हिस्सा वैह डोका-काँकड़ु अएलन्हि। ओऽ लोकनि खोधिया कए एकर रहस्य बूझि गेलाह फेर ई रहस्य सौँसे मिथिलाक मलाह लोकनिक बीच पसरि गेल। गांगोदेवीक भगता एखनो मिथिलाक मलाह भैया लोकनिमे प्रचलित अछि। सभ जाल फेंकबासँ पहिने गांगोक स्मरण करैत छथि।


16.बड़ सख सार पाओल तुअ तीरे

मिथिलाक राजाक दरबारमे रहथि बोधि कायस्थ। राजा दरमाहा देथिन्ह ताहिसँ गुजर बसर होइत छलन्हि बोधि कायस्थक। दोसाराक प्रति हिंसा, दोसरक स्त्री वा धनक लालसा एहि सभसँ भरि जन्म दूर रहलाह बोधि कायस्थ। आजीविकासँ अतिरिक्त जे राशि भेटन्हि से दान-पुण्यमे खरचा भऽ जाइत छलन्हि। भोलाबाबाक भक्त छलाह।
जेना सभकेँ बुढ़ापा अबैत छैक तहिना बोधि कायस्थक मृत्यु सेहो हुनकर निकट अएलन्हि आऽ ओऽ घर-द्वार छोड़ि गंगा-लाभ करबाक लेल घरसँ निकलि गेलाह। जखन गंगा धार अदहा कोसपर छलीह तखन परीक्षाक लेल बोधि कायस्थ गंगाकेँ सम्बोधित कए अपनाकेँ पवित्र करबाक अनुरोध कएलन्हि। गंगा माय तट तोड़ि आबि बोधि कायस्थकेँ अपनामे समाहित कएलन्हि। बोधि कायस्थकेँ सोझे स्वर्ग भेटलन्हि।
बोधि कायस्थ विद्यापतिसँ पूर्व भेल छलाह कारण ई घटना विद्यापति रचित संस्कृत ग्रंथ पुरुष-परीक्षामे वर्णित अछि। फेर विद्यापति अपन मैथिली पद बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे लिखलन्हि- आऽ बोधि-कायस्थ जेकाँ गंगा लाभ कएलन्हि।

17.छेछन

डोम जातिक लोकदेवता छेछन महराज बड्ड बलगर छलाह। मुदा हुनकर संगी साथी सभ कहलकन्हि जे जखन ओ सभ सहिदापुर गेल छलाह, बाँसक टोकरी आऽ पटिया सभ बेचबाक लेल तखन ओतुक्का डोम सरदार मानिक चन्दक वीरता देखलन्हि। ओ एकटा अखराहा बनेने रहथि आऽ ओतए एकटा पैघ सन डंका राखल रहय। जे ओहि डंकापर छोट करैत छल ओकरा मानिकचन्दक पोसुआ सुग्गर, जकर नाम चटिया छल तकरासँ लड़ए पड़ैत छलैक। मानिकचन्द प्रण कएने रहथि कि जे क्यो चटियासँ जीत जाएत से मानिकचन्दसँ लड़बाक योग्य होएत आऽ जे मानिकचन्दकेँ हराएत से मानिकचन्दक बहिन पनमासँ विवाहक अधिकारी होयत। मुदा ई मौका आइ धरि नहि आएल रहए जे क्यो चटियाकेँ हराऽ कए मानिकचन्दसँ लड़ि सकितय।

दिन बितैत गेल आऽ एक दिन अपन पाँच पसेरीक कत्ता लए छेछन महराज सहिदापुर दिश विदा भेलाह। डंकापर चोट करबासँ पहिने छेछन महराज एकटा बुढ़ीसँ आगि माँगलन्हि आऽ अपन चिलममे आगि आऽ मेदनीफूल भरि सभटा पीबि गेलाह आऽ झुमैत डंकापर चोट कए देलन्हि। मानिकचन्द छेछनकेँ देखलन्हि आऽ चटियाकेँ शोर केलन्हि। चटिया दौगि कए आयल मुदा छेछनकेँ देखि पड़ा गेल। तखन पनमा आऽ मानिकचन्द ओकरा ललकारा देलन्हि तँ चटिया दौगि कय छेछनपर झपटल मुदा छेछन ओकर दुनू पएर पकड़ि चीरि देलखिन्ह। फेर मनिकचन्द आऽ छेछनमे दंगल भेल आऽ छेछन मानिकचन्दकेँ बजारि देलन्हि। तखन खुशी-खुशी मानिकचन्द पनमाक बियाह छेछनक संग करेलन्हि।
दिन बितैत गेल आऽ आब छेछन दोसराक बसबिट्टीसँ बाँस काटए लगलाह। एहिना एक बेर यादवक लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ ओऽ बहुत रास बाँस काटि लेलन्हि। कृष्णाराम अपन सुबरन हाथीपर चढ़ि अएलाह आऽ आमक कलममे छेछनकेँ पनमा संग सुतल देखलन्हि। सुबरन पाँच पसेरीक कत्ताकेँ सूढ़सँ उठेलक आऽ छेछनक गरदनिपर राखि देलक आऽ अपन भरिगर पएर कत्तापर राखि देलक।


18.गरीबन बाबा

कमला कातक उधरा गाममे तीनटा संगी रहथि। पहिने गामे-गामे अखराहा रहए, ओतए ई तीनू संगी कुश्ती लड़थि आऽ पहलमानी करथि। बरहम ठाकुर रहथि ब्राह्मण, घासी रहथि यादव आऽ गरीबन रहथि धोबि। अखराहा लग कमला माइक पीड़ी छल। एक बेर गरीबनक पएर ओहि पीड़ीमे लागि गेलन्हि, जाहिसँ कमला मैय्या तमसा गेलीह आऽ इन्द्रक दरबारसँ एकटा बाघिन अनलन्हि आऽ ओकरासँ अखराहामे गरीबनक युद्ध भेल। गरीबन मारल गेलाह। गरीबनकेँ कमला धारमे फेंकि देल गेलन्हि आऽ हुनकर लहाश एकटा धोबिया घाटपर कपड़ा साफ करैत एकटा धोबि लग पहुँचल। हुनका कपड़ा साफ करएमे दिक्कत भेलन्हि से ओऽ लहाशकेँ सहटारि कए दोसर दिस बहा देलन्हि।


एम्हर गरीबनक कनियाँ गरीबनक मुइलाक समाचार सुनि दुखित मोने आर्तनाद कए भगवानकेँ सुमिरलन्हि। आब भगवानक कृपासँ गरीबनक आत्मा एक गोटेक शरीरमे पैसि गेल आऽ ओऽ भगता खेलाए लागल। भगता कहलन्हि जे एक गोटे धोबि हुनकर अपमान केलन्हि से ओऽ शाप दैत छथिन्ह जे सभ धोबि मिलि हुनकर लहाशकेँ कमला धारसँ निकालि कए दाह-संस्कार करथि नहि तँ धोबि सभक भट्ठीमे कपड़ा जरि जाएत। सभ गोटे ई सुनि धारमे कूदि लहाशकेँ निकालि दाह संस्कार केलन्हि। तकर बादसँ गरीबन बाबा भट्ठीक कपड़ाक रक्षा करैत आएल छथि।


19.लालमैनबाबा


नौहट्टामे दू टा संगी रहथि मनसाराम आऽ लालमैन बाबा। दुनू गोटे चमार जातिक रहथि आऽ संगे-संगे महीस चरबथि। ओहि समयमे नौहट्टामे बड्ड पैघ जंगल रहए, ओतहि एक दिन लालमैनक महीसकेँ बाघिनिया घेरि लेलकन्हि। लालमैन महीसकेँ बचबएमे बाघिनसँ लड़ए तँ लगलाह मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर अपन सम्पूर्ण शक्तिक प्रयोग नहि केलन्हि आऽ मारल गेलाह। मनसारामकेँ ओऽ मरैत-मरैत कहलन्हि जे मुइलाक बाद हुनकर दाह संस्कार नीकसँ कएल जाइन्हि। मुदा मनसाराम गामपर ककरो नहि ई गप कहलन्हि। एहिसँ लालमैन बाबाकेँ बड्ड तामस चढ़लन्हि आऽ ओऽ मनसारामकेँ बका कऽ मारि देलन्हि। फेर सभ गोटे मिलि कए लालमैन बबाक दाह संस्कार कएलन्हि आऽ हुनकर भगता मानल गेल, एखनो ओऽ भगताक देहमे पैसि मनता पूरा करैत छथि।


20.गोनू झा आ दस ठोप बाबा

मिथिला राज्यमे भयंकर सुखाड़ पड़ल। राजा ढ़ोलहो पिटबा देलन्हि, जे जे क्यो एकर तोड़ बताओत ओकरा पुरस्कार भेटत।
एकटा विशालकाय बाबा दस टा ठोप कएने राजाक दरबारमे ई कहैत अएलाह जे ओऽ सय वर्ष हिमालयमे तपस्या कएने छथि आऽ यज्ञसँ वर्षा कराऽ सकैत छथि। साँझमे हुनका स्थान आऽ सामग्री भेटि गेलन्हि। गोनू झा कतहु पहुनाइ करबाक लेल गेल रहथि। जखन साँझमे घुरलाह तखन कनिञाक मुँहसँ सभटा गप सुनि आश्चर्यचकित हुनका दर्शनार्थ विदा भेलाह।
एम्हर भोर भेलासँ पहिनहि सौँसे सोर भए गेल जे एकटा बीस ठोप बाबा सेहो पधारि चुकल छथि।
आब दस ठोप बाबाक भेँट हुनकासँ भेलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि “अहाँ बीस ठोप बाबा छी तँ हम श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा छी। कहू अहाँ कोन विधिये वर्षा कराएब”।
“हम एकटा बाँस रखने छी जकरासँ मेघकेँ खोँचारब आऽ वर्षा होएत”।
“ओतेक टाक बाँस रखैत छी कतए”।
“अहाँ एहन ढोंगी साधुक मुँहमे”।
आब ओऽ दस ठोप बाबा शौचक बहन्ना कए विदा भेला।
“औऽ। अपन खराम आऽ कमण्डल तँ लए जाऊ”। मुदा ओऽ तँ भागल आऽ लोक सभ पछोड़ कए ओकर दाढ़ी पकरि घीचए चाहलक। मुदा ओऽ दाढ़ी छल नकली आऽ ताहि लेल ओऽ नोचा गेल। आऽ ओऽ ढ़ोंगी मौका पाबि भागि गेल। तखन गोनू झा सेहो अपन मोछ दाढ़ी हटा कए अपन रूपमे आबि गेलाह। राजा हुनकर चतुरताक सम्मान कएलन्हि।




Tuesday, April 14, 2009

अटकन-मटकन- बाल-कविता-4


एक टा पुरान मैथिली फकरा प्रस्तुत क रहल छी. दाय आ नानी के मुहं स सुनैत-सुनाबैत ई फकरा के एखनो गाम-घर के बच्चा गाईव क खेलाइत-धुपाइत अछि।


अटकन मटकन
दहिया चटकन
केरा कुश
महागर जोहागर
पुर्णि पत्ता

हिलय डोलय
माघ मास
करैला फरय
ई करैला नाम की
आमुन गोटी
जामुन गोटी
तेतरी सोहाग गोटी
बांस कटय
ठाँय ठाँय
नदी गोगियायल जाय
कमलक फूल दूनु
अलगल जाय
छोटी रानी
जेठी रानी
गेली नहाय
इछुवा बिछुवा
लय गेल चोर
आब कि पहिरती
कौवा के ठोर
कौवा के ठोर में पिलुवा
आव कि पहिरती सिलुवा।


Wednesday, April 01, 2009

बाल कविता-३ माटिक बासन- जीवकान्त

माटिक बासन

लाल-लाल अछि
गोल-गोल अछि कटगर

माटिक छाँछी दही जमओलनि

उज्जर, कठगर, सोन्हगर


छथि कुम्हार ओ धन्य-धन्य

जे भारी चाक घुमाबथि

माटि-पानिसँ चाकक ऊपर

नाना रूप बनाबथि


आंगुर छुआ, इशारा देलनि

माटि धयल नव रूप

लाल सुराहीमे जल झाँपल

घरमे छोटकी कूप

माटिक मुरुत बनइ सल्हेसक
कहबइ गामक देब

बड़ पवित्र अछि

माटिक बासन
सुन्दर आर सुरेब

Tuesday, March 31, 2009

मैथिली मे चित्रकथा श्रृंखलाक शुरुआत

मैथिली मे नेना-भुटकाक प्रिय विधा चित्रकथाक खगता देख 'नताशा' चित्रकथा श्रृंखलाक संकल्पना हमरा मोन मे करीब एक दशक पहिने आयल छल. प्रकाशनक माध्यम आ प्रसार साधन केर अभाव मे हमर कल्पना हिंदी मे अनुदित भ' विभिन्न पत्र-पत्रिका मे छपय लागल आ' शनै:-शनै: ई हिंदिये के भ' गेलै.
'मैथिल आ मिथिला' से जुडलाक बाद दशकक दबल कामना पूर हेबाक लेल हिलकोर लेबै लागल अछि. अहि क्रम मे 'नताशा' केर मूल मैथिलीक अलावे एकर हिंदी संस्करणक अनुवाद मे लागल छी. अहि कार्य मे अनुज मित्र कुमार सौरभक सहयोग उल्लेखनीय अछि.
अगला सप्ताह सं दर सप्ताह अहि श्रृंखलाक एक गोट चित्रकथा प्रस्तुत कयल जायत. अहि सन्दर्भ मे दू टा बिंदु स्पष्ट क' देब आवश्यक अछि-
१. श्रृंखलाक चित्रकथा मे किछु प्रचलित चुटक्काक अलावे किछु मौलिक कथ्यक उपयोग कयल गेल अछि.
२. अहि श्रृंखलाक अनेको चित्रकथा बालहंस, चकमक, बच्चों का देश, प्रभात खबर, अंग्रेजी पत्रिका TINKLE आ रविवारीय जनसत्ताक यात्रा क' चुकल अछि.
हमर प्रयास सकारथ होयत जं' किछुओ धीया-पुता अहि माध्यमे मातृभाषाक साहित्यिक पक्ष सं जुड़ता.

Saturday, March 21, 2009

बाल कविता-२ गाछ मे -जीवकांत

गाछ मे पात
पात मे बसात

पात मे फूल
गाछ झूल-झूल

पात मे छाह
गाछ वाह! वाह!

गाछ मे आम
गमकैए गाम

गाछ मे मेघ
भीजैए खेत

पातमे उछाह
गाछ वाह! वाह!

Thursday, February 26, 2009

बाल कविता-१ जीवकान्तक दू टा कविता

1.
अक्षर कवितामे अँकुसी- जीवकांत


नेना सभ लेल फूजल स्कूल
बड़का देबाल वला
बड़का बस वला स्कूल
अक्षर सभ
बनाओल जा रहल कटगर
पेंसिलक खपत बढल अछि
विद्यालयक देबाल होइत जाइत मोट
अक्षरक काट भेल सुरेब
शिक्षक भेलाह छोट

बहुत न्एना बकरी लए जाइए खेत दिस
देबाल दिस नहीं तकैए
फेकि देल खराँत वला सिलेट
अक्षर सभमे देखाइत चैक अँकुसी
विचित्र आकार
ओहिसँ नीक आकारमे
जन्म लैत अछि बकरीक बच्चा
शिक्षक सभकेँ अभिनन्दन
अभिनन्दन ह्रस्व इकारक मात्राकेँ
अभिनन्दन स्कूलक घड़ीकेँ
रजिस्टर सभक गेँटल अभारकेँ
नमस्कार


2.
तकैत अछि चिड़ै - जीवकांत



रातिक अंतिम पहरमे
चिड़ै जगैत अछि
राजमार्ग पर घोदिआइत अछि

छोट-छोट जानवर सभक देह
टुटैत अछि गाड़ीक पड़िया तर
छोट-छोट घौदामे
तकैत अछि चिड़ै

आंगनमे बाँस पर बैसल अछि छिड़ै
कुड़िअबैत अछि अपन पाँखि लोलसँ
तकैत अछि चिड़ै
चार सभक दुनू कात
झीलक कछेरमे सिम्मरक गाछ पर
बैसल चिड़ै गबैत अछि गीत
तकैत अछि पानि दिस
झीलक पानि दिस
की सभ दहाइत छैक पानिमे
तकैत अछि चिड़ै

Saturday, December 27, 2008

बहादुरगंजक लोककथा-तीन मूड़ी बला लोक- उमेश कुमार महतो "वियोगी"




बहादुरगंजक लोककथा-तीन मूड़ी बला लोक

एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए।
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले।
राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक।
राजकुमार राजा बनि गेल।
पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल।
१.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचला मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल।
२.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देल आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल ले राखि देलक।
३.ओ सभटा बैरक गाच्ह काटि कऽ हटा देलक।
४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए।

एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते करिते राजपाट खतम भऽ रहल च्हलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक।
गामक एक बुजुर्ग सं ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तं ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सं पुछू।
चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही आदमी सं पुछलक जझमरा तं तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल।
बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख से ८० बरखक आदमी कें तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसै ये तं ओकर मूरी झुकि जाइ च्है आ घुटना ओपार उठि जाइ छैक आ से ओ तीन मूरी जकां भऽ जाइ छैक।
राजा एहेने एकटा मनुक्ख सं पुछलक।
“पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक।
राजा कहलक।
“ओ बतेलथि-
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”।

“पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा के खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटल।
दोसराक मतलब घूर लगा देबा लऽ जाहिसं द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत।
तेसर के मतलब झगड़ा-झांटि से दूर रहि दोस्ती मिलान सं रहए लेल।
चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलब”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक।
एकरापर अमल केलापर ओकर राजपाट वापस आबए लगलैक।

11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)

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