भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, November 10, 2008

उदाश मोन - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

उदाश मोन

अपन प्रेमीकाकेँ कहलापर उमेश विना विवाह भेनेमे ओ वावुजी सँ भिन– भिनाउजक वात करऽ लगलनि । सन्तान जाहिसँ खुस रहे वोहीमे अपन खुसी बुझिकऽ बाबुजी सबकिछ मे सँ हिसा लगाकऽ उमेशके अपना नामपर कऽ दैछथि । सम्पती उमेशकेँ नामपर देखिकऽ उमेशकऽ प्रेमिका आशाकेँ ओ सम्पती पर लोभ भऽ जाइछैन । उमेश सऽ करिब १० वर्ष जेठ विधवा प्रेमिका उमेश सँ सम्बन्ध तखन वनबैय जखन ओ कक्षा नौ मे बढैत रहैक । एकदिन उमेशकऽ माँ विमार भऽगेली आ हुनका जचाबऽ लेल जखन उमेशकेँ बाबुजी पटना लजाइत रहैथ त अपन परोशी विधवा आशाकेँ कैहगेली जे उमेशके भोजन वनादेबऽ लेल जाही सँ उमेशके कोनो प्रकारक दिकत नहि होइन । आशा उमेशकेँ लेल बडशासन भोजन बनाक खुएलनि आ ओही अंगनामे सतएली । आ कनेक वेर बाध आशा से हो ओही पलंगपर आविकऽ सुतिरहली । रातिमे उमेशके ओ भैर पाजकऽ पकरली । उमेशकेँ निन त टुटिगेलैक मुदा ओ अन्ठिआदेलन । दोसर दिन ई वात उमेशक दिमागपर नचैत रैह गेलैक । जे ई रातिमे डेरागेलनि कि केना ? कथिला ओ हमरा ओना पकरलनि ?" आ ई वात सोचैत उमेशके रातिमे निन सेहो नइ परैक । कर बदलवेरमे उमेशक हात आशाकऽ स्तन पर परिगेलैक । एतवेमे ओ उमेश दिश धुमिगेली । आ उमेशकेँ पैरपर अपन एकटा पैर धऽदेली फेरु ओ उमेशकेँ सहलाबऽ लगली आ............। फेर, ताही दिनसँ उमेशके आशाकेँ संग एकटा देहकेलेल गलत सम्बन्ध स्थापना भऽगेलैक । उमेशकें आशा सँऽप्रेम भऽगेलनि । आ तहिया सँ सबदिन उमेश सब निक बेजाय आशाकेंसुनाबऽ लगलनि आ आशाकेँ कहलपर चलऽ लगलाह । आशाके कहैछलनि वोहे उमेश करैछलाह । आ उमेश अपन लक्ष्य तक आशाके बुझिलेने रहैथ । आ ओ ईहो सोचिलेने रहैथ जे जीब संगैह आ मरब संगैह । जखन उमेशकऽ बाबजुी उमेशकेँ बखडा अदालत आ मालपोतमेँ जाक उमेशकनामपर कऽ देलनि । तखन किछे दिन बाद उमेश अपन नाम बाला सारा सम्पत्ती आशाके नामपर कऽदेलनि । तकदिरक लिखल आशा उमेशसँऽ बिना पुछने नैहर चैलगेली ताँही सँऽ दुनु गोटाके एकआपसमे मनमोटाब भऽगेलनि । उमेशक उझट बाली सुनि आशा हुनका सँऽ बाजब सेहो बन्द कऽ देलनि । ओ सोच आ चिन्तामे एहन भ गेला कि चञ्चल स्वभावके उमेशक मोन उदाश भ गेलनि ।उमेशकेँ ई दशा देखकऽ उमेशक बाबुजी आ माँ हुनका पुनः अपनालेलनि । भोरक भुतलायल जौ साँझक घर आबेतऽ ओकरा हेयायल नहि कहि बुझिक उमेशके निकसँ राखऽ लगलनि ।उमेशके उदाश रहब देखिकऽ हुनक माँ आ बाबुजी सब हुनका विवाहकेँ वातचित कर लगलनि । विवाहकऽ नाम सुनिते उमेश आशाकेँ वारेमे अनेक वात सोचाए लगलनि । मुदा, उमेश विवाहक बारेमे कनेक देर सोचलनि आ सोचिक पुनः ई दिमागमे अएलनि जे "विवाह जौ कलिअ त आशा त हमरा धोखा देलनि मुदा हम ओकरा किया धोखा दिए ।" ओ फेर सोचलनि हम जौ अखन विवाह कऽ लेब तऽ कल्हिखन जाकऽ हमर कनियाकऽ कोनो प्रकारक इच्छा जौ पुरा नहि कर सकबै त ओकरा मोनमे कतेक किसिमक वात अएतैक । ओ फेर ई सोचला जे "अपन हिस्सा सम्पती त हम बुरालेललहँु आ बाँकी लेल......नहि बाबुजी कि सोच्ता ?" आ, ई वात सोचिक उमेश सब किछ छोरिकऽ सबहक माया मोह त्यागीक घर सँऽ बहुत दुर जाएकें सोचिकऽ चैलदेलाह । जखन उमेश पटना स्टेशन पर पहुचलनि त आगुमे आशा ठाह–रहैक । उमेशकेँ देखक ओ हुनका आर नजदिक अएली आ कहलनि– "उमेश ! आहाँके मनमे होयत जे आहाँके हम बरबाद कऽदेलहँु मुदा ई बाते नहि छैक । आउ आहाँके हम अशल बात सुनबैतछि ,आ बिना सुनने हम आहाँके एतऽ सँऽजाहू नहि देब ।"ई सुनिक उमेश बजलनि "आब सुनला ...कि बाँकी छैक से ?"आशा उमेशके हाथ पकरिक कातमे लजाइछैक आ कहैछै "अहि के लेल .........आहाँके कने समय देबऽ परत ।"कनिक समय सोचैत उमेश कहलनि"— ठिक छै चलु कातमे ।"एकान्त ठाममे जाक दुनु बैसलनि तब आशा कहलनि "सुनु,.....हमरा एकटा परी सँ श्रापित भऽ ई मृत भुवनमे आबऽ परलअछि.....। हम एक दिन गगन—विहारभऽ स्वर्ग जातिरही । बाटमे सपन नामक ऋषि कमण्डलमे जल लऽकऽ पुजा करला जातिरहैथ । हम ऋषिके खौझाव लेल बाटपर आबिकऽ ठाह् भऽ गेलहु आ ऋषीके आखि पर ताकऽ लगलहुँ । हम ऋषी पर आ ओ हमरा पर बहुते देर तक एक आपसमे तकैत रहिगेलहूँ । ऋषी हमरा नजदिक आबऽ लगलनि आ ओ हमरा नजदिक आविक छुबऽ चाहलनि । मुदा हम ऋषी सऽछलिगेलहँु , आ ओ खसिपरला ।" ई ऋषी आ परीक वात उमेशकेँ सुनल नहि गेलनि आ ओ कहला "चुप,.....झुठफुस आ नौटकी कनेक कम बाजु बुझलहु कि नहि,......रे ई सत्ययुग, द्वापर आ त्रेता नहि न छैक ?" मुदा आशा कऽ आँखि आइ सच वाजिरहलछैक ओ फेर कहली " त आहाँ खाली बात सुनिलिअ.......विश्वास करु या नहि करु आहाँ पर अछि । तखन ऋषी हमरा कमण्डलमे सँ पानि लऽ श्राप देलाह " जो, हम तोरा श्राप दैछिऔक कि तोरा स्वर्गक सुख त्यागीकऽ एकटा नहि वल्की दुँटा पुरुशके साथ सम्भोग कर परतौक । जे एकटा तोहर पती रहतौक आ देसर एकटा तोहर परोशके बच्चा । ऋषी फेर कहलनि " ओ बच्चा जखन श्यान भऽ जतैक त तोरा द्वारा ओकर धन सम्पत्ती सबकिछ खतम भऽ जएतै आ जखन तोरा छोरिक ओ चैलजतौ तखन तोहर मृत्यु भऽ तोहर जीवन तृप्त भऽ जएतौ ।" ऋषीक कुवचन सुनिकऽ हम निराश भऽ गेलहु । बड कनलहु ।" आशा वजली ।ई वात सुनऽके इच्छामे आविकऽ उमेश वजलाह–"तव ...........कि भेल ?"उमेशक प्रश्नकेँ जबाब दैत आशा कहली – " हम मृत भुवन अएलहु । आ नदिकातमे आमक गाछलग बसिकऽ सोचऽ लगलहु जे आब कि करु । नदी कातक गाममे एकटा नँया फूसक घर रहैक । हम अप्पन दिव्य शक्ति सँ ओकरा वारेमे देखलहु । हुनका सबकेँ गाममे के ओ नहि चिन्हैत रंहनि । हम अप्पन मायाबी शक्ति सँ हुनका सबकेँ मन वदलीकऽ आ एकटा बच्चकऽ रुपमे प्रवेश कैलहँु । आ, ओ दुनुगोटा हमरा अप्पन बेटी जका मानऽ लगलनि । गामक स्कुलसँ एस.एल.सी. पास कैैलहु । आ तखन ओ सब हमरा कैम्पस मे पढला शहर पढादेलनि । मनोविज्ञानकेँ ज्ञानी तऽ हम रहबे करी । हम मनोविज्ञान सँऽ स्नातक कैलहु आ कैम्पसेमे हुनका हमरा सँऽ प्रेम भऽगेलीन । हुनक माँ विमार रहवाक कारण सँ ओ दुईए महिना वितलाक वाद हमरा सँ विवाह कऽ लेलनी आ साल वितिते हुनक मृत्यु भऽ गेलनी ई त होबहे के रहैक । श्राप अहि प्रकारक रहैक । बहुत दिन बाद हमरा आहाँ सँ सम्वन्ध बनल । ऋषीकऽ बचन अनुसार आँहा बरबाद भऽ गेलहु ।" एतेक बाजिकऽ ओ चुप भऽ गली । ओ फेर कहली– "हमर समयक अन्त भऽ गेल अछि, मात्र दु दिन वाँकि अछि हमर मृत्युकेँ ।ई वात त ओना किनको पचऽ बाला नहिरहैक । मृत्युकऽ नाम सुनिकऽ उमेश बजलाह ".............दु दिन मात्र वाँकीे कोनाक ?""जँऽ आँहा पतियाए चाहैतछि त.........मात्र दु दिन हमरा संगे रैहजाउ । "आशा कहली । उमेश झुठाकेँ नेङ्गराबकेँ विचारमे ओ "ठिक छै" कहला ।उमेश त पहिलदिन बड निकजका आशाक सगं वितएलाह आ एकबेर फेर आशा ओ राति उमेशपर समर्पित कऽ देलनि । उमेशके वस आशाके देह सँ प्रेम रहैक जेना वझाएल । मुदा दोसर दिन उमेशकेँ आशासँ डर लागऽ लगलनि । मँुहपर डर आ चिन्ता देखिक आशा बुझिगेली जे उमेशकेँ पक्का हमर मृत्यु सँ डर लागिरहल छनि । आ, ई देखिक आशा उमेशकेँ तखने ज्ञात करौलनि जे "काल्हिखन सूर्य जखन उदय भऽ जतएतैक तखने हमर समयकऽ अन्त भऽ जाएत ।" जखन हुनका आशा मृत्युक समयके बारेमे ज्ञात करौलनि तखन जाकऽ हुनका मोनमे संतोष भेलनि ।आ, आई राति आशा आ उमेश दुनुगोटा मे सँ किनको निन नहि परिलनि । राति भरि ओ दुनु बितल समय, आ साथे बितल राति सबकेँ वारेमे बतीयाति रहिगेलाह । जखन भोरकें पाँच बजलैक ओ जल्दीसँ जाकऽ नहाएली आ उमेशकेँ कहली– "दुनियामे आठटा मात्र चिरंजीवी पुरुश छथि । जै मे सँ हनुमानजी से हो छथि । हम हनुमान मन्दिर जाइतछी । आहाँ हमरा गेलाकऽ ठिक आधा घण्टाकऽ बाद मन्दिर तर्फ आएब ।"ई सुनिकऽ उमेश लाशकेँ बारेमे पुछला ।हुनका सम्झबित आशा कहली "ओ अपने जरि जएतै" बड अबेर भेल जाइत रहैक । ओ जल्दी सँ निकली । किछ समय बाद ओ एकवेर फेर आविक कहलनि–"उमेश भगवान अहाकेँ कल्याण करौथ ।"उमेशकेँ हुनक बात पर अखनो विश्वास नहि भेलनि ओ आधा घण्टा सँ पहिनही ओतऽ सँऽ निकललनि । जखन हनुमान मन्दिर लग पहुचलाह तँ लोक सवहक बाहरमे भिर लागल रहैक । एकटा आदमी सँ उमेश पुछला जे कि भेलैय ? ओ आदमी बडा उदाश भऽ कहलनि जे मन्दिरमे सँ दर्शन कऽकऽ निकलिते अपनेमने देहमे आगि लागि गेलन । ई सुनिक उमेश लोक सवहक भिरमे पसिक देखलनि त ओत मात्र छाउर बाँकी रहैक । उमेशक मोनमे एकटा अलग उदाशी पकरिललकनि । आ ओ ओत सऽ उदाश भऽकऽ पुनः घर आपस चलिअएलाह । ओ अखनो कतौ बसिकऽ मौन रहैछथि ।

अशल खिलाडी - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

अशल खिलाडी

एकटा देशमे कोचर नामक जादुगर रहे । कोचरकें जादुबाला चमत्कारी शक्तिकें देखकऽ गामक लोक हुनक प्रशंशक बनिगेल रहै । एकदिन कोचर सपनामे एकटा तलवार देखलनि जाहि तलबारमे एकटा अलौकिक शक्ति रहैछ । तलबार प्राप्त करै वाला व्यक्तिके कोनो प्रकारक इच्छा पूर्ण भऽ सकैत अछि । आब, कोचर ओही तलबारके पत्ता लगाबऽ लेलअपन प्रत्येक शक्ति लगादैछैक । अन्ततः ओ एकटा उपाय निकालैय जे ई तलवार राजा गोपाल सिंहक संग्राहालयमे राखलगेल अछि । ओइ तलवारक सुरक्षाके लेल अनेक प्रकार व्यवस्था कएलगेल अछि । आ, ई तलवार एकहि आदमी लाबि सकैय जेकर नाम सरोज खिलाडी थिक । कोचर खिलाडी लग जाकऽ अपन सब समस्या सुनौलनि । खिलाडी ओ तलबार जेनाक होई लाबऽकें लेल मनमे अठोट कैलनि । खिलाडी जखन सब किछ पार कऽ कऽ तलवार वाला कोठरीमे पहुचला त हुनका आगि, पानि आ पाथरि सवकिछ क सामना कऽरऽ परलनि । खिलाडी सामना करैत ओ तलवार प्राप्त कैलाह । जखन ओतऽ सँऽ ओ बाहर निकललनि त ओ एकटा चक्रव्यूहमे फसिगेलाह । निकलऽ कें लेल जखन ओ अकक्ष भऽ गेला तऽ ओतै माथ पर हाथ धऽ कऽ बसिगेलाह । खिलाडी अपन ईच्छा अनुसार रुप बदलिसकैय । मुदा तैंयो निराश भेलाक कारण सँऽ तलवारके भित्तर सँ एकटा चमत्कारी बालक निकललनि आ पुछलनि—"हे खिलाडी जी ! हम आहाँके कि सेवा कऽ सकैछि ?"एकाएक एहन आवाज सुनिक खिलाडी उपर देखलनि त एकटा शुन्दर बालक नजरि परलनि बालक के देखिकऽ खिलाडी पुछलनि –"अपने के छि ?""हम त आहाँक दाशछि । आज्ञा कएल जाँए ।"बालकके एहन नम्रता भरल आवाज सुनिक खिलाडी कहलनि "हम एतऽ सँऽ निकल चाहैत छि ।" एते मात्र बजिते खिलाडी बाहर निकलि गेलाह आ ओ बालक लोप भऽ गेल । तलवार लकऽ खिलाडी कोचरकें घर नहि गेला । ओ सिधा अपन घर पहुँचलनि । ओतऽ खिलाडीक माँ आ बाबुजी तिन दिन सँऽ भोजन नहि कैने रहैथ । जखन खिलाडी पहुचला त हुनको बड जोर सँऽ मुख लागल रहनि । सव गोटा चिन्तामे परल रहैथ । तखने फेर ओ चमत्कारी बालक आएला आ एकटा चौकी पर खुब निकजका सजाओल पकमानक थारी खिलाडीक सेवामे हाजीर कैलाह । एवं प्रकारके जते वातमे हुनका कोनो प्रकारक दिकत होयन त ओ चमत्कारी बालक आविक पुरा कऽ दै । एक दिन खिलाडीक घरक बाट दने एकटा राजकुमारी जातिरहैछैक । ओ राजकुमारी के देखकऽ खिलाडी मोहित भऽ जाइछ आ मनमे अहि राजकुमारी सँ विवाह करऽ कें वात सोचैय । राजकुमारीके देखला वाद खिलाडीक मोनमे एकटा अलग बेचैनी अबैछ ओ जखन तखन मात्र राजकुमारीके बारेमे सोचऽ लगैय । खिलाडी कें सोच मे परल देखिकऽ तलवारवाला चमत्कारी बालक पुनः उपस्थित होइय आ खिलाडीके लेल खुब शुन्दर गहना जेवर सँऽ भरल घर बनादैछ । खिलाडीक बाबुजी खुब बहुते गहना–जेवर लऽ कऽ राजकुमारीक हाथ मांग करऽ लेल तयारी से हो भऽ जाइछ । विवाह से हो बड निकजका सम्पन्न होइछैक । समय एतेक बितला बादो कोचर पिताएले छैक । आ ओ खिलाडीक पत्ता लगाबलेल अनेक प्रकारक बिधाके प्रयोग कऽरहल छैक । बहुतो बिधाक प्रयोग कएलाक बाद ओ खिलाडीक पत्ता लगाबमे सफल भेला । तखन ओ खिलाडीक घर लग एकटा छिट्ठीमे बहुते तलवार लऽकऽ पहुचल आ हल्ला करऽ लागल "पुरान एकटा तलबारके नयाँ दुटा तलबार । "ई बात खिलाडीक माँक कान तक गेलै ओ घरमेका जाँदू बाला तलबार लऽकऽ नयाँ तलबार लेबऽ पहुचैछथी ।कोचरके हाथमे तलबार पैरते कोचर ओतऽ सब तलबार छोरिकऽ गायबभऽजाइय । घरसँऽ तलबार के जाइते खिलाडी पुनः पहिलके स्थितीमे पहुचजाईय । आहे पुरान घर, भोजन करऽमे दिकत आदी ।खिलाडी अपना इक्षानुसार रुप बदलके क्रममे ओ एक दिन कोचरके कनिया बनिकऽ हुनक घरमे पैसलनि । कनियाके देखते कोचर मदिरा देबऽला कहलनि । खिलाडी मदिरा संगैह किछ आर मिलाक कोचरकें पिया देलनि । कोचर बेहोश भऽगेल आ खिलाडी अपन तलबारके खोजमे लागल । तलबार बहुत खोजला बाद भेटलनि । बादमे खिलाडी एहन ढंग सँ ओ तलबारके रखलनि जैके केओ देख नहि सकैय ।

मुमफली बाली - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

मुमफली बाली

काठमाण्डूकेँ टुंडीखेलमे हम आ दुटा आओर हमर साथी बैसल छलहुँ । ताबते एकटा छौरी आबिकऽ हमरा सबके मुमफली खाएला कहलक । जेना मंगनीए दऽदेतै तहिना ओ हमरा आगुमे दु डिबा ममफली धऽ देलक । हम पाइकेँ लेल पुछली त बिस रुपैया कहलक । ममफली खाएवाक इच्छा त नहि, रहे मुदा साथी सबलग प्रतिष्ठाके देखकऽ जेबसँ पाइ निकालिकऽ दऽ देलहँु । करीब एक–डेढ घण्टाक बाद ममफली खतम भऽ गेल त हमसब ओतऽ सँ उठिकऽ रौदमे वैसऽ चैल गेलहु । फेर, एकटा दोसर छौरी आबिकऽ कागज निकालिकऽ ममफली छोटका डिब्वा सँ एक डिब्वा धऽ देलकै । हमहुँ सब ममफली खाए लगलहँु । ओ छौरी हमरा सवहक नजदिक बैसिकँ गीत गाबऽ लागल "यो मायाको सागर.....।" हमर साथी ओकरा भऽगाब केँ लेल "तो बड सुन्दर गीत गवैछ"े कह लगलैक । ई सुनिकऽ ओ छौरी कहैछै "एह, हम त........ गीते नहि नेपाली, हिन्दी, अंग्रेजी गीतमे डान्सो करैछी ।"फेर ओ अपन कुर्तीके उपरका बट्टम खोलिकऽ कहैय "आई कते गर्मी छै.........।"ई देखकऽ हमर साथी पुछलकै "एक दिनमे कते.......कमालैछही ।"ओ ढिठेसँ जाबाव देलक "मुला जौ फसिगेल त........हजारो भऽ जाइए ।"हम व्यंग करित कहलि " तब त हम अपनो घरवालीके ममफलीके व्यपार कऽ देबै.....।"फेर ओ कहली "आँहा सब तिन आदमी छि ..........मात्र तिन सय रुपैया जँ खर्च करब तऽ आइ राति आँहा सब साथे हम चैल सकैत छि ।"हम फेर व्यंग कैलिए "तोहर वाप कमाकऽ धऽ गेलछौ से......... ।"ओ हसऽ लगली आ फेरु थेथरियाएल जका बसिगेली । हमरा त बुझले नहि छल जे ओकर ई व्यपार होतैक । आ ओकर पहिरन–ओढ्न सँऽ बुझाय परैक जेना ओ कानो सेठकेँ वेटी होतैक । हमर साथी रामबाबु अपन जेबमे हाथ दैत कहैय "हे यो......हमरा लग त दु सय टका अछि.......आँहा लग एक सय अछि त दिअनै पैचे सही.....।"मुदा हम बड डटली ओ ओतऽ सँ उठिक तिनु आदमी भद्रकाली दने जाइत रही । भद्रकाली मन्दिर सँऽ कनिकें आगु आवीक रामबाबु कहलनि "अाँहा सब बढु ...........हम एक आदमी सँ भेटने अवैछी ।" हम आ संजय त बुझिगेलहु कि ई कतऽ गेल होएत ।करिब एक महिना वाद जखन हम ओहि दकऽ जाइत रही त ओही छौरी पर नजरि परल ओकर कपडा फटल रहैक मुदा ठोह् मे लाली बड. मोटसँऽ लगौने रहैक । आ जतेक आदमी ओइ दऽ कऽ जाइक सबके मुह पर तकै । ओही साँझमे हमर साथीरामबाबूकें फोन आयल आ कहलनि "हमर मोन खराब अछि ।"भोरमे हम ओकर डेरालग जाक ओकरा टिचिङ्ग अस्पताल जचाव लऽ गेलहु । डाक्टर बोखारक दवाइ दऽ पठादेलनि आ कहलनि जे एक हप्तावाद भेट करला । ओ, दवाइ खाइ, मुदा ओकर वोखार त ठिके नहि होइक । दिनदिने कमजोर भेल जाइक । फेर ओकरा लऽकऽ हम अस्पताल गेलहुँ । डाक्टर खुन, दिशा, पेशाब जचाबऽ लेल कहलनि । दिशा आ पिसाबक रिर्पोट तऽ तुरते दऽ देलक मुदा खुनक रिर्पोट ४२ दिनक वाद देबऽ कहलनि । ४२ दिन बाध हम रिर्पोट लऽकऽ डाक्टर लग गेलहुँ । वै दिन डाक्टर सब सँ अन्तमे हमरा बजौलनि । मितकेँ पकरिक डाक्टर लग लगेलियन । डाक्टर मित सँऽ पुछलनि "आहाँ बजारक लैरकी सँ..........सम्बन्ध रखैछी ।"किछ नहि बाजिकऽ ओ मुरी निचा कैने रहि गेलैक । आ, ई, सुनिक हम कहलियनि "डाक्टर साहेब,..................."डाक्टर हमरा किछ बाजऽ नहि देलनि आ हमरा कहलनि कृपया बिचमे नई, बाजल करी ।"फेर डाक्टर आवेशमे आविक कहलनि "हिनका छैन एड्स लागीगेल ।"ओ पुनः हमरा पर ताकिक कहलनि "ओना त एड्सकेँ इलाज त नहि छैक मुदा जौ संयम सँ रही त किछ दिन बाचि सकैछी । आँहा सब नयाँ उमेरक लरिका सब एना कर लगबै त कोना हेतैक ।"डाक्टर हाथमे कलम आ, आगामे सँ पुर्जी लैत कहलनि "देखु, आहाकेँ चित बुझावलेल किछ दवाई लिख दैछि ।"डाक्टर पुर्जी हमरा हाथमे देलाह । आ हम सब ओतऽ सँऽ निकलँहु । हमर मितत वड उदाश रहे भऽ गेल । ई देखक हम कहलियनि "चल वल्की गामे पर रहब ।"तखन त ओ हमरा हँ कहलक मुदा जखन हम तैयारी भऽ ओकरा डेरामे पहुचलहु त देखलहँु ओकरा खिरकी केवार चारु तर्फसँऽ लोक भरल । हमर मन धबरागेल । जखन हम नजदिक पहुचलहुँ त देखलहुँ एकटा हवलदार ओकरा गरदनिमे सँ डोरी खोलैतरहै । ओकरा शव बाहनमे धऽ कऽ अस्पताल लऽ गेलैक । आ हम ओकरा गामपर फोन कऽ कऽ ओकर बावुजीकँ खवर कऽ बजालेलियनि ।

विवाहक—प्रतिक्षा - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

विवाहक—प्रतिक्षा

अमरकेँ माँ आ भाई अमरके विवाहक चर्चा करैत रहैत अछि । आ हाथमे फोटो लऽक केओ बजैय –"लैरकी त सिनेमाक हिरोनी सनकें छैक"फेर के ओ बजैय "लाखौ कि..... करोरोमे एक छै ।"ई वातक चर्चा करिते बेरमे अमर घरमे प्रवेश करैत अछि । केवारक आवाज सुनिकऽ अमरकेँ माँ केवारदिश तकैत अछि आ अमरके देखिक पुछैछथि "कि रौ आइ त...... सवेरे कलेज सँ चैलएलही ।"अमर जुत्ता खोलैत कनी स्तीरे सँ जवाब दैत अछि "हँ, आइ कलेजमे दुनु पाटीवाला छौरा सब झगरा झंझट कैलकै ताहीसँ......... कलेज अनिश्चित कालके लेल बन्द भगेलैक ।"ई सुनिक माँ बजैछठि "ई छौरा सब कौलेज पढ.ऽ जाइतछै कि राजनितीकरऽ ...किछ बुझ्वे नहि करैछी ।"अमर फेर कहैय "तो सब कथीके चर्चा करैत छलेह ?"प्रश्न सुनिते अमरके भाई सुवोध बजैय "भैया .......ई फोटो देखीयौ ने ।"अमर भाइकेँ हाथस फोटो लऽकऽ देख लगैछैक ।फेर ओ फोटो उल्टवै छैक । फोटोक पाछामे लिखल पत्ता अमर पढिकऽ ओ फोटो द दै छैक ।दोसर दिन अमर भोजन कऽकऽ तैयार होइछै आ अपनमाँ के कहैछै–"माँ, हम कने मधुबनी जाइतछि ।"माँ ई सुनिक जवाब दैत छथि "परसु तोरा ओमहर सँ देखऽ अबैत छौ आ तो......""नहि माँ हम कल्हिए चैल अवौ ।"माँ कहैत छथि "ठिक छै जो ........मुदा वातमे फरक नहि परबाक चाही ।"अमर अपनसाथी रंजीतके साथमे लऽकऽ फोटोपर लिखल वाला पतापर चैलजाइए । गाँउमे जखन ओ सब पहुचैय तँऽ ओत देखैय कि लोक सब केओ केमहरो, कओकेमहरो भगैत रहैछ । अमर आ रंजीत दनूु ओमहरे जाइए जेमहर आगि लागल रहैत छैक ।ओहीठाँम एकटा विधवा, दुटा महिला आ एकटा स्यान लैरकी खुब कनैत रहैतछैक । ओकरा सबहक मुहसँऽ "बौआ रौ बौआ" निकलैत रहैक छै । ई देखिक रंजीत बुदिया सँऽ पुछैत अछि "कि भेलैय जे वौआ, वौआ कहैछि ।"बुदिया कनैत जवाव दैय "वौआ...... रे हमर पोता ओहिमे.....।"ई सुनिते अमर पहिनही दौरजाइत अछि । आ पाछा सँ रंजीत हल्ला करैय "रुक !!! रुकिजो अमर........ ।"अमर आगि आगल घरमे पैस जाइय । रंजीत पाछु सँ दौरैत अछि मुदा पैसऽ सँऽ पहिनही केवार खसिपरैछैक । करिब तिन–चारि मिनटककेँ वाद अमर वच्चाकेँ लऽकऽ खिरकी दने कुदैत छैक । ई देखक रंजीत कने नमहर श्वाश लैय । जखन पुरा आगि मिझा जातिछै त अमर आ रंजीत अपन घरकेँ लेल चैलदैय मुदा बुदिया वड आग्रह करऽलगैछै "बौआ आई एतै रैहजाउ ।"वुदियाके आग्रह देखकऽ रंजीत अमरकेँ रुकिए जाएला कहैछै । केओ गोटा अमर आ रंजीत सँ परिचय सेहो नहि पुछै छैक । किया त ई सब अमर परिचय वच्चाकेँ जान बचाक दऽदेनेरहैछैक । घर जरिगेलाक वादो वुदिया अमर पाहुनके दलानपर वैसबैय आ वुढि. ओतऽ सँ चलिजाइए ।पोखरिदिश जाएके बहाना बनाकऽ दुनुसाथी घुमऽ केँ लेल निकलैय किया त हुनका सबके एकटा दोसर काज सेहो छैन । ओमहरसँऽ एकटा मर्द हाथमे लोटा लेने अबैत रहै छथि । हुनका बजाकऽ रंज्ीत पुछैय—"भाईजी व्रज मोहनजीक घर केमहर छैक ।"ओ वटोही जवाब दैय "ओ हुनकरे घरमे त आइ .........आगि लागीगेल छलैय ।"अमर विचार करऽ लगैय ओ लैरकी कें बारेमे किया कि ओहे लैरकी सँ बिबाहक बात रहैछै । दुनुसाथी चिन्तामे पैरजाइए । आ चुपचाप अपन दलान पर आबिक बैसजाइए । के ओ किनको सँ वजितो नहि रहैछैक । कनिके देरके वाद ओ लैरकी खाना लकऽ अबैय । भोजनक साज देखक रंजीत कहैय "एतेक करऽकेँ कोनो जरुरीए नहि छलैक ।"मुदा ओ लैरकी कोनो प्रकारक जबाब नहि दैत कहैछैक "आहाँसबकेँ भुख लागिगेल होयत जल्दिसँऽ .....भोजन कलिअ ।"दुनु गोटा भोजन कएलाकवाद रंजित अमरकेँ लैडकी केँ आगातक अरीयाति देवऽ ला कहैतछै । अमर वै लैरकीके अरीयातऽ चैलजाइए । रंजीत तऽ मोनेमोन खुसी रहैय कि अमर ओकरा सँऽ किछ नहि किछ त पछबे करतै । मुदा अमरकेँ ओकारासँ किछ पुछवाक लेल हिम्मत काजेनहि करेछैक । किछ आगु अएलाक वाद ओ लरकी कहैछैक –"आँहा जाउ, आरम करु ।"अमर दलानपर फिर्ता भऽ जाइए ।प्रातःकाल सूर्योदय होबऽ सँऽ पहिनही रंजीत आ अमर ओतऽ सँऽ चैलजाइय । अमर घर पहुंचकऽ माँ आ बाबुजीकें दहेजक बिक्रीतीके बारेमे चर्चा सुनबैय । मुदा अमरके बाबुजी ई सब सुनलाक वाद जवाब दैछथि–"रे तो सब नहिने वुझबे जे कतेक आशा राखिक तोरा सबमे खर्च कैलि आ अखनो करैछी ।" पोर साल जे तोरा वहीनक बिबाहमे तिन लाख तिलक गनलहुँ से । ओइ समयमे दहेगकऽ विक्रिती त केओ नहि सुनैलनि ।"ई सुनिक" अमर वावुजीक विचारकेँ वारेमे नहि सोचैछ कि मुदा ओ लैरकि वाला सवकेँ वारेमे सोचऽ लगैछय जे ओ सब पहिने घर पर ध्यान देता कि तिलक गन्ता । ई वात सोचिते अमरकेँ बाबुजी सऽ सहमति नहि भऽ ओही साझँ घर सँ कतौ भागिजाइय ।लैरकी देखाबऽ के लेल जानकी मन्दिरमे अबैय । अमर नइ होबऽके कारणसँऽ अमरके माँ अमरके फोटो लऽकऽ पहुचैय । जलपान आदी भेलाकवाद आब सबगेटा लैरका के बजाबके लेल कहैय । ई सुनिकऽ अमरकेँ माँ कहैछथि "अमर त कने कौलेजके काजसँऽ काठमाण्डौ गेलअछि ।"फेर अमरके फोटो वेगमेसँ निकालिकऽ दैत कहैछथी "हे, लिअ ...........फोटो लैरकाकेँ ।"लैरकि वाला सव फोटो देखिते एकआपसमे कानफुस्की करऽ लगैय । सवगोटा फोटो देखिते–देखित फोटो लैरकीके हातमे परैय । फोटो देखिते ओ चिन्हलैय । अमर के प्रतिक्षा करऽ केँ क्रममे विवाहक वात कतेकवेर पक्का भभऽ कऽ टुटिजाइछनि । एक–डेढ वर्ष तक अमरके वाट तकिकऽ लैरकिक बाबुजी विवाहकऽ वात दोसर ठाम करैछथि मुदा ओ लैरकी अपन बाबुजीकेँ कहैय "बाबुजी, जौ हम विवाह करब त..................अमर सँ नहि त अहिना रहब । बल्कि हम अमरके प्रतिक्षा करब मञ्जुर अछि ।"अपन संतान त केकरो भारी नहि होइछैक । बाबुजी किछ जवाव नहि देलाह । आ ओ अमरसँऽ विवाह करव कैहक प्रतिक्षा करऽ लगली । बिश वर्ष त बितगेलै मुदा बिभा अखनो अमरके संग होबऽबाला बिबाहक प्रतिक्षा करैय ।

धोबीकेँ गदहा - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

धोबीकेँ गदहा

सुबोधकेँ बच्चे सँ माँ आ बाबुजीक निक स्नेह भेटलनि । सुवोध हसिते, खेल्ने मेट्रिक पास भेलाह । गामसँ लगे पर वाला कौलेज मे आ.ए. पढैत रहैथ ।एकदिन हुनक बाबुजी हनका बजाक कहलनि "अपना खेत कते छौक से त बुझले छौक......... आब हम तोरा खर्च नहि द सकैछि आब तो अपने किछ आर्जन कर केँ कोषीश कर.....।"ई बात सुनिक सुवोधकें मनमे दुःख लगलनि आ ओ अपना बाबुजीके कहलनि "हम एते पाइ कमासकैत छि जे अाँहा पुते कहियो खर्च ककऽ खतम नहि कएल पार लागत ।"आ, ई वात कहिक ओ बाहर जाएकें लेल तयारी करऽ लगैय । ताबतें किछ दिन बाद सुवोधके वास्ते अगुवा एलनि आ हुनक बाबुजी तिलक लक सुवोध केँ विवाह क देलनि । विधी विद्यान सँ सुवोधक विवाह सु–सम्पन्न भेलनि । तिकममेका जे पाई बैचगेलरहनि ताहिसँ ओ छोटमोट व्यापार क'र केँ सोचलनि । ओ पटनासँ दवाई आ अन्य किछ लाविक वेचैछलैथ । एक दिन जखन ओ पटनाक गोविन्द मित्रा रोड पहुँचैछथ लखने हुनका ३ आदमी घेरक चाकु देखाक –"जते पाइ छौ निकाल नहि त मारिक नालीमे फेक देवौ ।"ई धमकी द सुवोधसँ सवटा पाई छिन लैछनि । सुवोधक जेवीमे एकटा फूटलो कौडी नई होब के कारण स ओ वड कष्ट कक अपन घर पहुँचैछथि । तिन दिन वाद भुखले सुवोध अपना घरपर पहुँचैय । मुदा ई घटनाक वात किनको नहि सुनवैछथि । मुदा ई वात ओ अपना मनमे से हो नहि दवाब सकैय । आ ई कारण ओ एकदिन आधा रातिएमे उठिकऽ घर घेरिक चैलजाइछैक । आगा पहुचक जइ वस पर चढ लनि ताही वसक स्टाफसँ पुछलनि "ई बसमे ......यात्री विमा अछि कि नहि ?"एहन वात सुनिकऽ लोक कहैक "ई छौरा त ....पागल लगैछैक ।"मुदा सुवोधकें मनमे ई छलैक जे हम मरियोजाएब त विमा वाला पाइ हमर बाबुकेँ भेटऽ जाइतै जै सँऽ किछ निमहि जएतै । मुदा ओकरा अपन घरवालीके चिन्ता कनिको छैहे नहि । सुवोध मुम्बई पहुँचैय । मुम्बईमे सुवोध करिब २० दिन पाथरि फोडवाला काज करैय आ पुनः ओ दोसर काज करकेँ तैयारीमे लगैय । काज ताकँऽके क्रममे एकदिन सुवोध देखैय एक आदमी आगु–आगु भागिरहल आ चारिगोटें ओकरा खेहारैत । हाथमे तलवार लऽकऽ खेहारैवाला सब बड क्रुर लगैत रहैत छैक । भागऽ वाला आदमी सुवोध ठाह् भेल वाला गल्लीमे नुकारहैछैक । बाँकी खेहारवाला सब चारुतर्फ ताकिक ओ फिर्ता चैल जाइए । तखन ओ नुकायल अदमीलग जाकऽ अपन परिचय दैछैक आ काजक तलाशमे छि से हो कहैय । ओ आदमी सुवोधकें अपन मालिक लग लऽजाइतछै । खाँन पोशाक पहिरने दाह् िवाला आदमी सुवोधके एकटा काज सोपैछै"ई वेग लऽकऽ समुद्र किनारमे पहुचादही तोरा ओतै हमर अदमी भेटतौ आ तोहर परिश्रमिक ओतै दऽ देतै ।"सुवोध बेगलक समुद्रकात पहुचैय ओत ओकरा कहल अनुसारकेँ आदमी भेट जाइछैक । ओ वेग सुवोध ओकरा द'क अपन परिश्रमिक पच्चिस हजार रुपैया पबैय । हातमे पाई परिते ओ सबसँ पहिने जीवनविमा करबैय आ पुनः अपन काजमे लागि जाइय । एक दिन जखन सुवोध वेग लऽकऽ समुद्रकात जातिरहैय त पुलिश पाछा आब लगैछैक । सुवोध अपन मोटर–साइकल छोरिक लगैय गलिदने भाग । सुवोध आगा आ पुलिशपाछा । ई क्रम चलैत चलैत पुलिश सुवोधपर गोली–चलवैछैक । सुवोधके पिठपर गोली लागिजाइछैक । सुवोध लगैय छटपटाय । हाथसँ वेग खैस परैछै । गोलीके आवाज सुनिक लोक लगैछै भागऽ । पुलिश वेग खोलिक देखैय त ओकरा वेगमे मात्र उजरा पाउडर रहैछैक । पुलिश पुनः दोसर गोली ओकरा माथपर मारिदैछैक । सुवोधकेँ प्राण ओतै छुटिजाइछैक । पुलिश ओकरा लाशके समुद्रकात मे लजाक फेकदैछै । मुदा सुवोधके माथ–बाबु आ कनियाके अखनो प्रतिक्षा छै सुवोधके ।

हमरा याद अछि - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

हमरा याद अछि

हम आठमे पढैतछलहु बात त तहिएके थिक । दोसर–दोसर स्कूलसँआयल नयाँ–नयाँ विद्यार्थी तिनटा साथी स परिचय भेल । आ, ई, तिनु सँ परिचय भेलाक बाद हमहु पहिल–दोसर ब्रिन्चि पर बैसनाइ छोरिक अन्तिम ब्रिन्चि पर ओकरा सब साथे बैस लगलहुँ । अन्तिममे वैसकऽ अनेक प्रकारक गप होइछलै । ताहिक्रममे लैरकी सबकेँ बात बेशी होइक । ई सब हमरो सुनऽ मे बड निक लागे । एक दिन हमरा सबकेँ क्लाशमे चौथी ब्रिन्चिपर बसैल भाटारंगकऽ कपडा पहिरने लैरकिकेँ वारेमे गप चलऽ लगलैक । शिक्षक चैलअएलनि सब चुप मुदा शिक्षककेँ गेलाक बाध फेरु ओकरे बारेमे गप । ओ रहवो करै एते सुन्दर जे लगै चन्द्रमा मेँ स टुटल टुक्रासँ ओकर मुह बनल होइक । क्लाशक प्रायः लैरका सब ओकरेपर तकै । आब ओकर नाम कि थिक ? पत्ता लगाब परलैक । मुदा हम अपन साथी सबके हम कहलहु "आहा सब ई काज...... हमरापर छोरिदिअ"सब नाम पत्ता लगाब बाला काज हमरापर छोरिदेलक जखन टिपिन भेलैक । सबगोटा बाहर चैलगेलैक त ओकर किताब–कापी उल्टाकऽ देखलहु । आ ई पत्ता लागलजे ओकर नाम मनोरमा छैक । आब बात रहल ओकर घर पत्ता लगाबकेँ । त आनदिन जैतहु त अबेर भजाइत । ताहि सँ हम आ हमर साथी जगत शुक्र दिनक ओकरा पाछा करैत गेलहँ । घर पत्ता लागिगेल । अहि सब किछ केँ बारेमे हम संजयके सुनैलहूँ । ई सब त हम करैछलहुँ हमर मित संजय ला मुदा मनोरमाकेँ धीरे–धीरे हमरा सँ लगाब होबऽ लगलैक । मनोरमा के हमरा सँऽ लगाब देखिकऽ संजय हमरा सँऽईर्शा करऽ लागल ।मनोरमाकें नजरिमे हमरा गीराबऽ लेल आ अपने निक बनऽलेल अर्धवार्षिक परिक्षाक अन्तिम दिन हमरा पर हात उठेलक अपना साथीमे सबसँ कमजोर हमही रही ताही सँ हमरा माइर खाए परल आ कपार से हो फूटिगेल । बाबुजीक डर सँ घर नहि जाकऽ हम मन्दिरपर वैसल छलि । करिब १५–२० मिनटकेँ बाद मनोरमा ओत पहुचली आ हमरा कहलगली "एना डरपोक भऽ कऽ नहि चलत,.......... आहाँ कँराटे सिखु आ....... किछ करु ।"ई वात सुनिकऽ , हम बड सोचलँहु । कि, ओ ठिक कहलीअ कि बेजाय । ओहि दिन साँझ सँऽ हमहुँ कराँटे खेलगेलहँु । आ, ३ महिना पहुचैत– पहुँचैत हम अपना क्लबके एकटा निक खेलाडी बैनगेलहु । दशमी आएल । स्कुलमें सबसाथी एकआपसमे शुभकामना आदन–प्रदान केओ मुह सँऽ आ केओ पोष्टकार्ड आ ग्रिटीङ्ग कार्ड सँ । हमरो एकटा ग्रिटीङ्ग कार्ड मनोरमाके तर्फ सँ भेटल । जे कार्ड सायत संजय के कहलापर अरुण चोरालेलक । मुदा, फेर छुट्टी कालमे संजय अपनाके हिरो बनाबऽकेँ लेल हमरा पर हाथ उठौलक मुदा हम ओते आब आशान नइ रैहगेलरही । हमरा दुनुके बराबर माइर चलल आ, पुनः हमरा कपार फुटिगेल । तावते स्कुलकें एकटा शिक्षिका आबिक झगडा छोरादलनि । आ ओ ई हो कहलनि जे एहन जँ आदत रहतौ तऽ जीवनमे कहियो आगु बढल पार नहि लगतौ । ई आठ –दश वर्गक विधार्थी कही एहन भेल । फेर, विद्यालय खुजल । सबगोटाके तँऽ बुझले छलैक हमर आ मनोरमाक प्रेमके बारेमेँ ई चर्चा कने बेशिए भऽ गेलैक । एक दिन मनोरमा हमरा स्कुल छोरिकऽ सिनेमा देखला कहलनि । हम आ मनोरमा आशा हलमे अमानत फिल्म देख गेलहु । वै के वाद ई क्रम चलैत रहलै । समय वितते गेलैक । हम सब एस.एल.सी. दैत रही त हमरा मालुम भेल कि मनोरमाके विवाह फागुनमेँ छैक । ई सुनिक हमरा शारीरक रक्त सञ्चार बन्द भऽगेल । हमर सोचन शक्ति हेरागेल । आ एकटा एहन अवस्था चैलआयल जतऽ नहि त हम कानि सकतछी नहि हम हसिसकैत छि । मुदा एतऽ कि करु हम बुझऽ नहि सकलहुँ । ई सुनिकऽ हमरा हृदयके से हो कने चोट पहुँचल किछ दिन बाध ओकर सहेली संकटमोचन लग भेटलनि आ कहलनि "कल्हि खन ३ बजे आँहा राम मन्दिर अवियौ ।"हमरा किछ अवेर भऽगेल करिब पौने चारि बजे ओत पहुँचलहु । ओ सब तिनो बजेसँ पहिले आएल रहैक । हमरापर ओ खुब जोइ सँ खिसएली । मुदा हम किछ जबाब नहि देलियनि । अन्ततः ओ एतवे कहलनि जे हम सब किछ लऽकऽ चैल आएल छि आ अपने सब भागु । हिम्मत काज नहि केलक जे दुनु अदमी भागी जाई । हम नहि छोरिक आइ किछ जबाब नहि देबऽ सकलहुँ । ओना तखन तऽ हम पुरा होशमें छलहुँ । भागीकऽ विवाह करऽ बालाकऽ तिन पुस्ता बखाद भऽ जाइतैछक । ताही सँ ई मनक बातमे हम दिमागक प्रवेश कऽ कऽ हम अन्तोतक नहि मात्र जबाब देलीयनि । एतेक बात मात्र भेलैक मुदा साँझके सात कोना बाजिगेल बुझ नहि सकलहु । जाए कालमे ओ कहली "अमर ............... हम आहाके श्राप त नहि दऽ सकैतछि मुदा एकटा शिख जरुर देब जे.................. एहन काज कहियो नहि करब जै सँ केकरो मनमे दुःख लगै ।"आ ई बात हमरा अखनो याद अछि ।

दाग लागल स्नेहमे - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

दाग लागल स्नेहमे

आई.ए. प्रथम वर्षमे अध्यनरत सुनिताकेँ एकटा बड निक विद्यार्थी दिपक सँ भेट होइछैक । बात–बिचार मिलऽ केँ क्रममे सुनिताकेँ । दिपकसँ प्रेम भऽ जाइछैक । सुनिताक घरसँ नजदिकेँ के घरमे भाडा लक रहबाला दिपक से हो सुनिता सँ प्रेम कर लगैछैक । आ, सुनिताक साथी रुबी सेहो जखन भेटभेल तखने दिपककेँ बारेमेँ पुछ लगैछैक । दिपक, रुबि आ सुनिताकेँ पढमे से हो बड मदत करैछैथि । समय–समय पर दिपकसंग सुनिता सिनेमा देखऽ सेहो जाय लगैय । दुनु एक आपसमे कहियो मन्दिर लग आ कहियो पार्कलग भेटघाट करके बात सुनिताक बाबुजीकेँ कान तक पहुँचजाइछैक । सुनिताक बाबुजी बड दुखी भऽ सुनिता लेल वर ताक लगैछथि । ई वात सोचिकऽ जे बेटी अपन प्रतिष्ठा सेहो बुरादेत । संचयकोष सँऽ पाई छोराक बेटीलेल गहना–गुरिया से हो वनाब लगैछथि । सुनिता ई सब बात अपन सहेली रुबिकेँ सुनबैय । ई सुनिकऽ रुबि दिपककें संग भागिक विवाह कर ला आ मिथिलाक दुर्दशा दहेज आ महिला अधिकारके बारेमे निक जका पाठ पढादैछैक । दोसर दिन सुनिता अपन साथी दिपककेँ भेट कऽकऽ भागिकऽ विवाह करऽला कहैछैक । सब किछ सुनलाक बाद दिपक भागऽके लेल समय सेहो निश्चितक सुनिताके कहैय । प्रातः काल सुनिता आपन माँके मंगलशुत्र, तिलहरी आ अनवारीमे राखल रुपैया लऽ दिपक संग भागिजाइय । आ दुनू सब मुम्बइ पहुँचैय । दिपक रहऽकेँ लेल अपन मितकेँ डेरामे व्यवस्था मिलबैय । आ, सुनिताकेँ डेरामे छोरिकऽ दिपक ओमहरे रैहजाइय, जाँहि कारण सँऽ सुनिता बड चिन्तित भजाइय । मुदा साँझमे दिपक केँ देखिते सुनिताके चन्द्रमा सनक मुहसँ इजोत निकलैछैक । आ, ओइ राति सुनिता दिपकपर पूर्ण रुपे समर््िर्पत भऽ जाइय । भोर मे जखन सुनिताक आँखि खुलैछै त दिपक ओतऽ नहि रहैछैक । दिपक नितक्रिया मे गेलहोयत सोचिक सुनिता जल्दि सँ उठिक अपन कपडालता पहिरक तैयार होइय । मुदा एमहर–ओमहर तकैत सुनिताक नजर चिठ्ठी पर परैछैक । ओ चिठ्ठी खोलिक देखैय, लिखल रहैछैक "हमरा माफ क दिअ सुनिता ।"
ई पढिक सुनिता अपन माथ कपार पिट लगैय आ सोच लगैय जे कि भगेल । सुनिताक छाती धर धर धर धर काप लगैछैक । तावते केवार खुलैछैक । आ, एकटा महिला पान खैने दुटा मर्दके लक पहुँचै छै । पहिने ओ महिला सुनिता सँ पुछैछैक "तम्हारा नाम.... सुनिता है ।""हाँ, हाँ, मगर क्यो ?" सुनिता डेराक जवाफ देछै । ओ महिला फेर कहैछै "चलो हमारे साथ ।""क्यो ?""हमने तुमको ....खरिदा है ।""नही ए झुठ है ।" ओ महिला अपन साथमे आयल मर्दकेँ कहैछै "ए ! उठालो सालीको,...... बहोत बोलरलिए ।"दुनु मर्द सुनिताके उठाक लजाइय । सुनिताके देह व्यापार कर ला कहलजाइछ । मुदा अस्विकार कएला पर सुनितकेँ लगैछै पिटाइ आ दऽ देओल जाइछ निशा के सुई । निशाकेँ सुई दकऽ देह व्यापार कराबके कारण स ओ विमार भऽ जाइछ । ताहि सँऽ ओकरा जचाँबऽ लेल डाक्टरलग लगाइछ । ओ सौचालय जायकेँ बहाना सँऽ ओतऽ सँऽ भगैय । आ भागऽमे सफल सेहो भऽजाईछ । सामने अवैत रिक्सापर बैसकऽ ओ रेलवे–स्टेशनपर पहुँचैय । रिशसाबाला जखन पाई मगैछैक त सुनिताकेँ सबकिछ सुनाब परैछैन । किया त सुनिताक सबपाई ल क दिपक चैलगेल रहैय । सुनिताक दुःख भरल खिस्सा सुनिक रिक्सावाला सुनिताकेँ अपन डेरा लजाइय । आ दु–तिन दिनमेँ अपन गाम पहुँचादेवकेँ बचन से हो दैय । रिक्शावालाक वात सँऽ सुनिताकेँ विश्वास होइछ । सुनिताकेँ संग परिचयपात होबऽ के क्रममे रिक्शावालाकेँ घर सेहो परोशकें गाउँमे छैक से ओ वतवैय । दु–तीन दिन बाद सुनिताक संगे रिक्शावाला अपन गामकेँ लेल निकलैय । रेलबे स्टेशनपर सुनिता पुरा एमहर–ओहमर देखैत सावधानी सँऽ चलैय मुदा जहिना टे«न आगा बढैछै, सुनिताक घरकैत करेज स्थिर होब लगैछैक । सुनिता ताक लगैय रिक्शावालापर आ सोच लगैय ओ दुनुकेँ फरककेँ बारेमे ।रिक्शावाला सुनिताकें लकऽ जखन सुनिताकऽ घर पहुँचैय तऽ सुनिताक बाबुजी सुनिताके देखक कहैछथि "आब कि लेब अएले.................., ओतै सँ चैलजो नइ त हमहि सब बिख खा लेब ।"सुनिता विना किछ बाजिकऽ मुरी गोतने बाहर निकलैय । सुनिताकऽ हाथ रिक्शावाला पकरिलैछ आ ओ अपन घर चलऽ ला कहैछ । जखन ओ दुनु बाटमे परऽवाला दिपककेँ डेरा लग पहुचैय । कोठरी भितरसँ बन्द रहैछैक । सब दिन खिरकी दने वजाबकेँ आदत सुनिता खिरकी दने पुनः बजाबलेल तकैछ । मुदा सुनिता जखन खिरकि दने तकैछै त सुनिताक साथी रुबि दिपक के कोरामे बैशल प्रेमरसकेँ वात करैत रहैछ । ई देखक, सुनीताक पैर तर सँऽ जमीन जेना निकलिजाई तहिना भऽजाइछ । आ ओ अपना पर भेल अत्याचार दोशर पर नहि होउक से सोचिकऽ नजदिक कें थानामे जाक दिपक के बारेमे लिखवैय । सुनिताकेँ स्थीती परिस्थिति देखक आब ओ कत जएती सोचिक रिक्शावाला सुनिताकेँ कहैछ "एक बात कहु, .........पिताएब न नहि ?"उत्सुक्ता जनबैत सुनिता, कहैछ " ह ! कहु ..........!"तब रिक्शावाला कहैछ "आहा हमरा सँ ............विवाह करब ।"
ई सुनिक सुनिता हसऽ लगैछ ।

Wednesday, November 05, 2008

भाग्य अप्पन अप्पन- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक बेर देशमे के की–की कऽकऽ जीवन यापन कऽरहल अछि ताहि बातक पत्ता लगाबऽलेल राजासाहेब अप्पन राजकुमारके देशमे सर्बेक्षण करऽलेल पठौलनि । देशमे के केहन प्रकारक रोजगार कऽकऽ अप्पन जीवनयापन करैत अछि, से विषयक सर्वेक्षणमे राजकुमार सबहक आङन जा–जाकऽ प्रजासबहक रोजगारक बारेमे सर्वेक्षणक श्रीगणेश कएलनि ।
सर्वेक्षणक क्रममे जखन ओ एकटा आङन पहुँचलनि त देखलखिन दू भाइमे झगडा होइतछल । जाहिमेसँ एकटा भाइ जे जेठ छल ओ रहैथ केश कटौने जेना किनको स्वर्गबास भऽगेल छलैन । आ, दोसर भाइ जे छोट छलैथ ओ लाल धोती पहिरने छलाह जे देखिकऽ लगै नव बियौहती बर । राजकुमार ई देखिकऽ हरान भऽगलैथ जे एकहि आङनमे एना किए छै ? आङनमे ओ दूनु राजकुमारके देखियोकऽ चुप नहि भेल । हँ, स्वभाविक छै, कहाँदोन पित्तमे लोक आन्हर भऽजाइछ । राजकुमार लगलैथ दूनुमे भऽरहल बातचित सुनऽ । बड़का भाइ बेर–बेर कहै —‘रे तोरा लेल हम नौह–केश करालेली..हमरालेल तो मरिगेले ।’ एहन किसीमके बात सुनिकऽ हुनको बरदास नहि भेलनि माय ओ जोरसँ कहलैथ–‘अहाँसब चुप होएब कि जेल अखने पठादिअ ।’बास्तवमे लोक कहैछै –‘माइरके डरसँ भुत पराए’, ठिक ओहने भेलै । दूनु भाइ चुप भगेल तखन राजकुमार छोटका भाइसँ पुछलखिन –‘अहाँ कहु अहाँ एहन कोन गलती कएलहुँ जे घरमे एहन कल्लह भऽरहल अछि ? कि अहाँके एते बुझल नहि अछि जे कलहके कारणसँ घरक सब किछु कमजोर भऽजाइछ ?’ राजकुमारक प्रश्न सुनिकऽ बड़ विनम्र भऽओ जवाब देलनि –‘हम आठ बर्ष पहिनेसँ जाँहि लड़कीसँ प्रेम करैछलहूँ ओकरेसँ हम बियाह कएलहूँ अछि । ताहिलेल ओ हमरा पर खिसियाएल छथि ।...हुनका तिलकके माध्यमसँ आबऽवाला आम्दनी नहि भेटलनि ते ओ बिभिन्न बहन्ना बनाकऽ हमरासँ झगडा कऽरहल छथि ।’
भाइके मुँहसँ एहन बात सूनिकऽ ओ पिताकऽ कहलैथ –‘बियाहमे सबसँ पहिने देखलजाइछ लड़कीक खन्दान, जाति आदि ।’ जातिके नाम सुनिते छोटका भाइ कहलकै –‘हम जातिके बाह्मण होइतो जँ चौकपर जाकऽ जुत्ता सियब त लोक हमरा चमार कहत, अर्थात मतलव साफ छै आदमी अप्पन कर्मसँ नमहर आ छोट होइछ ,... किनको माथपर नहि लिखल रहैछनि कि ओ कोन जाति छथि ।....रैहगेल खन्दानक बात त थाल आ कमलके फूलवाला कहाबत अहाँ पक्का सुनने हाएब ठिक तहिना जँ हम बाहरमे कतौ फेकल पथ्थरपर भगवानक मूर्ति गढ़िक मन्दिरमे राखि दिऐ त लोक ई नहि पुछ अएतै जे ई पथ्थर कतऽके छै ओ सिधा पूजा करतै ......लोक डुबैत सूरजके एकहि दिन प्रनाम करैछैक मुदा उगैत सूरजके सब दिन ।’ एते बातक बादो जेठ भाई फेर कहलखिन –‘रे, कमसे कम ओकर संस्कृती पर त बिचार करऽके चाही ।’ संस्कृतीक नाम सुनिते छोटका भाइ हसिकऽ बाजल –‘महाभारतमे भिम सेहो एकटा राक्षसनीसँ बियाह कएलकै जेकर पुत्र घटोत्कच छलैक ।....आप करे त रास लिला आ हम करे त कैरेक्टर ढिला, नहि ।’ फेर ओ शान्त भऽकऽ कहलखिन–‘देखु भैया, बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
दूनु भाइमे भऽरहल बातचित सुनिकऽ राजकुमारके सेहो किछु नहि फुराति छलैन । उदाहरण एकहुटा काटऽवाला नहि रहैक । ते ओ बिचमे किछु बाजऽ सेहो नहि चाहलखिन । ते ओ हुनकासभसँ बिनाकिछु पुछने –‘अहाँसभ झगड़ा नहि करु’ कैहकऽ बिदा भऽगेलैथ ।
राजकुमार ओतऽसँ कनिके आगु बढ़लैथ त देखलखिन एकटा बोर्डपर लिखल रहै “भविश्यवाणी” । बहूतो लोकसभक ओतऽ भिड़ लागल रहै । लोक सबहक भिड़भाड़ देखिकऽ ओ आश्र्यमे परिगेलैथ । केओ अनाज, केओ किछु– केओ किछु केओ रुपैया दऽकऽ भविश्यवाणी सुनऽ आएल रहे । राजकुमार पण्डितजी लग जाकऽ पहिने ओ अप्पन सर्वेक्षणक सम्बन्धमे आय–ब्यय सभ किछु पुछिलेलाक बाद ओ भविश्यवाणीक सम्बन्धमे सेहो किछु पुछलखिन किए त हुनका दिमाग पर नचैत छलैन एकहिटा बात जे ओतऽ छोटका भाइ बाजल छल –‘ बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
राजकुमार अप्पन बिवाहक सम्बन्धमे पण्डितजीसँ पुछलखिन कहु –‘हमर बियाह केकरासँ कोन जातिमे होएत ?’ पण्डितजी हुनक माथक रेखा देखिकऽ पहिनही बुझिगेल छलैथ कि ओ एहि देशक भावी राजा छथि । मुदा बियाहक सम्बन्धमे ओ देखलथिन त हुनका भेटलनि कि हुनक बियाह ओही गाँमक चमनिके संग । पण्डितजी राजकुमारसँ कहलखिन–‘अहाँक बियाह एहि गाँमक चमनिसङ होएत ।’ ई बात सुनिते राजकुमार पितागेलैथ आ पुछलखिन –‘जँ नहि भेलै त ?’ राजकुमारक प्रश्नके ओ हसैत उत्तर देलैथ–‘जँ नहि भेल त अहाँ हमरा जे कहब मानिजाएब ।’ राजकुमार सर्वेक्षणक काज छोड़िकऽ दरवार फिर्ता भऽ चिन्तीत भऽ अप्पन कक्षमे जाकऽ सुतिरहलैथ ।
देशक प्रधान सेनापत्ति राजकुमारक एकटा बहुत निक मित सेहो छलखिन । राजकुमारके चिन्तीत मुद्रामे देखि ओ हुनकाँसँ पुछलखिन –‘मित, अहाँके कि भेल, अहाँ एना चिन्तीत किए छी ?’ राजकुमार सेनापत्तिलग अप्पन मनक बात पूर्ण रुपसँ निकजकाँ सम्पूर्ण घटना सुनौलखिन । ओहि गाममे एकहि घर चमनि होबऽके कारणसँ सेनापत्तिके ओकरा सबहक बारेमे सेहो निकजकाँ बुझलरहे । सेनापत्ति अप्पन बिचार प्रस्तुत कएलानि –‘चमनिके एकहिटा जे बेटी छैक ओकरा मारिकऽ नदिमे फेक देल जाए ।
राजकुमारक आज्ञा अनुसार सेनापत्ति अप्पन किछु सेनासहित जाकऽ ओइ लड़कीके जंगल दिश लगेल । बिच जंगलमे जे एकटा नदि परै ओतै ओकरा लऽजाकऽ एकटा सेना ओकरा पाछुसँ एक तलवार मारिदेलकै । ओ लड़की ओतै बेहोस भऽगलै । मरलसन देखिकऽ ओकरासभके भेलै जे ओ लड़की मरिगेल ते ओकरा नदिमे फेककऽ सेनासभ अप्पन देश फिर्ता चलिआएल ।
ओ लड़की दहाकऽ एकटा दोसर राज्यमे पहुचगेल । नदिक किनारके ओहि देशक राजा रहैथ स्नान करैत तखने हुनका ओ बेहोस लड़कीपर नजड़ि पड़लनि । राजा अपनेसँ जाकऽ ओ लड़कीके कोरामे उठाकऽ लैलथि । श्वास त ओकर चलिते रहै ते राजा अप्पन दरवार लऽजाकऽ ओकर ईलाज राजबैद्यसँ करौलनि । राजाके अप्पन कोनो सन्तान नहि होबऽके कारण राजा ओइ लड़कीके अप्पन राजकुमारी घोषणा कएलनि । किछु समयक बाद राजकुमारीके बियाहक प्रशंगमे राजा एकटा सभाक आयोजना कएलनि । आ, आहि सभामे बिभिन्न राज्यक राजा तथा राजकुमारसभके आमन्त्रित सेहो ।
शभामे उपस्थित राजा–महाराजा लग घोषणा कएलगेल –‘राजकुमारीके जे लड़िका पसन्द एतै, ओ ओहि लड़काके वरमाला पहिरादेत आ ओहि लड़कासँ राजकुमारीक बियाह सेहो कएलजाएत । घोषणा पश्चात राजकुमारी शभामे वरमाला लऽकऽ उपस्थित भेली । राजकुमारी कोनो स्वर्ग परीसँ कमजोर नहि बुझाई । राजकुमारीके देखिकऽ सबहक मोनमे रहे –‘हम राजकुमारीसँ बियाह करितहुँ ।’ ओ चारु दिश घुमिकऽ ओही राजकुमारक गरदनिमे माला पहिरादेली । राजकुमार सेहो बड़ खुस भेल किए त हुनका भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितके जबाव देबऽके छलनि ।
बियाह भेलनि । राजकुमार राजकुमारीके लऽकऽ अप्पन राज्य अएलनि । बियाहक सब बिध समाप्त भेलाक बाद ओ अप्पन सेनापत्तिके बजाकऽ ओ भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितसँ भेटवाक इच्छा प्रगट कएलनि । मित तथा राजकुमारक इच्छा अनुसार ओइ पण्डितके राजकक्षमे उपस्थित कराओल गेल । राजकुमार आदेश देलनि –‘ई पण्डित दोसरके मात्र ठकैय । भविश्यवाणीक नाम पर सभके धोखा दैय ते एकरा सजाय मृत्यु देल जाए ।...... जँ हिनका अप्पन सफाइके लेल किछु कहऽके छनि त कैह सकैछथि ।’ राजकुमारक बात सुनिकऽ ओ कहलखिन–‘राजा साहेब आइ तक किनको हम नहि ठकलीयनि । रहल बात अपनेके त अपने जाकऽ ई देखलजाए कि अपनेक रानीक गरदनिके पाछु कातसँ अपनेक सेनापत्ति द्वारा मारलगेल तलबारक निसान अछि कि नहि ।’ ई बात सुनिक राजकक्षमे रानीके सेहो उपस्थित कराओलगेल आ ओतै सभक सामनेमे जखन ओ माथ परसँ नुवा हटाकऽ पाछुतकलखिन त बास्तवके तलबारक निसानी रहबे करै । सभगोटेके छक्क पड़ैत देखिकऽ पण्डितजी कहलनि–‘होइहे वही जो राम रचि राखा ....।’

दाग- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

अरुण भोरमे घरसँ निकलऽ बेरमे ताला लगाकऽ निकलल छलाह । मुदा साँझखन जखन ओ घर पहुचलाह त केवार मात्रे सटाएल रहै । तालाके त अत्ते–पत्ते नहि । बुझऽमे अएलनि जे घरमे पक्का चोरी भऽगेल । ओ धरफऽराति बौल बारलनि । आ, ईजोत होइते घरमे रानीके देखिकऽ ओ अकबका गेलाह । सोफालग निच्चामे ओ बैसल छलिह । आ अबाक होबऽके त बाते रहै जे कनिए दिन पहिने रानी दोसरासंग भागिगेल छलिह । मुदा, ओ पहिनेके तुलनामे बहुत बदलल बुझाइत छलिह । एते लटल छलिह जे लगै मात्र देहमे हडडी । अरुणके बाजके मोन त नहि रहै किए त बियाह कएला दूइयो बर्ष नहि भेल रहै आ दोसर संगे ...... । ओ अरुणके देखते किछु बजली मुदा हुनका बुझऽमे नहि अएलनि । ओ नजदिक जाकऽ बैसिगेलाह आ पुछलखिन –‘कि भेल अहाँके ?’
अरुणक प्रश्नके बिना कोनो जबाब देने ओ कहलीह –‘हम भागिकऽ अएलीए ।’
तैयो अरुण किछु नहि बुझल जकाँ ओ ओकर आओर लग घुसकिकऽ ओकरे दिश ताकय लागल । रानीके लगमे बसिते ओकरा पुरान बातसभ मोन परऽलगलै; रानी, जे पहिलबेर कैम्पसक पहिल सांस्कृतीक कार्यक्रममे भेटल छलीह । निक कलाकार होबऽके कारणसँ रानी अरुणसँ परिचय करऽगेलीह । परिचय भेलै । आ, साथमे आओर किछु बात सभ । आ एतहि दूनुके एक–दोसरसँ मुक प्रेम भऽगेलनि । ताहिके बाद दूनु कहियो कतौ त कहियो कतौ भेटऽके सिलसीला जारी राखऽलागल । एहिके बारेमे किनको किछु बुझल नहि छलनि । एहि क्रममे अरुण रानीसँ बियाहक प्रस्ताव आगु बढ़ौलनि । आ, रानीक सहमति पाबि ओसभ भागिकऽ बियाह कएलाह । एहि बियाहके ओना रानीक जातिके लोक बिरोध आ अरुणक जातिक लोक स्वागत कएने रहै । आ, दूइए बर्षक बाद ई .......... दोसर संगे ।
जेकरासंगे ओ चलिगेलछली अरुणके बुझल नहि छलनि जे ओ के छैक । किए त अरुण एकटा कुशल कलाकार होबऽके कारणसँ बहुतो लोकके हुनका आंगनसँ आबाजाही लागल रहैछलनि । ओना त ओ रानीके गेलाक बाद ओ बहुत दिन धरि गुमसुम रहय लगलाह । मुदा एखनि ओ अप्पन मोनके बुझालेने छलाह । गाम आ टोलक लोकसभ कहैछलै –
‘केहन छै , लाजो नहि । बहुभागिगेलै ...... ।’
मुदा समाजमे एहन घटना घटब त आम बात भऽगेल छैक । एकटा अकल्पनीय घटनाके प्रश्नवाचक दृष्टीसँ देखते रहैथ ताबते ओ बजलीह–
‘हम अहाँसँ मात्र भेट करऽ आएलछी ......... एगारहे बजे अएली मुदा अहुँ नोकरी करऽलगलीए से मालुम भेल । ...... एखनो धरि अहाँ हमरालेल चिन्ता लैतरहैछी से बात सिरसियावाली काकी कहैछलखिन । .......कि आब अहूँ बियाह कऽलेब त नहि होएत .......... आ नोकरीवालाके बियाह होनाइ सेहो कठिन नहि ।’
मुदा अरुण हुनक प्रश्नक कोनो जवाफ बिना देने पुछलखिन –
‘अहाँ एतऽ कि करऽ अएली ?’
अरुणक एहि प्रश्नक जवाफमे ओ कहली –
‘हम बिमार भऽगेली ...... दिनानुदिन कमजोर भऽरहलछी ....... जखन–तखन माथ दुखाइत रहैय .... घुरमी लागल जकाँ बुझाइतरहैय । ......... हम ओ छठठूकसंग जाकऽ बड नमहर पाप कएली आ पापक परिणाम कतहूँ निक नहि होइछैक । हमरा ओ ठगिलेलक, अरुण ?’
एते सुनलाक बाद अरुण पुछलखिन– ‘किए ? आब कि भेल ?’
बड गम्भिर भऽकऽ रानी जबाब देली– ‘हमरा ओ कहने रहे घरमे असगरे छी, एकटा माय मात्र छथि, नमहर घर अछि .. अन्न किनऽनहि परैए । मुदा सब झूठ छै । ....... एक्कहूटा बात साँच नहि ।’
एते बजलाके बाद ओकरा आखिमेसँ नोर खसऽलगलै आ आवाज सेहो थरथराए लगलै । ओकर बातक बिना कोनो प्रतिक्रिया देनहि ओ पुछलाह –‘आब कि समस्या अछि ?’
ओ फेर कहली – ‘ओ कहैए हमरो होटलमे गीत गाबऽपरत .......... नहि त ओना पालऽ नहि सकत । नमहर शहरमे एसगर कमाकऽ पेट नहि भरैछैक कहाँदोन । .....हम कि करु ?’
एते बजला बाद ओ भोकासी पारिकऽ कानऽ लगलीह । अरुण बिना कोनो प्रतिकृयाके पुछैछथि– ‘ओ अपने कि करैए ?’
‘ओ अपने होटलमे डान्स करैए ।’
आँखिसँ खसल नोरके आँचरसँ पोछैत ओ अरुण दिश ताकऽ लागलीह मुदा हुनका सहजहि किछुनहि फुरैलनि तथापि ओ रानीके धैर्यता धारण करबाक अश्वासन दैत कहलनि –‘जे भेलै भऽ गेलै मुदा अहाँके बिना सोंच बिचार कएने ओना भागऽके नहि चाही । आब अहाँ कि चाहैछी, कहू ।’
‘हमर जीनगी बरवाद भऽगेल, ..... हम कतऽ जाउ, ..... फाँसी लगाकऽ मरियो नहि सकैछी ।’ हुनक नोरक गंगा बहिरहल छलनि कनिक देर चुप भऽ ओ फेर बजलीह– हम बहुते पैघ गलती कऽलेली, आब हम जीबियोकऽ कि करब । आ हमरासन रोगीके केओ नोकरनीमे सेहो नहि रखतै ....... हम कि करु ..... ?’ एते कहिकऽ ओ भोकासी पारिकऽ कान लगलीह ।
अरुणलग कोनो प्रकारक जबाब नहि छलनि तैयो ओ रानी दिश तकैत बजलाह –‘किछु नहि भेलैए, ..... अहाँ किछु दिन अप्पन माय–बाबुजीलग जाक रहु । आ, बितल समयके बिसरऽके कोशिस करु । आ, ओही लफंगासँ नहि डेराउ ।’
‘केना जाउ नैहर, माय–बाबुजीके कोन मूहँ देखबियनि ...... हमरा सहास नहि अछि ....... ओतहूसँ सेहो हम भागिएकऽ आएल रही । ....... आ अहाँसंगे भागऽसं पहिनहि ई सोचिलेने रही जे मरिजाएब मुदा माय–बाबुजी लग हारिकऽ नहि जाएब । ..... सच त ई छैक जे हमरा अहाँसँ सेहो क्षमा मागऽके छल .... किए त हमरा बड़ निक जकाँ बुझल अछि जे हमरा चलते अहाँके प्रतिष्ठापर पड़ल । ....... तैयो हम अहाँक समक्ष आबऽके सहास कैली । ...... माय बाबूजी त हमरासँ तहिए हाथ धो लेलखिन जहिया हम अहाँसंगे बियाह कएली । .... सहेलीसभ कहैत रहे जे जहिना सुनलखिन हमर बियाहक बात तखने केश कटालेलखिन आ कहलखिन– जो बेटीके नामके नौहकेश करालेली । ....... अहाँ सेहो हमरासँ मन मारिलेने होएब ।’ एते कहऽ धरि रानी मात्र हिचैक रहल छली सायद नोर सुखागेल छलैक ।
अरुण उदास भऽ कह लगलखिन– ‘हम कि करी... हमरा त अहाँके देखिकऽ आओर दुख लागि रहल अछि । बल्कि जा धरि अहाँके नहि देखने रही ता धरि मन शान्त छल, बिसरऽके प्रयास करैत छलीए ।’ किछु देर चुप्प भऽ ओ फेर कहलखिन – ‘अहाँके कि भेल अछि ? .... अहाँ हमरासँ कि चाहैछी ?.... अहाँके मुँह देखिकऽ हमरा डर लागिरहल अछि । दबाईबिरो सेहो नहिए करौने होएब ? ...... मुदा अहाँक एहन हालत देखिकऽ ओ कि कहैए..................’
अरुणक बात बिचेमे कटैत ओ सिसकैत बजलीह– ‘आब हमरा ईलाज कराबऽके नहि अछि । अहाँसँ भेटलाक बाद माय–बाबुजीसँ भेटवाक चाहना पुरा भऽगेल ।’ एते कहि ओ उठिकऽ केवार दिश आगु बढ़लीह ।
केवारलग पहुचते काल अरुण उठैत बैसऽलेल कहलखिन – ‘रानी, बैसु ने ।’ मुदा एते कहवासँ पहिने बिना किछु बजने ओ केवारसँ बाहर भऽगेल छलीह ।
बाहर अन्हार रहै । ‘आब ई नौ बजे कतऽ जाएब ? रुकु । .... हमहु अबैछी ... रुकु ।’ एते कहिते ओ जुत्ता पहिरऽलागल । आ जखन बाहर निकलल त रानी केम्हरो नजरि नहि परलनि । अन्हार सड़क पर ओ पूर्ब गेली वा पच्छिम देखऽमे नहि अबनि । ओ किछु आगु पाछु देखलखिन आ जखन भेट नहि भेलनि त फेर घरमे फिर्ता आबिगेलाह ।
किछु दिन बाद केओ कहलकनि जे रानी आत्महत्या कऽलेलीह । ई सुनिकऽ अरुणक पैरतरसँ जमिन निकलिगेलनि । शायद मुत्युसँ दाग धुवागेल होए मुदा किछु कऽसकैछलीह ।

डाक्टर- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक्कहिटा गाममे सभ दिन कोनो नहि कोनो बिमारीक प्रभावसँ ग्रामबासी मरिरहल खबरि नियमित रुपमे निकालिरहल पत्रिकाक माध्यमसँ सरकार तक पहूँचैछैक । माय स्वास्थ बिभागद्वारा एकटा नव डाक्टर जे एक महिना पहिने स्वर्ण पदक प्राप्तकऽ कऽ आएल छथि, हुनके निरिक्षण आ जाँचके लेल ओहि गाममे पठाओल गेलनि ।
ठाँम–ठाँमके पुल टुटल । सड़क काटल । आ, गाछसभ काटिकऽ सड़केपर राखल होयवाक कारणसँ कोनो सवारी साधनक सुबिधा नहि रहैक । माय, करिब पन्द्र घन्टा पैदले चलिकऽ ओ ओहि गाम तक पहुँचलैथ । सभसँ पहिने त ओ रहऽके ब्यवस्था मिलौलैथ । एकटा कोठरीक ब्यवस्था भेलैक, सायद घरबला पुरे परिवार किछुए दिन पहिने मरिगेल छलैक । घरो एहन जाहिके भितरसँ दिनमे आकास आ रातिमे तारा निकसँ देखाजाइक ।
ओना त डाक्टर साहेब अपना हाथे कहियो भानस बनौने नहि रहथि माय हुनका एकटा भानस बनौनिहारक आवश्यक्ता रहैन । अशोरा पर बैसिकऽ किछु सोंचिते रहैथ कि एकटा भलादमी ओतऽदने जाइत नजड़ि परलैन । ओ, हुनका बजाकऽ पुछलखिन–“भाइ साहेब एतऽ एकटा आदमीके ब्यवस्था नहि भऽसकैय ? जे भानस बनादे आ बरतनि साफ कऽलेअ ।” अनचिन्हार आदमीके देखिकऽ ओ पुछलखिन “पहिने अहाँ ई कहुँ जे कहाँसँ अएलहुँ आ अहाँ के छी ?” हुनको पुछब उचित छलनि किया त ओ घटना अखन पुरान नहि भेल अछि । डाक्टर साहेब अपन पुरा परिचय कहलखिन तखन जाकऽ ओ सेहो अपन परिचय दैत कहलखिन–“हमर नाम रतन अछि, आ अहाँ एतऽ जे हमरा सभकलेल अएलहुँ ताहिकेलेल धन्यवाद । रहि गेल बात अहाँक लेल आदमी त हम देखैछी । ” एते कहिकऽ ओ ओतऽसँ बिदा भऽगेलथि ।
करिब एक घण्टाक बाद ओ एकटा बाह्–तेह् बर्षक बचियाके लेनेअएलखिन । आ डाक्टर साहेबके बचियाके देखाकऽ कहलखिन–“हे ई टुगर छै, ईहे करिब एक महिना पहिने एकर माय आ बाप दूनु एकहि दिनक आगा–पाछा मरिगेलै ।” बचियाके देखिकऽ ओ सेहो चिन्तित भऽगेलखिन आ, ओकरा अपना लग राखिलेलखिन । काज सेहो बेशी करऽके नहि रहै जे कनिको दिक्कत होइतै ।
दोसर दिन डाक्टर साहेब अपन औजार लऽकऽ गाममे रोगक परिक्षण करऽलेल बिदा भेलैथ । हुनक नजड़ि जेमहर पड़ैन, एकहिटा चिज सगरो देखऽमे अबैन – गामक सभक कपड़ा मैल, अधिक्तर बच्चा सभक मुहँसँ एकहिटा बात–“गे माय भुख लागल अछि । ” कतौ सुनऽमे अबै–“दादा हो दादा मरिगेली । ” आदि ।
डाक्टर साहेब बिमारीके जाँचऽगेल रहथि भुख सन पैघ बिमारीक ईलाज हुनकालग नहि रहैन –जे गामक प्रमुख समस्या रहै । जतऽ डाक्टरसाहेब ठाह् भऽजाथिन त लगै जेना कौआ सभक बिचमे बकुला । गाम भरिमे एकहिटा हुनके कपड़ा साफ छलनि, मुदा कते दिन ? एकटा बात त निश्चित छलै जे ई गामक एहन दशा गरिबीक कारणे भेल छल । ताँहूमे किछुलोक ओकर गरिबीक नाजाएज फाएदा लेबऽचाहै ।
गाममे घर–घर जाकऽ ईलाज करऽके क्रममे एकबेर जखन ओ बाटपर चलैत रहैथ त अबाज अएलै–“माय गे मरिगेली .....। ” बड जोरसँ ओ अबाज जे अएले सें सोचियोकऽ डर लागिसकैय । डाक्टर अबाज आएल दिश दौड़ला । घरमे पैसिकऽ देखलखिन त एकटा बाह्–तेह् कर्षक बच्चा पेट पकरिकऽ कनैत रहै । ओ एमहर–ओमहर सगरो तकलखिन मुदा शियान ओतऽ केओ नहि रहै । ताबते मधिम–मधिम खोकीके अबाज सुनाय पड़लै । ई सुनिकऽ ओ अबाज लगौलखिन “घरमे के छी ?” केश बगराके खोता सन रखने एकटा बुढ़िया अएलै त डाक्टर साहेब एकटा गिलासमे पानि लाबिदेबऽलेल कहलखिन । बुढ़िया पानि लाबिकऽ देलकै । एकटा गोटी ओहि बच्चाके ओहि पानि संगे खुवेलखिन । पाँच–सात मिनटके बाद ओ ठिक भऽगेलै । फेर ओतऽसँ ओ बिदा भेला । साँझमे ओ जखन अपन घर पहुँचलखिन त ओ टुगरी बड़ सुनरि भानस बनाकऽ धएने रहै । ओ हाथ–पएर धोकऽ भोजन करऽ लेल बैसिगेलखिन । ओ चिन्तिते अवस्थामे भोजन कऽकऽ आराम करऽ गेलखिन । हुनका निने नहि परैन । दिनमे जाँच कएल बिमारीसभ हुनक नजरिके सामने घुमैत रहैन । आ, एकहि दिनमे एकहि परिवारक चारि–चारिगोटेके मृत्यु । ओ एहि बिमारीसभक बारेके सोंचऽलगलखिन ।
बिमारी किछु नव किशिमक भेटल रहैक । किछु जल्दिसँ करऽके अवस्था नहि रहैक किया त ओहि गामसँ शहर धरि पहुँचऽलेल कमसँ कम पन्द्र घण्टा चलऽपरै । ओतऽ नहि त प्याथोलोजिक समानरहै जे किछु जाँच कएल जएतै । बिमारीसभक बारेमे सोचैत–सोचैत, ओतै बोरा पर सुतल ओहि बचियासँ पुछलखिन–“बौआ, नाम कि छो तोहर ? ” ओकरो निन त नहिए पड़ैत रहै, ते ओ उठिकऽ बैसिगेली आ जबाब देली –“जी हमर नाम सेहन्ता अछि । ” ओ फेर पुछलखिन–“ तोहर माय–बाबुके कि होइत छलौ ? ” सेहन्ता हुनका पएरलग जाकऽ बैसिगेली आ गम्भिर भऽ कहऽलगली–“ किछो नहि ......, करिब डेढ़ दू महिना पहिने बहुते लोक सभ बन्दुक लऽकऽ अएलै आ सभके घरे–घर लोकसभके कहै काज करऽ जाएला ।.....जे नइ जाइ ओकरा धमकी दै जे नहि जएतै ओ घिसरी काटिकऽ मरतै । .......बहुतो लोक त ओकरा सभसंगे चलिगेलै मुदा किछु लोक जाएके लेल तैयार नहि भेलै । सभगोटेके चलिगेलाक बाद एकटा आदमी एकटा बम फेकलकै जाहिके आबाजसँ बहुते घर टुटिगेलै आ छ–सात दिन धरि अन्हारे रहै । एतऽके लोक सभके श्वासलेबऽमे सेहो दिक्कत होइ । एतऽ एकहिटा ईनार छै जतऽके पानि सभ पिबैछै ओहूमे किछु खसादेलकै । .........एतऽ पानिके लेल आओर ब्यवस्था नहि छैक । ” एते बात कहिकऽ ओ बच्चा लगलै डाक्टर बाबुके पएर जाँतऽ ।
पएर जाँतब देखकऽ ओ सेहो उठिकऽ बैसिगेलाह आ कहलखिन “ जो तहूँ सुतऽ । ” ओ बच्चा फेर ओहि बोरापर सुतऽ चलिगेली । भोरमे सबेरे उठिकऽ एकटा आदमीके चिठ्ठी दऽकऽ स्वास्थ मन्त्रालय पठौलखिन । आ संगहि किछु दबाई आ गैससभ सेहो पठादेबऽलेल ओहि चिठ्ठीमे लिखलनि । ओकरा बिदा कएला बाद हुनका जे किछु टोल छुटिगेल छलनि ओमहर बिदा भेला ।
साँझमे जखन ओ सूचि उल्टाकऽ देखलनि त किछु बच्चा मात्र एहन छलै जेकरा कोनो प्रकारक रोग नहि लागल छलैक । आ, एकटा बात निश्चित रहै
जे रोगीसभ मरबेटा करतै आओर कोनो उपाय नहि रहै । रोगीक श्वाससँ फैलऽवाला रोगक नियंत्रन बड़ कठिन माय ओकरा सभके मरनाइए उचित बुझि ओ अपन झोरासँ बिषक सूइ निकाललैथ । आ, पहिने तैयार कएल सूचिके देखिकऽ फेर एकटा नव सूचि तैयार कएलनि जे केकरा –केकरा बिषक सुई देबाक अछि ।
प्रातः फेर ओ आओर दिन जकाँ बिमारीक देखभाल करऽ बिदाभेलखिन । मुदा ओइ दिन हुनका छटपटाति मुर्दाके मुक्ति देबऽके छलनि । आ, साँझ धरि ओ करिब अस्सिगोटेके मुक्ति दऽदेलखिन ।
साँझखन जखन ओ निबासस्थान फिर्ता अएलथि त सेहन्ता भोजन बनाकऽ हुनके बाट तकैत छली । ओ झटसँ झोरा धऽकऽ हाथ पएर धोकऽ भोजन करऽलेल बैसिगेलखिन । सेहन्ता भोजन लाबिकऽ देलकै मुदा भोजन करऽसँ पहिने हुनका उल्टी होबऽलगलनि । पेट–माथ सभमे दर्द सेहो होबऽलगलनि । ओना हुनको ओहे बिमारीक लक्षण छलनि मुदा ओ अपनेसँ बिषक सूइ त नहि न लऽसकैछलथि ।
राति भरि दर्दसँ छटपटाति, बोकरैत । मात्र तिन पहरके राति कतेको बर्ष जका अनुभव होइ । भोरमे करिब नौ बजे बहुते डाक्टर, नर्स आ पुलिससभ सेहो अएलै । डाक्टर आ नर्ससभ पहिने डाक्टर मुरली प्रसाद शर्माके देखभाल कएलखिन । हुनका निशाक सूइ दऽकऽ मात्र आराम भेटलनि ।
दोसर दिश पुलिससभके गाममे ई समाचार भेटलनि जे डाक्टरसाहेब काल्हिखन जिनका–जिनका सूइ देलखिन ओ सभ मरिगेलै । माय पुलिससभ हुनकासँ पुछऽअएलै कि एते लोक एकहिबेरमे केना मरिगेलै । ओ निसंकोच अपन समस्या कहिकऽ कहलखिन–“............माय हम काल्हिखन अस्सिगोटेके बिषक सूइ दऽदेलीऐ । ”
एमहर सेहन्ता डाक्टरबाबुके रातिभरि सेवामे लागलछली । आ, भोरमे जखन ओ पुरा ओछायनपरके बोकरल साफ कऽकऽ बैसली तखने एकटा पुलिस डाक्टरबाबुके कहलकनि–“हम अहाँके हपन हुकुमतमे लैछी । ” ई बात सुनिकऽ ओ जबाब देलखिन–“जँ अहाँके उचित लगैय त हम तैयारछी । ओ फेर कहलखिन – “अपन आवलोकन सभगोटेके समझादैछी आ एकटा बात आओर किछु बच्चा छै जेकरा कोनो रोग नहिछैक ते ओकरा सभके सेहो लऽचलऽके ब्यवस्था सेहो करु । ” सूचिअनुसार रोग नहि लागल बच्चासभके लेबऽ किछु पुलिससभ गेल । आ एमहर डाक्टर बाबु लगलखिन सभके अपन आबलोकन सम्झाबऽ । ओमहरसँ जखन ओसभ निरोग बच्चासभके लऽकऽ आबिगेलखिन तखन धरि हिनको काज समाप्त भऽगेल छलनि । तखन ओ कहलखिन –“आब चलि सकैछी । ”
दशगोटे पुलिस, बच्चासभ आ डाक्टरसाहेब ओतऽसँ बिदा भेलथि । थाकल बच्चासभके पुलिससभसेहो कोरामे उठाकऽ शहर तक पहुचौलैथ । रातिके दश बाजिगेल छलै माय बच्चासभ संगे डाक्टरबाबुके सेहो थानामे राखऽके ब्यब्स्था कएलगेलै । डाक्टरबाबु त गल्ति बड नमहर कएनेछलाह किया त जियाबऽ लेल पठाओलगेल छलनि मुदा ओ ..........., माय हुनका भोरमे अदालत मे उपस्थित कराओल गेलनि ।
अदालतमे हुनकासँ पुछलगेलनि –“डा. मुरली प्रसाद शर्मा, अहाँ एना किए कैलीऐ ? ” ओे किछु देर चुप भेलखिन तखन फेर जबाब दैत कहलखिन–“आइ तक हमर एस.एल.सी.के रेकर्ड केओ नहि तोरऽसकल अछि । तइयो बाबुजीके बड मेहनति करऽ परलनि हमर रुशमे एम.बि.बि.एसके लेल । आइ.एससी सँ एम.डी धरि टौप कऽकऽ पि.एचडी.मे स्वर्णपदकसँ विश्वबिद्यालय सम्मान कएने रहे । बहुतो अस्पतालसँ प्रस्ताव सेहो आएल मुदा हमर सोंच ई छल जे हमरा सनके डाक्टरके हमरा देशमे आवश्यक्ता अछि । सायद माय हमरा अबिते ओतऽ पठादेलगेल जतऽ पन्द्र घण्टा चलिकऽ पहुचऽपरैछैक । ......हम ओतऽ गेलहुँ ईलाज करऽ, ठिक छै , ईलाज कऽदेबै, मुदा जतऽ खाएके लेल रोटीयो नहि छैक ओतऽ दबाइ कतऽसँ अएतै । ......सरकारके सुरक्षामे खर्च करऽसँ फुरसते नहिछै आ, दबाइ त दूर जाउक ......... ओकरासभके एहन रोग छै जे एकटासँ दोसरके आ दोसरसँ तेसरके होइतजएतै । आ, धिरे–धिरे ओइ श्म्सानमे के बाँकि रहत......? ”
एते सुनिलेलाक बाद, न्यायधिस डाक्टरके प्रमाण–पत्र रद्द कऽदेबऽके फैसला सुनौलखिन । न्यायधिसक फैसला सुनिते हुनका मुँहसँ गाउज निकलऽलगलनि । ओ बेहोस भऽ खसिपरला । जाबे लोक दौड़े– दौड़े ताबे ओ ई देश नहि दुनियासँ बिदा भऽगेलाह ।

सिपाही- सन्तोष मिश्र,काठमाण्डू

“लोक कि कहैत हायत, जे बेटीके दुरागमन भेला एक वर्ष भऽगेलै मुदा नैहर सँ केओ नहि गेलै ................. एकटा बेटा अछियो त देशक भक्त ।...... बेटियो कि सोचैत हायत ।” ई बात सन्तोषक माय सोचिते रहैक की ताबते सन्तोष हाथसँ झोड़ा निचा रखैत पैर छुकऽप्रणाम कएलकै । सन्तोषक माय ओकरा मुँहपर ताकिकऽ कहैछ “बौआ रे ........... तोरे बारेमे सोचैछलहु ।”
ई सुनिकऽ सन्तोष हसऽ लगलै आ कहलकै “एह, माय तहुँ कि नहि .......।”
एते बजीते जखन सन्तोष अपन मायके मूहँपर तकलकै त आँखिमे नोर नजड़ि परलै ताहि बातपर ध्यान बिना देनहि कहलकै– “अच्छा, माय ..... चल हमरा बड जोरसँ भुख लागिगेल अछि ।”
माय भितर जाकऽ जाबे नास्ता लबैक ताबे सन्तोष कलपर जाकऽ हाथपएर धोकऽ बैस गेल रहै । माय चुरा आ दही लऽकऽ सन्तोषके देलखिन आ ओ खायलगलै । माय सेहो सन्तोषक कातमे बैसिकऽ कहलीह “हो, तहुँ निके समयपर अएलेह..... काल्हिखन सुकराति छै...........तो एतऽ सँ परसु भोजन कैलाक वाद बहिन गाम जाकऽ नौत लेबऽ चलिजो ।” बहिनगाम जएबाक नामपर सन्तोष खुस होइय आ सोचऽ लगैय अपन ओझाक पिसियौत बहिनके बारेमे जे दुरागमनमे भेटल रहैक । ओना दुनुके टोका चाली त भेल नहिए रहैक मुदा ताकाताकी खुब भेल रहैक । ओ रहबो करै एते सून्दर जे किनका नहि एकबेर नजड़ि पड़िजाई त बेर–बेर देखऽ चाहितै ।
सुकराति बड़ निकजका मनौलनि । आ प्रातः भोजन कऽकऽ सन्तोष बहिनगाम जएवाकलेल तैयार भेला । माय एकटा चंगेरीमे किछु खजुरिया, किछु पिरुकिया, आर कि दोन कहाँ दोन धकऽ एक चंगेरी पुरा देलनि । चंगेरी उठाबके चलते सन्तोष कहैछ “एहँ माय, कि धऽ देलही.........हम ओम्हरे मिठाई ललितिऐ ।”
ई छिछ कटनाई देखिक माय कहलीह– “हमरा ई सोचिकऽ दुःख लागल ........जे सबहे सिपाहि छिछकट किया भऽजाइछ ।”
सिपाहिक बारेमे एहन वात सुनिते सन्तोष जल्दिसँ हाथमे चंगेरी उठबैत चलिदैछथि । बाटमे सैनिक बसके चेक (तलाश) करैतरहै छैक । ताही तलाशक क्रममे सन्तोषक जेबसँ एकटा बन्दुकक गोलीके खोका भेटैछनि । सन्तोषके बसमेसँ उतारिक सैनिक सब पुछताछ करऽ लेल लजाइछनि । ओमहर बसक खलासी हुनक समान निचा उतारिकऽ चलिजाइ छैक । जखन सन्तोषसँ काजक बारेमे पुछलजाइ छनि तखन हुनका अपना बारेमे कहवाक मौका भेटैछनि आ कहैछथि “हम एहि देशक सिपाहिमे असई छि........आ ई खोका त हालेमे आतंकवादीसभसँ द्वन्द भेलछल ताही वेरके छै ।” एते वात कहीकऽ ओ अपन परिचय–पत्र देखबैछथि । परिचय–पत्र देखला बाद सैनिक सब हुनका छोडैछनि । बसक समय सेहो समाप्त भऽगेल छलैक । ताहीसँ हुनका चंगेरी माथपर धऽकऽ करिब तिन कोष पएरे चलिक जाए परैछनि । अन्हरिया राति, कच्ची सडक भऽसन्तोष रातिकेँ करिब दश बजे वहिनगाम पहुँचैछथि ।
तखन धरि घरक सब लोक भोजन कऽकऽ आराममे चलि गेलरहै । मात्र ओकर बहिन आंगनमे बरतन मजैत रहै तखने ओ केवार ढकढऽकौलनि ई सुनिकऽ ओ केवार खोलऽ गेलिह । सन्तोषके देखिकऽ बहिन बड खुसी भेलीह किए त हुनको सुनऽ पड़ल रहैछनि “एक साल होबऽ लगलै आ नैहर सँ केओ नहि अएलै । “ओ पुनः भोजन बनाबऽके सुरसार जँ करऽ लगलीह त ओ बहिनके हरान कराबऽ नहि चाहलकै आ कहलकै –‘भोजन कऽ लेने छी मात्र सुतऽके ब्यवस्था कऽदे ।’ हुनका आरामक ब्यवस्था भेलनि ओ आराम करऽ गेलाह ।
भोरमे सन्तोष प्रातः काल उठिक नित्य क्रियामे चलिगेल । नित्य क्रियाक वाद जखन सन्तोष स्नान करऽलेल बाल्टीन लऽकऽ दलानबाला कलपर पहुँचैछथि त नजड़ि पड़लनि हुनक ओझाक पिसियौत बहिनपर जे कल पर कपडा खिचैत छलिह । झुलि–झुलिकऽ कपडा खिचऽके क्रममे हुनक ओढनी निचा खसिपड़ल छलनि जाहिके कारणसँ हुनक गोर आ शिकार करला तानल बन्दुक सनक स्तनपर सन्तोषक नजड़ि पड़िगेलै । ओकर नजरि ओही सुन्दर स्तनपरसँ हटिते नहि रहैक । आ ओ कन्या विना केम्हरो तकैत मात्र अपन कपडा खिचऽ पर ध्यान देनेछलिह । कपडा धोब केँ क्रममे जखन ओ कन्या दोसर कपडा बाल्टीनमेसँ निकालऽलगलीह त सन्तोष पर नजड़ि पड़लनि । हुनका देखिते ओ जल्दीसँ अपन ओढनी सरियबैत कहलिह–“पाहुन, .....नहाय अएलीए ?” प्रश्न सुनिते सन्तोष कन्याक मुहपर तकैत घबराएल जका कहैछथि “....एह, हँ, हँ ।”
“ठिक छै पहिने अहाँ नहालिअ तखन हम कपडा खिचब ।” एते कहिक ओ आँगनदिश चलिगेलीह । सन्तोष नहेलाक वाद जखन आँगन पहुचैय त ओ कन्या सन्तोषक बहिन लग बैसल रहै । सन्तोषकेँ ओतऽ देखिकऽ ओ कन्या पुनः कपडा धोब चलिगेलीह । कन्याक गेलाबाद सन्तोष अपन बहिनसँ पुछलकै “ आँइ गे बहिन ..........ई के छथिन ?” बहिन हँसिकऽ जबाब दैछ “ ई तोरे ओझाक पिसियौत बहिन....... कञ्चन ।” नाम सुनिक सन्तोष बजैछथि “बाह ! एकर मुहसँ सुन्दर त .....एकर नाम छैक ।”
बहिन हसऽ लगैय । सन्तोष पुनः अपना बहिनके आगंनमे देखाक कहैए “जा, अखन धरि आगंनमे अरिपन सेहो नहि देलही ।” बहिन कने खेखैनकऽ कहलिह “कनिके देर रुकिजोनऽ .........कि ?”
“हेतै !” कहिकऽ सन्तोष अशोरापर धएल कुर्शीपर बैसिजाइछथि ।
कनिए समयक वाद कञ्चन पुनः आगंनमे अबैछथि हाथमे भिजल कपडा सँ भरल बाल्टीन आ दोसर हाथमे साबुन रहैछनि । सन्तोष पुनः कञ्चनपर ताकऽ लागैछथि । मुदा कञ्चन के अपन काजसँ मतलब रहैछैक । ओ असगनि पर कपडा पसारिरहल छथि । सन्तोष विचारैत रहैछथि जे कखन कञ्जनसँ परिचय करि । ताबते एकटा बुढिया कञ्चन के अढादैछनि आगंनमे अरिपन धरऽलेल । ओ अरिपन धर लगलीह । ओना त कञ्चन सेहो सन्तोष पर तकित रहैए मुदा एहि किसिमसँ जे केओ बुझ नहि सकै ।
रातिमे भोजन करऽला कञ्चन सन्तोषके बजाबऽ दलानपर पहुचैछथि । सन्तोष दलानपर लालटेमक टिमटिमाइत इजोतमे उपन्यास पढैतरहे मुदा पएरकें पायलक आवाज सुनिते सन्तोष उपन्यास छोड़िक बाहर ताकऽलागल । आ,
कञ्चनके देखिते ओ पूनः मुरी गोतिकऽ पढऽलागल । कञ्चन नजदिक आविक कहैछथि “पाहुन............. चलु भोजन करऽ लेल ।”
उपन्यासपर तकिते सन्तोष कहैय “कनिए देर रुकुने......., कनिके बाँकी छै ।”
कञ्चन ई सुनिकऽ सन्तोषक दहिनाकात बैसजाइय । कञ्चनके वैसैत देखिकऽ ओ मोनेमोन बड खुशी होइय आ सोचैय कि आबो जरुरे बात करबाक मौका भेटत ।
कञ्चन पुनः पुछैय “अच्छा, पाहुन ........कोन उपन्यास अछि ?”
“ई सुस्मीता उपन्यास कें मैथिली अनुवाद छै ।”
ओ पुनः पुछैछथि “आहाँक नाम कि अछि,.... पाहुन ?”
“हमर नाम आहाँके बुझल होएत ।”
“नहि, कहुने ।”
“हमर नाम सन्तोष कुमार झा अछि ।”
“आ शिक्षा ?”
“छोरु, शिक्षा बड कम अछि ।”
“कहुने”
“हम स्नातक प्रथम वर्षमें नामांकन कराक छोड़िदेलहु ।”
कञ्चन फटाफट प्रश्न पुछनेजारहल अछि मुदा सन्तोष प्रश्न करऽबाक हिम्मत जुटाक व्यंग करैत पुछैछथि “ओना .........आहाँक नाम कि अछि, कञ्चनजी ?”
“हमर नाम............।” एतबे कहिते कञ्चन चुप भऽ जाइछ ।
आ दुनुगोटे हँसऽ लगैय । तखन हँसिते दूनु गोटे आंगन दिश प्रस्थान
करैत अछि । सन्तोष भोजन करऽ ला बैसैय । ओत, कञ्चन, ओकर माय आ सन्तोषक दिदी सेहो बैसल रहैछथि । कञ्चनकेँ माय बजैछथि “कि करबै पाहुन, ...............बहिनोइ नोकरी परसँ आयल रहितनि त संगे बैसतनि मुदा...।”
सन्तोष कोनो प्रकारक प्रतिक्रिया नहि व्यक्त करैछथि आ ओ चुप चाप मुरी निहुराकऽ भोजन करैतरहै छै । ताबते बुढ़ी पुनः पुछैछनि “पाहुन, आहाँक विवाह त.......अखन नहि भेल होएत ?”
एते सुनिते सन्तोषके वाजसँ पहिनही हुनक बहिन कहैछथि “नहि त ...... मुदा आब त कर परतै ....... गाँमपर माय असगर भ जाइछथि ।”
सन्तोष भोजन कऽकऽ आराम कर दलानपर चलिजाइछथि । रातिमे सन्तोषक बारेमे कञ्चनक माय सब किछु पुछैछथी मुदा ओ ई त पुछबेनहि करैछथि कि सन्तोष कोन काज करैछथि । सब किछु पुछलाक वाद बड गम्भीरता पूर्वक ओ सन्तोषक बहीनसँ कहैछथि “ए कनिया.......जौ अाँहा पाहुन सँ कञ्चनियाकेँ विवाह करबा दितहु त बड गुन होएत । जे जेना तिलक गनऽ परतैक हम त गनबेकरबैक ।” एमहर कञ्चन अपन विवाहक बारेमे सुनिकऽ खुशी होइय आ रातिमे सन्तोषके बारेमे सपना से हो देखलीह ।
भोरमे सन्तोष अपन गाम जाएलेल तैयार होइए मुदा हुनक बहिन एकदिन रहऽला आदर करैछनि ।” गामपर छठि सेहो अछि ।” कहिकऽ वातकेँ टारैत सन्तोष अपन झोड़ा लऽकऽ निकलैय । कञ्चन हुनका अरियातऽ लेल हातसँ झोड़ा लऽकऽ आगुबढैय । दलान सँ कनिक आगु गेलाक वाद कञ्चन गम्भिरता पूर्वक सन्तोषके कहैय –“आब अपना दुनुकेँ कहिया भेट होएत से ठेकान नहि अछि मुदा माय कहै छलीह जे छठिके परात त भदवा रहैछैक आ तकर बाद बाबुजी अहाँक गाम पहुँचता से ध्यान देबै ?”ऐते कहलाक बाद जे ओकरा अाँखि जे कहैत रहैछै से ओकर मुह कहि नहि पबै ।
माय, ई सुनिक सन्तोष कहैय “देखु ! भगवान की कराबऽ चाहैय । तैयो ठिके छै हम प्रतिक्षा करबनि ।”
कनि आगु चलिक कञ्चन रुकलीह आ कहलीह– “आब आँहा जाउ, .............हम एतै सँ विदा होइछि ।” सन्तोष कनेक मुसैक कञ्चनके हातसँ झोरा लकऽ गम्भीर भऽ जाइछैक आ दुनु एक आपसमे आगु बढैत पाछु तकैत अपन–अपन दिशातर्फ चलिदैछ ।
कञ्चनकेँ माय जखन ओकर बाबुजीलग वियाहक चर्चा करैछथि त बाबुजी सेहो सहमति जनबै छथि । ओना हुनको इच्छा रहैछनि जे बेटीक वियाह नेपालमे करी । ओ पुरा तैयारी भऽ असगरे नेपालक सर्लाही जिल्लाक खैरवा गाम पहुँचैछथि ।
बाटमे एक आदमी माथपर धानक बोझा लऽकऽ अवैत रहैछथि । ओ आदमी आर केओ नहि सन्तोष अपने रहैए ओ सन्तोषके रोकिकऽ पुछैछथि “हे यौ भाइसाहेब .....सन्तोष झाके घर कोन थिकै ?”
सन्तोष झा हुनकापर ताकिक कहैछथि “चललजाए हमरे संग,......कनिके आगा छैक ।” दुनु गोटा चुप्पेचापे कनिक आगुतक चलैय आ पुनः कञ्चनके बाबुजी पुछैछथि “अच्छा, एकटा चिज कहल जाए .......हुनका कतेक जमिन–जत्था हैतनि ?”
“इहे करिब ३ विग्घा जते छैक ।”
कने सोचल जका करैत कहैत छथि “ऐ ... आ सन्तोष कोन काज करैय ।”
“ओ नेपालक पुलिसमें असइ छथि ।”
ओना त ओ असइके अर्थ नहि बुझलनि मुदा पुलिसक अर्थ बुझिगेलाह । आ पुलिसक नाम सुनिते ओ रुकिक कहलनि “भाई साहेब, अपने चललजाय ........हम अबैत छी ।”
माथपर धानक बोझा धएने सन्तोष इहो नहि कहऽ सकल कि सन्तोष ओहे छथि । कञ्चनके बाबूजी ओतै सँ अपन घर फिर्ता भऽ जाइछथि । गाम पहुचिकऽ निराश भ बैसिजाइछथि । कञ्चन बाबुजीके देखिक काकाक अगनासँ माय के बजाबऽ गेलीह । माय जल्दिसँ अबिकऽ कञ्चनके बाबुजी सँ पुछैछथि “कि भेल वात पटल कि नहि ।”
ई सुनिते कञ्चनके बाबुजी आवेशमे आबिजाइछथि आ कहैछथि “जखन भोरे–भोर रेडियो खोलैछि त समाचार मे नेपालके वारेमे सब दिन एक्कहिटा वात सुनैछि फल्ना ठाम माओवादी सिपाहिके द्वन्द भेलैक । फल्ना ठाम एते सिपाहि मरिगेलैक । फल्ना ठामक चौकीमे बम फेक देलकै । मतलब अखनकेँ समयमे सिपाहिके माय कखन निपुत्र भऽ जाएत सिपाहिक कनिया कखन विधवा भजाएत कोनो ठेकान नहि ।”
ओ पित्त सँ थुक घोट लगलनि, आँखिमे नोर भरि जाइछनि आ मन्द स्वरमे पुनः कहलनि –“ए, कञ्चनके माय ! एतेक सम्पत्ति अछि, एते सुन्दर बेटी, कोनो हम अपन बेटी सँ स्नेह नहि करैछी हम बेटी के निक ठाम वियाह करब मुदा नेपालक सिपाहि सँ नहि करब ।”
बाबुजीक एहन बात सुनिकऽ कञ्चन दू–तिन दिन तक खान–पिअन त्यागिक बैसिगेलीह । माय ई वात हुनक बाबुजीकेँ सुनौलीह त ओ बेटीके कतबो सम्झझौलनि मुदा बेटी त वात बुझ्बेनहि करै । ओ मात्र एते कहैछथि “प्रित त किछ नहि देखैछैक ।” ओ बड जीद करऽ लगलीह त हुनक बाबूजी पुनः सन्तोषक घर जाएवाक लेल तैयार होइछथि । ओ पुनः सन्तोषक गाम पहुँचलनि । ओ जखन सन्तोषक दलान पर पहचैछथि त सन्तोष खह् लऽकऽ वैललग जाइत रहथि । कञ्चनके बाबुजी हुनका कहलनि– “सुनलजाय ।”
सन्तोष हाथमे पोआर लेनहि रुकिकऽ हुनकापर ताकिकऽ कहैछथि “जी कहलजाय, ...हम कि सेवा कऽ सकैछि ?”
“अपने सन्तोषजी, छिए कि ?”
“जी ! मुदा अपने ?”
“हमर घर हाटी, हम कञ्चनके.......बाबुजी ।”
सन्तोष खह् आतै छोड़िकऽ हुनक नजदिक अबैछथि आ जल्दी सँ पैर छुकऽ प्रणाम करैत हात पकरिकऽ भितर बैसाबऽ लजाइछथि । सन्तोष आँगन जाकऽ पाहुनके बारेमे अपन माय के कहैय । माय जलपान आदी बनाबमे लागिजाइछथि । माय पाहुनके लेल जखन जलपान लऽकऽ अबैछथि त जलपान खाइत ओ सन्तोषक मायके सुनाकऽ कहैछथि– “हम त सन्तोषक घटक बनिकऽ अएलहु ।”
ई वात सुनिते सन्तोषक मुरी निचा निहुरि जाइछनि आ ओ भितरे भितर एते खुस भऽ जाइछथि जैके केओ नापि नहि सकैय आ नहि त ओइके केओ लेखक लिखऽ सकैय ओ पुनः कहलाह –
“अपने सब जे किछ कहब हम दऽ देव मुदा एकटा आग्रह जे सन्तोषजी के सिपाहि क नोकरी छोड़ऽ पड़तनि बरु ओ गाममे बैसिक व्यापार आदि करौथ जे जेना करऽपरतै हम कऽ देबनि ।”
नोकरी छोड़ऽ के नाम सुनिते सन्तोष सोच लागल– “वाप रे ! जौ एहने सब व्यक्ति भऽ जाइ त देशके कि हालत हेतैक.................. कि हालत हेतै ?”

Tuesday, November 04, 2008

जखन कनिञा भेलखिन बिमार - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

जखन कनिञा भेलखिन बिमार

हँ मैथिलके मात्र कि कहू, एतऽ सब ऐरे–गैरेक बियाह होइते छैक । चाहे ओकर मुँह थुराएल अल्हुवा सन होइक चाहें शिताएल नढ़ियासन । खैर, बियाह त भऽ जाइ छनि मुदा किछु बातक लेल जिनगि भरि सेहन्ता लागले रहि जाइ छनि । मोनमे बेर–बेर होइत रहै छनि –

‘हमरो एहन होइत....’

मुदा कि ? भाग्य अप्पन–अप्पन । ठिक ओहिना, हमरो बियाहक एते बर्ष बित गेल । मुदा .......। संगीसभ भेट हुए त सब अप्पन–अप्पन कनिञाक बिमार होबऽ बला खबरि बैसख्खा घेरा जकाँ मूँह बनाकऽ सुनाबऽ लागै । हमहुँ सेहो बैसख्खा सजिमन सन थुथुर बनिकऽ सुनऽ लागी । कतबो धाहसँ सिद्ध होबऽ के बाते नहि । किए त हमर कनिञा कहियो बिमार पड़बे नहि करथिन्ह । ओ त अपने पहलवान, पुलिसमे असइ रहथिन्ह । संगीसबहक बात सुनिकऽ एकहि बातक सेहन्ता लागए आ मने मने एकहि बात कही-

"रुक ! भगवान एक दिन हमरो दिन सुदिन करथिन्ह , हमरो कनिञा बिमार परथिन्ह ।"

आ, एक दिन भगवान हमर मनक बात सुनि लेलखिन । जखन हम अफिससँ घर अएलहुँ त जुत्ता खोलिते समय मे मधुर–मधुर आवाज आएल –

"माइ गे माइ ....... बाबुहो बाबु’

के मधुर अवाज सुनिकऽ हमर मोन गदगद भऽगेल आ, हम खुसी भऽ जल्दीसँ घरमे पैसलहुँ । आ, हुनकासँ पुछलियनि –

"कि मोन खराब भऽगेल ।"

कुहरैत उठली आ कहली-

"मोन खराब होए दुसमनके, हमरा त पिठमे कि नहि कि भऽ गेल से दुखाइए, यौ ।"

ई बात सुनिते हमरा लागल जेना हमरा लौटरी परि गेल । मन त खुसीसँ गदगद भऽगेल। हमहूँ कलाकार, कला प्रस्तुत कऽ कऽ ई जरुर अनुभव करा देलियनि जे हम दुःखी भऽ गेली । आ, दुःखी मुद्रामे कहलियनि –

"कोनो निक डाक्टरसँ जचाँ लेव त......?"

ओ कुहरैत हमरा मुहँ पर ताकि बजलिह –

"डाक्टरके घरेमे बजा लेब त नहि होएत ?"

घरमे त डाक्टरके बजालेब ..... ठिके छैक, एकटा डाक्टरके नंम्बर त डायरीमे अछि हुनके बजा लै छियनि । फोन डाएल कएल मुदा फोनक लाइन त कटल छलैक । एकटा डाक्टरक लाइन कटल देखकऽ किछु नहि फुराएल । हम चुप्पेचाप किछु देर धरि ओतै बैसल रहि गेलहुँ ओ हमरा बैसल देखकऽ कने झसकिकऽ कहली–

"सुनै नै छी, जल्दी जाउ न, ............नहि त हम मरि जाएब ।"

ई सुनिकऽ हम आओर हर्षित भऽ गेलहुँ, मुदा कि करु ओहन शुभ दिन अप्पन भागमे कहाँ लिखल छैक ? हम त खुसी भऽकऽ सोचऽ लगलहुँ जे बात किछु आओर रोचक भऽ जएतै जखन हम अप्पन संगी सभके ई खुसीक खबरि सुनएबै । ताबते जेना केओ अनचेकेमे लुत्ती सटा देए तेहने आवाज आएल –

"कथि मुँह तकै छी......जलदीसँ जाउने आ सप्तरीवाला डा. रोबिन मिश्रके टिचिङ्गसँ बजौने आउ ।"

हम कहलियनि –

"हँ, हँ हम तुरत्त गेली आ अएली ।" कहऽ लेल त एते कहि देलियनि ।

बाबूजी कहै छलखिन–

"बचने किए दरिद्रता ।"

मुदा मोन तऽ गदगदाकऽ फटकार लगौलक–

"डाक्टर त बादमे पहिने संगी सबके खुसीक खबरि त सुना दिऐ ।"

आंगनसँ जखन बाट पर अएलहूँ त सोंचऽ लगलहुँ –

"केम्हर जाउ ... एम्हर कि ओम्हर ....."

हम त बड़ मुसकिलमे पड़ि गेलहुँ जे आखिर केम्हर जाउ ? खैर, एक बेर ओकरो बकैस दै छी .... पहिने डाक्टरेके बजा दै छी । बिभिन्न बात सभ कल्पना करैत जखन डाक्टरक घरपर पहुचलहुँ त ओ घरे पर रहथि । ओ हमरा देखिते पुछलैथ –

"कि होइए कहू ?"

हुनका जखन सभ किछु कहलियनि त हुनको जेना लौटरी परि गेलन्हि तहिना ओ अप्पन झोड़ा लऽकऽ हमरोसँ आगु–आगु दौरय लगलैथ किए त काज त भेटबे नहि करै छनि । कारण ई कि डाक्टर सबहक पेटपर लात मारनिहार बाबा रामदेब जे जिबते छथि । हम हुनकर सर्ट पकड़िकऽ तनैत कहलियनि –

"हे भाइसाहेब, बिमारी कोनो खासे सिरियस नहि छैक ....... कने आरामसँ चलु ।"

हमहुँ मोट आदमी,ओते जल्दी चलब आ कहुँ हम अपने बिमार पड़ि गेली त कि होएत ? ..... मोनक ललसा कहियो पुरा नहि होएत । डाक्टर संगे जखन घर पहुँचलहुँ त देखै छी पड़ोसी सभमे केओ भरि–भरि गिलास चाहे लऽ कऽ बैसल त केओ भन्सा घरसँ अबैत । हाल–चाल पुछनिहारके आदर–भाव देखकऽ किछु नहि फुराए । किनका रोकियनि आ किए रोकियनि ? भगवान बहुत दिन बाद ई मौका देखऽ देलनि अछि । एकटा कहबी छैक–

"खुसी बटलासँ बढ़ै छै ।"

डाक्टर साहेब रोगीके खुब निक जकाँ तकलनि मुदा रोगी त भेटऽके बाते नहि, किए त रोगी आह–उह, गे माय गे माय, उहुहु’ करैत चाह बनाबऽपर लागल रहथिन । ओना सच्च जौ कहऽ पड़े त एते परोशी सभ हमरा बियाहमे सेहो नहि आएल रहथिन । नहि जानि ई किए ? माय त हमर नंगटीनी नहि छथि ............. मुदा कनिञा सूनरि जरुर छथि । ताबते एकटा परोशी बाजल –

"कि रे घनचक्कर दास ! आइ सबेरे चलि आएल छे ?"

मोनेमन सोचलहुँ सबेरे नहि आएल रहितहुँ त तोरा सन चोट्टासँ केना भेटघाट होइत । सरबा रहे हमरे कनिञा लग सटिकऽ बैसल । माय हमर मुँह दुसैत कहलनि–

" हँ, आई एहि घनचक्कर दासके तकदीरमे चक्कर लगाबऽके लिखल छैक त कि करौक ?"

एते दुःखीक अभिनय करैत बाजल आवाज सुनिकऽ ओ बाजल –

"मुदा , अहाँ एना किए बजैछी ?"

चोट्टा, सायद ई बुझि गेल जे हमर शुभश्री मुँहसँ ओकरे लेल आर्शीवाद निकलैए । खैर, हमरा त अप्पन कनिञाके जनाबऽके छल, ते हम अप्पन खुसीके मगरकच्छके नोरमे भिजाकऽ कहलीए–

"किए नहि बाजु, आइ हमर प्राण प्रिय बिमार भऽगेली ।"

चाहक घुट लऽकऽ लोल चटपटऽबैत फेर पुछलक–

"ई केना भेलै ? कहियासँ ? किया भऽगेलै ?"

गुरुजी बेर–बेर कहै छलखिन–

"प्राक्टीस मेक्स परफेक्ट द मैन ।"

एहि प्रश्नसँ हमरो पूर्णता आबि सकैय ते हम कला प्रस्तुत करैत जबाब देलीए–

"अरे, जखने हम अफिससँ अएलहुँ कि .....................।"

बात पूरा भेलो नहि रहे कि एकटा परोशी बिचेमे बाजल –

"लिअ सर हम जाइछी ।"

ओकरा जाइत देखिकऽ हमरो मोन अपनामे पूर्णता आबऽके अनुभव कैलक ताहि कारण ओ भाइ साहेब एतऽसँ बिदा भेलथि । सबहे दिन एकर सबहक बात सुनिकऽ हमहुँ थाकि गेल रहि । आब मुदा तराजुक दूनु पलरा बराबर भऽ गेलै । ताबे डाक्टरसाहेब जोरसँ कहलखिन –

"कहाँ गेली .... ई दबाई कने जल्दीसँ लाबिकऽ दिअ ......साँझ धरि सभ ठिक भऽ जएतै ।"

डाक्टरसाहेबक बात सुनिकऽ हमरा मुँहसँ निकलिगेल –

"कोनो जल्दी थोरहे छै ।"

ताबते चाहक चुस्की लैत परोशनी बाजलीह–

"देर करब उचित नहि ।"

हमहुँ ओकरे आबाज निकालिकऽ मुँह दुसैत कहलिऐ –

"हमर कहबाक मतलब छल जे दू मिनट आराम कऽ लै छी ।"

एते कहिते ओ कप टनटनऽबैत निचा राखिकऽ- "हुँह" कहलीह आ बिदा भऽगेलीह । कनिञा त पलंगपरसँ जेना हमरा घोटि जएती तेना परल परल देखऽ लगली । हम दबाइ लेबऽ बिदा भेलहुँ । हमरा ओम्हरसँ अबिते गामबाली दाइ पुछलखिन–

"कनिञा, मोन केहन बुझाइए ?"

हँ एहनेके छुछ दुलार कहै छै । नकारात्मक संकेत करैत ओ मुरी हिलऽएली । मतलब साफ रहै-

"ठिक नहि अछि ।"

कनिञाके कुहरैत छटपटाति देखिकऽ मजा लैत रही । ताबते हमर परम मित्र रंजित पहुँचि गेल । चारु दिश ताकिकऽ ओ पुछलक–

"कि भेलै भौजीके रे ? केओ जे ई प्रश्न पुछए त मोन त गदगद भऽ जाए । मुदा ओतै रही । आ, ओहुना पुलिस सभके मुँह आ हाथ दूनु छुटल रहै छै । माय हम सुखाएल भन्टासन मुह बनाकऽ कहलनि–

"बिमार भऽगेली रे हे"

आ जाबे किछु बाजे ताबे ओकर हाथ पकरि कऽ बाहर लऽ गेलीए । ओ हमर हाथ छोराकऽ पुछलक –

"डाक्टर कोन बिमारी कहलकै ?"

हमरा ओकरासँ कोनो बात करऽके मोन नहि करे माय। हम कहलीए–

"रे हमरा याद त नहि अछि कथि दोन संस्कृतमे कहने छलैए ।"

ओ पिताकऽ बाजल–

"केना नहि बिसरबे ............ तोरा त ध्यान रहै छौ रिसेप्सनिष्ट छौरीपर ।"

हम चारु दिश ताकि कऽ कहलीए –

"चुप..चुप ।"

कने देर चुप भेला बाद, मोनक बात निकलि गेल । ओहुना बहुत देरसँ मोनमे छटपट्टी रहे जे ई बात ककरा सुनाउ । ते ओकरा सुनाबऽ लगलीए–

"सच्च पुछैछे त रंजित भाइ, दबाइ किनलाक बादो मोन होइ छल जे फेकदी । कहुँ ओ चोट्टी ठिक नहि भऽ जाए ।"

एते बतियाति जहिना घरमे पैसलहुँ त ओकर बड़का भैया पलंगपर बैसिकऽ परौठा आ भुजीयाक प्लेट हाथमे लेने बकरी जकाँ पाउज करैत रहे । हम ई देखि कऽ थकमका गेलहुँ, आखिर ओ साहबनी गेली कतऽ ? ताबते पाछुसँ हमरा डाड़पर एक छोलनी लागल, छोलनी धिपल सेहो रहै । हम छिलमिलाइते बाहर भगलहुँ आ आब मात्र प्रतिक्षा करऽ लगलहुँ कि ओ अफिस कखन जएतीह ।

Saturday, November 01, 2008

कारी पौलनि करिखा- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

कारी पौलनि करिखा

भोगेन्द्रजी अपन गामक आंगुर पर गनाए बला धनीक मे सँ छथि । ओना त भोगेन्द्रजी बेशी पढला–लिखला नहि मुदा अपन दुनु पुत्र सुबोध आ विनोदकेँ एम. ए. तक पहुचैलनि । भोगेन्द्रजीक पुत्री आशा जखन आइ.ए. पास कऽ लेलनि तकर बाद हुनका लेल बर तकाय लगलनि। वर भेटलनि । गामक धनिक आ बि.ए. अनर्स कैल बरक माँग भेलनि तीन लाख पचहत्तर हजार भा.रु. । बड धुमधाम सँ विवाह भेलैक आ साते दिनपर विदागरी सेहो ।
आशाक स्वभाव आ विचारकेँ बारेमे जते वर्णन कैल जाए कमे रहत । आशाक स्वभाव सँ सब गोटे बड खुसी रहथि । समय वितैत गेल । आशाक गर्भ सँ एकटा पुत्रीक जन्म भेलैक । आशाक बर (बलराम) के कनिको अपनेसँ किछु अर्जन करय के चिन्ते नइ । पाईके जौं जरुरी बुझाय तँ गहना त छलैहे । भोर आ साँझ बिना दारुके नहि रहऽ वाला बलरामकेँ आशा कते सम्झा वुझाकऽ किछ अर्जन करबाक हेतु धनवाद पठौली । करिब डेढ महिनाक वाद बलराम गाम अएलाह । अगहन मास रहैक । दौनी, कटनी सब सेहो करबा के छलैक । मुदा एको सप्ताह नहि वितलै । बलराम तैयार भेलाह फेरु जएवाक लेल । आ आशाके सेहो चलए लेल कहलनि । बलरामकेँ बाबुजी घरक काजक बारेमे कते समझौलनि मुदा बलराम किछु मानऽ लेल तैयार नइं भेलाह । अन्ततः आशाके जाएबाक लेल तैयार होबहे परलनि ।

तीने दिन बितल रहैक बलरामकेँ गेला । चारिटा पुलिस सबसँ पुछैत रहैक बलरामक घरक बारेमे । ओमहर सँ अपन गम्छा मे तरकारी बन्हने बलरामक बाबुजी अवैत रहथि । एकटा पुलिश हुनकें सँ बलरामक घरक बारेमे पुछलकनि । बलरामक बाबुजी अपन परिचय देलथि । तखन जा कए ओ पुलिस सब कामेश्वर (बलरामक बाबुजी) के सब बात कहलनि आ ई सब सुनिते ओ लगला छाती–कपार पिटक कानऽ । कनिते–कनिते आँगन अएलाह आ कामेश्वर बाबुकेँ कनैत देखिकऽ घरक सब गोटा लग आबिकऽ सेहो कानय लगलाह । आ कनिते–कनिते बलरामक माय पुछलनि-

“आहाँ किया .......कनै छी ..........?”

कामेश्वर बाबु जवाब देलनि-

“कनियाँ त......... ट्रेनमे पिचा गेलीह ।”

किछ पत्ता लगावक क्रममे ओहि पुलिस सबमे सँ किछु आशाक नैहर गेल । भोगेन्द्र जी सँ भेंटक पूरा घटना बतौलक । ई तँ सुनिते भोगेन्द्रजीक देहमे झुनझुनी भरि गेलनि आ गारा भुकुर सेहो लागि गेलनि । पुलिस भोगेन्द्रजी सँ पुछलक–

“..........आहाकेँ किछ कहवाक अछि ?....... बलराम त थानामे अछि ।”

त भोगेन्द्रजी जवाब देलनि–

“जी .......नहि हमर बेटिए बदमाश छल ।”

आशाकऽ नैहर पहुँचल पुलिस सब आशाक सासुर पहुँचल आ ओ कामेश्वर बाबुकेँ हथकड़ी लगाकऽ गामसँ लऽ गेलनि । गामसँ आगु एकटा बजार छलैक ओत स एकवेर कामेश्वर बाबु फोन कैलनि तँ ओहि पुलिस सबके एकटा आदेश भेटलैक जे ओ हथकड़ी खोलिकऽ इज्जतक संग लऽ जाइथ । पुलिस सब कामेश्वर बाबुकेँ इज्जत सँ थाना लऽ गेलनि ।

थानामे कामेश्वर बाबुक नजरि अपन पोती पर पड़लनि। ओ एक–एकटा कऽ मुरही पात परसँ विछ–विछक खाइत रहैक । कामेश्वर बाबु तुरते दुध मंगवौलनि आ वाद मे वेटालेल सेहो बहुत पाई खर्च कैलनि तखन जा कए हुनक वेटा थाना सँ छुटलनि । कामेश्वर बाबु अपन वेटा, आ पोती दुनुके लऽ कऽ गाम जाइत रहथि । वाटमे एक ठाम जखन ट्रेन रुकलैक तँ कामेश्वर बाबु अपन भेटासँ पुछलनि-

“तोहर .....सर–समान कि भेलौं ?”

बलराम बड सान सँ जबाब देलकै-

“बेचलिया । आ........ गहना नहि दिया तो ट्रेनमे धकेल दिया ।”

कामेश्वर बाबुके ई सुनिक बड दुःख लगलनि आ ओ कहलनि-

“जो ! रे कुपात्र । ......... तु जे मैरते त हम नौहकेश नहि करैबति ।”

गाममे सगरो ई बातक चर्चा भेलै आ अहि बेटाक कारण गामक लोक हिनका–सबकेँ बारि देलनि । लोकसब घृणा करऽ लगलनि ।

एक राति करिब बारह बजे बलराम चिचियाति घर सँ भागल । आ दलानपर अबैत–अबैत ओ बेहोस भऽ खसि पड़ल । हल्ला सुनि कय बलरामक बाबु आ माँ दुनु बाहर निकललनि । अन्हारक कारण सँ किछ सुझबो नहि करै । तावते मे एकटा महिला हाथमे लालटेन लेने, धोघ तनने अवैत रहै छै । इजोत पर बुढा–बुढी अप्पन बेटाकेँ देखलनि आ बेटाक दिस दौड़लनि । बेटा लग पहुँचते अन्हार फेर भ गेलैक । ई देखि कए बलरामक बाबुजी परोसी धामीके बजाब गेलाह । मानवताकेँ प्रथम स्थानपर रखैत ओ धामी अपन कर्तब्य पुरा करऽ अबए छैक । बलरामकेँ देखक धामी भुतक आशंका व्यक्त करैत छैक । तावतेमे फेरु बलराम होसमेँ अवैत छैक आ खुब जोर जोर स हल्ला आ बदमाशी कर लगैछै । हल्ला सुनिकऽपरोसक दु–तिन आदमी आरो अवैत छैक आ बलरामके बान्हिक राखि दैत छैक ।

दु–तीन आदमी सँ बलरामके जचाँबऽ लेल राँची ल जाइत छैक । डाक्टर के कहलापर पागलखानामे बलरामके भर्ना कर परैछनि ।

सुभद्रा- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

सुभद्रा


सुरजक बाबुजीक मरलाक बाद ओकर माँ पागल भऽ गेलैक । बाटपर किछु-किछु बरबड़ाति रहैत छैक । सुरजक बहिन सुभद्रा सँ ओकर भौजी घरक सवटा काज करबऽबैत छैक । घरमे कपडा धोअ सँ लऽकऽ भोजन बनाबऽ तक आ बाहर खेत सँ खरिहान तकके काजकरऽ मे ओ एकोवेर नहि, नहि कहैत छैक । सुरजकेँ व्यपार पेशासँ सम्बन्धित होब केँ कारण सँ फुरसत तँ रहै नहि छनि मुदा जखन ओ घरपर अबैत छथि तँ सुरजक कनिया सुभद्राक बारेमे शिकायत करै छलीह जे उपराग लोक सुनबैयऽ आ से सब कहैत रहैत छलीह ।

एक दिन सुभद्राक सहेलीक दुरागमन रहैत छैक । सुभद्रा सबेरे घरक काज ओरियाकऽ अपनो तैयार होइयऽ । जखन सुभुद्रा दुरागमनमे जाएवाक लेल अपन भौजी सँ कहैय-

“भौजी !.... आजु मंजुक दुरागमन छैक । हम देख जाइत छी।”

भौजी मुँह ऐठकऽ जवाब दैछ-

“कोनो जरुरी नहि......... घरक काजसब करऽकेँ छै ।”

“नहि भौजी,........... हम त जाएब आ,...... घरक काज सब ओरिया लेने छिऐ ।”

“घरक काज जौ भऽ गेल छै त जाकऽ बारीमे पानी पटा दिअ ।”

"मंजुक दुरागमन फेर नहि होयतै । ताहि सँ हम जाइ छी ।”

एते कहिकऽ सुभद्रा आँगन सँ चलि दैअ ।

सुभद्रा त चलि जाइए । मुदा पाछासँ सुभद्राक भौजी कहिते रहि जाइछै–

“नइ छै जाएकेँ, ........सोइचलिअ !!!”

रातिमे जखन सुरज आँगन अबैयऽ त अविते नजरि चुल्हि पर पंरै छनि । ओतय चुल्हि फुटल आ बरतन सब ओङ्गघरायल रहैत छैक । ई देखि कय सुरज अपन कनियाकेँ बजबैत छथि-

“......गामबाली !! गामवाली !!”

सुरजक आवाज सुनिकऽ गामवाली घर सँ कुहरैत निकलैछै । गामवाली के देखि कए सुरज गामवाली सँ पुछैत अछि-

“ई........सब कि छै ? ....हँ.....।”

कुहरैत गामवाली जबाव दैछ “आहाके त किछ बुझले नहि रहययऽ,........ घरक वेटी विगैर गेल आ, आहा चिन्ते नहि करैछी।”

सुरज ई सुनिक फेर पुछैयऽ-

“.............ई अहाँ कि बजैछी ?”

“हँ हँ ईहे कहब कि, सुभद्रा दिनमे चारि-पाँच बेर खेत दिस जाइए । आ आब....... हमरा एना बुझाइए कि सुभद्रा क पेटमे केकरो.......”

ई सुनिक सुरज अपनाके रोक नइ सकैयऽ आ अपन गामवालीकेँ एक थापड़ मारि दैअ ।

फेर गामवाली कानिक कहैयऽ-

“आ.......... ई हे वात पुछली त .......हमरा पर हाथ उठौलक आ चूल्हि फोड़ि देलक ।”

सुरजकेँ अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता लागि जाइत छैक । सुरज घरमे जाकए ओछायन पर बैसिकए लगैयऽ अपन प्रतिष्ठाकेँ बारेमे सोचय । कनिके वेर बाद सुभद्रा सेहो अबैयऽ । कोनो बेशी अबेर नइ भेल रहैछ । सुभद्रा डिवियाक तिलमिलाति इजोतमे भैयाकेँ देखिकय भैया लग जा कय पुछैयऽ–

“कि भेल भैया ?”

सुरज सुभद्राके एक थप्पर मारिकऽ घरमे पठा दैछ । सुरजके अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता लगैछ हरान करऽ कनिक देरक बाद सुरज बाहर चलि जाइय । करिब बारह बजे रातिके बाद सुभद्राक कोठरीक केवार ढकढक होइछै । ई सुनिकऽ सुभद्राक मनमे ई होइछ जे भोजन करऽ लेल भैया जगाबय आएलनि । जखन सुभद्रा केबार खोलैछै कि एकटा मर्द ओकर मुह आ हाथ पकड़ि लै छै । आ फेर दुटा मर्द दुटा लाठी लऽकऽ घेउटके उपर निचा धकऽ दावि दैछै । सुभद्राकऽ घेघीयाति आवाज ओकर मा केँ कानमे परैतछै । । त बुढिया बाहर निकलिक हल्ला करऽ लगैछै-

“बाबु सब हो बाबु सब................हमर बेटीके मारैय हो....बाबु सब ।”

मुदा पागल बुढियाके बात केओ नहि सुनैय । आ, सुभद्राक लाश के सबगोटा नदि किनार लऽकऽ जराबऽ जाइछै ।

नदिपर पहुँचि कए ओहिमे सँ एक आदमी कहैत छैक-

“एकर पेट चिरि कऽ देख । कही...... सुरजा झुठ तँ नहि कहलकौ ।”

सुभद्राके मरला बादो ई सब सुख नहि दै छैक । पेट चिरकऽ देखैछैक । मुदा ओकरा पेटमे खएला खाना छोड़ि कय किछ नई भेटैछै । ओ फेर कहैय-

“साह्,....... वौह के वातपर होतै मरबौने होतै ।”

दोसर कहैय-

“हो........अपनासबके कथी लगैछौ ।”

पहिले वाला आदमी कहैय-

“एकर हाथपैर काटि नदैछी नहि त.....भुत भ हरान करतै ।”

हाथ पैर काटिकऽ ओकरा जरादैत छै । आ, भोर होइत–होइत सुभद्रा नामक इतिहास बनि जाइत अछि । आब ई वात गाम मे एक कान सँ दोसर कान आ दोसर सँ मैदान भ जाइछ । गाममे पुलिस अबैय । सहरजमिनमे ई प्रमाणित सेहो भऽ जाइछ जे सुरज अपन बहिनके मरबौलक। सुरज के अदालत २० वर्षक जेल सजाय दैत अछि ।
सुरजकें जेल गेलाक बाद गामवालीके मनमोजी भऽ जाईछ । जे मनमे अबैछ से करैय ।

सुरजके स्वभाव के कारण सँ १५ वर्षमे बाँकी सजाय माफ भ जाइछ । सुरज अपन गाम पहुँचैत छैक ।ओना समय त बड बदलि गेल रहैछ । गामक ईनार भसि गेल रहैछ । बहुतो गाछ सुखि गेल रहैछ । आ लोक सबहक आदत सेहो ।

अपन आँगनमे पहुचते देखैयऽ घरमे सँऽ एकटा मर्द हसिते निकलैय आ वैके पाछा ओकर गामवाली सेहो । सुरजके देखिते ओ मर्द त टाटके दोग दने भागि जाइयऽ । सुरजके बितल बात अखनो यादे रहैछै जे गामबालीके कहला पर गंगा सन पबित्र बहिनके मारि दैछ । ई सब ध्यानमे अबित सुरज आगनमे धएल हासुल लऽ कऽ अपन गामवाली केँ गरदनि काटिकऽ फेर थाना जा कए हाजिर भऽजाइछै ।

एक कथा स्नेहकें- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक कथा स्नेहकें

नरेशक काका आइ खूब सेन्ट छिटकऽ अपन संगीक बहिनक बियाहमे जाए लेल तैयार भेलाह । ताबते नरेश सेहो ओतऽ पहुँचलाह । काकाकेँ नव कपड़ा आ सेन्टमे देखि कऽ कहलखिन्ह “कि यौ काका आई तऽ बड़ा..........।“

काका पहिने जतऽ कतौ जाइ छलथि नरेशकेँ संगे लऽ कऽ । ताहिसँ ओ नरेशकेँ कहलनि “चलबे तँ.....तहूँ चल,...जो जल्दीसँ तैयार भऽ कऽ चलि आऽ ।

“नरेश बच्चा नहि वरन ओऽ आई.ए. दोसर बर्षमे अध्ययनरत अठारह बर्षक जबान छथि । ओ जल्दीसँ तैयार भऽ कऽ आबि गेलाह, तखन जाऽ कऽ दुनु काका आ भातिज ओतऽ सँ बिदा भेलाह ।

जखन काका भातिज दुनू ओतऽ पहुँचलाह तँ घरबैयाक मोनमे बड आश अएलनि । दुनु गोटाकेँ बिभिन्न काज देबाक क्रममे नरेशकेँ टेन्ट सबहक काजक जिम्मेबारी भेटलनि । नरेश एकटा असल अतिथीक भूमिका निर्वाह करैत टेन्टक सरसमान लाबऽ लेल तैयार भेलाह । ओहि ठाम एकटा पुरान स्र्कोट मोटरसाईकल राखल छलैक । नरेश काकासँ ओहि मोटरसाइकलक लेल कहिते रहथि तावते एकटा हाफ सर्ट आ जीन्स पैन्ट पहिरने ब्यक्ति अएलाह आ कहलनि-

“एह.....धीया-पुता कि मोटरसाईकल चलेतय.....। “

फेर ओ ओहि ठाम राखल पुरना साईकल देखबैत कहलनि-

“वैह....लऽ कऽ चलि जाउ । “

एहन बात सुनि कऽ हुनका मोनमे बड दुःख लगलनि आ ओऽ अपन घर जाकऽ बाबुजीसँ मोटरसाईकल लेबाक काजमे लागि गेलाह ।

बैशाखक महिना, चण्डाल सनक रौदमे टेन्टक सभ काज समाप्त कऽ नरेश आँगन बाला नारियल गाछ लग बनाएल टेन्ट पर कुर्सी पर बैसकऽ किछ सोचैत रहथि । तावते बेबी- जिनकर बिवाह रहनि- ओ हुनकासँ पुछलखिन्ह-

“नरेश.....भोजन केलहुँ कि करब"।


नरेश किछ जबाब नहि देलनि । तखने अचानक हुनक नजरि एकटा कत्थी रंगक कुर्ती–सलबारपर, पैरमे पायल आ खुजल केशबाली लड़की पर पड़लनि । ओ लड़की नरेशकेँ एतेक नीक लगैत छैक जे ओ हुनका सँ बाजऽ लेल ब्याकुल होब लगैत छथि । हुनका मोनमे ईहो भऽ जाइत छनि-

“एकरा संग हम जीवन बिताऽ सकैत छी ।“

तखने लिली अपन भाइक संगे नरेश लग अएलीह आ हुनकर माँ आ बाबुजीके बारेमे पुछय लगलीह । ओ बात तँ लिली संगे करैत रहथि मुदा ध्यान केमहरो दोसर ठाम रहनि । कनिए देरक बाद वैह लड़की एकटा थारीमे चूड़ा, दही, चीनी, आमक अचार, आर मिठाई सब लाबिकऽ नरेशकेँ नास्ता करय लेल दैत छथि ।

नरेश दुनु हाथसँ थारी पकड़ैत कहलनि-

“आहाँ नास्ता....कऽ लेलहुँ ?”

जेना कतेक दिनसँ परिचित रहथि तहिना ओ कहलनि-

“जी नहि ........आब जाइत छी हमहुँ ।”

ओ पुनः जाकऽ तीनटा थारीमे नास्ता लऽ कऽ अएलीह । लिलि, बिक्किकेँ दैत अपनो एतहि खाए लगलीह । नरेश मात्र हुनके पर तकैत रहथि । एकबेर जखन नरेश हुनका पर तकैत रहथि तखने ओ सेहो नरेश पर तकलन्हि हुनका रहल नहि गेलनि आ ओ पुछलनि-

“आहाँक नाम...कि थिक" ?

निसंकोच ओ जबाब देलन्हि-

“हमर नाम.......रुबी अछि ।“

काज सब ओरिया गेल छलैक ताहिसँ ओ बैसल छलाह । लिलि आ नरेशक पहिनहिसँ घरसँ आनजान रहन्हि । लिलि नरेशके कहलनि-

“नरेश........चल सबगोटा हमरा आँगन..........सब गोटा लुडो खेलब ।“

ओत कोनो प्रकारक काज नहि होबऽ कें कारणसँ नरेश, लिलि, बिक्कि आ रुबी चारु गोटे लुडो खेल चललाह । सबगोटे ओतऽ "व्यापारी" खेलऽ लागल, जाहिमे नरेश बैंक बनल । भाग्यसँ कही वा संयोगसँ नरेशक कातमे रुबी बैसल । नरेशकेँ जतऽ पचास देबऽ के रहनि ओतऽ रुबीके पाँच हजार दऽ दैथ आ एकटा टिकटक बदलामे दुटा टिकट । आ एहि खेलऽके समयमे ओ रुबीसँ हुनका बारेमे सब किछ पुछऽ लगलाह । रुबीक एस.एल. सी.क सिम्बल नं. सँ घरक फोन नं. तक । एक बेर खेल समाप्त भेल । दोसर बेरक खेलमे बैंक रुबी बनलीह । रुबी एक के सट्टामे दु कऽकऽ बिक्किके देबऽ लगलीह । रुबीक गलतीकेँ बिक्कि सबकेँ खोलिकऽ देखाऽ दैक । जखन रुबीक काज नरेश पाँच–छ बेर देखलन्हि तँ कहलनि-

“ई तँ एहन दुनिया छैक जेकरा मदति करबय सैह भाला भोकत ।“

अहिके बाद रुबी नरेशकेँ एकटा टिकटक बदला तीनटा आ............। एक बेर त नरेश फेकि देलन्हि मुदा जखन रूबी नरेश पर तकलकै तँ नरेश रुबी कि कहऽ चाहैत अछि से बुझि गेलाह । आ नरेश सभ किछु स्वीकार करय लगलाह।

साँझक करीब छ बजे नरेश अपन घर जाय लेल जुत्ता पहिरैत रहथि, तावते एकटा महिला रुबीकेँ घर जाए लेल कहलन्हि । नरेश आ रुबी संगहि विदा भेलाह ।

बाटमे नरेश पुछलनि-

“.....आहाँक घर.... कोन ठाम अछि”।

बडा सिनेहसँ ओ जबाब देलन्ह “महादेब मन्दिर बाला गल्लीमे”।

किछ आगू बढैत नरेश कहलनि-

“....हम तँ ...अहाँसँ सब किछु पुछलहूँ मुदा ..अहाँ हमरा बारेमे .........”।

बात कटैत ओ कहलन्हि-

“हमरा लिली सभ किछु कहि देलन्हि।”

एते बतियाइतो नरेश रुबीसँ अखनो बाजऽ लेल छटपट करैत छलाह ताबते ओ पुछलन्हि-

“अं.....आहाँके कोनो लड़की साथी अछि ?”

नरेश ब्यंग करिते जबाब देलन्हि-

“हँ ..बहुते ।”

नरेशक जबाब सुनिते रुबी गम्भीर भऽ गेलीह आ पुनः पुछलन्हि-

“हम जे.....बुझि रहलछी .....से हो ?”

ठोही मुस्की आ आखिसँ गम्भीर भऽ नरेश कहलनि-

“हँ......अखन धरि त नहि मुदा आब भऽ जएतै ।”

रुबी अपनामे खुशी भऽ फेर पुछलन्हि-

“कतऽ के छै”।

नरेश जबाब देबऽ मे धुकचुक भऽ कहलन्हि-

“काठमाण्डूक”।

ओ कनिक देर चुप भऽ चलऽ लगलीह, तखन फेर नरेश पुछलनि-

“.......रुबी अहाँकेँ कोनो लड़का साथी अछि ?”

जहिना नरेश कहने रहथि तहिना ओहो कहलन्हि-

“हँ ..बहुते ।”

फेर नरेश सेहो पुछलनि-

“हम जे.....बुझिरहलछी..से हे ?”

“हँ......अखन धरि तँ नहि मुदा आब भऽ जएतै ।”

“कतऽ के छै”

“दिल्लीक”।

दिल्लीके नाम सुनिते नरेशकेँ बुझा गेलनि जे ओ हुनके बात पर ब्यंग करैत छलीह । फेर ओ सब कनिक देर चुपचाप चलल आ फेर नरेश कहलनि-

“ रुबी....जँ हम कोनो लड़कीकेँ कहबै जे हम ओकरा सँ प्रेम करैत छी .....तँ....कि ओ स्वीकार करतीह”।

रुबी मुस्कैत गम्भीरतासँ कहलन्हि-

“हँ ...किया नहि । एकटा लड़कीकेँ अपन वरक लेल जे किछु गुण चाही- सुन्दर, निक स्वभाव–विचार, आदी-इत्यादी सब किछु तँ अछि अहाँमे”।

आब एते बातचीत भेलाक बाद नरेश आब फेर हिम्मत जुटाकऽ एकटा प्रश्न करैत अछि-

“........अहाँ असगरे कोनो लड़काक संग साथ सिनेमा देखने छी?”

बडा गम्भीर भऽ ओ कहलन्हि-

“नहि”।

“.....आ जँ केओ कहत तँ जएबै कि नहि ?"

अहि प्रश्नक जबाब देबऽ लेल रुबीकेँ बड. कठिन पड़लनि आ ओ कहलन्हि-

“ जाएब आ नहि जाएब से तँ संगे चलऽ बाला आदमी पर परै छै“।

एते सुनिकऽ नरेशक छाती कापऽ लगलैक आ ठोढ़ सेहो कापऽ लगलैक मुदा तैयो नरेश कहैछै -

“.........काल्हि ३ बजे वाला शोमे........ नीलम हॉलमे अहाँक प्रतीक्षा करब । हमरा विश्वास अछि जे अहाँ आएब ।”
मूड़ी डोलबैत रुबी कहलन्हि-

“ठीक छै”।

एते बात भेलैक, रुबी अपन घर तक पहुँच गेलीह । दुनु गोटे आपसमे बिदा लैत अपन अपन घर दिस लागल । अखन तँ साँझक सात मात्र बजलैयऽ मुदा नरेशकेँ प्रतिक्षा छैक तँ काल्हुक ३ बजेक । धिरे–धिरे हुनक मोन बेचैन होबऽ लगलनि । ओ कखनो टि.भि.लग आ कखनो कतौ... । बैसले–बैसल नरेशकेँ उचाट जकाँ लगय आ सोंचऽ लगथि जे एतऽ किया बैसल छी । एवं प्रकारे नरेशकेँ खाए, पिबऽ, उठऽ, बैसऽ सभ किछुमे उचाट लागऽ लगलनि।

दोसर दिन नरेश करीब दूइए बजे सिनेमा हॉल पहुँचल । टिकट बिक्री तँ अढाई बजे खुलैत छैक । तखुनका एक–एक मिनट हुनका बझाइन जे एक बर्ष बित रहल अछि आ मनमे एकटा इहो छटपट्टी रहनि जे ओ अएतीह कि नहि । जखन सवा
तीन बाजि गेलैक, मुसराधार पानि सेहो परऽ लगलै तखनो नरेश बाहर जा–जाक देखऽ लगलाह । तीन बाजि गेलैक, मुसराधार पानि सेहो परऽ लगलै, तखनो नरेश बाहर जा–जाकऽ देखऽ लगलाह । घण्टी जहिना बजै, नरेशक छाती आओर तेज धरकय लगैक । जखन तीन-पैतिस भऽ गेलैक, तखन नरेश देखलक जे रुबी पानिमे भीजैत माथ पर ओढनी धएने आबि रहल छथि । ओ जल्दी सँ कूदि कऽ रुबी लग जाइत अछि आ हाथ पकरि कऽ भीतर लऽ जाइयऽ । आ ई दूनु गोटे सिनेमा कम आ एक दोसराकेँ बेशी तकैत रहैअ ।

किछ कालक बाद एकटा गीत शुरु होइछ, नरेश रुबीक हाथ पकरिकऽ कहैछ-

“....रुबी ....हमरा दिश ताकु ने ।”

रुबी हुनका दिश तकैछ तँ ओ कहैत छथि-

“हमरा अहाँसँ प्रेम भऽ गेल“।

ई सुनिकऽ रुबी फेर पर्दा दिश ताकऽ लगैछ । नरेश फेर कहैछ-

"अहाँ हमरा जबाब नहि देब" ।

बडा गम्भीर भऽ रुबी कहैछ-

“हमरा कनीक..........सोचबाक मौका नहि देब.........?”

किछ समय बाद रुबी रुबी नरेशक हाथ पकरिकऽ कहलनि-

“....नरेश हमरा अहाँसँ प्रेम भऽ गेल, हम अहाँ बिन रहि नहि सकैत छी । “

बातो तँ ओतबे हेबाक रहैक । कनिक कालक बाद ओऽ दूनु गोटे सिनेमा हॉलसँ निकललाह आ साँझमे भेट करबाक बात करैत अपन–अपन घर दिस बिदा भेलाह । करीब छ बजे साँझमे नरेश मोटरसाईकल लऽकऽ रुबीसँ भेट कऽ आएल आ तखने जल्दिसँ अपन गाम डेबडीहा चलि देलक। गाम पहुँचैत साँझक साढे-सात बाजि गेल रहैक । ओ अपन माँ लग जाऽ कऽ गम्भीरता पूर्वक बैसि गेल । नरेशकेँ एहन उदास देखि कऽ माँ पुछलन्हि-

“कि बात बेटा, अबेर आबिकऽ, उदास" ?

नरेश माँकें अपन प्रेमक विषयमे कहए गेल रहथि । बड हिम्मत जुटएलाक बाद नरेश कहलनि-

“माँ ...........हमरा प्रेम भऽगेल ऽ”।

माँके कोनो भाँज नहि लगलनि आ पहिने ओ लड़कीक विषयमे पुछलन्हि । आ नरेश सभ किछ कहि गेलाह । तखन माँ कहलन्हि-

“ठीके छैक । मुदा बाबुजीक प्रतिष्ठा बचाकऽ ।”

तकर बाद दूनु गोटाक भेँटघाट आ फोनपर गपशप चलैत रहल । बिवाहक चतुर्थीक रातिमे निमंत्रण परल रहनि । बिना काकाक संग कतहु नहि जाएबाला नरेश निमंत्रणमे असगरे चलि गेलाह । मोनमे ई रहनि जे ओतऽ रुबीसँ गप होयत । एवं प्रकारे नरेश आ रुबी बड लग भऽ जाइ गेलाह । दिन भरिमे बड़ कम तँ १२–१४ बेर फोन पर बात होइन ।

एक बेर अहिना रुबीक माँ नरेशकें रुबी आ सोनीकेँ अंग्रेजी पढाबय लेल कहलन्हि । नरेश पढाबए लगलाह । मुदा दूनु गोटे बिच जे बात होइ ताहि पर सोनीकेँ शंका रहैक । एक महिनाक बाद रुबीक बाबुजी सुर्खेतसँ अएलाह। हुनका रुबीक बारेमे मालुम भेलनि, ओ रुबीक झोराकेँ तलाश कैलनि । हुनका नरेशक लिखल किछु चिठ्ठि भेटलनि । साँझमे रुबी अपन भाईक हाथसँ नरेशक लेल चिट्ठी पठौलन्हि। नरेश ओ पढिकऽ तुरन्ते रुबीक घरपर फोन करैत अछि । फोन रुबीक माँ उठबैतछथि । नरेश रुबीसँ बात करऽके इच्छा व्यक्त करैयऽ मुदा फोन रुबीक हाथ नहि परैत छनि । आ ओऽ नरेशकेँ इहो कहैत छथि जे अहाँ एतय आबि कऽ रुबीक बाबुजीसँ बात कऽ लिअ । ई बात सुनिकऽ नरेश अपन माँके सुनबैयऽ आ रुबीक बाबुजी सँ बात करऽ लेल सेहो जिद्द करैयऽ । करीब १ बजे दिनमे नरेश आ हुनक माँ रुबीक घर जाइत छथि । नरेशक माँके देख कऽ रुबीक बाबुजी कटाक्ष बोली बजैत कहैयऽ-

“...आ....आएलजाए – आएलजाए”। माँ आ सभ गोटे बैसय बाला घरमे जाईत छथि आ नरेश रुबीबाला घरमे । ओतऽ सोनी सेहो पढैत रहैछ । घरमे जाइते नरेशक नजरि रुबीक हाथपर परैत छै । बाहिमे काटल– काटल देखिकऽ नरेश पुछैत छैक-

“ई कि.......हमरा पर भरोसा नहि “ओतऽ बैसल नोकरकेँ बजाकऽ नरेश पत्ती लाबऽलेल कहैछ । रुबी ओकरा मना करैछ । नेकोन एयरक १२ बजे बाला प्लेन सँ भागऽ के बात सेहो रुबी सँ कहलनि। हाथमे पत्ती अपने सँ आनि नरेश अपनो हाथमे खचाखच ६–७ बेर मारैयऽ ताबते नरेशक माँ हुनका बजबैत छथि । नरेश कलपर जाकऽ हाथ धोकऽ अपन माँ लग पहुँचैत छथि। माँ सभ सँ माफी मांग लेल कहैत छथि, नरेश माफी मंगैय मुदा एतेके बादो रुबीक बाबुजी एकैहटा बात कहैत छथि-

“ आब जे सभसँ पहिने लगन अएतै ताहिमे बिबाह करब तँ ठिक छैक, नहि तँ नहि हेतै । “

"ठिक छै हम एकर बाबुजी सँ बात करैछी “। एते कहि नरेश आ हुनक माँ दुनु ओतऽ सँ बिदा भेलाह ।

ओही रातिमे दू–तिन आदमी आबिकऽ नरेशक बाबुजीकेँ कहैछ-

“आहाँ बेटाकेँ सम्हारि लिअ नहि तँ ठीक नहि होएत“ ।

नरेशक बाबुजीकें एहन सुनिकऽ बरदास नहि भेलनि आ ओ कहलनि-

“हे जाउ ! ........हुनको एकहिटा बेटा छनि से याद करा देबै । .....आब आहाँ सभ जा सकैतछी ।”

एते कहिकऽ ओ केवार बन्द कऽलेलन्हि । एवं प्रकारे रुबीसँ नरेशकेँ कोनो प्रकारक बातचित करीब आठ महिना तक नहि होइत छनि ।

फेर नरेशक काठमाण्डू रहबाक बात होइत छैक । मुदा नरेश १०–१५ दिन पर जनकपुर जाइत अबैत रहैयऽ ।


एक दिन नरेश रुबीसँ जेना होइ बाजऽ के छैक, सोचिक निकलैयऽ । भोरमे रुबी गणित बिषयक ट्यूसन पढ. लेल के. झा लग अपन साथी भावना संग जाइत रहैय । अचानक नरेशक घरपर रुबीक फोन अबैत छैक आ रुबी कहैछ-

“बारह बिग्घामे बेरियामे भेट करऽ आउ । “

जखन नरेश ओत पहुचैय त रुबी सम्पूर्ण घटनाक चित्रण करैत कहैत छथि-

“....आब आहाँ जँ हमरा सँ भेट करब त हमर बाबुजी आहाँके जानसँ मरबादेता....से....कृप्या.........।”

मुदा नरेश जनकपुर १०–१५ दिन पर आन जान नहि छोरैय । आ रुबी सँ भेटबाक बात कहीयो दशमीमे, कहियो सुकरातिमे करैत –करैत नरेशके रुबी धोखा दऽ दैत छैक ।
ओना नरेशके मनकें बड चोट पहुचैत छैक, तैयो ओ एकहिटा बात कहैछैक-

“बाहिमे रहू न रहू मोनमे रहलकरु ।”

वाह नरेश !

Saturday, October 25, 2008

पोसपुत (भाग - १) -सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

भवानीशंकरकेँ बुढ़ारीमे पुत्रसोग देखऽ पड़लनि ओहो सबसँ छोट बेटाक । रहि–रहिकऽ ओ बेहोश भऽ जाइछ, किए तँ आओर किछु नहि, मुदा ओते कम समयमे मुसमात पुतहू आ...।... दूटा पोती जाहिमेसँ एकटा दस बर्षक आ दोसर पाँच बर्षक...स‍ंगमे एकटा पोता सेहो छलै, जे दूइयो बर्षक नहि । हम जखन हुनकालग बैसलहुँ तँ ओ कानि–कानि कऽ अप्पन घटना सुनाबऽ लगलथि आ हम एकटा कागजमे नोट करऽ लगलहुँ । ओना ई बात सुनिकऽ ककरो रोंआ ठाढ़ भऽ जएतै, जे ओ आई हमरा लग बैसिकऽ सुना रहल छथि । हुनक अप्पन ओ दिन जे बाबुजी जुवानीएमे घर परिवारसँ मतलब छोरिकऽ धार्मिक क्रियाकलाप अपनौलथि । आ, तिनु भाईकेँ अपने कष्ट कइयो कऽ पोसि–पाइलकऽ निक बाटपर चलऽके सिखौलथि ।

एक दिनक बात छैक– साँझक समय रहै । पुरा अन्हार नइं भेल रहै तै लालटेमक ईजोत सेहो भकइजोत बुझाइ । भवानीशंकरक माय चारु बेटाक संगे बैसिकऽ भानस बनबैत रहथिन । ताबते हुनक दूनु बटिदार जोगिया आ नगिना ‘मलिकिनी– मलिकिनी’ करैत आंगनमे अएलै । एते साँझक समयमे ई सभ कहियो नइ आबऽबाला आदमीके देखिते भवानीशंकरके बुझऽमे चलि अएलै जे पक्का किछु अनिष्ट भेल । हुनक माय सेहो अचरामे हाथ पोछैत बाहर अएली । ताबते भवानीशंकर पुछिदेलखिन –

‘कि रे जोगिया, कि भेलौ ?....आइ बड़ अबेर धरि एमहर घुमि रहल छे ।’

जोगिया मुड़ी निहुरएने पुछलकै–

‘ बड़का मालिक कहाँ छथिन ?’

बहुत दिन भऽगेल छलनि हुनका आंगन अएला । पुरे गौंआके बुझल छलनि जे ओ मन्दिरे पर रहै छथि । आ, आब सभ किछु हुनक पुजापाठ मात्र छनि नहि कि घर–परिवार । माय भवानी कने रोखाइएकऽ कहलखिन–

‘जँ तोरा बड़के मालिकसँ भेटवाक छौ त जो ........पुरे गौंआके बुझल छैहे जे ओ कतऽ रहै छथि, .....पुछिलीहे ।’

एते बाजिकऽ ओ पित्तसँ थुक धोटऽ लगलथि । ई देखकऽ नगिना कने डेराइएकऽ पुछलकै–

‘आइ मालिक पैतिस बिग्घा खेत ओमप्रकाशक हाथे बेचलेलखिन.........से कि कोनो बिशेष छलैक ।’

ई सुनिते त भवानीक देह पित्तसँ काँपऽ लगलनि । किछु देरक बाद ओ माय पर ताकि कऽ कहलखिन–

‘एखन त हुनका कोनो चिजक कम्मी नहि छलनि.....तैयो एना किए ?’

पुरा घरक भार हुनके पर होबऽके कारणसँ माय आ बाँकी तिनू भाइ सब सेहो हुनका इज्जत करनि । सबहे कातपर निक बिचार कैनिहार भवानीपर घरसँ गाम धरि केओ नाखुस नहि रहै छलैक । तैं माय कहलखिन –

"एखन छोड़ि दिअ, काल्हि भोरे मन्दिरपरसँ बजाकऽ पुछबनि ।’

घरक बात बाहर तक नहि पहुँचे से सोचि ओ दूनु बटिदारके कहलखिन–

"अहूँ दूनुगोटे भोजन कऽ लिअ तखन चलि जाएब ।’

ई सुनिते दूनु पोन्ह झारैत उठल आ नगिना बाजल –

"नइं मलकिनी, हमर भनसिया भानस बना लेने हैतै ...... बल्की अपने हमरो सभके बिदा देलजाए ।’

बिदा हेबऽलेल त ओ कहनहि रहथि, माय सकारात्मक मुरी हिलाकऽ कहलखिन –

"ठिके छै ।’

तखन ओ दूनु ओतऽ सँ बिदा भेल । दूनु बटिदारक गेलाक बादो हुनका पित्तसँ भोजन नहि घोटानि। माय ओ हाथ धोकऽ अप्पन कोठरीमे चलि गेलाह । हँ एते बात तँ हमरो कहवाक अछि जे ओ बाबा–दादा वा बाप बड़ नमहर पापी रहैए जे अप्पन बाल–बच्चाक लेल किछु सम्पत्ति नहि मुदा कर्जा जरुर धऽकऽ जाइए । भवानीके एते अवश्य बुझल छलैक जे लोक दू पाइ केनाकऽ कमाइ छैक । कते मेहनति आ कष्ट कऽकऽ लोक किछु अर्जन करैछ । ओहुना जँ ई बुझल नहि रहितनि त सतरह–अठारह बर्षक समयमे एते केना करऽ सकैत । राति भरि निन्न नइं परलनि हुनका, अप्पन बाबूजीक बारेमे सोचैत–सोचैत । ई आठ घण्टाक समय एकटा जुग बनि गेल रहैक । मुदा समयके अप्पन गती होइ छैक । भोरमे जखन कछमछिया बजलै, ओ कोठरीसँ निकलि सबसँ छोट भाइ बिश्वनाथके जगएलन्हि । हुनकर आवाज सुनिकऽ माय सेहो बाहर निकललीह आ प्रश्न कएलन्हि –

"बौआ, कि बात ? सबेरे जागि गेले......... ? कि आइ निन्न नइ परलौ ?’

ओ मायके बातक कानो जबाब नहि देलकै । ताबते बिश्वनाथ सेहो उठिकऽ अएलै आ, अबिते ओकरा कहलखिन–

"जो कुरुर कऽकऽ आ ।’

माय बुझि गेलीह जे ई एखनो धरि पिताएले अछि । माय ओ भवानीक हाथ पकरिकऽ कहलन्हि–

"चल भन्सा घरमे .......... चाह बनबैछी ।’

बिना किछु बजने ओ माय संगे भन्सा घर गेल । माय चाह बनएलीह।भवानी आ बिश्वनाथकेँ चाह दऽकऽ दोसर कोठरीमे सुतल दूनु बेटा छेदिलाल आ ओमप्रकाशकेँ चाह देबऽ चलि गेलीह । चाह दऽकऽ जखन ओ पुनः भन्साघर अएलीह तँ छोटका चाह पी लेने रहै । ओकरा कहलनि –

"जो रे, मन्दिरपरसँ बाबुके बजाकऽ ला गऽ ।’ ओ बाबुके बजाबऽ लेल प्रस्थान कएलनि । ओ जखन मन्दिरपर पहुँचल तँ देखलक जे बाबुजी पुजामे ब्यस्त छथि । ओ मन्दिरक असोरापर बैसिकऽ हुनक प्रतिक्षा करऽ लागल । कर्रीब दू घण्टाक बाद जखन पुजा समाप्त कऽकऽ ओ बाहर निकललाह तँ छोटकाकेँ देखिकऽ आश्र्यमे परिगेलाह । सबसँ पहिने ओकरे हाथक प्रसाद दैत पुछलन्हि–
"कि बात, केम्हर अएले ?’

ओ प्रसाद मुहँमे धरैत, मुँह लटपटबैत जबाब देलकै –

"अहाँके माय आ बड़का भैया बजौलनि अछि ।’

ई सुनिते ओ प्रसादक थारी दोसर पूजारीक हाथमे दैत कहलाह –

"हम कने देरीसँ आएब ।’

एते कहिकऽ ओ छोटकासंगे बिदा भेलाह । मुदा बाट भरि एक्कहिटा बात सोंचैत गेलाह–

"किए बजौलक ?"

आ, सोचिते–सोचिते कखन आंगन पहुचलाह से हुनका पते नहि चललनि । जखन ओ आंगन पहुँचलाह तखने हुनक कनिञा पुछलिह–

"जमिन बेचऽके कोन प्रयोजन छलैय ?’

ओ कनी हँसिएकऽ कहलाह–

"ओना पैतिसे बिगहा बेचलिययए, जाहिसँ अहाँसभके कोनो प्रकारक कष्ट नहि होबऽ के चाहि ......... हम एहि पाइसँ पाठशाला बनाएब, ...... धर्म कर्ममे खर्च करब ...... भन्सा बनि गेल अछि तँ हमरो दिअ...... भुख लागि गेल अछि ।’

भानसमे कने देर रहै तैँ हुनक कनिञा कहलखिन –

"कनिक देर रुकु तरकारी बरकैछै ।’

फेर, भवानी पिताएले मुद्रामे पुछलखनि –

"आब त अहाँके किछु नहि चाहि जँ चाहि त एखने बाजि लिअ........ किए त बाल–बच्चाके कष्ट देब पाप छैक, धर्म नहि ।’

कनिक देर धरि चुप भऽ ओ फेर कहलनि–

"बाहर कतबो पूजा कऽ लिअ, जँ घरक लोक खुशी नहि अछि त अहाँ धर्म, ....... अँह सोचबे नहि करु ।’

बेटाके पिताएल देखिकऽ ओ कने स्थिरेसँ सफाइ दैत कहलाह–

"हमरालग जे अछि ताहिसँ एकटा बिद्यालयके लेल मकान, एकटा पोखरि आ किछु जगेड़ा कोषमे पाइ धऽकऽ समाप्त भऽ जएतै । हमरा भोजन आ अन्य आवश्यकता पुरा करऽलेल अलगसँ पाई चाही ।’

फेर ओ भवानी दिश ताकिकऽ कहलाह –

"तहूँ अठारह बर्षक भेले ..... जे करबे से कर ।"

हुनका आओर किछुके डर नहि मुदा सम्पति बिकएला बाद होबऽबाला बेइज्जतीसँ डर रहै । माय फेर ओ बाबूजीसँ कहलनि –

"अहाँके भोजन एतहि आबिकऽ करऽपरत । आ, खर्च जते महिनाबारी चाही लऽलेब मुदा जमिन नहि बेचु ।"

ताबते भवानीक माय भोजन लकऽ अएली बाबू भोजन कएलनि आ तौनीमे हाथ पोछैत बिदा भऽगेलाह । हुनका बिदा भेलाक बाद भवानीक माय एकटा माटिके चुकिया बाहर लाबिकऽ फोरली आ पाइ उठाकऽ भवानीके गनऽ लेल कहली । भवानी ओ पाइ गनलकै । पाई अठाहृ हजार तिन सय संतानबे रहै । फेर हुनक माय सोनाके पहूँची आ, करिब एक किलोके कसुली दऽकऽ कहली –

"ई तोरा पूजी देलीयौ ..... तों केना करबे ...... कि करबे तोही जान, ...... तोरासँ छोट तिन भाइ सेहो छौ सेहो बुझिले ।’

मायके बातके ध्यानमे रखैत भवानी ई सोचलक जे एहि क्षेत्रमे कि कएलासँ निक होएत आ करिब एक हप्ता घुमफिर कएलाक बाद एहि क्षेत्रमे कपड़ाक दोकान करब उचित बुझि काज सुरु कएलनि । गामसँ कनिके हटिकऽ नेपाल आ भारतक सिमा छैक । साइकिलसँ समान सिमा पारसँ लाबऽ लगलाह । कनिक–कनिक समान लैनिहारके भंसारपर सेहो केओ किछु नहि कहै । लगनसँ काज करैत गेलाह । हुनक भोर चारि बजे आ राति बारह बजेक बाद होइ छलैक । इमान्दारीसँ ब्यापार करऽके कारण गामक प्रायः सबहे आ अराश–परोशक गामक लोक ओकरे लग समान किनै । समय अप्पन गतिसँ चलैत रहलै । सेकेन्ड मिनटमे, मिनट घण्टामे, घण्टा दिनमे, एवं प्रकारे दिन महिनामे आ महिना सालमे परिबर्तन होबऽलगलै । भवानीसँ छोट भाइसब सेहो नमहर भेलै । माझिल भाइ छेदिलाल ईन्जिनियरिङ्ग पढ़ऽलेल बेङ्गकक गेल । छात्र–बृती भेटलै मतलब पढ़ऽमे निक रहै । साझिल भाइ एम.बि.ए.करऽ दिल्ली गेलै आ छोटका बिद्यार्थीए समयसँ नेतगिरी (राजनिति) करऽ लगलै ।भवानीक बियाह भेलै । निक होनहार लड़िका रहै तैं सबहक नजरिमे गरले रहे । माय बियाह धरि निक इज्जतदार घरमे भेलनि ।एहि क्रममे नेपालमे राजनिति परिबर्तनक समय अएलै । २००७ सालमे प्रजातन्त्रक स्थापनाक लेल एकटा जबरदस्त क्रान्ति एकतन्त्रिय राणाशासनक बिरुद्धमे भेलै । द्वितिय बिश्व युद्धके बाद नेपालमे सेहो एसिया आ अप्रिकामे आएल नवजागरणके प्रभाव पड़लै । नेपाली जनतामे स्वतन्त्रताक अनुभूति भेलै आ ओ सब स्वतन्त्रताक लेल आवाज उठाबऽ लागल । जाहि क्रममे गंगालाल, धर्मभत्त, शुत्रराज आ दशरथचन्द्र सन सपूतके मृत्युदण्ड देल गेलै । जाहिसँ जनतामे सेहो एकटा आक्रोशक भावना जागृत भेलै । २००७ साल कार्तिक ११ गते जखन राजा त्रिभुवन शिकारक बहाना बनाकऽ भारतिय राजदुताबासमे जाकऽशरण लेलखिन आ बादमे भारत निर्वासित सेहो भेलखिन । राजा त्रिभुवनके दिल्ली सवारीसँ प्रजातन्त्रक क्रान्तिमे बल पहुँचलै । भारत सरकार द्वारा राणा आ त्रिभुवन बिच समझौताक बातचित चलाओल गेलै । आ, फागुन ४ गते त्रिभुवनके फिर्ति सवारी । फागुन ७ गते शाही
घोषणासँ देशमे एकटा नया भोर भेलै । तत् पश्चात् राणा शासनके मनोमानी खतम भऽ कानूनपूर्ण राज्यक स्थापना भेलै । देशमे किछु परिवर्तन होइक ताहिसँ भवानीशंकरके कोनो मतलव नहि । अप्पन नियमितता कहियो नहि तोरलक । भगवानक इच्छासँ हुनका पाँचटा बेटा आ एकटा बेटी भेलनि । ओतबे निक ब्यापारी छलैथ ओतबे निक बेटा, ओतबे निक पति, ओतबे निक भाइ आ बहुत निक बाप सेहो ।लोक किछु कऽले मुदा नेपालमे राजनितिक स्थिरता आबऽके त नहि । बि।सं. २०१७ साल पुस महिनाक १ गते राजा महेन्द्रद्वारा कोइरालाक मन्त्रिमण्डलके आ संसदके बिघटन कऽकऽ देशक शासन भार अपनेमे लऽलेलक । ताहिके बाद दलसभ प्रतिबन्धित भऽगेलै । नेतासभक भागा–भाग भेलै । बिरोध कैनिहारके बिभिन्न सजाय भेटलै । जाहिमे बिश्वनाथके दश–पन्दरह गोली लगलै । मुदा ओ बाँचिगेल । एमहर छेदीलाल सेहो जखन इन्जिनियरिङ्ग कऽकऽ आबिगेल त हुनका काठमाण्डूक त्रिभुवन अन्तराष्टिय बिमान स्थलमे नोकरी भऽगेलै । ओ सेहो पूर्ण इमन्दारीसँ काज करऽलगलाह ।


क्रमशः

पोसपुत (भाग - २)- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

छेदीलाल जखन अप्पन आमदनी पूर्णरुपसँ देख लेला तखन हुनका अप्पन बड़का भैया प्रति मदति करबाक भावना मोनमे जागृत भेलनि । माय ओ अप्पन भतिजा निरंजनके अपनेसंग राखऽलगलखिन । त्रिचन्द्र कौलेजमे नमांकन सेहो करा देलखिन आ, ओ निकसँ अध्ययननमे लागि गेल। मुदा घरक स्त्रीक कारणसँ मर्दक सब कएल–धएल सभ पानिमे चलि जाइ छैक । सेहे भेलै, छेदीलालक कनिञा निरंजनसँ भोजनक बरतनि धोबऽसँ घर–आंगन सभ किछु करबऽबनि । आ, जखने ओ अप्पन पतिक मोटरसाइकलक अवाज सुनिलैथि त ओछाएनपर जाकऽ सुतिरहै आ कुहरऽ लगै । जखन हुनका डाक्टरलग जचाबऽ लेल कहल जाए त ओ कहथिन –

"एँह, ......... अहिना ठिक भऽजएतै कि ।"

समय एहिना चलैत रहलै । एक दिन किछु बिदेशी हुनका घरपर अएलै आ किछु कागज–पत्र पर हस्ताक्षर कऽकऽ सहमति जना देबऽलेल कहलकै । छेदीलाल बैसकऽ ओहि कागज सबके अध्ययन करऽ लगलाह । ओहिमे पन्द्रह हजारक मसिनके अठारह लाखक बिजक तैयारी कएल गेल रहैक । ई देखिकऽ ओ एहि बातक बिरोध कएलनि । तैं बिरोध करैत देखिकऽ ओ बिदेशी सब हुनका तिन लाख रुपैया दऽकऽ कहलकनि –

"राखू।"।

तैयो ओ हस्ताक्षर नहि कऽ ओकरा सबके डाँटिकऽ भगा देलाह । ओकरा सब मे एकटा आदमी बाजलो रहै –

"तोहर भविष्य कारी छौ ।’

मुदा ओ एहि बातपर ध्यान नहि देलन्हि । आ, करिब एक सप्ताहक बाद एकटा पत्र हुनक नामसँ अएलै जाहिमे हुनकर अवकास पत्र छलैक । एहिके अलाबा भवानीक बेटासबमे एकटा बेटा सतीश होटल मेनेजमेन्ट, बिनोद कमर्स, गोपाल एम.बि.बि.एस करऽ बनारस गेलै । सबसँ छोट बेटा दिनेश पढ़ऽमे बड भुसकौल रहै । कहुना घुसकुनिया काटिकऽ एस.एल.सी. पास कएलकै आ आइ. कम. पढ़िते छोड़ि देलकै । भवानी एकटा निक आ कुशल बाप रहथि तैं धियापुताक जिम्मेबारी निकसँ निर्वाह कएलनि । अप्पन बालबच्चाक बियाहक सम्बन्धमे गोपालक बियाह झंझारपुर, निरंजनक बियाह मोतिहारी, सतिसक बियाह पटना आ बिनोदक बियाह सितामढ़ि कएलनि । मुदा दिनेशक बियाहक बात जखन चलै तखन ओ एक्कहिटा बात कहथि–

"एखनधरि किछु नहि कएलहूँ । किछु आर्जन कऽलैछी तखन बियाह करब ।’

दिनेश अप्पन लगन आ मेहनतिसँ बिभिन्न काजक शुरुवात कएलनि । हुनक कहब छलनि जे एहि दुनियामे कोनो काज खराब नहि होइत अछि, निर्भर करऽके तरिका आ करनिहारके सोंचपर फरक परैछ । जे जते मेहनति करत ओकरा ओतबे फल भेटतै । हुनका आगु जे काज अएलनि ओ छोरलखिन नइ । लकड़ि ढुवानीसँ लऽकऽ सड़क निर्माणक ठेक्का तक हुनका जे काज भेटलनि सबटा लेलनि आ, भाग्य सेहो साथ देलकनि । समयक गति अपने हिसाबसँ चलैत रहलै । गोपालके एकटा बेटी रिना आ दूटा बेटा जँहिमेसँ जेठकाके नाम राजा आ छोटकाके नाम छोटु परलै । दिनेश राजाके बड मानै । ओकर पढ़ाइ–लिखाइसँ लऽकऽ आओर सब किछुपर ओबिचार कऽ देथिन्ह । आ, दिनेश सब दिन एकहि बात कहथिन्ह –

"राजा हमर बेटा छै ।’

एकबेर निरंजन दिनेशक बियाहक प्रस्ताव रखलकै । दिनेशक पएर स्थिर भऽ गेल रहै । ओ अप्पन पएरपर ठाढ़ऽ भऽगेल रहे । तैं ओ बियाहक लेल तैयार भऽ गेलै । निरंजन अपने ससुरारिमे निक आ खानदानी लड़की पिंकी संग बियाह कऽ देलकै । बियाहक बाद त बहुतो लोक स्थिर भऽजाइए । मुदा दिनेशक ब्यापारिक क्रियाकलाप रुकलै नहि । बल्कि आओर तेज भऽ गेलै । सच कहथिन हमर बाबूजी –

"मरदाबा उपजाबे धान त मौगी लक्षणमान ।’

सबहक कहब छलनि जे हुनक कनिञा लक्ष्मीपात्र छथि । एकबेर ओ अप्पन कनिञासँ बिचार कएलनि जे भैयारीमे सबके पूँजी दऽ ब्यापार सञ्चालन कराबऽ परलै । कनिञा सेहो सबहक निक सोचि सकरात्मक जबाब देली । एहि बातपर बिचार कऽकऽ ओ बड़का भैया गोपालके बजाकऽ कहलखिन –

"भाइ, अहाँ कोनो ब्यापार सुरु कऽलिअ ।’

गोपाल कोनो प्रकारक उत्तर नहि देलकै तैं ओ फेर कहलनि –

"अहाँके जाहि क्षेत्रमे ज्ञान अछि ताहि क्षेत्रक ब्यापार करु ........ पूँजी हम देब ।’

ओना सच कही त गोपाल बनारस जाकऽ पढ़ल नहि, नक्कली प्रमाण–पत्र लऽकऽ आएल छलथि । दिनेश हुनका एक सप्ताहक समय दैत कहलखिन –

"एक सप्ताह भितरमे बिचार कऽकऽ कहु अहाँ कि करब ?"

एक सप्ताह ठिकसँ बितलो नहि रहै कि दिनेशलग जाकऽ गोपाल कहलकै–

"हमरा फिल्मके सम्बन्धमे निक ज्ञान अछि तै हम फिल्म डिस्ट्रीब्यूसनके काज करऽचाहैछी ........ मुदा एहि काजक लेल कम सऽ कम तिस लाख रुपैया चाही ।"

आमदनीक बारेमे पुछलापर ओ जबाब देलखिन –

"भाग्य जौ साथ दऽदे त साल भरिमे पूँजी निकलि जाएत ।’

दिनेश तिने–चारि दिनमे तिस लाख रुपैया गोपालके देलखिन आ चेताबनी सेहो देलखिन –

"निकसँ काज करऽब, प्रतिष्ठा नहि खसए ।’

गोपाल शुरुमे बड निकसँ काज कएलनि । मेहनति, लगन आ धैर्यतासँ काज कएलासँ सबके सफलता भेटैत छैक, हुनको भेटलनि । जाहिके देखिकऽ निरंजनके सेहो ब्यापार सञ्चालन करबाक इच्छा भेलनि आ दिनेशलग इच्छा जाहिर कऽकऽ प्रेशवला काजक शुरुवात कएलनि । फिल्मके सम्पूर्ण जिम्मेवारी गोपाल आ प्रेशक जिम्मेवारी निरंजनके सौंपल गेल रहै । साझिल भाइ बिनोदक कनिञा सब दिन बिमारे रहऽके कारणे ओ काठमाण्डूएमे रहिके ब्यवस्था कएलनि । आ ओतै ब्यावसाय करऽ लगलाह । शायद बिष्णु लोकसँ लक्ष्मी आबिकऽ ओहि घरमे बास लऽ लेने छलखिन तैं सबहक ब्यापार निके रहै ।

एक दिन बिनोद अप्पन कनिञाके लऽकऽ डाक्टर लग गेलाह । हुनक कनिञाक बिभिन्न जाँच कएलाक बाद डाक्टर हुनका एकान्तमे बजाकऽ कहलकनि जे हुनक कनिञा कहियो माय नहि बनि सकती । ई सुनिते हुनका पर पहाड़ खसि पड़लनि । जखन ओ डाक्टर लगसँ अएला तखनेसँ ओ त किछु बजबे नहि करथि । हुनक कनिञा हुनकासँ बेर–बेर पुछबो कएलखिन मुदा ओ कोनो प्रकारक जबाब नहि देथिन्ह । ओइ दिन हुनका दिनोमे अन्हार जकाँ महसुस होइत छलनि । ओ घर कटाओन लगै छलनि । मुदा कि ...........। करिब पाँच बजे एकटा झोड़ा लऽकऽ ओ कालीमाटी दिश तरकारी किनऽके बहानासँ निकललाह । किछुए दूर आगू हुनक परम मित्र रामकिशन हुनका भेटलनि । अप्पन मित्रके देखियोकऽ आन दिन जकाँ हुनका चेहरापर मुस्कान नहि अएलनि तैं हुनका बुझऽमे चलि अएलनि जे पक्का कोनो मुस्किलमे अछि । तेँ ओ बिनोदक हाथ पकरिकऽ कहलकै –

"रे, चल दारु पिबै छी"।

दुनू ओतैके भठ्ठिमे गेल आ ब्रिन्चिपर बैसिगेल । काउन्टरपर बैसल युबकके रामकिशन एक बोतल दारु ल्ऽ कऽ आबऽ लेल आदेश देलकै । कनिक देरक बाद एकटा पच्चिस–तिस बर्षक महिला एकटा बोतलमे दारु, दूटा गिलास आ एकटा थारीमे मुरही, दालबुट आओर किछु लाबिकऽ टेबुलपर धऽ देलकै । रामकिशन दूनु गिलासमे दारु धएलकै आ एकटा गिलास अपने उठएलकै आ दोसर मिताके उठाबऽलेल आग्रह करैत ’चियर्स’ कहलकै । दारु पिबऽके क्रममे करिब आठ बजे धरि चलैत रहलै । रामकिशनके त कम मुदा बिनोदके कने बेशिए निशा लागि गेल रहए। तखन मूँह लरबरबैत बिनोद अप्पन मितसँ कहलखिन–

"आइ हमरा डाक्टर कि कहलकऽ से तोरा बुझल छौक ..... नइ होतौ बुझल ........ कैला त तु ओतऽ नहि छलेहऽ ....... आ ओकर बात हमरा सिधा दिलपर लागल । ........ ओ हमरा कहलक जे हमर कनिञा कहियो माय नहि बनिसकैए । ..... ओकरा कहियो बालबच्चा नहि होएतै ।’

एते बाजिकऽ ओ भोकासी पारिकऽ लागल कानऽ । बिनोदके कनैत देखिकऽ रामकिशन ओकरा सम्झाबऽ लागल । अन्ततः ओ सम्झा बुझाकऽ बिनोदके ओकर घर पहुँचाकऽ अप्पन घर दिश चलल । ताहि दिनसँ बिनोद प्रायः सब दिन पिबऽ लागल । एहि बातक चर्चा प्रायः सब दिन घरमे चलै मुदा कारण किनको बुझल नहि छलनि । एक दिन निरंजन, दिनेश आ बिनोदक कनिञा लक्ष्मीसंग बैसकऽ बिनोदके दारु पिबऽके कारण प्रति बिचारबिमर्श करऽलेल बैसल मुदा कारण किनको बुझल नहि छलनि । बिभिन्न बातसभक सम्भावना भऽसकैए कहिकऽ ओ सब चर्चा करैत रहे । ताबते लक्ष्मी बजलिह –

"पहिल दिन दारु पियलमे घर पहुचाबऽ रामकिशन आएल रहै । ...... एहि सम्बन्धमे पूर्ण जानकारी ओकरा होएत ..... ।"

ई बातक बाद दिनेश आ निरंजन दूनु भाइ रामकिशन लग पहुचल । बहुत देरक बिचार-बिमर्शक बाद ओ घटना पूर्ण रुपसँ कहलकै । तखन दूनु भाई ओतऽसँ घुरि आएल । आब बात अएलै समस्याक समाधानके । आखिर कि कएल जाए । दोसर बियाह कऽदेलासँ घरमे मात्र कल्लह बढ़ि जएतै आओर किछु नहि । एहि समस्याक समाधान बड कठिन भऽ गेलै आ जौँ एहिना रहत त भाइसँ हाथ धोबऽ परत । ओ त एकटा आओर नमहर समस्या भऽजाएत । बहुत देर धरि बिचार बिमर्श कएला बाद निरंजन कहलकै –

"हम अप्पन जेठ बेटाके दऽ दै छी ।"

तकर बाद दिनेश कहलकै –

"बेटी चाही त हम अप्पन बेटीके दऽदैछी ।"

आ सेहे भेलै । एकटा पूजाके आयोजना कऽकऽ निरंजन अप्पन आठ बर्षक बेटा आ दिनेश अप्पन तिन महिनाक बेटी सदाकऽ लेल दऽ देलकै । फेर, समय निकसँ चलऽ लगलै । नहि त कोनो कष्ट आ नहि त कोनो झंझट । दिनेश अप्पन बडका भाइके बेटा अभिषेकके बड मानै । ओ अभिषेकके प्रेमसँ राजा कहिकऽ बजाबै । आ ओकरे सभ दिन आगु बढाबऽमे प्रयासरत रहै छलाह । दिनेशक मोनमे रहै जे ओकरा निक बनाबी आ बेटा ओहे बनि जाए । दिनेशक ब्यापार खुब निकसँ चलै । तैं ओ अप्पन ब्यावसायके खुब निकसँ बिस्तार करऽ लेल राजधानीमे कार्यालयक स्थापना कएलनि । जे प्रमुख कार्यालय रहलै आ शाखा कार्यालय सभ बिभिन्न जगह । ब्यापार ओतहू निके गतिमे चलैत रहलै । मुदा काठमाण्डू एकटा खर्चाक प्रमुख बाट सेहो छैक । आ एकटा आओर बात जे लगभग सबहक मुँहसँ सुनैछीऐ–

"काठमाण्डू बाबा पशुपतिनाथक एहन धाम छैक जतऽ निक काज कैनिहारके शरण भेटै छैक आ अधलाह काज कैनिहार जतऽ सँ आएल रहैए ओ ओतहू निकसँ नहि रहऽपबैए ।"

ठिक ओहिना भेलै ओकरा अमृत नामक ब्यत्तिसँ परिचय भेलै । जे बिभिन्न ब्यत्ति सभसँ दिनेशक परिचय करौलकै । एहि क्रममे भारतिय ब्यापारी गुप्ताजीसँ परिचय भेलै आ लगले किछु दिनक बाद सोना–चाँदीक ब्यापारी दिपकसँ परिचय भेलै । सबहक बात बुझि ओ अप्पन कनिञा आ एकटा फेर बेटी भेल रहै ओकरा आ राजाके लऽकऽ काठमाण्डूए चलि आएल । ओ समय, ब्यापारक बड निक समय रहै । बहुतो लोकके इच्छा छलनि जे दिनेशक पार्टनर बनिकऽ काज करी । आ, एहि क्रममे एकटा बिरगंजक ब्यापारी अशोक हुनका लग ब्यापारक लेल प्रस्ताव रखलाह । दिनेश सकरात्मक जबाव देलखिन । मुदा एकटा कहबी छैक –

"सब दिन होत न एक समाना ।"

ब्यापार आओर बिस्तारक क्रममे हुनक किछु साथी सभ सोनाक ब्यापार करऽ लेल हुनका बिचार देलकनि । नाफा त खुब रहै । दिनेश करऽ लेल तैयार भऽ गेल । सोना हङकङसँ अबै आ नेपाल होइत भारत । एक टिपमे दू सँ तिन लाखक बचत । एहि काजमे दिनेश अप्पन टोल परोसक साथी भाइ सभके काज देलखिन । सभके एकबेर–दूबेर हङकङ जएबाक मौका भेट जाइ छलनि । मुदा एकटा कहबी हमर मा हमेशा कहै छलखिन –

"कुकूरके घी नइ पचै छैक ।"

नहि जानि किए नहि पचै छैक । भऽ सकैए ओकरा खाएके लुरि नहि होए । दिनेश ब्यापारसभ देखभाल करऽलेल अप्पन माझिल भाइ निरंजनके जिम्मा दऽ देलक । आ, अपने क्यासिनो आ बिभिन्न जुवाक अड्डासभ घुमऽ लागल । दिनेश एकटा आओर ब्यापार सुरु कएलकै । जखन नेपालमे भ्याट (भेल्यू एडेड टेक्स) बि।सं. २०५२सालमे अएलै आ तकर नियमावली २०५३ क बाद सम्पूर्ण ब्यपारी सभके दर्ता होबऽजाए परलै । ताहि समयमे बहुतो ब्यापारीलग समान त रहै मुदा ओकर बिल त नहि रहै । आन्तरिक राजश्व कार्यालयद्वारा सर्बेक्षण सुरु भेलाक बाद बिलक श्रृजना करब शुरु होबऽ लगलै । ई ब्यापार बड चलै । ओ अप्पन टोलक साथी–भाइसभक नाममे फर्म आ कम्पनी दर्ता कराकऽ बिल बेचब चालू कयलक । आ, आम्दनीसँ क्यासिनो जाएब, दारु पियब आदी–इत्यादि । एहि सन्दर्भमे एकटा संस्कृतमे बड सुन्दर कहबी छैक –

"भाग्यं फलतु सर्वत्रः न च बिद्या न च पौरुषः"

अर्थात एहि दुनियामे जे किछु होइछ भाग्यसँ नहि त बिद्या आ नहि त तागतसँ । भाग्य खराब जौ भऽ जाए त ककरो किछु नहि लगैछ । ओकर भाग्य खराब तहिएसँ सुरु भेलै जहिया ओ ब्यापारक देखभाल निरंजनके हाथमे दऽ देलकै । बि.सं. २०५७ साल जेष्ठमे हम काठमाण्डू अएली आ २०५८ साल जेष्ठ १० गते दिनेशक अफिसमे एकाउन्टेन्टक पदपर हमरा नोकरी भेल । बि.सं. २०५९ साल जेष्ठ १९ गते राज परिवारक हत्या पश्चात देशमे अशान्ति फैलल रहै । तकर बादक तात्कालिन प्रधान मन्त्रि शेरबहादुर देउवा द्वारा देशमे संकटकालक घोषणा भेलाक बाद नेपालक ब्यापारमे मन्दि आबऽ लगलै । आ, सुरक्षाक जाँचक प्रभावसँ ब्यापार प्रभावित होबऽ लगलै । जाहिमे दिनेश अपने गामपर रहऽ लागल । ओतै होटल आ फैक्ट्रीके देखभालमे लागि गेल । काठमाण्डूमे अशोक कहियोकाल अबै मुदा पुरा देखभाल राजाक हाथमे रहै ।एहि क्रममे एकबेर फैक्ट्रीक अडिट चलैत रहै । हमरा ओतऽ एक्सपर्ट बनिकऽ जएबाक मौका भेटल । मुदा हमरा ओतऽ फैक्ट्रीक हिसाब–किताब कम आ सोना चाँदीवाला हिसाब देखऽलेल बेशी आग्रह कएल गेल । छ बर्षक पहिलेके हिसाब रहै । ओ हिसाबमे की देखाओल गेल छैक से हमरा किछु बुझऽमे नहि आबे । तिन दिन हम लगातार ओकर अध्ययन करैत रहली । बादमे ई बुझऽमे आएल कि ओ हिसाब गलत रहै । ओहिमे अरसठि लाख नाफा होबऽचाही मुदा मुदा छेहतर लाख घाटा देखाओल छलैक । हम अपना अनुसार ओ रिपोर्टके ठिक बनाकऽ दिनेशक कनिञाक हाथमे दऽ देलियइ । दोसर दिन साँझक समय रहै । दिनेश हमरा बजाबऽ लेल हमर कोठरीके नोकरके पठौलक । हम तुरत ओतऽ गेलीऐ । सम्मान पूर्वक ओ हमरा बैसऽ लेल आग्रह कएलक । हम ओतऽ सोफापर बैसि गेलिऐ । नोकरके ओ ओतऽसँ जाएके लेल आदेश देलकै । ओकरा ओतऽसँ गेलाक बाद दिनेश आ हुनक कनिञा बातक शुरुवात कएलखिन । पहिने दिनेश हमरासँ पुछलक –

"हँ सन्तोष, जे कागज तोहर चाची हमरा देखऽ देलकौ से ....... कि ठिक छौ । तों कतेक बिश्वस्त छे, अप्पन काज प्रति ?"

"जी" –हम जबाब देलिऐ ।

"एतऽके नामी अडिटरके हाथसँ बनाओल ब्यालेन्स शिटके तों गलत कहिरहल छही .. एहि लेल तों बिचार कऽले .......आ, अडिटर संगैह हमर बाप समान भाइ सेहो बदनाम भऽरहल अछि ....... एहि बातक बिचार कऽले ।"

हम कने मुस्कैत कहलीऐ –

"एकाउन्टमे चचा ई कतौ नहि लिखल छैक जे नामी आदमी बनएतै त गलत नहि होएतै आ नहि तऽ कतौ लिखल छै जे कोनो बडका आदमी बदनाम हुए त चुप भऽजाइ । ....... आ ओहुना हमर गुरुजी पढ़ऽएने छथि जे अडिटक काम गल्ती आ जालसाजी पत्ता लगाउ आ ओकर रोकथाम करु ।"

हुनक कनिञा हमरासँ फेर पुछलखिन –

"अहाँके अप्पन हिसाबपर भरोशा अछि कि नहि ?"

सकरात्मक मुरी हिलाकऽ हम जबाब देलिऐ । फेर ओ सभ अडिटर आ भाइसाहेबके बजाबऽके बात कएलनि । हम फेर कहलियनि –

"जी हमरा एकटा अनुभव अछि जौं ओ अडिटर दोसरके कहलपर हस्ताक्षर कएने होएत त ..... नहि आओत ।"

"हेतै, ....... अहाँ जाउ, अराम करु ।" –हुनक कनिञा हमरा कहलखिन ।

हम ओतऽसँ अप्पन कोठरीमे अएलहुँ । किछु देरक बाद खाना त खएली, मुदा निन्न नहि आबे । रातिमे कखन निन्न परल से धरि बुझबे नहि कएलिऐ । भोरमे करिब आठ बजे नोकर चाह लऽकऽ उठाबऽ आएल । आ, चाह हाथमे दैत कहलक–

"निरंजन भैया सेहो आएल छथि, ........ किछु पिताएल जकाँ बुझाइछथि ।"

हम ओकरा हाथसँ चाह लऽलेलिऐ । चाह पिलाक बाद ओतै राखल लोटामेका पानिसँ हम मुँह धोएलिऐ आ रुमालसँ मुँह पोछैत निच्चा उतरलिऐ । हमरा देखिते निरंजन पिताकऽ बाजल –

"कि रे, तों तऽ हिरो भऽगेले ?"

तखने दिनेशक कनिञा निरंजनके कहलखिन –

"आप उसको कुछ मत बोलिए ....नहि तो ठिक नहि होगा .....’।

एतबे बात पर ओ शान्त भऽगेलै । तखन दिनेश हुनकासँ पुछलकनि –

"भैया, ओ अडिटरके कि भेलै ?"

एकदम शान्त भऽ बिनम्र आवाजमे निरंजन जबाब देलकै –

"ओ त बाहर गेलछै ।"

"त ....... अहाँ सन्तोष जे हिसाब निकाललकैए से देखलिए, कि नहि ....?"

"हँ, देखलिए ।"

"कि बुझाइए ?"

दिनेशक प्रश्न सुनिते निरंजन बजलै –

"गँरि धोबऽके त लुरि छैहे नइ, ..... ओ कथी हिसाब निकालतै ।"

हमरा बेइज्जत कऽकऽ बजैत सुनिकऽ दिनेशक कनिञाके बरदास्त नहि भेलनि आ ओ निरंजनके डटैत बजलिह –

"माइन्ड योर ल्याङ्गवेज ........ आप मुँह सम्हालकर बोलिए ....... एक अफिसर रैंकके आदमीको आप इस तरह बोलते आपको शरम आनी चाहिए ।"

जहिना ओकरा डाँट परलै ओ मुहसँ गारि निकालिते ओतऽसँ चलि गेलै । हमहुँ अप्पन काठरीमे जाकऽ कपड़ासभ जे बाहरमे रहे ओहिके बैगमे धऽकऽ बाहर निकलैत रहि । ई देखकऽ दिनेश हमरा हाथसँ बैग लऽलेलक । आ, हाथ पकड़िकऽ अप्पन कोठरीमे लऽ जाकऽ सोफापर बैसऽ लेल कहलक । ताबते हुनक कनिञा सेहो निरंजनके गारि पढ़िते ओहि घरमे अएलखिन । जखन ओ सेहो बैस गेलखिन तखन दिनेश गम्भिर भऽ हमरा कहलनि –

"देख सन्तोष, लोक जीवनके छोट कहै छैक, मुदा जीवन छोट नहि छैक । एहिमे लोक जस–अपजस, ...... धर्म–पाप, ...... प्रेम–घृणा, आदि बिभिन्न चिजक भागिदार बनैछ । हालाकि केकरो किछु लऽलेलासँ किछु नहि बिगड़ैछैक ।..... एकटा चोरके बारेमे जौ कहऽ परै त ओ केहन केहन घरमे चोरी करैछ, मुदा पुरी त नहिए परैछ । ....... माय हमर कहबाक आशय ई अछि जे भेलै भऽ गेलै । ...... जहिना तों रातिमे कहले जे ओ अडिटर नहि आओत तहिना नहि आएल .... जखन की ओ हमरा भोरमे भेटले छल । ..... खैर, तों ई अडिट कऽकऽ हमर आँखि खोलि देले माय एमकी बेरके सभहेसँ नमहर प्रमोशन तोरे भेटतौ । ..... हँ, आब कह तों ई बेग लऽकऽ कतऽ चलले ?"

हम मुरी गोतनहि कहलियइ –

"मुड अफ भऽ गेल जनकपुर जाकऽ चलि अबै छी ।"

ताबते हुनक कनिञा बजलिह–

"भोजन कऽलिअ, तखन चलि जाएब ।"

बात काटब उचित नहि रहे माय हम भोजन करऽ बेर तक रुकि गेली । भोजन कएला बाद दिनेश हमरा एकटा लिफाफ देलक । तकर बाद हम ओतऽसँ जनकपुर चलि देली । काठमाण्डू अफिसक परोशमे एकटा अडिटक अफिस रहै । आ ओतऽ सुजाता नामक एकटा लड़िकि काज करै । देखऽमे मूँह–कान त निके रहै मुदा ओ लोभी प्रबृतीके रहै । राजाके अप्पन मुँह–कान त निक रहै नहि मुदा काका वाला पाइ त रहै जाहिके बलपर बराबर स्पेशल नास्ता आओर बिशेष ब्यवस्था करै । ओ लोभसँ ओकरा पाछु पड़लापर राजाके अनुभव होइक जे ओ ओकरासँ प्रेम करऽ लगलीह । माओवादीक चन्दा आतंकके प्रभावसँ दिनेश अप्पन अफिसके घरमे लऽगेल मुदा राजाके सुजातासँ भेटऽबाला क्रममे चलैत रहलै । बजारमे ब्यापारीसभ लग पाइ बाँकी त रहबे करै आ ख्याती सेहो । जेकरा कहै केओ नहि नइ कहै । ओ जतऽसँ चाहै पाइ उठऽबै आ सुजाता जे कहै किनदइ .... । किछु दिन बाद दिनेश बिमार भऽगेल । काठमाण्डूसँ दिल्ली धरि इलाज चललै । ओमहर अशोकक लगानी सबटा डुबि गेलै । क्यासिनोक प्रभाव पड़िते रहै । दोसर दिश राजा सबहे पार्टी सभसँ अग्रिम पैसा उठाकऽ सुजातामे खर्च करऽ लागल । रोकऽवाला केओ रहै नहिए । एक दिश स्टाफ सभके तलब नहि आ दोसर दिश चालिस–पचास लाख रुपैया चारिए महिनामे राजा खर्च कऽ देलकै । दिनेश बेटा कहिक पालने जे पोशपुत रहै जेकरा ओ प्रेमसँ राजा कहथि से साँप रहै से हुनका बुझल नहि छलनि । ओ त सोचथि जे हुनका बाद हुनक ब्यापार आ परिवारक देखभाल राजा करत मुदा ओ .......। दिनेशके दवाइसँ किछु दिन ठिक रहै आ फेर जहिनाके तहिना । दारुक कारण किडनी खराब भऽ गेल रहै । एहिना एकबेर हुनका बड़जोर मोन खराब भऽ गेलनि त एम्बुलेन्ससँ पटना लजाइते बेर ओ अप्पन पत्निके कोरामे ई संसारके छोरिकऽ सदाके लेल चलि गेला । ओतैसँ सतिश फोन कएलकै । हमरा सभके मालुम भेल । राजा संगहि ओकर परिवारके अन्य सदस्यसभ सोल्टि होटलके गाड़ी लऽकऽ गेलथि । आ हम आ रंजन बससँ गेलीयइ । बसमे हमरा त कनी देर निनो परल मुदा रंजन भाइजीके निन्न साफे नहि पड़लनि । किए त हुनको नामक एकटा कम्पनीसँ कारोबार बहुत भेल रहै मुदा आयकर एक्कहुटा रुपैया बुझाओल गेल नहि रहै । सायद स्टाफसभमे सभसँ बेशी ओहे बेचारा दुःखी रहे । मुदा दिनेशक अप्पन ब्यबहारक कारणे ओ हमरा कहलनि –

"सन्तोष भाइ जिवनमे कहियो हमरा लग कने बेशी पाइ अएलै त हम दिनेश भैयाके नामके धर्मशाला वा बिद्यालय जरुर बना देबै ।"

प्रातः स्थानिय बजार सोगमे एक दिनक लेल बन्द भेलै । आ करिब चालिस प्रतिशत परिवारमे कन्नारोहट । दिनेशके मरलाक बाद राजा आ ओकर बाबू गोपालके त लौटरीए पड़िगेलै । लोकके देखाबऽ लेल कानऽ लगै आ फेर आपसमे खुसी बाँटऽ लगै । राजा जे दिनेशक पोशपुत रहै ओकरा अप्पन धर्मक मायसँ ताबते मतलब रहै जाबे ओ दिनेशक ब्रास्लेट, औंठी, लकेट आ अन्य गहना सभ लेबऽके रहै । ओकरा हम एकबेर रोकबो कएलियइ मुदा माय त बुझे जे बेटे त अछि । आखिर ओ गहना की होइक, कतऽ जाइक ? त अकसर राजा गहनाके बैंकमे धऽकऽ पाइ निकालै आ सुजाताके कहियो नगरकोट, त कहियो धुलिखेल, कहियो दामन आ कहियो कतौ त ....... । ई क्रम चलैत रहलै । दिनेशके देहान्तक बाद सुरेन्द्र आ रंजन दुनु नोकरी छोड़ि देलकै मुदा हम नोकरी नहि छोड़ने रही । कहबी छैक –

"कौआ भेल भण्डारी त गुँहे–गुँह टार ।" सेहे भेलै । दिनेशक मरला बाद अफिसक कार्यभार सतिश, गोपाल आ निरंजनके हाथमे चलि गेलै । पहिलेके बितल घटना सबहक कारणसँ हमरासंगे सेहो किछु निक ब्यबहार नहि होए। हमहुँ छोडि देलियइ । मुदा, ओहि परिवारसँ हम अखनो नजदिक छियइ । ई कथा लिखऽसँ किछु दिन पहिने दिनेशक कनिञाके एते ओसभ दुःख देबऽ लगलै कि ओ नैहर चलि गेलि !


समाप्त

V.L.F. VIDEHA LITERATURE FESTIVAL

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