भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
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पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor:
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Wednesday, July 08, 2009
समीक्षा श्रृंखला 9- सुभाष चन्द्र यादवक कथा संग्रह बनैत बिगड़ैत पर डॉ कैलाश कुमार मिश्र
(क) भाषा विन्यास आ शब्दावलीक दृष्टिकोण सँ ,
(ख) कथा-वस्तुक दृष्टिकोण सँ।
आब उपरलिखित दृष्टिकोण पर विचार करी:
भाषा विन्या स आ शब्दावलीक दृष्टिकोण सँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कए एक नीक परम्पहराक प्रारम्भी केलन्हि अछि।
मैथिली भाषाक सब सँ पैघ समस्या , हमरा एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते, ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्कृातनिष्ठज ब्राह्मण एवं कायस्थत लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृतक शब्द केँ घुसा-घुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति, एवं सर्वहाराक शब्दब, विन्यांस, व्यनवहार आदि केँ नजरअंदाज कऽ देल जाइत छैक। सही अर्थमे भाषा माटिक सुगन्ध, आ लोक परम्पवरासँ दूर भऽ जाइत अछि। सर्वहारा वर्गसँ कटि जाइत अछि। एहिना स्थितिमे छोट जाति, स्त्रीोगण आदि अपना-आप केँ भाषाक तागसँ बान्हिल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब धरि तँ ठीक परन्तु् पढ़ब आ लिखब परमपरासँ ई लोकनि अपन नाता समाप्त। कऽ लैत छथि।
मैथिली भाषाक समस्या केवल जाति अथवा समुदाय मात्रसँ नहि छैक। विभिन्नभ सांस्कृनतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषाकेँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक चारु दिशामे पाँच कोस धरिमे उच्चत वर्गक लोकक द्वारा प्रयुक्तं मैथिलीकेँ सर्वाधिक नीक मैथिली , पुन: समस्तीछपुर सँ कनीक दक्षिण दिस आगू गेलाक बाद प्रयुक्तश मैथिलीकेँ निम्नँ श्रेणीक मैथिली बुझल जाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि, तकरा पंचकोसिला लोकनि दछिनाहा , पूबमे व्युवहरित मैथिलीकेँ पुवहा एवं पच्छिम, विशेष रूपसँ सीतामढ़ीमे प्रयुक्त मैथिलीकेँ पछिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि।
एहि सभ कारणसँ कुजरा मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोइरी, धानुख आदि अपना आपकेँ मैथिली भाषाक बाजय वला नहि बुझैत छथि। दक्षिण, पच्छिम केर लोककेँ एहन बुझाइ छनि जेना ई लोकनि भाषाक मुख्याधारासँ अलग-थलग होथि। लोकविद्या अथवा फॉकलोर एतेक सम्पयन्नोा होइतो एहि क्षेत्रमे बहुत नीक स्थाेन बनाबयमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि।
नामकरणक उदाहरण जे ली तँ बुझायत जेना ब्राह्मण एवं कायस्थ् लोकनि संस्कृथतनिष्ठउ नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जरवन कि पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्टा अछि। पंजाबी भाषामे नाम आदि, लोक एवं सामान्यर जनमानस केर हिसाबसँ निर्धारित होइत अछि। गुरु ग्रन्थधसाहेबकेँ एखनहुँ धरि गुरग्रन्थ साहेब, कहल जाइत अछि। स्मररण आइयो सिमरन थीक। फॉकलोर जाग्रत छैक। एकर परिणाम ई होइत छैक जे की स्त्रीण, की पुरुष, की छोट, की पैघ सभ जातिक लोक अपना आपकेँ भाषा, संस्काषर आ संस्कृकतिसँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि।
अतेक सम्प न्नह फॉकलोर रहितहुँ, मिथिलाक फॉकलोरपर किछु विशेष कार्य नहि भऽ सकल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एक उल्लेाखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाष जी पंचकोसिया नहि छथि आ दोसर ओ ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ सेहो नहि छथि। से अपन परिवेशक प्रयुक्त शब्द , वाक्य , परम्प रा, नाम आदिक वेवाक वर्णन कयलन्हि अछि। किताबक सब पन्ना पढ़ि लेलाक बाद अपन ठेठ गाम, गामक परम्पिरा, लोक परिवेश इत्या दि स्मनरण होबय लागत। लोकमे प्रयुक्तप खांटी देसी नाम जेना कि मुनिया, कुसेसर, उपिया, बिहारी, बौकू, सिबननन, रामसरन, रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजनाथ, सकुन आदि पाठककेँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूपसँ लऽ जाइत अछि। भाषा सेहो अग्गबब देसी। कुनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि।
एहि तरहक यथार्थवादी परम्पभराक प्रारम्भ, केलासँ मैथिली साहित्यछ सम्पान्ने हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक संख्याप बढ़त। अनेरे संस्कृमतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीक पाठकक संख्याप लगभग शून्यम जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्वभयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियोक पढ़यबला नहि। वेबवर्ल्ड क विकास हेमाक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिलासँ बाहर रहनिहार मैथिल आब आइ काल्हि किछु सामग्रीकेँ सर्फ कय देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सब सामग्री मैथिलीमे लिखल पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन कथ्य अंग्रेजीमे व्यखक्त करैत छथि।
सुभाषजी जकाँ अगर आरो लेखक, कवि इत्याेदि आगाँ आबथि तँ यथार्थवादी परम्पजरा समृद्ध हैत। मैथिलीमे नव-नव शब्दा वली विकसित हैत। सब क्षेत्र, सम्प्रीदाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक, बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष केर हाथक खेलौनासँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत।
आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्तुो पर कनी विचार करब जरूरी। कथा-वस्तुाक दृष्टियें सेहो लेखक अपन परिवेशसँ बान्हरल छथि। कथा सभमे लेखककेँ परम्पसराक नीक तत्वक प्रति सिनेह, पाखण्डबक प्रति विद्रोह, एक निम्नल-मध्यकम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर फ्रर्स्टेिशन, एक युवकक सुन्द र नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समस्याँ, यात्रा-वृतान्तो, मोनक अन्तःवद्वन्द, सुन्दसरता आ सुन्दधरताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत।
‘‘बनैत बिगड़ैत’’ कथामे माए-बापक मनोदशा, जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक वर्णन कएल गेल छैक। कथाक मुख्य्पात्र माला टाँहि-टाहि करैत कौवाक आवाजसँ डरैत अछि। ओकरा हकार दैत उड़बै चाहैत छैक। लेकिन ‘‘टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — “बज्जटर खसौ, भागबो ने करै छै”।
परदेसमे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु ऐना लिखैत छथि:
कौका कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै।
“हे भगवान, तूही रच्छा करिहबु। हाह। हाह।”—
माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै।”
आ मालाक बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्य मसँ अपन विस्म य व्याक्तब करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्ने करैत छथि:
माला सब बेर अहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तै सन्तोंि नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खूनमे मिल गेल छै। संस्काटर बनि गेल छै।
सन्तो्केँ छगुन्ताक होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा–पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय । रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।”
अही तरहें अपन खिस्साब ‘कनियाँ-पुतरा’ मे लेखक ट्रेनमे ठाढि़ एक बारह बर्षक लड़की आ लड़कीक निश्छल व्यखवहारसँ आत्मविभोर भय, लड़की सँ एहन सम्बकन्ध़ बना लैत छथि जेना जो लड़कीक भाय अथवा पिता होथि। ट्रेनक व भीर भरल बोगीमे ठाढि़ लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत छैक तँ लड़कीक निर्विकार मुद्रासँ एना बुझना जाइत छैक जेना ‘ ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सँ सटल हो।’
लड़कीक भविष्यपर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्य मसँ सोचय लगैत छथि : “ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पोना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका धेरने जा रहल ऐछ।”
‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्न वर्गीय दब्बूडपनीक मनोदशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक ऐँठ पात्र नवीनकेँ थमाबय चाहैत छैक, तँ सूत्रधार बाजि उठैत अछि:
“सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि के ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ धृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै — ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक खौंझ हुअए लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहिं कहि सकलै -हाउ डिड यू डेयर?’ तोहर ई मजाल ! मुदा ओ कहि नहिं सकलै। साइत निम्नवर्गीय दब्बूेपनी आ संस्काुर ओकरा रोकि लेलकै।”
- डॉo कैलाश कुमार मिश्र
(कैलाश जी इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे स्कॉलर छथि आ कतेक प्रदेशमे मानवशास्त्रीय फील्डवर्कक क्रममे घूमल छथि। फॉक म्युजिक ऑफ मिथिलापर पी. एच.डी. छथि आ मिथिला चित्रकलापर हिनकर आलेख एहि विषयपर सभसँ नीक प्रबन्ध मानल जाइत अछि।)
Tuesday, June 09, 2009
समीक्षा श्रृंखला 8 - गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पर डॉ. उदय नारायण सिंह नचिकेता
खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना
खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि)
खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर)
खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ)
खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण)
खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )
खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत
सभसँ महत्वपूर्ण बात ई जे सभ विषयक पाठकक आ पाठिकाक लेल एतए किछु ने किछु भेटबे करत । पुछलियन्हि जे एहन संरचना किएक तँ जे किछु कहलन्हि ताहिसँ लागल जे ई हिन्दी केर तार-सप्तक आ तमिलक कुरुक्षेत्रम् केर बीच मे कतहु अपन जगह बनेबाक प्रयास कऽ रहल छथि । फराक एतबे जे हिन्दी आ तमिल मे कएक गोटे मिलि कए संकलित भेल छथि एकटा जिल्दमे, आ एतए कएक लेखकक द्वारा विभिन्न विधा केर रचना नहि रहि हिनके अपन रचना पोथीमे उपलब्ध कराओल गेल अछि ।
कतेको पंक्ति भरिसक पाठकक मोनमे ग्रंथित-मुद्रित भऽ जएतन्हि, जेना कि
“ढहैत भावनाक देबाल
खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़
आकांक्षाक बखारी अछि भरल
प्रतीक बनि ठाढ़
घरमे राखल हिमाल-लकड़ीक मन्दिर आकि
ओसारापर राखल तुलसीक गाछ
प्रतीक सहृदयताक मात्र”
अथवा , निम्नोक्त पंक्ति-येकेँ लऽ लिअ :
“सुनैत शून्यक दृश्य
प्रकृतिक कैनवासक
हहाइत समुद्रक चित्र
अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द
क्यो देखत नहि हमर ई चित्र अन्हार मे
तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर”
मिथिलेक नहि अपितु भारतक कतेको संस्कृतिक प्रभाव देखल जा सकैछ हिनक कथा-कवितामे। एहिसँ मैथिली क्रियाशील रचनाक परिदृश्य आर बढ़ि जाइछ, आ नव-नव चित्र, ध्वनि आ कथानक सामने आबि जाइत अछि ।
कवि कोन मन्दाकिनी केर खोजमे छथि जे कहैत छथि-
“मन्दाकिनी जे आकाश मध्य
देखल आइ पृथ्वीक ऊपर...”
अपन विशाल भ्रमणक छाप लगैछ रचनामे नीक जकाँ प्रतीत होइत अछि । आ आर एकटा बात स्पष्ट अछि कोषकार गजेन्द्र ठाकुर आ रचनाकार गजेन्द्र ठाकुर भिन्न व्यक्ति छथि, व्यक्तित्वमे सेहो फराक... जतए कोशकारितामे सम्पादकत्व तथा टेक्नोलोजी –सँ सम्बन्धित व्यक्तिक छाया भेटिते अछि, मुदा सृजनक मुहुर्तमे से सभटा हेरा जाइत छथि ।
एहिमे सँ कतेको टेक्स्ट ओ रखने छथि इन्टरनेटमे मैथिलीक बढ़ैत
पाठककेँ ध्यानमे राखि, जेना कि विदेह-सदेह अछि http://videha123.wordpress.com/ मे, आ देवनागरी आ तिरहुता दुन्नु लिपिमे । जे क्यो मिथिलाक्षरक प्रेमी छथि तनिका सब लेखेँ तँ ई विरल उपहारे रहत ।
अनेको रचनामे मात्र गोल-मटोल कथे नहि, राजनीतिक भाष्य सेहो लखा दैत अछि। ताहिमे हिनका कोनो हिचकिचाहटि नहि छन्हि। ओना देखल जाए तँ कुरुक्षेत्र क कतेको महारथी छलाह = प्रत्येक वीर-योद्धा अपन-अपन क्षेत्र आ विधाक प्रसिद्ध पारंगद व्यक्ति छलाह,–क्यो कतेको अक्षौहिणी सेनाक संचालनमे, तँ क्यो तीरन्दाजीमे, आदि आदि । सभ जनैत छलाह जे धर्म आ अधर्मक भेद की होइछ मुदा तैयो सभ क्यो जेना आसन्न विपर्यायक सामने निरुपाय भऽ गेल छलाह। आजुक सन्दर्भमे सेहो कथा मे तथा व्याख्यामे एहन परिस्थितिक झलक देखल जाइत अछि । सैह एहि महा-पाठ –क (मेटाटेक्सट) खूबी कहब। नहि तँ ओ कियेक लिखताह- –
“देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत
मंत्र-तंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल
गुनधुनी बला स्वप्न
बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक
अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान
दमसाइत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त
कारिख चित्रित रातिक निन्न
टुटैत-अबैत-टुटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य
...”
एहि महापाठकेँ एकटा एक्सपेरीमेन्ट केर रूपमे देखी तँ सेहो ठीक , आ सप्तर्षि-मंडलक निचोड़ अथवा सप्त-काण्डमे विभाजित आधुनिक महा काव्य रूपमे देखी तँ सेहो ठीक हएत। जेना पढ़ी , सामग्री एहिमे भरपूर अछि, भरिसक किछु अत्युच्च मानक लागत , आ किछु किनको तत्तेक नहि पसिन्न पड़तन्हि । मुदा एहि ग्रन्थ निचयकेँ पाठक अवश्य स्वागत करताह , आ नवीन लेखक वर्गकेँ एकटा नव दिशा सेहो भेटतन्हि।
मैसूर, ९ जून २००९ उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
निदेशक,
भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
Saturday, May 16, 2009
समीक्षा श्रृंखला-07 - बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा,गजेन्द्र ठाकुर
किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जाहि कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओहि समय एहिपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहए। जेना “जाइत रही” केँ “जाति रही” लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरा मे एकर प्रयोग कए दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा एहिसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाए आ “छै” लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ “छैक” लिखबाक अछि तँ “अन्तक ’क’ साइलेन्ट अछि” से प्रोनन्सिएशनक निअम बनए। मुदा से जल्दी बनए आ सर्वग्राह्य होअए तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोककेँ “य” लिखल जाए वा “ए” एहिपर भरि जिनगी लड़बाक समय नहि छै, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, आ नहि तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाऊ। “नहि” लेल “नञि” लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ (अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नहि होअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ।(वैज्ञानिक आ मानक मैथिली वर्णमालाक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइवक (http://www.videha.co.in/) विदेह ऑडियो लिंकपर डाउनलोड/श्रवण लेल उपलब्ध अछि।)
“बनैत बिगड़ैत” पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लए जएबामे सक्षम अछि।
कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि।
कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि “सोप ओपेरा” जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिए बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नहि दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नहि तँ खरापे-खराप।
कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना एहि तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे “देवी को बलि” सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नहि।
वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल।
से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि।
साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत।
आधुनिक कथा अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ?
कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि।
जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि।
जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि।
मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि।
आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत।
कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी।
मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत।
सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संग्रह बनैत बिगड़ैत:
स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ एहि स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा “काठक बनल लोक” क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहए। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कए कोनो पात्र फेरसँ कानए लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कए जाइत छथि। आब “बनैत बिगड़ैत” कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी।
कनियाँ-पुतरा- एहि कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि, जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने होअए। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहए जेना बाप-दादा वा भाए बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि।
कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वैह सड़कक चौबटिया अछि आ वैह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका सभ देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मँगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नहि होएतन्हि? बालक तँ पैघ भए चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका ? ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद ओहि पुरातन दृष्टिसँ काज कए सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कए जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कए अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कए जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे “मेड बाइ मी” केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अएबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नहि लगाओत?
असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नहि रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा एहि तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छै। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छै। चौक-चौराहाक एहि तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, एहिमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि।
एकाकी- एहि कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतए एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानए लागलि। एना होइत अछि। कथाकार मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कए नहि वरण जीवन्तता देखा कए करैत छथि।
ओ लड़की- एहि कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन नामक युवक एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओहि लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छै जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छै जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छै। ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ओ दृढ़तासँ नहि कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि।
एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल, जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीक प्रेमिकाक फोन अएलापर, ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आएब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। एहि कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नव युगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि।
टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ । गाम-घरक जे सास-पुतोहुक गप छै, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वैह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जाएत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत।प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम !
अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ, खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित होएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छै। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छै मुदा से नहि अछि। सभक अपन सुख-दुःख छै, अपन आशा आ आकांक्षा छै। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि, जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भए सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि।
आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज एहि लऽ कऽ नहि भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ ताहि द्वारे काजो नहि केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त ? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतए व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी, तँ यैह ने सुनए पड़ैत अछि, जे पाइ जे माँगत से दए देबैक आ तखन कोनो दिक्कत होअए तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लए गेलहुँ तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज होएत।
एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नहि, एहिपर कैक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आएल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार, जे नहि पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नहि, मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नहि कटबैत अछि, तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छै तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि, तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि ?
कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आएब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोक लग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटाएब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नहि छइ, नहि तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लैतए। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनाएब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र होएत।
कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, एहिपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबए लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबए लेल कहैत छै। सिन्हा एहि कथामे ककरो गलती नहि मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किएक इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किएक देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नहि बिताओत, तँ ओकर पति मरि जएतैक।
आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ए लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि।
कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखाएल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि, जे ओ से दाग नहि अछि, वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा, हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतए ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कए होम्योपैथीपर विश्वास करए लगैत छथि, एहि गपक चरचा आएल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ अएनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कैक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि।
कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतए एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जएबाक, गेरुआ पानिक धारमे आएब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जाँघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि क्यो कहैत छन्हि- “साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक”। दीदी-पीसा अहिठाम एहि गपक चरचा सुनलन्हि, जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सए टाका नहि माँगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आश्वस्त नहि छथि आ घुरि जाइत छथि।
तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नहि भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत।
छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा “कैनरी आइलैण्डक लारेल” आ “तृष्णा”।
दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतए सहृदय चपरासी सूचित करैत छै जे बाहरीकेँ नहि लैत छै, पी.एच.डी. रहितए तँ कोनो बात रहितए। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहए। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहए।प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आएल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि।
दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज, गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतए गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि।
नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भए जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आएल छै। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छै। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छै। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नहि हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल।
परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतए। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छै। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छै आ एम्हर माएक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छै। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छै से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छै। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकैक, मोह तोड़ि देलकैक। मुदा बरखा रुकि गेलैक। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करए लागल।
बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता माँगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहए।दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छै।
रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छै। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी।रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छै, ओतेक सुन्नर नहि, कारण एकर वर सुन्दर नहि होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नहि बुझिमे अएलन्हि।
हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ एहिठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छै से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पए चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि।
स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि।
यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतए चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहए, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छै- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि।सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठी सभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, कारण ई धारणा लोकमे छै। सत्तोक बेटी एखन सासुर नहि बसैत छै। सुकन रामक एहिठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि।
ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नहि। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जाएत ? गीताक सप्पत खा कए झूठ बजनिहारक संख्या कम नहि। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भए जाएत ?
सभ प्रबुद्ध नहि होएताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओहि दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध होएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नहि, तँ ओकर ओहि परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि एहि तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत।
आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत ? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि ? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि।
तँ कथा आदर्शवादी होअए, प्रकृतिवादी होअए वा यथार्थवादी होअए। आकि एहिमे सँ मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमएबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी होअए ? आ नहि तँ कथा प्रयोजनमूलक होअए। एहिमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त कएनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि।
तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कए गढ़ल जाएत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि।
स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित होएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत।
जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नहि छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह।
कथा क्रमबद्ध होअए आ सुग्राह्य होअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नहि व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कए देलक।
आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल।
प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग।
क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि।
तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत?
जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि।
होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत।
पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि।
आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल।
पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म।
कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट !
पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। एहि बेरुका (२००८) कोसीक बाढ़िमे अनलकान्तजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही?
डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था।
एहि परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा गाथापर सेहो एकटा गहिंकी नजरि दौगाबी।
रामदेव झा जलधर झाक “विलक्षण दाम्पत्य” (मैथिल हित साधन, जयपुर, १९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक “मोहिनी मोहन” (१९०७-०८), जनसीदनक “ताराक वैधव्य” (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर “सरोज”क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर “विनय”क तारा आ श्याम सुन्दर झा “मधुप”क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र “विद्यासिन्धु”क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा “शास्त्री”, धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा “जिज्ञासु”, श्याम सुन्दर “शशि”, रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त, श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि।
मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे, वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि, मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि ? नचिकेताक नाटक आ मैथिलीक सेक्सपिअर महेन्द्र मलंगियाक काजक आ रामभद्र आ सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल।
जाहि समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नहि भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भए, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कए कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्म आ मिथिला राज्य आ संघक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ एहि तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक तँ क्यो सुमनजीक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नहि कएल गेल अछि- एहि तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कए स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जाहि कवि-कथाकारकेँ विचलित कए रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे अएबाक बाद जाहि गतिसँ ओ ई सभ करतब कए रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जएतन्हि से नहि जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ एहि तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन एहि भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दए कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ? सेमीनारमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एहन जुझारू कथाकार, सम्पादक आ समालोचक सभकेँ अपन पुत्र-पुत्री-पत्नीक संग मैथिलीमे नहि वरन् हिन्दी मे (अंग्रेजी प्रायः सामर्थ्यसँ बाहर छन्हि तेँ) गप करैत देखि हतप्रभ रहि जाइत छी। मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल होएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कए हम कहि सकैत छी। ताहि स्थिति मे- ई विवाद रहए एहि कवितामे आ एहि कथामे- एहि तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दए अपन लेखनी चमकाएब ? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा एहि सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित कए सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद ! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भए रहल अछि ? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा कए , तकर समीक्षा करबा कए, सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा कए , तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जाए स्थिर भए गेल अछि।
जे अपन घर-परिवार नहि सम्हारि सकलाह से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लए बैसल छथि, मिथिला राज्य बनएबामे लागल छथि , पता नहि राज्य कोना सम्हारि सकताह आ ओकर विधान सभामे कोन भाषामे बजताह, जखन हुनका ओतए पुरस्कृत कएल जएतन्हि।
जे घरमे मैथिली नहि बजैत छथि से लेखक आ कवि बनल छथि (हिन्दी-मैथिलीमे समान अधिकारसँ) हिन्दीमे सोचि लिखैत छथि आ तखन अनुवाद कए मौलिक मैथिली लिखैत छथि ! मैथिली कथा-कविता करैत छथि!!
मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नहि अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नहि, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नहि छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ एहि द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कए समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नहि। पाठक नहि रहएमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ एहि पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन एहि सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि । सारंग कुमार छथि, तँ बलरामक चरचा फेरसँ कथाकारक रूपमे शुरू भेल अछि । आ जिनकर सन्तान साहित्यमे नहि अएलाह हुनकर चरचा फेर कोना होएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? जीबैत धरि ने सभ अपन पक्ष स्वयं आगाँ राखि रहल छथि ? मुदा मुइलाक बाद ? मैथिली साहित्यक एहि सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कए सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि।
क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि। कथा-कविता संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन कथाकार-कविक संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि , भने हुनकर कोनो पहिले संग्रह आएल होइन्हि वा कथा-कविताक संख्या हास्यास्पद रूपसँ कम होइन्हि। पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जाहि भाषामे लिखल जाइत होअए, ओतए एहि तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि।
मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक एहि तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही, धंधा तँ सुमन, राजकमल, यात्री, मणिपद्म, धूमकेतु......सभक शुरू भेल अछि। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वैह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नहि भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यैह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा एहि वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार होएबे टा करत।
मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नहि। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे “विदेह” ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट एहि कथा सभकेँ भेटलैक जाहिमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ पाठक बनि रहिये नहि सकैत छथि, शीघ्र यात्रीक बादक एकमात्र जन उपन्यासकार आ कुलानन्द मिश्रक बादक एकमात्र सही अर्थमे कविक उपाधि लेल लालायित भए जाइत छथि। अपनाकेँ घोड़ा आ बाघ आ दोसरकेँ गधा आ बकरी कहबा काल ओ मूल दिशा आ समस्यासँ अपनाकेँ फराक करैत छथि। अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कए आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आएल अछि। एहि एकमात्र शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध “विदेह” ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। एतए साल भरिमे सएसँ बेशी लेखक जुड़लाह तँ पाठकक संख्या लाख टपि गेल। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर एहि गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जाएत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की होएतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ एहि रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतए ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए प्रिंट फॉर्ममे आबि रहल अछि, कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लए। आ ई घटना सभ दिन आ सभ प़क्षमे मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि।
-गजेन्द्र ठाकुर
Thursday, April 16, 2009
समीक्षा श्रृंखला-६ : नचिकेताक नाटकपर गजेन्द्र ठाकुर
नो एण्ट्री: मा प्रविश
नाटकक कथानक: प्रथम कल्लोल: ई नाटक ज्योतिरीश्वरक परम्परामे कल्लोलमे (हुनकर वर्ण रत्नाकर कल्लोलमे विभक्त अछि जे नाटक नहि छी, धूर्त-समागम जे ज्योतिरीश्वर लिखित नाटक अछि- अंकमे विभक्त अछि) विभाजित अछि। चारि कल्लोलक विभाजनक प्रथम कल्लोल स्वर्ग (वा नरक) केर द्वारपर आरम्भ होइत अछि। ओतए बहुत रास मुइल लोक द्वारक भीतर प्रवेशक लेल पंक्तिबद्ध छथि। क्यो पथ दुर्घटनामे शिकार भेल बाजारी छथि तँ संगमे युद्दमे मृत भेल सैनिक आ चोरि करए काल मारल गेल चोर, उच्चक्का आ पॉकिटमार सेहो छथि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागममे जे अति आधुनिक अब्सर्डिटी अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो देखबामे अबैत अछि। प्रथम कल्लोलमे जे बाजारी छथि से, पंक्ति तोड़ि आगाँ बढ़ला उत्तर, चोर आ उचक्का दुनू गोटेकेँ, कॉलर पकड़ि पुनः हुनकर सभक मूल स्थानपर दए अबैत छथि। उचक्का जे बादमे पता चलैत अछि जे गुण्डा-दादा थिक मुदा बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैत अछि, हुनकासँ अंगा छोड़बाक लेल कहैत अछि। मुदा जखन पॉकेटमार बाजारी दिससँ चोरक विपक्षमे बजैत अछि तखन उचक्का चक्कू निकालि अपन असल रूपमे आबि जाइत अछि आ पॉकेटमारपर मारि-मारि कए उठैत अछि। मुदा जखन चोर कहैत छनि जे ई सेहो अपने बिरादरीक अछि जे छोट-छीन पॉकेटमार मात्र बनि सकल, ओकर जकाँ माँजल चोर नहि, आ उचक्का जेकाँ गुण्डा-बदमाश बनबाक तँ सोचिओ नञि सकल, तखन उचक्का महराज चोरक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, जे बदमाश ककरा कहलँह। आब पॉकेटमार मौका देखि पक्ष बदलैत अछि आ उचक्काकेँ कहैत छन्हि जे अहाँकेँ नहि हमरा कहलक। संगे ईहो कहैत अछि जे चोरि तँ ई तेहन करए जनैत अछि, जे गिरहथक बेटा आ कुकुर सभ चोरि करैत काल पीटैत-पीटैत एतऽ पठा देलकए आ हमर खिधांश करैत अछि, बड़का चोर भेला हँ। भद्र व्यक्ति चोरक बगेबानी देखि ई विश्वास नहि कए पबैत छथि जे ओ चोर थिकाह। ताहिपर पॉकेटमार, चोर महाराजकेँ आर किचकिचबैत छन्हि। तखन ओ चोर महराज एहि गपपर दुख प्रकट करैत छथि जे नहि तँ ओहि राति एहि पॉकेटमारकेँ चोरिपर लए जएतथि आ ने ओ हुनका पिटैत देखि सकैत। एम्हर बजारी जे पहिने चोर आ उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ि घिसिया चुकल छलाह, गुम्म भेल सभटा सुनैत छथि आ दुख प्रकट करैत छथि जे एकरा सभक संग स्वर्गमे रहब, तँ स्वर्ग केहन होएत से नहि जानि। आब बजारी महराज गीतक एकटा टुकड़ी एहि विषयपर पढ़ैत छथि। जेना धूर्तसमागममे गीत अछि तहिना नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो, ई एहि स्थलपर प्रारम्भ होइत अछि जे एहि नाटककेँ संगीतक बना दैत अछि। ओम्हर पॉकेटमारजी सभक पॉकेट काटि लैत छथि आ बटुआ साफ कए दैत छथि। आब फेर गीतमय फकड़ा शुरू भए जाइत अछि मुदा तखने एकटा मृत रद्दीबला सभक तंद्राकेँ तोड़ि दैत छथि, ई कहि जे यमालयक बन्द दरबज्जाक ओहि पार, ई बटुआ आ पाइ-कौड़ी कोनो काजक नहि अछि। आब दुनू मृत भद्र व्यक्ति सेहो बजैत छथि, जे हँ दोसर देसमे दोसर देसक सिक्का कहाँ चलैत अछि। आब एकटा रमणीमोहन नाम्ना मृत रसिक भद्र व्यक्तिक दोसर देसक सिक्का नहि चलबाक विषयमे टीप दैत छथि, जे हँ ई तँ ओहिना अछि जेना प्रेयसीक दोसरक पत्नी बनब। आब एहि गपपर घमर्थन शुरू भए जाइत अछि। तखन रमणी मोहन गपक रुखि घुमा दैत छथि जे दरबज्जाक भीतर रम्भा-मेनका सभ हेतीह। भिखमंगनी जे तावत अपन कोरामे लेल एकटा पुतराकेँ दोसराक हाथमे दए बहसमे शामिल भऽ गेल छथि, ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की इत्यादि कहैत छथि। मुदा पॉकेटमार कहैत अछि जे भीतरमे सुख नहि दुखो भए सकैत अछि। एहिपर बीमा बाबू अपन कार्यक स्कोप देखि प्रसन्न भए जाइत छथि। आब पॉकेटमार इन्द्रक वज्र पर रुपैय्याक बोली शुरू करैत अछि। एहि बेर बजारी तन्द्रा भंग करैत अछि आ दुनू भद्र व्यक्ति हुनकर समर्थन करैत कहैत अछि, जे ई अद्भुत नीलामी अछि, जे करबा रहल अछि से पॉकेटमार आ ओहिमे शामिल अछि चोर आ भिखमंगनी, पहिले-पहिल सुनल अछि आ फेर संगीतमय फकड़ा सभ शुरू भए जाइत अछि। मुदा तखने नंदी-भृंगी शास्त्रीय संगीतपर नचैत प्रवेश करैत छथि। आब नंदी-भृंगीक ई पुछलापर जे दरबज्जाक भीतर की अछि, सभ गोटे अपना-अपना हिसाबसँ स्वर्ग-नरक आ अकास-पताल कहैत छथि। मुदा नंदी-भृंगी कहैत छथि जे सभ गोटे सत्य कहैत छी आ क्यो गोटे पूर्ण सत्य नहि बजलहुँ। फेर बजैत-बजैत ओ कहए लगैत छथि, क्यो चोरि काल मारल गेलाह (चोर ई सुनि भागए लगैत छथि तँ दु-तीन गोटे पकड़ि सोझाँ लए अनैत छन्हि!) तँ क्यो एक्सीडेन्टसँ, आ एहि तरहेँ सभटा गनबए लगैत छथि, मुदा बीमा-बाबू कोना बिन मृत्युक एतए आयल छथि से हुनकहु लोकनिकेँ नहि बुझल छन्हि ! बीमा बाबू कहैत छथि जे ओ नव मार्केटक अन्वेषणमे आएल छथि ! से बिन मरल सेहो एक गोटे ओतए छथि ! भृंगी नंदीकेँ ढ़ेर रास बीमा कम्पनीक आगमनसँ आएल कम्पीटिशनक विषयमे बुझबैत छथि ! एम्हर प्रेमी-प्रेमिकामे घोंघाउज शुरू होइत छन्हि, कारण प्रेमी आब घुरि जाए चाहैत छथि। रमणी मोहन प्रेमीक गमनसँ प्रसन्न होइत छथि जे प्रेमिका आब असगरे रहतीह आ हुनका लेल मौका छन्हि। मुदा भृंगी ई कहि जे एतएसँ गेनाइ तँ संभव नहि मुदा ई भऽ सकैत अछि जे दुनू जोड़ी माय-बाप (!) केँ एक्सीडेन्ट करबाए एतहि बजबा लेल जाए। मुदा अपना लेल माए-बापक बलि लेल प्रेमी-प्रेमिका तैयार नहि छथि। तखन नंदी भृंगी दुनू गोटेक विवाह गाजा-बाजाक संग करा दैत छथि आ कन्यादान करैत छथि बजारी।
दोसर कल्लोल: दोसर कल्लोलक आरम्भ होइत अछि एहि आभाससँ, जे क्यो नेता मरलाक बाद आबएबला छथि, हुनकर दुनू अनुचर मृत भए आबि चुकल छथि आ नेताजीक अएबाक सभ क्यो प्रतीक्षा कए रहल छथि, दुनू अनुचर छोट-मोट भाषण दए नेताजीक विलम्बसँ अएबाक (मृत्युक बादो !) क्षतिपूर्ति कए रहल छथि, गीतक योग दए। एकटा गीत चोर नहि बुझैत छथि मुदा भिखमंगनी आ रद्दीबला बुझि जाइत छथि, ताहि पर बहस शुरू होइत अछि। चोरकेँ अपनाकेँ चोर कहलापर आपत्ति अछि आ भिखमंगनीकेँ ओ भिख-मंग कहैत अछि तँ भिखमंगनी ओकरा रोकि कहैत छथि जे ओ सरिसवपाहीक अनसूया छथि, मिथिला-चित्रकार, मुदा दिल्लीक अशोकबस्ती आबि बुझलन्हि जे एहि नगरमे कला-वस्तु क्यो नहि किनैत अछि आ तखन चौबटियाक भिखमंगनी बनि रहि गेलीह। चोर कहैत अछि जे मात्र ओ बदनाम छथि, चोरि तँ सभ करैत अछि। नव बात कोनो नहि अछि, सभ अछि पुरनकाक चोरि। तकर बाद नेताजी पहुँचि जाइत छथि आ लोकक चोर, उचक्का आ पॉकेटमार होएबाक कारण समाजक स्थितिकेँ कहैत छथि। तखने एकटा वामपंथी अबैत छथि आ ओ ई देखि क्षुब्ध छथि जे नेताजी चोर, उचक्का आ पॉकेटमारसँ घिरल छथि। मुदा चोर अपन तर्क लए पुनः प्रस्तुत होइत अछि आ नेताजीक राखल “चोर-पुराण” नामक आधारपर बजारी जी गीत शुरू कए दैत छथि।
तेसर कल्लोल: आब नेताजी आ वामपंथीमे गठबंधन आ वामपंथी द्वारा सरकारक बाहरसँ देल समर्थनपर चरचा शुरू भए जाइत अछि। नेताजी फेर गीतमय होइत छथि आकि तखने स्टंट-सीन करैत एकटा मुइल अभिनेता विवेक कुमारक अएलासँ आकर्षण ओम्हर चलि जाइत अछि। टटका-ब्रेकिंग न्यूज देबाक मजबूरीपर नेताजी व्यंग्य करैत छथि। वामपंथी दू बेर दू गोट गप- नव गप कहि जाइत छथि, एक जे बिन अभिनेता बनने क्यो नेता नहि बनि सकैत अछि आ दोसर जे चोर नेता नहि बनि सकैछ (ई चोर कहैत अछि) मुदा नेता सभ तँ चोरि करबामे ककरोसँ पाछाँ नहि छथि। तखने एकटा उच्च वंशीय महिला अबैत छथि आ हुनकर प्रश्नोत्तरक बाद एकटा सामान्य क्यूक संग एकटा वी.आइ.पी.क्यू बनि जाइत अछि। अभिनेता, नेता आ वामपंथी सभ वी.आइ.पी.क्यूमे ठाढ़ भऽ जाइत छथि ! ई पुछलापर जे पंक्ति किएक बनल अछि (?) ताहिपर चोर-पॉकेटमार कहैत छथि जे हुनका लोकनिकेँ पंक्ति बनएबाक (आ तोड़बाक सेहो) अभ्यास छन्हि।
चतुर्थ कल्लोल: यमराज सभक खाता-खेसरा देखि लैत छथि आ चित्रगुप्त ई रहस्योद्घाटन करैत छथि जे एक युग छल जखन सोझाँक दरबज्जा खुजितो छल आ बन्न सेहो होइत छल। नंदी भृंगी पहिनहि सूचित कए देलन्हि जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नहि, मात्र बुझबाक दोष छल। दरबज्जाक ओहि पार की अछि ताहि विषयमे सभ क्यो अपना-अपना हिसाबसँ उत्तर दैत छथि। चित्रगुप्त कहैत छथि जे सभक वर्णनक सभ वस्तु छै ओहिपार। नंदी-भृंगी सूचित करैत छथि जे एहि गेटमे प्रवेश निषेध छै, नो एण्ट्री केर बोर्ड लागल छै। आहि रे ब्बा! आब की होअए ! नेताजीकेँ पठाओल जाइत छन्हि यमराजक सोझाँ, मुदा हुनकर सरस्वती ओतए मन्द भए जाइत छन्हि। बदरी विशाल मिश्र प्रसिद्ध नेताजी, केर खिंचाई शुरू होइत छन्हि असली केर बदला सर्टिफिकेट बला कम कए लिखाओल उमरिपर। पचपन बरिख आयु आ शश योग कहैत अछि जे सत्तरि से ऊपर जीताह से ओ आ संगमे मृत चारू सैनिककेँ आपिस पठा देल जाइत अछि। दूटा सैनिक नेताजीक संग चलि जाइत छथि आ दू टा अनुचर सेहो जाए चाहैत अछि। मुदा नेताजीक अनुचर सभक अपराध बड़ भारी, से चित्रगुप्तक आदेशपर नंदी-भृंगी हुनका लए, कराहीमे भुजबाक लेल बाहर लए जाइत छथि तँ बाँचल दुनू सैनिक हुनका पकड़ि केँ लए जाइत छथि आ नंदी-भृंगी फेर मंचपर घुरि अबैत छथि। तहिना तर्कक बाद प्रेमी-प्रेमिका, दुनू भद्र पुरुष आ बजारीकेँ सेहो त्राण भेटैत छन्हि ढोल-पिपहीक संग हुनका बाहर लए गेल जाइत अछि। आब नन्दी जखन अभिनेताक नाम विवेक कुमार उर्फ...बजैत छथि तँ अभिनेता जी रोकि दैत छथि, जे कतेक मेहनतिसँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़ि सकल अछि, से उर्फ तँ छोड़िए देल जाए। वामपंथी गोष्ठीकेँ अभिनेता द्वारा मदति केर विवरणपर वामपंथी प्रतिवाद करैत छथि। हुनको पठा देल जाइत छनि। वामपंथीक की हेतन्हि, हुनकर कथामे तँ ने स्वर्ग-नर्क अछि आ ने यमराज-चित्रगुप्त। हुनका अपन भविष्यक निर्णय स्वयं करबाक अवसर देल जाइत छन्हि। मुदा वामपंथी कहैत छथि जे हुनकर शिक्षा आन प्रकारक छलन्हि, मुदा एखन जे सोझाँ घटित भए रहल छन्हि ताहिपर कोना अविश्वास करथु? मुदा यमराज कहैत छथि जे- भऽ सकैत अछि, जे अहाँ देखि रहल छी से दुःस्वप्न होअए, जतए पैसैत जाएब ओतए लिखल अछि नो एण्ट्री। आब यमराज प्रश्न पुछैत छथि जे विषम के, मनुक्ख आकि प्रकृति ? वामपंथी कहैत छथि जे दुनू, मुदा प्रकृतिमे तँ नेचुरल जस्टिस कदाचित् होइतो छै मुदा मनुक्खक स्वभावमे से गुन्जाइश कतए ? मुदा वामपंथी राजनीति एकर (समानताक, सुधार केर) प्रयास करैत अछि। ताहिपर हुनका संग चोर-उचक्का आ पॉकेटमारकेँ पठाओल जाइत अछि, ई अवसर दैत जे हिनका सभकेँ बदलू। चोर कनेक जाएमे इतस्तः करैत अछि आ ई जिज्ञासा करैत अछि जे हम सभ तँ जाइए रहल छी मुदा एहिसँ आगाँ ? नंदी-चित्रगुप्त-यमराज समवेत स्वरमे कहैत छथि- नो एण्ट्री। भृंगी तखने अबैत छथि, अभिनेताकेँ छोड़ने। यमराज कहैत छथि - मा प्रविश। भृंगी नीचाँमे होइत चरचाक गप कहैत अछि, जे एतुक्का निअम बदलल जएबाक आ कतेक गोटेकेँ पृथ्वीपर घुरए देल जएबाक चरचा सर्वत्र भए रहल अछि। यमदूत सभ अनेरे कड़ाह लग ठाढ़ छथि क्यो भुजए लेल कहाँ भेटल छन्हि (मात्र दू टा अनुचर छोड़ि)। आब क्यो नहि आबए बला बचल अछि, से सभ कहैत छथि। चित्रगुप्त अपन नमहर दाढ़ी आ यमराज अपन मुकुट उतारि लैत छथि आ स्वाभाविक मनुक्ख रूपमे आबि जाइत छथि! मुदा चित्रगुप्तक मेकप बला नमहर दाढ़ी देखि भिखमंगनी जे ओतए छलीह, हँसि दैत छथि। भृंगी उद्घाटन करैत छथि जे भिखमंगनी हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि ! कोन अभिनय ! तकर विवरण मुहब्बत आ गुदगुदीपर खतम होइत अछि, तँ भिखमंगनी कहैत छथि जे नहि एहि तरहक अभिनय तँ ओतए (देखा कए) भऽ रहल अछि। ओत्तऽ रमणी मोहन आ उच्चवंशीय महिला निभाक रोमांस चलि रहल अछि। मुदा निभाजी तँ बजिते नहि छथि। भिखमंगनी यमराजसँ कहैत छथि जे ओ तखने बजतीह जखन एहि दरबज्जाक तालाक चाभी हुनका भेटतन्हि, बुझतीह जे अपसरा बनबामे यमराज मदति दए सकैत छथि, ई रमणीक हृदय थिक एतहु नो एण्ट्री ! यमराज खखसैत छथि, तँ चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज “पंचशर”सँ ग्रसित भए गेल छथि ! चित्रगुप्तक कहला उत्तर सभ क्यो एक कात लए जाओल जाइत छथि मात्र यमराज आ निभा मंचपर रहि जाइत छथि। यमराज निभाक सोझाँ- सुनू ने निभा... कहि रुकि जाइत छथि। सभक उत्साहित कएलापर यमराज बड़का चाभी हुनका दैत छथि, मुदा निभा चाभी भेटलापर रमणी मोहनक संग तेना आगाँ बढ़ैत छथि जेना ककरो अनका चिन्हिते नहि होथि ! ओ चाभी रमणी मोहनकेँ दए दैत छथि मुदा ओ ताला नहि खोलि पबैत छथि। फेर निभा अपने प्रयास करए लेल आगाँ बढ़ैत छथि मुदा चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई मोनक दरबज्जा थिक, ओना नहि खुजत। महिला ठकए लेल चाभी देबाक (!) गप कहैत छथि। सभ क्यो हँसी करैत छनि जे मोन कतए छोड़ि अएलहुँ ? ताहिपर एकबेर पुनः रमणी मोहन आ निभा मोन संजोगि कए ताला खोलबाक असफल प्रयास करैत छथि। नंदी-भृंगी-भिखमंगनी गीत गाबए लगैत छथि जकर तात्पर्य ईएह जे मोनक ताला अछि लागल, मुदा ओतए अछि नो एण्ट्री। मुदा ऋतु वसन्तमे प्रेम होइछ अनन्त आ करेज कहैत अछि मैना-मैना । तँ एतहि नो एण्ट्री दरबज्जापर धरना देल जाए।
विवेचन: भारत आ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक तुलनात्मक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”।
भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नहि। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतहु चरचा नहि अछि।
अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दैत छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जाएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु होअए से आवश्यक नहि, नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि तँ कोनो तेहन आधिकारिक कथावस्तु अछि आ नहिए कोनो प्रासांगिक, कारण एहिमे नायक कोनो सर्वमान्य नायक नहि अछि। जे बजारी उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ैत छथि से कनेक कालक बाद गौण पड़ि जाइत छथि। जाहि उच्क्काक सोझाँ चोर सकदम रहैत अछि से किछु कालक बाद, किछु नव नहि होइछ केर दर्शनपर गप करैत सोझाँ अबैत छथि। जे यमराज सभकेँ थर्रेने छथि, से स्वयं निभाक सोझाँमे अपन तेज मध्यम होइत देखैत छथि। भिखमंगनी हुनका दैवी स्वरूप उतारने देखैत हँसैत छथि तँ रमणी मोहन आ निभा सेहो हुनका आ चित्रगुप्तकेँ अन्तमे अपशब्द कहैत छथि। वामपंथीक आ अभिनेताक सएह हाल छन्हि। कोनो पात्र कमजोर नहि छथि आ समय-परिस्थितिपर रिबाउन्ड करैत छथि।
कथा इतिवृत्तिक दृष्टिसँ प्रख्यात, उत्पाद्य आ मिश्र तीन प्रकारक होइत अछि। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। मिश्रमे दुनूक मेल होइत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मिश्र इतिवृत्तिक होएबाक कोनो टा गुंजाइश तखने खतम भए जाइत अछि जखन चित्रगुप्त आ यमराज अपन नकली भेष उतारैत छथि आ भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहैत छथि जे ई भिखमंगनी सेहो हमरे सभ जेकाँ कलाकार छथि ! मात्र यमराज आ चित्रगुप्त नामसँ कथा इतिहास-पुराण सम्बद्ध नहि अछि आ इतिवृत्ति पूर्णतः उत्पाद्य अछि। अरस्तू कथानककेँ सरल आ जटिल दू प्रकारक मानैत छथि। ताहि हिसाबसँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आकस्मिक घटना जाहि सरलताक संग फ्लोमे अबैत अछि, से ई नाटक सरल कथानक आधारित कहल जाएत। फेर अरस्तू इतिवृत्तकेँ दन्तकथा, कल्पना आ इतिहास एहि तीन प्रकारसँ सम्बन्धित मानैत छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश केँ काल्पनिक मूलक श्रेणीमे एहि हिसाबसँ राखल जाएत। अरस्तूक ट्रेजेडीक चरित्र य़शस्वी आ कुलीन छथि- सत् असत् केर मिश्रण। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे जे चरित्र सभ छथि ताहिमे सभ चरित्रमे सत् असत् केर मिश्रण अछि। निभा उच्चवंशीय छथि मुदा रमणी मोहन, जे बलात्कारक बादक भेल पिटानक बाद मृत भेल छथि, सँ हिलि-मिलि जाइत छथि। भिखमंगनी मिथिला चित्रकार अनसूया छथि। मुदा दुनू भद्रपुरुष, बजारी आ चारू सैनिक एहि प्रकारेँ बिन कलुषताक सोझाँ अबैत छथि। भरत नृत्य संगीतक प्रेमीकेँ धीरललित, शान्त प्रकृतिकेँ धीरप्रशान्त, क्षत्रिय प्रवृत्तिकेँ धीरोदत्त आ ईर्ष्यालूकेँ धीरोद्धत्त कहैत छथि। बजारी आ दुनू भद्रपुरुष संगीतक बेश प्रेमी छथि तँ रमणी मोहन प्रेमी-प्रेमिकाकेँ देखि कए ईर्ष्यालू। सैनिक सभ शान्त छथि क्षत्रियोचित गुण सेहो छन्हि से धीरोदत्त आ धीरप्रशान्त दुनू छथि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि प्रकारक विभाजन पूर्णतया सम्भव नहि अछि।
भारतीय सिद्धांत कार्यक आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति आ फलागम धरिक पाँच टा अवस्थाक वर्णन करैत अछि। प्राप्त्याशामे फल प्राप्तिक प्रति निराशा अबैत अछि तँ नियताप्तिमे फल प्राप्तिक आशा घुरि अबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धांतमे अछि आरम्भ, कार्य-विकास, चरम घटना, निगति आ अन्तिम फल। प्रथम तीन अवस्थामे ओझराहटि अबैत अछि, अन्तिम दू मे सोझराहटि।
कार्यावस्थाक पंच विभाजन- बीया, बिन्दु, पताका, प्रकरी आ कार्य अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे बीया अछि एकटा द्वन्द - मृत्युक बादक लोकक, बीमा एजेन्ट एतए बिनु मृत्युक पहुँचि जाइत छथि। यमराज आ चित्रगुप्त मेकप आर्टिस्ट बहराइत छथि। विभिन्न बिन्दु द्वारा एकटा चरित्र ऊपर नीचाँ होइत रहैत अछि। पताका आ प्रकरी अवान्तर कथामे होइत अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि अछि। बीआक विकसित रूप कार्य अछि मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे ओ धरणापर खतम भए जाइत अछि! अरस्तू एकरा बीआ, मध्य आ अवसान कहैत छथि। आब आऊ सन्धिपर, मुख-सन्धि भेल बीज आ आरम्भकेँ जोड़एबला, प्रतिमुख-सन्धि भेल बिन्दु आ प्रयत्नकेँ जोड़एबला, गर्भसन्धि भेल पताका आ प्राप्त्याशाकेँ जोड़एबला, विमर्श सन्धि भेल प्रकरी आ नियताप्तिकेँ जोड़एबला आ निर्वहण सन्धि भेल फलागम आ कार्यकेँ जोड़एबला। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मुख/ प्रतिमुख आ निर्वहण सन्धि मात्र अछि, शेष दू टा सन्धि नहि अछि।
पाश्चात्य सिद्धांत स्थान, समय आ कार्यक केन्द्र तकैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे स्थान एकहि अछि, समय लगातार आ कार्य अछि द्वारक भीतर पैसबाक आकांक्षा। दू घण्टाक नाटकमे दुइये घण्टाक घटनाक्रम वर्णित अछि नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कार्य सेहो एकेटा अछि। अभिनवगुप्त सेहो कहैत छथि जे एक अंकमे एक दिनक कार्यसँ बेशीक समावेश नहि होअए आ दू अंकमे एक वर्षसँ बेशीक घटनाक समावेश नहि होअए। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कल्लोलक विभाजन घटनाक निर्दिष्ट समयमे भेल कार्यक आ नव कार्यारम्भमे भेल विलम्बक कारण आनल गेल अछि। मुदा एहि त्रिकक विरोध ड्राइडन कएने छलाह आ शेक्सपिअरक नाटकक स्वच्छन्दताक ओ समर्थन कएलन्हि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि तरहक कोनो समस्या नहि अबैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आपसी गपशपमे- जकरा फ्लैशबैक सेहो कहि सकैत छी- ककर मृत्यु कोना भेल से नीक जेकाँ दर्शित कएल गेल अछि।
भारतमे नाटकक दृश्यत्वक समर्थन कएल गेल मुदा अरस्तू आ प्लेटो एकर विरोध कएलन्हि। मुदा १६म शताब्दीमे लोडोविको कैस्टेलवेट्रो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि। डिटेटार्ट सेहो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि तँ ड्राइडज नाटकक पठनीयताक समर्थन कएलन्हि। देसियर पठनीयता आ दृश्यत्व दुनूक समर्थन कएलन्हि। अभिनवगुप्त सेहो कहने छलाह जे पूर्ण रसास्वाद अभिनीत भेला उत्तर भेटैत अछि, मुदा पठनसँ सेहो रसास्वाद भेटैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे पहिल कल्लोलक प्रारम्भमे ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे एतए दृश्यत्वकेँ प्रधानता देल गेल अछि। पश्चिमी रंगमंचक नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भारतीय विधानकेँ अंगीकृत कएल गेल- जेना मृत्यु प्राप्त सभ गोटे द्वारा स्वर्ग प्रवेश द्वारक अदृश्य देबारक गपशप आ अभिनय कौशल द्वारा स्पष्टता। अंकिया नाटमे सेहो प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आ एतहु अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटकक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। नो एण्ट्री: मा प्रविश मैथिलीक परम्परासँ अपनाकेँ जोड़ने अछि मुदा संगहि इतिहास, पुराण आ समकालीन जीवनचक्रकेँ देखबाक एकटा नव दृष्टिकोण लए आएल अछि, सोचबा लए एकटा नव अंतर्दृष्टि दैत अछि।
ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय, कीर्तनिञा नाटक, अंकीयानाट, मुंशी रघुनन्दन दासक मिथिला नाटक, जीवन झाक सुन्दर संयोग, ईशनाथ झाक चीनीक लड्डू, गोविन्द झाक बसात, मणिपद्मक तेसर कनियाँ, नचिकेताजीक “नायकक नाम जीवन, एक छल राजा”, श्रीशजीक पुरुषार्थ, सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी, महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक, राम भरोस कापड़ि भ्रमरक महिषासुर मुर्दाबाद, गंगेश गुंजनक बुधिबधिया केर परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत नचिकेताजीक नो एण्ट्री: मा प्रविश तार्किकता आ आधुनिकताक वस्तुनिष्टताकेँ ठाम-ठाम नकारैत अछि। वामपंथीकेँ यमराज ईहो कहैत छथिन्ह, जे वामपंथी देखि रहल छथि से सत्य नहि, सपनो भए सकैत अछि। विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका अछि ई नाटक। सत्य-असत्य, सभ अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन करैत छथि। चोरक अपन तर्क छन्हि आ वामपंथी सेहो कहैत छथि जे चोर नेता नहि बनि सकैत छथि, मुदा नेताक चोरिपर उतरि अएलासँ चोरक वृति मारल जाए बला छन्हि। नाटकमे आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। यमराज आ चित्रगुप्त धरि मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि। उत्तर आधुनिकताक ई सभ लक्षणक संग नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एके गोटेक कैक तरहक चरित्र निकलि बाहर अबैत अछि, जेना उच्चवंशीय महिलाक। कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नहि लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भए जाएत तकर कोनो ठेकान नहि। उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आ तेहन चरित्र सभक नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भरमार लागल अछि, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नहि अछि। जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नहि कैक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण विद्यमान अछि। कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नहि, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल गेल अछि। गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि।
एहि तरहेँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे उत्तर आधुनिक दृष्टिकोण दर्शित होइत अछि, एतए पाठक कथानकक मध्य उठाओल विभिन्न समस्यासँ अपनाकेँ परिचित पबैत छथि। जे द्वन्द नाटकक अंतमे दर्शित भेल से उत्तर-आधुनिक युगक पाठककेँ आश्चर्यित नहि करैत छन्हि, किएक तँ ओ दैनिक जीवनमे एहि तरहक द्वन्दक नित्य सामना करैत छथि।
समीक्षा श्रृंखला-५: मायानन्द मिश्रपर गजेन्द्र ठाकुर
एहि प्रबन्धमे मायानन्दजीक स्त्रीधन, पुरोहित, मंत्र-पुत्र आ प्रथमं शैलपुत्री च- एहि चारि पोथीक जे कथा-विधान आ साहित्यिक विवेचन छल तकरा यथा संभव नञि छुअल गेल आ मात्र इतिहास-बोधक सन्दर्भमे विवेचना अछि।
प्रबंधमे मायानान्द जीक १.प्रथमं शैल पुत्री च २.मंत्रपुत्र ३.पुरोहित आ ४. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे, मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे, तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ श्रृंखलाक तारतम्य आ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल।
कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि । एहिमे १५०० ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे १५०० ई.पू. सँ १२०० ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे १२०० ई.पू.सँ १००० ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला।
मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने -नवंबर १९८६ मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दू सालक बाद रचित भेल आ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आएल जाहि कारणसँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ १९९९ मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, २००७ ई. मे प्रकाशित भेल।
“प्रथमं शैल पुत्री च” केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल।मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल, किएक तँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ विश्वक प्रथम देशभक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि जकर पक्ष-विपक्षमे विस्तृत चरचा बादमे होएत।
स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि।
मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क आ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी। पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कए इतिहासक समीक्षा भेल अछि आ मध्य एशिया आ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहि पड़ए से प्रयास कएल गेल अछि।
१. प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक १. अग्ना, २.अग्न-शैला, ३. शैला- कराली, ४. कराली- महेष, ५. महेष- पारवती, ६. गणेष, ७. हरकिसन, ८. किसन, ९. हरप्पा : मोअन गाँव, १०. गणेष का श्रीगणेश, ११. किश्न, १२. महाजन, १३. मंडल, १४. किश्न मंडल, १५. मंडल : मंडली, १६. पतन: पुरंदर आ १७. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि।
१. अग्ना- २००० ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहएबला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि। बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जाइत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्व बढ़ल आ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कए खाएल नहि जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ तेसर नदी देव छलाह। अम्बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आएल छलाह। नव कुठार आ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कए वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि। प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ देखलापर हास्यास्पद लगैत अछि।
अग्ना-शैलासँ शुरू होइत अछि दोसर भाग। १०००० ई.पू.। भाषाक आरंभक प्रारंभ मायानन्द मिश्र एहिमे प्रकट कएने छथि। एहिमे बड्ड नीक जेकाँ, संकेत भाषासँ ध्वनिक संबंध परिलक्षित कएल गेल अछि। चलंत सँ स्थिर जीवनक शुरुआत सेहो देखायल गेल अछि। तकर बाद शैला कराली अध्यायक प्रारंभ होइत अछि, ७५०० वर्ष पूर्वसँ। गौ पालनक चर्चा होइत अछि, गायक संख्यामे पर्याप्त वृद्धि भेल छल। सभ रहथि चरबाह, चर्मस्त्र्धारी। आ कटिमे पाथरक हथियार। भेड़, बकरी आ सुग्गर छल, किछु आन पोसिया जंतु जात सेहो रहए। घासक रस्सी, त्रिशूल आ नागदेवक चर्चा होइत अछि। बाक नाम आब भऽ जाइत अछि, ओजा। दलाग्राक नाम पड़ैत अछि शैला कराली। पशुक संख्या बढ़ल तँ पशुक चोरि सेहो शुरू भऽ गेल।पीपरक गाछक नीचाँ बैठकीक प्रारम्भ भेल। करालीक नाम अंबा पड़ल।
कराली-महेष अध्यायमे ५००० ई.पू. मे कृषिक प्रारम्भ देखाओल गेल अछि। महेष बीया बागु कए रहल छथि। जवकेँ पका कऽ खयबाक चर्चा होइत अछि। आब धारक नाम सेहो राखल जाए लागल। महेष कुल द्वारा पोस केर माँस खेनाइ तँ एकदम निषिद्ध भऽ गेल।ओजा लिंग स्थानमे बैसल रहैत छलाह।
तकर बाद महेष-पारवती अध्याय शुरु होइत अछि ४ सँ ५ हजार वर्ष पूर्व। धानक फसिलक प्रारंभ भेल। पारवती जहिया अएलीह तहिया ओतुक्का प्रथाक अनुसार लाल माटि माथमे लगा देल गेल। पुत्रक नाम गणेष पड़ल। एहिसँ पहिने संतानक परिचय नहि देल जाइत छल।
गणेष- ई अध्याय ४००० वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ गहूमक खेतीक प्रारंभ आ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभ आ अदला-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल। शिश्न देव पर जल आ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ पानिमे भिजा कए आगिमे पकाएब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करएबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल। लिपिक प्रारंभ सेहो भेल।
हर- एहि अध्यायक प्रारंभ ३५०० ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पइलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर आ बड़दक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ जनक लंबवत केर अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल।
हरकिसन अध्यायक प्रारम्भ ३४०० वर्ष पूर्व होइत अछि। कृषि विकासक संग स्थायी निवासक प्रवृत्ति बढ़य लागल। तकरा बाद परिवारक रूप स्पष्ट होमय लागल। कृषि-विकाससँ वाणिज्य विस्तारक आवश्यकता बढ़ल। ऊनक वस्त्र, चक्की, भीतक घर आ इनारक घेराबा बनए लागल।
किसन अध्यायक प्रारम्भ ३३०० ई.पूर्व भेल। श्रम-बेचबाक प्रारम्भ भेल। पटौनीक प्रारम्भक संग कृषि-विकास गति पकड़लक। भूगोलक जानकारी भेलासँ वाणिज्य बढ़ल। अलंकारक प्रवृत्ति बढ़ल।
हड़प्पा: मोहनगाँव अध्याय ३२०० वर्ष पूर्व देखाओल गेल अछि।श्रम-बेचबाक हेतु काठक टोलक उदाहरण अबैत अछि। अलंकार प्रवृत्ति बढ़ल। गोलीक मालाक संग कुम्हारक चाक सेहो सम्मुख आयल। समाजमे वर्ग विभाजनक प्रारम्भ भेल।
गणेषक श्रीगणेष अध्याय ३१०० ई. पूर्व प्रारम्भ भेल। दक्षिणांचल लोकक आगमनक बाद हड़प्पा हुनका लोकनि द्वारा बनेबाक चर्च लेखक करैत छथि। मोहनजोदड़ो, लोथल आ चान्हूदोड़ोक विकास व्यापारिक केन्द्रक रूपमे भेल। लिपि, कटही गाड़ी आ मूर्त्तिकलाक आविष्कार भेल आ वस्तु विनिमयक हेतु हाट लागए लागल। मेसोपोटामियाक जलप्लावन आ सुमेरी आ असुरक आगमनक चर्चा लेखक करैत छथि।
किश्न अध्यायक प्रारम्भ ३००० ई.पू. सँ भेल। विदेश व्यापारक आरम्भ भेल। तामक आविष्कार भेल। कृषि दासत्वक सेहो प्रारम्भ भेल। बाढ़िसँ सुरक्षाक हेतु ऊँच डीह बनाओल जाए लागल।
महाजन अध्याय २८०० ई. पू. प्रारम्भ होइत अछि। नगरक प्रारम्भ वाणिज्यक हेतु भेल। नहरि पटौनीक हेतु बनाओल जाए लागल। डंडी तराजूक आविष्कार आवश्यकता स्वरूप भेल। प्रकाश-व्यवस्थाक ब्योँत लागल।
मंडल अध्यायमे चर्च २६०० ई.पू.क छै। संस्था निर्माण, विवाह व्यवस्था आ दूरगर यात्राक हेतु पाल बला नावक निर्माण प्रारम्भ भेल।
किश्न मंडल अध्याय २४०० ई.पू. केर कालखण्डसँ आरम्भ कएल गेल अछि। एहिमे वर्षाक अभावक चरचा अछि। आर्यक पूर्व दिशामे बढ़बाक चर्चासँ लोकमे भयक सेहो चर्चा अछि।
मंडल:मंडली अध्याय २२०० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल। आर्यक आगमनक आ वर्षाक अभाव दुनूकेँ देखैत लोथल वैकल्पिक रूपसँ विकसित होमए लागल।
पतन:पुरंदर: एहि अध्यायक कालखण्ड २००० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल अछि। आर्यक राजा द्वारा पुरकेँ तोड़ि महान केंद्र हड़प्पाकेँ ध्वस्त करबाक चर्चासँ मायानन्द जी अपन पहिल किताब ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ केर समापन करैत छथि। आर्य हड़प्पाकेँ हरियूपियासँ संबोधित कएल, आर्य बाहरसँ अएलाह प्रभृत्ति किछु सिद्धांतक आधार पर रचित ई उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास होएबाक दावा करैत अछि। आ एहिमे २०,००० ई.पू.सँ १८०० ई.पू. धरिक इतिहासोपाख्यानक चर्चा अछि। मुदा मौलिक ऐतिहासिक विचारधारा आ नवीन शोधक आधार पर एकर बहुतो बात समीचीन बुझना नहि जाइत अछि।
अग्नासँ शुरू भेल ई कथानक बड्ड आशा दिअओने छल। लेखक पहिल अध्यायमे लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। ई अनुमानित अछि जे यूरेनियमक १.६७ भाग १०,००,००,००० वर्षमे सीसामे बदलि जाइत अछि। विभिन्न प्रकारक पाथर आ चट्टानमे सीसाक मात्रा भिन्न रहैत अछि। एहि प्रकारसँ गणना कएला पर ई ज्ञात होइछ जे रेडियोएक्टिव पदार्थ १,५०,००,००,००० वर्ष पहिने विद्यमान छल। एहि प्रकारेँ कोनो शैलक आयु २,००,००,००,००० वर्षसँ अधिक नहि भऽ सकैछ। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। एहि तरहक पाश्चात्य शोधकेँ लेखक पहिल अध्यायमे तँ नकारि देलन्हि मुदा अंत धरि जाइत-जाइत ओ - आर्य लोकनि हड़प्पाकेँ हरियूपिया कहैत छथि - एहि प्रकारक पाश्चात्य दुराग्रहक प्रभावमे आबि गेलाह। पश्चिमी विद्वानक उच्छिष्ट भोजसँ बचि श्रुति परम्पराक परीक्षा तर्कसँ नहि कए सकलाह। एहि प्रकारे ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ निम्न आधार पर अपन इतिहासोपाख्यान साहित्यिक रूपसँ नहि बना पओलक :-
पुरातात्विक, भाषावैज्ञानिक आ साहित्यिक साक्ष्य एहि पक्षमे अछि जे आर्य भारतक मूल निवासी छलाह। आर्य भाषा परिवारक नामकरण मैक्समूलर द्वारा कएल गेल छल। द्रविड़ परिवारक नामकरण पादरी रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा कएल गेल छल।आर्यक आक्रमणक सिद्धांत आएल ग्रिफिथक ऋग्वेदक अनुवादमे देल गेल फूटनोटसँ। पहिने तँ ई नामकरण विदेशी विद्वान द्वारा कएल गेल छल ताहि द्वारे ओकर अपन उद्देश्य होएतैक।
सरस्वती नदी, जल-प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ देवतंत्रक विकास एहि सभटा समाजशास्त्रीय विकासक विश्लेषण आर्य लोकनिक भारतक मूल निवासी होएबाक साक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
ऋग्वेदमे मातृसत्तात्मक व्यवस्थाक स्मृतिक रूपमे बहुवचन स्त्रीलिंगक प्रयोगक बहुलता अछि।
सघोष आ महाप्राण ऋग्वेदिक आ भारतीय भाषाक ध्वनिक प्रतिरूप, नहि तँ ईरानी आ नहिये यूरोपीय भाषा सभमे भेटैत अछि। सरस्वती आ सिन्धु धारक बीचक सभ्यता छल आर्यक सभ्यता। सरस्वती धारक तटवर्ती भरत, पुरु आ अन्य गण सभ मिलि कए ऋगवेदक रचना कएलन्हि। सरस्वतीमे जल-प्रलयक बाद ई सभ्यता सारस्वत प्रदेश सँ हटि कए कुरु-पांचाल आ ब्रह्मर्षि प्रदेश-मध्यदेश- पहुँचि गेल। इतिहासमे भरत लोकनिक महत्व समाप्त भऽ गेल। एहि जल प्रलयक बाद आर्यजन लोकनिक वंशज मोहनजोदड़ो आ हड़प्पा नगरक निर्माण कएने होएताह सेहो सम्भव। हड़प्पा सभ्यताक ८०० मे सँ ५३० सँ ऊपर स्थान एहि लुप्त सरस्वती धारक तट पर अवस्थित छल। सिन्धुक धार पर एहि स्थल सभक बड्ड कम निर्भरता छल आ जखन सरस्वतीमे पानिक प्रवाह घटल तँ एहि सभ केन्द्रक ह्रास प्रारम्भ भऽ गेल।
पहिने सरस्वतीमे जल-प्रलयसँ आर्यक पलायन भेल (ऋगवेद आ यजुर्वेदक रचनाक बाद) आ फेर सरस्वतीमे पानिक कमी भेलासँ दोसर बेर आर्यक पैघ पलायन भेल (अथर्ववेदक रचनाक पहिने)। अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहि तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ नहिये यूरोपमे। भारतीय देवनाम, शिल्प, कथा, अश्वविद्या, संगीत, भाषिक तत्व आ चिंतनक संग ई उद्घाटित होमए लागल पश्चिम एशिया, मिश्र आ यूनानमे। दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ, भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवेदिक तत्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाए लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन, आदि सभ्यता आ मित्तनी आ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहि ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भऽ गेल छल।
मायानन्दजीक एहि सीरीजक दोसर रचना मंत्रपुत्र अछि। एहिमे ऋगवैदिक आधार पर जीवन-दर्शनकेँ राखल गेल अछि।
ऋगवेद १० मंडलमे (आ आठ अष्टकमे सेहो) विभक्त्त अछि। मायानन्द मिश्रजी मंडलक आधार पर मंत्रपुत्रक विभाजन सेहो १० मण्डलमे कएने छथि। एहि पुस्तकक भूमिकाक नाम अछि ऋचालोक आ ई पुस्तकक अंतमे १०म मण्डलक बाद देल गेल अछि।
प्रथम मण्डलमे काक्षसेनी पुत्री ऋजिश्वाक चर्च अछि संगहि ऋतुर्वित पुत्री शाश्वतीक सेहो। जन सभा आ जन-समिति द्वारा राजाकेँ च्युत करबाक/ निर्वासन देबाक आ दोसर राजाक निर्वाचन करबाक चर्चा सेहो अछि। नेत्रक नील रंग रहबाक बदला श्यामल भऽ जएबाक चर्चा आ एकर कारण खास तरहक विवाहक होयबाक चर्चा सेहो भेल अछि।वितस्ता तटसँ कृष्ण सभक निरन्तर उपद्रवक चर्चा सेहो अछि। सुवास्तु तटसँ रक्त्त मिश्रणक प्रक्रियाक वर्णन अछि। गोमेधकेँ वर्जित कएल जाय, ई विचार विमर्श कएल जाए लागल। दासक चर्चा सेहो अछि। हरियूपिया पतन आ ओकर विभिन्न नगर सभक उजड़ि जएबाक चर्चा अछि आ पश्चात्, बल्बूथ द्वारा अनार्य सभक ध्वस्त वाणिज्य व्यवस्थाकेँ संगठित करबाक चर्चा अछि।
द्वितीय मण्डलमे राजाकें समिति द्वारा एहि गपक लेल पदच्युत कएल जएबाक चर्चा अछि, कि धेनुक चोरिक बादो गव्य-युद्ध ओ नहि कएलन्हि। अभिषेकक सङ्ग राजा सेहो प्रायः निश्चित होमए लगलाह आ कौलिक परम्परा चलि गेल। पहिने समितिक निर्णयक बादे क्यो समर्थन-याचनामे जाइत छलाह, राजदण्ड सम्हारैत छलाह। धेनुक हरण कएने छल अनास दस्यु सभ। सुवास्तु, क्रुमु, वितस्ता आ अक्खनीक तट पर श्रुति अभ्यास आ युद्ध-कार्य संगहि चलैत छल, एके संग ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्य कर्म करैत छथि। मुदा सरस्वतीक तट पर बात किछु दोसरे भऽ गेल, ऋषिग्राम फराक होमय लागल। सभटा अनास दस्यु दास बनि गेल आ दासीसँ आर्यगणक संतान उत्पन्न होमए लगलन्हि। दासीपुत्र लोकनिकेँ तँ गाममे घर बनेबाक अनुमति छलन्हि मुदा अनास दस्युकेँ ओ अनुमति नहि छलन्हि। एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह आ अनास दस्यु लोकनिक संपर्कसँ सूतक वस्त्र आ लवणक प्रयोग सिखलन्हि। एहि दुनू चीजक आपूर्त्ति एखनो अनास लोकनिक हाथमे छलन्हि। अनार्य लोकनिक संपर्कसँ अपन शब्द कोश बिसरबाक आ तकर संकलनक आवश्यकताक पूर्त्तिक हेतु निघण्टुक संकलनक चर्चा सेहो अछि। गंधर्व विवाहक सेहो चर्चा अछि।
तृतीय मण्डल
अग्निष्टोम यज्ञक चर्चा अछि। छागर आ महीसक बलि केर चर्च अछि।
माँस-भात महर्षि लोकनिकेँ प्रिय लगलन्हि, तकर चर्चा अछि मुदा भातक बदला गहूमक सोहारीक प्रचलन एखनो बेशी होएबाक चर्चा अछि।
चतुर्थ मण्डल
राजाक अभिषेक यज्ञक चर्चा आ ओहिमे अरिष्टनेमिक ब्रह्मा बनबाक चर्चा अछि। ग्रामणी, रथकार, कम्मरि, सूत, सेनानी सेहो यज्ञमे सम्मिलित छलाह।
“अति प्राचीन कालमे सृष्टि जलमय छल”! एकर चर्चा मायानन्द मिश्रजी नहि जानि ऋगवेदिक युगमे कोना कए देलन्हि।
पञ्चम मण्डल
अश्वारोहण प्रतियोगिताक चर्चा अछि। अनास दास-रंजक नाट्यवृत्तिक चर्चा सेहो अछि। राजा द्वारा एकर अभिषेक कार्यक्रममे स्वीकृति आ एकर भेल विरोधक सेहो चर्चा अछि। दासकेँ स्वतंत्र कृषि अधिकार आ एकरा हेतु विदथक अनुमति राजा द्वारा लेल जाए आकि नहि तकर चर्चा अछि।
षष्ठ मण्डल
महावैराजी यज्ञक चर्चा अछि। समस्त दस्यु-ग्रामक दास बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि आ ओ सभ पशुपालन आ पणि कार्य कऽ सकैत छथि। नग्नजितक प्रसंग लए मंत्र गायन केनिहार ब्राह्मण, गविष्ठि युद्ध कएनिहार क्षत्रिय आ एकर अतिरिक्त्त जे कृषि विकासमे बेशी ध्यान दैत छलाह से विश- सामान्य जन छलाह मुदा एहिमे मायानन्द जी वैश्य शब्द सेहो जोड़ि देने छथि।
सप्तम मण्डल
बर्बर उजरा आर्यक आक्रमणक चर्चा आब जा कए भेल अछि। प्रायः विदेशी विशेषज्ञक एक भागक संग मायानन्द जी सेहो पैशाची आक्रमणकेँ बादमे जा कए बूझि सकलाह आ एकरा सेहो आर्यक दोसर भाग बना देलन्हि। आर्य हरियूपियाकेँ डाहि कए नष्ट कए देने छलाह एकर फेर चर्च आबि गेल अछि। मोहनजोदड़ो आतंकसँ उजड़ि गेल फेर भूकम्पो आयल ताहूसँ नगर ध्वस्त भेल। आब मायानन्दजी ओझराएल बुझाइत छथि। वर्षा कम होएबाक सेहो चर्चा अछि।
अष्टम् मण्डल
ऋषिग्रामक चर्चा अछि। कुलमे दास आ दासी होएबाक संकेत अछि। वृषभ पालनक सेहो संकेत अछि। मंत्र-पुत्रक ग्रामांचल चलि जएबाक आ विशः-वैश्य बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि। मुदा आगाँ मायानन्दजी ओझराइत जाइत छथि। कश्यप सागर तटसँ प्रस्थान-पूर्व द्यौस आ त्वराष्ट्री केर गौण देव भऽ जएबाक चर्चा अछि। ब्राह्मण आ क्षत्रियक विभाजन नहि होएबाक चर्च अछि आ क्यो कोनो कर्म करबाक हेतु स्वतंत्र छल। देवासुर संग्राम आ हेलमन्द तटक युद्ध आ पशुपालनक चर्चा अछि। पश्चात ब्रह्मण आ क्षत्रियक कर्मक फराक होएब प्रारम्भ भए गेल। पश्चात् मंत्र-द्रष्टा ऋषि द्वारा मंत्रमे देवक आ अपन नाम राखब प्रारम्भ भेल- एकर चर्चा अछि।श्रुति अभ्यासक प्रारम्भ होएबाक चर्चा अछि कारण मंत्रक संख्या बढ़ि गेल छल।
नवम् मण्डल
वस्तु विनमयक हेतु हाट व्यवस्थाक प्रारम्भ भेल। हाटमे मृत्तिका प्रभागमे दास-शिल्पी पात्रक उपस्थिति आ वस्त्र प्रभागक चर्चा अछि। मृत्तिका, हस्ति-दन्त, ताम्र सीपी आदिक बनल वस्तुजातक चर्चा अछि। शिशु-रंजनक वस्तुजात - जेना हस्ति, वृषभ आदिक मूर्त्तिक, लवणक, अन्नक, काष्ठक आ कम्बलक बिक्रीक चर्चा अछि।
दशम् मण्डल
श्वेत-जनक आगमनक -बर्बर श्वेत आर्य- सूचना नागजनकेँ भेटबाक चर्चा अछि। नाग जन द्वारा अपन दलपतिकेँ राजा कहल जाएब, नागक पूर्व-कालमे ससरि कए यमुना तट दिशि आएब आ ओतुक्का लोककेँ ठेल कए पाछाँ कए देबाक सेहो चर्चा अछि।कृष्ण जनक काष्ठ दुर्ग आ नागक संग हुनका लोकनिकेँ सेहो अनास कहल गेल अछि। मुदा ओ लोकनि दीर्घकाय छलाह आ नागजन कनेक छोट। एहि मण्डलमे दासक संग शूद्रक आ गंगा तटक सेहो चर्चा आबि गेल अछि। आर्य, दास आ शूद्रक बीचमे सहयोगक संकेत अछि।
अंतमे ऋचालोक नामसँ भूमिका लिखल गेल अछि। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि, हित्ती मित्तानी चलल आ आर्य पूर्व दिशा दिशि बढ़ल- एहि सभ तथ्यक आधार पर लिखल ई मंत्रपुत्र ऐतिहासिकताक सभटा मानदण्ड नहि अपना सकल।
मायानन्द मिश्रजी साहित्यकारक दृष्टिकोण रखितथि आ पाश्चात्य इतिहासकारक एक भाग द्वारा पसारल गॉसिपसँ बचितथि तँ आर्य आक्रमणक सिद्धांतकेँ नकारि सकितथि। सरस्वतीक धार ऋगवेदक सभ मंडलमे अपन विशाल आ आह्लादकारी स्वरूपक संग विद्यमान अछि। सिन्धु आकि सरस्वती नदी घाटीक सभ्यता तखन खतम आकि ह्रासक स्थितिमे आएल जखन सरस्वती सुखा गेलीह। अथर्ववेदमे सेहो सरस्वती जलमय छथि। ऋगवेदमे जल-प्रलयक कोनो चर्च नहि अछि आ अथर्ववेदमे ताहि दिशि संकेत अछि। भरतवासी जखन पश्चिम दिशि गेलाह, तखन अपना संग जल-प्रलयक खिस्सा अपना संग लेने गेलाह। जल-प्रलयक बाद भरतवासी सारस्वत प्रदेशसँ पूब दिशि कुरु-पांचालक ब्रह्मर्षि प्रदेश दिशि आबि गेलाह।
सरस्वती रहितथि तँ बात किछु आर होइत मुदा सुखायल सरस्वती एकटा विभाजन रेखा बनि गेलीह, आर्य-आक्रमणकारी सिद्धांतवादी लोकनिकेँ ओहि सुखायल सरस्वतीकेँ लँघनाइ असंभव भऽ गेल।
सिन्धु लिपिक विवेचन सेहो बिना ब्राह्मीक सहायताक संभव नहि भऽ सकल अछि।
ग्रिफिथक ऋगवेदक अनुवादक पादटिप्पणीमे पहिल बेर ई आशंका व्यक्त्त कएल गेल जे आर्य आक्रमणकारी पश्चिमोत्तरसँ आबि कए मूल निवासीक दुर्ग तोड़लन्हि। दुर्गमे रहनिहार बेशी सभ्य रहथि। १९४७ मे ह्वीलर ई सिद्धांत लऽ कए अएलाह जे विभाजित पाकिस्तान सभ्यताक केन्द्र छल आ आर्य आक्रमणकारी विदेशी छलाह। एकटा भारतीय विद्वान रामप्रसाद चंद ताहिसँ पहिने ई कहि देने रहथि जे एहि नगर सभक निवासी ऋगवेदक पणि छलाह। मुदा मार्शल १९३१ ई मे ई नव गप कहने छलाह जे आर्यक भारतमे प्रवेश २००० ई.पूर्व भेल छल आ तावत हड़प्पा आ मोहनजोदड़ोक विनाश भऽ चुकल छल। १९३४ मे गॉर्डन चाइल्ड कहलनि जे आर्य संभवतः आक्रमणकारी भऽ सकैत छथि। १९३८ मे मकॉय मोहनजोदाड़ोक आक्रमणकेँ नकारलन्हि, किछु अस्थिपञ्जड़क आधार पर एकरा सिद्ध कएनाइ संभव नहि। डेल्स १९६४ मे एकटा निबन्ध लिखलन्हि ‘द मिथिकल मसेकर ऑफ मोहंजोदाड़ो’ आ आक्रमणक दंतकथाक उपहास कएलन्हि। तकर बाद ह्वीलर १९६६ मे किछु पाछाँ हटलाह मुदा मकॉयक कबायलीक बदलामे सभटा आक्रमणक जिम्मेदारी बाहरी आर्यगणक माथ पर पटकि देलन्हि। आब ओ कहए लगलाह जे आर्य आक्रमणकेँ सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि मुदा ज्योँ ई संभव नहि अछि तँ असंभव सेहो नहि अछि। स्टुआर्ट पिगॉट १९६२ धरि ह्वीलरक संग ई दुराग्रह करैत रहलाह। पिगॉट आर्यकेँ मितन्नीसँ आएल कहलन्हि। नॉर्मन ब्राउनकेँ सेहो पंजाब प्रदेशक शेष भारतक संग सांस्कृतिक संबंधक संबंधमे शंका रहलन्हि। संस्कृत आ द्रविड़ भाषाक अमेरिकी विशेषज्ञ एमेनो लिखलन्हि जे सिन्धु घाटी कखनो शेष भारतसँ तेना भऽ कए सांस्कृतिक रूपसँ जुड़ल नहि छल। जे आर्य ओतए अएलाह सेहो ईरानी सभ्यतासँ बेशी लग छलाह।
मुदा पॉर्जिटर १९२२ मे साहित्यिक परम्परासँ सिद्ध कएलन्हि जे भारत पर आर्यक आक्रमणक कोनो प्रमाण नहि अछि। ओ सिद्ध कएलन्हि जे भारतसँ आर्य पश्चिम दिशि गेलाह आ तकर साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध अछि। लैंगडन सेहो कहलन्हि जे आर्य भारतक प्राचीनतम निवासी छलाह आ आर्यभाषा आ लिपिक प्रयोग करैत छलाह। ब्रिजेट आ रेमण्ड ऑलचिन आ कौलीन रेनफ्रीव आदि विद्वान प्राचीन भारतक इतिहासक प्रति पूर्वाग्रहक विश्लेषण कएने छथि।
मितन्नी शासक मित्र, वरुण, इन्द्र आ नासत्यक उपासक छलाह। हित्ती राज्यमे सेहो वैदिक देवता लोकनिक पूजा होइत छल।आलब्राइट आ लैंबडिन सेहो दू हजार साल पहिने दक्षिण-पश्चिम एशियामे इंडो आर्य भाषा बाजल जाइत छल आ संख्यासूचक शब्द सेहो भारतीय छल, एहि तथ्यकेँ मानलन्हि।
ई लोकनि भारतीय छलाह आ ऋगवेदक रचनाक बाद भारतसँ बाहर गेल छलाह। बहुवचन स्त्रीलिंग रूप, ऋगवेदक देवगणक विशिष्ट रूप अन्यत्र उपलब्ध नहि अछि। इंडो योरोपियन देवतंत्रमे भारतीय देवीगणक विरलता पूर्ववर्त्ती भारतीय मातृसत्तात्मक व्य्वस्थाक बादक योरोपीय परवर्त्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्थाक परिचायक अछि।
आब आऊ सुमेरक जल प्रलयपर जेकि ३१०० ई.पू. मे मानल जाइत अछि। भारतीय कलि संवत ३१०२ ई.पू. मानल जाइत अछि। अतः एहि तिथिसँ पूर्व ऋगवेदक पूर्ण रचना भऽ गेल छल।
देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि आदि गप पोथीक समाप्ति पर ऋचालोकमे मायानन्द जी लिखैत छथि। किछु पाश्चात्य विद्वान सेहो ऋगवेदक दार्शनिक महत्वकेँ कम करबाक लेल ई गप कहैत छथि जे यूनानमे देवतंत्र पूर्ण रूपसँ पल्लवित छल मुदा ऋगवेदिक समाज घुमंतु छल आ देवतंत्र ताहि द्वारे विकसित नहि छल। ओ लोकनि ई सेहो कहैत छथि जे ऋगवेदक रचना अश्व पर घुमंतु जीवन यापित केनहार पश्चिमी आक्रमणकारी कएने छथि। ऋगवेदिक कवि लोकनि आरंभिक सामूहिक संपत्ति आ रक्त्त संबंध आधारित गणसमाज दुनूसँ परिचित छलाह मुदा स्वयं ओहिसँ बाहर आबि गेल छलाह आ व्यक्त्तिगत आ कुटुम्बक संपत्तिक आधार बला व्यवस्था शुरू कए देने छलाह। संपत्ति पुरुष केंद्रित आ परिवार पितृसत्तात्मक छल। मुदा मातृसत्तात्मक व्यवस्थाकेँ ओ बिसरल नहि छलाह कारण ओ आपः मातरः कहि बहुवचनमे जलदेवीक उपासना आ स्मरण करैत छथि, संगहि मरुतगण सदिखन गणक रूपमे स्मरण आ उपासना करैत छथि।
आब जा कए एंगेल्स कहैत छथि जे यूनानमे मातृसत्तासँ पितृसत्ता प्राचीन कालक सभसँ पैघ क्रान्ति छल। ई क्रान्ति ऋगवेदिक कालमे घटित भए गेल छल। श्रमक वैशिष्टीकरणसँ उत्पादनमे गोत्रक भूमिका घटि जाइत अछि आ कुटुम्बक बढ़ि जाइत अछि। गण, गोत्र, कुल आ कुटुम्बक क्रमशः विकास सामूहिक भूसंपत्तिक संगठनसँ होइत अछि। ऋगवेदमे कुम्भकार, कमार (काष्ठकार), लोहार आ धातु शिल्पक चर्च अछि। प्राचीन ईरानमे असुरक प्रतिरूप अहुरक प्रयोग भेल। ओ लोकनि एकर उपासक छलाह मुदा असुर-उपासक भारतीय जनक प्रभाव ईरान धरि सीमित छल, आगाँ एकर प्रसार नहि भेल। भारतमे असुर दुष्ट छथि मुदा ईरानमे देव दुष्ट छथि। असुरक गरिमा सम्पूर्ण ऋगवेदमे अछि। कोनो मण्डल एहन नहि अछि जाहिमे कोनो एक वा आन देवताकेँ असुर नहि कहल गेल होअए। मुदा एहनो असुर छथि जे देवक विरोधमे छथि आ इन्द्रसँ एहन अदेवाः असुराः केर नाशक हेतु आह्वाण कएल गेल अछि।इन्द्रक समान अग्नि सेहो असुरक नाश करैत छथि आ इन्द्र आ बृहस्पति दुनू गोटे स्वयं असुर छथि। असुर देवताक उपाधि छल। ऋगवेदमे देव आ असुरक सदृश असुर एकटा भिन्न वर्ग छल असुर श्वास लैत छलाह मुदा देव नहि। देवसँ असुर बेशी प्राचीन छथि ताहि द्वारे असुर वरुण देव आ मनुष्य दुहूक राजा छथि।
पैशाची त्वग् त्वचा भारतमे कहियो तेहन आह्लादसँ नहि देखल गेल । ओहिनो आर्य आक्रमण पोषक सिद्धान्तकार जे ई तथ्य उदाहरणार्थ देखथि जे दक्षिण भारतीय ब्राह्मण, कश्मीरी ब्राह्मण आ नेपालक ब्राह्मण मे त्वचा नहि वरण रूप सेहो भिन्न अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे ई सभ स्थानीय जन छथि आ जाति-व्यवस्थामे ताहिरूपेँ सम्मिलित भेल छथि । कारण पाँच-सए आ हजार बरखमे मानवशास्त्रीय आ वैज्ञानिक रूपेँ ओतेक रूप-रंगक अन्तर सम्भव नहि। जे यूरोपवासी दक्षिण अमेरिका-अफ्रीकामे छथि तिनको, आ जे नीग्रो-रेड इन्डियन अमेरिका-अफ्रीका-यूरोपमे छथि तिनको रूप रंगमे कोनो परिवर्तन पाँच सए बरखमे नहि आएल छन्हि। ई लाख बरखक आवाससँ सम्भव होइत अछि जे गरम प्रदेशक निवासी कारी आ ठंढ प्रदेशक गोर होइत छथि ।
पुरोहित
पुरोहित हिन्दीमे अछि आ श्रृँखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि।
पुरोहित केर आरम्भ दूर्वाक्षत आशीर्वचन मंत्रसँ होइत अछि। शुक्ल यजुर्वेदक अध्याय २२ केर मंत्र २२ “ॐ आब्रह्मन…” सँ “नः कल्प्ताम्” धरि अछि। मिथिलामे एहि मंत्रक संग अन्तमे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव”। एकर सेहो मंत्रोच्चार होइत अछि आ एहि चारि पादसँ ई मंत्र आशीर्वचनक रूप लए लैत अछि।
यजुर्वेदीय २२/२२ मंत्र सौसेँ भारतमे देशभक्त्ति गीतक रूपमे मंत्रोच्चारित होइत अछि।
दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बड़द भार वहन करएमे सक्षम होथि आ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होअए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बड़द ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/ संरक्षित करी।
तकर बाद लेखकीय प्रस्तावना जकरा पुरोहितमे विनियोगक नाम देल गेल अछि, केर प्रारम्भ होइत अछि। पुरोहित शतपथ ब्राह्मणकालीन समाज पर आधारित अछि।
विनियोगमे पूर्व आ उत्तर वैदिक युग, महाभारत काल इत्यादिक काल निर्धारण पर चरचा कएल गेल अछि। संन्यास आ मोक्ष धारणाक प्रवेश, सूत्र साहित्य, आरण्यक आ उपनिषद आ ब्राह्मण ग्रंथक रचनाक सेहो चरचा अछि।कर्मणा केर बदलामे जन्मना सिद्धांतक प्रारम्भ आ शूद्र शब्दक उद्भव, नगरक, आहत मुद्राक, उद्योगक सुदृढ़ीकरणक आ लोहाक प्रयोगक सेहो चरचा भेल अछि। फेर मायानन्द जी ई लिखि जाइत छथि जे दाशरज्ञ युद्ध ई.पू. १८०० मे भेल- भरत आ कुशिक-कस्साइटक सम्मिलित समूह सरस्वती तटसँ व्यास नदी पार करैत इलावृत पर्वत प्रदेश होइत ; आ ओ लोकनि कोशल मिथिलाक राजतंत्रक, कुरु-पांचालक संस्कृतिक विकसित होएबासँ पूर्वहि, स्थापना कएने छलाह।
पुरोहित तेरह टा सर्गमे विभक्त्त अछि आ एकर अन्त उपसंहारसँ होइत अछि। प्रथम सर्ग दक्षिण पांचालक कांपिल्य नगरसँ शुरू होइत अछि। अथर्वणपल्लीक पशुशालामे साँझ होइत देरी उठैत धुँआक चरचा अछि। मेधा आ कुशबिन्दुसँ कथा आगू बढ़ैत अछि। ऋषि गालबक आश्रममे ऋगवेदकेँ कंठाग्र कराएल जएबाक आ बादमे जा कए कृषि संबंधी शिक्षा देल जएबाक वर्णन अछि।
दोसर सर्गमे राजा प्रवाहण जैबालिक मूर्ख पुत्र द्वारा ब्राह्मणक अपमानक, प्रथम श्रोत्रिय आ दोसर पुरोहित ब्राह्मणक वर्णन अछि।
तेसर सर्गमे आचार्य चाक्रायणक अपमानक कारण पुरोहित वर्ग द्वारा पौरहित्य कर्म नहि करबाक निर्णयसँ प्रजाजनक दैनिक अग्निहोत्र कार्य आ बिना लग्नक कृषि आ वाणिज्य कार्यमे होअए बला भाङठक वर्णन अछि।
चतुर्थ सर्गमे व्यास कथा आ भारत युद्धक चर्चा अबैत अछि आ एतए मायानन्द जी पाश्चात्य दृष्टिकोणक अनुसरण करैत छथि। जय काव्यकेँ भारत युद्धकथाक रूप दए देल गेल- ई वक्त्तव्य अनायासहि दए रहल छथि मायानन्द मिश्र।
पाँचम सर्गमे वैश्य द्वारा उपनयन संस्कार छोड़बाक चरचा अछि मुदा क्षत्रिय पुत्र आ पुत्री दुनूक उपनयन करैत छलाह। वैश्य कन्या शिक्षासँ दूर जा रहल छलीह आ ब्राह्मण कन्या गुरुकुलक अतिरिक्त पितासँ शिक्षा लए रहल छलीह। ब्राह्मणकेँ पौरहित्यसँ कम समय भेटैत छलन्हि।
छठम सर्गमे ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अथर्व वेदकेँ नहि मानबाक चरचा अछि।
सातम सर्गमे अथर्वनपल्लीमे अथर्ववेदीय संस्कारक शिक्षा आ प्रथम श्रेणीक ब्राह्मण द्वारा ओतए नहि जएबाक चरचा अछि।
आठम सर्गमे इद्रोत्सवमे रथदौड़, अश्वारोहण, मल्लयुद्ध, असिचालन, लक्ष्यभेद आ विलक्षण अनुकृतिक चरचा अछि आ व्यासपल्लीक लोक द्वारा अनुकृति करबाक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे व्रात्य करुष भारत युद्धक कथा कहि रहल छलाह। भारत युद्धक बहुत पूर्व भरत, त्रित्सु, किवी आ सृंजय मिश्रित जनक आर्यवर्तमे शूद्र नामसँ सुमेरियाक जियसूद्रक स्मृतिमे अपनाकेँ गौरव देबाक हेतु सूद्र कहबाक वर्णन अछि।
नवम सर्गमे तन्तुवाय द्वारा स्त्री निमित्त वस्त्रमे तटीयता देल जएबाक कारण भेल अन्तरक चरचा अछि, पहिने ई अन्तर नहि छल। अथर्वण आ याज्ञिक ब्राह्मणमे भेदक चरचा अछि।
दशम् सर्गमे शिश्नदेवक पूजा अनार्य द्वारा होएबाक आ अथर्वण पुरोहित द्वारा एकर अनभिज्ञताक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे अक्षर लिपिक प्रयोग आ आचार्य गालबक श्रुति आश्रममे अंक लिपिक अतिरिक्त्त किछु अन्य देखब वर्जित होएबाक गप कहल गेल अछि।
एगारहम सर्गमे गालब आश्रममे दण्डनीति पर चरचा निषिद्ध होएबाक बादो दक्षिण पांचालक सभासदक आग्रह पर एतद संबंधी चरचा होएबाक गप अछि। राजा शिलाजित द्वारा राजपद प्रधान पुरोहितकेँ देबाक चरचा अछि।
बारहम सर्गमे भारत युद्धक बाद नियोग प्रथाक अमान्य भऽ बन्द भऽ जएबाक बात अछि। शिश्नदेवक शिवदेवसँ एकाकारक चरचा सेहो अछि।
तेरहम सर्गमे क्रैव्यराजक अभिषेक उत्सवक चरचा अछि। दूर्वाक्षत मंत्रमे
“ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव” आ दीर्घायुर्भव केर मेल शुक्ल यजुर्वेदक २२/२२ मंत्रसँ कए दूबि अक्षत लए, विशेष लए ताल गति यति मे गएबाक वर्णन अछि। एकर अनुवाद सेहो मायानन्द जी देने छथि, जे ग्रिफिथक अनुवादसँ प्रेरित अछि:-
समस्त विश्वमे ब्राह्मण विद्याक तेजक वर्चस्व स्थापित करए बला, सर्वत्र, वाण चलएबामे निपुण, निरोगि, महारथी, शूर, यजमान राज्य सभक जन्म होए, सर्वत्र अधिकाधिक दूध दएबाली धेनु होए, शक्तिशाली वृषभ होए, तेजस्वी अश्व होए, रूपवती सध्वी युवती होथि, विजयकामी वीरपुत्र होथि, जखन हम कामना करी पर्जन्य वर्षा देथि, वनस्पतिक विकास होए, औषधि फलवती आ सभ प्राणी योगक्षेमसँ प्रसन्न रहथि।राजन शतंजीवी होथि।
क्रैव्यराजक अभिषेकक लेल ई मंत्र हाथमे अक्षत, अरबा, ब्रीहि आ दूर्वादल लए आ मंत्र समाप्ति पश्चात राजा पर एकरा छीटबाक आ फेर दहीक मटकूरीसँ दही लए महाराजक भाल पर एहिसँ तिलक लगएबाक वर्णन अछि। एहि प्रकरणमे मायानन्द जी लिखैत छथि जे एहि मंत्रक, जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत मंत्र कहल जाइत अछि, रचना याज्ञवल्क्य द्वारा वाजसनेयी संहिताक लेल कएल गेल। एहि मंत्रक उपयोग मिथिलामे उपनयनक अवसर पर बटुकक लेल आ विवाहक अवसर पर वर-वधुककेँ आशीर्वचनक रूपमे प्रयुक्त होअए लागल।
पुरोहितक अन्त होइत अछि उपसंहारसँ। एतय वर्णित अछि, जे काशीक रस्ताक अनार्य ग्रामक आर्यीकरण भेल आ व्रात्यष्टोम यज्ञ भेल। शिश्नदेवाः पर चरचा अछि, शुनःशेप आख्याण आ भारत कथाक कहबाक परम्पराक प्रारम्भ आ मगध द्वारा आर्य धर्मक प्रति वितृष्णाक चर्च सेहो अछि।
मायानन्दजी महाभारतक समस्याक समाधानमे सेहो पाश्चात्य विचारक लोकनिक अनुसरण करैत बुझना जाइत छथि। प्रोफेसर वेबर पहिल बेर एहि सिद्धांतकेँ लए कए आएल छलाह। ओ अपन विचार व्यक्त कएने छलाह जे ८८०० पद्यक जय संहिता छल आ पहिने युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) मात्र छल। ओकर आधार ओ बनेने छलाह एकटा श्लोककेँ-
अष्टौश्लोक सहस्राणि..... अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा
संजय, व्यास आ शुक तीनू गोटे ८८००-८८०० प्रत्येक कए भारतक श्लोक मात्र स्मरण कए सकल छलाह। माने भारत एतेक विशाल छल जे प्रत्येक गोटे सम्पूर्ण स्मरण नहि कए सकल छलाह आ ताहि दृष्टिसँ भारत कहियो २६४०० श्लोकसँ कम नहि छल, जकरा व्यास लिखने छलाह। जय संहिता भारत आ महाभारत दुनूकेँ कहल जाइत छै। युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) तेना ने परस्पर दोसर पर्व सभसँ जुड़ल अछि जे बिना पछिला पर्व पढ़ने अगिलाक कोनो भाँज नहि लगैत छै। इलियडक युद्ध १० साल धरि चलल छल मुदा इलियड मात्र ट्रॉयक घेरा धरि सीमित छल। मुदा महाभारत बहुत पहिने सँ १८ दिनुका युद्धक कारणसँ शुरु होइत अछि। भीष्म पर्व छठम पर्व अछि, द्रोण पर्व सातम, कर्ण पर्व आठम आ शल्य पर्व नवम। तकरा बाद ९ टा पर्व आर अछि।
किएक तँ कैक बैसारीमे महाभारत केर पाठ सुनाओल जाइत छल ताहि द्वारे ई स्वाभाविक अछि जे पुरान पाठ सभ जे भए चुकल छल केर फेरसँ पुनःस्मरण बेर-बेर कएल जाइत छल। ताहिसँ ई अर्थ निकालब जे ई क्षेपक अछि, अनर्गल होएत। तहिना गीता सेहो पाश्चात्य विद्वान लोकनिक लेल क्षेपक अछि कारण ओ लोकनि भारतीय संस्कृति, साहित्य आ कलाक अनुभव विदेशी मानसिकतासँ करबाक कारण गलती करैत छथि। विदेशी विद्वान ई मानबामे कष्ट अनुभव करैत छथि जे महाभारत ओतेक पुरान भेलाक बादो ओतेक वृहत् अछि आ इलियड ओकर सोझाँ किछु नहि अछि। से एक गोट पद्यक वेबर द्वारा कएल गेल मिथ्या व्याख्याक आधार पर जय संहिता केर संकल्पना आएल। मात्र भारत आ महाभारत केर रूपमे एहि महाकाव्यक विकासकेँ बिना कोनो कारणसँ जय संहिता, भारत आ महाभारत रूपी तीन चरणमे प्रस्तुत कएल गेल। महाभारत केर सभसँ छोट रूपमे सेहो २४६०० सँ कम श्लोक नहि छल आ जय संहिता भारत आ महाभारतकेँ सम्मिलित रूपसँ कहल जाइत छल।
स्त्रीधन
ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आ ई सूत्र-स्मृतिकालीन उपन्यास मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि।
मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आएल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि।
ई ग्रन्थ प्रथम आ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि।
प्रथम अध्याय
प्रथम सत्र
एहिमे सृंजय द्वारा कएल जा रहल धर्म-पश्चात्ताप स्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि।
“द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि।
द्वितीय सत्र
राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि।
तृतीय सत्र
एतए पुरान आ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी।
चतुर्थ सत्र
एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि तँ संगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्यखण्ड केर उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह।
पंचम सत्र
प्रणिपात, आशीर्वचन आ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आएल अछि। ईहो वर्णन आएल अछि जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल आ भारत-युद्धमे ओ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त धरि कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि।
षष्ठ सत्र
पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि आ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकाय भारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि जेना कोनो विशेष तथ्य होअए।
फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि।
सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि।
सप्तम् सत्र
सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि।
अष्टम् सत्र
राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि।
नवम् सत्र
सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि।
पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आ ताहिसँ वन्यजन आ शूद्र जनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि। सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा कराल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि। चिकित्साशास्त्रक नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि, संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि। ओ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि।
द्वितीय अध्याय
प्रथम सर्ग
सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि। आ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि।
द्वितीय सर्ग
सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिशि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि आ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि।
तृतीय सर्ग
अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन-सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि।
चतुर्थ सर्ग
आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आ द्रविड़ शब्द दुनू , पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि। मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि।
पञ्चम सर्ग
दिनमे एकभुक्त आ रातिमे दुग्धपान मिथिला आ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर- आ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब !
षष्ठ सर्ग
अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनका सभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आ पशु चर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि।
विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत, तकर चर्च अछि।
सप्तम सर्ग
उसना चाउरक अधिक सुपाच्य होएबाक आ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आ ताहि लेल आवास-भूमि आ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि।
अष्टम सर्ग
कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आएल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल।
उपसंहार
दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल। वैशाली आ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल।
भाषा विज्ञान प्रसंग - ऋगवैदिक ऋचामे प्राकृतक किछु विशेष शब्द, ध्वनि, प्रत्यय आ वाक्य रचना भेटैत अछि। पाणिनी संस्कृतकेँ मानक भाषा आ प्रादेशिक तत्वसँ मुक्त भाषाक रूप देने छलाह। कर्णाटकमे पानिकेँ नीरू आ उत्तर भारतमे जल कहल जाइत अछि। पानिक ई दुनू रूप संस्कृतमे भेटत। प्राकृतिक तत्वसँ मुक्त भाषा बनेबाक लेल पाणिनी कोनो क्षेत्रक अवहेलना नहि कएने छलाह वरण सभ क्षेत्रक शब्दकोष लए उच्चारणक भेदकेँ खतम कएने छलाह। बहुत रास प्राकृत शब्द संस्कृतमे ध्वन्यात्मक संशोधन कए लेल गेल आ ताहिसँ बादमे ई धारणा भेल जे प्राकृतक शब्द सभ तद्भव छल। संस्कृतमे तद्भव ताहि कारणसँ नहि देखबामे अबैत अछि। तहिना अपभ्रंश आ प्राकृत भाषा सौँसे देशमे घुमए बलाक भाषा छल।
भारतमे देवतंत्रक विकास पानि संबंधी धारणासँ जुड़ल अछि। यावत विश्व अव्यक्त अछि तँ अन्धकारमय अछि, अकास अछि, व्यक्त भेलापर ओ जल बनि जाइत अछि। अकास आ जल दुनू भारतीय चिन्तनमे तत्व अछि। मूर्तिपूजनक जे चित्र मायानन्दजी चित्रित करैत छथि ओ सरलीकरण अछि। भाषा-प्रसारक जे विधि ओ स्त्रीधनमे देखबैत छथि सेहो अति सरलीकरण अछि।
श्रवण द्वारा परम्पराक निर्वहण साहित्यमे देखल गेल छल आ से महाभारतमे किछु ठाम बेर-बेर देखबामे अबैत अछि , से ताहि कारण कतेको पर्वकेँ क्षेपक कहल जाएब सम्भव नहि। वेदक प्रतिशाख्यकेँ ओना देखलापर ई ज्ञात होएत जे लिखबाक परम्पराक अछैत ई सम्भव नहि छल मुदा महाभारत अबैत-अबैत कट्टरता बढ़ल। महाभारतमे वर्णन अछि:
वेदविक्रयिणश्चैव वेदानांचैवदूषकः।
वेदानांलेखकश्चैव तेवै निरयगामिनः॥
(वेदक विक्रेता, गलत-व्याख्या कएनिहार आ लेखक, सभ नरकक पथपर गेनिहार छथि।)
कराल प्रसंग : कराल जनकक कुकृत्यक वर्णन अर्थशास्त्रमे एना आएल अछि:
(१.६ विनयाधिकारिकेप्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायःइन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्याग) : तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपिराजा सद्यो विनश्यति- यथा
दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रोविननाश करालश्च वैदेहः,...।
भिक्षु प्रभामतीक जयमंगल भाष्य एहिमे जोड़ैत अछि जे कराल योगेश्वर तीर्थमे भीड़ दिशि देखैत काल एकटा सुन्दर ब्राह्मण-स्त्रीकेँ देखलक आ ओकरा अपन राज्य जबर्दस्ती लए गेल। ओ ब्राह्मण ओकर राजधानी गेल आ कानि खीजि कए कहलक जे ई धरती किएक नहि फटैत अछि जतए एहन कुकर्मी राजा रहैत अछि। धरती फाटल आ ओहिमे कराल परिवार समेत धसि कए मरि गेल।
एकटा ब्राह्मण स्त्रीक अपहरण करालक पतनक कारण छल ई चरचा अश्वघोषक बुद्धचरितमे सेहो आएल अछि जेना कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे आएल अछि। मुदा दीपवंश कराल जनकक बाद ओकर पुत्र आ पौत्रक राजा होएबाक वर्णन करैत अछि। ब्राह्मण ग्रंथ सभ विदेहकेँ राजशाही आ बौद्ध ग्रन्थ सभ गणतंत्र (राजा समिति द्वारा चुनल) कहैत अछि आ मत विभिन्नताक से कारण।
एहि प्रकारें मायानन्द मिश्रजीक ऐतिहासिक यात्रा बहुत रास एहन तथ्य अनलक जे कोनो तरहेँ तर्कसँ पुष्ट नहि भए सकल।
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डाॅ. देव शंकर नवीन (जन्म: 2 अगस्त 1962) मैथिली तथा हिन्दी मे एम.एण्, पी-एच.डी., भौतिकी मे एमए स-सी. तथा पुस्तक प्रकाशन एवं अनुवाद मे पी.जी. ...
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...