भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Tuesday, September 29, 2009

राजकमल चौधरी - सीता मृत्यु: अहिल्याक जन्म

प्रस्तावना
बिना कएने धरम-समाजक लोक-लाजक कोनो परवाहि
वृद्ध पितामह अनने छथि खोड़षीकें बिआहि...

परिस्थिति
पंडित सुधाकरजीक धर्मपत्नी द्वितीया, स्वकीया
आ हमर नवजात वासना परकीया
दुन्नू अछि बान्हल कुल-शील ससरफानीसँ
वैवस्वत मनुक महावाणीसँ
परनारीक नाम नहि लिअ’
परपुरुषकें दिअ’ देह नहि छूअ’
मनेच्छाक करू जुनि गप्प, हृदयधारकें राखू सम्हारि
देखू काटए नहि, बिखधरकें पहिनहि दिअ’ मारि
मोनक वातायन पर टाँगू मोट-मोट कारी-कारी परदा
खाइत रहू कामनाक माटि, फँकैत रहू निवृत्तिक गरदा
द्रवित, दुखित, भ्रमित रहू होइते आत्माक क्रन्दनसँ
बान्हल छेकल रहू स्मृति-पुराण संहिताक बन्हनसँ
लक्ष्मण-रेखासँ
नियतिक व्यंग्यपूर्ण लेखासँ...
कथा
मुदा, (ई ‘मुदा’ अछि कतेक नग्न, अछि कतेक भग्न)
अर्थार्जनमे सदिखन रहै छथि सुधाकरजी मग्न
जमीन्दर (पहिने छलाह। आब नेता) देशक द्वार पर प्रति राति
करैत गप्प शप्प ओएह जे जमिन्दारिनीकें सोहाति
बँचै छथि पुराण
बँटै छथि धर्मक ज्ञान, त्याग, बलिदान
जे एहेन छलाह राजा शिवि, एहेन छलाह दधीचि
कर्तव्य-रक्षार्थें अपने सोनितसँ धरा देलनि सींचि
एहेन छलीह गार्गी, मैत्रोयी, सीता, अनुसूया, सावित्राी
अपन शक्तिसँ केलनि गौरवान्वित ई धरित्राी
एहेन छलाह पूर्णपरब्रह्म श्रीकृष्ण भगवान
केलनि गोपिकाक रूप-गंगामे भरिपोख स्नान
... सुधाकरजी बँटै छथि मर्मज्ञान
आ, एम्हर हुनकर द्वितीया, बनि पूर्णिमाक चान
गबै छथि मधुर स्वरें कोनो नटुआसँ सूनल गान--
केहेन चतुर भौजाइ रे
मोन होइ छै दिअर संगें जाइ रे
कनकलता सन देहक कंचन फल छै
कतबो जतनहुँ आँचर तर ने समाइ रे...
सत्य
गबै छथि मधुर स्वरें गान, भ’ खिड़की लग ठाढ़ि
हमरा हृदयमे उठै’ए जेना कोसिकाक बाढ़ि
उफनै’ए कामनाक धार
(की हएत अनर्गल जँ रोकी नइं मोन-सागरक फेनिल ई ज्वार?)
उपसंहार
फूसि थिक मनुदेवताक स्मृति, फूसि थिक व्यासदेवक गीत
आइ थिक कलियुग, त्रोतामे मरलीह सीता
मरि गेलाह एक पत्नीव्रतधारी पुरुषोत्तम राम
नइं मरल मुदा, शिवक तृतीयो नेत्रा ज्वालासँ काम
भेलै नइं संसारक कोनो क्षति
सीताक मरनइं की, जीविते छथि एखन लक्ष-लक्ष रति
मरलीह एखनऊँ नइं गौतमक पत्नी अहिल्या सुकामा
मरलाह श्रीकृष्ण, जिबते अछि रूपभिक्षुक हमरा सन सुदामा
आ,
जनमिते रहती नितप्रति अगणित अहिल्या सुकुमारी
(ताकत अवस्से स्वस्थ वृक्ष, माधवी लता थिक नारी)
जावत अछि जीवित एक्कोटा बूढ़ बोको गौतम
नइं हटि सकत ई तम
गबिते रहती नारी परपुरुखक सहगान
करिते रहत पुरुख-जाति सहस्त्रा अहिल्याक धेआन...

Kurukshetram of the Inner Mind- KURUKSHETRAM ANTARMANAK [कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक] -A MAITHILI NOVEL BY GAJENDRA THAKUR- in English Translation

  Study Guide: Kurukshetram of the Inner Mind Kurukshetram of the Inner Mind   is a Maithili novel authored and translated into English by...