भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).

ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

 

(c) २००-२०२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.htmlhttp://www.geocities.com/ggajendra  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Showing posts with label पेटार. Show all posts
Showing posts with label पेटार. Show all posts

Sunday, October 11, 2009

पेटार ४२

अप्प.न बात

एहि बेरक बात थिक। विविधश्भाोरती रेडियो स्टेरषन सँ गीत सुनैत छलौ। एखन धरि मैथिली साहित्य. सॅ कम्मेोश्समम्मय सिनेह छल। ओना परिवार सॅ समाज धरि मैथिलिऐक बीच आठो पहर समय बीतैत अछि। कातिक पूर्णिमाक दिन रहने, समाजक माएश्बिहिन लोकनि सामा भसा आंगन दिषि सोहर गबैत घुमलीह। एकाएक हमरो कान मे, गीतक ध्वननि हवा मे छिछलैत अबै लगल। रेडियो बन्नग कऽ सोहर सुनै लगलहुँ। गीतक स्वकर हृदय केॅ झकझोड़ए लगल। जेहने माएश्बलहीनि लोकनिक स्व्रक मधुर टाँस तेहने एकरुपता। जहिना बहीनि, माएश्बा.प समाजक सखीश्सडहेली छोड़ि, सासुर जेबा काल, अपन क्रन्दिन स वातावरण केॅ शोकाकुल बनबैत आ सखीश्सडहेली सोहरक स्वलर सॅ विदा करैत, तहिना भऽ गेल। हृदय विदीर्ण हुअए लगल।
अनायास मन मे सवाल उठै लगलश्‍
(क) श्‍ की हमर कलाश्सारहित्यल, भूमण्डललीकरण स, आगू बढ़त?
(ख) श्‍ आ कि जतय अछि ततय, अजेगर सॉप जेॅका थुसकुरिया मारि, बैसल रहत?
(ग) श्‍ आ कि हमर कलाश्सािहित्या मटियामेट भऽ जायत?
एहि प्रष्नअक बीच उलझल मोन मे, डिबियाक टिमटिमाइत इजोत जेकॉ, आयल जे अपनो मातृभाषा आ मातृभूमिक सेवा लेल किछु कयल जाय! एहि जिज्ञासाक संग अपने लोकनिक बीच, एकटा छोटश्छीलन पोथी ‘संस्कालर गीत' राखि रहल छी। आषा अछि जे अधला पर ध्याबन नहि दऽ, आगूक सेवा लेल पे्ररित आ प्रोत्सा हित जरूर करब।
गीतक संकलन किछु पोथिओक अछि आ अधिकतर माएश्बकहीनिक कंठक सेहो अछि। जहि गीतिकार लोकनिक गीत संकलित अछि, हुनक आभारी छी। आ जे गीत माएश्बाहीनि लोकनिक कंठक अछि, ओ जहिना कहलनि तहिना लिखलो गेल अछि तेॅ शब्द क फेड़िश्फाहड़ आ टूटल सेहो अछि।
गीतक संकलन करै मे अग्रज सुरेष मंडल आ अनुज मिथिलेष मंडलक भरपूर सहयोग रहल।



अपनेक
उमेष मंडल

पोथिक मादे

संस्काणर कल्प ना थिक। हमरा सभक बीच संस्कालरक प्रयोग विभिन्न। रूप मे विभिन्ना जगह पर होइत अछि। ओना जहि रूप मे संस्कालरक प्रयोग हमरा सभक बीच होइत, ओ मन्दक आ कुषाग्र रूप मे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रष्नॅ अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तॅ किऐक? एखन हम एहि प्रष्नचक उत्तर नहि द शास्त्री य प्रयोग दिषि नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य? कतिपय अपदार्थ के दूर करैक हेतु संस्कापरक कल्प ना कयल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहि सॅ शरीर आ मन परिष्कृषत होइत अछि। शालीनता आ शिष्टनता मनुष्यऐताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिपक साधन थिक संस्कालर कर्म। दषर्न शास्त्रतक अनुसार भोग्यख पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्काृर कर्म। मनुष्यलक अव्य क्त मन पर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समय अयला पर ओ प्रकट भऽ जायत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्माॅन्तरक संस्कारर। धर्मशास्त्री लोकनि संस्कारर केॅ शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुणश्दोाषक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कयलनि अछि।
आष्वरलायन अपन गृहसूत्र मे एगारह तरहक संस्कापरक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्य्टल बारह तरहक। गौतम भिन्नरश्भिंन्ना दैवयज्ञ केॅ संस्कानर मे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्यान धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समय हिन्दूद मे बारह संस्कापर प्रचलित छल। मिथिला मे सोलह तरहक संस्कािरक विधान मान्यि अछि ई थिकश्‍ गर्भधान, पुंसवन, सीमन्तो।न्नायन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रामण, अन्न प्राषन, चूड़ाकर्म, कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भत, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थू, सन्या्स आ अन्येषनर ष्टिस। एखन सिर्फ पाँच तरहकश्‍ जन्मर,मूड़न,उपनयन,विवाह आ मृत्युस संस्का्रक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जाति मे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरि मे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनिये टा संस्कातर जन्म ,विवाह आ मृत्युन अछि।
संस्कासरक कल्पइना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पयष्ट अछि जे संस्कासरक शासन जीवन पद्धति के खास ढ़ंग सॅ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुटखी बनयवाक लेल देल गेल। शुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवनश्य्तिरवस्थासक आवष्योकता अथवा स्थि तिक उपस्थििति दिषि संकेत करैत अछि। कहैक तात्पेर्य जे आर्यश्अ्नार्यक घालमेल सँ उपजल सामाजिक स्थि ति मे संस्कावरक माध्यनम सॅ अपन अस्मि्ता के सुरक्षित रखवाक ब्राहम्‌णवादी चिन्तंनक परिणाम थिक संस्काधर। मध्यसकाल मे संस्काअरक पालन पर बेसी जोर देल गेल। ओना दोषक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थिातिक प्रभवक कारणे समाज मे कखनो बेटिक त कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि।
आइ जकरा मैथिल संस्कृिति कहल जा रहल अछि,से की वस्तुातः मिथिलाक संस्कृतति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिषि देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटिश्बा?लू सँ बनल अछि। नदी प्रदेषक एहि भूभाग पर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियान मे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अयलाह ओ द्विज बनि के एहि प्रदेष पर सत्ता स्थाकपित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जाि केलनि आ ब्राह्‌मणक हाथ मे समाज सत्ता आयल। वैष्वतलोकनि अर्थसत्ताक स्वा मी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्य्करणज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्याल मे आयल रहथि तेँ कृषि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजन सँ प्रतिलोम विवाह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मृवति आ मिथिलाक इतिहास मे बिस्तालर सँ अछि। द्विजक संख्यार कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवीश्दे वता,पावनिश्तिनहार आ नेमश्तेतम अपनौलनि। जहि स ब्राह्‌मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्‌मणक हाथ मे छलनि तेँ हुनके जीवनश्ौ्चर्ली संस्कृिति बनल। बहुसंख्यकक मूलवासी पर एकटा नवश्संकस्कृथति आरोपित कयल गेल। औझुका जेँका प्रचारश्प्रिसारक माध्यसम त नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनके सभक बीच छलनि। लिखैकश्पाढ़ैक सुविधा आ सामर्थ्यत रहने हुनके (द्विजिक) संस्कृथति सम्पूयर्ण मिथिलाक संस्कृिति रसेश्ररसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनश्शै(ली आ रीतिश्नीकतिक पूर्ण विलयन ने त संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कृभति लोक संस्कृित कहल जाइत छैक।
मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्यत संस्काररक कोटि मे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिला मे ढ़ेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यकक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेॅ उपनयन के मिथिलाक संस्काटर कोना मानल जाय? हाँ, खंडित संस्काीर कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुप मे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थािन जा मूड़न करबैत त क्यो गंगाकात जा। केयो गामे मे कबुलाश्पाछती द करबैत त केयो बिना गीतेश्नाजद,पूजेश्पा ठ केने, करैत। केयो समाज मे खीरश्टि।कड़ी बॉटि करैत त क्योद भोजश्भाात कऽ। तेॅ सब मिला के देखला पर प्रष्नम उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाय? तहिना विवाहोक संबंध मे प्रष्नड उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याटक संग विवाह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्या क संग विवाह होइत जखन कि बहुसंख्य क जाति मे द्वितिय बरश्कून्यानक विवाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याृक संग कुमार बर के सेहो होइत अछि तहिना मृत्युल संस्कामर मे सेहो एकरुपता नहि अछि। मृत्युक के शोक बुझि गीतिश्ना द नहि होइत। मुदा प्रष्नश उठैत जे मृत्युर शोकेक संस्कािर किऐक थिक? हॉ, असामयिक मृत्युय के शोकक श्रेणी मे राखल जा सकैत। मुदा उचित आयु बीतला परक मृत्युम के शोक किऐक मानल जाय? जहिना प्रकृति मे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्व्तः नष्टय भऽ जाइत अछि तहिना त मनुष्योय थिक। मुदा ढ़ोरो प्रष्नन उठलाक उपरान्तोप समाज, विवाह आ मृत्युऐ के व्यनवहारिक संस्कामर रुप मे अपनौने अछि। छिटश्फुलट ढ़ग सँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सब कुछ अपना पेट मे समेटि लैत अछि।
व्यतक्तिृगत जीवनक समस्याप सँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यािस कालक महत्वर आइयो अछि। सन्यापस यैह थिक। ब्रह्‌मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गृहस्ता्श्रम व्यतवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन क जीवनश्जीमवाक माध्य्म होइत। नव परिवारक सृजन होइत। जहि सॅ समाज आगूओ बढ़ैत आ समृद्धो होइत। तेसर अवस्थाञ वा अंतिम संन्याजस अवस्थाि तक पहुँचैतश्पसहुँचैत ज्ञान आ कर्म सँ पूर्ण मनुष्य् केँ अज्ञान आ अबोध मनुष्यकक सेवा मे लगि जायब, बेजाय नहि। वास्त्व मे ओ जरुरियो अछि।
संस्काकर गीतक अर्थ थिक विभिन्नज संस्काजरक प्रसंग मे गाओल जायवला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहि मे लोक गीतक आत्मा् बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ी मे यदि संस्कािर गीत के हटा देल जाय तँ ओ निष्प्रा ण भऽ जायत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्ता विष्‍ोषता संस्कारर गीत मे उपलब्धष अछि। मृत्यु् संस्काःर केँ छोड़ि अन्यी सभ संस्कासर आनन्दोयत्संवक माहौल मे मनाओल मे जाइत अछि। उमंगमय वातावरण मे नारी कंठ सँ निकलैत स्व्रलहरी देह मे थिरकन, हृइय मे झंकार आ मस्तिरष्का मे चुलबुली उत्पसन्नस कऽ दैत अछि। गीति गायव मिथिलाक सभ नारश्नातरीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनयन, विवाह इत्यािदिक समय सभ नारी समवेत स्वार मे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुषो पावनि आ धार्मिक कार्य मे सभ मिलि गबैत छथि।
संस्काणर गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठ मे अछि। एक कंठ सँ दोसर कंठ धरि जाइतश्जा इत गीतक स्वहरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलिश्ब्दलि कत्त्ो रुप मे गाओल जायत। तेँ संस्काठर गीत मे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वाभावगत एहि स्थि्तिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीत मे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुप मे जोड़ि दैत छथि। विद्‌यापतिक रचना उमापतिक भ जाइत त कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्र सँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास, मीरा इत्याभदि मिथिलाक माएश्बवहीनिक कंठ मे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता, रामायण, सुरसागर माध्यहम सँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि शब्द टूटैक प्रष्नर अछि ओ ज्ञानश्अगज्ञानक बीचक बात थिक। भषाक जन्मि आम जनक बीच होइत। किछु नव शब्दोच जन्म लैत अछि आ शुद्व शब्दथ टूटि कऽ नवो बनि जायत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हिक, संस्काऐर गीत मे वुझब कठिन भऽ जायत अछि। स्पनष्टक अछि जे संस्कातर गीत मैथिलश्म‍हिलाक परिष्कृकत सांस्कृनतिक चेतनाक परिचायक थिक।
मिथिला मे संस्कािर गीत अनौपचारिक षिक्षाक माध्ययम अछि। मैथिल समाज मे नारीक लेल औपचारिक षिक्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़ला सँ ओ बताह भऽ जायत। नारी मे विदुषी होइत छलीह। संस्काकर गीतक संबंध संस्कृिति आ साहित्यन से त अछिये, समाज स सेहो अछि। संस्कृिति, साहित्यय आ समाजक अन्तफरावलम्वसन केँ जत्त्ो नीक जेँका संस्कालर गीत प्रकट करैत अछि तत्त्ो एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्काथर गीतक संकलनश्प्रदकाषन सँ मौखिक परम्पंरा साहित्यत समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्यल अघ्यनयनश्विकष्लेकष्णोक आधार प्रस्तु्त करैत अछि
मिथिला मे संस्कािर गीतक श्रीगणेष होइत अछि गोसाउनिक गीत सँ। एहि स मैथिल समाजक धर्मभावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तुर प्रष्नै अछि जे संस्काररक अवसर पर ई धर्मश्भा वना मुख्य्तः गोसाउनिऐक गीत मे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पजष्टअ अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाई सँ बेसी महत्वुपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिला मे गाओल जाइत अछि मुदा संस्काःर कर्मक अवसर पर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रष्नइ उठैत जे मिथिला मे देवीश्पू जाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवीश्पू जा तंत्रसाधना सँ सम्बलद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हिछ जे तंत्रसाधना असंस्कृात जनजातिक समाज सँ आयल अछि। जकरा कालान्तकर मे ब्राह्‌मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रश्साँधना अवैदिक कार्य बूझल जायत छल। रसेश्रससे अपनवैतश्अरपनवैत सनातन धर्म मे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बीू सभ सेहो तंत्रश्सासधना अपना देवी पूजा दिषि आकृष्टि भेलाह। एहि सँ अतिरिक्त् मिथिलाक समाज मे शैवश्धधर्मक प्रमुखता छल अथवा शाक्तर धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडली मे बहुत दिन धरि चलल। पनचैती सँ फरिआयल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यलता पुरानकालक समन्वतयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कादर गीतक मध्य कालीन चरित्र के देखार करैत अछि।
गीत संस्कानर मे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी' मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्मक तेरहमश्चौादहम शताब्दीश मे भेल। षिव सिंह आ विद्‌यापति समकालिन छलाह। हुनके पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पकराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देषी गीत परम्पशराक स्थागपना भेल। ऐतिहासिक आाधार पर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुष्याक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधार पर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि।
गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिला मे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विषिष्टहता छैक। संस्कारर गीत एहि भासक भंडार छी। हँ, किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्केा गीत (समदाउन) खुषीक समय मे सेहो गवैत छथि आ शोकक समय सेहो जखन कि दुनूक लेल अलगश्अतलग विषयवस्तुन होइछ। तहिना बेटाक विवाह मे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीत मे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समय खेलौना आ सोहर मे सेहो अंतर अछि।
अंत मे, संकलनकर्ता नवयुवक छथि, तेँ बहुत किछु त्रुटि रहलाक वादो धन्य।वादक पात्र छथि, जे अपन मातृभाषाक सेवा लेल डेग बढ़ौलनि अछि।

- जगदीष प्रसाद मंडल


(1)
सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती।
उदित दिनकर लाल छवि निज रुप सुन्दार छाजती।
दाँत खटश्खाट जीह लहश्लाह श्रवन कुन्ड।ल शोभती।
शंख गहिश्गसहि, चक्र गहिश्गषहि खर्ग गहि जगतारिणी।
मुक्तिपनाथ अनाथ के माँ भक्तगजन के पालती।
सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती।
माँ ताहि ऊपर भगवती।
(2)
सभ के सुधि अहाँ छी अम्बाह हमरा किए बिसरै छी हे।
हमरा दिस सँ मुह फैड़े छी, ई नहि उचित करै छी हे।
छी जगदम्बाक जग अबलम्बाश तारिणी तरणि बनै छी हे।
छनश्छिन पलश्पेल ध्या्न धरै छी दरसन बिनु तरसै छी हे।
छी हम पुत्र अहीं केर जननी से तँ अहाँ जनै छी हे।
रातिश्दि न हम विनय करै छी पापी जानि ठेलै छी हे।
सभ के सुधि अहाँ लै छी अम्बाा हमरा किए बिसरै छी हे।
(3)
कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार।
शुक्र दिन आहे सेवक हमरो जनम भेल, बुध दिन भेल छठियार।
पहिर ओढ़िय काली गहबर ठाढ़ि भेली, करब मे काली के सिंगार।
कोन फूल ओढ़न माँ के कोन फूल पहिरन, कोन फूल सोलहो सिंगार।
चम्पा् फूल ओढ़न, जूही फूल पहिरन, ओढ़हुल फूल सिंगार।
भनहि विद्‌यापति सुनु माता काली, सेवक रहु रक्षपाल।
कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार।
(4)
अब ने बचत पति मोर हे जननी,
अब ने बचत पति मोर।
चारु दिसि पथ हेरि बैसल छी,
क्योा ने सुनै दुख मोर। हे जननी.....
एहि अवसर रक्षा करु जननी,
पुत्र कहाएव तोर। श्‍ हे जननी.....
अलटिश्बि लटि कऽ जँ मरि जायब,
हँसी होयत जग तोर। श्‍ हे जननी.....
अबला जानि शरण दीअ जननी,
नाम जपत हम तोर। श्‍ हे जननी....


(5)
हम अबला अज्ञान हे श्या‍मा,
हम अबला अज्ञान।
धन सम्पबत्ति किछु नहि अछि हमरा,
नहि अछि किछुओ ज्ञान। श्‍ हम अबला....
नहि अछि बल, नहि अछि बुद्धि,
नहि अछि किछुओ ध्यानन। श्‍ हम अबला......
कोन विधि भव सागर उतरब,
अहिंक जपल हम नाम। श्‍ हम अबला...
(6)
जगदम्ब हे अबलम्बग मेरी, जननी जय जय कालिका।
दष भुजा दष खड़ग राजित, पाष खप्पजर विराजित।
मुण्डब लयश्लषय मगन नाचय, गाबय योगिन मालिका।
भाइ भैरब मुण्डन छीनथि जय जय कालिका।
(7)
अहाँ कियै भेलहुँ कठोर हे जननी अहाँ कियै भेलहुँ कठोर।
हम दुखिया माँ शरण अहाँ के अहाँ कियै भेलहु कठोरश्‍ हे जननी...
अतुल कष्टय सहि जनम देल अछि आब पोछत के नोरश्हेग जननी ...
ककरा पर हम जनम गमायब के करती आब शोरश्‍ हे जननी....
ककरा पर हम रुसि परायब के आब रक्षक मोरश्‍ हे जननी अहाँ कियै....
(8)
क्योड ने हमर रखबार हे जननी,
क्योड ने हमर रखबार।
चिन्ता विकल विवस मन मेरो,
मन दुख होइए अपार। हे जननी क्यो ....
बिनु अबलम्बल धार मे डुबलहुँ,
सुझत नहि किनार। श्‍ हे जननी.....
अहाँ किए देर लगेलहुँ जननी,
हम डुबलहुँ मझधार। श्‍ हे जननी....
सृष्टि क मालिक अहीं छी जननी,
करहु सभक प्रतिपाल। श्‍ हे जननी....
माता के सब पुत्र बराबरि,
पंडित मूर्ख गमार। श्‍ हे जननी....
कतेक विनय कय थाकि गेलहुँ हम,
अब करिअ भव भार। श्‍ जननी...

(9)
कहाँ नहैली काली कहाँ लट झाड़लन्हिन,
कहाँ कयल सिंगार हे।
गंगा नहैली काली बाट लट झाड़लन्हिन,
गहबर कयल सिंगार हे।
पहिरि ओढ़िया काली गहबर ठाढ़ भेलि,
करय लगली सेवक गोहारि हे।
यष लिय यष लिय काली हे माता,
अहाँ यष फिरु संसार हे। श्‍ कहाँ.....
(10)
अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता।
लाले मन्दिररबा के लाले केवरिया,
लाले ध्वदजा फहराय हे जगतारनि माता।
लाले चुनरिया के लाले किनरिया,
लाले सिन्दुार कपार हे जगतारनि माता।
राखि लिय मुख लाली हमरो,
हम लेब अँचरा पसारि हे जगतारनि मता।
अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता।
(11)
हे जगदम्बाट जय माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे।
नहि जानि हम सेवा पूजा अटपट गीत गबै छी हे।
सुनलहुँ कतेक अधम के मैया मनवांछित फल दै छी हे।
पुत्र सम जानि चरण सेवक के जन्म क कष्ट हरै छी हे।
विपतिक हाल कहल की हे मैया आषा लागि जपै छी हे।
सोना चानी महल अटारी ई सब किछु ने मँगै छी हे।
मनक मनोरथ मनहि मे राखि मंदिर तक पहुँचे छी हे।
अहाँक चरण के दास कहाबी एतवे हम मनबै छी हे।
प्रेमी जन सँ पाबि निराषा नयन नीर बहबै छी हे।
नोर बहा कऽ अहाँ लय मैया मोती माल गुथै छी हे।

''''''




(1)
गरजह हे मेध गरजह गरजि सुनावह रे।
ललना रेश्‍ ऊसर खेत पटाबह सारि उपजाबह रे।
जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे।
ललना रेश्‍ बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुष रे।
हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे।
ललना रेश्‍ भैलहि वसन सुतायत छौड़ा कहि बजायत रे।
जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे।
ललना रेश्‍ पीयर वसन सुताबह बाबू कहि बजायब रे।
(2)
पलंगा सुतल तोहेँ पिया कि तोहें मोर साहेब रे।
ललना रेश्‍ बगिया जँ एक लगबितहुँ टिकुला हम चखितहुँ रे।
भल नहि बोललिह धनी कि बोलहुँ न जानह रे।
ललना रेश्‍ बेटबा जँ एक तोरा होइत सोहर हम सुनितहुँ रे।
भानस करैत तोहें गोतनी कि तोहें मोर हित बंधु रे।
ललना रेश्‍ अपन बालक दिअ पैंच पिया सुनु सोहर रे।
नोन तेल पैंच उधार भेटय आर सभ किछु रे।
ललना रेश्‍ कोखिआक जनमल पुत्र सेहो नहि भेटय रे।
मचिया बैसल तोरे सासु कि सासु सँ अरजि करु रे।
ललना रेश्‍ कओनश्करओन तप केलहुँ पुत्र फल पेलहुँ रे।
गंगहि पैसि नहेलहुँ हरिवंष सुनलहुँ रे।
ललना रेश्‍ देवलोक भेला सहाय कि पुत्र फल पयलहुँ रे।
आदित लगैत बिलम्बव भेल होरिला जनम लेल रे।
ललना रेश्‍ लाल के पलंगा सुता देल पिया सुनु सोहर रे।

दषमासी सोहर
(3)

प्रथम मास जब आयल चित फरिआयल रे।
जानि गेल सासु हमार चढ़ल मास दोसर रे।
सासु मोर बसु नैहर ननदी बसु सासुर रे।
घर छथि देबर नदान चढ़ल मास तेसर रे।
बाट रे बटोहिया कि तोहि मोर भैया कि हित बंधु रे।
हमरो समाद लेने जाउ चढ़ल मास चारिम रे।
अन्नम पानि किछु नहि भावय खटरस भावय रे।
कहब हम कओन उपय चढ़ल मास पाँचम रे।
रचिश्र चि पतिया लिखाओल नैहर पठाओल रे।
बिनु आमा नैहर विरान चढ़ल मास छट्ठम रे।
आगुश्आ गु आवय दोलिया पाछु भैया आवय रे।
घुरिश्घु‍रि घर भैया जाउ चढ़ल मास सातम रे।
तन भेल सरिसब फूल देह भेल पीयर रे।
अब न बाँचत जीव मोर चढ़ल मास आठम रे।
घरश्घ्र बाजत बधावा कि भेल बड़ आन्न द रे।
अयोध्याु मे जनमल राम चढ़ल मास नवम रे।
तुलसीदास सोहर गाओल गाबि सुनाओल रे।
भक्तीवत्सोल भगवान कि आजु प्रकट रे।

(4)

एक दिन छल बन झंझर आब बन हरियर रे।
बड़ रे सीता दाई तपसी कि गरम सँ रे।
के मोरा गरुअनि काटत खिनहरि बूनत रे।
ललना रे मन होय पियरी पहिरतहुँ गोद भरबितहुँ रे।
ललना रे राम दहिन भए बैसतथि कौषल्याय चुमबितथि रे।




(5)
प्रथम समय नियराओल शुभ दिन पाओल रे।
ललना रे देवकी दरदे वयाकुल दगरिन आयल रे।
दोसरो वेदन जब आयल कृष्णल जन्म लेल रे।
ललना रे तेसर हरिक प्रवेष कलेष मेटायल रे।
दगरिन आबि जगाओल केओ नहि जागल रे।
ललना रे हरि देखि सभ मन अचरज सभ हित साधल रे।
सूरदास प्रभु हितकर कृष्णो जनम लेल रे।
बाजन बाजय सभ ठाम देव लोक हरखित रे।

(6)
उतरि सावन चढ़े भादव चहुँ दिस कादब रे।
ललना रे मेधवा झरी लगाबय दामिनि दमकय रे।
जनम लेल यदुनन्दकन कंस निकन्द्न रे।
ललना रे फुजि गेल वज्र केवाड़ पहरु सब सूतल रे।
शंख चक्र युक्त् हरि जब देवकी देखल रे।
ललना रे आइ सुदिन दिन भेल कृष्णह अवतार लेल रे।
कोर लेल वसुदेव कि यमुना उछलि बहू रे।
ललना रे हरि देल पैर छुआय नन्दब घर पहुँचल रे।
नन्दा भवन आन्नदद भेल यषुमति जागल रे।
ललना रे सूरदास बलि जाय कि सोहर गाओल रे।

(7)
घर से बहार भेली सुन्दारि, देहरि धय ठाढ़ भेली रे।
ललना रे ओलती धय धनि ठाढ़ि कि, दरदे व्या कुल रे।
कथि लय बाबा बिआहलनि, बलमु घर देलनि रे।
ललना रे रहितहुँ बारि कुमारी, दर्द नहि जनितहुँ रे।
अगाध राति बिराल पहर रति, बबुआ जनम लेल रे।
ललना रे बाजय लागल बधाबा, कि गाओल सोहर रे।

(8)
पहिल परन सिया ठानल सेहो विधि पूड़ाओल रे।
ललना रे भेटल अयोध्याि राज ससुर राजा दषरथ रे।
दोसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे।
ललना रे भेटल कौषल्याि सासु लखन सन देओर रे।
तेसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे।
ललना रे माँगल पति श्रीराम सेहो विधि पूरल रे।

(9)
गाँव के पछिम एक कुइयाँ सुन्दररि एक पानि भरु रे।
ललना रे घोड़बा चढ़ल एक कुमर पानि के पियासल रे।
पानि पीबू पानि पीबू कुमर सुरति नहि भुलह रे।
तोरो सँ सुन्दार हमर स्वािमी जे तजि विदेष गेल रे।
कोन मास तोहरो वियाह भेल कोने गवन भेल रे।
कोने मास जोड़ल सिनेह कि तजि परदेष गेल रे।
फागुन हमरो विआह भेल कि चैत गवन भेल रे।
बैसाख जोड़ल सिनेह कि तेजि विदेष गेल रे।

(10)
जीर सन धनि पातरि फूल सन सुन्दारि रे।
ललना रे सुतल प्रेम पलंग पर दरदे व्याककुल रे।
सासु जे हुनका अलारनि बहिन दुलारनि रे।
ललना रे तिल एक दरद अंगेजह, होरिला जनम लेत रे।
जाहक हे ननदी जाहक, भइया के बजाबह हे।
ललना रे भइया ठाढ़ देहरि बीच कहु बात मनके रे।

खेलौना

(1)
भैया के घर बेटा जनम लेलक बधैया माँगे एलै हो लाल।
सोना खराम चढ़ि भैया एला की की मोर बहीन लेली हो लाल।
सोनाक हम मट्ठा लेलौ रुपा केर हम लेलौ काड़ा हो लाल।
रेषमी कपड़ाक अंगा लेलौ जड़ी लागल हम टोपी हो लाल।
पचासक बदला सौ लऽ कए जेती रेषम साड़ी पहिरेबनि हो लाल।
भनस कए कऽ भौजी अयली खादी साड़ी पहिरेबनि हो लाल।
सयक बदला पचास लय कए जैती, मूड़ी मे डांड़ लगतनिहो लाल।
कनैत खीजैत घर ननदि जेती हो लाल।

(2)
आइ छठि दिन घर मे सुदिन भेल
घर मे भेल ललना, दुआरे वाजे बजना।
बाबा लुटाबथि हाथी ओ घोड़ा
बावी लुटावे गहना, दुआरे बाजे बजना।
काका लुटाबे घड़ी ओ औंठी
काकी लुटाबे कंगना, दुआरे बाजे बजना।
पिसा लुटाबे मोटर गाड़ी
पीसी लुटाबे यौबना, दुआरे बाजे बजना।

(3)
बाजे बाजे बधाबा नन्दा के अंगना
कथक नाचे पमरिया नाचे, छोटकी ननदिया नाचे अंगना।
किये तोँ ननदी नाचह आंगन, तोरो भैया रहथि पटना। श्‍ बाजे....
भैया हमर पटना रहै छथि, ओतहि सँ आओत मोती के कंगना।
भाई मोरा जीबौ भतीजबा जीबौ, देव पुराओल मन कामना।

(4)
ककरा के अंगना जमहिरा रे,
मन रंजे के लाल।
ककरा बहिनि आबय रे,
मन रंजे के लाल।
बाबा के अंगना जमहिरा रे,
मन रंजे के लाल।
पलंगा सुतल तोहे पिया हे,
मन रंजे के लाल।
बहिन मांगय इनाम रे,
मन रंजे के लाल।
तेरे सन्दुेक मे कंगना रे,श्‍ मन रंजे...
कंगना हम नहि लेब रे, मन....
हमहि त लेब नौ लाखा हार,श्‍ मन.....
हँसैत जायब ससुरारि रे,श्‍ मन......
हम नहि देब नौ लाख के हार,श्‍ मन....
कनैत जाउ ससुरारि रे,श्‍ मन.....
जँ नहि देब नौ लाख के हार,श्‍ मन....
बबुआ के लऽ जैब ससुरारि रे,श्‍ मन....
फेर कऽ बबुआ जनम लेब रे,श्‍ मन....
नैना मे नैना मिला लेब रे,श्‍ मन....
सुनु बचन अहाँ ननदी रे,श्‍ मन....
कोखिया लहरि नहि जाय रे,
गन रंजे के लाल।

गनियारि पिसबाक गीत

कहमा केर जड़िया कहमा सिलौटिया रे।
ललना रेश्‍ कओन मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीआयब रे।
दछिन के इहो जड़िया, पछिम सिलौटिया रे।
ललना रेश्‍ पूब मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीयाअब रे।
पहिने जे पीलनि कौषिल्याभ रानी, सुमित्रा रानी रे।
ललना रेश्‍ सिल धोइ पीयल कैकेयी रानी तीनू गरभ सँओ रे।
कौषिल्या‍ के जनमत राम, सुमित्रा के लछमन रे।
ललना रेश्‍ कैकेयी के भरत, शत्रुघन, तीनू घर सोहर रे।

तेलश्क साय लगवैक गीत

(1)
कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे।
कौने बाबी पीसल कसाय, जे कि बरुआ ओंगारल हे।
बड़का बाबा हरबा जोताओल, कि सरसो उपजाओल हे।
ऐहब बाबी तेल पेरौलीह, बरुआ ओंगारथि हे।


(2)
काँचहि बाँस के मलिया हे,
आकि ताहि मलिया तेल फूलेल हे।
कौने बाबी लगेतीह तेल फूलेल,
आकि कौन बाबी लगेती उबटन हे।
आकि फल्लाँँ बाबी लगेती तेल फुलेल,
आकि फल्लाँँ बाबी लगेती उबटन हे।

मूड़न

गोसाउनि नोतक गीतश्‍
जँ हम जनितौं काली मैया औती
अगर चानन मंगबितौ हे।
गंगा सँ मैया चिकनी मंगबितौ
ऊँच के पीड़िया बनबितौ हे।
नीर गंगाजल सँ पीड़िया निपबितौ
अड़हुल फूल चढ़बितौ हे।
पीअर पीताम्बकर माँ के आँचर दीतौं
सोन रुपे घूघरु लगाय हे।
जोड़ा छागर धूर बन्हमबितौ
करिया दीतौं बलिदान हे।
भनहि विद्‌यापति सुनु देबि काली
सदा रहब सहाय हे।

पितर नोतक गीतश्‍
कौन बाबा आओत गजन हाथी
ओ जे कौने बाबा लिल घोड़ा हे।
कौने बाबी अओती दोलियहि
कि बरुआ आषीष देती हे।
बड़का बाबा आओता गजन हाथी
छोटका बाबा लिल घोड़ा हे।
ऐहब बाबी अओती दोलियही
कि बरुआ आषीष देती हे।

मुड़न बेरक गीतश्‍

समुआ बैसल तोहे बाबा कि बरुआ अरजि करु हे।
लपटि झापय ललाट करह जगमूड़न हे।
रहु बाबू रहु बाबू बरुआ कि होयत सुदिन दिन हे।
नोतब सकल परिवार करब जगमूड़न हे।
मूड़न करैत बरुआ क बाबा सँ अरजि करु हे।
आनहु पीसि बोलाय कि अउरी पसारल हे।
औती पीसी सोहागिन बैसति चौक चढ़ि हे।
पीअर वस्त्रब पहिरती केष परिछति हे।

केष कटबै कालक गीतश्‍

कौने बाबा छुरिया गढ़ाओल सोने मढ़ाओल हे।
कौने अम्मार लेल जन्म केष कि शुभश्शुूभ होयत हे।
बड़का बाबा छुरिया गढ़ाओल रतने मढ़ओल हे।
बड़की बाबी लेल जनमकेष कि शुभश्शुओभ होयत हे।
देब हे नौआ भैया लाल धोतिया सोनक कैंचिया हे।
शुभ कऽ उतारऽ बाबाक केष बबुआ जीक मूड़न हे।

नौआक गीत

धीरेश्धी रे कटिहह नौआ केष, कि बौआ बड़ दुलारु छइ हौ।
बौआक मामी नौआ तौरे देवह, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ।
बौआक मामी भार पठौलखिन, ठकुआ तोरे देबह केरा तोरे देवह हौ।
बौआक नाना घोती पठेलखिन, पीअर मे रंगि के तोरे देवह हौ।
धीरेश्धी रे कटिहह केष, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ।

नहेबा कालक गीतश्‍

कोने बाबा पोखरि खुनाओल, कि घाट बनाओल हे।
कोने बाबा भरथि जूड़ी पानि, कि बरुआ नहाबथि हे।
अपन बाबा पोखरि खुनाओल, घाट बनाओल हे।
ऐहब बाबी भरु जुड़ि पानि, कि बरुआ नहावथि हे।

चुमाओन गीतश्‍

आजु माइ शोभा श्री रघुवर के
मातु कौषल्याश हकार पठाओल
गाइन जतेक नगर के।
कैकेयी आयलि सुमित्रा आयलि
गाइनि सगर नगर के।
दुबि अछत लय देवलोक आयल
चर डोलय रघुवर के।
तुलसीदास प्रभु तुम्हघरे दरस के
जीवन सफल दरस के।
आजु माइ शेभा श्री रघुवर के।

भगवतीक विनतीश्‍

अयलहुँ सरन तोहर हे जगतारनि माता। श्‍ अयलहु.....
लाले मन्दिोरिया के लाले केबरिया।
लाले घ्वतजा फहराय हे जगतारनि माता। श्‍
लाले चुनरिया के लाले किनरिया,
लाले सिनुर कपार हे जगतारनि माता॥
राखि लिऔ मुखलाली हमरो।
हम लेब अचरा पसारि हे जगतारनि माता॥
अयलहुँ सरन तोहार...

गाम देवताक गीतश्‍

बेरिश्बे रि बर बरजौं मालिनि बेटिया,
बाट घाट जुनि रोपु फूल हे।
एहि बाटे औता ब्राह्‌मण दुलरुआ,
घोड़ टाप तोड़ि देत फूल हे।
कानै लगली खीजै लगली मालिनि बेटी,
आखि स बहै लागलि नोर हे।
के निरमोहिया फूल गाछ तोड़त,
के रे देत वरदान हे।
जुनि कानू जुनि खीजू मालिनि बेटिया,
हमरा स लीअ वरदान हे।
पहिल जे मंगलौ ब्रह्‌मण सिर के सिनुरबा,
तखन कोर भरि पुत्र हे।
जे पुत्र दीह ब्राह्‌मण हरि नहि लीह,
बाँझी पद छूटत गोर हे।

साँझश्‍

साँझ दिय यसुमति मइया हे साँझ बीतल जाइये।
जैता कन्हैहया खिसिआय, हे साँझ बीतल जाइये।
कथी केर दीप कथी केर बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
सोना केर दीप पाट सूत बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
सरसो तेल जरय सारी राती, हे साँझ बीतल जाइये।
जरय लागल दीप चमकि गेल बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
खेलय लगलै साँझ मइया, हे साँझ बीतल जाइये।



उपनयनक गीतश्‍
(उद्‌योग गीत)
गोसाउनिक नोतक गीतश्‍
अढ़ुल फूल देखि अयली गोसाउनि, दूधहि चरण पखारब हे।
छुट्‌टा पान गोटा सुपारी, माँ काली नोतल जाथि हे।
बरुआक माय बाप गोचर करै अछि, सुनु माता विनती हमार हे।
सेबक बालक स्तुयति नहि जानय, छमा करब सब अपराध हे।

पीतर नोतक गीतश्‍
दुअरहि बाजन बाजय स्वार्ग आवाज गेल हे।
स्वरर्ग मे पुछथिन बड़का बाबा कतय बाजन बाजू हे।
अहाँ कुल जनमल फल्लाँव बरुआ ओतहि बाजन बाजू हे।
स्वँर्गहि पितर आनन्द भेल कि आब वंष बाढ़ल हे।
स्वँर्ग सँ आबि पितर बरुआ के आषीष देल हे।

बँसकट्टीक गीतश्‍
वृन्दा वन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे।
पहिने बाँस के पूजब तखन छऽ लगायब हे।
आहे ई थिक काठ सुकाठ एही सँ मारब बान्हेव हे।
आकि वृन्दाटवन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे।

मड़ठट्ठीक गीतश्‍
जन्म सुफल आइ भेल की आंगन माड़ब भेल हे।
जन्म सुफल ओहि बाबाक जिनका आंगन माड़ब हे।
जन्म सुफल ओहि बाबीक जनिका कुल पुत्र भेल हे।
पीयरहि खड़ छरायब कि लाल झालरि लगायब हे।
ताहि माड़व बैसत फल्लाँन बरुआ जिनकर जनउ हैत हे।
चहुदिस रहतनि सर सम्ब‍न्धीन की माड़ब सोहाओन हे।




मड़वा छारैक गीत
बाबा हे फल्लाँा बाबा मड़वा छारि मोहि दैह।
बरिसत हे नन्हाबुनिया मेघ,
भाीजत हे मोरा बालक बरुआ,
पीताम्बेर ओढ़न को दैह। श्‍ बाबा हे....
बाबी हे फल्लाँ़ बाबी आँचर झाँपि मोहि लैह।
बरिसत हे नन्हलबुनिया मेघ,
भीजत हे मोरा बालक बरुआ,
आँचर झाँपि मोहि लैह। श्‍ बाबा हे....
मड़बा नीपक गीतश्‍
बाबा दान दीअ यौ, मटिया कोड़ैक इनाम दीअ यौ।
बाबा दान दीअ यौ, मड़बा नीपैक इनाम दीअ यौ।
गइया जे देलौ बछिया लगाय,
आर किछु दान बेटी आमा सँ लीअ?
आमा दान दीअ यै, मड़बा नीतैक इनाम दीअ यौ।
बाली जे देलौ बेटी झुमका लगाय,
आर किछु दान बेटी भैया सँ लीअ।
भैया दान दीअ यौ, मड़वा नीपैक इनाम दीअ यौ।
कंगना जे देल खीलन लगाय,
आर किछु दान बहिन काकी सँ लीअ।

बलिप्रदान कालक भगवती गीतश्‍
बदन भयावन कान बीच कुण्डडल विकट दषन घन पाँती।
फूजल केष वेष तुअ के कह जनि नव जलधर काँती।
काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्णै खड़ग्कअर लाई।
भय निर्भय बर दहिन हाथ लय रहिअ दिगम्बअरि माई।
पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर स्रावित मुण्डनहारा।
कटि किंकणि शब कर मण्डिनत सिक बह शोणित धरा।
बसिय मसान ध्याशन सब ऊपर योगिन गण रहु साथे।
नरपति पति राखिअ जग ईष्वमरि करु महिनाथ सनाथे।

बेटा विवाह
कुमरमक गीतश्‍
(1)
हम ते पोखरि खुनबै तेइ के घाट मढ़ैबै।
छिनारो आयल करिहें ओहि रे पोखरिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हाररि, छोड़ू हमरा से अरारि।
हम त झुलफी धय घिसिआयब पोखरिया मे।
हम त कोठवा उठैब तेइ मे खिड़की लगैब।
छिनरो अबायल करिहें ओहि रे कोठरिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हाहरि छोड़ू हमरा से अरारि,
हम त झुलफी धय घिसिआयब कोठरिया मे।
हम त पलंगा लगैब तेइ मे तोसक ओछायब।
छिनरो आयल करिहें ओहि रे पलंगिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हाहरि छोड़ू हमरा से अरारि।
हम त झुलफी घय घिसिआयब पलंगिया मे।
(2)
रिमझिम रिमझिम बुन्दे् बरसि गेल, अंगना मे पड़ल कजरिया।
थरिया धोबै गेलि फल्लाँि छिनरिया, खसली टांग अलगइया।
घेड़बा चड़ल एलखिन फल्लाँस रसिया उठ गै छिनो हरजैया।
हम कोना उठबौ रसिया, तोहर बचनिया डरबा मे पड़लैमचकिया।
डरबा मचकिया के की की दबैया, सोठि पीपरि मरचइया।
सोठि पीपरि के बड़ रे जहरिया, अतर गुलाब ठंंदैइया।

जुटिका बन्ध नक गीतश्‍

कोने बाबा केरा गाछ रोपल, केरा कोसाय गेल हे।
कोने बाबीक बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे।
फल्लाँ बाबा केरा गाछ रोपल केरा कोसाय गेल हे।
फल्लाँ बाबी बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे।
मड़बहि घीव ढ़रकि गेल स्वशर्ग इजोत भेल हे।
स्वबर्गक पितर आनन्दे भेल आब कुल रहत हे।

आमश्मीहु विआहय लेल जयबा कालक गीतश्‍

जाइत देखल पथ नागरि सजनी गे,आगरि सुबुधि सयानि।
कनकलता सन सुन्दुरि सजनीगे, विधि निरमाओल आनि।
चलैत हस्तिन गमन सन सजनी गे, देखैत राजदुलारि।
जनिकर ऐहन सोहागिनि सजनी गे, पाओल पदारथ चारि।
निल वसन तन घेरल सजनी गे, सिर लेल चिकुर सम्हाारि।
ओहि भ्रमर रस पीबह सजनी गे, बैसल पंख पसारि।

आमश्मनहु विआहक गीत
(1)
आम बीछै गेली छिनरो, आँठी विछि लैली हे।
पचास बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे।
आम महु बिआहै छलै, तही से भुलेलियै हे।
हजार बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे।
(2)
अमुआ मजरि गेल जमुआ मजरि गेल चम्पाुकली
ताहि तर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीरे ढरी।
घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँस रसिया
किए अकेली ठाढ़ं, नयना सँ नीरे ढरी।
सासु मोर बुढ़िया हे ननदी ससुररिया
मोर पिया गेलै परदेष, नयना सँ नीरे ढ़री।
छाड़ि दीअ आ गे छिनरो घरबा दुअरबा
सुख सम्प ति सगरी।
छोड़ि दैह बिअहुआ के आष चल हमरो नगरी
अगिया लगेबै रसिया के घरबा दुअरबा, सुख सम्प ति सगरी।
बज्र खसेबै तोरे माथ मोर पिया आते रही।

उपनयन कालक गीतश्‍
(1)
चैतहि बरुआ विजय भेल बैषाख पाहुन भेल हे।
घर पछुआर केबटा बसु पार उतारि देहु हे।
जौं हम पार उतारब जायब कओन देष हे।
जायब हम जाहि देष जहाँ अपन बाबी हे।
बाबी के चरण पखारब लाल जनउआ देती हे।
(2)
काषी मे जाय बरुआ ठाढ़ भेल जनऊ पुकारय हे।
आहे के थिका काषी के वासी जनऊ मोहि चाहिय हे।
सुतल छला बाबा कवष्वेनाथ सेहो उठि बैसला हे।
आहे हम थिकौं काषी के वासी जनऊआ पहिरायब हे।
झारिखंड जाय वरुआ ठाढ़ भेल जनऊआ माँगय हे।
आहे के थिका झारिखंड वासी जनऊ मोहि चाहिय हे।
हम थिकौं झारिखण्ड वासी जनऊआ पहिरायब हे।
आंगन आबि ठाढ़ि भेल भिखि मांगय हे।
हम थिकौं अहाँ के बाबी झोरी भरिय देव हे।

भीख कालक गीतश्‍

मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कथि लेल जाय।
आगे दाय कियो नहि हित बन्धुे जे बरुआ लेल बिलमाय।
आगे दाय बाबा से बड़का बाबा बरुआ लेल विलमाय।
बाबी से अइहब बाबी भीख नेने ठाढ़ि।
आगे माइ भिखो ने लियै बरुआ मुँहो सँ ने बजाय।
पहिरय लय पीयर धोती ओढ़य लेल मांगल चादर।
आगे माय हाथ दुनु मंट्‌ठा माँगे कान दुनु सोन।
आगे माइ मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कियै जाय।

पुरोहित के गारिश्‍

बकलेल बभना चूड़ा दही चाटय ऐला हमर अंगना।
चाउर देलियनि दालि दलियनि धेलनि अंगना।
एक रती नोन लय करै छथि खेखना।
धेती देलियनि तौनी देलियनि धेलनि अंगना।
एकटा गमछा ले करै छथि खेखना।
सोन देलियनि चानी देलियनि धेलनि अंगना।
एकटा पाइ ले कोना करै छथि खेखना।





जनउ कालक गीतश्‍
लाल पीयर अछि माड़ब पाने पात छारल हे।
ताहि माड़ब बैसलाह बाबा से फल्लाँग बाबा हे।
बगल भए बैसलखिन बाबी से ऐहब बाबी हे।
कोरा बैसौलनि बरुआ से फल्लाँल बरुआ हे।
बरुआ जे मँगै बाबी लाल पीयर जनऊ दिय हे।
रहुश्रउहु बाबू आइ अहाँ ब्राह्‌मण होएव हे।
कि लाल जनऊआ देब हक कि पियर जनऊआ हक।

चुमाओन कालक गीतश्‍
आइ षिवक चुमाओन हेमन्ति घर मे।
सखि सब गाबै मंगलाचार हेमन्तल घर मे।
आंगन चानन निपू मनाइन गजमोती चौक पुराइ।
काँचहि बाँस के डलबाँ बुनाओल।
ताहि राखब दूभि धान हेमन्तन घर मे।
चुमबै बैसली सासु मनाइनि।
गौरी सहित त्रिपुरारी हेमन्तम घर मे।
दुबि अक्षत लय मुनि सब आयल।
जय जय शब्दप सुनाय हेमन्तल घर मे।

दनही आ बिलौकी कालक गीतश्‍
(1)
अमुआ मजरि गौले महुआ मजरि गेलै।
ताहि तर फल्लाँर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीर झरे।
घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँन रसिलवा, कियै छिनरो एकसरि ठाढ़ि।
सासु मोरा आन्हएर ननदि गेल निज घर, मोर पिया गेल परदेष।
नयना......
छोड़ि दिहो छिनरो घरबा दुअरबा, छोर विहुआ के आस।
नयना........

(2)
नामि नामि कोसिया मे जुटिया गूथविह लटका के चलिहह ना।
छिनरो गोरी बदन बिछा के चलिहह ना।
पतरी कमरिया मे डरकस पहिरि लचका के चलिहह ना।
गोरे कलइया मे घड़ी पहिरि देखा के चलिहह ना।
गोरेश्गो रे अखिया मे सुरमा लगाबिह मचका के चलिहह ना।

बेटा विवाह
विवाहक लेल जाय कालक गीत (कुमार)
(1)
जहि दिन आहे बाबू तोरो जनम भेल, अन्न पानि किछु ने सोहाय हे।,
सेहो बाबू चलला गौरी विआहन, दुधबाक दाम दहु ने चुकाय हे।
दूधक दाम अम्माे सधियो ने सकइछ, पोसाइक दाम दै देव हे।
जाबत जीव अम्माे सध्यिोल ने सकइछ, धनी हेती नौरी तोहार हे।
नित दिन आहे अम्माा चरण दबेती, भोरे उटि करती प्रणाम हे।
(2)
पाकल पान के बिड़िया लगाओल
नगर मे पड़ल हकार।
आबथु देवलोक बैसथु माड़ब चढ़ि,
सब मिलि साजु बरियात हे।
कौने बाबा साजल आजनश्बाुजन
कौने बाबा साजु बरियात हे।
कौने बाबी साजल दुलहा दुलरुआ,
झलकैत जायत बरियात हे।
(3)
साँठह आहे आमा सिन्दुिरक पुरिया, नगर मे पड़ल हकार हे।
साजह आहो बाबा दुलहा दुलरुआ, दूर जायत बरियात हे।
जखनहि रामजी कोबर बिच आयल, सरहोजि छेकल दुबारि हे।
हमरा के दान दीअ ननदोसिया, तखन कोबर देव पैर हे।
मोरा कुल आहे सरहोजि बहिनी ने जनमल, राम लखन दुहु भाइ हे।
सेहो भाइ मोर संगहि अयलाह, सरहोजि मांगथि दहेज हे।
बरियातीक गीतश्‍
(1)
ऊँची महलिया मालिनि के घर, नीचा लागल फुलवारी हे।
ले गे मालिनि सोनाक सूइया, बाबू के गूँथि दे मौरि हे।
मौरि लय आयल मालिन, कहलक के देत मौरक दाम हे।
घर सँ बाहर भेला फल्लाँल बाबा, हम देब मौरक दाम हे।
(2)
कौने बाबा सजल घोड़ हाथी कौने बाबा साजु बरियात हे।
कौने दुलहा साजथु रहिमल घोड़ा साजि चलल बरियात हे।
तिल एक आहे बाबू घोड़ा विलमाव अमा गोर लागि लिय हे।
जुरहि जैहह बाबू जुरहि अबिह जुरहि होयत विवाह हे।
रहमल घोड़ा सलामति रहतै शुभश्‍2 होयत विवाह हे।
नगहर भरबाक गीतश्‍
भरय चलली सखि सिरहर नव कलष मँगाइ।
चानन सिरहर उर लय शुभ सिन्दुहर लगाइ।
सागर तट जब महुँचल सब नारी।
सिर सँ कलष उतारल देल आमक डारी।
लोचन प्रीत जुड़ायल सब मिलि मंगल गावे।
सब के ई दिन होय विधाता लिखथि भागे।

शुभ कार्य मे विदा होयबा कालक गीतश्‍
शुभे ल बहार भेलि बेटीक माय,
काहु हाथ नारियल काहू दूबि धान,
काहू खोंइछा साँठल पाकल पान
भैया हाथ नारियल भौजी दूबि धान।
अमा खोंइछा साँठल पाकल पान।
आजू मोरा आजू मोरा उचित कल्यााण,
बीलहह हे तरुणी सिनुर पिठार।

बेटीक विआह (कुमारि गीत)
(1)
कौने बन बोले कारी कोइलिया
कौने बन बोले मयूर हे।
कौने घर बोले सीता हे दुलारी
आब सीता रहति कुमारि हे।
आनन्द बन बोले कारी कोइलिया
निकुंज बन बोले मयूर हे।
राजा जनक घर सीता बेटी बोले
आब सीता व्याबहन जोग हे।
जाहक आहो बाबा राज अयोध्या।
जहाँ बसै दषरथ राज हे।
राजा दषरथ के चारि पुत्र छनि
राम लखन दुइ वीर हे।
गोरहि देखि जनु भुलहि हो बाबा
श्यािमहि तिलक चढ़ैब हे।
अपन जोग बाबा समधि जोहब
नगर जोकर बरिआत हे।
सीता जोकर बाबा लायब जमैया
देखत जनकपुरक लोक हे।
(2)
जहि दिन आहे बेटी तोहरो जनम भेल से दिन कहलो ने जाय।
चिन्ता निन्दो हरित भेल बेटी थीर नहि रहल गेयान।
कथी लय आहे सियाक जन्म भेल से भेल व्याकहन योग
से सुनि बाबा उढ़ला चेहाय चलि भेला ताकयं जमाय।
बाँध बनबिहह बाबा पोखरि खुनबिहह लगबिहह आमक गाछ।
हँस जुटत आ कमल फुलायत जल मारत हिलकोर।
ई सरोवर जैतुक नहि माँगत भैया होयता वेहाल।


दरबाजा पर वरियाती ऐला परश्‍
(1)
आउ आउ आहे बहिना सखिया हमार हे।
रतन पलकिया चढ़ि आयल चारु दुलहा।
हाथी घनेरो आबे घोड़ा हजार हे।
कतेक वरियाती आबे पाबी न पारे हे।
जेहने कुमारि तेहने चारु कुमार हे।
तिरहुत के नर नारी देखय मुँह उघारि हे।
लग भऽ जाऊ बहिनि लाज बिसारि हे।
गाओल सिनेहलता मन के उसारि हे।
परिछनक गीत
(1)
षिव छथि जागल लागल दुआरी हे बहिना, षिव छथि लागल दुआरी।
इन्द्र चन्द्रह दिक्‌पाल वरुण सभ, चढ़िश्चाढ़ि निज असबारी।
साजि बरात हेमन्तह घर आयल, नगर शोर भेल भारी। श्‍ षिव...
पुरहित ब्रह्‌मा चारु मुख लय, वेद ऋृचा उचारी।
दाढ़ी झुलबैत अगुआ नारद, ब्राह्‌मण वीणा धारी। श्‍ षिव...
परिछय चलली माय मनाइनि,लय कंचन दुइ थारी। श्‍ षिव...
पटकि आरती घर के पड़ली, नाग छोड़ल फुफकारी। श्‍ षिव...
योगन गण मण्ड प बीच आयल, भरि गहना पेटारी।
तखन ससरि मण्ड प दिषि आयल, देखल सब नरश्ना।री। श्‍ षिव...
हरहारा के काड़ा, पहुँची पनिया दरारी।
ढ़ोढ़क जोसन सुगबा के मुनरी, मनटीका मनिहारी।
ढ़ोरक करेत आ अजगर, अधसर के पटसारी।
धामन करधन गेड़ुली गहुमन, नागक नथिया भारी। श्‍ षिव...
जेहने बर तेहने बरियाती, तेहने गहना सारी।
षिव छथि लागल दुआरी, हे बहिना षिव छथि लागल दुआरी।




(2)
चलु सखि सब देहरि पर साजू डाला पान हे।
आनि ठक बक दीप लेसू परिछु सीताराम हे।
हरखि चलू बरियात बरियात आयल राज भवन समीप हे।
आइ अछि बड़ भाग हे सखि राम दरषन देल हे।
(3)
सीता करथि बिलाप तन थरश्थेर काँप।
धनुषा केओ नहि तोरल जनकपुर मे।
आब हम रहब कुमारि घर बैसल हिय हारि,
बिनु पुरषक नारि जनकपुर मे।
घर मे बैसब आब जाय, अपन वयस गमाय।
मरब जहरश्बिनख खाय, जनकपुर मे।
(4)
घीरेश्घी रे चलियौ दुलहा अंगना हमार हे।
अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यछवहार हे।
सरहोजि दाइ लेती नाक पकरि हे।
लग कनी अबियौ दुलहा लाज बिसारि हे।
धुनेष के झाँपल मुँह करियौ उधार हे।
सिताजी के माय सुनयना आरती उतारु हे।
कपड़ा उतारै कालक गीतश्‍
माइ हे नाक दबाय वरके जाँचू बहिना।
दाइ हे योगी छथि कि भोगी से बुझबनि कोना?
कपड़ा निकालि बनी देखियनु बहिना।
दाइ हे रोगी छथि कि भोगी से बुझवनि कोना?
माइ हे हाथ पैर नीक जकाँ जाँचू बहिना।
हाथ पैर ठीक छनि कि नहि से बुझवनि कोना?
घुमाय फिराय वर के देखियनु बहिना।
माइ हे नांगर छथि कि ठीक से वुझबनि कोना?
दाइ हे बजाय झुकाय बरके देखियनु बहिना।
पण्डिीत छथि कि मूर्ख से वुझबनि कोना?



पाग उतारै कालक गीतश्‍
जे एहि बर के आंगन अनलनि हुनका देवनि गारि हे।
धोती पहिरक लूरि ने हिनका पाग खसल जाय हे।
देह परहक वस्त्रोी जे छनि सेहो अनलनि माँगि हे।
ठक बक किछुओ नहि चिन्हनथि हिनका देबनि फेरि हे।
अक्षरक ज्ञान कनियो ने हिनका नित करथि चरबाहि हे।
मूसे कवि इहो पद गेलनि गौड़ीक बड़ दिअमान हे।
चतुर घटक इहो वर अनलनि हिनके दियनु वियाहि हे।
नाक धरक गीतश्‍
सिर स पाग उतारल काँख दबाओल हे।
लय डोपटा गिरमोहार नाक धय आनल हे।
दुधहि चरण परवारल निहुरि निहारल हे।
हिनको परिछि घर आनल परिछि देखओल हे।
ठक बक चीन्हिक गीतश्‍
चलूश्च लू दुलहा अंगना हमार यो।
अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यशवहार यो।
ठक के कहलनि दुलहा माटिक मुरुत यो।
दुलहाक माय केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे।
हुनकर काकी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे।
बेसन के कहलनि दुलहा घाटि यो।
दुलहाक पीसी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन यो।
भालरि के कहलनि दुलहा केरा के पात यो।
दुलहाक बहिन केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो।
मूज के कहलनि दुलहा इ थीक कोर यो।
हिनकर पितामही केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो।
आंगन जायकालक गीतश्‍
चलु घीरे धीरे ललन ललीक अँगना
ई अंगना नहि बुझब अवध के
दौड़ल चलब मन मानत जेना। चलु.....
गमकैत फूल कियारी लागल
हीरा पन्नाह गमला साजल
बेली चमेली गुलाब दोना। चलू....
एहिना फुल रहय मिथिला मे
बारहो मास ओ तीसो दिना। चलू....
देखथि दुलहा ठाढ़ अँगना। चलु....
अठोंगर कुटै कालक गीतश्‍
हम धनमा कुटैब एहि बरबा से।
घुरि फिरि आयल अवधबा से।
की बहिया की नृपति बालक।
बुझबनि उखरि मूसरबा से।
घुमि घुमि धान कुटै छथि बालक।
विवष भेल बेवहरबा से।
चौदह भुवन ई अनका बन्हैथ छथि।
आइ बन्हिखयनु काँच डोरबा से।
स्नेनहलता ई गाओल अठोंगर।
रानी बिलोकति घरबा से।
नैनाश्‍ योगिनिक गीतश्‍
पहिल योगिनिया तोहे अपन सासु हे।
आब दुलहा भेलहा योगिनिया बसी हे।
आलरिश्‍ झालरि कन्हय कारु सिर बेनिया हे।
गीत स पहिनक फकड़ा
थिकौ बंगालिनि बसी, बंगला सुरपुर स आयल छी
सूखल नदिया नाव चलाबे, बिन लेसन के दधि जनमाबे।
चुलहिक पुत्ता सारि उपजाबे, कोठी पर जे बड़द नचाबे।
कन्याु निरीक्षण कालक गीतश्‍
देल आमक पल्ल व आमक पल्लगव हे।
चिन्हू बाबू चिन्हूष घनि, अपन चिन्हि। जुनि भूलव हे।
रघुकूल के एक रीति, तकर सुधि राखब हे।
आहे! हेरथि नहि परनारि, से तखनहि जानब हे।
चारु ललन चित्त चंचल करे डगमग हिय हे।
आहे! आजु असल थिक जाँच नृपति घर आयल हे।
यद्‌यपि चारु कुमार कुलक पति(पैत) राखल हे।
सब सखि देल हकार ललन कहि राखल हे।


एहि अवसरक फकड़ाश्‍
काँच बाँस काटि के, बंगला घर छाड़ि के, दहिन लट झाड़ि के.
वाम छथि कनियाँ दहिन छथि सारि, उठाउ प्रथम वर हृदय विचारि।
जौं नहि चिन्हँब अप्पछन नारि, हँसती सखी सब थपड़ी पाड़ि।
आम महु विवाहक गीतश्‍
उठु उठु कामिनि छोड़ह लाज,
द्वार लागल छथि पाहुन समाज।
आयल दषरथ साजि बरियात,
फुलह फलह सखि नव जल जात।
मन जे आँकल गेल तुलाय,
सुनतहि सीता गेली फुलाय।
गद्‌गद स्वलर बड़ होइछ लाज,
आजु देखत मोहि ससुर समाज।
धोबिनक सोहागश्‍
धोविनक बेटी झट दहिन सोहाग गे
राजा जनकजी के एक गोट बेटी।
सिन्दु र पिठार लय मुँगरी पुजबही,
लय धो दहिन सोहाग गे। धोबिन...
गुर चााउर लऽ मुँह मे खुअबही
कोचा धो दहिन सोहाग गे। धोविन....
सुकुमारि धिया के सोहाग दही ने,
खय के देबौ चूड़ा दही।
पहिरय के देबौ सायाश्सा ड़ी
जेवर देबौ लटकाय। सुकुमारी....
देबौ मे देबौ गाय महिसबा,
जोड़ा बड़द देबौ हकाय। सुकुमारी....
बेदी घुमय कालक गीतश्‍
(1)
गरदनि बान्ह1ल चदरिया आगूश्आरगू सिया माई।
करथिन मण्डहप परिकर्मा हे दुलहा और भाई।
बसहा जकाँ सभ घुमथिन हे न चलय प्रभुताई।
गाबथि मंगल गाइनि हे सब मंगल छाई।
हँसी अली मुसकाथि छनहि देथि पीहकारी।
से सुनि हँसि कऽ जमाय हे देल परिक्रमा सारी।
(2)
नहु नहु दुलहा चलै छथि कोना।
जेना कल्हु2आ के बरदा घुमै जेना।
बड़द के उपमा हुनका देलियनि कोना।
माई हे चौरासीक फन्दाा मे पड़लनि जेना।
डेग नमहर कऽ दुलहा चलै छथि कोना।
माई हे खुट्‌टा स बड़दा खुजै जेना।
बरदाक उपमा हुनका देलियनि कोना।
माई गे चौड़ासीक फन्दाा मे पड़लनि जेना।
अंगना मे ठाढ़ दुलहा लगै छथि कोना।
जेना अंगना मे मेह गाड़ल हो जेना।
मेहक उपमा हुनका देलियनि कोना।
जेना चोरासीक फन्दाो मे पड़ला जेना।
कहथि सिनेहलता चलब कोना।
माई गे आंगुरक इसारा देब जेनाश्जे ना।
कन्यालदान कालक गीतश्‍
कोनहि कुल मे सीता जनम लेल, कौनहि कुल श्रीराम हे।
कौनहि आगे माइ वेद उचारल कौनहि कैल कन्याुदान हे।
राजा जनक घर सीता जनम लेल दषरथ घर श्रीराम हे।
नारद ब्राह्‌मण वेद उचारल जनक कयल कन्याेदान हे।
राजा जनक देल हीरा मोती सोनमा आओर देलनि धेनु गाय हे।
रानी सुनयना देल सीता सन बेटी राम लेल अंगुरी लगाय हे।
कहमा छुटल सुपति मौनियाँ कहमा जनक ऋृषि बाप हे।
कहमा छुटल माय सुनैना जिनका झहरनि नोर हे।
अंगनहि छुटल सुपति मौनियाँ दुआरे जनक ऋृषि बाप हे।
मंदिर छुटल माय सुनैना जनिका नैन नोर हे।
सिनुरदान गीतश्‍
पाहुन सिन्दुनर लिय हाथ, सर सुपारीक साथ।
सिता उधारल माथ सिन्दुिर लिय अय।
सुन्द र बितै अछि लगन, अहाँ धनुष कयल भगन।
सब आनन्दु मगन, आषिष दिय अय।
रघुबर सिर शोभनि मौर, सीता नित पूजथि गौर।
आइ पूरल मनोरथ नरपति होय लय।
महिमा दुनूक अनूप, सब आनन्दिआत भूप।
आइ पूरल मनोरथ आनन्दिनत होय लय।

लावा छिटबा कालक गीतश्‍
मैना देखहुँ जाय,
त्रिभुवन पति भेल अहाँक जमाय।
षिव गौरी मिलि लावा छिड़िआय।
भूखल वासुकि बिछिश्‍ बिछि खाय।
सोनाक बट्टा भरि घोरल कसाय।
उमत सदाषिव भसम लोटाय।
जटा मे देल अंकुसी लगाय।
झिकतहि सुरसरि गेलि बहराय।

विआहक गीतश्‍
मचिया बैसल तोहे राजा हेमन्ता ऋृषि, सुनू अहाँ बचन हमार यो।
गौरी कुमारि कते दिन रहती, ई नहि उचित विचार यो।
एतबा वचन जब सुनल हेमन्तत ऋृषि, पंडित अनलनि बजाय यो।
आबथु पंडित बैसथु पलंग चढ़ि, मुनि देथु धीया के विआह हे।
एक पोथी तकलनि दोसर पोथी तकलनि, तेसर मोथी तकलनि पुरान यो।
ओहि रे जंगल मे योगी एक वसै छथि, तनिके संग धिया के विआह यो।
अरही वन के खड़ही कटाओल, वृन्दाषवन बिट बाँस यो।
देव पितर मिलि माड़व ठानल, होबय लागल धिया के विआह यो।
एक दिस बैसला नारद ब्राह्‌मण, दोसर दिषि गौरीक बाप यो।
बाघक छाल पर वैसला महादेव, होअय लागल धिया के विआह यो।
कन्या दान कय उठला हेमंत ऋृषि, मोती जेंका झहरनि नोर यो।
किए जे खेलौ बेटी किए पहिरलौ, कथी ले भेलहुँ वीरान यो।
खीर जे खेलौ बाबा चीर पहिरलौ, सिन्दुिर लै भेलहुँ वीरान यो।


देहरि छेकक गीतश्‍
छोड़ब नहि दुआरि सुनियौ रघुनन्दरन।
जौं रघुनन्दसन चलला कोवर घर सरहोजि छेकल दुआरि।
नेग बिना दय पैर बढ़ायब देब गारि हजार यौ, सुनियौ रघुनन्द़न ...
पाँच पदारथ हरि जीक संग मे एक सरहोजि एक सारि यौ, सुनियौ...
जौं नहि देता सात पदारथ बेचता बहिन भाय यौ। सुनियौ....



बरियाती खेबा कालक गीतश्‍
(1)
समधि गारि नइ दै छी विनती करै छी,
समधिक माए पितिआइन गोअरबा के दै छी।
गोअरबा सँ दूध मंगबै छी, लके समधि जिमबै छी। समधि...
समधि के दादी नानी ल बनियाँ के दै छी
बनियाँ सँ चीनी मंगा समधि के दै छी। श्‍ समधि....
समधि क मौसी पीसी ल मड़बड़िया के दै छी।
मड़बड़िया स धेती कीनि समधि के दै छी। श्‍ समधि गारि....
(2)
निज कुल कामिनि समधिन छिनरो महिमा अगम अपार।
सगर नगर घर एको ने छोड़लनि के थिक अपन परार।
बनियाँ मे जे फल्लाँर के गछलनि जिनका टाका हजार।
पढ़ूआ मे जे डाक्टलर के गछलनि जे भोकतनि सूई बारम्बाार।
राजपूत मे जे फल्लाँर के गछलनि जनिका ढ़ालश्तरलवार।
गोआर मे जे फल्लाँ् के गछलनि जिनका धेनु हजार।
सोनरा मे जे फल्लाँ् के गछलनि जनिका जेवर भण्डाूर।
तमोलिन मे जे फल्लाँर के गछलनि के करतनि उपर लाल।



कोवर गीतश्‍
(1)
कोने बाबा बान्हेल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर।
कोने अम्माे लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर।
फल्लाँ बाबा बान्हलल इहो नव कोवर फल्लाँत अम्माा लिखू पूरैन हे।
ताहि पैसि सुतय गेला फल्लाँँ दुलहा सीता कोवर धय ठाढ़ि हे।
बैसू सीता दाइ लाले रे पलंगिया बुझि लिय हमरो गेयान हे। जनकपुर
(2)
नव खटिया नव पटिया नव सब पुरहर हे।
आहे नव नव जोड़ल सिनेह सोहाग राति निन्दि नहि हे।
ताहि पैसि सुतलाह फल्लाँर दुलहा संग सिया दाइ हे।
सीताअति सुकुमारि सोहाग राति निन्दो नहि हे।
हटि सुतु हटि सुतु ससुर जी के बेटिया अहाँ धामे गरमी बहुत हे।
एतबा वचन सुनि कनियाँ सुहवे रुसि बाहर चलि जाइ हे।
हम नहि घुरबै ककरो वचनियाँ कोवरक वर बड़ ठेकर हे।
महुअक कालक गीतश्‍
बर रे जतन सासु मौहक रान्होल खिरियो ने खाथि जमाय।
गे माइ गौरी जाय दहिन भरि बैसलि थार बदल दुइ भेल।
मनाइनि जाय पाँछा भय बैसलि वर करा एक देल।
गे माइ सेहो करा हम कुकुर जिमायब से पान वर के देल।
घरभरी कालक गीतश्‍
माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कैल ओरियान।
आइ थिकनि घरभरी सखि हे धीया जमैआ मोर जाय।
धानश्पा न देल हाथहि सखि हे दुनू मिलि देलि छिड़आय।
भनहि विद्‌यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय।
खोंइछ झाड़ैक गीतश्‍
सगर जनम हम आस लगाओल,
भैया करता बिआह गे माइ।
भौजी के खोंइछा मे हीरा मोती आओत,
ताहि लय गहना गढ़ायब गे माइ।
तेहन घर ने भैया बिआहल,
भौजी खोंइछ दुबिश्धा न गे माइ।
जनु कानू जनु खीजू बहिन दुलरुआ,
हम देव गहना गढ़ाय गे माइ।
कोवर परातीश्‍
अब ने विलासक बेरि हे माधव,
आब ने विलासक बेरि।
मुखहुक पान बिरस सन लागत,
दीपक जोति मलीन। श्‍ हे माधव.....
चेरिया आय बहारय आंगन,
चन्द्रनक जोति मलीन। श्‍ हे माधव.....
ग्वा ला आय गौ दूहन लागे,
बछड़ डगरि बन गेल। श्‍ हे माधव......
सूरदास प्रभु तुम्हानरे दरस को,
सुर्य उदय भय गेल। श्‍ हे माधव.......
कनियाँ मुँह देखैक गीतश्‍
सुनू हे सखिया सिया मुँह देखू शुभ काल।
पहिने जे देखथि सासु कौषिल्या ,
देखू हे सखिया मोहर देखि शुभ काल।
तखन जे देखथिन गोतनि बड़ैतिन।
देखू हे सखिया कंगना देथि शुभ काल।
तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन,
देखू हे सखिया टाका देथि शुभ काल।
तखन जे देखथि परश्पनरोसिन,
आषीष देथि शुभ काल। सुनू हेे सखिया....
कोबर नीपै कालक गीतश्‍
नीक नीपू नीक नीपू दुलहिनिया।
नहि नीक नीपब ते सुनब कहिनिया।
कुम्ह राक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया।
माटि आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया।
जोलहाक जनमल थिकहुँ दुलहिनिया।
पाट आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया।
बहियाक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया।
पानि आनि नीपू नै ते सुनब कहिनिया।
कोबर नीपै काल कनियाँ क ठकैक गीतश्‍
देखू देखू हे सखि सीता रुसि रहली,
आधा निपलनि कोबर आध छोड़ि बैसली। श्‍ देखूश्दे खू .....
सीताक बापकेँ बजाउ, सीता माए केँ बजाउ
की सब सीता के सिखा क वदा कयली। श्‍ देखू....
सुनलनि सासु कौषिल्याक हाथ मोहर धयली
कंगना गढ़ायब टीका मंगायब सीता किए रुसली। श्‍ दुखूश्दे खू...
गौरी पूजाक गीतश्‍
गौरी पूजय चलल रुक्मिगनि संग सखी दस पाँच यो।
तीन फूल लय गौरी पूजल बेली चम्पाह गुलाब यो।
तीन सिन्दुसर लय गौरी पूजल मोटिया पीपा अचीन यो।
तीन नेवेद्‌य लय गौरी पूजल नेवो नारंगी अनार यो।
तीन वस्त्र‌ लय गोरी पूजल लाल पीयर पटोर यो।
तीन बेरि कल जोरि पूजब लय गंगाजल नीर यो।
हड़ीर पानक गीतश्‍
रतन सिंहासन बैसथु सुलपाणि
रवाथि ने हरीर पान पीवथु जूड़ी पानि।
जेहने महादेव के गौरीदाइ परान
तेहने फल्लाँन दुलहाके फल्लींा दाइ परान।
जेहने रामचन्द्रे के सीता दाइ परान
तेंहने फल्लाँव दुलहा के फल्लोंए दाइ परान।
जेहने हड़ीर खेने मधुर पानि
तेहने फल्लाँ् दुलहाक फल्लोंा दाइ मधुर हे।
मुट्ठी खोलैक गीतश्‍
सखि मुट्ठियो ने खोलय जमैया
हे हारि गेला रधुरैया।
हमरो सीता मुट्‌ठी कसि के बान्हाल
खोलियो ने सकला जमैया हे।हारि गेला...
हमरो सिया दाइक कोमल आँगुर
धीरे स खोलब जमैया हे। हारि गेला...


चतुर्थीक कालक गीतश्‍
चलुश्च लु कामिनि कर असनान।
प्रखर भानु मुख करत मलान।
शीतल शुरभीत जल घट देल।
पंकज नायक नभगत भेल।
आजु चतुर्थीक अवसर थीक।
किछुओ ने भिजतह लोहित सारि।
लहु लहु जल हम ढा़रब बारि।
दुहु जन रहु गय अमर कहाय।
वरुण देव नित रहथु सहाय।
कुमर चतुर्थीक उत्स व तोर।
विधिकरी विधि करु भऽ गेल भोर।
नहायकालक गीतश्‍
राम लखन सन सुन्दऽर वर के जनु पढ़ियनु केओ गारि हे।
केवल हास विनोदक पुछिअनु उचित कथा दुइ चारि हे।
प्रथम कथा ई पुछिअनु सजनी कहता कनेक विचारि हे।
गोरे दषरथ गोरे कौषल्याि, भरत राम किएक कारी हे।
सुनु सखि एक अनुपम घटना, अचरज लागत भारी हे।
खीर खाय बालक जनमौलनि, अवध पुरी के नारी हे।
अकथ कथ की बाजू सजनी, रघुकूल के गति न्या री हे।
साठि हजार बालक जनमौलनि सगरक नारि छिनारि हे।
नेहलता किछु आब ने कहियनु, एतवे करथि करारी हे।
हँसी खुषी मिथिला से जेता, पठा देता महतारी हे।
वेदी उखारै कालक गीतश्‍
सखि यदि एक बापक बेटा हेता
दोसर हाथ ने लगेता हे।
दू बापक बेटा हेताह
तखने दोसर हाथ लगोता हे।
दू कोन के वेदी उखारलनि
तेसर आंगन मे ठाढ़ हे।
कहियनु गऽ सासु ससुर सँ
आंगन मे रुसल छथि जमाय हे।
कहियनु जाय जमाय बाबू सँ औंठी देवनि गढ़ाय हे।
पटिया समटय कालक गीतश्‍
रघुववर पटिया देलनि ओछाय
सीता फेकल जुमाय कोवर घर मे।
गाइन मंगल गीत गाय विधिकरी विधि कराय।
सखि सब करथि विनोद कोवर घर मे।
कहथिन सरहोजि बुझाय जुनि अहाँ अगुताइ।
विधि करियौ आइ कोवर घर मे।
सौजनक गीतश्‍
मेही भात जतन भनसीआ
साँठि लयल भरि थारी जी,
राहड़िक दालि बटा भरि उत्तम
ताहि देल घी ढ़ारी जी।
ओल पड़ोर तरल तरकारी
खटरस भेग लगावै जी।
महिसिक दही छाँछ भरि उत्तम
परसय प्रेम पियारी जी।
दही खयवा कालक गीतश्‍
हे वर दही किये ने खाइ छी
माय अहाँक गोआरक बहु छथि
अहाँ संग किएक ने लयलहुँ
संग संग अयली टीसन सँ घुरली
टीकट मास्टहर देखि डेरेयली
हे वर चीनी किये ने खाइ छी
माय अहाँक छथि बनियाक बहुआ
संग किये नहि अनलहुँ
संगे अयली दरबजा सँ घुरली
समधी देखि डेरेयली। हे वर...
चित्ती साटक गीतश्‍
भितिया मे चितिया सटि हे योगिया
जाहि ठाम लागल सिन्दु।र पिठार।
जहाँ जहाँ सुमिरन करबे रे योगिया
रखिहे हिरदय लगाय।
नून तेल पैंच लेल सिन्दुुर सपन भेल
पिया भेल डुमरीक फूल। भितिया.... मधुश्रावनीश्‍ गोसाउनिक गीतश्‍
(1)
विनती सुनियौ हे महरानी, हम सब शरण मे ठाढ़।
अक्षत चानन अहाँ के चढ़ायब, आरती उतारव ना।
बेली चमेलीक माँ के हार चढ़ायब अढ़ूल चढ़ायब ना।
करिया छागर धूर बन्हाेयब, उजर चढ़ायब ना।
(2)
महिमा तोहर अपार हे जगजननी महिमा तोहर अपार हे।
बामे रवप्पकर दहिने कताबहै सोनितक घार हे।महिमा.....
पहिरन चीर गले मुण्डेमाला पैर मे नुपुर अपार हे।
सूरदास प्रभु तुम्हुरे दरस के सदा रहिय रखवार हे। महिमा....
बिसहाराक गीतश्‍
साओन मास नागपंचमी भेल।
बिसहरि गहवर सोहाओन भेल।
केओ नीपै गहवन केओ चौपारि।
हमही अभागिन निपी दुआरि।
केओ लोढ़े अढ़ूल केओ बेलपात।
हमहू अभागिन हरिअर दूबि।
केओ माँगे अनधन केओ माँगे पूत।
हमहू अभागिन सिरक सिन्दुलर।
पावनिक गीतश्‍
पाबनि पूजू आजु सोहागिन प्राण नाथ के संग मे।
कारी कम्बपल झारि गंगाजल काजर सिन्दुरर हाथ मे।
चानन घसू मेहदी पीसू लिखू मैना पात मे।
पावनि साजि भरिश्भररि आनल जाही जूही पात मे।
कतेक सुन्दार साज सजल अछि लिखल मैना पात मे।
आँखि मूनै कालक गीतश्‍
नहुँ नहुँ धरु सखी बाती, धरकय मोर छाती।
नहुँ नहुँ पान पसारह, नहुँ नहुँ दृग दुहु झाँपह।
मधुर मधुर उठ दाह मधुर मधुर अवगाहे।
कुमर करह विधि आजे, मधुश्रावनी भेल आजे।
टेमी कालक गीतश्‍
क्द ली दल सन थर थर कापय मधुश्रावनी आजे।
स्क ल सिंगार समारि साजथि सब मधुमय कैल समाजे।
क्म ल नयन पर पानक पट दै नागर जखनहि झाँपै।
विधकरी हाथ चन्द्रतकर बाती देखि सगर तन काँपै।
आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख किये पड़ल उदासे।
अम्बाी मुख हेरय कियै कामिनि पल पल लैह उसासे।
कुमर नयन सँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते।
बड़ अजगुत मधुश्रावनी विधि परम कठिन इहो रीते।
बटसावित्रीश्‍
बड़क पूजाक गीतश्‍
जेठ मास अमावस सजनी गे सब धनि मंगल गाव।
भूषण वसन ठीक करु सजनी गे रचि रचि आँग लगाव।
काजर रेख सिन्दुार भेल सजनी गे पहिरथु सुबुधि सयानि।
हरखित चललि अक्षयवट सजनी गे गवितहि मंगल गाने।
घर घर नारि हकारल सजनी गे आदर सँ सभ गेलि।
आइ थिक बड़साइति सजनी गे तैँ आकुल सभ भेलि।
घुरुमिश्घु़रुमि जल ढ़ारल सजनी गे बांटल अक्षत सुपारी।
फतुर लाल देल आषिष सजनी गे जीबथु दुलह दुलारी।
(2)
कतेक जतन भरमाओल सजनी गे, दै दै शपथ हजारे।
सपथहुँ छल जौं जनितहुँ सजनी गे, नहि करितहुँ अंकारे।
आब जगत भरि मानिनि सजनी गे, केओ जनि करय पिरीते।
मुँह सँ अधिक बुझावथि सजनी गे, वचन त राखथि थीर
हुनक हिया दगधल मोर सजनी गे, जसु नलिनी दल नीर।
गुन अवगुन सब बुझलहुँ सजनी गे, बुझलुँ पुरुषक रीत।
मनहि विद्‌यापति गाओल सजनी गे, पुरुषक कपटी प्रीति।
कोजगरा चुमाओनश्‍
भैया के करियनु चुमाओन कोजगरा मे।
बाबू जी पुछि पुछि परसथि मखान भोजघरा मे।
आंगन चानन नीपल गेल अछि।
गजमोती चौक पुराय देल अछि।
भैया के कहिऔन चुमाओन कोजगरा मे।
मानिक दीप जराओल दय दय।
काँच बाँस के डाला लय लय।
भैया के करियौन चुमाओन कोजगरा मे।
पचीसी गीतश्‍
खेलू खेलू यौ भैया बाजी लागइ के।
सीता जीतथि रामजी हारथि बाजी लगाइ के।
सखि सब देथिपिहकारी बाजी लगाई के।
सीता हारथि रामजी जितथि बाजी लगाइ के।
सखी सब गेल लजाय बाजी लगाइ के।
धन्यी धन्यग सखी हम मिथिलावासी।
रामजी भेला जमाय बाजी लगाइ के।
जुआ खैलै लेल एल जनकपुर वाजी लगाइ के।
हारला भाय बहिन पितिआइन हे वाजी लगाइ के।
दुरागमनश्क नियाँ परिछनिश्‍
सीता एली अंगना परिछन चलु सखि सब।
कथी के महफा कथी के लागल ओहार हे।
सोनाक महफा रेषमक लागल ओहार हे।
सीता एली अंगना परिछन चलु सखी सब।
कथी के साड़ी कथीक लागल किनारी हे।
रेषमक साड़ी गोटा लागल किनारी हे।
सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब।
कतय गेली सासु ओ ननदि जी हे।
सीता के अरिछिश्प रिछि घर लय चलू हे।
सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब।
चमाओन गीतश्‍
चुमाबहु हे राम सिया के चुमाबहु हे।
आंगन चानन निपल कौषिल्या , गजमोती चौक पुराइ हे।
अलष कलष लय पुरहर साजल, मानिक दीप जराय हे।
काँचहि बाँस के डाला बनल अछि, दही ओ धान सजाई हे।
दूभि अक्षत लय मुनि सब अयला, शुभ शुभ शब्द सुनाई हे।
चुमबय बैसली मातु कौषिल्या , सखि सब मंगल गावे हे।
देहरि छेकक गीतश्‍
राम सिया मिलि अयला अवधपुर, बहिन छेकलनि दुआरि हे।
हमरा दान देव जहन अहाँ भैया, तहन छोड़व हम दुआरि हे।
सासु ससुर हमरा किछु नहि देलनि, कि देव अहाँ के देहरि छेकाइ हे।
हाथक औंठी भैया खोलि देलखिन, बहिन लेलनि देहरि छेकाइ हे।
खोंइछ झारक गीतश्‍
सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई।
भौजीक खोंइछ मे सोना चानी आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गेमाई।
तेहना ठाम ने भैया बियहला, भौजीक खोंइछ दुभि धान गे माई।
सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई।
मोरि बैसक गीतश्‍
मोरि बैसल अहाँ अपन सासु, मुंह जनु अहाँ बाजब हे।
पुतहुँ होयत गलजोर, मुंह जनु अहाँ बाजब हे।
मोरि बैसल अपन पितिया सासु, मुंह जनु बाजब हे।
पुतोहू होयती गलजोर, मुँह जनु अहाँ बाजब हे।
कनियाँ मुँह देखैक गीतश्‍
सुनु हे सखि सिया मुंह देखु शुभ काल।
पहिने जे देखथि अपन सासु कौषिल्या ।
तखन जे देखथिन गोतिन बड़ेतिन।
तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन।
तखन जे देखथि पर परोसिन सब।
आषीष देथि सब मिलि शुभ काल। सुनु हे सखि....
कोवर परातीश्‍
आब न बिलासक बेर हे माधव आब न बिलासक बेर।
मुखहुक पान निरस सन लागय, दीपक जोति मलीन।
ग्वाुला आबि गो दुहन लागे, गैया हमर बन गेल।
चेरिया आबि झारु दियै, सुरुज उदय भय गेल।
सूरदास प्रभु तुम्हािरे दरस को चन्द्रतक जोति मलीन।
आब न....




कोबरक गीतश्‍
कोबर लिखय गेलि रानी कौषिल्यास, चारु कात लिखल मयूर।
ताहि कोबर सुतला फल्लाँर दुलहा, संग लागि सीता सुकुमारि।
मुह उधारि सुन्दुरि के पुछलनि कोन कोन अभरन हे।
हाथ कंगना अपन बाबा देलनि, सिकरी लखन देओर हे।
सिरक सिन्दु.र प्रभु अहीं जे देलहु यैह तीन अभरन भेटल हे।
कोबर नीपक गीतश्‍
देखू देखू हे सखि सीता आइ रुसि रहली।
आधा निपलनि कोबर आधा छोड़ि बैसली।
सीताक बापके बजाउ ओ भाय के बजाउ।
की की सीता के सिखाय कइलनि विदा।
सुनि सासु कौषिल्या मोहर लेलनि हाथ।
कंगना गढ़ायब टीका गढ़ायब सिया किय रुसली।

कन्या पक्षश्‍ तुलासी
गौड़ीक गीतश्‍
फूल लोढ़य गेलि गौरी माली फुलबाड़ी
बसहा चढ़ल षिव आइ गे माइ।
लोढ़ल फूल षिव देलनि छिरिआइ।
कनैत खीजैत गौरी अम्माढ लग ठाढ़ि।
के तोरा मारलक के पढ़ल तोरा गारि।
हम नहि कहब अम्माढ कहितहुँ लाज।
पूछू गय सखि सभके कहत बुझाय।
महेषवाणी
हम नहि आजु रहब एहि आंगन, जौं वूढ़ होयत जमाय गे माई।
एक त बैरिन भेल विधि विधाता, दोसर धिया के बाप गे माई।
तेसर बैटी भेला नारद ब्राह्‌मण, हेरि लयला बूढ़ जमाय गे माई।
धोती लोटा पोथी पतरा, सेहो सब लेबनि छिनाय गे माई।
जौं किछु बजता नारद ब्राह्‌मण, दाढ़ी धऽ देबनि धिसिआइ गेमाइ।
अरिपन लेपलनि पुरहर फोरलनि, फेकलनि चौमुख दीप गे माई।
धिया लऽ मनाइनि मन्दििर पैसलीह, केओ जुनि गाबथि गीत गे माई।
भनहि विद्‌यापति सुनु ए मनाइनि, इहो थिक त्रिभुवन नाथ गे माई।
शुश्षुणभ कऽ षिव गौरी विवाहू, इहो वर लिखल ललाट गे माई।
समदाउनश्‍
बारह बरस केर छल उमिरिया तेरहम बरस ससुरारि।
कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल।
कौने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय।
ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल।
भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वा मी निरमोही नेने जाय।
कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथि देखि रहब लोभाय।
घरभरीक गीतश्‍
माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कयल ओरियान।
आइ थिकनि घरभरी सखि हे धिया जमैया मोर जाय।
धान पान देल हाथहिँ सखि हेे दुनु मिलि देल छिड़िआय।
भनहि विद्‌यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय।
अवसर विष्‍ोष वा समसामयिकश्‍
पावसश्‍
नव घन गरजत माला।
एक सघन तिपिराछन रजनी कूजित दुतिय मराला।
तेहर सेज सुनि लखि पहु बिनु उठल अन्त र ज्वाछला।
रहिश्रशहि चहुदिषि चपला चमकत विहरिनि जन जिमि भाला।
खेपब राति कौन विधि सखि हे चिन्ताा हृदय विषाला
हे जलधर अहाँ जाउ ततय झट जहाँ बसथि नन्द लाल।
करबनि विनय चरण धय लबि कऽ आबथु शीघ्र कृपाला
जौं झट दऽ मोहन नहि औता करता निमिप अभेला।
तौं ब्रज मे एको नहि जीउति विरहिनि सब व्रजवाला।
कजरीश्‍
सखी हे पिया नहि घर अयला, मेघवा वरिसन लागे ना।
जौं हम जनितौं पिया नहि औंता रखितहुँ हृदय लगाय।
हमरा सँ की त्रुटि भेल सखि हे आइधरि नहि आय।
जौं जनितौ पिया ऐहन करता दितियनि नहि हम जाय।
सखी हे पिया नहि घर अयला।
(2)
सखिया सावन ने डर लागै जियरा धड़श्धिड़ धड़कै ना।
ष्यााम घटा चहुँ ओर देखायत बिजुरी चमकै ना।
पिया मोर परदेष गेला सुन सेजबा न भावै ना।
झींगुर दादुर मोर पपिहरा कोइली कुहकै ना।
सखिया सावन मे डर लागै ना।
उदासीश्‍ तिरहुत
मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती।
गोपी सकंल बिसललनि रे जते छल अहिबाती।
सुतलि छलहुँ अपन गृह रे निन्नल गेलौ सपनाइ
कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाई
कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरब गरानी।
आनक धन लय धनबन्तीख रे, कुबजा भेलि रानीश्तिनरहुत।
(2)
जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि।
आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारी।
वन मे डोलय पिपर पात रे बहय सेमरि।
हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारी।
केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारि।
हरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई।
(3)
एते दिन भ्रमर हमर छल सखि हे,
आब गेल सारंग देष।
मधुपीबि भ्रमर लोभित भेल सखि हे।
मोहि किछु कहियो ने गेल।
ककराश्क्करा कहब, अपन दुख सखि हे,
नयन निन दुरि गेल।
जे बिरहे हम व्याभकुल सखि हे
भ्रमर हमर रुसि गेल।
आंगन मोर लिये बिजुवन सखि हे,
घर भेल दिवस अन्हानर।
पुरुषक वचन ऐहन थिक सखि हे,
सपतक नहि विसवास।


अवसर विष्‍ोषक गीतश्‍
मलारश्‍
(1)
अलि रे प्रीतम बड़ निरमोहिया।
आतुर वचन हमर नहि मानय, परम विषम भेल रतिया।
काँपत देह घाम घमि आबत, ससरि खसत नव सरिया।
आवत वचन थीर नहि आनन, बहत नीर दुहू अँखिया।
रमानन्द् भामिनि रहु थीर भय सुख बिच कहु दुख बतिया।
(2)
हे उधो लिखब कोन विधि पाती।
अंचल पत्र नयन जल कज्जथल नख लिखि नहि थीर छाती।
चन्द्रद किरण बध करत एतए पिय ओतए रहू दिनश्रा़ती।
रेषम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जीव घाती।
कहथि रमानन्दा सुनू विरहिनि आओत श्या म विरहाती।
(3)
अलि रे हम रघुवर संग जायब
भूखल पायब भोजन करायब निर्मल जल पियेबै।
थाकल पायब चरण दबायब शीतल बेनिया डोलेबै।
औंघैल पायब वन पत्र लायब तहि पर आँचर ओछेबै
तुलसीदास प्रभु तुम्हररे दरस को रघुवर चरण लेपटेबै।

योगश्‍ (1)
भात खेआय मन मारलन्हि हे अपन सासु हे।
जाय ने देथि अपन देष हे अपन सासु हे।
अम्माद होयती बाट देखैत करवन बाबू औताह हे।
पान खेआय मति मारलन्हि हे सरहोजिनि अपन हे।
जाय न देथि निज देष बुझाय रखतीह हे।
कर जोरि विनती करै छी सुनू रघनन्दहन।
बान्हदत अहाँ के प्रेम अहाँ अपने छी जगवन्द।न।
(2)
प्रिय पाहुन मन सँ जिमि लिअ।
अपने योग बनल अछि किछु नहि सेहो मनहि विचारि लिय।
बुझब तखन हम जौं किछु माँगव और दिअ।
भावक भुखल स्वँभाव अहाँ के तेँ हम सब हरसाइत छी।
भनहि विद्‌यापति इहो मंगल मिथिला विधि जानि लिअ।
(3)
हमर अपन करिये छथि पाहुन ताहि सँ मतलब अनका की।
अपन बल पर अपन खुषी थिक ताहि मे कानून जहाने की।
अपन बहिनि यदि फेकिये देता ताइ सँ मतलब अनका की।
साठि हतार जनभूलखिन पुरखिन तकर करै छी निन्दान की।
प्रसव कास मे दषा जे भेलनि ताहि सँ मतलब अनका की।
गटश्गदट गारि सुनै छथि लालन मगर मरम्मतति करताकी।
स्नेगहलता मुसकाथि लजाइत उचित बात मे बजता की।
उचितिश्‍(1)
श्यािमा वरन श्री राम हे सखि! देखैत मुख अभिराम।
आइ हमर विध बाम हे सखि! मोहि तेजि पहु गेल आन।
पढ़ल पंडित भान हे सखि! पहुक नहि करि अपमान।
भनहि ‘विद्‌यापति' भान हे! स्‍ुापुरुष गुणक निधान।
(2)
श्यािम गोकुल तेजि गेल रे, हमर कोन दोख भेल रे।
हमरा सँ नित अपराध रे, तोहे प्रभु गुणक अगाध रे।
कत गुणकरब बखान रे, जग भरि के नहि जान रे।
भनहि ‘विद्‌यापति' भान रे, सुपुरुष गुणक खान रे।
(3)
जओं करु सुजन सिनेह रे, उपला पाहुन नेह रे।
हेमकर मण्डवप हेम रे, चाानन वन कत नीम रे।
हिंगु हरदि कत बीच रे, गुनहि चिन्हेल ऊँच नीच रे।
मणि कादब लेपटाय रे, तैओ ने तनिक गुण जाय रे।
अलि के कुसुम अनेक रे, मालति के अलि एक रे।
काक कोइलि एक कांति रे, भेम्हे भ्रमर दुई भाँति रे।
कह ‘बादरि' अवधारि रे, सुपुरुष जन दुइ चारि रे।






बारहमासाश्‍ (1)
चैत हे सखि मत्तकोकिल कुहुकि काम जगाव यो।
कठिन श्या‍म कठोेर मानस ऋृतु बसन्ते विदेष यो।
बैषाख हे सखि देखि उपवन ललित कुसुम विकास यो।
देखि निज कुच कुसुम मौलल रहत चित्त न थीर यो।
जेठ हे सखि तेल चन्दकन पंक लेप शरीर यो।
बिन नाथ चन्द1न शीतलादिक धघकि जारत देह यो।
आषाढ़ हे सखि झमकि झमकत नीर बिजुरी जोर यो।
देखि काँपत देह थर नयन धारा नोर यो।
आयल साओन मेघ बरिसत घुमुड़ि घोर समीर यो।
सुमरि यौवन उमड़ि आबत प्राणमति नहि पास यो।
भादब जलधर धड़कि ठनकत खसल चौकि अचेत यो।
काहि कहु अब श्यातम बिनु सखि जात जीवन मोर यो।
आस आसिन अन्ति कय सखि बैसल कंत दुंरंग यो।
शरद चन्द्रदक चाँदनी देखि चित्त चंचल मोर यो।
देखि कातिक नारि एकसरि तानि शर रतिनाथ यो।
करत आंकुल जीव छनश्छीन कठिन कन्ता न बूझ यो।
लबिजात धान समान अगहन कमल सन कुच मोर यो।
झट नाथ-नाथ पुकार कय सखि पड़ल सेज अचेत यो।
पूस ओस बेहोष भय सखि खसत प्रीतम पास यो।
हम अकेलि सून पहु बिन काटब कोन विधि राति यो।
माघहे सखि जाड़ लागत जुलुम करि गेल कंत यो।
अंगश्अंाग अनंग ज्वारला ताप तापित देह यो।
रमानन्दा रहु धीर कामिनि धीर धय मन मारि यो।
आओत फागुन मिलत बालम खेलत हुनि संग फागु यो।
(2)
कहत मैना सुनू यो मुनि जन गौरी कोना रहत कुमारि यो।
गौरी जोग बर खोजि आनू चढ़ल मास बैसाख यो।
जेठ नारद फिरति चहु दिषि जोहल भंगिया भिखारि यो।
कहथि नारद सुनहु त्रिभुवनपति चलह व्याभहन आज यो।
अखाढ़ हेमन्तन घर बरियात लायल देखल सकल समाज यो।
काज राज सब छोड़ि सखिसब देखु हर बरियात यो।
सावन वर बौराह आयल बसहा पीठ असवार यो।
एहन उमत वर हेमन्तव लायल पैर फाटल बेमाय यो।
भादब मैना भेलि व्या्कुल धुनथि माथ कपार यो।
घटक के हम की बिगाड़ल की विधि लिखल लिलाट यो।
आसिन मैना गेलि अंगना मन दुख अगम अपार यो।
आब हम विष घोरि पीअब मरब जल बिच जाय यो।
कातिक शंकर भस्मह तेजल कयल गंगा स्नाबन यो।
रगड़ि चानन अंग लेपल भेल सुन्दीर रुप यो।
अगहन मैना भेलि हरसित लावथि गाइनि बजाय यो।
चलह सखि सब गीत गाबह त्रिभुवनाथ जमाय यो।
पूस सखि सब छोड़ि बैसलि देखथि रुप अनूप यो।
चलह सखि सब करह मौहक देखि नैन जुड़य यो।
माघ शंकर भेल व्यािकुल जोहथि आक धथुर यो।
एहन उमत वर हेमन्तव लायल भाँग हुनक अधार यो।
फागुन षिव सँ कहथि गौरी सुनू षिव अरजी हमार यो।
एक बेरि भस्मह उतारु शंकर देखत हेमन्तजक समाज यो।
चैत मैना भेलि हरसित पूरल मनक अभिलाष यो।
भनहि विद्‌यापति ई पद गाओल मिलल त्रिभुवन नाथ यो।
(3)
अगहन सीता के विवाह, पूस कोवर तैयार।
माघ सीरक भराय देव रधुवर जी के।
फागुन फगुआ खेलायब, चैत फूल लोढ़ि लायब,
बैषाख बेनिया डोलायब रधुवर जी के।
जेठ घाम परे भारी, आषाढ़ वुन्दे झरे सारी,
सावन झूलबा लगा दे, रधुवर जी के।
भादव राति अन्हाोर, आसिन करब सिंगार
कातिक आवि गेल मिथिला रधुवर जी के।
(4)
कातिक अयले कलकतिया जोहन बटिया।
अगहन चुड़वा कुटायब पूस दही पौरायब।
फागुन फगुआ खेलायब चैत फूल लोढ़ि लायब।
बैषाख बेनिया डोलायब जोहन बटिया।
जेठ हेठ भऽ गमायब अषाढ़ घर चल जायब।
सावन दुनु मिलि खेलब जोहन बटिया।
भादब नहि घहराय आसिन आस लगायब।
कातिक ऐलै कलकंतिया जोहन बटिया।
छौमासाश्‍(1)
साओन सर्व सोहाओन सखि हे फुलल बेलि चमेलि यो।
रभसि सौरभ भ्रमर भ्रमि भ्रमि करय मधुरस केलि यो।
आरे केलि करथु पहु मन दय
सखि अधिक विरह मन उपजय।
भादव घन घहराय दामिनि गरजि गरजि सुनाय यो।
बरसु घन झहर बून्दि रिमिझिमि मोहि किछु नहि भाय यो।
आरे भामिनि भय घन दमसय
सखि मुरुछि खसु महिमय।
परिणाम कोन उपाय हे सखि करब कोन परकार यो।
मास आसिन अधिक ज्वाहला विरह दुख अपार यो।
आरे कतेक सहब दुख पहु बिनु
सखि ककरो नाह बिछड़ि जनु।
नाह विछुड़ल मोर हे सखि होयत जीवक अन्त यो।
अरुण कातिक धसिय धायब जतय लुबधल कंत यो।
आरे कंत जोहय हम जायब
सखि जतय उदेष हम पायब।
अगहन हे सखि सारि लुबधल लबल जीवन मोर यो।
योगिनि भय हम जगत जोहब जतय जुगल किषोर यो।
आरे हमर प्रभु जौं अहोताह
सखि कर गहि कंठ लगोताह।
पूस धैरज धरय चाहिए भमर रहल विदेष यो।
हुनि विदेषी सुखहि खेपत हमर तरुण वयस यो।
आरे विदेसहि वैसि गमओताह
सखि हमर गृह नहि अओताह।
माध झिहिर पवन डोलय देह झाँझड़ मोर यो।
हँसथि, बसन उधारि सखि सब कहथि मोहि विजोर यो।
आरे शोक वियोग मनहि मन
सखि चित्त नहि थिर रहे एको छन।
(2)
वैषाख मास तनि तलफत घाम चुबै अबिरल।
वैसि बेनिया डोलायब कोठरिया मे।
जेठ दहकत अकास, घाम सहलो न जात
पैस बैसब भीतर मन्दिारिया मे।
अषाढ़ वुन्दा अपार पावस बरसे हजार
देखि हरषथ अपन कोठरिया मे।
साओन बरखा बहार, झुला करब तैयार
झुला झुलबै हम फुलवरिया मे।
भादब भरु गदी नार, नैया करब तैयार
अहाँ झिझरी खेलायब नदिया मे।
आसिन शरद बहार चाँदनी के झलकार
रास रचालेब कंचन महलिया मे।
कातिक दुतिया मनायब सबके एतहि बजायब
करब सब सुख साज कोठरियामे।
अगहन पन्चयचमी मनायब नवका चड़बा कुटायब
प्याकरे परसि खुआयब ससुररिया मे।

चौमासाश्‍
(1)
माध मोहन नेह लगायल अपने चलल परदेष यो।
ओहि रे परदेषिया रामा ओतहि गमाओल हम धनि बाड़ि बयस यो।
फागुन हे सखि आम मजरल कोइली सबद घमसान यो।
कोइली शब्द सुनि हिया मोर सालय नैना सँ झहरय नोर यो।
चैत हे सखि चित्त चंचल यौवन भेल जीवकाल यो।
आन धन रहितय बेचि हम खइतौं ई धन बेचलो न जाय यो।
बैषाख हे सखि विषम ज्वा ला घाम सँ भीजल शरीर यो।
रगड़ि चन्द न अंग लेपितहुँ जौं गृह रहितथि कन्तश यो।
(2)
कैसे खेपव बिनु कामिनि दामिनि दमसय रे।
सखि री सुखक मास अषाढ़ आस नहि पूरल रे।
दादुर करत पुकार झिंगुर झंझकारत रे।
सखी री सावन चहुँ ओर घटा मयूर बन कुहकत रे।
भादव मे मेघ झंहरत मोर मन झहरत रे।
सखी री हरि बिनु मंदिर शून गुण कत सुमिरब रे।
‘सूरदास' प्रभु गावल सखी समुझाओल रे।
सखी री धैरज धरु चहु मास आसिन हरि आओत रे।

वसन्तू (1)
सरस वसन्त समय भेल सजनी गे दखिन पबन बहु धीरे।
सपनहुँ रुप वचन एक भाखिय मुखा सँ दूर करु चीरे।
तोहर बदन सन चान होथि नहि यदपि जतन विधि देथि।
कय वेरि काटि बनाओल नव के तदपि तुलित नहि होथि।
लोचन तूल कमल नहि भय सक से नहि के जग जाने।
तै पुनि जाय नुकायल ज लमे पंकल एहि अपमाने।
मदन बदन परतर नहि पावथि जब भरि तोहरहि जोहि।
भनहि विद्‌यापति सुनु वर यौवति उपमा सुझय न मोहि।
(2)
समय वसन्तु पिया परदेष
असह सहब कत विरह कलेष
सुमरि पहु मन नहि थीर
मदन दहन तन दगध शरीर
षीतल पंकज चम्पाचक माल
हृदय दहन करु विषधर ज्वा ला
श्रवण दहन करु कोकिल गान
चान दहन तन अनल समान
(3)
रंगीली रंगश्मथहल मे खेलतु आज वसन्तख।
संगश्सरखी श्रृंगारश्साजी सब सरस तरंग वसन्तप। रंगीली...
सुश्कसर कनक पिचकारीश्धाेरी, सोहत श्री सिय कन्त।।
भीजतश्भू‍षणश्विसनश्रचमणश्तान, अनुपमश्छशवि दर्षन्तत। रंगीली...

तिरहुतश्‍
(1)
मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती।
गोपी सकल बिसरलनि रे जते छल अहिबाती।
सुतल छलहुँ अपन गृह रे निन्दल गेलौं सपनाइ।
कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाइ।
कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरम गरानी
आनक धन लय धनवन्तीख रे कुबल भेलिरानी।
(2)
जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि।
आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारि।
वन मे डोलय पिपर पात रे जल बहय सेमारि।
हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारि।
केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारी
ळरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई।
(3)
सुतल छलहुँ हम घरवा रे गरवा भोतिहार।
राति जखन भिनसरवा रे पहु आयल हमार।
कर कोषल कर कपइत रे मुखचन्द्रि निहारे।
केहन अभागलि बैरिन रे भागल मोर निन्दृ।
विद्‌यापति कवि गाओल रे धनि मन धरु धीर।
समय पावि तरुबर फरु रे कतबो सिंचु नीर।
बटगवनीश्‍
(1)
तरुणी वयस मोर बीतल सजनी गे पिया पिया बिसरल मोर नाम।
कुसुम फुलीय फूल मौलल सजनी गे भ्रमरो ने लेल विश्राम।
सिर सिन्दुलर नहि भावय सजनी गे मुखहि खसय एहि ठाम।
उठ दूत परम व्यारकुल सजनी गे नयन ढ़रकि खसु वारि।
अधरस ओतय गमाओल सजनी गे दय गेल सौतिनक बारि।
युगल नयन मन व्यारकुल सजनी गे थिर नहि रहय गेयान।
विद्‌यापति कवि गाओल सजनी गे ई थिक दुखक निदान।
(2)
चानन बुझि हम रोपल सजनी गे
भय गेल सिमरक गाछ सजनी गे।
ताहि रे गमक पिया जागल सजनी गे।
चलि भेल पिया परदेष सजनी गे।
बारह बरस पर आयल सजनी गे,
लायल कंगही सनेस सजनी गे।
ताहि कंगही लय आयल सजनी गे,
कय लेल सोलह श्रृंगार सजनी गे।
खोंइछ भरि लोढ़लहुँ चंगेरी भरि सजनी गे,
सब फूल सेजिया लगैब सजनी गे।

फगुआश्‍
(1)
मिथिला मे राम खेलथि होरी। श्‍ मिथिला मे...
अतर गुलाब कुम कुम केषरि, रंग अबीर भरल झोरी।
सखि सब सजि धजि रधुवर के देल अबीर भरल झोरी।
होइछ बाद्‌य विधान विविधश्विोधि नाचश्गारन ओ झिकझोरी।
मारथि मर्स पूर्ण पिचकारी राम सकुचि जाइछ गोरी।
सुरश्गशण सुमन गगन सौ उझलथि, अबीर गुलाल बीच घोरी।
कूदथि बालक वृन्दा मुदित मन, मिलाश्मि‍ला निज-निज जोरी।
धै फगुआ के रुप मिथिलापुर, घरश्घिर मचि रहल होरी।
‘हरेकिृष्णग' शोभा लखि सकुचित, शेषश्षािरदाश्ष त्‌ जोरी।
(2)
गलिअन बिच धूम मचायो री, गलियन...
ग्वानलवाल संग लिये कन्है या नित भोरे उठि आयो री।
हाथ अबीर गुलाल पिचकारी सिर डारो री।
वन्षी) वीणा झाल बजाओ देत गारी गायो री। -गलियन......
(3)
गोरी संग कृष्णं खेलय होरी
ग्वा3ल वाल संग कृष्णि कन्हैाया
सुन्द)र रंग भरी झोरी।
बाजत आबत झाल मृदंग सब
सब जन आबत रस बोरी।
गिरिधर दास गाओल बाल संग
युग युग जीबओ यह जोरी। गोरी संग...
(4)
परदेसिया लै अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया...
जब परदेसिया नगर बीच आयल
खुटे खुट अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया...
जब परदेसिया आंगन बीच आयल
रचि रचि केसिया बन्हाेवे गोरिया। परदेसिया...
जब परदेसिया घर बीच आयल
झाड़ि झाड़ि पलंग ओछावे गोरिया। परदेसिया...
(5)
परदेसिया के नारि सदा रे दुखिया।
चारिम मास फागुन अब बीतल
कहियो ने आयल पहुँ पतिया। श्‍ परदेसिया....
पाचम मास चैत जब बीतल
अपनो ने सूनल हुनि बतिया। श्‍ परदेसिया...
(6)
होरी खेलत श्री रघुवर रसिया।
धूम मचावत, डंफ बजाबत घाटश्बािट सब रोक लिया।
श्री रघुवंषी छैल छबीले, श्री मिथिलेष दुलारी सिया।
ललकारत दोऊ ओर परस्पेर जीत लिया होरी जीत लिया
अबीर उड़ावत रंग वरसावत जनक नगर के गलि गलिया।
‘प्रेमनिधि' अबला प्रबला भऽ, उमड़ि चली हे रंगरलिया।
(7)
होरी मे लाज न करु गोरी।
प्रेम ब्रजवासी तु गोरी भली बीनहै यह जोड़ी।
जौ इससे सीधे नहि खेलहुँ मार मार कर वरजोरी।
सुरदास निकले सब बन मे लिये जाय वन मे जोड़ी।

चैताबरश्‍
(1)
कृष्ण) तेजल मधुवनमा हो रामा कौन करनमा
कृष्ण) तेजल मधुवनमा।
यमुना तट पर वंषी वट पर सेहो नहि लागत सोहनमा
कौतुक हास रास वृन्दारवन सेहो सब भेल सपनमा
हो रामा कृष्णब तेजल मधुवनमा।
जौं हम जनितौं कृष्णे नहि औता रहितौ अपन भवनमा।
सूरदास प्रभु तुम्हधरे दरस को हरि मुख भेल सपनमा।
हो रामा कृष्णु तेजल मधुवनमा।
(2)
चैत रे महिनमा पिया बिनु आबै नहि निंदिया, हो रामा...
पिया परदेष गेल सुधि बुधि हरि लेल
भुलि गेल घर के सुरतियाश्‍ हो रामा पिया बिनु.....
जब सुधि आबै पिया तोहरो सुरतिया
कुहुकि उठय मोर छतियाश्‍ हो रामा पिया...
केहन कठोर भेल पिया के करेजवा
एको नहि लिख भेजय पतियाश्होध रामा
घर जब अइहे। पिया कोरा लै बैसिहें
नखरा लगैंहें आधी रतियाश्‍ हो रामा...
कहत महानन्दभ सुनु हे सहेलिया
ऐसे मे बितैं हें सारी रतियाश्‍ हे रामा....
(3)
डिम डिम डमरु बजाबै हो रामा, षिव रंगरसिया।
अपने सदाषिव पूजा पर बैसता
गौरी सँ टहल कराबै हो रामा...
अपने सदाषि भाँग उपजावै
गौरी सँ भाँग पिसाबै, हो रामा....
अपने सदाषिव बसहा चराबै
गौरी सँ डोरी धरावै, हो रामा....
अपने सदाषिव माँगिश्माँागि आनथि,
गौरी स धान कुटावै, हो रामा....
(4)
रुसल पियबा मना दे कोइलिया
तेरी मीठी बोलिया।
सगर रैनि हम कतेक मनाओल
ओ नहि मानल मोर बतिया।
केओ नहि हितश्बंगधु ककरा जगायब
के पिया देत मनैया।
आमक गाछ पर तोही जे कुहुकब
हम कुहुकब दिन रतियाश्‍ हो रामा...
सूरदास प्रभु तुम्होरे दरस को
कओन हरल हुनि मतिया। हो रामा तेरी मीठी बोलिया
(5)
कौन कयल योग टोनमा, हो रामा सब गेल वनमा
राम लखन सिय वनहि सिधारल, दषरथ तेजल परनमा, हो रामा..
मातु कौषिल्या रोदना पसारल सुन भेल नगर भवनमा, हो रामा..
तुलसदास प्रभु तुम्होरे दरस को, धन इहो कोप भवनमा, हो रामा..
झूलाश्‍
(1)
यमुना तीरे कदमक डारी झूला रेषम के डोर गे।
षोभा देखि भेल चितबौरी ज्ञान हरन भेल मोर गे।
एक दिष राधा एक दिष कन्हार दोउ कर झिकझोर गे।
राधा वदनमा पर शोभे माला निरखत नंद किषोर गे।
नभ धेरि अयलै कारी बदरिया भेलै गगन मे शोर गे।
विरहिन के चित्त चंचल भेलइक नयना झहरे नोर गे।
राधाकृष्णह युगल अति सुन्देर एक श्यानमल एक गोर गे।
(2)
आयल सावनक मास, मन मे बढ़ल हुलास
मनमा लागि गेलै वृन्दाचवन नगरिया मे।
झुला परम अनमोल, लागत रेषमक डोर
झूलत नन्दक किषोर इजोरिया मे।
सखियन संग राधा रानी से छवि कोना के बखानी
सुन्द)र बाजन बाजै हुनका पैजनिया मे।
झूलवै मिलिकय सखी सहेली, सुमुखी राधा अलबेली
झूलत राधे श्यासम यमुना किनरिया मे।
एक सखि लेने कर मे माला, कहाँ गेल नन्द लाला
सूरदास पुछथिन्हल छोड़ि डगरिया मे।
(3)
झूला लगे कदम की डाली,
झूले कृष्णु मुरारी ना।
कौने काठ के बनल हिड़ोला
कोन वस्तुु के डोरी। झूला..
राध झूलय कृष्णख झुलावय बारीश्बा.री ना। झूला..

छठि
(1)
अंगना मे पोखरी खुनायल
छठि मइया औती आइ।
दुअरा पर तमुआ तनायल
छठि मइया औती आइ।
अँचरा सँ गलिया बहारब
तैपर पियरी ओढ़ायब
छठि मइया औती आइ।
(2)
डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै
उगै हो सुरुज देव।
अरघ केर बेर
हो पूजन केर बेर
मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै
उगै हो सुरुज देव।
अरघ केर बेर
हो पूजन केर बेर
केओ ने छै लेसबैया परमेसरी मैया
सोना के दियरा मइया, पाटश्सुुती बाती हे
अबला नारी लेसबैया परमेसरी मइया
निर्धन कोढ़ी बाटे-घाटे ठाढ़ छै
उगै हो सुरुज देव।
अरघ केर बेर
हो पूजन केर बेर
पान सुपारी पकवान नेने ठाढ़ छै
उगै हो सुरुज देव।
(3)
हमरो पर होइयौ सहाय, हे छठि मइया
हमरो पर होइयौ सहाय।
चारि पहर राति जलश्थेल सेबलौं
सेबलौ छठि गोरथारि, हे छठि मइया।
हमरो पर होइयौ सहाय।
अपना ले मंगलौ अनश्धेन लछमी
जुगश्जु्ग मांगल अहिबात, हे छठि मइया
हमरो पर होइयो सहाय।
घोड़ा चढ़ै लेल बेटा एक मंगलौ
हमरो पर होइयो सहाय।
वयन बिलहै लेल बेटी एक माँगल
माँगल पण्डिीत जमाय, हे छठि मइया
हमरो पर होइयो सहाय।
(4)
केरवा जे फरल छै घौद सँ, ओइ पर सुग्गाप मड़राय।
मारबौ रे सुगवा धनुष सँ, सुगा खसल मुरुझाय।
सुगनी जे कानय वियोग सँ, आदित होउ ने सहाय।
काँचहि बाँस केर बहिंगा, ओइ मे रेषमक डोर
भरिया जे फल्लाँर भरिया, भार नेने जाय छै
बाटहि पूछै बटोहिया स, ई भार किनकर जाई।
आन्हिर होइबे रे बटोहिया ई भार छठि माई के जाइ।
ई भार दीनानाथ के जाय।
समदाउनश्‍
(1)
बड़ रे जतन सँ सिया जी के पोसल
सेहो रघुवंषी नेने जाय।
कौने रंग दोलिया कौने रंग ओहरिया
लागि गेल बतीसो कहार।
लऽ कऽ निकसल बिजुवन सखिया
ओहि बन केओ ने हमार।
केयो जे कानय राजमहल मे
केओ कानय दरबार।
केओ जे कानय मिथिला नगर मे
जोड़ि सँ बिजोड़ि केने जाय।
आजु धीया कोना अमा बिनु रहती
छनश्छ)न उठति चेहाय।
(2)
भेल विवाह चलल षिवषंकर
गौरी सहित कैलाष।
बसहा पीठ षिव दोलिया पठाओल
बाघ छाल पड़ल ओहार।
बड़ रे जतन सँ गौरी के पोसल
घृत मधु दूध पीआय।
सोनाक मुरुति सन गौरी हमर छथि
वर भेल तपसि भिखारि।
हमर गौरी कोना तपोवन जैतीह
झाँखथि राजदुलारि।
(3)
सुग्गाश जौं पोसितहुँ भजन सुनविते
धीया पोसि किछु नहि भेल।
घीवक घैल जकाँ पोसलौं हे धीया
बेटा जेँका कयल दुलार।
सेहो धीया मोर सासुर जैतीह
सुन भवन केने जाय।
ओलतिक छाहरि जकाँ पोसलौं हे धीया
मधुर जेँका राखल जोगाय।
सेहो धीया मोर सासुर जैतीह
सुन भवन केने जाय।
(4)
बारह बरस केर छल उमेरिया तेरहम बरस ससुरारि।
कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल।
कोने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय।
ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल।
भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वा मी निरमोही नेने जाय।
कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथी देखि रहब लोभाय।
(5)
जखन महादेव निज घर चललाह गौरी सहित कैलाष।
बसहा चढ़ल षिव डोलिया पठौलनि बाघछाल कयल ओहार।
घर सँ बाहर भेला हेमन्तौ ऋृषि भय गेल बाप पीठी ठाढ़।
घर सँ बाहार भेलि माय मनाइनि सुसुकि बहाबथि नोर।
सब दिन खाथि गौरी माखन मिसरी सक्कसर करथि अहार।
से गौरी कोना धतुर भाँग खयती आन की हयत आधार।
परातीश्‍
(1)
उठि भोरे कहू गंगाश्गं गा।
उठि भोरे कहू गंगाश्गं गा।
छल एक पापी महाबली
जाय मगह मरि गेल।
ओकरा तनके कौओ कुकुर ने खाय,
गिद्ध गीदर देखि डराय। उठि...
गलि गेल माँस हाड़ भेल बाहर
रोमश्रो्म भेल विकलाई।
कणिका एक उड़ि पद पंकज,
सुर विमान लय धाई। उठि...
पंछी एक उड़ल गंगा मे
ऊपर पाँखि फहराई।
देखू गंगाजी क महिमा जे
ओ कोना तरि जाई। उठि...
गेल बैकुण्ठय मुदित मन देखू,
आरति सुर उतराई।
भोलाजी गंगाक महिमा,
कहइत अधिक लजाई।
(2)
कोन गति होयत मोर हो प्रभु कोन गति होयत मोर।
जनम जनम हम पाप बटोरल कहिओ न भजलहुँ तोर।
बेरि बेरि अँखिया कमल मुख हेरलहुँ सुधि नहि तोर एको बेर।
अबहु सुमति गति दिय त्रिभुवन पति शरण रहब हम तोर।
तुलसीदास प्रभु तुम्हारे दरस के दुख संकट हरु मोर।
(3)
रथ पर निरखत जात जटाईश्‍ रथ पर निरखत जात।
रथ के उपर बैठ वैदेही नाजत निठुराई। रथ पर...
है कोइ वीर राम के दलमे रथ के ले बिलमाई।
कोन वंष के सूत रघुराई कौन हरने आई। श्‍ रथ पर ...
सूर्यवंषक राजा नृप दषरथ तनिके सुत रघुराई।
तनिके प्रिया नाम जानकी निषचर हरने जाइ। श्‍ रथ पर...
करुण वचन जब सूनेउ जटाई रथ चढ़ि कयल लड़ाई।
अग्निववाण मारल सो धरती गिरल मुरदाई - रथपर
मन सँ आषिष देल माता जानकी प्राण रहे घट छाई।
एहि बाटे आओता रघुवर ताकय सव बात कहव बुझाई। रथ पर...
(4)
जागहु राम कृष्णा दोउ मूरति दषरथ नन्दक दुलारे।
उदय होय उदयाचल आवत जोति पलंग पसारि।
जय जयकार करत सब आयो सुर नर मुनि तुअ दुआरे। जा....
क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डोल मुरली धनुष सम्हाथरि।
कब देखिहौं नयनन दोउ मुरति सन्तीन केर रखबारे। - जा....
पायो दरस परस पद पंकज पापी पुरुष निवारे।
रहे एक आस दास तुलसी के तीन लोक के न्या रे।
सीता पति राधा वर जोरी लेइय सुधि न हमारे। - जागहु....
(5)
जुनि करु राम वियोग हे जननी। जुनि..
सुतल छलहुँ सपन एक देखल,
देखल अवधक लोक हे जननी। - जुनि....
दुइ पुरुष पथ अबइत देखल,
एक श्याषमल एक गोर हे जननी। - जुनि....
कंचन गढ़ हम जरइत देखल,
लंका मे उठल किलोल हे जननी। - जुनि.....
स्‍ेातु वान्हय हम बन्हानइत देखल,
समुद्र मे उठल हिलोर हे जननी। - जुनि....
नचारीश्‍
(1)
रहबौ हम तोहरे नगरिया हो भंगिया,
रहबौ हम तोहरे नगरिया।
झारी मझारी मे कुटिया बनायब,
सब दिन बहारब डगरिया हौ भ्ंिगिया।
भांगो धथुर पीसि तोहरा पियायब,
भोर साँझ दुपहरिया, हो भंगिया....।
भांगक बाड़ी मे बसहा चराएव,
जीवन भरि करबौ चकरिया, हो भंगिया...
धथुर के फूल बेलपतिया चढ़एव,
चानन चढ़ायब केषरिया, हो भंगिया....
कतबो हटेला सँ हम नहि हटबह,
कहियो ने छोड़वह दुअरिया, हौ भंगिया...।
सब दिन नवीने नचारी सुनाकय
अप्पोन बितायब उमरिया, हौ भंगिया...
नेको अनेको जनम मे बसविहह,
अपन घरक पछुअरिया, हो भंगिया...
‘मधकर' सतत बाट हम तोरे ताकब
कहियो त फेरबऽ नजरिया, हौ भंगिया...।
(2)
आइ मयना के अंगना सोहाग बहिना।
जेना जूटल छै शोभा के खान बहिना।
गौरी ओ शंकर युगल रुप मोहन।
कए के सकै अछि बखान बहिना।
घरश्घ)र नगर ओ डगर पर विराजय।
तानल वसन्तब वितान जहिना।
छवि के छटा पर कपिक घन घटा अछि।
तै पर स्वअर लय के जुटान बहिना।
मोदो प्रमोदो प्रमोदो पाबि उमड़ल।
उदधि देखि पूनम के चान जहिना।
षिवराति षिवमय करय विष्वा भरि कैं।
‘मधुकर' सब फागुन के मास एहिना।
(3)
गौरी तोर अंगना बड़ अजगुत देखल तोर अंगना।
एक दिस बाघ सिंह करै हुलना
दोसर बड़द छैन सेहो बउना।
पैंच उधार लय गेलहुँ अंगना
सम्पात्ति के मध्यु देखल भाँग घोटना।
खेती ने पथारी सिव के गुजर कोना
मंगनी के आस छनि वरिसो दिना।
कातिक गणपति दुइ जन बालक
एक चढ़ै मोर एक मूस लदना।
भनहि विद्‌यापति सुनु उदना
दारिद्र हरण करु घैल शरणा। गौरा...
(4)
नारद बहुत बुझा हम कहलहुँ
गौरी लय एहन वर अनलहुँ यो।
हमरो गौरी छथि बारह बरख केर
बुढ़वा वर लय अयलहुँ यो।
नारद बड़ अजगुत अहाँ कयलहुँ।
गौरी लय एहन बर लयलहुँ यो।
तीनि भुवन बर कतहुँ न भेटल
तँ घर घूरि फिरि अबितहुँ यो।
बेटि गौरी छथि अल्पँ वयस केर
कनिको नहि बिचारलहुँ यो।
भनहि विद्‌यापति सुनिय मनाइनि
त्रिभुवन पति लय अयलहुँ यो।
(5)
जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे।
भिखियो ने लिअय बाटो नहि छोड़य गौरी कोना जयती अंगनमा मे।
देह अछि सह सह विषधर शतश्षोत भूतश्प्रे त छनि संगवा मे।
बरहा चढल षिव डमरु बजाबथि जटा बीच गंग तरंगना मे
जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे।
सामाक गीतश्‍
(1)
डाला लय बहार भेली बहिनो से फल्लाँच बहिनो
फल्लाँव भैया लेल डाला छीनि, सुनु राम सजनी....
समुआ बैसल तोहें बाबा बड़ैता
तोर बेटा लेल डाला छीनिश्‍ सुनु राम सजनी...
कथी केर आहे बेटी डालवा तोहर छौ
कथी बान्हेल चारु कोनश्‍ सुनु राम सजनी...
काँचहि जे बाँस केर डलवा यौ बाबा
बेलीश्चनमेली चारु कोनश्‍ सुनु राम सजनी ...
जौं तोरा आहे बहिनो डलवा जे दय देब
हमरा के की देब दानश्‍ सुनु राम सजनी....
चढबाक घोड़ा देव पढ़वाक पोथी देब
छोटकी ननदिया देब दानश्‍ सुनु...
(2)
चानन बिरिछ तर भेलि बहिनो
से फल्लाँे बहिनोश्‍
ताकथि बहिनो भाइ केर बटिया
एहि बाटे औता भैया, से फल्लाँम भैया ..
दखि लेबनि भरि अँखिया
पैर पकड़ि जनु कानू हे बहिनो, से फल्लाँच वहिनो
फाटत मोर छतिया।
(3)
हमर भैया कोना आबै
हाथी चढ़ल भैया हँसैत आवै
पान खय मुह रंगैत आबै
रुमाल लय मुह पोछेत आबै।
दरपन लय मुह देखैत आबै
चुगिला कोना के आवै
गदहा चढ़ल हिहिआइत आबै
कोइला सँ मुह रंगैत आबै
गुदरी सँ मुह पोछैत आबै।
(4)
गे माइ कौने भइया जयता अटनाश्‍ पटना
कोने भैया जयता मुंगेर।
कोने भइया जेता दिल्ली। कलकत्ता
कौने भइया जयता रंगून।
कौने भइया लौता आलरिश्झा‍लरि
कौने भइया लौता पटोर
कौने भइया लौता झिलमिल केचुआ।
कौन भइया लौत कामी सिन्नुचर
कौने बहिना पहिरथि आलरिश्‍ झालरि
कौने बहिनी पहिरु पटोर।
कौने बहिना पहिरथि झिलमिल केचुआ
कौने भौजी कामि सिन्नुलर।
युगेश्यु गे लीबथु इहो सब भैया, भौजी के बाहु अहिवात।
(5)
नदिया के तीरे तीरे फल्लाँच भैया खेलथि सिकार।
कहि पढ़ोलनि भाइ फल्लाँब बहिनो के समाद
भैया आओताह पाहुन हे।
कोठी नहि मोरा आरब चाउर बसनो नहि बीड़ा पान हे।
कौन विधि राखब माइ हे, फल्लाँम भाइक मान हे।
हाट बजार सँ चाउर मंगायब, तमोली सँ बीड़ा पान हे।
पटना शहर से धोतिया मंगायब, राखब भैया के मान हे।
(6)
गाम के पछिम ठुठि पाकड़ि रे ना
ना रे ताहि पर बाबा बसेरा लेल ना।
खेलितेश्धु.पैते गेली फल्लाँब बहिनी ना।
एक कोस गेली बहिनी दू कोस ना।
तेसर कोस बहिनी हेराय गेलौ ना।
तकैत तकैत गेलथिन फल्लाँ् भौया ना।
एक वन तकलनि भैया दुइ वन ना।
कतहुँ ना भेटय बहिनिया मोर ना।
देहरि बैसल भैली खुष भेली ना।
ना रे भेल ननदी हेराय गेली ना।
(7)
गाम के अधिकारी भैया हे
भैया हाथ दस पोखरी खुना दिय।
चम्पा) फूल लगा दिय हे।
फुलवा लोढ़ैत बहिनी आयल हे।
घमि गेल सिर के सिन्नु।र नयन भरु काजर हे।
छता लेने आवथि भैया से फल्लाँ। भैया हे।
बैसह बहिनी एहि छाह आषीष देहु हे।
युगेश्यु गे जीवथु फल्लाँ् भैया तोरो अहिबात बढ़ू हे।
राग संबंधी
ललित राग मेश्‍
मेघ समय पर जलदान करे।
पृथ्वीय धनश्धावन्यल सँ भरल रहे।
पिसुन पाबि जनु नृपतिक काने।
गुन बुझि भूप करथु सनमाने।
चिरै जिबथु हिन्दुवपति देओ।
गुन कीरथि गाबहि सब केओ।

राजविजय राग मेश्‍
जय जय परिजात तरुराज।
पाओल पुरुब पुन दरसन आज।
सरगक भूखन गुनक निवास।
सुरहुक तोहें परिपूरह आस।
सेवक सब तुअ दानव देबा।
मानव जानव की तुअ सेवा।
सुरमति निअ कर करथि किआरी।
सची देथि सुरसरि जल ढ़ारी।
सुमति उमापति भन परमाने।
माहेसरि देइ हिन्दुहपति जाने।

आसावरी राग मेश्‍
जायब हरिक समाजे। पाओब नयन सुख आजे।
कि आरेश्ध्रु वमद।
जोगहुँ न जानिअ जन्हीर। दिठीभरि देखब तन्हीँ।
ब्रह्‌म सिव सेव जाही। काहि भजब तेजि ताही।
मनहि भगति लेब माँगी। समय परमपद लागी।
हिन्दुिमति जिउ जाने। महेसरि देइ बिरमाने।
सुमति उमापति भाने। पुनमति भजु भगमाने।

वसन्ते राग मे
अनगिनत किंषुक चारु चम्पमक वकुल बकुहुल फुल्लि।याँ।
पुनु कतहुँ पाटलि पटलि नीकि नेवारि माधबि मल्लिियाँ।
कर जोरि रुकुमिनि कृष्णम संग वसन्ता रंग निहार हीं।
रितु रभस सिसिर समापि रसमय रमथि संग बिहार हीं।
अति मज्जु। बन्जुृल पुन्जि मिन्जिल चारु चूअ बिराजहीं।
निज मधुहिं मातलि पल्ल‍बच्छकवि लोहितच्छजवि छाजहीं।
पुनु केलि कलकल कतहु आकुल कोकिल कुल कूजहीं।
जनु तीनि जग जिति मदननृपमनि विजयराज सुराजहीं।
नव मधुर मधु रसु मुगुध मधुकर निकर निक रस भावहीं।
जनि मानिनि जन मान भन्ज न मदन गुरुगुन गावहीं।

बराडीराग मेश्‍
अब तरु अबनी तेजि अकास।
न थिक दिवाकर न थिक हुतास।
धोती धबल तिलक उपबीत।
ब्रह्‌म तेज अति अधिक उदीत।
बैनब दण्ड वेद कर सोभ।
आवथि नारद दरसन लोभ।
परम जुगुत तिनि जगतक हीत।
ब्रह्‌मासुत मोर सम्भु।क मीत
सुमति उमापति भंन परमान।
जगमाता देवि हिन्दुदपति जान।

पंचम राग मेश्‍
सखि हे रभस रस चलु फुलवारी।
तहँ मिलत मोहि मदनमुरारी।
किनक मुकुट महँ मनि भल भासा।
मेरु सिखर जनि दिनमनि बासा।
सुन्दार नयन बदन सानन्दाा।
उगल जुगल कुबलय लय चन्दाद।
बनमाला उर उपर उदारा।
अन्जलनगिरि जनि सुरसरि धारा।
पिअर बसन तन भूखन मनी।
जनि नव घन उगल दामिनि।
जीवन धन मन सरबस देबा।
से लय करब हरि चरनक सेवा।
सुमति उमापति मन परमाने।
जगमाता देइ हिन्दुदपति जाने।
नटराग मेश्‍
कि कहब माधब तनिक बिसेसे।
अपनहु तनु धनि पाब कलेसे।
अषनुक आनन आरसि हेरि।
चानक भरम कोप कतबेरी।
भरमहु निअ कर उर मर आनी।
परम तरस सरसीरुह जानी।
चिकुर निकर निअ नयन निहारी।
जलधर जाल जानि हिअ हारी।
अपन बचन पिकरब अनुमाने।
हरि हरि तेहु परितेजय पराने।
माधव अबहु करिअ समधाने।
सुपुरुष निठुर ने रहय निदाने।
सुमति उमापति भन परमाने।
माहेसरि देइ हिन्दुदपति जाने।

मालव राग मेश्‍
हरि सउँ प्रेम आस कय लाओल।
पाओल परिभब ठामे।
जलधर छाहरि तर हम सुतलहुँ
आतप भेल परिनामे।
सखिहे मन जनु करिय मलाने
अपन करम फल हम उपभोगव
तोहें किअ तेजह पराने। श्‍ ध्रुवम्‌
पुरुब पिरिति रिति हुनि जउँ विसरल
तइओ न हुनकर दोसे।
कतन जतन धरि जउँ परिपालिअ
साप न मानय पोसे।
कवहु नेह पुनु नहि परगासिअ
केवल फल अपमाने।
बेरि सहस दस अमिअ भिजाबिअ
कोमल न होअ परवाने। श्‍ ध्रुवम्‌
गुरु उमापति पहु देव दरसन
मान होएव अबसाने।
सकल नृपतिपति हिन्दुवपति जिउ
महरानि विरमाने। ध्रुवम्‌।

केदारराग मेश्‍
मानिनि मानह जउँ मोर दोसे।
साँति करह बरु न करह रोसे।
भौंह कमान बिलोकन बाने।
बेधह बिधुमुखि कय समधाने।
पीन प्योमधर गिरिबर साधी।
बहु मास धनि धरु मोहि बाँधी।
की परिनति भय परसनि होही।
भूखन चरनकमल देह मोही।
सुमति उमापति मन परमाने।
जगमाता देइ हिन्दुरपति जाने।

भल्लाा राग मेश्‍
माधब करह हमर समधाने।
देह मोहि पारिजात तरु आने।
एहिखन तोरित करिअ परयाने।
नहि तइँ हमर अबस अबसाने।
एहि परि हमर पुरत अभिमाने।
हयत हसी नहि होअ अपमाने।
सुमति उमापति भन परमाने।
पटमहिखी देह हिन्दुरपति जाने।

विभास राग मेश्‍
सहस पूर्णससि रहओ गगन बसि
निसिबासर देओ नन्दाु।
भरि बरिसओ विस बहओ दहओ दिस
मलय समीरन मनदा।
साजनि आब जिबन किअ काजे
पहु मोहि हिन करु अपजस जग भरु
सहय न पारिअ लाजे। ध्रुवम्‌
कोकिल अलिकुल कलरब आकुल
करओ दहओ दुहु काने।
सिसिर सुरभि जत देह दहओ तत
हनओ मदन पचबाने।
सुकवि उमापति हरि होए परसन
मान होएत समधाने।
सकल नृपति पति हिन्दुएपति जिउ
महेसरि देइ विरमाने। ध्रुवम्‌
............................

पेटार ४१

मिथिलाक बेटी


















- जगदीश प्रसाद मण्डःल
मिथिलाक बेटी
नाटक



ःः पात्र परिचय ःः


पुरुष पात्र

1. कर्मनाथ प्रशासनिक अफसर 45 बर्ख
2. सोमनाथ कर्मनाथक पिता 65 बर्ख
3. रामविलास सेवा निवृत्ति मिस्त्रीय 61 बर्ख
4. विकास सेवा निवृत्ति शिक्षक 70 वर्ख
5. नूनू कर्मनाथक भाइ 30 बर्ख
6. लालबाबू कर्मनाथक भाइ 25 बर्ख
7. श्रीचन किसान 45 बर्ख
8. फुलेसर कर्मनाथक बेटा 17 बर्ख
9. राधेश्याकम बोनिहार 35 बर्ख

नारी पात्र

1. चमेली कर्मनाथक पत्नीा 41 बर्ख
2. आशा कर्मनाथक माए 63 बर्ख
3. माधुरी रामविलासक पत्नीन 58 बर्ख
4. चम्पाी कर्मनाथक बेटी 19 बर्ख
5. जुही कर्मनाथक बेटी 14 बर्ख








पहिल अंक
(कर्मनाथक डेरा। बहराक कोठरी मे कर्मनाथ)
कर्मनाथ ः (घड़ी देखि) पौने पाँच बजि रहल अछि, किऐक ने अखन धरि बच्चाप सब पढ़ि कऽ आयल। भऽ सकैत अछि जे बाट मे किछु देखए लगल हुअए। ओना हमहूँ आन दिन पाँच बजेक बादे अॉफिस स अबैत छलहुँ, मुदा आइ किछु पहिनहि आबि गेलहुँ। कोना नै अबितहुँ, आन दिन तते काज रहैत छल जे ओकरे निपटबै मे अबेर भ जाइत छल, मुदा आइ त महगीक बिरोध मे, कर्मचारी सबहक हड़ताल, अॉफिसे बन्ना कऽ देलक। खैर जे होय, किछु काल मे ते सब आबिये जायत।
(कहि कुरसी पर बैसि अखबार पढ़ै लगैत)
(चम्पाु आ चमेलीक आगमन। दुनू केँ हाथ मे झोरा। एकटा झोरा मे चाउर, दाइल, तरकारी आ देासर मे दूधक डिब्बा।, चाय पत्तीक डिब्बाम, छोट-छोट पुड़िया मे मसाला, एकटा नोनक पौकेट, आ शीशी मे करुतेल)
चमेली ः बजार मे आगि लगि गेल अछि। बाप रे बाप, ऐना कतौ महगी आबए। (दूधक डिब्बाो निकालि) जे बौस कीनै ले जाउ, अग्ग।ह से बिग्गबह दाम। कोना लोक कोनो चीज खायत। जे दूधक डिब्बाल बीस रुपैया मे कीनै छलौ, आइ अट्ठाइस रुपैया मे देलक। जे चाहक डिब्बाध (डिब्बा देखबैत) दस रुपैया मे दइत छल ओकर दाम बारह रुपैया लेलक। कोनो की एक्के -दुइये टा चीजक दाम बढ़ल, सब चीजक दाम अकास ठेकल जाइ अए। तोहूँ मे नोकरियाक जिनगी ! सब चीज पाइये हाथे हैत। साल मे एक्कोद दिन ऐहेन अबन्चअ नइ रहए अए जइ दिन ककरो नै ककरो तकेदा नइ सुनै छी।

कर्मनाथ ः कते अनघोल केने छी। बजैत-बजैत होइ अए जे बताहि भ जाय। जत देखू तते महगीक चर्च। बजैत त सब अछि जे देशव्याएपी महगी भ गेल। मुदा एकटा बात कहू जे महगी कतऽ स आयल। ओकरा अबैत कियो ने देखलक। अगर जँ अकासक रास्ताक स हवाइ जहाज पर आयल ते ओकरा हवाइये फिल्डक पर किऐक ने रोकल गेल। जँ से नहि पाइनिक रास्ताज स आयल ते पनिया जहाज के बन्द रगाह मे ढ़ूकै किऐक देल गेल। जँ सेहो नहि, माटिएक रास्ता स आयल ते ओकरा सीमाने पर ने किअए रोकल गेल। मुदा से त किछु नहि भेल, तखन कोन दोग देने, चोर जेँका, महगी चलि आयल। जे एत्त्ो नमहर देश मे, एत्त्ो लोक के एक्केह बेरि चद्‌दैर जेँका, ओढ़ा देलक।

चमेली ः अहाँ अहिना नोन- तेल मिला, बात के बतंगर बना बजै छी। एतबो नइ बुझै छियै जे बड़का-बड़का लोकक कहब छै जे अधिक उपजाबाड़ी भेला स चीजक दाम कम होइ छै आ कम भेने दाम बेसी होइ छै। जइ स दामक घटती-बढ़ती होइ छै। सदिखन रेडिओओ मे कहै छै। आ अखबारो मे लिखै छै जे खेतो आ करखन्नो मे बेसी पैदाबार भेल हेँ। तखन इ महगी किअए भेल?

(माएक बाँहि पकड़ि, डेालबैत)
चम्पाब ः गे माए, तू जे कहलीही उ सोझका बात कहलीही, जे हमहू हाइये स्कू ल से पढ़ैत एलहुँ। मुदा अइ के तर मे असल बात अछि। बड़का-बड़का पाइबला व्याकपारी सब जे अछि ओ खेतोक उपजा आ करखन्नोतक बौस के कीनि लइ अए आ ओकरा नमहर-नमहर गोदाम (जे माइटिक उपरो, आ माइटिक तरो मे बनौने अछि) मे डिक दइ अए। जइ से बौस घेरा जाइ अए। घेरेला से बौस निग्ह टि जाइ अए। तखन जा कऽ ओ सब (व्यघपारी) कनी-कनी क कऽ बौस के निकालि-निकालि महग क कऽ बेचइ अए।

चमेली ः (मुह चमकबैत) गोदाम मे जे बौस नुकबै अए, ओकरा लोक (जनता आ सरकार) नै देखै छै।

चमपा ः ऊँह, गे तेहेन ठीमन के रख्‍ैा छै जे लोकक कोन बात जे कानूनो ने देखै छै। ओ सब करैत कि अछि जे बड़का-बड़का पनिया जहाज मे समान लादि के समुद्र मे ठाढ़ क दइत अछि। ततबे नहि, जे बौस माइटिक उपरको गोदाम मे रहै छै, ओकरा तेहेन कानूनी पेंच लगा दइत अछि जे ओ देशक छी की विदेशक, से बुझबे ने करबीही।

चमेली ः (पति स) अहाँ हाकिम छियै कि माइटिक मुरुत। मोटका-मेाटका जे कानूनक किताव सब रखने छियै, ओ झींगुर खाइ ले। जखैन कानून हाथ मे अछि, पुलिस अछि, जहल अछि तखन ओकरा सब के छुट्टा खेलाइले छोड़ि देने छियै। पैछला खेप (सात दिन पहिने) अढ़ाय सौ मे जते समान भेलि रहए ओतबे समान कीनै मे आइ तीनि सौ लागल हेँ अहाँ नोकरिया छी अहूँक दरमाहा एहिना बढ़ैत अछि।

कर्मनाथ ः कते, खापड़िक मकई जेँका, भरभराइ छी। होइ अए जे हम खूब बजनता छी।

चमेली ः उलटे चोर कोतबाल के डॉटे। अहीं हमरा पर आखि लाल-पीअर करै छी। एतबो आखि उठा कऽ नइ देखै छियै जे अहाँ के एते दरमाहा अछि, तखन इ रामा-कठोला अछि, जे बेटी विआह करै जोकर भेलि जाइ अए मुदा हाथ मे एकोटा फुटल कौड़ी नै अछि। (कर्मनाथ नमहर साँस छोड़ैत) अहींक अॉफिस मे जे कम महीना पबैवला संगी सब छथि, हुनका सब के की दशा होइत हेतनि। तहू मे कम महीना पौनिहार के धियो-पूतो बेसी होइ अए। जइ से परिवारो नमहर रहैत अछि।

(चमेलीक बातक गंभीरता कऽ अकैत कर्मनाथ तीनि बेरि चमेली कऽ उपर स निच्चा धरि देखि)
कर्मनाथ ः बड़ सुन्दऽर बात अहाँ बजलहुँ, मुदा हम ते पढ़बे केलहुँ नोकरिये करै ले। जे आइ बुझै छी भूल भेल। जना हम मीनबाला परिवार क छी तना हमरा खेतीक संबंध मे पढ़ैक चाहै छल। जते धन माइटिक तर मे साले-साल बिला जाइत अछि ओकर चौथाइयो नोकरी मे नइ कमाइ छी। ततबे नहि, जाधरि सब अप्पिन-अप्पोन गामक सम्पइत्ति के नहि जगाओत ताधरि आन ठाम से जे सम्पकत्ति आओत, ओ या त भीख बनि क आओत वा�कर्ज बनि क। खैर जे होय! हँ, ते कहैत छलहुँ जे लगले त हम्मइर दरमाहा बढ़त नहि। तखन ते दुइये टा उपाय, दिवस गुजारैक अछि। पहिल अछि जे जेहन चीज-बौस कीनै छलौ, तइ स कनी झुस (दब) कीनू चाहे जेहेन कीनै छलौ तेहने कनी कम क कऽ कीनू। जँ से नइ करब ते पाओल जायब। करजा तर मे पड़ब। अइ ले एते आमील किअए पीबै छी। महगी कि कोनो हमरे-अहाँ टा ले भेलि हेँ, जे एते आफन तोड़ै छी। आ कि सब ले भेलइ अए। जहाँ धरि हाकिमक बात अछि, हाकिमक मतलब इ नहि ने अछि जे, जे मन फुरत से क देबइ। महगी रोकब हमरा सबहक बुताक बात छी, जे रोइक देबइ। जेकर हम नोकरी करै छियै ओकरे काज छियै महगी आनब।

चमेली ः तखन झुठे एते लाम-काफ किअए देखवै छियै?

कर्मनाथ ः (मुस्कीठ दैत) दरमाहा तरे देखबै छियै। जे होइ छै ओ देखियौ। जखन अकासे फाटल अछि ते कते सीबै। तखन ते मेघ तरकै छै ते कियो अपना माथ पर हाथ दऽ ‘साहोर-साहोर' करैत अछि। (चम्पाम से) बुच्चीि, चीज-बौस घर मे रक्खूम। (दुनू झोरा उठा चम्पाछ जाइत अछि) अच्छाे एकटा बात कहू जे आन दिन बाजार से सबेरे अवैत छलहुँ, आइ किऐक एत्त्ो अबेर भेलि

चमेली ः (अकचका कऽ) से नइ बुझलियै।

कर्मनाथ ः कहबै तब ने बुझबै। हम कि कोनो भगवान छी जे बिनु सुननहुँ, सुनि जायब।
चमेली ः परसुका गप छियै। बजार मे एकगोटेक बेटीक विआह छलै। बनारस से बरिआती आयल छलै। बरिआतियो लाजबाब छलै। मौगी-मरद सब छलै। खूब निम्मतन बैंड पाटी सेहो छलै। बैंड-पाटी मे छौड़हरे कौरनेटिया छलै। कहाँ दन ओकरा मेाछक पम्हड अबिते छलै।

कर्मनाथ ः कोन खेरहा पसारि देलियै?

चमेली ः ऐँह, एतबे मे अगुताइ छी । अस्सेल बात त आब अछि। खाली सुनैत रहियौ। बड़ी बजनतिरी ओ छैाँड़ा छलै। बैंड-पारटीक संग बरिआतियो (मौगी-मरद) आ बजारोक छैाँड़ा-छैाँड़ी सब खूब नाचल। ओहि कौरनेटियाक संग, बजार मे रस्ताैक पछबारि भग जे बड़का गद्दी छै, ओकर बेटी चलि गेलइ।

कर्मनाथ ः तब ते अेाकरा बाप के, बेटीक विआह मे एक्को -पाइ खरचो ने भेल हेतइ।
चमेली ः अहाँ ते अहिना आगुऐ से लोइक लइ छियै। सुनियौ, कहाँ दन ओ छैाँड़ा (कौरनेटिया) नोकरी करै अए। ओइ छैाँड़ी के माए-बाप कतबो रोकलकै, ओ किन्ननहु नहि मानलकै। ओकरे संगे चलि गेलइ।

कर्मनाथ ः ओ लड़की केहेन छलै?

चमेली ः ओइह सब बजै छलै जे ओ (लड़की) कओलेजो मे पढ़ैत छलै आ नाचो सिखै छलै। (अफसोस करैत) से देखियो जे ओइ छैाँड़ीक गुजर ओहि कौरनेटियाक संग कोना चलतै। कहाँ अेा धनी-मनीकक बेटी आ कहाँ ओ गरीब घरक कौरनेटिया।

कर्मनाथ ः (मुस्कीी दइत) गुजर किअए ने चलतै। एकटा बजनत्री अछि दोसर नचनिया। दुनू मिलि कऽ एकटा पार्टी ठाढ़ क लेत आ गामे-गाम नाचत।
(तहि बीच फुलेसर आ जुहीक आगमन। दुनूक हाथ मे किताब) (बेटा स) बौआ आइ बीस तारीक भ गेल। एक तारीक के गाम चलब। तइ बीच तू दुनू भाय-बहीनि (स्कूआल कओलेज मे) दरखास्ता द कऽ दू मासक छुट्टी ल लिहह।

फुलेसर ः बावू, अगिला मास से एक घंटाक स्पेीशल क्ला स चलतै। ओ ते छुटि जायत। तेँ, मन होइ अए जे हम एतै रहि जइतौ।

कर्मनाथ ः विचार त बड़ सुन्दएर छह, मुदा असकर रहब नीक हेतह(बिचहि मे चमेली पति स)

चमेली ः अहाँ ते दोसर गप करै लगलहुँ। एकटा गप सठवे ने कयल आ दोसर लाधि देलियै।

कर्मनाथ ः अहाँ अपना बात के थेाड़े पछुआइ देवइ। हमही अपना बात के पाछु क लइ छी। बाजू... ..।
चमेली ः हँ, ते वरिआतीक गप्प कहै छलौ ने। उ ते कौरनेटियाक कहलौ। अहू से चोखगर गप आरो अछि।

कर्मनाथ ः (मुस्कुेराइत) ओइ मे कने तेतरीक रस मिला देबइ।

चमेली ः अहूँ ते हद छी। स्त्री गणक बात के कोनो मोजरे ने दइ छियै।
कर्मनाथ ः छुछे मोजर देने की हैत। ओ फड़बो करै तब ने।

चमेली ः बुझै मे अहूँ बिहाड़िये छी। नट्ठा होइ अए पुरुख आ कहिऔ मौगी के। अनरनेवा गाछ देखलियै हेँ। मरदनमा गाछ खाली फुलेबे करैत अछि फड़ैत नहि अछि। मुदा मौगियाही गाछ जते फुलाइत अछि तते फड़बेा करैत अछि। हँ, ते सुनू बरिआतीक दोसर गप। बरिआती आबि दुआर लगलै। दुआर लगि, जखन बैठकी मे बरिआती वैसल ते बरक बाप कहलकै जे पहिने दारु पीबि, डान्स करब तकर बाद विआहक कोनो विधि-वेबहार हैत। मुदा घरवारी ओ बात मानै ले तैयारे ने भेल। दुनूक (बरिआती आ घरवारिक) बीच रक्कात-टोकी शुरु भ्‍ेाल। दुनू मे से कियो पाछु हटै ले तैयारे नहि। ओमहर बैंड बाजा गड़गड़ाइते रहै। दुनूक बीच कहा-कही होइत-होइत पकड़ा-पकड़ी भ गेल। पकड़ा-पकड़ी होइतहि पटको-पटकी आ मुक्कोश-मुक्कीम शुरु भेल।

कर्मनाथ ः (हॅसैत) बाह-बाह, तखन ते कुरथी दउन (दौन) हुअए लगल हैत।

चमेली ः अहाँ ते बाजै ने दइ छी, विचहि मे लोइक लइ छियै। पटका-पटकी करितहि टेन्टाक बाँस घीचि-घीचि एक-दोसर के मारै लगल। कते के कपार फुटलै। तहि बीच हड़हड़ा कऽ टेन्ट‍ खसल। सब ओइ तरे मे झँपा गेल। ककरो निकलियेे ने होय। जहिना महजाल मे माछ फँसैत अछि, तहिना।

कर्मनाथ ः मरदे-मरदी सब रहै कि मौेगियो सब रहै।

चमेली ः सब रहै की। कतऽ के ओंघराइल रहे से कोइ देखइ। बड़ी कालक बाद गौँआ सब समेना हटौलक। समेना तर मे जते गोटे रहै सब गरदा स नहा कऽ गरदे रंग मे रंगि गेल। पी के सब बुत्त रहबे करै। टगैत-टुगैत सब (बरिआती) निफाहे मे जा-जा बैसल। थोड़े खान जब हवा लगलै तब बारह गेाटे (बरिआती) अप्पिन-अप्पहन बैंग-एटेंची ल-ल जाइ ले तैयार भ गेल। घरवारी सब गुहरिअबै लगल। मुदा कियो मानै ले तैयारे ने।

कर्मनाथ ः तब ते बेचारे बरिआती सब के नइ सुतरलै।

चमेली ः ऐँह, एतबे भ्‍ेालइ। जते बजरुआ पौकेटमार सब रहे सब सबहक (बरिआतीक) रुपैइयो, मोबाइलेा आ आनो-आनो चीज छीनि के निकलि गेल। रौतुका मसीम रहबै करै।

कर्मनाथ ः बरिआतीक सोखड़ि ओराइल कि आरो अछि।

चमेली ः एतबे मे अगुता गेलहुँ। अच्छा , एकटा आरो कहि दइ छी। बरिआती सब तते छुुड़छुड़ी आ फटाका अनने रहे जे दुआर पर पहुँचते, गदमिशान उठा देलक। लड़कीक नन्नाछ, ओहि काल, पैखाना गेल रहथि। एकटा बड़का फटाका ओहि पैखाना कोठरीक देवाल मे, एकटा बरिआती मारलक। से कहाँ दन ओ फटाका (बम) गुंगुंआ के तते जोर से अवाज केलकै जे ओ बेचारे धड़फड़ा कऽ भगै लगल। केबाड़ बन्नर रहै। वेचारेक होश त उड़ि गेल रहनि, देवाले मे टकरा गेलाह। कपारो फुटि गेलनि आ चोट स चोन्ह। आबि गेलनि। चोन्ह अबिते तिलमिना के खसलाह कि दहिना पाएर पैखानाक नाली मे फॅसि गेलनि बड़ी कालक बाद जखन दोसर गोरे पैखना जाय लगलाह कि केबाड़ बन्ना देखलखिन। थोडे़ काल ओतइ ठाढ़ रहथि, मुदा कोनो सुनिगुनि नहि बुझि हल्ला केलखिन। तखन केबाडक छिटकिल्लीर अलगाओल गेल। केबाड़क छिटकिल्लीु अलगबिते, बुढ़ा के अचेत-भेल पड़ल देखलखिन।

कर्मनाथ ः (हँसैत) तब ते बिआहक संग सराधेाक जोगार लगि गेलनि।
चमेली ः अहाँ ते अहिना अनका दुख के दुखे ने बुझै छियै।
कर्मनाथ ः हम की अहाँ जेँका अनकर सुख देखि कऽ थेाड़े नचै छी। सुख-दुखक बीच जिनगीक रास्ता छैक। तेँ, जिनगी जीवैक लेल सुख-दुख अंगेज कऽ चलए पड़ैत छैक। जे यात्री (जातरी) सुख मे मगन भ जायत आ दुख मे विचलित, ओ जिनगीक यात्रा कोना सफर कऽ सकैत अछि। छोड़ू दुनियादारीक गप। अप्पखन जिनगीक गप करु।
(चम्पातक आगमन) भने चम्पो आबिये गेलि।
फुलेसर ः दू मासक छुट्टी ल कऽ की करबै, बावूजी?
कर्मनाथ ः चम्पाुक विआह करैक विचार से गाम जायब। मुदा तू जे कहने छेलह जे स्पेपशल क्लामस चलत, तेँ रहि जाइक विचार होइ अए। बड़ सुन्देर विचार छह, मुदा इ बात बुझै पड़तह जे हर मनुष्यस केँ पहिल कर्तव्यँ होइत जिनगीक रक्षा। जीबैत रहबह, तखने बुझि पड़तह जे दुनिया छैक, नहि त किछु नहि। पढ़ैक खियाल से तोहर विचार नीक छह। मुदा एकटा बात कहि दइ छिअ। हम अफसर छी तेँ विशेष अनुभव अछि। अखन अप्पमन परिवारक बीच छी, तेँ बजैत एक्कोे पाइ असोकर्ज नै भ रहल अछि। जँ अखन सरकारक कुरसी पर रहितहुँ वा लोकक बीच, त नहि बजितहुँ।
जुही ः बावूजी, कते काल सरकारी आदमी रहै छियै?
कर्मनाथ ः बाउ, जे सवाल पुछलह, ओकर उत्तर साधारण नइ अछि। अखन परिवारक काजक विचार करैक अछि, तेँ तोरा सवालक उत्तर नीक नहाँति नइ द सकवह। निचेन मे दोसर दिन बुझा देबह। अखन थेाड़े इशारा मे कहि दइत छिअह। अखन जे अपना देशक स्थिोति अछि, एहि मे क्योक सुरक्षित नहि अछि। जना सब दिन अपहरणक घटना सुनै छहक। घटना मे की सुनै छहक जे पाइक दुआरे अपहरण (फिरौती) होइ छै। इहो होइ छै। मुदा एतबे टा नइ होइ छै। आखि उठा के देखवहक ते बुझि पड़तह जे बिनु पाइओवलाक अपहरण होइ छै। ततबे नहि, पाइबला त पाइ द कऽ जानो बचा लइ अए मुदा बिनु पाइवलाक जानक अपहरण होइ छैक।
जुही ः इ बात लोक कहाँ बजै अए।
कर्मनाथ ः लोक के अखवार आ रेडिओ पढ़वै छैक। तेँ, जे अखबार मे पढ़ैत अछि से दोसर के पढ़बैत अछि। मुदा अस्सपल बात एहि स आगू अछि। जे थेाड़-थाड़ कहियो रेडिओओ आ अखवारो कहियो दइत अछि आ बेसी नहिये कहैत अछि। हँ, ते कहै छेलियह जे अपहरण भेला पर बिनु पाइवलाक जान नहिये बँचैत अछि। तेँ, इ बात बुझै पड़तह जे के केकर जान लइ ले, खून पीबै ले तैयार अछि से कहब कठिन। (बेटा से) तू कहबह जे अहाँ त गलत काज कहियो ने केलहुँ आ ने करैत छी, तखन हमरा किऐक किछु होयत। मुदा एहि सवालक जबाब बुझै ले एहि बात पर नजरि देमए पड़तह जे जहिना दिनक विपरीत राइत होइत अछि। धनिकक गरीब आ सुखक विपरीत दुख होइत अछि। मुदा एकरे उलटा के देखवहक ते बुझि पड़तह जे जहिना दिनक विपरीत राइत होइत अछि तहिना राइतियोक विपरीत दिन होइत अछि। तहिना धनिको आ सुखेाक होइत अछि।
जुही ः बावूजी, हम इ बात नइ बुझि सकलहुँ जे विपरीतक माने की?
कर्मनाथ ः बाउ, अखन हम दोसर काजक गप करै चाहैत छी, तेँ, अखन तोरा प्रश्नथक जबाव नीक जेँका नहि द सकबह। मुदा तोरा जे शंका भ रहल छह, अेा हमहुँ बुझि रहल छी। अखन एतबे बुझह जे दिन-राति प्रकृति स जुड़ल अछि, तेँ अेा हेबे करत। एक-दोसरक विपरीत रहबे करत। मुदा धनी-गरीब आ सुख-दुख से नहि अछि।
जुही ः बावूजी, अहाँ जे कहलियै तइ से हमर मन नै मानलक।
(जुहीक बात सुनि कर्मनाथ मने-मन सोचै लगलथि जे जखन हाइ स्कू लक बच्चा। के हम संतुष्टब नहि कऽ सकलहुँ, तखन परिवार आ समाज त बड़ नमहर होइत अछि। सोचि-बिचारि)
कर्मनाथ ः बाउ, एकठाम भेाज भेलइ। भेाज नै भेलइ, पाँच गोटे आन मुलुक से एक गोटे एहिठाम ऐलखिन। आन मुलुकक रहने नमहर पाहुन भ्‍ेालखिन। ओ घरवारी (जिनका ऐठाम आयल रहनि) खाइ-पीबैक नीक ओरियान केलनि। आन मुलुकक पाहुन बुझि अपनो दस सवांग केँ खाइक नोत देलखिन। खाइक सब बरतन (थारी,लोटा, गिलास,बाटी,चम्मखछ) सोनाक रहैक। खेला-पीलाक बाद अप्पोन (घरवारीक) एकटा सवांग एकटा चम्म छ चोरा क जेबी मे रखि लेलक। घरवारी देखि लेलखिन। देखला बाद घरवारीक मन मे दुअए लगलनि जे जँ कहीं पाहुनो सब देखि नेने होथि। मुदा दोसर दिशि अप्पेन मुलुक आ सवांगक प्रश्नब छलनि। असमंजस मे वेचारे पड़ि गेलाह। तत्‌-मत्‌ करैत ओ (घरवारी) एकटा मैजिक केलनि।
जुही ः खाइये काल मे मैजिक केलनि।

कर्मनाथ ः हँ। आगू सुनह। मैजिक ओ इ केलनि जे कहलखिन- जनिका जेबी मे जे वस्तुः अछि से हम देखै छी। सभकेँ आश्चहर्य भेलनि। अप्पान सवांग दिशि इशारा करैत कहलखिन जे हुनका जेबी मे एकटा चम्मेछ अछि। जइ सवांगक नाम कहलखिन, ओ भड़कि उठलनि। दोसर गोरे, जेबी मे हाथ द चम्मनछ निकालि टेबुल पर रखि देलखिन। तेँ बाउ, तू जे प्रश्नज केलह ओ अहू से नमहर मैजिक अछि। आब तू चुप रहह। आगूक गप बढ़वै दाय।
जुही ः भैयाक सवालक जबाव अधखड़ुऐ रहि गेल छनि।

कर्मनाथ ः बौआ, समय ऐहन परिस्थिेति पैदा क देलक हेँ जे कियो अपना कऽ सुरक्षित नहि बुझैत अछि। सचमुच अछियो नहि। अखन एकटा अपहरणक चरचा केलियह। ऐहन-ऐहन अनेको अछि। एक राज्य क लोक दोसर राजवला के दुसमन बुझैत अछि। दुसमनक संग जेहेन बेबहार होइ छै, से करबो करैत अछि। ततबे नहि, एक सम्प्र दायवला दोसर के दुसमन बुझैत अछि। तहिना एक जाइतिक लोक दोसर के बुझैत अछि।
जुही ः तना ओझड़ा-पोझड़ा के कहलियै जे हम किछु बुझबे ने केलहुँ।
कर्मनाथ ः अप्प-न देश विभिन्ने राज्यब, विभिन्नत सम्प्र दाय, आ सैकड़ो जाइत मे बँटल अछि। उपर से सब कहैत अछि जेे हम सब एक देशक बासी छी। तै, मिलि-जुलि के रहैक अछि। मुदा से थोड़े अछि। एक राजवला दोसर राजवला केँ मारि-पीटि, बहू-बेटीक इज्ज त लुटि, कमाइल पाइ लुटैक पाछु लागल अछि। तहिना आरो सब अछि।
जुही ः तइयो अहाँ ओझराइले बात कहलियै।

(एक टक स जुही पर नजरि राखि कर्मनाथ कने काल गुम्मव रहि )
कर्मनाथ ः बाउ, अखन धरि तू सब शहर-बजार मे रहलह, तेँ नहि देखै छहक। हमरा ते गमैया लोक सब से गप-सप होइ अए किने। सुनह, गाम सब मे की होइ छै; एक जाइतिक लोक (जे बुतगर अछि) दोसर जाइतिक लोकक (जे अब्बैल अछि) बहू-बेटी केँ दिन-देखार इज्ज त लुटै अए। तहिना एक सम्प्रादाय वला दोसर सम्प्रबदायवला केँ।
फुलेसर ः (नमहर साँस छोड़ैत) बाबूजी, जे बात अहाँ आइ बिकछा के कहलियै, ओइ बात दिशि हम्म(र नजरि आइ घरि नहि गेल छल।
कर्मनाथ ः अगर जँ अखन धरि तोहर नजरि एहि बात दिशि नहिये गेल छेलह ते ओहो कोनो बड़ भारी गलती नहिये भेल छेलह। किऐक त अखन धरि तू किताबक बीच रहलह, दुनिया दारीक बात थोड़े बुझै छहक। मुदा एकटा बात पर सदिखन आखि, कान ठाढ़ क कऽ राखै पड़तह जे सिर्फ किताबेक ज्ञान स जिनगी नहि चलैत अछि। जिनगीक लेल दुनू (किताबो आ बाहरियो) ज्ञानक जरुरत होइत अछि।
फुलेसर ः बाबूजी, अखन देखै छियै जे छोटका स्कूतलक विद्‌यार्थी स ल कऽ कओलेज धरिक विद्‌यार्थी, सिनेमा आ खेल-कूदक सब बात जनैत अछि मुदा अप्प न परिवार, समाज आ वंशक विषय मे किछु नहि जनैत अछि। बहुत दिन सऽ मन मे अवैत अछि जे अप्पशन परिवारक संबंध मे अहाँ से पूछी। मुदा समयक ऐहेन उटपटँग रुटिंग बनि गेल अछि जे पूछैक गरे ने लगै अए।
कर्मनाथ ः (मुस्कुनराइत) अपनो इ इच्छाँ दस वर्ख पहिने से मन मे अछि, किऐक त एहि शरीरक कोनो ठेकान नहि अछि। कुम्हा रक बनाओल माइटिक काँच वरतन जेँका मनुक्खेार अछि।
(बिचहि मे)
चमेली ः बेटा फुल, एकटा बात आरो जोड़ि दहक जे दू परिवार, दू समाज आ दू वंशक योग स नव परिवारक उदय होइत अछि। तेँ, दुनू के जानव जरुरी अछि।
कर्मनाथ ः (हँसैत) हँ ते पहिने अहीं परिवारक खेरहा कहै छी। पुरुष-नारीक संयोग स नव मनुखक जन्मत होइत अछि। एकर अतिरिक्त जे सब अछि ओ बाहरी उपरी छियै। तेँ, अखन एतबे कहब। मुदा हमरा संग जे अहाँक विआह भेल, ओ बच्चा सब के जरुर कहि देबइ।
जुही ः (थोपड़ी बजवैत) पहिने यैह कहियौ बावूजी। तखन आन बात कहबै।
कर्मनाथ ः (मुस्कीै दइत पत्नीे स) हम अहाँ छोड़ि बच्चाच सब के कहै छियै। तेँ, बीच मे रग्ग ड़ नहि ठाढ़ कऽ देवइ।
चमेली ः (मुह चमकवैत) हम बड़ रगड़ी छी, की ने।
कर्मनाथ ः अपना की बुझि पड़ै अए। अहीं सन लोकक संबंध मे कहल गेल अछि जे नाक नै रहैत ते की सब खेइतहुँ, तेकर कोनो ठीक नहि।
चमेली ः छुछुनरि होइ अए पुरुख आ दुसिऔ मौगी के।
कर्मनाथ ः पुरुष की छुछुनरि होइ अए?
चमेली ः बजार जाइ छी ते देखै छियै जे जहाँ पुरुख कोनो स्त्रीनगण के देखत कि अनेरे ओकर जाँघक दिनाइ चुल-चुला लगै छै।
कर्मनाथ ः अहाँ कोनो डॉक्ट र छी जे दिनाइ देखि दवाई सोचै लगै छी। अहाँ दिनाइ देखै छियै कोना?
चमेली ः आँखिये छियै। ओकरा पकड़ि कऽ रखबै, से हैत।
कर्मनाथ ः अच्छाओ बुझि गेलहुँ। अहूँ के अप्प न विआहक बात सुनैक मन अछि, ते सुनू। जखन हम बी.ए.पास केलहुँ, तखन बावूजी विआह करैक चर्च चला देलनि। सब दिन दू-चारि कन्याकगत अबै लगलथि। हम दरभंगे मे रहैत रही। इमहर बावूजी एकठाम विआहक बात पक्काि क लेलनि। जे हम पछाति बुझलियै। कहाँ दन ओ कन्या गत भरिपोख द्रव्यब आ कन्यााक खेांछि मे बीस बीघा जमीन देवा ले तैयार रहथि। मुदा अंतिम बात हमरे पर अँटकल रहै। जेठ मास। गेाटे-गोटे गाछ मे गोटि पंगरा आम फड़ल रहै नइ त नहिये जेँका फड़ल रहै। दस बजेक बाद बाध मे लू नचै लगै। जना बुझि पड़ै जे खेत सब स आगिक ताव जेँका नाचि रहल छै। हम खा के दरवज्जेलक ओसारक कोठरी मे रही। ओसारक दुनू भाग (उत्तरो आ दछिनो) दू टा कोठरी बनल रहै आ बीच मे खाली रहै। ओहि खाली ओसार मे एकटा मोथीक सोफ (नमहर बिछान) विछाओल रहैत छलै। सतासीक बाढ़ि मे ओ दरबज्जाम खसि पड़ल। करीब बारह बजे तोहर (बेटा-बेटी) नन्ना आबि के, ओहि सोफ पर चारु नाल चीत भ के ओंघरा गेलाह। ओंघरेला पर जे बिछान (सोफ) खड़बड़ेलइ ते हमहू कोठरी से बहरेलहुँ, ते देखलियै जे एक गोटे दुनू बाँहि के मोड़ि माथ तर मे नेने, आखि मूनि कऽ पड़ल छथि। आ कनी हटा कऽ मत्थेन सोझे एकटा बटुआ रखने छथि।
जुही ः बटूआ केहेन होइ छै, बावूजी?
कर्मनाथ ः (मुस्कु राइत) बटुआ कपड़ाक बनै छै। दरजी सब सीवै अए। कोठरीनुमा ओहि मे हन्नाः सब बनल रहै छै। जेकरा लोक डॉरक डोराडोरि मे बान्हि कऽ रखैत अछि। ओहि मे अमलोक वस्तुु आ पाइयो-कौड़ी रखैत अछि। हमरो हड़ल ने फुड़ल, ओतइ वैसि कऽ बटुआ उठा देखै लगलियै। ऐँह, की कहवह अजीव खजाना बटुओ होइ अए। जहिना लोक पीढ़ी, केबाड़ आ सन्दूाक सब मे रंग-बिरंगक चित्र बनबवै अए तहिना ओहि बटुआक उपर मे एकटा इनार बनौल रहै। ओहि इनार पर पाँच टा जनिजातिक चित्र बनाओल रहै। एक गोटे इनार मे डोल खसबैत। दोसर उगहनि पकड़ि डोल उपर करैत। तेसर काँखतर मे घैल रखने। आ बाकी दुनू इनारक दुनू भाग ठाढ़ भ कऽ बाँहि फड़का-फड़का झगड़ा करैत अछि।
फुलेसर ः इनारो-पोखरि मे लोक झगड़ा करैत अछि।
कर्मनाथ ः (ठहाका मारि) हौ, इनार-पोखरि त स्त्रीिगणक लड़ैक अखडे़हे छी (पत्नीी दिशि देखि, मूड़ी डोला हँसि) उठा-पटक त स्त्री गण कम करैत अछि मुदा गरिखर बेसी होइ अए। सात पुरखाक नाम आ सातो पुरखा के कोन गारि ककरा लगतै, से सबके बुझल रहैत अछि।
चमेली ः (मुह चमकवैत) इनार-पोखरि ढ़ाठै अए पुरुख आ झगड़ाउ होइत अछि मौगी। (मूड़ी डोलबैत) निरलज के ने लाज, पेट भरला से काज। पुरुख नीक रहतै ते मौगी अधला भ जेतइ, की?
फुलेसर ः बटुआ जे उठौलियै से ओ नइ वुझलनि।
कर्मनाथ ः (उदास होइत) ओ कोना बुझितथि। ओ कोनो रौदक जरल रहथि, ओ त जिनगीक ठोकर स घायल बटोही रहथि। चिन्ताा आ दुखक अथाह समुद्र मे डूवल रहथि। जहि स निकलैक कोनो रस्तेर ने देखथि।
जुही ः बटुआ मे की सब रहनि?
कर्मनाथ ः (मुस्कुहराइत) जखन बटुआक डोरा दुनू हाथे पकडि खेललियै कि भक दे एक्केा बेरि नअ टा मुह बाबि देलक। नवो हन्नाख मे नअ रंगक बौस। पहिल हन्नाल मे नोइसिक डिब्बाे। नोइसिक डिब्बाल के उठाबितहि गमकि उठल। गमक देखि हमरो मन भेल जे कनी निकालि कऽ नाक मे लगा ली मुदा फेरि मन मे आयल जे नाक मे नोइस लगाएव ते छीक हेबे करत। जँ कही जोर से छिक्कान भेल आ ओ आखि खोललनि, ते देखिये जेताह। तेँ नोइस नइ लगेलहुँ।
फुलेसर ः नोइस नइ लगेलियै?
कर्मनाथ ः हँ, लगौलियै। पाछु काल । दोसर हन्ना मे छलिया सुपारी। शुद्ध कालापानी, चारि टा। खूब नमहर-नमहर। तेसर हन्नान मे पानक पनबट्टी। चारिम मे दू टा जरदाक डिब्बा,। एकटा हरिशंकर काली पत्ती आ दोसर पान सौ नम्ब्र, पीली पत्ती। पाँचम मे चानीक रुपैया। ओ नीक जेँका नइ देखलियै। मुदा कम्मेन बुझि पड़ल। छठम मे लंग, इलायची। सातम मे बिलेती तमाकुल पात। आठम मे एकटा चुनौटी मे चून आ दोसर शीशी मे बुकल खैर। नवम्‌ मे रामपट्टीक बनाओल सरोता। नवो हना कऽ देखि नोइसिक डिब्बाे से कने नोइस निकालि, चुटकी मे रखलौ। बटुआ बन्नक क कऽ रखि नाक मे नोइस लगेलहुँ। नोइस लगविते खूब जोर से छिक्का भेल। जहाँ छिकलौ कि ओ फुर-फुरा कऽ उठि, बैसि रहलाह। हमरा नाक मे सुरसुरी लागल तेँ नाक मलैत रही।
फुलेसर ः नाना किछु बजलाह नहि?
कर्मनाथ ः ने ओ किछु बाजथि आ ने हम किछु पुछिएनि। हुनक बगए आ शरीरक रुप देखि हम्मछर बोली बन्नि रहै। मन मे ढ़ेरो रंगक सवाल सब उठैत रहै। जहिना कोनो राही बटोही बिनु खेने-पीने रास्ताह-बाट चलैत रहैत अछि, मुदा रुकैक नाम नहि लइत, तहिना बुझि पड़ल। बड़ी कालक बाद, मन के असथिर करैत पुछलिएनि, अपने कतऽ रहै छियै? नीक जेँकाँ नहि चीन्हिी रहल छी। आखिक नोर पोछैत ओ कहलनि, बौआ, अहाँ अखन बच्चाँ छी, तेँ हम अप्प न सब बात त नहिये कहब, मुदा एते जरुर कहब जे जइ धनुष कऽ तोड़ि राम वीर भेलाह, ओहि धनुष कऽ मिथिलाक बेटी (सीता) बामा हाथे उठा बाहरै-नीपै छलीह। ओहि मिथिलाक आइ एते पतन भ गेल अछि जे बेटीक हाथ पकड़िनिहार, बिना रुपैया नेने, कियो नहि अछि।
फुलेसर ः (चौंक कऽ) बड़ भारी बात कहलनि, बावूजी।
(चमेली, चम्पाा आ जुहीक आखि मे नोर आबि गेल)
कर्मनाथ ः हमर करेज दहलि गेल। आखि भारी भ गेल। मुहक बकार बन्न भ गेल। हम्मनर आखि कखनो हुनक मुह देखैत त कखनो बगए। तहि काल पितो जी अएलाह। पिताजी केँ देखितहि ओ (तोहर नन्नाद) कहलखिन, जे एकटा कुल-शील कन्याकक भार उताड़ि देल जाय। जइ पर पिताजी तुरुछ भ कऽ जवाब देलखिन जे कुल-शील ल कऽ हम धो-धो चाटब। द्रव्यीक युग छी। टका धर्म टका कर्म छी। अहाँ अप्प न बेटीक प्रति कते खर्च करै चाहैत छी। जहिना पाइन (तरल) बरफ बनैत, तहिना हम्मीर कोमल ह्‌दय कठोर बनै लगल। मन मे अन्हैर-बिहाड़ि उठै लगल। मुदा चुप रही। ओ (तोहर नन्ना्) कहलखिन, हम्म‍र हालत पाइ-कौड़ी खर्च करै जोकर नहि अछि। अपनेक पाएर पकड़ि कहै छी जे एकटा मुइल बापक बेटीक भार उताड़ि देल जाय। द्रव्यर से त अपनेक इच्छाो पूर्ति हम नहिये कऽ सकब, तखन एकटा नोकरनी परिवार मे जरुर देब। हुनकर बात सुनि पिताजी उठि कऽ बाड़ी दिशि विदा भ गेलखिन। हमरा हुअए जे बोम फाड़ि कऽ कानी। मन मे विचित्र स्थिाति पैदा ल लेलक। एक दिशि पिता दोसर दिशि निरीह कन्या ।
फुलेसर ः नाना बैसिले रहलथि कि उठि के चलि गेलाह।
कर्मनाथ ः बैसिले रहलथि। उठैक साहसे ने होइन। मुह करिछौन भेलि जाइत रहनि। लगले-लागल हाफी करथि। मिरमि-राइते हम पुछलिएनि, अपने कते खर्च करए चाहैत छिअए। ओ कहलनि, बौआ, जखन अहाँ पुछलहुँ ते हम अप्पनन दुख कहै छी। हम दू भाइ छी। हमरा से जेठ भाइ छथि। ओ पढ़लहुँ-लिखलहुँ त बेसी नहि मुदा अखड़ाहा पर जरुर जाइ छलौ। दुनू भाइक बीच जखन बँटवारा हुअए लगल तखन ओ खेत-पथार त बाँटि देलनि, मुदा घरक बरतन-वासन, गहना-जेबड़ आ नगद-नारायण किछु नहि देलनि। एक दिन हम खिसिया के कहलिएनि। हुनको दाँव-पेंचक दाबी। ओहो ओहिना जोर से कहलनि जे जे बँटैवला छेलह से बाँटि देलियह आब किछु ने देबह। हमरो अखड़ाहा परहक ताव रहबे करए। दरवज्जेा पर उठा कऽ पटकि पान-सात थापर मुह मे लगा देलिएनि। कहि दुनू हाथ माथ पर ल चुप भ गेलाह।
फुलेसर ः किअए चुप भऽ गेलाह?
कर्मनाथ ः थोडे खानक बाद फेरि कहै लगलाह। हौ बाउ, पेंच-पाँच त हम जिनगी मे कहियो सीखिलहुँ नहि। कोट मे केसो क देलक आ गौउओ सब के मिला लेलक। दुनू दिशि हम फँसि गेलहुँ। बलजोरी लोक सब जजातो काटि लिअए, बाँसो-गाछ काटि लिअए आ आमो तोड़ि लिअए। तारीक पर जाइ ते एक के तीनि ओकिलो-मुन्सीद ठकि लिअए। केस हारि गेलहुँ। जहि के चलैत छह मास जहलो मे रहलौ। कोनो कर्म बाकी नइ रहल। सब सम्परत्ति नष्टक भ गेल। हारि के बेटा पड़ा कऽ दिल्लीी चलि गेल। एहना स्थिेति मे बेटी विआह करै जोगर भ गेल अछि।
चमेली ः (नोर पोछैत) हे भगवान, ऐहेन दिन ककरो नइ दिहक।
(चम्पाि आ चमेली माइयक मुह तकैत आ फुलेसर बापक मुह)
फुलेसर ः बाबा घुरि कऽ एलखिन आ कि नहि?
कर्मनाथ ः ने घुरि कऽ एलखिन आ ने कतौ गेलखिन। अंगनाक पछुआरक रस्ता देने आबि कऽ अढ़ मे बैसि गेलखिन।
फुलेसर ः सोझा मे किअए ने एलखिन?
कर्मनाथ ः से त ओ जानथि। मुदा हम्मिर मन हुनका (पिता) स हटै लगल आ हिनका (ससुर) दिशि झुकै लगल। मने-मन सोचै लगलहुँ जे अखन जँ हम बलजोरी (पिताक बिना विचारे) विआह क लइ छी ते परिवार मे जबरदस विबाद ठाढ़ हैत। जँ विआह करै स इनकार करै छी ते दरबज्जाहक इज्ज त चौपट हैत।
जुही ः दरबज्जाजक इज्जलत की छियै?
कर्मनाथ ः बाउ, दरवज्जाक अंगनाक नाक होइत। आंगन व्यसक्ति -विशेषक वुझल जाइत, जबकि दरवज्जाज दसगरदा मे बदलि जायत। आंगन आंगनवालीक (पत्नीकक) बुझल जाइत जबकि दरवज्जाउ द्वार (दुआर) होइत। ककरो आंगन मे पुरुख क आगमन आंगनवालीक आदेश स होइत जबकि दरवज्जााक लेल आदेशक जरुरत नहि। सबहक लेल सदिखन रहैत। पुरुखक परीछाक (परीक्षाक) केन्द्रह दरवज्जाप छी। परिवार मे जेहेन पुरुख रहत दरवज्जाहक इज्जछत ओहि रुपक होइत। हमर-अहाँक पुरुखा एहि इज्ज।त केँ वुझै छेलखिन, तेँ, बहुतो गोटे एहि प्रतिष्ठाु के उच्चा सीढ़ी धरि मर्यादित बना कऽ रखलनि। ऐहन-ऐहन हजारो पुरुख भेल छथि जे कनैत आइल मनुक्खत केँ दरवज्जाी पर स हँसा कऽ विदा केलनि। अइह बात (विचार) हमरो मन मे आयल।
जुही ः इ विचार बावा मे किऐक ने एलनि?
कर्मनाथ ः इ त ओ जानथि। मुदा हमरा मन मे जरुर भेल जे जहिना तोहर नन्नाा कनैत अएलाह तहिना हम हँसा कऽ विदा करबनि। चाहे परिवार मे जे होय। फेरि मन मे आयल जे जाधरि परिवार स नीच विचार हटत नहि ताधरि उच्चब विचार आबि कोना सकैत अछि। इ त कोनो जादू-टोना नहि छियै। बेवहार छियै। जे सोझे कर्म (काज) स जोड़ल अछि।

फुलेसर ः तकर बाद की केलियै?
कर्मनाथ ः (गंभीर होइत) थेाड़े काल मने-मन विचार केलहुँ जे अखन त हमरो स्थिसति काटल गाछक छाहरिये जेँका अछि। तेँ विआह करै स पहिने अप्प-न आस्तिहत्वह कायम करी। अगर जँ से नहि कऽ पहिने विआहे क जे कनियाँ घर ल आनब त ओहने दशा कनियाँक संग हेतनि जहिना अनभुआर चिड़ैक दशा चिड़ैक जेर मे होइत। तेँ जरुरी अछि जे पहिने अप्पंन जिनगी कऽ अपना हाथ मे ल कऽ चली। मुदा इ होएत कोना? सोचैत-विचारैत तय केलहुँ जे आब एहि घर कऽ छोड़ि कतौ नोकरी करी। नोकरी करैक विचार मन मे अबितहिं हम कहलिएनि जे एहिठाम अपनेक जे नोर खसल ओ अपनेक उद्धार करत।
जुही ः (हॅसैत) तब ते नानाक मन खूब खुशी भेलि हेतनि?
कर्मनाथ ः ओ बड़ पारखी रहथि। किछु बाजथि नहि मुदा हमरे मुहक बात सुनै चाहथि। जबकि हमरा मन मे भीतर स समुद्रक लहरि जेँका उठाय। हुअए जे की कहिएनि,कत्त्ो कहिएनि जे अेा ठहाका मारि हँसथि। हम कहलिएनि जे अपने भोजन क-ए लेल जाउ। ओ कहलनि, बौआ अहाँ अखन बच्चाक छी तेँ अपना ऐठामक विधि- बेबहार नइ बुझै छियै। अखन हम कन्या गत छी, कोना भोजन करब। मन मे भ्‍ेाल जे कहि दिअनि, जौर जरि गेल मुदा ऐँठन नहि गेल। हम भुखल बुझि के कहलिएनि आ ओ शास्त्रि पढ़वै लगलथि। मुदा हम चुप्पेह रहलहुँ। फेरि कहलिएनि जे कम से कम एक गिलास पाइन पीवि लेल जाउ। पाइनिक नाम सुनि धड़फड़ा के कहलनि, हॅ, इ भऽ सकै अए।
जुही ः चाह-ताह पीबै ले नइ कहलिएनि?
कर्मनाथ ः अपना ऐठाम (इलाका) ते चाहक चलनि (1935 ई0 क बाद भेल) आब भेलि हेँ। जखन पाइन पीबैक लेल राजी भ गेलाह, तखन सोचलहुँ जे भरि मन सरबत पीआ देबनि। मुदा बाउ, अपना ऐठाम गिलास मे पाइन बच्चाो पीबैत छल चेतन लोटा मे पीबैत छल। एकटा बड़का लोटा अपना घर मे अछि, जइ मे तीनि किलो से बेसिये पाइन अँटैत अछि। ओही मे भरि लोटा सरबत बना कऽ अनलौ आ आगू मे रखि देलिएनि। लोटा देखि ओ हँसि देलनि।

जुही ः सरबत देखि कऽ हँसलथि आ कि मने खुशी भऽ गेल रहनि।
कर्मनाथ ः से ते ओ जानथि। मुदा तखन से हँसी मेटेलनि नहि। लोटो भरि सरबत पीबि लेलनि। सरबत पीबि, बटुआ खोलि पान निकालि मस्तलगर खिल्लीि लगा, मुह मे दइत कहलनि, आब मन हल्लुटक भ गेल। जते हुनकर मन हल्लुिक होइत जाइन तते हमरो मन मे शान्ति अबैत गेल। मुदा करेज सक्क।त हुअए लगल। हम कहलिएनि, किछु दिन अपने केँ प्रतीक्षा करै पड़त। मुदा एते अखन जरुर कहि दइत छी जे जहि काजक लेल अपने परेशान छी ओ परेशानी जरुर मेटा जायत। एते सुनितहि ओ बजै लगलथि जे हम सब मिथिलाक बासी छी तेँ मैथिल छी। हमरा सबहक पूर्वज नारीक जिबठ (साहस) के जनैत छेलखिन। किऐक त जिनगी-जिनगी भरि नारी परपुरुषक मुह नहि देखलनि, भले ही ओ बाल-विधवे किऐक ने भऽ गेल होथि। जे हमर धरोहर सम्प त्ति छी। हँ, आइ भले ही समाजक विकृतताक चलैत किछु अनुचित जेँका जरुर भऽ गेल अछि। मुदा अस्स्ल तथ्ये सभकेँ बुझैक चाही। हम दुनू गोटे गप-सप करिते रही कि ओमहर (कोठरी मे) पिताजी गरजि अन्ट।-सन्ट- बजै लगलथि।
फुलेसर ः अढ़े से बावा बजथि, सोझा मे किअए ने ऐलाह।
कर्मनाथ ः से त ओ जानथि। ओ (तोहर नाना) उठि के विदा हुअए लगलाह कि हम गोड़ लगलिएनि। गोड़ लगितहि ओ बटुआ खोलि पाँच टा रुपैया हमरा हाथ मे दइत कहलनि बाउ, मिथिला अखने पुरुष-विहीन नइ भेलि अछि, आ ने हैत। आब अहीं सबहक (नव युवक) हाथ मे सब कुछ अछि, तेँ, जना कऽ आगू ल चली। कहि चलि गेलाह।
फुलेसर ः अहाँ की केलियै?
कर्मनाथ ः बी0 ए0 धरि हम कहियो, कोनो क्लानस मे फेल नहि केने छलहुँ, तेँ मन मे पढ़ैक उत्साथह एक्कोे पाइ कमल नहि छल। सोचलहुँ जे जखन नोकरी करैक अछि तखन एक बेरि प्रशासनिक परीक्षा मे बइस कऽ देखियै। नइ पास करब ते नइ करब। दू वर्ख मेहनत कऽ परीक्षा मे बैसलहु। पास केलहुँ। पास केलाक बाद विआह केलहुँ। आब पैछला खिस्साऽ-पिहानी छोड़ह। अखन परिवारक सब कियो छी, तेँ एकटा विचार कइये ली।

फुलेसर ः (साकांच होइत) हम सब त बच्चार छी, की विचार दऽ सकै छी। मुदा बुझि त सकै छी।
कर्मनाथ ः बौआ, कोनो परिवारक बच्चा , न एक्केे बेरि सियान होइत अछि आ ने एक्केक रंग रहैत अछि। किऐक त सब परिवारक वातावरण एक्के‍ रंग नहि होइत अछि।ं पढ़ल-लिखल परिवारक बच्चाक आ बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक बच्चा मे बहुत अंतर होइ छै। तहिना अगुआइल परिवारक (सम्‍पन्ऩ) बच्चाब आ पछुआइल परिवारक (गरीब) बच्चाा मे सेहो बहुत अंतर होइत अछि। ऐहेन- ऐहेन अनेको कारण अछि जहि स दू परिवारक बच्चाइ के दू रंगक वातावरण भेटैत छैक। तेँ दू रंगक होइत अछि।
चमेली ः जेकर माए-बाप खूँटा सन-सन ठाढ़ रहत, अनेरे ओहि बच्चाे कऽ परिवारक काज किअए पूछबै।
कर्मनाथ ः बिनु वुझनहि अहाँ किअए सब वात मे टाँग अड़ा दइत छियै। (भाव बदलैत) ओना अहूँक दोख बड़ बेसी नहिये अछि किऐक ते अहुँक विचार एक रस्ते क अछि। जे रास्ताथ व्यबवस्थाय स जुड़ल अछि। अइ दुनियाक अजीव बुनाबटि अछि। कने नीक जेँका बुझियौ। विषुवत रेखा बीच दुनिया मे अछि। रेखा से उतरो आ दछिनो, समान दूरी पर, एक्केौ रंग मौसम होइत अछि। मुदा विपरीत समय मे। तहिना विचारो आ जिनगियोक अछि। अखन चम्पा क विआहक संबंध मे विचारेैक अछि तेँ बेसी नहि कहब। कोनो परिवार, परिवारक सव सदस्यमक होइत, नहि कि परिवारक गारजने टाक। हँ, इ बात जरुर अछि जे परिवारक सब काजक भार गारजने पर रहैत अछि एकर माने इ नई जे बच्चाि सब बुझवे ने करए।
फुलेसर ः बहीनिक विआहक चरचा करै छेलियै?
कर्मनाथ ः जे बात बौआ तू पुछलह, सैह हमहू कहै चाहै छिअह। तीनू भाइ-बहीनि मे चम्पाा जेठ छह। बी0एक रिजल्टोह निकलिये गेलइ। अपना मन मे जे छल ओ भइये गेल। उमेरोक हिसाब से अठारहम पुरि उनैसम चढ़ल, तेँ आब बिआह क लेब, उचितो हैत। कथा-कुटुमैतीक सवाल अछि, तेँ किछु समय लगबे करत।
फुलेसर ः किछु दिनक बाद चलितहुँ
कर्मनाथ ः देखहक, ओना त हमहू नीक-नाहाँति नहिये बुझै छी किअए त सब दिन बाहरे रहलौ। मुदा देखै छियै जे किछु मास छोड़ि लोक बेटा-बेटीक बिआह सब मास करैत अछि। तखन ते सब मासक अप्पेन-अप्पकन गुण छै। तइ मे हमरा बुझैत फागुनक काज बढ़ियाँ होइत अछि। जाड़क मास मे बेसी जाड़ आ गरमी मास मे हबा-बिहाड़िक संग रौउदो तीख होइ छै। तेँ फागुनक दिन सबसँ नीक।
(चम्पास बिआहक चर्च सुनि सबहक मनमे सब रंगक विचार उपकै लगल। चमेलीक मन मे बेटी जमाइ आ परिवार नचै लगल। जबकि चम्पांक मन मे बदलैत जिनगी। जुहीक मन मे बहीनिक विआहक आनन्दग त फुलेसरक मन मे माए-बापक परेशानी। खुशी स जुही गीत गबै लगली।)
चमेली ः बेटी विआहक चर्च, बेटीक सोझा मे करैत लाज-धाक नइ होइ अए।
कर्मनाथ ः से की?
चमेली ः आइ धरि ऐहेन कतौ देखने-सुनने छेलियै। आ कि मन मे सनकी सवार भऽ गेल अछि। जे मन मे अबै अए बकै छी।
कर्मनाथ ः (मुस्कीब दइत) जकरा अहाँ नीक परम्पकरा बुझै छियै, भऽ सकैत अछि। जखन समाज मेदहेज(खरीद-बिकरीक) चलनि नहि रहल छल हेतइ। पढ़लो-लिखल नहिये जेँका छलै। मुदा आइक बेटी पढ़लक-लिखलक हेँ। ओ अपन जिनगी क बात बुझै लगल हेँ। तेँँ माए-बापक ओकाइत आ अपना प्रति माए-बापक सेवा ओकरा सोझा मे अछि। ते,ँ ओ खुद अपन विआहक विचार कऽ सकैत अछि। ऐहेन त नहि जे वेटीक चलैत माए-बाप डूबि जाय वा माइये-बाप बेटी के डुबा दइ। जहाँ धरि अनमेल विआहक बात अछि ओ लेन-देनक चलैत रहल अछि। तेँ बेटी के अपना पर भरोस कऽ अगिला जिनगीक लेल डेग बढ़वै पड़तै। जइ समाज मे नारी शिक्षा कऽ अधला मानल गेल ओहि समाज मे लड़का-लड़की समान कोना भऽ सकैत अछि। तखन रहल रंग-रुपक समानता,रंग-रुपक समानता परिवारक रंगरुप समाप्ता कऽ दइत अछि। तहू स जुआइल गहूमन, बिनु केंचुआ छोड़ला जेँका, कात मे बैसल अछि। ओ छी जाइतिक भीतर जाइतिक कुल-मूल।
फुलेसर ः बाप रे बाप, जइ समाज मे एते रंगक विषमता अछि ओ समाज एक रास्ताा स चलि कोना सकैत अछि। समाजक बात त कात रहअ जे परिवारो कोना चलि सकैत अछि। मर्द औरत (पति पत्नी ) परिवारक मुख्यअ अंग होइत, जहिना गाड़ीक पहिया। मुदा गाड़ीक एक पहिया मजगूत होय आ दोसर कमजोर त समुचित भार ल गाड़ी कोना चलि सकत। तहिना त परिवारो अछि।
कर्मनाथ ः बौआ, समाज आ परिवार एहि रुपे, पुरान कपड़ा जेँका, चिड़ी-चोंट भऽ कऽ फटि गेल अछि जेकरा सीला से काज नहि चलि सकैत अछि। जाधरि ओहि मे पीओन-चेफड़ी लगा-लगा काज चलाओल जाइत अछि, जाइत अछि। मुदा एहि स काज कते दिन चलत। अखन हम एहि स बेसी नहि कहबह। किऐक त अखन अपने सिर पर काज अछि, जहि लेल सोचैक अछि।
चमेली ः जखन चम्पाेक विआह करैक विचार करै छी ते गहना जेबरक ओरियान कहिया करब?
कर्मनाथ ः (चम्पाे दिशि देखि) कहलौ ते ठीके, मुदा जकरा रुपैआ नइ रहतै ओ की करत?
चमेली ः छुछ देहे बेटी सासुर जायत, से अपना नीक लागत।
कर्मनाथ ः कहलौ ते ठीके, मुदा जकरा अहाँ मान-मरजादा वुझै छियै ओ सिर्फ गहने-जेबर छी। गरीब लोक जे गहना-जेबरक सिहिन्ता करै अए अेा ओकर मुरुखपना छियै। कने आखि उठा के देखियौ जे कोन परिवारक माए-बाप अपना बेटी के किछु नहि किछु गहना नइ देलक, मुदा ककरा घर मे एकटा कनौसियो छै। तेँ गरीब लोक के एकर (गहनाक) सिहनते नइ करैक चाहियै।
फुलेसर ः बावूजी, जखन ऐहेन ओझराओठ काज अछि आ अखन धरि किछु केलहुँ नहि, तखन लगले कोना काज निपटाएब?
कर्मनाथ ः हम संकल्प क कऽ गाम जा रहल छी, तेँ विआह हेबे करतै। काज कोना हैत से हमरा मन मे अछि। हम्मचरबेटी सुगक अनुकूल अछि, ते ँ विआह नइ होइक कोनो कारणे नहि अछि। (चम्पा से) बाउ, हमर जेठ बेटी छिअह। पढ़ल-लिखल सेहो छह। ते ँ तोरा किछु बात कहि दिअए चाहै छिअह। दुनिया दिशि नइ देखह अपना आ अप्प न माए-बाप के देखह। हम पढ़ि कऽ प्रशासनिक अफसर बनलौ मुदा तोहर माए कते पढ़ल छथुन। फेरि परिवार कोना चलैत अछि। तोरा हम बी. ए. पास करा देलियह। तोरा मे ओतेे क्षमता आबि गेल छह जे स्कू ल, अॉफिस, बैंक वा आन कोनो काज कऽ सकैत छह, तखन तेाहर जिनगी भारी किअए हेतह। मन से इ हटा लाय जे हम उपारजन नइ कऽ सकै छी। जहिना पुरुख उपारजन करैत अछि तहिना तोहूँ क सकै छह। हम तोहर बाप छिअह, तेाहर अधला हुअ, इ हमरा मन मे कोना आओत?
चमेली ः गाम मे जे खेत-पथार अछि, जइ से एक्कोा सेरक आशा कहियो ने होइ अए, भाय सब बेचि-बेचि खाइ अए, ओ बेचि कऽ बेटीक बिआह क लिअ।
कर्मनाथ ः कहलौ ते ठीके मुदा जाधरि पिताजी जीवैत छथि ताधरि हम्मलर बेचब उचित होएत। एक त ओहिना पिताजी (दहेज हाथ नइ लगला स) कड़ुआइल छथि, तइ पर स ज ऐहन काज करब त परिबार मे विस्फोिट होइ मे बाँकी रहत। हम बेटीक विआह करै ले गाम जायब कि घर मे आगि लगवै ले।
फुलेसर ः (चिन्तिपत भऽ) बड़ भारी काज उपस्थिमति-भऽ गेल अछि, बावूजी।
कर्मनाथ ः (मुस्कुिराइत) बौआ, अखन तू बच्चाभ छह; तेँ नीक जेँका परिवार आ समाज के नहि जनैत छहक। जहिना फुलवारी मे सैकड़ो रंगक फूल रहै छै, मुदा कात से देखिनिहार त कातेक फूल देखैत अछि। बीच मे कोन फूल केहेन छै, से थेाड़े देखैत अछि।
फूलेसर ः अहाँक बात हम नहि बुझि सकलहुँ, बावूजी।
कर्मनाथ ः फुलवारीक त उदाहरण देलियह। असल बात समाजक अछि। फुलबारिये जेँका समाजो मे अछि। हजारो रंगक मनुष्यब समाज मे रहैक अछि। हर मनुष्य केँ अप्पेन-अप्प न जिनगी, अप्पेन-अप्प‍न विचार होइत अछि। जहि स अप्प न-अप्पलन संकल्‍प आ उदेस (उद्देश्य‍) सेहो होइत अछि। नीक स नीक आ अधला स अधला मनुष्य् समाजक पेट मे नुकाइल रहैत अछि। जेकरा सिर्फ देखिनिहारे देखि पबैत अछि। सब नहि। मुदा एकटा बात कहि दइत छिअह जे जखन कोनो काज करै ले डेग उठाबी ते देहक सब अंग के चौकन्नाद क कऽ राखी। जेकर सब अंग क्रियाशील रहत ओ माइटिक रास्ता क कोन बात जे पाइनियो आ हवोक रास्ताब स चलि सकैत अछि। तेँ सदिखन आशावान भ कऽ डेग बढ़ेवाक चाही।

यय










दोसर अंक
(सोमनाथक दरवज्जाे। सेामनाथ मसलन पर ओंगठल, आशा आ नूनू दुनू भाग बैसल।)
सोमनाथ ः बाउ नूनू , आइ जे भाँग पिऔने छेलह से कतऽ से अनने छेलह? अप्प न घरक पत्ती त नहि छेलह। बहुत दिन बाद ऐहेन मस्तँगर भाँग पीलहुँ। आब कने चाह पीआवह। तखन, परसु जे कर्मनाथक पत्र आयल छेलह, ओ पढ़ि कऽ सुनविहह।
(नूनू चाह अनै जाइत) (पत्नीा स) एकटा बात कहू।
आशा ः की?
सोमनाथ ः कने विआह दिनक बात मन पाड़ियौ ते। ओइ दिन इ बात कल्प नो केने रही जे एक दिन हमहू सब अथबल हैब।
आशा ः (खौंझा कऽ) मन बौआइ अए। जते बूढ़ भेल जाइ छी तते बुद्धियो टूटि-टूटि खसै अए। एतबो नै बुझै छियै जे अइ दुनियाक नियमे छै जे जन्मभ लेब, जुआन हैब आ बू़ढ़ भ कऽ मरि जायब। अगर जँ से नहि होइत आ पहिलुको लोक सब जीबिते रहितथि ते अहाँ के कि हमरा के पूछैत?
(चाह ल कऽ नूनू अवैत। एकटा कप सोमनाथक हाथ मे आ एकटा आशाक हाथ मे दइत)
सोमनाथ ः (चाहक चिस्कीन लइत) सात घर मुद्दइयो किअए ने हुअए मुदा भगवान जँ ओकरो बेटा देथुन ते नूनू सनक देथुन। जे बेटा बाप-माएक सेवा नै केलक ओहो कोनो बेटे छी। कखनो काल मन मे अबै अए जे दूटा समाजोक लोक कऽ आ अपनो दियाद-बाद केँ बैइसा कहि दिअए जे हमरा मुइला पर नूनूए आगि दिअए।
आशा ः ऐना किअए बजै छी। लोक सुनत ते की कहत। जखन भगवान तीनि टा बेटा देने छथि ते हमरा लिये सब बरावरि। जेकरा हाथे आगि लिखल होएत, ओ देत। कोनो कि देखै ले एबइ। माए-बापक अप्प न करतब छै, बेटा-बेटीक अपन होइ छै। तइ ले अनेरे माथ किअए धुनै छी।
सोमनाथ ः (बिगड़ि कऽ) जे बेटा जीबैत मे कटहर लगा कऽ मोजर नइ दइ अए ओ मुइला पर सोनाक मंदिर बना देत। अहाँ सैह बुझै छियै।
आशा ः (झपटैत) जना अहाँ अपना माए-बावू केँ सोनाक मंदिर बना देने होइएनि, तहिना बजै छी। जेहने किरिया-करम क कऽ मरब तेहने ने फलो हैत। जँ अशुद्ध (अधलाह) किरिया क कऽ मरब ते भूत-परेत (प्रेत) बनि गाछी-बिरछी मे बौआइब, नइ जे शुद्ध (नीक) किरिया क कऽ मरब ते स्वरर्ग मे जायब। देखै नै छियै जे पपियाहा सब जे मरै अए ते ओहिना बौआइत रहै अए। पियास लगै छै ते इनार पर जा-जा लोकक धैला फोड़ै अए आ भुख लगै छै ते बाट-बटोही के पटकि-पटकि सनेस छीनि-छीनि खाइ अए। हमरा की अहाँ के विधाता छठियारे दिन लिखि देने छथि, से त हेबे करत।
सोमनाथ ः (पिनकि कऽ) मौगीक बातक कोनो ठीक नै। लगले कहै छी जे जेहेन किरिया करब तेहेन फल हैत आ लगले कहै छी जे छठियारे दिन विधाता लिखि देलनि। अच्छाा, एकटा बात कहू ते, जाबे जीबै छी ताबे ने लिखलाहा हैत आ कि मुइलाक बादो।
आशा ः अहाँ के की होइयै जे मुइलाक वाद फेरि से लिखायत। आ कि छठियारे दिनक लिखल मुइलाक वादो हैत।
(पनबट्टी स पान निकालि मुह मे दइत सोमनाथ)
सोमनाथ ः (मुहक पान गाल तर दवैत) बेटा नूनू , अगर ज भगवान गाहीक-गाही बेटा नहियो दथि आ तोरा सन एकोटा रहए त ओइ गाहीक-गाही स नीक। अपना सबहक जे बाप-दादा कहने छथिन जे माए-बापक सेवा करब बेटाक सबसँ पैध धर्म थिक। से कोनो अधलाह कहने छथिन। अखनो जे इ दुनिया चलैत अछि से तोरे सन-सन बेटाक धर्म पर। नइ ते इ दुनिया कहिया ने अलोपित भऽ गेल रहैत। किऐक ते तते ने चोर-उचक्कार, बइमान-शैतान सब फड़ि गेल हेन जे एक्कोह दिन इ धरती असथिर रहैत। अच्छा्, एकटा बात कहह जे औझुका भाँग कतऽ स अनने छेलह।
नूनू ः औझुका कोन भाँग छेलए से नइ बुझलियै। दछिनवारि टोल मे जे दिनेश अछि ओइह दरभंगा से अनने अछि।
सोमनाथ ः के दिनेश?
नूनू ः हीरा कक्काेक बेटा। दरभंगा कओलेज मे पढ़ै अए।
सोमनाथ ः (किछु मन पाड़ैत) हीरालाल। ओकरा ते कहियो भाँग मुह मे लइत नै देखलियै। तेकर बेटा ऐहेन ओसताज भऽ गेल।
नूनू ः ऐँह, जेहने मजगर भाँग पीवए अए तेहने टिपगर तमाकुलो खाइ अए। गाम मे ओहन माल के देखत। अपना सब ते ओ भाँग पीबै छी जे बाड़ी-झाड़ी मे अनेरुआ जनमै अए। ओ शुद्ध कलमी भाँग पीबए अए।
सोमनाथ ः भाँगो कलमी होइ छै, हौ।
नूनू ःअहाँ ते पुरना गीत गबै छी। विज्ञान कते आगू बढ़ि गेल अछि से नइ बुझै छियै। आ कि सोझे हवाइये जहाज आ रौकेटे टा बुझै छियै। विज्ञान बढ़ला से खाइओ-पीवैक वस्तु बढ़ल की। अहाँ ने सदिखन कहै छियै जे बासमती धानक चूड़ाक जोड़ा दोसर नइ अछि। मुदा आब जे चूड़ा बजार मे विकाइत अछि ओकर जोड़ा बासमतीक चूड़ा करतै।
सोमनाथ ः चूड़ाक गप छोड़ह। देखते छहक जे छह मास से तेहेन रोग ने तरे-तर देह मे धेसिया गेल अछि जे सब खेलहा-पीलहा बिसरि गेलहुँ। जे ने करै बीमारी। ने ते जइ जौ के कहियो अन्ने मे नइ गनलौ, से भ गेल अछि अहार। थाकल पाँव पलंग भेल भारी, आब की लादब हौ बेपारी। खाइक बात छोड़ह। कलमी भाँग कोना होइ छै, से कनी बुझा दाय।
नूनू ः एकटा बड़ भारी कम्पछनी अछि। जेकर अरबो-खरबेाक कारोवार छै। वैह भाँगोक कारोवार करैत अछि। भाँगेक जूस, मोदक इत्याछदि विन्याछस बना-बना देश-विदेश सगतरि बेचै अए। ओइह कम्मतनी भाँगक खेतीक लेल किसान के अगुरबारे खरचो आ संकर किस्म क बीओ दइत अछि। किसानो सब के, आन फसिल से बेसी रुपैइयेा होइ छै आ मेहनतो कम होइ छै। बाधक-बाध किसान सब कात-कात मे मकै रोपने अछि आ बीच मे बीधाक बीधै भाँग लगौने अछि। ओही भाँग मे मसल्लाक सब मिला के जूसो, मोदको आ आनो-आनो विन्याअस सब बनबैत अछि।
सोमनाथ ः अच्छा्, आब दुनियादारीक बात छेाड़ह, पत्र निकालि के सुनावह।
(जेबी से चिट्ठी निकालि नूनू मने-मन पढ़ै लगैत)
नूनू ः (चिट्ठी पढ़ि) सबतुर भैया नीके छथि। चम्पाप बी.ए.पास केलक। ओकरे विआहक ले लड़का भजिअवै ले लिखलनि अछि।
सोमनाथ ः (उत्त्ोजित होइत) तोरा दुनू भाइ के लिखने छौ कि हमरा।
नूनू ः अहीं के लिखने छथि।
सोमनाथ ः (आरो उत्त्ोजित होइत) पढ़ल-लिखल लोक कते बेसरमी होइ अए से देखही। तोरा मन हेतउ कि नहि, जखैन उ (ओ) बी.ए. पास केने रहए, तखैन विआहक चरचा उठौलियै। (अफसोस करैत) ओ-हो-हो, हुसि गेल। गरदनि कटि गेल। सम्पआत्ति दोवरा जइतौ। बीस बीघा खेत ते बेटीक खोंइछ मे दइ ले तैयार रहै। नगद आ जेबरक कोन ठेकान। (आदर्शवादी बनैत) कहू जे कते भारी नोकसान परिवार मे भेल।
आशा ः अहाँ ते तेना बताह जेँका बजै छी जना करमू अइ घरक कियो छीहे नहि। ने अहाँ कियो छियै आ ने ओ कियो छी। बाल-बच्चा जे कनी-मनी किछु कइये गेल ते की हेतइ। तइ ले अहाँ किअए एते आमील पीने छी।
सोमनाथ ः हूँह। एते दिन बेटा सिखौलक आ आब अहाँ सिखाउ। गीदरक नांगरि किमहर होइ छै से अहीं बुझवै। दिन-राति कमाई छी, घर चलबै छी तेँ बुझि पड़ै अए जे एहिना दिन-दुनिया चलै छै। (चिन्तिमत होइत) आब ते सहजहि अथबले भेलहुँ , अपनो जिनगी पहाड़ बुझि पड़ै अए। मान-अपमान, इज्जहत-आबरु सब बिसरि गेलहुँ। जावे जीबै छी ताबे कौआ जेकाँ टाँहि-टाँहि करै छी। (अफसोस करैत) घरक की मान-परतिसठा (प्रतिष्ठाज) छल, की रुआब छल, सब चलि गेल। भगवानो रच्छन रखलनि जे सब सुख-भोग छोड़ा देलनि। जौ के फाँटी पर आनि के रखि देलनि। नइ ते हम्म र की दशा होइत से ते उगलेहे देखितथि। (गंभीर होइत) अच्छाि अहीं कहू जे बेटा मनसम्फेस कमाइ अए की नै? मुदा माए-बाप के की दइ अए।
आशा ः (मुह बिजकबैत) अहाँ के कोनो गत्तर (गत्र) मे लाजे ने होइ अए। जखैन ओ (कर्मनाथ) नोकरी शुरु केलक आ महीने-महीने पान सौ रुपैया पठबै लगल, ते तीनिये मासक बाद लिखि पठौलियै जे पान सौ रुपैया ल कऽ चुट्टीक बिल गहब। आ आब निरलज भट्टा जेँका कहै छियै जे रुपैइये ने दइ अए। अगर पान सैा रुपैया झुझुआन बुझि पड़ल ते कहितियै जे बौआ मासे-मास नहि, छह मास पर एक्के ठीन पठबिहह। जहि से कोनो काज चलत।
सोमनाथ ः बड़ बुद्दिआरि छी अहाँ। एकटा बात कहू ते, जे बेटा-बेटीक विआह-दुरागमन करब माए-बापक मर्यादा छी की नहि? आ कि अपने मने विआह कऽ लिअए।
आशा ः अगर जँ करमू (कर्मनाथ) अपने मने विआह कइये लेलक ते कोन बड़ भारी जुलुम क लेलक। कोनो कि जाइत गमा लेलक। दहेज नै लेलक, सैह ने केलक। ते की हेतइ। वैह कन्यालगत अहाँक तिजोड़ी भरि दइते ते बड़वढ़िया, नइ भरलक ते बड़ अधला।
सोमनाथ ः की हौ बौआ नूनू। माइयक बात के तू नीक बुझै छहक कि अधला।
नूनू ः बाबू, माए पुरना विचारक लोक छथि तेँ हिनको विचार बेजाय नहिये छनि।ंं मुदा आब ते युग बदलि चुकल अछि। अर्थयुग आबि गेल। जेकरे पाइ छै अेाकरे लोक मनुक्खो बुझै छै आ समाज मे मानो-प्रतिष्ठार दइत छैक। तेँ एते घाटा त परिवार मे जरुर भेल जे मोट रकम हाथ स ससरि गेल। मुदा माए, आब परिकछो (परीक्षो) बेरि आबिये गेल अछि। करमू भैया दहेज नइ लेलनि, बड़बढ़िया। मुदा आब त अपनो बेटीक विआह करैक छनि की ने?
सोमनाथ ः (फड़कि कऽ) हँ-हँ, बेस कहलहक बौआ। जनिहें मियाँ धुनै बेरिया। भने त आविये रहल हेँ। भगवाना नीक केलनि जे अथबल बना देलनि। ने किछु करब आ ने दोखी हैब।
आशा ः बौआ नूनू , तू ने कहै छहक जे अर्थयुग आवि गेल, तेँ सब काज पाइयेक हाथे हैत। मुदा एकटा बात वुझै छहक जे मनुक्खअ मनुक्खेन रहत। युग कोनो अबै आ कि जाय, मुदा नीक काज करैवला नीके काज करत आ अधला काज करैवला अधले करत। जइ बेटाक दोख तू दुनू बापूत लगवै छहक ओइ बेटाक गुणो बुझै छहक। अप्पकन परिवारक कोन बात जे गामे मे अप्पपन कर्मनाथक जोड़ा कैक टा अछि। मनुक्ख‍ ते सौँसे गामे भरल अछि।
सोमनाथ ः अहाँ हाकिम बेटा ल कऽ नाचू, मुदा हम ते सोमनाथे छलो आ रहबो करब। हमरा नूनू सन बेटा रहक चाही। जखैन जे कहै छियै, दासो-दास रहै अए।
आशा ः अही सन हमहुँ नै ने छी जे कर्मनाथ सन बेटा पर ओंगरी उठाएब। अपनो ते दू टा बेटी आ (कर्मनाथ छोड़ि) दू टा बेटो अछिये, किअए ने एकोटा हाइयेा स्कूेल धरि देखलक। बेटेक चलैत पोती बी.ए. पास केलक। तेकरा अहाँ मनुखे ने बुझै छियै। जेकरा अहाँ नै मनुख वुझवै ओ अहाँ के मनुख बुझत?
सोमनाथ ः (शान्तब होइत) आब हमरा कोन मनुख बनैक काज अछि। मृत्युाक रास्ताक मे अटकल छी, जखन रसीद कटि जायत, राम-राम क कऽ विदा भ जायब।
(लालबावूक आगमन)
सोमनाथ ः भरि दिन तू कतऽ निमत्ता रहै छह, लालबावू?
लालबाबू ः ऐँह, की कहब बाबू! ककर मुह देखि कऽ आइ उठलौ जे समय पर अनजलो ने भेल। सबेरे चौक दिशि गेलहुँ ते देखलियै जे मारे-लोक घेाल-फचक्काअ कऽ रहल अछि। अनगैाँओ आ गैाँओ थाहा-थहि कऽ रहल अछि। ससरि कऽ हमहूँ गेलहुँ, ते देखलियै जे अनगौँआ सब सन-सन कऽ रहल अछि। गौँआ सबमूड़िआरी दऽ दऽ खाली सुनैत अछि। मन असथिर भेल। एक गोटे के पुछलियै जे भाइ की बात छियै जे अहाँ सब ऐना सन-सन करै छी? कत्तऽ हेँड़ बान्हि कऽ जा रहल छी, ओ कहलक, हमरा गामक (खैरबोनीक) एकटा विद्‌यार्थी दरभंगा मे पढ़ैत अछि। लौज मे रहै अए। ओही लौज मे पीपराघाटक सेहो पान-सात गोटे रहैत अछि। एक ठाम रहने सबके-सबसे चिन्हाओरय छै। पीपराघाटक विद्‌यार्थी सब हमरा गामक विद्‌यार्थी के फुसला कऽ अपना गाम ल गेल, आ एकटा लड़कीक संग बलजोरी वियाह करा देलक।
सोमनाथ ः लड़काक बाप के बिना पुछिनहि?
लालबाबू ः हँ, तेँ ने लड़काक सवांग सब जुटि के पीपराघाट जाइ अए। लड़काक पितिऔत भाइ कहलक जे दस लाख रुपैआ पर लड़काक विआह सतगछिया ठीक भेल छै। जइ मे एक लाख रुपैया अगुरवारे देनहुँ अछि। बाकी रुपैया विआह स चारि दिन पहिने देवाक बात पक्काप भ गेल छै।
सोमनाथ ः जखन लड़का-लड़कीक विआह भ गेलइ, तखन लड़कावला सब जा कऽ की करतै?
लालबाबू ः ऐँह, की करतै? तेहन गरमाइल लोक सब के देखलियै जे बुझि पड़ल जना बेटी वलाक घरक कोरो खींचि लेतइ। आ अहाँ कहै छियै की करतै?
सोमनाथ ः कते गोरे खैरबोनीवला सब छेलइ?
लालबाबू ः कोनो की गनलियै, मुदा चालीस-पचासक धत-पत छलै।
नूनू ः आइये खैरबोनीवला सबहक दालक छुटतै। तेहेन शैतानक चरखी पीपराधाटबला सब अछि जे आइये बुझि पड़तै। तहु मे एकटा तेहेन खूँखाड़ नेताक धसना पाटी अछि जे काजे यैह करै अए।
सोमनाथ ः (दुनू हाथ माथ पर लऽ) कोन जुग-जमाना चलि आयल से नहि जाइन।
नूनू ः बाबू, भगवान के कहिअनु जे दस बर्ख आरो औरदा दथि। तखन देखबै जे की सब होइ छै।
सोमनाथ ः तकर बाद की भेलइ?
लालबाबू ः सब कियो चाह-पान खा उत्तर मुहे सनकल विदा भेल। जखन ओ सब कनी चौक से आगू बढ़ल कि हमहू ससरि कऽ रतनाक चाहक दोकान पर आवि गेलहुँ। चाहक देकान पर नीक-नहाँति बैसलो ने रही कि सुरजा आयल। तामसे ओकर मुह तुरुछ जेँका भेल, मुदा किछु बजै नहि। पूछलियै जे सुरुज मन बड़ खिसिआइल छह। ओ कहलक, लालबाबू की कहब! दुनिया मे सब बेइमान भ गेल। ककरा के अप्पछन बुझत। से की? हमरा सार के बेटीक विआह मे करजा भ गेलइ। ने रुपैआ होइ छलै आ ने महाजन के दइ छलै। खिसिया कऽ महाजन लालीस क देलकैेेेेेेेे। हमर सारो चलाकी केलक। ओ अप्पइन सब जमीन ममिऔत भाइक नाम से फरजी कऽ देलक। ओहो साला तेहेत नेतघटू जे सब जमीन वेइमानी क दफानि लेलक। सैह, ओतइ से समाद आयल हेँ जे कनी आबि के फड़िया दिअ।
नूनू ः के केकरा पर बिसवास करत। एक त ओ वेचारा अप्पसन बुझि जमीन फरजी केलक आ ओ साला केहेन गइखोक भ गेल जे सबटा बेइमानी करै छै।
लालबाबू ः अखन ते अनकर बात सुनलियै। आब अपन बात सुनू ; चाह पीबि के जहाँ घर दिशि विदा भेलहुुुुँ कि आगूऐ से गंगाइ घेरि कऽ कहै लगल।
सोमनाथ ः (उत्सुिक भऽ) की, की गंगाइ कहै लगलह?
लालबाबू ः कहै लगल जे अहाँक मोहन (लालभाइ) हमर गरदनि काटि लेलनि। गरदनि कटैक नाम सुनि हम चौंकलहुँ। मन मे रंग-विरंगक बात अबै लगल। पूछलियै जे कने सरिया कऽ कहह। ओ कनैत कहै लगल जे पनरह कट्ठा खेत हुनका से नेने छलहुँ। दस हजार रुपैइये कट्ठा देने रहथि। जेकरा तीनि-चारि मास भेल हएत। खेत जोइत कऽ मकै केने छी। परसु खन मुनेसरा आबि कऽ कहलक जे गंगा भाइ मकई हमरा बाँटि दिहह। हम चौंकि गेलहुँ कहलियै जे जखन हम खेत कीनने छी ते तोरा किअए बाँटि दिअ। एते सुनिते ओ जेबी से दस्तालवेज निकालि कऽ देखा देलक। ओकर रजिष्ट्री हमरा से दू मास पहिलुके छै।
सोमनाथ ः (अकचकाइत) मोहनक त चाइल-प्रकृति ऐहेन नै छै।
नूनू ः लोकक किरदानी मुह-कान देखने वुझबै। बेटीक विआह जे ओते लाम-झाम से केने छलाह से कतऽ स। एक लाख रुपिया मे पटना से खाली टेन्टे अनने छलाह। कहाँदन पच्ची स हजार भनसिया नेने छलै, तइ पर स चारि सय बरिआतीक खेनइ-पीनाइ। तहू मे जते बरिआती खेलक, तइ से बेसी समान उगरिये गेलनि।
लालबाबू ः सात लाख रुपियो गनने छलाह।
सोमनाथ ः जे सात लाख रुपिया गनत, ओ ओहने लड़का आनत?
नूनू ः लड़का अनलनि कि धन। डेढ़ सय बीघा जमीन लड़काक माथ पर पड़ै छै।
सोमनाथ ः अच्छाि, छोड़ह दुनियादारीक गप। लालबावू के कर्मनाथक पत्र देखए देलहक।
नूनू ः कहाँ। नहि!
(नूनू लालबावूक हाथ मे चिट्ठी दइत। लालबावू चिट्ठी पढ़ै लगैत)
लालबावू ः दिन पनरहम छियै। हम चौके पर गुलटेनक पानक दोकान पर रही। वैह (गुलटेन) कहैत रहए जे मालिक आइ से पानक खिल्लीर मे एक रुपैआ बढ़ा देलियै। किऐक ते पानक सब मसल्ला महग भ गेल। तहि बीच एक गोटे साइकिल से आयल। साइकिल दोकानेक आगू मे ठाढ़ कऽ गुलटेन के पुछलकै, पोलीथीन अछि। गुलटेन मुसकिया देलकै। ओ कम्पननीक नाम पुछलकै। पानोबला मूड़ी डोला देलकै। किलो भरिक एकटा पोलीथिन बढ़ा देलकै। ओहो बटोही एकटा पचसटकही निकालि दोकानवला के द देलकै। ठाढ़े-ठाढ़ ओ बटोही गट दे पोलीथिन पीबि गेल। पीलाक बाद ओ बटोही दोकानदार के पुछलकै, कर्मनाथ बावूक घर ऐठाम से किमहर छनि। हमरेा कान ठाढ़ भेल।
सोमनाथ ः ओकरा किछु पुछबो केलहक?
लालबाबू ः नहि। अपने मने बजै लगल जे कर्मनाथ बावू आ हम्मकर भाइ सहाएव (जेठ भाइ) एक्केज ठीन रहै छथि। कमा कऽ हम्मकर भाइ सहाएव अमार लगा देलखिन। हमरा गाम मे एक्केा गोटे नहि अछि जे बेटीक विआह मे एते खर्च केने हैत।
नूनू ः अप्पनन कर्मनाथ भइया कि रुपैइया नइ रखने छथि। तखन ते हम सब दियाद छिअनि तेँ छिपौने छथि। पाइ रखैक लूरि सबके होइ छै। कियो ढ़ोल जेँका ढ़नढ़नाइत रहत आ कियो चुपचाप दबने रहत।
सोमनाथ ः पत्रक बात त सब बुझवे केलहक। आब चारु गोटे (बाप-माए, दुनू भाइ) विचारि लाय जे की करवह?
नूनू ः जखन अहाँ दुनू गोरे (बाप-माए) छीहे तखन हम सब की कहब।
सोमनाथ ः हमरा ते साप-छुछुनरिक पड़ि भ गेल अछि। ने, हँ कहैत बनै अए आ ने नै कहैत। हँ, कहैत अइ दुआरे नइ बनैत अछि, जे सत पूछह ते हमर मन कर्मनाथ पर स ओही दिन हटि गेल जइ दिन ओ अपना मने बिआह क लेलक। देखल लक्ष्मीे घुरि गेलीह। खैर, विआहो केलक ते केलक जे कमाइयो के ते एक्कोी पाइ कहियो नहिये देलक। मुदा छी ते बेटे। तहू मे बेटीक विआह करत। बेटी त सिर्फ माइये-बापक नहि होइत, ओ ते सबहक होइत।
आशा ः अहाँक अपने मन कखनो थीर नै रहै अए। कखनो किछु बजै छी त कखनो किछु। अहीं कहू जे जखैन करमू पान सौ रुपैया मनिआडर करैत रहै तखैन चिट्ठी मे लिखि कऽ पठौलियै जे पान सौ रुपैया से चुट्टीक बोहरि मूनब, आ आइ कहै छियै जे एक्केाह पाइ नै कहियो देलक। वेचारा नोकरी करै अए, जेैह दरमाहा रहतै तेही मे ने काज चलौत। अनका देखि के करमूओ के वहिना बुझवै से ओहिना ओहो घूस-पेंच लइत हुअए तखन ने। दुनिया मे सबहक चाइल एक्केु रंग होइ छै।
सोमनाथ ः औझुका लोकक भाँज अहीं पेबइ। ककरा रुपैआ बकछुहुल (अधला) लगै छै। एक बर लोक के दरमाहा रहै छै आ सात बर बाइली होइ छै।
लालबाबू ः माए गे, भइयेक एकटा संगी कमा के अमार लगा देलक हेँ। एक्केल काज दुनू गोटे केँ छनि।
आशा ः बौआ, एकटा बात तूही सब कहह जे जइ सम्पअतिक सुख तू सब करै छहक ओइ मे ओकर हिस्साा नै छै? ओकर हिस्सार ते अपने सब खाइ छियै। ओ कहियो किछो पूछबो केलकह हेँ। एतबो आखि मे पाइन नै छह। अगर जँ ओकरा बेटीक बिआह मे खरच नै जुमतै ते की ओ अइ सम्पात्ति मे से नइ लेत।
लालबाबू ः हमरो रहत तब ने देवइ। तू नै देखै छीही जे साले-साल खेत बेचै छी तखन कहुना के काज चलै अए। ने एकोटा पुरना गाछ गाछी मे रहल आ ने बाध मे खेत। ल द कऽ घरारी आ घरक आगू मे जे अछि ततबे रहल हेँ, सेहो अपना बुते खेती कएल होइते ने अछि। बटेदारो सब तेहेन अछि जे दूध महक डारही बाँटि के दइ अए। मुदा ओहू वेचारा सब के की कहबै, कोनो साल रौदी होइ छै ते कोनो साल दाही। लगतौ बूड़ि जाइत छै।
आशा ः से ते हमहूँ देखै छियै, मुदा रौदी-दाही दुआरे ककरो उचित कल्या ण रुइक जेतइ। बेटा-बेटीक वियाह सबके हेबे करतै। घर-दुआर बनबै पड़तै। धिया-पूताक पढ़ौनी, बर- बेमारी मे खरच हेवे करतै। तहू मे हम दस कुटूम परिवार वला छी। एकरा सबके छोरबहक से बनतह। परिवार किअए कहौल कै।
सोमनाथ ः एते राँउ-झाँउ करैक कोन काज छह बौआ। अन्हाबर घर सापे-साप। जखन कर्मनाथ आओत, विआहक चरचा करत, तखन ने पुछबै जे बौआ कोना काज करबह? ऐठाम ते देखते छहक जे जेकरो ने किछु रहै छै, बोइन-बुत्ता करै अए, ओहो एक-आध (एकाध) लाख रुपैआ बेटीक विआह मे खरच करै अए। जबकि अप्प न परिवार त से नहि छह। कतबो काटि-छाँटि के विआह करवह, तइओ दस लाख खरच हेबे करतह। तहू मे अपना सबहक समाज तेहेन गड़िबहू अछि जे एतवो नै बुझै अए जे जे माए-बाप बेटी के पढ़बै मे ओते खर्च करै अए ओकरा से रुपैआ कोना मंगबै। से लाज थेाड़े ककरो होइ छै। नमहर-नमहर भाषण क लेत, मुदा करै काल छुतहरो से छुतहर भ जाय अए। ऐहेन छुतहर समाज मे लोक कोना जीबत।
भीतर स ः दादी, दादी, कर्मनाथ कक्का ऐलखिन।
(आशा उठि कऽ भीतर जाइत। कर्मनाथक परिवार अवैक गल्लम-गुल)
नूनू ः बावू, हम दुनू भाइ ते छोट छी, तहू मे अहाँ जीबिते छी। तखन ते जे भैया कहता से क देबनि।
सोमनाथ ः (मूड़ी डोलबैत) एकटा बात हमरा मन मे उपकै अए।
नूनू ः से की?
सोमनाथ ः कहीं ऐहन ने हुअए जे कर्मनाथ अप्प न रुपैआ दाबि लिअए आ खेत बेचै ले कहथुन। जँ से हेतह ते हाथो तरक जेतह आ पाएरो तरक।
लालबावू ः तखन की करबै?
सोमनाथ ः की करवहक सें हमहीं कहबह। आब तोहूँ दुनू भाय धीगर-पुतगर भेलह, आबो जे नइ सोचबहक ते कहिया सोचबहक। हम त सहजहि अथवल भेलियह, चलन-पियारा छियह हम्म र आशा कते दिन करबह। जाधरि दाना-पानी लिखल अछि ताधरि मुह देखै छह। जहिया उठि जायत तहिया चलि जायब।
(कर्मनाथक प्रवेश। पिता कऽ प्रणाम करैत। लालबावू आ नूनू कर्मनाथ केँ प्रणाम करैत)
सोमनाथ ः (असिरवाद दइत) कल्याूण हुअ। वौआ, आब त हम्मछर हालत एत्त्ो रद्दी भ गेल जे मुइले बुझह। छह मास से डॉक्ट)र सब कुछ बड़ा देलक। जौ केर फाँटो खाइ छी, तेँ अखनो ठाढ़ छी। नै ते कहिया ने चलि गेल रहितौ। सैांसे देह जाँचि के डॉक्टफर कहलक जे रोग जड़ि से नै मेटाइत, तखन त पथ-पाइन करैत रहूँ। मन भेल जे सवा लाख महादेबक पूजा करा कऽ सेहो देखियै। मुदा आइ-काल्हिइ करै छी, ओहो अखैन धरि नहिये केलहुँ हेँ। सब परिवार आनन्दस से छह की ने?
कर्मनाथ ः हँ । सब आनन्द सऽ छी। दू मास पहिने हमरो परमोशन भेल। चम्पोा बी.ए. कऽ लेलक। बड़वढ़िया नम्बमर एलै। फुलेसर बी.ए. मे, आ जुही मैट्रिक मे पढ़ै अए।
सोमनाथ ः (हँसैत) परमोशन भेलह ते दरमहो बढ़ल हेतह की ने?
कर्मनाथ ः हँ। अढ़ाई सय टाका महीना बढ़ल। मुदा तइ से की जिनगी मे कोनो बदलाव आओत।
सोमनाथ ः (अकचकाइत) से की?
कर्मनाथ ः दरमाहा जे बनल छै अेा परिवार आ पदक स्ततरक हिसाब स बनल छै। तहू मे इनकम-टेक्सा ओकरा (दरमाहा) नियंत्रित केने रहै छै। जहिना दरमाहा बढ़ै छै। तहिना इनकम-टैक्से सेहो बढ़ि जाइ छै। ततबे नहि, मकान भाड़ा, पाइन बिजलीक खर्च सब बढ़ि जाइ छै। घुमा-फिरा क कहुना परिवार चलवैत जीवि लइ छी। तीनि-तीनि टा विद्‌यार्थीक खर्च, शुरुहे से अपनो पढ़ै-लिखैक अभ्या स बनि गेल अछि, तोहू मे खर्च होइते अछि। तइ पर स जइ समाज मे रहै छी ओहू मे खर्च होइते अछि। इ सब खर्च त दरमहे मे से होइ अए। महीना लगैत-लगैत हाथ साफ भ जाइ अए। साल कहियौ कि मास, एक्को दिन ओहन नइ बँचै अए जइ दिन ककरो नै ककरो, किछु ने किछु बाकी नइ रहैत अछि। तखन ते कहुना जीबि लइ छी।
सोमनाथ ः तोरो से छोट-छोट नोकरी करैवला सब के देखै छियै जे कमा कऽ बुर्ज क लइत अछि। से कोना कऽ लइत अछि?
कर्मनाथ ः (मुस्की दैत) जहिना शरीर मे रोग होइत अछि तहिना मनो मे रोग होइत अछि। जे बात अहाँ कहलौ ओ मनक रोग छी। मुदा सबहक शरीर वा मन रोगाइले होइत अछि, एहनो बात त नहि अछि।
लालबाबू ः भैया, पछवारि गामक एक गोटे छथि, भरिसक अहाँ चिन्हातो हेबनि, जे कमा कऽ अमार लगा लेलनि अछि।
कर्मनाथ ः हुनका हमहुँ चिन्है त छिअनि। हमरा से एक बैच पाछु छथि। पहिने बेसीकाल डेरा पर अबैत छलाह आ हमहूँ हुनका ऐठाम जाइ छलौ, मुदा धीरे-धीरे संबंध कमैत गेल। आब ने हम हुनका ऐठाम जाइ छी आ ने ओ हमरा ऐठाम अबैत छथि। रस्ते--पेरे जँ कतौ भेटि भऽ गेलाह ते भेटि गेलाह।
लालबाबू ः भैया, अहाँ जे चम्पाम विआहक संबंध मे चिट्ठी लिखने छलौ से त आब अपनहुँ आबिये गेलहुँ। जहिना चम्पाअ अहाँक बेटी छी तहिना त हमरो भतीजिये छी। जना जे करब तइ मे हम सब कोनो अड़ंगा करब।
कर्मनाथ ः अखन ते हमहूँ विआहेक उदेस से एलहुँ, तेँ दोसर तेसर गप करब नीक नइ हैत। मुदा एकटा बात जरुर कहबह जे समय बहुत तेजी स बदलि रहल अछि, तेँ समयक संग अपनो केँ बदलै पड़तह। जँ से नइ बदलवह ते पाओल जेबह। बाबू बूढ़ भेलखुन, कते दिन छथुन तेकर कोनो ठीक नहि। मुदा तू दुनू भाइ त जवान छह। परिवार बढ़बे करतह, घटतह त नहि। तेँ खरचो बढ़बे करतह। इ त तोरा अपने पुरबै पड़तह। अखन छोट परिवार छह तखन त खेत बिकाइत छह, आ जखन खरचा बढ़तह तखन कोना पुरेबहक।
लालबाबू ः हँ, इ त ठीके कहलहुँ। मुदा नोकरियो त अपना हाथ मे नहि अछि। तखन की करबै?
कर्मनाथ ः नोकरिये के सीमा-नांगरि छै जे जे करत ओकर गुजर चलतै आ जे नै करत ओकर गुजर नै चलतै। बहुत रास काज सव अछि, जेकरा केला से धनक उपारजन होइत अछि। जे करैवला अछि ओ त नोकरियो छोड़ि अपन काज ठाढ़ कऽ करैत अछि।
लालबावू ः (मूड़ी डोलवैत) ठीके कहै छी भैया, पाछु घुरि क तकै छी ते बुझि पड़ै अए जे अखन धरिक समय फुर्र-फाँइ मे बीति गेल। आब बुझि पड़ै अए जे जीवैक लेल सबके मेहनत करै पड़तैक।
कर्मनाथ ः निचेन मे कोनो दिन नीक जेँका बुझा देबह। अखन हमहूँ काजे मे पड़ल छी तेँ पहिने एहि काज के निपटबैक अछि।
नूनू ः भैया, बेटीक विआह परिवारक सबसँ भारी काज भऽ गेल अछि। तोहू मे जेकरा पाइ-कौड़ीक अभाव छै ओकर त इज्जित-आवरु बँचब कठिन भ गेल अछि। सबसँ लाजिमी बात समाज मे इ अछि जे बेटी केहनो पढ़ल-लिखल हुअए, शील,गुण,सौन्द़र्य स पूर्ण किऐक ने हुअए, मुदा ओकर कोनो मोल नहि अछि।
कर्मनाथ ः (दृढ़ता स) बौआ, चम्पाहक विवाह हेबे करतै। इ हमरा अपन ब्रह्‌म कहि रहल अछि। जहाँ धरि दहेजक सवाल अछि, ओ हम एक्कोु पाइ नइ देवइ। हँ, जे बेबहारिक चलनि दछि ओ त पुरबै पड़त।
नूनू ः दहेज नइ देबइ ते काज (विवाह) हैब कटिन अछि।
कर्मनाथ ः जइ समाज मे तू दहेजक चलनि देखै छहक, ओ चुतिया समाज अछि। अेाहि समाज पर हम थूक फेकइ छी। मुदा वैह टा समाज नहि अछि। अेाहि स (समाज) हटि दोसरो समाज अछि, जे मनुक्खनक समाज छी। जइ समाज मे कियो ककरो अधलाह नहि करैत अछि, आ ने ककरो अधलाह मन मे अनैत अछि। चम्पाकक विआह ओहि समाज मे हेतइ। तेँ, हमरा दहेजक चिन्ताा नइ अछि। तखन ते सब दिन समाज स हटि कऽ रहलहुँ , जहि स अनभुआर थेाड़े जरुर छी।

यय
तेसर अंक
(विकास क दरवज्जाह। प्ला स्टिरकक डोरी स कुरसी बुनैत)
श्रीचन ः (भीतरे स) विकास भाइ। यौ, विकास भाइ।
(कुरसी बीनब छोड़ि। चकोना होइत, चारु भाग विकास तकै लगैत)
विकास ः के छियह हौ। (फेरि चारु भर तकै लगैत)
श्रीचन ः (प्रवेश करैत। कान्हभ पर कोदरि, हाथ मे खुरपी) बिकास भाइ। यौ विकास भाइ।
विकास ः श्रीचन। किअए ऐना अपसियाँत होइ छह, की भ्‍ेालह हेँ?
श्रीचन ः नाश भ गेल। गरदनि कटि गेल।
विकास ः (अकचकाइत) की नाश भेलह? मन असथिर क कऽ बाजह।
श्रीचन ः अइ से एकटा बेटा मरि जाइत, से नीक। मुदा भरल-पुरल चास नाश भेने त दू मासक मेहनत बुइर गेल।
विकास ः ऐना किअए मुह से अधला बात निकालै छह।
(कोदरि, खुरपी रखि। दुनू हाथ माथ पर लइत, कनैक मुद्रा मे श्रीचन)
श्रीचन ः भाइ की कहब। भगवानो बड़ धड़कट-बेईमान छथि। किअए लोक अपना कऽ हुनकर सनतान वुझैत अछि। जखैन ओ भगवान छथि ते सबपर एक रंग नजरि राखथि। से कहाँ रखै छथि। हुनको मे दूजा-भाव छनि। ककरो पर खुशी भऽ कऽ खूब दइ छथिन आ ककरो भेातहा कचिया (हाँसू) से गरदनि हलालि दइ छथिन।
विकास ः तेना ने तू बजै छह जे हम किछु बुझवे ने करै छिअह। कने खोलि कऽ साफ-साफ बाजह।
श्रीचन ः की खोइल कऽ कहब भाइ! अहाँ त सबटा बुझबे करै छियै, तइयो अनठा कऽ पूछै छी।
विकास ः अनठा के कहाँ पुछै छिअह। तेना ने तू कहै छह जे हम अखनो धरि बौआइते छी। उनटे तोंहि कहै छह जे सबटा अहाँ बुझिते छियै। कनी फरिछा के कहह।
श्रीचन ः अहाँ ते जनिते छी जे हम ने गिरहत छी आ ने बोनिहर। चौदह-पनरह कट्ठा खेत अछि, तेही मे खेतियो करै छी आ अपना काज नै रहै अए ते बोइनो करै जाइ छी। पान-सात कट्ठा तरकारीक खेती करै छी जइ से अपनो खाइ छी आ दू-चारि पाइ के बेचिओ लइ छी। चारि कट्ठा टमाटरक खेती केने छलौ, से सबटा गलि गेल। जना कियो चोरा कऽ नोन छीटि देने हुअए, तहिना।
विकास ः टमाटर गलि गेलह ते हमरा की कहै छह?
श्रीचन ः चलु , कनी मधमन्नीन चलु।
विकास ः किअए?
श्रीचन ः ओइ बीआवला कम्पहनी पर लालीस करबै। अपने ते कोट-कचहरीक पेंच-पाँच बुझै नै छियै, तेँ अहाँ के संगे ल जायब। ओइ बीआवला के सिखा देवइ जे मरदक पल्लाक केहेन होइ छै। जाबे ओकरा जहल मे नइ ढ़ुकाएव ताबे हम्मओर मन असथिर नै हैत। जेँ चारि कट्ठा टमाटर गेल तेँ दू हजार रुपैआ आरो जा।
विकास ः कनी सरिया के सब बात कहह।
श्रीचन ः दू मास पहिलुका गप छी। जतराक (यात्राक) परात झंझारपुर हाट बीआ कीनै ले गेलौ। ओना अप्पदन चिन्ह रबो दोकान अछि। मुदा केान दुरमतिया कपार पर चढ़ि गेल जे ओइ दोकान नइ जा हाटे दिशि बढ़ि गेलौ।
विकास ः अप्पनन चिन्हिरबा दोकान किअए ने गेलह?

श्रीचन ः की कहब भाइ, हाट से कनी पछुऐ रही कि बड़का भेामहा (होरन) से बीआ-बाइलिक परचार होइत सुनलियै। खूब जोर-जोर से अमेरिकन कम्पानीक परचार करैत रहै। हमरो जना डोरी लगि गेल। जहिना अजगर सापक आखि पर आखि पड़ला से होइत, तहिना भोमहाक अवाज हमरा मन के पकड़ि लेलक। आन कोनो चीज देखबे ने करियै। जाइत-जाइत हमहूँ ओतए पहूँच गेलहुँ। एकटा खूब नमहर मोटर गाड़ीक उपर मे दू टा भेामहा, दुनू भाग घुमा के लगौने रहै। गाड़ीक बगल मे बीआ-बाइलिक खूब नमहर दोकान सेहो लगौने रहै। ओहि दोकानक चारु भर लोक सब वैसि के बीआक पौकेट सब देखैत रहै। दू गोटे दुनू भाग बैसि कऽ बीआ बेचैत रहै। पाँच गराम से ल कऽ किलो भरि-भरिक पौकेट सब रहै। पौकेट सब पर, जइ चीजक बीआ रहै, खूब रंगर फोटो सब बनल रहै।
विकास ः अमेरिकन कम्परनी रहै, से तू कन्नार बुझलहक?
श्रीचन ः भेामहो से परचार करैत रहै आ दोकानदारो कहैत रहै।
विकास ः देखै मे दोकानदार केहेन रहए?
श्रीचन ः ऐँह, की कहब भाइ; तीनू गोटे एक्केब रंग देखै मे लगे। घोरहा रंग, पितरिया आखि आ मकैइया केश तीनूक रहै।
विकास ः (छुव्दर होइत) घोरहा रंग, पितरिया आखि आ मकैया केश......।
श्रीचन ः अहाँ नै वुझलियै भाइ। तीनू एक्के रंग घोर जेँका (छालही मोहि कऽ घोर बनैत) उज्जचर दप-दप। तेँ कहलौ घोरहा रंग। अपना सबहक आखि, केहेन सुन्दहर कारी अछि आ ओहि तीनूक आखि पित्तरि जेँका देखै मे लगइ। तेँ कहलौ पितरिया आखि। आ जहिना मकै बाइलिक उपर मे जे रुँइयाँ जेँका रहै छै तहिना तीनूक केश देखै मे लगई। अपना सबहक केश केहेन सुन्देर कारी अछि से ओकरा सवहक नइ रहै।
विकास ः (हँसैत) तीनू मौगी रहै कि पुरुख?
श्रीचन ः यौ भाइ, इ हम ठीक-ठीक नइ कहब। किऐक ते तीनूक मुहो-कान आ उमेरो एक्केन रंग बुझि पड़इ। मोछ-दारही रहितइ तखैन ने बुझितियै। से तीनू मे ककरो ने रहै। रहबे ने करै आ कि कटौने रहे, से नहि कहि।
विकास ःमोछ-दारही ने रहै, मुदा माथोक केश से नइ वुझलहक?
श्रीचन ः की कहब भाइ, अपना सबहक केश केहेन मरदनमा अछि। स्त्रीिगणक केश नमहर होइ छै, से ओकरा सबहक नइ रहै।
विकास ः तब केहेन रहै?
श्रीचन ः ने मौगियाही केश रहै आ ने मरदनमा। ने बाबरी सीटे जेागर रहै आ जुट्टी गुहै जोकर। खोपाक त कोनो बाते नहि। ओहिना सोझे पाछु मुहे उनटौने रहै। जे लटकि के गरदनिये धरि रहै।
विकास ः सिनुरो लगौने रहै कि नहि?
श्रीचन ः ओह। एक्कोौ गोटे सिनुर नइ लगौने रहै।
विकास ः आखि केहेन रहै?
श्रीचन ः कहलौ ते पित्तरि जेँका बुझि पड़ै। मुदा एक गोरेक आखि बिलाइ जेँका चकोना होइत रहै।
विकास ः (मुस्कीँ दइत) आँइ हौ श्रीचन, तोँहू जीवनी (पारखी) भ कऽ अनाड़ी भ गेलह, जे मौगी रहै कि पुरुख से नइ वुझि सकलह।
श्रीचन ः यौ भाइ की कहब। एक्के रंगक पेन्टो आ अंगो पहिरने रहै। खाली बोलीक अवाज मे कनी फड़क बुझि पड़ै। दू गोरेक अबाज कनी मोट (भारी) बुझि पड़े आ एक गोरेक मेही।
विकास ः जेकर अबाज मेही रहए ओ केहेन रहए?
श्रीचन ः अरे बाप रे, बिलाइक आखि जेँका ओकर आखि चमकबो करै आ नचबो करै। मुदा तते हाँइ-हाँइ बजइ जे बुझैक कोन बात, सरिया के सुनबो ने करियै। हम ते खाली ओकरे मुहे दिशि देखियै।
विकास ः (हँसि) उ तोरा दिस देखह कि अनका दिस।
श्रीचन ः अइ भाग से ओइ भाग जे आखि नचबै, तखैन हमरो देखए मुदा बेसी ओ पाइयेवला सब दिशि देखए। हम ते तीनिये सइअ रुपैआ ल कऽ गेल रही। सेहो ढ़ट्ठा मे रखने रही। सोचने रही जे एक सइ मे बीआ कीनि लेब आ दू सइ के घरक चीज-बौस कीनि लेब। किअए ते लोक थेाड़े सब दिन हाट-बजार जाइ अए।
विकास ः बीआ जे कीनलहक तेकर रसीदो देलकह।
श्रीचन ः हँ। (जेबी से रसीद आ बीआक खाली डिब्वा। निकालि विकास दिशि बढ़बैत) हे, यैह दुनू छी।
विकास ः (रसीदो आ पौकेटो मे लिखल मिलबैत) ऐँह, ओ त सोलहन्नीद ठकि लेलकह। रसीद मे किछु लिखल छह आ पैकेट मे किछु। तहू मे तू कहै छह जे अमेरिकन कम्प नीक परचार करैत छलैक। तीनू तीन रंगक भ जाइ छह।
श्रीचन ः (निराश होइत) तब ते लालीस नइ हेतइ?
विकास ः नै। अगर अइ सबूत पर केस करबहक ते अपने फँसि जेबह। उनटे जहल जाइ पड़तह।
श्रीचन ः हमरे तीन सय रुपैइयौ ठकि लेलक आ हमही जहलो जायब।
विकास ः कानून के अपन रास्ताै छै। जना कहै छह तना जे तीनूक मिलान रहितह ते केशो होइतह। से त नहि छह।
श्रीचन ः तब की करब?
विकास ः नीक हेतह जे भरमे-सरम चुपे रहि जाह। नहि ते अनेरे खरचो हेतह, खेतियो बुड़लह आ जहलो जेबह।
श्रीचन ः (गुम्म भ मूड़ी डोलवैत) भाइ अहाँक बात ते हम सब दिन मानैत एलहुँ। तेँ मानि लइ छी। मुदा हमर मन जरल अछि, जाबे ओकरा या त दस टा गारि नहि पढ़बै, वा दस थापर नै मारबै वा जहल नै ढ़ुकेबै, ताबे हमर मन शान्तग नै हैत।
विकास ः अपना गलती से सब कुछ भेलह। कान पकड़ि लाय जे ककरो लल्लोर-चप्पोब मे नइ पड़ब। एक पर एक ठक दुनिया मे अछि। अच्छान, एकटा बात कहह ते ऐना अल्लोग-बल्लमग मे ठका कोना गेलह?
श्रीचन ः (कनै-कनै सन) भाइ, वेगरताक मारल मन बौआ गेल। ओना ते दू टा बेटी अछि, मुदा जेठकी बेटीक विआह तेसरे साल से करैक विचार अछि। तेसराँ बाढ़ि मे सब दहा गेल, तेँ नइ कए भेल। पौरुका रौदिये भ गेल, तेँ ने भेल। अइ बेर सोचने छेलौ जे जना-तना वेटीक विआह कइये लेब, मुदा सेहो आशा टुटि गेल। देखते छियै जे हमरा सब के बैंक से करजो ने भेटइ अए। गामक महाजनो सब हाथ-पाएर समेटि लेलक। तेँ सोचने छलौ जे जना-तना खेते मे खूब मेहनत कऽ बेटीक विआह कऽ लेब। सेहो ने भेल। आब किछु फुड़वे ने करै अए जे की करब।
विकास ः श्रीचन, आशा नइ तोड़ह। जखने गरीब भेलह तखने चारु दिस से बेगरता खिहारबे करतह। मुदा की करबहक। नइ अइ साल बेटीक विआह हेतइ त अगिला साल करिहह।
श्रीचन ः भाइ, हैत त सैह। मुदा गामक स्त्रीसगण सब कुट्टी-चाल करै अए।
विकास ः ओहिना स्त्रीइगण सब बजै अए। ककरो बजै मे किछु लगै छै। साहस करह।
श्रीचन ः भाइ, अपन मन त, समय-साल देखि कऽ, मानि जाइत अछि, मुदा घरवाली सदिखन कनिते रहै अए। ओकरा जे कनैत देखै छियै ते अपनो छाती दहलि जाइ अए।
विकास ः से ते होइते हेतह। एक बेरि तमाकू खाह।
श्रीचन ः (जेबी से तमाकुल-चून निकालि, तमाकुल चुनबै लगैत) एकटा बात ते पुछबे ने केलहुँ। आब मन पड़ल। ओ सब (अमेरिकन) जे ओहन उज्ज।र दप-दप लगै छले से ओकरा सबहक रंगे ओहिना होइ छै कि चरक फुटल छलै। किऐक ते अपनो गाम मे एक गोरे ओहने अछि। जेकरा सब चरकाहा कहै छै।
विकास ः जइ मुलुक मे ओ सब रहै अए, ओइठाम बारहो मास ठंढ़े रहै छै। अपना सब जेँका गरमी नै होइ छै, तेँ ओकरा सबहक रंगे ओहन भ जाइ छै।
(तमाकु खा श्रीचन विदा हुअए लगैत)
विकास ः एकटा बात सुनि लाय श्रीचन। जाबे तक अपना ऐठामक किसान नीक बीआ, नीक खाद, नीक दवाई (कीटनाशक) बनवैक लूरि अपने नइ सीखि लेत, ताबे तक एहिना ठक सब आबि-आबि ठकैत रहतै। बजैत दुख होइ अए जे अपन देश किसानक देश छी। मुदा किसानक जिनगी मुरदो स बत्तर अछि। ने खेती करैक लूरि किसान के छैक आ ने खेतीक उपकरण छै। ने पटवैक कोनो जोगार छै। धार-धुरक अप्पनन इलाका रहने खेत चौरसो ने अछि। एहना स्थि ति मे लोक कोना जीवित रहत?
(श्रीचन जाइत अछि। कर्मनाथ प्रवेश। विकास के प्रणाम करैत)
विकास ः आ-हा-हा, बाउ कर्मनाथ। बहुत दिनक बाद तोरा स भेटि भेल। कहिया गाम ऐलह। सपरिवार आनन्दि स रहै छह की ने। बच्चार सबहक कुशल कहह?
कर्मनाथ ः सब आनन्दि सऽ छी। जेठकी बच्चिनया बी.ए. पास केलक। बच्चाा कओलेज मे आ छोटकी बच्चिबया हाइ स्कूछल मे पढ़ैत अछि। परसु गाम एलहुँ
विकास ः बेटी त विआहै जोकर भ गेल हेतह?
कर्मनाथ ः हँ। ओइह सेाचि दू मासक छुट्टी ल कऽ एलहुँ। मुदा ऐठाम जे हवा-बिहाड़ि देखै छी तइ से मने घबड़ाइत अछि। आन नोकरिया जेँका ते हम्मऐर जिनगी नहि अछि।
विकास ः बाउ कर्मनाथ, अखन धरि तोरा बच्चेे जेँका वुझैत एलियह आ आगुओ बुझैत रहबह। भने कहलह जे दहेजक बिहाड़ि समाज मे उठि गेल अछि। अखन धरि त कहियो कोनो काज केलह नहि, तेँ मन घबड़ाएव उचिते छह। मुदा एकटा बात वुझए पड़तह जे हवा-बिहाड़िक जन्मा जहिना समाज मे उठैत अछि तहिना समाजे ओकरा रोकबो करैत अछि। अज्ञानी, लोभी आ समाज विरोधी लोक ओकरा बढ़वैत अछि। मुदा एहि स समझदार लोक थेाड़े धवड़ाई अए। जहिना एक्केा खेत मे बगुरोक गाछ रहैत अछि आ नीक-नीक फलोक गाछ रहैत अछि, तहिना समाजो मे होइत अछि। नीक स नीक लोक आ अधलाह स अधलाह लोक एक्केए समाज मे रहैत अछि। हँ, इ बात जरुर अछि जे कखनो अधलाह लोक नीक लोक केँ पछाड़ैत अछि त कखनो नीक लोक अधलाह लोक के पछाड़ैत अछि।
कर्मनाथ ः जँ एहिना होइत रहत ते समाज नीक कोना बनत?
विकास ः अखन धरिक जे इतिहास अछि, ओहि आधार पर नीक लोक पछड़ैत रहल अछि। किऐक त जहि शक्तििक हाथ मे समाज सत्ता रहल ओ धूर्त्त, बेइमान आ शेाषकक हाथ मे रहल। तेँ ओहि शक्ति क संग इमानदार, मेहनती आ भलमानुस लोक केँ संगठित भ मुकावला करै पड़तैक। जहि स उठा-पटक हेबे करतै मुदा अंतिम विजय इमानदारेक होएत। किऐक त ऐहेन लोकक संख्योस बेसी अछि आ काजो नीक अछि।
कर्मनाथ ः तखन फेरि ऐना किअए होइ छै?
विकास ः (मुस्कीए दइत) कम संख्यार मे धूर्त, वेइमान के रहितहुँ , बुद्धि आ सम्पैति ओकरे हाथ मे छै। जे दुनू हथियारक रुप मे काज करै छै। कमजोर, मुर्ख अधिक रहितहुँ अखन धरि पछड़ैत रहल अछि।
कर्मनाथ ः एहि बात के अखन छोड़़ूँ। हम जहि काज से अहाँ लग एलहुँ तहि पर कने विचार कएल जाय। अपने सिर्फ गुरुऐ (शिक्षक) नहि समाज निर्माता सेहो छी। हम्ममर बेटी आइक मनुक्खए छी, नहि कि घसल-पिटल परम्पतराक। तेँ, हमरा मन मे अटूट बिसबास अछि जे हमरा बेटीक विआह हँसी-खुशी स हेबे करत। मुदा हम त समाज स सब दिन अलग रहलहुँ तेँ, कने चिन्ताश मन मे जरुर अछि।
विकास ः बौआ, तोरा पिता स हमरा मतभेद किऐक अछि? से पहिने सुनि लाय। तोहर परबाबा जे रहथुन अेा नामी-गामी लोक रहथि। समाजो अनुकूले रहनि आ समयो तेहने रहै। जहिना हुनका धन-सम्पगति रहनि तहिना मानो-प्रतिष्ठाे। जखन ओ मुइलाह ते मास दिन धरि सराधक भोज होइते रहलै। हमहूँ ताबे ढ़रवे रही, मुदा सब कुछ मन अछि। तीस गाम नति के खुऔल गेल रहै। एक-एक गाम के एक-एक दिन। गामक (सब जाइतिक) ओहि काज मे जुटल रहै। किऐक त काजो भारी रहै। खेबाक सब वस्तुसक ओरियान स ल कऽ नेात पठौनइ आ खुऔनाइ धरिक काज रहै।
कर्मनाथ ः (मुस्कीआ दइत) इ बात हमरा नइ बुझल छल। भने अहाँ कहि देलहुँ।
विकास ः करीब पचास-पचपन बर्ख पहिलुका बात छी। ताधरि गाम मे दोसर तरहक विचार चलैत छलैक। अखुनका जेँका लोक मे दूजा-भाब नै छलैक। ओहि समय लोकक जिनगियो छोट छलैक। तेकर बाद, करीब पेंइतीस-चालीस बर्ख पहिने, तोहर बाबा मरलखुन। हमहुँ शिक्षक भऽ गेल रही। समाज मे विचारो बदलै लगल छलै। तोहर पिताजी (सोमनाथ) भोजक लेल समाज के बैसौलनि। हमहूँ छलौ। ओ (सोमनाथ) कहलखिन जे नअ गामक जे सौजनिया अछि, तते ल कऽ भोज करब। किछु गोटे समर्थनो केलकनि। मुदा किछु गोटे विरोधो केलकनि, जइ मे हमहूँ छलौ।
कर्मनाथ ः विरोध किअए केलिएनि?
विकास ः (हँसैत) हमरा सबहक (विरोध केनिहरक) विचार छल जे कोनो भोज मे समाजक लोक के छोड़ि (आन जाइतिक) अनगोंआ के न्यो त द खुआएव उचित नहि। जते खर्च कऽ भोज करै चाहै छी ओ गौंउये केँ न्यो त द कऽ खुआउ। गामक कोनो जाइत किऐक ने हुअए, मुदा छी त ओ समाज। समाजक काज सदिखन लोक (समाज) के होइत छैक। कोनो बेर बेगरता मे समाजे ठाढ़ होइत अछि। अनगौंआ ते सिर्फ भोजे खाइत अछि आ खुआबैत अछि। तेँ इ काज अधलाह छी।
कर्मनाथ ः (मुड़ी डोलबैत) इ त वैचारिक मतभेद भेल।
विकास ः सिर्फ वैचारिके मतभेद नहि, एकरा पाछू वास्तेविकतो छैक। बेटा-बेटीक विआह लोक आन गाम मे करैत अछि। जहि स ओ समाज नहि, कुटुम्बा होइत अछि। जनिका संग नोत-पिहान चलिते अछि। मुदा आन गामक जाइत क समाज मानि खाइ-पीवैक वेवहार बनाएव, उचित नहि। हँ, उचित तखन जखन समाजक सब जाइत कऽ खुआ, आनो गामक लोक के खुआबी। मुदा समाज त जीबैत स ल कऽ मृत्युत धरि संग रहैवला होइत। तेँ, आन गामक जाइत स पैध अप्पमन समाज होइत अछि। जना कतौ आगि लगै छै ते समाजेक लोक (चाहे कोनो जाइतिक किऐक ने हुअए) आबि कऽ आगि मिझबैत अछि। तहिना कियो बीमार पड़ैत अछि, वा कोनो आफत-असमानी होइत छैक त समाजे आगू अबैत अछि। अही ल कऽ दुनू गोटेक बीच मतभेद अछि। मतभेदे नहि अछि, एक जाइत रहनहुँ खेनाइयो-पीनाइ बन्नब अछि। हमरो समाज अलग अछि आ हुनकेा अलग छनि। सिर्फ एक गाम मे छी तेँ गौँआ छिआह।
कर्मनाथ ः तखन त गाम दू समाज मे बँटि गेल अछि।
विकास ः (दृढ़ता स) निश्चिँत। निश्चिोत दू भाग मे बँटल अछि। एक-समाजक लोक गौँआ स जुड़ल अछि आ समाजक लोक अनगैाँवा जाइत सब स जुड़ल अछि। तेँ अहाँ ऐठाम जे कोनेा भोज होइ अए ते हम खाइ ले नइ जाइ छी। आ ने अहाँक परिवार हमरा ऐठाम अबैत छथि।
कर्मनाथ ः इ त जवर्दस्त कारण अछि।
विकास ः हमरा संग ऐहेन समस्यात अछि जे ज अहाँ ऐठाम खाइ ले जायब त अप्प न वैचारिक समाज टुटि जायत। जँ बैचारिक समाज टुटि जाइत त फेरि ओहिना विना जड़ि-पालोक समाज मे मिझ्‌र भ जायब। जहि समाज मे बलात्काओर के धिया-पूताक खेल बुझल जाइत अछि। गारि क मजाक बुझल जाइत अछि आ आिथ्र्बाक शोषण (धनक बेइमानी) के परम्पाराक चलनि वुझल जाइत अछि।
कर्मनाथ ः (मूड़ी डोलबैत) हँ, इ त होइत अछि।
विकास ः आइ धरिक जिनगी मे हम दुइये टा काजक संकल्पा कऽ करैत एलहुँ। आ अखनो करैत छी। पहिल, समाजक भेाज आ दोसर, बेटा-बेटीक विआह मे दहेज, ने लेब आ न देब। जे सिर्फ हमही टा नहि, अप्प न जे समाजक लोक अछि, ओ सब करैत अछि। अही दुनू काजे तोरा परिवार स हमरा मनमुटाव बुझहक वा पार्टी बुझहक वा दू समाज वुझहक। अच्छाक, आब अपना काज पर आबह। तू ते अफसर छह, तखन किअए अफसरक समाज छोड़ि गामक समाज मे कुटुमैती करए चाहै छह?
कर्मनाथ ः अफसरक समाज कहियौ वा नोकरियाक समाज, ओ अअस्थाकयी (अस्थाकयी) होइत अछि। जहिना रबड़क बैलून मे जाधरि हवा रहैत ताधरि अकास मे उड़ैत, मुदा फुटितहि कतौ जा कऽ खसि पड़ैत। तहिना नोकरियोक जिनगी होइत। जाधरि नोकरी रहैत, पावर मे रहैत आ नोकरी समाप्तर होइतहि जिनगी कत्तऽ स कत्तऽ चलि जाइत। मुदा सामाजिक जिनगी से नहि होइत। स्थानयी होइत। सामाजिक जिनगी बहुआयामी होइत। जहिना गनगुआरि कऽ सैकड़ो पैर होइत, जहि मे से एकाध टुटनहुँ कोनो अन्तजर नहि होइत, तहिना। एकर अतिरिक्तोड कारण सब अछि।
विकास ः आरो की कारण अछि?
कर्मनाथ ः नोकरी करैवला सिर्फ एक्केछ इलाकाक नहि हेाइत। जहि स जिनगीक ऐहन अनेको काज अछि जहि मे एकरुपता नहि हेाइत। मुदा सामाजिक जिनगी ओही स विपरीत होइत। जाधरि हमरो नोकरी अछि ताधरि हमहुँ घर स बाहर छी, मुदा नोकरी समाप्त होइतहि गाम चलि आयब।
विकास ः बहुत बढ़ियाँ विचार छह। आइ जे देखै छहक जे गाम घरक दशा दिनो-दिन पछुआइल जा रहल अछि, एकर की कारण अछि? एकर कारण अछि गामक पढ़ल-लिखल लोक केँ गाम छोड़ि कऽ चलि जायब। जाधरि गामक सम्पजत्ति मे बुइधिक उपयोग नै हैत, ताधरि गामक सम्प़त्ति नीचे मुहे ससरैत जायत। ओकरा (गामक सम्पीत्ति क) आगू मुहे बढ़वैक लेल नव ज्ञानक जरुरत अछि। जखने नव ज्ञान क उपयोग गाम मे हुअए लगत तखने नव तकनीक, नव ढ़ंग (लूरि) आबि जायत। नव तकनीक आ नव ढ़ंग नव मनुष्यन पैदा करत। नव मनुष्यं पैदा होइतहि नव समाज बनि कऽ ठाढ़ भ जायत। जे समयक अनुकूल चलै लगत।
कर्मनाथ ः(मूड़ी डोलबैत) हूँ-उ-उ।
विकास ः एतबे नहि, अपना इलाकाक (मिथिलांचलक) जे अमूल्य व्य वहार, अमूल्यद क्रिया-कलाप अछि, ओ धीरे-धीरे घटि रहल अछि। आ ऐहेन बुझि पड़ि रहल अछि जे घटैत-घटैत मेटा जायत। लोकक जीवन शैली बदलि रहल अछि, जहि स सामाजिक संबंध, कला संस्कृेति सब कुछ प्रभावित भ रहल अछि। नान्हित-नान्हिध टा काज, नान्हि -नान्हिद टा बात मे, लोक तेना ने दिन-राति ओझराइल रहैत अछि जे आगू मुहे ससरैक कोन बात जे पाछुऐ मुहे ढ़रैक रहल अछि। जहि स सदिखन बातावरण दूषित भेल रहैत अछि। अनेरो लोक सदिखन चिन्तार आ तनाव मे पड़ल रहैत अछि।
कर्मनाथ ः एहि दिशा मे समाजक बुद्धिजीवी लोकनि केँ आगू अबै पड़तनि।
विकास ः निश्चिनत। कोनो समाज के आगू बढ़वैक लेल वा गलत दिशा स सही दिशा दिशि ल जाइक लेल वुद्धिजीविये अगुआइ कऽ सकैत छथि। जेकरा अपने दिशाक बोध नहि छैक अेा आगू मुहे कोना बढ़ि सकैत अछि। ओना पढ़लो-लिखल सभकेँ दिशाक बोध होइते अछि, सेहो बात नहि। जना कहल गेल अछि जे जहि पोथी कऽ पढ़ि लोक ज्ञान अर्जित करैत अछि वैह पोथी लोक केँ अज्ञानोक दिशा मे बढ़वैत अछि।
कर्मनाथ ः (गंभीर होइत) अपने जे बात कहि रहल छी, ओहि दिशि हमरो धियान अखन धरि नहि गेल छल।
विकास ः (मुस्कुभराइत) अखन धरि तोहर धियान, एक वेवस्थाशक बीच रहलह तेँ नीक-अधला बेरबैक (फुटबैक) ज्ञान नहि भेलह। किऐक त व्यलवस्था् वेवहारक माघ्यबम स चलैत अछि।
कर्मनाथ ः (मूड़ी डोलवैत) तखन ते नीक-अधला वुझैक लेल मन स नहि विवेक स कयल जा सकैत अछि।
विकास ः निश्चिसत। एहि मे एक्को पाइ संदेह नहि। मन निर्णय करैत बुइधिक हिसाव स। बुद्धि बनैत व्यसवस्थाहक हिसाव स। तेँ लोकक जे सोचैक आ बुझैक प्रक्रिया अछि ओ वेवसथाक अनुकूल होइत अछि। मुदा वेवसथा केहेन अछि, ओ एहि स आगूक प्रक्रिया छी। हमरा नीक हुअए, इ सब चाहैत अछि। मुदा एहिक भीतर प्रश्न उठैत जे अप्प न नीकक संग जँ दोसर के अधला होय, तखन? नीक त तखन ने नीक जे अपना संग-संग दोसरोक नीक होय। जँ दोसर के नीक नइ हेाय त अधलो नहि होय। हँ, इ बात जरुर जे किछु काज व्य।क्तिीगतो होइत अछि, जहि स दोसर के मतलब नइ होइत।
कर्मनाथ ः (नमहर साँस छोड़ैत) तब ते विवाह मे जे दहेजक चलनि अछि, सेहो ओहने अछि।
विकास ः (मुस्कीा दइत) निश्चिहत। दहेज लेनिहार तीनि रंगक अछि। पहिल अछि जे जते दहेज लइत अछि ओहि स दोबरा-तेवरा कऽ बजैत अछि। दोसर तरहक अछि जे बेटाक विआह मे जते दहेज लइत ओहि स कम बेटीक विआह मे दइत अछि वा नहियो दइक विचार मे रहैत अछि। तेसर तरहक अछि जे दहेज लेलाक बादो छिपबै चाहैत अछि। आब तोंही कहह जे ऐना किऐक अछि।
कर्मनाथ ः ऐहन ओझराइल सवालक हल कोना होएत?
विकास ः (हँसैत) यैह काज त हम अपना समाज मे कऽ रहल छी। उपर से नहि बुझि पड़तह, मुदा समाजक भीतर समाज बनि चलि रहल अछि। जहिना बेटा तहिना पढ़ौल शिष्या। तू हमर पढ़ाओल शिष्या छियह, तेँ तोरा हम विसबास दइ छियह, हम्मा र जे जरुरत तोरा हुअअ, तेही लेल हम तैयार छिअह। तोहर बेटी हम्मारो त पोतियो छी। तोरा हम शुरुहे से जनैत छिअ जे आन नोकरिया जेँका तू लेन-देन स परहेज केने छह। तोरा एक्को। पाइ दहेज कहि खर्च नहि हेतह। तखन त बेटा-बेटीक विआह छी। जे वेवहार अदौ स आबि रहल अछि ओ त पुरवै पड़तह।
कर्मनाथ ः आइ धरि जे समस्या माथ के भरिऔने छल ओ निकलि गेल। मन हल्लुाक भ गेल। मुदा एकटा बात कहि दइत छी कक्का , हम त नोकरिया छी। गनल दिनक छुट्टी अछि तेँ दोहरा कऽ छुट्टी नहि लिअए पड़ए। तहि पर नजरि रखबैत।
विकास ः (मुड़ी डेालबैत) हमहुँ नोकरी कऽ चुकल छी तेँ छुट्टीक महत्व बुझै छियै। काल्हि ये से हम तोरा काजक पाछु पड़ि जायब।ं परसु फेरि भेटि होएव बेटी किछु विशेष पढ़ल छह तेँ काज थेाड़े भरिगर जरुर अछि। किऐक त गाम-घर मे लड़कीक कोन बात जे लड़को कम पढ़ल-लिखल अछि। बी.ए. पास लड़कीक लेल कम स कम एम.ए. पास लड़का चाहिऐक। नहि त इंजीनियर, डॉक्टछर, वकील त चाहबे करिऐक।
कर्मनाथ ः आब हम कने हटि कऽ एकटा सवाल पूछै छी। अखनो आ पहिनहुँ स देखैत एलहुँ जे नीक स नीक (बेसी स बेसी) पढ़ल लिखल लड़काक संग अनपढ़ लड़कीक विआह होइत अछि वा होइत आयल अछि। ओ उचित बुझल जाइत। मुदा अधिक पढ़ल-लिखल वा पढ़ल-लिखल लड़कीक संग कम पढ़ल वा अनपढ़ लड़काक संग विआह करब, उचित वा अनुचित।
विकास ः एहि प्रश्नखक उत्तर दोसर दिन देबह। अखन हमर मन तोरा काज मे ओझरा गेल अछि।

यय










चारिम अंक
(रामविलासक घर)
रामविलास ः जिनगीक साइठम बर्ख मे, आइ वुझि पड़ैत अछि जे निचेन भेलहुँ सेहो सोलहन्नी नहि, पाँच पाइ चिन्ताव अखनो बाकिये अछि। मुदा तइओ आइ अपना कऽ निचेन मानै छी, किऐक त जहिना एक दिन बीतने पूर्वज सौंसे माध बीतब मान लेलनि, तइ हिसाबे त पाँच पाइ भार बड़ थेाड़ भेल। जिनगीक साठि बर्खक संघर्षक (रग्ग,रघस) उपरान्ता जे फल भेटल ओ त सुअदगर आ मीठ हेबे करत,तेँ मन मे खुशी सेहो अछि।
माधुरी ः मन मे खुशी आछि त नाचू।
रामविलास ः नचै त शरीरक भीतर मन अछि। हम कोनो नचनिया छी जे मंच पर नाचब। तखन हँ, एकटा बात मन मे जरुर उपकैत अछि जे अहाँ स भरि मन गप करी।
माधुरी ः ठीके लोक कहैत अछि जे पुरुखक बात आ गाड़ीक पहिया दुनू बरोबरि। जहिना गाड़ीक पहिया घुमैत रहैत अछि तहिना पुरुखोक बात। कहू जे केहेन अकड़हर बात बजै छी जे एते दिन दुनू गोरे संग-संग रहलौ, मुदा भरि मन गप कहियो ने केलहुँ।
रामविलास ः (मुह बिजकबैत) अहाँ कऽ की होइये जे हम फुसिये कहलहुँ।
माधुरी ः अपना की बुझि पड़ै आए जे साँचे कहलहुँ।
रामविलास ः सुआइत लोक कहैत अछि जे पुरुख आगू बढ़ैत-बढ़ैत चोर-डकैत, लुच्चा , लम्पिट सब बनि गेल, मुदा मौगी गोबरक चोत जेँका ठामक-ठामहि रहि गेलि। अहीं से पुछै छी जे कहू काल्हिब धरि हम कहिया निचेन भेल छलहुँ आ अहाँ से भरि मन हँसी-खुशीक बात केलहुँ।
माधुरी ः कोन बड़का पहाड़ उलटबै छलौ, जेकरा उलटबै मे साठि बर्ख लागि गेल।
रामविलास ः (गंभीर होइत) बड़ सुन्द र बात कहलौ। सबसे पहिने इ बात बुझि लिअ जे जहिया से हम अहाँ एकठाम भेलहुँ आ जाधरि नहि भेल छलहुँ। तेँ पहिने, दुनू गोटेक विआह स पहिलुका बात कहि दइत छी। तकर बाद विआहक उपरान्ततक बात कहब। जहिया अहूँ अपना गाम मे रहैत छलौ आ हमहुँ अपना गाम मे।
माधुरी ः अहाँक अप्पअन कोन गाम छल? हम त अप्पहन गाम अप्पकन नैहर कऽ बुझै छी।
रामविलास ः एतवेा नइ बुझै छियै जे अप्प न गाम होइत अछि अपना रहने। से ज नइ रहलौ त अप्पलन गाम कोना भेल? बड़बढ़ियाँ अहाँ अप्पअन नइहर के अप्प न गाम कहलियै। मुदा हमरा त अपना गाम से भगा देलक।
माधुरी ः के भगा देलक?
रामविलास ः गरीबी भगा देलक। जखन हम दसे-बारह वर्खक छलौ तखन बवू दुखित पड़लाह। तीनिये गोरेक परिवार छल, माए-बावू आ हम। हम ताबे खेलाइते-धुपाइते छलौ आ धरिये पहिरैत छलौ। दुख से बाबूक हालत दिनो-दिन बिगड़िते जाइत रहनि। असकरे माए बोइनो क कऽ आनए आ बावूओक सेवा टहल करैत रहए। दिन-राति तंग-तंग रहैत छलि। बेबस भ एक दिन कहलक जे बौआ गाम मे सब अन्नए बेतरे मरि जेवह। गाम मे ने कियो काज करौनिहार अछि आ ने अपना कोनो-आए-उपाए छह। तेँ कतौ जा कऽ कमा आनह।
माधुरी ः गाम से माइये जाइ ले कहलनि।
रामविलास ः हँ। मुदा ओहो बेचारी की करैत।
माधुरी ः गाम से असकरे कत्तऽ गेलियै?
रामविलास ः असकरे कहाँ गेलियै। अपनो गामक आ लग-पासक आनो-आनो गामक लोक, सब साल पटुआ कटै ले, धनरोपनी करै ले पूभर जाइ छल। ओकरे सबहक संगे हमहूँ गेलौ। तीन दिने मोरंग पहुँचलौ। ताबे कोसी धार मे पुलो ने भेल रहए। नावे पर पार भेलहुँ। भीमनगर से जगबोनी बस चलैत रहए। कोसी पार भ कऽ बथनाहा मे बस पकड़लौ। जे नेने-नेने जगबोनी पहुँचा देलक। जगबोनी से पाएरे मोरंग गेलौ। तेसर दिन किरिण डूबैत-डूबैत मोरंग बजार पहुँलौ। ओही दिन हाटो रहए। हम सब हाटे पर रही कि एकटा थारु, दुनू परानी, आइल रहए। ओ जे हमरा सब के देखलक ते बुझि गेल जे पछबड़िया सब छी। लग मे आबि के कहलक जे अइ देसवाली भइया हमरा संगे चलह। सव कियो ओकरे संगे विदा भेलहुँ। जहाँ हाट से निकलै लगलौ कि कहलक जे भैया तोरा सब के भुख लागल हेतह तेँ किछु खा लाय। दू छिट्टा मुरही आ कचड़ी कीनि के द देलक। सब कियो गमछाक खोंचड़ि बना मुरही ल लेलहुँ आ खाइते विदा भेलहुँ। साँझ मे ओकरा अइठिन पहुँचलौ। देखै मे ते ओ अलबटाहे जेँका बुझि पड़ै, मुदा रहए पूजीगर। आठ जोड़ा बड़द खूँटा पर रहए।
माधुरी ः कते दिन ओकरा ऐठाम रहलियै?
रामविलास ः दू मास रहलियै। एक मास पटुआक काज चललै आ एक मास धनरोपनी।
माधुरी ः काजक लूरि कोना भेल?
रामविलास ः सबकेँ जना-जना करैत देखियै, तहिना-तहिना हमहुँ करियै।
माधुरी ः दू मास मे कत्त्ो कमेलियै?
रामविलास ः डेढ़-डेढ़ सौ रुपैआक फाँट सबके भेलइ। ओइ मे से हम सबा सौ रुपैआ गाम पठा देलियै आ पच्चीढस रुपैआ लऽ कलकत्ता चलि गेलियै। कलकत्ता त गेलियै मुदा कियो चिन्हेरए रहबे ने करए। बस स्टै ण्डग मे उतड़ि एकटा दोकान मे खाइ ले गेलहुँ। खाइते रही कि तीनि-चारि टा मटिया चाह पीबै आयल। ओ सब अपने बोली बजै। हम खेबो करैत रही आ ओकरे सब दिस तकबो करैत रही। हमहूँ हाँई-हाँई के खा हाथ धोय, दोकानदार के पाइ द, एक गोरे के कहलियै, भाइ हमहूँ काजे करै ले एलौ, कतौ जोगार लगा दाय। ओ सब अपने संगे हमरो नेने गेल।
माधुरी ः मटिया सब काज की करए?
रामविलास ः बोरो उधै आ आनो-आनो सामान सब उधै। ओकरे लाट मे हमहूँ काज करै लगलहुँ। बर्ख दिन ओकरे सबहक संगे रहलौ। बर्ख दिनक बाद ओहो सब गाम आयल आ हमहूँ एलौ। बरखे दिन मे कते गोरे से चिन्हाखरय भ गेल। गाम आवि एकटा भीतघर बन्ह लौ। बावूओक मन नीक भ गेलनि। अपन मासुल ले रुपैआ रखि अन्नग-पानि कीनि के घर मे द देलियै आ डेढ़ मासक बाद फेरि चलि गेलहुँ।
माधुरी ः फेरि मटिये काज करै लगलहुँ?
रामविलास ः हाँ। पाँच बर्ख धरि मटिया काज करैत रहलहुँ। तेकर बाद अहाँक संग विआह भेल। विआहक बाद जे कलकत्ता जाइत रही कि दरभंगा मे एक गोरे परिवारक संगे हमरे लग मे आबि कऽ बैसिलथि। ओहो कलकत्त्ो जाइत रहथि। समस्तीेपुर तक हमहूँ चुप्पेग-चाप बैसल रही, मुदा ओ सब अपना मे गप सप करैत। समस्ती‍पुर तक छोटकिये गाड़ी चलै। समस्तीहपुर से बड़की गाड़ी कलकत्ता जाइ। जखन समस्ती‍पुर टीशन लगिचाइत कि ओ हमरा कहलनि, वौआ कतऽ जेबह। हम कहलिएनि, कलकत्ता। ओ कहलनि जे हमहू कलकत्त्ो जायब। हमरा समानो सब अछि आ दू टा बच्चोए अछि, तेँ कने समस्तीलपुर टीशन मे बच्चा सब के सम्हासरि दिहह। हमहूँ सैह केलहुँ।
माधुरी ः समस्तीूपुर टीशन मे जे गाड़ी पकड़लियै अेा सेाझे कलकत्ता ल गेल कि बीच मे कतौ फेरि बदलै पड़ल।
रामविलास ः नहि। बीच मे कतौ नै बदलै पड़ल। समस्तीकपुर टीशन मे जे गाड़ी पर बैसलहुँ , तखन से ओइह चाहो पिअबथि आ गपो-सप करै लगलहु। ओ अपने इलाकाक रहथि। हिन्दप मोटर कारखाना मे नोकरी करैत रहथि । इंजीनियर रहथि। देखै मे ते साधारणे बुझि पड़थि, मुदा ओ राक्षात्‌ देबता रहथि। ओ कहलनि जे बौआ तू हमरे संगे चलह। हमरे ऐठाम रहिहह आ तोरा हम करखन्नेह मे काज धरा देवह। तहिया से हम हुनके ऐठाम रहै लगलहुँ।
माधुरी ः (मुस्कीध दइत) अखन धरि विआह से पहिलुके जिनगीक बात कहलियै।
रामविलास ः हँ। विआहक बाद ते अहूँ आबिये गेलहुँ आ देखवे करैत एलियै जे साल मे एक बेर, महीना दिनक छुट्टी मे अवैत छेलहुँ। तहि एक मास मे जे-जना घरक काज रहैत छल ओकरे सम्ह,रै मे महीना बीति जाइत छल। तखन आब अही कहू जे हम कहिया निचेन भेलहुँ।
माधुरी ः अच्छाी, आब अपन खिस्साह-पिहानी छोड़ू। काल्हिच त बौआक (मदनक) रिजल्टर निकलिये गेल। पढ़ाइयो ओकर समापते (समाप्तेत) भ गेलै। आब ओकर विआह क लिअ।
रामविलास ः अपनो मन मे सैह अछि। मुदा अखन धरि त घरक गारजन अहाँ रहलौ हम ते सब दिन बाहर खटलौ। घरक तीत-मीठ त बुझलियै नहि। आब रिटायर क कऽ एलहुँ हेँ। आब जे घरक भार उठबै चाहब से हमरा बुते सम्हिरत।
माधुरी ः कोनो काज केने लोक काज सीखैत अछि। अहाँ कतबो अनाड़ी छी तइयो त पुरुखे छी। हम कतबो जीवनी छी तइयो त स्त्री गणे छी। घरक काज सम्हाबरि सकै छी, मुदा घर स बाहरक काज कोना सम्हाछरल हैत।
रामविलास ः अहूँक बात एकतरहक जरुर अछि। मुदा आब त तीनि गोटे भेलहुँ। मदनोक पढ़ाइ समापते भ गेलै। तेँ सबसे पहिने ओकर विआह क लेब अछि।
(विकासक आगमन)
रामविलास ः (हँसैत) आउ, आउ मास्टटर सहाएव। अहोभाग्यी हम्मकर आ हमरा परिवारक। बहुत दिनक बाद अपने स भेटि भेल। शरीर स स्वरस्थआ रहै छियै की ने?
विकास ः हँ।
रामविलास ः परिवारक सब आनन्दर स छथि की ने?
विकास ः हँ। बच्चान (बेटा) हाइ स्कूील मे मास्टयरी करैत अछि। अपने त आठ साल पहिने रिटायर भ गेलहुँ।
रामविलास ः (मुस्कु्राइत) वाह,वाह। हमरो मदन एम.कम. केलक। काल्हिनये ओकर रिजल्ट निकललै। फस्ट डिवीजनभेलइ। (पत्निे स) अनासुरती मास्ट र सहाएव पहुँच गेलथि, भाग्यओ हम्मलर। किऐक त मास्टभरे सैहबक पढ़ौल मदन छिअनि, तेँ सबसे पहिने मास्टटर सहाएव के मिठाइ खुअविअनु।
(माधुरी जाइत अछि)
विकास ः मदन कहाँ अछि। बिना असिरवाद देने मिठाइ कोना खायब।
रामविलास ः ओ त आइये भोरुका गाड़ी से दरभंगा गेल। अप्प न संगियो-साथी आ प्रोफेसरो सब से भेटि करए गेल। भऽ सकैत अछि सौझुका गाड़ी से घुमत। नइ ज संगी सबहक संगे सिनेमा देखै लगत ते काल्हिै कखनो आओत। हमहुँ पैछला मास रिटायर कऽ गेलहुँ। मदनेक दुआरे घरक सब काज जक-थक पड़ल अछि। किऐक त जाधरि ओ पढ़ैत छल ताधरि घरक काज मे कोना लगबितियै। मुदा सोचै छी जे सबसे पहिने ओकर विआह कऽ ली। ओना अखन धरि घरो बनौनाइ पछुआइले अछि।
विकास ः हँ, हँ, बड़बढ़ियाँ विचार अछि।
रामविलास ः एकटा भार मास्टँर सहाएव अहूँ कऽ दइ छी, किऐक त गाम-घरक (समाजक) बात अपने बुझै नइ छी। घन्यरवाद घरेवाली के दी जे वेचारी स्त्रीगगण रहितहुँ अखन धरि घर सम्हाएरि कऽ चलौलनि। हम त जिनगी भरि सिर्फ कमेलहुँ, एहि स बेसी त किछु केलहुँ नहि। अपने केँ यैह भार दइ छी जे मदनक विआह कतौ करा दिऔ।
विकास ः भार त बड़बढ़िया देलहुँ, मुदा.......।
रामविलास ः मुदा की?
विकास ः बेटा-बेटीक विआह आब विजनेस भ गेल अछि। जइ से हमरा सख्ती घृणा अछि। सत्तरि वर्खक जिनगी मे, सैकड़ो विआहक अगुआइ केलहुँ मुदा एकोटा मे लेन-देन नहि केलहुँ। तखन आब अहीं कहू जे इ भार हमरा उठत।
(प्लेतट मे मिठाइ नेने माधुरीक प्रवेश)
रामविलास ः मास्सै ब, ल द कऽ एकटा बेटा अछि, अगर जँ ओकरो बेचियै लेब तखन मुइलाक बाद एक चुरुक पाइनियो के देत। बेचलाहा बेटा ज देवे करत ते ओहि से थोड़े सबुर हैत।
विकास ः (मुस्कु राइत) कहलियै ते बड़बढ़िया, मुदा आब लोक थेड़े इ बात बुझैत अछि। आब त लोक के रुपैआक आगि मन मे लागि गेल छैक। रुपैइये के धरम-करम सब वुझैत अछि। समाजोक ऐहेन रुखि भ गेल छैक जे जेकरा रुपैया छैक ओकरे पूछै अए आ जकरा नइ छै ओकरा कियो ने पूछै अए।
रामविलास ः (मुस्कु।राइत) मास्सैओब, हम अपन बात कहै छी, जाधरि हमहूँ नइ बुझै छेलिएक ताधरि मन मे सदिखन रुपैऐक बात रहैत छल। संतोष के एकटा शब्दप मात्र बुझै छेलियै। मुदा धन्यरबाद ओहि इंजीनियर सहाएव केँ दिअनि जे आखिक परदा हटा देलनि। आब रुपैया के एकटा साधन मात्र बुझै छी। जिनगी नहि।
विकास ः ओ इंजीनियर के छलाह?
रामविलास ः हुनकर घर अपने इलाका छनि मुदा बच्चेस स ओ कलकत्त्ो मे रहलाह। ओतइ पढ़वो केलनि आ हिन्दअ मोटर मे नोकरियो केलनि। बहुत दिनक बात छियै, हमहूँ कलकत्ता जाइत रही आ ओहो दरभंगा मे गाड़ी पकड़ि जाइत रहथि। गाड़िये मे भेटि भेलाह। अपने संगे हमरो ल जा पहिने त, उठे काज मे घरौलनि मुदा किछुए दिनक बाद हमरो परमानेंट नोकरी भ गेल। सदिखन ओ यैह कहथि जे राविलास गरीबक पूँजी मेहनत छियै। तेँ मेहनत के अपन दोस्तस बना कऽ चली। हुनके परसादे हम हेड मिसतिरी भ के रिटायर केलहुँ। मुरुख रहितहुँ हम कमा कऽ बुर्ज लगा देलियै।
विकास ः की बुर्ज लगा देलियै?
रामविलास ः जना-जना आमदनी बढ़ैत गेल तना-तना अपन कारोबार बढ़बैत गेलहुँ। जाबे मशीनक ज्ञान नहि भेल छल ताबे एकटा सेकेण्ड़ हेंड टैक्सी कीनिलहु। एकटा ड्राइवर के पचास रुपैया रोज पर चलवै ले द देलियै। अपन जे दरमाहा हुअए ओहि मे अधा गाम पठाबी आ आधा जमा करी। किछुए दिनक बाद पुरना टेक्सीे के बेचि नवका कीनि लेलहुँ। तख भड़ो वेसी हुअए लगल। अपनो मिसतिरीक हेल्पार से मिसतिरी बनि गेलहुँ।
विकास ः बाह-बाह। तखन ?
रामविलास ः जखन मिसतिरी बनि गेलहुँ तखन दरमहो दोवरा गेल। आ गाड़ी के बनौनाइ सीखि लेलहुँ। आठ घंटा करखन्नाब मे डयूटी करी बाकी समय मे बजारक गाड़ी सबके ठीक करै लगलहुँ। फेरि दोसर टेक्सीब लेलहु। ओहो भाड़ा पर लगा देलियै। मन पड़ै अए ते हँसी लगै अए। जहिना रुपैयाक लेल मन जरल रहैत छल तहिना रुपैयाक बरखा हुअए लगल।
विकास ः बाह-वाह। तखन?
रामविलास ः आमदनी देखि मन हुअए लगल जे कलकत्त्ो मे जमीन कीनि मकान बना ली। मुदा जखन हुनका (इंजीनियर के) पुछिलिएनि ते ओ कहलनि जे विचार त बड़बढ़िया छह, मुदा मुरुखपाना हेतह। अपना इलाका सन दुनिया मे कोनो इलाका नहि अछि। सिर्फ पाइये सब कुछ नहि ने छियै। ऐठाम ने खेत कीनह आ ने मकान बनावह। हॅ जाबे नोकरी करै छह ताबे किछु अस्थाियी (टेमप्रोरी) कारोबार करै छह ते करह। मुदा रिटायर भेला पर गाम चलि जइहह।
विकास ः किअए गाम अबै ले कहलनि?
रामविलास ः हमहूँ इ बात पुछलिएनि ते बुझवैत कहलनि जे देखहक अपन इलाका, बजारक हिसाबे, बड़ पछुआइल अछि। पछुआइल इलाका मे लोकक आमदनियो आ जिनगिओ पछुआइले रहै छै। मुदा अइ स ककरो घवड़ेबाक नहि चहियै। कोनो इलाका अगुआइल अछि ओहिठामक लोकक मेहनत स। जँ लोक मेहनत नहि कऽ कऽ भागतते ओ इलाका अगुऐतै कोना?
विकास ः (गंभीर होइत) बड़ पैघ बात कहलनि।
रामविलास ः तहि बीच मदन चिट्ठी लिखलक जे बाबू अपने गाम होइत ‘राष्ट्री य राज पथ' (एन.एच.डव्लूी) बनि रहल अछि। अपने ते चिट्ठियो ने पढ़ल होइत अछि, हुनके पढ़ै ले देलिएनि। चिट्ठी पढ़ि ओ मने-मन खूब हँसलाह। कहलनि जे रामविलास अहाँ मिसतिरी छीहे, आब अहाँक कलकत्ता गामे भ जायत। हमरा कोनो अरथे ने लागल। तखन ओ वुझा के कहलनि जे नोकरियो लगिचाइले अछि आ बड़का सड़को बनिये रहल अछि। ठाठ से ऐठामक सब गाड़ी बेचि एकटा नमहरका बस कीनि लेब। ताबे वेटेाक पढ़ाई समापते भ जायत। बेटा के वस द देबइ आ अपने एकटा लेथ मशीन कीनि के रोडे साइड मे बैसा देबइ। हमहूँ खेत-पथार नइ कीनिलहु। सिर्फ घर लग तीनि कट्ठा कीनि लेलहुँ।
विकास ः बड़ सुन्दतर विचार अछि।
रामविलास ः ओना अखन सब काज पछुआइले अछि। ने घर बनेलहुँ हेँ आ ने वस कीनिलहु हेँ। मुदा तीस लाख रुपैआ हाथ मे रखने छी। तेहि से सब काज भ जाइत। अपनो नोकरिये करैत छलहुँ आ बेटो पढ़िते छल, तेँ कोना करितहुँ। आब पाइक भुख मेटा गेल। दुनिया देखैक ढ़ंगो बदलि गेल।
विकास ः दुनियाँ देखैक की ढ़ंग बदलि गेल?
रामविलास ः जाबे मिसतिरी नइ बनल छलौ आ कम आमदनी छल, तावे जे लोकक हाइ-फॉइ देखियै ते हुअए जे कोन दरिदरा भगवान हमरा सब के जन्मन देने छथि जे सब दिन सब चीजक अभावे रहै अए। मुदा जखन मिसतिरी बनलौ आ आमदनी बढ़ल, तहिया से वुझि पड़ै लगल जे हमरा सन-सन दरिद्र ते सौंसे दुनिये भरल अछि। जहि से मन मे संतोषक अंकुर जनमै लगल। आब ओ अंकुर विशाल गाछक रुप मे भ गेल अछि। जहि स आखिक इजोत सुन्द र होइत गेल। आब वुझि पड़ै अए जे दुनिया बड़ सुन्दिर अछि।
विकास ः की सुन्द र?
रामविलास ः आब देखै छी जे दुनिया, स्विर्गो स सुन्दरर आ हजारो तीर्थ स्थािन मिलौला से जेहेन होइत, तहू से पवित्र आ पैध अछि। कोनो देवस्थारन मे गनल-गूथल देवताक वास होइत मुदा दुनियारुपी तीर्थ स्थापन मे अरबो-अरब देवता वास करैत अछि। किऐक लोक एहि देवस्थादन स हटै चाहत। मन मे संकल्पम शक्तिेक जन्मस भेल। जे संकल्पएशक्तिइ विचारक रास्ताा बदलि देलक। जहि स जिनगी फूलो स हल्लुशक बनि गेल अछि।
विकास ः इ त दुनिया देखैक नजरि भेल, मुदा अपना जिनगी मे की सब आयल?
रामविलास ः जाधरि जिनगी नहि बदलल छल ताधरि कमेनाइ-खेनाइ मात्र बुझैत छलहुँ। मुदा आब दोसर केँ मदति करब बुझै लगलहुँ। अनका हाथे जे अपन मेहनत बेेचै छलौ ओ मेहनत आब अपना काज मे लगबै लगलहुँ। जहि स मनक गुलामी मेटा गेल।
विकास ः आव अपना काज दिशि आउ। जहिना अहाँक लड़का पढ़ल-लिखल छथि तेहने एकटा लड़की हमरो नजरि मे अछि। बी.ए.पास ओ लड़की अछि। शील, स्वहभाव, आ गुणक भंडार अछि। शुद्ध लछमीपात्र। ओहन लड़की भगमन्तेअ घर मे जन्मश लैत अछि।
रामविलास ः मास्सैलब, हम मदनक पिता जरुर छिअनि मुदा ज्ञान दइवला गुरु त अहीं छिअनि। तेँ, मदन के अहाँ अपन बेटा वुझि जतए विआह करा देवनि, हमरा दिस स एको-पाइ आपत्ति नहि। पाइ-कौड़ीक हमरा एको-पाइ लोभ नहि अछि।
विकास ः (मने-मन खुश होइत) देखिऔ ओ लड़की एकटा पैध अफसरक छिअनि। ओ अपनो साक्षात्‌ देवता छथि। ओना ओहो (अफसर) हमरे पढ़ाओल छथि, तेँ हमरा पर अटूट विसवास छनि। जे कहबनि से ओ जरुर करताह। मुदा आइ-काल्हिस देखै छियै जे झूठ-फुस ल कऽ शादी-विआह मे झगड़ा-झंझट भ जाइत छैक। खास कऽ स्त्रीयगणक चलैत। जँ से सब नइ हुअए ते हम एहि काज मे पड़ब।
रामविलास ः मदन त अखन नहि अछि, नइ ते अहाँ के संग लगा दइतौ। ओना हम कन्या गत नहि बरपक्ष छी, तेँ पहिने पाएर कोना उठाएब। मुदा अहाँ ऐठाम जेबा मे ते कोनो असोकर्ज नहि अछि। चलू हम अहींक संग चलै छी। आ कन्याहगत से गप-सप करा दिअ।
माधुरी ः माहटर बावू, बेटा त हमरो छी आ पुतोहुओ हेती, तेँ, एकटा बात हमहूँ कहै छी। लोक सब बजैत अछि जे दुनिया बड़ आगू बढ़ि गेलई, इ त नीक बात। जते आगू दुनिया बढ़तै तते आगू सब बढ़त। मुदा हम सब त मिथिलाक गाम मे रहै छी, जइ ठाम अखनो लोक पाएरे नैहर-सासुर करैत अछि। कोनो सोखे त नहि करैत अछि। अभाव मे करैत अछि। शहर-बजारक लोक हवाई-जहाज पर उड़ैत अछि आ हमरा सबहक सवारी अखनो नाव अछि। तेँ, एहि सब केँ नजरि मे राखब जरुरी अछि।
विकास ः (ठहाका दइत) इ सब कहैक जरुरत नहि अछि। पहिनहि कहि देलहुँ जे कन्याे लछमीपात्र छथि। साक्षात्‌ लछमीक आगमन परिवार मे होएत।
रामविलास ः मास्सै्ब, शुभ काज मे बिलंब नहि करक चाही। हमरो कपार परक, अंतिम भार उतडि ़जायत, जे पाँच पाइ चिन्ताभ अछि ओहो मेटा जायत। तेँ, हम्म,र विचार अछि जे हमहूँ अपनेक संग चलि, सब बात आइये फरिच्छा लेब।
यय


पाँचम अंक
(विकासक दरवज्जाि। विकास, रामविलास आ तीनि चारि गोटे बैसल)
विकास ः राधेश्यासम, कने कर्मनाथबावू केँ बजौने आवह?
(राधेश्यारम जाइत)
रामविलास ः कते दूर पर हुनकर घर छनि?
विकास ः थोड़वे दूर पर छनि। लगले चलि औताह।
रामविलास ः मास्सै ब, जखन ऐठाम धरि आबिये गेलहुँ तखन कहुना काज कऽ सलिटिआइये देवैक।
विकास ः देखियौ, हम त अपना भरि परियास करबे करब तखन ते.........।
(राधेश्याःमक संग कर्मनाथ अबैत)
विकास ः आउ, आऊ कर्मनाथ बावू। हमरा त होइत छल जे अहाँ गाम मे छी की नहि। मुदा संयोग नीक अछि।
कर्मनाथ ः अखने हमहूँ मामा गाम (मात्रिक) से एलहुँ। ममो संगे अएलाह हेँ।
विकास ः हुनको किअए ने संगे नेने ऐलिएनि?
कर्मनाथ ः कोना नेने अवितिएनि। राधेश्यानम सोझे कहलक जे विकास कक्काग बजौलनि अछि।
विकास ः (रामविलास के देखवैत) हिनका त अहाँ नहि चिन्हैकत हेबनि। हिनकर घर सुन्दछरपुर छिअनि। हिनका एकटा लड़का छनि जे एहिवेर एम.कम. केलनि अछि। काल्हि्ये रिजल्टि निकललनि हेँ। ओना ओ लड़का हमरे पढ़ौल छी मुदा किछु दिन पहिलुका देखल अछि। मुदा लड़का दिव हेबे करत।
(कर्मनाथ मुस्कुकराइत)
रामविलास ः रिजल्टि सुनि बौआ पराते भिनसुरका गाड़ी पकड़ि, संगी-साथी सब स भेटि करै चलि गेला हेँ। भए सकैत अछि जे रौतुका गाड़ी स आबि जाय, नहि जँ संगी साथीक संग सिनेमा देखै लगए त काल्हि आओत।
विकास ः रामविलास जी, हिनका (कर्मनाथ बावू केँ ) ते अहूँ नहिये चिन्हैित हेबनि। इहो हमरे पढ़ौल छथि। मुदा हमरा गामक रत्न। छथि। गामक पहिल फुल। बड़का अफसर छथि। भगवान ऐहेन बेटा सबकेँ देथुन। जेहेने पैघ अफस तेहने इमानदार। सज्ज नक त चरचे नहि। ओना जिनगी भरि हमहूँ गुरुआइये केलहुँ। मुदा औझुका शिक्षक सब जेँका नहि, जे अपनो पढ़ौल विद्‌यार्थी, सोझा मे सिगरेट, बीड़ी पीवैत रहत आ शिक्षक मुड़ी निच्चाि कऽ जाइत रहताह। आजुक जे छौड़ा-माड़रि सब भ गेल अछि ओ ने माए-बाप केँ आदर करैत अछि आ ने शिक्षक केँ।
रामविलास ः (हड़वड़ा कऽ कर्मनाथ केँ प्रणाम करैत, मने-मन सोचैत जे कहुना कुटुमैती भ जाय।) मास्सैमब अहाँ के ते हम कहि देलहुँ जे भलेही मदन हम्मैर बेटा छी मुदा शिष्यै त अहींक छी। तेँ, मदन पर जते अधि हमर अछि ओहि स मिसिओ भरि कम अधिकार अहूँक नहि अछि। माए-बाप जन्मम दैत अछि मुदा जिनगीक रास्तार त गुरुऐ बतबैत अछि।
विकास ः (मुस्कीत दैत) अहाँ दुनू गोटे सोझा मे छी, तेँ हमरा किछु बजैत असोकर्ज नहिये भ रहल अछि। कर्मनाथ बावू, अपने त बड़ ज्ञानी लोक छी, तेँ हम किछु बाजी से हमरा उचित नइ वुझि पड़ै अए। मुदा दू परिवारक बीचक संबंध अछि तेँ चुप्पोी रहब उचित नहि।
(कर्मनाथो आ रामविलासो ठहाका मारि हँसैत)
हम दुनू गोटे केँ परिचय करा देलहुँ। आब एकटा बात अॉझुका समयक संबंध मे कहि दइत छी।
रामविलास ः अबस, अवश्य अपनेक कहि देल जाओ।
विकास ः अखुनका समयक संबंध मे कहि रहल छी। अहाँ (कर्मनाथ) जेठरैयति परिवारक छी जे आब निच्चास मुहे भऽ रहल अछि। उपर स निच्चा( उतड़ैत आ निच्चाठ स उपर जाइत, एक सीमा पर दुनू गोटे (सामाजिक, आर्थिक आ शैक्षणकित) पहुँच गेल छी। तेँ, दुनूक बीच मे संबंध बनब समयानुकूल अछि। रहल बात लड़का-लड़कीक। अपना ऐठामक जे सामाजिक ढ़र्रा बनि गेल अछि, ओकरा हम झुस (घटी) बुझै छी। किऐक त मुरुख लड़कीक संग पढ़ल-लिखल लड़काक विआहक चलनि अछि। जेकरा सबकियो नीक बुझि अंगीकारो कऽ नेने छी। मुदा एहिठाम एकटा प्रश्नक उठैत अछि जे मुरुख लड़काक संग पढ़ल-लिखल लड़कीक विवाह के नीक मानल जाय वा अधलाह। मुदा अहाँ दुनूक संबंध मे त से बात नहिये अछि। तेँ, एहि संबंण मे किछु कहैक जरुरते ने अछि। हृदय स असिरवाद बुझी वा धन्येवाद देव बुझि हम दुनू गोटे केँ (मदन आ चम्पाि) दइत छिअनि।
रामविलास ः (हँसैत) से की?
विकास ः जहिना अहाँक मदन रत्नी भेलाह (बोनिहार परिवारक दुआरे) तहिना हम चम्पो के (नारी शिक्षाक) बुझैत छिअनि। तेँ, चाहे रत्न।क हार होय वा फुलक, एकोटाक माला बनैत आ सओक। मुदा दुनू गरदनिये मे पहिरल जाइत। भलेही एकक डोरा सबहक नजरि पर पड़ै आ दोसराक झँपाइल होय।
रामविलास ः (हँसैत) मास्सैलब, हम त मुरुख छी तेँ अहाँक सब बात बुझियो ने रहल छी, मुदा एते बिसवास मन मे जरुर अछि जे अहाँ हमर अधला कखनो नहि सोचब।
विकास ः देखियौ, दुनू गोटेक विचार एक रास्तााक अछि, तेँ एहि संबंध मे किछु अटकलबाजी करब उचित नहि। आब काजक गप कऽ आगु बढ़ाउ।
कर्मनाथ ः हमरा मन मे एक्को पाइ इ शंका नहि अछि जे हम लड़का के नहि देखलहुँ। मुदा जखन ऐठाम (हमरा गाम) पहुँच गेल छी त कने हम अप्पहन दुनू भाइयो केँ बजा लइ छिअनि। एहि दुआरे नहि कि हुनका से पूछब जरुरी अछि, बलकि एहि दुआरे जे हुनको सबहक मन मे इ नइ होइन जे भैया हमरा सब के कहबो ने केलनि। ततवे नहि, हम त चाहब जे अपना बेटिओ के देखा दी।
रामविलास ः आइ अहाँक बेटी तेँ सब भार अहाँ उपर मे अछि। मुदा विआहक उपरान्तस त हमरो पुतोहूऐ हेतीह। तेँ, जखन ऐठाम धरि आबिये गेल छी ते असिरवादो देनहि जेवनि।
विकास ः (हँसैत) बड़बढ़िया। राधेश्याुम, तू कने फेरि दोहरा के कर्मनाथ बावू एहिठाम जा आ दुनू भाइयो (लालबावू आ नूनू) आ चम्पोम केँ बजौने आबह।
(राधेश्यादम बजवै ले जाइत)
कर्मनाथ ः कक्काल, हम्म्र बेटी आइक मनुक्खन छी। सिर्फ पढ़ले-लिखल अछि, ततबे नहि। कमप्यु‍टरक ज्ञान सेहो छैक। परिवार चलवैक सब लूरि छैक। आ सबसँ पैघ गुण इ छैक जे मिथिलाक सब व्युवहार क (जे नारी लेल अछि) ज्ञाने नहि व्‍यवहार मे सेहो छैक। ओ सिर्फ कुशल गृहणिये नहि अपना पाएर पर ठाढ़ भ जीवन-यापन करैक लूरि स सेहो सम्पिन्नह अछि।
रामविलास ः कर्मनाथबावू, हम मुरुख रहितहुँ ओहन विचारवान आदमी लग रहि जिनगी बितेलहुँ, जिनका हम देवता बुझैत छिअनि। ओ हमरा अपना पाएर पर ठाढ़ भ जीवैक लूरि (ज्ञान) सिखा देलनि। सदिखन ओ कहथि जे श्रमिक अपन श्रम पूँजीपतिक हाथ बेचि लइत अछि, जे उचित नहि। तेँ, हम अप्पिन श्रम केँ अपना काज मे लगेबाक सतत प्रयास करैक चेष्टा् करी। ओना हमहूँ जिनगी भरि नोकरिये केलहुँ किऐक त ऐहेन मजबूर परिवार मे जन्मष भेल छल जे दोसर चारा नहि छल। मुदा आब हम एते कमा लेलहुँ जे हमरा परिवार के कहियो नोकरी क लेल मुहताज नहि होअए पड़त।
(लालबावू,नूनू आ चम्पा क प्रवेश)
विकास ः रामविलास जी यैह बच्चिाया थिक।
(एकटक स रामविलास चम्पाज कऽ देखि)
रामविलास ः मास्सै्ब, हमरा पाइक भुख नहि, मनुक्ख क भुख अछि। (हँसैत) हम अपन बेटे टा नहि, विआहोक खर्च हमही करब।
कर्मनाथ ः (मुस्कीी दइत) बौआ तोरा दुनू भाइ (लालबावू आ नूनू) के हम एहि दुआरे बजौलियह जे जहिना बेटी तहिना भतीजी, तेँ तोहूँ दुनू भाइ अप्पकन विचार दाय।
दुनू भाइ ः �(लालबावू आ नूनू) भैया, जहिठाम अहाँ आ विकास कक्काक छी, तहिठाम हम सब की बाजब। अहाँ लोकनिक पसन्दू हमरो पसन्दँ।
कर्मनाथ ः (चम्पाक से) बाउ, गोड़ लगहुन।
(सबसँ पहिने चम्पा( विकास केँ, तेकर बाद अप्प न पिता कर्मनाथ केँ तेकर बाद रामविलास केँ गोड़ लगलक)
रामविलास ः (हजारी नोट दइत) भगवान जिनगी दथि। मास्सैभब, भलेही हम बेटावला छी मुदा कर्मनाथ बावूक आगू मे किछु नहि छी। धन्य वाद हम अहाँ कऽ (विकास बावू) दइत छी जे हमरा कीचड़ स निकालि सिंहासन पर पहुँचा देलहुँ।
विकास ः रामविलास जी, हम दुनू गोटे स आग्रह करब जे शुरुहेक लगन मे काज (विवाह) निपटा लेब।
रामविलास ः हमरा दिशि स कोनो आपत्ति नहि।
विकास ः एकटा बात आरो। अखन जे लोकक रुखि भऽ गेलै अए जे खूब लाम-झाम से विआह करै अए से नहि हेवाक चाही। जेते खर्च (चाहे कन्याागतक होय वा बड़क पिताक) झुठ-फुस मे करब, ओ बेकार। ओ पइसा जँ बँचा कऽ कोनो काज क लेव त ओ जिनगीक लेल होएत। हम अप्पेन बात कहै छी, हम्मइर जे विवाह भेल छल अहि मे सिर्फ पितेजी टा बरिआती गेल रहथि। तइयो काज भेलइ। तेँ, कौआ स खइर लुटायब, कोनो नीक बात नहि।
रामविलास ः अपनेक विचार स हमहूँ सहमत छी। जना कर्मनाथ बावू कहताह, तहिना करब।
कर्मनाथ ः हम्मसर कोनो विचार नहि, जना विकास कक्काि कहताह, तहिना हम करब।
विकास ः विआहक बात त समपन्नेक जेँका भऽ गेल। आब जँ किनको मन मे किछु बात बाकी हुअए से अखने बाजि चलू।
कर्मनाथ ः हम जहि समाज मे अखन धरि छी ओहि समाजक बीच त बेटीक विआह नहिये कऽ रहल छी, मुदा ओहि समाज मे त बहुत अधिक संबंध (लेन-देन) बनि चुकल अछि। तेँ, हम आग्रह करब जे एक बेरि, विआहक बाद, बेटी के अपना संगे ल जाएव। ओकरो सखी-विहीनिया छैक तेकरो सब स भेटि-घाँट क लेत। तकर बाद त अहाँक ऐठाम रहत आ ओइह अपन घर हेतैक।
विकास ः हम नीक जेँका अहाँक बात बुझि नहि सकलहुँ, कर्मनाथ बावू।
कर्मनाथ ः काकाजी, जहि समाज (अफसर समाज) मे रहैत छी ओहिक बीच पच्चीआसो-पच्चा स काज (विआह,मूड़न इत्यारदि) सब साल होइत छैक। जहि मे हमहूँ आमंत्रित होइत छी। ओहि मे हम त सिर्फ भोजने करैत छी, मुदा प्रति काज पाँच सय स दू हजार धरि खर्च होइत अछि। मुदा हम त अेाहि समाज स अलग भ कऽ अप्पमन काज कऽ रहल छी। तेँ, ओहि समाज मे रहैक लेल हमरो किछु करै पड़त।
विकास ः ओ-ो. ो. ो, ो। हँ इ त उचिते छी। की यौ रामविलास जी अहूँक किछु समस्या् अछि?
रामविलास ः हँ। समस्याि त हमरो अछि। मुदा हम्म र समस्यात दोसर तरहक अछि।
विकास ः की?
रामविलास ः अपने केँ कहिये देने छी जे किछुए दिन पहिने नेाकरी स निवृत भेलहुँ आ मदनो पढ़िते छल। मरदा-मरदी कियो घर मे छेलहुँ नहि, जहि स घरक सब काज पछुआइल अछि। जना, घर बनौनाइ, काज सब ठाढ़ केनाइ, जहि कऽ पुरबै मे कम स कम छह मास जरुर लगत। अखन घरो ने अछि, जहि मे रहब। तेँ हमरो किछु समय चाही। ओना विआह अखन कइये लेब, मुदा जहाँ धरि बिदागरीक सवाल अछि ओ अगिला साल करब।
विकास ः की सब काज करैक अछि?
रामविलास ः (हँसैत) मास्सैयब, मुरुख रहितहुँ हम बहुत (बड़) कमेलहुँ। जाधरि कमाइत छलहुँ ताधरि अपनो अनके घर मे रहैत छलहुँ। वेटो होस्ट,ले मे रहैत छल। सिर्फ पत्नि ये टा घर मे रहैत छलहुँ , तेँ ने बेसी घरक जरुरत छल आ ने बनवैक समय भेटल। आब दुनू बापूत निचेनो भेलहुँ आ दुनू काजो (नोकरी आ पढ़नाई) सम्पसन्नन भ गेल। तेँ, दुनू ठाम (रहबोक लेल आ कारोबार करैक लेल) घरो बनवैक अछि आ कारोवार शुरुह करैक अछि।
विकास ः की सब कारोबार करैक विचार अछि?
रामविलास ः सबसँ पहिने रहैक लेल चौघारा घर बनाएव। तीन अलंग आंगन मे रहत आ एक अलंग दरवज्जाप रहत। तेकर बाद चौकपर (एन.एच.क बगल मे) तीनि टा कोठरी बनवैक अछि। जहि मे एकटा कोठरी मे लेथ मशीन बइसायब। दोसर मे अप्पगन कारोवारक (मिसतिरिआइक) रहत आ तेसर मे बच्चाो कऽ अॉफिसनुमा बना देवइ, जहि मे ओ अप्परन कारोवारक हिसाव-किताब राखत।
विकास ः वाह, बड़सुन्दआर योजना अछि। तेकर बाद की करब?
रामविलास ः घर बनौलाक बाद दुनू बापूत कलकत्ता जायब। ओतुक्केछ बैंक मे रुपैइयो अछि। रुपैइया उठा इंजीनियर सहाएव केँ संग कऽ एकटा वस बेटा लेल कीनब। अपना लेल मशीन आ जखन पुतोहू कमप्युरटर सीखन छथि ते हिनका लेल एकटा कमप्युेटर कीनब। तेकर बाद जे रुपैया उगरत ओहो आ सब सामानो बसे मे लादि कऽ ल आनब। एहि सब काज करै मे छह मास स बेसिये लाइग जायत।
विकास ः काज त बहुत अछि। बड़वढ़िया नहि छह मास त साल भरि मे सब काज भइये जायत।
रामविलास ः हँ, से किअए ने हैत।
विकास ः भने दुनू गोटे, एहि साल भरि मे, अप्पबन-अप्प न काज साल भरिक भीतर पूर्ति कऽ लेब। बिबाह त अखन कइये लिअ, विदागरी अगिला साल करब। मुदा दुरागमनोक विधि समपने कऽ लेब। अखन कनियाँ केँ अप्पदन सीमा पार कऽ घुमा लेब। विवाहक काज त समपन्ने बुझू।

ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः
समाप्त
ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः ःः

11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)

  11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS ( VOLUME I TO XXII )