भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

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Wednesday, July 15, 2009

'विदेह' ३८ म अंक १५ जुलाइ २००९ (वर्ष २ मास १९ अंक ३८)-part i

'विदेह' ३८ म अंक १५ जुलाइ २००९ (वर्ष २ मास १९ अंक ३८)


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एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य
२.१. कथा- सुभाषचन्द्र यादव-हमर गाम
२.२. प्रत्यावर्तन - आठम खेप- कुसुम ठाकुर
२.३. अनमोल झा- कथा- प्राथमिकता
२.४ सुशान्त झा- रिपोर्ताज
२.५ नवेन्दु कुमार झा- रिपोर्ताज
२.६. कथा-मनस्ताप कुमार मनोज कश्यप

२.७. चन्द्रेश- पोथी समीक्षा

२.८. जितेन्द्र झा -रिपोर्ताज

३. पद्य

३.१. राजकमल चौधरीक दूटा अप्रकाशित पद्य
३.२. जीवकान्तक टटका पद्य

३.३. आशीष अनचिन्हार

३.४.पंकज पराशर - जानि नहि किएक
३.५. सुबोध ठाकुर- सनेश

३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)


३.७. रूपा धीरू

३.८. ज्योति-बरसातक दृश्य

४. मिथिला कला-संगीत-तूलिकाक चित्रकला

५. गद्य-पद्य भारती -१. मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह
२.मूल तेलुगु पद्य-
अन्नावरन देवेन्दर-अंग्रेजी अनुवाद- पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर

६. बालानां कृते-१. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ २. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति
७. भाषापाक रचना-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)
8.1.Original poem in Maithili by Ramlochan Thakur Translated into English by Gajendra Thakur

8.2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili NovelSahasrabadhani translated by Jyoti.



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions
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१. संपादकीय


वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा ६ जुलाइ २००९ केँ प्रस्तुत भारतीय बजट २००८-०९ मे आर्थिक विकास दर ६.७ प्रतिशत रहल होएबाक सम्भावना व्यक्त कएल गेल अछि। एहि बेर करदाता लेल बेसिक छूट एक लाख ५० हजार टाका सँ बढ़ाकऽ एक लाख ६० हजार कएल गेल अछि। आयकर पर दस प्रतिशत सरचार्ज हटा लेल गेल अछि। सरकार नोट छापिकऽ निवेश करत। रोजगार गारंटी योजनामे विस्तार कएल जएत, २५ किलो अनाज तीन टाका प्रति किलोक दरपर उपलब्ध कराओल जएत। किसान आ लघु उद्योगकेँ सस्ता कर्ज भेटत। निर्यात दबावमे रहने अर्थव्यवस्थामे सुस्ती अछि। खाद आ डीजल पर राहत देल जएत। प्रत्येक राज्यमे एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करबाक योजना अछि। नव आई.आई.टी. आ एनआईटी लेल ४५० करोड़ टाका खर्च करबाक योजना अछि। आयमे कृषिक हिस्सा जे १९४७ मे ५६ प्रतिशत छल से आइ १८ प्रतिशत भऽ गेल अछि। बजटक आर मुख्य विशेषता एहि प्रकारेँ अछि:-लॉ फर्मपर सर्विस टैक्स, आयकर छूटक सीमा महिला लेल भा.रु. १,९०,०००/- आ वरिष्ठ नागरिक लेल भा.रु.२,४०,०००/- कएल गेल, ग्रामीण सड़कक लेल १२,००० करोड़ रु. आबंटित, हृदय रोग सम्बन्धी दवाइ सस्ता हएत, बायो-डीजलपर कस्टम ड्यूटी घटत आ सोना-चानीपर बढ़त, कॉमनवेल्थ गेम लेल १६,३०० करोड़ रु. देल गेल, राष्ट्रीय गंगा प्रोजेक्ट लेल ५६२ करोड़ रु. आबंटित, यू.आइ.डी.(यूनीक आइडेन्टिफिकेशन प्रोजेक्ट) नंदन नीलेकनीक अध्यक्षतामे शुरू कएल जएत, अप्रैल २०१० सँ गुड्स आ सर्विसेज टैक्स प्रारम्भ आ पुनः ९% आर्थिक विकास दर प्राप्त कएल जएत।
नेपालमे सेहो वित्तमंत्री सुरेन्द्र पाण्डेय १३ जुलाई २००९ केँ प्रस्तुत अपन बजट(२००९-१०, वि.सं.२०६६-६७) मे किसान लेल ५००० लाख ने.रु. सब्सिडी लेल देलन्हि। मैथिली, भोजपुरी, थारू, लापचा, लिम्बू आ धीमाल भाषायी क्षेत्रमे कला-गामक विकास करबाक योजना अछि। २५०० लाख ने.रु. जनकपुर, राजबिराज, हुमला, मुगु, कालीकोट आ डोलपा हवाइ अड्डाक विकासार्थ देल गेल अछि। नव संविधानक ड्राफ्ट तैयार करबामे सभक सहयोग लेबाक आ शान्ति प्रक्रिया आगू बढ़ेबाक संकल्प सेहो व्यक्त कएल गेल। बिराटनगर रिंग रोड आ जनकपुर परिक्रमा (रिंग रोड) सड़ककेँ नीक बनाओल जएत। जनकपुरमे राजश्री जनक विश्वविद्यालयक स्थापना कएल जएत। धालकेबार-जनकपुर रोड अगिला वित्त वर्षधरि पूर्ण कऽ लेल जएत। डोम, मुसहर, चमार, दुसाध, खतबे आ गरीब मुस्लिम लेल सिरहा, सप्तरी आ कपिलवस्तु जिलामे एक-एक हजार घर (पूरा ३००० घर) बनाओल जएत। दलित आ गरीब मुसलमानक अठमा पास बालिका लेल (परसा, बारा, रौतहट, सरलाही, महोत्तरी, धनुषा, सिरहा आ सप्तरी जिलामे) स्कॉलरशिप देल जएत जाहिसँ ओ अपन पएरपर ठाढ़ भऽ सकथि। जाहि कोनो तकनीकी इंस्टीट्यूटमे ओ नामांकन लेमए चाहतीह ओहिमे हुनकर एडमिशन कम्पलशरी रूपेँ लेल जएतन्हि। उत्तर दक्षिण हाइवे (कोशी, कंकाली आ गंडकी कोरीडोर)क निर्माण कएल जएत। सिरहा, सप्तरी, उदयपुर आ सुनसरीमे कृषिक विकासक संग शिवालिक आ चूड़ पर्वत श्रृंखलाक संरक्षणपर ध्यान देल जएत। मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल काज केनिहारकेँ पुरस्कृत करबाक लेल एक करोड़ ने.रु.क योगसँ महाकवि विद्यापति पुरस्कार गुथीक स्थापना कएल गेल अछि।

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ जुलाई २००९) ८१ देशक ८४८ ठामसँ २५,५८२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ १,८५,३२५ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।


गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in


२. गद्य
२.१. कथा- सुभाषचन्द्र यादव-हमर गाम
२.२. प्रत्यावर्तन - आठम खेप- कुसुम ठाकुर
२.३. अनमोल झा- कथा- प्राथमिकता
२.४ सुशान्त झा- रिपोर्ताज
२.५ नवेन्दु कुमार झा- रिपोर्ताज
२.६. कथा-मनस्ताप कुमार मनोज कश्यप

२.७. चन्द्रेश- पोथी समीक्षा

२.८. जितेन्द्र झा -रिपोर्ताज

सुभाषचन्द्र यादव-

चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द

सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।

हमर गाम
बसंत रितु बीत गेल अछि । गरमी धबल जाइत छै । लेकिन भोरमे आ साँझमे शीतल आ सोहाओन बसात मंद-मंद चलैत रहैत छै तऽ लगैत छै बसंत अखन गेल नहि अछि, विदा होइत-होइत अपन झलक देखा रहल अछि ।
एकटा एहने साँझ केँ हम गाम जा रहल छी । सुरूज एखन डूबल नहि छै । बुझाइत छै आध कोस जाइत-जाइत छिप जेतै । अखनुका रौदमे धाह नहि छै । सुरूज इजोतक विराट पिण्ड भरि लगैत छै, तापक प्रचंडतासँ रहित ।
हमर गाम सुपौलसँ डेढ़ कोस पच्छिम कोसी बान्हक भीतर अछि । आरि-धूर, बालु आ धार टपय पड़ैत छैक; तइँ हमर गाम धरि कोनो सवारी नहि जाइत अछि । पाँव-पैदल । दोसर कोनो उपाय नहि । हिस्सक छूटि गेलासँ आब गाम जायब अबूह बुझाइत अछि । कोनो टंटा ठाढ़ भऽगेल तखने हम जाइत छी । नहि तऽ बाल-बच्चा जाइत अछि, पत्नी जाइ छथि । आइ दू सालक बाद हम जा रहल छी । दू बर्ख पहिनो जमीनक ओझरी रहय आ आइ फेर वैह स्थिति अछि ।
गामक झंझट कहियो खतम नहि होइत अछि । हेबो नहि करत । सभ दिन किछु ने किछु लागले रहत। आइ क्यो जमीन धकिया लेलक तऽ काल्हि क्यो खढ़ काटि लेलक, परसू क्यो धान घेरि लेलक । एहि सभसँ हम कहियो पार नहि पाबि सकब । आइ धरि क्यो नहि पाबि सकल अछि । ई संसार एहिना चलैत आबि रहल छै । एहिना चलैत रहत । स्वार्थक क्षुद्रतामे डूबल । नाना प्रकारक छल-प्रपंच करैत, कखनो हँसैत, कखनो कनैत।
अनन्त विस्तारमे पसरल सूर्यक प्रकाशमे भासमान होइत ई पृथ्वी अपन अनेकरूपता सँ हमर चित्तकेँ आकृष्ट करैत अछि । ग्राम्य दृश्यावलीक सुन्दरता हमर आत्मा केँ मुदित करैत अछि । किन्तु थोड़बे कालक लेल । मन भटकि कऽ अस्तप्राय सूर्य दिस चल जाइत अछि । गामक झमेलमे ओझराय लगैत अछि ।
कोसीक पुबरिया बान्ह आबि गेल । बान्ह जे अपना भीतर लाखक लाख लोककेँ घेरि कऽ अहुँछिया कटबैत अछि । बान्ह पर एक पल ठाढ़ भऽ कऽ हम पच्छिम भर नजरि खिरबैत छी । दूर-दूर तक कोनो बस्ती नहि । कोनो गाछ नहि । खाली माल-जालक खूरसँ उड़ैत धूरा । बान्ह पर सँ हमर गाम नहि देखाइत अछि । गामक काली मंदिर देखाइत अछि । मंदिर आइ डेढ़-दू सय बर्ष सँ स्थिर अछि । अस्थिर अछि बान्ह परसँ मंदिर धरिक रस्ता । कोसी कोनो चीजकेँ थिर नहि रहय दैत छै । रस्ता-पेरा, आरि-धूर, खेत-पथार, घर-दुआर, लोक-वेद डगराक बैगन जकाँ गड़कैत रहैत अछि ।
बान्ह पर पहुँचिते चिंता होइत अछि। कोन बाटे-जायब ? घाट कोन ठाम छै? नाह चलिते छै कि बंद भऽ गेलै ? बन्द भऽ गेलै तऽ कोन ठाम पार होयब ? रस्ता हियासैत छी । दूर दू गोटय जा रहल छै । ओ दुनू निश्चिते धारक ओहि पार जायत । धारक एहि पार कोनो बस्ती नहि छै । हम ओहि दुनूक अनुगमन करय लगैत छी । चालि तेज भऽ गेल अछि । ध्यान झलफलाइत साँझ पर अछि ।
धार लग पहुँचि कऽ ओ दुनू अढ़ ताकि लेलक अछि । नाह नहि छै । दू-तीन टा भैंस अखने टपि कऽ ओहि पार पहुँचल छै । पानि देखि कऽ हम अटकर लगा रहल छी जे कपड़ा खोलय पड़त कि नहि ।
'कपड़ा-तपड़ा खोलह ।'- बगलसँ आबि कऽ सिबननन कहैत अछि आ एकटा पुरान मैल तौलिया हमरा दिस बढ़बैत अछि । अपन धोती ओ तेना कऽ समेटि लैत अछि जे बुझाइत छै जेना ओ बुट्टा पहिरने हो । जेना-जेना पानि बढ़ैत छै, तेना-तेना हम तौलिया ऊपर उठौने जाइत छी । सिबननन आगू अछि तइँ हम नि:संकोच तौलिया उठा कऽ नांगट भऽ जाइत छी ।
आब कने और आगू जा कऽ सटले-सटल तीन टा गाम छै – नरहैया, कदमटोल आ तकर पच्छिम हमर गाम मेनाही । हमरा पियास लागि गेल अछि आ हम ककरो ओहिठाम पानि पीबि लेबऽ चाहैत छी । मुदा सिबननन कहैत अछि- 'चलह, रामसरन ओतऽ पिबिहह । ' पता नहि कोन बात छै । रामसरन कनेक सुभ्यस्त अछि । कहियो सरपंच रहय । मुदा ओकर नाम सुनितहि हमरा पन्द्रह मन धान मोन पड़ि जाइत अछि जे ओकर पिता हमर पितासँ कर्ज लेने रहय आ कहियो घुरेलक नहि ।
सिबननन एहि ठामसँ फुटि जायत; उत्तर चल जायत, जतय पछिला साल उपटि कऽ बसल अछि । मेनाहीक लोक कटनियाक कारणे चारि ठाम छिड़िया गेल छै । सिबनन अपने दहियारी करैत अछि आ धीया-पूता खेती करैत छै; दिल्ली-पंजाब कमाइत छै । सिबननन हमर किछु खेत बटिया करैत अछि । ओही मे सँ एकटा कोलाक गहूम कमल घेरि लेने छै । तीस साल पहिने ई कोला हमरा बदलेन मे भेटल रहय । कमलक आधा हिस्सेदार बासदेव ई बदलेन कयने रहय । कमलकेँ दोसर ठाम हिस्सा दऽ देल गेल रहैक, जे अखन धारमे छै । हमर बला कोला उपजैत छै, तइँ ओकरा लोभ भऽ गेल छैक ।
'काल्हि गहूम काटि लएह ।'- ई कहैत हम सिबननन केँ विदा करैत छी। मोनमे फसादक भय अछि।अनेक प्रकारक आशंका अछि । मुदा गहूम तऽ खेतमे ठाढ़ नहि रहत । ओकरा तऽ कटनाइए छैक । चाहे क्यो लिअय । पाही आदमीक जमीनकेँ लोक मसोमातक जमीन बुझैत अछि ।
रघुनीक दुआर पर थ्रेसर चलि रहल छैक । रघुनी अपने मरि गेल । धीया-पूता छैक । दू टा बेटा दिल्ली मे छैक । तेसर जे गहूम तैयार कऽ रहल अछि, तकर नाम छिऐक नट्टा । नट्टा हमरा बैसय कहैत अछि । घरक एक कात दू टा चौकी लागल छै । चौकी पर मैल खट-खट भोटिया बिछाओल छै । चौकी सँ सटले दच्छिन गाय, भैंस, बकरी सब रहैत छै । नाकमे निरंतर गोबर आ गोंतक दुर्गन्ध अबैत रहैत अछि । कोसिकन्हाक अधिकांश लोक एहिना रहैत अछि । जानवरक संग । जानवरक समान । जानवरक हालतमे।
हम ओहि मैल बिछौन पर आ दुर्गन्ध मे कनेक काल बैसल रहैत छी । थ्रेसर सँ उड़ैत गरदा आ भूसी भौक मारि कऽ हमरा दिस आबि रहल अछि । सोचैत छी ता कमलसँ गप कऽ ली । उठि कऽ कमल कतऽ चल जाइत छी । कमल अड़ल अछि । आधा गहूम कटबा कऽ ओ अपना ओतय लऽ आनत ।
हम क्षुब्ध भेल उठि कऽ नथुनी मुखिया ओहिठाम चल अबैत छी । नथुनिओ हमर बटेदार अछि । नौ कट्ठा मे तीन सेर मेथी हिस्सा दैत अछि । नथुनी अपन बेटीक खिस्सा सुनबैत अछि । एक मास पहिने कोना पाँच हजार कर्ज लऽ कऽ ओकर विवाह कयलक । दिल्लीमे दू मास रिक्शा चला कऽ कोना ओ कर्ज सधाओत । फेर ओ अचानक पुछैत अछि – 'खाना खेलहक?'
'न' । - हम कहैत छिऐ ।
'कतऽ खेबहक ?'
'कतहु तऽ खेबे करबै ।'
ओ बेटी कें हाक दऽ कऽ हमर खाना बनबऽ कहैत छै ।
गाममे हमरा घर नहि अछि । अड़सठक बाढ़िमे घर जे कटल से फेर बनि नहि सकल । सभ बेर गाम अयला पर ई समस्या रहैत अछि जे कतऽ खायब, कतय रहब ।
भोजन करबैत काल नथुनी आश्वस्त करैत अछि जे ओ हमरा खातिर मछबाहि करत । अपन छोट भाइ धुथराकेँ ओ चिड़ै बझाबऽ कहैत छै । हम माछ आ चिड़ैक सुखद कल्पनामे डूबल सुतबाक चेष्टा करैत छी । निन्न नहि भऽ रहल् अछि । निन्न पर कल्हुका चिंता सवार अछि । गहूम जँ कमल लऽ गेल तऽ भारी बेइज्जती – जाइत-जाइत सिबननन बाजल रहय । हमर देयाद बैजनाथ, कमल पर सन-सन कऽ रहल अछि ।
धन आ स्त्री संसारक सर्वोपरि सुख अछि । लोक एहि दुनूक पाछू बेहाल रहैत अछि । धन आ स्त्रीक तृष्णा कहियो शांत नहि होइत छै । आदमी तइयो एहि मृगतृष्णाक फेरमे पडि. कऽ भटकैत अछि आ दुख उठबैत रहैत अछि ।
हम अवधारि लैत छी जे दंगा-फसाद नहि करबाक अछि । कमल गहूम लऽ जायत तऽ लऽ जाउक । भोरमे निन्न टुटिते मोन पड़ैत अछि जे गहूम कटैत हएत । मुँह-हाथ धो कऽ खेत दिस जाइत छी । गहूम कटि रहल छै । कमल पहिनहि आबि जनकेँ कहि गेल छै जे गहूम ओकरे ओहिठाम जेतैक । जन सभ असमंजसमे अछि । हम कहैत छिऐक गहूम सिबननन ओतय जेतैक । बोझ उठबाक घड़ी संघर्षक घड़ी होयत।
हम घूरि कऽ टोल पर चल आयल छी । चाह पीबाक लेल रघुनाथकेँ तकैत छी । रघुनाथ दूधक जोगाड़मे गेल अछि । दूध आनत तखन चाह बनाओत । सिबननन अबैत अछि । ओ बहुत आशंकित आ बेचैन अछि। हमरा कमलसँ गप्प करय कहैत अछि ।
हम कमल आ ओकर दुनू बेटाकेँ बुझबैत छिऐ जे बकवाद आ दंगा-फसाद कयला सँ कोनो फायदा नहि छै । जाधरि फैसला नहि भऽ जायत, ताधरि गहूम तैयार नहि हएत । रघुनाथ दूध लऽ कऽ कमले ओतय चल आयल अछि । ओत्तहि चाह बनैत छै आ कपक अभावमे हम सभ बेराबेरी चाह पीबैत छी । चाह खतम होइते कमल उठि कऽ खेत दिस विदा होइत अछि । हमहूँ विदा होइत छी । हम सभ चाह पीबिते रही, तखने चारि-पाँच टा बोझ सिबननन अपना ओतय पठबा देने रहै । किछु और कने दूर पर जा रहल छै । कमल ई सब देखि क्रुद्ध भऽ जाइत अछि । मुदा आब तऽ खेल खतम भऽ गेल छै ।
हम जहिया कहियो गाम अबैत छी तऽ चाहैत छी धारमे नहाइ । हेलबाक मौका गामे मे भेटैत अछि । मेनाहीक पूब आ पच्छिम दुनू कात कोसी बहैत छै । पच्छिम कतका धारक पसार बहुत छै । पच्छिम, उत्तर दच्छिन जेम्हरे तकैत छी, तेम्हरे बालु आ धार । दूर-दूर धरि खाली दोखरा बालु जाहिमे पचासो बरखसँ किछु नहि उपजैत छै । मेनाही, परियाही आ भवानीपुर-एहि तीनू गामक लोक तबाह भऽ गेल अछि । पीढ़ी दर पीढ़ी हजारक हजार लोक कोसीक बालु फँकैत मेटा जाइत अछि ।
हाँजक हाँज सिल्ली पानि पर बैसल छै । पच्चीस-तीस टा लालसर भित्ता पर टहलि रहल छै । आब चिड़ै कम अबैंत छै । बहुत पहिने जहिया झौआ, कास आ पटेरक जंगल रहै, तहिया अनेक तरहक जल आ थल-चिड़ै अबैत रहै । पूर्णियाक शिकारी चिड़ै बझबैत रहै आ सुपौलमे बेचैत रहै । आब झौआ उकनि गेल छै आ कास-पटेर उकनल जा रहल छै । पहिने लोक झौआ, कास, पटेर बेचि कऽ किछु कमा लैत छल । जंगलमे झुंडक झुंड गाय-महींस पोसि कऽ जीविका चलबैत छल । खढ़िया, हरिन, माछ, काछु आ डोका मारि कऽ खाइत छल । आब सभ किछु खतम भऽ गेल छै आ जीबाक साधन दुर्लभ भऽ गेल छै।
धारक बीचमे छीट पर एकटा मछवाह पड़ल अछि । बगलमे जाल आ डेली राखल छैक । हम हेलि कऽ छीट पर जाइत छी । फेकुआ अछि । नथुनी मुखियाक भाइ । डेलीमे पाव भरि रेवा छै । तीन घंटाक उपार्जन । समुद्रक कछेरमे जेना लोक पड़ल रहैत अछि, हम तहिना बालु पर पड़ि रहैत छी । एहि दुपहरियोमे धार कातक हवा ठंढ़ा छै । कोसीक पानि ठंडा छै । कनिको काल पानि मे रहला सँ जाड़ हुअय लगैत छै । दूर एक आदमी असकरे डेंगी लऽ कऽ मछबाहि कऽ रहल छै । और कतहु क्यो नहि छै । धार आ बालुक निर्जन विस्तार ।
कोसिकन्हाक लोक साहस आ धैर्यपूर्वक कोसीक प्रचंडताक मोकाबिला करैत अछि आ अपन प्राण-रक्षामे लागल रहैत अछि । कोसीक उत्पात सहैत-सहैत ओ सभ पितमरू भऽ गेल अछि आ सब तरहक दुख सहबाक अभ्यस्त भऽ गेल अछि ।
बेरियाँ मे हम सत्तो ओहिठाम चल अबैत छी । सत्तो हमर पाँच कट्ठा खेत करैत अछि । खेतमे दस बोझ गहूम भेल छैक जे तैयार करत । थ्रेसर अनलक अछि । सत्तोक माय अपन दुखनामा सुनबैत अछि । इलाजक अभावमे मरल बेटाक सोगमे ओ कनैत अछि । आब जे एकटा बेटा-पुतहु छैक तकर अभेलाक कथा सुनबैत अछि । दुख हम नहि बँटबैक, तइयो सुनबैत चल जाइत अछि । ओकर कथा के सुनत ? ककरो छुट्टी नहि छैक । तइँ हमरा सुनबैत रहैत अछि ।
सॉझ मे हम पंचैतीक ओरियान करैत छी । पंचक बुझेलो पर कमल तैयार नहि होइत अछि । फैसला होइत छै-ई खेत ओ लऽ लेत, बदलामे दोसर खेत लिखि देत। बैजनाथ कहैत छै जाधरि कमल लिखत नहि, ताधरि ई खेत छोड़बाक काज नहि छै। बैजनाथ खेत हथियाबऽ चाहैत अछि । जँ हम कहि दिऐक तँ ओ लाठीक जोरसँ खेत खाइत रहत । खेत पर कमलकेँ नहि चढ़य देत । एहि बात लेल ओ अनेक तरहेँ हमरा पर दवाब दऽ रहल अछि । कहैत अछि-तोहर पच्छ लेबाक कारणे कमल हमरा मरबेबाक लेल एकटा पिस्तौल बलाकेँ ठीक केने रहय ।
सत्तोक बकरी मरि गेल छैक । भोरमे निन्न टुटिते ओकर धरवालीक आवाज कानमे पड़ैत अछि । ओ सासुसँ पूछि रहल छै – बकरी कोना मरि गेलै ? ओकर सासु किछु बजैत नहि छै । चुपचाप बकरी लग जाइत छै । दुख आ आश्च र्य सँ बकरी कें देखैत रहैत छै । बकरी मुँह रगड़ि कऽ मरल छै । सत्तोक माय हमरा सुनाकऽ कहैत अछि-घुरघुरा काटि लेलकै की !
हम जाहि चौकी पर सूतल रही, बकरी ओकरे पौवामे बान्हल रहै । सत्तोक घरवाली ओकर गराक डोरी खोलि देने छै आ ऑगनमे जा कऽ सासु पर भनभना रहल छै-हद्दो घड़ी सरापैत रहै मरियो ने जाइत छैक !
सासु हमरा कहैत अछि-बहुत दिन पहिनहि बलि गछने रहै । कैक बेर पाठी भेलैक आ सब बेर बेचने गेलैक । अखनधरि चढ़ौलकै नहि ।
धुरि कऽ अबैत छी तऽ पता लगैत अछि बकरी डोमरा लऽ गेल छै । खाएत । सभ चीज पर मृत्युक छाया पसरल छै । पठरू माय लेल औनाय रहल छै। एम्हर सँ ओम्हर भेमिआइत दौड़ि रहल छै । दूइए-चारि दिन पहिने खढ़ धेने छै ।
सत्तो दुपहर मे दौन शुरू करैत अछि । पहिने अपन बोझ धरबैत अछि । आगू मे ओकरे बोझ राखल छैक। सत्तोक बेटी परमिलिया बोझ उठा-उठा थ्रेसर लग दैत छै । परमिलिया सतरह-अठारह सालक युवती अछि । स्वस्थ-सुगठित शरीर । ओकर जोबनक उभार पुरूष-सम्पर्कक साक्षी छै । ओ अखन सासुर नहि बसैत अछि । सूर्यास्त भऽ गेलाक बाद खुरपी-छिट्टा लऽ कऽ घास लेल जाइत अछि । संध्या-अभिसार ।
भोर मे अकचकाइत उठैत छी । क्यो आधा गिलास पानि ढ़ारि चानि थपथपा रहल अछि । आइ जूड़शीतल छै । सात-आठ बजे धरि चानि पर पानि पड़ैत रहैत अछि । ढ़लाय अपन छागर तकने फिरैत अछि । राति मे क्यो चोरा लेलकै । सोचने रहय बेचि कऽ कर्जा सधाओत । आब हताश भऽ गेल अछि ।
आइ धार मे मेला जकाँ लागल छै । लोक सभ मालजाल धो रहल अछि । छौड़ा सभ धारमे उमकैत अछि आ हो-हल्ला कऽ रहल अछि।
गाम मे आब हमरा कोनो काज नहि अछि । साढ़े तीन मन गहूम जे हिस्सा भेल अछि तकरा सुपौल लऽ जेबाक ब्योंत केनाइ अछि । साइकिल भेटितय तऽ डोमा दू खेप मे पहुँचा दैत । ने साइकिल भेटैत अछि, ने माथ पर लऽ जायवला कोनो आदमी। गहूम पितम्बर लग छोड़ि दैत छिऐ । पाँच-सात दिनमे ओकर गाड़ी सुपौल जेतै ।
दुपहर मे नट्टा परबाक माउँस बनबैत अछि । माउँस सुकन राम ओहिठाम बनैत छै आ भात नट्टा ओहिठाम । नट्टा बजा कऽ लऽ जाइत अछि । पीढ़ा सुकनक धाप पर लागल छै। हमरा भीतर छूआछूतक कोनो भावना नहि अछि । लेकिन आइ अचानक गाममे सुकन रामक ओहिठाम खाइत पता नहि कोना पूर्व-संस्कार जाग्रत भऽ गेल अछि आ कनेक काल धरि विचित्र प्रकारक संकोचक अनुभव करैत रहैत छी । फेर संकोचसँ उबरैत बजैत छी – सुकन भाय! आइ तोरा जाति बना लेलिअह । सुकन कहैत अछि जे आब ओ माल-जाल नहि खालैत अछि । बादमे एक गोटय हँसीमे कहैत अछि- तोरा सभ भठि गेल छह । तोरा सभकेँ जातिसँ बारि देबाक चाही ।
कोसी सभटा भेदभावकेँ पाटि देने छै। डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सब एके कल सँ पानि भरैत अछि । एके पटिया पर बैसैत अछि ।
आब सूर्यास्त भऽ जायत । हम गामसँ विदा होइत छी । संगमे नट्टा आ गनेस अछि । एकटा साइकिल पर थोड़े-थोड़े गहूम लादने ओ दुनू पुनर्वास जा रहल अछि । गामक विकट जीवन पाछू छूटि रहल अछि । संग जा रहल अछि अनेक तरहक स्मृति । ई स्मृति हमर अस्तित्वक अंश बनि जायत आ जीवनमे अनेक रूप-रंगमे प्रकट होइत रहत ।
उपन्यास
-कुसुम ठाकुर,सामाजिक कार्यमे (स्त्री-बच्चासँ विशेष) , फोटोग्राफी आ नाटकमे रुचि । अन्तर्जाल पता:-http://sansmaran-kusum.blogspot.com/

प्रत्यावर्तन - (आठम खेप)
१४

१३ जून १९८५ के भारतीय नृत्य कला मन्दिर मे "मिस्टर नीलो काका" कs सफल मंचन के पश्चात् प्रति वर्ष अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिता मे मिथिलाक्षर आ "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर" जी कs नाटक सब बेर पुरस्कार लैत रहलैन्ह आ मैथिली दर्शक आ नाट्य प्रेमी के सब बेर एक टा नव सामाजिक विषय पर नाटकक नीक प्रस्तुति देखय के लेल भेँटैत रहलैन्ह।

१९८६ मे अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिता के लेल जहिया निमंत्रण आयल छलैक ओहि समय "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर"जी के लिखल नाटक सब मंचित भs चुकल छलैन्ह मुदा नव नाटक केर नाम ओ सोचि कs रखने रहथि। जहिया निमंत्रण आयल छलैक ओकर बाद कलाकार सब के एकटा बैठक भेलैक आ ओहि मे नाटक जे अन्तराष्ट्रीय समारोह मे जएबाक छलैक ओकर नाम बतायल गेलैक। नाटक केर नाम "लौंगिया मिरचाइ " सुनतहि कलाकार सब बड खुश भेलाह मुदा जखैन्ह इ सुनालाह जे मात्र नाम टा लिखल छैक तs पहिने त किछु कलाकार मायुस भेलाह मुदा सब बेर नाटक मे ओहिना होइत छलैक आ ता धरि कलाकार सब श्री लल्लन जी के प्रतिभा सँ परिचित भs गेल छलाह।

कलाकार सब केर बैठकी के बाद ओहि दिन राति मे बैसि कs पात्र आ "पहिल दृश्य" लिखि देलाह आ हमरा ओ कैयेक बेर सुनय परल। ओकर बाद रबि दिन सs रिहर्सल सेहो शुरू भs गेलैक। एक दृश्यक रिहर्सल कतेक दिन होयतैक। एक दिन साँझ मे देखलियैन्ह रिहर्सल स जल्दि आबि गेलाह आ आबिते कहलाह "आजु हम लिखय के मूड मे छी आ एक दृश्यक रिहर्सल कतेक दिन होयत। अहाँ सब खेलाक बाद सुति रहु आ हमरा लेल चाय बना कs राखि दिय हमरा आजु नाटक पूरा करबाक अछि"। इ सुनतहि हम कहलियैन्ह हम सुति जायब ता अहाँक संवाद सब के सुनत। हम नहि सुतब अहाँ चिंता जुनि करू हम चाय बना बना कs अहाँके दैत रहब। राति मे बच्चा सब खेलाक बाद सुति रहलाह हम चाय बना कs राखि देलियैन्ह आ बैसि कs किछु समय हुनक संवाद सब सुनलियैन्ह मुदा किछु समय बाद नीँद आबय लागल तs सुति रहालौंह। अचानक नीँद खुजल तs देखलियैन्ह लिखिए रहल छलाह ओहि समय ठीक ४:३० होइत छलैक। हुनका लग गेलहुँ तs कहलाह आब खतमे पर छैक एक बेर चाय पिया दिय। हम उठि कs चाय बनेलहुँ आ चाय दुनु गोटे चाय पिलहुँ ५:३० बजे तक "लौंगिया मिरचाइ" नाटक पूरा छलैक। इ नाटक सेहो कैयाक टा पुरस्कार पौलक।

"मिस्टर नीलो काका" के बाद जे नाटक सबस बेसी लोकप्रिय आ चर्चित भेलैक ओ छैक बकलेल। २९-४-बकलेल के अन्तराष्ट्रीय मैथिली नाट्य प्रतियोगिता के लेल कलाकार भवन एहि सिनेमा मेक मंचन भेल। एहि नाटक के सर्वोत्तम नाटक, सर्वोत्तम आलेख , सर्वोत्तम निर्देशक, सर्वोत्तम बालकलाकार, सर्वोत्तम प्रकाश परिकल्पना आ सर्वोत्तम मंच सज्ज्या के पुरस्कार भेटलैक आ नाट्य प्रतियोगिताक निर्णायक मंडलक अध्यक्ष आ फ़िल्म निर्देशक " श्री प्रकाश झा" मंच पर पुरस्कार दैत समय "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर जी" कs प्रशंसा करैत पता आ फ़ोन नम्बर माँगि लेलाह।

बकलेल नाटक केर किछु मास बाद अचानक एक दिन प्रकाश जी के फ़ोन अयलैन्ह आ फ़ोन पर कहलथिन्ह जे ओ एकटा फिचरेट फिल्म बना रहल छथिन्ह आ ओहि फिल्म मे मुख्य भूमिका करबा के छैन्ह, आ जल्दी दू तीन दिन के लेल पटना आबय परतैंह। ऑफिस सs छुट्टी लs पटना गेलाह आ दू तीन दिन के बाद आपस आबि गेलाहआपस अयला के बाद अपन ऑफिस स छुट्टी ल आ दू कलाकार के अयबाक लेल कहि चलि गेलाह। प्रकाश जी हुनका अपन कलाकारक चुनाव मे सेहो रहबाक लेल कहने रहथि।

कलाकारक चुनाव सs शूटिंग धरि करीब डेढ़ मास लागि गेलैक। शूटिंग बेतिया लग गाम मे भेल छलैक आ किछु बम्बई मे ।सिनेमाक नाम छलैक " कथा माधोपुर की " ई सिनेमा पंचायती राज पर बनायल गेल छैक।
(अगिला अंकमे)

अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, साठिसँ बेशी लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।


प्राथमिकता

-बौआक मूड़नमे कतेक खर्च भेल हेतउ बुच्ची।
-तोरा सऽ कोन लाथ माय, यैह बीस-पच्चीस हजारक आस-पास।
-की कहले! बीस-पच्चीस हजार।
-हँ, ओहिमे भोज-भात, कपड़ा-लत्ता,लेआओन-हकार सबटा ने भेलै।
-अएँ गइ, एते पाइ छलनि ओझाक हाथपर।
-नै सब पाइ तऽ नै छलनि हाथपर, किछु एम्हर-ओम्हर, पैंच उधार सेहो भेलै।
-चल भगवतीक दया सऽ काज नीक जकाँ पार लागि गेलउ, जस देलकउ समाज आर की चाही। अच्छा कह तऽ बौआक सब भेकसीन (सूइ) सब पड़लै की नै।
-हँ गय पड़लै। मात्र दू-तीन टा बेसी दामी बला पन्द्रह सै, दु-हजार बला सब बाँकी छैक से दिया देबै बादमे।
-छिः छिः छिः। तोरा बेटाक भेकसीन बाँकी छउ देनाइ आ तू भोज केले हे। कोन मनुक्ख भेलेँ तू...!!
सुशान्त झा
मैथिली भाषा- संस्कृति के रक्षाक लेल एकटा संस्था जरुरी अछि

यूट्यूव पर भटकि रहल छलहूं। नौकरी के व्यस्तता के वजह सं एतेक फुरसति नहि भेटति अछि जे यूट्यूब पर अपन मनपसंद गीत सुनि सकी। कोशिश रहैत अछि जे फुरसति भेटय त मैथिली गीत सुनी। मैथिली गीत जे सब यूट्यूब पर उपलब्ध अछि ओहि में बेसीतर बियाहक गीत आ भक्ति गीत सब अछि। मैथिली के विराट संसार में जे छिडियाल लोकगीत सब अछि तकरा सब के एकठाम पौनाई मुश्किल अछि। दोसर बात ई जे सब गीत के रिर्काडिंग सेहो नहि भेल छैक, भेलो छैक त ओकरा संकलन के काज बड्ड कठिन। गीत सब सुनिक मन नास्टेल्जिक भ गेल...कमला-बलान के धार आ राजनगर के मंदिर यादि आबय लागल। गजेंद्रजी के फोन केलियन्हि। हम जानय चाहै छलहुं जे की समस्त लोकप्रिय मैथिली गीत के वेबसाईट पर डालल जा सकैत छौ की। लेकिन पता चलल जे अहि में कापीराईट के संकट छैक। एखन अगर कियो मैथिली गीत संगती सुनय चाहैत अछि त किछ वेबसाईट पर 10-20 टा गीत छैक या नहि त यूट्यूब पर ओकरा गीत खंगालय पड़तै। हम ई खोजै छलहु जे कोनो एकटा वेबसाईट होइत जतय दिल्ली बंबई स ल क अमेरिका तक में रहय बला मैथिल अपन भाषा में गीतसंगीत के आनॆंद ल सकितथि। दुनिया जहि हिसाब स बदलि रहल अछि ओहि में अंग्रेजी आ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद स बचनाई बड्ड मुश्किल बुझना जाईत अछि। लेकिन अगर सतर्कता स नब तकनीक के उपयोग कयल जे त मैथिली गीतसंगीत के विराट संसार के मैथिल भाषी तक आसानी स पहुंचायल जाय सकैछ। मैथिली लोकगीत, नाटक, लोककथा आ आख्यान हमर बडड् पैघ धरोहर अछि। आ एकर सॆयोजन के जरुरत छैक। अगर अहि स हम सब आम मैथिल के जोड़ सकी त एखनो बडड् उम्मीद अछि। लेकिन अहिलेल हमरा सबके मैथिली के सब रुप के दिल खोलि क अपनाबय पड़त अ पंचकोसी के ग्रंथि स बाहर आब पडत। अहि मुद्दा पर हम पहिनौ लिखि चुकल छी। दोसर बात जे आब बला जमाना आडियो विजुअल के छैक। पूरा दुनिया में लोक पढ़ै में दुर्भाग्यजनक रुप सं रुचि घटि रहल छैक। लोक आडियो आ विजुअल बेसी देखय चाहैत अछि। ई आब बला जमाना में आर बढ़त। अहि स इंकार नै। एखनो जे मैथिल कहिय़ो अपन जिनगी में एकटा मैथिली पोथी नै पढ़लन्हि ओ मैथिली के गीत सुनि क विभोर भय जाय छथि। आवश्यकता अहि बात के अछि हम सब कोन प्रकारे अहि विशाल समुदाय के अपन संस्कृति के अहि मजबूत उपकरण स जोड़ि क राखी। छिटपुट स्तर पर मैथिली में गीत संगती के कैसेट बनैत अछि, फिल्मों बनि रहल अछि आ आब एकटा टीवी चैनल के सेहो सुनगुनी अछि। लेकिन एकर कोनो संस्थागत प्रयास नहि भ रहल अछि। संविधान में भाषा के स्थान भेट गेलाके बादो हम सब सरकार स बड्ड उम्मीद नहि क सकैत छी। लेकिन अगर अहि दिशा में कोनो गैरसरकारी प्रयास इमानदारी स कयल जाई त एखनों बहुत काज कयल जा सकैत अछि। अहि दिशा में गजेंद्रजी के प्रयास वास्तव में स्तुत्य छन्हि जे बुहत मेहनत क क अहि दिशा में काज क रहल छथि। मैथिल बुद्धीजीवी सबके अहि पर विचार करय के चाहियनि आ कोनो तरीका खोजय के चाहियनि। अहि में बाद में सरकारी अनुदान आ विदेशी अनुदान स ल क वैयक्तिक अनुदान के कमी नहि रहत-ई हमर दृढ़ निश्चय अछि। कोनो ट्रस्ट या सोसाईटी के अधीन अगर ई काज कयल जाय आ नया विचार सामने आबय त ओ स्वागतयोग्य कदम होयत।
नवेन्दु कुमार झा, आकस्मिक समाचारवाचक सह अनुवादक, मैथिली संवाद, आकाशवाणी, पटना

१.रेलवेक श्वेत पत्रकेँ लऽ कऽ चलि रहल अछि वाक् युद्ध

संसदमे प्रस्तुत वर्ष २००९-१० क रेल बजटमे भने बिहारक उपेक्षा कयल गेल हो मुदा बिहारक नेताकेँ जेना एकर चिन्ता नहि अछि। परञ्च रेलवे मंत्री ममता बनर्जी द्वारा रेलवेक स्थितिपर श्वेतपत्र जारी करबाक घोषणाक बाद बिहार दू टा पूर्व राजनीतिक मित्र मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आ पूर्व मुख्यमंत्री आ पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद एक दोसरापर हमला कऽ रहल छथि। एक दिस रेल बजटमे बिहारक उपेक्षाकेँ लऽ कऽ कांग्रेसकेँ छोड़ि आन दल आ संगठन केन्द्र सरकारकेँ अपन निशाना बना रहल अछि तँ दोसर दिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रेल मंत्री ममता बनर्जीक प्रशंसा कऽ हुनका द्वारा रेलवेक स्थितिपर श्वेत-पत्र जारी करबाक घोषणाक समर्थनमे ठाढ़ भेल छथि। बिहारक चुनावी राजनीतिमे पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसादकेँ जमीन धड़ा देलाक बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार श्वेत-पत्रक माध्यमसँ पूर्व रेल मंत्रीकेँ प्रदेशक राजनीतिसँ बेदखल करबाक प्रयासमे लागल छथि।

वर्तमान वित्तीय वर्षक रेल बजटमे बिहारकेँ कतिया देबाकेँ मुद्दा बनेबाक बजाय श्वेत-पत्र जारी करबाक लेल सभ दिन बयानबाजी भऽ रहल अछि। ई विडम्बना कहल जा सकैत अछि जे रेलक मामिलामे पछुआयल बिहारकेँ एहि बेरुका बजटमे नव घोषणाक मात्र लॉलीपॉप थमा देल गेल। कोनो नव परियोजना एहि बेर बिहारक हिस्सामे नहि आयल। पूर्व रेल मंत्री द्वारा रेलवे घोषित परियोजना सभपर रेल मंत्रीक रवैय्या उदासीन रहल तथापि ई मुद्दा श्वेतपत्रक आगाँ गौण भऽ गेल अछि।

रेलमंत्री द्वारा रेलवेक स्थितिपर श्वेतपत्र जारी करबाक घोषणाक बाद नीतीश कुमार जाहि तरहेँ सक्रिय छथि, ओहिसँ लगैत अछि जे ओ पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसादकेँ प्रदेशक राजनीतिसँ उखाड़ऽ चाहैत छथि। श्री कुमारक अनुसार वर्तमान रेल बजटमे पूर्व रेलमंत्री द्वारा रेलवेकेँ लाभ देखेबाक जे हवाइ-चित्र प्रस्तुत कऽ जे बाजीगिरी पूर्व रेलमंत्री कयने छलाह, ओकर पोल खूजि गेल अछि। एहिसँ आँकड़ाक जे खेल खेलल गेल छल से सोझाँ आबि गेल अछि।

ज्योँ पुरान मित्र हमलापर हमला कऽ रहल होथि तँ भला पूर्व रेलमंत्री कोना चुप बैसि सकैत छथि। पूर्व रेलमंत्री लालूप्रसाद रेलवेक स्थितिपर श्वेतपत्र जारी करबाक घोषणाकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार कयलनि अछि आ सात दिनक भीतर श्वेतपत्र जारी करबाक चुनौती रेलमंत्रीकेँ देलनि अछि। श्री प्रसादक अनुसार रेलवेक भेल लाभ पूर्वक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकारक उपलब्धि छल मुदा कुण्ठासँ ग्रसित भऽ वर्तमान सप्रग सरकारक रेलमंत्री एहिपर आँगुर उठा रहल छथि।

कहल जाइत अछि जे दुश्मनक दुश्मन दोस्त होइत अछि आ एहि तर्जपर ममता बनर्जी द्वारा लालू प्रसादपर अपरोक्ष हमला कयलाक बाद नीतीश कुमार श्री प्रसादकेँ अपन निशाना बना रहल छथि। रेलवेक बहन्ने दुनु पुरान मित्रक भऽ रहल वाक् युद्धमे बिहारक हक मारल जा रहल अछि, एकर सुधि लेबाक फुर्सत ककरो नहि अछि।
२.ममताक रेल बिहारमे भेल डिरेल्ड

लगातार तेरह बरख धरि रेलवेक लेल विशेष महत्व राखयबला बिहार एहि बेरुका रेल बजटमे कतिया गेल। गोटेक डेढ़ दशक धरि जार्ज, नीतीश, रामविलास आ लालू जाहि तरहेँ रेल बजटमे बिहारमे सरपट रेल दौड़बैत छलाह, ओहिसँ बिहारक जनताकेँ अहू बेर पैघ आशा छल। मुदा रेलमंत्री ममता बनर्जीक रेल बजट पूरा देशमे सरपट दौड़त बिहारमे डिरेल्ड भऽ गेल। पूर्वक बिहारी रेलमंत्रीसँ नाराज ममता दीदी बिहारकेँ मात्र लालीपाप थमा श्वेतपत्र जारी करबा तेहन शगूफा छोड़लनि अछि जे बिहारक नेताकेँ अपन हकक याद बिसरा गेल अछि आ ओ श्वेतपत्रक बहन्ने एक दोसराकेँ नीचाँ देखबऽ मे लागल छथि।

वर्ष २००९-१०क रेल बजटमे मिथिलांचल तँ जेना रेलवेक नक्शासँ गायब बुझा रहल अछि। रेलवे नव-घोषणाक प्रतीक्षा कऽ रहल मिथिलावासीकेँ ममता दीदी जेना बिसरि गेलनि। बजटमे बिहारक लेल कयल गेल आधा दर्जन घोषणामे सँ मिथिलांचलक हिस्सामे सीतामढ़ीसँ बैरगनियाक मध्य रेल-लाइनक दोहरीकरण आयल अछि। राजधानी पटना विश्वस्तरीय स्टेशन बनेबाक सूचीसँ गायब अछि, ओना रेलवेक अधिकारी एहिसँ मना कऽ रहल छथि, ओतहि दू टा नव ट्रेन पटनासँ राँचीक मध्य एकटा जन-शताब्दी आ झाझासँ पटनाक मध्य सवारी गाड़ीक संगहि गया आ जमालपुरक मध्य सवारी गाड़ीक घोषणा एहि रेल बजटमे कयल गेल अछि। आन नव घोषणामे पटना-सिकन्दराबाद आ पटना-पुणे ट्रेनक परिचालन प्रतिदिन, बाबूधाम-मोतीहारी एक्सप्रेसक विस्तार मुजफ्फरपुर धरि आ मुजफ्फरपुरक रास्ता राजधानी ट्रेनक परिचालनक घोषणा कयल गेल अछि। ममता दीदी नव नन स्टॉप ट्रेनसँ पटनाकेँ वंचित कऽ रेल मंत्री अपन मंशा स्पष्ट कऽ देलनि। एहि वर्ष चलयवाला १४ टा नव नन स्टॉप ट्रेनमे सँ कोनो ट्रेन पटनासँ नहि खूजत मुदा पटनावासी पटना जंक्शन भऽ कऽ जायबाला एहि ट्रेनकेँ टाटा-बाय-बाय कहि सकैत छथि।

३.चेतना समितिक आम सभामे नव पदाधिकारीक भेल चुनाव

मिथिलांचलक प्रतिनिधि सामाजिक संस्था चेतना समिति पटनाक सम्पन्न भेल वार्षिक आम सभामे वर्ष २००९-११क लेल नव पदाधिकारीक चुनाव कयल गेल। सम्पन्न चुनावमे उपाध्यक्षकेँ छोड़ि आन पदाधिकारी निर्विरोध चुनल गेलाह। समितिक निर्वर्तमान अध्यक्ष विजय कुमार मिश्र पुनः अध्यक्ष बनलाह तँ सचिव पदपर विवेकानन्द ठाकुर निर्वाचित भेलाह अछि। उपाध्यक्षक तीन पदक लेल भेल मतदानमे प्रेमकान्त झा, प्रमीला झा आ पुरुषोत्तम झा निर्वाचित घोषित भेलाह अछि। मधुकान्त झा, सत्यनारायण मेहता आ प्राणमोहन मिश्र संयुक्त सचिव, योगेन्द्र नारायण मल्लिक कोषाध्यक्ष, जगत नारायण चौधरी, संगठन सचिव आ सुरेन्द्र नारायण यादवकेँ प्रचार सचिव बनाओल गेल अछि।


कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

मनस्ताप

आजिर भऽ गेल छल मोन फाईल निबटबैत-निबटबैत। मोन के कने हल्लुक करबा लेल कुर्सी सँ उठि अपन चैम्बर सँ बाहर निकलले रहि कि ऑफिसक पाछु ओहि कोन मे किछु देखि कऽ ठमकि गेलंहु। देखैत छी हमर अर्दली रामनिवास ककरो सँ मंद स्वर कनफुसकी करैत़़ किछु बुझबैत़़ ओ व्यक्त्ति अपन जेब सँ एकटा नोट निकाललक़़ रामनिवास ओ नोट ओहिना पैंटक जेब मे राखि लेलक़़ फेर ओहि व्यक्ति के आश्वस्त कऽ रामनिवास पाछु मुड़ल। अप्रत्याशित रुप सँ हमरा सामने देखि रामनिवास सकपका गेल़़ हवांस उड़ऽ लगलै़ चेहरा पीयर पड़ऽ लगलै़ पैर काँपऽ लगलै। चोट्टहि हमरा पैर पर खसि कऽ कानऽ लागल़़''हाकिम! बड़ पैघ गलती भऽ गेल हमरा सँ हमरा एहि बेर माँफ कऽ दियऽ हम कान पकरैत छी़ ।'' हमर तामस टीक तक चढ़ल जा रहल छल़़ हमर अर्दली आ घूस़़ ओकर की छैक?बदनामी तऽ हमर हैत। केयो कहैत तऽ बाद मे पतियबितौं आइ तऽ चोर सेन्हे पर धड़ा गेल।

लोकक भीड़ बढ़ले जा रहल छलै़ ज़ते मुँह, तते तरहक बात। कनिये कालक बाद डी०एस०पी० अपने आबि रामनिवास के पकड़ि कऽ लऽ गेलाह। रामनिवास कनैत पुलिसक संग जा रहल छल़़ हमरा मोन के उसास भेटल़़ ठोर सँ कठोर सजा भेटक चाहि एहन भ्रष्टाचारी के़।

दिन बीतल़़ समय बीतल़़ हमहुँ तबदला पर दोसर शहर मे आबि गेलंहु। एक दिन विभागीय मंत्री के औफिस सँ फोन आयल - मंत्रीजी भेंट करऽ चाहि रहल छथि। मंत्रीजीक आदेश भेलनि जे पुरनका ऑफिसक ठेकेदार धर्मपाल एण्ड संस के सभ बकाया बील बैक डेट मे पास कऽ दियौ। डेड लाईऩ तीन दिन के भीतर भुगतान भऽ जेबाक चाही।

अनमनस्क मोन सँ हम पुरना बील सभ मँगा होटलक कक्ष मे बैसल पास कऽ रहल छी़ आन ऊपाईये की़ ऩोकरक लेल तऽ मालिकक आदेश सिरोधार्य। नोकरी करक अछि तऽ उचित-अनुचित सभटा करहि परत़़ हंसि कऽ की कानि कऽ । बील की छलैक सभटा झूठ़़ बिना काज करबायल़़ आब परमेश्वरे टा रक्षक सैह सुमीरि दस्तखत केने जा रहल छी झूठक पुलिंदा पर।

जखन एतऽ आयले छी तऽ पुरनका मित्र सभ सँ भेंट-घाँट नहि केनाई सेहो कोनादन होयत । दोसर, मोनक भड़ास निकलि जाय तऽ मोनो हल्लुक होईत छैक । सैह सोचि पैर अकस्मात जिला जज के आवास दिस बढ़ि गेल। जिला जज कर्णजी हमर नीक मित्र मे सँ छलाह। बेचारे बड़ सहृदय लोक। जखन एहि ठाम पोस्टिंग रहय तखन एको दिन भेंट नहि भेला पर तुरत फोन आबि जाय जे निके छी कि नहि।

चाय-स्नैक्स के बीच मे चर्चाक मध्य हमरा मोन पड़ि गेल रामनिवास़़ मोन कि पड़ल कर्णजी के कनियाँ मोन पाड़लनि । छगुंता भेल जे रामनिवास एखनो धरि जेले मे आछ। कर्णजी हमरा तजबीज करैत बजलाह- ''सजा तऽ अपराध सँ बेसी भईये गेलैक मुदा हम जमानति एहि द्वारे नहि देलियै जे ओकरा आहाँ स्वयं पक़डने रहि।'' हम हुनका सँ जमानतिक आग्रह कऽ लौटि फेर पुरना बील मे ओझरा गेलंहु।

दोसर दिन बील सँ मगजमारी के बीच बाहर किछु आहट बुझना गेल़़ मुड़ी उठौलंहु़ आगाँ मे रामनिवास दुनू प्राणी कऽल जोड़ने ठाढ़ छल। केयो किछु नहि बाजल़़ दुनूक आँखि सँ आवरल नोर बहल जा रहल छलैक। हमरो मोन द्रवित भऽ गेल़़ अंतरात्मा कान उमेठलक़़ ''बीस रुपया लेल़़ सेहो काज जल्दी करा देबाक लेल ज़ँ सजा पाँच मासक जेल छैक; तऽ बिनु काज करेनहि ठेकेदार के गरीबक लाखो रुपया पेयमेंट कऽ देबाक घोर अपराधक सजा कि हेबाक चाहि? उम्र कैद वा फाँसी वा ओहु सँ किछु बेसी़?''

रामनिवास दुनू प्राणिक आँखि सँ दहो-बहो बहैत नोर साईत हमरा सँ यैह मूक प्रश्न कऽ रहल छल। आई हम अपराधी रुप मे ठाढ़ छी ओकरा दुनूक समक्ष बौक बनल।
चन्द्रेश
संवेनशील मोनकेँ छुबैत हुगली ऊपर बहैत गंगा
रामभरोस कापडि भ्रमरक ३२ गोट कथाक संग्रह थिक हुगली ऊपर बहैत गंगा । एहि संग्रहक नामक अन्तिढ़म कथा थिक । हीरा आ सोना बाईक माध्यपमे कथाकार नारी मोनक संवेदनाकेँ उभारिक भविष्यलक सृजन दिस डेग उठाओल अछि । ई सत्यढ़ थिक जे नारीक देहक अवयवकेँ कामुक पुरुष अपन धन–सम्पेत्ति बुझि ओएह व्यरवहार करैत अछि जे नारीक मोनकेँ दुःख ओ पीडामे भरिक कुण्ठिीत करैत अछि । नारी मात्र देह नहि थिक । नारी आ पुरुषक साहचर्य अबस्से‍ सृष्टििक निरन्तढ़रता थिक । एकर अर्थ ई नहि जे नारीक देहकेँ खेलौना बूझिक खेलायल जाय । ओकर अंग–प्रत्यंागकेँ तोडि–मरोडि अर्थात् अत्यानचार क प्रेम ओ विश्वाथसके तोडल जाय । ई सत्यल अछि जे आजुक भौतिकबादी युगमे धनक अतिशय लिप्साग अबस्सेे मानवीय मूल्यनबोधकेँ गिडने जा रहल अछि । जेँ कि मानवीय चेतना आ मनुष्यअता कुण्ठिकत क देल गेल अछि तेँ अनैतिकताक अढमे छिडहरा खेलाओल जाइत अछि । धन–मदक एंठी पर नग्नच कामुकताक ताण्डकव मचल अछि । दैहिक जरुरतिसँ बेसिए काम क्रीडामे भोग आ लिप्साि नयन रंजन भ गेल अछि । तेँ विभिन्ने मुद्रा अख्ति्यार क आवेग आ उच्छ्छाअसमे अमानवीयताक – क्रूर आ पैशाचिक रुपक दिग्दअर्शन होइत अछि । लाचार मे विचार कतय ? फलतः वासनाक भ्रमजालमे ओझरा क नैतिकता ओ मर्यादाकेँ अतिक्रमण क कुत्सि–त मानसिकताक – क्रूर रुप झलकि अबैत अछि ।
एहि शीर्षक कथामे हीरा असन्तोभष आ खौंझीकेँ मेटयबाक लेल सोनाबाइक ओहिठाम अबैत अछि । ओकर एकमात्र उद्देश्यक रहैत छैक जे मोनकेँ बहटारि लेब । सोनाबाइ अपन पेशामे कतहु कोनो कोताही नै करैत अछि । ओ आवेशक स्नेमहिल स्‍वरमे लगीच अयबाक आमंत्रण अपन परिधान खोलि क दैत अछि । हीराकेँ ठकमुहरी लागि जाइत छैक । ओकर हृदयमे नारीक प्रति सम्मासन– भाव जागि जाइत छैक । ओकर मनोभावमे स्त्रीी संवेदना अस्मितताक पर्याय बनि उभरि अबैत छैक । सोनाकेँ हडबडी छैक जे एकटा ग्राहकसँ निपटत तँ दोसरक आश ? ओ बजैत अछि जे आउ ने,आनो ग्राहक खोज पडत ने (१४४) । हीरा हारल जुआडी सन मनोव्य्था की कहि दैत अछि जे सोनाक आँखि चमकि उठैत अछि । ओकर सबल मानवीय संवेदना उभरि अबैत छैक – हम आइ पहिल बेर कोनो सुच्चाह मनुक्खाक दर्शन कयलहुँ अछि (१४६) । परिणतिमे दुनूक सुरक्षा भावमे अपनत्वाबोध जागि जाइत छैक ।
तात्प्र्य जे दैहिक भोगसँ बेसी–मोनक राग जे हल्लु४को आँच पर बरकैत रहैत छैक वा बेसिए आँच पर किएक ने, मुदा दुनू स्थि तिमे अनुशासित रहैत छैक । यैह कारण थिक जे जीवनकेँ गति आ उष्मा६ देबामे स्त्री –पुरुषक साहचर्य दोसरक पूरक बनैत अछि । आजुक समाजमे अमानवीयताक यैह स्थिछति अछि जे स्त्रीनकेँ चीरीचोँत क अपन पुरुषत्वै देखयबाक दम्भ भरैत अछि ततय सोना आ हीराक बीचक घटित घटना कनेक अविश्विसनीयताकेँ पनुगबैत अछि । जतय सोनाक संग भेल अत्याुचार स्व तः उघरैत व्य था–कथा कहैत अछि ततय ई पंक्तिक–सोना आन बाइ जकाँ तोडल–मचोडल नहि गेलि रहय, बाँचल छलीह (१४४) सेहो अविश्व्सनीय बुझाइत अछि । शिल्पयक दृष्टििएँ अवस्से ई कथा कनेक कमजोर अछि, मुदा कथ्याक दृष्टि एँ रक्त४ आ स्नेसहसँ जे अपनत्वी बोध जगाओल गेल अछि से अबस्सेई मनुष्यिक मनुष्यथताक स्वाछद चीखबैत अछि ।
आब ई प्रश्न‍ उठब स्वा भाविके जे मनुष्यिक मनुष्यतताकेँ अमानवीय बनयबाक दोषी के ? की जन समाज ? समाज तँ लोकेक थिक । ई सत्य अछि जे आइयो हीरा सन गनल–गूंथल लोक अछि । तथापि कामोत्तेजक भाव–भंगिमा नेने दैहिक जरुरति बुझि वा फैशनपरस्तस भ कुटिल पुरुषक अहं अबस्सेठ स्त्री केँ भोगक सामग्री बुझि पबैत अछि जे मोनक तुष्टिब हेतु कुविचारेँ पाश्विभक आचरण करैत अछि । जं हीरा आ सोना बाइसन एक दोसरक प्रति समर्पण आ निष्ठार–भावमे राग उभरय तँ निश्चिनते अनैतिकताक अढमे होयत विकृतिक विषाक्त चद्दरि फाटत आ असली छवि जगजियार होयत । एतेक तँ निश्चिवते जे विश्वाचस आ हार्दिकतामे स्त्री –पुरुषक आकर्षण अबस्सेव जीवन–सत्यतक अढमे मानवीय आकांक्षाक पूर्तिमे सबल ओ सहायक सिद्ध होयत । हीरा आ सोनाक हृदयमे वास्त‍विक प्रेम–भाव की अंकुरित होइत अछि जे सहजता ओ सरलतामे आन्तवरिक जटिलताकेँ आरो सघन बनबैत अछि । नारी पूरक बनैत अछि । जेंकि अभिजातीय संस्कृरतिक विरोध स्वारुप सामाजिक अस्मििताक व्या पक बोध अर्थात् स्त्रीो पुरुषक सहज आकर्षणमे आत्मिरक स्व र उभरिक आत्मिस्फुकलिंग छिटकबैत अछि तेँ दुनूक संघर्षमे सामाजिक जीवनक यथार्थ झलकि उठैत अछि ।
आधुनिक चकचोन्हीहमे अन्हतरायलि भगजोगनी कथामे रेखाक भोगबादी लिप्साछ ततेक आगाँ बढि जाइत अछि जे अपन बसल–बसाओल घर उजारबासँ बाज नहि अबैत अछि । ओ बिसरि जाइत अछि जे अर्थलिप्साो सम्बेन्धलकेँ गीडि जाइत अछि । फल भेटैत छैक जे जखन जीवनक बोध होयत छैक तँ गत कर्मक तर्पण करैत अछि । ओ भ्रमजालमे जे अहुरिया कटैत छल से तोडि फेकैत अछि । यौन रुपमे उन्म त्त प्रेम आ घृणाक ढहैत देबालक बीच समाज आ सत्यअसँ जे साक्षात् कराओल गेल अछि से अबस्से। वैयक्तिौक चेतनाकेँ धार दैत दाम्प त्यह जीवनकेँ सफल बनबैत अछि । एहिमे प्रेम आ यौन सम्वलन्धीस गेंठकेँ फोलैत कथाकार उपसंस्कृमति पर जमिक प्रहार कयल अछि । ई सत्यत थिक जे दैहिक भूख लोककेँ कामुकतामे जकडि अबस्से देह मैथुनकेँ प्रश्रय दैत अछि । एतेक दूर धरि जे आवेगमे मनोविकार अपन ठोस रुप तत्क्षैण प्रभाव जनबैत अछि । मुदा, काम–भावक भूख सम्वछन्धेकेँ स्थापयित्व नहि प्रदान करैत अछि तेँ असन्तोवष पनुगैत अछि । सामाजिक दायित्वभ बोधक ई कथा थिक । ॅअन्हाारमे भोतिआयल एकटा सिपाही गणेशक संस्म रण थिक । ई संस्मनरणात्ममक रिपोर्ताज थिक । कारण गणेशक संस्महरण उपस्थाआपितक ओकरे गुण–गौरवकेँ परोसल गेल अछि । तें कथा–सूत्रक निर्माण तेना भऽकऽ नहि भेल अछि जेना कि पात्रक परिप्रेक्ष्यंमे घटना आ स्थियतिक विवरणात्मफक प्रस्तुोति भेल अछि । साम्यथबादी विचारधाराकेँ लऽकऽ कामरेड कथाक सृष्टिक भेल अछि– गरीब गरीब सभ एक हो । अर्थात् धनी–गरीबक बीच जे असमानताक खधिया अछि से आरो चकरगर भेल जाइत अछि तकरे भरबाक भरपूर प्रयासमे ई कथा सृजित भेल अछि । सुपत–कुपत आब हमहु सब कहबै (३७) । आत्म चेतना जगयबाक उद्देश्येँ ई कथा सृजित भेल अछि ।
पाइक आगाँ बेइज्जकति आ गारि कथीक एहि पृष्ठमभूमि पर उडान-कथा सृजित भेल अछि । कतार दिस उडान भरबाक लोभेँ आ ढेर पाइ अर्जित करबाक सपना संजोगने रजिन्दआर कापरकेँ पहिलु एजेन्टन दस हजार टाका, दोसर अस्सीक हजार आ तेसर खेप पन्चा‍न्वेद हजारक कर्जा पर लेल टाका बोहाइत छैक । ओ ठकाइत अछि तैयो ओकरा उडान भरबाक आशा छैक । ओ हृदयक कोनो कोनमे दमित इच्छााकेँ संयोगने रहैत अछि जे कोना उडान भरी । जहिना धनक लेल जेबाक हाहुती तहिना एजेन्टछकेँ चाही लाभ । माने ई उडान की, दस हजारसँ पच्चीअस हजार धरिक चोखे नफा । तात्पलर्य जे दुनू गर भिडौने । तेँ बेर बेर ठकाइतो लोक पुनि ठकाइत अछि । एहिमे पाखण्डीे चरित्रक पर्दाफाशक संग केवल जीवन जीनाइयेक मात्र लुतुक नहि होयबाक प्रत्यु त जीवन मूल्योबोधक लेल जीवाक ओकालति संकेत मात्रमे कयल गेल अछि ।
जय मधेशमे एक मधेश, एक प्रदेश लऽकऽ आन्दोीलन अछि । मधेशी आ पहाडीक बीचक खधिया समानतामे पटि जाय । अयोधी मास्ट रके जीवन कोहुनाक मास्टगरीमे खेपायल आ एकमात्र बेटा अशोक केँ नोकरी नहि भेटब । तात्पार्य जे अपेक्षित योग्यजता अछैतो व्य्वस्थेी तेहन वनल छैक जे मधेशकेँ के पूछओ ? तेँ आन्दोीलनी जुलुसमे ओकर बुढायल देहक जोश की हिलोर मारय लगलैक जे ओहो कूदि पडल । ओकर अस्मिथता की जागि उठलैक जे मधेशक लेल ओ किछुओ क सकैत अछि । राष्ट्रि यताक परिप्रेक्ष्यदमे अपन विचार, भावना आ समयके सत्यत केँ उद्भासित कयल गेल अछि । जखन लोकक अस्मििता पर चोट लगैत छैक तँ ओकर मोन कचोटय की लगैत छैक जे स्वसतंत्रताक हनन मंजूर नहि होइत छैक । मधेशी होयबा पर जे गौरवबोध होइत छैक से जखन एके देशमे विषमताक बोध होइत छैक तँ पीडाइत मोनमे आक्रोश पनुगैत छैक । एहिमे मानवीय जीवनक संवेदना झलकि उठैत अछि ।
गहनतम प्रश्नाकनुकूलतामे भहरैत नेओक जोड कथाक सृस्टिा भेल अछि । एहिमे निरसन बाबूक पुत्री सरोजाक दुःस्थिकतिमे अन्ति ओ रानीक संग छलाइत जीवनके कथाकार ओकर मार्मिक पीडाके उभारिक सामाजिक परिवर्तन दिस ध्याअन आकृष्टस कराओल अछि । एतेक दूर धरि जे एकर जिम्मे वार के ? स्त्रीपक त्रासक मार्मिक उद्घाटनक फलस्वररुप ई कथा फोकिला मानसिकताक दम्भ केँ आरो उघार करैत अछि । ओढल अभिभावकत्वेक नीतिकेँ सरेआम चौबटिया पर नग्न‍ क मानवीय जीवनक अनुभवसँ सम्पृवक्तर क निजी संवेदनाकेँ सार्वभौमिक बना देल गेल अछि । एहि प्रकारेँ एक दिस हृदयहीनता आ मूल्ययहीनताकेँ देखार कयल गेल अछि तँ दोसर दिस परिवर्तनक सुगबुगीमे मानवीय सोच आ संवेदनाकें आजुक परिस्थि तमे ठोस दृष्टिय द अमानवीयताक खोलकें चीटीचोंत करबाक सनेस बिलहल अछि ।
अन्तगतः मे किसुनमाक ऊहमपोहक स्थि तिमे जतय पत्नीस उत्तीमपुरवालीक प्रति अनुराग–भाव अछि से पंजाबमे कमाइत मनसूबा पोसने घर अबैत अछि तँ एकटा नेना? मासक फरक । आन बापक बच्चात अर्थात् अनकर जनमल बेटा । रहि रहिक ओकर हृदयकेँ ई बात टीसैत की छैक जे सभटा मनोरथ भग्ना भ जाइत छैक आ अन्तिचम परिणतिमे नेनाक मूडी छपाक् क दैत अछि । निर्दोष आ अबोध बच्चातक हत्याा ।
ई सत्यक थिक जे निशंस हत्यानक फलस्व्रुप हृदय भावमे परिवर्तन आयब स्वा भाविक थिक । मुदा, अबोध वच्चाइक हत्याउ ? तकर परिनति ? कथा जाहि विन्दुह पर आबिक छोडि देल गेल अछि से आगाँक अपेक्षा रखैत अछि । तैयो, एकटा प्रश्नअ पनुगबैत सोचबाक लेल वाध्या करैत अछि ।
अमरलत्ती कथामे रेखाक माध्युमे ओकर बहसलि उद्दाम छविक वीभत्सग रुप देखार कयल गेल अछि । ओ अमरलती बनि चतरैत की अछि जे सहारा बनैत आनक बसल–बसाओल घरकेँ उजारि–पुजारि दैत अछि । अपन बनल घर तँ उपटाइये दैत अछि जे आनोक घरमे वास क ओकर सोनहल दुनियामे आगि पजारि दैत अछि । एहिमे रमेशक कामलोलुपताक रेखाक काम–भाव जाग्रत भ मायाजाल की पसारैत अछि जे आरो अहिमे ओझराइत जाइत अछि । एहि प्रकारें वासनाकेँ उभारिक पुरुष आ स्त्री वर्गक कुत्सिमत मानसिकताकें देखार कयल गेल अछि । सामाजिक कुव्यतवस्था् ओ एहिसं उपजल मानवीय व्य‍थाकें अवस्सेम कथाकार उभारल अछि ।
सम्बरन्धिक पीडामे आशाक हृदयमे बरकैत हृदयक उफान जे प्रेमक उपजामे मानसिक पीडा प्रतिफलित अछि तकर सशक्तक चित्रण भेल अछि । प्रेम कहि–सुनिक नहि होइत छैक आ ने कीनल बेसाहल जाइत छैक । जखन दूटा हृदय मिलैत छैक वा मोन मिलानी भ जाइत छैक तँ बाटमे केहनो रोडा अटकाओल किएक ने जाउक तैयो दुनू–प्रेमी –प्रेमिका हँसैत–कनैत, संघर्ष पथ पर टकराइतो, खसितो–उठितो पार–घाट उतरिए जाइत छैक । सैह स्थिनति आशा ओ संदीपक मोन–मिलानीमे भेलैक । फल भेटलैक जे आशाक माय–बापक हृदयमे उठैत विरक्तिर भाव सम्बान्ध –सूत्रकें खण्डिमत क देलकैक । आ आशा प्रेमक पणिामसँ उपजल मानसिक पीडाकेँ सहबाक क्षमता अपनामे विकसित करबाक प्रयास क रहलीह अछि (१३८) । सामाजिक यथार्थक रुप झलकाक कथाकार सामाजिक व्यावस्थाेकेँ उघेसिक आत्मीरयता ढंगसं लोकजीवनक चित्र उभारबाक प्रयास कयल अछि ।
बालमोनक सुलभ चंचलता ओ नेनपनक निश्चतछलताकेँ स्मगरण करैत नरेशक मोनमे स्मृ तिक तरंग की प्रवहित भ अबैत छैक जे होयत छैक जे हमही किए ने अपनाकेँ नेना बनाली (१४२) । फ्लैश बैक कथाक माध्यममे कथाकार बालपनक अढमे निडरता, निश्छ्ना लता आ सौहार्द्र भावमे वचपनक प्रेमक अनुभूति जगाओल अछि तँ उमेरक चारिम प्रहरक पनुगैत भय, सुरक्षा, षडयन्त्र , सामाजिक विद्रूपता आदिसँ अपनाकें बँचबा–बचयबाक प्रयासकेँ रेखाङ्कित करबाक । ई सत्यष थिक जे नेनपनक बिताओल क्षणक मधुर स्मृातिमे लोकजीवन चाहैये, मुदा संघर्षमे सेहो जीवनकेँ फूट आनन्दब अबैत अछि । सामाजिक व्याक्ति।त्विक दोगला मुंह अर्थात् सभ्य समाजक अंग बनबाक लेल लोक जे छल–क्षुद्रमक खोल ओढने रहैत अछि । से अवस्से मानसिक बुद्धिकें कुण्ठि त करैत अछि, सामाजिक समरसताकें खण्डिेत करैत अछि ।
नेपालीय मैथिली कथा–साहित्योमे निस्स्न्दे ह कथाकार भ्रमरक कथामे जीवनक राग अछि आ अछि नव युगक नारीक प्रति विशेष श्रद्धा–भाव । तेँ हिनक बेसिए कथामे नारी जीवनक संघर्ष अछि । युग यथार्थक त्रासदी जे सामाजिक विडम्ब नामे उपजैत अछि आ एकर कारक थिक सामाजिक व्य वस्थाह । तेँ कथाकारक छटपटाइत मोन मे अबला नारीक चीख अछि आ परिवेशक दंशमे पीडाइत मानसिक व्यिथा–कथा । देह–भोगमे टीसैत दर्द उभरि की अबैत अछि जे सामाजिक सत्यरकेँ देखार करैत यथातथ्यमक मोनक पीडाकेँ उगलि दैत अछि । टूटैत सम्बीन्धह, छुटैत लोक, अर्थ लिप्साकक मोह ओ दैहिक भोगमे पीडाइत कामुकता आ रोटीक समस्याा नेने कथाकारक मोनमे कतेको प्रश्नब छटपटी मचौने अछि तकरे सार्थक अभिव्यअक्तिस द सहज ओ सरल भाषा मे पाठकक सोझाँ परोसि देलनि अछि ।
कोनो सभ्यतता–संस्कृीतिकेँ गतिशील बनाक राखब समाजक लोक दायित्वक थिक । से ताधरि जाधरि ओ सामाजिक जीवनमे सार्थक भूमिका निमाहय । ई नहि जे सडल गलल परम्प‍राकेँ उघने व्य वस्था क तरमे पीसाइत जीवनसँ कटल व्य वस्थाीकेँ सत्य मानि फोकिला मानसिकताकेँ उघैत रही । जे सभ्याता संस्कृतति जीवनमे नहि उतरि सकय तकर परित्यातग करब उचित–विहित थिक । ओ जीवनक अर्थक खोजमे प्रेमक आसरा लैत समयक परिवर्तनकेँ युगक अनुकूलेँ टांकिक नव समाज बनयबाक आकांक्षा रखैत छथि । तें कथाकार सामाजिक विसंगतिसं उत्प न्न् विषमता ओ आर्थिक स्थितिक संग सांस्कृकतिक आयाम पर जमिक विमर्श करबाक लेल प्रश्नाकेँ पनुगबैत छथि । एहिमे हिनक परिवर्तनकारी सोच अबस्से् उत्प्रेसरक बनि नव सामाजिक मूल्यवबोधक संवाहक बनैत अछि ।
हिनक लेखनी अबस्से। शोषित–पीडितक अस्मिेता–अधिकारक बात उठबैत अछि । ओ दबल–कुचलल लोकक पक्षमे भ जाय । ई सत्य अछि जे हिनक प्रेममूलक धारणामे वासना जन्यड उभार कनेक बेसिए उभरि आयल अछि से सत्ते कामुक पुरुषक दम्भोरचित उपजा थिक । किएक तँ पुरुषक पौरुषत्‍व वासनामे विशेषे केन्द्रि त भ आयल अछि । कथाकारक बेचैन मोनमे समतामूलक ओ प्रेममूलक धारा रसप्लारवित अछि तेँ अभावजन्यव पीडामे पीडाइत शोषित वर्गक समस्याा उभरि आयल अछि । स्त्री वर्गक प्रति जहिना पुरुष वर्गक दम्भस, क्रूर मानसिकता ओ व्ययवस्थातकेँ उजागर करैत अछि तहिना सम–सामयिक प्रश्नकक झडीमे रोटीक औकाति देखबैत अछि ।
एहि प्रकारेँ कथाकारक हृदयके व्याथासँ उपजैत अकूलाइत मोनक छटपटाहटिमे सुखाइत प्रेम भावनाकेँ खींचबाक आकांक्षा अछि तँ मूल्य हीनताबोधक प्रति तिक्खृ आक्रोश । जीवनक व्याैवहारिकता सँ सामाजिक मुद्दाकेँ उठबैत छथि । हँ, प्रश्नतक झडीमे किछुक समाहार करैत छथि तँ यथातथ्यत उपस्थाखपन सेहो । ओना, कथाक मूल स्वकर हस्तैक्षेप करिते अछि । ईहो सत्यि अछि जे नारी अनुभूतिक रिक्ति क्षणमे कथाकारकेँ रहि–रहिक� नारीक मानसिकताक भूख दैहिक काम–क्रीडामे ओझरा जाइत अछि । मुदा, ईहो सत्‍य थिक नारीक अन्त रमोनमे पैसिक जे मानसिक विकारकेँ स्वकच्छभ करबाक प्रयास भेल अछि से मात्र कामुकतामे नहि भऽकऽ सामाजिक मूल्य बोधक संवाहक बनिक उभरि अबैत अछि । उपसंस्कृकतिक प्रति हिनक हृदयमे खोंझी आ असंतोष भाव अछि तं सामाजिक नैतिकता आ धार्मिकताक अढमे छिडहरा खेलाइत साम्राज्यकवादी संस्कृहति प्रति विद्रोह भाव मुखरित भेल अछि । मुदा, इहो देखल जाइत अछि जे भ्रमरक कथाकार कथा साहित्येमे जतेक कथ्यृक प्रति सजग रहि पबैत अछि ततेक शिल्पोक प्रति नहि । शैलिक दृष्टििएँ अवस्सेक हिनक कथाकार सजग नहि रहि पबैत अछि जे कथा–सौन्द र्यकेँ बाधित करैत अछि । तें की ? भ्रमरक अनुभववादी दृष्टि‍ सतत चौकन्ने रहैत अछि जे अपन गाम–घर, अडोसिया–पडोसियाक देखल भोगल यथार्थक चिक्क न–चुनमुन चित्रण करैत अछि । हिनकामे कहबाक क्षमता अछि जे शिल्पनक विकासमे आरो सौन्दघर्य आनि निखरत ।
जेँकि कथाकार भ्रमरक चौकन्न दृष्टिप समाजक प्रति सजग अछि । तेँ जीवन मूल्यशक संवाहक बनैत ओ ओहि पात्रक सृष्टि करैत छथि जे समाजमे आइयो निरीह अछि । खासक नारी पात्र हिनक संवेदनशील मोनकेँ छुबैत अछि । ओ नारीक अधिकार ओ चेतनाबोधक पक्षधर छथि । ओ कखनो नारीक पक्षमे छाती तानिक ठाढ होइत छथि । मुदा, उपसंस्कृततिमे घेरायल नारीक वीभत्सक छवि अबस्सेप हिनक हृदयकें पीडित–सीदित करेत अछि । ओ कोनो परिस्थिअतिमे स्वािभाविक यथार्थक तहकें फोलिते छथि । तेँ शोषणक विरोधमे झंडा उठबिते छथि । हिनक संवेदनशील मोनमे जीवनक प्रति रागात्म्क बोध अछि । हं, हिनक कथाकार यथातथ्यिकेँ हू–बहू प्रस्तुशति क दैत अछि से कैक स्तथर पर । तें पात्रक चरित्र तेना भऽकऽ ठाढ नहि भऽ पबैत अछि जे होयबाक चाही । जाहि ठाम हिनक पात्रक चरित्र–चित्रण सजीव भऽ उठल अछि ताहि ठाम कथाक सौन्द।र्य अपन अपूर्व छवि–छटा लऽ मुखरित भेल अछि ।
नेपालीय मैथिली कथा साहित्य्मे भ्रमरक कथा मात्रात्य क ओ गुणात्म क दुनू दृष्टिाएँ अपन प्रभाव छोडैत एकदिस जँ कथा–साहित्यभक भण्डालरकेँ भरैत अछि तँ दोसर दिस कथा दृष्टि मे मूल्य।बोधक संवाहक बनैत अछि । तेँ मानवीय मूल्य बोधक जीवन–दृष्टि् नेने भ्रमरक कथा सामाजिक परिवर्तनमे अपन औकाति सिद्ध करबे करत आ भविष्यरमे ऐतिहासिक मूल्यहक वस्तुत बनबे करत से आशा ओ विश्वामस जगबिते अछि ।
ई संग्रह छपाइ–सफाइक दृष्टिअएँ देखनुक आ मनमोहक रहल अछि खासकऽ पोथीक आवरण विशेष आकर्षित करैत अछि ।

मनमीत कुटीर/राजपूत कालोनी
मौलागंज/दरभंगा–८४६०४
बिहार/भारत!
आशाक किरण
जितेन्द्र झा

मैथिलीभाषा धिरे धिरे आब विद्युतीय संचारमाध्यममे स्थान बना रहल अछि । दिल्लीसं सौभाग्य मिथिला नामक एकटा टेलिभिजन संचालन भेल अछि । इ सम्पुर्ण मैथिली टेलिभिजन रहल कहल गेल अछि । ई मनोरंजनात्मक टेलिभिजन अछि जाहिमे गीत नाद आ टेली श्रृंखला प्रसारणके प्रमुखता देल जारहल अछि ।

इ निश्चित जे जनसंख्याक अनुपातमे इ समुदायके अपन संचारमाध्यम नहि अछि। भारत आ नेपालक सीमामे बांटल प्रतीकात्मक मिथिला एखनो आन भाषाक माध्यमसं सुसूचित हएबाक बाध्यतासं मुक्त नहि भ' सकल अछि । ओना नेपालक किछु एफ़ एम आ नेपाली / भारतीय च्यानलसभसं मैथिली भाषाक माध्यमसं समाचार आ मनोरंजनक सामग्री एहि क्षेत्रमे पंहुच रहल अछि ।

टेलिभिजनमे मैथिलीके स्थापित करबाक प्रयास दिल्लीसं भेल । दिल्लीस संचालित नेपाल वन टेलिभिजनके मधेश स्पेशल कार्यक्रमसं मैथिली भाषामे समाचार आ गीतनाद प्रसारण भ' रहल अछि । दिल्लीसं प्रसारित नेपाल वनमे लगभग दु सालसं बेशी भ'गेल अछि एहि कार्यक्रमके । पहिने एक घण्टाक कार्यक्रममे मैथिलीमे समाचार,अन्तर्वार्ता आ मैथिली भोजपुरी गीत प्रसारण होइत छल आब वएह समयमे भोजपुरी आ थारुके सेहो सन्हिया देल गेल अछि ।

तहिना दिल्लीसं संचालित भोजपुरी भाषाक टेलिभिजनमे मैथिलीके किछु मिनेट भेट जाइत अछि । दिल्लीसं प्रसारित हमार आ महुवा टेलिभिजन मैथिलीमे कखनो किछु मैथिलीमे सामग्री देल करैत अछि । सहारा समयसेहो किछु दिन मैथिली भाषामे साप्ताहिक कार्यक्रम प्रस्तुत कएलक मुदा ओ निरन्तरता नहि पाबि सकल ।

मैथिली भाषा भारतक अष्टम अनुसूचिमे पडलाक बादो सरकारी संचार माध्यममे अपन स्थान नहि बना सकल अछि । दोसर दिश नेपालमे भारतसं संचालित नेपाल वन मैथिली भाषाक माध्यमसं मैथिली भाषीमे अपन अलग स्थान बनालेने अछि । नेपालक सरकारी टेलिभिजन नेपाल टेलिभिजनमे एखनो उपेक्षित अछि मैथिली। नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाएबला दोसर भाषा मैथिलीमे निजी टेलिभिजनसभ किछु रुचि देखौलक अछि । काठमाण्डूसं प्रसारित सगरमाथा टेलिभिजन सांझमे लगभग 15 मिनटके समाचार प्रसारण करैत अछि त बिरगंजसं प्रसारित तराई टेलिभिजन सेहो मैथिलीमे मनोरंजनात्मक आ सूचनामुलक कार्यक्रम प्रसारण करैत अछि । नेपाल टेलिभिजनके मेट्रो टेलिभिजनमे साप्ताहिक मैथिली कार्यक्रम किछु एपिसोड चलल छल मुदा ओ निरन्तरता नहि पाबि सकल ।

मैथिली भाषाके प्रतिनिधित्व कएनिहार सशक्त संचार माध्यमके एखनो नितान्त अभाव अछि । सूचना प्रविधिक एहि युगमे मैथिलीके अपन अस्तित्व बचएबामे संचारमाध्यम सहायक भ' सकैया एहिमे किनको शंका नहि हएबाक चाही । जा धरि सशक्त संचार माध्यम मैथिलीके नइ भेट्त ता धरि इ कल्पना मात्र रहत जे मैथिलीक सुनिश्चित भविष्य अछि ।
अपार सम्भावनाक बादो संचारमे मैथिलीक सिकुडल काया कहिया पुष्ट हएत से कहब अनुमानो लगाएब कठिन ।
३. पद्य

३.१. राजकमल चौधरीक दूटा अप्रकाशित पद्य
३.२. जीवकान्तक टटका पद्य

३.३. आशीष अनचिन्हार

३.४.पंकज पराशर - जानि नहि किएक
३.५. सुबोध ठाकुर- सनेश

३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)


३.७. रूपा धीरू

३.८. ज्योति-बरसातक दृश्य
राजकमल चौधरीक दूटा अप्रकाशित पद्य
(सौजन्य डॉ. देवशंकर नवीन)

१.बही-खाता
एहि खाता पर हम घसैत छी
संसारक सभटा हिसाब
एहि खाता पर हम सदिखन घसैत छी
अपना कर्मक-अपकर्मक कारी किताब!
जे किछु कयने छी पाप-धर्म
जे किछु बुझने छी जीवन-रहस्य आ प्राण-मर्म
जे किछु बुझने छी प्राण-मर्म
जे किछु कयने छी पाप-धर्म
सभटा अंकित अछि एहि लाल बहीमे
एहि लाल बहीमे सभटा इच्छा, समग्र वासना
जे जतबा अछि जकरासँ लेन-देन
जे रखने छी हेम-नेम
सभ दर्ज भेल अछि
सभ दर्ज भेल अछि एहि लाल बहीमे
एहि लाल बहीमे सभटा इच्छा समग्र वासना
जे जतबा अछि जकरासँ लेन देन
जे रखने अछि हेम-क्षेम
सभ दर्ज भेल अछि
सभ दर्ज भेल अछि एहि लाल बहीमे
ककरासँ की लेने छी
हम सदिखन
स्नेह-दया, माया-ममता, घृणा-क्रोध
ककरा की करबाक अछि ऋणक शोध
एतबा दिनमे ककरापर
कतबा कर्ज भेल अछि
सभ दर्ज भेल अछि एहि लाल बहीमे

कविता लिखबाक केर ई लाल-बही
थिक हम्मर जीवन-खाता
हमर सभटा अपराध, ज्ञान, अनुभव
मोह-लोभ-संताप पराभव
इच्छा-अभिलाषासँ लीपल-पोतल
अछि एक्कर सभटा पाता
ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता
जीवन-खाता

२.एकटा प्रेम-कविता
कतेक राति बितला पर
फूल पात तितला पर
मुदा इजोरिया उगबासँ कतेक पहिनें
एकटा म्लान-मुख स्त्री, अनचिन्हार
हमरा हृदयमे
किंवा अपन आँखिमे
किंवा अथाह समुद्र जकाँ पसरल अकाशमे
ताकि रहल अछि अप्पन अतीत
ताकि रहल अछि कहियो
कतेक दिन पहिनें केकरोसँ सूनल
कोनो गीत
ताकि रहल अछि अप्पन अतीत
एकटा म्लान-मुख स्त्री अनचिन्हार
बहुत राति बितलापर
फूल-पात तितला पर
मुदा हमरा निन्न आबि जाइत अछि
आ काँच सपना मे
बसन्त बहार नहि
जीवकान्त: एक अनौपचारिक प्रोफाइल। १९९९ मे साहित्य अकादमी पुरस्कारक लेल मंचपर।जीवकान्त- पूर्ण नाम- जीवकान्त झा
पिता-गुणानन्द झा, माता-महेश्वरी देवी, जन्म तिथि-२५.०७.१९३६ स्थान अभुआढ़, जिला-सुपौल
शिक्षा-मैट्रिक (१९५५ उ.वि.डेवढ़), आइ.एस.सी. (१९५७ आर.के.कॉलेज, मधुबनी), बी.ए. (१९६४ बिहार वि.वि.स्वतंत्र छात्र), डिप.इन.एड.(१९६९ मिथिला वि.वि.)
नौकरी-उच्च विद्यालयमे सहायक शिक्षक। विज्ञान शिक्षक (उ.वि.खजौली १९५७-८१), हिन्दी शिक्षक (उ.वि.डेओढ़ एवं उ.वि.पोखराम १९८१-९८)
पहिल रचना-इजोड़िया आ टिटही (कविता, जनवरी १९६५ मिथिला मिहिर)
पहिल छपल पोथी- दू कुहेसक बाट (उपन्यास १९६८)
नवीनतम पोथी-खिखिरक बीअरि (२००७ बाल पद्य कथा), अठन्नी खसलइ वनमे (पद्य-कथा संग्रह) आ पंजरि प्रेम प्रकासिया (जीवन-वृत्तक अंश) प्रेसमे
पुरस्कार-साहित्य अकादेमी (दिल्ली १९९८), किरण सम्मान (१९९८), वैदेही सम्मान (१९८५)
प्रकाशित पोथी-
कविता संग्रह:
नाचू हे पृथ्वी (७१), धार नहि होइछ मुक्त (९१), तकैत अछि चिड़ै (९५), खाँड़ो (१९९६), पानिमे जोगने अछि बस्ती (९८), फुनगी नीलाकाशमे (२०००), गाछ झूल-झूल (२००४), छाह सोहाओन (२००६), खिखिरिक बीअरि (२००७)
कथा-संग्रह:
एकसरि ठाढ़ि कदम तर रे (७२), सूर्य गलि रहल अछि (७५), वस्तु (८३), करमी झील (९८)
उपन्यास:
दू कुहेसक बाट(६८), पनिपत(७७), नहि, कतहु नहि (७६), पीयर गुलाब छल (७१), अगिनबान (८१)
हिन्दी अनुवाद- निशान्त की चिड़िया (हिन्दी अनुवाद-तकैत अछि चिड़ै, साहित्य अकादमी, दिल्ली २००३)



वनदेवी

वनवासिनी स्त्री जंगलमे
भोजन तकबा लेल बौआइत अछि
झाँखुरमे पकड़ए चाहैए बटेर
बिछैए जंगली करैल आ खम्हारु
थोड़ेक जारनिक काठ जमा करैए

क्यो चिमनी ईंट भट्ठापर
पजेबा उघैए आ बोनि कमाइए
चुल्हि जरैत छैक बहुत नियारसँ
मुदा मिझाइत छैक पट दए

हाथ धरबा लेल कम मर्द उपलब्ध छैक
शहर दिस गेल जुआन नहि घुरलैए
रिक्शा घिचबाक बोरा उतारबाक जानमारू काजमे
बहुत पसेनाकेँ थोड़ कैंचा भेटैत छैक

वनवासिनी स्त्री सेहो छोड़ने जाइए वन
शहरमे सड़कपर राति कटबा लेल
आ दिनमे हवेलीमे झाड़ू-पोछा देबा लेल...
शहर ओकरा चिबा कए सुआ दैत छैक
ओकर खून चाटि कए नेहाल होइत छैक
शहरक मोटरमे
तेल जकाँ जरैत अछि वनवासीजन
शहरक आकाशमे
ओ डीजिलक धुआँ जकाँ बिलाइत अछि

बाघक प्रजाति उपटैत छैक
तँ चिन्ता घेरैत अछि जनमानसकेँ
अंडमानसँ लोहरदग्गा धरि
आ उजानक मुसहरीसँ नट्टिन सभक सिड़की धरि
उपटैत अछि वनवासी स्त्री-पुरुष
अगबे बसात रोदना करैए सुतली रातिमे
पहाड़मे गन्हाइत धार नोर बनि टघरैत अछि
बबुआन सभक करेज दिल्लीसँ चतरा धरि
पथर-कोइलाक खण्ड जकाँ सर्द अछि
(३०.०६.२००९)
आशीष अनचिन्हार

गजल १३
मछगिद्ध जँ माछ छोड़ि दिअए त डर मानबाक चाही
लोक जँ नेता भए जाए त डर मानबाक चाही

रंडी खाली देहे टा बेचैत छैक अभिमान नाहि
मनुख अस्वभिमानी हुअए त डर मानबाक चाही

अछि विदित शेर नहि खाएत घास भुखलों उत्तर
वीर अहिंसक बनए त डर मानबाक चाही

माएक रक्षा करैत जे मरथि सएह विजेता
माए बेचि जँ रण जितए त डर मानबाक चाही

सम्मानक रक्षा करब उद्येश्य अछि गजल केर
जँ उद्येश्य बिझाए त डर मानबाक चाही

गजल १४
मालक खातिर माल-जाल बनल लोक
देखाँउसक खातिर कंगाल बनल लोक

भूखक दर्द होइत छैक इजोतो सँ तेज
पेटक खातिर दलाल बनल लोक

वृत टूटल मिलल समानान्तर रेखा
बिनु कागजीक प्रकाल बनल लोक

सत्य-सत्य ने रहल ने रहल फूसि- फूसि
अपनेक लेल अपने जंजाल बनल लोक

सुस्जित आनन चानन ललाट
नुनिआएल देबाल बनल लोक
गजल १५
गप्प जखन बिआहक चलल हेतैक
गरीबक बेटी बड्ड कानल हेतैक

गोली लागल देह दसो दिशा मे
कुशलक खोंइछ कत्तौ बान्हल हेतैक

डेग-डेग पर निद्रा देवीक प्रसार
केना कहू केओ जागल हेतैक

सड़ि गेलैक एहि पोखरिक पानि
जुग-जुगान्तर सँ नहि उराहल हेतैक

विश्वास करु समान कम नहि देत
बाटे मे बाट भजारल हेतैक

गजल १६
जल-थल बसात लेल युद्ध
छोट-छीन बात लेल युद्ध

आदर्श बनाम आदर्शवादी
बुद्ध-गान्धीक गात लेल युद्ध

जर-जमीन-जोरु एतबा नहि
होटलक फेकल पात लेल युद्ध

नून नहि चटबए पड़तैक बेटी के
सोइरी सँ पहिनेहे गर्भपात लेल युद्ध

तकनीकी जुगक व्यस्तम व्यवस्था
साँझ होइते प्रात लेल युद्ध

जँहा देखलहुँ घर तहीं धर खसा लेलहुँ
असगरे मे अपन जिनगी बसा लेलहुँ

लोक फेकैत रहल पाथर पर पाथर
तकरे बीछि एकटा घर बना लेलहुँ

झोल लागल देबाल पर टाँगल उदासी
अहाँक हँसी टाँगि ऒकरा सजा लेलहुँ

मोन मे धाह , करेज मे भूर ,देह साबुत
अपन भावना के दरबार मे नाचा लेलहुँ
(अगिला अंकमे जारी)
पंकज पराशर
जानि नहि किएक
मोन मे नुकबैत छी
आँखि मे नुकबैत छी
बूझए नहि दुनिया
एहि सतर्कता सँ व्यामकुल
दौड़ैत रहैत छी अपस्याँकत
अहाँक छायाक भय सँ
अहार्निश!
सुबोध ठाकुर- गाम हैंठी-बाली, मधुबनी

सनेश
जो रे पवन तू ओहि दूर देश
पिआ बसए जाहि देश

छी हम व्याकुल आतुर हद तक
प्यासल छी हम अन्तर घट तक
जा कऽ दए आ हुनका ई सनेस
जो रे पवन तू

सावनक रास भरल महीना
कटए विरान हुनका बिना
सहि नहि सकब हम ई कलेश
जो रे पवन तू ओही दूर देश
पिआ बसए जाहि देश

आँखि कजराएल हमर
मेघक संग हेराएल
मनपर खसल बज्जर
रसक मात्रा बाँचल नहि शेष
जा कऽ दए आ हुनका ई सनेस

कटत केना राति अन्हरिया
ऊपरसँ जे चमकए बिजुरिया
मनक बढ़ल जाए कलेश
जा कऽ दए आ हुनका ई सनेश

पसरल अछि रंग रभसक बहार सगरो
मुदा हमरा लेल पसरल अन्हार सगरो
एनामे जे छोड़तथि रणभूमि
सखी सहेली उल्हन देत विशेष

दए कऽ तू आ पिआ केँ ई सनेश
जो रे पवन तू ओहि दूर देश
पिआ बसए जाहि देश।
निशाप्रभा झा (संकलन)



भगवती गीत

तारा नाम तोहार
तारा नाम तोहार हे जननी काली करथि पुकार
सतयुग कलयुग दुइ प्रति हारल
तीनू भुवन तोहार हे जननी तारा नाम तोहार।
अष्ट भुजा लए सिंह पर चढ़ली
देखइत सकल संसार हे जननी, तारा नाम तोहार।
सुर-नर मुनि सभ ध्यान धरतु हे
गले बैजन्ती माल हे जननी तारा नाम तोहार।
तारा नाम तोहार हे जननी, तारा नाम तोहार।

(अगिला अंकमे)।
प्रसव–पीड़ा
रूपा धीरू

प्रसव–पीड़ासँ छटपटाइत ओ
अइ कोलासँ ओइ कोला करैत
बोदरि छलि पसेनासँ,
किछु कालक पश्चासत चौरीमे हलचल भेलैक
आ प्रसन्न ताक लहरि पसरि गेलैक
ओकर बाप हाथमे राखल बहिंगाकेँ
खुशीसँ उछालि फेकलक दूर कऽ
ओ बड़ पोरगर नेनाकेँ जन्मऽ देने छलि ।
ओ बड़ प्रसन्ने छल
ई सोचि
जे काल्हिस ई हम्महर
बाँहि पूरत, पँचपज्जीम बोझ उठएबाक
सामर्थ राखत,
तखन फागुनेमे बेसाह लगबाक डर नहि रहत
प्रात भने गिरहतक खरिहानमे बोनि लेबाक लेल
बड़ हुलसगर मोनसँ पहुँचल ओ
हुनकर दलानपर बड़कीटा मोटर चमचमाइत छलनि
पता चललै जे गिरहतक पुतौहुकेँ
सातम महिना छियनि
दड़िभंगा जा रहल छथि
दुस्सागहस कऽ ओ अपन बुधनी,
आ गिरहतक पुतौहुक तुलना कएलक

बहिंगा ठामे गाड़ि देलक बोझपर
ओ गिरहतके नेहोरा करऽ लागल—
“मालिक परसौतीक लेल दालि–चाउर
बड़ जरूरी छै
कने, बोनि ........”
“की बजलेँ ?”
ओ गरजि उठलाह— “सार नहितन
जतराक बेरमे तोँ .....
अपने भनसिया जकाँ
बूझैत छिहीक ?”

ज्योति
बरसातक दृश्य
सड़क बरसातक पानि स तरल
जाहि पर गाड़ी तेजीसऽ बढ़ल
एक सनसनीक आवाज छल
पहिया सऽ कादोक फुहार निकलल
पदयात्री मोनेमोन खौंझाइत
एक तऽ गुप्प अन्हरिया राति
दोसर होयत घनघोर बरसाति
ताहिपर कादो छलय छितराति
दिवस सेहो अन्हारे हरदम
घर बैसक बड्ड बढ़िया मौसम
एकरसता मिटाबक ताकू मरहम
सुगन्धित ओराहल मकई गरम
कियौ बैसल छैथ ताश पसारिकऽ
कियो निकालैत उपन्यास संदूकसऽ
कियो बैसली कुरूसिया पकड़िक
कियो लगली गीतनाद सीखऽ
बच्चा सबहक हालत सबसऽ गड़बड़
खेलायक समयमे लागैत जेलसन घर
पढ़िकऽ मोन बहलाबक सलाह पर
सबटा मेघ घरेमे बरसल

'विदेह' ३७ म अंक ०१ जुलाइ २००९ (वर्ष २ मास १९ अंक ३७)-part ii

'विदेह' ३७ म अंक ०१ जुलाइ २००९ (वर्ष २ मास १९ अंक ३७)
PART-II

बालानां कृते-
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); 2. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)

देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्र्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा: मैथिलीक पहिल-चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
नीचाँक दुनू कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा बारह
नताशा तेरह


2.
मध्य प्रदेश यात्रा- ज्योति
तेरहम दिन
4 जनवरी 1992
हमर सबहक गाड़ी भोरे 6:20 मे भोपाल पहुंचल।ओतय हमसब ‘विजय होटल’मे रूकलहुं। ई होटल स्टेशन सऽ काफी नज़दीक छल। मध्यप्रदेशक राजधानी ‘भोपाल’अपने आप मे काफी पैघ शहर छै। विजय होटल सऽ करीब 50 किलोमीटर के दूरी पर स्थित सांची स्तूप के देखैके हमरा सबके विशेष शौक छल।मुदा अकरा हमर सबहक दुर्भाग्य कहैके चाही जे आहि बस वला सब हड़ताल पर छल। तैं दूर जायके कार्यक्रम स्थगित कऽ शिक्षक सब स्थानीय आटो ठीक कऽ शहरमे घुमैके निर्णय लेलैथ।
अतय हमसब सबसऽ पहिने गंगा प्रसाद बिरला द्वारा दिल्लीके बिरला मंदिर के आधार पर बनायल गेल ‘लक्ष्मी नारायण’ मंदिर गेलहुं।चारू दिस पुष्पवाटिका सऽ घेरल अहि मंदिरमे अवस्थित प्रतिमा अकर धार्मिक विशेषताक बखान करैत रहै।अहि सऽ आगां बढ़ि हमसब मछलीघर पहुंचलहुं जतय हमसब तरह-तरहके माछ सब देखलहुं। माछक अहि संसार सऽ निकलिकऽ हमसब चित्रकलाक संसारमे पहुंचलहुं। भारत-भवन नामक अहि संग्रहालयमे माडर्न वा कण्टेमपरेरी आर्ट्स के भण्डार छल। यद्यपि हमसब अहि चित्रक मर्म़ ओहिमे निहित भाव सऽ अनभिज्ञ छलहुं तथापि ओहि चित्रकला सबहक सूक्ष्मता हमरा सबके बहुत आकर्षित केलक। कलाकार कतेक मिहनत केने छल ओहिके बनाबैमे। आब हमर सबहक यात्रा अपन अंतिम छोर पर छल। अत्तऽ राजा भोज द्वारा निर्मित 50 किलोमीटर लम्बा झील के किनारा सऽ सूर्यास्तक अवलोकनके उपरान्त हमसब अपन होटल लौटि एलहुं। रस्तामे हमसब ओहि कारखानाके सेहो देखलहुं जाहिमे 3 दिसम्बर 1984 कऽ जहरीला गैस मिथाइल आइसो साइनेट लीक होय के कारण करीब 2,50,000 लोकक मृत्युज भेल छल।
आब हमरा सबके टाटानगर घुरबाक छल। गाड़ी करीब 11:30 बजे प्ले टफार्म पहुंचल। हमर सबहक वापसी यात्रा प्रारम्भ भऽ चुकल छल।

देवीजी : ज्योति

देवीजी
बरसातक तैयारी
गर्मी छुट्टीक बाद विद्यालय खुजल छल।सब कियो नव उत्साह सऽ आयल छल। देवीजीक मोन छलैन जे बच्चा सबके ई उत्साह बनले रहै। मौसम परिवर्त्तन संगे धूमिल नहिं होई।बीतल सभ सालक ऑंकड़ा बताबैत छल जे बरसातमे विद्यार्थी सबहक उपस्थिति बहुत कम भऽ जायत अछि।तैं ओ जीवविज्ञानमे विभिन्न बिमारीक विषयमे पढ़ाबै बेरमे बरसातमे हुअ वला बिमारी सबपर विशेष जानकारी देब लगली।ओ बतेलखिन जे बरसातमे हैजा, मलेरिया, डेंगु , पेचिस, टायफॉयड आदि बिमारीक प्रकोप बढ़ि जाइत अछि।अहि सबहक मुख्य कारण अछि अपन तथा आसपासक अस्वच्छता विशेषतथ अस्वच्छ जलके सेवन जाहिपर ध्यान देने स्वस्थ रहल जा सकैत अछि। किछु बिमारी जेना कि दम्मा, एश्नोफेलिया आदि के रोगीके परेशानी अहि ऋतुमे बढ़ि जाएत छैन आऽ अकरा रोकैके एकमात्र उपाय अछि उचित दवाई के व्यवस्था तथा परहेजपूर्ण भोजन।
देवीजी बात आगॉं बढ़ाबैत बजली जे सब कियो एक गोट छत्ता, एक गोट बरसाती, एक जोड़ी बरसात लायक बूट, पानि सऽ बचाबै वला बैग, आऽ जॅं दम्मा अछि तऽ ओकर दवाई संगे राखक इंतजाम अखने सऽ कऽ लिय।बाहरके कीनल खाना खेनाई एकदम बन्द करू। घरक बनल भोजन टिफिन डब्बामे आनल करू।यथासम्भव गरम खाना खाऊ।खाना खाई सऽ पहिने तथा शौचके बाद आवश्यक रूप सऽ साबुन सऽ हाथ धोऊ।हमेशा साफ पाइन एक बोतलमे भरिकऽ संगे राखल करू। जतऽ ततऽ के पानि नहिं पीबू। चापाकल तथा इनार जतेक गहींर होयत छै पानि ततेक स्वच्छ होयत छै। शौचालय तथा पानिक पम्पक दूरी बेसी हुअऽ के चाही।पानि हमेशा उबालि कऽ वा फिल्टरक उपयोगसऽ शुद्ध कऽ पीबू।तॉंबा तथा चॉंदीक बरतन मे पानि रखला सऽ पानि शुद्ध होयत अछि। घर आ आसपासक जगह साफ राखू।मच्छड़ सऽ बचैलेल जॅं दवाईक छिड़काव करऽ पड़ै तऽ जरूर करू।सूतैकाल मच्छड़दानीक प्रयोग करू। अहि सब सावधानी सऽ बरसातक कारण विद्यालय आबैमे रूकावट नहिं आयत।
अहि सबके बादो जॅं बिमारी भऽ जाय तऽ तुरन्त उपचार करू। दम्मा आऽ एश्नोफेलियामे अलग उपचार काज आबै छै। बॉंकि सबमे सबसऽ पहिने शरीरमे पानिक कमी नहिं होय तकर ध्यान राखू।बजारमे जीवनरक्षक घोल आबैछै से राखल करू।नहिं तऽ एक गिलास स्वच्छ पेयजलमे एक चम्मच चीनी आऽ एक चुटकी नून मिलाकऽ राखि लिय।अहि मिश्रणके रोगीके कनी-कनी देरमे सतत्‌ पियाबैत रहू।
पिछला सालक दुर्दशा ककरा बिसरल छल। तैयो सरकार के निष्ठुरता कहबाक चाहि जे आबऽ वला समयमे इतिहास नहिं दुहराई तकर कोनो प्रावधान अवलोकित नहिं भऽ रहल छल।सबके बुझल अछि जे कोसी नदि कै बेर अपन रस्ता बदलि चुकल अछि मुदा कोनो ठोस उपाय नहिं कैल जाऽ रहल छल। लेकिन देवीजी अपन सामर्थ्यानुसार छोटे पैमाना पर अपन प्रयास नहिं छोड़ऽ चाहै छलैथ।ओ सब ग्रामवासी के आपातकालीन स्थितिक तैयारी लेल कहलखिन जे सबकियो हेलनाई सीखू।अपन-अपन घरक छतक मरम्मत तऽ बरसातके पहिने करबे करब संगे गामक सबसऽ ऊॅंच भूमिके मरम्मत कऽ अस्थायी आवासक व्यवस्था तथा अनाजक संग्रहक विचार देलखिन। विगत वर्षक तबाही के सामने तऽ ई सब तैयारी तुच्छ बुझायत छल तैयो मिथिलावासीक अपन कर्म पर विश्वास राखैके सिद्धान्तक लाज राखैत सब गौंवा देवीजीक आज्ञापालन लेल मानि गेला।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली


1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६


VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS
DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami - 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul

Guru Poornima-25 Jul



English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed athttp://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title“KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

The Comet



English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary


The comb seller, pen seller, screw-seller etc. visited the bus and left as well. It was only known when asked that the bus was to be started at 11 o’clock instead of 10 o’clock as announced by the conductor. The previous bus had not found enough passengers so the driver played that trick as a marketing tool. By that trick the bus was not very late and got enough passengers too. The bus was to start at 11 o’clock but it took 5 minutes after 11 o’clock to confirm that time mark of 11 was past. Later on at 10 past 11 when the conductor of next bus announced that he would start fighting if the bus would be late any more and for that he gave reference of fight between Ashok Mishra and Shahi. Then the driver started sounding the horn continuously. The old lady in the adjacent seat started calling her son. Everything had been disturbed for next five minutes. No sooner all passengers came inside the bus. A few people had just came out of rickshaw the conductor of next bus tried to load his luggage on his bus but they were educated people and they were intended to catch the current bus. Those passengers had given them reference of some Chaudhary guys then the conductor was convinced that they were powerful people so he only said that if they wanted to go by standing in a three by two seater overcrowded bus instead of two by two empty one even though there would not be any concession in charges then it was their choice. After grabbing a few more passengers from people coming by rickshaw at last moment the bus started its journey. An elderly man was one of those last moment passengers. Co-incidentally a passenger sitting besides Aaruni was murmuring that why he had not come and after some time he got off the bus in next stop. And in that way that elderly man got seat adjacent to Aaruni.
Aaruni was quiet and he wasn’t in the mood of speaking a lot. But that man first appreciated his good luck by virtue of which he got the seat. He would be late in his mission if he could have missed that bus and waited for the next bus. Then he continued his conversation by introducing himself as an assistant director and he also informed that he had two houses one in Patna and another in Darbhanga. He built his both houses by his own efforts. He also mentioned that both houses were double stories and floors were made up of marbles and granites. The chatting people always like company of a good listener so he started liking Aaruni. He asked Aaruni “Which colony in Patna is your house situated at?. ”
Aaruni replied, “I don’t have my own house, I live in rented house.”
After a moment of silence that man brought beetle leave out of the paan case and broke the ice again by asking Aaruni if he ate paan or not.
“No”, Aaruni replied precisely according to his personality.
“Your teeth made me to guess so earlier”, said that man.
After chewing beetle leaves he started talking about in-laws of his daughters. He talked about his son’s preparation for I.A.S. exams and he also talked about a group of such students who prepare for such exams. He said that only talented people got accepted by the group and at last he mentioned that his son was a member of that group.
After travelling a while the bus stopped in a line hotel. Many passengers expressed their anger that the driver and conductor stopped in such a bad place for their food. It was suspected that their food was free of charge rather the price was charged indirectly to the passengers who ate there so ultimately passengers used to pay for their food. So those people suggested that no body should get off the bus then they would have to start the bus. But after some time people started getting off the bus one by one and at last those intellectuals also came out of bus by chatting about analytical review of reasons of bad condition of Mithilanchal where they found people’s such attitude due to which their request to not to get off the bus was neglected as one of the vital reasons.
The bus was restarted but couldn’t continue uninterrupted very long. The conductor instructed everyone to get the bus off as tyre was punctured. The person who disliked stopping at the line hotel was of the opinion that the journey was disturbed because of that halt. Let’s see what happens now. Groups of four-five people were made and started talking by standing in circles. That place was perhaps somewhere close to Vaishali. One of them found the farmers’ fields of that village in bigger pieces. The houses were also bigger in his opinion. Proceeding in the same topic people also discussed that houses in their villages were very congested and creating causes of day-to-day quarrels among the villagers. The elderly person sitting on the adjacent seat to Aaruni was sleepy and he awake because of that trouble. Aaruni noticed that the man used to be very calm at line hotel and at the moment of that break down. But as soon as the bus restarted he started his chatting again. His memories became brighter when he came to Hazipur.
When bus moved further for a while then he said pointing to a colony, “this is Ganga Bridge Colony, what it was earlier and what it is now. Earlier there used to be quarters in one side and materials for maintenance work on the other side.”
Aaruni was shocked, “these used to be a school as well”.
He pointed to something in front, “Look at there, name is still written, some letters however disappeared because of rain.” Then he asked surprisingly, “how do you know all this?”
“I studied in this school.”
“But here only engineers of the Ganges Bridge Project were allowed to stay and that school was made for their children.”
“We used to live in this colony.”
“What is your father’s name?”
“Mr. Nand Thakur”
It was only fifteen days past the death of his father so he couldn’t dare to add late in his name.
“Are you son of Thakurji”, while asking that he was filled with motherliness rather than merely an attachment.
“What is your good name?” asked Aaruni.
“I. A. Aazam”, he replied.
Then Aaruni recited all of his children’s names. One of his sons called Nehal Aazam was studying in Aaruni’s class. Aaruni’s voice was totally changed after that.
“Two people in the colony were very religious, one was Pandeyji and other was your father. Pandeyji used to earn money by that profession too but your father was very honest and kind. He collected subscriptions from the residents of the colony to bring homeopathy medicines and distributed those among needy residents free of cost. My daughter had a boil on her head and no allopathic medicine could cure her. Your father had cured her boil. Even though he was an engineer by profession he had degree in homeopathy as well. “
Aaruni recalled the coloured small bottles used for giving medicine that used to decorate his drawing room.
“Where is he posted nowadays? We got disconnected. We never got transferred to the same place after that place. It had been around fifteen years since we met last.”
“He died fifteen days back.”
“Oh! It is my fault. I did not ask you even if you had your head shaved. That is why you have been so silent all the way.”
He continued, “He was very worried about the workers.”
The bus came to the Ganga Bridge meanwhile. Bus was in a queue at the gate to get ticket. Someone informed that the traffic on the bridge was like one way as some repairing work was going on. Aaruni recalled the scene of past -the huge pillars during building of the bridge then the scenario of broken walls of the colony. That wall used to break every year. Father said that the contractor and engineers were united in that fraudulent act. Then he recalled the bribe of suitcase filled with notes. Aaruni’s father kicked the suitcase and suitcase was thrown away. One cousin brother was living with them who collected that money and returned to the contractor. Mother had hidden her sons inside the house.
(continued)


महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट संस्करणक विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे।
महत्त्वपूर्ण सूचना (२): 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. प्रकाशित कएल जा रहल अछि: लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website:http://www.shruti-publication.com

महत्त्वपूर्ण सूचना:(३). पञ्जी-प्रबन्ध विदेह डाटाबेस मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण- श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। पञ्जी-प्रबन्ध (शोध-सम्पादन, डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- तीनू पोथीक शोध-संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा Combined ISBN No.978-81-907729-6-9

महत्त्वपूर्ण सूचना:(४) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे।कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)-लेखक गजेन्द्र ठाकुर Combined ISBN No.978-81-907729-7-6विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे ।

महत्त्वपूर्ण सूचना (५): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे।

महत्त्वपूर्ण सूचना (६):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे

नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७
Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
Language:Maithili
६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)
(add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : देवनागरी
"विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:1)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुर (1971- ) छिड़िआयल निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) ,पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण),महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक (खण्ड 1 सँ7 ) नामसँ। हिनकर कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे आ उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद संस्कृत आ अंग्रेजी(द कॉमेट नामसँ)मे कएल गेल अछि। मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली शब्दकोश आ पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन-आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण। अंतर्जाललेल तिरहुता यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com

सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा
श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा (1962- ), पिता श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, पति श्री दीपक कुमार। श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा इतिहास आ राजनीतिशास्त्रमे स्नातकोत्तर उपाधिक संग नालन्दा आ बौधधर्मपर पी.एच.डी.प्राप्त कएने छथि आ लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर आलेख-प्रबन्ध सेहो लिखने छथि।सम्प्रति “विदेह” ई-पत्रिका(http://www.videha.co.in/ ) क सहायक सम्पादक छथि।
मुख्य पृष्ठ डिजाइन: विदेह:सदेह:1 ज्योति झा चौधरी
ज्योति (1978- ) जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।ज्योतिकेँ www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि।
विदेह ई-पत्रिकाक साइटक डिजाइन मधूलिका चौधरी (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस), रश्मि प्रिया (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस) आ प्रीति झा ठाकुर द्वारा।
(विदेह ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि आ एकर सभटा पुरान अंक मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल वर्सनमे साइटक आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध रहैत अछि। विदेह ई-पत्रिका सदेह:1 अंक ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह:सदेह:2 जनवरी 2010 मे आएत ई-पत्रिकाक26 सँ 50म अंकक चुनल रचनाक संग।)
Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)
विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)
विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-
(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.30/- per copy for outside Delhi)
BOTH VERSIONS ARE AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT
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"मिथिला दर्शन"

मैथिली द्विमासिक पत्रिका

अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल) "मिथिला
दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens,
Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण
पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता।
कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता
सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming
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अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक
सजिल्द

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00
राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00
पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00
स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00
अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00


कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00


कविता-संग्रह



या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00
जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00
कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00
लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00
फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00
दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00
कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक,सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू।
बया, हिन्दी छमाही पत्रिका,सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें।
पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी ।
एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन


अंतिका प्रकाशन
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-)
९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर१.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा ।
१२.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा"
१३. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संभस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1:तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु.100/-
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२. संदेश

१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।

२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।

३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।

४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।

५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|

६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।

७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।

८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।

१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।

१५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।

१६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।

१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।
विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
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