भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
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पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor:
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(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
Sunday, July 27, 2008
विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 12. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुरपंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
पछिला अंकमे देल गेल श्रोत्रियक सातक बदलामे आठ श्रेणीमे ओ लोकनि क्रमबद्ध छथि- आ’ पञ्जीक कुल संख्या 185 अछि, जाहिमे 32 टा श्रोत्रिय आ’ 153 टा आन ब्राह्मणक श्रेणी अछि। जातुकर्ण गोत्र त्रिप्रवर जातुकर्ण/आंगीरस/भारद्वाज छथि। पहिने सभ क्यो अपन-अपन पुरखाक, आ’ वैवाहिक संबंधक लेखा स्वयं रखैत रहथि। हरसिंहदेवजी एहि हेतु एक गोट संस्थाक प्रारम्भ कलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ’ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक पंजी वैज्ञानिक आधार बला छल आ’ शुद्ध रूपेँ वंशावली परिचय छल। सभ ब्राह्मण कायस्थ आ’ क्षत्रिय एहिमे बराबर छलाह। मुदा महाराज माधव सिंहक समयमे शाखा पञ्जीक प्रारम्भ भेल आ’ श्रोत्रिय आदि विभाजन आ’ क्रमानुसारे छोट-पैघक आ’ ओहिसँ उपजल सामाजिक कुरीतिक प्रारम्भ भेल।
कर्ण कायस्थमे एकेटा गोत्र काश्यप अछि। मात्र मूलक अनुसारेँ उतेढ़ होइत अछि, मझौला दर्जाक गृहस्थ कहल जाइत अछि।
मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि। किछु अपवादो छैक। जेना: ब्रह्मपुरा मूल, काश्यप/गौतम/वत्स/वशिष्ठ।(7टा)
करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्स गोत्री।
दुनू करमहामे विवाह संभव।
चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ’ बंगाल चलि गेलाह, हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु।
श्रोत्रियकेँ पुबारिपार आ’ शेषकेँ पछ्बारिपार सेहो कहल जाइत अछि।श्रोत्रियक पाँजिकेँ चौगाला(श्रेणी) मे विभक्त्त अछि। श्रोत्रिय पंञ्जीकेँ लौकित कहल जाइत अछि। कुल 8 टा चौगोल श्रेणी अछि।32 टा पञ्जी अछि। पञ्जी आ’ पानि अधोगामी होइत अछि। विवाह संबंधक कारणे समय बीतला पर उच्च श्रेणी समाप्त होइत जाइत अछि। प्रथम श्रेणी ताहि कारणसँ समाप्त भ’ गेल अछि।
शेष ब्राह्मण पछ्बारिपार कहबैत छथि। एहि मे 15 गोट श्रेणी अछि।153 टा पञ्जी अछि। एकरा नामसँ जेना महादेव झा पाँजि इत्यादि संबोधित कएल जाइत अछि।
(अनुवर्तते)
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Saturday, July 26, 2008
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 एहि अंकमे अछि/संपादकीय
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7
एहि अंकमे अछि:- 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7
1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
3. महाकाव्य महाभारत (आँगा) 4. कथा(हम नहि जायब विदेश)
5. पद्य ज्योति झा चौधरीक पद्य विशाल समुद्र
आ’ आन कविक अन्यान्य कविता आन कविक अन्यान्य रचना
6. संस्कृत शिक्षा (आँगा) 7. मिथिला कला- चित्रकला चित्रकार प्रीति
8. संगीत शिक्षा (आँगा) 9. बालानां कृते (एकांकी –अपाला आत्रेयी- अंतिम भाग)
10. पंजी प्रबंध पंजी संग्रहकर्त्ताश्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार
11. मिथिला आ’ संस्कृत( सर्वतंत्रस्वतंत्र बच्चा झाक जीवनी-दोसर भाग)
12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी 13. रचना लिखबासँ पहिने... (आँगा) 14. प्रवासी मैथिल English मे
अ. VN Jha केर Globalization- Is it a boon or a curse for the Maithils?
आ.VIDEHA,Mithila,Tirbhukti, Tirhut…(आँगा)
विदेह (दिनांक 01 अपैल, 2008)
संपादकीय
वर्ष: 1 मास: 4 अंक:7
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक 7 दिनांक 1 अप्रैल 2008) ई पब्लिश भ’ रहल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अंकमे विवेकानन्द झाक अंग्रेजी निबंध साहित्यकेँ समाजसँ जोड़बाक उद्देश्यसँ राखल गेल अछि। ज्योतिझाचौधरीक कविताक संग पञ्जीकारजीक पञ्जी पर निबंध देल गेल अछि। प्रवासी मैथिल स्तंभमे विदेहक इतिहासकेँ आँगा बढ़ाओल गेल अछि।
रचना लिखबासँ पहिने.. स्तंभमे मैथिली अकादमी द्वारा निर्धारित भाषाक अंकन कएल गेल अछि,एहिमे विशेष वृद्धि कएल गेल अछि। श्री उदय नारायण सिंह नचिकेता, निदेशक, केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर केर मेल प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि जे ओ' एकरा डॉ. श्री बी मल्लिकार्जुनकेँ अग्रसारित कए देलन्हि, जे केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूरमे भाषा पौद्योगिकी विभागक अध्यक्ष छथि। श्री मल्लिकार्जुनजीक ई-मेल सेहो प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि अछि, जे एकरा कमेटीक समक्ष राखल जायत। बी. मल्लिकार्जुन मैथिली स्टाइल मनुअल बनएबाक कार्यकेँ आगाँ बढ़ा रहल छथि।
प्रीति द्वारा कला आ' चित्रकला स्तंभ चित्रित कएल गेल अछि।
मिथिलाक रत्नमे साहित्यकारक अतिरिक्त खेलकूद आ’ अन्यान्य विधासँ संबंधित (संगीत,फिल्म,पत्रकारिता,इतिहास,संस्कृत आ’ अंग्रेजी, अर्थशास्त्री,डिप्लोमेट,रजनीतिज्ञ आदि)मिथिलाक विभूतिक चित्र प्रदर्शित अछि। वेबसाइट खोलला अनन्तर विद्यापतिक ‘बड़ सुखसार पाओल तुव तीरे’क वाराणसीक गंगातट पर शहनाइ पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान द्वारा बजाओल, आ’ तबला पर किसन महाराज आ’ वायलिन पर श्रीमति एन. राजम द्वारा बजाओल संगीत बाजि उठैत अछि। संपर्क_खोज स्तंभ पर मिथिला आ’ मैथिलीक साइट सभक संकलन/लिंक देल गेल अछि।विदेहक अपन सर्च इंजिनसँ विदेहक नव-पुरान अंककेँ ताकल जा’ सकैत अछि। दोसर सर्च इंजिनसँ मैथिलीक विशेष संदर्भमे संपूर्ण वेबकेँ ताकि सकैत छी।पुरान किताब सभक डिजिटल इमेजिंग विदेह कॉर्पोराक अंतर्गत करबाओल जा’ रहल अछि। वेब सर्चेबल डिक्शनरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जॉड़ि सकताह केर कार्य सेहो आरंभ कएल गेल अछि। मैथिलीमे बालानांकृतेक एनीमेशन सेहो शुरू कए देल गेल अछि।प्ञ्जीक मिथिलाक्षर आ’ देवनगरीक पत्रक सेहो स्कैनिग शुरू भ’ गेल अछि। ई सभ शीघ्र आर्काइवक अंतर्गत देल जायत।विदेहक पुरान अंक सामान्य आ’ pdf फॉर्मेटमे आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि। पाठक पाक्षिक पत्रिकाक pdf संस्करण डाउनलोड सेहो कए सकैत छथि।प्रथम पृष्ठ पर देवनागरी टाइप करबाक हेतु किछु सहयोगी लिंक देल गेल अछि। एहि तरहक तेसर लिंक पर ऑनलाइन टाइप क’ कॉपी क’ ई-मेल किंवा वर्ड दॉक्युमेंटमे पेस्ट क’ सकैत छी।
अपनेक रचना आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर 01.04.2008
389,पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-110070.
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विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
सुभाषितम्
अन्नदानं परं दानं विद्यादनमतः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यवज्जीवं च विद्यया॥ दानम करणेतु। अन्नदानं यदि कुर्मः महादानम् इति वदन्तु। यदि अन्नदानं कुर्मः, यदा वुभुक्षा भवति तावत् पर्यन्तम तिष्ठति। यदि विद्यादानम् कुर्मः यावत् जीवन् तिष्ठति।
कथा
एकः ग्रामः अस्ति। ग्रामे एकः धनिकः अस्ति। सः महान् धनिकः। तस्य सुन्दरं भवनम् अस्ति। पत्नी अस्ति, पुत्राः सन्ति। गृहे सेवकाः सन्ति।कृषिः भूमिः अस्ति। सर्वम् अपि अस्ति। तस्य कापि न्यूनता नास्ति। अतः सः सर्वदा उपविशति।तथा सः धनिकः तिष्ठति। परन्तु आश्चर्यम् नामा तस्य समीपे सर्वम् अपि अस्ति। किन्तु सः धनिकः निद्राम् न प्राप्नोति। रात्रौ निद्रामेव कर्त्तुम् सः न शक्नोति। एकदा सः स्वगृहे उपविष्टवान् आसीत्। चिन्तनं कुर्वन् आसीत। तस्मिनपि दिने तस्य निद्रा न आगता। किमर्थं मम् एवं भवति। इति तस्य मनसि महती चिन्ता उत्पन्नः। तस्मिन्नैव समये दूरतः सः एकम् गीतं श्रुणोति। मधुरं गीतम् आसीत्। कः एवं गायति। इतिः सः न जानाति। तथापि पश्यामि इति चिन्तयित्वा सः गीतस्य ध्वनिम् अनुसरन् अग्रे-अग्रे गच्छति।तस्य गृहतः समीपे एव एकं कुटीरं पश्यति सः। तस्मिन् कुटीरे कश्चन् निर्धनः आसीत्। सः तत्र शयनं कृतवान् आसीत्। शयनं कृत्वा, भित्तिम् आलव्य शयनं कृत्वा उच्चैः गायन् आसीत्। संतोषेन सः गायति। तस्य मुखे संतोषः दृश्यते। तद्दृष्ट्वा धनिकस्य आश्चर्यं भवति।अतः सः प्रश्नं पृच्छति।भो भो मित्रा। भवान् एतावता आनन्देन गायन अस्ति। भवतः आनन्दस्य किम् कारणम् इति पृच्छति। तदा सः निर्धनम् उत्तरं वदति। महाशयः, मम् समीपे धनं किमपि नास्ति। सत्यम्। तत् अहं जानामि। किन्तु अहं बहिः पश्यामि। प्रकृतिं पश्यामि। इदानीं प्रकृतिः कथं शोभते। वसन्तकालः अस्ति। सर्वं पुष्पाणि विकसन्ति। भ्रमराः संचारं कुर्वन्ति। वसन्तकालस्य सौन्दर्यं सर्वत्र दृश्यते। एतद् अस्ति अहं तद् पश्यामि। भवान् वस्तुतः किम् करोति। मम् समीपे तत् नास्ति, एतत् नास्ति,अन्यत् नास्ति। तदैव चिन्तनं करोति। यद्यपि भवतः समीपे बहुः बहुः अस्ति, तथापि भवान् यत् नास्ति तस्य विषये चिन्तनं करोति। अतः दुःखम् अनुभवति। अहं यत् अस्ति तस्य विष्ये चिन्तनं करोमि, अतः अहं सुखं अनुभवामि। एतदैव रहस्यम् इति निर्धनः वदति। तस्य वचनं श्रुत्वा धनिकस्य ज्ञानोदयः भवति। सत्यमेव खलु। वयं सर्वदापि अस्ति। तस्य विषये चिन्तनं कुर्मः चेत्। संतोषम् अनुभवामः। यत् नास्ति तस्य विषयेव चिन्तनं कुर्मः चेत् वयम् अपि दुःखम् अनुभवामः।
कथायाः अर्थः ज्ञातः।
गीतम्
वर्षाकाले आकाशे, चटका विचरति आगच्छति। शीतल समीर,चपला, मेघ गर्जति तीव्रा, जल-बिन्दु निपतति, विद्युत झंझति।
सम्भाषणम्
अद्य शनिवासरः। श्वः रविवासरः/भानुवासरः। अद्य कः वासरः। शनिवारः कदा। परश्वः सोमवासरः। रविवासरः कदा। सोमवासरः कदा। अद्य शनिवासरः। ह्यः शुक्रवासरः।
परह्यः गुरुवासरः। गुरुवासरः कदा। प्रपरश्वः मंगलवासरः। प्रपरह्यः बुधवासरः।
वयं प्रतः काले मिलामः। किम् वदामः। सुप्रभातम्। रात्रौ वदामः। शुभ रात्रिः। अन्य समये। नमोनमः/नमस्कारः/नमस्ते।
यदा दूरवाणी आगच्छति। हरिओम्। इति वदामि-हलो स्थाने। पुनः वदन्तु। एवं कृत्वा वदन्तु।
क्षम्यताम्। आम्।वेंकटरमणन्ः।
कुशलम्। अस्तु। सायंकाले आगच्छामि। पंचवादने आगच्छामि। अस्तु धन्यवादः। पश्यतु। दंतकूर्चः अस्ति। दण्डः अस्ति। अहं दण्डं स्वीकरोमि।
अहं शिक्त्तवर्त्तिकां स्वीकरोमि। अहम् अङ्कनीं स्वीकरोमि। अहं लेखनीं स्वीकरोमि।
अहं दूरवाणीं स्वीकरोमि। अहं करवस्त्रं स्वीकरोमि। अहं पुस्तकं स्वीकरोमि। इदानीम् अहं पुस्तकं/लेखनीं/अङ्कनीं/दण्डं/दंतकूर्चं स्थापयामि।
पुस्तकं/दण्डं ददामि। दूरवाणीं/शिक्त्तवर्त्तिकां/ दंतकूर्चं/लेखनीं/ न ददामि। अहम् अङ्कणीं न ददामि। अहं पुस्तकं/चमषं न ददामि।
भवती किम् ददाति। अहं दंतकूर्चं ददामि। भवती किम् ददाति। अहं पुस्तकं ददामि। भवत्याः नाम् किम्। अहं वेदवतीं पृच्छामि। भवतः नाम् किम्। अहं शुशीलेन्द्रम् पृच्छामि। रमानन्दः- रमानन्दम्
वित्तकोषम्/विद्यालयम्/मंदिरम्/पुस्तकम्/मालविकाम्/शुशीलाम्/कूपीम्/ घटीम्/अङ्गुलीम्। अहं भगवतगीतां पठामि। अहं रामायणं/काव्यं/महाभारतं/सुन्दरकाण्डं/सुभाषितं पठामि।
अहं विद्यालयं गच्छामि। भवन्तः कुत्र-कुत्र गच्छन्ति। अहं मुम्बई/तिरुपति नगरं गच्छामि।
अहम् अरण्यं गच्छामि।
माधवः ग्रामं/मथुरां/वाटिकां/पुरीं/दिल्लीं गच्छति।
इदानीं भवन्तः वाक्यं वदन्तु। कः-कः कुत्र गच्छतेति। पवित्रा चलचित्रमन्दिरं/इन्द्रलोकं गच्छति।
बालकः आपणं गच्छति। गणेशः विदेशं/नगरं/वनं/वाटिकां/नदीं गच्छति।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Friday, July 25, 2008
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 4. कथाप्लाइवुड
प्लाइवुड
प्लाइवुड
“नहि एहन कोनो बात नहि अछि”, ई तँ हमर सभक कार्यक अंतर्गत करइए पड़ैत अछि”।
“ मुदा अहाँकेँ ई नहि बुझि पड़ैत अछि जे एहि बेर किछु बेशी क्रूर भ’ गेलहुँ अहाँ सभ?”
“क्रूरताक तँ कोनो बात नहि अछि। हमरा सभ तँ कोनो विशेष सूचनाक आधार पर कार्य करैत छी”। ”मानि लिय’ जे हमरा ककरोसँ दुश्मनी अछि, आ’ ओहि आधार पर विभागकेँ ओ’ अपन व्यक्त्तिगत स्वार्थ आ’ झगड़ाक हेतु प्रयोग कए सकैत अछि”।
“ अहाँक शंका ककरो पर अछि?”
“ नहि हम तँ उदाहरण दय रहल छलहुँ”। ” नहि हमरा सभ कोनो सूचनाक आधार पर सोझे बिदा नहि होइत छी। पहिने ओकर गंवेषणा करैत छी, आ’ तकरे बाद एतेक ठाम सर्च करबाक अनुमति भेटैत अछि”।
“ मुदा आब अहाँ ई कहियो देब जे अहाँक कोनो गलती नहि अछि, तँ की हमर इज्जत लौटि कए आयत”। ” एनातँ हमरा सभकेँ हाथ-पर हाथ दए बैसि जाय पड़त। मुदा अहूँक गप ठीक अछि। अहाँक प्रति जौँ द्वेषवश क्यो कार्य कएने होयत तँ ओकरा पर कार्यवाही कएल जायत।”
“ की कार्यवाही होयत। हमरा परतँ कार्यवाही भ’ गेल। हमर सभटा बायर टूटि जायत।हम सभ एतेक पुरान छी, तीन पुस्तसँ एहि कार्यमे लागल छी। करबो करब तँ क्लेंडेस्टाइन रिमूवल करब। सभ परतँ रेड भ’ गेल, किछु कतहु नहि भेटल से के पतियायत”।
ओकर बातो ठीक छलैक। ई प्लाइवुडक व्यापारी एक नंबरक काजक हेतु जानल जाइत छल, मुदा संकर्षणकेँ जे सूचना प्राप्त भेल छलन्हि से ओकर विपरीत छल। मुदा ई रेडतँ खाली गेल। फैक्टरी, घर, डीलर सभ ठामसँ टीम खाली हाथ आयल। मुदा आब ऑफिसरकेँ की जवाब देताह। नामी कंपनी छल, अधिकारीगण डरा क’ रेडक अनुमति संकर्षणक व्यक्त्तिगत प्रतिष्ठाक देखैत देने छलाह। हेडक्वार्टरसँ फोन पर फोन संकर्षणकेँ आबि रहल छलन्हि, भोरतँ रेडमे भइये गेल छल, दस बजे ऑफिसमे रिपोर्ट देबाक हेतु कहल गेल छलन्हि। फैक्टरीक मालिक सेहो एम्हर- ओम्हरक बात ल’ क’ दस बात सुना देलाकन्हि। स्वर्णप्लाइ नाम्ना ई कंपनीक दिल्ली धरि पहुँचि छलैक। अकच्छ भ’ क’ संकर्षण भोरमे घर पहुँचि मोबाइल ऑफ क’ कय 9 बजेक अलार्म लगा’ क’ सुतबाक प्रयास करय लगलाह। काल्हि भोरेसँ रेड चलि रहल छल, ई कोना भेल, कोनो क्लेंडेस्टाइन रिमूवलक कच्चा पर्ची किएक नहि भेटल। केस लीकतँ नहि भ’ गेल। मुदा केसक विषयमे संकर्षणक अतिरिक्त्त डायरेक्टर विजीलेंसकेँ मात्र बुझल छलन्हि। ई सभ बिछौन पर सोचिते रहथि, तावत निन्द तँ नहि लगलन्हि मुदा 9 बजेक अलार्म बाजि उठल।
ऑफिसमे सभ क्यो जेना हिनके बाट ताकि रहल छलाह। कतेक गोटे ईहो सुना देलकन्हि, जे एहि केसक इंटेलिजेंस हुनको सभक लग छलन्हि, मुदा एहि तरहक केसमे क्लेंडेसटाइन रिमूवलकेँ सिद्ध केनाइ मुश्किल होइत छैक, ताहि हेतु ओ’ लोकनि एहिमे हाथ नहि देलन्हि। कानाफूसी होमय लागल जे बड्ड हीरो बनैत छलाह, आब ट्रांसफर ऑर्डर ल’ कय निकलताह डायरेक्टरक ऑफिससँ।
संकर्षण डायरेक्टरक ऑफिसमे गेलाह आ’ सोझे किछु दिनक समय माँगि लेलन्हि। की प्लान छन्हि, एहि विषयमे गप-शप घुमा देलथि। एहि बेर कोनो प्रकारक कोनो भ्रम नहि राख’ चाहैत छलाह।
आब संकर्षण स्वर्ण प्लाइक फैक्टरीसँ हटि क’ आ’ ओकर डीलरसँ हटि क’ कार्य करए लगलाह। सभटा दस्तावेजकेँ घोखि गेलाह। किछु कागज पर सेहो लिखय लगलाह। फेर अपन प्लानक हिसाबसँ पटनासँ अररियाक हेतु बिदा भ’ गेलाह।
पान तँ खाइत नहि रहथि आ’ चाह सेहो घरे टा मे पिबैत रहथि। मुदा लोकसँ किछु जनबाक हो तँ बिना चाह आ’ पानक दोकान गेने कोना काज चलत। से ओ’ चाह पान शुरू कएलन्हि। बाबुल दादाक गुलकन्द बला पान नीको बड्ड लागन्हि। तकरा बाद बाबुल दादा अररियाक लग पासक सभटा प्लाइवुडक फैक्टरीक लिस्ट द’ देलकन्हि। मुदा फैक्ट्री सभक पहुँचबाक रोड सभक भगवाने मालिक रहथि। धूल-धक्करमे कहुना जा’ कय एकटा फैक्टरीक पता चलल जे स्वर्णप्लाइकेँ सप्लाइ दैत छल, ओतुक्का दरबान संकर्षणकेँ कहलकन्हि जे मालिक दोसर फैक्टरीमे बैसैत छथि, से दू टा फैक्ट्रीक पता चलि गेलन्हि संकर्षणकेँ।
संकर्षण थाकल-हारल ओहि फैक्टरी पहुँचलाह।एक गोट मारवाड़े सज्जन बैसल रहथि।
“कतयसँ आयल छी”। ”आयल तँ पटनासँ छी, मुदा घुरब कोना से नहि बुझि पड़ैत अछि”। ” हँ, एक गोट नेताक जेलसँ बाहर गोली मारि कय हत्या क’ देल गेल। नेताजी रहथि तँ जेलमे मुदा घुमय फिरय पूर्णियाँ जेलसँ बाहर बिना नियमक निकलल रहथि। जेलर की करताह। पिछला मास एक गोट कैदीकेँ पुरनका जेलर घुमय हेतु नहि देने छलथिन्ह तँ भट्टा बजारमे गोली मारि देलकन्हि। एहि बेर जे घुमय देलखिन्ह तँ सरकार सस्पेन्ड क’ देलकन्हि। ताहि ह्त्याक बाद बन्दक आह्वान अछि। हमरा संगे रहू।एतय हमहू अपन गेस्ट हाउसमे रहैत छी। परिवार सिलीगुड़ीमे रहैत अछि। विवाह नहि भेल अछि। भोरमे हमरा कलकत्ता जयबाक अछि। पहिने सिलिगुरी अपन गाड़ीसँ जायब तँ रूट बदलि क’ पूर्णियाँ बस स्टैण्डमे अहाँकेँ छोड़ैत जायब”।
युवा बजक्कर रहथि से संकर्षणकेँ नीक लगलन्हि। रातिमे गेस्ट हाउसमे बहुत गप्प भेलन्हि। नेताक रंगदारीक, चन्दा बला सभ जबर्दस्ती रसीद काटि जाइत छलन्हि।
“एनामे तँ बिना क्लेनडेस्टाइन कएने घाटा भ’ जायत, हँ मजबूरी छैक। आ’ तकर दोषी तँ ई नेता सभ छथि। व्यापारी की करओ”।
आब मारवाड़ी युवा जकर नाम नवल छल कनेक कनछिया क’ संकर्षण दिशि देखलक। संकर्षणकेँ भेलन्हि जे ओकरा कोनो शंकातँ नहि भेलैक।
“ नहि क्लेंडेस्टाइन नहि करबाक तँ सिद्धांत अछि हमरा सभक। हँ किछु एडजेस्टमेंट करय पड़ैत अछि”। संकर्षणकेँ यादि पडलन्हि जे कोना स्वर्ण प्लाइक मालिको बजैत-बजैत बाजि देने छल, जे करबो करब तँ क्लेनडेस्टाइन रिमूवल करब। तखन करैत की जाइत अछि ई सभ। ओना अररियाक ई फैक्टरी स्वर्ण प्लाइक हेतु जॉब वर्क करैत छल, आ’ ताहि हेतु सरकारी ड्यूटीक सभ भार स्वर्ण प्लाइ पर रहैक। ई क्लेनडेस्टाइन करियो क’ की करत। टैक्स तँ दोसराकेँ देबाक छैक।
तखने एकटा फोन अयलैक। रिंग नमगर रहैक से संकर्षणकेँ बुझबामे भांगठ नहि भेलन्हि जे ई बाहरक एस.टी.डी.कॉल अछि। ओहि कॉलक बाद एकाएक ओ’ युवा संकर्षण दिशि ताकि कय चुप्पी लगा’ गेल।
भनसिया जकरा नवलजी झा सँ संबोधित क’ रहल छलाह खेनाइ बनि जेबाक सूचना देलकन्हि। संकर्षण आ’ नवलक बीच मात्र औपचारिक गप भेल। फेर दुनू गोटे सूति गेलाह। भोरमे अपन वचनक अनुसार ओ’ युवा संकर्षणकेँ पूर्णियाँ बस स्टैण्ड छोड़ि देलकन्हि। उतरबासँ पहिने संकर्षण नवलसँ पुछलन्हि।“ कलकत्तामे स्वर्ण प्लाइक ऑफिस छैक। ओतहि जा’ रहल छी की”। ओ’ युवा हँसल।
“ अहाँ विजिलेंस सँ छी। हमरा काल्हि जे एस.टी.डी. आयल छल, से स्वर्ण-प्लाइक कलकत्ता ऑफिस सँ आयल छल। अहाँक विभागेक क्यो गोटे हुनका सभकेँ अहाँक अररिया यात्राक विषयमे सूचना देलखिन्ह। देखू हम कहने छी जे हम मात्र एडजेस्टमेंट करैत छी। आ’ ताहिसँ हमरा कोन फायदा होइत अछि? टैक्स तँ हमरा लगैत नहि अछि। हँ ताहिसँ हमरा काज भेटैत अछि। आ’ बाहरी छोट-मोट खर्चा, विभागक,पुलिसक, नेताक निकलि जाइत अछि। तखन बेश”।
ई कहि ओ’ सज्जन संकर्षणकेँ हतप्रभ करैत चलि गेलाह।
आब पटना पहुँचि कय संकर्षण जखन ऑफिस पहुँचलाह तँ सभकेँ बुझल रहैक जे संकर्षण ताहि फैक्ट्रीक विजिट सरकारी खर्चा पर कएलन्हि अछि, जकरा पर सरकार टैक्सक माफी देने छैक।
डायरेक्टसँ भेँट कएलाक बाद संकर्षण पहुँचि गेलाह कलकत्ता। पुलिस थानामे घुमैत रहलाह आ’ पता करैत रहलाह जे स्वर्ण-प्लाइ आकि ओकर कोनो कर्मचारीक विरुद्ध कोनो केस छैक तँ नहि। मुदा ओतय तँ स्वर्ण प्लाइ बड्ड नीक छवि बनेने छल।आब संकर्षण सोचमे पड़ि गेलाह। इनपुट-आउटपुट केर अनुपातसँ ई कंपनी करोड़ो रुपयाक टैक्सक चोरि कए रहल अछि। मुदा प्रमाण कोनो नहि। संकर्षण ओतुक्का थाना सभमे अपन पता आ’ फोन नंबर छोड़ि देलन्हि, जे जौँ कोनो केस एहि कंपनी किंवा एकर कर्मचारीक संबंधमे होय तँ तकर सूचना हुनका देल जाइन्ह।
घुरि कए आबि गेलाह संकर्षण। डायरेक्टरसँ कहलखिन्ह, जे क्लोजर रिपोर्ट अखन नहि देब। देखैत छी किछु जानकारी कतहु सँ भेटैत अछि कि नहि।
छह मासक बाद। भोरमे एस.टी.डी. केर रिंग भेल। ” हम कलकत्ता, साल्ट लेक थाना सँ बाजि रहल छी। एक गोटे एकटा कमप्लेन लिखेने छथि, जे स्वर्ण-प्लाइ ऑफिससँ पेमेन्ट ल’ क’ घुरैत काल हुनकर सूटकेस ऑटो बला छीनि लेलकन्हि, जाहिमे किछु कैश आ’ चेक छलन्हि”। ” कतेक कैस आ’ कतेक चेक”। ”1.79 लाख कैस आ’ 1.83 लाखक चेक, प्रायः कैसक कोनो इनस्योरेंस रहन्हि, ताहि द्वारे एफ.आइ.आर. करओलन्हि अछि।चेकक तँ पेमेंट स्टॉप भ’ जायत”।
भोरे बिना रिजर्वेशनक संकर्षण पहुँचि गेलाह कलकत्ता। आ’ लोकल टीमक संग ओहि गोटेक घर पर छापा माड़लन्हि जकर पाइ आ’ कैस ऑटो बला छीनि लेने छल।
छापाक बीचमे संकर्षणकेँ एकटा डायरी भेटलन्हि। तकरा बाद पटना फोन क’ अररियाक फैक्टरीसँ नवीनतम रिमूवलक रिटर्न मँगा लेलथि। फेर ओ’ सज्जन जिनका घर पर छापा पड़ल छल केँ ट्रांजिट रिमांड पर ल’ क’ पटना आबि गेलाह। रस्तामे पता चलल जे ओ’ सज्जन नवलक बहनोइ छलाह, आ’ अररियाक फैक्टरीक एकाउन्टेन्ट होयबाक संगहि, स्वर्ण-प्लाइक संग ओकर लाइजन अधिकारी सेहो छलाह।
आब सभ तथ्य सोँझा छल। जे डायरी भेटल छल ताहिमे कैस आ’ चेकक कॉलम बनल छल। तिथि सहित विवरण छल। चेकक भुगतानक कॉलम अररिया फैक्टरीक क्लियरेंस सँ मिलि गेल छल, आ’ ईहो सिद्ध भ’ गेल जे सभ ट्रांजेक्सनमे लगभग अदहाक पेमेंट स्वर्ण-प्लाइ द्वारा कैसमे देल जाइत छल। आ’ तकर विवरण नहि तँ स्वर्ण-प्लाइक खातामे रहैत छल आ’ नहिये अररियाक फैक्टरीमे। स्वर्णप्लाइ टैक्स सेहो मात्र चेकक (पकिया) द्वारा गेल अदहा रिमूवलक पेमेंट पर दैत छल। संकर्षण ई रिपोर्ट डायरेक्टर केँ द’ देलन्हि।
एकाउन्टेन्टक अपराध बेलेबल छलैक। कोर्ट ओकरा बेल पर छोड़ि देलकैक। ”नवलक समाचार कहू। बड्ड नीक लोक अछि। मुदा किछु बतेलक नहि”। ” ओकर काल्हि अररियासँ सिल्लीगुड़ी जाइत काल सड़क दुर्घटनामे मृत्यु भ’ गेलैक किंवा करा देल गेलैक। जमाय बाबूक संग एतयसँ सोझे हमरा सभ ओतहि जायब”। एक गोट उत्तेजित स्वर जे एकाउन्टेन्ट बाबू केँ लेबाक हेतु आयल छल बाजि उठल।
“ मुदा ई बूझि लिय’ जे अहाँक ई सफलता हमर बुरबकीसँ भेटल अछि। जौँ हम कैसक इनस्योरेंस क्लेमक लालचमे नहि पड़ितहुँ तँ ई सभ नहि होइत”। जमाय बाबू बाजि उठलाह। डायरेक्टर स्वर्णप्लाइक विरुद्ध कार्यवाहीक लेल कलकत्ता ऑफिसकेँ लिखि देलन्हि। स्वर्ण प्लाइक विरुद्ध करोड़ोक ड्राफ्ट शो-कॉज नोटिस सेहो पठा देल गेल। संकर्षन चिंतामग्न छलाह।“ ठीके तँ कहलक नवल। एडजेस्टमेंटे तँ क’ रहल छल। चोरि तँ क्यो आन क’ रहल छल। ओ’ तँ मात्र माध्यम छल। हमहू तँ कतहु नहि बनि गेल छी माध्यम, नवलक मृत्युक”। --------
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
गामक प्राइमरी स्कूलमे सभ कलाक परीक्षा होइत छल। संगीत, चित्र, नाटक। गाममे हारमोनियम, ढ़ोलक बजेनहार खूब रहथि। पहिने दुर्गा पूजाटामे नाटक होइत छल, मुदा पछाति जा’ क’ कृश्णाष्टमी, काली पूजा इत्यादिमे सेहो नाटक खेलेनाइ शुरू भ’ गेल। हरखाक रामलीला पार्टी सेहो एक महिना खेला क’ गेल छल। अहूमे दू चारि दिनमे रामलीलाक बीचमे नाटक होइत छल। शुरू भेल रामलीला पार्टी बिना बजेनहि। मुदा दू चारि दिन धरि माला क्यो न’ क्यो उठबैत गेलाह। रामलीला पार्टीक सभ कलाकारकेँ एक दिनक खेनाइक खर्चाकेँ माला उठेनाइ कहल जाइत छल। दूचारि दिनतँ माइक पर क्यो न क्यो जोशमे जा’ क’ हम माला उथायब तँ हम उठायब कहैत गेलाह, मुदा दू चारि दिनुका बाद रामलीला पार्टीक आर्द्र अनुरोधकेँ देखैत गौँका सभ टोलक अनुसार माला उठेबाक एकटा क्रम बना देलखिन्ह। ओहि समयमे ओकर एकटा चमत्कार छल, आ’ हम अपन कैरियर अभिनेताक रूपमे बादमे करबाक मोने-मोन इच्छा रखैत छलहुँ। ओहि समयमे शनि दिन स्कूलमे नाटक खेलेबाक प्लान शिक्षकगणक स्वीकृतिसँ बनल। नाटकक किताब कतएसँ आयत ताहि हेतु एकटा नाटक दानवीर दधीची लिखलहुँ। स्कूलक कलाकार सभकेँ एकत्र कएलहुँ। आब कलाकार सभक नाम तँ सुनू। पोटहा, लुल्हा, नेँगड़ा, पोटसुड़का,लेलहा,ढ़हीबला,कनहा, अन्हरा, तोतराहा,बौका,बहिरा ई सभ हमर बालकलाकार रहथि। कारण जे अपनाकेँ शुभ्र-शाभ्र बुझथि से किएक नाटक खेलेताह। दहीकेँ तोतराकेँ कहियो क्यो ढ़ही बजल तँ ओकर नाम ढ़हीबला भ’ गेलैक। सर्दीमे कहियो पोटा चुबैत रहि गेलैकतँ पोटहा भ’ गेल आ’ दोसर एहन भेल तँ दुनूमे अन्तर कोना करी। से ओ’ पोटा खसैत काल सुरकतो अछि से ओकर नाम भ’ गेल पोटसुरका। आँगा आऊ। ककरो अन्हरिया रातिमे ठेस लागि गेलैक तँ कोन अत्ततः भेलैक। हँ ओकर नाम अन्हरा भ’ गेलैक। बच्चामे देरीसँ बजनाइ शुरू कएने छलहुँ तँ अहाँ भ’ गेलहुँ बौका। सोझगर छी तँ लेलहा। गपकेँ अनठबैत छी तँ भेलहुँ बहिरा। नव घड़ी पहिरलाक बाद(घड़ी पाबनि दिन वनस्पतिक घड़ी) हाथ कनेक सोझ राखि लेलहुँ तँ भेलहुँ लुल्हा। तोतराइत तँ सभ अछि, मुदा कबियाठी टोलक छी तँ लोक नाम राखि देलक तोतराहा। कनेक डेढ़ भ’ ताकि देलहुँ आकि पिपनीकेँ उनटा क’ ककरो डरेलहुँ त’ भेलहुँ कनहा। ठेस लगलाक बाद कनेक झका क’ चललहुँ तँ भेलहुँ नेंगड़ा।
आ’ जौँ कनेक पाइ बलाक बेटा छी, आकि माय कनेक दबंग छथि तँ कनाह रहलो उत्तर क्यो कनहा कहि क’ देखओ। अस्तु एहि बाल कलाकार सभक संग शनि दिन होयत हमर नाटक दानवीर दधीची।
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
हरकिसन अध्यायक प्रारम्भ 3400 वर्ष पूर्व होइत अछि।कृषि विकासक संग स्थायी निवासक प्रवृत्ति बढ़य लागल। आ’ तकरा बाद परिवारक रूप स्पष्ट होमय लागल। कृषि-विकाससँ वाणिज्य विस्तारक आवश्यकता बढ़ल। ऊनक वस्त्र, चक्की, भीतक घर आ’ इनारक घेराबा बनय लागल।
किसन अध्यायक प्रारम्भ 3300 ई.पूर्व भेल। श्रम-बेचबाक प्रारम्भ भेल। पटौनीक प्रारम्भक संग कृषि-विकास गति पकड़लक। भूगोल जानकारी भेलासँ वाणिज्य बढ़ल। अलंकारक प्रवृत्ति बढ़ल।
हरप्पा:मोहनगाँव अध्याय 3200 वर्ष पूर्व देखाओल गेल अछि।श्रम-बेचबाक हेतु काठक टोलक उदाहरण अबैत अछि। अलंकार प्रवृत्ति बढ़ल। गोलीक मालाक संक कुम्हारक चाक सेहो सम्मुख आयल। समाजमे वर्ग विभाजनक प्रारम्भ भेल।
गणेषक श्रीगणेष अध्याय 3100 ई. पूर्व प्रारम्भ भेल। दक्षिणांचल लोकक आगमन बाद हरप्पा हुनका ल्कनिक द्वारा बनेबाक चर्च लेखक करैत छथि। मोहनजोदड़ो, लोथल आ’ चान्हूदोड़ोक विकास व्यापारिक केन्द्रक रूपमे भेल। लिपि, कटही गाड़ी आ’ मूर्त्तिकलाक आविष्कार भेल आ’ वस्तु विनिमयक हेतु हाट लागय लागल।मेसोपोटामियाक जलप्लावन आ’ सुमेरी आ’ असुरक आगमनक चर्चा लेखक करैत छथि।
किश्न अध्यायक प्रारम्भ 3000 ई.पू. सँ भेल। विदेश व्यापारक आरम्भ भेल। तामक आविष्कार भेल। कृषि दासत्वक सेहो प्रारम्भ भेल। बाढ़िसँ सुरक्षाक हेतु ऊँच डीह बनाओल जाय लागल।
महाजन अध्याय 2800 पू. प्रार्म्भ होइत अछि। नगरक प्रारम्भ वाणिज्यक हेतु भेल। नहरि पटौनीक हेतु बनाओल जाय लागल। डंडी तराजूक आविष्कार आवश्यकता स्वरूप भेल। प्रकाशक व्यवस्थाक ब्योँत लागल।
मंडल अध्यायमे चर्च 2600 ई.पू.क छैक। संस्था निर्माण, विवाह व्यवस्था आ’ दूरक यात्राक हेतु पाल बला नावक निर्माण प्रारम्भ भेल।
किश्न मंडल अध्याय 2400 ई.पू. केर कालखण्डसँ आरम्भ कएल गेल अछि। एहिमे वर्षाक अभावक चर्चा अछि। आर्यक पूर्व दिशामे बढ़बाक चर्चासँ लोकमे भयक सेहो चर्चा अछि। मंडल:मंडली अध्याय 2200 ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल। आर्यक आगमनक आ’ वर्षाक अभाव दुनूकेँ देखैत लोथल वैकल्पिक रूपसँ विकसित होमय लागल।
पतन:पुरंदर: एहि अध्यायक कालखण्ड 2000 ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल अछि। आर्यक राजा द्वारा पुरकेँ तोड़ि महान केंद्र हड़प्पाकेँ ध्वस्त करबाक चर्चासँ मायानन्द जी अपन पहिल किताब ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ केर समापन करैत छथि। आर्य हड़प्पाकेँ हरियूपियासँ संबोधित कएल, आर्य बाहरसँ अयलाह प्रभृत्ति किछु सिद्धांतक आधार पर रचित ई उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास होयबाक दावा करैत अछि। आ’ एहिमे 20,000 ई.पू.सँ 1800 ई.पू. तकक इतिहासोपाख्यानक चर्चा अछि। मुदा मौलिक एतिहासिक विचारधारा आ’ नवीन शोधक आधार पर एकर बहुतो बात समीचीन बुझना नहि जाइत अछि।
अग्नासँ शुरू भेल ई कथानक बड्ड आशा दिअओने छल। लेखक पहिल अध्यायमे लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग 200 करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ’ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर 1,97,29,49,032 वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। ई अनुमानित अछि जे यूरेनियमक 1.67 भाग 10,00,00,000 वर्षमे सीसामे बदलि जाइत अछि। विभिन्न प्रकारक पाथर आ’ चट्टानमे सीसाक मात्रा भिन्न रहैत अछि। एहि प्रकारसँ गणना कएला पर ई ज्ञात होइछ जे रेडियोएक्टिव पदार्थ 1,50,00,00,000 वर्ष पहिने विद्यमान छल। एहि प्रकारेँ कोनो शैलक आयु 2,00,00,00,000 वर्षसँ अधिक नहि भ’ सकैछ। यूरोपमे सत्रहम शाब्दी तक पृथ्वीक आयु 4000 वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान 1200 वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मनलैन्ह। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ हास्यास्पद अछि। एहि तरहक पाश्चात्य शोधकेँ लेखक पहिल अध्यायमेतँ नकारि देलन्हि मुदा अंत धरि जाइत-जाइत ओ’ आर्य लोकनि हड़प्पाकेँ हरियूपिया कहैत छथि एहि प्रकारक पाश्चात्य दुराग्रहक प्रभावमे आबि गेलाह। पश्चिमी विद्वानक उच्छिष्ट भोजसँ बचि श्रुति परम्पराक परीक्षा तर्क आ’ श्रद्धाक मिश्रणसँ नहि कए सकलाह। एहि प्रकारे ‘प्रतमं शैल पुत्री च’ निम्न आधार पर अपन इतिहासोपाख्यान साहित्यिक रूपसँ नहि बना पओलक..............
(अनुवर्तते)
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6
एहि अंकमे अछि:- 15 मार्च 2008 वर्ष 1 मास 3 अंक 6
1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) 2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा) 3. महाकाव्य महाभारत (आँगा) 4. कथा(प्लाइवुड)
5. पद्य ज्योति झा चौधरीक पद्य गामक सूर्यास्त
आ’ आन कविक अन्यान्य कविता 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा) 7. मिथिला कला- चित्रकला चित्रकार उमेश कुमार महतो
8. संगीत शिक्षा (आँगा) 9. बालानां कृते (एकांकी –अपाला आत्रेयी- पहिल भाग)
10. पंजी प्रबंध श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार श्री व्
11. मिथिला आ’ संस्कृत( सर्वतंत्रस्वतंत्र बच्चा झाक जीवनी)
12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी 13. रचना लिखबासँ पहिने... (आँगा) 14. प्रवासी मैथिल English मे
अ. VN Jha केर DO WE REALLY EXIST AS NATION
आ.VIDEHA,Mithila,Tirbhukti, Tirhut…(आँगा)
संपादकीय
वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 6
एहि अंकमे साहित्यकेँ राजनीतिसँ जोड़य बला अंग्रेजीमे विवेकानन्द झा जीक लेख प्रवासी मैथिल स्तंभक अंतर्गत देल गेल अछि। पञ्जीकारजीक पूर्ण परिचयक संग हुनकर लेख सेहो देल गेल अछि। विदेह द्वारा किचुउ पुरान अलभ्य किताबक डिजिटलाइजेशनक कॉर्पोरा सेहो शुरू कएल गेल अछि। पञ्जीक स्कैनिंग आ’ सर्च करबा योग्य डिक्श्नरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जोड़ि सकताह केर आधार किछु मनोयोगी विदेह कार्यकर्त्ता सभक द्वार शुरू हेल अछि। ई सभटा सभ क्यो नि:शुल्क कए रहल छथि आ’ अपन मातृभाषाक आ’ मातृभूमिक अनुरागी होयबाक प्रमाण दए रहल छथि। हिनका लोकनिक नाम रचना आ’ आर्काइवक सम्मुख अएला पर सोँझा आनल जायत।
अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
नई दिल्ली 15/03/08 गजेन्द्र ठाकुर
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Thursday, July 24, 2008
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008)वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5
संपादकीय
वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5
पिछला पक्षमे हम दरभंगा गेल छलहुँ, अपन भतीजीक विवाहमे। ओतय मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट आ’ संस्कृत विश्वविद्यालयक भ्रमण कएलहुँ।सर्वश्री भीमनाथ झा, मैथिलीपुत्र प्रदीप, रघुवीर मोची(अध्यक्ष,मैथिली अकादमी), विश्वनाथ झा(प्रतिकुलपति का. सि. दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय), देवनारायण यादव( अध्यक्ष, मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट) लोकनिक दर्शनक सुअवसर प्राप्त भेल। फेर बिदेश्वरस्थानसँ आँगा गौरीशंकर स्थान( हैंठी बाली) गेलहुँ, आ’ ओतय पालवंशक मूर्त्ति आ’ ओहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल अभिलेखक चित्र खिंचलहुँ(फोटो मिथिलाक खोज स्तंभमे देखू)। ई मूर्ति भव्य अछि, आ’ 1500 वर्ष पूर्व मिथिलाक्षरक प्रभुता देखबैत अछि।एहि पर शोध लेख आँगाक कोनो अंकमे देल जायत। मिथिलाक इतिहासमे एहि स्थलकेँ आइसँ पहिने स्थान नहि देल जा’ सकल छल, आ’ ईहो तथ्य अछि जे इतिहासक विद्वान श्री डी.एन. झा अही गामक छथि, ओना हैठी बाली हमर मामा गाम सेहो छी। हम गेल तँ रही अपन भतीजी डॉ स्वीटी ठाकुर आ’ श्री प्रदीप कुमार झा, भा.प्र.से. केर विवाहमे मुदा बेशी काल अपन स्वार्थमे गाम-गाम घुमैत रहलहुँ, सरिसवक अयाची मिश्रक घरारी(सवा कट्ठा) देखल, नागेन्द्र कुमर जीक ससरफानी(स्वतंत्रतासँ पहिने प्रकाशित) ऊपर कएल, किछु मिथिलाक्षरक पांडुलिपिक इमेज लेलहुँ, मिथिलाक रत्नक पौतीकेँ समृद्ध करबाक हेतु सेहो ढ़ेर रास चित्रक संग्रह कएलहुँ आ’ दिल्ली दू गोट किताबक बोझक संग अएलहुँ। श्री विभूति आनन्द आ’ श्री धीरेन्द्र झा जीसँ भेँटक अवसर एहि हूलि मालिमे हाथसँ निकलि गेल।नेपालक मैथिलीक विद्वान लोकनिसँ संपर्क निरंतर होय तकर प्रयास सेहो शुरू कएलहुँ। जनकपुरमे तीनटा मैथिली एफ.एम. अछि आ, एकटाक निर्देशन श्री महेन्द्र मलंगियाजी कए रहल छथि।
अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
नई दिल्ली 01/03/08 গজেন্দ্র ঠাকুব
विदेह 01 मार्च 2008 वर्ष 1 मास 3 अंक 5
एहि अंकमे अछि:- 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
3. महाकाव्य
महाभारत (आँगा)
4. कथा आर्या
5. पद्य -ज्योति झा चौधरी
-अन्यान्य कविता
6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) चित्रकार उमेश कुमार महतो
8. संगीत शिक्षा
9. बालानां कृते
10. पंजी प्रबंध (आँगा) - लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार
11. मिथिला आ’ संस्कृत
12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
13. रचना लिखबासँ पहिने... (आँगा)
14. प्रवासी मैथिल English मे
(c) २००८ सर्वाधिकार सुरक्षित। (c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
'विदेह' (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आऽ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।
सिद्धिरस्तु
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
गणेष- ई अध्याय 4000 वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ’ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ’ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ’ गहूमक खेतीक प्रारंभाअ’ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभाअ’ अदल-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल।शिस्न देव पर जल आ’ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ’ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ’ पानिमे भिजा कय आगिमे पकायब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करयबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ’ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल।लिपिक प्रारंभ सेहो भेल।
हर- एहि अध्यायक प्रारंभ 3500 ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ’ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पैलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर-आ’ बरदक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ’ जनक लंबवतक अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ’ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 3. महाकाव्य महाभारत (आँगा)
महाभारत (आँगा) ------
2.सभा पर्व
मय दानव छल कय रहल नव निर्माण,
सभा भवनक दिन-राति लागि उत्थान।
स्फटिकसँ युक्त शीसमहल सन कौशल,
युधिष्ठिर ओतहि तखन सिंहासन बैसल।
ऋषि नारदक आगमन भेल ओतय जाय,
देलन्हि करबाक यज्ञ जे राजसूय कहाय।
बजाओल द्वारकासँ कृष्णकेँ समाद पठाय,
कृष्ण कहलन्हि सभा भवनमे आबि कय,
जरासंध मगधक नरेश रहत गय यावत।
राजसूय सफल नहि होमय देत तावत।
बंदी बनेलक राजा लोकनिकेँ ओ’हराय,
आक्रमण ओकर भेल मथुरा पर बड्ड ,
हारि द्वारका राजधानी बनाओल जाय ।
युधिष्ठिर बात सुनैत भेलथि हतास सन,
भीम अर्जुन आशा बन्हेलन्हि भ्राता सुन।
क्षत्रिय-धर्म अछि शत्रुके वशमे करय,
कृष्ण,अर्जुन-भीम संग राजगृह चलल।
ब्राह्मण वेशधारी राजगीरक प्राचीर लाँघि,
पहुँचल सभ सोझे सभा-भवन जी-जाँति।
सत्कार करय चाहलक जरासंध बुझि विप्र,
ललकारा देलक किंतु भीम द्वंद-युद्धक शीघ।
दिन बीतल खत्मक नाम नहि लैछ ई युद्ध,
कृष्णक संकेत पाबि चीरल ओ’शरीर संधिसँ,
भीम तोड़ल शरीर जरासंधक उनटि फूर्त्तिसँ,
शरीर फेंकल दुहू दिशि उनटि एम्हर-ओम्हर,
मुक्त कएल कारागारसँ बंदी गण राजा सभकेँ।
जरासंध-पुत्र सहदेवकेँ दय मगध राजक गद्दी,
आपस भेलाह इंद्रप्रस्थ घुरलाह तीनू व्यक्त्ति।
पूर्व दिशि भीम उत्तर अर्जुन नकुल दक्षिण ,
सहदेव पश्चिम दिशा दिशि दिग्विजय खातिर।
विजय रथ नहि क्यो रोकि सकल हुनकर,
धन-धान्यसँ परिपूर्ण सभ आबि कएल तैयारी,
राजसूय यज्ञक भेल राजा सभक प्रस्थमे बजाही।
राजा लोकनि केँ दय समुचित कार्यक भार,
भीष्म-द्रोणकेँ यज्ञ-निरीक्षणक देल प्रभार।
कृष्ण विप्र चरण-धोबाक लेलन्हि काज ।
हस्तिनापुरसँ भीष्म,
द्रोणक संग भेल आगमन,
धृतराष्ट्र विदुर कृप अश्वत्थामा दुर्योधन दुःशासन।
(अनुवर्तते)
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 4.कथा 5. आर्या
विवाहक उपरान्त ढ़ेरी-ढ़ाकी लोक हमरासँ भेँट करबाक हेतु सासुरमे आबि रहल छलाह। ताहिमे छलि एकटा नवम् कक्षाक छात्रा आर्या आ’ ओकर पितामही आ’ माय। ओ’ मायक संग नहि आबि असगरे आयल छलीह। खूब कारी, दुबर-पातर, आवश्यकतासँ बेशी अनुशासित आ’ शिष्ट आ’ नापि-जोखि कय बजनिहारि। हमरासँ सभ गपमे उलटा। हमर कनियाँ हुनकासँ हमर परिचय करओलन्हि, आ’ ओकर प्रशंसा सेहो कएलन्हि। किछु कालक बाद जखन ओकर पितामही आ’ माय हमरासँ भेँट करबाक हेतु अयलीह तँ हमरा अनुभव भेल, जे हुनकर पितामहीक तँ लेहाज राखल गेल छल मुदा हुनकर मायक अवहेलना सन हमर कनियाँ आ’ सासु द्वारा भेल छल। गप्पो करबामे ओ’ नीक छलीह आ’ जाइत-जाइत कहि गेलीह, जे हमरा सभ अहाँक ससुरक किरायादार छी, आ’ उपरका महला पर रहैत छी। से भीड़-भाड़ कम भेला पर अवश्य आऊ। ई गप्प जाइत-जाइत हमर सासु प्रायः सुनि लेलन्हि, से हमर पत्नीकेँ अस्थिरेसँ मुदा आज्ञार्थक रूपेँ कहलन्हि, जे ऊपर जयबाक कोनो जरूरी नहि छैक। हम पत्नीसँ पुछलियन्हि, जे बेचारी एतेक आग्रहसँ बजओलन्हि अछि। पत्नी कहलथि जे सुनलियैक नहि, माँ मना कएलन्हि अछि। कारण पुछला पर गप अन्ठा देलन्हि।
किछु दिनुका बादक घटना छी, अन्हरोखेमे गेटक झमाड़ि कय खुजबाक अबाज भेल। लागल जे क्यो पीबि कय बड़बड़ा रहल अछि। हमरा अतिरिक्त क्यो ओहि अबाज पर ध्यान नहि देलक, आ’ अन्ठयबाक स्वांग कएलन्हि। हम बाहर अएलहुँ तँ एकटा अधवयसु झुमैत अबैत दृष्टिगोचर भेलाह। हमरा देखि डोलैत हाथसँ जमायबाबू कहि नमस्कार कएलन्हि। अखन धरि हमरासँ भेँट नहि होयबाक कारण हमर पत्नीकेँ फड़िछओलन्हि आ’ डोलैत ऊपर सीढ़ीक दिशसँ चलि गेलाह। हमर पत्नी हाथ पकड़ि कय हमरा भीतर आनि लेलन्हि आ’ ईहो सूचना देलन्हि जे ईएह आर्याक पिता थीक। अनायासहि हमरा माथमे आयल जे रंग जे आर्याक छैक से पिते पर गेल छैक। बादमे हमर सासु ऊपर जा’ कय भाषण दए अयलीह आ’ एक महिनाक भीतर घर छोड़बाक अल्टीमेटम सेहो आर्याक परिवारकेँ दए देलन्हि। हमर सर कहलथि जे ई दसम अल्टीमेटम छैक, मुदा हमर सासु अडिग छलीह जे किछु भय जाय एहि बेर ओ’ नहि मानतीह। जमाय की भुझताह जे केहन भाड़ादार रखने छी। पहिने ठकिया-फुसिया कय बहटारि लैत छल। पुछला पर पता चलल जे आर्याक पिता डॉक्टर छैक, आ’ सेहो होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक किंवा भेटनरी नहि वरन् एम. बी.बी.एस.। मुदा लक्षण देखियौक। ओना सासु ईहो गप कहलन्हि जे ई पीने रहबाक उपरान्तो गप्प एकोटा अभद्र नहि बजैत अछि, जेना आन पीनहार सभक संग होइत छैक। मनुक्खो ठीके अछि, मुदा यैह जे एकटा गड़बड़ी छैक से बड्ड भारी।अगला दिन नशा उतरलाक बाद पति-पत्नी दुनू गोटे नीचाँ अएलीह आ’ सासुकेँ कहलन्हि, जे आर्याक बोर्डक बाद ओ’ सभ पटना चलि जयतीह से हुनका सभक खातिर नहि मुदा आर्याक खातिर तावत रहय दिय’। घोँघाउजक बाद से मोहलति भेटि जाय गेलन्हि। तकरा बाद हुनकर पत्नीक नजरि हमरासँ मिलल तँ ओ’ कहलन्हि जे अहाँ तँ ऊपर नहिये आयब। आ’ एहि बेर ऊपर अयबाक आग्रहो नहि कएलथि। किछु दिन बीतल आ’ फेर सासुर जयबाक अवसर भेटल। किछु दिनमे पता चलल जे किरायादार बदलि गेल छथि। घरक लोक मात्र एतबे कहलथि जे आर्याक पिताक मृत्यु भ’ गेलन्हि आ’ अनुकम्पाक आधार पर ओकर मायकेँ नौकरी भेटि गेलैक। आब ओ’सभ क्यो पटनामे रहैत छथि। घरक लोक आगाँ किछु नहि कहलन्हि, मुदा कनियाँक एकटा पितयौत भाय आयल रहथि, से कहलथि जे डॉक्टरी रिपोर्टमे विष खा’ कय आत्महत्याक वर्णन अछि। फेर आँगा पति-पत्नीक मध्य मचल तुमुलक चर्च भेल। कनियाँ कहइत रहथिन्ह जे ई डॉक्टर बड्ड पिबैत छथि ताहि लेल झगड़ा होइत अछि, तँ डॉक्टर साहब कहथि जे झगड़ाक द्वारे पिबैत छी। अस्तु मृत्युक बाद हुनकर कनियाँक भाव एहन सन छल जेना मुक्ति भेटि गेल होय- एहि बातमे सभ क्यो एक मत रहथि।
फेर दिन बितैत रहल आ’ बादमे फोन पर समाचार भेटल जे आर्या सेहो आत्म हत्या कए लेलक। फेर बहुत रास बात मोनमे घूमि गेल। आर्या भावुक छलि, किछु बेशी तनावमे रहिते छलि। गपकेँ गंभीरतासँ लइत छलि। एकटा सारि रहथि, हुनकर बात सेहो मोन पड़ल। एक गोट युवकक विषयमे आर्या कहैत छलि, जे ओकर संगीकेँ होइत छैक जे ओ’ युवक ओकरासँ प्रेम करैत अछि। मुदा आर्याक मत छल जे ऊ’ युवक ओकरासँ नहि वरन् आर्यासँ प्रेम करैत छल। हम सारिकेँ कहने रहियन्हि जे आर्या बच्चा अछि, ओहिना हँसी कएने होयत। मुदा ओ’ कहलन्हि, जे नहि यौ। बड्ड भावुक अछि आर्या। कहैत अछि जे ओहि युवकके प्राप्त करबाक हेतु किछुओ करत। एहि बात पर हम तखन कोनो बेशी ध्यान नहि देने रहियैक। मुदा एहि बातक आब महत्त्व बढ़ि गेल छल। हम फोन दोबारा लगेलहुँ। पता चलल जे ओ’ युवक कोनो पुरान महारानीक बेटीक बेटा छी। ओकर माता शिक्षिका अछि, आ’ बाप मेरीनमे काज करैत अछि। साल-छह मास पर अबैत अछि। आ’ जखन अबैत छल तँ जे मास-पंद्रह दिन रहैत छल से मारि_पीटिमे बिता दैत छल। पूरा मोहल्लामे बदनामी छैक। मायक शील-स्वभाव बड्ड नीक, बोलीसँ फूल-झड़ैत छैक। बापकेँ तँ लोक चिन्हितो नहि छैक।खाली झगड़ाक अबाजे सुनैत अछि लोक। आर्याक संगीकेँ स्कूल बससँ उतरबा काल क्यो तंग कएने छल तँ ओ’ युवक सभकेँ मारि-पीटि कय भगा देने छल, आ’ एकर बाद आर्या एहि शहरसँ दूर भ’ गेल। ओ’ मायकेँ कहैत रहलि जे परीक्षा तक रहय दिय’, मुदा माय विमुक्त भेलाक बाद एको पल पुरान कटु-स्मृतिकेँ देखय-नहि चाहैत छलथिन्ह।हम फोन पर पुछलियन्हि जे ओहि युवकक विवाह आर्याक मृत्युसँ पहिने कतय भेल। तँ सासुरक लोक अचंभित पुछलन्हि, जे ओकर विवाह तँ भेल मुदा अहाँ कोना बुझलहुँ। पता चलल जे सिलीगुड़ी-दिशि कोनो कन्यागत छथि, आ’ ओ’ युवक अपन बाप जेकाँ घर-जमाय बनि रहबाक नियाड़ कएने अछि। एहि शहरक लोककेँ तँ विवाहक हकारो नहि भेटल। हम आर्याकेँ एकटा दृढ़ बालिका बुझैत रही। मुदा ओकर ‘किछुओ कड़य पड़त से करब’ केर अर्थ आब जा’ कय बुझलहुँ।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 5.पद्य (आँगा)
नाम - ज्योति झा चौधरी ;जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८;जन्म स्थान -बेल्हवार मधुबनी ;शिक्षा - स्वामी विवेकानन्द मिडल स्कूल़,टिस्को साकची गर्ल्स हार्ई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी़ आइ.सी.डबल्यू.ए.( कॉस्ट एकाउण्टेन्सी) ;निवास स्थान – लन्दन,यू.के.;पिता -श्री शुभंकर झा,ज़मशेदपुर;माता -श्रीमती सुधा झा़ शिवीपट्टी ;''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी़ नानी़ भाई बहिन सबकेँ पत्र लिखबामे केने छी ।बचपन सँ मैथिली सँ लगाव रहल अछि|-ज्योति
हिमपात
बर्फ ओढ़ने वातावरण !
मानू आकाश टूटि क बिखरि गेल ,
अपने आप के छिरियाकऽ
सबके एक रंग में रंगि गेल ॥
थरथराबैत सरदी स भयभीत
सब जीव अपन जगह धेलक;
प्रकृति के इहो अवरोध मुदा,
मनुष्य के नहि बॉंधि सकल ॥
भॉंति प्रकारक साधन जोगारलक
विकट परिस्थिति पर विजय लेल;
अपन सर्वश्रेष्ठ बुद्धिबल स
मनुष्य अंतत: सफल भेल॥
गजेन्द्र ठाकुर
90.नव-घरारी
साँप काटल नन्दिनीकेँ,
नव घरारी लेलक खून।
टोलक घरारी छोड़ू जुनि।
ई विशाल जनसंख्या एतय,
छल बनल एकटा काल,
ई नव-घरारी लेलक प्राण,
टोलक घरारी साबिकक डीह,
परञ्च अछि छोट आब की।
खून लेलक आब ई बनि गेल अख्खज,
नव घरारी होयत छोट किछु काल अन्तर।
91. बुद्ध
हृदय लग अछि जेबी,
से जखन रहय खाली,
मोन कोना रहत प्रसन्न।
बुद्ध सेहो कहि गेल छलाह ई।
मुम्बइमे सूप मँगलहुँ,
पुछलक अहाँमे जैनी कैकटा छी।
देत लहसुन की नहि रहय तात्पर्य,
आपद्काले रहि गेल अछि आइ काल्हि सदिखन।
सेल टैक्समे करैत छी भरि दिन काज,
तैँ प्रोननशियेशन भेल अछि मराठी,
एक्साइज तँ अछि केन्द्रीय सरकार,
संपर्क बाहरीसँ बेशी।
छत्तीसगढ़क छत्तीस घंटाक यात्रा,
उत्तर-मध्य क्षेत्रक स्तूपकेँ देखल,
बंगाल घूमल पंजाब घूमल,
बंगाली कहलन्हि सुनि जे जौँ,
बंगाली जायत संग करत कानूनी बात\
सरदारजी कहलन्हि रोड पर,
रेड लाइट रहलो क्रॉस करू,
सोझाँसँ अबैत छल एकटा सरदार,
कहल करत आब ई झगड़ा।
सक्सेना कहलक एक मैथिलकेँ,
मैथिल अछि मैथिलक परम शत्रु।
हम कहल सक्सेनाकेँ,हे
जुनि करू हुनका दूरि।
काज सभटा झट कराऊ जुनि भड़काऊ।
बुद्धक भूमिसँ घुरि आयल छथि,
दिल्लीक सड़क पर एहि बेर।
पाटलिपुत्र रहय राजधानी,
हम छलहुँ ततय पुन फेर,
दिल्ली बनल राजधानी भारतक,
कोन जुलुम हम कएल।
कणाद कपिल गौतम जेमिनी देतथि
जौँ नहि काज,
कहलन्हि ई ठीके हृदय लग,
जेबी देने अछि सीबि।
हृदय कोना प्रसन्न रहत जखन,
पेट रहत गय खाली।
जेबीमे पाइ नहि रहत,
उपासे करब हम भाइ।
बुद्ध सेहो कहि गेलाह ई।
92. रिक्त पाँचम वर्गसँ सातम वर्गमे,
तड़पि गेल छलहुँ हम।
छट्ठा वर्गक अनुभव अछि रिक्त।
बा’ आ’ बाबा जन्मक पहिनहि,
प्राप्त कएलन्हि मृत्यु,
वात्स्ल्यक अनुभव भेल रिक्त।
माँ एके बहिनि छलि तेँ,
मौसी-मौसाक अनुभवो नहि,
ईहो रहल रिक्त।
क्यो कहैत अछि जे छठामे पढ़ैत छी,
बा’ आ’ बाबाक संग घुमैत छी,
मौसी-मौसाक काज उद्यममे जाइत छी,
तँ हम कहैत छी, जे ई कोन संबंध
, कोन वर्ग अछि,
छोड़ि सकैत छी।
उत्तर भेटैछ,
अहाँ नहि बुझब।
मुदा नव संबंध,
नब नगर,
नव भाषा,
नवीन पीढ़ीकेँ, कोना बुझायब,
ओ’ कोना बुझत।
ओ’ तँ नहि बूझि सकत काका-काकी,
नहि बूझत दीया-बाती,
खटैत दौड़ैत आ’ नहि घुरि आओत,
ककरा बुझायब आ’ के बूझत।
93. चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी,
हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ,
लागल मंझा बूकल शीसाक,
जेना प्रतियोगीक कागज-कलम।
कटल चित्रपतङ्ग,
देखबैत अछि वास्तविकताक धरा।
जतयसँ शुरू ओतहि खत्म,
मुदा बीच उड़ानक स्मृति,
उठैत काल स्वर्गक आ’,
खसैत काल नरकक अनुभूति।
94.प्रवासी
संगहि काटल घास,
महीस संगे चड़ेलहुँ,
पुछैत छी गहूम ई,
पाकत कहिया?
दू दिन दिल्ली गेलहुँ,
सभटा बिसरेलहुँ,
ईहो बिसरि गेलहुँ,
जे धान कटाइछ कहिया।
95. वेदपाठी
वेद वाक्य परम सत्य,
संस्कृत साहित्य अति उत्तम।
करैत छी अहाँ वक्त्तव्य,
मुदा अहाँ की अहाँक पुरखा,
मरि गेलाह बिन सुनने,वेद वाक्य,
बिन पढ़ने संस्कृत।
यौ अहाँ नहि पढ़लहुँ अहाँ,
अनका अनधिकार बनेबाक चेष्टा,
कएलहुँ अहाँ।
छी वेदक अप्रेमी,
नहि अछि क्षमता,
वेदक पक्ष की विपक्षमे बजबाक ।
वेद वाक्य सत्य एकरा बनेने छी,
अहाँ फकड़ा।
96. बिसरलहुँ फेर
खूब ठेकनेने जाइत,
जे नहि बिसरब आइ,
मुदा गप्प पर गप्प चलल,
कृत्रिमता गेल ढ़हाइत।
फेर काजक बेर मोन,
नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन,
कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप,
आ’ तकरा बाद मसोसि कय
रहि जाइत छी गुम्म।
97. तक्षशिला
तक्षशिला अछि पाकिस्तानमे,
इतिहासक उनटबैत पन्ना,
चक्र घूमल टूटल हमर देश,
अराड़ि ठाढ़ कएलक दियाद।
मुदा सोचैत छी।
जे भने दियाद अछि समीप,
आ’ कएने अछि अराड़ि,
ताहि बहन्ने छी हम सजग,
करैत रहैत छी तैयारी।
1962 धरि हिमालयकेँ बुझल बेढ़,
जेना 1498 धरि छल समुद्र,
द्वार खोलैत छल खैबर दर्रा।
प्ड़ोसीयो पर आक्रमण होइत छल,
दूर-दूरसँ अबैत छल अत्याचारी,
भने दियाद अछि कएने अराड़ि,
जे करैत रहैत छी तैयारी।
98. चोरि
गेलहुँ गाम आ’ एम्हर,
आयल फोन, समाचार चोरिक।
छुट्टी होयबला छल समाप्त,
मुदा चोरक गणना छल ठीक।
आबयसँ एक्के दिन पहिने,
लगेलन्हि घात।
तोड़ि कय केबाड़,
उधेसल घर-बार।
नहि पाबि कोनोटा चीज,
घुरल माथ पीटि।
भोरमे पड़ोसी कएलन्हि डायल सय,
पुलिस आयल हारि थाकि कय।
पड़ोसीसँ किनबाय दू टा अतिरिक्त ताल,
(पुलिस महराज अपन घरक हेतु),
चाभी लेलन्हि अपन काबिजमे।
चोर हड़बड़ीमे छल चलि गेल,
मुदा एहि महाशयक हाथ चाभी गेल,
आ’ शो-केशक चानीक नर्त्तकी गुम भेल।
चोरकेँ छल डर गेटक दरबानक,
से छलाह ओ’ गहनाक आ’ नकदीक ताकक।
मुदा पुलिस महाराज दय राब दौब दरबानहुँकेँ,
निकललाह चोरि कय बरजोड़ीसँ।
99. चोरकेँ सिखाबह
यौ काका छी अहाँ खाटकेँ,
धोकड़ी किएक बनओने,
खोलि नेवाड़ फेर घोरिकेँ,
बनाऊ खाट फेर नवीने।
कहलन्हि काका तखन जे हौ,
देखह आयत रातिमे जे चोर,
पटकत लाठी खाट पर आ’
चोट नहि लागत मोर।
परञ्च काका जौँ ओ’ चलबय,
लाठी नीचाँ बाटे,
वाह बेटा कहि दिहह चोरकेँ,
ई गप तोहीँ जा कय।
100. काल्हि
भोरे उठि ऑफिस जाइत छी,
आ’ साँझ घुरि खाय सुतैत छी।
कतेक रास काज अछि छुटैत,
अनठाबैत असकाइत मोन मसोसैत।
जखन जाइत छी चुट्टीमे गाम,
आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम।
पबैत छी ढ़ेर रास उपराग,
तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम।
कागजक पन्ना पर नव राग,
विलम्बक बादक हृदयक संग्राम।
चलैत छल बिना तारतम्यक,
उद्देश्यक-विधेयक।
कनेक सोचि लेल,
छुट्टीमे जाय गाम।
विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान,
फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ,
जे सोचल कएल, नित चलल,
जीवनक सुर भेटल आब जाय।
101. मोन पाड़ैत
मोन अछि नहि पड़ि रहल,
पाड़ि रहल छी मोन।
लिखना कड़ची कलमसँ लिखैत,
फेर फाउन्टेन पेनक निबमे बान्हि ताग,
छलहुँ लिखाइकेँ मोटबैत,
मास्टर साहब भ’ जाइथ कनफ्यूज।
केलहुँ अपने अपकार ठाढ़े-ठाढ़,
अक्षर अखनो हमर नहि सुगढ़।
फेर मोन पाड़ैत छी,
दिनमे बौआइत रही,
कलममे बाँझी तकैत,
दोसर ठाढ़ि तोड़ने पड़ैत छल,
बुरबक होयबाक संज्ञा,
ईहो छी नहि बुझैत,
मोजर होइत तँ खैतहुँ आम,
अगिला साल।
बाँझीमे नहि कोनो आस,
घूरमे होइछ मात्र काज।
फेर छे पाड़ैत, अंडीक बीया बीछब,
पेराइ कटबाय अनैत छलहुँ तेल,
ओहिमे छनल तिलकोड़क स्वाद,
राजधानीक शेफकेँ करैछ मात।
तेलक कमीसँ भभकैत कबइक स्वाद,
’की नीक बनल’ केर मिथ्यावाद।
महिनामे आध किलो करू तेलक खर्च,
भ’ जायत एक किलो, पाइक माश्चर्ज।
कंजूसी नहि, जबरदस्ती ठूसी।
मोन पाड़ैत छी धानक खेत,
झिल्ली कचौड़ी, लोढ़ैत
काटल धानक झट्ठा,
ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी।
‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ’ सतघरियाक खेल,
आमक जाबी,
बंशीसँ मारैत माछ,
खुरचनसँ सोहैत आम काँच।
चूनक संग काँच आमक मीठ स्वाद,
बडका दलान, दाउन,
बाढ़िक पानि सँ डूबल शीस होइत खखड़ी,
धानमे मिला देला पर पकड़ैत छल कुञ्जड़नी।
भैरव स्थानक काँच बैरक स्वाद,
बिदेसरक रवि दिनक बूझल,
फूल_लोटकीसँ बिदेसर पूजल।
चूड़ा लय जाइत रही गामसँ,
दही-जिलेबी कीनि घुरैत भोजन कय।
जमबोनीक बनसुपारीक स्वाद,
पुरनाहाक धातरीमक गाछ।
साहर दातमनिक सोझ नीक छड़,
जे अनैछ छी बुधियारी तकड़।
तित्ती खेलाइत बाल, गुल्ली डंटा,
गोलीक खेल, अखराहाक झमेल।
हुक्का लोलीक बाँसक कनसुपती,
फेर कपड़ाक गेनी मटियातेलमे डुबाय,
छलहुँ रहल जराय।
छठिक भोरमे फटक्का फोड़ल,
जूड़िशीतलक धुरखेल खेलेल।
आयल बाढ़ि दुर्भिक्ष,
छोड़ल गाम यौ मित्र।
मोन नहि पड़ैछ,छी पाड़ैत,
बैसि बैसि बैसि।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
संस्कृत कथा
गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल।
कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।
सुभाषितम्
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।
पद्य ( गजेन्द्र ठाकुर)
चटका चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे। रचयति नीडं चटका वृक्षे आकाशे।
नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे। आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा, न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।
कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे, कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।
------------------------------------------------
नमोनमः। भवतां सर्वेषाम् अपि स्वागतम्।
जलम् आवश्यकम्।
काफी आवश्यकम्।
मास्तु।
चायम् आवश्यकम्।
मास्तु। मास्तु। पर्याप्तः।
किम् आवश्यकम्। जलम् आवश्यकम्।
किंचित् आवश्यकम्।
आम्।
पुनः किंचित् आवश्यकम्। धनम् आवश्यकम्। चाकलेहः आवश्यकः। मिष्टान्नम् मधुरम् आवश्यकम्। शिक्षणम् आवश्यकम्। मास्तु। संस्कृतम् आवश्यकं वा। आवश्यकम्। ताडनं मास्तु। वस्त्रं धनं आवश्यकम्। द्वेषः कोलाहलः मास्तु। अहं भवतः युतकं ददामि। सर्वे वदंतु। चतुर्वेदस्य युतकम्। भवान युतकम्। मम युतकम्। वदतु। भवतः युतकम्। भवतः नासिका। समीचीनम्। सुनीते। भवति आगच्छतु। अहं भवत्याः आभूषणं वदामि। भवति मम् आभूषणं वदतु। भवन्तः सुनीतायाः आभूषणम् इति वदन्तु। भवत्याः घटी। भवत्याः केशः। साधु-साधु। पुनः एकम् अभ्यासः कुर्मः। कः कस्य मित्रम्। अथवा का कस्याः सखी। इति भवन्तः। लता प्रियङ्कायाः सखी। वदन्तु। उदाहरणं वदामि। इदानीम भवन्तः वदन्तु। रोहितः अभिषेकस्य मित्रम्। उत्तमम्। इदानीं वयं बहुवचनस्य अभ्यासं कुर्मः। छात्रः- छात्राः। दंतकूर्चः-दंतकूर्चा।
उत्तमम्। चशकः- चशकाः। बालकः- बालकाः। सैनिकः- सैनिकाः। वृक्षः- वृक्षाः। शिक्तवर्तिका- शिक्तवर्तिकाः। पेटिका- पेटिकाः। उत्पीठिका- उत्पीठिकाः। लेखनी- लेखन्यः। अङ्कनी- अङ्कन्यः। घटी- घट्यः। कूपी- कूप्यः। पर्णम्- पर्णानि। पुस्तकम्- पुस्तकानि। कङ्कनम्- कङ्कणानि। फलम्- फलानि। सङ्गणकम्- सङ्गणकानि।
अहम् एकवचने वदामि। भवन्तः परिवर्त्तनं कुर्वन्।
छात्रः अस्ति- छात्राः सन्ति। छात्रा अस्ति।– छात्राः सन्ति। दंतकूर्चः अस्ति। - दंतकूर्चाः सन्ति। चमषः अस्ति।– चमषाः सन्ति।
अङ्कणी अस्ति। अङ्कन्यः संति।
पर्णम् अस्ति।पर्णानि सन्ति।
वृक्षः अस्ति।– वृक्षाः सन्ति। बालकः अस्ति।– बालकाः सन्ति। गायकः अस्ति।– गायकाः सन्ति।
लेखकः अस्ति।– लेखकाः सन्ति। बालिका अस्ति। बालिकाः सन्ति। पत्रिका अस्ति। पत्रिकाः सन्ति। पत्रम् अस्ति।पत्राणि सन्ति। पुष्पम् अस्ति।पुष्पाणि सन्ति। मन्दिरम् अस्ति।मन्दिराणि सन्ति। फलम् अस्ति। फलानि सन्ति। पर्णम् अस्ति। पर्णानि सन्ति।
अङ्कणि अस्ति। अङ्कण्यः सन्ति। लेखनी अस्ति। लेखन्य सन्ति।
इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः।
बालिकाः सन्ति। बालकाः सन्ति। बालकः एकवचनं वाक्यं वदति। बालिकाः बहुवचनं रूपं वदन्तु।तस्य वाक्यस्य बहुवचन रूपं वदति।
बालिकाः एकवचनं वाक्यं वदति। बालकाः परिवर्त्तनन्ति। अस्तु वा। अस्तु। पुस्तकम् अस्ति।पुस्तकानि सन्ति। लेखनी अस्ति। लेकण्याः सन्ति। घटी अस्ति। घट्याः सन्ति। सः छात्रः। ते छात्राः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। सः कः। सः पुरुषाः। ते के। ते पुरुषः। कः पुरुषः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। ते के। ते पुरुषाः। के पुरुषाः। ते पुरुषाः। हस्तं दर्शयन्तु। अक्षता उत्तिष्ठन्तु। ताः बालिकाः। सा बालिका। सा पेटिका। ताः पेटिकाः। सा का। ताः काः। का पेटिका। सा पेटिका।
काः पेटिका। ताः पेटिकाः। तत् चित्रम्। ताणि चित्राणि। तत् किम्। ताणि कानि। ते वृक्षाः। एते वृक्षाः। एते छात्राः। ताः घट्यः। ते के। एते के। एताः बालिकाः। एताः घट्यः। ताः बालिकाः। एताः काः। ताः घट्यः। काः घट्यः। तानि फलानि। एतानि फलानि। एतानि पुस्तकानि। तानि पुस्तकाणि। एतानि फलानि। एतानि कानि। तानि फलानि। भवान् बालकः। भवन्तः बालकाः। भवती बालिका। भवत्यः बालिकाः। अहं भारतीया। वयं के। वयं भारतीयाः। वयं भारतीयाः।
अहं देशभक्त्तः। वयं देशभक्ताः। भवन्तः बालकाः। भवन्तः के। वयं बालकाः। भवत्यः बालिकाः। भवत्यः काः। वयं बालिकाः। अहम् एकवचनं वदामि। भवन्तः बहुवचनं वदन्तु। एकम् अभ्यासः कूर्मः। अहं भारतीयः।अहं राष्ट्रभक्तः। अहं चतुरः। अहं मूर्खः। वयं मूर्खाः।
सिद्धिरस्तु।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) मधुश्रावणी अरिपन
चित्रकार- उमेश कुमार महतो, गाम-बहादुरगंज(जिला किशनगंज,बिहार, भारत), उम्र-18 वर्ष, पिताक नाम- श्री केशव महतो।
श्रावन कृष्ण पंचमी (नाग पंचमीसँ) प्रारम्भ भ’ कय श्रावन शुक्ल तृतीया पर्यन्त नीचाँक अरिपन पर विभिन्न नागक पूजा कएल जाइत अछि, आ’ वृद्धा लोकनि एहि अवसर पर कथा सेहो कहैत छथि। नव वर-वधूकेँ संग बैसा कय पूजाक समापन होइत अछि। इइ अरिपन दूटा मेना-पात आ’ पूजा करयबालीक दुनू दिशि भूमि पर बनाओल जाइत अछि। वाम पात पर 101 सर्पिणी सिनूर आ’ काजरसँ आ’ दहिन कातक पात पर 101 सर्पिणी पिठारसँ बनाओल जाइत अछि। वाम कातक सर्पक मुखिया कुसुमावती आ’ दहिन कातक वौरस नागक पूजा होइत अछि। मेना पातमे सर्प वशीकरण शक्त्ति होइत अछि। संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 8. संगीत शिक्षा
शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि।
जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ’ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।
शुद्ध आ’ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑।
एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ’ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल।
एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ’ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत।
आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। 37 टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ 12, 12, 12 केर तीन सेट आ, अंतिम 37म तीव्र सां केर हेतु।
सप्तक मे सातटा शुद्ध आ’ पाँचटा विकृत मिला कय 12 टा भेल!
वाम कातसँ 12 टा उजरा आ’ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला 12 टा की मध्य सप्तक आ, 25 सँ 36 धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।
आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ’ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक।
मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ’ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा-
स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं
अवरोह- तारसँ मध्य आ’ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।
वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ’ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी।
(अनुवर्तते)
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