भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, August 01, 2008

'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ ) ११. बालानां कृते-१.नैका बनिजारा-गजेन्द्र ठाकुर २. देवीजी: गरीबक सहायता- ज्योति झा चौधरी

११. बालानां कृते-
बालानां कृते


१.नैका बनिजारा-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: गरीबक सहायता- ज्योति झा चौधरी
१.नैका बनिजारा


चित्र: ज्योति झा चौधरी
नैका बनिजारा

शोभनायका छलाह एकटा वणिकपुत्र। हुनकर विवाह तिरहुतक कोनो स्थानमे बारी नाम्ना स्त्रीसँ भेल छलन्हि। शोभा द्विरागमन करबा कए कनियाँकेँ अनलन्हि, आऽ बिदा भए गेलाह मोरंगक हेतु व्यापार करबाक लेल। पत्नीक संग एको दिन नहि बिता सकल छलाह। रातिमे एकटा गाछक नीचाँमे जखन ओऽ राति बितेबाक लेल सुस्ता रहल छलाह, तखन हुनका एकटा ध्वनि सुनबामे अएलन्हि। एकटा डकहर अपन भार्याक संग ओहि गाछ पर रहैत छल। दुनू गोटे गप कए रहल छलाह, जे ओऽ राति बड़ शुभ छल आऽ ओहि दिन पत्नीक संग जे रहत तकरा बड्ड प्रतिभावान पुत्रक प्राप्ति होएतैक।
ई सुनतहि शोभा घर पहुँचि गेल भार्या लग। लोकोपवादसँ बचबाक लेल पत्नीकेँ अभिज्ञानस्वरूप एकटा औँठी दए देलन्हि आऽ चलि गेलाह मरंग। ओतए १२ बर्ख धरि व्यापार कएलन्हि, आऽ तेरहम बर्ख बिदा भेला घरक लेल।
एम्हर ओकर कनियाक बड़ दुर्गति भेलैक। ओऽ जखन गर्भवती भए गेलीह, सासु-ससुर घरसँ निकालि देलकन्हि हुनका। मुदा ओकर दिअर जकर नाम छल चतुरगन, ओकरा सभटा कथा बुझल छलैक। ओतए रहय लगलीह ओऽ। जखन शोभा घुरल तखन सभ रहस्य बुझलकैक आऽ सभ हँसी खुशी रहए लागल।
तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना।
दुर्गा गे स्वामी के लैके कोहबर घर लेवा ने
केलही रे ना।
कोहबर घर से हमरो निकालियो देलकइ रे ना
दुर्गा गे केना बचबै अन्न-पानी बिन केना
रहबइ रे ना।
२. देवीजी: गरीबक सहायता



चित्र: ज्योति झा चौधरी

देवी जी : गरीबक सहायता
एक बेर देवीजी विद्यालय आबि रहल छलीह तऽ द्वार लग हुनका एकटा चिनिया बदाम बेचऽवला बड उदास देखेलनि। हुनका सऽ नहि रहल गेलनि। ओऽ ओकरा लग जा कऽ पुछलखिन '' एहि उदासीक की कारण? जवाबमे जे सुनऽ भेटलनि ताहि सऽ हुनकर मोन क्षोभसॅं भरि गेलनि।
हुनकर विद्यालयक किछु छात्र ओकरा सऽ चिनियाबदाम खरीदकऽ पाई नहि देलकै। अगिला दिन ओऽ खुमचावला ओहि बेईमान सभकेँ समान बेचऽ सॅं मना कऽ देलक। ताहिसॅं उकता कए बच्चा सभ आर उग्र भऽ गेल आर ओकरा सब समानकेँ लुटि पाटि कऽ छिड़िया देलक। ओऽ खुमचावला गरीब छल, ओकर बड नुक्सान भेलैक। ताहि लऽ कऽ ओऽ बड दुःखी छल।
देवीजी ओकरा प्रधानाध्यापक लग लऽ गेलखिन। प्रधानाध्यापककेँ सेहो अपन विद्यालयक बच्चा सबहक ई कुकर्म बड क्षोभित केलकनि। ओऽ देवीजी संगे मिलिकऽ उपद्रवी बच्चा सभकेँ अपन अभिभावक संगे बजेलखिन। सभ उपद्रवी बच्चा सभकेँ विद्यालयसँ निष्कासित करबाक बात भेल। तहन बच्चा सभ माफी मॅगलक। देवीजी ओकरा सभकेँ बुझेलखिन जे गरीबी द्वारे ओऽ खुमचावला विद्यालय लग खुमचा लगाकऽ दू पाई कमाइत अछि जाहि सॅं ओकर परिवार चलैत छञ। एहि घटनासॅ ओकर बड हानि भेलैक। ओकरा खेनाइ पिनाइ तकक कष्ट भऽ गेलैक।
तखन बच्चा सभ अपन एहि गलतीक पश्चाताप करबाक विचार केलक। देवीजीक आज्ञा लऽ ओऽ सभ टूटल खुमचाक मरम्मति केलक आऽ चंदा जमाकऽ जतेक समान लुटने रहए तकरा कीनि लौटेलक। सभ कियो ई शपथ लेलक जे कहियो फेर एहेन काज नहि करत आऽ गरीबक यथासम्भव सहायता करत ।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ ) ११. बालानां कृते-१.कौआ आऽ फुद्दी-गजेन्द्र ठाकुर२. देवीजी: विद्यार्थी बनल माली- ज्योति झा चौधरी

११. बालानां कृते-
१.कौआ आऽ फुद्दी-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: विद्यार्थी बनल माली- ज्योति झा चौधरी
1.कौवा आऽ फुद्दी


चित्र: ज्योति झा चौधरी
एकटा छलि कौआ आऽ एकटा छल फुद्दी। दुनूक बीच भजार-सखी केर संबंध। एक बेर दुर्भिक्ष पड़ल। खेनाइक अभाव एहन भेल जे दुनू गोटे अपन-अपन बच्चाकेँ खएबाक निर्णय कएलन्हि। पहिने कोआक बेर आयल। फुद्दी आऽ कौआ दुनू मिलि कए कौआक बच्चाकेँ खाऽ गेल। आब फुद्दीक बेर आयल। मुदा फुद्दी सभ तँ होइते अछि धूर्त्त।
“अहाँ तँ अखाद्य पदार्थ खाइत छी। हमर बच्चा अशुद्ध भए जायत। से अहाँ गंगाजीमे मुँह धोबि कए आबि जाऊ”।
कौआ उड़ैत-उड़ैत जंगाजी लग गेल-
“हे गंगा माय, दिए पानि, धोबि कए ठोढ़, खाइ फुद्दीक बच्चा”।
गंगा माय पानिक लेल चुक्का अनबाक लेल कहलखिन्ह।
आब चुक्का अनबाक लेल कौआ गेल तँ ओतएसँ माटि अनबाक लेल कुम्हार महाराज पठा देलखिन्ह्। खेत पर माटिक लेल कौआ गेल तँ खेत ओकरा माटि खोदबाक लेल हिरणिक सिंघ अनबाक लेल विदा कए देलकन्हि। हिरण कहलकन्हि जे सिंहकेँ बजा कए आनू जाहिसँ ओऽ हमरा मारि कए अहाँकेँ हमर सिंघ दऽ दए। आब जे कौआ गेल सिंघ लग तँ ओऽ सिंह कहलक- “हम भेलहुँ शक्त्तिहीन, बूढ़। गाञक दूध आनू, ओकरा पीबि कए हमरामे ताकति आयत आऽ हम शिकार कए सकब”।
गाञक लग गेल कौआ तँ गाञ ओकरा घास अनबाक लेल पठा देलखिन्ह। घास कौआकेँ कहलक जे हाँसू आनि हमरा काटि लिअ।
कौआ गेल लोहार लग, बाजल-
“हे लोहार भाञ,
दिअ हाँसू, काटब घास, खुआयब गाय, पाबि दूध,
पिआयब सिंहकेँ, ओऽ मारत हरिण,
भेटत हरिणक सिंघ, ताहिसँ कोरब माटि,
माटिसँ कुम्हार बनओताह चुक्का, भरब गङ्गाजल,
धोब ठोर, आऽ खायब फुद्दीक बच्चा”।
लोहार कहलन्हि, “हमरा लग दू टा हाँसू अछि, एकटा कारी आऽ एकटा लाल। जे पसिन्न परए लए लिअ”।
कौआकेँ ललका हाँसू पसिन्न पड़लैक। ओऽ हाँसू धीपल छल, जहाँ कौआ ओकरा अपन लोलमे दबओलक, छरपटा कए मरि गेल।

2.देवीजी विद्यार्थी बनल माली

एकटा बच्चा छलै जे छलै बड़ा खुरापाती।विद्यालय आबैत काल ओ रस्ताक सब फूल पात नोचने आबै छलै।विद्यालयमे सेहो फूलक गाछ के नोइच कऽ राइख दैत छल।अतब्ैा नहि ओ आनो बच्चा सबके उकसाबै छल।ओकर संगी साथी सब सेहो संगतक प््राभावे बड उपद्रवी भऽ गेल।तंग भऽ विद्यालय के माली प््राधानध्यापक लग अपन समस्या बाजल ''महोदय हम बच्चा सबहक खुरापात सऽ बड तंग छी।हम्मर दिन भरिक मिहनत ई सब क्षण भरि मे मटियामेट कऽ दैत अछि आ हम्मर बातक मोजर सेहो नहि दैत अछि।च्च् ताही पर प््राधानाध्यापक ओकरा आश्वासन देलखिन ''हम एहि पर अवश्य कार्यवाही करब।हम एहन बच्चा सभके दंडित करब।च्च्
जखन देवीजी के अहि बातक खबरि लगलैन तऽ ओ स्वयम्‌ माली सॅं बात क बालक के पता केलीह फेर ओकरा सभके बजा कऽ पुछलखिन ''अहॉ सभ एहेन काज कियैक करै छी। बेचारा माली रौद बसात मे काज करैत अछि आ अहॉ सभ उारे ओकर परिणाम नहि आबैत छै। अहॉं सभके नहि ईच्छा होइत अछि विद्यालय के सुन्दर बनाब के।च्च् ताहि पर कियो बजलै ''हमरा सभके तितली पकड़नाई नीक लागैत अछि आ तितली सभत फूले पर बैसैत छै।च्च् आब देवीजीके फसादक जड़ि ज्ञात भेलैन।ओ प््राधानाचार्य सॅं आदेश पाबि सभ बच्चा सभके छुट्रटी वला दिन विद्यालय बजेलखिन। माली सेहो आयल।
देवीजी खेले खेलमे सभके बागवानी सिखेलखिन। सभके मिलकऽ काज केनाइ ततेक नीक लागल जे क्षण भरिमे सभ टूटल मरल गाछ सभ हटा नब फूलक गाछ लागि गेल। देवीजी सभके कहलखिन जे जॅं ई गाछ सबके कियो तोड़त नहि त कञिये दिनमे अहि मे सुन्दर सुन्दर पुष्प लागत जाहि सॅं आकर्षित भऽ तितली के जमौड़ा लागत।संगहि देवीजी तितली के पकड़ सॅ मना केलखिन।ओकरा सुन्दरता दूर स देख के शिक्षा देलखिन।सभ बच्चा आह्‌लादित छल तैं उत्पात बन्द कऽ देलक। प््राधानाचार्य अहि परिवर्तन सॅं प््राभावित भेला।
किछुए दिन बाद गाछमे फूल लाग लगलै।आ संगहि तितलीक आगमण सेहो बढ़ि गेल। आब खाली समय निकाइल कऽ देवीजी संग बच्चा सभ ओहि दृष्यक आनन्द लेब लागल।उपद्रवी बच्चा सभसॅं सकारात्मक काज करबाबऽ लेल देवीजीके सभसॅं प््राशंसा भेटलैन।
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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ ) ११. बालानां कृते-१.मूर्खाधिराज-गजेन्द्र ठाकुर/ २. देवीजी: पिंजराक पक्षी- ज्योति झा चौधरी

११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
बालानां कृते
-गजेन्द्र ठाकुर
१.मूर्खाधिराज-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: पिंजराक पक्षी- ज्योति झा चौधरी
१.मूर्खाधिराज

चित्र: ज्योति झा चौधरी
एकटा गोपालक छल। तकर एकटा बेटा छल। ओकर कनियाँ पुत्रक जन्मक समय मरि गेलीह। बा बच्चाक पालन कएलन्हि। मुदा ओऽ बच्चा छल महामूर्ख। जखन ओऽ बारह वर्षक भेल तखन ओकर विवाह भए गेल। मुदा ओऽ विवाहो बिसरि गेल।
बुढ़िया बाकेँ काज करएमे दिक्कत होइत छलन्हि। से ओऽ बुझा-सुझाकेँ ओकरा कनियाकेँ द्विरागमन करा कए अनबाक हेतु कहलन्हि। बा ओकरा गमछामे रस्ता लेल मुरही बान्हि देलन्हि। रस्तामे बच्चाकेँ भूख लगलैक। ओऽ गमछासँ मुरही निकालि कए जखने मुँहमे देबए चाहैत छल आकि मुरही उड़ि जाइत छल। बच्चा बाजए लागल- आऊ, आऊ उड़ि जाऊ।
लगमे बोनमे एकटा चिड़ीमार जाल पसारने छल, मुदा बच्चाक गप सुनि कए ओकरा बड्ड तामस उठलैक। ओकरा लगलैक जेना ई बच्चा ओकर चिड़ैकेँ उड़ाबए चाहैत अछि। चिड़ीमार बच्चाकेँ पकड़ि कए पुष्ट पिटान पिटलक। बच्चा पुछलक- हमर दोख तँ कहू? चिड़ीमार कहलक- एना नहि। एना बाजू। आबि जो। फँसि जो।
आब बच्चा सैह बजैत आगू जाए लागल। आब साँझ भए रहल छल। बोन खतम होएबला छल। ओतए चोर सभ चोरिक योजना बनाए रहल छलाह। ओऽ सभ सुनलन्हि जे ई बच्चा हमरा सभकेँ पकड़ाबए चाहैत अछि। से ओऽ लोकनि सेहो ओकरा पुष्ट पिटान पिटलन्हि। बच्चा फेर पुछलक- हम बाजी तँ की बाजी? चोरक सरदार कहलक- बाज जे एहन सभ घरमे होए।
आब बच्चा यैह कहैत आगाँ बढ़ए लागल। आब श्मसानभूमि आबि गेल। एकटा जमीन्दारक एकेटा बेटा छलैक। से मरि गेल छल आऽ सभ ओकरा डाहबाक लेल आबि रहल छलाह। ओऽ लोकनि बच्चाक गप पर बड़ कुपित भेलाह आऽ ओकरा पुष्ट पिटलन्हि। फेर जखन बच्चा पुछलक जे की बाजब उचित होएत तँ सभ गोटे कहलखिन्ह जे एना बाजू- एहन कोनो घरमे नहि होए। बच्चा यैह गप बाजए लागल। आब नगर आबि गेल छल आऽ राजाक बेटाक विवाहक बाजा-बत्ती सभ भए रहल छल। बरियाती लोकनि बच्चाकेँ कहैत सुनलन्हि जे एहन कोनो घरमे नहो होए तँ ओऽ लोकनि क्रोधित भए फेर ओहि बच्चाकेँ पिटपिटा देलखिन्ह। जखन बच्चा पुछलक जे की बजबाक चाही तँ सभ कहलकन्हि जे किछु नहि बाजू। मुँह बन्न राखू।
बच्चा सासुर आबि गेल। ओतए नहिये किछु बाजल नहिये किछु खएलक, कारण खएबामे मुँह खोलए पड़ितैक। भोरे सकाले सासुर बला सभ अपन बेटीकेँ ओहि बच्चाक संग बिदा कए देलन्हि। रस्तामे बड्ड प्रखर रौद छलैक। ओऽ सुस्ताए लागल। मुदा कलममे सेहो बड्ड गुमार छलैक। कनियाकेँ बड्ड घाम खसए लगलैक आऽ ताहिसँ ओकर सिन्दूर धोखरि गेलैक। बच्चाकेँ भेलैक जे सासुर बला ओकरासँ छल कएलक आऽ ओकरा भँगलाहा कपार बला कनियाँ दए जाइ गेल अछि। एहन कनियाँकेँ गाम पर लए जाय ओऽ की करत। ओऽ तखने एकटा हजामकेँ बकरी चरबैत देखलक। ओकरासँ अपन पेटक बात कहबाक लेल अपन मुँह खोललक आऽ सभटा कहि गेल। हजाम बुझि गेल जे ई बच्चा मूर्खाधिराज अछि। ओऽ ओकरा अपन दूध दए बाली बकड़ीक संग कनियाँक बदलेन करबाक हेतु कहलक। बच्चा सहर्ष तैयार भए गेल। आगू ओऽ बच्चा सुस्ताए लागल आऽ खुट्टीसँ बकड़ीकेँ बान्हि देलक। बकड़ी पाउज करए लागल तँ बच्चाकेँ भेलैक जे बकड़ी ओकर मुँह दूसि रहल अछि। ओऽ ओकरा हाट लए गेल आऽ कदीमाक संग ओकरो बदलेन कए लेलक। गाम पर जखन ओऽ पहुँचल तँ ओकर बा बड्ड प्रसन्न भेलीह। हुनका भेलन्हि जे कनियाँक नैहरसँ सनेसमे कदीमा आएल अछि। मुदा कनियाँकेँ नहि देखि तकर जिगेसा कएलन्हि तँ बच्चा सभटा खिस्सा सुना देलकन्हि। ओऽ माथ पीटि लेलन्हि। मुदा बच्चा ई कहैत खेलाए चलि गेल जे कदीमाक तरकारी बना कए राखू।
२. देवीजी: पिंजराक पक्षी



चित्र: ज्योति झा चौधरी

एकटा शिक्षिका छलीह, जिनका गाम पर सभ देवी जी कहैत छलन्हि। हुनकासॅं सभ विद्यार्थी डेराइतो छल, मुदा सम्मान सेहो करैत छल। एक दिन ओऽ एकटा कक्षामे गेलीह तँ हुनका एकटा छात्र पिंजरामे बंद एकटा सुग्गा देलकन्हि, जकरा 'देवी जी’ बजनाइ सिखा देल गेल छल । ओकरा बजैत सुनि सभ छात्र प्रसन्न भऽ हॅंसऽ लागल। देवीजी ओकरा तत्काल स्वीकार कऽ पढाबऽ मे लागि गेलीह । बादमे ओऽ ओहि बालकसँ पुछलखिन्ह जे '' जौं अहाँकेँ क्यो अपन शौक पूरा करऽ लेल सभसँ अलग कऽ छोट जगह पर बान्हि कऽ राखए तँ केहन लागत। हमरा एहि भेँटसँ कोनो खुशी नहि भेल”। बालककेँ अपन गलतीक अनुभव तुरत भऽ गेलैक। ओऽ तुरत ओहि पक्षीकेँ पिंजरासॅं मुक्त कऽ देलक।
अगिला दिन देवी जी सभकेँ पक्षी देखबाक अलग तरीका सिखेलखिन्ह। पाठशालाक प्रांगणक एकान्त स्थान पर एकटा पुरान टेबुल राखि देलखिन्ह। ताहि पर मकई, चाउर, गहुम, अंकुरैल चना, रोटीक टुकड़ा, कटोरीमे पानि आदि राखि देलखिन्ह। सभ क्यो दूर बैसि कऽ प्रतीक्षा करऽ लगलैथ। कनिके देरीमे तरह-तरहक पक्षी ओतए हलचल करय लागल। ई दृष्य सभक लेल ओहि पिंजरामे पक्षी देखबासँ बेसी सुखद छलैक। तखन देवीजी कहलखिन्ह ''असली खुशी दोसराक खुश करबामे छैक। अपन स्वार्थ मात्र लेल दोसराकेँ कष्ट देनाइ पाप कहाइत छैक। सभ बच्चा शपथ लेलक जे आब कोनो पक्षीकेँ पिंजरामे बन्द नहि करत।
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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ ११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर

११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
बालानां कृते
-गजेन्द्र ठाकुर
गोनू झा आ’ दस ठोप बाबा
चित्र ज्योति झा चौधरी

मिथिला राज्यमे भयंकर सुखाड़ पड़ल। राजा ढ़ोलहो पिटबा देलन्हि, जे जे क्यो एकर तोड़ बताओत ओकरा पुरस्कार भेटत।
एकटा विशालकाय बाबा दस टा ठोप कएने राजाक दरबारमे ई कहैत अएलाह जे ओऽ सय वर्ष हिमालयमे तपस्या कएने छथि आऽ यज्ञसँ वर्षा कराऽ सकैत छथि। साँझमे हुनका स्थान आऽ सामग्री भेटि गेलन्हि। गोनू झा कतहु पहुनाइ करबाक लेल गेल रहथि। जखन साँझमे घुरलाह तखन कनिञाक मुँहसँ सभटा गप सुनि आश्चर्यचकित हुनका दर्शनार्थ विदा भेलाह।
एम्हर भोर भेलासँ पहिनहि सौँसे सोर भए गेल जे एकटा बीस ठोप बाबा सेहो पधारि चुकल छथि।
आब दस ठोप बाबाक भेँट हुनकासँ भेलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि “अहाँ बीस ठोप बाबा छी तँ हम श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा छी। कहू अहाँ कोन विधिये वर्षा कराएब”।
“हम एकटा बाँस रखने छी जकरासँ मेघकेँ खोँचारब आऽ वर्षा होएत”।
“ओतेक टाक बाँस रखैत छी कतए”।
“अहाँ एहन ढोंगी साधुक मुँहमे”।
आब ओऽ दस ठोप बाबा शौचक बहन्ना कए विदा भेला।
“औऽ। अपन खराम आऽ कमण्डल तँ लए जाऊ”। मुदा ओऽ तँ भागल आऽ लोक सभ पछोड़ कए ओकर दाढ़ी पकरि घीचए चाहलक। मुदा ओऽ दाढ़ी छल नकली आऽ ताहि लेल ओऽ नोचा गेल। आऽ ओऽ ढ़ोंगी मौका पाबि भागि गेल। तखन गोनू झा सेहो अपन मोछ दाढ़ी हटा कए अपन रूपमे आबि गेलाह। राजा हुनकर चतुरताक सम्मान कएलन्हि।

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बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर

११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
बालानां कृते

-गजेन्द्र ठाकुर
बगियाक गाछ
चित्र ज्योति झा चौधरी
एकटा मसोमात छलीह आ’ हुनका एकेटा बेटा छलन्हि। ओ’ छल बड्ड चुस्त-चलाक।
एक दिनुका गप अछि। ओ’ स्त्री जे छलीह, अपना बेटाकेँ बगिया बना कए देलखिन्ह। ओहि बालककेँ बगिया बड्ड नीक लगैत छलैक। से ओ’ एहि बेर ओ’ एकटा बगिया बाड़ीमे रोपि देलक। ओतए गाछ निकलि आएल। बगियाक गाछ, नञि देखल ने सुनल।
माय बेटा ओहि बगियाक गाछक खूब सेवा करए लगलाह। कनेक दिनमे ओहि गाछमे खूब बगिया फड़य लागल। ओ’ बच्चा गाछ पर चढ़ि कए बगिया तोड़ि कए खाइत रहैत छल।
एक दिनुका गप अछि। एकटा डाइन बुढ़िया रस्तासँ जा’ रहल छल। ओकरा मनुक्खक मसुआइ बना कए खायमे बड्ड नीक लगैत रहैक। से ओ’ जे बच्चाकेँ गाछ पर चढ़ल देखलक, तँ ओकर मोन लुसफुस करए लगलैक। आब ओ’ बुढ़्या मोनसूबा बनबए लागल जे कोना कए ई बच्चाकेँ फुसियाबी आ’ एकरा घर ल’ जा कए एकर मसुआइ बना कए खाइ।
बच्चाकेँ असगर देखि ओ’ लग गेल आ’ बच्चाकेँ कहलक-

“ बौआ एकटा बगिया हमरा नहि देब। बड्ड भूख लागल अछि।
बच्चा ओकर हाथ पर बगिया देबय लागल।

“बौआ हम हाथसँ कोना लेब बगिया हथाइन भ’ जायत”।
बच्चा बगिया माथ पर राखए लागल।
“हँ हँ माथ पर नहि राखू। मथाइन भ’ जायत”।
बच्चो छल दस बुधियारक एक बुधियार। खोइछमे बगिया देबए लागल।
”ई की करैत छी बौआ। बगिया खोँछाइन भ’ जायत, अहाँ झुकि कए बोरामे दए दिअ”।
मुदा बच्चा तँ छल गोनू झाक बुझू जे गोनू झाक मूल-गोत्रेक।
बाजल-
“नञि गए बुढ़िया। तोँ हमरा बोरामे बन्द कए भागि जेमह। माय हमरा ठग सभसँ सहचेत रहबाक हेतु कहने अछि”।

मुदा बुढ़ियो छल ठगिन बुढ़िया। ठकि फिसिया कए बोली-बाली दए कए ओकरा मना लेलक। जखने बच्चा झुकल ओ’ ओकरा बोरामे कसि कए चलि देलक। बुढ़िया रस्तामे थाकि कए एकटा गाछक छहरिमे बैसि गेलि।
कनेक कालमे ओकरा आँखि लागि गेलैक। बच्चा मौका देखि कोनहुना कए ओहि बोरासँ बाहर बहरा गेल आ’ भीजल माटि, पाथर आ’ काँट-कूस बोरामे ध’ कए ओहिना बान्हि कए पड़ा गेल।
बुढ़िया जखन सूति कए उठल आ’ बोरा ल’ कए आगू बढ़ल तँ ओकरा बोरा भरिगर बुझएलैक। मोने-मोन प्रसन्न भ’ गेलि ई सोचि जे हृष्ट-पुष्ट मसुआइ खएबाक मौका बहुत दिन पर भेटल छैक ओकरा। रस्तामे भीजल माटिसँ पानि खसए लागल तँ ओकरा लगलैक जे बच्चा लगही कए रहल अछि। ओ’ कहलक जे-
”माथ पर लहुशंका कए रहल छह बौआ। कोनो बात नहि। घर पर तोहर मसुआइ बना कए खायब हम”।

कनेक कालक बाद काँट गरए लगलैक बुढ़ियाकेँ। कहलक-
”बौआ। बिट्ठू काटि रहल छी। कोनो बात नहि कतेक काल धरि काटब”।
बुढ़्याक एकटा बेटी छलैक। गाम पर पहुँचि कए बुढ़िया ओकरा कहलक, जे आइ एकटा मोट-सोट शिकार अछि बोरामे। माय बेटी जखन बोरा खोललक तँ निकलल माटि, काँट आ’ पाथर। कोनो बात नहि।

बुढ़िया भेष बदलि पहुँचल फेरसँ बगियाक गाछ तर।
एहि बेर बच्चा ओकरा नञि चीन्हि सकल। मुदा जखन ओ’ झुकि कए बगिया बोरामे देबाक गप कहलक तँ बच्चाकेँ आशंका भेलैक।
”गए बुढ़िया। तोँही छँ ठगिन बुढ़िया”।
मुदा बुढ़िया जखन सप्पत खएलक तँ ओ’ बच्चा झुकि कए बगिया बोरामे देबए लागल। आ’ फेर वैह बात।
एहि बेर बुढ़िया कतहु ठाढ़ नहि भेल। सोझे घर पहुँचल आ’ बेटी लग बोरा राखि नहाए-सोनाए चलि गेल।बेटी जे बोरा खोललक तँ एकटा झँटा बला बच्चाकेँ देखलक। ओ’ पुछलक-
”हमर केश नमगर नहि अछि किएक”।
”अहाँक माय अहाँक माथ ऊखड़िमे दए समाठसँ नहि कुटने होयतीह। तैँ”।बच्चा तँ छल दस होसियरक एक होसियार तैँ।

बुढ़ियाक बेटी अपन केश बढ़ेबाक हेतु अपन माथ ऊखड़िमे देलन्हि, आ’ ओ’ बच्चा ओकरा समाठसँ कॉटए लागल। ओकरा मारि ओकर मासु बनेलक। बुढ़िया जखन पोख्रिसँ नहा कए आयल तँ बुढ़ियाक आगू ओ’ मासु परसि देलक।
जखने ओ’ खेनाइ पर बैसलि तँ लगमे एकटा बिलाड़ि छल से बाजि उठल-
”म्याँऊ। अपन धीया अपने खाँऊ।म्याँऊ”।
”बेटी एकरा मासु नहि देलहुँ की।तँ बाजि रहल अछि”।
ओ’ बच्चा बिलाड़िक आँगा मासु राखि देलक मुदा बिलाड़ि मासु नहि खएलक।
आब बुढ़ियाक माथ घुमल। ओ’ बेटीकेँ सोर कएलक तँ ओ’ बच्चा समाठ ल’ कए आयल आ’ ओकरा मारि देलक।
फेरसँ बच्चा बगियाक गाछ पर चढ़ि बगिया खए लागल। बड्ड नीक लगैत छल ओकरा बगिया।
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२.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।


कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्तितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥

करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 11. बालानां कृते-दानवीर दधीची-गजेन्द्र ठाकुर

11. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
दानवीर दधीची
मंच सज्जा
अम्र वन, पोखरि आ’ युद्ध स्थल

वेष-भूषा
अधो वस्त्र- आश्रमवासीक हेतु
आश्विनक हेतु वैद्यक श्वेत वस्त्र
आ’ इन्द्रक हेतु योद्धाक वस्त्र
रथ आ’ अस्त्र शस्त्रक चित्र पर्दा पर छायांकित कएल जा’ सकैत अछि।


प्रथम दृश्य

( महर्षि दध्यङ आथर्वन दधीचीक तपोवनक दृश्य। सूर्योदयक स्वर्णिम आभा, फूलक गाछक फूलक संग पवनक प्रभावसँ सूर्य दिशि झुकब। यज्ञक धूँआसँ मलिन भेल गाछक पात। महर्षि सूर्योदयक दृश्यक आनन्द लए रहल छथि। मुदा दृष्टिमे अतृप्त भाव छन्हि। ओहि आश्रमक कुलपति थिकाह महर्षि, दस सहस्र छात्रकेँ विद्यादान करैत छथि, सभक नाम, गाम आ’ कार्यसँ परिचित छथि। से ओ’ तखने प्रवेश करैत एकटा अपरिचित आगंतुकक आगमन सँ साकांक्ष भ’ जाइत छथि।)


दध्यङ आथर्वन दधीची: अहाँ के छी आगंतुक?

अपरिचित: हम एकटा अतिथि छी महर्षि, आ’ कोनो प्रयोजनसँ आयल छी। कृपा कए अतिथिक मनोरथ पूर्ण करबाक आश्वासन देल जाय।
दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि आश्रमसँ क्यो बिना मनोरथ पूर्ण कएने अहि गेल अछि आगंतुक। हम अहाँक सभ मनोरथ पूर्ण होयबाक आश्वासन दैत छी।

अपरिचित: हम देवता लोकनिक राजा इन्द्र छी। अहाँसँ परमतत्त्वक उपदेशक हेतु आयल छी।एहिसँ अहाँक कीर्त्ति स्वर्गलोक धरि पहुँचत।

(दध्यङ आथर्वन दधीची सोचमे पड़ल मंच पर एम्हरसँ ओम्हर विचलित होइत घुमय लहैत छथि। ओ’ मंच पर घुमैत मोने- मोन, बिनु इन्द्रकेँ देखने, बजैत छथि, जे दर्शकगणकेँ तँ सुनबामे अबैत अछि, मुदा इन्द्र एहन सन आकृति बनओने रहैत छथि, जे ओ’ किछु सुनिये नहि रहल छथि, आ’ मंचक एक दोगमे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।)
दध्यङ आथर्वन दधीची: (मोने-मोन) हम शिक्षा देब तँ गछि लेने छी, मुदा की इन्द्र एकर अधिकारी छथि। बज्र लए घुमए बला, कामवासनामे लिप्त अनधिकारी व्यक्त्तिकेँ परमतत्त्वक शिक्षा? मुदा गछने छी तँ अपन प्रतिज्ञाक रक्षणार्थ मधु-विद्याक शिक्षा इन्द्रकेँ दैत छियन्हि।

इन्द्र: कोन सोचिमे पड़ि गेलहुँ महर्षि।

दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र हम अहाँकेँ मधुविद्याक शिक्षा दए रहल छी। भोगसँ दूर रहू। नाना प्रकारक भोगक आ’ भोज्यक पदार्थ सभसँ। ई सभ ओहने अछि, जेना फूल सभक बीचमे साँप। भोगक अछैत स्वर्ग अधिपति इन्द्र आ’ भूतलक निकृष्ट कुकुरमे कोन अंतर रहत तखन?
( इन्द्र अपन तुलना कुकुरसँ कएल गेल देखि कए तामसे विख-सबिख भ’ गेल। मुदा अपना पर नियंत्रण रखैत मात्र एक गोट वाक्य बजैत मंच परसँ जाइत देखल जाइत अछि।)
इन्द्र: महर्षि अहाँक ई अपमान तँ आइ हम सहि लेलहुँ। मुदा आजुक बाद जौँ अहाँ ई मधु-विद्या ककरो अनका देलहुँ तँ अहाँक गरदनि पर ई मस्तिष्क जकर अहाँकेँ घमण्ड अछि, एहि भूमि पर खसत।


दृश्य 2:

( ऋषिक आश्रम। आश्विन बन्धुक आगमन।महर्षिसँ अभिवादनक उपरान्त वार्त्तालाप। )

आश्विन बन्धु: महर्षि। आब हम सभ अहाँक मधु विद्याक हेतु सर्वथा सुयोग्य भ’ गेल छी। हिंसा आ’ भोगक रस्ता हम सभ छोड़ि देलहुँ। इन्द्र सोमयागमे हमरा लोकनिकेँ सोमपानक हेतु सर्वथा अयोग्य मानलन्हि, मुदा हमरा सभ प्रतिशोध नहि लेलहुँ। कतेक पंगुकेँ पैर, कतेक आन्हरकेँ आँखि हमरा सभ देलहुँ। च्यवन मुनिक बुढ़ापाकेँ दूर कएलहुँ। आ’ तकरे उपकारमे च्यवन हमरा लोकनिकेँ सोमपीथी बना देलन्हि।

दध्यङ आथर्वन दधीची: आश्विनौ। ब्रह्मज्ञानककेँ देब एकटा उपकारमयी कार्य अछि, आ’ अहाँ लोकनि एहि विद्याक सर्वथा योग्य शिक्षार्थी छी। इन्द्र कहने अछि, जे जाहि दिन ई विद्या हम कहियो ककरो देब तँ तहिये ओ’ हमर माथ शरीरसँ काटि खसा देत। मुदा ई शरीरतँ अछि क्षणभंगुर। आइ नहि तँ काल्हि एकरा नष्ट होयबाक छैक। ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक।

आश्विनौ: महर्षि अहाँक ई उदारचरित! मुद हमरो सभ शल्यक्रिया जनैत छी आ’ पहिने हमरा सभ घोड़ाक मस्तक अहाँक गरदनि पर लगाए देब। जखन इन्द्र अपन घृणित कार्य करत आ’ अहाँक मस्तककेँ काटत तखन अहाँक अस्ली मस्तक हमरा सभ पुनः अहाँक शरीरमे लगा देब।
(मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर घोड़ाक गरदनि लगओने महर्षि आश्विन बन्धुकेँ शिक्षा दैत दृष्टिगोचर ओइत छथि।)
दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि जगतक सभ पदार्थ एक दोसराक उपकारी अछि। ई जे धरा अछि से सभ पदार्थक हेतु मधु अछि, आ’ सभ पदार्थ ओकरा हेतु मधु। समस्त जन मधुरूपक अछि। तेजोमय आ’ अमृतमय। सत्येक आधार पर सूर्य ज्योति पसारैत अछि एहि विश्वमे, आ’ चन्द्रक धवल प्रकाश दूर भगाबैत अछि रातिक गुमार आ’ आनैत अछि शीतलता। ज्ञानक उदयसँ अन्हारमे बुझाइत साँप देखा पड़ैत अछि रस्सा। विश्वक सूत्रात्माकेँ ओहि परमात्माकेँ अपन बुद्धिसँ पकड़ू। जाहि प्रकारेँ रथक नेमिमे अर रहैत अछि, ताहि प्रकारेँ परमात्मामे ई संपूर्ण विश्व।

( तखने मंचक पाछाँसँ बड्ड बेशी कोलाहल शुरू भ’ जाइत अछि। तखने बज्र लए इन्द्रक आगमन होइत अछि। एक्के प्रहारमे ओ’ महर्षिक गरदनि काटि दैत छथि। फेर इन्द्र चलि जाइत छथि। मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर महर्षि पुनः अपन स्व-शरीरमे देखल जाइत छथि। ओ’ बैसले छथि आकि इन्द्र अपन मुँह लटकओंने अबैत अछि।)

इन्द्र: क्षमा करब महर्षि हमर अपराध। आइ आश्विन-बन्धु हमरा नव-रस्ता देखओलन्हि। गुरूसँ एको अक्षर सिखनहार ओकर आदर करैत छथि मुदा हम की कएलहुँ। असल शिष्य तँ छथि आश्विन बन्धु।

दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। अहाँकेँ ताहि द्वारे हम शिक्षा देबामे पराङमुख भए रहल छलहुँ। मुदा अहाँक दृढ़निश्चय आ’ सत्यक प्रति निष्ठाक द्वारे हम अहाँकेँ शिक्षा देल। हमरा मोनमे अहाँक प्रति कोनो मलिनता नहि अछि।
इन्द्र: धन्य छी अहाँ आ’ धन्य छय्हि आश्विनौ। आब हम ओ’ इन्द्र नहि रहलहुँ। हमर अभिमानकेँ आश्विनौ खतम कए देलन्हि।

(इन्द्र मंचसँ जाइत अछि। परदा खसैत अछि।)


दृश्य 3:

( स्वर्गलोकक दृश्य। चारू दिशि वृत्र आ’ शम्बरक नामक चर्चा करैत लोक आबाजाही कए रहल छथि। ओ’ दुनू गोटे आक्रमण कए देने अछि भारतक स्वर्गभूमि पर। इन्द्र सहायताक हेतु महर्षिक आश्रम अबैत छथि।)

इन्द्र: वृत्र आ’ शम्बरक आक्रमण तँ एहि बेर बड्ड प्रचंड अछि। अहाँक विचार आ’ मार्गदर्शनक हेतु आयल छी महर्षि।

दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। कुरुक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि, जकर नाम अछि, शर्यणा। अहाँ ओतए जाऊ, ओतय घोड़ाक मूड़ी राखल अछि, जाहिसँ हम आश्विनौकेँ उपदेश देने छलहुँ। ब्रह्मविद्या ओहि मुँहसँ बहरायल आ’ ताहि द्वारे ओ’ अत्यंत कठोर आ’ दृढ़ भ’ गेल अछि। ओहिसँ नाना-प्रकारक शस्त्र बनाऊ, अग्नि आश्रित विध्वंसकक प्रयोग करू, त्रिसंधि व्रज, धनुष, इषु-बाण-अयोमुख-लोहाक सूचीमुख सुइयाबला आ’ विकंकतीमुख- कठोर कन्ह सन एहि तरह्क शस्त्रक प्रयोग करू, कवच आ’ शिरस्त्राणक प्रयोग करू, अंधकार पसारयबला आ’ जड़ैत रस्सी द्वारा दुर्गंधयुक्त्त धुँआ निकलएबला शस्त्रक सेहो प्रयोग करू आ’ युद्ध कए विजयी बनू।

इन्द्र: जे आज्ञा महर्षि।

( परदा खसैत अछि, आ’ जखन उठैत अछि, तँ पोखडिक कातमे घोड़ाक मूड़ीसँ इन्द्र द्वारा वज्र आ’ विभिन्न हथियार बनाओल जा’ रहल अछि, फेर परदा खसि क’ जखन उठैत अछि तँ अग्नियुक्त शस्त्र, जे फटक्काक द्वारा उत्पन्न कएल जा’ सकैत अछि, देखबामे अबैत अछि आ’ मंच धुँआसँ भरि जाइत अछि। फेर परदा खसैत अछि आ’ मंचक पाछाँसँ सूत्रधारक स्वर सुनबामे अबैत अछि।)

सूत्रधार: इन्द्रक विजय भेलन्हि आ’ दुष्ट सभ गुफामे भागि गेल। ईएह छल वैदिक नाटक बादमे एहि अर्थकेँ अनर्थ कए देलन्हि पौराणिक लोकनि, जाहि कथामे दधीचीक हड्डीसँ इन्द्रक वज्र बनएबाक चर्च कएल गेल अछि।

(पर्दा ओ’ ई असल बात अछि केर फुसफुसाहटिक संग खसले रहैत अछि, आ’ लाइट क्षणिक ऑफ भेलाक बाद ऑन भए जाइत अछि।)
2.संस्कृति
शुक्ल यजुर्वेद, अध्याय 22, मंत्र 22
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।


कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्तितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥

करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।

3.की अहाँकेँ बुझल अछि?

1.महात्मा गाँधी 15 अगस्त 1947 केँ कलकत्तामे रहथि आ’ भरि दिन उपास आ’ प्रार्थनामे बितओलन्हि।
2.विश्वक सभसँ पैघ कैंटीलीवर पुल ( दू टा बेम बीचमे योज्यसँ जुड़ल आ’ ऊपरमे लोहाक रस्सा सभसँ बैलेंस कएल) कनाडाक क्यूबेक पुल छैक। ई पुल क्यूबेक नगरक पश्चिममे सेंट लॉरेन्स धार पर अछि।
3. लिमिटेड लायबिलिटी कंपनीक पाँछा ltd लगैत छैक। तहिना जर्मनीमे एकरा हेतु एहि हेतु Gmbh , इटलीमे SpA आ’ संयुक्त्त राज्य अमेरिकामे LLC लगैत छैक।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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Friday, July 25, 2008

विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 9. बालानां कृते एकाङ्की अपाला आत्रेयी

9. बालानां कृते एकाङ्की
अपाला आत्रेयी
पात्र: अपाला: ऋगवैदिक ऋचाक लेखिका अत्रि: अपालाक पिता
वैद्य 1,2,3: कृशाश्व: अपालाक पति।
वेषभूषा
उत्तरीय वस्त्र (पुरुष), वल्कल, जूहीक माला(अपालाक केशमे), दण्ड।
मंच सज्जा
सहकार-कुञ्ज(आमक गाछी), वेदी, हविर्गन्ध, रथक छिद्र, युगक छिद्र, सोझाँमे साही, गोहि आ’ गिरग़िट।




दृश्य एक
(आमक गाछीक मध्य एक गोट बालिका आ’ बालक)।
बालिका: हमर नाम अपाला अछि। हम ऋषि अत्रिक पुत्री छी।अहाँ के छी ऋषि बालक।
बालक: हम शिक्षाक हेतु आयल छी। ऋषि अत्रि कतए छथि।
अपाला: ऋषि जलाशय दिशि नहयबाक हेतु गेल छथि, अबिते होयताह। (तखनहि दहिन हाथमे कमंडल आ’ वाम हाथमे वल्कल लेने महर्षि अत्रिक प्रवेश।) अत्रि: पुत्री ई कोन बालक आयल छथि। अपाला: ऋषिवर। आश्रमवासीक संख्यामे एक गोट वृद्धि होयत। ई बालक शिक्षाक हेतु... बालक: नहि। हमर अखन उपनयन नहि भेल अछि। हम अखन माणवक बनि उपाध्यायक लग शिक्षाक हेतु आयल छी। ई देखू हमर हाथक दण्ड। हम दण्ड- माणवक बनि सभ दिन अपन गामसँ आयब आ’ साँझमे चलि जायब। हम वेद मंत्रसँ अपरिचित अनृच छी। अत्रि: बेश तखन अहाँ हमर शिष्यक रूपमे प्रसिद्ध होयब। दिनक पूर्व भाग प्रहरण विद्याक ग्रहणक हेतु राखल गेल अछि। हम जे मंत्र कहब तकरा अहाँ स्मरण राखब। पुनः हम अहाँक विधिपूर्वक उपनयन करबाय संग ल’ आनब। बालक: विपश्चित गुरुक चरणमे प्रणाम। (पटाक्षेप)
दृश्य दू
(उपनयन संस्कारक अंतिम दृश्य। अपाला आ’ किछु आन ऋषि बालक बालिकाक उपनयन संस्कार कराओल जा चुकल अछि।)
अत्रि: अपाला। आब अहाँक असल शिक्षा आ’ विद्या शुरू होयत।(पुनः आन विद्यार्थी सभक दिशि घूमि।) अहाँ सभकेँ सावित्री मंत्रक नियमित पाठ करबाक चाही। ॐ भूरभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्। सविता- जे सभक प्रेरक छथि- केर वरेण्य- सभकेँ नीक लागय बला तेज- पृथ्वी, अंतरिक्ष आ’ स्वर्गलोक-सर्वोच्च अकाश-मे पसरल अछि। हम ओकर स्मरण करैत छी। ओ’ हमर बुद्धि आ’ मेधाकेँ प्रेरित करथु। अपाला: पितृवर।“ ॐ नमः सिद्धम” केर संग विद्यारम्भक पूर्व शिक्षाक अंतर्गत की सभ पढ़ाओल जायत। अत्रि: वर्ण, अक्षर-स्वर-, मात्रा- ह्र्स्व,दीर्घ आ’ प्लुत- बलाघात- उदात्त, अनुदात्त, स्वरित- शुद्ध उच्चारण, अक्षरक क्रमिक विन्यास- वर्त्तनी-, पढ़बाक आ’ बजबाक शैली, एकहि वर्णकेँ बजबाक कैकटा प्रकार, ई सभ शिक्षाक अंतर्गत सिखाओल जायत। साम संतान- जेकि सामान्य गान अछि- केर माध्यमसँ शिक्षा देल जायत। अपाला: गुरुवर। आश्रमक नियमसँ सेहो अवगत करा देल जाय। अत्रि: वनक प्राणी अवध्य छथि। आहारार्थ फल पूर्व-संध्यामे वन-वृक्षसँ एकत्र कएल जायत। प्रातः आ’ सायं अग्निहोत्र होयत, ताहि हेतु समिधा, कुश, घृत-आज्य-, एवम् दुग्धक व्यवस्था प्रतिदिन मिलि-जुलि कय कएल जायत। हरिणकेँ निर्विघ्न आश्रममे टहलबाक अनुमति अछि। कदम्ब, अशोक, केतकी, मधूक, वकुल आ’ सूदकारक गाछक मध्य आश्रममे यद्यपि कृषिक अनुमति नहि अछि, परञ्च अकृष्य भूमि पर स्वतः आ’ बीयाक द्वारा उत्पन्न अकृष्टपच्य अन्नक प्रयोग भ’ सकैछ। बालक: हम सभ एकहि विद्यापीठक रहबाक कारण सतीर्थ्य छी। गुरुवर। दण्ड आ’ कमण्डलक अतिरिक्त्त किचुउ रखबाक अनुमति अछि?
अत्रि: कटि मेखला आ’ मृगचर्म धारण करू आ’ अपनाकेँ एहि योग्य बनाऊ, जाहिसँ द्वादशवर्षीय यज्ञ सत्रक हेतु अहाँ तैयार भ’ सकी आ’ महायज्ञक समाप्तिक पश्चात् ब्रह्मोदय, विदथ परिषद आ’ उपनिषद ओ’ अरण्य संसदमे गंभीर विषय पर चर्चा क’ सकी। (पटाक्षेप)
दृश्य तीन
(कुटीरमे ऋषि अत्रि कैक गोट वैद्यक संग विचार-विमर्श कए रहल छथि।)
अत्रि: वैद्यगण। बालिका अपालाक शरीरमे त्वक् रोगक लक्षण आबि रहल अछि। शरीर पर श्वेत कुष्ठक लक्षण देखबामे आबि रहल अछि। वैद्य 1: कतबा महिनासँ कतेको औषधिक निर्माण कए बालिकाकेँ खोआओल, आ’ लेपनक हेतु सेहो देल।
अत्रि: अपाला आब विवाहयोग्य भ’ रहल छथि। हुनका हेतु योग्य वर सेहो ताकि रहल छी। वैद्य 2: कृशाश्वक विषयमे सुनल अछि, जे ओ’ सर्वगुणसंपन्न छथि, आ’ वृद्ध माता-पिताक सेवामे लागल छथि। ओ’ अपन अपालाक हेतु सर्वथा उपयुक्त वर होयताह। अत्रि: तखन देरी कथीक। अपने सभ उचित दिन हुनकर माता-पितासँ संपर्क करू।
दृश्य चारि
(आश्रमक सहकार-कुञ्जमे वैवाहिक विधिक अनुष्ठान अछि। वेदी बनाओल गेल अछि, आ’ ओतय ऋत्विज लोकनि जव-तील केर हवन क’ रहल छथि।) अपाला(मोने मोन): माथ पर त्रिपुंडक भव्य-रेखा, आ’ शरीर-सौष्ठवक संग विनयक मूर्त्ति, ईएह कृशाश्व हमर जीवनक संगी छथि। (तखने कृशाश्वक नजरि अपालासँ मिलैत छन्हि, आ’ अपाला नजरि नीँचा कए लैत छथि।। मुदा स्त्रीत्वक मर्यादाकेँ रखैत ललाट ऊँचे बनल रहैत छन्हि।) अत्रि: उपस्थित ऋषि-मण्डली आ’ अग्निकेँ साक्षी मानैत, हम अपाला आ’ कृशाश्वक पाणिग्रहण करबैत छी। (अग्निक प्रदक्षिणा करैत काल कृशाश्वक उत्तरीय वस्त्र कनेक नीँचा खसि पड़ल आ’ अपालाक केशक जूही-माला पृथ्वी पर खसि पड़ल।)
दृश्य पाँच

(अनुवर्तते)

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE   I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...