भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Saturday, July 11, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल
इजोतक दर्द अन्हार सँ पुछियौ
धारक दर्द कछेर सँ पुछियौ


नहि काटल गेल हएब जड़ि सँ
काठक दर्द कमार सँ पुछियौ


समदाउनो हमरा निर्गुणे बुझाएल
कनिञाक दर्द कहार सँ पुछियौ


सभ पुरुषक मोन जे सभ स्त्री हमरे भेटए
अवैध पेटक दर्द व्यभिचार सँ पुछियौ


करबै की हाथ आ गला मिला कए
अनचिन्हारक दर्द चिन्हार सँ पुछियौ

Saturday, June 27, 2009

कविता-जननी-आशीष अनचिन्हार

जननी

एखन
लोकक आपकता बेसी घनहन भएगेलैक अछि
ओहू सँ बेसी
बेगरता
आब अहाँ जे बुझिऔ
जे कहिऔ
अहाँ कहि सकैत छिऐक
बेगरता अविष्कारक जननी थिक
मुदा हम नहि
हमर कहब अछि
अविष्कारक नहि
बेगरता
आपकताक जननी थिक.

Sunday, June 14, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार


एना जे धड़ के नेड़ा बैसल छी
जिनगीक अर्थ के हेड़ा बैसल छी

नहि होइन्ह अन्हार हुनक कोबर मे
तँए अपन करेज जरा बैसल छी

उराहल इनारक पानि सँ कब्ज होइए
गंगोजल के सड़ा बैसल छी

भेटबे करत केओ ने केओ कहिओ
एही उम्मेद पर अपना के जिया बैसल छी

करोट फेरब के परिवर्तन कहल जाइए
जखन की आत्मे के सुता बैसल छी

Friday, May 29, 2009

गजल-आशीष अनचिन्हार

गजल

एना हमरा दिस किएक देखैत छी अहाँ

लाल टरेस आखिँए किएक गुम्हरैत छी अहाँ

कोन खराप जँ अहाकँ करेज पर लिखा गेल हमर नाम

जँ मेटा सकी तँ मेटा सकैत छी अहाँ

पीअर रौद मे नाचि रहल उज्जर बसात अनवरत

उदास सन गाम मे केकरा तकैत छी अहाँ

पानि जेना बचए तेना बचाउ एखन ,हरदम

जल-संकटक समय मे किएक कनैत छी अहाँ

धेआन सँ परिवर्तन देखू चोरबा बदलि लेलक समय

राति भरि जागि कए दिन मे सुतैत छी अहाँ

Sunday, May 03, 2009

पंचसती - पंचउपसती- आशीष अनचिन्हार


इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक।
कविता
पंचसती - पंचउपसती
सती खंड

१
अहिल्या
सूनू गौतम
ओहि भोर जखन अहाँ
चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल
आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए
हमर देहक लेल
ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम
इ इन्द्र छथि
मुदा इ मोने छैक
सूनू गौतम
हम भासि गेल रही
अहाँक नजरि मे
मुदा
इ अर्धसत्य थिकैक
सत्य त इ थिक
आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण
दूनू फराक- फराक गप्प छैक
सूनू गौतम
हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ
अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ
आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि
सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰
२
तारा
इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम
बालिक कनियाँ छलहुँ
आ
बालिक पश्चात अहाकँ
इहो सत्य छैक
जतबे हम
बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक
ततबे अहुँ सँ करैत छी
मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक
जे
अहाकव मृत्युक पश्चात
हम तेसरोक कनियाँ हेबैक
ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक
अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी.
आ
इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग
त्रेतायुग
सतयुग
द्वापर
आ कलियुग
सभ युग मे ॰
३
मंदोदरी
राज्यक संग-संग
विजेताक
रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक
मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम
विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक
हँ
एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक
जे
हमरा
अर्थात मंदोदरी के
ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक
जँ बाँकी होइक
त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ
मुदा
तैओ हम विभीषणक कनियाँ
नहि भए सकैत छियैक
विभीषणक संग
संभोगरत रहितो ॰
४
कुंती
योनि हरदम योनि होइ छैक
चाहे ओ
अक्षत हो वा क्षत
लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो
साधन नहि छैक जे
योनिक की अवस्था छैक
इ त पुरुषक मोन छैक
जे
योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि
स्त्री के गुलाम बना लेलकै
कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग
लोक लाज छल
मुदा आब नहि
संतान हरदम संतान होइत छैक
चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक
आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम
मने कुंती
अर्थात
कर्ण आ पांडवक माए
५द्रौपदी

जखन कोनो जीवक
जिनगी
पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक
त हमर सोहाग
पंचपति सँ किएक नहि ?
उपसती-खंड
१
सीता
राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह।
अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा
देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल,
हम असमय प्राण त्यागलहुँ।
ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰
२
अनूसूया
नाम थिक हमर अनूसूया
मुदा
एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल
आर्यगण शूद्र स्त्री पर
किएक मोहित होइत रहलाह
घरक स्त्री उपेक्षित
रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल
इ बड्ड बादक गप्प थिक जे
आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक
रक्षाक लेल
शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि
मुदाहाय रे हमर कपार
हम
महासती त बनि गेलहुँ
मुद स्त्री नहि ॰
३
दमयंती
जंगल मे नल हमरा छोड़ि
पड़ा गेलाह
इ कोनो बड़का गप्प नहि
जखन ओ नाङट रहथि
हम अपन नूआ फाड़ि
हुनक गुप्तांग झाँपल
मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि
बड़का गप्प त इ छैक जे की
मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि
स्त्री पुरुषक नहि
जँ नहि
त हम कोना केलियैक ?
४
राधा
अच्छर-कटुआ हमरा
कृष्णक घरवाली बुझैए
साक्षर कुमारि
आ हम राधा
एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे
फसँल
एकटा नारि मुदा अबला नहि
कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक
सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै
ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे
बिआहक बादे संभोग कएल जाए
आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए
बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से
विवेचना मिमांसक करताह
मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि
जकरा संग मोन नहि मानैत हो
ओकरा संगक संभोग
बलात्कार सँ कम नहि ॰
५
गांधारी
हमरा एक सए एक पुत्र छल
अर्थात
लोकक नजरि मे
हमर पति हमरा संग
एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह
मुदा हम जनैत छी
ओ संभोग नहि
बलात्कार छल
एहन बलात्कार जाहि मे ने त
स्त्री चिचिआ सकैत अछि
आ ने केकरो कहि सकैत अछि
सुनिगबाक अतिरिक्त
लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल
आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर
मुदा
पट्टी बान्हल हमर आँखि मे
अबैत रहल कतेक रास सपना
इ केओ कोना देखत ?

Wednesday, April 22, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल

गप्प जखन बिआहक चलल हेतैक
गरीबक बेटी बड्ड कानल हेतैक

गोली लागल देह दसो दिशा मे

कुशलक खोंइछ कत्तौ बान्हल हेतैक

डेग-डेग पर निद्रा देवीक प्रसार

केना कहू केओ जागल हेतैक

सड़ि गेलैक एहि पोखरिक पानि

जुग-जुगान्तर सँ नहि उराहल हेतैक

विश्वास करु समान कम नहि देत

बाटे मे बाट भजारल हेतैक

Thursday, April 16, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल

मछगिद्ध जँ माछ छोड़ि दिअए त डर मानबाक चाही
लोक जँ नेता भए जाए त डर मानबाक चाही


रंडी खाली देहे टा बेचैत छैक अभिमान नहि
मनुख अस्वभिमानी हुअए त डर मानबाक चाही


अछि विदित शेर नहि खाएत घास भुखलों उत्तर
वीर अहिंसक बनए त डर मानबाक चाही


माएक रक्षा करैत जे मरथि सएह विजेता
माए बेचि जँ रण जितए त डर मानबाक चाही


सम्मानक रक्षा करब उद्येश्य अछि गजल केर
जँ उद्येश्य बिझाए त डर मानबाक चाही

Monday, April 13, 2009

कविता- हे हमर प्रेयसी- आशीष अनचिन्हार

कविता

हे हमर प्रेयसी

जहिना
फूल झहरि-झहरि खसैत अछि
माटि पर
ओकरा सजबए लेल


मेघ हहरि-हहरि
बुन्नी बनि जाइत छैक
फसिलक लेल


सुगंध उड़ि-उड़ि
बसात मे मीलि जाइत छैक
ओकर सौन्दर्यक लेल


तहिना
हे हमर प्रेयसी, हे हमर सोन
आउ
हम दूनू मीलि जाइ
एक दोसरा मे
नव जिनगी , नव चेतनाक
लेल

Tuesday, April 07, 2009

गजल - आशीष अनचिन्हार



गजल

इहो अहाँक प्रेम छल पछाति जानल हम
खाली मूहँक छेम छल पछाति जानल हम


आगि लागल घर मे चिन्ताक गप्प नहि
कारण अपने टेम छल पछाति जानल हम


सड़ैत देखलिऐक किच्छो के कादो मे
अपने घरक हेम छल पछाति जानल हम


पिबैत रहलहुँ सदिखन विदेशी शीतल पानि
तैओ गरमी कम्म छल पछाति जानल हम


किछु तत्व कए दैत छैक अनचिन्हार सभ के
कथन मे दम्म छल पछाति जानल हम

Sunday, April 05, 2009

कविता- हुनका लेल- आशीष अनचिन्हार

कविता
हुनका लेल
इ
कविता हुनका लेल छन्हि
जे
अपना के किछु ने बुझैत छथिन्ह


इ
कविता हुनका लेल छन्हि
जे
अपना के सभ किछु बुझैत छथिन्ह


इ
कविता हुनका लेल छन्हि
जे
किछु ने बुझैत छथिन्ह




Friday, April 03, 2009

कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार

कुंडलिया
बाप मरल अन्हार मे पूतक नाम पावर-हाउस
नोर-माँड़ पिबए माए कनिञा खाए माउस
कनिञा खाए माउस ताहि पर दही चाहबे करी
बिनु सेब-समतोलाक वज्र खसए हरहरी
कह अनचिन्हार कविराय कनिञा चंडीक अंश
भुखले नहि रखथिन्ह त बढ़तैन्ह कोना वंश

Thursday, April 02, 2009

कविता- भूतःवर्तमानःभविष्य- आशीष अनचिन्हार

कविता
भूतःवर्तमानःभविष्य

अकबर के जोधाबाइक संग
विआह करबाक लेल परामर्श के देने रहैक
भूत बाजि ने रहल


रोमिला थापरक तर्क संपूर्ण रुपे सत्त
नागेश ओकक फूसि
लोक के गोधरे किएक देखाइत छैक
कश्मीरी पंडित आ राजौरी किएक नहि
वर्तमान नहि बाजि रहल


तुष्टीकरण के
कहिआ धरि भारत मे
धर्मनिरपेक्षता मानल जेतैक
भविष्य बाजि ने रहल

Wednesday, April 01, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

इ गजल रचना प्रियंका झा के समर्पित छैन्ह, मुदा गजल मे लिखल रचना शब्द सँ हुनकर कोनो तालमेल नहि। आनंद जी खुशी भेल जे अपने रुपकांत जीक पोथी चाही, मुदा इ मात्र छायाप्रति केर रुप मे भेटि सकैए, जँ केओ चाहए त। ओना हमरा लग हुनक सभ पोथी अछि मुदा अफसोच, हम अपन पोथीघर सँ बहुत दूर छी।तएँ हमरा दिस सँ सहयोगक आशा कम्म। धन्यवाद आशीष अनचिन्हार (09968989527)
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गजल
रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल
जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल


हम मुक्त छी राग-विराग प्रेम-घृणा सँ
रचना कतेक टका लगतै भावना किनबाक लेल


सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए
रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल


पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल

Saturday, March 28, 2009

समीक्षा श्रृंखला---२। रुपकांत ठाकुर पर आशीष अनचिन्हार।

अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि (आलोचना)

शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"।
मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि--
१) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि,
२) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक ,
३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक ।
एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि।
आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह)
2) धूकल केरा (कथा संग्रह)
3) लगाम (नाटक)
4) वचन वैष्णव (नाटक)
5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक।
आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे लेखक भविष्यक संकेत कए गेल छथि।
आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" ।
हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि।
त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ।
"ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार।
भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"।
बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह।
ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि।
भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो लेखकक प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि।

विदेह ई पत्रिकामे http://www.videha.co.in/ पर पूर्वप्रकाशित।

Friday, March 20, 2009

कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार

कोनो समय मे हम कुंडलिया लिखैत रहियैक। गजलक फेर मे ओकरा बिसरि गेलियैक। आब मात्रा सही नहि बसि रहल छैक।मुदा तैओ हम दोहरा रहल छी। आशा अछि जे सुधी पाठक मात्राक गलती के बिसरि रसास्वादन करताह। हमर अन्य गजल के लेल देखू---anchinharakharkolkata.blogspot.com
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कुंडलिया

डेग-डेग पर छाल्ही भेटै डेग-डेग पर गूँह
लूझए बला लुझबे करतै जकर जेहन मूँह

जकर जेहन मूँह धोधि पोन बेसी अछि चतरल
प्राण मुदा अछि टूटल फूटल काटल कतरल

कह अनचिन्हार कविराय एहने छैक संसारक रीति
सगरो दुनिया बजि रहल स्वार्थक गीति

Tuesday, March 10, 2009

सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक-गजल

गजल

सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक
बाजए जँ केओ प्यार सँ त बुझिऔ होली छैक

बेसी टोइया-टापर देब नीक नहि भाइ सदिखन अनवरत
निकलि जाइ जँ अन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक

केहन- केहन गर्मी मगज मे रहै छैक बंधु
मनुख बचि जाए जँ गुमार सँ त बुझिऔ होली छैक

की दुख होइत छैक चतुर्थीक राति मे नहि बुझि सकबै
हँसी जँ आबए कहार सँ त बुझिऔ होली छैक

जहाँ कनही गाएक भिन्न बथान तहाँ सुन्न- मसान
होइ कोनो काज सभहँक विचार सँ त बुझिऔ होली छैक

Wednesday, March 04, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल

यथा एन्नी तथा ओन्नी एन्नी-ओन्नी तथैव च
यथा माए तथा बाप मुन्ना-मुन्नी तथैव च

बलू हमर करेज जरैए अहाँ गीत लिखै छी
यथा भँइ तथा अच्छर पन्ना-पन्नी तथैव च

देखहक हो भाइ बोंगहक पोता कोना करै हइ
यथा मुल्ला तथा पंडित सुन्ना-सुन्नी तथैव च

देवतो जड़ि पकड़ै हइ मुहेँ देखि कए बचले रहू
यथा मौगी तथा भूत ओझा-गुन्नी तथैव च

बान्हि क भँइ दूरा पर मगबै ढ़ौआ पर ढ़ौआ
यथा समधी तथा समधीनी बन्ना-बन्नी तथैव च

की करबहक हो भगवान एमरी सभ के
यथा मरनाइ तथा जिनाइ रौदी-बुन्नी तथैव च

बचले रहिअह अनचिन्हार एहि गाम मे सदिखन
यथा साँप तथा मनुख जहर चिन्नी तथैव च

Sunday, December 14, 2008

किछु गद्य कविता-आशीष अनचिन्हार

१) सीमा

अर्थ मास्टरमाइन्ड भए सकैत छैक । मास्टरपीस भए सकैत छैक । मास्टर नहि ।

२ ) काटब

पेट भरबाक लेल घेंट कटैत छी आ घेंट ऊँच रखबाक लेल पेट

३ ) दोसराति

जखन भए जाइत छी हम अपने अशक्त ।
तखने जरूरति परैत अछि दोसरातिक ।

४ )

प्रगति १.

शंख । महाशंख । डपोरशंख । हराशंख ।

प्रगति २.

कनिया देशी । पिया परदेशी । बच्चा विदेशी ।

५) मूलमंत्र

अपन कनियांक हाथ पकड़ू आ दोसरक कनियांक करेज । चिन्हारक गरिदन पकरू आ अनचिन्हारक पैर । कहियो कोनो काजमे असफलता नहि भेटत ।

६ ) मोश्किल काज

कोनो कनैत जीव के चुप्प करब ओतबे मोश्किल काज छैक , जतेक की अपन आँखिक नोर के रोकब ।

७ ) सुआद

सोहारी आ गप्प दूनू नून मरचाई लगेला सं सुअदगर भए जाइत छैक ।

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE   I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...