भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).

ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

 

(c) २००-२०२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.htmlhttp://www.geocities.com/ggajendra  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Showing posts with label Maithili Story. Show all posts
Showing posts with label Maithili Story. Show all posts

Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )५कथा बैसाखी-गजेन्द्र ठाकुर-

५कथा
गजेन्द्र ठाकुर-
बैसाखी
“गरमी तातिलक छुट्टीक बाद कॉलेज कहिया खुजतैक”। एकटा विद्यार्थी कॉलेजक एकटा कर्मचारीकेँ पुछने छलाह।
“हमरा कपार पर लिखल छैक आकि नोटिस बोर्ड पर जाऽ कए देखबैक”। ओल सनक बोल बाजल ओऽ कर्मचारी जकर नाम गुणदेव छल।
“ओहो गुणदेबा भयङ्करे छल। एडमिशन क्लर्क छल, ताहि द्वारे चलतीमे छल”।
“नञि यौ। चपरासी छल। एडमिशन क्लर्क तँ मुँहदुब्बर छल आऽ ताहि द्वारे सभ ओकरे एडमिशन क्लर्क बुझैत छलाह”।
रतीश आऽ फूलक बीचमे ई वार्त्तालाप चलि रहल छल। बहुत दिनका बाद दुनू गोटेकेँ एक दोसरासँ भेँट भेल छलन्हि। स्कूल आऽ कॉलेजमे संगे-संग दुनू गोटे पढ़ने छलाह। मुदा तकरा बाद सालक साल बीति गेल छल, आऽ आइ चन्द्रधारी मिथिला कॉलेजमे अपन-अपन बेटाकेँ अभियान्त्रिकीक प्रवेश परीक्षा दिअएबाक लेल दुनू गोटे आयल छलाह आकि अनायासहि एक-दोसरासँ भेँट भए गेलन्हि। दुनू गोटेक बालक परीक्षा हॉलमे रहथि से दुनू गोटेक लग गप करबाक लेल तीन घण्टा समय छलन्हि।

करची कलमसँ लिखना लिखैत-लिखैत रतीश आऽ फूल दुनू गोटेक अक्षर सुन्दर भए गेल छलन्हि। रोशनाइक गोटीकेँ गरम पानिमे दए दवातमे दए ओहिमे करची कलम डुबा कए लिखना लिखैत छलाह दुनू गोटा। अपन-अपन गामसँ केजरीबाल हाइ स्कूल पहुँचैत छ्लाह दुनू गोटे। विज्ञानक प्रायोगिक कक्षाक कॉपी रतीशक सेहो साफ आऽ स्पष्ट होइत छलन्हि, मुदा फूलक अक्षर फूल सन सुन्दर होइत छलन्हि। मैट्रिकमे रतीशकेँ प्रथम श्रेणी आयल छलन्हि मुदा पूलकेँ द्वितीय श्रेणी अएलन्हि। आ.एस.सी. केर बाद रतीशतँ इंजीनियरिङमे नाम लिखा लेलन्हि मुदा रतीश पोस्टऑफिसमे किरानीक नोकरी पकड़ि लेने छलाह। आऽ तकर बाद १८ साल धरि दुनू गोटेकेँ एक दोसरासँ भेँट नहि भेल छलन्हि। नोकरी लगलाक बाद फूलक विवाह भए गेलन्हि।
“विवाहक बाद की भेल। हम तँ विवाहोमे नहि जाऽ सकल छलहुँ। पहिने ओतेक फोन-फानक सेहो प्रचलन नहि छल। ताहि द्वारे सम्पर्क सेहो नहि रहल”।
“नोकरीक बाद छोट भाय आऽ कनियाँकेँ लए नोकरी पर कोहिमा चल गेलहुँ। छोट भाए एकटा हाथसँ लुल्ह रहथि। दोसर हाथे प्रयाससँ लिखैत छलाह। किछु दिनुका बाद विकलांगक लेल आरक्षणक अंतर्गत हुनका सेहो किरानीमे केन्द्र सरकारक अंतर्गत नोकरी लागि गेलन्हि, आऽ ओऽ पटना चलि गेलाह। हमर माएकेँ हुनकर विवाहक बड़ सौख छलन्हि। मुदा घटको आबए तखन ने। से कतेक दिनुका बाद जखन माए हमरा ओहिठाम आएल छलीह, तँ एक गोट मैथिल परिवार हमरा ओहिठाम घुमए लेल आयल रहथि। हमर मायक वयसक एक गोट महिला छलीह जे अपन पुतोहुक संग आयल छलीह। गपे-शपमे हुनका पता चलि गेलन्हि, जे एहि घरमे एकटा विकलांग सरकारी नोकरी बला विवाहयोग्य बालक छैक। से ओऽ हठात् अपन पुत्रीक विवाहक प्रस्ताव सोझाँ आनि रखलन्हि।
हमर माय बजलीह, “बहिनदाइ। अछि तँ हमर बेटा सरकारी नोकरी करैत मुदा ई पहिनहिये कहि देनाइ ठीक बुझैत छी जे बादमे अहाँ नहि कही। शील-स्वभाव सभमे कोनो कमी नहि छैक, मुदा नहि जानि किएक भगवान एक हाथसँ लुल्ह कए देलखिन्ह। गाममे लोक सभ लुल्हा-लुल्हा कहि कए सोर करैत छैक। शुरूमे तँ हमरा बरदास्त नहि होइत छल, एहि गप पर झगड़ा भए जाइत छल। मुदा बादमे हमहू ई सोचि धैर्य धए लेलहुँ जे जखन भगवाने नजरि घुमा लेलन्हि, तँ ककरा की कहबैक”।
“से तँ हमरा गप-शपमे बुझबामे आबि गेल छल। आऽ ताहि द्वारे ई कथा करबाक साहसो भेल। अहाँ सँ की कहू। हमर बेटी पेदार अछि। पैर छोट-पैघ छैक। से सौँसे तेहल्लाकेँ बुझल छैक। इलाकामे ककरो लग कथाक लेल जायब सेहो हिम्मत नहि होइत अछि। भगवान छथिन्ह, नञि नैहरे आऽ नहिये सासुरमे क्यो पेदार भेल छल। भगवान भल करथिन्ह, देखबैक हमर बुचियाक बच्चा सर्वगुण सम्पन्न होयत”।
ई गप सुनिते हमर माय तँ सन्न दए रहि गेलीह। कनेक काल धरि गुम-सुम रहलाक बाद कहलन्हि जे सोचि कए खबरि पठाएब। घरमे किछु दिन धरि एहि गप पर चरचा भेल आऽ आगाँ जाऽ कए मायक विचार भेलन्हि, जे विवाह भए जएबाक चाही। विवाहक उपरान्त कताक बेर बच्चा खराप भए जाइत छल। तीन चारि बेर एहिना भेल। हमर भाए तँ मोनकेँ बुझा लेलन्हि मुदा, भाबहु विक्षिप्त जेकाँ भए गेलीह। राति-दिन घरमे उठा-पटकक अबाज पड़ोसी सभ सुनैत छल। मुदा आस्ते-आस्ते ओहो मोनकेँ बहटारि लेलन्हि। मुदा दस बरखक बाद भगवानक कृपा जे एकटा बच्चा भेलन्हि, सभ अंग दुरुस्त। मुदा एक दिन तेल-कूर लगा कए बाहर हबामे देलखिन्ह भाबहु। भाए हमर कहबो कएलन्हि, जे बच्चाकेँ भीतर कए लिअ, मुदा होनी जे कहैत छैक। साँझसँ बच्चाकेँ हुकहुक्की लागि गेलैक। अगिला दिन भोर धरि ओऽ एहि जगकेँ छोड़ि चलि गेल। हमरो पदस्थापन ताधरि पटने भए गेल छल, आऽ सभ गोटे संगे रहैत छलहुँ। मुदा भगवानोक लीला। जखन सभ आस छोड़ि देने छल, तखन फेर एकटा बालक भेलन्हि छोट भाँयकेँ। एहि बेर हुनकर सासु सेहो बच्चाक टहल-टिकोर करबाक लेल आबि गेलखिन्ह। आब तँ बेश टल्हगर भए गेल अछि, हृष्ट-पुष्ट कोनो पैअ नहि”। फूल बजिते रहलाह।
रतीश कहलन्हि-“अहाँ परेशानीयेमे रहलहुँ एतेक दिन धरि। मुदा अहाँकेँ कैकटा बच्चा अछि, की करए जाइत छथि से नहि कहलहुँ”।
“एकेटा अछि, से परीक्षा हॉलमे छथि, कनेक कालमे देखिए लेबन्हि। मुदा अहाँ अपन बच्चाकेँ परीक्षा दिआबए किएक आयल छी। आइ.एस.सी. पास कएने छथि, बेश चेतनगर भए गेल होएताह”। फूल भाए कहलन्हि।
“मुदा अहूँ तँ आएल छी...”।
रतीश बजैत चुप भए गेलाह। कारण एक गोट बालक वैशाखी पर चलि फूलक लग आबि ठाढ़ भए गेल छल। परीक्षा खतम भए गेल छल, आऽ रतीशकेँ ई बुझबामे बाङठ नहि रहलन्हि, जे ई बालक फूलक छियन्हि। कालक विचित्र गति, भाए-भाबहु विकलांग छन्हि, मुदा तत्ता-सिहर देखेलाक बादो भगवान हृष्ट-पुष्ट नेना देलखिन्ह, आऽ फूल सन लिखनहार फूल भाइक लेल विधनाक कलम नहि चललन्हि। मुदा फूल भाए शांत-धैर्य धए बेटासँ परीक्षाक विषयमे पूछि रहल छलाह।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )/ ५कथा/1. गंगेश गुंजन -गोबरक मूल्य/2. गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति

५कथा
1. गंगेश गुंजन -गोबरक मूल्य

2. गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति
1. गंगेश गुंजन श्री गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
गोबरक मूल्य
भागलपुर मे एकटा उनटा पुल कहबैत छैक। उनटा पुलसँ दक्षिण मुँह जे सड़क जाइत छैक, तकरा बौंसीे रोड कहल जाइत छैक। बौंसी रोड पर कएक टा बस्ती-मोहल्ला लगे-लग पड़ैत छैक। बहुत रास दोकान आ लोकक, ट्रक-बस, टमटम, रिक्शा सभक खूब घन आवाजाही। सुखायल मौसम मे भरि ठेहुन ध्ूरा आ भदवारि मे भरि ठेहुन पानि-कादो। शहरी नाला सभक कारी गंदगीसँ सड़क भरल-पूरल। कैक समय तं पयरे आयब-जायब कठिन ।
मुदा सड़क छैक पीच। मोजाहिदपुर मिरजान हाट चौक, हबीबपुर आ हुसैनाबाद तथा अलीगंज। कैक जाति आ पेशाक लोक । काठ गोदामसँ ल क तसरक उद्योगी ध्रि आ जानवरक गंध् तोड़ैत हड्डीक टालसँ ल क हरियर टटका तरकारी सभक हाट ध्रि । तहिना टिक टिक घोड़ासँ ल क बड़दोसँ बत्तर ठेलासँ छातीतोड़ श्रम करैत घामे-पसेने तर माल उघैत मजूर सेहो। बच्चा, सियान सभक भीड़ भेटत । कतहु दोकानमे लागल पफलकल कोबीक छत्ता जकाँ कतहु अलकतराक उनटल पीपा जकां। ई दृश्य थिक सड़कक दुनू कातक उनटा पुलसँ ता अलीगंज।
अलीगंजसँ किछुए आगाँसँ सड़क खूब पकठोस छैक। चिक्कन कारी। तेहन जे कैक टा परिवार ओहिपर मकै-गहूम पर्यन्त पथार द क सुखबैत भेटत।
ओही इलाकाक एकटा घटना थिक। आने बीच सड़क परक अलीगंज बस्ती जत खतम होइत छैक ताही ठाम सड़कक कातमे एकटा आर कल छैक जे हरदम अबन्ड छौँड़ा जकाँ छुरछुरबैत रहैत छैक। यद्यपि भागलपुर मे पीबाक पानिक कष्ट बड़ सामान्य बात अछि, मुदा एत पानिक उदारता देखिक से समस्या अखबारी पफूसि बनि जाइत छैक। खैर, ताहू दिन खूब तेजीसँ पानि छुरछुरा रहल छलैक। क्यो भरनिहार नहि रहैक। खूब रौद रहैक। चानि खापड़ि जकाँ तबैत। तेहन सन जे चानि पर यदि बेलिक रोटी ध् देल जाइक तँ पाकि जयतैक।
एहना मौसम मे कलसँ सटले दस गोटे बीस गोटे अपन चानि तबबैत यदि घोलिमालि करैत ठाढ़ हो तँ ध्यान जायब स्वाभाविके। हमहूँ अपनाके ँ रौद, लू आ उमसमे उलबैत पकबैत ओहि द क ल जाइत रही। एकटा उपयुक्त कारण बुझायल सुस्तयबाक। भने किछु लोक
घोँघाउज क रहल छलैक। लगमे कलसँ ओतेक प्रवाह सँ जल झहरि रहल छलैक से एकटा मनोवैज्ञानिक शीतलता पसारि रहल छलैक मने।
जखन ओहि गोल लग पहुँचलहुँ तँ ईहो देखबा योग्य भेल जे ओहि घोँघाउजि मण्डलीसँ आगाँ एक टा मिनी बस ठाढ़ छैक। सन्देह नहि रहल जे कोनो दुर्घटना सँ पफराक किछु बात नहि छैक। एहन दुर्घटना मे सड़कपर ककरो मृत्यु सामान्य बात थिक। डेग अनेरे किछु झटकि गेल। लग पहुँचलहुँ आ ओहि घरेलू घोंघाउजिक कन्हापरसँ हुलकि क देखलहुँ तँ बीचमे दू पथिया गोबर हेरायल बीच सड़कपर। एक टा छौंँड़ा हुकुर-हुकुर करैत...। घोंघाउजि खूब जोरसँ चलि रहल छल। ओही लोकक गोलमे एक कात करीब १०-१२ बर्षक दूठा छौंड़ी आदंकेँ चुप्प ठाढ़ि आ कनैत... खरफकी पहिरने खूजल देह, छिट्टा सन केश...। ओहिमे सँ एक टा छौंड़ीक जमड़ी लागल अगंिह मे पफाटल पैंट, ताहिपर टटका गोबर लेभरल। दुनू छौँड़ीक गालपर हाथमे, सौँसे देहपर गोबर लागल आ दुर्घटनाग्रस्त छौँड़ाक छातीपर गोबर लागल । दू टा नान्हि टा हाथक छाप यद्यपि ओहि कड़ा रौदमे सुखा गेल रहैक, मुदा स्पष्ट रहैक।
आदंकमे पड़लि दुनू छौँड़ी, अंदाज करैत छी, गोबरबिछनी छैक। बाट-घाट जाइत अबैत गाय-महींसक गोबर जमा अछि, भरि दिन तकर गोइठा थोपैत अछि, माय वा परिवारक क्यो लोक तकरा सुखबैत अछि आ बड़का पथियामे सजाक शहर जाक बेचैत अछि । जीविकाक एक साध्न यैह गोइठाक आमदनी। गोइठा जाहिसँ बनय से गोबर आबय कतसँ एहिना अनिश्चित। कहियो एको पथिया कहियो किछु नें। तेेँ एहि सड़कपर गोइठा बिछनी छौँड़ी सभक आपस मे होइत झोंटा-झोंटीक दृश्य बड़ आम घटना रहैत छैक। आ ओकरा माय-बाप केँ गारि-सराप देलक, ओ ओकरा माय बहिनके ँ घोड़ासँ वियाह करौलक... एकहि दिन पहिने दूटा छौँड़ी बीच सड़कपर तेना पटकम-पटकी करैत रहय आ एक दोसराक झोंटाके ँ तेना नोचि रहल छल जे दया आ क्रोध् दुनू आबय मनमे, मुदा समाधन की। गोबर जकर जीविका छैक ताहि परक आपफत तँ ठीके नै सहल हेतैक ओकरा ताहूमे एक दिन हम एकटा छौँड़ी के ँ पुछने रहिऐक-÷तोरा सिनी केहने एना झगड़ा करै छे ँ, जरी टा गोबर के वास्ते?'
- ÷जरी टा छलै? एतना छलै, हम्मे जमा करी क रखलिऐ आरू ई रध्यिा मोटकी-ध्ुम्मी ने अपने छिट्टामे ध्री लेलक। आय हमरा केतना मारतै माय ? माय तँ इहे ने कहतै जे हम्मे गोबर नहि बीछय छलियै, कहीं दिन भर खेली रहल छलियै? की खयतै लोगें?'
हमर प्रश्न हमरे खूब भारी चमेटा जकाँ बुझायल, हम चोट्टहि ससरि गेल रही।
मुदा ओहि दिनुका दृश्य बड़ भार्मिक छलैक। आदंके ँ चुपचाप दहो-बहो कनैत दुनू छौँड़ी एक बेर चारू कातक लोकके ँ एक बेर शोणित बहैत बच्चाके ँ देखैत ठाढ़ि रहैक।
- ÷की होलै भाइ जी?' हम एकटा सज्जनसँ पुछलियनि।
- ÷अरे कलियुग छौं भाई जी। बताब जरी टा गोबर के वास्ते एकरा सिनी मे आपसे मे झगड़ा होलै आरू हौ छौ ँड़ी एकर छोट भाइके ँ ध्केली देलकै मिनी बसके आगूमे। देखै नै छहौ जे घड़ी मे दम टुटल छै छौँड़ाके आहा...
- ÷जरी टा गोबर छलै उफ? माय किरिया खा के कही तँ लछमिनियाके ँ जे हमर एक चोत गोबड़ छलय कि नै ?' अचानक जेना खूब साहस करैत आदंकित एक टा छौंड़ी कनिते बाजलि-
हमरा अकस्मात लोकसभपर खासक ओही भाइ साहेबपर क्रोध् उठल।
- ÷विचित्रा बात तोरा की नहि देखाइ रहल छ जे ई बुतरू मरि रहल दै आ अस्पताल पहुँचाबै के पिफकिर नै करीक दबकि बनल खाड़ छ ध्क्किार।'
सभ जेना हमरेपर गुम्हर लागल।
- ÷आब की ई बच पाड़तै? की पफयदा लय गेलासँ।'
- ÷तैयो लै जायमे की हर्जा? भाइ-साहेब ठीके तँ कही रहल छै हौ।' एक गोटे अपन विचार देलकैक।
मुदा तकर कोनो प्रयोजन नहि भेलैक। घोल-पफचक्का मचिते रहलैक, ओ दुनू गोबरबिछनी छौंड़ी आदंके ठाढ़िए रहलि लोकसँ घेरायलि। बीच बाटपर ओहि घायल नेनाक प्राण छुटि गेलैक। एक चुरफक पानियो ने देलकै क्यो।
एहि संदर्भमे एकटा लेखकक टिप्पणी प्रस्ताव करैत छी जे ई दृश्य छल एकटा नहि, कैकटा गोबर पर जिनहार परिवारक बच्चाक संघर्षक। एक बहिन ककरो एक चोत गोबर चोरा लेलकै तँ तामसमे ओ चौरौनिहारक छोट भाइके ँ सड़कपर ध्क्का द देलकै आ मिनीबस ओकरा पीचि देलकै। पीचपर शोणित आ गोबर बराबरि दामक भेल जे रौदमे सुखाइत रहलैक।
बौंसी रोडक ई दृश्य जे देखने होयता सैह बुझने होयता - एतबे कहब।
हमरा तँ ईहो नहि बुझल अछि जे मुइल छौंड़ाक मायो-बाप छलैक कि नहि? छलैको तँ ओकरा कखन खबरि भेल होयतैक जे ओकर बेटा मिनीबसमे पिचा क मरि गेलैक। वा मिनीबसक ड्राइवर कोन थानामे जाक कहने होयतैक जे हम एकटा निरीह छौंड़ाके ँ खून क क आबि रहल छी?
हमरा तँ नहि बूझल अछि ओहि दुनू छौंड़ियो क, मुदा ओहि घटनाक बादसँ मनमे एहि बातक अंदेशा अवश्य होइत रहैत अछि जे कतहु दुनू छौंड़ी पफेर ने एहि बौंसी रोडपर गोबर बीछैत भेटि जाय... कतहु पफेर ने भेटि जाय।.....
आ, सत्य पूछी तँ आब हमरा सभटा गोबर बिछनी एक्के रंग लगैत अछि।
2.. गजेन्द्र ठाकुर-
पहरराति

“सुनू। प्रयोगशालाक स्विच ऑफ कए दियौक”। चारि डाइमेन्शनक वातावरणमे अपन सभटा द्वि आऽ त्रि डाइमेन्शनक वस्तुक प्रयोग करबाक लेल धौम्य प्रयोगशालामे प्रयोग शुरू करए बला छथि। हुनकर संगी-साथी सभ उत्सुकतासँ सभटा देखि रहल छथि।
“दू डाइमेन्शनमे जीबए बला जीव तीन डाइमेन्शनमे जीबए बला मनुक्खक सभ कार्यकेँ देखि तऽ नहि सकैत छथि, मुदा ओकर सभटा परिणामक अनुभव करैत छथि। अपन एकटा जीवन-शैलीक ओऽ निर्माण कएने छथि। ओहि परिणामसँ लड़बाक व्यवस्था कएने छथि। तहिना हमरा लोकनि सेहो चारि डाइमेन्शनमे रहए बला कोनो सम्भावित जीवक, वा ई कहू जे तीनसँ बेशी डाइमेन्शनमे जिनहार जीवक हस्तक्षेपकेँ चिन्हबाक प्रयास करब”। धौम्य कहैत रहलाह।
एक आऽ दू डाइमेन्शनमे रहनहारक दू गोट प्रयोगशालाक सफलताक बाद धौम्यक ई तेसर प्रयोग छल।
“एक विमीय जीव जेना एकटा बिन्दु। बच्चामे ओऽ पढ़ैत छलाह जे रेखा दू टा बिन्दुकेँ जोड़ैत छैक। नञि तऽ बिन्दुमे कोनो चौड़ाइ देखना जाइत अछि आऽ नहिये रेखामे। रेखा नमगर रहैत अछि, मुदा बिन्दुमे तँ चौड़ाइक संग लम्बाइ सेहो नहि रहैत छैक। एक विमीय विश्वमे मात्र अगाँ आऽ पाछाँ रहैत अछि। नञि अछि वान दहिनक बोध नहिये ऊपर नीचाँक। मात्र सरल रेखा, वक्रता कनियो नहि। आब ई नहि बुझि लिअ जे अहाँ जतय बैसल छी, ओतए एकटा रेखा विचरण करए लागत। वरण ई बुझू जे ओऽ रेखा मात्र अछि, नहि कोनो आन बहिः।
“द्वि बीमीय ब्रह्माण्ड भेल जतए आगू पाछूक विहाय वाम दहिन सेहो अछि, मुदा ऊपर आऽ नीछाँ एतए नहि अछि। ई बुझू जे अहाँक सोझाँ राखल सितलपाटीक सदृश ई होयत, जाहिमे चौड़ाइ विद्यमान नहि अछि।“
“ मुदा श्रीमान् ई चलैत अछि कोना। गप कोना करत एक दोसरकेँ संदेश कोना देत”।
“आऊ। पहिने एक विमीय ब्रह्माण्डक अवलोकन करैत छी”।
धौम्य एक विमीय प्रयोगशालाक लग जाइत छथि। ओतए बिन्दु आऽ बिन्दुक सम्मिलन स्वरूप बनल रेखा सभ देखबामे अबैत अछि। ई जीब्व सभ अछि। एक विमीय ब्रह्माण्डक जीव, जे एहि तथ्यसँ अनिभिज्ञ अछि जे तीन विमीय कोनो जीव ओकरा सभकेँ देखि रहल छैक।
“देखू। ई सभ जीव एक दोसराकेँ पार नहि कए सकैत अछि। आगू बढ़त तँ तवत धरि जाऽ धरि कोनो बिन्दु वा रेखासँ टक्कर नहि भए जएतैक। आऽ पाछाँ हटत तावत धरि यावत फेर कोनो जीवसँ भेँट नहि होयतैक। एक दोसराकेँ संदेश सेहो मात्र एकहि पँक्त्तिमे दए सकत, कारण पंक्त्तिक बाहर किछु नहि छैक। ओकर ब्रह्माण्ड एकहि पंक्त्तिमे समाप्त भए जाइत अछि।
“आब चलू द्वि बीमीय प्रयोगशालामे”।
सभ क्यो पाछाँ-पाछाँ जाइत छथि।
“एतय किछु रमण चमन अछि। पहिल प्रयोगशाला तँ दू तहसँ जाँतल छल, दुनू दिशिसँ आऽ ऊपरसँ सेहो। मात्र लम्बाइ अनन्त धरि जाइत छल। मुदा एतय ऊपर आऽ नीचाँक सतह जाँतल अछि। ई आगाँ पाछाँ आऽ वाम दहिन दुनू दिशि अनन्त ढरि जा रहल अछि। ताहि हेतु हम दुनू प्रयोशालाकेँ पृथ्वीक ऊपर स्वतंत्र नभमे बनओने छी। एतुक्का जीवकेँ देखू। सीतलपाटी पर किछुओ बना दियौक। जेना छोट बच्चा वा आधुनिक चित्रकार बनबैत छथि। एतय ओऽ सभ प्रकार भेटि जायत। मुदा ऊँचाइक ज्ञान एतए नहि अछि। एक दोसरकेँ एक बेरमे मात्र रेखाक रूपमे देखैत अछि ई सभ। दोसर कोणसँ दोसर रेखा आऽ तखन स्वरूपक ज्ञान करैत जाइत अछि। लम्बाइ आऽ चौड़ाइ सभ कोणसँ बदलत। मुदा वृत्ताकार जीव सेहो होइत अछि। जेना देखू ओऽ जीव वाम कातमे। एक दोसराकेँ संदेश ओकरा लग जाऽ कए देल जाइत अछि। पैघ समूहमे संदेश प्रसारित होयबामे ढ़ेर समय लागि जाइत अछि”।
“श्रीमान, की ई संभव अछि, जेना हमरा सभक सोझाँ रहलो उत्तर ओऽ सभ हमरा लोकनिक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ अछि तहिना हमरा सभ सेहो कोनो चारि आऽ बेशी विमीय जीवक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ होञि”।
“हँ तकरे चर्चा आऽ प्रयोग करबाक हेतु हमरा सभ एतए एकत्र भेल छी। अहाँने सँ चारि गोटे हमरा संग एहि नव कार्यक हेतु आबि सकैत छी। ई योजना कनेक कठिनाह छैक। कतेक साल धरि ई योजना चलत आऽ परिणाम कहिया जाऽ कए भेटत, तकर कोनो सीमा निर्धारण नहि अछि”।
पाँच टा विद्यार्थी श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा एहि कार्यक हेतु सहर्ष तैयार भेलाह। धौम्य पाँचू गोटेकेँ अपन योजनामे सम्मिलित कए लेलन्हि।
“चारि बीमीय विश्वमे तीन बीमीय विश्वसँ किछु अन्तर अछि। तीन बीमीय विश्व भेल तीन टा लम्बाइ, चौड़ाइ आऽ गहराइ मुदा एहिमे समयक एकटा बीम सेहो सम्मिलित अछि। तँ चारि बीमीय विश्वमे आकि पाँच बीमीय विश्वमे समयक एकसँ बेशी बीमक सम्भावना पर सेहो विचार कएल जायत। मुदा पहिने चारि बीमीय विश्व पर हमरा सभ शोध आगाँ बढ़ायब एहिमे मूलतः समयक एकटा बीम सेहो रहत आऽ ताहिसँ बीमक संख्या पाँच भए जायत। समयकेँ मिलाकए चारि बीमक विश्वमे हमरा सभ जीबि रहल छी। जेना वर्ण अन्धतासँ ग्रसित लोककेँ लाल आऽ हरियरक अन्तर नहि बुझि पड़ैत छैक, ओहिना हमरा सभ एकटा बेशी बीमक विश्वक कल्पना कए सकैत छी, अप्रत्यक्ष अनुभव सेहो कए सकैत छी”। धौम्य बजलाह।
सभा समाप्त भेल आऽ सभ क्यो अपन-अपन प्रकोष्ठमे चलि गेलाह। सैद्धांतिक शोध आऽ तकर बाद ओकर प्रायोगिक प्रयोगमे सभ गोटे लागि गेलाह। त्रिभुज धरातल पर खेंचि कए एक सय अस्सी अंशक कोण जोड़ि कए बनएबाक अतिरिक्त्त पृथ्वीकार आकृतिमे खेंचल गेल त्रिभुज जाहि मे प्रत्येक रेखा एक दोसरासँ नब्बे अंशक कोण पर रहैत अछि, मुदा रेखा सोझ नहि टेढ़ रहैत अछि। ओहिना समय आऽ स्थानकेँ तेढ भेला पर एहन संभव भए सकैत अछि जे हमरा सभ प्रकाशक गतिसँ ओहि मार्गे जाइ आऽ पुनः घुरि आबी। प्रकाश सूर्यक लगसँ जाइत अछि तँ ओकर रस्ता कनेक बदलि जाइत छैक।
श्वेतकेतु आऽ रैक्व एकटा सिद्धान्त देलन्हि- जेना कठफोरबा काठमे वृक्षमे खोह बनबैत अछि, तहिना एकटा समय आऽ स्थानकेँ जोड़एबला खोहक निर्माण शुरू भए गेल। अपाला एकटा ब्रह्माण्डक डोरीक निर्माण कएलन्हि, जकरा बान्हि कए प्रकाश वा ओहूसँ बेशी गतिसँ उड़बाक सम्भावना छल। सत्यकाम एकटा एहन सिद्धान्तक सम्भावना पर कार्य शुरू कएने छलाह, जकर माध्यमसँ तीन टा स्थानिक आऽ एकटा समयक बीमक अतिरिक्त्त कताक आर बीम छल जे बड़ लघु छल, टेढ छल आऽ एहि तरहेँ वर्त्तमान विश्व लगभग दस बीमीय छल। घोषा स्थान समयक माध्यमसँ भूतकालमे पहुँचबासँ पूर्व देशक विधिमे ई परिवर्त्तन करबाक हेतु कहलन्हि जाहिसँ कोनो वैज्ञानिक भूतकालमे पहुँचि कए अपन वा अपन शत्रुकेँ जन्मसँ पूर्व नहि मारि दए। घोषा विश्वक निर्माणमे भगवानक योगदानक चरचा करैत रहैत छलीह। जौँ विश्वक निर्माण भगवान कएलन्हि, एकटा विस्फोट द्वारा, आऽ एकरा सापेक्षता आऽ अनिश्चितताक सिद्धांतक अन्तर्गत छोड़ि देलन्हि बढ़बाक लेल, तँ फेर समयक चाभी तँ हुनके हाथमे छन्हि। जखन ओऽ चाहताह फेरसँ सभटा शुरू भए जायत। जौँ से नहि अछि, तखन समय स्थानक कोनो सीमा, कोनो तट नहि अछि, तखन तँ ई ब्रह्माण्ड अपने सभ किछु अछि, विश्वदेव, तखन भगवानक कोन स्थान? घोषा सोचैत रहलीह।
आब धौम्यक लेल समय आबि गेल छल। अपन पाँचू विद्यार्थीक सभ सिद्धांतकेँ ओऽ प्रयोगमे बदलि देलन्हि। आऽ आब समय आबि गेल। पहरराति।
पुष्पक विमान तैयार भेल स्थान-समयक खोहसँ चलबाक लेल। ब्रह्माण्डीय डोरी बान्हि देल गेल पुष्पक पर। धौम्य सभसँ विदा लेलन्हि। प्रकाशक गतिसँ चलल विमान आऽ खोहमे स्थान आऽ समयकेँ टेढ़ करैत आगाँ बढ़ि गेल। ब्रह्माण्दक केन्द्रमे पहुँचि गेलाह धौम्य। पहरराति बीतल छल। आगाँ कारी गह्वर सभ एहि समय आऽ स्थानकेँ टेढ़ कएल खोहमे चलए बला पुष्पकक सोझाँ अपन सभटा भेद राखि देलक। भोरुका पहरक पहिने धौम्यक विमान पुनः पृथ्वी पर आबि गेल। मुदा एतए आबि हुनका विश्व किछु बदलल सन लगलन्हि। श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा क्यो नहि छलाह ओतए। विमानपट्टी सेहो बदलल सन। विश्वमे समय-स्थानक पट्टी सभ भरल पड़ल छल।
“यौ। समय बताऊ कतेक भेल अछि”।
“कोन समय। सोझ बला वा स्थान-समय विस्थापन बला। सोझ बला समय अछि, सन् ३१०० मास...”।
ओऽ बजिते रहि गेल छल मुदा धौम्य सोचि रहल छलाह जे स्थान-समय विस्थापनक पहररातिमे हजार साल व्यतीत भए गेल। ककरा बतओताह ओऽ अपन ताकल रहस्य। आकि एतुक्का लोक ओऽ रहस्य ताकि कए निश्चिन्त तँ नहि भए गेल अछि?
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ ५. कथा११.संगीत

५. कथा
११.
संगीत
“गबैया परिबार छैक। तान जँ चढ़ैत छैक तँ उतरिते नञि छैक”।
“एकसँ एक कबिकाठी सभटा, परिबारमे क्यो गप छोड़बामे ककरोसँ कम नहि”।
“से की कहैत छियैक। परिबारक कोन कथा, सौँसे टोल मे सभटा कबिकाठिये भेटत”।

उदितक हारमोनियमक तानक विवेचन सौँसे गाम कए रहल छल।
उदितक बाबू आऽ काका दुनू गोटे बड्ड पैघ गबैय्या रहथि। खानदानी गायन आऽ वादन प्रतिभा हुनका लोकनिक रक्त्तमे छलन्हि। उदित पाँचे वर्षसँ संगीत सीखय लागल छलाह, हुनकर स्वरक स्वाभाविक उदात्त आऽ अनुदात्त स्वरूपसँ पिता मुग्ध भए जाइत छलाह। मुदा गामक लोकक संगीतक ज्ञान अष्टजाममे मृदंग, झाइल आऽ हारमोनियम बजेबा तक आऽ निर्दिष्ट वाक्यकेँ गएबा तक सीमित छल, आऽ से प्रायः सभ गोटे सहज रूपेँ कए लैत छलाह। आङ्ल लोकनिक राज्य छ्ल, मैकाले महोदय संस्कृत शिक्षाक स्थान पर आङ्ल भाषा अनबा पर उतारू छलाह। उदितक पिताजी एहिसँ संबंधित एकटा कथा कहैत छलाह। मैकाले महोदय जखन भारत अएलाह तँ एकटा गेस्ट हाउसमे ठहरल छलाह। खिड़कीसँ बाहर देखि रहल छलाह तँ देखलन्हि जे गेस्ट हाउसक मैनेजर परिसरमे प्रवेश कए रहल छलाह, आऽ प्रवेश कएला उत्तर गेस्ट हाउसक दरबानकेँ पैर छुबि कए प्रणाम कएलन्हि। बादमे जखन मैकाले हुनकासँ पुछलन्हि, जे अहाँ मैनेजर छी आऽ तखन सामान्य दरबानकेँ पैर छुबि किएक प्रणाम कए रहल छलहुँ। एहि पर हुनका प्रत्युत्तर भेटलन्हि, जे ओऽ सामान्य दरबान नञि छल वरन् संस्कृतज्ञ सेहो छल। ताहि दिन मैकाले सोचि लेलन्हि जे भारतकेँ पराजित करबाक लेल भारतक संस्कृतिकेँ नष्ट करए पड़त। आऽ एहि लेल संस्कृतकेँ नष्ट करबाक प्रण लेलन्हि, जकर अछैत भारतीय कला संगीत आऽ संस्कृतिसँ पराङमुख भए जएताह। अस्तु तावत, उदित एहि तरहक वातावरणमे आगाँ बढ़ए लगलाह। अङरेज लोकनि द्वारा पाश्चात्य सङ्गीतकेँ अनबाक प्रयासक पलुस्कर, भातखण्डे आऽ रामामात्य द्वारा देल गेल समीचीन उत्तर शिक्षाक क्षेत्रमे किएक नञि भए सकल, उदितक बाल मोन अकुलाइत छल। अस्तु तावत उदित संगीतोद्धारक भातखण्डेकेँ आदर्श बनाए आगाँ बढ़ए लगलाह। लोक गबैय्या कहए तँ कोनो बात नहि, एक दिन आएत जखन एहि गबैय्याक सोझाँ समस्त अखण्ड भारतक मनसि श्रद्धासँ देखत, अस्तु तावत।
काका आऽ पिताक संरक्षणमे गामक रामलीला मंडली द्वारा प्रस्तुत कएल जायबला नाटकमे सेहो उदित भाग लैत छलाह, हुनकर गाओल गीत गाममे सभक ठोर पर आबि गेल छल। मुदा खेती बारी तेहन सन नहि छलन्हि। एक बीघा बटाइ करैत जाइत छलाह, सेहो सुनए पड़न्हि जे गबैय्याजी बुते की खेती कएल होएतन्हि, मुँहसँ गओनाइ आऽ हाथसँ काज करबामे बड्ड अंतर छैक।
जीवनक रथ आगाँ बढ़ैत रहैत मुदा विदेशीक शासनमे सेहो धरि संभव नहि होइत छल। कखनो हैजा तँ कखनो प्लेग तँ कखनो मलेरिआ। अहिना एक बेर गाममे प्लेग पसरल। लोक एक गोटाकेँ डाहि कए आबय तँ गाम पर दोसर व्यक्ति मृत पड़ल रहैत छल। उदितक मायकेँ सेहो पेट आऽ नाक चलय लगलन्हि, देह आगि जेकाँ जड़ैत रहन्हि, मुदा बेटाकेँ लग नहि आबय देथिन्ह जे कतहु हुनको प्लेग नहि भए जाइन्ह। दू दिनुका बाद बेचारी दुनियाँ छोड़ि देलन्हि। दुनू-बाप बेटा दाह संस्कार कए अएलाह। दुनू गोटेक आँखिमे नोर जेना सुखा गेल छलन्हि। पिता गुम-सुम रहए लगलाह। कण्ठसँ स्वर नहि निकलन्हि, मुदा हस्त परिचालनसँ बेटाकेँ अभ्यास कराबथि। दू-तीन बर्ष बीतल उदितक बयस वैह १०-११ साल होएतन्हि आकि पिताकेँ मलेरिआ पकड़ि लेलकन्हि।
रातिमे निन्द नहि होइन्ह। सिरमामे भातखण्डे स्वरलिपि रहैत छलन्हि, ताहि आधार पर बेटाकेँ किछु गाबि सुनाबए कहैत छलखिन्ह। उदितकेँ आभास भए गेलन्हि जे माताक संग पिता सेहो दूर भए जएताह। ई सोचि कोढ़ फाटि जाइन्ह। कुनैनक प्रभाव सेहो आब पिता पर नहि होइत छलन्हि। रातिमे थरथरी पैस जाइत छलन्हि। उदित सभटा केथरी-ओढ़ना सभ ओढ़ा दैत छलखिन्ह, मुदा तैयो थरथरी नहि जाइत छलन्हि। लोक सभ दिनमे आबि खोज-पुछाड़ी कए जाइत छलन्हि। गामक नाटक मण्डली सेहो बन्दे छल कारण मुख्य कार्यकर्त्ता हर्षित नारायण छलाह आऽ ओऽ बनारस चलि गेल छलाह कोनो नाटक मण्डलीमे। ओऽ गाम आयल छलाह आऽ जखन सुनलन्हि, जे उदितक पिताक मोन खराप छन्हि तँ पुछाड़ी करए अएलाह।
“हर्षित। हम तँ आब जाऽ रहल छी। उदित नेना छथि। काका पर बोझ बनताह ताहिसँ नीक जे अपन पैर पर ठाढ़ भए जाथि, संगीत साधना करथि। ई देवक लीला अछि जे एहि समय पर अहाँ गाम आबि गेलहुँ। गामक हबामे जेना रोगक कीटाणु आबि गेल छैक। एतए मत्यु टा निश्चित छैक आर किछु नहि। एहना स्थितिमे संगीतक मृत्यु भए जाए ताहिसँ नीक जे उदित अहाँक संग बनारस नाटक मण्डलीमे चलि जाथि। अहाँ बुते ई होएत हर्षित”?
“की कहैत छी गुलाब भाइ। उदित अहाँक पुत्र छी आऽ हमर क्यो नहि? मुदा संगीतक पारखीक प्रतिभा नाटक मण्डलीमे कुण्ठित नहि भए जएतैक। नाटक मण्डली तँ हमरा लोकनिक सनक अल्प ज्ञानीक लेल छैक”।
“नहि हर्षित। ओतए उदितकेँ हनुमानक आऽ रामक आशीर्वाद भेटतन्हि। संगीतक कतेक रास पक्ष छैक। नव-नव बाधा पार करताह आऽ अल्प समयमे संगीत फुरेतन्हि। ओतएसँ हिनकर साधना आगाँ बढ़तन्हि”।
गुलाब जेना हर्षितक बाट जोहि रहल छलाह। बजिते-बजिते प्राण जेना उखड़ए लगलन्हि। बेटाक माथ पर थरथराइत हाथ रखलन्हि, तँ दौगि कए हर्षित गंगा जल आनि मुँहमे एक दिशिसँ देलन्हि मुदा जल मुँहक दोसर दिशिसँ टघरि कए बाहर आबि गेल।

काशीक तट पर विद्यापतिक बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे सँ लऽ कए भिन्न-भिन्न धार्मिक आऽ लौकिक गीत गाबथि ओकर सुर बनाबथि आऽ ताहि लेल उदितकेँ प्रशंसा सेहो भेटन्हि। आयुक न्यूनता सेहो कहियो काल उपलब्धिक मार्गकेँ रोकि दैत छैक। उदित मात्र ११ वर्षमे काशी गेलाह आऽ ताहि द्वारे हुनकर स्वरक आऽ सुरक बहुत गोटे ग्राहक बनि गेलन्हि, ग्राहक नञि शोषक कहू। सभटा परिश्रम हिनकासँ करबाए लैत छलन्हि आऽ नाम अपन दऽ दए जाइत छलाह। मुदा उदित समय, आयु आऽ गुरुक आसमे दिन काटि रहल छलाह। दिन बड़ मुशकिलसँ कटैत छैक मुदा फेर लागए लगैत छैक, मुदा जौँ एकहि ढर्रा पर चलैत जाइत छैक तँ लागए लगैत छैक जे सालक साल कोना बीति गेल। उदित ११ वर्षसँ २६ वर्ष धरि नाटक कम्पनीमे काज करैत रहलाह।
“शास्त्री जी। ई सुर तँ हमही बनओने छी, मुदा मोन कनेक विचलित अछि ताहि द्वारे दोसर सुर नञि बनि पाबि रहल अछि। उदितकेँ बजाऽ लैत छी। ओहो हमरासँ किछु सिखने अछि, किछु समाधान निकालि लेत”। महान संगीत उपासक भट्ट जीक सोझाँ हर्षित बाजि रहल छलाह।
“हँ हँ। अवश्य बजा लिऔक”। भट्ट जी बजलाह।
मुदा उदित जखन आबि कए संगीतकेँ जाहि सरलतासँ सिद्ध कए सुर गाबि देलन्हि, ताहिसँ भट्टजीकेँ बुझबामे भाँगठ नहि रहलन्हि, जे वास्तविक कलाकार हर्षित नहि उदित छथि। भट्ट जी एकटा एहन शिष्यक ताकिमे छलाह जे प्रतिभावान आऽ साधक होथि, जिनका भट्टजी अपन सभटा कला सौँपि निश्चिन्त भए दए सकथि। आइ से शिष्य भेटि गेलन्हि हुनका। उदितकेँ अपना आश्रममे चलबाक जखन ओऽ नोत देलन्हि तँ उदित दौगि कए अपन प्रकोष्ठ चलि गेलाह, आऽ पिताक फोटोकेँ निकालि कए जे कननाइ शुरू कएलन्हि, तँ १५ सालसँ रोकल धार छहर तोड़ि बहराए लागल।
नाटक कम्पनीमे जेहन एकरूपता छल, तकर विपरीत गुरुआश्रममे वैविध्यता छल। सभ दिन उदित सूर्योदयसँ पूर्व उठैत छलाह आऽ संगीत साधनामे लीन भए जाइत छलाह। शिष्य गुरुकेँ पाबि धन्य छल आऽ गुरु शिष्यकेँ पाबि कए। दिन बीतए लागल मुदा भातखण्डे आऽ पलुस्कर महाराज द्वारा संस्कृत साहित्यक आधार पर संगीतक कएल गेल पुनुरोद्धार तँ गङ्गाक धार जेकाँ निर्मल आऽ चिर छल। जतेक गँहीर उदित ओहि धारमे उतरथि, मोन करन्हि जे आर गँहीर जाइ। २५ साल धरि गुरुक आश्रममे उदित रहलाह। ५१ वर्षक जखन भेलाह तँ गुरु ई कहि बिदा कएलन्हि जे उदित आब अहाँ शिष्य नहि गुरुक भूमिका करू। संगीतशास्त्रक पुनरोद्धार भए चुकल छैक, आङ्ल लोकनिक पाश्चात्य संगीत पद्धति अनबाक प्रयास विफल भए चुकल अछि, आऽ आब भारत स्वतंत्र सेहो भए चुकल अछि। जाऊ आऽ शास्त्र द्वारा प्रदत्त संगीतक दोसर पुनर्जागरणक योद्धा बनू।
५१ वर्षक आयुमे स्वतंत्र भारतमे उदित नोकरी तकनाइ शुरू कएलन्हि। काशीक एकटा संगीत विद्यालय सहर्ष हुनका स्वीकार कए लेलकन्हि। मुदा ३६ वर्षक संगीत साधनाक साधल स्वर काशी विश्वविद्यालय तक पहुँचि गेलैक। शिष्यक पंक्त्ति लागए लगलन्हि। श्रद्धाक प्रतीक, मुदा भारतक नव स्वरूपमे कतेको गोटे शास्त्रीय संगीतक व्यापार सेहो शुरु कएलन्हि, मुदा प्रचारसँ दूर मात्र गुरु शिष्य परम्पराकेँ आधार बनाऽ कए आगू बढ़बैत रहलाह् उदित। हुनकर शिष्य सभ देश विदेसमे नाम करए लागल। तखन काशी विश्वविद्यालय शिक्षक रूपमे हिनका नियुक्त्त कए लेलकन्हि। मुदा ओतए नियम छल जे बिना पी.एच.डी. कएने ककरो विभागक अध्यक्ष नहि बनाओल जाऽ सकैत अछि। मुदा विभागमे उदितसँ बेशी श्रेष्ठ तँ क्यो छल नहि। जेना आङ्ल जन कए गेल छलाह, गुरुकुलसँ पढ़निहारकेँ कोनो डिग्री नहि भेटैत छल आऽ ओऽ सरकारी नोकरीक योग्य नहि होइत छल। उदितक लगमे सेहो ताहि प्रकारक कोनो औपचारिक डिग्री नहि छलन्हि। विश्वविद्यालयक सीनेटक बैसकी भेल आऽ ताहिमे विश्वविद्यालय अपन नियमकेँ शिथिल कएलक, आऽ उदितकेँ संगीतक विभागाध्यक्ष बनाओल गेल। ओतए सेवानिवृत्ति धरि उदित अपन प्रशासनिक क्षमताक परिचय देलन्हि। भातखण्डेक अनुरूप कतेक खण्डमे संगीतक शास्त्रक परिचय देलन्हि उदित। उदितक शिष्य सभक दृश्य-श्रव्य रेकार्ड बहरा गेल छलन्हि, मुदा उदित स्टुडियो आऽ जनताक समक्ष अपन कार्यक्रमसँ अपन साधना भंग नहि करैत छलाह। भोरक साधनासँ साँझक सुर भेटन्हि आऽ साँझक साधनासँ भोरक। हुनकर शिष्य सभ उदितकेँ बिना कहने एकटा अभिनन्दन कार्यक्रम रखलन्हि। ओतए रेकार्डिङ्ग केर व्यवस्था छल। उदित अभिनन्दन कार्यक्रममे अएलाह। आयु ७५ वर्षक छलन्हि हुनकर। श्रोता रहथि देशक सर्वश्रेष्ठ शास्त्रीय संगीतकार लोकनि आऽ उदितक शिष्य-मण्डली। जखन उदित शुरू भेलाह तखन हुनकर शिष्य लोकनि चारू दिशि ताकि रहल छलाह। हुनकर लोकनिक गुरुक स्वर हुनका सभकेँ छोड़ि सद्यः आर क्यो नहि सुनने छल। मुदा शिष्य लोकनिकेँ सुनला उत्तर सभकेँ अभिलाषा छलैक जे जखन शिष्य लोकनि एहन छथि तखन गुरु केहन होएताह। ७५ वर्षक एहि योद्धाकेँ सुनैत सुनैत सगीतक महारथी नव रसक संग हँसथि आऽ कानथि, मुदा शिष्य लोकनि विभोर भए मात्र कानथि।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ५. कथा १०.फूसि-फटक-गजेन्द्र ठाकुर

५. कथा
१०.फूसि-फटक
“कोनो काज भेला पर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझ बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।
“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि से प्रशांते कहैत छन्हि”।
“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।
“अच्छा तँ फेर सैह होय। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँ लिखल रहैत छैक”।
“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”।
मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल। ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक तँ यैह उत्तर भेटैत छैक-
“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि, से जानि कचोट भऽ रहल अछि”। आऽ जखन ओऽ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-
“फलनाक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।
भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ हिनका सोँझा एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-
“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।
“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।
“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो कजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नै अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि कएलहुँ। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से बुझबामे आबि जएतन्हि तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, हगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी। भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।
“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।
“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।
“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय”।
“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।
फेर भाष्कर एकटा खिस्सा सुनबए लगलन्हि मीत भाइकेँ।
तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।
पहिने एकटा कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल। दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।
“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।
"ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर महादेवक दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे माहदेव हुनका हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि। आब कहितहुँ जे नहि पीबि रह्ल छथि तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि, से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू”। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।
दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि तँ पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि। जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।
“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भ्ल होएतैक जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू। बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ, माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?
मीत भाइ मूरी गोतने हँ मे मूरी डोलओलन्हि।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 5. कथा9.पसीधक काँट

5. कथा
9. पसीधक काँट

मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि नोकरी करबाक हेतु मुदा यावत लाल काकाक लग रहलाह तावत कनैत-कनैत हुनका अकच्छ क’ देलखिन्ह।
-----------------------------------------------------------------------
मीत भाइ गाममे रहथि तँ पसीधक काँटक रस पोखड़िमे द’ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देथि।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। फेर मँहीस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह। एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखा’ पड़लन्हि तँ पुछलखिन्ह जे हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल? बुझू। ओ’ तँ धन रहल जे मरीजक बापकेँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलैक आ’ पूछि देलकैक, नहि तँ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जा’ रहल छल।
फेर मीत भाइ कंठी ल’ लेलन्हि, मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आ’ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि आ’ रोहु दू कुट्टी भ’ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह, मोनमे ई सोचैत जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आ’ ‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल, जे क्यो बच्चो जे ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।
“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भ’ कए माछ उघैत छी”।
”यौ माछा खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”।
अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।
से एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह, “की देखि रहल छी”।
गोनर झा कहलखिन्ह जे “टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।
“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।
”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।
”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।
आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,” यौ मीत भाइ, अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”
मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो ठाढ़ि छलखिन्ह से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि, से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह, “भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।
”हँ से तँ पाइ लागले छल”।
”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आ’ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।
एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओ’ पैघ लोक आ’ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आ’ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह। मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि, मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्हि, आ’ तकरेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।
किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओ’ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आ’ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। मीत भाइ खूब जबाब देलन्हि ऐ बेर एहि बातक। अधिक फलम् डूबाडूबी।
-----------------------------------------------------------------------
मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि। पुछला पर कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।
“यौ, लाल काका बियाह तँ करा’ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आ’ अपना लेल नोकरी सेहो दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।
मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलन्हि तँ कहए लगलीह
“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।
तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह,
“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।
आ’ बूढ़ी फेर सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।
मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आ’ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ लोकि लेलकन्हि।
”ई की छी”।
”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।
”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।
” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।
”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।
”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”
” ल’ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।
मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।
दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा’ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा ल’ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।
मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ’ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि मीत भाइ जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भ’ गेलाह।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 6. कथा 8.भैयारी बिसरब नहि- गजेन्द्र ठाकुर

6. कथा
8.भैयारी बिसरब नहि- गजेन्द्र ठाकुर
“कहलहुँ सुनैत छियैक। बेटी पैघ भ’ रहल अछि। बेटा सभक लेल किछु नहि कएलहुँ। अपन घरो नहि बनल। रिटायर भेलाक बाद कतय रहब।“
” बेटीक चिन्ता नहि करू। बेटा बला’ अपने चलि कए आयत।हमरा सभकेँ जतेक सुविधा भेटल छल, ताहिसँ बेशी सुविधा हिनका सभकेँ भेटि रहल छन्हि। तखन पढ़्थु वा नहि से ई सभ जानथि। रिटायरमेन्टक बाद गाम जा’ कय रहब। सात जन्म शहर दिशि घुमि कए नहि आयब।“
” क्यो सर-कुटुम अबैत छथि तँ हुनका सत्कार करबा लेल घरमे इंतजामो नहि रहैत अछि।“
” इंतजाम करबाक की जरूरति अछि। एक पैली बेशी लगा’ दियौक अदहनमे।“
आरुणि मायबापक एहि तरहक वार्त्तालाप सुनि पैघ भेलथि। एक बेर हॉस्पीटलमे पिताजीकेँ देखय लेल एक गोट कुटुम्ब आयल रहथि। हुनकर गप सेहो किछु एहने बुझा पड़लन्हि।
” की क’ लेलहुँ शरीरकेँ। ई बच्चा सभकेँ देखि कए मोहो नहि भेल। कतय पढ़ैत जाइत ई सभ। आ’ कोनो टा सुविधा, नहिये कोनो टा चिन्ते छल अहाँकेँ।अपनो आ’ एकरो सभक जिनगी बर्बाद कएलहुँ।“

“आरुणि। एकटा पैघ राजनीति चलि रहल अछि ऑफिसमे। अहाँक विरुद्ध षड्यंत्र चलि रहल अछि। अहाँकेँ चेतेनाइ हमर काज छल। मुदा अहाँ तँ कोनो तरहक प्रतिक्रिया दैते नहि छी।“ फोन पर एक गोट हितैषीक आवाज सुनि रहल छलाह आरुणि।
”आरुणि। की भ’ गेल। बाबूजी जेकाँ डरायल रहब।किछु दिनुका बाद हारि मानि ऋषि भ’ जायब। आकि दुष्टक संहार करब। एहि दुनूमे की चुनब अहाँ।“
”चिन्ता नहि करू। “ हँसैत बजलाह आरुणि फोन पर, आ’ फोन राखि देलन्हि।

ऑफिसक एकटा लॉबी आरुणिक पाँछा पड़ि गेल छल। ट्रांसफर-पोस्टिंग केर बाद आरुणिक ऊपर दवाब आबि गेल छल।किछु गोटे हुनकर विरुद्ध बिना-कोनो आधारक किछु कम्प्लेन कए देने छलन्हि। एकटा ऑफिसर शशांक केर हाथ छलैक एहिमे। ओकर खास-खास आदमीक पोस्टिंग मोन-मुताबिक नहि भेल रहय आ’ ओ’ प्रोमोशनमे आरुणिकेँ पाँछा करए चाहैत छल।एहि बीचमे आरुणिक फोन किछु दिन डेड छलन्हि। तकरा बाद हुनकर फोनसँ अबुधाबी आ’ दुबइ फोन कएल गेल छल। मुदा ओहि समयमे सरकारी फोनमे आइ.एस.डी. केर सुविधाक हेतु टेलीफोन विभागकेँ सूचित करए पड़ैत छल। हुनकर ऑफिसक एकटा प्रशासनिक अधिकारी टेलीफोन विभागकेँ चिट्ठी लिखि कए ई सुविधा आरुणिक जानकारीक बिना करबाए देने छल। विजीलेंसक जाँचमे ओ’ बयान देने छल जे आरुणि एहि ऑफिसक मुख्य छथि, आ’ हुनकर मौखिक आदेशोक पालन करए पड़ैत छन्हि हुनका। से आइ. एस.डी. केर सुविधाक लेल टेलीफोन विभागकेँ ओ’ आरुणिक मौखिक आदेश पर चिट्ठी लिखने छलाह।माफिया ओकरा तोड़ि लेने छल आ’ ओहिमे ओ’ प्रशासनिक अधिकारी अपनाकेँ सेहो फँसा लेने छल।
सोम दिन फैक्स आयल आ’ आरुणिक ट्रांसफर भ’ गेल।
”रिप्रेसेंट करू एहि आदेशक विरुद्ध”। वैह चिरपरिचित स्वर, मणीन्द्रक।
“अहूँ कोन झमेलामे पड़ल छी। सभ ठीक भ’ जायत”। बजलाह आरुणि फोन पर।
शशांकक घर पर पार्टी भेल।
”मिस्टर आरुणि रिप्रेसेन्ट तक नहि कएलन्हि। रिलीव भ’ कए चलि गेलाह। बुझू सरेन्डर कए देलन्हि अपनाकेँ”।
”प्रोमोशन बुझू जे दस साल धरि रुकल रहतन्हि। सीनियरिटी मारल जएतन्हि। बदनामी भेलन्हि से अलग। सुनैत छी जे फोन पर दुबइक स्मगलर सभसँ गप करैत छलाह”।
-------------------------------------------------------------------
ओम्हर आरुणिकेँ अपन बाबूजीक ट्रांसफर, ईमानदारीक संग कएल संघर्ष, संघर्षक विफलता आ’ तकर बाद हुनकर तंत्र-विद्या आ’ पूजा-पाठक दिशि अपनाकेँ ओझरायब आ’ घर-द्वार,ऑफिस आ’ सांसारिकतासँ विरक्त्ति मोन पड़ि गेलन्हि। एहि सभ घटनाक्रमक बाद हुनकर मुँह पर जे चिन्ताक रेखा आयल छलन्हि,से बेशी दिन धरि नहि रहलन्हि आरुणिक मोन पर। हारिकेँ जीतमे कतोक बेर बदलने छलाह ओ’। पढ़ाइक ग्राफ पिताक मोनक संग बनैत-बिगड़ैत रहैत छलन्हि। मुदा घुरि कए पुनः लक्ष्य प्राप्त करैत छलाह। नोकरीमे रहितहु ई घटना एक बेर भेल छल। एकटा सरकारी यात्राक बाद भेल एक्सीडेन्ट, 15 दिन धरि वेंटीलेटर पर,फेर एक साल धरि बैशाखी पर रहलाक बाद, पुनः अपन पैर पर ठाढ़ भ’ गेलाह। मृत्यु पर विजय कएलन्हि।मुदा डेढ़ साल बाद जखन ऑफिस अएलाह तखन लोककेँ विश्वासे नहि भेलैक।मुख पर वैह चिरपरिचित हँसी।लोक सभ तँ ईहो कहैत छल जे ई एक्सीडेंट भेल नहि छल वरन् करबाओल गेल छल।
” की यौ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि। स्टेटसँ बाहर ट्रांसफर भ’ गेल तँ अहाँ सभ तँ बिसरिये गेलहुँ”।
” हम की सभ क्यो बिसरि गेल अहाँकेँ एतय।
“अहाँ की बुझलहुँ। जे हम सेहो बिसरि गेल छी। अहाँकेँ मोन अछि। हम जखन इंटरक बाद बाबूजीक इच्छाक विरुद्ध विज्ञान छोड़ि कए कला विषय लेने छलहुँ। विज्ञानक सभटा किताब 11 बजे रातिमे पोखड़िमे फेंकि देने छलियैक। कोनोटा अवशेषो नहि छोड़ने छलहुँ ओहि विषयक अपन घरमे। आ’ जखन कला विषयमे प्रथम श्रेणी आयल छल तखन गेल छलहुँ गाम। तकरा पहिने कतेक बरियाती छोड़ने छलहुँ, कतेक जन्म-मृत्यु। मुदा गाम नहि गेल छलहुँ”।
” एह भाई। अहाँकेँ तँ सभटा मोन अछि। हमरा तँ भेल जे अहूँ काका जेकाँ भ’ गेलहुँ। ई सभ क्षमाक योग्य नहि अछि। कनेक देखा’ दियौक। आब हमरा विश्वास भ’ गेल जे किछु होयत”।
” फेर वैह गप। जखन अहाँ नहि बदललहुँ तखन हम कोना बदलब। चोड़ने छलहुँ किछु दिन अपनाकेँ। आब सुनू। जे कहैत छी से टा करू। बेशी बाजब जुनि। जाहि समयक कॉल हमर टेलीफोनसँ बाहरी देश कएल गेल छल, ओहि समयमे तँ हमर टेलीफोन खराब छल, ई तँ अहाँकेँ बुझले अछि।घरसँ टेलीफोन विभागकेँ कम्प्लेन सेहो लिखबाओल गेल छल। मुदा से टेलीफोने पर लिखबाओल गेल छल। कोनो लिखित पत्र आ’ ओकर प्राप्ति रशीद तँ अछि नहि। मुदा ई पता करू जे एहि तरहक कम्प्लेनक कोनो रेकार्ड टेलीफोन विभागक लग रहैत छैक की नहि।“

मणीन्द्रक फोन आयल किछु दिनुका बाद जे फोन विभाग एक महीनाक बाद कम्प्लेन नंबर फेरसँ एक सँ देब शुरू कए दैत छैक। से ई काज नहि भेल।
” बेश तखन ई पता करू, जे हमर नंबरसँ ककरा-ककरा कोन-कोन नंबर पर विदेश फोन कएल गेल छल। आ’ ओहि विदेशीक फोन कोन-कोन नंबर पर आयल अछि”।
”हँ। एहि गपक तँ हमरा सुरते नहि रहल”।

आब मणीन्द्र जे टेलीफोन नंबरक सूची अनलन्हि, से सभटा टेलीफोन बूथ सभक छल। मुदा कोनो टा कॉल आरुणिक नंबर पर नहि आयल छल।

विजीलेंसक सुनबाहीमे ई सभ वर्णन जखन आरुणि कएलन्हि, तखन शशांक हतप्रभ रहि गेलाह। ई तँ नीक भेल जे हुनकर आदमी सभ बूथ बलासँ संपर्क रखने छल, नहि तँ ओहो सभ फण्सैत आ’ संगहि शशांकोक नाम अबैत एहि सभमे। अस्तु आरुणि जाँचसँ बाहर निकलि गेलाह।
-----------------------------------------------------------------------
“ भाइ। हम मणीन्द्र। ओकरा सभकेँ तँ किछु नहि भेलैक।“
”हमर ट्रांसफर दिल्ली भेल अछि। देखैत छी। अहाँ निश्चिंत रहू।“
”हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भ’ गेलहुँ जहिया अहाँ पुरनका गप सभ सुनेलहुँ। काकाक अपमानक बदला अहाँकेँ लेबाक अछि। मात्र व्यक्त्ति सभ बदलल अछि। चरित्र सभ वैह अछि”।
--------------------------------------------------------------------
दिल्लीमे आरुणि विजीलेंस विभागक सूचना-प्रौद्योगिकी शाखामे पदस्थापित भेलाह। एहि विभागकेँ शंटिंग पोस्टिंग मानल जाइत छल। विजीलेंसक एनक्वायरीसँ बाहर निकललाक बादो आरुणि एहि पोस्टिंगके चुनलन्हि, से एहिसँ तँ ईएह सिद्ध होइत अछि, जे आरुणि थाकि गेलाह। पाँच साल कोनमे बैसल रहताह। शशांकक ग्रुप प्रफुल्ल छल।
एम्हर आरुणि अपन विज्ञानक छोड़ल पाठ फेरसँ शुरू कएलन्हि। भरि दिन कम्प्युटर आ’ ओकर तकनीकी विशेषज्ञ सभसँ भिड़ल रहथि। ओहो लोकनि बहुत दिनक बाद एहन अधिकारी देखनी छलाह जे भिड़ल अछि, काजसँ। दोसरि लोकनि तँ कोहुना टर्म पूर्ण कए भागैत छथि।
ओना देखल जाय तँ ई विभाग बड्ड संवेदनशील छल। आब आरुणिक अपन विभागक सभ कर्मचारीसँ बेश निकटता भ’ गेल छलन्हि। सभक आवेदन समयसँ आगू बढ़ैत छल। सभटा ऑफिसक इक्विपमेंट नव आबय लागल। पहिलुका ऑफिसर सभ तँ समय काटि भागय केर फेरमे रहैत छल आ’ ऑफिसक आवश्यक आवश्यकता सेहो पूर्ण नहि करैत छल।
ऑफिसमे एकटा इक्विपमेन्ट आयल छल, एन्टी करप्शन रोकय लेल। एहिमे स्मगलर सभक फोन टेप करबाक सुविधा छल।

किछु दिन समय व्यतीत होइत रहल।
”मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”।
”हम आब निश्चिन्त छी”।
”हँ समय आबि गेल अछि। एकटा काज करू स्मग्लरक संग शशांकक संबंधक संबंधमे एकटा न्यूज निकलबा दिऔक अखबारमे।आगाँ सभ चीज तैयार अछि”।
ओम्हर अखबारमे खबरि निकलल, आ’ मंत्रीक जन संपर्क पदाधिकारी जकर काज विभागक खबरिकेँ अखबारसँ काटि कए मंत्री धरि पहुँचायब छल, ओ’ क्लिपिंग मंत्रीजी लग पहुँचाय देलन्हि। समय समीचीन छल कारण विभागीय मंत्रीजी पर ढेर आरोप ओहि समय आयल छलन्हि,संसदक सत्र चलि रहल छल, से ओ’ कोनो तरहक रिस्क नहि लेलन्हि। इंक्वायरीक ऑर्डर दय देलन्हि।
विजिलेंस विभागमे केश आयल। ओकर आंतरिक बैठकी होइत छल, जाहिमे प्रौद्योगिकी विभागकेँ सेहो बजाओल जाइत छल। सभ केशमे मोटा-मोटी प्रौद्योगिकी विभाग अनाधिकार प्रामाण पत्र दए दैत छल।आ’ केश इंक्वायरीक बाद समाप्त भ’ जाइत छल।
मीटिंगक तिथि तय भेल। मीटिंगमे आरुणि विजिलेंस कमेटीक सदस्यक रूपमे शामिल भेलाह।
”शशांक पर कोनो तरहक कोनो आरोप सिद्ध नहि होइत छन्हि। आरुणि अहाँक विभागकेँ टेलीफोन टैपिंगक उपकरण उपलब्ध करबाओल गेल छल। मुदा अपन ऑफिसमे तँ फैक्स मशीनो 6 मास किनाकय राखल रहलाक बाद लगाओल जाइत अछि, तखन ई मशीन एखनो राखले होयत आकि किछु कंवर्शेशन रेकार्डो भेल अछि”।
”श्रीमान। ई मशीन एहि मासक पहिल तिथिकेँ आएल आ’ ओहि तिथिसँ एकर उपयोग शुरू भ’ गेल। एहि केशमे जहि स्मगलरक नाम आयल अछि, ओकर नाम ओहि सूचीमे अछि, जकर कॉल रेकॉर्ड करबाक आदेश हमरा भेटल छल। शशांकक कंवर्शेशन एहि व्यक्त्तिसँ नहि केर बराबड़ अछि।आध-आध मिनटक दू टा कंवर्शेशन।दोसर कंवर्शेशन नौ बजे रातिक छी आ’ एहि कंवर्शेशनक बाद ओहि स्मगलरक फोन अपन कर्मचारीकेँ जाइत छैक, आ’ ताहूमे मात्र आध मिनट ओ’ लगबैत अछि”।
” ई कोन तारीखक अछि”।
”पाँच तारीखक”।
” छह तारीखक भोरमे एहि स्मगलरक ओहिठाम रेड भेल छल, आ’ किछु नहि भेटल छल। ई सभ फोनक डिटेल दिअ आरुणि’।
”पहिल कॉलमे शशांक कहैत छथि, जे साढ़े आठ बजे घर पर आबि कए भेंट करू।बड्ड जरूरी गप अछि। दोसर कंवर्शेशनमे ओ’ नौ बजे तमसाइत कहैत छथि, जे नौ बाजि गेल आ’ अहाँ एखन धरि नहि अएलहुँ। एहिमे उत्तर सेहो भेटैत अछि, जे ओ’ शशांकक गेट पर ठाढ़ अछि”।
” तेसर फोनमे की वार्त्तालाप अछि”।
” तेसर फोन ओ’ स्मगलर अपन ऑफिस स्टाफकेँ साढ़े नौ बजे करैत अछि। ओ’ कर्मचारीकेँ आदेश दैत अछि, जे तुरत ऑफिस आऊ, हमहुँ पहुँचैत छी। बस एकर अतिरिक्त किछु नहि। कोनो एवीडेंस नहि भेटि सकल एहि केसमे। कहू तँ हम नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दए दिअ”।
”आरुणि। की कहैत छी अहाँ। अहाँक विभाग तँ आइ तक कोनो काज नहि कएने छल, मुदा आइ तँ सभटा कड़ी जोड़ि देलहुँ अहाँ। शशांक फोन कएलक जे भेंट करू। दोसर फोन पर ओ’ व्यक्त्ति ओकर गेट पर ठाढ़ छल। तेसर फोनमे ओकर कर्मचारी ऑफिस ओतेक रातिमे की करए जाइत अछि। रेडक खबड़ि शशांक लीक कएलन्हि। ओ’ कर्मचारी सभटा कागज हटा देलक, आ’ हमर विभागक ऑफिसर भोरमे छुच्छ हाथ घुरि कए आबि गेलाह। आब एकटा फोन आर करू। शशांकक नंबर टेप तँ नहि भ’ सकल छल, मुदा प्रक्रियाक अनुसार ओकर आवाजक सैंपल मैच करबाक चाही। ओ’ फोन उठायत तँ गलत नंबर कहि काटि दियौक”।
”सैह होयत”।
तखने ई प्रक्रिया कएल गेल।
“ई तँ ओपन आ’ शट केस अछि”। विजीलेंस कमेटीक अध्यक्ष महानिदेशककेँ बतओलन्हि। महानिदेशक शशांककेँ बजबओलन्हि आ’ ओकरा दू टा विकल्प देलन्हि।
”शशांक एहि सभ घटनाक बाद अहाँ लग दू टा विकल्प अछि। विभागसँ कंपलसरी सेवा निवृत्ति लेबय पडत अहाँकेँ। नहि तँ इंक्वायरी आगाँ बढ़त”।
शशांक कंपलसरी सेवानिवृत्ति लए लेलन्हि। विभाग छोड़ि कए चलि गेलाह।
” भाइ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”।
”भजार। हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भ’ गेल छलहुँ जाहि दिन हमरा बुझबामे आओल, जे अहाँकेँ बच्चाक सभटा गप मोन अछि। काका आ’ अहाँमे कोनो अंतर नहि। मार्ग मात्र दू तरहक रहल। एहि विजयक मार्ग पर अहाँ चली ताहि हेतु, कतेक भरकाबैत छलहुँ अहाँकेँ से मोन अछि ने। मुदा ओहि दिन जखन हमरा अहाँ बच्चाक गप सभ कहए लगलहुँ तहिये निश्चिन्त भ’ गेल छलहुँ हम”।


(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।


(अनुवर्तते)

Saturday, July 26, 2008

विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)

2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
आ’ नियत तिथिकेँ शुरू भेल दानवीर दधीची नाटक।स्कूल खुजबासँ किछु काल पहिनहि हम सभ पहुँचि गेलहुँ स्कूल। बरण्डाक एक कोनमे गाम परसँ आनल चद्दरिक पर्दा बनल। रस्सी ठीकसँ नहि लागि सकल से ईएह निर्णय भेल चद्दरिकेँ ऊपर उठा-खसा कए काज निकालल जाएत।तकरा बाद कलाकार सभ अपन अप ड्रेस पहिरए लगलाह। ड्रेस की छल मात्र पाउडर लगा’ कय आ’ गमछा, धोती पहिरि कय सभ सभ तरहक ड्रेस पहिरि लेलक। जाहि मास्टरसाहेबक ड्यूटी लागल छल नाटकक संचालनक हेतु, हुनका कोनो आवश्यक कार्य मोन पड़ि गेलन्हि, से ओ’ ओहि दिन छुट्टी मारि देलन्हि। गामक पैघ तुरियाकेँ तावत बुझबामे आबि गेलैक,जे प्राइमरी स्कूलक छौड़ा सभ नाटक क’ रहल अछि। से तुरत्तेमे दस टा पैघ बच्चा सभ जूटि गेल आ’ पिहकारी देनाइ शुरू क’ देलन्हि। हम सभ कलाकारकेँ कहलियन्हि, जे ई सभ उत्तेजित क’ कय हमर सभक नाटककेँ दूरि करत। मुदा छोटे भाइ भीड़ि गेलाह।कहय लगलाह जे हे बौआ सभ, हम नाटकक ड्रेसमे छी, तेँ ई नहि बुझू जे मारि नहि करब। एखने ड्रेस फेकि-फाइक क’ हम सभ कर्म क’ दइ जायब अहाँ सभकेँ। मुदा पिहकी पारनहारक संख्यामे घटती नहि भेल। आ’ छोटे भाइ बाजि उठलाह जे छोड़ू आइ एहि नाटककेँ। हिनका सभक बदमस्ती हम एखने ठीक करैत छी। आ’ खुट्टा उखाड़ि कय दौड़लाह। तावत थाम्ह-थोम्ह करय बलाक जुमान भ’ गेलैक आ’ तकरा संगहि नाटक दानवीर दधीची जे हमर लिखल छल आ’ जकर मंचनक निर्देशन हम करए बला छलहुँ, बीचहिमे खतम भ’ गेल। किछु दिन धरि छोटे भाइसँ मूहा-फुल्ली रहल। ओ’ आबथि आ’ कहथि जे की करू, तामस उठि गेल छल। ओहो सभ अतत्तह क’ देने छल। फेर किछु दिनुका बाद सभटा सामान्य भ’ गेल। रामलीलाक आ’ नाटकक भूत सेहो एहि घटनाक बाद हमरा परसँ उतरि गेल।
(अनुवर्तते)

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 4. कथा हम नहि जायब विदेश

4. कथा
हम नहि जायब विदेश

“यौ भैय्या। कनेक काकासँ भेँट नहि करा देब”।
“काका छथि अहाँक। आ’ भेँट करा दिअ हम”।
“यौ। ओ’ तँ हमरा सभकेँ चिन्हितो नहि छथि। बच्चेमे गामसँ निकलि गेलथि , से घुरि कए कहाँ अएलाह”।
“बेश। तखन चलू भेँट करबा’ दैत छी। मुदा कोनो पैरवी आकि काज होय तँ पहिने कहि दैत छी, से ओ’ नहि करताह”।
“नहि। कोनो काज नहि अछि। मात्र भेँट करबाक इच्छा अछि। भारत वर्षमे एतेक नाम छन्हि, सभ चिन्हैत छन्हि, मुदा नहिये हमरा सभ चिन्हैत छियन्हि , आऽ नहि वैह चिन्हैत छथि”।
लाल गेल छलाह दस दिन पहिने, द्विजेन्द्र जीक घर पर। जाइते देरी लालक कटाक्ष शुरू भ’ जाइत छन्हि। गामकेँ बिसरि गेलियैक। घुरि क’ देखबो नहि कएलहुँ। खोपड़ीकेँ घर त’ बना लैतहुँ।आ’ जबाबो भेटन्हि, ओहिना बनल बनाओल।जे जा’ कय की करब। एक कट्ठाक घरारी आ’ ताहि पर कतेक बाबूक कतेक भाँय। आ’ फेर वामपंथी विचारधाराक चिन्तन शुरू भ’ जाइत छलन्हि। गाम अछि धनीकक लेल। यावत गामक जनसंख्या कम नहि होयत तावत धरि तँ अवश्ये। गरीबीमे लोककेँ लोक नहि बुझैत अछि क्यो। मुदा नगर मात्र दिल्ली, कलकत्ता नहि अछि। यावत मधेपुर, मधेपुरा, बनैली आ’ झंझारपुरक विकास नहि होयत, शोषित वर्ग रहबे करत। तावत द्विजेन्द्र जीक कनियाँ चाह राखि गेलथि।
द्विजेन्द्रजी गामेमे प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि।झंझारपुरमे मिड्ल स्कूल आ’ हाइ स्कूल पैरे जाथि। पिताजी राँचीमे ठिकेदारी करैत छलखिन्ह। माय पढ़ल-लिखल छलीह। लोक कहैत छल जे उपन्यास सेहो पढ़ैत छलीह।
दरभंगासँ सोझे प्रयाग पहुँचि गेलाह द्विजेन्द्र। पिता छलाह नबका बसातक लोक। खूब कमाथि आ’ खूब खर्च करथि। गामसँ कोनो सरोकार नहि। कनियाँक खोजो-खबरि नहि लैत छलाह। लोक कहैत छल जे दोसर बिआह क’ लेने छलाह राँचीमे। लोक ईहो कहैत अछि, जे यावत गाममे छलाह ओ’ तावतो वैह हाल छलन्हि। बेरू पहर तीन बजेसँ कनियाँ हुनका लेल भाङ पीसब प्रारम्भ क’ दैत छलीह। मुदा बड़का बेटाकेँ खूब मानैत छलाह। छोटका बेटा हुनके पर गेल छलन्हि। नाम छल हरेन्द्र आ’ लोक कहैत अछि, जे पटनाक कोनो गैराजमे काज करैत रहथि। द्विजेन्द्र गुरु-गम्भीर, पढ़बामे तेज, सभ विषयमे पितासँ विपरीत। आ’ ताहि द्वारे पिता हुनकर खर्च पठेबामे कोनो विलम्ब नहि करैत छलाह। एहि पठाओल पाइसँ द्विजेन्द्र छोट भाइकेँ सेहो नुकाकेँ पाइ पठा दैत छलाह। मायक सुधि मुदा हुनको नहि रहैत छलन्हि, आकि भ’ सकैत अछि जे ओतेक पाइ आ’ समय नहि रहैत होयतन्हि।
माय बेचारीकेँ क्यो कहि दएन्हि, जे बेटाकेँ फेर फर्स्ट डिवीजन भेल छन्हि, आकि पतिकेँ हाइवे केर ठेका भेटि गेल छन्हि, तँ ओ’ तिरपित भ’ जाइत छलीह। गाममे बटाइदार सभ जे किछु द’ दएन्हि ताहिसँ कोनो तरहेँ गुजर चलि जाइत छलन्हि। नील रंगक नूआ, रुबिया वाइल कहैत छल कोटाक दोकान बला सभ ओहि नूआकेँ, सेहो सस्तमे भेटि जाइत छलन्हि, ओहि कोटा बला दोकानसँ। रने-बने गाछीमे घुमय पड़ैत छलन्हि जारनिक हेतु। गाममे सभक गुजर कोहुनाकेँ भ’ जाइत छैक ।
आ’ एम्हर ठेकेदार साहेब पैघ बेटाकेँ समय पर पाइ पठेबाक अतिरिक्त्त अपन सभ कर्त्तव्य बिसरि गेल छलाह। कमाउ आ’ खाउ छल मात्र हुनकर मंत्र। गाम-घरसँ कोनो मतलबे नहि।
द्विजेन्द्र इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे सभक आदर्श बनि गेल छलाह। इतिहास विषयक तिथि सभ हुनकर संगी बनि गेल छल। विश्वविद्यालयमे सर्वप्रथम तँ अबिते रहथि, संगहि हुनकर चालि-चलन, गुरु-गम्भीर स्वभाव, परिपक्व मानसिकता एहि सभसँ सभ क्यो प्रभावित रहैत छल। संगी-साथी सेहो कम्मे छलन्हि। एकटा संगी छलन्हि उपेन्द्र आ’ एकटा आलोक। महिला संगी कोनोटा नहि। ओ’ सभ कहितो छलीह जे द्विजेन्द्र तँ घुरि कय तकितो नहि छथि। ओहिमे एकटा छलीह अरुन्धती।पढ़बामे तेज, राजनीति विज्ञानक विद्यार्थी। प्रतियोगी स्वभावक छलीह। बापक दुलारू, आ’ पिताकेँ हुनका पर सेहो असीम विश्वास छलन्हि।एडवान्स कहि सकैत छी। द्विजेन्द्रसँ बहुत बिन्दु पर सुझावक आकांक्षी छलीह। मुदा द्विजेन्द्र बाबू तँ दोसरे लोक छलाह। घरक कोनो गप तँ ककरो बुझल नहि रहैक। मुदा से कारण छल जे द्विजेन्द्र सभक प्रति निरपेक्ष रहैत छलाह।
“यौ उपेन्द्र। राजनीति विज्ञानमे तँ हमरा कोनो दिक्कत नहि अछि, मुदा इतिहासमे तिथि आ’ दृष्टिकोणसँ बड्ड दिक्कतिमे पड़ि गेल छी”।अरुन्धती उपेन्द्रसँ पुछलन्हि।
आ’ दुनू गोटे इतिहास पर अपन- अपन दृष्टिकोण एक दोसरकेँ देबय लगलथि।रासबिहारी बोस आजाद हिन्द फ्औजक स्थापना कएलन्हि सुभाष चन्द्र बोस नहि आ’ नीलक खेतीक हेतु सरखेज जे गुजरातमे छल बड्ड प्रसिद्ध छल, धोलावीर सभसँ पैघ सिन्धु घाटी आकि सरस्वती नदी सभ्यताक स्थल छल आ’ दारा शिकोहकेँ सभसँ पैघ मनसब देल गेल छल, उपेन्द्र ई सभ गप द्विजेन्द्रसँ पूछि कए आबथि आ’ फेर अरुन्धतीसँ वार्त्तालाप करथि।एहिमे समयक हानि होइत छल। से उपेन्द्र कहलन्हि, जे किएक नहि द्विजेन्द्रकेँ सेहो अपन समूहमे शामिल कए लेल जाय।
” मात्र द्विजेन्द्रकेँ शामिल करू। बेशी गोटेकेँ आनब तँ पढ़ाइ कम आ’ गप सरक्का बेशी होयत”।
उपेन्द्रक कहलासँ द्विजेन्द्र आबय लगलाह, सामूहिक अध्ययनमे।
तावत एक दिन समाचार आयल जे पिताक मोन बड्ड खराब छन्हि। पहुँचलाह तँ लीवर खराब होयबाक समाचार भेटलन्हि। सतमायसँ सेहो भेँट भेलन्हि।गाम-घर पर कोनो खबरि नहि। फेर 15 दिनमे मृत्यु भ’ गेलन्हि पिताक। गाम पर तखन जा’ कय खबरि भेल। नहि तँ कोनो पता,नञ तँ कोनो फोन। माय बेचारी कनैत रहि गेलीह। बेटा दाह-संस्कारक बाद सोझे प्रयाग चलि गेलाह। गाम घुरियो क’ नहि गेलाह।

मायक खिस्सा यैह अछि, जे फेर ओ’ गुम-शुम रहय लगलीह। कोनो चीजक ठेकान नहि रहन्हि। एक बेर तँ डिबिया सँ चारक घरमे तेहन आगि लागि गेल जे सौँसे टोल जरि गेल। ओहि समयमे सभकेँ चारक घर रहैक। सभ घर एक दोसरसँ सटल। पूरा टोल जरि गेल। सभ कहय जे द्विजेन्द्रक माय उपन्यास पढ़ैत-पढ़ैत सुति गेलीह आ’ डिबियामे हाथ लागि गेलन्हि।सौँसे टोल जरैत रहय, आ’ ओ’ भेर भेल सूतल छलीह। ककरो फुरेलइ तँ हुनका उठा-पुठा क’ बाहर कएलक। बादमे हुनकर आरो अवहेलना होमय लागल। लोक गारि सेहो पढ़ि देने छलन्हि कताक बेर। ओहिनामे एक बेर जारक झपसीमे गुजरि गेलीह। द्विजेन्द्रक पता सेहो नहि छलन्हि ककरो लग। घरारीक लोभमे एक गोट समाङ आगि देलकन्हि। द्विजेन्द्रक निकटता अरुन्धतीसँ बढ़य लगलन्हि। उपेन्द्रकेँ अरुन्धती एक बेर कहियो देलखिन्ह जे अहाँ सीढ़ी छलहुँ हमर आ’ द्विजेन्द्रक बीचमे। अरुन्धतीक माय सेहो बच्चेमे गुजरि गेल छलीह। पिताक दुलरी छलीहे ओ’। अरुन्धतीक कहला पर द्विजेन्द्र आबि गेलाह हुनका घर पर रहबाक लेल। संगे पढ़लन्हि, आ’ फेर दुनू गोटे प्रयाग विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर बनि गेलाह।विवाह सेहो भ’ गेलन्हि। मात्र मधुबनीक एक गोट पीसाकेँ बुझल छलन्हि हिनकर विवाहक बात।पीसा छलाह पत्रकार आ’ मधुबनीक कोनो हॉस्पीटलमे काज केनहारि केरलक नर्स सँ ताहि जमानामे विवाह कएने छलाह।घर परिवार हुनका बारि जेकाँ देने छलन्हि। मुदा छलाह बड्ड नीक लोक।द्विजेन्द्रकेँ वैह बेर-बखत पर कहियो काल मदति करैत छलाह।मुदा विवाहमे ओहो नहि अयलाह।अपन सलाहो देने छलाह एहि विवाहक विरुद्ध। अपन उदाहरण देलन्हि, जे कतेक दिक्कत भेलन्हि।मुदा संगमे ईहो कहलन्हि, जे अहाँकेँ तँ बाहर रहबाक अछि। हम तँ मधुबनीमे रहैत छलहुँ, कहियो कनियाकेँ गामो नहि ल’ जा’ सकलहुँ।
द्विजेंन्द्रकरिसर्च पर रिसर्च प्रकाशित होइत गेलन्हि। देश-विदेशमे सेमीनार पर जाथि। अरुन्धती जेना बेर पर मदति कएने छलीह, तकरा बाद द्विजेन्द्र अपना पर भरोस कएनाइ छोड़ि देने छलाह। वामपंथी इतिहासकारक रूपमे छवि बना’ कय मात्र इतिहास आ’ पुरातत्त्व सँ सम्पर्क बनओने छलाह। सालक-साल बितैत गेल। गामक लोकमे मात्र लाल छलाह जे ओहि नगरमे रहैत छलाह आ’ ताहि द्वारे कहियो काल भेँट क’ अबैत छलखिन्ह। लालक गप पर अनुत्तरित भ’ जाइत छलाह द्विजेन्द्र। मायक कोनो चर्चा पर नोर पीबि जाइत छलाह। सोचने रहथि जे किछु बनि जयताहतँ मायकेँ संग आनि रखितथि आ’ सभ पापक पश्चाताप क’ लितथि। मुदा यावत अपन खर्चा नहि जुमन्हि तवततँ ओ’ जीवित रहलीह आ’ जखन किछु बनलाह तँ तकर पहिनहि छोड़ि गेलीह। कोन मुँह ककरा देखेतथि।
आ’ जखन लाल पहुँचलाह हुनका लगमे ई बजैत जे लियह, भातिज आयल छथि भेँट करबाक हेतु, अहाँ तँ कोनो सरोकार ककरोसँ रखबे नहि कएलहुँ, तँ पहिल बेर बजलाह द्विजेन्द्र-
“कोन सरोकार मायसँ पैघ छल यौ लाल, जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नहि रखने छी”।
--------

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN

  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm ...