भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

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Friday, March 07, 2008

खिस्सा जीवनक ( मैथिली भाषा लघु कथा)


एक आदमीक घर एक सन्यासी पाहुन बनि कs एलखिन। रातिमे गपशपक बीच ओऽ संन्यासी आदमीसँ कहलखिन की अहाँ एहि ठाम ई छोट-मोट खेतीमे की लागल छी ! साइबेरियामे किछु दिन पहिने हम यात्रा पर रही, ओइ ठाम जमीन एतेक सस्ता अछि मानू अहाँकेँ मँगनीम्वे भेट जाएत! अहाँ अपन ई जमींन बेचि कऽ साइबेरिया चलि जाऊ ! ओहिठाम हजारो एकड़ जमीन भेट जाएत एतबे जमीनमे ! ओइ ठामक जमीन बड उपजाऊ छइ, आर ओइ ठामक लोक एतेक सीधा-साधा की करीब-करीब जमींन मुफ्तेमे दऽ देत! ओइ आदमीकेँ वासना जगलनि! ओऽ दोसरे दिन अपन सभ जमीन बेचि कऽ साइबेरिया चलि देलथि! जखन ओऽ साइबेरिया पहुँचला तँ सन्यासीक गप हुनका सत्य लगलनि! ओ ओइ ठामक आदमीसँ पुछलखिन की हम जमीन कीनय लय चाहए छी ! तँ हुनका जबाब भेटलनि, जमीन कीनए हेतु अहाँ जतेक पाइ अनलहुँ यऽ ओकरा राखि दियौ ; आर जीवनक हमरा लग खाली इएह उपाय अछि की जमीन बेचि दी! काल्हि भोर सूरज उगइ पर अहाँ निकलब आर साँझ सूरज अस्त होएबा धरि जतेक जमीन अहाँ घेर सकी घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत!
बस चलैत रहब .........साँझ सूरज डूबए तक जतेक जमीन अहाँ घेर सकब घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत! बस शर्त ई अछि की जतएसँ अहाँ चलब शुरू करब साँझ सूरज डूबएसँ पहिने अहाँकेँ ओही ठाम वापस आबए पड़त !
ओऽ आदमी राति भरि सूति नञि सकलाह, सत्य पुछू तँ यदि हुनका जगह पर अहूँ रहितहुँ तँ ओहिना होइतए; एहेन क्षणमे कियो सुति सकैत छथि? ओऽ आदमी राति भरि योजना बनाबैत रहलाह की कोन तरहसँ कतेक जमीन घेरल जाय! भोर होइते पूरा गामक लोक जमा भऽ गेलखिन। जहिना सूरज उगलथि ओऽ आदमी चलब शुरू केलाह ! चलएसँ पहिने ओऽ रोटी आर पानि सभ संगमे लऽ लेलथि रहए ! रास्तामे भूख प्यास लागै पर सोचने रहथि चलिते-चलिते भोजनो कऽ लेताह! हुनकर खाली इएह सोचब रहनि की कुनू भी स्थितिमे रुकनाइ नञि छइ ! चलैत-चलैत आब ओऽ दौड़ब शुरू कऽ देलखिन सोचलथि बेसी जमीन घेर लेब ! ओऽ दौगैत रहलाह, सोचने रहथि ठीक बारह बजे घुरि जाएब , ताकि सूरज डूबैत-डूबैत वापस पहुँचि सकी ! बारह बाजि गेलनि, ओऽ मीलो चलि चुकलथि रहए, मुदा वासनाक कोनो अंत छइ ? ओऽ सोचऽ लगलाह, बारह तँ बाजि गेलए आब लौटबाक चाही ; मुदा सोझाँ बला जमीन बड़ उपजाऊ छइ कनी ओकरो घेर ली! लौटेत समय कनी तेजीँ स दौगए पड़त आर की एके दिनक तँ बात छइ तेजीसँ दौग लेब !
दौड़ए के चक्करमे ओऽ भूख-प्यास सभ बिसरए देलखिन, नञि ओऽ किछु खेलथि नञि पिलथि बस दौगेत रहलाह! रास्तामे ओऽ रोटी पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौगैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरऽ के मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर-सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटएक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलन्हि! हुनका डर सताबए लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सभ ताकति वापस दौगएमे लगा देलथि ; लेकिन तागति ख़तम होइक करीब रहनि ! सुबहेसँ दौगैत-दौगैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबऽ लगलाह की सूरज डूबए धरि घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौगएमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरीयो आब नञि बचलनि, ग्रामीण सभकेँ ओऽ देखऽ लगलाह ! सभ गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि, एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौगैत छथि! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह, तैयो दम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाइ छनि, किछ दूरी बाँकी देखि ओऽ घुसकैत- घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! सूरजक अन्तिम किरण विलिप्त होइसँ पहिने हुनकर हाथ ओहि जमीन पर पड़ि गेलनि जतएसँ ओऽ दौगब शुरू केलथि रहए ! एक तरफ सूरज डूबल दोसर तरफ हुनकर अंतिम साँस सेहो हुनकर साथ छोड़ि देलकनि। ओऽ मरि गेलाह, बहुत मेहनति केलखिन रहए ! शायद ह्रदयक दौरा पड़ि गेलनि ! ओइ ठाम जमा गामक सब सोझ-साझ कहाबए बला ओऽ दौगएक चक्करमे भूख-प्यास सभ बिसारि देलखिन नञि ओऽ किछ खेलथि नञि पिलथि बस दौगैत रहलाह ! रास्तामे ओऽ रोटी-पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौड़ैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरबाक मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर - सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटेबाक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलाह ! हुनका डर लागऽ लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सब ताकति वापस दौड़एमे लगाऽ देलथि ; लेकिन ताकत ख़त्म हेबाक करीब रहनि ! भोरेसँ दौड़ैत - दौड़ैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबए लगलाह की सूरज डूबए तक घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौड़ैमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरियो आब नञि बचलनि। ग्रामीण सबकेँ ओऽ देखए लगलाह ! सब गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि, की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि। एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौड़ैतत छथि ! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह तैयोदम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाए छनि। किछु दुरी बाँकी देख ओऽ घुसकैत-घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! हँसैत-हँसैत आपसमे बात करऽ लगलाह की अइ तरहक पागल आदमी आबिते जाइत रहैत छथि !ई कुनू नव घटना थोड़े अछि ! अक्सर लोग खबर सुनला पर आबैत रहथि आर अहिना मरैत रहथि ! ई कुनू अपवाद नञि, नियम रहए ओहि सब जमींदारक ! कियो ऐहन नञि भेलाह जे ओऽ जमीनकेँ घेरि कऽ ओकर मालिक बनलाह ! ई (लघु कथा) खाली कहानी मात्र न्ञि अछि ! ई घटना हमर, अहाँ आर सम्पूर्ण संसारक कहानी छी। हमर सभक जीवनक कहानी छी ! हुनके जेकाँ आइ हम सभ कऽ रहलहुँ-ए! हुनके जेकाँ जमीन घेरए के पाछाँ दौगि रहलहुँ-ए की कतेक जमीन घेर ली ! बारह बाजए-ए , दुफरिया होइ-ए, घुरए धरि समय भेलाक बाबजूद कनी आरक चक्करमे हम सब दौगि रहल छी ! ओकरा पाछाँ भूख प्यास सब बिसारि दए छी ! सत्य पुछू तँ हमरा अहाँक लग जीबए लेल समय नञि अछि ! हमसब चाहतक पीछाँ भागि रहलहुँ-ए! कहियो हमसब संतुष्ट नञि भऽ रहलहुँ-ए, हुनके जेकाँ हमर अहाँक सोच अछि, एहिसब चक्करमे गरीब - धनिक सब भूखे मरि रहलहुँ-ए कियो अपन जीनन जी नञि पबैत छ्थि ! जीबए हेतु कनी विश्रान्ति चाही ! जीबए लेल कनी समय चाही, जीवन मँगनी भेटए-ए बस ज्ञान भेनाय जरुरी अछि !!

Monday, February 25, 2008

मधुक एक ठोप ( मैथिली भाषा लघु कथा)


कुरुक्षेत्रक भीषण रक्तपातक बाद, अपन सभ पुत्र गवाँ चुकल शोकसँ संतृप्त धृतराष्ट्रक दुःख विदुरक समक्ष अश्रुधाराक रूपमे बहि निकललनि ! तखन ओऽ सेविका पुत्र (विदुर) हुनका समक्ष वर्तमान स्थितिक अनुकूल एक उपदेशात्मक नीति-कथाक वर्णन केलखिन !
विदुर कहलखिन "आइ एकटा ब्राह्मणक कथा अपनेकेँ बताबैत छलहुँ ! जे जंगली पशुसँ भड़ल जंगलमे पथ - भ्रमित भऽ गेलखिन रहए ! शेर आर चिता, हाथी आर भालूक चीख, चिंघाड़, आर गर्जनक एहन दृश्य जे मृत्युक देवता, यमोक मोनमे सिहरन पैदा कऽ दैतियनि! ब्राह्मणोकेँ ओऽ वातावरण डरा देलकनि रहए! हुनकर सम्पूर्ण शरीर भयसँ थरथराइत रहनि ! हुनकर मस्तिष्क आशंकासँ भरल रहनि आर हुनकर भयभीत मोन कुनू देवताकेँ व्याकुल भए तकैत रहनि, जे हुनकर प्राणकेँ भयावह वनचरसँ बचाऽ सकतियनि ! लेकिन ओइ बर्बर जानवरक गर्जनासँ सम्पूर्ण जंगल प्रतिध्वनित भऽ कs हुनकर उपस्थितिक आभास करबैत रहनि !ब्राह्मणकेँ एहन प्रतीत होइ छ्लनि की जतए-जतए ओ जाइत छथिन, जानवरक गर्जना हुनकर प्रतिच्छाया बनि कए हुनकर पीछा करैत छ्लनि ! अचानक हुनका लागलनि की ओऽ भयावह जंगल एक घन जाल बुनि कs हुनका आर डरा रहलनि-ए! जंगलक गहनता एक डराओन स्त्रीक रूप धरि, अपन दुनु हाथ पसारि कs हुनका अपनामे विलीन करएक निमंत्रण दऽ रहलनि-ए!जंगलक बीचमे एकटा इनार रहनि जे घास आर बड़का-बड़का लत्तीसँ झाँपल रहए ! ओऽ ओही इनारमे खसि गेलखिन आर लत्तीक सहारासँ कुनू पाकल आम जेकाँ लटपटा कs माथक भर उलटा लटकि गेलखिन ! हुनका लेल डरक बादल गहींर भेल जाइत रहनि! इनारक तलमे ओऽ एक राक्षसी सांप देखलथि, इनारक मुंडेर पर एक बड़का हाथी जकर छः मुँह आर बारह पैर रहनि , ओ मंडरबैत रहए ! आर लत्तीक बीचमे बनल मधुमाछीक छत्ताक चारू दिस विशालकाय मधुमाछी ओकर भीतर-बाहर भिनभिनाबैत रहए ! मधुमाछीक छत्तासँ टपकै बला मौधक किछु ठोप लटकल ब्राह्मणक मुँह पर खसलनि ! ओइ लटकल परिस्थितियोमे ओऽ ब्राह्मण शहदक ओऽ बूंद केँ नञि छोड़लखिन ! जतेक बूंद गिरैत रहनि, हुनका ओतेक संतोष प्राप्त होइत रहनि ! मुदा हुनकर इच्छा शांत नञि होइत रहनि ! ओऽ आर जीवित रहए लय चाहैत रहथिन ! जखन ओऽ शहदक मज़ा लैत रहथि तखने ओऽ देखलखिन की जै लत्ती पर ओऽ लटकल रहथिन ओइ लत्तीकेँ किछु उज्जर आर कारी मूषक (मूस) अपन धरगर दांतसँ काटि रहलनि-ए! हुनकर भय आर बढ़ि गेलनि ! ओऽ भयसँ चारूदिस घिरि गेलथि, कखनो हुनका मांसाहारी जानवरक भय, तँ कखनो डराओन स्त्री, राक्षसी सांप तँ कखनो ओइ लत्तीक भय होइत रहनि जकरा मूषक (चूहा) अपन दांतसँ कुतरैत रहए। भएक एहि बहावमे ओऽ माथक बल लटकल छथि ! अपन आशाक संग , मधुक रसास्वादक तीव्र आकांक्षा लऽ कs ओइ जंगलमे हुनका जीवित रहबाक आर प्रबल इच्छा रहनि!
विदुर धृतराष्ट्रसँ कहैत छथिन " ई जंगल एक नश्वर संसार अछि; एहि संसारक भौतिकता एक इनार आर अंधकारमय इनारक चारू दिसक स्थान कुनू व्यक्ति विशेषक जीवन चक्रकेँ कs दर्शाबैत अछि ! जंगली पशु रोगक प्रतीक अछि तँ डराओन स्त्री नश्वरताक द्योतक ! इनारक नीचां बैसल विशालकाय सांप ओऽ काल अछि, जे समयकेँ लीलए लऽ पर्याप्त अछि ! एक वास्तविक आर संदेहरहित विनाशकक तरह ! लत्तीक मोह - पाशमे ब्राह्मण लटकल छथि जे स्वरक्षित जीवनक मूल प्रवृति छथि, जकरासँ जीव बाँचल नञि अछि ! इनारक मुंडेर पर छः मुखी हाथीक प्रतीक ई अछि, छः मुख अर्थात छः ऋतु आर बारह पैर माने सालक बारह मास ! लत्तीक कुतरए बला मूस ओऽ दिन राति अछि, जे मनुष्यक आयुकेँ अपन धरगर दाँतसँ कुतरि-कुतरि कs कम क्ऽ रहल अछि ! यदि मधुमाछी हमर सबहक इच्छा अछि तँ मधुक एक बूंद ओऽ तृप्ति जे इच्छामे निहित अछि ! हम सब मनुष्य इच्छाक अथाह समुद्रमे शहद रूपी काम-रसक भोग करैत डूबि-उतरि रहलहुँ-ए!
एहि तरहेँ विद्वान लोक जीवन चक्रक व्याख्या केने छथि, आर ओकरासँ मुक्तिक उपाएसँ अवगत करेने छथि !

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE   I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...