भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
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(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
Saturday, July 26, 2008
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
पुरातात्त्विक ,भाषावैग्यानिक आ’ साहित्यिक साक्ष्य एहि पक्षमे अछि,जे आर्य भारतक मूल निवासी छलाह। आर्य भाषा परिवारक नामकरण मैक्समूलर द्वारा कएल गेल छल। द्रविड़ परिवारक नामकरण पादरी रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा कएल गेल छल।आर्यक आक्रमणक सिद्धांत आयल ग्रिफिथक ऋग्वेदक अनुवादमे देल गेल फूटनोटसँ। पहिने तँ ई बात जे ई नामकरण विदेशी विद्वान द्वारा देल गेल छल, ताहि द्वारे ओकर अपन उद्देश्य होयतैक।
सरस्वती नदी,जल-प्रलय, मनु, आ’ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ’ देवतंत्रक विकास एहि सभटाक समाजशास्त्रीय विकासक विश्लेषन आर्य लोकनिक भारतक मूल निवासी होयबाक साक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
ऋग्वेदमे मात्र्सत्तात्मक व्यवस्थाक स्मृतिक रूपमे बहुवचन स्त्रीलिंगक प्रयोगक बहुलता अछि।
सघोष आ’ महाप्राण ऋग्वेदिक आ’ भारतीय भाषाक ध्वनिक प्रतिरूप नहि तँ ईरानी आ’ नहिये यूरोपीय भाषा सभमे भेटैत अछि। सरस्वती आ सिन्धु धारक बीचक सभ्यता छल आर्यक सभ्यता। सरस्वती धारक तटवर्त्ती भरत, पुरु आ’ अन्य गण सभ मिलि कए ऋगवेदक रचना कएलन्हि। सरस्वतीमे जल-प्रलयक बाद ई सभ्यता सारस्वत प्रदेश सँ हटि कए कुरु-पांचाल आ’ ब्रह्मर्षि प्रदेश-मध्यदेश- पहुँचि गेल। इतिहासमे भरत लोकनिक महत्त्व समाप्त भ’ गेल। एहि जल प्रलयक बाद आर्यजन लोकनिक वंशज लोकनि मोहनजोदड़ो आ’ हड़प्पा नगरक निर्माण कएलन्हि। हड़प्पा सभ्यताक 800 मे सँ 530 सँ ऊपर स्थान, एहि लुप्त सरस्वती धारक तट पर अवस्थित छल। सिन्धुक धार पर एहि स्थल सभक बड्ड कम निर्भरता छल, आ’ जखन सरस्वतीमे पानिक प्रवाह घटल तँ एहि सभ केन्द्रक ह्रास प्रारम्भ भ’ गेल।
पहिने सरस्वतीमे जल-प्रलयसँ आर्यक पलयन भेल(ऋगवेद आ’ यजुर्वेदक रचनाक बाद) आ’ फेर सरस्वतीमे पानि कमी भेलासँ दोसर बेर आर्यक पैघ पलायन भेल(अथर्ववेदक रचनाक पहिने)।अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहि तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ’ नहिये यूरोपमे। फेर ई रह, भारतीय देवनाम,शिल्प,कथा, अश्वविद्या,संगीत, भाषिक तत्त्व आ’ चिंतनक संग उद्घाटित होमय लागल पश्चिम एशिया, मिश्र, आ’ यूनानमे।
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(अनुवर्तते)
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
आ’ नियत तिथिकेँ शुरू भेल दानवीर दधीची नाटक।स्कूल खुजबासँ किछु काल पहिनहि हम सभ पहुँचि गेलहुँ स्कूल। बरण्डाक एक कोनमे गाम परसँ आनल चद्दरिक पर्दा बनल। रस्सी ठीकसँ नहि लागि सकल से ईएह निर्णय भेल चद्दरिकेँ ऊपर उठा-खसा कए काज निकालल जाएत।तकरा बाद कलाकार सभ अपन अप ड्रेस पहिरए लगलाह। ड्रेस की छल मात्र पाउडर लगा’ कय आ’ गमछा, धोती पहिरि कय सभ सभ तरहक ड्रेस पहिरि लेलक। जाहि मास्टरसाहेबक ड्यूटी लागल छल नाटकक संचालनक हेतु, हुनका कोनो आवश्यक कार्य मोन पड़ि गेलन्हि, से ओ’ ओहि दिन छुट्टी मारि देलन्हि। गामक पैघ तुरियाकेँ तावत बुझबामे आबि गेलैक,जे प्राइमरी स्कूलक छौड़ा सभ नाटक क’ रहल अछि। से तुरत्तेमे दस टा पैघ बच्चा सभ जूटि गेल आ’ पिहकारी देनाइ शुरू क’ देलन्हि। हम सभ कलाकारकेँ कहलियन्हि, जे ई सभ उत्तेजित क’ कय हमर सभक नाटककेँ दूरि करत। मुदा छोटे भाइ भीड़ि गेलाह।कहय लगलाह जे हे बौआ सभ, हम नाटकक ड्रेसमे छी, तेँ ई नहि बुझू जे मारि नहि करब। एखने ड्रेस फेकि-फाइक क’ हम सभ कर्म क’ दइ जायब अहाँ सभकेँ। मुदा पिहकी पारनहारक संख्यामे घटती नहि भेल। आ’ छोटे भाइ बाजि उठलाह जे छोड़ू आइ एहि नाटककेँ। हिनका सभक बदमस्ती हम एखने ठीक करैत छी। आ’ खुट्टा उखाड़ि कय दौड़लाह। तावत थाम्ह-थोम्ह करय बलाक जुमान भ’ गेलैक आ’ तकरा संगहि नाटक दानवीर दधीची जे हमर लिखल छल आ’ जकर मंचनक निर्देशन हम करए बला छलहुँ, बीचहिमे खतम भ’ गेल। किछु दिन धरि छोटे भाइसँ मूहा-फुल्ली रहल। ओ’ आबथि आ’ कहथि जे की करू, तामस उठि गेल छल। ओहो सभ अतत्तह क’ देने छल। फेर किछु दिनुका बाद सभटा सामान्य भ’ गेल। रामलीलाक आ’ नाटकक भूत सेहो एहि घटनाक बाद हमरा परसँ उतरि गेल।
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विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 4. कथा हम नहि जायब विदेश
हम नहि जायब विदेश
“यौ भैय्या। कनेक काकासँ भेँट नहि करा देब”।
“काका छथि अहाँक। आ’ भेँट करा दिअ हम”।
“यौ। ओ’ तँ हमरा सभकेँ चिन्हितो नहि छथि। बच्चेमे गामसँ निकलि गेलथि , से घुरि कए कहाँ अएलाह”।
“बेश। तखन चलू भेँट करबा’ दैत छी। मुदा कोनो पैरवी आकि काज होय तँ पहिने कहि दैत छी, से ओ’ नहि करताह”।
“नहि। कोनो काज नहि अछि। मात्र भेँट करबाक इच्छा अछि। भारत वर्षमे एतेक नाम छन्हि, सभ चिन्हैत छन्हि, मुदा नहिये हमरा सभ चिन्हैत छियन्हि , आऽ नहि वैह चिन्हैत छथि”।
लाल गेल छलाह दस दिन पहिने, द्विजेन्द्र जीक घर पर। जाइते देरी लालक कटाक्ष शुरू भ’ जाइत छन्हि। गामकेँ बिसरि गेलियैक। घुरि क’ देखबो नहि कएलहुँ। खोपड़ीकेँ घर त’ बना लैतहुँ।आ’ जबाबो भेटन्हि, ओहिना बनल बनाओल।जे जा’ कय की करब। एक कट्ठाक घरारी आ’ ताहि पर कतेक बाबूक कतेक भाँय। आ’ फेर वामपंथी विचारधाराक चिन्तन शुरू भ’ जाइत छलन्हि। गाम अछि धनीकक लेल। यावत गामक जनसंख्या कम नहि होयत तावत धरि तँ अवश्ये। गरीबीमे लोककेँ लोक नहि बुझैत अछि क्यो। मुदा नगर मात्र दिल्ली, कलकत्ता नहि अछि। यावत मधेपुर, मधेपुरा, बनैली आ’ झंझारपुरक विकास नहि होयत, शोषित वर्ग रहबे करत। तावत द्विजेन्द्र जीक कनियाँ चाह राखि गेलथि।
द्विजेन्द्रजी गामेमे प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि।झंझारपुरमे मिड्ल स्कूल आ’ हाइ स्कूल पैरे जाथि। पिताजी राँचीमे ठिकेदारी करैत छलखिन्ह। माय पढ़ल-लिखल छलीह। लोक कहैत छल जे उपन्यास सेहो पढ़ैत छलीह।
दरभंगासँ सोझे प्रयाग पहुँचि गेलाह द्विजेन्द्र। पिता छलाह नबका बसातक लोक। खूब कमाथि आ’ खूब खर्च करथि। गामसँ कोनो सरोकार नहि। कनियाँक खोजो-खबरि नहि लैत छलाह। लोक कहैत छल जे दोसर बिआह क’ लेने छलाह राँचीमे। लोक ईहो कहैत अछि, जे यावत गाममे छलाह ओ’ तावतो वैह हाल छलन्हि। बेरू पहर तीन बजेसँ कनियाँ हुनका लेल भाङ पीसब प्रारम्भ क’ दैत छलीह। मुदा बड़का बेटाकेँ खूब मानैत छलाह। छोटका बेटा हुनके पर गेल छलन्हि। नाम छल हरेन्द्र आ’ लोक कहैत अछि, जे पटनाक कोनो गैराजमे काज करैत रहथि। द्विजेन्द्र गुरु-गम्भीर, पढ़बामे तेज, सभ विषयमे पितासँ विपरीत। आ’ ताहि द्वारे पिता हुनकर खर्च पठेबामे कोनो विलम्ब नहि करैत छलाह। एहि पठाओल पाइसँ द्विजेन्द्र छोट भाइकेँ सेहो नुकाकेँ पाइ पठा दैत छलाह। मायक सुधि मुदा हुनको नहि रहैत छलन्हि, आकि भ’ सकैत अछि जे ओतेक पाइ आ’ समय नहि रहैत होयतन्हि।
माय बेचारीकेँ क्यो कहि दएन्हि, जे बेटाकेँ फेर फर्स्ट डिवीजन भेल छन्हि, आकि पतिकेँ हाइवे केर ठेका भेटि गेल छन्हि, तँ ओ’ तिरपित भ’ जाइत छलीह। गाममे बटाइदार सभ जे किछु द’ दएन्हि ताहिसँ कोनो तरहेँ गुजर चलि जाइत छलन्हि। नील रंगक नूआ, रुबिया वाइल कहैत छल कोटाक दोकान बला सभ ओहि नूआकेँ, सेहो सस्तमे भेटि जाइत छलन्हि, ओहि कोटा बला दोकानसँ। रने-बने गाछीमे घुमय पड़ैत छलन्हि जारनिक हेतु। गाममे सभक गुजर कोहुनाकेँ भ’ जाइत छैक ।
आ’ एम्हर ठेकेदार साहेब पैघ बेटाकेँ समय पर पाइ पठेबाक अतिरिक्त्त अपन सभ कर्त्तव्य बिसरि गेल छलाह। कमाउ आ’ खाउ छल मात्र हुनकर मंत्र। गाम-घरसँ कोनो मतलबे नहि।
द्विजेन्द्र इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे सभक आदर्श बनि गेल छलाह। इतिहास विषयक तिथि सभ हुनकर संगी बनि गेल छल। विश्वविद्यालयमे सर्वप्रथम तँ अबिते रहथि, संगहि हुनकर चालि-चलन, गुरु-गम्भीर स्वभाव, परिपक्व मानसिकता एहि सभसँ सभ क्यो प्रभावित रहैत छल। संगी-साथी सेहो कम्मे छलन्हि। एकटा संगी छलन्हि उपेन्द्र आ’ एकटा आलोक। महिला संगी कोनोटा नहि। ओ’ सभ कहितो छलीह जे द्विजेन्द्र तँ घुरि कय तकितो नहि छथि। ओहिमे एकटा छलीह अरुन्धती।पढ़बामे तेज, राजनीति विज्ञानक विद्यार्थी। प्रतियोगी स्वभावक छलीह। बापक दुलारू, आ’ पिताकेँ हुनका पर सेहो असीम विश्वास छलन्हि।एडवान्स कहि सकैत छी। द्विजेन्द्रसँ बहुत बिन्दु पर सुझावक आकांक्षी छलीह। मुदा द्विजेन्द्र बाबू तँ दोसरे लोक छलाह। घरक कोनो गप तँ ककरो बुझल नहि रहैक। मुदा से कारण छल जे द्विजेन्द्र सभक प्रति निरपेक्ष रहैत छलाह।
“यौ उपेन्द्र। राजनीति विज्ञानमे तँ हमरा कोनो दिक्कत नहि अछि, मुदा इतिहासमे तिथि आ’ दृष्टिकोणसँ बड्ड दिक्कतिमे पड़ि गेल छी”।अरुन्धती उपेन्द्रसँ पुछलन्हि।
आ’ दुनू गोटे इतिहास पर अपन- अपन दृष्टिकोण एक दोसरकेँ देबय लगलथि।रासबिहारी बोस आजाद हिन्द फ्औजक स्थापना कएलन्हि सुभाष चन्द्र बोस नहि आ’ नीलक खेतीक हेतु सरखेज जे गुजरातमे छल बड्ड प्रसिद्ध छल, धोलावीर सभसँ पैघ सिन्धु घाटी आकि सरस्वती नदी सभ्यताक स्थल छल आ’ दारा शिकोहकेँ सभसँ पैघ मनसब देल गेल छल, उपेन्द्र ई सभ गप द्विजेन्द्रसँ पूछि कए आबथि आ’ फेर अरुन्धतीसँ वार्त्तालाप करथि।एहिमे समयक हानि होइत छल। से उपेन्द्र कहलन्हि, जे किएक नहि द्विजेन्द्रकेँ सेहो अपन समूहमे शामिल कए लेल जाय।
” मात्र द्विजेन्द्रकेँ शामिल करू। बेशी गोटेकेँ आनब तँ पढ़ाइ कम आ’ गप सरक्का बेशी होयत”।
उपेन्द्रक कहलासँ द्विजेन्द्र आबय लगलाह, सामूहिक अध्ययनमे।
तावत एक दिन समाचार आयल जे पिताक मोन बड्ड खराब छन्हि। पहुँचलाह तँ लीवर खराब होयबाक समाचार भेटलन्हि। सतमायसँ सेहो भेँट भेलन्हि।गाम-घर पर कोनो खबरि नहि। फेर 15 दिनमे मृत्यु भ’ गेलन्हि पिताक। गाम पर तखन जा’ कय खबरि भेल। नहि तँ कोनो पता,नञ तँ कोनो फोन। माय बेचारी कनैत रहि गेलीह। बेटा दाह-संस्कारक बाद सोझे प्रयाग चलि गेलाह। गाम घुरियो क’ नहि गेलाह।
मायक खिस्सा यैह अछि, जे फेर ओ’ गुम-शुम रहय लगलीह। कोनो चीजक ठेकान नहि रहन्हि। एक बेर तँ डिबिया सँ चारक घरमे तेहन आगि लागि गेल जे सौँसे टोल जरि गेल। ओहि समयमे सभकेँ चारक घर रहैक। सभ घर एक दोसरसँ सटल। पूरा टोल जरि गेल। सभ कहय जे द्विजेन्द्रक माय उपन्यास पढ़ैत-पढ़ैत सुति गेलीह आ’ डिबियामे हाथ लागि गेलन्हि।सौँसे टोल जरैत रहय, आ’ ओ’ भेर भेल सूतल छलीह। ककरो फुरेलइ तँ हुनका उठा-पुठा क’ बाहर कएलक। बादमे हुनकर आरो अवहेलना होमय लागल। लोक गारि सेहो पढ़ि देने छलन्हि कताक बेर। ओहिनामे एक बेर जारक झपसीमे गुजरि गेलीह। द्विजेन्द्रक पता सेहो नहि छलन्हि ककरो लग। घरारीक लोभमे एक गोट समाङ आगि देलकन्हि। द्विजेन्द्रक निकटता अरुन्धतीसँ बढ़य लगलन्हि। उपेन्द्रकेँ अरुन्धती एक बेर कहियो देलखिन्ह जे अहाँ सीढ़ी छलहुँ हमर आ’ द्विजेन्द्रक बीचमे। अरुन्धतीक माय सेहो बच्चेमे गुजरि गेल छलीह। पिताक दुलरी छलीहे ओ’। अरुन्धतीक कहला पर द्विजेन्द्र आबि गेलाह हुनका घर पर रहबाक लेल। संगे पढ़लन्हि, आ’ फेर दुनू गोटे प्रयाग विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर बनि गेलाह।विवाह सेहो भ’ गेलन्हि। मात्र मधुबनीक एक गोट पीसाकेँ बुझल छलन्हि हिनकर विवाहक बात।पीसा छलाह पत्रकार आ’ मधुबनीक कोनो हॉस्पीटलमे काज केनहारि केरलक नर्स सँ ताहि जमानामे विवाह कएने छलाह।घर परिवार हुनका बारि जेकाँ देने छलन्हि। मुदा छलाह बड्ड नीक लोक।द्विजेन्द्रकेँ वैह बेर-बखत पर कहियो काल मदति करैत छलाह।मुदा विवाहमे ओहो नहि अयलाह।अपन सलाहो देने छलाह एहि विवाहक विरुद्ध। अपन उदाहरण देलन्हि, जे कतेक दिक्कत भेलन्हि।मुदा संगमे ईहो कहलन्हि, जे अहाँकेँ तँ बाहर रहबाक अछि। हम तँ मधुबनीमे रहैत छलहुँ, कहियो कनियाकेँ गामो नहि ल’ जा’ सकलहुँ।
द्विजेंन्द्रकरिसर्च पर रिसर्च प्रकाशित होइत गेलन्हि। देश-विदेशमे सेमीनार पर जाथि। अरुन्धती जेना बेर पर मदति कएने छलीह, तकरा बाद द्विजेन्द्र अपना पर भरोस कएनाइ छोड़ि देने छलाह। वामपंथी इतिहासकारक रूपमे छवि बना’ कय मात्र इतिहास आ’ पुरातत्त्व सँ सम्पर्क बनओने छलाह। सालक-साल बितैत गेल। गामक लोकमे मात्र लाल छलाह जे ओहि नगरमे रहैत छलाह आ’ ताहि द्वारे कहियो काल भेँट क’ अबैत छलखिन्ह। लालक गप पर अनुत्तरित भ’ जाइत छलाह द्विजेन्द्र। मायक कोनो चर्चा पर नोर पीबि जाइत छलाह। सोचने रहथि जे किछु बनि जयताहतँ मायकेँ संग आनि रखितथि आ’ सभ पापक पश्चाताप क’ लितथि। मुदा यावत अपन खर्चा नहि जुमन्हि तवततँ ओ’ जीवित रहलीह आ’ जखन किछु बनलाह तँ तकर पहिनहि छोड़ि गेलीह। कोन मुँह ककरा देखेतथि।
आ’ जखन लाल पहुँचलाह हुनका लगमे ई बजैत जे लियह, भातिज आयल छथि भेँट करबाक हेतु, अहाँ तँ कोनो सरोकार ककरोसँ रखबे नहि कएलहुँ, तँ पहिल बेर बजलाह द्विजेन्द्र-
“कोन सरोकार मायसँ पैघ छल यौ लाल, जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नहि रखने छी”।
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(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 5. पद्य
विशाल समुद्र
समुद्रक लहरिक तरंग
अनगिनत बेर दोहरा रहल अछि ।
उद्देश्यहीन अपने मुदा ओकर गान
कहिया कत’ सँ चलि रहल अछि ।
बेर बेर रेत पर बनल पदचिह्न
मेटा क’ तटसॅं घुरि जाइत अछि ।
जलक सभसॅं शक्तिशाली संगठन
सागरक रूपमे उपस्थित अछि ।
रातिक अन्हारोमे ओकर गर्जन
ओकर विशालताक आभास कराबैत अछि ।
गजेन्द्र ठाकुर-
के छथि
के छथि जिनकर हस्त-रेखमे,
अछि परिश्रमसँ बढ़ब लिखल।
के छथि जिनका ललाट मध्य,
परिश्रमक गाथा रहैछ सकल।
जे छथि सुस्त तकरे चमकैत,
अछि हाथक रेखा बुझूँ सखा,
जिनका घाम नहि खसन्हि,
छन्हि ललाट चमकैत,नहि बेजाय।।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
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विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
सुभाषितम्
अन्नदानं परं दानं विद्यादनमतः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यवज्जीवं च विद्यया॥ दानम करणेतु। अन्नदानं यदि कुर्मः महादानम् इति वदन्तु। यदि अन्नदानं कुर्मः, यदा वुभुक्षा भवति तावत् पर्यन्तम तिष्ठति। यदि विद्यादानम् कुर्मः यावत् जीवन् तिष्ठति।
कथा
एकः ग्रामः अस्ति। ग्रामे एकः धनिकः अस्ति। सः महान् धनिकः। तस्य सुन्दरं भवनम् अस्ति। पत्नी अस्ति, पुत्राः सन्ति। गृहे सेवकाः सन्ति।कृषिः भूमिः अस्ति। सर्वम् अपि अस्ति। तस्य कापि न्यूनता नास्ति। अतः सः सर्वदा उपविशति।तथा सः धनिकः तिष्ठति। परन्तु आश्चर्यम् नामा तस्य समीपे सर्वम् अपि अस्ति। किन्तु सः धनिकः निद्राम् न प्राप्नोति। रात्रौ निद्रामेव कर्त्तुम् सः न शक्नोति। एकदा सः स्वगृहे उपविष्टवान् आसीत्। चिन्तनं कुर्वन् आसीत। तस्मिनपि दिने तस्य निद्रा न आगता। किमर्थं मम् एवं भवति। इति तस्य मनसि महती चिन्ता उत्पन्नः। तस्मिन्नैव समये दूरतः सः एकम् गीतं श्रुणोति। मधुरं गीतम् आसीत्। कः एवं गायति। इतिः सः न जानाति। तथापि पश्यामि इति चिन्तयित्वा सः गीतस्य ध्वनिम् अनुसरन् अग्रे-अग्रे गच्छति।तस्य गृहतः समीपे एव एकं कुटीरं पश्यति सः। तस्मिन् कुटीरे कश्चन् निर्धनः आसीत्। सः तत्र शयनं कृतवान् आसीत्। शयनं कृत्वा, भित्तिम् आलव्य शयनं कृत्वा उच्चैः गायन् आसीत्। संतोषेन सः गायति। तस्य मुखे संतोषः दृश्यते। तद्दृष्ट्वा धनिकस्य आश्चर्यं भवति।अतः सः प्रश्नं पृच्छति।भो भो मित्रा। भवान् एतावता आनन्देन गायन अस्ति। भवतः आनन्दस्य किम् कारणम् इति पृच्छति। तदा सः निर्धनम् उत्तरं वदति। महाशयः, मम् समीपे धनं किमपि नास्ति। सत्यम्। तत् अहं जानामि। किन्तु अहं बहिः पश्यामि। प्रकृतिं पश्यामि। इदानीं प्रकृतिः कथं शोभते। वसन्तकालः अस्ति। सर्वं पुष्पाणि विकसन्ति। भ्रमराः संचारं कुर्वन्ति। वसन्तकालस्य सौन्दर्यं सर्वत्र दृश्यते। एतद् अस्ति अहं तद् पश्यामि। भवान् वस्तुतः किम् करोति। मम् समीपे तत् नास्ति, एतत् नास्ति,अन्यत् नास्ति। तदैव चिन्तनं करोति। यद्यपि भवतः समीपे बहुः बहुः अस्ति, तथापि भवान् यत् नास्ति तस्य विषये चिन्तनं करोति। अतः दुःखम् अनुभवति। अहं यत् अस्ति तस्य विष्ये चिन्तनं करोमि, अतः अहं सुखं अनुभवामि। एतदैव रहस्यम् इति निर्धनः वदति। तस्य वचनं श्रुत्वा धनिकस्य ज्ञानोदयः भवति। सत्यमेव खलु। वयं सर्वदापि अस्ति। तस्य विषये चिन्तनं कुर्मः चेत्। संतोषम् अनुभवामः। यत् नास्ति तस्य विषयेव चिन्तनं कुर्मः चेत् वयम् अपि दुःखम् अनुभवामः।
कथायाः अर्थः ज्ञातः।
गीतम्
वर्षाकाले आकाशे, चटका विचरति आगच्छति। शीतल समीर,चपला, मेघ गर्जति तीव्रा, जल-बिन्दु निपतति, विद्युत झंझति।
सम्भाषणम्
अद्य शनिवासरः। श्वः रविवासरः/भानुवासरः। अद्य कः वासरः। शनिवारः कदा। परश्वः सोमवासरः। रविवासरः कदा। सोमवासरः कदा। अद्य शनिवासरः। ह्यः शुक्रवासरः।
परह्यः गुरुवासरः। गुरुवासरः कदा। प्रपरश्वः मंगलवासरः। प्रपरह्यः बुधवासरः।
वयं प्रतः काले मिलामः। किम् वदामः। सुप्रभातम्। रात्रौ वदामः। शुभ रात्रिः। अन्य समये। नमोनमः/नमस्कारः/नमस्ते।
यदा दूरवाणी आगच्छति। हरिओम्। इति वदामि-हलो स्थाने। पुनः वदन्तु। एवं कृत्वा वदन्तु।
क्षम्यताम्। आम्।वेंकटरमणन्ः।
कुशलम्। अस्तु। सायंकाले आगच्छामि। पंचवादने आगच्छामि। अस्तु धन्यवादः। पश्यतु। दंतकूर्चः अस्ति। दण्डः अस्ति। अहं दण्डं स्वीकरोमि।
अहं शिक्त्तवर्त्तिकां स्वीकरोमि। अहम् अङ्कनीं स्वीकरोमि। अहं लेखनीं स्वीकरोमि।
अहं दूरवाणीं स्वीकरोमि। अहं करवस्त्रं स्वीकरोमि। अहं पुस्तकं स्वीकरोमि। इदानीम् अहं पुस्तकं/लेखनीं/अङ्कनीं/दण्डं/दंतकूर्चं स्थापयामि।
पुस्तकं/दण्डं ददामि। दूरवाणीं/शिक्त्तवर्त्तिकां/ दंतकूर्चं/लेखनीं/ न ददामि। अहम् अङ्कणीं न ददामि। अहं पुस्तकं/चमषं न ददामि।
भवती किम् ददाति। अहं दंतकूर्चं ददामि। भवती किम् ददाति। अहं पुस्तकं ददामि। भवत्याः नाम् किम्। अहं वेदवतीं पृच्छामि। भवतः नाम् किम्। अहं शुशीलेन्द्रम् पृच्छामि। रमानन्दः- रमानन्दम्
वित्तकोषम्/विद्यालयम्/मंदिरम्/पुस्तकम्/मालविकाम्/शुशीलाम्/कूपीम्/ घटीम्/अङ्गुलीम्। अहं भगवतगीतां पठामि। अहं रामायणं/काव्यं/महाभारतं/सुन्दरकाण्डं/सुभाषितं पठामि।
अहं विद्यालयं गच्छामि। भवन्तः कुत्र-कुत्र गच्छन्ति। अहं मुम्बई/तिरुपति नगरं गच्छामि।
अहम् अरण्यं गच्छामि।
माधवः ग्रामं/मथुरां/वाटिकां/पुरीं/दिल्लीं गच्छति।
इदानीं भवन्तः वाक्यं वदन्तु। कः-कः कुत्र गच्छतेति। पवित्रा चलचित्रमन्दिरं/इन्द्रलोकं गच्छति।
बालकः आपणं गच्छति। गणेशः विदेशं/नगरं/वनं/वाटिकां/नदीं गच्छति।
(अनुवर्तते)
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11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)
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