भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

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Friday, August 01, 2008

'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ )३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर


एहि तरहेँ समय बितैत गेल। बाहर एनाइ-गेनाइ किछु कम भैये गेल छल। तकर बाद दूटा घटना भेल। एक तँ छल गङ्गा पुलक उद्घाटन। आऽ दोसर छमाही परीक्षामे नन्दक दुनू बेटा पहिल बेर प्रथम स्थान प्राप्त नञि कए सकल छलाह। एकर बाद नन्द असहज होमए लगलाह। ओना एहि दुनू घटनामे कोनो आपसी सम्बन्ध नहि छल मुदा नन्दक अन्तर्मनक जे हुलिमालि छलन्हि से बढ़ए लगलन्हि। आब ओऽ किएक तँ सरकारी तन्त्रसँ न्याय नञि पाबि सकल छलाह आऽ पुत्र लोकनि सेहो पढ़ाईमे पिछड़ि गेल छलन्हि, से अदृश्य शक्तिक प्रति हुनक आशक्ति फेरसँ बढ़ए लगलन्हि। सभ परिणामक कारण होइत छैक आऽ कारणक निदान जखन दृश्य तन्त्र द्वारा नञि होइत अछि, तखन अदृश्यक प्रति लोकक आकर्षण बढ़ि जाइत छन्हि। आऽ नन्द तँ अदृश्यक प्रति पहिनहिसँ, बाल्यकालेसँ आकर्षित छलाह।
“नन्द छथि”?
एक गोट अधवयसू, मुँहक दाँत पान निरन्तर खएलासँ कारी रंगक भेल, पातर दुबर पिण्डश्याम रंगक, नन्दक घरक ग्रील खटखटा कए पुछलन्हि।

“नहि। ऑफिससँ नहि आयल छथि, मुदा आबैये बला छथि। भीतर आउ, बैसू”। नन्दक बालक कहलखिन्ह।
“हम आबि रहल छी कनेक कालक बाद”।
किछु कालक बाद नन्द सुरसुरायल अपन धुनमे, जेना ओऽ अबैत छलाह, बिना वाम-दहिन देखने, घर पहुँचलाह। पाछाँ लागल ओहो महाशय घर पहुँचलाह। नन्द हुनका देखि बाजि उठलाह-
“शोभा बाबू। कतेक दिनुका बाद”।
“चिन्हि गेलहुँ”। शोभा बाबू बजलाह।
आऽ एकर उत्तरमे नन्द बैसि गेलाह आऽ हुनकर आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबय लगलन्हि।
“एह बताह, अखनो धरि बतहपनी गेल नञि अछि”। शोभाबाबूक अन्तर्मन एहि तरहक आदर पाबि गदगद भए रहल छल।
शोभाबाबू छलाह कछबी गामक। नन्दक सभसँ पैघ बहिनक दिअर। बहिन बेचारी तँ मरिए गेल छलीह, भगिनी नन्दक गाम मेहथक मामागाममे पेट दुखएलासँ अकस्माते काल-कवलित भए गेल छलीह। नन्दक बहिनौउ बढ़िया चास-बला घोड़ापर चढ़ि लगान वसूली लए निकलैत छलाह। मुदा भगिनीक मुइलाक बाद बहिनौउसँ सम्बन्ध कम होइत गेल छलन्हि। कोनो जानि बुझि कए नहि वरन् अनायासहि। आऽ आइ पचीस सालक बाद शोभाबाबूसँ पटनामे भेँट भेल छलन्हि।

“ओझाजी कोना छथि। हमरासभ बहुत कहलिअन्हि जे दोसर विवाह कए लिअ मुदा नहि मानलन्हि”।
“आब ओऽ पुरान चास-बास खतम भए गेल। जमीन्दारी खतम आऽ चास-बास सेहो। मुदा खरचा वैह पुरनके। से खेत बेचि-बेचि कतेक दिन काज चलितए। सभ बाहर दिस भागए लागल। मुदा हम कहलिअन्हि जे अहाँ हमरा सभसँ बहुत पैघ छी, बहुत सुख देखने छी, से अहाँ बाहर जाए कोनो छोट काज करब से हमरा सभकेँ नीक नहि लागत”।
शोभा बाबू कंठमे पानक पात आबि जएबाक बहन्ना कए चुप भए गेलाह मुदा सत्य ई छल जे हुनकर आँखि आऽ कंठ दुनू भावातिरेकमे अवरुद्ध भए गेल छलन्हि। किछु काल चुप रहि फेर आगाँ बाजए लगलाह-
“से कहि बिना हुनकर औपचारिक अनुमति लेने घरसँ चूड़ा-गूड़ लए निकलि गेलहुँ। रने-बने सिमरिया स्नान कए नाओसँ गंगापार कएलहुँ आऽ सोहमे पटना पहुँचि गेलहु। पहिने एकटा चाहक दोकानपर किछु दिन काज कएलहुँ। ओहि दिनमे पटनामे अपन सभ दिसका लोक ओतेक मात्रामे नहि रहथि।अवस्थो कम छल। फेर कैक साल ओतए रहलहुँ, बादमे पता चलल जे एहि बीच गाममे तरह-तरहक गप उड़ल। जे मरा गेल आकि साधु बनि गेल शोभा। फेर जखन अपन चाहक दोकान खोललहुँ तखन जाऽ कए गाम एकटा पोस्टकार्ड पठेलियैक। आब तँ बीस सालसँ बी.एन.कॉलेजिएट स्कूल लग चाहक दोकान चला रहल छी। ओतहि पानक सेहो स्टॉल लगा देने छियैक”।
“सभटा दाँत टूटि गेल शोभा बाबू”।
“चाहक दोकानमे रहैत-रहैत चाह पीबाक हिस्सक भए गेल। मुदा ताहिसँ कोनो दिक्कत नहि भेल। मुदा जखन पानक दोकान आबि गेल तखन गरम चाह पिबियैक आऽ ताहिपरसँ ठंढ़ा पान दाँत तरमे धए दियैक से ताहिसँ गरम-सर्द भेलासँ सभटा दाँत टूटि गेल”।
एहि गपपर नन्द आऽ शोभा बाबू दुनू गोटे हँसि पड़लाह।
फेर गप-शप चलए लागल। शोभाक भौजी तँ मरि गेल छलीह मुदा जौँ भतीजी जिबैत रहितथि तँ मेहथ कछबीक बीच संबंध जीवित रहैत, मुदा जे विपत्ति आएल तँ सभटा एके बेर। नन्दकेँ मोन पड़लन्हि जे भगिनी केलाइत छलीह पड़ोसमे आऽ आबि कए नन्दक माएकेँ कहलन्हि जे फलना-अँगनाक फलना पेटपर हाथ राखि देलकन्हि आऽ तखने तेहन पेट-दर्द शुरू भेलन्हि जे कतबो ससारल गेलन्हि तैओ नहि ठीक भेलन्हि आऽ नन्दक आँखिक सोझाँमे बचियाक रहस्यमयी मृत्यु भए गेलैक।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

एहि घटनाक चरचा बहुत दिन धरि होइत रहल। नन्दक आदर अपन नीचाँक कर्मचारीक बीच एहि घटनासँ बढ़ि गेल छलन्हि, मुदा आब ठिकेदार आऽ अभियन्ता लोकनिक बीच नन्द रावण बनि गेल छलाह।
सभ टा चीज ठीक-ठाक चलि रहल छल। नन्दक बच्चा सभ गणित आऽ विज्ञानक अंकगणितीय प्रश्न सभ जनबरीसँ मार्च धरि बना लैत छलन्हि। मुदा घरक सभ काज किएक तँ नन्द स्वयं कए लैत छलाह, नन्दक बच्चा सभ स्कूल गेनाइ आऽ घर अएनाइक अतिरिक्त्त बाहरी दुनियासँ अनभिज्ञ छलाह। कतओ घुमए जाथि तँ नन्दक संगे, एक तरहेँ बुझू जे नन्दक बच्चा सभक व्यक्त्तित्व एकटा विभिन्न प्रकारसँ निर्मित भए रहल छलन्हि। नञि तँ कोनो दोस्त-महीम, नञि तँ कोनो दोस्तक घर अएनाइ-गेनाइ। ओहि समयमे मीडिअम वेभक एकटा जापानी ट्रांजिस्टर नन्दक घरमे छलन्हि, वैह मनोरंजनक एकमात्र साधन छल। हुनकर बच्चा सभ एकरा रेडियो कहैत जाइ छलाह, आऽ नन्द बुझबैत छलखिन्ह जे रेडियो बड्ड पैघ होइत अछि, ट्रांजिस्टर आकारमे छोट होइत अछि। नन्द जखन नोकरी शुरू कएने रहथि तँ बुश कम्पनीक एकटा रेडियो गाम लए गेल छलाह। सौँसे टोलबैय्याक भीड़ जुमि गेल छल रेडियो सुनबाक लेल। ओऽ जापानी मीडिअम वेभ रेडियो मझोला आकारक बैटरीसँ चलैत छल, खूब बैटरी खाइत छल ई ट्रांजिस्टर। बैटरी प्रायशः महिनाक दस तिथि धरि चलैत छल। बैटरी एक महिनामे एक बेर अबैत छल, महिनबारी किरानाक वस्तुजातक संग। से नन्दक बच्चा लोकनिक मनोरंजनक ओऽ साधन महिनामे बीस दिन काज नहि करैत छल, आऽ ताहि लेल बच्चा सभ पलंगक दुनू कात दू टा गोल पोस्ट बनबैत छलाह। ई गोल पोस्ट प्लास्टिकक एक-दोसरामे जुड़य बला खेल सामग्रीसँ बनैत छल, ई खेल सामग्री पता नहि कतेक दिनसँ घरमे पड़ल छल, प्रायः गंगा ब्रिज कॉलोनीमे क्यो गोटे देने छलखिन्ह। नन्दक दुनू बेटा दुनू दिशि ककबाक स्टिकसँ खेलाइत छलाह। ए बी सी डी क कचकाराक खेल सामग्री बॉल बनैत छल। खेलक निअम सेहो भिन्न छल। मात्र एक शॉटमे एक गोल पोस्टसँ दोसर गोल पोस्टमे गोल करए पड़ैत छल। एहि तरहक कैकटा नूतन क्रीड़ाक जनक छलाह नन्दक दुनू पुत्र।
नन्द सामान्य जीवन व्यतीत कए रहल छलाह, मुदा गंगा पुलक कोनो चरचा हुनकर अन्तरमनमे हुलिमालि शुरू कए दैत छलन्हि।

(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )३.उपन्यास/ सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

नन्दक दुनू बेटा वर्गमे प्रथम अबैत छलन्हि। किछु दिन धरि सभटा ठीक-ठाक चलैत रहल। पुरनका सभटा चिन्ता-फिकिर लगैत छल जेना खतम भए गेल होए। गामक एक दू गोटे सेहो पटनामे रहैत छलाह। महिनामे एकटा रवि निश्चित छल, जाहि दिन सभ गोटे कतहु घुमए लेल जाइत छलाह। एक रवि कोनो गौँआक अहिठाम तँ कोनो आन बेर चिड़ियाखानाक यात्रा। एक बेर चिड़ियाखाना गेल रहथि सभ गोटे तँ आरुणि नन्दकेँ पुछलखिन्ह- “हमरा सभ आयल छी चिड़ियाखाना, बाहरमे बोर्ड लागल अछि बोटेनिकल गार्डेनक आऽ गेटक ऊपरमे लिखल अछि बायोलोजिकल गार्डेन”।
“पहिने सोनपुरमेला सभमे अस्थायी चिड़ै सभक प्रदर्शन होइत छल आऽ लोकक जीह पर ओकरा लेल चिड़ियाखाना शब्द आबि गेल। मुदा एतए तँ कताक बीघामे वृक्ष सभ लागल अछि, प्रत्येक वृक्ष पर ओकर नाम आऽ वनस्पतिशास्त्रीय विवरण सेहो लिखल अछि, आऽ ताहि द्वारे एकर नाम अंग्रेजीमे वनस्पति उद्यानक लेल बोटेनिकल गार्डन पड़ि गेल। मुदा बादमे अनुभव कएल गेल जे जन्तु आऽ वनस्पतिक रूपमे दू तरहक जीवविज्ञान अछि। एहि उद्यानमे वनस्पति, चिड़ै आऽ बाघ-सिंह इत्यादि सेहो प्रदर्शित अछि। ताहि द्वारे एकर नाम बायोलोजिकल गार्डन वा जैविक उद्यान दए देल गेल। पुरनका बोर्ड जतए-ततए रहिये गेल”।
एक बेर सभ गोटे गेल रहथि एकटा गौँआक अहिठाम। ओतए चर्चा चलए लागल जे गंगा पुल केर उद्घाटन दू तीन सालसँ एहि साल होयत, अगिला साल होयत एहि तरहक चरचा अछि।
नन्दसँ ओऽ लोकनि पुछलखिन्ह, “अहाँक बुझने कहिया धरि एहि पुलक उद्घाटन भए जएतैक। मुख्यमन्त्री तँ कहने छथि जे एहि साल एकर उद्घाटन भए जएतैक”।
“कहियो नहि होएतैक। दू-तीन सालसँ तँ सुनि रहल छियैक। यावत एकटा पाया बनैत छैक, तँ ओहिमे ततेक न बालु देने रहैत छैक जे किछु दिनमे दरारि पड़ि जाइत छैक। फेर राता-राती ओकरा तोड़ि कए फेरसँ नव पाया बनेनाइ शुरू करैत जाइत अछि”।
गंगा पुलक चरचा सुनि नन्दक सोझाँ पाया परसँ गंगाजीमे खसैत जोन-मजदूर सभक चित्र नाचि जाइत छलन्हि। नन्दक विवाद ओहि समय ठिकेदार आऽ संगी अभियन्ता सभसँ काजक संबंधमे होइत रहैत छलन्हि। एकटा पायाक कार्यक संबंधमे नन्द अपन विरोध प्रकट कएने छलाह, किछु दिनुका बाद ओऽ पाया फाटि गेल, एकटा पैघ दरारि पड़ि गेल छल बीचो-बीच। राता-राती ठिकेदार-अभियन्ता लोकनि ओकरा तोड़बेलन्हि। रातिमे कतहुसँ ओतेक विशाल पाया टूटि सकैत छल? से अगिला दिन दरारिक स्थान पर तिरपाल बिछाओल गेल, जे ककरो नजरि नहि पड़ि जाइ।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ ३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

नन्दक अव्यव्स्थाक विरुद्ध शुरू कएल गेल संघर्ष किछु दिनका विराम लेने छल। गाममे बच्चा सभ डेढ़ साल रहल छलन्हि, दरमाहा बहुत दिन धरि बन्द छलन्हि। गाममे पैघ भाय एकटा भावी राजनीतिज्ञकेँ कहि कए नन्दक पदस्थापन क्षेत्रीय काजसँ हटा कए ऑफिसमे चित्र परियोजना डिजाइनमे करबाए देने छलखिन्ह। संगे ईहो कहने छलखिन्ह जे अपन ऑफिस जाऊ आऊ आऽ बच्चा सभ पर ध्यान दिअ। सभसँ मिलि जुलि कए रहू।
नन्द पटना आबि कए भायक सभ गप पर ध्यान देने छलखिन्ह। पटनामे बेटीक कॉलेजमे नामांकन करबाए महाविद्यालयक पार्श्वमे किराया पर घर ताकलन्हि। दुनू बेटाक नामांकनक हेतु प्रवेश परीक्षा केर फॉर्म सभ भरबाय सभकेँ पटना बजा लेलखिन्ह। भातिजकेँ कहलखिन्ह जे सभकेँ लए कए आबि जाऊ, आऽ पहलेजाघाटमे बिहार सरकारक स्टीमर पकड़बाक सेहो आदेश देलखिन्ह। कारण एकटा निजी स्टीमर बच्चा बाबूक सेहो चलैत छल, मुदा ओऽ बेशी पसेन्जर लए कऽ चलैत छल, संगहि सरकारी स्टीमर अपन समयसँ चलैत छल, ओहिमे पैसेंजर होए वा नहि। सरकारी स्टीमरमे यात्रीक संख्या सीमित छल ताहि हेतु टिकट केर नियमित हिसाब छाल आऽ सभ यात्रीक बीमा होइत छल, ई बात निजी स्टीमरमे नहि छल।
भातिजक सग पत्नी आऽ पुत्र-पुत्री सभ आबि गेलखिन्ह। गंगा ब्रिज कॉलोनीमे नन्द एकाकी रहैत छलाह। परिवारक लोककेँ सेहो आसपड़ोससँ बेशी मेल-जोल करबाक अनुमति नहि देने छलाह। मुदा पटनामे सभटा उनटि गेल छल। पड़ोसमे एकटा रिटायर्ड फौजी छलाह, एकटा बिहार सरकारक पुलिस छलाह आ एकटा बिहार सचिवालयक कर्मचारी। नन्द दुनू बेटाकेँ लए अगिला दिन तीनू गोटेक घर गेला आऽ सभसँ नमस्कार-पाती करबओलखिन्ह। बेटा-बेटी सभ स्कूल जाए लागल छलन्हि। नन्द पाँच किलोमीटर ऑफिस पएरे जाथि आऽ घुरती काल घरक काज-उद्यम सेहो करैत आबथि, जेना बृहस्पतिकेँ हाट लगैत छल, तँ ओतएसँ हरिएर-तरकारी, चाउर दालि इत्यादि आनब ई सभ। हाट रविक छुट्टीक दिन सेहो लगैत छल, आऽ ओहू दिन अपने जाऽ कए सभ टा घरक काज करैत छलाह। बच्चा सभक काज मात्र पढ़बा धरि सीमित छल। दूध पैकेट बला अबैत छलन्हि, कारण उठाना दुहबाए कए अनबामे बच्चा सभक पढ़ाईमे भाँगठ पड़ैत। बड़का बेटा जे गगा ब्रिज कॉलोनीमे कहियो ककरो फूल उखाड़ि लैत छल आऽ कहियो ककरो खिड़की पर गिट्टी फेंकि दैत छल, डेढ़ सालक ग्राम प्रवासक बाद शान्त भए गेल छलन्हि। नन्दकेँ मोन छन्हि जे कॉलोनीमे एक बेर बेटाकेँ लए कए पड़ोसीक ओहिठाम गेल छालाह आऽ पड़ोसीक पत्नीसँ बेटा क्षमा याचना कएने छलखिन्ह, कारण कार्यालयसँ अएला उत्तर ज्ञात भेल छलन्हि, जे बेटा हुनका पर गिट्टी फेँकने छलखिन्ह, जखन ओऽ बेचारी खिड़की लग ठाढ़ि बाहर दिशि किछु देखि रहल छलीह। छोट बेटा कोनो पैघ बच्चाकेँ पाथर फेंकि कए मारने छलखिन्ह, जखन ओऽ बच्चा साइकिल पर चढ़ल छल, भेल ई छल जे ओऽ पैघ बच्चा कॉलोनीक एक चक्कर काटि कए सायकिल लौटेबाक अपन वचनक पालन नहि कएने छल आऽ घुरलाक बाद दोसर चक्कर लगाऽ कए अबैत छी ई बजैत-बजैत सायकिल लए आगू बढ़ि रहल छल। छोटका बेटा क्षमा याचना करबासँ सेहो मना कए देने छलखिन्ह कारण ओऽ सोचैत छलाह जे हुनकर कोनो गलती नहि छलन्हि। बेश तखन एहि बेर बच्चा सभकेँ जखन नन्द पड़ोसी सभसँ भेँट करबाबए लेल गेल छलाह तावत धरि बड़का बेटा तँ पूर्णतया पन चञ्चल स्वभावक विपरीत स्वभावक भए गेल छलाह, मुदा छोट बेटा अपन स्वभाव पर दुराग्रह करैत स्थिर छलाह।
(अनुवर्तते)

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर


आब ओऽ छौड़ा कानय खीजय लागल, आऽ पैघ वर्गक कोनो बदमाश विद्यार्थीकेँ बाजाबए हेतु गेल। फेर घुरि कए जे आयल तँ ओकर कानब-खीजब बन्न भए गेल छलैक, हमरा कहलक जे हमर भाग्य नीक अछि जे जकरा ओऽ बजाबए गेल छल से आइ स्कूल नहि आएल अछि।
दू तीन दिन धरि हम ई गुन-धुन करैत रहलहुँ जे ओऽ ओहि बदमाशकेँ बजाऽ कए नहि आनि लए। ओहिना किछु दिनुका बाद ओकरा फेर कोनो दोसर छौड़ासँ झगड़ा भेलैक आऽ ओहि दिन ओऽ हीरो छौड़ा स्कूल आएल छल। हमरे सोझाँमे ओऽ हमर कक्षामे आएल आऽ एक फैट पेटमे दोसर विद्यार्थीकेँ मारलकैक। क्यो बचबए लेल तँ नहि गेलैक मुदा बादमे जखन एकटा क्लासमे शिक्षक नहि अएलाह आऽ विद्यार्थी सभ खाली गप शप कए रहल छल तखन एहि बातक निर्णय भेल जे आब ओहि विद्यार्थीसँ क्यो गप नहि करत आऽ क्लास टीचरसँ एहि गपक शिकाइत कएल जायय जाहिसँ ओऽ ओहि बदमाश विद्यार्थीक क्लास टीचरकेँ एहि घटनाक विषयमे बताबथि। आब ओऽ पिनकाह विद्यार्थी शुक-पाक करए लागल।फेर ओहि विद्यार्थीक लग गेल ओकरा कान भड़ि कए आयल जे सभ ओकरा विरुद्धमे चालि चलि रहल अछि। ओऽ बदमाश आबि कए सभकेँ उठबाक लेल कहलक, मुदा क्यो नहि उठल। तख्न ओऽ हमरा कहलक जे उठू। हम उठि गेलहुँ आऽ तखन ओहिना एक-एक कऽ कए तीन चारि गोते केँ उठेलक आऽ फेर सभकेँ उठबाक लेल कहलक। सभ उठि गेल। तखन सभकेँ धमकी देमय लागल। मुदा एहि बेर हमर सभक क्लास मोनीटर किछु हिम्मतसँ काज लेलक आऽ ओकरा ओहि छौड़ाक विषयमे कहए लागल। हमरा देखाय कए कहलक जे एकरा देखैत छी? कनियो बदमाश लगैत अछि, एकरो अहाँक नाम लऽ कए दबाड़ि रहल छल। ओऽ छौड़ा तँ हुण्ड छल से ओकर पारा चढ़ि गेलैक आऽ हमर वर्गक पिनकाहा छौड़ाकेँ चेतौनी देलकैक जे आइ दिनसँ कनैत खिजैत ओकरा लग नहि आओत आऽ ओकर नाम लऽ कए ककरोसँ झगड़ा नहि करत।
एहिना स्कूल चलि रहल छल आकि एक दिन एकटा छौड़ा वर्गमे पिहकी मारि देलकैक। ओऽ छौड़ा बीचहिमे बम्बई भागि गेल छल बाल कलाकार बनि कए। घुरि कए आयल तँ वर्ग शिक्षक पुछलन्हि जे किएक घुरि अएलहुँ तँ कहलकन्हि जे सभ कहलक जे एतय तँ सभ बी.ए., एम.ए. अछि, अहाँ कमसँ कम मैट्रिको कए लिअह। आब पिहकीक बाद वर्ग शिक्षक पढ़ाइ छोड़ि कए ओकर अन्वेषणमे लागि गेल। पिहकी कोन दिशिसँ आयल। बहुमतक आधार पर एक कातकेँ छाँटि देल गेल। आब आगूसँ आयल आकि पाछूसँ। ताहि आधार पर सेहो एकटा बेंच निर्धारण भए गेल। ओहि बेंच पर छह गोटे छलाह। आब ई निर्धारण होमए लागल जे बाम कातसँ आयल आकि दहिनसँ। फेर छहमे सँ दू गोटेक निर्धारण बहुमतक आधार पर कएल गेल। ओहिमेसँ एकटा हमरा लोकनिक बम्बइया हीरो छलाह, जनिकर बम्बइक खिस्सा टिपिनसँ लऽ कए लीजर क्लास धरि चलैत रहैत छल। मुदा एहि दुनू गोटेमे १:१ केर टाइ भए गेल कारण क्यो मानए हेतु तैयार नहि जे पिहकी के मारलन्हि।
एकर बाद डायरी खाली छल। नन्द बेटाकेँ बजा कए डायरी दए देलन्हि आऽ मात्र ई कहलन्हि जे पढ़ाई पर ध्यान दिअ। एहि बात पर लज्जित होएबाक कोनो बात नहि छल मुदा आरुणिकेँ हुनकर भाए बहिन एहि गपक लेल बहुत दिन धरि किचकिचाबैत रहलाह। अस्तु एक दिन ओऽ डायरीकेँ फाड़ि देलन्हि, आऽ ई आत्मकथात्मक उपन्यास पूर्ण होएबासँ पहिनहि खतम भए गेल।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 3.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

3.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर


“काका यौ, हम नहि लगेलिअन्हि कबकबाउछ”। ई गप कहैत हमर आँखिमे नोर आबि गेल छल। बनाइकेँ किछु गोटे छौड़ा सभ दलान पर सुतलमे कबकबाउछ लगा’ देने छलन्हि। कलम दिशिसँ खेला-कुदा कए सभ आबि रहल छल। महारक कातमे कबकबाउछक पात तोड़लक, आ’ एकर पातकेँ चमड़ा पर रगड़लासँ होयबला पऋणाम पर चर्चा होमय लागल। क्यो अपन चमड़ा पर लगेबाक हेतु तैयार नहि छल से दलान पर बनाइकेँ सुतल देखि हुनके देह पर पात रगड़ि देलकन्हि। पाछाँसँ हम अबैत छलहुँ आ’ सभ छौड़ातँ निपत्ता भए गेल, बनाइक नजरि हमरा पर पड़लन्हि। से ओ’ काकाकेँ कहि देलखिन्ह। काका हमर कोनो गप नहि सुनलन्हि आ’ दस बेर कान पकड़ि कए उट्ठा-बैसी करबाक सजा भेटल। संगहि साँझमे संगी सभक संग खेलेबाक बदला काका आ’ हुनक भजार सभक संग खेत पथारक दिशि घूमबाक निर्णय भेल जाहिसँ हमर बदमस्ती कम होय।

बाढ़िक समय छल।नाओ पर बाढिक दृश्य आ’ सिल्लीक शिकार। बादमे तँ एकर शिकार पर सरकार प्रतिबंध लगा’ देलक। मुदा मोन हमर टाँगल रहल गाम परक कल्पित खेल सभक दिशि, जे हमर सभक संगी सभ खेलाइत होयताह। ई छल पहिल दिन।
दोसर दिन बेरू पहर धरि हम एहि प्रत्याशामे छलहुँ, जे आइ फेरसँ काकाक संग जाए पड़त। ओना संगी सभकेँ हम ई भास नहि होमय देलियैक जे हम एको रत्ती चिन्तित छी, आ’ नाओ आ’ सिल्लीक खिस्सा सभ तन्मयतासँ सुनैत रहलाह। मुदा हमर मुखाकृति देखि कए काका पुछलन्हि, जे आइ हमरा सभक संग जएबाक मोन नहि अछि? तँ हम नञि नहि कहि सकलियन्हि। मुदा फेर अपनाकेँ सम्हारैत कहलियन्हि, जे मोन तँ गामे पर लगैत अछि। तखन काकाकेँ व्दया लागि गेलन्हि, आ’ एहि प्रतिबन्धक संग की हम बदमस्ती नहि करब हमरा गाम पर रहबाक छूटि भेटि गेल।

गाममे डेढ़ साल धरि रहलहुँ, आ’ जखन बाबूजीक ट्रांसफर पटना भ’ गेलन्हि, तखन बड़का भैयाक संगे पहलेजाघाट आ’ महेन्द्रूघाट द’ कए पटना आबि गेलहुँ। ओतय स्कूल सभमे प्रवेश परीक्षा होइत छल आ’ बाबूजी भायकेँ छठासँ सतमाक हेतु आ’ हमरा पँचमासँ छठा आ’ सतमा दुनू वर्गक हेतु प्रवेश परीक्षामे बैसओलन्हि। आ’ तकरा बाद हमरा बुझायल जे किएक हमरा बाबूजी पचमेमे छठाक विज्ञान आ’ गणित पढ़ि लेबाक हेतु कहने छलाह। प्रवेश परीक्षामेमे ईएह दुनू विषय पूछल जाइत छल।
अस्तु हमरा छठा आ’ सतमा दुनू वर्गक हेतु आ’ भाएकेँ सतमाक हेतु चयन जिला स्कूलमे भए गेल। फेर शहरक सरकारीयो स्कूलमे ड्रेस छलैक। से दुनू गोटे बाबूजीक संग दोकान गेलहुँ आ’ ड्रेस सियाओल गेल, दू-दू टा हाफ पैंट आ’ एक-एकटा अंगा। स्कूलक पहिलुके दिन मारि होइत-होइत बचल। एकटा चौड़ा हमरा देहाती कहल तँ से तँ हमरा कोनो खराप नहि लागल। ओहि उम्रमे देहाती शब्द हमरा नीके लगैत छल, मुदा आइ सोचैत छी तँ ओ’ ई शब्द व्यंग्यात्मक रूपेँ कहने छल। फेर जखन ओ’ देखलक जे ई तँ नहि खौँझायल तखन बंगाली-बंगाली कहनाइ शुरू कएलक। हम दुनू भाइ पातर दुबर आ’ शुभ्र-शाभ्र चिक्कन-चुनमुन लगैत छलहुँ, ताहिओ द्वारे ओ’ हमरा सभकेँ बंगाली बुझि रहल छल। हम ई व्यंग्य नहि सुनि सकलहुँ, आ’ ओकरा दिशि मार-मार कए छुटलहुँ। भाइ बीच-बचाओ कएलक।
(अनुवर्तते)
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विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 4.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

4.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर


गणित आ’ विज्ञानक अतिरिक्त्त कोनो आन विषयकेँ नहि तँ हम एक बेरसँ दोसर बेर पढ़ैत छलहुँ आ’ नहिये एहि हेतु मास्टर साहेबे कहैत छलाह। कोनो विद्यार्थीकेँ मास्टर साहेब इतिहास आ’ नागरिक शास्त्रक किताबकेँ एकसँ दोसर-तेसर बेर पढ़ैत देखि जाइत छलाह तखन तँ ओहि विद्यार्थीक नामे ओहि विषयसँ पड़ि जाइत छल। आब ओ’ गणितो पढ़त तँ ओकरा सुनय पड़तैक जे बाबू ई इतिहास नहि छियैक, जे कंठस्थ कए रहल छी। सैया-निनानबे अनठानबे- सन्तानबे-छियानबे-पनचानबे कहैत-कहैत आ’ बोराक आसनीकेँ बरषाक समयमे छत्ता बनओने पाँच चारि तीन दू एक-एक-एक करैत भागैत विद्यार्थी सभ। कहियो छुट्टीक दिन जौँ कबड्डी खेलाबय काल मास्टर साहेब साइकिल पर चढ़ल देखा पड़थि, तँ कबड्डी-कबड्डी, मास्टर साहेब प्रणाम कबड्डी-कबड्डी कहैत भागैत विद्यार्थी। आ’ एहने एकटा घटनामे हम मास्टर साहेबकेँ ठाढ़ भ’ कए साँस तोड़ि कए प्रणाम कएने रहियन्हि आ’ एहि क्रममे विपक्षी पार्टी द्वारा लोकि लेल गेल छलहुँ, तँ एहि पर कोइलख बला मास्टर साहेब प्रसन्न भेल रहथि, आ’ एकर चर्चा स्कूलमे सभक समक्ष कएने रहथि।

बुझु जे गामक प्रवास बादक समयमे एकटा पैघ संबल सिद्ध भेल छल।खड़ाम पहिरि कए गतिसँ दौगैत रही, फेर बर्षामे आरि पर पिच्छड़ पर खड़ाम पहिरि कए दौगैत रही।पिच्छड़ पर खड़ाम नहि पिछड़ैत छल। बादमे हवाइ चप्पलक आगमन भेलाक बाद कतेक गोटे खसि-खसि कए डाँर पर गरम पानिक भाप लैत छलाह। अगिलही, किरासन तेलक लाइन, रोशनाइक गोटी, लबनचूस, रबड़क बॉल, ओधिक गेंद, पसीधक रसक विषसँ पोखरिमे माछ मरलाक बाद भेल दू टोलक बीचमे बाझल मारि, बाढ़िक दृश्य देखबाक लेल जुटल भीड़,छोट-छोट गप पर होइत पंचैती, आमक मासक आमक जाबीसँ बहराइत गछपक्कू आमक छटा, ई सभ टा अलोपित तँ नहि भ’ जायत।

(अनुवर्तते)
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Saturday, July 26, 2008

विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)

2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
आ’ नियत तिथिकेँ शुरू भेल दानवीर दधीची नाटक।स्कूल खुजबासँ किछु काल पहिनहि हम सभ पहुँचि गेलहुँ स्कूल। बरण्डाक एक कोनमे गाम परसँ आनल चद्दरिक पर्दा बनल। रस्सी ठीकसँ नहि लागि सकल से ईएह निर्णय भेल चद्दरिकेँ ऊपर उठा-खसा कए काज निकालल जाएत।तकरा बाद कलाकार सभ अपन अप ड्रेस पहिरए लगलाह। ड्रेस की छल मात्र पाउडर लगा’ कय आ’ गमछा, धोती पहिरि कय सभ सभ तरहक ड्रेस पहिरि लेलक। जाहि मास्टरसाहेबक ड्यूटी लागल छल नाटकक संचालनक हेतु, हुनका कोनो आवश्यक कार्य मोन पड़ि गेलन्हि, से ओ’ ओहि दिन छुट्टी मारि देलन्हि। गामक पैघ तुरियाकेँ तावत बुझबामे आबि गेलैक,जे प्राइमरी स्कूलक छौड़ा सभ नाटक क’ रहल अछि। से तुरत्तेमे दस टा पैघ बच्चा सभ जूटि गेल आ’ पिहकारी देनाइ शुरू क’ देलन्हि। हम सभ कलाकारकेँ कहलियन्हि, जे ई सभ उत्तेजित क’ कय हमर सभक नाटककेँ दूरि करत। मुदा छोटे भाइ भीड़ि गेलाह।कहय लगलाह जे हे बौआ सभ, हम नाटकक ड्रेसमे छी, तेँ ई नहि बुझू जे मारि नहि करब। एखने ड्रेस फेकि-फाइक क’ हम सभ कर्म क’ दइ जायब अहाँ सभकेँ। मुदा पिहकी पारनहारक संख्यामे घटती नहि भेल। आ’ छोटे भाइ बाजि उठलाह जे छोड़ू आइ एहि नाटककेँ। हिनका सभक बदमस्ती हम एखने ठीक करैत छी। आ’ खुट्टा उखाड़ि कय दौड़लाह। तावत थाम्ह-थोम्ह करय बलाक जुमान भ’ गेलैक आ’ तकरा संगहि नाटक दानवीर दधीची जे हमर लिखल छल आ’ जकर मंचनक निर्देशन हम करए बला छलहुँ, बीचहिमे खतम भ’ गेल। किछु दिन धरि छोटे भाइसँ मूहा-फुल्ली रहल। ओ’ आबथि आ’ कहथि जे की करू, तामस उठि गेल छल। ओहो सभ अतत्तह क’ देने छल। फेर किछु दिनुका बाद सभटा सामान्य भ’ गेल। रामलीलाक आ’ नाटकक भूत सेहो एहि घटनाक बाद हमरा परसँ उतरि गेल।
(अनुवर्तते)

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE   I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...