भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
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Monday, July 28, 2008
'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक२.शोध लेखमायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
पुरोहित
मायानन्दजी महाभारतक समस्याक समाधानमे सेहो पाश्चात्य विचारक लोकनिक अनुसरण करैत बुझना जाइत छथि। प्रोफेसर वेबर पहिल बेर एहि सिद्धांतकेँ लए कए आयल छलाह। ओऽ अपन विचार व्यक्त कएने छलाह जे ८८०० पद्यक जय संहिता छल आऽ पहिने युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आऽ शल्य पर्व) मात्र छल। ओकर आधार ओऽ बनेने छलाह एकटा श्लोककेँ-
अष्टौश्लोक सहस्राणि..... अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा
संजय, व्यास आऽ शुक तीनू गोटे ८८००-८८०० प्रत्येक कए भारतक श्लोक मात्र यादि कए सकल छलाह। माने भारत एतेक विशाल छल जे प्रत्येक गोटे सम्पूर्ण यादि नहि कए सकल छलाह, आऽ ताहि दृष्टिसँ भारत कहियो २६४०० श्लोकसँ कम नहि छल, जकरा व्यास लिखने छलाह। जय संहिता भारत आऽ महाभारत दुनूकेँ कहल जाइत छैक। युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आऽ शल्य पर्व) तेना नञि परस्पर पुरान पर्व सभसँ जुड़ल अछि, जे बिना पछिला पर्व पढ़ने अगिलाक कोनो भाँज नहि लगैत छैक। इलियडक युद्ध १० साल धरि चलल छल, आऽ इलियड मात्र ट्रॉयक घेरा धरि सीमित छल, मुदा महाभारत बहुत पहिने सँ १८ दिनुका युद्धक कारणसँ शुरु होइत अछि।भीष्म पर्व छठम पर्व अछि, द्रोण पर्व सातम, कर्ण पर्व आठम आऽ शल्य पर्व नवम। तकरा बाद ९ टा पर्व आर अछि।
किएक तँ कैक बैसारीमे महाभारत केर पाठ सुनाओल जाइत छल ताहि द्वारे ई स्वाभाविक अछि जे पुरान पाठ सभ जे भए चुकल छल केर फेरसँ पुनःस्मरण बेर-बेर कएल जाइत छल। ताहिसँ ई अर्थ निकालब जे ई क्षेपक अछि, अनर्गल होयत। तहिना गीता सेहो पाश्चात्य विद्वान लोकनिक लेल क्षेपक अछि कारण ओऽ लोकनि भारतीय संस्कृति, साहित्य आऽ कलाक अनुभव विदेशी मानसिकतासँ करबाक कारण गलती करैत छथि। विदेशी विद्वान ई मानबामे कष्ट अनुभव करैत छथि जे महाभारत ओतेक पुरान भेलाक बादो ओतेक वृहत् अछि, आऽ इलियड ओकर सोझाँ किछु नहि अछि। से एक गोट पद्यक वेबर द्वारा कएल गेल मिथ्या व्याख्याक आधार पर जय संहिता केर संकल्पना आयल। मात्र भारत आऽ महाभारत केर रूपमे एहि महाकाव्यक विकासकेँ बिना कोनो कारणसँ जय संहिता, भारत आऽ महाभारत रूपी तीन चरणमे प्रस्तुत कएल गेल। महाभारत केर सभसँ छोट रूपमे सेहो २४६०० सँ कम श्लोक नहि छल, आऽ जय संहिता भारत आऽ महाभारतकेँ सम्मिलित रूपसँ कहल जाइत छल।
स्त्रीधन
(अनुवर्तते)
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )२.शोध लेखमायानन्द मिश्रक इतिहास बोधप्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
पुरोहित
पुरोहित हिन्दीमे अछि आऽ शृखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि।
पुरोहित केर आरम्भ दूर्वाक्षत आशीर्वचन मंत्रसँ होइत अछि। शुक्ल यजुर्वेदक अध्याय २२ केर मंत्र २२ “ॐ आब्रह्मन…” सँ “नः कल्प्ताम्” धरि अछि। मिथिलामे एहि मंत्रक संग अन्तिममे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव”॥ एकर सेहो मंत्रोच्चार होइत अछि, आऽ एहि अन्तिम दू श्लोकसँ ई मंत्र आशीर्वचनक रूप लए लैत अछि। कारण यजुर्वेदीय २२/२२ मंत्र सौसेँ भारतमे देशभक्त्ति गीतक रूपमे मंत्रोच्चारित होइत अछि। तकर बाद लेखकीय प्रस्तावना जकरा पुरोहितमे विनियोगक नाम देल गेल अछि, केर प्रारम्भ होइत अछि। पुरोहित शतपथ ब्राह्मणकालीन समाज पर आधारित अछि।
विनियोगमे पूर्व आऽ उत्तर वैदिक युग, महाभारत काल इत्यादिक काल निर्धारण पर चरचा कएल गेल अछि। संन्यास आऽ मोक्ष धारणाक प्रवेश, सूत्र साहित्य, आरण्यक आऽ उपनिषद आऽ ब्राह्मण ग्रंथक रचनाक सेहो चरचा अछि।कर्मणा केर बदलामे जन्मना सिद्धांतक प्रारम्भ आऽ शूद्र शब्दक उद्भव, नगरक, आहत मुद्राक, उद्योगक सुदृढ़ीकरणक आऽ लोहाक प्रयोगक सेहो चरचा भेल अछि। फेर मायानन्द जी ई लिखि जाइत छथि, जे दाशरज्ञ युद्ध ई.पू. १८०० मे भरत आऽ कुशिक-कस्साइटक सम्मिलित समूह सरस्वती तटसँ व्यास नदी पार करैत इलावृत पर्वत प्रदेश होइत ओऽ लोकनि कोशल मिथिलाक राजतंत्रक, कुरु-पांचालक संस्कृतिक विकसित होएबासँ पूर्वहि, स्थापना कएने छलाह।
पुरोहित तेरह टा सर्गमे विभक्त्त अछि आऽ एकर अन्त उपसंहारसँ होइत अछि। प्रथम सर्ग दक्षिण पांचालक कांपिल्यनगरसँ शुरू होइत अछि। अथर्वणपल्लीक पशुशाला, साँझ होइत देरी उठैत धुँआक चरचा अछि। मेधा आऽ कुशबिन्दुसँ कथा आगू बढ़ैत अछि। ऋषि गालबक आश्रममे ऋगवेदकेँ कंठाग्र कराएल जएबाक आऽ बादमे जाऽ कए कृषि संबंधी शिक्षा देल जएबाक वर्णन अछि।
दोसर सर्गमे राजा प्रवाहण जैबालिक मूर्ख पुत्र द्वारा ब्राह्मणक अपमानक, प्रथम श्रोत्रिय आऽ दोसर पुरोहित ब्राह्मणक वर्णन अछि।
तेसर सर्गमे आचार्य चाक्रायणक अपमानक कारण पुरोहित वर्ग द्वारा पौरहित्य कर्म नहि करबाक निर्णयसँ प्रजाजनक दैनिक अग्निहोत्र कार्य, आऽ बिना लग्नक कृषि आऽ वाणिज्य कार्यमे होय बला भाङठक वर्णन अछि।
चतुर्थ सर्गमे व्यास कथा आऽ भारत युद्धक चर्चा अबैत अछि आऽ एतय मायानन्द जी पाश्चात्य दृष्टिकोणक अनुसरण करैत छथि। जय काव्यकेँ भारत युद्ध कथाक रूप दए देल गेल- ई वक्त्तव्य अनायासहि दए रहल छथि मायानन्द मिश्र।
पाँचम सर्गमे वैश्य द्वारा उपनयन संस्कार छोड़बाक चरचा अछि, मुदा क्षत्रिय पुत्र आऽ पुत्री दुनूक उपनयन करैत छलाह। वैश्य कन्या शिक्षासँ दूर जाऽ रहल छलीह आऽ ब्राह्मण कन्या गुरुकुलक अतिरिक्त पितासँ शिक्षा लए रहल छलीह। ब्राह्मणकेँ पौरहित्यसँ कम समय भेटैत छलन्हि।
छठम सर्गमे ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अथर्व वेदकेँ नहि मानबाक चरचा अछि।
सातम सर्गमे अथर्वनपल्लीमे अथर्ववेदीय संस्कारक शिक्षा आऽ प्रथम श्रेणीक ब्राह्मण द्वारा ओतए नहि जएबाक चरचा अछि।
आठम सर्गमे इद्रोत्सवमे रथदौड़, अश्वारोहण, मल्लयुद्ध, असिचालन, लक्ष्यभेद आऽ विलक्षण अनुकृतिक चरचा अछि, आऽ व्यासपल्लीक लोक द्वारा अनुकृति करबाक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे व्रात्य करुष भारत युद्धक कथा कहि रहल छलाह। भारत युद्धक बहुत पूर्व भरत, त्रित्सु, किवी आऽ सृंजय मिश्रित जनक आर्यव्त्तमे शूद्र नामसँ सुमेरियाक जियसूद्रक स्मृतिमे अपनाकेँ गौरव देबाक हेतु सूद्र कहबाक वर्णन अछि।
नवम सर्गमे तन्तुवाय द्वारा स्त्री निमित्त वस्त्रमे तटीयता देल जएबाक कारण भेल अन्तरक चरचा अछि, पहिने ई अन्तर नहि छल। अथर्वण आऽ याज्ञिक ब्राह्मणमे भेदक चरचा अछि।
दशम् सर्गमे शिश्नदेवक पूजा अनार्य द्वारा होएबाक आऽ अथर्वण पुरोहित द्वारा एकर अनभिज्ञताक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे अक्षर लिपिक प्रयोग आऽ आचार्य गालबक श्रुति आश्रममे अंक लिपिक अतिरिक्त्त किछु अन्य देखब वर्जित होएबाक गप कहल गेल अछि।
एगारहम सर्गमे गालब आश्रममे दण्डनीति पर चरचा निषिद्ध होएबाक बादो दक्षिण पांचालक सभासदक आग्रह पर एतद संबंधी चरचा होएबाक गप अछि। राजा शिलाजित द्वारा राजपद प्रधान पुरोहितकेँ देबाक चरचा अछि।
बारहम सर्गमे भारत युद्धक बाद नियोग प्रथाक अमान्य भऽ बन्द भऽ जएबाक बात अछि। शिश्नदेवक शिवदेवसँ एकाकारक चरचा सेहो अछि।
तेरहम सर्गमेक्रैव्यराजक अभिषेक उत्सवक चरचा अछि। दूर्वाक्षत मंत्रमे
“ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव” आऽ दीर्घायुर्भव केर मेल शुक्ल यजुर्वेदक २२/२२ मंत्रसँ कए दूबि अक्षत लए विशेष लए ताल गति यति मे गएबाक वर्णन अछि। अनुवाद सेहो मायानन्द जी देने छथि, जे ग्रिफिथक अनुवादसँ प्रेरित अछि।
समस्त विश्वमे ब्राह्मण विद्याक तेजक वर्चस्व स्थापित करए बला, सर्वत्र, वाण चएबामे निपुण, निरोगि, महारथी, शूर, यजमान राज्य सभक जन्म होए, सर्वत्र अधिकाधिक दूध दएबाली धेनु होए, शक्तिशाली वृषभ होए, तेजस्वी अश्व होए, रूपवती सध्वी युवती होथि, विजयकामी वीरपुत्र होथि, जखन हम कामना करी पर्जन्य वर्षा देथि, वनस्पतिक विकास होए, औषधि फलवती आऽ सभ प्राणी योगक्षेमसँ प्रसन्न रहथि।राजन शतंजीवी होथि।
क्रैव्यराजक अभिषेकक लेल ई मंत्र हाथमे अक्षत, अरबा, ब्रीहि आऽ दूर्वादल लए आऽ मंत्र समाप्ति पश्चात राजा पर एकरा छीटबाक आऽ फेर दहीक मटकूरीसँ दही लए महाराजक भाल पर एहिसँ तिलक लगएबाक वर्णन अछि। एहि प्रकरणमे मायानन्द जी लिखैत छथि, जे एहि मंत्रक, जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत मंत्र कहल जाइत अछि, रचना याज्ञवल्क्य द्वारा वाजसनेयी संहिताक लेल कएल गेल। एहि मंत्रक उपयोग मिथिलामे उपनयनक अवसर पर बटुकक लेल आऽ विवाहक अवसर पर वर-वधुककेँ आशीर्वचनक रूपमे प्रयुक्त होए लागल।
पुरोहितक अन्त होइत अछि उपसंहारसँ। एतय वर्णित अछि, जे काशीक रस्ताक अनार्य ग्रामक आर्यीकरण भेल आऽ व्रात्यष्टोम यज्ञ भेल। शिश्नदेवाः पर चरचा अछि, शुनःशेष आख्याण आऽ भारत कथाक कहबाक परम्पराक प्रारम्भ आऽ मगध् द्वारा आर्य धर्मक प्रति वितृष्णाक चर्च सेहो अछि।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Sunday, July 27, 2008
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ २.शोध लेखमायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि आदि गप पोथीक समाप्ति पर ऋचालोकमे मायानन्द जी लिखैत छथि। किछु पाश्चात्य विद्वान सेहो ऋगवेदक दार्शनिक महत्त्वकेँ कम करबाक लेल ई गप कहैत छथि जे यूनानमे देवतत्र पूर्ण रूपसं पल्लवित छल मुदा ऋगवेदिक समाज घुमतु छल आऽ देवतंत्र ताहि द्वारे विकसित नहि छल। ओऽ लोकनि ई सेहो कहैत छथि जे ऋगवेदक रचना अश्व पर घुमतु जीवन यापित केनहार पश्चिमी आक्रमणकारी कएने छथि। ऋगवेदिक कवि लोकनि आरंभिक सामूहिक संपत्ति आऽ रक्त्त संबंध आधारित गणसमाज दुनूसँ परिचित छलाह मुदा स्वयं ओहिसँ बाहर आबि गेल छलाह आऽ व्यक्त्तिगत आऽ कुटुम्बक संपत्तिक आधार बला व्यवस्था शुरू कए देने छलाह। संपत्ति पुरुष केंद्रित आऽ परिवार पितृसत्तात्मक छल। मुदा मातृसत्तात्मक व्यवस्थाकेँ ओऽ बिसरल नहि छलाह, कारण ओऽ आपः मातरः कहि बहुवचनमे जलदेवीक उपासना आऽ स्मरण करैत छथि, संगहि मरुतगण सदिखन गणक रूपमे स्मरण आऽ उपासना करैत छथि।
आब जाऽ कए एंगेल्स कहैत छथि जे यूनानमे मातृसत्तासँ पितृसत्ता प्राचीन कालक सभसँ पैघ क्रान्ति छल। ई क्रान्ति ऋगवेदिक कालमे घटित भए गेल छ्ल। श्रमक वैशिष्टीकरणसँ उत्पादनमे गोत्रक भूमिका घटि जाइत अछि, आऽ कुटुम्बक बढ़ि जाइत अछि। गण, गोत्र, कुल आऽ कुटुम्बक क्रमशः विकास सामूहिक भूसंपत्तिक संगठनसँ होइत अछि। ऋगवेदमे कुम्भकार, कमार(काष्ठकार), लोहार आऽ धातु शिल्पक चर्च अछि। प्राचीन ईरानमे असुरक प्रतिरूप अहुरक प्रयोग भेल, ओऽ लोकनि एकर उपासक छलाह, मुदा असुर-उपासक भारतीय जनक प्रभाव ईरान धरि सीमित छल, आगाँ एकर प्रसार नहि भेल। भारतमे असुर दुष्ट छथि मुदा ईरानमे देव दुष्ट छथि। असुरक गरिमा सम्पूर्ण ऋगवेदमे अछि। कोनो मण्डल एहन नहि अछि जाहिमे कोनो एक वा आन देवताकेँ असुर नहि कहल गेल होए। मुदा एहनो असुर छथि जे देवक विरोधमे छथि आऽ इन्द्रसँ एहन अदेवाः असुराः केर नाशक हेतु आह्वाण कएल गेल अछि।इन्द्रक समान अग्नि सेहो असुरक नाश करैत छथि आऽ इन्द्र आऽ बृहस्पति दुनू गोटे स्वयं असुर छथि। असुर देवताक उपाधि छल। ऋगवेदमे देव आऽ असुरक सदृश असुर एकट भिन्न वर्ग छल, मुदा असुर श्वास लैत छला मुदा देव नहि। देवसँ असुर बेशी प्रचीन छथि, ताहि द्वारे असुर वरुण देव आऽ मनुष्य दुहूक राजा छथि।
पुरोहित
पुरोहित हिन्दीमे अछि आऽ शृखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० २.शोध लेखमायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
द्वितीय मण्डलमे राजाक समिति द्वारा एहि गपक लेल पदच्युत कएल जएबाक चर्चा अछि, कि धेनुक चोरिक बादो गव्य-युद्ध ओऽ नहि कएलन्हि।अभिषेकक सङ्ग राजा सेहो प्रायः निश्चित होमए लगलाह आऽ कौलिक परम्परा चलि गेल। पहिने समितिक निर्णयक बादे क्यो समर्थन-याचनामे जाइत छलाह, राजदण्ड सम्हारैत छलाह। धेनुक हरण कएने छल अनास दस्यु सभ। सुवास्तु, क्रुमु, वितस्ता आऽ अक्खनीक तट पर श्रुति अभ्यास आऽ युद्ध-कार्य संगहि चलैत छल, एके संग ब्राह्मण, क्षत्रिय आऽ वैश्य कर्म करैत छथि, मुदा सरस्वतीक तट पर बात किछु दोसरे भऽ गेल, ऋषिग्राम फराक होमय लागल। सभटा अनास दस्यु दास बनि गेल आऽ दासीसँ आर्यगणक संतान उत्पन्न होमय लगलन्हि। दासीपुत्र लोकनिकेँ तँ गाममे घर बनेबाक अनुमति चलन्हि मुदा अनास दस्युकेँ ओऽ अनुमति नहि छलन्हि। एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह आऽ अनास दस्यु ओकनिक संपर्कसँ सूतक वस्त्र आऽ लवणक प्रयोग सिखलन्हि। एहि दुनू चीजक आपूर्त्ति एखनो अनास लोकनिक हाथमे छलन्हि। अनार्य लोकनिक संपर्कसँ अपन शब्द कोश बिसरबाक आऽ तकर संकलनक आवश्यकताक पूर्त्तिक हेतु निघण्टुक संकलनक चर्चा सेहो अछि। गंधर्व विवाहक सेहो चर्चा अछि।
तृतीय मण्डल
अग्निष्टोम यज्ञक चर्चा अछि। छागर आऽ महीँसक बलि केर चर्च अछि।
माँस-भात महर्षि लोकनिकेँ प्रिय लगलन्हि, तकर चर्चा अछि, मुदा भातक बदला गहूमक सोहारीक प्रचलन एखनो बेशी होएबाक चर्चा अछि।
चतुर्थ मण्डल
राजाक अभिषेक यज्ञक चर्चा आऽ ओहिमे अरिष्टनेमिक ब्रह्मा बनबाक चर्चा अछि। ग्रामणी, रथकार, कम्मरि, सूत, सेनानी सेहो यज्ञमे सम्मिलित छलाह।
’अति प्राचीन कालमे सृष्टि जलमय छल!’ एकर चर्चा मायानन्द मिश्रजी नहि जनि ऋगवेदिक युगमे कोन कए देलन्हि।
पञ्चम मण्डल
अश्वारोहन प्रतियोगिताक चर्चा अछि। अनास दास-रंजक नाट्यवृत्तिक चर्चा सेहो अछि। राजा द्वारा एकर अभिषेक कार्यक्रममे स्वीकृति आऽ एकर भेल विरोधक सेहो चर्चा अछि। दासकेँ स्वतंत्र कृषि अधिकार आऽ एकरा हेतु विदथक अनुमति राजा द्वारा लेल जाए आकि नहि तकर चर्चा अछि।
षष्ठ मण्डल
महावैराजी यज्ञक चर्चा अछि। समस्त दस्यु ग्रामक दास बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि, आऽ ओऽ सभ पशुपालन आऽ पणि कार्य कऽ सकैत छथि। नग्नजितक प्रसंग लए मंत्र गायन केनिहार ब्राह्मण, गविष्ठि युद्ध कएनिहार क्षत्रिय आऽ एक्र अतिरिक्त्त जे कृषि विकासमे बेशी ध्यान दैत छालाह से विश- सामान्य जन छलाह मुदा एहिमे मायानन्द जी वैश्य शब्द सेहो जोड़ि देने छथि।
सप्तम मण्डल
बर्बर उजरा आर्यक आक्रमणक चर्चा आब जाऽ कए भेल अछि। प्रायः विदेशी विशेषज्ञक संग मायानन्द जी सेहो पैशाची आक्रमणकेँ बादमे जाऽ कए बूझि सकलाह आऽ एकरा सेहो आर्यक दोसर भाग बना देलन्हि। आर्य हरियूपियाकेँ डाहि कए नष्ट कए देने छलाह एकर फेर चर्च आबि गेल अछि। मोहनजोदड़ो आतंकसँ उजड़ि गेल, फेर भूकम्पो आयल ताहूसँ नगर ध्वस्त भेल। आब मायानन्दजी ओझड़ायल बुझाइत छथि। वर्षा कम होएबाक सेहो चर्चा अछि।
अष्टम् मण्डल
ऋषिग्रामक चर्चा अछि। कुलमे दास आऽ दासी होएबाक संकेत अछि। वृषभ पालनक सेहो संकेत अछि। मंत्र-पुत्रक ग्रामांचल चलि जएबाक आऽ विशः-वैश्य बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि। मुदा आगाँ मायानन्दजी ओझराइत जाइत छथि। कश्यप सागर तटसँ प्रस्थान-पूर्व द्यौस आऽ त्वराष्ट्री केर गौण देव भऽ जएबाक चर्चा अछि। ब्राह्मण आऽ क्षत्रियक विभाजन नहि होएबाक चर्च अछि आऽ क्यो कोनो कर्म करबाक हेतु स्वतंत्र छल। देवासुर संग्राम आऽ हेलमन्द तटक युद्ध आऽ पशुपालनक चर्चा अछि। पश्चात ब्रह्मण आऽ क्षत्रियक कर्मक फराक होयब प्रारम्भ भए गेल। पश्चात् मंत्र-द्रष्टा ऋषि द्वारा मंत्रमे देवक आऽ अपन नाम रखबाक प्रारम्भ भेल- एकर चर्चा अछि।श्रुति अभ्यासक प्रारम्भ होएबाक चर्चा अछि कारण मंत्रक संख्या बढ़ि गेल छल।
नवम् मण्डल
वस्तु विनमयक हेतु हाट व्यवस्थाक प्रारम्भ भेल। हाटमे मृत्तिका प्रभागमे दास-शिल्पीक पात्रक उपस्थिति आऽ वस्त्र प्रभागक चर्चा अछि। मृत्तिका, हस्ति-दन्त, ताम्र सीपी आदिक बनल वस्तुजातक चर्चा अछि। शिशु-रंजनल्क वस्तु जात- जेना हस्ति, वृषभ आदिक मूर्त्तिक, लवणक, अन्नक, काष्ठक आऽ कम्बलक बिक्रीक चर्चा अछि।
दशम् मण्डल
श्वेत-जनक आगमनक -बर्बर श्वेत आर्य- सूचना नागजनकेँ भेटबाक चर्चा अछि। नाग ज्न द्वारा अपन दलपतिकेँ राजा कहल जायब, नागक पूर्व-कालमे ससरि कए यमुना तट दिशि आयब आऽ ओतुका लोककेँ ठेल कए पाछाँ कए देबाक सेहो चर्चा अछि।कृष्ण जनक काष्ठ दुर्ग आऽ नागक संग हुनका लोकनिकेँ सेहो अनास कहल गेल अछि। मुदा क्ष्ण लोकनि दीर्घकाय छलाह आऽ नागजन कनेक छोट। एहि मण्डलमे दासक संग शूद्रक आऽ गंगा तटक सेहो चर्चा आबि गेल अछि। आर्य, दास आऽ शूद्रक बीचमे सहयोगक संकेत अछि।
अंतमे ऋचालोक नामसँ भूमिका लिखल गेल अछि। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि, हित्ती मित्तानी चलल, आऽ आर्य पूर्व दिशा दिशि बढ़ल आदिक आधार पर लिखल ई मंत्रपुत्र ऐतिहासिकताक सभटा मानदण्ड नहि अपनाऽ सकल।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 2.शोध लेखमायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रजी साहित्यकारक दृष्टिकोण रखितथि आ’ पाश्चात्य इतिहासकारक गॉसिपसँ बचितथि तँ आर्य आक्रमणक सिद्धांतकेँ नकारि सकितथि। सरस्वतीक धार ऋगवेदक सभ मंडलमे अपन विशाल आ’ आह्लादकारी स्वरूपक संग विद्यमान अछि। सिन्धु आकि सरस्वती नदी घाटीक सभ्यता तखन खतम आकि ह्रासक स्थितिमे आएल जखन सरस्वती सुखा गेलीह। अथर्ववेदमे सेहो सरस्वती जलमय छथि। ऋगवेदमे जल-प्रलयक कोनो चर्च नहि अछि, आ’ अथर्ववेदमे ताहि दिशि संकेत अछि। भरतवासी जखन पश्चिम दिशि गेलाह, तखन अपना संग जल-प्रलयक खिस्सा अपना संग लेने गेलाह। जल-प्रलयक बाद भरतवासी सारस्वत प्रदेशसँ पूब दिशि कुरु-पांचालक ब्रह्मर्षि प्रदेश दिशि आबि गेलाह।
सरस्वती रहितथि तँ बात किछु आर होइत, मुदा सुखायल सरस्वती एकटा विभाजन रेखा बनि गेलीह, आर्य-आक्रमणकारी सिद्धांतवादी लोकनिकेँ ओहि सुखायल सरस्वतीकेँ लँघनाइ असंभव भ’ गेल।
सिन्धु लिपिक विवेचन सेहो बिना ब्राह्मीक सहायताक संभव नहि भ’ सकल अछि।
ग्रिफिथक ऋगवेदक अनुवादक पादटिप्पणीमे पहिल बेर ई आशंका व्यक्त्त कएल गेल जे आर्य आक्रमणकारी पश्चिमोत्तरसँ आबि कए मूल निवासीक दुर्ग तोड़लन्हि। दुर्गमे रहनिहार बेशी सभ्य रहथि। 1947 मे ह्वीलर ई सिद्धांत ल’ कए अएलाह जे विभाजित पाकिस्तान सभ्यताक केन्द्र छल आ’ आर्य आक्रमणकारी विदेशी छलाह। एकटा भारतीय विद्वान रामप्रसाद चंद ताहिसँ पहिने ई कहि देने रहथि, जे एहि नगर सभक निवासी ऋगवेदक पणि छलाह। मुदा मार्शल 1931 ई मे ई नव गप कहने छलाह जे आर्यक भारतमे प्रवेश 2000 ई.पूर्व भेल छल, आ’ तावत हड़प्पा आ’ मोहनजोदड़ोक विनाश भ’ चुकल छल। 1934 मे गॉर्डन चाइल्ड कहलनि जे आर्य आक्रमणकारी संभवतः भ’ सकैत छथि। 1938 मे मकॉय मोहनजोदाड़ोक आक्रमणकेँ नकारलन्हि, किछु अस्थिपञ्जड़क आधार पर एकरा सिद्ध कएनाय संभव नहि। डेल्स 1964 मे एकटा निबन्ध लिखलन्हि ‘द मिथिकल मसेकर ऑफ मोहंजोदाड़ो’ आ’ आक्रमणक दंतकथाक उपहास कएलन्हि।तकर बाद ह्वीलर 1966 मे किछु पाँछा हटलाह, मुदा मकॉयक कबायलीक बदलामे सभटा आक्रमणक जिम्मेदारी बाहरा आर्यगण माथ पर पटकि देलन्हि। आब ओ’ कहए लगलाह जे आर्य आक्रमणकेँ सिद्ध नहि कएल जा’ सकैत अछि, मुदा जौँ ई संभव नहि अछि, तँ असंभव सेहो नहि अछि। स्टुआर्ट पिगॉट 1962 तक ह्वीलरक संग ई दुराग्रह करैत रहलाह। पिगॉट आर्यकेँ मितन्नीसँ आएल कहलन्हि। नॉर्मन ब्राउनकेँ सेहो पंजाब प्रदेशक शेष भारतक संग सांस्कृतिक संबंधक संबंधमे शंका रहलन्हि। संस्कृत आ’ द्रविड़ भाषाक अमेरिकी विशेषज्ञ एमेनो लिखलन्हि जे सिन्धु घाटी कखनो शेष भारतसँ तेना भ’ कए सांस्कृतिक रूपसँ जुड़ल नहि छल। जे आर्य ओतय अएलाह सेहो ईरानी सभ्यतासँ बेशी लग छलाह।
मुदा पॉर्जिटर 1922 मे भरत साहित्यिक परम्परासँ सिद्ध कएलन्हि जे भारत पर आर्यक आक्रमणक कोनो प्रमाण नहि अछि। ओ’ सिद्ध कएलन्हि, जे भारतसँ आर्य पश्चिम दिशि गेलाह आ’ तकर साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध अछि। लैंगडन सेहो कहलन्हि जे आर्य भारतक प्राचीनतम निवासी छलाह आ’ आर्यभाषा आ’ लिपिक प्रयोग करैत छलाह। ब्रिजेट आ’ रेमण्ड ऑलचिन आ’ कौलीन रेनफ्रीव आदि विद्वान प्राचीन भारतक पूर्वाग्रह विश्लेषण कएने छथि।
मितन्नी शासक मित्र, वरुण, इन्द्र आ’ नासत्यक उपासक छलाह। हित्ती राज्यमे सेहो वैदिक देवता लोकनिक पूजा होइत छल।आलब्राइट आ’ लैंबडिन सेहो दू हजार साल पहिने दक्षिण-पश्चिम एशियामे इंडो आर्य भाषा बाजल जाइत छल आ’ संख्यासोचक शब्द सेहो भारतीय छल।
ई लोकनि भारतीय छलाह आ’ ऋगवेदक रचनाक बाद भारतसँ बाहर गेल छलाह। बहुवचन स्त्रीलिंग रूप ऋगवेदक देवगणक विशिष्ट रूप अन्यत्र उपलब्ध नहि अछि। इंडो योरोपियन देवतंत्रमे भारतीय देवीगणक विरलता पूर्ववर्त्ती भारतीय मातृसत्तात्मक व्य्वस्थाक बादक योरोपीय परवर्त्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्थाक परिचायक अछि।
आब आऊ सुमेरक जल प्रलय पर, जेकि 3100 ई.पू. मे मानल जाइत अछि। भारतीय कलि संवत 3102 ई.पू. मानल जाइत अछि। अतः एहि तिथिसँ पूर्व ऋगवेदक पूर्ण रचना भ’ गेल छल।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक3.शोध लेख मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ , भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवेदिक तत्त्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ’ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाय लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन, आदि सभ्यता आ’ मित्तनी आ’ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहि ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भ’ गेल छल।
मायानन्दजीक एहि सीरीजक दोसर रचना मंत्रपुत्र अछि। एहिमे ऋगवैदिक आधार पर जीवन-दर्शनकेँ राखल गेल अछि।
ऋगवेद 10 मंडलमे (आ’ आठ अष्टकमे सेहो) विभक्त्त अछि। मायानन्द मिश्रजी मंडलक आधार पर मंत्रपुत्रक विभाजन सेहो 10 मण्डलमे कएलन्हि अछि। एहि पुस्तकक भूमिकाक नाम अछि, ऋचालोक आ’ ई पुस्तकक अंतमे 10म मण्डलक बाद देल गेल अछि।
प्रथम मण्डलमे काक्षसेनी पुत्री ऋजिश्वाक चर्च अछि, संगहि ऋतुर्वित पुत्री शाश्वतीक सेहो। जन सभा आ’ जन-समिति द्वारा राजाकेँ च्युत करबाक/निर्वासन देबाक आ’ दोसर राजाक निर्वाचन करबाक चर्चा सेहो अछि। नेत्रक नील रंग रहबाक बदला श्यामल भ’ जयबाक चर्चा आ’ एकर कारण खास तरहक विवाहक होयबाक चर्चा सेहो भेल अछि।वितस्ता तटसँ कृष्ण सभक निरन्तर उपद्रवक चर्चा सेहो अछि।सुवास्तु तटसँ रक्त्त मिश्रणक प्रक्रियाक वर्णन अछि। गोमेधकेँ वर्जित कएल जाय, ई विचार विमर्श कएल जाय लागल। दासक चर्चा सेहो अछि। हरिपूपियापतन आ’ ओकर विभिन्न नगर सभ उजड़ि जयबाक चर्चा अछि आ’ पश्चात् बल्बूथ द्वारा अनार्य सभक ध्वस्त वाणिज्य व्यवस्थाकेँ संगठित करबाक चर्चा अछि।
द्वितीय मण्डलमे
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Saturday, July 26, 2008
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे
पुरातात्त्विक ,भाषावैग्यानिक आ’ साहित्यिक साक्ष्य एहि पक्षमे अछि,जे आर्य भारतक मूल निवासी छलाह। आर्य भाषा परिवारक नामकरण मैक्समूलर द्वारा कएल गेल छल। द्रविड़ परिवारक नामकरण पादरी रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा कएल गेल छल।आर्यक आक्रमणक सिद्धांत आयल ग्रिफिथक ऋग्वेदक अनुवादमे देल गेल फूटनोटसँ। पहिने तँ ई बात जे ई नामकरण विदेशी विद्वान द्वारा देल गेल छल, ताहि द्वारे ओकर अपन उद्देश्य होयतैक।
सरस्वती नदी,जल-प्रलय, मनु, आ’ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ’ देवतंत्रक विकास एहि सभटाक समाजशास्त्रीय विकासक विश्लेषन आर्य लोकनिक भारतक मूल निवासी होयबाक साक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
ऋग्वेदमे मात्र्सत्तात्मक व्यवस्थाक स्मृतिक रूपमे बहुवचन स्त्रीलिंगक प्रयोगक बहुलता अछि।
सघोष आ’ महाप्राण ऋग्वेदिक आ’ भारतीय भाषाक ध्वनिक प्रतिरूप नहि तँ ईरानी आ’ नहिये यूरोपीय भाषा सभमे भेटैत अछि। सरस्वती आ सिन्धु धारक बीचक सभ्यता छल आर्यक सभ्यता। सरस्वती धारक तटवर्त्ती भरत, पुरु आ’ अन्य गण सभ मिलि कए ऋगवेदक रचना कएलन्हि। सरस्वतीमे जल-प्रलयक बाद ई सभ्यता सारस्वत प्रदेश सँ हटि कए कुरु-पांचाल आ’ ब्रह्मर्षि प्रदेश-मध्यदेश- पहुँचि गेल। इतिहासमे भरत लोकनिक महत्त्व समाप्त भ’ गेल। एहि जल प्रलयक बाद आर्यजन लोकनिक वंशज लोकनि मोहनजोदड़ो आ’ हड़प्पा नगरक निर्माण कएलन्हि। हड़प्पा सभ्यताक 800 मे सँ 530 सँ ऊपर स्थान, एहि लुप्त सरस्वती धारक तट पर अवस्थित छल। सिन्धुक धार पर एहि स्थल सभक बड्ड कम निर्भरता छल, आ’ जखन सरस्वतीमे पानिक प्रवाह घटल तँ एहि सभ केन्द्रक ह्रास प्रारम्भ भ’ गेल।
पहिने सरस्वतीमे जल-प्रलयसँ आर्यक पलयन भेल(ऋगवेद आ’ यजुर्वेदक रचनाक बाद) आ’ फेर सरस्वतीमे पानि कमी भेलासँ दोसर बेर आर्यक पैघ पलायन भेल(अथर्ववेदक रचनाक पहिने)।अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहि तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ’ नहिये यूरोपमे। फेर ई रह, भारतीय देवनाम,शिल्प,कथा, अश्वविद्या,संगीत, भाषिक तत्त्व आ’ चिंतनक संग उद्घाटित होमय लागल पश्चिम एशिया, मिश्र, आ’ यूनानमे।
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(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Friday, July 25, 2008
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
अ सँ ह तक वर्णमाला अछि। क्ष, त्र ,ज्ञ ओनातँ संयुक्त्त अक्षर अछि, मुदा बच्चेसँ हमरा सभ अ सँ ज्ञ तक वर्ण्मालाक रूपमे पढ़ने छी। श्र सेहो क्ष, त्र, ज्ञ जेकाँ संयुक्त अक्षर अछि। ज्ञ केर उच्चारण ताहि द्वारे हमरा सभ ग आ’ य केर मिश्रण द्वारा करैत छी से धरि गलत अछि। ई अछि ज आ’ ञ केर संयुक्त । ऋ केर उच्चारण हमर सभ करैत छी, री। लृ केर उच्चारण करैत छी, ल, र आ’ ई केर संयुक्त्त। मुदा ऋ आ’ लृ स्वयं स्वर अछि, संयुक्ताक्षर नहि। विदेहक आर्काइवमे एहि बेर सँ शुद्ध उच्चारणक आवश्यकताकेँ देखि कय अ सँ ज्ञ तक सभ वर्णक उच्चारण देल गेल अछि।एकरा डाउनलोड क’ अपन आ’ अपन बच्चाक हेतु प्रयोग कए सकैत छी। मैथिली अकादमीक भाषाक मानकीकरणक प्रयासमे सहयोग करबाक दृष्टिसँ ओकरा द्वारा निर्धारित मानककेँ रचना लिखबासँ पहिने कॉलममे आन नव रचनाक संग स्थायी रूपसँ देल जायत, जेना अ सँ ज्ञ केर .mp3फाइल आर्काइवमे स्थायी रूपसँ डाउनलोडक हेतु उपलब्ध रहत। मैथिली अकादमीक ई आग्रह जे संख्याक देवनागरी रूप प्रयोग कएल जाय, केर प्रयोग रूप देबाक हेतु सभ एकमत नहि क्ह्हथि, भारतीय अंकक अंतर्राष्ट्रीय रूपक प्रयोगक देवनागरीमे चलन भ’ गेल अछि। ताहि द्वारे रचना लिख्बासँ पहिने स्तंभमे जे भाषाक मानकीकरणक संस्तुति अछि, ताहिमे देवनागरी अंकक प्रयोगक आग्रहकेँ हटा देल गेल अछि। भारतीय संविधानक अनुच्छेद 343(1) कहैत अछि जे संघक राजकीय प्रयोजनक हेतु प्रयुक्त होमय बला अंकक रूप, भारतीय अंकक अंतर्राष्ट्रीय रूप होयत, मुदा राष्ट्रपति अंकक देवनागरी रूपकेँ सेहो प्राधिकृत क’ सकैत छथि।
(अनुवर्तते)
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।
हरकिसन अध्यायक प्रारम्भ 3400 वर्ष पूर्व होइत अछि।कृषि विकासक संग स्थायी निवासक प्रवृत्ति बढ़य लागल। आ’ तकरा बाद परिवारक रूप स्पष्ट होमय लागल। कृषि-विकाससँ वाणिज्य विस्तारक आवश्यकता बढ़ल। ऊनक वस्त्र, चक्की, भीतक घर आ’ इनारक घेराबा बनय लागल।
किसन अध्यायक प्रारम्भ 3300 ई.पूर्व भेल। श्रम-बेचबाक प्रारम्भ भेल। पटौनीक प्रारम्भक संग कृषि-विकास गति पकड़लक। भूगोल जानकारी भेलासँ वाणिज्य बढ़ल। अलंकारक प्रवृत्ति बढ़ल।
हरप्पा:मोहनगाँव अध्याय 3200 वर्ष पूर्व देखाओल गेल अछि।श्रम-बेचबाक हेतु काठक टोलक उदाहरण अबैत अछि। अलंकार प्रवृत्ति बढ़ल। गोलीक मालाक संक कुम्हारक चाक सेहो सम्मुख आयल। समाजमे वर्ग विभाजनक प्रारम्भ भेल।
गणेषक श्रीगणेष अध्याय 3100 ई. पूर्व प्रारम्भ भेल। दक्षिणांचल लोकक आगमन बाद हरप्पा हुनका ल्कनिक द्वारा बनेबाक चर्च लेखक करैत छथि। मोहनजोदड़ो, लोथल आ’ चान्हूदोड़ोक विकास व्यापारिक केन्द्रक रूपमे भेल। लिपि, कटही गाड़ी आ’ मूर्त्तिकलाक आविष्कार भेल आ’ वस्तु विनिमयक हेतु हाट लागय लागल।मेसोपोटामियाक जलप्लावन आ’ सुमेरी आ’ असुरक आगमनक चर्चा लेखक करैत छथि।
किश्न अध्यायक प्रारम्भ 3000 ई.पू. सँ भेल। विदेश व्यापारक आरम्भ भेल। तामक आविष्कार भेल। कृषि दासत्वक सेहो प्रारम्भ भेल। बाढ़िसँ सुरक्षाक हेतु ऊँच डीह बनाओल जाय लागल।
महाजन अध्याय 2800 पू. प्रार्म्भ होइत अछि। नगरक प्रारम्भ वाणिज्यक हेतु भेल। नहरि पटौनीक हेतु बनाओल जाय लागल। डंडी तराजूक आविष्कार आवश्यकता स्वरूप भेल। प्रकाशक व्यवस्थाक ब्योँत लागल।
मंडल अध्यायमे चर्च 2600 ई.पू.क छैक। संस्था निर्माण, विवाह व्यवस्था आ’ दूरक यात्राक हेतु पाल बला नावक निर्माण प्रारम्भ भेल।
किश्न मंडल अध्याय 2400 ई.पू. केर कालखण्डसँ आरम्भ कएल गेल अछि। एहिमे वर्षाक अभावक चर्चा अछि। आर्यक पूर्व दिशामे बढ़बाक चर्चासँ लोकमे भयक सेहो चर्चा अछि। मंडल:मंडली अध्याय 2200 ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल। आर्यक आगमनक आ’ वर्षाक अभाव दुनूकेँ देखैत लोथल वैकल्पिक रूपसँ विकसित होमय लागल।
पतन:पुरंदर: एहि अध्यायक कालखण्ड 2000 ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल अछि। आर्यक राजा द्वारा पुरकेँ तोड़ि महान केंद्र हड़प्पाकेँ ध्वस्त करबाक चर्चासँ मायानन्द जी अपन पहिल किताब ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ केर समापन करैत छथि। आर्य हड़प्पाकेँ हरियूपियासँ संबोधित कएल, आर्य बाहरसँ अयलाह प्रभृत्ति किछु सिद्धांतक आधार पर रचित ई उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास होयबाक दावा करैत अछि। आ’ एहिमे 20,000 ई.पू.सँ 1800 ई.पू. तकक इतिहासोपाख्यानक चर्चा अछि। मुदा मौलिक एतिहासिक विचारधारा आ’ नवीन शोधक आधार पर एकर बहुतो बात समीचीन बुझना नहि जाइत अछि।
अग्नासँ शुरू भेल ई कथानक बड्ड आशा दिअओने छल। लेखक पहिल अध्यायमे लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग 200 करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ’ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर 1,97,29,49,032 वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। ई अनुमानित अछि जे यूरेनियमक 1.67 भाग 10,00,00,000 वर्षमे सीसामे बदलि जाइत अछि। विभिन्न प्रकारक पाथर आ’ चट्टानमे सीसाक मात्रा भिन्न रहैत अछि। एहि प्रकारसँ गणना कएला पर ई ज्ञात होइछ जे रेडियोएक्टिव पदार्थ 1,50,00,00,000 वर्ष पहिने विद्यमान छल। एहि प्रकारेँ कोनो शैलक आयु 2,00,00,00,000 वर्षसँ अधिक नहि भ’ सकैछ। यूरोपमे सत्रहम शाब्दी तक पृथ्वीक आयु 4000 वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान 1200 वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मनलैन्ह। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ हास्यास्पद अछि। एहि तरहक पाश्चात्य शोधकेँ लेखक पहिल अध्यायमेतँ नकारि देलन्हि मुदा अंत धरि जाइत-जाइत ओ’ आर्य लोकनि हड़प्पाकेँ हरियूपिया कहैत छथि एहि प्रकारक पाश्चात्य दुराग्रहक प्रभावमे आबि गेलाह। पश्चिमी विद्वानक उच्छिष्ट भोजसँ बचि श्रुति परम्पराक परीक्षा तर्क आ’ श्रद्धाक मिश्रणसँ नहि कए सकलाह। एहि प्रकारे ‘प्रतमं शैल पुत्री च’ निम्न आधार पर अपन इतिहासोपाख्यान साहित्यिक रूपसँ नहि बना पओलक..............
(अनुवर्तते)
Thursday, July 24, 2008
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
गणेष- ई अध्याय 4000 वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ’ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ’ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ’ गहूमक खेतीक प्रारंभाअ’ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभाअ’ अदल-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल।शिस्न देव पर जल आ’ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ’ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ’ पानिमे भिजा कय आगिमे पकायब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करयबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ’ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल।लिपिक प्रारंभ सेहो भेल।
हर- एहि अध्यायक प्रारंभ 3500 ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ’ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पैलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर-आ’ बरदक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ’ जनक लंबवतक अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ’ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल।
11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)
11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS ( VOLUME I TO XXII )
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...
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जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन...