भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

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Sunday, July 04, 2010

'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१) PART I


'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१)NEPAL       INDIA                   
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य








 

३. पद्य





३.६.सत्येन्द्र कुमार झा- पांच लघु-कविता





 

४. बालानां कृते-मुन्‍नी वर्मा, १.कविता-समाजक वि‍डम्‍बना .लघुकथा-1.हमर संस्‍कार 2. करैलाक मीठ गुण

 


५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




 

 



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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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१.      संपादकीय

२.      कथा-लघुकथा अंग्रेजीक शॉर्ट स्टोरी आ मैथिलीमे अन्तर। एतए एक पन्नासँ छोट कथा भेल लघु कथा आ ओहिसँ पैघ आ ४-५ पन्नासँ १५-२० पन्ना धरि कथा आ दीर्घ कथा। फेर ५०-६० पन्नासँ उपन्यास शुरू।
३.      १९४२-४३ क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे एहि अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइलाह (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओहिमे नहि भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाओल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा एहिपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ एहि विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, ताहि कारणसँ अमर्त्य सेन जेकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओहि महाविभीषिकासँ ओतेक प्रभावित नहि भेल होएताह। आ एतए जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह होएबासँ बचा लैत अछि। एहि संग्रहक सभटा कथा उत्कृष्ट अछि, रिक्त स्थानक पूर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि।
४.       
५.      जगदीश प्रसाद मण्डल शिल्पी छथि, कथ्यकेँ तेना समेटि लैत छथि जे पाठक विस्मित रहि जाइत अछि। मुदा हिनका द्वारा कथ्यकेँ (कथा, उपन्यास, नाटक, प्रेरक-कथा सभमे) उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हिनका मैथिली साहित्यमे ओहि स्थानपर स्थापित करैत अछि, जतएसँ मैथिली साहित्यक इतिहास जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्वजगदीश प्रसाद मण्डलसँएहि दू खण्डमे पाठित होएत। समाजक सभ वर्ग हिनकर कथ्यमे भेटैत अछि आ से आलंकारिक रूपमे नहि वरन् अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर अएबाक समान अछि। हिनकर कथ्यमे कतहु अभाव-भाषण नहि भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्यमे रखैत छथि से अद्भुत। हिनकर कथ्यमे नोकरी आ पलायनक विरुद्ध पारम्परिक आजीविकाक गौरव महिमामंडित भेटैत अछि, आ से प्रभावकारी होइत अछि हिनकर कथ्य आ कर्मक प्रति समान दृष्टिकोणक कारणसँ आ से अछि हिनकर व्यक्तिगत आ सामाजिक जीवनक श्रेष्ठताक कारणसँ। जे सोचैत छी, जे करैत छी सएह लिखैत छी- ताहि कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शिल्पीक अछैत मैथिली भाषा जनसामान्यसँ दूर रहल। मैथिली भाषाक आरोह-अवरोह मिथिलाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल आ ओही भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्कृति-भाषासँ देखाओल जगदीशजीक सरोकारी साहित्य मिथिलाक सामाजिक क्षेत्र टा मे नहि वरन् आर्थिक क्षेत्रमे सेहो क्रान्ति आनत। विदेह मे हिनकर पाँचटा उपन्यास, एकटा नाटक आ दू दर्जनसँ बेशी कथा, नेना-भुटका-किशोर लेल सएसँ ऊपर प्रेरक कथा ई-प्रकाशित भऽ विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीकेँ दलमलित करैत मैथिली साहित्यक एकटा रिक्त स्थानक पूर्ति कऽ देने अछि।
६.      मैथिली भाषा साहित्य : बीसम शताब्दी - प्रेमशंकर सिंहजीक एहि निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना संग्रहमे मैथिली साहित्यक २०म शताब्दी आ एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक विभिन्न प्रिय-अप्रिय पक्षपर चर्चा भेल अछि। अप्रिय पक्ष अबैत अछि एहि द्वारे जे राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया कखनो काल परस्पर विरोधी होइत अछि।
७.       
८.      मैथिली साहित्यक पुरान सन्दर्भ मैथिली भाषा आ साहित्यमे वर्णित अछि। लोकगाथा मे मणिपद्मक लोकगाथाक क्षेत्रमे अवदानकेँ रेखांकित करैत लोकगाथाक चर्चा भेल अछि । लोकनाट्य मे मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत उल्लेख अछि। बीसम शताब्दी- स्वर्ण युगमे मैथिली साहित्यक सए बर्खक सर्वेक्षण अछि। पारंपरिक नाटक मे मैथिलीक आ मैथिलीमे अनूदित पारम्परिक नाटकक चर्चा अछि।सामाजिक विवर्तक जीवन झा मैथिली नाट्य साहित्यमे हुनका द्वारा आनल नूतन कथ्य-शिल्पकेँ रेखांकित करैत अछि। हरिमोहन झाक परवर्त्ती रचनाकारपर प्रभाव हरिमोहन झा पर समीक्षा अछि। मैथिली आन्दोलनक सजग प्रहरी जयकान्त मिश्रक अवदानक आधारित अछि। संस्मरण साहित्य मे मणिपद्मक हुनकासँ भेँट भेल छल क सन्दर्भमे संस्मरण साहित्यपर चर्चा भेल अछि। अमरक एकांकी: सामाजिक यथार्थ मे अमरजीक एहि विधा सभक तँ मायानन्दिक रेडियो शिल्पु मे मायानन्द मिश्रक एहि विधाक सर्वेक्षण अछि। चेतना समिति ओ नाट्यमंच मे चेतना समिति द्वारा कएल रचनात्मक कार्यक विवरण अछि।
९.       
१०.  एहि सभ आलेखमे सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, संस्था सभक निर्माण वा वर्तमानमे संपूर्ण समुदायक धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित सुधारक आवश्यकता, महिला-लेखन आ बाल-साहित्यक स्थान-स्थापर चर्चा, यथासंभव मेडियोक्रिटी चिन्हित करबाक प्रयास, मूल्यांकनमे ककरो प्रति पूर्वाग्रह वा घृणा नहि राखब- ई सभटा समीक्षाक आवश्यक तत्वक ध्यान राखल गेल अछि। एक पाँतिक वक्तव्य कतहु नहि भेटत, पूर्ण विवेचन भेटत।
११.   

१२.   

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com

२. गद्य

२. गद्य











 १.दुर्गानन्‍द मंडल-पारस २.उमेश मंडल-अमैआ भार ३.संजय कुमार-अनट्रेन्‍ड घुसखाेर ४.-जगदीश प्रसाद मंडल-एकांकी-कल्‍याणी
  
  
दुर्गानन्‍द मंडल

पारस

शान्‍ति‍ यै शान्‍ति‍ कतए नुकाएल छी यै फूलकुम्‍मरि‍?”
  शान्‍ति- एलौं याए एलौं। आंगनसँ शान्‍ति‍ हाक दैत लग आि‍ब सोझामे ठाढ़ि‍ होइत पुन: बाजि‍ उठैत छथि- कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दैत छलौं? कोनो खास बात छै की?
हम- ऐह, अहॉंकेँ तँ सदि‍खन मजाके सुझाइत अछि‍। खास बात की रहत, अहॉं छी तँ सब खासे बात बूझु। ओना आइ वि‍द्यालयक छुट्टी समाप्‍त भऽ गेल तेँ झब दऽ खाइले कि‍छु बनाउ। जे हम समएसँ वि‍द्यालय चल जाएव।
शान्‍ति‍ बजलीह- ओ..., आब ने बुझलहुँ। अहॉं तँ सब दि‍न गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपनहि‍ बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि‍ अनलहुँहेँ। तेँ आइ साग-भात आ आल्‍लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवि‍तहुँ से नि‍आरने रही। मुदा ताहि‍मे तँ देरी होएत। तावत अहॉं स्‍नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरि‍ओन कऽ दैत छी।
  बेस, बड्ड बढ़ि‍यॉं। कने अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दि‍अ। हम धोलूकेँ हाक दैत छी- धोलू हौ धोलू। कतऽ छह हौ?”
  ऐलौं, याए ऐलौं बावू जी, कने नदी फीरि‍ रहल छी।
  वेस, बड्ड बढ़ि‍यॉं। आ वौआ, है सुनै छह? आइ हमरा वि‍द्यालय जेवाक अछि‍। से जात हम स्‍नान करै छी। तात् तौं साइि‍कलकेँ बढ़ि‍यॉं जेकॉं झारि‍-पोछि‍ दाए। ई कहैत हम स्‍नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि‍ जाइत छी। स्‍नानोपरान्‍त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीि‍र तैयार होइते छी तात् शान्‍ति‍क आग्रह- सुनै छी, अहॉंले जलखै नि‍कालि‍ देने छी, कऽ लि‍अ। ई कहैत आगॉंमे सि‍कीक चंगेरी, जे रंग-वि‍रंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, ताहि‍मे मुरही-चूड़ा, दूटा चूड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे कॉंच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगॉं बढ़ौलनि‍। एक क्षणक लेल हम मि‍थि‍ला, मैथि‍ल, मैथि‍लक संस्‍कार आ स्‍भयतासँ बहुत बेसी आनन्‍दि‍त भेलहुँ। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्‍ति‍क मधुर आवाज- कतए हेरा गेलहुँ? एखन यएह खा, वि‍द्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएव तँ गरमे-गरम साग, भात, अल्‍लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि‍ मन खाएव। ओना जाड़ मास छै यदि‍ कि‍छु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नहि‍। कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेलीह। आ हम जलखै करैत एहि‍ मादक अदाक मादे सोचए लगलहुँ। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लागल। जलखै करैत एक बेरि‍ पुन: हाक देलि‍ऐनि‍- शान्‍ति‍, यै शान्‍ति‍....। नहि‍ जानि‍ जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि‍ रहल छलन्‍हि‍। ओ गुनगुनाइत ई गीत- एगो चुम्‍मा दे दऽ राजा जी, बन जाइ जतरा....।
  आवि‍ वाणभटक नायि‍का जेकॉं लगमे सटि‍ कऽ ठाढ़ि‍ होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्‍मा लऽ छथि‍ आ मुस्‍की दैत घरसँ बहार भऽ जाइत छथि‍। हम लजा जाइत छी।
     करीब चालीस मि‍नटक उपरान्‍त वि‍द्यालय पहुँचैत छी। हाथ-पएर धोलाक वाद हाजरी बनवैत छी। प्राथनाक घंटी बजैत अछि‍ आ धि‍या-पूताक संग हमहुँ एक पाति‍मे ठाढ़ भऽ जाइत छी। उपरान्‍त ऐकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि‍। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करैत छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग रहैत अछि‍, स्‍वागतार्थ सभ बच्‍चि‍या उठि‍ कऽ ठाढ़ि‍ भऽ जाइत अछि‍। वैसबाक आदेश पावि‍ यथास्‍थान सभ बैसि‍ जाइत अछि‍। सबहक हाजरी लेब सम्‍पन्‍न होइत अछि‍। तखन कि‍छु बच्‍चि‍या सभ बाजि‍ उठैत अछि‍- मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बि‍यौ, क्‍यो कहति‍ अछि‍ जी नइ सर आइ ग्रेजुएत पुतोहू पढ़बि‍यौ। मुदा कि‍छु खास बच्‍चि‍या यथा- राखी, गीतांजली, खुसवू, बबि‍ता, रि‍ंकी आ पि‍ंकी कहि‍ उठैत अछि‍- जी नै सर आइ अहॉं अपने ि‍लखल कोना कथा कहि‍यौ। आ हम ओहि‍ आग्रहकेँ नहि‍ टारि‍ पबैत छी। शुरू कऽ दैत छी अपन लि‍खल ई कथा- .....पारस।
     मॉं मि‍थि‍लाक गोद आ कमला महरानीक कछरि‍मे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जाहि‍मे छल एकटा चाहबला ओकर नाम छल पारस पि‍ता श्री सत्‍य नारायण जी। नामक अनुरूप दुनू बापूत वि‍परीत छल। पि‍ता श्री सत्‍य नारायण जरूर मुदा, सब चीजले खगले रहैत छलाह। एकटा प्राइवेट स्‍कूलमे अध्‍यापण कार्य करथि‍ आ कोनो तरहेँ बाल-बच्‍चाकेँ पोसथि‍-पालथि‍। हुनकेर बालकक नाम पारस। नामक अनुरूप एकदम ि‍वपरीत, मझौले कदक जवान देहो-हाथ सुखले-टटाएल कारी-झामर हाथ-पाएर एकदम सुखल-साखल मुदा, पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, सदि‍खन जेना मुँससँ लेर चुवि‍ते छलै। फाटले-चि‍टले कोनो जूता-चप्‍पल पहि‍र ओही प्राइवेट स्‍कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकि‍लगल कम नहि‍।
     सत्‍य नारायणजीक घर जरूर बान्‍हेँ कातक सौ फि‍ट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल, मुदा संस्‍कार कोनो सुसभ्‍य समाजक प्रति‍क छल। सत्‍य नारायण बावूकेँ हरलैन्‍हि‍‍ ने फुरलैन्‍हि‍‍ खेलवा देलखि‍न पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि‍ अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-वासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्‍टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटि‍क मटकुरी छाल्‍ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नि‍त्‍य समएसँ खुलैत आ बन्‍द होइत छल। क्रमश: महि‍सि‍क अगब दूधक चाह, एक्‍को ठोप पानि‍क छुति‍ नहि‍, बरतन-वासन खुब पवि‍त्र आ संस्‍कारी होएवाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचि‍त सम्‍मान भेटनि‍। चाहक दोकान खुब चलनि‍। क्रमश: पॉंच सेर दूधक बदला आध-आध मन दूध खपत होमए लागल। आमदनी नीक होमए लगलैक।
     कि‍छु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि‍ लऽ लेलक पक्‍काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्‍टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लागल सि‍ंहहारा आ गरमा-गरम जि‍लेबी बात एककानसँ दूकान होइत गेलै एकर दोकानक नाम भऽ गेलै दोकान खूब चलए लागल।
     समए पाबि‍ 26 जनवरी आ 15 अगस्‍तमे प्रसादक लेल वि‍शेष आदर पावि‍ बनाबए लागल मनक मन बुनि‍यॉं आ भुजि‍या। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचि‍ंग चलौनि‍हार संचालक आ ि‍नदेशक महोदयक योगदान एहि‍ देाकनकेँ चलाबएमे अहम भूमि‍का रखलक। दि‍न दुना आ राति‍ चौगुना उन्‍नति‍ होमए लगलैक। मनक-मन दूध खपत होएवाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचाए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि‍ लेलक ओ तीन‍ बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्‍तो ओ चाहो बेचाए आ पढ़बो करए। समए पाबि‍ प्राइवेट स्‍कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्‍कृत वि‍द्यालयमे नाओ लि‍खा लेलक, आ मध्‍यमाक फारम भरि‍ फस्‍ट डि‍वि‍जनसँ पास केलक। आव तँ ओ कि‍छु बेसि‍ए खुश रहैत छल। मध्‍यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओ जनता काओलेजमे झंझारपुरमे लि‍खा लेलक। तखनो ओ वेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परि‍वर्तन नहि‍। काओलेजसँ ऐलाक वाद चाहक दोकानपर ओ जमि‍ जाए। यद्यपि‍ चाह बेचब एकटा केहन काज मानल जएतैक ई वि‍वादक वि‍षए अछि‍। ओकरा एक्‍को पाइ लाज-संकोच नहि‍। कि‍एक तँ कर्म कोनो खराप नहि‍ होइत छैक। कमा कऽ खाइ एहि‍मे कोन लाज कोनो कि‍ ककरोसँ भि‍ख मंगबै जे लाज होएत। तेँ चाह बेचब अधलाह काज नहि‍ से मानि‍ ओ खुब जतनसँ अपन कतर्व्‍यक नि‍र्वहन करए।
     बुझि‍नि‍हार मैथि‍लमे एकर चर्च होमए लागल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखि‍ते-देखति‍ ओ मैथि‍ली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाम भऽ गेलैक जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नहि‍ छोड़लक। बात पसरैत गेल।
     एकबेरि‍ एकटा कथा गोष्‍ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि‍ गोट मात्र कथाकार वि‍दा भेलथि‍ दि‍न अछैते मुदा, कोशी महरानीक अभि‍शापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरि‍क बाट मात्र चारि‍ घंटामे तय भेल। सुपौलसँ पहि‍नहि‍ झल अन्‍हार भऽ जरा सेहो गेल रही। तेँ चारू कथाकार चाह पि‍बाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- हौ, चारि‍ कप चाह ि‍दहह।
  ओ बाजल- जी, श्रीमान् दै छी। कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लगल।


तात् ओतए गप्‍प कि‍यो तेसरे आदमी चलौलन्‍हि‍। जे गोधनपुर गाममे एकटा चाहबला अछि‍ पारस बी.ए. पास। बी.ए. पास केलाक बादो ओ चाह बेचब अधला नहि‍ बुझैत अछि‍। चाहो ततवेक सुन्‍दर आ व्‍यवहारो ओकर ततवेक सुन्‍दर छै।
     वाह। हर्ष भेल जे समाजकेँ एहि‍ वातक नजरि‍ जरूर छैन्‍हि‍ह जे एकटा पढ़ल-लि‍खल लोक चाह बेचैत अछि‍। ओकर नजरि‍मे कोनो काज करबामे हर्ज नहि‍।
     एम्‍हर देखु जे वर्तमान सरकारमे नगर-पंचायत, जि‍ला परि‍षद, टेन पलस टू वि‍द्यालयमे नि‍योजनक भेकेन्‍सी भेल। तात पारस मैथि‍लीसँ एम.ए. सेहो कऽ लेलक।
     भैकेन्‍सीक अनुसार वि‍भि‍न्‍न जि‍लामे आवेदन केलक। समए तँ जरूर लागल। मधुबनी जि‍लाक मेघा सुचीक प्रकाशि‍त भेल उपरहि‍मे ओकर नाम छलै। नि‍योजनक नि‍मि‍त्त सभ आवश्‍यक कागजात, मूल प्रमाण पत्र एवं शपथ पत्र देलाक वाद ओकर चयन इच्‍छानुकूल परि‍योजना वि‍द्यालय मनसापुरमे मैथि‍लीक लेल भेल।
     समाजक सभ वर्गकेँ एहि‍ बातसँ हर्ष भेल जे सत्‍यनारायण जीक बालक पारस आइ टेन पलस टू वि‍द्यालयमे मैथि‍ली पद्पर नि‍योजि‍त भेलाह। साझखन सभ ओही चाहक दोकानपर उपस्‍थि‍त भऽ पारस आ हुनक पि‍ता सत्‍य नारायणजीकेँ सभ शुभकामना आ बधाइ दैत कहलकनि‍- सत्‍य नारायण आव ओना काज नहि‍ चतल, आव भोज-भातक आयोजन कएल जाउ। भोज लागत।
     सत्‍य नारायण आरो अह्लादि‍त होइत बजलाह- सभ एहि‍ समाजक आशीर्वाद थि‍क। अहीं सबहक अशीर्वाद थि‍क जे आइ पारस चाह बेचैत-बेचैत एकटा टेन-पलस टू वि‍द्यालयक शि‍क्षक भेल। हम एहि‍ समाजक ऋृणी थि‍कहूँ। आइ जे समाज नहि‍ तँ हमर कोनो अस्‍ति‍त्‍व नहि‍। आइ हमहूँ गौरवान्‍वि‍त भऽ रहल छी जे हमर बेटा हमरे बेटा नहि‍ एहि‍ समाजोक बेटा। जे एहि‍ समाजमे सि‍र उठा कऽ जि‍वक, एकटा अलग स्‍वाभि‍मान देलक। एकटा आदर्श देलक। तेँ हम भोज देवेटा करब। भोज जरूर करब।
     समए सुअवसर पावि‍ सत्‍यनारायण बावू केलनि‍ बड़का भोजक आयोजन। लगुआ-भगुआ हि‍त अपेक्षि‍त मि‍त्र-बन्‍धु आदि‍ एहि‍ भोजमे नहि‍ छुटथि‍ आ हुनकर उचि‍त सम्‍मान हुअए एहि‍ बातक सदि‍खन खि‍याल रखलनि‍।
  दुनू तरहक आयोजन छल, शाकाहारी आ मांसाहारी। नि‍मंत्रि‍त व्‍यक्‍ति‍ सभ समएसँ उपस्‍थि‍त भऽ आ स्‍वरूचि‍ भोजन केलनि‍। शाकाहारीक लेल आयोजन छल। पुरान तीन-सलि‍या बासमती चाउरक भात, राहरीक दालि‍ आमि‍ल देल, पालक पूड़ी, पालक पनीर, आमक चटनी, सलाद, तरल मि‍रचाइ, मटर-आलू-परोर देल डलना, बड़ी अदौड़ी, सकरौड़ी ताहि‍पर डब्‍बूक डब्‍बूक घी। महीसीक अगव दूधक तौलाक-तौला दही, तरहत्‍थी सन मोट छाल्‍ही बुझु तँ खेनि‍हार तर आ भोजेतक व्‍यवस्‍था उपर। दहीक तँ कथा नहि‍ पुछू खेनि‍हार कम आ तौले बेशी। सभ क्‍यो गद्-गद् भऽ गेलाह।
     एम्‍हर मांसाहरी लोकनिकेँ‍ लेल अरवा चाउरक भात आ आध-आध मनक जुआएल खस्‍सीक लद-वद करैत मांस। कि‍सि‍म-कि‍सि‍मक मश्साला देल गम-गम करैत एकहक टा पीस बुझू जे सए-डेढ़ सए ग्रामक। ऐह अजोध खस्‍सी, माउस। बनलौ ततवेक सनगर। सभ भरि‍ मन खएलाह। आ उपरसँ सेरक सेर दही फी आदमीपर। तर-बत्‍तर छलाह, भोज तँ जस-जस भऽ भेल।
     सभ कि‍यो भोजनो करथि‍ आ पारसक चर्चो करथि‍। जे पारस तँ पारसे अछि‍। वस्‍तुत: पारस आब ओ पारस नहि‍ रहल जे चाह मात्र बेचै छल। चाहे बेचेत ओ पारस तँ आव समाजक लेल ओ पारस भऽ गेल। जेकर गुणसँ कतेको नेना-भूटका आव चाहेटा नहि‍ बेच समाजक बीच शि‍क्षाक ज्‍योति‍ जगाओता। जाहि‍सँ अपना समाजमे पारस, पारस मणि‍ गुणसँ प्रभावि‍त होएत आ पारसक गुणसँ अपना समाजक कतेको बच्‍चा पारस बनताह।
     अन्‍तत: बाउ लोकनि‍ अहीं सभ कहू जे अहॉं सभ घर आंगनाक काज करैत पढ़ि‍ लि‍खि‍ की बनए चाहैत छी?”
     एक स्‍वरमे उत्तर भेटैत अछि‍ मास्‍सैव हमहूँ पारस बनवै पारस। कहैत सभ बच्‍चि‍याक संग राखी, गीतांजली, खुशवू, बवीता, रि‍ंकू, पि‍कूक नोरसँ भरल ऑंखि‍मे एकटा वि‍शेष आत्‍म वि‍श्‍वास हमरा वुझना जाइत अछि‍। जेना ओ प्रखर ज्‍योति‍ बहराएल हुअए अनमोल मोती पारससँ।

 
उमेश मंडल

अमैआ भार

लपर सँ कुड़ुड़-आचमन कऽ पक्षधर बाबा दरवज्‍जाक सीढ़ीपर पहि‍ल पएर दैइते रहथि‍ कि‍ चाहक गि‍लास नेने लालकाकीकेँ आंगनसँ नि‍कलि‍ कोनचर लग अबैत देखलखि‍न। काजक संयोग देखि‍ मन फुदकि‍ गेलनि‍। जाधरि‍ लालकाकी ओसारक सीढ़ी लग अबैत-अबैत तहि‍सँ पहि‍नहि‍ बाबा ओसारक चौकीपर पसरल मोथीक बि‍छानक ओठ पकड़ि‍ दुइ बेरि‍ झाड़ि‍-बीछा, देवालसँ ओंगठि‍ चौकिपर बैसि‍ गेलाह। बैसि‍तहि‍ लालकाकी चौअन्‍नि‍यॉं मुस्‍की दैत हाथमे चाहक गि‍लास पकड़ा देलकनि‍। भफाइत हार्ड-लीकर चाह आ लालकाकीक मुस्‍की बाबाक मनकेँ, जहि‍ना बच्‍चाक फेकल गेन गुड़कैत तहि‍ना गुड़का देलकनि‍। मुँहमे चाह लइसँ पहि‍नहि‍ टुसि‍ देलखि‍न- मन बड़ छि‍टकल बुझि‍ पड़ैए। कतौ कि‍छु पेलहुँहेँ की?”
     पति‍ बातक उत्तर दइसँ लालकाकी अनसुन करए चाहलनि‍, कारण जाधरि चाह मुँहमे नहि‍ लऽ लैत छथि‍ ताधरि‍ घरक कोनो बात कहब उचि‍त नहि‍। हो न हो जँ कहीं अधले लगनि‍। हम तँ कोनो हाकि‍मक घरवाली नहि‍ छी जे आमद-खर्चक फाइल खाइऐ-पीवै काल उल्‍टा देबनि‍। आब भगवान दि‍न बदललनि‍ तेँ ने बीअनि‍ डोलबैक दुख भागल नइ तँ केहन भारी दुखक तरमे रहै छलौं। पत्‍नी तँ पति‍क ओहन खेलक संगी छि‍अनि जे दि‍न-राति‍ खेलैत रहैत। चाहक चुस्‍की लइतहि‍ लालकाकीक मुँहसँ खसलनि‍- एगारह सए रूपैया समैध पठा देलनि‍हेँ।
  रूपैयाक नाअो सुनि‍तहि‍ बाबा चौंकि‍ गेलाह। मनमे उठलनि‍, कि‍अए रूपैया पठौलनि‍?‍ अखन रूपि‍याक काज कोन अछि‍? तहूमे कहने तँ नहि‍ छेलि‍एनि‍। पति‍क टहलैत मनकेँ देखि‍ लालकाकी दोहरा देलखि‍न- रूपैयाे आ चि‍ट्ठि‍यो बौआकेँ भोरे डाक-पीन दऽ गेलनि‍। नवका समैध पठौने छथि‍।
  नवका समधि‍क नाओ सुनि‍तहि‍ पक्षधरक मनमे धक्‍का लगलनि‍। मुदा तइओ संयमि‍त होइत पुछलखि‍न- ि‍चट्ठीमे की सब लि‍खल छलैक?
  यएह जे, काजक धुमशाही एत्ते बढ़ि‍ गेल अछि‍ जे अमैया भारक लेल पाइऐ पठा रहल छी। गाम आएब मोसकि‍ल अछि‍।
     अमैया भारक नाओ सुनि‍तहि‍ बावाकेँ तेलि‍या सॉंपक बीख जकॉं सन्न दऽ ऑंखि‍ये पर बीख पहुँच गेलनि‍। बीखसँ कारी होइत पति‍क देह देखि‍ लालकाकी बुझि‍ गेलीह। सोझासँ ससरैक गर अँटबए लगलीह। जना कि‍यो अंगनासँ सोर पाड़ने होनि‍ तहि‍ना अंगना दि‍स देखि‍ बजलीह- अबै छी कनि‍यॉं। कहैत चुपचाप ससरि‍ गेलीह। मुदा देह थरथराइते रहनि‍। पति‍-पत्‍नी रहि‍तहुँ दुनूक बीच बैचारि‍क मन-भेद रहि‍ते रहनि‍। लालकाकीक वि‍चार जे सबहक संगे मि‍लि‍-जुलि‍ चली जहन कि‍ बाबाक वि‍चार छन्‍हि‍ जे जहि‍ना जंगलमे अनेको ि‍कस्‍मक गाछ कोनो-कोनो कोइढ़ला जकॉं तन्नुक अछि‍ तँ कोनो-कोनो लोहा जकॉं सक्कत। जँ दुनूकेँ एक रंग बुझि‍ कि‍छु बनौल जाय तँ कते दि‍न चलत। जे तन्नुक अछि‍ ओ लगले नष्‍ट भऽ जाएत जहन कि‍ जे सक्कत अछि‍ ओ ओहि‍ना तना-उताड़ रहत। तहि‍ना तँ मनुक्‍खोक बीच अछि‍।
     चाह सठबो नहि‍ कएल रहनि‍ कि‍ तहि‍क बीच क्रोध नाकपर आबि‍ गेलनि‍। क्रोधे मन उनटए-पुनटए लगलनि‍ मुदा, कि‍छु बाजति‍ नहि‍।
     शुरूहेसँ परि‍वारो आ टोलोक लोक शान्‍तीकेँ लालकाकी कहैत रहनि‍ जे अखनो धरि‍ कहि‍ते छन्‍हि‍।
     क्रोधसँ बाबा अधे-छि‍धे चाह पीबि‍, चौकी तर मे गि‍लास रखि‍ दलानक भीतुरका चौकीपर पड़ि‍ सोचए लगलाह। अमैया भार कि‍ आइऐक छी आकि‍ साबि‍केसँ अबैत अछि‍। कोनो कि‍ अपने नै पुरने छी जे नइँ बुझल रहत। जूरेशीतल पावनि‍सँ शुरू कऽ आद्रा धरि‍ पूरैत छलौं। चटनी खेवासँ लऽ कऽ कसौनी-अँचार होइत बरि‍साइतसँ पाकल आमक भार पुरने छी। शुरूमे रोहनि‍या सरही आ बमै, गुलाबखास जरदालूसँ शुरू करैत छलौं, कृष्‍णभोग, लड़ूबा, मालदह होइत कलकत्ति‍यापर पहुँचै छलौं। बरखो खसैत छलए आ आमो लगि‍जाइत छल। अन्‍तमे मोहर ठाकुर, राइर, फैजली, सि‍क्‍कूलक भार पूरि‍ समाप्‍त करैत छलौं। ई कि‍ भेलि‍ जे आमक भारक तरे रूपैया पठा देलौं? हम कि‍ रूपैया नइ देखने छी आकि‍ कर्जा मंगलि‍एनि‍? अइसँ नीक जे नहि‍ पठबि‍तथि‍। तइले केकरा के डॉड़-बान्‍ह करैए जे करि‍ति‍एनि‍। ई कि‍ बुद्धि‍-बधि‍‍या केलनि‍। भारपर आएल वस्‍तु समाजमे बेन स्‍वरूप बि‍लहल जाइत अछि‍, से कि‍ वि‍लहब?‍‍‍ केहन समए चि‍ल‍ आएल केहन नहि‍‍, देखै छी जे जेकरा खूँटापर चरि‍-चरि‍ थान महीसि‍क रहैत छल सेहो सभ आब बजरूए दूधक दही पौड़ि‍ चौरचनक हाथ उठबैए। ऐहन पावनि‍ केनहि‍ कि‍? तरे-तर मि‍यादि‍ अगि‍या गेलनि‍।
     अांगन आबि‍ शान्‍ती माने लालकाकी पुतोहूँ लग बजलीह- बुढ़ा बि‍गड़ि‍ गेल छथि‍।
  अंगनाक सभ सुनलनि‍, तेँ सभ दरवज्‍जा दि‍शि‍ जाएवे छोड़ि‍ देलक। तहि‍ काल बाबासँ भेंटि‍ करए सुशील आएल। दरबज्‍जापर नहि‍ देखि‍ सुशील आंगन ि‍दस तकलक। ऑंखि‍क इशारासँ लालकाकी सुशीलकेँ बजा कहलखि‍न-‍ भाय सहाएव, बगदल छथि‍।
  अचंभि‍त होइत सुशील पुछलकनि‍- कि‍अए?
  समधि‍याैरसँ अमैआ भारक रूपइऐ समैध पठा देलखि‍नहेँ, तेँ....।
  मुस्‍कुराइत सुशील आंगनसँ नि‍कलि‍ जोर-जोरसँ दरवज्‍जाक आगूमे बजए लगल- भाय सहाएव, यौ भाय-सहाएव।
  ककरो उत्तर नहि‍ सुनि‍ घरेसँ पक्षधर बजलाह- के, सुशील।
  हँ भैया, मन-तन गड़बड़ अछि‍ कि‍?
  ओसारपर आबि‍ पक्षधर बजलाह- मन कि‍ गड़बड़ हएत, तेहन-तेहन काज दखै छी जे नीको मन अधलाह भऽ जाइए।
 से कि‍?
  कि‍छु नै।
‍ ‍    चौकीपर बैसैत सुशील बाजल- कि‍ कहब भाय सहाएव, बे-ठेकानक गाम सभ भए गेल अछि‍। फागुनक लगनमे बरि‍आती गेल रही बरकेँ दुअार लगबए दाइ-माइ सभ चंगेरामे दूभि‍-धान, चरि‍ मुखी दीप जरौने पहुँचलीह। ले बलैया, तहि‍ काल बरि‍आतीक अंग्रेजी बाजा फि‍ल्‍मी धुन शुरू केलक। कि‍ कहू भाय, बूढ़ि‍-बुढ़ानुस सभ तँ पूर्वते गीत गवैत रहलीह मुदा, जते नव-तुरि‍या सभ रहए, ओ सभ डान्‍स करए लगल।
     सुशील बजि‍ते रहै कि‍ बि‍चहि‍मे ठहाका मारि‍ पक्षधर बजलाह- ई तँ आन गामक बात भेल। दुनि‍यॉं बड़ीटा अछि‍। सौंसे दुि‍नयॉंमे ने एक रंग लोक अछि‍ आ ने चालि‍-ढ़ालि‍। अपन कल्‍याणक लेल सभकेँ अपन-अपन जि‍नगी बुझए पड़तैक।
     बाबाक वि‍चार सुनि‍ सुशील अपन वि‍चार मोड़ैत बाजल- भाय चाह नै पीलौंहेँ, मूड भंगठल बुझि‍ पड़ैए।
  दरवज्‍जाक अढ़सँ लालकाकी सभ बात सुनैत रहथि‍। पति‍क ठहाका सुनि‍ मन असथि‍र भेलनि‍। आंगन ि‍दस देखि‍ पक्षधर जाेरसँ बजलाह- कने चाह बनौने आउ?
     पानि‍ पीबि‍ हाथमे चाहक गि‍लास लैत पक्षधर बजलाह- तेहन मनुक्‍ख सभ बनि‍ रहल अछि‍ जे एको-दि‍न जीवैक मन नहि‍ होइत अछि‍।
  पक्षधरक बातकेँ मोड़ैत सुशील बाजल- ऐह भाय, अगुता जाइ छी। दुि‍नयॉं सबहक सझि‍या छि‍यै कि‍ ककरो खानगी। कि‍यो अपन जि‍नगीक मालि‍क अछि‍ आकि‍ दोसराक। जाबे अइ धरतीक सुख-भोग आ अन्न-पानि‍क हि‍स्‍सा बचल अछि‍ ताबे मरबो नीक हएत।
  हँ, से तँ ठीके कहलह।
  पक्षधरक समर्थन देखि‍ सुशील बाजल- ‍अपने गामक घटना कहै छी मटकन भाइयक बेटाक कोजगरा रहनि‍। बम्‍बैऐसँ समैध भाति‍ज दियए रूपैया पठा देलकनि‍। सेहो चौबीसमॉं घड़ीमे। कोजगरे दि‍न। बेर झुकैत मटकन भाय आि‍ब कऽ कहलनि‍ जे सुशील तों बड़ जोगारी छह। कने सम्‍हारि‍ दाए। भाइक बात सुि‍न कोनो गरे ने सुझाए कि‍ऐक तँ अनका ऐठाम पूछि‍-पूछि‍ खाजा-लड्डू आ दही पबैत छथि‍न। मनमे आएल जे समाजक लेल पान-मखानक तँ जोगार भइयो सकैए। मुदा जि‍नकर-जि‍नकर भोज खेने छथि‍न ति‍नका-ति‍नका कि‍ खाइले देथि‍न। कोना दही पौरल जाएत आ खाजा-लड्डू बनत। ऐहन स्‍थि‍ति‍मे अनेरे पड़ि‍ दोखक मोटरी कपारपर लेब। मुदा एकटा बात मनमे उपकल।
  की?”
  जखन माए-बावूक भारसँ लऽ कऽ बाल-बच्‍चा धरि‍क उतड़ि‍ये गेल अछि‍ तखन अनेरे जंजालमे पड़ब नाक-कान कटाएब छोड़ि‍ आरो कि‍ भऽ सकैए। तइसँ नीक जे कि‍यो अपने केलहाक फल ने पाओत।
  सुशीलक बात सुि‍न पक्षधर बाबा गुम्‍म भऽ वि‍चार करए लगलाह।
 

संजय कुमार
ग्राम- गोधनपुर
जि‍ला- मधुबनी(बि‍हार)
अनट्रेन्‍ड घुसखाेर

पॉंच मि‍नटक भीतरे गामसँ लऽ कऽ बम्‍बै दि‍ल्‍ली धरि‍ समाचार पसरि‍ गेल जे बड़ा बाबूकेँ घुसखोरीमे सी.आइ.डी. पकड़ि‍ लेलकनि‍। सॉंझ-भोरक नढ़ि‍या जकॉं गाममे जेम्‍हर-तेम्‍हर अवाज उठए लगल-
  दुश्‍मनीसँ फँसाओल गेलनि‍।
  सी.आइ.डी. की कोनो हाड़-गोबर गीजैए जे बि‍नु देखि‍नहि‍ पकड़ि‍ जहल पठा देलकनि‍।
  सुनै छी जे एकटा मंत्रीक भागि‍नक काजमे टाल-मटोल केलखि‍न, वएह धरा देलकनि‍
  लाखक-लाख जे बेटीक ि‍वआहमे खर्च केलनि‍ से कि‍ दरमहेक पाइ छलनि‍।
  बेटाकेँ जे पॉंच लाख रूपैया डोनेशन दऽ बंगलोरमे नाओ लि‍खौलनि‍ से कि‍ खेत बेचि‍ कऽ केलनि‍।
  देखले दि‍न अछि‍ जे बाप दि‍न खाइ छलनि‍ तँ राति‍ले झकै छलनि‍ आ राति‍ खाइ छलनि‍ तँ दि‍नले झकै छलनि‍। तेकर बेटा गामक महाजन भऽ गेल।
  पसीनेक पाइ जकॉं सूदि‍ कड़गड़ छनि‍।
  ऑंफि‍समे गदमि‍शान हुअए लागल।
  बड़ाबाबू बननहि‍ कि‍ हेतनि‍, बुद्धि‍यो ने चाही। बुद्धि‍ रहि‍ गेलनि‍ नवका कि‍रानी जकॉं आ बनि‍ गेलाह बड़ाबाबू।
  जि‍नगी भरि‍ तँ बान्‍ह-सड़कक नक्‍शा पास करैत रहलाह आ लुरि‍ भऽ जेतनि‍ पाइ कमाइक।
  जखन कोट-कचहरीक चक्‍कर लगौताह तखन ने ट्रेन्‍ड हेताह।
  मुदा जाबे सीखि‍ताह-सीखि‍ताह ताबे तँ रि‍टायरे कऽ जेताह। तीनि‍ये मास नोकरी बँचल छन्‍हि‍ तहि‍ बीच जहलोसँ नि‍कलताह कि‍ नहि‍।
  जखन लूड़ि‍क काज छलनि‍ तखन लूड़ि‍ये ने भेलनि‍ आ जखन लूड़ि‍ हेतनि‍ तखन काजे ने रहतनि‍।
     जगदीश प्रसाद मंडल

      एकांकी-

   कल्‍याणी
  
   पहि‍ल अंक पहि‍ल दृश्‍य-

      (जहलक दृश्‍य। जेलक भीतरसँ जेलर, कल्‍याणी, प्रति‍ज्ञा आ दूटा सि‍पाही नि‍कलैत।     फाटकक बाहर आबि‍ कल्‍याणीयो आ प्रति‍ज्ञो पाछु घुि‍र जहलकेँ नि‍ङहारि‍-निङहारि‍ देखैत अछि‍।)

जेलर-             अखन धरि‍ हम जेलर आ अहॉं दुनू गोटे कैदी छलौं। मुदा आब जहि‍ना अहॉं दुनू             गोटे छी तहि‍ना हमहूँ एकटा अदना मनुक्‍ख छी। जेलक जि‍म्‍मेदार होइक नाते कहै                 छी जे जँ कि‍छु अभाव भेलि‍ हुअए ओ बि‍सरि‍ जाएब। संगे इहो कहै छी जे पुन:                 कैदी बनि‍ जहल नहि‍ देखी।

कल्‍याणी-     (मुस्‍कुराइत) कहलौं तँ बड़ सुन्नर बात, मुदा जहि‍ठाम एक्को इंच जमीन नारीक लेल                   सुरक्षि‍त नहि‍ अछि‍ तहि‍ठाम......?

जेलर-             कि‍ सुरक्षि‍त?

कल्‍याणी-     सुरक्षि‍त यएह जे नारीक लेल स्‍वतंत्र जि‍नगी कल्‍पनाक सि‍वा आरो कि‍ अछि‍।                जाधरि‍ नारी अपन शक्‍ति‍केँ जगा संघर्ष नहि‍ करत ताधरि‍ मनुष्‍यक जि‍नगीसँ उतड़ि‍                पशुक जि‍नगी जीबैक लेल बाध्‍य रहबे करत। तेँ जरूरत अछि‍ अपन शक्‍ति‍ नारी                 जगतक लेल उपयोग करए। जखने आजादीक लेल डेग उठौत तखने अहॉंक जेल                 आगू ऐबे करत।

प्रति‍ज्ञा-            कते दि‍न जहलक डरे नारी अपन स्‍वतंत्र जि‍नगीकेँ बान्‍हि‍ कऽ राखि‍ सकैए। जेम्‍हर            देखू तेम्‍हर नारीपर अत्‍याचारे-अत्‍याचार जहि‍ना घरक भीतर तहि‍ना घरक बाहर।                   सगतरि‍ एक्के रामा-कठोला भऽ रहल छै। घरसँ नि‍कलि‍तहि‍ कतौ अपहरण तँ कतौ                 छेड़खानी सदति‍काल होइते रहैत अछि‍। एहेन स्‍थि‍ति‍मे इज्‍जत-आबरूक संग जीवि‍                  कहॉं धरि‍ संभव अछि‍।

जेलर-             (मूड़ी डोलबैत) कि‍छु अंशमे अहॉं कहब मानल जा सकैत अछि‍।

कल्‍याणी-     (झपटि‍ कऽ) कि‍छु अंशमे कि‍अए कहै छि‍ऐ हँ, ई बात जरूर जे जहि‍ना सभ                 मनुष्‍यक जि‍नगी समान नहि‍ अछि‍ तहि‍ना अत्‍याचारोक अछि‍। मुदा जेहन माहौल                बनल अछि‍ ओहि‍सँ कि‍ आभास भेटि‍ रहल अछि‍।

 जेलर-      (नम्‍हर सॉंस छोड़ैत) खैर, हमर ओकाति‍ये कते अछि‍ जे अहॉंक सब प्रश्‍नक उत्तर                  दऽ सकै छी। मुदा एते जरूर आग्रह करब जे पुन: जहलक ऑंखि‍ नहि‍ देखी।

कल्‍याणी-     जँ जहलक डर करब तँ जि‍नगी कोना भेटत। हँ, ई बात जरूर जे छोटसँ छोट              आ पैघसँ पैघ सैकड़ो घेराक बीच जहलो एकटा घेरा छी। मुदा ओकरा टपैक तँ                   दुइये टा उपाए अछि‍। या तँ कूदि‍ कऽ टपि‍ जाय वा तोड़ि‍ दि‍अए।

जेलर-             (मूड़ी डोलबैत) धि‍या-पूताक खेल नहि‍ छी।

कल्‍याणी-     मानै छी जे धि‍या-पूताक खेल नहि‍ छी, मुदा अहूँ सुनि‍ लि‍अ जे जाहि‍ पौरूष पाबि‍             नर पुरूष कहबैक अधि‍कारी बनल अछि‍ ओ ि‍सर्फ पुरूषेक नहि‍ नारि‍योक धरोहर                सम्‍पदा छी। अखन धरि‍ नारी जगतक नजरि‍ ओहि‍ दि‍शा दि‍शि‍ नहि‍ बढ़ल अछि‍ तैं                 ऑंखि‍ मूनि‍ सभ अत्‍याचार झेलि‍ रहल अछि‍। जखने ओहि‍ दि‍शा दि‍शि‍ देखि‍ आगू               डेग उठौत तखने......।

जेलर-             (मुस्‍कुराइत) हमर शुभकामना अहॉं सभक संग अछि‍।

      (कल्‍याणी आ प्रति‍ज्ञा आगू बढ़ैत। दुनू सि‍पाही फाटकक भीतर प्रवेश करैत। बीचमे जेलर ठाढ़ भऽ कल्‍याणी दि‍स देखैत। दू डेग आगू बढ़ि‍ कल्‍याणी पाछु घुरि‍ कऽ तकैत। दुनूक- जेलर आ कल्‍याणी- ऑंखि‍पर पर ऑंखि‍ पड़ि‍तहि‍ कल्‍याणी मुस्‍कुरा दैत। जेलर ऑंखि‍ नि‍च्‍चॉं      कऽ लैत। पुन: कल्‍याणी आगू डेग उठबैत। जेलरो भीतर दि‍स प्रवेश करैत। एकटा पएर   भीतर आ एकटा पएर बाहर रहि‍ते पुन: कल्‍याणी दि‍स देखैत। तहि‍ काल कल्‍याणि‍यो दुनू गोटे पाछु घुि‍र तकैत तँ जेलरपर नजरि‍ पड़ैत।)

जेलर-             (दुनू हाथ जोड़ि‍) अंति‍म वि‍दाइ।

कल्‍याणी-     (मुस्‍की दैत) अंति‍म वि‍दाइ नहि‍ पहि‍ल वि‍दाइ। जाधरि‍ अहॉंक जहल रहत ताधरि‍              एक नहि‍ हजरो बेरि‍ आएब।


      (फाटक बन्न कऽ जेलर भीतर जाइत अछि‍। कल्‍याणी आ प्रति‍ज्ञा दू डेग आगू बढ़ि‍)

कल्‍याणी-     अखन धरि‍ जहि‍ना अहॉं कओलेजक एकटा छात्रा छी तहि‍ना हमहूँ छी। मुदा आब              तँ पढ़ाइक अंति‍मे समए छी। परीक्षो भइये गेल। रि‍जल्‍ट नि‍कलत जि‍नगीक लीला                शुरू हएत।

प्रति‍ज्ञा-            जि‍नगि‍ऐक लीला कि‍अए कहै छी नावालि‍कक सीमा सेहो टपि‍ गेलहुँ। जहि‍या जेल              एलौं तहि‍या ने नावालि‍क छलौं। जहि‍सँ देश आ समाजक प्रति‍ ने कोनो अधि‍कार                  छलए आ ने कोनो कर्तव्‍य। मुदा से तँ आब नहि‍ रहल। ओना बालबोधे जे कि‍छु                केलहुँ ओहो कोनो अधला थोड़े केलहुँ।

कल्‍याणी-     अखन धरि‍ जे कि‍छु भेल ओ बाल-बोधक खेल भेल। मुदा जहलक भीतर                         नावालि‍कक सीमा टपि‍ वालि‍क भेलहुँ। १८वर्ष पूरा भेल। जि‍नगीक लेल आइ                 संकल्‍प ली जे जाधरि‍ नरीक अन्‍याए होइत रहत ताधरि‍ चैनक सॉंस नहि‍ लेब।

प्रति‍ज्ञा-            अखन धरि‍ ने अहॉंकेँ एहि‍ रूपे हम चि‍न्‍हैत छलौं आ ने अहॉं हमरा चि‍न्‍है छलौं। तैं           दुनू गोटे संकल्‍पक संग शपथ ली जे जाधरि‍ सॉंस रहत ताधरि‍ संग-संग रहब।

कल्‍याणी-     नि‍श्‍चि‍त। जे कि‍यो एहि‍ धरतीपर जन्‍म नेने अछि‍ सभकेँ स्‍वतंत्र रूपे जीवैक                 अधि‍कार छे (कि‍छु काल चुप भऽ) सृष्‍टि‍क शुरूहेसँ देखैत छी जे जहि‍ना ऋृषि‍                   भेलाह तहि‍ना ऋृषि‍का सेहो भेलीह। (पुन: रूकि‍) संग-संग ि‍जनगी बि‍तबि‍तहुँ पुरूष                नारीक संग भीतरघात करैत-करैत सकपंज कऽ देलनि‍। जेकर परि‍णाम भेल जे                   ओकर पहाड़ सदृश्‍य रूप बनि‍ गेल अछि‍।

प्रति‍ज्ञा-            (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ बनि‍ गेल अछि‍। मुदा जहि‍ना रसे-रसे बंधन सक्कत होइत                   गेल तहि‍ना रसे-रसे तोड़हुँ पड़त। एक्के बेरि‍ जँ सब बंधनकेँ तोड़ए चाहब से संभव                  नहि‍ अछि‍।

कल्‍याणी-     (मूड़ी डोलबैत) ई तँ अछि‍। मुदा दुनि‍यॉंमे एहेन कोनो काज नहि‍ अछि‍ जेकरा                 मनुष्‍य नहि‍ कऽ सकैत अछि‍। तहन ई बात जरूर अछि‍ जे जे जेहन काज रहत                ओहि‍क लेल ओहि‍ तरहक शक्‍ति‍क जरूरत पड़ैत। तेँ जरूरी अछि‍ जे जहि‍ना                  अखन हम दुनू गोटे मि‍लि‍ संकल्‍प लेलहुँ तहि‍ना आरोकेँ जोड़ि‍ शक्‍ति‍क अनुकूल डेग         उठाएव।

प्रति‍ज्ञा-            हँ, से तँ कहलो गेल अछि‍ जे जमात करए करामात।‍ जेना-जेना दुर्ग टपैत                जाएब तेना-तेना शक्‍ति‍यो बढ़ैत जाएत। जहि‍ना बुन-बुन पानि‍ मि‍लि‍ धरतीपर ससरि              धारा बनि‍ धारक आकार बना समुद्रक रूप ग्रहन करैत तहि‍ना ने मनुष्‍योक होएत।

प्रस्‍थान, पटाक्षेप

दोसर दृश्‍य-

     (जहलक बाहरी छहरदेवाली टपि‍ कल्‍याणी आ प्रति‍ज्ञा। दोसर ि‍दससँ कल्‍याणीक भाए      चन्‍द्रनाथ आ माए शान्‍तीकेँ देखैत तँ दोसर दि‍ससँ शान्‍ती कल्‍याणीपर नजरि‍ अटकौने। जना शान्‍तीकेँ बघजर लगि‍ गेल दुनू ऑंखि‍सँ नोट टघरैत। मुदा कल्‍याणी आ प्रति‍ज्ञाक मुँहसँ    खि‍लैत माने फुलाइत फूल जकॉं हँसी नि‍कलैत।)

कल्‍याणी-     (आगू बढ़ि‍) माए, अहॉं कनै कि‍अए छी? बेटी कोनो अधला काज कऽ जहल नहि‍              आइलि‍ छलि‍। (कहैत दुनू हाथे दुनू पाएर पकड़ि‍) अहॉं असि‍रवाद दि‍अ। जहि‍ना              समाजक आन माएसँ हटि‍ अहॉं पढ़ैक छूट देलहुॅं तहि‍ना हमरो दायि‍त्‍व होइत अछि‍                 जे समाजक कल्‍याणक दि‍शामे आगू बढ़ी। जाधरि‍ परि‍वारक डेग आगू दि‍शि‍ नहि‍                बढ़त ताधरि‍ समाज कोनो बनत?
     
      (दुनू बॉंहि‍ पकड़ि‍ शान्‍ती कल्‍याणीकेँ उठबैत। कल्‍याणी उठि‍ कऽ माइक दुनू ऑंखि‍क नोर   दुनू हाथसँ पोछि‍ ऑंखि‍पर ऑंखि‍ गरा आगूमे ठाढ़ि‍। शान्‍तीक ऑंखि‍सँ धरती, पहाड़, समुद्रक       रूप छि‍टकैत तँ कल्‍याणीक ऑंखि‍सँ सि‍ंहक रूप छि‍टकैत)

चन्‍द्रनाथ-     अहॉं सभ ताबे एतै अँटकू। एकटा सवारी नेने अबै छी। (कहि‍ भीतर जाइत)

प्रति‍ज्ञा-            चाची, आइ धरि‍ नारी जगत, कमला-कोसीक धारक संग कारी मेघक बरखा सदृश्‍य             अदौसँ नोर बहबैत आइल अछि‍ मुदा जाधरि‍ ओहि‍ नोरकेँ बहैक कारणकेँ नहि‍ रोकल            जाएत ताधरि‍ बहब कोना बन्न हएत? जहि‍ना बेटी कल्‍याणी छी तहि‍ना प्रति‍ज्ञो छी।               असि‍रवाद दि‍अ।

शान्‍ती-             (माइक नजरि‍सँ नजरि‍ मि‍ला) तू सभ जहल कि‍अए ऐहल?

कल्‍याणी-     परीक्षाक आखि‍री दि‍न एक्केटा वि‍षएक परीक्षा रहै। जे दोसर खेपमे माने दोसर                 सत्रमे रहै। चारि‍ बजे समाप्‍त भेल। ओना प्रश्‍न हल्लुके बुझि‍ पड़ल। जहॉं सवाल                पढ़लौं कि मन हल्‍लुक भऽ गेल। नीक जकॉं लि‍खलौं। डेरा अबैत रही कि‍ रस्‍तामे             देखलि‍यै.....।

शान्‍ती-             की देखहलक?

कल्‍याणी-     आगू-पाछू वि‍द्यार्थी (संगी) सभ डेरा अबैत रहै। हम दुनू गोरे (कल्‍याणी आ प्रति‍ज्ञा)                   पाछु रही। हमरासँ करीब चारि‍ लग्‍गी आगू रूपा असकरे अबैत रहै। मोटर               साइकि‍लपर एकटा युवक पाछूसँ जाइत रहै। रूपा लग आबि‍ पहुँचते साइकि‍लेपर सँ          देह परक ओढ़नी खींचि‍ लेलक।
     
      (ओढ़नी खि‍ंचैक सुनि‍ शान्‍ती चौंकि‍ गेलि‍। जना बॉंसक दू टुकड़ी रगड़सँ आगि‍क लुत्ती    छि‍टकैत तहि‍ना शान्‍तीक ऑंखि‍सँ लुत्ती छि‍टकल)

शान्‍ती-             ऐँ, एते अन्‍याए?

प्रति‍ज्ञा-            चाची, अहॉं गाम-घरमे रहै छी तैं नइ दखै छि‍ऐ। एहेन-एहेन अन्‍याए हजारक हजार                   रोज होइए।

शान्‍ती-             राही-बटोही कि‍छु ने कहै छै?

प्रति‍ज्ञा-            की कहतै। नि‍र्लज पुरूख नारीक लाज (इज्‍जत) थोड़े बुझैए। उ सभ तँ नारीकेँ              खेलौना बनौने अछि‍। एक्के पुरूख अपन बहू-बेटीकेँ इज्‍जतक नजरि‍ऐ देखैत अछि‍              मुदा दोसराकेँ रण्‍डी-बेश्‍या बुझैत अछि‍।
      (क्रोधसँ शान्‍ती थर-थर कँपए लगल। दुनू ऑंखि‍ लाल भऽ गेलै)

शान्‍ती-             तब की भेलै?

प्रति‍ज्ञा-            बेचारी रूपा, आगू-पाछू ताकि‍, मूड़ी गोति‍ आगू बढ़ैत गेल। मुदा हमरा दुनू गोरेकेँ नै             देखल गेल। सड़कक कातेमे पीचक पजेबा उखड़ल रहै। दुनू गोटे पजेवा हाथमे              लऽ दौड़ि‍ कऽ ओकरापर फेकलौं। एकटा तँ हूसि‍ गेलै। मुदा दोसरक कपारमे               लगलै।
शान्‍ती-             वाह-वाह, भगवान हमरो औरूदा तोरे सभकेँ देथुन। भॉंइमे कि‍यो दादा हुअए। नारी-             जाति‍क सान बचेलहुँ। तेकर उत्तर की भेल?

प्रति‍ज्ञा-            ओ साइकि‍लपर सँ खसि‍ पड़ल। कपारसँ खून गड़-गड़ चुबए लगलै। हल्‍ला भेलै।            तखने ट्रैफि‍क पुलि‍स आबि‍ कऽ दुनू गोटेकेँ पकड़ि‍ पहि‍ने थाना लऽ गेल। थानासँ              जहल पठा देलक।

शान्‍ती-             मुदा हम तँ दोसरे-तेसरे बात सुनलौं।

प्रति‍ज्ञा-            की?

शान्‍ती-             कते बाजब कोइ कि‍छो तँ कोइ कि‍छो बाजैए। एक गोरे कहलक जे दुनू गोटे                परीक्षामे चोइर करैत पकड़ल गेल।


प्रति‍ज्ञा-            चाची, झूठकेँ सत्‍य बनाएव आ सत्‍यकेँ झूठ बनाएव छुद्दर पुरूख सभक गुण छी।              जहि‍ना बहीनि‍ कल्‍याणीक माए छि‍यै तहि‍ना हमरो छी अहॉं लग झूठ बाजब।

शान्‍ती-             (कि‍छु मन पाड़ैत) बेटी प्रतिज्ञा, तू जे कहलह ओ अपनो मनमे अबैए। मुदा बि‍ना              पुरूखक मदति‍ऐ नारी जीवि‍ कोना सकैए?

कल्‍याणी-     (उत्‍साहि‍त भऽ) माए बि‍ना पुरूखक नारी जनकपुरमे। अखन धरि‍ नारीकेँ पुरूख               अन्‍हारमे रखलक। जइसँ ओकरा अपन सभ गुन हरा गेलइ। घरक भीतर रखि‍               ओकरा दुनि‍यॉंक बात बुझै नहि‍ देलक। जइसँ ओ परती खेत नहाति‍ सब कि‍छु              रहि‍तो पानि‍-बि‍हाड़ि‍, जा़ड़, रौद, भुमकमक चोटसँ नि‍ष्‍क्रि‍य भऽ गेल।

शान्‍ती-             अइ बातकेँ नारी कि‍अए ने अखैन धरि‍ बुझि‍ रहल अछि‍?

कल्‍याणी-     एकरो कारण छै। सृष्‍टि‍क नि‍‍र्माण पुरूष नारीक संयोगसँ होइत अछि‍। जहि‍ना गाड़ी,            दू पहि‍यासँ चलैत अछि‍, तहि‍ना। मुदा नारीक पेटमे नअ मास रहि‍ बच्‍चाक जन्‍म                 होइत अछि‍। एहि‍ दौरमे नारीकेँ कठि‍न कष्‍टक सामना करए पड़ैत अि‍छ। जेकर                   लाभ पुरूख उठौलक।

शान्‍ती-             (मूड़ी डोलबैत) हूँ...।

कल्‍याणी-     बच्‍चाक पालन खाली पेटे धरि‍ नहि‍ जन्‍म लेलाक पछाति‍यो होइत अछि‍।                    जइमे घेरा जाइत अछि‍। घेराइत-घेराइत एते घेरा जाइत जे जि‍नगी बदलि‍ गुलाम                 बनि‍ जाइत अछि‍।

शान्‍ती-             (मूड़ी डोलबैत) एहेन स्‍थि‍ति‍मे नारी पुरूखक बराबरी कोना कऽ सकैत अछि‍?

प्रति‍ज्ञा-            (उत्तेजि‍त भऽ) कए सकैए, चाची।
     
      (सवारी लऽ कऽ चन्‍द्रनाथक प्रवेश)

चन्‍द्रनाथ-     चलै चलू। सवारी आबि‍ गेल।

प्रस्‍थान,  पटाक्षेप।

तेसर दृश्‍य-

     (अनन्‍त कुमारक घर। दरबज्‍जापर एकटा चौकी राखल आ बगलमे कुरसीपर अनन्‍त कुमार       बैसि‍, ऑंखि‍ बन्न केने)

अनन्‍तकुमार-  (स्‍वयं) दि‍नो-दि‍न जि‍नगी जपाल भेल जा रहल अछि‍। जे दि‍न जे क्षण बीति‍ रहल                   अछि‍ ओ नरकक वास भऽ रहल अछि‍। मुदा मऽरबो तँ हाथमे नहि‍ऐ अछि‍ अपने                  हाथे आत्‍महत्‍यो कोना कए लेब?

      (चाह नेने शान्‍तीक प्रवेश। पति‍क हाथमे कप पकड़बैत शान्‍ती चौकी बगलमे ठाढ़। एक   घोट चाह पीबि‍ अनन्‍त कुमार शान्‍ती दि‍स देखि‍।)

अनन्‍तकुमार- जि‍नगी भार भऽ गेल। अकाजक अन्न सन देबकेँ हत्‍या करैत छी। नीरस बि‍ना               रसक जि‍नगी कोकनल गाछ सदृश्‍य होइत अछि‍। जे पि‍ल्‍लू, गराड़क घर बनि‍              जाइत अछि‍ तहि‍ना जि‍नगी बुझि‍ पड़ैए।

शान्‍ती-             सोग केलासँ सोग थोड़े मेटाएत। सोग तँ समस्‍याकेँ जनम दैए। जे बि‍ना केने थोड़े            मेटाएत?

अनन्‍तकुमार- जखने घरसँ नि‍कलै छी तखने रंग-वि‍रंगक अड़कच-बथुआ काचर-कुचर सुनए लगै              छी। केकरा कि‍ कहि‍औ। कते लोकसँ माथ चटाउ। ककरो मुँहमे जाबी लगौनाइ                 असान छी।

शान्‍ती-             कते दि‍न मूड़ी गोि‍त समाजमे जीवि‍?

अनन्‍तकुमार- नीक हएत जे झब दए कल्‍याणीक वि‍आह करा दि‍यै। आन गाम गेलापर तँ लोकक                   बात नै सुनब। जहि‍ना पोखरि‍क पाि‍नक ि‍हलकोर जे दू-चारि‍ दि‍नमे शान्‍त भऽ जाइत          छै तहि‍ना असथि‍र भऽ जाएत।

      (चन्‍द्रनाथक प्रवेश)

शान्‍ती-             भने बउऔ आबि‍ऐ गेल। दुनू बापूत छीहे वि‍चारि‍ कऽ रास्‍ता नकालि‍ लि‍अ।

चन्‍द्रनाथ-     (अकचकाइत) कथीक रास्‍ता माए? कोन एहेन दुर्ग टूटि‍ कऽ खसि‍ पड़ल जे                 बाबूकेँ हम वि‍चार देवनि‍।

अनन्‍तकुमार- बौआ, नीक की बेजाए, अपना परि‍वारमे नै बाजव तँ कतए बाजब। जखने गाम                दि‍शि‍ टहलै छी, सोझा-सोझी तँ नहि‍ मुदा, अढ़ दाबि‍-दाबि‍ मौगि‍यो आ मरदो की                   बजैए तेकर कोनो ठेकान नहि‍।

चन्‍द्रनाथ-     की बजैए?

अनन्‍तकुमार- कि‍यो बजैए जे कल्‍याणी जहल जा कुल-खनदानक नाक-कान कटौलक। तँ कि‍यो              बजैए जे केहन माए-बाप छै जे बेटीक वएस बीतल जाइ छै मुदा वि‍आह करैले नीने        ने टुटै छै।

चन्‍द्रनाथ-     बाबू, जहि‍ना दि‍नक उनटा राति‍ होइ-छै तहि‍ना नीक अधलाक बीच सेहो होइ-छै                ज्ञान-अज्ञानक बीच सेहो होइ छै। धरतीपर ओतै अधलो अछि‍। हमरा बुझने तँ             अधले बेसी अछि‍। कि‍ऐक तँ नीक एक्के तरहक होइ छै जहन कि‍ अधला अनेको                   रंगक- रावण, कौरबक सखा जकॉं।

अनन्‍तकुमार- ततबे नै ने इहो बजैए जे पढ़ा-लि‍खा कऽ बेटी तेहन बना लेलक जे चौक-चौराहापर            पुरूखे जकॉं मुँह-कान उधारि‍ नि‍धोख भाषणो करैए।

चन्‍द्रनाथ-     बाबूजी, हमर बहीन कुम्‍हरक बति‍या नै ने छी जे ओंगरी बतौने सड़ि‍ जाएत। जँ               कि‍यो ऑंखि‍ उठाओत वा ओंगरी बतौत तँ ओकर ऑंखि‍यो फोड़ि‍ देबै आ ओंगरि‍यो                  काटि‍ लेबइ। अपन माए-बहीनि‍ दि‍स देखह जे माटि‍क मुरूत बनौने अछि‍।

शान्‍ती-             बौआ, हम दुनू परानी तँ पाकल आम भेलौं जाबे जीबै छी, ताबे जीबै छी। कखनी              खसि‍ पड़ब तेकर कोन ठीक। मुदा तू दुनू भाए-बहीि‍न तँ से नइ छह। भगवान              करथुन जे हँसैत-खेलैत शतायु हुअअ।
     
      (कल्‍याणीक प्रवेश)

अनन्‍तकुमार- बेटी कल्‍याणी, तोरा सभले ओइ गीरहकेँ तोड़ि‍ देलौं जइ बंधनक बीच कन्‍या                  अज्ञानक काल-कोठरीमे जीवैत अछि‍।

कल्‍याणी-     बाबूजी, जहि‍ना अहॉं समाजमे पहि‍ल डेग उठा नव फुलक गाछ रोपलौं तहि‍ना अहॉंक           आत्‍मा एक नहि‍ अनेक फुलक फुलवाड़ी लगौत।

शान्‍ती-             बेटी, भगवान हमरो दुनू बेकतीक औरूदा तोरे दुनू भाए-बहीनि‍केँ देथुन। जाबे बच्‍चा                   छेलह ताबे जतए धरि‍ भऽ सकल सेवा केलि‍यह। आब तँ तोरे सबहक दि‍न-दुनि‍यॉं                   भेलह, हम सभ तँ अस्‍ताबल भेलौं।

कल्‍याणी-     माए, नारीक संग अत्‍याचार करैत-करैत पुरूख एहेन अभि‍यस्‍त भए गेल अछि‍ जे              उचि‍त-अनुचि‍तक सीमे समाप्‍त भऽ गेल छै। जहि‍सँ नारी खसैत-खसैत एते नि‍च्‍चॉं                  खसि‍ पड़ल अछि‍ जे स्‍वरूपे समाप्‍त भऽ गेल अछि‍।

अनन्‍तकुमार- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ भऽ गेल अछि‍।

कल्‍याणी-     बावू, ई दुि‍नयॉं कर्मभूमि‍ छी ‍वीर भोग्‍या बसुंधरा जे जेहन कर्म करत ओ ओहन              फल पाओत। जहि‍ना डोरीक एक भत्ता अहॉं तोड़ि‍ हमरा अन्‍हारसँ इजोतक रस्‍ता                  खोललौं। तहि‍ना एक-एक भत्ता तोड़ि‍ नारी जगतक बन्‍धन तोड़ि‍ देवइ।

अनन्‍तकुमार- बंधन तँ सक्कत अछि‍, मुदा ओकरा तोड़नहुँ बि‍ना तँ कल्‍याण नहि‍ऐ अछि‍। मुदा एहि‍            लेल ज्ञान, साहस आ धैर्यक जरूरत अछि‍।

कल्‍याणी-     (मुस्‍की दैत) पौरूष सि‍र्फ पुरूखे लेल नहि‍ नारि‍योक लेल वि‍धाता देने छथि‍न।                जरूरत अछि‍ ओकरा पकड़ेक। हमहूँ आब नावालि‍क नहि‍ बालि‍क भेलहुँ  ततबे नहि‍          कि‍रि‍णक डोरसँ सुनि‍ सेहो देखि‍ लेलहुँ। जहि‍ना सृष्‍टि‍क ि‍वकासमे पुरूष-नारी समान            अछि‍ तहि‍ना जाधरि‍ दुनूक बीच समानता नहि‍ आाअेत ताधरि‍ चैनक सॉंस नहि‍ लेब

अनन्‍तकुमार- बहुत कष्‍ट हएत?

कल्‍याणी-     (हँसैत) ‍जीबन नया मि‍लेगा, अंति‍म चि‍ता मे जलके। जहि‍ना भि‍नसुरका सूर्ज                देखने दि‍नक अनुमान होइत अछि‍ तहि‍ना तँ नवालि‍कक आड़ि‍ हमहूँ जहलेमे टपलौं                 कि‍ ने।
प्रस्‍थान,  पटाक्षेप।

चारि‍म दृश्‍य-


     (दरबज्‍जाक चौकीपर चद्दरि‍ ओढ़ि‍, मुँह उधारने अनन्‍त कुमार पड़ल। पँजरामे शान्‍ती बैसल)

शान्‍ती-             (देह छुवि‍) बोखारसँ देह जरैए आ अहॉं जि‍द्द बन्‍हने छी जे रदबज्‍जापर सँ अंगना              नइ जाएब।

अनन्‍तकुमार- आइ धरि‍ परि‍वार अंगने भरि‍ रहल मुदा कल्‍याणी सन बेटी कुलमे जन्‍म लेलक। जे            आंगनसँ नि‍कलि‍ समाज रूपी परि‍वारमे रहए चाहैए, बाप होइक नाते हम दरबज्‍जो              धरि‍ नइ अरि‍आति‍ देवइ।

शान्‍ती-             कहलौं तँ ठीके मुदा माए-बाप, बेटा-बेटीकेँ जनमे ने दइ छे करम तँ अपने काज               करै छै।

अनन्‍तकुमार- हमरा अइ परि‍वारक कोनो भार नै अछि‍ जहि‍ना बाबू दरबज्‍जा बना कए गेला तहि‍ना            अंति‍म सॉंस धरि‍ दरबज्‍जाक रक्षा माने मान-सम्‍मान करैत रहब।

      (चन्‍द्रनाथक प्रवेश)

चन्‍द्रनाथ-     (अवि‍तहि‍) बाबू कि‍अए, चद्दरि‍ ओढ़ने छि‍ऐ?

शान्‍ती-             बोखारसँ आगि‍ फेकै छनि‍। कतबो कहै छि‍अनि‍ जे पुरबा लहकै छी, चलू आंगन, से            कहै छथि‍ जे अंति‍म समएमे दरवज्‍जापर प्राण छोड़ब। पुरबा-पछबाक काज छि‍ऐ। बहनाइ,                  बह-अ।

चन्‍द्रनाथ-     बाबू, जे बात अहॉं आइ बजलौं से पहि‍ने कहॉं कहि‍यो बाजल छलौं।

अनन्‍तकुमार- तोहर प्रश्‍नसँ हृदय जुरा गेल बौआ। माए छथुन तँ फुटल ढोल। भरि‍ दि‍न पनचैती                  केने घुरतीह जे सभ शान्‍तीसँ मि‍लि‍-जुलि‍ कऽ रहू। मूदा जहि‍ना शक्‍ति‍ बढ़ल जाइत          अछि‍ तहि‍ना हि‍नकर पनचैति‍यो बढ़ल जाइ छनि‍।


चन्‍द्रनाथ-     (ठहाका मारि‍) हूँ-हूँ.....।

शान्‍ती-             बुरहा तँ नीक-अधला सभ दि‍न कहलनि‍। जखन-जुआन रही तखन बरदास भेल आ            आब तामस उठत। दुनि‍यॉंमे जँ कि‍यो संग पुरलनि‍ तँ सभसँ बेसी यएह ने पुरलनि‍।         मुदा आब भगवान अन्‍याए केलनि‍ जे पहि‍ने हमरा नइ ओछाइन छड़ौलनि‍।

अनन्‍तकुमार- नीक हेतह जे कल्‍याणि‍यो केँ सोर पाड़ि‍ लहक।

      (चन्‍द्रनाथ भीतर प्रवेश। कल्‍याणीक संग मंचपर प्रवेश।)

कल्‍याणी-     बाबू, किछु होइए?

अनन्‍तकुमार- नहि‍।

शान्‍ती-             कि‍ कहथुन। बोखारसँ दह जड़कै छनि‍।

कल्‍याणी-     कोनो दवाइ नहि‍ देलहुनहेँ?

अनन्‍तकुमार-  दवाइ खाइबला रोग नहि‍ छी बेटी। मनमे एते खुसी आबि‍ गेल अछि‍ जे सौंसे देह              हँसैए।

कल्‍याणी-     (मने-मन सोचैत। मुँहक पोज सुख-दुखक यएह अवस्‍था छी) माए कि‍छु कहै छथि‍             अहॉं कि‍छु कहै छी? (आवेशमे अबैत) कि‍अए बजेलौं?

अनन्‍तकुमार- कतए गेल छेलह?

कल्‍याणी-     महि‍लाक एकटा बैसारक आयोजन करए चाहै छी जहि‍मे वि‍धवा समस्‍याक संबंधमे              वि‍चार करब।

अनन्‍तकुमार- ई तँ छोट समस्‍या छह। अखन नव उत्‍साह छह पैघ समस्‍याकेँ नजरि‍मे रखि‍ डेग                   उठाबह।

कल्‍याणी-     (वि‍स्‍मि‍त होइत) कोना एहि‍ समस्‍याकेँ छोट समस्‍या कहै छि‍यै।

अनन्‍तकुमार- भने तँ समाज दि‍स डेग उठेबे केलह, बुझवे करबहक। मुदा पहि‍ने समाजकेँ                 पढ़ए पड़तह। (उठि‍ कऽ बैसैत) चद्दरि‍ उताड़ि‍ सि‍रमापर रखि‍ दुनू पाएर मोड़ि‍ कए                 बैसैत सभ कि‍यो एकठाम बैसह।

      (चारू गोटे चौकीपर बैस जाइत अछि‍।)

अनन्‍तकुमार- सभकेँ अपन परि‍वारमे, एक सीमा धरि‍ लाज-वि‍चार करक चाही माइये छथुन पहि‍ने                   हि‍नका वि‍षएमे सुनि‍ लाए।
     
      (पति‍क बात सुिन शान्‍ती देह-हाथ समेटि‍ सांकांक्ष होइत बैइसैत। चन्‍द्रनाथ मूड़ी गोति‍            लेलक। कल्‍याणी पि‍ताक ऑंखि‍पर ऑंखि‍ गड़ा लेलक।)

अनन्‍तकुमार- जहि‍यासँ माए एलखुन तहि‍यासँ जि‍नगीक अंति‍म पड़ाव धरि‍ संगे छी। गुण-अवगुण              मनुष्‍यमे होइते अछि‍। मुदा सदति‍काल दुनूपर नजरि‍ रखि‍ गुणकेँ बढ़बैक आ                 अवगुणकेँ कम करैक कोशि‍स करैक चाही। जहि‍सँ नीक रास्‍ता पकड़ि‍ आगू बढ़ब।

कल्‍याणी-     ई तँ बड़ कठि‍न काज छी, बाबू।

अनन्‍तकुमार- (मुस्‍की दैत) हँ, ई वि‍वेकक काज छी। अही दुआरे मनुष्‍य सभ जीबि‍सँ उपर भेल।                   ओना उपर होइक दोसरो कारण ई अछि‍ जे धरतीपर जते जीवि‍-जन्‍तु अछि‍ तहि‍मे                  मनुष्‍य अंति‍म रूप छी।

कल्‍याणी-     माइक चरचा करए लगलि‍ऐ?

अनन्‍त कुमार-       हँ। देखहक, अइ धरतीपर अनेको लोक अछि‍। जेकर सीमा नि‍र्धारि‍त कर्म आ               ज्ञान केने अछि‍। एहि‍ अर्थमे माए बहुत दूर छथुन। मुदा अहूँ अवस्‍थामे आत्‍मा माने          वि‍वेक सएह कहैए जे अखनो धरि‍ दोसराक पैतपाल करैक शक्‍ति‍ छनि‍।

चन्‍द्रनाथ-     (मूड़ी उठा) एते दि‍न कि‍अए......?

अनन्‍त कुमार-       हँ, ठीके तू पूछए चाहै छह। जहि‍ना माली, बि‍ना फूलक बीआ देखनहुँ पात देखि‍,             बुझि‍ जाइत अछि‍ जे ई अमुक फूलक गाछ छी। तहि‍ना कल्‍याणीकेँ देखि‍ वि‍वेक                   जगि‍ गेल।

चन्‍द्रनाथ-     एते दि‍न वि‍वेक सुतल छलै?

अनन्‍त कुमार-       नइ बौआ, जहि‍ना आमक गाछक जड़ि‍मे जनमल तुलसी गाछक बाढ़ि‍ ठमकि‍ जाइत              अछि‍ तहि‍ना ठमकि‍ गेल छलै। मुदा कल्‍याणीक ऑंखि‍क ज्‍योति‍ जहि‍ना सुनयनाक                  बेटी सीताक छलनि‍ तहि‍ना बुझि‍ पड़ैए। तेँ अनायास वि‍वेक पोनगि‍ गेल।

कल्‍याणी-     माए, बावूक संग अहूँ असि‍रवाद दि‍अ।

शान्‍ती-             अखन धरि‍ जे डीह, पुरखाक कएल काजक इति‍हास छी ओकरा जीवि‍त दुनू भाए-             वहीनि‍ मि‍लि‍ राखब।

कल्‍याणी-     झॉंपल-तोपल बात अहॉंक नहि‍ बुझि‍ सकलौं।

शान्‍ती-             हम तँ बेसी-बि‍सरि‍ये गेलौं। बावूए कहथुन।

अनन्‍तकुमार- बेटी कल्‍याणी, पहि‍ने परि‍वार बुझि‍ लहक। तू दुनू भाए-बहीनि‍ छह। जहि‍ना तू घरसँ            नि‍कलि‍ दोसर घर जेवह तहि‍ना दोसरा घरसँ अपनो घर औतीह। एहि‍सँ मनुष्‍यक                   स्‍थानान्‍तर (ट्रान्‍जेक्‍शन) शुरू भेल। ओना अपनो परि‍वारमे लड़का-लड़की                       होइत (जन्‍म) अछि‍, कि‍अए दोसर परि‍वारसँ संबंध जोड़ल जाइत अछि‍?

      (चन्‍द्रनाथ बहीि‍न दि‍स हाथ बढ़ौलक, कल्‍याणी भाइक हाथमे हाथ रखलक। माटि‍क मूर्ति   जकॉं अनन्‍तकुमार देखैत। अपने मने शान्‍ती बरबराए लगलीह)

शान्‍ती-             सासु-ससुरक बनौल परि‍वारकेँ अखन धरि‍ नि‍माहि‍ रहल छी। जहि‍ना बूढ़ा दुआरपर                   आएल अभ्‍यागतकेँ बि‍ना हँसौने नहि‍ जाइ दइ छेलखि‍न तहि‍ना अखन धरि‍ नि‍माहल।

कल्‍याणी-     ई तँ काजक भार भेल, माए। मुदा असि‍रवादो ने चाही?

शान्‍ती-            बेटी, सामाक माए-बाप जकॉं, तोहर माए-बाप नहि‍ छथुन। जहि‍ना सामाक लेल                चकेबा सभ कि‍छु त्‍यागि‍ संग पुरलक तहि‍ना तोरो भाए करथुन।

      (चन्‍द्रनाथकेँ भारसँ दबैत देखि‍ अनन्‍त कुमार)

अनन्‍तकुमार- हँ, कहै छेलि‍यह। जहि‍ना कम्‍पोजि‍ट (शंकर) बीज उन्नति‍शील होइत तहि‍ना मनुष्‍योक            प्रक्रि‍या अछि‍। (बात बदलैत) सदति‍काल माए माथ खोड़ैत रहै छथुन जे कि‍अए              बेटीक (कल्‍याणीक) वि‍आह अनठौने छी। मुदा हम अनठौने कहॉं छी।

कल्‍याणी-     (ऑंखि‍ लाल केने) बाबू......।

अनन्‍तकुमार- (मुस्‍कुराइत) बेटी हुनको वि‍चार अधला नहि‍ये छन्‍हि‍। बेटीक प्रति‍ माएक ममता वेसी            होइ छै। मुदा पि‍रवारमे वि‍वाह साधारण काज नहि‍ छी। तहूमे अखन, सभ तरहक                  संक्रमणक प्रक्रि‍या चलि‍ रहल अछि‍।

चन्‍द्रनाथ-     की संक्रमण?

अनन्‍तकुमार- पहि‍ने अपन इति‍हास बुझि‍ लाए। अदौमे स्‍वयंवर प्रथाक चलनि‍ छल। जहि‍क                 माध्‍यमसँ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ भार दऽ देलकनि‍। मुदा आइ की देखैत छहक जे                तते ओझरी लगि‍ गेल जे जते सोझरबैक रस्‍ता अपनौल जाइत अछि‍ ओते ओझरी                  बेसि‍आइये जाइ छै।

कल्‍याणी-     बाबू, हमहूँ अबोध बच्‍चा नहि‍ छी बालि‍ग भेलहुँ। तेँ......।

अनन्‍तकुमार- बि‍ल्‍कुल ठीक सोचै छह। जखन महि‍लामे पेंइतालीस-पचास बर्ख धरि‍ सन्‍तान उत्‍पन्न            करैक शक्‍ति‍ रहैत अछि‍ तखन कम उम्रमे वि‍वाह तँ बड़ जरूरी नहि‍ये भेल?

कल्‍याणी-     असि‍रवाद ि‍दअ। समाजक बीच कि‍छु करैक ि‍जज्ञासा भऽ गेल अछि‍।

अनन्‍तकुमार- बेटी, हृदएसँ असि‍रवाद दइ छि‍अह। जहि‍ना अदौमे कोनो अछुत जाति‍ जखन कोनो             गाममे प्रवेश करैत छल तखैन कोनो ऐहन बाजा बजबैत छल जे लोक बुझि‍ जाइत                छलै।

कल्‍याणी-     (चकोना होइत) कि‍ कहि‍ देलि‍यै?

अनन्‍तकुमार- पुरना गप कहलि‍यह। आब तँ गीताक युग एलै। तेँ जहि‍ना कृष्‍ण कुरूक्षेत्रमे शंखक            अवाजसँ अपन जानकारी दैत छलथि‍न। तहि‍ना......।

कल्‍याणी-     (ऑंखि‍-कान चकोना करैत चारू भाग देखि‍) कने बुझा कऽ कहि‍यौ?

अनन्‍तकुमार- समाजमे कि‍छु करए चाहै छह तँ काल्‍हि‍ये बेरू पहर दुर्गास्‍थानमे बैसार करह।

कल्‍याणी-     काल्‍हि‍सँ नीक जे रवि‍ दि‍न बैसार करब नीक रहत। ओहि‍मे नोकरि‍यो चाकरि‍यो सभ            रहताह।

अनन्‍तकुमार- नोकरी-चाकरी कए कऽ जे गामक नास केलक ओकरा बुते गाम बनौल हएत।                जहि‍ना भि‍नसुरकेे सूर्य देखलासँ दि‍न भरि‍क अनुमान लोक कऽ लैत अछि‍ तहि‍ना              मनुक्‍खक कि‍रदानि‍ये देखि‍ कऽ मनुक्‍खकेँ ि‍चन्‍हए पड़तह।

कल्‍याणी-     हुनका बुते कोना गामक वि‍चार कएल हेतनि‍।

अनन्‍तकुमार- (खि‍सि‍या कऽ) दि‍ल्‍ली सरकारमे सभसँ बेसी बि‍हारक रेलमंत्री भेलाह। मुदा कि‍ देखै            छहक? जकरा तू अबोध कहै छहक ओकर जि‍नगि‍यो छोट छै। जि‍नगीक समस्‍यो              कम होइत अछि‍।

कल्‍याणी-     अखने जा कऽ ढोलि‍याकेँ ढोलहो दइले कहि‍ अबैत छि‍अनि‍। सॉंझू पहर ढोलहो दऽ            देब।
प्रस्‍थान,  पटाक्षेप।


पॉंचम दृश्‍य-

      (दुर्गास्‍थानक आगूमे एक भाग पुरूष एक भाग महि‍ला बैसल। एकटा डायरी, पेन नेने महि‍ला      दि‍ससँ आगूमे कल्‍याणी-प्रति‍ज्ञा। पुरूष दि‍ससँ सूर्यदेव, क्षि‍ति‍जदेव, नि‍सकान्‍त बैसल।)

सूर्यदेव-      आजुक बैसारक लेल कल्‍याणी आ प्रति‍ज्ञाकेँ हृदएसँ शुभकामना दैत छि‍अनि‍ जे                 एकटा नव परम्‍पराक शुभारंभ केलनि‍। आशा संग आगू बढ़ति‍ सएह शुभकामना।

कल्‍याणी-     भाय सहाएव, अहॉं सभ तरहेँ अगुआइल छी तेँ आगूक बाटक जते ज्ञान अहॉंकेँ               अछि‍ ओते हम थोड़े बुझै छी।

      (बि‍चहि‍मे नि‍सकान्‍त)

नि‍सकान्‍त-    सुरजू भाय, हमरो बात सुि‍न लि‍अ। काल्‍हि‍ये दुनू परानीक झगड़ाक पनि‍चैतीमे गेल                   छलौं। बेचारा वि‍सनाथकेँ देखते छि‍यै जे डेढ़ सौ रूपैयाक कमाइ घर जोड़ैयामे                करैए। सभ दि‍न कमा कऽ अबैए आ घरवालीक हाथमे दऽ दैत छै। घरवाली केहेन             जे टी.भी. कीनैले पाइ जमा करैत जाइए। रौद-बसातमे काज करैबलाकेँ एकटा                 गंजीसँ थोड़े पाड़ लगतै। तइले घरवाली पाइये ने दैत अछि‍।

कल्‍याणी-     (मूड़ी डोलबैत) की पनचैती केलि‍यै?

नि‍सकान्‍त-    सैंए-बहूक झगड़ा पंच लबरा। हम नै बुझै छि‍ऐ जे पावरक लड़ाइ छी। दुनू गोटेकेँ                   थोड़-थाम लगा देलि‍यै। दू वि‍चारक लड़ाइ हमरे बाप बुते फड़ि‍आएल हएत।

सूर्यदेव-      अच्‍छा एकटा कहऽ जे दुनू गोटेमे घरक गारजन के छी?

नि‍सकान्‍त-    उँ-हूँ सौंसे गामेमे सबहक घरमे मौगि‍ऐक जुति‍ अछि‍। ऐहन जे लोकक दशा भेलि‍ छै            से कि‍अए? कमाइ छै कोइ, हुकुम ककरो। कोनो घर कि‍ कोनो गाम, जाबे मरदक          जुति‍मे नइ चलत ताबे ओहि‍ना गाम आगू मुँहे ससरि‍ जाएत।

कल्‍याणी-     कवि‍लाहाक खेल देखबै। दि‍न पनरहम गुरूकाका कानि‍ कानि‍ कहैत रहथि‍ जे सभ                   दि‍न परदा-पौसकेँ मानलौं। पुतोहू जनीकेँ बेटा नोकरी लगा देलकनि‍। दस कोसपर                 स्‍कूल छनि‍। दुनू परानी भि‍नसरसँ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ घुमि‍ कऽ अबै छथि‍। बेटा             तँ बेटा भेल मुदा      पुतोहूक सेवा सासु कहनि‍, ई हमरा पसन्‍द नहि‍ अछि‍?

सूर्यदेव-      ई नइ पुछलहुन जे समए ऐना कि‍अए भेल?

नि‍सकान्‍त-    आठ घंटा खटनीक बाद जे समए बचैए- ततबे ने समाजमे समए लगाएव ओते जे              पुच्‍छा-पुच्‍छी करैए लगब, से ओते नि‍चेन रहै छी।

कल्‍याणी-     भैया, नारीकेँ बराबर अधि‍कारक हवा चलि‍ रहल अछि‍ से की?

सूर्यदेव-      मदारी सबहक खेल छी। नारी, पुरूषसँ हीन कोना बनैत गेल? जाधरि‍ एहि‍                  इति‍हासकेँ नहि‍ देखब ताधरि‍ कारण कोना पएव। ककरोसँ अधि‍कार मंगबै?              एहि‍ लेल वि‍कासक प्रक्रि‍याकेँ नीक जकॉं बुझए पड़त

कल्‍याणी-     काज कोना शुरू कएल जाए, भाय।

सूर्यदेव-      बहुत बातक जरूरत अखन नहि‍ अछि‍। मुदा कि‍छु बात कहि‍ दैत छी। पहि‍ल-               नारीकेँ चि‍न्‍हए लेल नजरि‍ ओतऽ दि‍अए पड़त जहि‍ठाम हवाइ जहाजमे उड़ैत,                इलाइची फोड़ि‍-फोड़ि‍ मुँहमे दैत जि‍नगी अछि‍ तँ दोसर दि‍शि‍ भरि‍-भरि‍ छाती पानि‍              टपि‍ (खच्‍चा, धार) भीजल कपड़ा पहीरि‍ गोबर बि‍छैक जि‍नगी अछि‍।

कल्‍याणी-     (नम्‍हर सॉंस छोड़ैत) अद्भुत बात भाय अहॉं कहलौं।

सूर्यदेव-      कल्‍याणी, अहॉं अखन फुलाइत फुलक कली छी। तैं जरूरत अछि‍ शुद्ध माटि‍-               पानि‍क। प्रत्‍येक साल समाजमे माने गाममे साएसँ उपर आन गामक बेटी अबैत                 छथि‍। गामक बेटी जेबो करैत छथि‍। प्रश्‍न उठैत सि‍र्फ देहेटा अबैत-जाइत आकि‍                  लूरि‍-बुद्धि‍ सेहो अबैत जाइत अछि‍।

कल्‍याणी-     अखन तँ आरो वि‍कट भऽ गेल अछि‍ जे देशक एक कोनसँ दोसर कोनमे                    रहनि‍हारक (पालल-पोसल) बीच संबंध स्‍थापि‍त रहल। जहि‍सँ खान-पान, बात-वि‍चार        लूरि‍-ढंग सभ टकरा रहल अछि‍।

सूर्यदेव-      एहि‍ना खाइ-पीवैमे देखि‍यौ। एक आदमीक (परि‍वारक) एक दि‍नक खर्च जते होइत              अछि‍ दोसर दि‍स ओहन परि‍वारक भरमार अछि‍ जहि‍ परि‍वारमे दसो-बर्खक आमदनी                ओते नइ छै। ककरो असली नोर चुबै तब ने से तँ पि‍औजक झॉंसक नोर चुबबैए।

कल्‍याणी-     खेती-बाड़ीक की स्‍थि‍ति‍ अछि‍?

सूर्यदेव-      सरकार मेला लागल। गाममे चारि‍टा ट्रेक्‍टर चलि‍ आएल। एक तँ बाढ़ि‍मे बारह                आना बड़द गाममे मरि‍ गेल, दोसर जे चारि‍ आना बचल ओहो सभ गोवर उठबै                  दुआरे बेचि‍ लेलनि‍। अखन गाममे एकोटा बड़द नै अछि‍। ले बलैया ट्रेक्‍टर कदबामे             सकबे ने करै छै। खेती कोनो हएत?

कल्‍याणी-     अजीव-अजीव बात सभ कहै छी, भैया?

सूर्यदेव-      कते कहब बहीनि‍। जते खर्चमे पहि‍ने लोक प्रोफेसर बनै छलाह तते अखन बच्‍चाक            स्‍कूलमे खर्च हुअए लगल अछि‍। ककर बेटा पढ़त। शि‍क्षा केहन भऽ गेल अछि‍                  धोती-कुरताबला अा पेन्‍ट-कोटबला अपनामे रगड़ केने छथि‍ जे हम नीक तँ हम                नीक। के फड़ि‍औत? जहन कि‍ प्रश्‍न नान्‍हि‍टा अछि‍ जे जहि‍सँ जि‍नगी नीक-नहॉंति‍                 आगू मुँहे समएक संग ससरै।

प्रस्‍थान,  पटाक्षेप। समाप्‍त।