भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, August 01, 2008

'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ )१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पञ्जी प्रबंध

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
तृतीय छठि
कन्याक प्रपितामहक श्वसुरक – जेना माण्डर मूलक सिहौली मूलग्रामक १.रघुबर झा पुत्र २.फेकू झा तनिक जमाए ३.कंटीर झा, तनिक पुत्र ४.पीताम्बर झा तनिक पुत्र ५.शशिनाथ झा ६.कन्या। एहि मध्य माण्डर सिहौली रघुवर झासँ कन्या छठि छथि
चारिम छठि- फेकू झाक श्वसुर- पाली महिषी मूलक हर्षी झा, यथा (१) हर्षी झा- (२)जामाता-फेकू झा (३) जामाता कंटीर झा (४)पुत्र-पीताम्बर (५) शशिनाथ (६) कन्या. एहि तरहेँ कन्या हर्षी झासँ छठम स्थानमे छथि तैय हेतु ई चारिम छठि भेल।

पाँचम छठि- कन्याक पितामहक श्वसुरक पितामहसँ कन्या छठम स्थान-जेना सकराढ़ी मूलक परहट मूलग्रामवाला (१) ब्रजनाथ झा (२) हुनक बालक हर्षनाथ झा (३) हिनक बालक सिद्धिनाथ झा (४) हिनक जमाय पीताम्बर झा (५) तनिक बालक शशिनाथ झा (६) हिनक कन्या- अस्तु, सकराढ़ी परहट ब्रजनाथ झा पाँचम छठि कहौताह।
(अनुवर्तते)
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Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ ) १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुरपंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पञ्जी प्रबंध

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
द्वितीय छठि

वृद्ध पितामह राधानाथ झाक श्वसुर माड़रि वलियास मूलक इन्द्रपति झाक बालक धनपति झा होएताह से एहि प्रकारे गणना – धनपति-=१, जमाय=राधानाथ= २, तनिक बालक कंटीर=पीताम्बर=४, शशिनाथ-कन्या=६

तृतीय छठि
(अनुवर्तते)
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ ) १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पञ्जी प्रबंध

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
संस्कृत श्लोकक अर्थ एवं प्रकारे अछि-
*वरक मातृकुलक पुरुषसँ कन्या पाँचम पीढ़ी धरिक सन्तान नहि होथि।वरक पितृकुलक छठम पीढ़ी धरिक सन्तान नहि होथि।
*जे कन्या वरक मातृ कुल ओऽ पितृकुलक सपिण्ड अहि होथि से द्विजाति वरक हेतु उद्वाह कर्मक लेल प्रशस्त।
*मातृकुलमे पाँच आऽ पितृकुलमे सात पीढ़ी धरि सपिण्ड रहैछ।

कोनो कन्याक छठिक अन्वेषण हेतु ३२ मूलक उतेढ बनाबए पड़ैत छैक। ताहिमे सर्वप्रथम उतेढ़क वाम भागमे कन्याक ग्राम, मूल ग्राम लिखल जाइत छैक। तहिसँ अव्यवहित दहिन भागमे मूल आऽ तकर नीचाँ कन्याक अति वृद्ध प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह, वृद्ध पितामह, प्रपितामह, पितामह आऽ तखन पिताक नामोल्लेख अवरोही क्रमसँ लिखल जाइत छैक। एहि मध्य वृद्ध प्रपितामह पहिल छठि कहओताह, जनिकासँ कन्या छठम स्थानमे पड़ैत छैक। प्रस्तुत उदाहरणमे करमहा मूलक बेहट मूलग्रामक विट्ठो ग्रामवासी (दरभंगा) पीताम्बर झाक पौत्री श्री शशिनाथ झाक पुत्री भौर ग्रामवासी खण्डबला मूलक भौर मूलग्रामक नारायणदत्त ठाकुरक दौहित्री- धरमपुर दरभंगा- क अधिकार दरिहरा मूलक रतौली मूलग्रामक लोहनावासी गोपीनन्द झाक पौत्र श्री कृष्णानन्द झाक बालक करमहा मूलक बेहट मूल ग्रामक बिट्ठो निवासी कन्हैय्या झाक दौहित्रसँ जँचबाक अछि।
द्वितीय छठि-
(अनुवर्तते)
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विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Sunday, July 27, 2008

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पञ्जी प्रबंध

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
वैवाहिक अधिकार निर्णय


नियम १. कोनो कन्या अपन १६ पुरुषा (पितृकुल आऽ मातृकुल मिलाकेँ) सँ छठम स्थानमे रहैत छथि- जिनका छठि कहल जाइत छन्हि।
एहि छठिक निर्धारण निम्न प्रकारसँ होइत अछि।
१.क्न्याक प्रपितामहक पितामह प्रथम छठि
२.कन्याक प्रपितामहक मातामह द्वितीय छठि
३.कन्याक पितामहक मातामह तृतीय छठि
४.कन्याक प्रपितामहीक मातामह चतुर्थ छठि
५.कन्याक पितामहीक प्रपितामह पञ्चम छठि
६.कन्याक पिताक मातामहक मातामह छठम छठि
७.कन्याक पितामहीक प्रमातामह सातम छठि
८.कन्याक पितामहीक मातृमातामह आठम छठि
९.कन्याक मातामहक प्रपितामह नवम छठि
१०.कन्याक प्रमातामहक मातामह दसम छठि
११.कन्याक मातामहक प्रमातामह एगारहम छठि
१२.कन्याक मातामहीक मातृमातामह बारहम छठि
१३. कन्याक मातामहीक प्रपितामह तेरहम छठि
१४.कन्याक मातामहीक पितृ मातामह चौदहम छठि
१५.कन्याक मातामहीक प्रमातामह पन्द्रहम छठि
१६.कन्याक मातामहीक मातृ मातामह सोलहम छठि

उपरोक्त्त समस्त छठिक समान महत्त्व अछि। एहिमे सँ कोनो छठि वरक पितृ पक्षमे अएला पर उक्त्त वर कन्याक मध्य वैवाहिक अधिकार नहि होएत। ओऽ छठि यदि वरक मातृकुलमे अबैत छथि तँ अधिकार होएत।

नियम२. वर कन्याक गोत्र एक नहि होए।
नियम ३. वर कन्याक प्रवर एक नहि होए।
नियम ४. वरक मातामह ओऽ कन्याक मूल ओऽ मूलग्राम सहित एक होए तँ सात पुस्त धरि मातृ सापिण्ड्यक कारणेँ अधिकार नहि होएत।
नियम५.वरक विमाताक भायक सन्तान कन्या नहि होए।
मातृतः पञ्चमी त्यक्त्तवा पितृतः सप्तमीं भजेत्- मनुस्मृति
असपिण्डाय या मातुः असपिण्डा च या पितुः सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार कर्मणि मैथुने।
पञ्चमात् सप्तमात् सप्तमात् उर्ढ्वं मात्रूतः पित्रूतस्थत।
सपिण्डा निवर्तेत कर्तुम् व्यतितिसम्।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
महाराजाधिराज ५ मान् मिथिलेशक आज्ञानुसार पछबारिपारक लौकिक आऽ श्रेणिक व्यवस्था पञ्जीकार लोकनि जे स्थिर कएलन्हि से प्रकाशित भेल छल आऽ ईहो प्रार्थना छल जे ताहि मध्य जनिका किछु वक्त्तव्य होइन्ह से प्रार्थना पत्र द्वारा श्री ५ मान् मध्य निवेदन करथि, ततः निदान विशिष्ट सभा मध्य एकर परामर्श कए पुनः प्रकाशित कएल जायत।
एतएसँ १ सँ १५ धरि श्रेणी बना देल गेल। ढेर विवाद उठल जे पाइ लए कए उच्च श्रेणी देल गेल।
पछबारिपारक लौकिक नाममे कतहु लौकिक तँ कतहु असल नाम छल।
किछु उदाहरण अछि-
१. सिंहवाड़-मथुरेश ठाकुर
२. मनियारी- मधुपति मिश्र
३. अमौन-बालकराम पाठक
४. भराम- धीतरी
५. बसन्तपुर- माधव मिश्र
६. कोकडीही- रामेश्वर मिश्र
७. नित्यानन्द चौधरी- पिण्डारुछ
८. एडु- भैय्यो मिश्र
९. खुटौनियाँ- भवानीदत्त झा
१०. लक्षमीपति मिश्र- धगजरी
११. कन्त झा- चानपुरा
१२. टङ्कवाल महिधर झा-पेकपाड़
१३. विष्णुदत्तपुरचिकनौट (मुजफ्फरपुर)
१४. चान पाठक- गजहरा
१५. काकठाकुर- धमदाहा
१६. खाशी ध्यामी- रंगपुरा(पूर्णियाँ)
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 6. पद्य अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)आ.पद्य गंगेश गुंजन.पद्य ज्योति झा चौधरी ई. गजेन्द्र

6. पद्य
अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)
आ.पद्य गंगेश गुंजन
इ.पद्य ज्योति झा चौधरी 1.मनुष्य आ' ओकर भावना 2.हम्मर गाम
ई.पद्य गजेन्द्र ठाकुर
विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य ।
जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि:
1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि।
मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि।
प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:-
1.
भजन विनय
प्रभू बिनू कोन करत दुखः त्राणः॥
कतेक दुःखीके तारल जगमे भव सागर बिनू जल जान, कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल सोर ने सिनई छी कानः॥ अहाँ के त बैनि परल अछि पतित उधारन नाम ।नामक टेक राखू प्रभू अबहूँ हम छी अधम महानः॥ जौँ नञ कृपा करब एहि जन पर कोना खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहिँ सहारा दोसर के अछि आनः॥

2.
भजन लक्ष्मी नारायण जीक विनय

लक्ष्मी नारायण अहाँ हमरा ओर नञ तकइ छी यौ।
दीनदयाल नाम अहाँके सभ कहए अछि यौ।
हमर दुःख देखि बिकट अहाँ डरए छी यौ।
ब्याध गणिका गिध अजामिल गजके उबारल यौ।
कौल किरात भिलनी अधमकेँ उबारल यौ।
कतेक पतितके तारल अहाँ मानि के सकत यौ।
रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ के धाम गेलायो।
ज्यों न हमरा पर कृपा करब हम कि करब यौ।
रामजी अनाथ एक दास राखु यौ।
3.
भजन विनय भगवती

जय जय जनक नन्दिनी अम्बे, त्रिभुवन के तू ही अवलम्बेः।
तुही पालन कारनी जगतके, शेष गणेश सुरन केः।
तेरो महिमा कहि न सकत कोउ, सकुचत सारभ सुरपति कोः।
परमदुखी एहि जगमे, के नञ जनए अछि त्रिभुवनमेः॥
केवल आशा अहाँक चरणके, राखू दास अधम केः॥
कियो नहि राखि सकल शरणोंमे, देख दुखी दिनन केः॥
जौँ नहि कृपा करब जगजननी, बास जान निज मनमे।
तौँ मेरो दुख कौन हटावत, दोसर छाड़ि अहाँकेः॥
कबहौँ अवसर पाबि विपति मेरो कहियो अवधपति को,
रामजी क नहि आन सहारा छाड़ि चरण अहाँकेः॥
(अनुवर्तते)
गंगेश गुंजन(1942- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
देश छोड़ि कत' गेल, देश छोड़ि कियेक गेलय ?

दिन केहन पहाड़ भेलय
कत कहां ऋतु औनायल
रस्ता अन्हार भेलय

चाही से गेल गाम
अनचाहल फेर आयल
बीच बाट पर तेना
आइ सूर्य ठाढ़ भेलय,
आगां अन्हार भेलय

कोनो ने समाद
कानो किछुओ सनेस नहि
जानि नहि केहन गँहींर उदेस की
ओना तं अयवाक किछु विशेष रहय
मन तें भदवरिया मेघक
अकास भेलय,
एखनहि बिन पानिक
कहार गेलय

कियेक एना कारी फूल
कियेक एना कोकनल फल
कियेक एना उष्ण बसात
एना कियेक अपस्याँत
गाम-घर,लोक, खेत-पथार
लोकक स्तब्ध मुखाकृति
डारि-पात हीन ठुठ्ठ गाछ
एतेक एना कियेक अनचिन्हार भेलय

हमर हृदय हमर प्राण केर आंगन
छोड़ि-छाड़ि बिन कहने-सुनने
कोन मृग मरीचिका मे आखिर से,
चुपचाप घरसँ बहार भेलय
देश छोड़ि कत' गेल,
देश छोड़ि कियेक गेलय ?


ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) आ' हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्र्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
1.मनुष्य आ' ओकर भावना
कठोर हृदयमे भावुकता नुकायल भेटल,
पुछलियै, “ तोहर आब कोन स्थान ?”
बड़ निर्मलतासॅं उत्तर देलक,
''हमरा सॅं नहिं तोरा सबके त्राण।

क्रोध, प्रेम, दु:ख, दया आदि जीवनक अंश
अहिसॅं पूर्णत: विमुक्त भेनाई कठिन;
परन्तु गलतकेँ बिसरा कऽ नीक विचारकेँ
आश्रय देनाय अछि अपन आधीन ।

दया परोपकारक अधिष्ठात्री अछि ,
दु:ख खुशीक महत्त्व बुझाबए छै।
क्रोध सॅं हठ, प्रेमसँ त्याग जनमैत अछि,
बस उचित दिशा निर्देशन आवश्यक छै।

मानवक बुद्धि भावनासॅं प्रभावित होइत अछि़ ;
भने ओ स्वयम्‌केँ विधाता बनओने फिरैए।
आधुनिकताक होड़मे निष्ठुरता ओढ़ने अछि,
भावनाहीन भऽ कऽ जीवित नहि रहि सकैए।
2.
हम्मर गाम
गरमी में सुर्योदय के समय कतेक शान्त आ' शीतल,
लू आ उमस सॅं ओत प्रोत दुपहरिया तेहने बिगड़ल;
सॉंझ हुअ सऽ पहिने धूल धक्कड़ आ' बिहारि,
राइत होति देरी अन्हार, ताहि पर मच्छड़क मारि।

अहि सबहक बीच बसल बस एक मात्र मिठास
अप्पन भाषाक ज देने अछि गाम जायक प्यास
जतऽ सभ्यता के लाज में अपनापन नहिं नुकाइत छल
लोक हाक दऽ कऽ हाल पूछऽ में नहिं सकुचाइत छल

अनार, शरीफा, खजूर, लताम, पपीता, जलेबी, केरा सहित लीचीक बगान
केसौर, कटहर, बेल, धात्री, जामुन, बेरक संग अप्पन पोखरिक मखान
फेर आमक गाछी सेहो अछि जतऽ गर्मी बितौनाई नहिं अखड़ल
हवा बिहारि में खसल आम बीछऽ लेल भगनाई नहिं बिसरल

गजेन्द्र ठाकुर

सपना

सपना,
सपना सुन्दर सुन्दर?

नञि, नञि छल ओतेक सुन्दर,
बच्चामे ई खूब डरओलक तोड़ैत,
आँखिसँ छिनैत सुतबाक उत्सुकता ,
जखन मोन उखड़ैत छल घबड़ाइत।

देश कालक सीमा बन्हलहुँ,
पुरखाक भ्रमकेँ अपनओने,
मुदा प्रथम बीजी-पुरुषक छद्म,
नहि छल जाइत मोनक भ्रम।

बचहनक मोनक-छाती धक-धक,
करैत छल खोज जगक जन्मक,
नहि पओने कोनो प्रश्नोत्तर,
छोड़ैत ईश्वर पर ई शाश्वत।

मुदा ईश्वरक मोन आ’ शाश्वत स्वरूपक,
नहि सोझ भेल ससरफानी पड़ल गिरह,
छाती-मोनक करैछ, बढ़ल जे धकधकी,
सपना सेहो नञि, जौँ अबैछ निन्न बेशी।

संसारकेँ सहबाक ईहो अछि प्रहेलिका,
बिनु समस्या समाधानक करैत छी,
हँसैत बिहुँसैत बनबैत सर्वोपरि भाग्यराजकेँ,
करैत छी सभटा अपने, आ’ ई छी कहैत,
कहैत जे हम छी भाग्यराजक कठपुतली।
ईश्वरक ई लीला? अछि मोनक छातीक संग,
भौतिक छातीकेँ सेहो, जे धकधकी ई बढ़बैत।

सपना सुन्दर आकि डरओन नहि कोनो,
अछि आब अबैत।


गजेन्द्र ठाकुर

सपना

सपना,
सपना सुन्दर सुन्दर?

नञि, नञि छल ओतेक सुन्दर,
बच्चामे ई खूब डरओलक तोड़ैत,
आँखिसँ छिनैत सुतबाक उत्सुकता ,
जखन मोन उखड़ैत छल घबड़ाइत।

देश कालक सीमा बन्हलहुँ,
पुरखाक भ्रमकेँ अपनओने,
मुदा प्रथम बीजी-पुरुषक छद्म,
नहि छल जाइत मोनक भ्रम।

बचहनक मोनक-छाती धक-धक,
करैत छल खोज जगक जन्मक,
नहि पओने कोनो प्रश्नोत्तर,
छोड़ैत ईश्वर पर ई शाश्वत।

मुदा ईश्वरक मोन आ’ शाश्वत स्वरूपक,
नहि सोझ भेल ससरफानी पड़ल गिरह,
छाती-मोनक करैछ, बढ़ल जे धकधकी,
सपना सेहो नञि, जौँ अबैछ निन्न बेशी।

संसारकेँ सहबाक ईहो अछि प्रहेलिका,
बिनु समस्या समाधानक करैत छी,
हँसैत बिहुँसैत बनबैत सर्वोपरि भाग्यराजकेँ,
करैत छी सभटा अपने, आ’ ई छी कहैत,
कहैत जे हम छी भाग्यराजक कठपुतली।
ईश्वरक ई लीला? अछि मोनक छातीक संग,
भौतिक छातीकेँ सेहो, जे धकधकी ई बढ़बैत।

सपना सुन्दर आकि डरओन नहि कोनो,
अछि आब अबैत।

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 12. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

12. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
कालक प्रभावे अत्रिय लोकनिमे पञ्जी समाप्त भए गेल आऽ ताहि द्वारे हुनका लोकनिमे पूरा गामेकेँ छोड़ि देल जाइत अछि, जाहिसँ सिद्धांतमे भाङठ नहि होए।
पञ्जी-पुस्तकक हेतु एकटा श्लोक अछि- जलात् रक्ष तैलात् रक्ष रक्ष स्थूल बन्धनात् माने पुस्तककेँ जलसँ तेलसँ आऽ स्थूल बन्धनसँ बचाऊ।संगहि सूर्य जखन सिंह राशिमे (मोटा-मोटी १६ अगस्त सँ १६ सितम्बर धरि) रहए तखन एकरा सुखाऊ- एहि समयमे सभसँ बेशी कड़गर रौद रहैत अछि।
उतेढ- सिद्धांत लिखबासँ पहिने वर ओऽ कन्या पक्षक अधिकार ताकल जाइत अछि।कन्याक विवाहक ५-१० वर्ष पूर्व कन्याक पिता पञ्जीकारसँ अधिकार माला बनबैत छथि, जाहिमे संभावित आऽ उपलब्ध वरक सूची रहैत छैक। पञ्जीकार एहि एतु उतेढ बनबैत छथि।वर कन्या दुनू पक्षक पितृ कुलक ६ पुस्त आऽ मातृकुलक ५ पुरखाक यावेता परिचय देल जाइत अछि।यावेता परिचयक अर्थ भेल ३२ मूलक उतेढ़ जे अधिकार तकबामे प्रयोजनीय थीक। कोनो कन्या मातृ वा पितृ पुरखा कुलमे १६ व्यक्त्तिसँ छठम स्थानमे रहैत छथि। एहि १६ मे सँ १६ वा एको व्यक्त्ति वरक पितृपक्षमे अओथिन्ह तँ ओहि कन्या वरक मध्य वैवाहिक अधिकार नहि होएत।जौँ ओऽ १६ व्यक्त्ति वा एको व्यक्त्ति मातृ पक्ष (वरक) मे अओथिन्ह तँ अधिकार भए जायत।
मुदा एहिमे ई सेहो देखबाक थीक जे वर कन्या समान गोत्र आऽ समान प्रवरक नहि होथि।संगहि ई सेहो देखबाक थीक जे वरक मातामह आऽ कन्याक मूल ओऽ मूलग्राम सहित एक होए तँ सात पुस्त धरि मातृसापिण्डयक कारणेँ अधिकार नहि होएत। ई सेहो देखए पड़त जे कन्या वरक विमाताक भाइक सन्तान नहि होए।
पञ्जी सात प्रकारक होइत आछि-मूल,शाखा,गोत्र,पत्र,दूषण उतेढ़ आऽ एकटा आर।
पञ्जीक प्रारम्भसँ पहिने सभ क्यो अपन-अपन वंशावली स्वयं राखैत छलाह। हरसिंह देव ताहि हेतु एकटा संस्थाक निर्माण कएलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक हेतु शंकरदत्त आऽ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त पञ्जीकार नियुक्त्त भेलाह।
दरभंगा नरेश माधव सिंह शाखा प्रणयन पुस्तकक आदेश देलन्हि।एहिसँ पहिने मूल पञ्जी सभक समान रूपेँ बनैत छल। आब सोति, जोग आऽ पञ्जीबद्धक हेतु फराक शाखा पञ्जी बनाओल जाए लागल।
गोत्र पञ्जीमे सभ गोत्र आऽ तकर प्राचीन मूल रहैत अछि।
पत्र पञ्जी लगभग ३०० वर्ष पूर्वसँ प्रचलनमे अछि। एहिमे मूलग्रामक उल्लेख रहए लागल।
दूषण पञ्जीमे वंशमे आएल क्षरणक उल्लेख रहैत अछि। ई गोपनीय पञ्जी थीक आऽ एकरा सार्वजनिक नहि कएल जाइत अछि। बहुत बादमे एकर चर्च संभव होइत अछि।
उतेढ़ पञ्जीमे सपिण्डक निवृत्ति होइत अछि- छह पुरखक प्राप्त होइत अछि। मात्र रसाढ़-अररियाक पञ्जीमे महिलाक पञ्जी भेटैत अछि।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 12. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुरपंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)

12. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
पछिला अंकमे देल गेल श्रोत्रियक सातक बदलामे आठ श्रेणीमे ओ लोकनि क्रमबद्ध छथि- आ’ पञ्जीक कुल संख्या 185 अछि, जाहिमे 32 टा श्रोत्रिय आ’ 153 टा आन ब्राह्मणक श्रेणी अछि। जातुकर्ण गोत्र त्रिप्रवर जातुकर्ण/आंगीरस/भारद्वाज छथि। पहिने सभ क्यो अपन-अपन पुरखाक, आ’ वैवाहिक संबंधक लेखा स्वयं रखैत रहथि। हरसिंहदेवजी एहि हेतु एक गोट संस्थाक प्रारम्भ कलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ’ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक पंजी वैज्ञानिक आधार बला छल आ’ शुद्ध रूपेँ वंशावली परिचय छल। सभ ब्राह्मण कायस्थ आ’ क्षत्रिय एहिमे बराबर छलाह। मुदा महाराज माधव सिंहक समयमे शाखा पञ्जीक प्रारम्भ भेल आ’ श्रोत्रिय आदि विभाजन आ’ क्रमानुसारे छोट-पैघक आ’ ओहिसँ उपजल सामाजिक कुरीतिक प्रारम्भ भेल।

कर्ण कायस्थमे एकेटा गोत्र काश्यप अछि। मात्र मूलक अनुसारेँ उतेढ़ होइत अछि, मझौला दर्जाक गृहस्थ कहल जाइत अछि।

मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि। किछु अपवादो छैक। जेना: ब्रह्मपुरा मूल, काश्यप/गौतम/वत्स/वशिष्ठ।(7टा)
करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्स गोत्री।
दुनू करमहामे विवाह संभव।
चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ’ बंगाल चलि गेलाह, हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु।
श्रोत्रियकेँ पुबारिपार आ’ शेषकेँ पछ्बारिपार सेहो कहल जाइत अछि।श्रोत्रियक पाँजिकेँ चौगाला(श्रेणी) मे विभक्त्त अछि। श्रोत्रिय पंञ्जीकेँ लौकित कहल जाइत अछि। कुल 8 टा चौगोल श्रेणी अछि।32 टा पञ्जी अछि। पञ्जी आ’ पानि अधोगामी होइत अछि। विवाह संबंधक कारणे समय बीतला पर उच्च श्रेणी समाप्त होइत जाइत अछि। प्रथम श्रेणी ताहि कारणसँ समाप्त भ’ गेल अछि।
शेष ब्राह्मण पछ्बारिपार कहबैत छथि। एहि मे 15 गोट श्रेणी अछि।153 टा पञ्जी अछि। एकरा नामसँ जेना महादेव झा पाँजि इत्यादि संबोधित कएल जाइत अछि।

(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

Saturday, July 26, 2008

विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 10. पंजी प्रबंध पञ्जी संग्राहक-श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार

10. पंजी प्रबंध पञ्जी संग्राहक-श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार
श्री विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा, पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।

श्रोत्रिय ब्राह्मण सात श्रेणीमे क्रमबद्ध छथि, आ’ योग्य एवम् वंशज पन्द्रह श्रेणीमे। पञ्जीक संख्या 209 अछि, जाहिमे 56 पंजी श्रोत्रिय आ’ 153 पंजी योग्य आ’ वंशजक अछि।
पंजी-प्रबन्धक प्रारम्भ राजा हरसिंहदेवक कालमे शुरू भेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह।
आइ काल्हि पञ्जी-प्रबंध मात्र मैथिल ब्राह्मण आ’ कर्ण-कायस्थक मध्य विद्यमान अछि। मुदा प्रारम्भमे ई क्षत्रिय(प्रयः गंधवरिया राजपूत)केर मध्य सेहो छल।
वर्णरत्नाकरमे 72 राजपूत कुलक मध्य 64 केर वर्णन अछि, जाहिमे बएस आ’ पमार दोहराओल अछि। दोसर ठाम 36 राजपूत कुलक वर्णन अछि। 20 टा नामक पूर्वहुमे चर्च अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे, जे प्रायः हुनकर नेपाल प्रवासक क्रममे लिखल गेल छल, चन्देल आ’ चौहानक वर्णन अछि। गाहनवार वा मिथिलाक गंधवरिया राजपूतक दू टा शखा मिथिलामे छल, भीठ भगवानपुर आ’ पंचमहला(सहर्सा, पूर्णियाँ)। गंधवरिया,पमार,विशेवार,कंचिवाल, चौहान आदि मिथिलाक महत्त्वपूर्ण राजपूत छथि।मुदा गंधवरिया मिथिलामे महत्त्वपूर्ण छथि आ’ एखनहु मधुबनीसँ सहरसा-पूर्णियाँ धरि छथि।
वर्णरत्नाकरक राजपूत कुलवर्णनक निम्न लगभग 62 टा कुल अछि। सोमवंश,सूर्यवंश, डोडा, चौसी, चोला, सेन, पाल, यादव, पामार, नन्द, निकुम्भ, पुष्पभूति, श्रिंगार, अरहान, गुपझरझार, सुरुकि, शिखर, बायेकवार, गान्हवार,सुरवार, मेदा, महार, वात, कूल, कछवाह, वायेश, करम्बा, हेयाना, छेवारक, छुरियिज, भोन्ड, भीम, विन्हा, पुन्डीरयन, चौहान, छिन्द, छिकोर, चन्देल, चनुकी, कंचिवाल, रान्चकान्ट, मुंडौट, बिकौत, गुलहौत, चांगल, छहेला, भाटी, मनदत्ता, सिंहवीरभाह्मा, खाती,रघुवंश, पनिहार, सुरभांच, गुमात, गांधार, वर्धन, वह्होम, विशिश्ठ, गुटिया, भाद्र, खुरसाम, वहत्तरी आदि। एखनो गंगा दियारामे राजपूत आ’ यादव दुनूक मध्य ‘बनौत’ होइत छथि, आ’ दुनूमे बहुत घनिष्ठता अछि।
पर्वतमे रहनिहार आ’ वनमे रहनिहारक वर्णन सेहो अछि वर्ण रत्नाकरमे। जनक राजाक विरुद ज(कबीला) सँ बनल प्रतीत होइत अछि।
(अनुवर्तते)

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Friday, July 25, 2008

विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 10. पंजी प्रबंध श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार

10. पंजी प्रबंध श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार


अतः विवाहक पहिल चरण अधिकारक निर्णय रहल होयत। वर पक्ष ओ’ कन्या पक्षक लोक परस्पर बैसि अपन-अपन परिचयक आधार पर निर्णय करैत छल होएताह, जे ‘अमुक’ कन्यासँ ‘अमुक’ वरक विवाह हो वा नहि। मुदा परिचय रखबाक प्रवृत्तिक ह्रासक कारणेँ अधिकार-निर्णयक हेतु प्रत्येक परिवारक सुयोग्य ओ’ आस्थावान व्यक्ति अपन यावतो परिचय(32 मूलक उल्लेख) लिखि कए राखय लगलाह। सातम शाब्दीसँ पूर्वहि ए लिखित कौलिक परिचय ‘समूह लेख्य’ क उल्लेख सर्वप्रथम विद्वद्वैरैण्य कुमारिल भट्ट रचित ‘तंत्र वार्त्तिक’मे भेल अछि, जे मीमांसा दर्शनक जैमिनी सूत्रक शबर द्वारा कएल भाष्यक ग्द्यात्मक ‘वार्त्तिक’ थीक। तंत्रवार्त्तिक दर्शनक ग्रंथ थीक जाहिमे यथार्थ वस्तुस्थितिक वर्णनसँ जातिक विशुद्धि सिद्ध कएल गेल अछि। जाहि आधार पर धर्मक निरूपण भए सकैत। कुमारिल भट्टक कहब छलन्हि जे “ बड़का कुलीन लोक बड़ विशेष प्रयत्नसँ अपन जातिक रक्षा करैत छथि। तैहि त’ क्षत्रिय ओ’ ब्राह्मण अपन पिता-पितामहादिक परम्परा बिसरि नहि जाए तेँ समूह-लेख्य चलौलन्हि। ओ’ प्रत्येक कुलमे गुण आ’ दोष देखि ओहि अनुरूप सम्बंध करबामे प्रवृत्त होइत छथि।
“विशिष्टेनैव हि प्रयत्नेन महाकुलीनाः परिक्षन्ति आत्मानम् अनेनैव हि हेतुना राजाभिब्रह्मिणैश्च स्व पितृ-पितामहादि पारम्पर्यो विस्मणार्थं समूहलेख्यानिप्रवर्तितानि तथा च प्रतिकुलं गुण-दोष स्मर्णांतदनुरूपाः प्रभृति-निवृतयो दृश्यंते”।
(तंत्रवार्त्तिक, अध्याय 1, पाद-2, सूत्र-2क वार्त्तिक)
मुदा तेरहम शताब्दीक उत्तरार्ध होइत-होइत साधारण लोकक कोन कथा पण्डित लोकनि समेत समूह लेख्य राखब छोड़ि देलन्हि। एकर परिणाम ई भेल जे पं हरिनाथ उपाध्याय(धर्म-शास्त्रक महान ज्ञाता) “स्मृतिसार” सन धर्मशास्त्रक विषयक ग्रंथकर्त्ता ओ’ महापंडित परिचयक अभावमे विवाह कए लेल, स्वजनमे अनधिकारमे अपन साक्षात पितयौत भाइक दौहित्रीमे। फलतः चौदहम शताब्दीक तृतीय दशक होइत-होइत एहि कौलिक परिचयकेँ विशिष्ट पण्डितक अधीन कए देबाक आवश्यकताक अनुभव कएल जे विवाहक समय अधिकारक निर्णय कए सकथि। मिथिलाक तत्कालीन शासक राजा हरिसिंहदेवक प्रेरणासँ मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके 1248 तदनुसार 1326 ई. मे निर्णय कएलन्हि, जे “ परिचय राखब लोककेँ अपना पर नहि छोड़ल जाय, प्रत्युत ओकरा संगृहित कए विशिष्ट पण्डितजनक जिम्मा कए देल जाए, ओ’ ई राजकीय एक गोट विभाग बना देल जाए जाहिसँ पण्डित राजाज्ञासँ नियुक्त होथि सैह संगृहित परिचय राखथि। प्रत्येक विवाह तखनहि स्थिर हो जखन नियुक्त पंडित(पञ्जीकार) अधिकार जाँचि कए लिखिके देथि, जे अमुक कन्या ओ’ अमुक वर ‘स्वजना’ नहि छथि। अर्थात् शास्त्रीयनियमानुसार कन्याक संग वरकेँ वैवाहिक अधिकार छन्हि। इयैह पत्र ‘अस्वजन पत्र’ वा ‘सिद्धांत पत्र’ कहौलक। आइयो कन्या वरक विवाह पूर्व अधिकार जँचाए सिद्धांत पत्र लेल आवश्यक बूझल जाइत अछि। पञ्जी-प्रबंधमे इएह सभसँ प्रधान नियम भेल जे बिनु सिद्धांत भेने विवाह अशास्त्रीय मानल जायत। ‘अस्वजन पत्र’ देनिहार राजाज्ञासँ नियुक्त इएह पण्डित पञ्जीकार कहओलाह। संगृहित परिचय जाहिमे प्रत्येक नव जन्म ओ विवाह जोड़ल जाय लागल से भेल पञ्जी। जिनकर पञ्जीमे आएल से भेलाह पञ्जीबद्ध।
महाराज हरिसिंहदेव ओ’ तत्कालीन पण्डितक संयुक्त निर्णय अनुसार परिचेता लोकनिक नियुक्त्ति कए समस्त मैथिल ब्राह्मणक सम्पूर्ण परिचय संगृहित कएल गेल। परिचेता लोकनि घुमि-घुमि प्रत्येक परिवारक मुख्य व्यक्तिसँ हुनक परिचय पुछि लिखि लेल करथि। सामान्य रूँपे छओ पुरुषक परिचय सभ जनैत रहथि। किछु गोटा एहिसँ बहुतो अधिक परिचय जनैत रहथि। एहिना किछु गोटए मात्र दू वा तीन पुरुषाक ज्ञान रखैत छलाह। जे जतबा जनैत रहथि हुनकासँ ओतबहि संग्रह कए हुनकर पूरवजक वास-स्थान, गोत्र, प्रवर तथा हुनक वेद ओ’ शाखाक सूचना लिखि लेल जाइत रहैए। एहि संग्रहसँ एकहि कुलक अनेक शाखा जे विभिन्ना ग्राममे बसैत छलाह, तकर परिचय एकत्र भए गेल। एहि रूपे गोत्रक अनुसार भिन्न-भिन्न कुलक सम्पूर्ण परिचय प्राप्त भए गेल। एहि परिचय संकलनक समय सभसँ प्रमुख मानल गेल बीजी पुरुष ओ मूल ग्रामकेँ। कारण कौलिक परिचयक हेतु सर्वाधिक उपयोगी इयैह सूत्र भेल। विभिन्न गाममे बसैत एकहि कुलक विभिन्न व्यक्तिक कौलिक परिचय एहि मूल ग्रामक आधार पर संगृहित कएल गेल रहए। एहि कारणे पञ्जीमे अनिवार्य रूपसँ मूल ग्रामक उल्लेख भेल अछि। पञ्जी-प्रबंधक समय जे व्यक्ति जतए बसैत रहथि से हुनक भावी संतानक ग्राम कहओलक ओ परिचय लिखौनिहार अपन पूर्वजक प्राचीनतम वास स्थानक जे नाम कहल से ओहि व्यक्तिक मूल भेल। एहिना प्रत्येक कुलक प्राचीनतम ज्ञात पूर्वज ओहि कुलक बीजी पुरुष कहाओल। एकर प्रमाणमे एक गोट उदाहरण देखल जाए सकैत अछि। काश्यप गोत्रीय एक महाकुल जकर शतावधि शाखा मिथिलामे अनुवर्त्तमान रहए, संगृहित परिचयक आधार पर मूलतः माण्डर ग्रामक वासी सिद्ध भेलाह। मुदा पञ्जी-प्रबंधसँ बहुत पहिनहि, एकर दू गोट शाखा स्पष्टतः प्रमाणित भए गेल। एक मँगरौनी गामक आ’ दोसर गढ़-गामक। अतः पञ्जीमे आदिअहिसँ मण्डरक संग-संग गढ़ ओ मँगरौनी विशेषण जोड़ल जाए लागल। मुदा उपलब्ध परिचयक आधार पर दुनू एकहि कुलक दू शाखा सिद्ध भेल। तैय दुनू कुलक मूल एकहि भेल ओ बीजी पुरुष सेहो एकहि भेलाह।

गोत्र- कहल जाइत अछि जे सकल गोत्रक समस्त जन समुदाय एकहि प्राचीनतम ज्ञात महापुरुषक वंशज थिकाह। ईएह प्राचीनतम ज्ञात महापुरुष गोत्र कहाए सुविख्यात छथि। श्री एम.पी. चिंतालाल राव महोदय चारि हजार गोत्रक सूची तैयार कएने छथि। “ अमरकोष”मे गोत्रक हेतु तीन अर्थ देल गेल अछि- पर्वत, वंश आ’ नाम। “वाचस्पत्य” कोषमे गोत्रक एगारह अर्थ देल गेल अछि- पर्वत, नाम ,ज्ञान, जंगल,खेत,क्षत्र,संघ,धन, मार्ग, वृद्धि आ’ मुनि लोकनिक वंश। प्राचीन संस्कृत साहित्यमे गोत्र शब्दक प्रयोग प्रायः वंश वा पिताक नामक लेल भेल अछि। छान्दोग्य उपनिषद (4/4) मे जीवन गुरु सत्यकामसँ गोत्र पुछैत छथिन्ह तँ हुनक अभिप्राय सत्यकामक कुल अथ्वा पिताक नामसँ छन्हि, मुदा ऋगवेदमे गोत्रक उल्लेख चारि ठाम मेघ अथवा पहाड़क लेल आ’ दू ठाम पशु समूह अथवा जनसमुदाय अथवा पशु रक्षक रूपमे भेल अछि। अंततः वंश अथवा परिवरक अर्थमे गोत्र शब्दक प्रयोग पश्चातक प्रयोग थिक। वंश अथवा परिवारक अर्थमे गोत्रक प्रयोग सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे भेल अछि।
मैथिल ब्राह्मण समाजमे गोत्र वंशा-बोधक थीक। मैथिल ब्राह्मणक समस्त गोत्र पितृ प्रधान थीक- अर्थात् प्रत्येक गोत्र अपन-अपन वंशक प्राचीनतम ज्ञात महापुरुषक नाम थीक। मैथिल ब्राह्मणमे सभ मिलाए 20 गोट गोत्र अछि। मैथिल ब्राह्मणमे सात गोट गोत्रक कुल व्यवस्थित, सुपरिचित ओ बहुसंख्यक अछि। ई सात गोट गोत्र थीक- 1.शाण्डिल्य 2.वत्स 3.काश्यप 4.सावर्ण 5.पराशर 6.भारद्वाज 7.कात्यायन। शेष 13 गोट गोत्र थीक- 1.गर्ग 2.कौशिक 3.अलाम्बुकाक्ष
4.कृष्णात्रेय 5.गौतम 6.मौद्गल्य 7.वशिष्ठ 8.कौण्डिन्य 9.उपमन्यु 10.कपिल 11.विष्णुवृद्धि 12.तण्डि 13.जातिकर्ण।
प्रत्येक गोत्रमे कतौक मूल्य अछि। मिथिलामे 153 मूलक ब्राह्मणक परिच्अय प्राप्त होइत अछि। कतैक मूल एहन अछि, जे एकसँ अधिक गोत्रमे पाओल जाइत अछि।‘ब्रह्मपुरा’ एकटा एहने मूल थिक। एहि मूलक ब्राह्मण- शाण्डिल्य,वत्स,काश्यप,अलाम्बुकाक्ष,गौतम ओ गर्ग गोत्रमे पाओल जाइत छथि। प्रवर- प्रवरक उल्लेख वैदिक युगमे दर्श ओ पौर्णमास नामक इष्टिमे भेटैत अछि। इ इष्टि सभ आन सभ प्रकारक यज्ञक आधार थीक। अतः एहिमे प्रवरक पाठ होइत अछि। एहि पाठक प्रयोजन तखनहि होइत अछि जाहि क्षण यज्ञाग्नि उद्दिप्त करएबाली(सामधेनी) ऋचाक पाठक अनंतर अध्वर्यु ओहि अग्नि पर आज्य(घृत) दैत छथिन्ह। एकर निहितार्थ अछि जे प्रवर, यज्ञमे अग्निकेँ बजएबाक प्रार्थना थीक। प्रवरकेँ बादमे ‘आर्षेय’ सेहो कहल गेल अछि- जकर अर्थ थिक ऋषिसँ संबंधराखए बला(ऋग्वेद-09/97/51)। शोनक ऋषिक सुविख्यात पूर्वज लोकनि मैथिल ब्राह्मण मध्य प्रवर कहबैत छथि अर्थात् ऋगवेदक ऋचाक प्रणेता लोकनि प्रवर थिकाह।
मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि।
1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स---] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन।
3. सावर्ण--] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन।
4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस.
गोत्र आ’ मूल
शाण्डिल्य- दिर्धोष(दिघवे), सरिसब, महुआ, पर्वपल्ली(पवौली),खण्डबला, गंगोली, यमुशाम, करिअन, मोहरी, सझुआल, मड़ार, पण्डोली, जजिवाल, दहिसत, तिलय, माहब, सिम्मुआल, सिंहाश्रम, सोदरपुर, कड़रिया, अल्लारि, होइयार,तल्हनपुर,परिसरा,परसड़ा,वीरनाम, उत्तमपुर, कोदरिया, छतिमन, वरेवा, मधुआल, गंगौर, भटोर, बुधौरा, ब्रह्मपुरा, कोइआर, केटहिवार, गंगुआल, घोषियाम, छतौनी, भिगुआल, ननौती, तपनपुर।
वत्स- पल्ली(पाली), हरिअम्ब, तिसुरी, राउढ़, टकवाल, घुसौत, जजिवाल, पहद्दी, जल्लकी(जालय), भन्दवाल, कोइयार, केरहिवार, ननौर, डढ़ार, करमहा, बुधवाल, मड़ार, लाही, सौनी, सकौना, फनन्दह, मोहरी, वंठवाल, तिसउँत, बरुआली, पण्डौली, बहेटाढ़ी, बरैवा, अलय, भाप्रारिसमथ, बभनियाम, उचति, तपनपुर, विठुआल, नरवाल, चित्रपल्ली, जरहटिया, ब्रह्मपुरा,सरौनी।
काश्यप- ओइनि, खौआल, संकराढ़ी, जगति, दरिहरा, माण्डर, वलियास, पचाउर, कटाइ, सतलखा, पण्डुआ, मालिछ, मेरन्दी, नदुआल, पकलिया, बुधवाल, दिभू, मौरी, भूतहरी, छादन, विस्फी, थरिया, दोस्ती, भरेहा, कुसुम्बाल, नरवाल, लगुरदह।
सावर्ण- सोन्दपुर, पनिचोभ, बरेबा, नन्दोर, मेरन्दी। पराशर- नरौन, सुरगन, सकुरी, सुइरी, सम्मूआल, दिहवाल, नदाम, महेशारि, सकरहोन, सोइनि, तिलय, बरेबा। भारद्वाज- एकहरा, विल्वपञ्चक(बेलौँच), देयाम, कलिगाम, भूतहरी, गोढ़ार, गोधूलि। कात्यायन- कुजौली, ननौती, जल्लकी, वतिगाम। अलाम्बुकाक्ष- बसाम,कटाइ, ब्रह्मपुरा।
गार्ग्य – बसहा, बसाम, ब्रह्मपुरा, सुरौर, विधौर, उरौर। कौशिक- निटेरति कृष्नात्रेय- लोहना, बुसवन, पोदौनी। मौद्गल्य- रतवाल, मालिछ, दिघौष, कपिञ्जल, जल्लकी। गौतम- ब्रह्मपुरा, उंतिमपुर, कोइयार। वशिष्ठ- कोथुआ। कौंडिल्य- एकहरा, परौन। जातुकर्ण- देवहार। तण्डि- कटाई।

मिथिलाधीश कार्णाट वंशीय क्षत्रिय महाराज हरिसिंहदेव जीक सभामे उपस्थित सभ्य लोकनि महिन्द्रपुर पण्डुआ मूलक सदुपाध्याय गुणाकर झाकेँ मैथिल ब्राह्मणक पञ्जी प्रबन्धक भार देलन्हि

नन्देहु शुन्यं शशि शाक वर्षे (1099 शाके) तच्छ्रावणस्य धवले मुनितिथ्यधस्तात। स्वाती शनैश्चर दिने सुपूजित लग्ने श्री नान्यदेव नृपतिढ़र्यधीत वास्तं॥1॥ शास्तानान्द पतिर्व्वभूव नृपतिः श्री गंगदेवो नृपस्तत् सूनू(पुत्र) नरसिंहदेव विजयी श्री शक्ति सिंह सुतः तत् सूनू खलू राम सिंह विजयी भूपालवंत सुतो जातः श्री हरिसिंह देव नृपतिः कार्णाट चूड़ामणि ॥2॥ श्रीमंतं गुणवन्त मुत्तम कुलस्नाया विशुद्धाशयँ सञ्जातानु गवेषणोत्सुक यातः सर्वानुव्यक्तिक्षमां चातुर्यश्चतुराननः प्रतिनिधिंकृत्वा च्च्तुर्द्धाकिमां पंचादित्यकुलांविता विवजया दित्यै ददौ पञ्जिकाम्॥3॥
भूपालवनि मौलि रत्न मुकुटोलंकार हिरांकुर ज्योत्सोज्वाल यटाल माल शशिनिः लीलञ्च चञ्चलम्तावः शोभा भाजि गुणाकरे गुणवतां मानन्द कन्दोदरे दृष्ट्वात्मा हरिसिंह देव नृपतिः पाणौ ददौ पञ्जिकाम॥4॥ दृष्ट्वा सभां श्री हरिसिंहदेव विचार्य चिंते गुणिणी सहिष्णौ॥ गुणाकरे मैथिल वंश जाते पञ्जी ददौ धर्म विवेचणार्थम॥

(अनुवर्तते)

Thursday, July 24, 2008

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)

6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
संस्कृत कथा
गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल।
कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।
सुभाषितम्
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।

पद्य ( गजेन्द्र ठाकुर)
चटका चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे। रचयति नीडं चटका वृक्षे आकाशे।
नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे। आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा, न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।
कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे, कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।

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नमोनमः। भवतां सर्वेषाम् अपि स्वागतम्।
जलम् आवश्यकम्।
काफी आवश्यकम्।
मास्तु।
चायम् आवश्यकम्।
मास्तु। मास्तु। पर्याप्तः।
किम् आवश्यकम्। जलम् आवश्यकम्।
किंचित् आवश्यकम्।
आम्।
पुनः किंचित् आवश्यकम्। धनम् आवश्यकम्। चाकलेहः आवश्यकः। मिष्टान्नम् मधुरम् आवश्यकम्। शिक्षणम् आवश्यकम्। मास्तु। संस्कृतम् आवश्यकं वा। आवश्यकम्। ताडनं मास्तु। वस्त्रं धनं आवश्यकम्। द्वेषः कोलाहलः मास्तु। अहं भवतः युतकं ददामि। सर्वे वदंतु। चतुर्वेदस्य युतकम्। भवान युतकम्। मम युतकम्। वदतु। भवतः युतकम्। भवतः नासिका। समीचीनम्। सुनीते। भवति आगच्छतु। अहं भवत्याः आभूषणं वदामि। भवति मम् आभूषणं वदतु। भवन्तः सुनीतायाः आभूषणम् इति वदन्तु। भवत्याः घटी। भवत्याः केशः। साधु-साधु। पुनः एकम् अभ्यासः कुर्मः। कः कस्य मित्रम्। अथवा का कस्याः सखी। इति भवन्तः। लता प्रियङ्कायाः सखी। वदन्तु। उदाहरणं वदामि। इदानीम भवन्तः वदन्तु। रोहितः अभिषेकस्य मित्रम्। उत्तमम्। इदानीं वयं बहुवचनस्य अभ्यासं कुर्मः। छात्रः- छात्राः। दंतकूर्चः-दंतकूर्चा।
उत्तमम्। चशकः- चशकाः। बालकः- बालकाः। सैनिकः- सैनिकाः। वृक्षः- वृक्षाः। शिक्तवर्तिका- शिक्तवर्तिकाः। पेटिका- पेटिकाः। उत्पीठिका- उत्पीठिकाः। लेखनी- लेखन्यः। अङ्कनी- अङ्कन्यः। घटी- घट्यः। कूपी- कूप्यः। पर्णम्- पर्णानि। पुस्तकम्- पुस्तकानि। कङ्कनम्- कङ्कणानि। फलम्- फलानि। सङ्गणकम्- सङ्गणकानि।
अहम् एकवचने वदामि। भवन्तः परिवर्त्तनं कुर्वन्।

छात्रः अस्ति- छात्राः सन्ति। छात्रा अस्ति।– छात्राः सन्ति। दंतकूर्चः अस्ति। - दंतकूर्चाः सन्ति। चमषः अस्ति।– चमषाः सन्ति।
अङ्कणी अस्ति। अङ्कन्यः संति।
पर्णम् अस्ति।पर्णानि सन्ति।
वृक्षः अस्ति।– वृक्षाः सन्ति। बालकः अस्ति।– बालकाः सन्ति। गायकः अस्ति।– गायकाः सन्ति।
लेखकः अस्ति।– लेखकाः सन्ति। बालिका अस्ति। बालिकाः सन्ति। पत्रिका अस्ति। पत्रिकाः सन्ति। पत्रम् अस्ति।पत्राणि सन्ति। पुष्पम् अस्ति।पुष्पाणि सन्ति। मन्दिरम् अस्ति।मन्दिराणि सन्ति। फलम् अस्ति। फलानि सन्ति। पर्णम् अस्ति। पर्णानि सन्ति।
अङ्कणि अस्ति। अङ्कण्यः सन्ति। लेखनी अस्ति। लेखन्य सन्ति।
इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः।
बालिकाः सन्ति। बालकाः सन्ति। बालकः एकवचनं वाक्यं वदति। बालिकाः बहुवचनं रूपं वदन्तु।तस्य वाक्यस्य बहुवचन रूपं वदति।
बालिकाः एकवचनं वाक्यं वदति। बालकाः परिवर्त्तनन्ति। अस्तु वा। अस्तु। पुस्तकम् अस्ति।पुस्तकानि सन्ति। लेखनी अस्ति। लेकण्याः सन्ति। घटी अस्ति। घट्याः सन्ति। सः छात्रः। ते छात्राः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। सः कः। सः पुरुषाः। ते के। ते पुरुषः। कः पुरुषः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। ते के। ते पुरुषाः। के पुरुषाः। ते पुरुषाः। हस्तं दर्शयन्तु। अक्षता उत्तिष्ठन्तु। ताः बालिकाः। सा बालिका। सा पेटिका। ताः पेटिकाः। सा का। ताः काः। का पेटिका। सा पेटिका।
काः पेटिका। ताः पेटिकाः। तत् चित्रम्। ताणि चित्राणि। तत् किम्। ताणि कानि। ते वृक्षाः। एते वृक्षाः। एते छात्राः। ताः घट्यः। ते के। एते के। एताः बालिकाः। एताः घट्यः। ताः बालिकाः। एताः काः। ताः घट्यः। काः घट्यः। तानि फलानि। एतानि फलानि। एतानि पुस्तकानि। तानि पुस्तकाणि। एतानि फलानि। एतानि कानि। तानि फलानि। भवान् बालकः। भवन्तः बालकाः। भवती बालिका। भवत्यः बालिकाः। अहं भारतीया। वयं के। वयं भारतीयाः। वयं भारतीयाः।
अहं देशभक्त्तः। वयं देशभक्ताः। भवन्तः बालकाः। भवन्तः के। वयं बालकाः। भवत्यः बालिकाः। भवत्यः काः। वयं बालिकाः। अहम् एकवचनं वदामि। भवन्तः बहुवचनं वदन्तु। एकम् अभ्यासः कूर्मः। अहं भारतीयः।अहं राष्ट्रभक्तः। अहं चतुरः। अहं मूर्खः। वयं मूर्खाः।
सिद्धिरस्तु।

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 10. पंजी प्रबंध

10. पंजी प्रबंध
श्री विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया


पुनश्च सप्तसिन्धु सँ प्राच्याभिमुखी यायावर ऋषि लोकनि गंगा ओ’ हिमालयक मध्यक सुभूमि मिथिलामे जाहि आर्यसंस्कृतिक बीज-वपन कएल, तकर मूल छल धर्म, धर्मक मूल थिक जाति, ई जाति होयत एहि जन्मक विशुद्धिसँ, जन्मसँ विशुद्ध संतान होइत अछि तखन जखन विवाहक अधिकार जाहि कन्यासँ हो तकरहिसँ विवाह कएला उत्तर प्राप्त संतान आर्य जातिक विवाहक नियम सभ सर्वप्रथम निबंधित भेल विभिन्न स्मृति सभमे। महान स्मृतिकार मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक अनुसार ओहि कन्यासँ विवाहक अधिकार हो जे- 1. समान गोत्रक नहि होथि, 2. समान प्रवरक नहि होथि, 3. माइक सपिण्ड नहि होथि,
4. पिताक सपिण्ड नहि होथि,
5. पिताम अथवा मातामहक संतान नहि होथि, 6. कठमामक संतान नहि होथि।
एहि वैवाहिक अधिकारक निष्पादनार्थ कमसँ कम मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक समयसँ त निश्चये लोक अपन ‘ यावतो परिचय’ स्वयं अपनहि रखैत आबि रहल छल, मुदा पश्चातक युगमे ई प्रवृत्ति समाप्तप्राय भ’ गेल। विवाहक हेतु वर ओ’ कन्याक सम्पूर्ण परिचय तँ आवश्यके छल, जे आनहु धार्मिक संस्कारक हेतु सपिण्डत्त्वक विचार विवाहक अतिरिक्त श्राद्ध ओ’ अशौच प्रभृतिअहुमे आवश्यक होइत छल, एहि कारणेँ प्रागैतिहासिक कालहिसँ लोक अपन सांगोपांग परिचय रखैत छल। ओ’ ओकरहि अनुसार अपन धार्मिक क्रियाक निष्पादन करैत रहए। ई नियम सभ हमरा लोकनिक प्राचीनतम धर्मग्रंथ सभमे उपलब्ध अछि। स्मृति सभमे कहल गेल अछि, जे जनिकासँ विवाहक अधिकार नहि हो से स्वजना भेलीह। स्वजनासँ विवाहोपरांत प्राप्त संतान चाण्डाल बूझल जाइत छल। ओ’ आर्यत्वक मर्यादासँ बहिष्कृत मानल जाइत छल।
(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
देवनागरी लिखबामे बराह आइ.एम.ई. केर योगदान विशिष्ट अछि। एहिमे संस्कृतक उदात्त , अनुदात्त आ’ स्वरित केर संगे बिकारी, देवनागरी अंक आ’ संगीतक नोटेशन लिखबाक सुविधा अछि। विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभ बिना एकर सहयोगक संभव नहि छल। मंद्र सप्तक, तीव्र आ’ कोमल स्वरक नोटेशन एहिमे अछि। ऋ,ॠ आ’ ऌ,ॡ आ’ ऍ, ऎ अ, ~ हलन्तक बाद अअर जोड्बाक सुविधा एहिमे सुविधा छैक। अनुदात्त क॒ उदात्त क॑ आ’ स्वरित क॓ सेहो उपलब्ध अछि।
ई विस्टामे सेहो कार्य करैत अछि। आ’ यूनीकोड फॉंटमे रहबाक कारण इंटरनेट पर पठनीय अछि। विदेहक सम्मुख पृष्ठ पर देवनागरीसँ संबंधित तीनटा लिंक राखल गेल अछि। पहिल दू टा लिंक पर जानकारीक संग सॉफ्टवेयर डाउंलोडक लिंक अछि। तेसर लिंक पर ऑनलाइन ताइपिंगक सुविधा अछि, एतय टाइप क’ कय कॉपी कय वर्ड डोक्युमेंटमे पेस्ट कए सकैत छी किंवा ईमेलमे सोझे टाइप केलाक बदला एतयसँ कॉपी कय पेस्ट कए सकैत छी।
(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 13. रचना लिखबासँ पहिने...

13. रचना लिखबासँ पहिने...
मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य अग्राह्य
एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अएलाह वा अयलाह, जाए वा जाय इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, कौआ वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, किनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कय।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ड वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
( ह./ गोविन्द झा/11.08.76 श्रीकांत ठाकुर 11.08.76 सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ 11.08.76
(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 14. प्रवासी मैथिल English मे

14. प्रवासी मैथिल English मे
King Videha of Mithila had his counsellor Mahosadha.Mithila was invaded by Sudhanvan, king of Sankaiya, and much later by Chulani Brahmadatta and Kewatta, king of Kampila both were defeated by Siradhvaja and Videha, respectively. Jataka story of king Videha and Mahosadha,commander. Secret service reported daily ,employed a hundred and one soldiers in as many cities,employed parrots also, great rampart,watchtowers, and between the watctowers,three moats, water,mud and a dry moat. In city old houses were restored and large banks were dug made warter-reservoirs and grain store-houses. The siege of Mithila and the great tunnel have been described in the Jataka.The weapons included,red-hot missiles,javelins,arrows,spears and lances,and showers of mud and stone. The society consisted of Brahmanas, Kshatriyas, Vaisyas. Sirivaddha, father of Mahosadha was an important merchant of Mithila. The Chandala is also referred.A hawk carried off a piece of flesh from the slab of a slau¬ghter-house. A dog fed upon the bones, skins of the royal kitchen. There was a type of education and later Videha students went to Takshsila for education,e.g.Pintguttara. Kahoda Kaushitaki was married to the daughter of his teacher Uddalaka Aruni. Suka visited Mithila to acquire wisdom. Srutadeva was a great scholar of pre-Bharata era. Agriculture and Cattle-rearing was in vogue and Yajur-Veda mentions famous cows of Videha.King Vedeha gave a thousand cows and a bull to Mahasodha. There was a place where foreign merchants showed their goods. Goods from Magadha and Kasi were imported. The conches of Magadha,Kasi-robe and Sindh mares were famous.Krishna visited Mithila to see his devotees Srutadeva and Bahulashva.The Mahabharata says that shaligrama is another name of Vishnu, Shaligrama worship begun. Janakpur had four gates were four market towns distinguished as eastern, southern, western and northern. There was a revival of Mithila after Bharata war which lasted for more than two centuries and in this period the famous sages of the Brahmanas, the Aranyakas and the Upanishads flour¬ished. Vaishali lost its significance. After Bharata War period the Puranas furnish genealo¬gies of Pauravas(Hastinapura-Kosambi), the Ikshvakus (Kosala) and the Barhadrathas (Mag adha).The names of the kings of Videha ia available in the Jatakas.The Upanishads mention one ruler known as Janaka Videha.Videha has been omitted in the sixteen Mahajanapada available in the Buddhist work Aiguttara-Nikaya where we have Vajji.Karala Janaka perished along with his king-dom and relations. Kasi was conquered by Kosala and Anga by Magadha. The Vajji established their republic before the Kosala conquest of Kasi and the Magadh conquest of Anga.Mall, the penultimate sovereign of the Janaka dynasty of Videha, adopted the faith of the Jaina Parsva, the first historical Jaina 250 years before Mahavira(561BC-490BC).Between Bharat war circa.950 BC and Karala Janaka circa 725 B.c Videha monarchy flourished.
Suruchi group consisting of Suruchi I, Suruchi II Suruchi III and Mahapadmanada.
Janaka group consisting of Mahajanaka I, Arittha¬janaka, Polajahak, Mahajanaka II and Dighavu.Then a group of two kings Sadhina and Narada and then Nimi and Karala(father and son).Makhadeva is regarded as the founder of Mithila monarchy.
Angatis was righteous king,had a daughter named Raja. His ministers were Vijaya, Sunama and Alata. Narada set him to right path after the influence he got from the heretical teachings of a naked Guna Kassapa. Purana Kassapa and Maskari Gosala were the contemporaries of Buddha, thus, Guna Kassapa flourished round 6th century B.C. Chulani Brahmadatta of Kampilya conquered 101 princes of India and only Videha had been left. There is reference that Gandhara king and the Videha king met and mystic meditation was taught to Videha King by Gandhara king.There were land owners and Alaras is mentioned in this regard.The Vedic texts mention Uddalaka and Svetaketu as belonging to the age of Janaka of Videha. The Jatakas mention these two scholars connected with Banaras.For MahapanadaVisvakarman, engineer, constructed a palace seven storeys high with precious stones. Mahajanaka II was brought up by his mother in the house of a Brahmana teacher at Kalachampa and after finishing his education at16 sailed for Suvarnabhumi on a commercial enterprise, in order to get mone to recover the kingdom of Videha. The ship perished in the middle of the ocean. He managed to reach Mithila, where the throne had been lying vacant since the death of Polajanak, his uncle, who had left a marriageable daughter Sivalidevi and no son. Mahajanaka II was now married to this princess and raised to the throne. He later renounced the world. A remarkable feature of the character of Mahajanaka II was his spirit of renunciation. He gives utterance to a famous verse :¬ ‘We have nothing own may live without a care Mithila palaces may burn,nothing mine is burned . Mahajanaka-Jataka is sculptured on a railing of the Bharhut Stupa having inscription : The arrowmaker, King Janaka, Queen Sivali.Nimi and Kalara are men¬tioned in Buddhist,Brahmanical and Jaina literature. Ugrasena Janaka revived the greatness of Mithila. Ashtavakra sais as all other mountains are inferior to the Mainaka, as calves are inferior to the ox, so kings of the earth inferior to the king of Mithila (Ugrasena). He is called Janakana varishtha Samrat(Mahabharata),great performer of sacrifices and is compared with Yayati. In one such Yagya Ashtavakra, son of Kahoda and Sujata (daughter of Uddalaka), attended and Ashtavakra defeated Vandin, son of a charioteer and got released his son.Paurava prince, Satanika, the son of Janamejaya, was a Vaidehi. Sathnika married the daughter of Ugrasena Janaka who sought to enhance his influence by means of this matrimonial alliance. Devarata II was contemporary of Yajnavalkya, who took the management of the royal sacrifice where a quarrel arose between Yajnavalkya and his maternal uncle Vaisampayana as to who should be allowed to take the sacrificial fee and in presence of Devala, Devarata, Sumanta, Paila and Jaimini Yajnavalkya took half of that. Devarata I obtained the famous bow of Siva. The Vedic texts mention five Videha kings,Videgha Mathava, Janaka Vaideha, Janaki Ayasthuna, Nami Sepya and Para Ahlara. Janak Ayasthuna in the Brihadaranyaka Upanishad is said to be pupil of Chuda Bhagavitti and a teacher of Satyakama Jabala. Satyakama Jabala is contemporary of Janaka Vaideha and Yajnavalkya. Ayasthuna was a Grihapati of those whose Adhvaryu was Saulvayana and taught the latter the proper mode of using certain spoons. Sayana Ayasthuna is the name of a Rishi. Jatak mentions a city named Thuna between Mithila and the Himalayas, a favourite resort of Ayasthuna. Janakpur corres-ponds exactly with the position assigned by Hiuen Tsang the capital of Vaji. Janaka Vaideha is Kriti Janaka, son of Bahulasva and was contemporary of Janamejaya Parikshita and his son Satanika. Yajnavalkya and Kritis were the disciples of Hiranyanabha Kausalya. Uddalaka Aruni was approached by Janamejaya Parikshita to become his priest. Uttanka instigated Janamejaya to exter¬minate the non-Aryan Sarpas by burning them in a sacrifice.Uddalaka Aruni with his son Svetaketu attended the Sarpa satra of Janamejaya. Yajnavalkya taught the Vedas to Satanika, the son and successor of Janamejaya.Kriti, the disciple of Hiranyanabha, was the son of a king. Janaka Videha was a contemporary of Uddalaka Aruni,Yajna¬valkya, Ushasti Chakrayana. Janaka Vaideha brought centre of political and intellectual gravity from the Kuru country to Videha.The royal seat of the main branch of the Kuru or Bharata dynasty shifted to Kausambi. Aitareya Brahman says that all kings of the are called Samrat. Satapatha¬ Brahman says that the Samrat was a higher authority than a Rajan as by the Rajasuya he becomes Raja and by Vajapeya he becomes Samrat.
The Kuru ¬Panchalas were called Rajan. Janaka Vaideha’s was a master of Agnihotra sacrifice. Yajnavalkya learnt the Agnihotra from this king. Yajnavalkya Vajasaneya, who was a pupil of Uddalaka Aruni.


सिद्धिरस्तु
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Wednesday, July 23, 2008

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
आब किछु बात यूनीकोड आ’ वेबसाइट केर संबंधमे।
कोनो फाइलकेँ पढ़बाक हेतु कंप्युटरमे आवश्यक फॉंट होयब जरूरी अछि, नहि तँ सभसँ सरल उपाय अछि, वर्ड डोक्युमेंटकेँ पी.डी.एफ. फाइलमे परिवर्त्तित करू। एहिमे नफा नुकसान दुनू अछि। नफा जे बिना कोनो फांटक झंझटिक पी.डी.एफ.फाइल जाइ लिपिमे लिखल गेल अछि, ताहिमे पढ़ल जा’ सकैत अछि। एकर नुकसान जे जखने फाइलमे जा’ कय सेव एज टेक्स्ट करब तँ अंग्रेजीतँ सेव भय जायत, मुदा देवनागरी तेहन सेव होयत जे पढ़ि नहि सकी। दोसर यूनीकोडक मंगलमे टाइप कएल डॉक्युमेंटकेँ एडोब अक्रोबेटसँ पी.डी.एफ.मे परिवर्त्तित करबामे दिक्कत होय तँ संपूर्ण फाइलकेँ खोलि कय सेलेक्ट करू यूनीवर्सल यूनीकोड एम.एस.फांट ड्रॉप डाउन मेनूसँ सेलेक्ट करू फेर प्रिंटमे जा कय प्रिंटर एडोब एक्रोबेट सेलेक्ट करू। आब ई फाइल परिवर्त्तित भय जायत पी. डी. एफ.मे। आब वेबसाइट बनेबाक पूर्व किछु मुख्य बातकेँ देखि लिय’। चारि तरहक इंटरनेट ब्राउजर अछि, शेष सभटा एकरा सभकेँ आधार बना कय रचित अछि। तखन सभसँ पहिने ई चारू अपना कंप्युटरमे इंस्टॉल करू. 1.ओपेरा 2.मोजिल्ला 3.माइक्रोसॉफ्टक इंटरनेट एक्सप्लोरर(ई तँ होयबे करत) आ’ चारिमक बीटा(प्रायोगिक) वर्सन आयल अछि, 4. एपलक,अखन तक मेकिनटोसक लेल छल ई, सफारी (विंडोजक हेतु)। आब जखन वेब पेज उपलोद करू वा पहिनहु तँ एहि चारू पर खोलि कय जरूर देखि लिय’।(अनुवर्तते)

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 11. मिथिला आ’ संस्कृत

11. मिथिला आ’ संस्कृत

कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयसँ प्रकाशित दोसर नाटक अछि- महाकवि विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक। एहिसँ पहिने कृष्ण पर आधारित नाटक प्रचल छल। एहि अर्थमे ई एकटा क्रांतिकरी नाटक कहल जायत।
नाथ संप्रदाय किंवा गोरक्ष संप्रदायक प्रवर्त्तक योगी गोरक्षनाथक कथा ल’ कय एहि नाटकक कथावस्तु संगठित भेल अछि।गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा 18 टा रानीक संग भए भोग कए रहल छथि। गोरक्ष आ’ काननीपादकेँ द्वारपाल रोकि दैत अछि।मंत्री ढोलहो पिटबा दैत अछि जे योगी सभक प्रवेश कतहु नहि हो आ’ रानी सभकेँ राजाक मोन मोहने रहबाक हेतु कहल जाइत अछि। गोरक्ष आ’ काननपाद नटुआक वेष धरैत छथि आ’ मोहक नृत्य राजाकेँ देखबैत छथि। एहि बीच राजाक एकमात्र पुत्र बौधनाथ खेलाइत-खेलाइत मरि जाइत अछि। राजाक शंका नट पर जाइत छैक तँ ओकरा मारबाक आदेश होइत छैक। नट बच्चाकेँ जिया दैत छैक। राजा हुनकर परिचय पुछैत छथि तखन ओ’ हुनका अपन पूर्व जन्मक सभटा गप बता दैत छन्हि, जे अहाँ तँ जोगी छी भोगी नहि।
एहि नातकक पात्रमे महामति(राजाक मंत्री) आ’ महादेवी- मत्स्येन्द्रनाथक ज्येष्ठ रानी सेहो छथि। मत्स्येन्द्रनाथ कदलीपुरक राजा आ’ पूर्व जन्मक योगी छथि। मत्स्येन्द्रनाथ अंतमे कहैत छथि जे गोरक्ष जेहन शिष्य हो आ’ महादेवी जेहन सभ नारी होथु। --------

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 10. पंजी प्रबंध लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार

10. पंजी प्रबंध
लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार
भारतीय इतिहासक वेत्ता ओ’ जातीय व्यवस्थाक मर्मज्ञ लोकनि जनैत छथि, जे भारतवर्षक ब्राह्मण लोकनि सर्वप्रथम वेदक आधार पर विभिन्न वर्गमे विभाजित रहथि। जेना- सामवेदी, यजुर्वेदी, आदि कहाबथि। मुदा समयक प्रभावमे भिन्न क्षेत्र-प्रक्षेत्रमे रहनिहार ब्राह्मण लोकनि भिन्न-भिन्न संस्कृतिसँ प्रभावित भए गेलाह। क्षेत्रीय संस्कृतिसँ प्रभावित होएबाक मुख्य कारण छल विशिष्ट क्षेत्रक विशिष्ट जलवायु, क्षेत्र विशेषक भाषा-विशेष, भिन्न-भिन्न क्षेत्रक भिन्न-भिन्न आहार एवम भेष-भूषा आ’ एक क्षेत्र सँ दोसर क्षेत्र जयबाक हेतु आवागमनक असुविधा आदि। फलतः क्षेत्र-विशेषक ब्राह्मण समुदाय, क्षेत्र विशेषक आचार-विचार, खान-पान,वेश-भूषा ,भाव-भाषा ओ’ सभ्यता संस्कृतिसँ प्रभवित भय गेलाह।
उपरोक्त कारणे पुरानक युग अबैत0-अबैत भारत वर्षक ब्राह्मण समाज भिन्न-भिन्न क्षेत्रक आधार पर विभिन्न वर्गमे विभाजित भए गेलाह। पुरानक सम्मतिये भारत-वर्षक समस्त ब्राह्मण समाजकेँ दस(10) वर्गमे विभाजित कएल गेल रहय। ब्राह्मणक ई दसो वर्ग थीक-उत्कल,कान्यकुब्ज,गौड़,मैथिल,सारस्वत, कार्णाट,गुर्जर, तैलंग,द्रविड़ ओ’ महाराष्ट्रीय। स्थूल रूपेँ पूर्वोक्त पाँच केँ पञ्च गौड़ आ’ अपर पाँचकेँ पञ्च द्रविड़ कहल जाइत अछि। एकर सीमांकन भेल विन्ध्याचल पर्वतक उत्तर पञ्च गौड़ ओ विन्ध्याचल पर्वतक दक्षिण पञ्च द्रविड़।
मैथिल ब्राह्मण
पञ्च गौड़ वर्गक मैथिल ब्राहमण लोकनि पुस्ति-दर-पुस्त सँ मिथिलामे रहबाक कारणेँ मिथिलाक विशिष्ट संस्कृतिसँ प्रभावित भए गेलाह, तँय अहि कारणेँ पुराणक युगमे मैथिल ब्राह्मण कहाए सुप्रसिद्ध भेलाह। मिथिला वस्तुतः प्राचीन राहवंशक राजधानी रहए। मुदा पश्चातक युगमे विदेह राजवंशक समस्त प्रशासित क्षेत्र अथवा जनपद मिथिला कहाए सुप्रसिद्ध भेल आ’ एहि जनपदक रहनिहार ब्राह्मण लोकनि मैथिल ब्राह्मण कओलन्हि। ई मिथिला आइ नेपाल ओ’ बंगलादेशक सीमा सँ सटैत अनुवर्त्तमान अछि, जे राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिसँ अपन एक विशिष्ट स्थान रखैत अछि।
मैथिल ब्राह्मण लोकनि मूलतः दुइए गोट वेदक अनुयायी थिकाह। एक वर्गक यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक अनुयायी थिकाह तँ दोसर सामवेदक कौथुम शाखाक अनुगमन करैत छथि। यजुर्वेदक माध्यन्दिन शाखाक अनुयायी”वाजसनेयी” कहबैत छथि, एहिना सामवेद्क कौथुम शाखाक अनुयायी छन्दोग कहबैत छथि।दुहुक संस्कारमे किछु स्थूलो अन्तर अछि। छन्दोग उपनयनमे चारि गोट संस्कार- नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन ओ समावर्त्तन मुदा वाजसनेयीक ई चारू संस्कार थिक, चूड़ाकरण, उपनयन, वेदारम्भ ओ समावर्त्तन। एहिना छन्दोग विवाह मुख्यतः दू खण्डमे सम्पन्न होइत अछि, पूर्व विवाह आओर उत्तर विवाह। उत्तर विवाह सूर्यास्तक बाद तारा देखि कए होइत अछि। मुदा वाजसनेयी विवाहमे एहन कोनो विभाजन नहि अछि। एकहि क्रममे दिन अथवा रातिमे कखनहुँ भए सकैत अछि। वाजसनेयी ओ’ छन्दोगक धार्मिक संस्कारमे तँ सूक्ष्म अंतर कतौक अछि।
(अनुवर्तते)

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा)

7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा)
कुमरम मने विवाह आ’ उपनयनसँ एक दिन पहिने क्रमशः कनियाँ आ’ बरुआकेँ आङ उङारल जाइत अछि मने श्रेष्ठ स्त्रीगण यव आ’ आन पदार्थसँ बनल उबटन लगबैथ छथि। एतय मंडप पर सबरंग पटिया पर षट पाइस अरिपनक समक्ष मंडप पर ई कार्य संपादित होइत अछि। ई एकटा रक्षा कवच थिक।
विधि- तीनटा आयत बनाऊ एकक नीचाँ एक। पाँच खंड उर्ध्वाधर आ’ तीन क्षैतिज खंड करू। एहि 18 खंडमे फूल बनाऊ।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)

6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
वयम् इदानीम अति सरलां रम्यां कथां श्रुण्वः। एकाम् कथां वदामि। कश्चन् वृद्धः अस्ति। तस्य शक्तिः नास्ति। जीर्णम् शरीरम् अस्ति। चलितिम् शक्नुम न। सः बुभुक्षितः अस्ति। सः एकम् वनम् गच्छति। वने सर्वत्र भ्रमणम् करोति। खदितुम् किमपि लभ्यते वा इति सर्वत्र भ्रमणं करोति। सः एकंवृक्ष समीपम् गच्छति। वृक्षं पश्यति। उत्तमानि फलानि सन्ति। किंतु फलानि उपरि सन्ति। सः वृद्धः चिन्तयति। फलानि उपरि सन्ति। अहं निस्पृहः अस्मि, कथं प्राप्नोमि। किम् करोमि। इति चिन्तयति। वृक्षः उन्नतः अस्ति। अहं निष्यप्तः अस्मि। आरोहण कर्त्तुम् न शक्नोमि। किम् करोमि। कथं फलं प्राप्नोमि। इति चिन्तयति। वृक्षस्य उपरि वानराः सन्ति। वृद्धः एकः उपायः करोति। एकं शिलाखण्डं स्वीकरोति। शिलाखण्डं उपरि क्षिपति। वनराः कुपितः भवन्ति। फलानि अधः क्षिपन्ति। वृद्धः संतोषेण फलं सर्वम खादति। बहुसंतुष्टः भवति।कथायाः अर्थः ज्ञातवंतः। आम् ज्ञातवंतः। धन्यवादः। नमोनमः।

मम् नाम गजेन्द्रः। भवत्याः नाम् किम्? मम् नाम रमा। भवतः नाम किम्? समीचीनम्।
उत्तिष्ठतु।
आगच्छतु। गच्छतु। रोहित आगच्छतु। रोहितः किम् करोति?
रोहितः गच्छति। रोहितः आगच्छति। उपविशतु। अभिरामः उपविशति। उत्तिष्ठतु। अभिरामः उत्तिष्ठति। सुनीता पिबति। आस्था पिबति।
ओम गच्छति। खादतु।
सा खादति। आस्था खादति। श्रुतिः किम् करोति। श्रुतिः खादति। स्नेहा किम् करोति। स्नेहा पठति। लिखतु। आस्था लिखति। अश्वनी हसतु। आस्था हसतु। आस्था हसति। सुमन्तः हसति। पश्यतु। सुमन्तः पश्यति। प्रियङ्का वदतु। कृष्णफलकं तत्र अस्ति। प्रियङ्का वदति। आगच्छतु। क्रीडतु। आस्था आगच्छति।
क्रीडति।
गच्छति पठति लिखति सः एषः सा एषा भवान भवती
भवान उत्तिष्ठति। भवान उपविशति। भवती लिखति। भवती पठति। अहं गच्छामि। अहं आगच्छामि। अहं उपविशामि। अहं उत्तिष्ठामि। अहं पिबामि। अहं खादामि। अहं क्रीडामि। अहं हसामि। अहं पठामि। अहं लिखामि। अहं वदामि। भवान किम् करोति। अहं पश्यामि। भवान उत्तिष्ठतु। भवान उपविशतु। भवती पठति। भवती पठतु। भवती लिखति। भवती लिखतु। भवती पश्यति। भवती पश्यतु। भवती गच्छति। भवती आगच्छति। भवती उपविशति। उत्तिष्ठति। वदति। लिखति। अहं पठामि। अहं वदामि। अहं पश्यामि। ददातु। किम् करोति। आगच्छतु। आगच्छति। नयतु। मास्तु-मास्तु। ददातु। कृपया उत्तिष्ठतु। एकम् – एकादश
द्वे द्वादश त्रीणि
चत्वारि पञ्चः षट्
सप्त अष्ट नव दश एकादश द्वादश विंशतिः त्रिंशतः चत्वारिंशत्
पञ्चाशत्
षष्टिः सप्ततिः अशीतिः नवतिः शतम्

संस्कृतम् कथं समयः वक्त्तव्यः इति इदानीम् वयं जानीम। पंच वादनम्। कः समयः। षड् वादनम्। अष्ट वादनम्। समयम् अक्षरैः लिखतु। घट्यां समयं दर्शयतु। दश वादनम्। दशाधिक नव वादनम्। पञ्चन्यून दशवादनम्। एकादश वादनम्। सपाद एकादश वादनम्। सपाद पञ्चवादनम्। सपाद अष्टवादनम्। सार्ध सप्तवादनम्। पादोन एकादशवादनम्। एवमेव सार्द्ध दशवादनम्। एक
द्वि
त्रि चतुर्वादनम्
इदानीम् वयम् एकं सुभाषितम श्रुण्वः।
सुभाषितम्

प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्त्तव्यं वचने का दरिद्रता। वयम् इदानीम् यत् सुभाषितम् श्रुतवंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। यदि वाक्यं वदामः सर्वे जनाः अपि संतुष्टाः भवन्ति। न केवलं जनाः अपितु सर्वे प्राणिनाः अपि संतुष्टाः भवंति। अतः प्रियः वाक्यमेव वदामः। प्रिय वाक्यम् वक्तुम् धनं दातव्यं किमपि नास्ति। प्रिय वाक्य कथने दारिद्रयं कुतः।
सङ्कल्पगानम्

भवतु सफलार्थाः वयम्
भवतु सफलार्थाः वयम्
भवतु सफलार्थाः वयम् एक वासरे....
ओ हो हो, मनसि मे विश्वासः सम्यक्
विश्वासः मे मनसि विश्वासः वयम् एक वासरे....
भवतु शान्तिः सर्वत्र भवतु शान्तिः सर्वत्र
भवतु शान्तिः सर्वत्र
एक वासरे,ओ हो हो..। सन्ति एक-तया वयम्
सन्ति एक-तया वयम्
धृत्वा हस्त-हस्ततलं सन्ति एक-तया वयम्
एक वासरे,ओ हो हो .....
अद्य न अस्ति दरः कस्मात्

अद्य न अस्ति दरः कस्मात्
अद्य न अस्ति दरः कस्मात्
एक वासरे,ओ हो हो....
सिद्धिरस्तु।