भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).

ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

 

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Showing posts with label लिली रे. Show all posts
Showing posts with label लिली रे. Show all posts

Wednesday, April 22, 2009

विधिक विधान-कथा- लिली रे

पानमती खटनारि माउगि छल। सब ठाम ओकर माँग छलै। चाहे कतबो राति क’ सुतए, पाँच बजे भोरे ओकर नीन टूटि जाइ। छ’ बजे ओ काज पर बहरा जाए। तीन घरमे बासन मँजैत छल, घर बहाड़ैत-पोछैत छल, कपड़ा धोइत छल। साढ़े एगारह बजे अपन झुग्गीमे घुरैत छल।

झुग्गीमे सबसँ पहिने चटनी पीसैत छल। तकरा बाद स्टोव पर गेंट क गेंट रोटी पकबैत छल। ओकर बेटी तकरा बिल्डिंग साइट पर बेचैत छल। कुली-मजदूर टटका रोटी कीनए। चटनी मुफ्त भेटइ।

हिसाब-किताब पूनम राखए। ओ पाँच क्लास तक पढ़लि छल। स्कूलमे पाँचहि क्लास तक छलै। से भ’ गेलइ त’ पानमती पूनमकें काज लगा देलकै। बासन माँजब घर पोछब नइं। पूनम करैत छल कपड़ामे ‘इस्त्राी’। फाटल कपड़ाक सिलाइ, बटन टाँकब। इसकूलिया बच्चाक माइ लोकनि पूनमकें मासिक दरमाहा पर रखने छलीह। सस्त पड़नि।

चोरी, मुँहजोरी, दुश्चरित्राता-तीनूमे कोनो दोष पानमतीमे नइं छलै। झुग्गी कालोनीक लोककें ओकरासँ ईष्र्या होइ। नियोजक लोकनि लग पानमती सम्मानक पात्रा छल। पूनम आठ वर्षक छल जखन पानमती ओहि इलाकामे आएल। पचास टाका मास पर झुग्गी किराया पर नेने छल। आब ओकरा चारि टा अपन झुग्गी छलै। एकमे रहै छल। तीनटा किराया लगौने छल। सौ रुपैया मास प्रति झुग्गी। आब इच्छा छलै एकटा सब्जीक दोकान करबाक। दखली-बेदखलीवला नइं, रजिस्ट्रीवला दोकान। जकरा केओ उपटा नइं सकए। दुनू माइ-बेटी रुपैया जमा क’ रहल छल। बेटी समर्थ भ’ गेल रहै। तकर बियाह करब’ चाहैत छल। नीक घर-वर। विश्वासपात्रा।

पूनम पानि भरबा लेल लाइनमे ठाढ़ि छल। बुझि पड़लै जेना केओ ओकरा दिस ताकि रहल होइ। मुँह चीन्हार बुझि पड़लै। अधवयसू व्यक्ति। उज्जर-कारी केश। थाकल बगए। ताबत लाइन आगू घसकि गेलइ। पूनम सेहो बढ़ि गेल। आगू पाछू लोकक बीच अ’ढ़ क’ लेलक। ओ लोक सेहो दोसर दिस मूड़ी घुरा लेलक।

पूनम सेहो तीन घरमे काज करैत छल। मुदा ओकरा देरीसँ जाइए पड़ै। तहिना देरीसँ अबैत छल। तीनू ठाम चाह-जलखइ भेटै। माइ-बेटी तीन ठाम नइं खा सकए। एक ठाम खाए, बाकी ठाम चाह पीबए। जलखइ’क पन्नी घर आनए। बेरहट रातिमे चलि जाइ। कहियो काल भानस करए।

पूनम जलखइ ल’ क’ बहराए त’ माइ ठाढ़ि भेटइ। पूनमसँ दुनू पन्नी ल’ माइ घर घूरि जाइ। माइ जाबत अदृश्य नइं भ’ जाइ, पूनम देखैत रहए। तखन पुनः काज पर जाए।

फेर ओएह व्यक्ति सुझलइ। ओ पूनमकें नइं, पानमतीकें अँखियासि क’ देखि रहल छल। दूरहि दूरसँ। पानमती निर्विकार भावसँ जा रहल छल।

तकरा बाद ओ व्यक्ति नइं सुझलइ। पूनम सेहो बिसरि गेल।

पानमती स्टोव पर रोटी पकबैत छल। गरमीमे पसीनासँ सराबोर भ’ जाइत छल। काज परसँ घूरए त’ सबसँ पहिने अपन झुग्गीक पाछू पाॅलिथिनक पर्दा टाँगए। पानिक कनस्तर आ मग राखए। तकरा बाद माइ’क बनाओल रोटी-चटनीक चंगेरी उठा साइट पर बेच’ जाए। पानमती स्टोव मिझा, स्थान पर राखि, नहाइ लेल जाए।

ओहि दिन रोटी कीननिहारक जमातमे ओहो व्यक्ति छल। सभक पछाति आएल। रोटी कीनबाक सती अपन गामक भाषामे बाजल-माइ कि एखनहुँ सुकरिया कहइ छउ? पूनम अकचकाइत पुछलकइ-अहाँ के छी?

-तोंही कह जे हम के छियौ तोहर?-फेर ओएह भाषा।

-बा... बू... !-पूनम कान’ लागल।

-विधिक विधान! जहिया तकैत रहियौ, नइं भेटलें। आशा छुटि गेल त’ भेट गेलें। अकस्मातहि।

-तों चुपहि किऐ पड़ा गेलह? हमरा लोकनिकें कतेक तरद्दुत उठाब’ पड़ल-पूनम कनैत बाजल।

-विधिक विधान। हमर दुर्भाग्य। भेल जे आब एहि ठाम किछु हुअ’ वाला नइं। आन ठाम अजमाबी। गम्हड़ियावाली काज करैत छल। तइं भेल जे तोरा लोकनि भूखल नइं रहबें। कहि क’ जएबाक साहस नइं भेल। घूरि क’ अएलहुँ त’ ने ओ नगरी, ने ओ ठाम। गउआँ सभक ओतए खोज लेब’ गेलहुँ त’ सुनलहुँ जे ओ बाट बहकि गेल। गाम नइं जा मजूरक संग चल गेल। कोनो पता नइं छलइक ओकरा सबकें।

धत्! हमर माइ ओहेन नइं अछि।-पूनमकें हँसी लागि गेलइ। छलछल आँखिसँ हँसैत बाजल, गामक लोक कंठ ठेका देने रहइ गाम घूरि जाइ लेल। जबर्दस्ती ल’ जाइत। तइं माइ नुका क’ मंजूर मामाक मोहल्लामे आबि गेल।

-मंजूर कत’ अछि?

-पता नइं। मामा बड़ जोर दुखित पड़ि गेलै। दवाइ दारूमे सब पाइ खर्च भ’ गेलै। रिकशा सेहो बेच’ पड़लै। पाछू नोएडामे ओकरे गामक कोनो साहेब रहथिन। सएह क्वार्टर देलखिन। रिकशा कीनै लेल पैंच देलखिन। शर्त रहनि जे मेमसाहेबकें स्कूल पहुँचाएब, आ घर आनब। तकर बीचमे अपना लेल चलाएब। मेमसाहेब डी. पी. एस.मे टीचर छली। पहिने भेंट कर’ अबैत रहै। एक दूू बेर मामी, बच्चा सबकें सेहो अनने छल। आब त’ कत्ता वर्ष भ’ गेलइ। कोनो पता नइं। मंजूर मामाक झुग्गी हमरा लोकनि कीनि लेलहुँ।

-वाह।

-तीन टा झुग्गी आर अछि। किराया पर लगौने छी। सबटा माइक बुद्धिसँ। तों की सब कएलह?

-से सब सुनाबी त’ महाभारत छोट भ’ जेतइ। हम अभागल, दुर्बल लोक।

-चल’ घर चल’। माइ बाट तकैत होएत।



पानमती नहा क’ भीतर आबि चुकल छल, जखन पूनम आएल।

-माइ, देख त’ हम ककरा अनलिऔ? चीन्हइ छही?

पानमती चीन्हि गेलै। मुदा किछु बाजल नइं।

-कोना छें?-ओ पुछलकइ।

-एतेक दिनसँ जासूसी चलैत रहइ, बूझल नइं भेलइ जे कोना छी।-पानमती अपन पैरक औंठा दिस तकैत नहुँ-नहुँ बाजल।

-तकर माने जे तोंहू चीन्हि गेलें।-ओ हँसबाक प्रयास कएलक।

पानमती किछु उत्तर नइं देलकै। ओहिना अपन पैरक औंठा दिस तकैत रहल। पूनमक ध्यान ओहि दिस नइं गेलै। ओ अपनहि झोंकमे छल-आब लोकक सोझामे माइ पूनम कहैत अछि। मुदा जखन दुःखित पड़ैत छी त’ कह’ लगैत अछि-हमर सुकरिया, नीके भ’ जो।-माथो दुखाइत त’ एकर हाथ पैर हेरा जाइत छै। कौखन नीको रहै छी त’ दुलार कर’ लगैत अछि। मारि मलार-हमर अप्पन सुकरिया। सुकरी! की-कहाँ नाम दैत अछि। पूनम नाम त’ तोरे राखल थिक ने? स्कूलमे। नइं? के रखलक हमर नाम सुकरिया?

-गाममे। तोहर जन्म शुक्र क’ भेलौ, तें सब सुकरिया कह’ लगलौ। हमरा केहेन दन लागए। मुदा ओतेक लोकसँ के रार करए। एत’ अएलहुँ त’ नाम बदलि देलियौ। तोहर नाम पूनम। तोहर माइक नाम पानमती। आ’ अपन नाम जागेश्वर मंडल।-पूनम ठठा क’ हँस’ लागल। जागेश्वरकें सेहो हँसी लागि गेलै। पूनम बाजल-कतेक सुखी रही हमरा लोकनि तहिया।

जागेश्वर लए सबसँ सुखक समय रहै ओ। मालिक सीमेण्ट, ईटाक खुचरा व्यापारी छल। अपन साइकिल ठेला छलै, जाहि पर समान एक ठामसँ दोसर ठाम पठबै। कइएक ठाम छोट छोट कच्चा गोदाम बनौने छल। तहीमे एक गोदाम लग एकटा झुग्गी जागेश्वर लेल सेहो बना देलकै। जागेश्वर अपन परिवार ल’ अनलक। सामनेक कोठीमे पानमतीकें बासन मँजबाक काज भेटि गेलै। म्यूनिसिपल स्कूलमे पूनम पढ़’ लागल।

मालिक रहै छल दक्षिण दिल्लीमे। अपन कोठी छलनि। तहीमे एक राति हुनकर परिवार सहित हत्या भ’ गेलनि। पुलिस आ वारिस लोकनिक गहमागहमी हुअ’ लागल। गोदामक जमीन मालिक केर नइं छलनि। जागेश्वरकें झुग्गी छोड़’ पड़लै। जाहि घरमे पानमती काज करैत छल, तत’ जगह खाली नइं छलै। दोसर एक कोठीमे टाट घेरि, टिनक छत द’, जगह देबा लेल राजी छलै, यदि पानमती ओहि कोठीक काज करब गछए। पानमती दुनू कोठीमे काज कर’ लागल।

जागेश्वरकें काज नइं भेटि रहल छलै। नब मालिक पुलिसक झमेला समाप्त होएबा तक प्रतीक्षा कर’ कहलखिन। झमेला अनन्त भ’ गेल छल। ओ मंजूरकें पकड़लक। मंजूर बाजल, हमर इलाकामे मजूरी बड़ कम छै। ओहि ठाम अधिकांश लोक नोकरिया। स्त्राीगण सब सेहो आॅफिस जाइत छथि। तैं ओहि ठाम घरक काज कएनिहारक मांग छै। पाइयो तहिना भेटै छै ओहि सब घरमे। छह बजे भोर जाउ, नौ बजेसँ पहिने काज खतम करू। घरवाली अपस्याँत भ’ जाइत अछि जाड़मे। नागा भेल, त’ पाइ कटि गेल। हमरा पोसाइत त’ किऐ अबितहुँ एतेक दूर काज ताक’?

मंजूर प्रीतमपुरामे रहै छल। भिनसर बससँ उत्तर दिल्ली अबैत छल। जगदीशक संग मालिक केर साइकिल ठेला पर माल उघैत छल। साँझ क’ फेर बससँ घर घुरैत छल। ओहि ठाम मालिककें कोनो गोदाम नइं छलनि। मंजूर तीस टका मास किरायाक झुग्गीमे रहै छल। ओकर योजना छलै एकटा अपन रिक्शा किनबाक। तकर बाद अपन स्त्राीक काज छोड़ा देबाक।

मंजूरक योजना सुनि जागेश्वर सेहो योजना बनबैत छल। पानमती सेहो। जागेश्वरकें झुग्गीक किराया नइं लगैत छलै। तैं ओ अपनाकें मंजूरसँ अधिक भाग्यवान बुझैत छल। बुद्विमान सेहो। भविष्यमे ओ झुग्गी बनएबाक सोचैत छल।

-पहिने जगह सुतारब। ठाम ठाम झुग्गी बना किराया पर लगा देबै। तखन तोरा काज कर’ नइं पड़तौ।

-नइं, हम काज नइं छोड़ब। झुग्गी किरायासँ साइकिल ठेला कीनब। एकटा नइं कइएक टा। माल उघै लेल किराया पर देबै।

-मालिककें?-जागेश्वर कौतुकसँ पूछै। पानमतीकें हँसी लागि जाइ। पूनम सेहो हँस’ लागए।

किछु नइं भेलै।

फरीदाबाद तक बउआएल। ढंगगर काज नइं भेटलै। शुभचिन्तक सब दिल्लीसँ बाहर भाग्य अजमएबाक सलाह देलकै। अपनहुँ सएह ठीक बुझि पड़लै। पानमती कन्नारोहट करत, ताहि डरसँ चुप्पहि चल गेल।

पूनम नेना छल। तैयो ओ दिन मोन पड़ि गेलै। स्कूलसँ बहराएल त’ बाप फाटक लग ठाढ़ भेटलै।

-नोकरी भेटलह?-पूनम पुछलकै।

-भेटि जायत।

-कत’?

-बड़ी दूर। तों नीक जकाँ रहिहें। माइक सब बात मानिहें। जाइ छी।

-कत?

-काज ताक’-जागेश्वरक आँखि छलछला गेलै।

-नइं जाह।

-फेर आबि जएबौ।

जागेश्वर चल गेल। तीन मास जखन कोनो खबरि नइं भेटलै, त’ पानमती पूनमक संग रघुनाथ रिक्शवाला लग गेल। ओकरहि गामक रहै। रघुनाथ बाकी गौंआं सबकें खबरि देलकै। सब पहुँचलै। घर घुरि जएबाक सलाह देलकै। पानमतीकें नइं रुचलै। सब जोर देब’ लगलै। पानमतीकें मान’ पड़लै। तय भेल जे अगिला मासक आठ तारीख क’ जे जमात गाम जाएत, ताहि संग पानमती आ पूनम सेहो रहत। सात तारीख क’ लोक आबि क’ ल’ जेतै अड्डा पर। ताबत पानमती दुनू घरसँ अपन दरमाहा उठा लिअय।

दुनू मलिकाइन दिल्ली छोड़बाक सलाह नइं देलखिन। कहलखिन, काज ताकए गेल छौ, घुरि अएतौ। चाहत त’ आब एत्तहु काज भेटि जेतै। हमरा लोकनि देखबै।

-अपन लोकवेदक से विचार नइं छै। ओ आबि जाए त’ कहबै जे हमरा जल्दी गामसँ ल’ आबए।-पानमती बाजल।

मंजूर भेंट करए अएलैक। पानमती ओकर पैर पकड़ि लेलकै। कान’ लागल। बाजल-हमरा अपन इलाकामे ल’ चलू। ओहि ठाम काजक लोकक माँग छै।

माइकें कनैत देखि, पूनम सेहो माइक बगलमे लोटि गेल। माइ बात दोहराब’ लागल।

मंजूर अकचका गेल। बाजल-ओहि ठाम रहब कत’?

-झुग्गीक किराया द’ क’। जेना अहाँ रहै छी।

-झुग्गीक किराया आब बढ़ि गेलै अछि। पचास टाका मास। आ पचास टाका सलामी भिन्न।

-देबै। जे नुआ फट्टा अछि, बेचि क’ द’ देबै।

मंजूरक बहु किछु दिनसँ काज पर जाइ काल नाकर नुकर क’ रहल छलै। हाथ-पैर झुनझुनाइत रहै। बदलामे पानमती सम्हारि देतै त’ दरमाहा नइं कटतै।

सएह सोचि क’ मंजूर राजी भ’ गेल। पानमती तखनहि बिदा हेबा लेल वस्तु जात बान्ह’ लागल। रघुनाथकें खबरि दइ लए पूनमकें दौड़ा देलकै।

-रघुनाथ काका! हमरा लोकनि गाम नइं जाएब।

-किऐ?

-मंजूर मामा लग रहब।



रघुनाथकें तखन सवारी रहै। ओ अधिक खोध वेध नइं केलकै। जागेश्वर प्रीतमपुरामे कत्ता बेर छानि मारलक। ने मंजूर भेटलै, ने पानमती, ने पूनम। अपने लोकबेद जएबासँ रोकै। बेर बेर बुझबै-केओ ककरो संग भागत, त’ पुरान डीह पर थोड़े बसत। ओ त’ तेहेन ठाम जाएत, जत’ ओकरा केओ नइं चीन्हइ। केहेन मूर्ख छें तों।



-महामूर्ख छी हम-जागेश्वर घाड़ नेरबैत बाजल। पूनम सेहो घाड़ नेरबैत बाजल-नइं। तों कदापि मूर्ख नइं छह। झुग्गी बना क’ किराया लगएबाक विचार तोंही कएने छलह। हमरा लोकनि जे ठेला किनलहुँ, से जकरा चलब’ देलिऐ, सएह ल’ क’ भागि गेल। माइ त’ निश्चय क’ लेलक अछि, बिना रजिस्ट्रीक सब्जी दोकान नइं करत। आब तों आबि गेलह। तोंही दोकान चलएब’। आदना लोककें नइं देबै।

पूनम अपन माइ दिस तकलक। माइ अपन पैरक औंठा दिस दृष्टि गड़ौने ओहिना ठाढ़ि रहए। पूनमकें आश्चर्य भेलै। पूछलकै-माइ! तों किछु बजै नइं छें?

एक क्षण आर चुप रहि, पानमती बाजल-सब्जी दोकानमे देरी छै। रुपैया जमा हैत, जगह भेटत, रजिस्ट्री हैत-एखन त’ नाम पर लगैत बट्टा बचएबाक अछि।

-बट्टा?

-नौ वर्षसँ एहि इलाकामे छी। सब जनैत अछि जे हमरा एक बेटी छोड़ि, आगू पाछू केओ नइं अछि। तखन एकटा पुरुष क्यो।

-केओ एकटा पुरुष नइं। तोहर वर, आ हमर बाप थिक।

-केओ नइं मानत। सब आंगुर उठाओत।

-के आंगुर उठाओत? प्रति तेसर लोक जोड़ी बदलैत रहै अछि एतए।

-तइं त’ ककरो विश्वास नइं हेतै सत्य पर!-पानमती अइ बेर जागेश्वर दिस ताकि बाजल, बेटी लेल नीक घर वर चाहैत छी। एहने समयमे...

-माइ! एहेन कठोर जुनि बन। बाबू हारल थाकल अछि। कहियो त’ भरि गामक लोकसँ लड़ाइ क’ क’ हमरा लोकनिकें एत’ अनलक। बेटी-पुतोहुकें बाहर पठएबा ले ने तोहर लोकवेद राजी रहौ, ने बाबूके। बाबू नइं अनैत त’ गाममे गोबर गोइठा करैत सड़ैत रहितहुँ आइ।

-तोरा जनैत नीक दशा बनबै वाला तोहर बाप छौ। माइ जहन्नुममे देलकौ!

-नइं माइ, नइं। हमर तात्पर्य से नइं छल। हमरा सन माइ ककरो नइं छै।

-गामसँ अनलक ठीके। बैसा क’ नइं खुऔलक। तहू दिनमे बासन मँजैत रही। आइयो सएह करैत छी। तहिया दू घर काज करैत रही, आइ तीन घर करैत छी।

पूनमकें उत्तर नइं फुरलै। ओ दहो-बहो कान’ लागल। पानमती फेर अपन पैरक औंठा दिस ताक’ लागल।

जागेश्वर नइं सहि सकल। हाथसँ बेटीक मुँह पोछैत बाजल-चुप भ’ जो। माइसँ बढ़ि क’ तोहर हित-चिन्तक आन नइं हेतौ। ओकर बातसँ बाहर नइं होइ। ओकरा खूब मानी। चलै छियौ।

-नइं।-पूनम केर कोंढ़ फाट’ लगलै।

जागेश्वर बिदा भ’ गेल। पानमती ठाढ़िए रहल। पूनम अपन माइकें बड्ड मानैत छल। कहियो कोनो विरोध नइं कएने छल। दरमाहा बख्शीस जे किछु भेटै, माइक हाथ पर राखि देअए। माइ प्रति बेर ओहिसँ किछु पूनमकें दैत कहै-ले अपन सौख-मनोरथ लेल राख।

पूनम एकटा बटुआमे सौख मनोरथक रुपैया रखैत छल। पूनम फुर्तीसँ ओ बटुआ आ जलखैक एकटा पन्नी उठा बाहर दौड़ल।

जागेश्वर मंथर गतिसँ जा रहल छल। पूनम हाक देलकै-बाबू... कनेक बिलमि जा।-जागेश्वर थमि गेल। पूनम बटुआ ओकर हाथमे दैत कहलकै-ई एकदम हमर अपन पाइ थिक। तोरा लेल। जतबा दिन चल’, भूखल नइं रहिह’।

-नइं, नइं। ई राख तों, हमरा काज भेटल अछि।

-तैयो राखि लैह। तोहर बेटीकें संतोष हेतह। आ’ इहो लैह। जे घड़ी ने क’लमे पानि अएलहि अछि। हाथ मुँह धो क’ पेटमे ध’ लैह।

-एतेक मानै छें हमरा?-जागेश्वर आर्द्र कंठसँ बाजल।

-तों कोनो कम मानै छ’, हमरा राति क’ खिस्सा कहैत रह’। गीत सुनबैत रह’। कतेक दुलार-मलार करैत रह’। कहियो नइं बिसरल। ने कहियो बिसरत।-पूनम फेर कान’ लागल।

जागेश्वर हाथसँ नोर पोछि देलकै। बाजल किछु नइं। पूनम अवरुद्ध कंठसँ कहलकै, दू सौ सत्तासी नम्बर वैशाली नगरमे हम काज करैत छी। फाटक पर घरवैयाक नाम पता लिखल छै। ओहि ठाम चिट्ठी दिह’। नीक आ अधलाह सब हाल लिखिह’। आर एकटा बात...

-की?

-माइकें माफ क’ दिहक। कठोर मेहनति करैत-करैत ओकर मोन कठोर भ’ गेलै अछि। मुदा हमरा विश्वास अछि जे एक दिन ओ पिघलत। आ’ हमरा लोकनि पहिने जकाँ संग रह’ लागब, प्रेमसँ।

Friday, November 21, 2008

मिथिला विभूति 2- मिथिलाक महिला विभूति

अणिमा सिंह

(१९२४- )—समीक्षिका, अनुवादिका, सम्पादिका।प्रकाशन: मैथिली लोकगीत, वसवेश्वर (अनु.) आदि। लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज, कलकत्तामे पूर्व प्राध्यापिका।




लिली रे


जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार।मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित।विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। प्रबोध सम्मान प्राप्त।



शांति सुमन

जन्म 15 सितम्बर 1942, कासिमपुर, सहरसा, बिहार, प्रकाशित कृति, “ओ प्रतीक्षित, परछाई टूटती, सुलगते पसीने, पसीने के रिश्त, मौसम हुआ कबीर, समय चेतावनी नहीं देता, तप रेहे कचनार, भीतर-भीतर आग, मेघ इन्द्रनील (मैथिली गीत संग्रह), शोध प्रबंध: मध्यवर्गीय चेतना और हिन्दी का आधुनिक काव्य, उपन्यास: जल झुका हिरन। सम्मान: साहित्य सेवा सम्मान, कवि रत्न सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान। अध्यापन कार्य।





शेफालिका वर्मा


जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।



इलारानी सिंह


जन्म 1 जुलाई, 1945, निधन : 13 जून, 1993, पिता: प्रो. प्रबोध नारायण सिंह सम्पादिका : मिथिला दर्शन, विशेष अध्ययन: मैथिली, हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान एवं लोक साहित्य। प्रकाशित कृति: सलोमा (आस्कर वाइल्डक फ्रेंच नाटकक अनुवाद 1965), प्रेम एक कविता (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विषवृक्ष (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विन्दंती (1972), स्वरचित: मैथिली कविता संग्रह (1973), हिन्दी संग्रह।






नीरजा रेणु

जन्म: ११ अक्टूबर १९४५,नाम: कामाख्या देवी,उपनाम:नीरजा रेणु,जन्म स्थान:नवटोल,सरिसबपाही ।शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) एम.ए.,पी-एच.डी.,गृहिणी ।प्रकाशित रचना:ओसकण (कविता मि.मि., १९६०) लेखन पर पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेशक प्रभाव।मैथिली कथा धारा साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथाक पन्द्रह टा प्रतिनिधि कथाक सम्पादन ।सृजन धार पियासल कथा संग्रह,आगत क्षण ले कविता संग्रह, ऋतम्भरा कथा संग्रह,प्रतिच्छवि हिन्दी कथा संग्रह,१९६० सँ आइधरि सएसँ अधिक कथा, कविता, शोधनिबन्ध, ललितनिबन्ध,आदि अनेक पत्र-पत्रिका तथा अभिनन्दनग्रन्थमे प्रकाशित ।मैथिलीक अतिरिक्त किछु रचना हिन्दी तथा अंग्रेजीमे सेहो।




उषाकिरण खान


जन्म:१४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात।मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल (उपन्यास), नाटक, उपन्यास।





प्रेमलता मिश्र ’प्रेम’

जन्म:१९४८,जन्मस्थान:रहिका,माता:श्रीमती वृन्दा देवी,पिता:पं. दीनानाथ झा,शिक्षा:एम.ए., बी.एड.,प्रसिद्ध अभिनेत्री दू सयसँ बेशी नाटकमे भाग लेलनि ।भंगिमा (नाट्यमंच) क भूतपूर्व उपाध्यक्षा, पत्रिकाक सम्पादन, कथालेखन आदिमे कुशल । ’अरिपन’ आदि अनेक संस्था द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित।


आशा मिश्र


जन्म:६-७-१९५० ई.,प्रकाशित कथा मे मैथिकीक संग हिन्दी मे सेहो । सभसँ पैघ विजय मैथिली कथा संग्रह।





नीता झा

जन्म : २१-०१-१९५३,व्यवसाय:प्राध्यापिका । लेखन पर समाजक परम्परा तथा आधुनिकताक संस्कार सँ होइत विसंगतिक प्रभाव।प्रकाशित कृति : फरिच्छ, कथा संग्रह १९८४, कथानवनीत १९९०,सामाजिक असन्तोष ओ मैथिली साहित्य शोध समीक्षा।





ज्योत्स्ना चन्द्रम

मूल नाम: कुमारी ज्योत्स्ना ,उपनाम : ज्योत्स्ना आनन्द ,जन्मतिथि: १५ दिसम्बर, १९६३,जन्मस्थान : मरूआरा, सिंधिया खुर्द, समस्तीपुर,पिता: श्री मार्कण्डेय प्रवासी,माता: श्रीमती सुशीला झा,कार्यक्षेत्र : अध्ययनाध्यापन ।,रचना प्रकाशित : झिझिरकोना (कथा-संग्रह), एसगर-एसगर (नाटक),बीतक संग संकलन एवं सम्पादन।एकर अतिरिक्त दर्जनाधिक कथा ओ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित तथा आकाशवाणीक पटना, भागलपुर, दरभंगा केन्द्रसँ प्रसारित।शिक्षा : पटना विश्वविद्यालयसँ हिन्दी साहित्यमे एम.ए,।


सुस्मिता पाठक


जन्म:२५ फरवरी, १९६२,सुपौल, बिहार । परिचिति कविता संग्रह प्रकाशित । कथावाचक, कथासंग्रह प्रकाशनाधीन । राजनीति शास्त्रमे एम.ए.। संगीत, पेंटिंगमे रुचि । मैथिलीक पोथी पत्रिका पर अनेक रेखाचित्र प्रकाशित । समकालीन जीवन, समय, आ तकर स्पंदनक कवयित्री । अनेक भाषामे रचनाक अनुवाद प्रकाशित।


विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।

विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि।
'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।

श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि।

ज्योति
www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।


रूपा धीरू
- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन), पल्लवमिथिला, प्रथम मैथिली इन्टरनेट पत्रिका,वि.सं. २०५९ माघ (साहित्यिक), सम्पादन-सहयोग।

मैत्रेयी - याज्ञवल्क्यक दू टा पत्नी छलथिन्ह, १. कात्यायनी आऽ दोसर मैत्रेयी। मत्रेयी ब्रह्मवादिनी छलीह। कात्यायनीसँ हुनका तीनटा पुत्र छलन्हि- चन्द्रकान्ता, महामेघ आऽ विजय।

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE   I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...