भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Thursday, March 26, 2009

समीक्षा श्रृंखला-1 विनीत उत्पलक मैथिली कविता संग्रह "हम पुछैत छी"- समीक्षक डॉ.गंगेश गुंजन

कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन



विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी।

हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि।

एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये !

अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर !

पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे।

कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि।

सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ।

विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक।

बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज।

उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक।

एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे।

Wednesday, March 18, 2009

दिल्लीमे बिहारक संस्कृतिक झलक

दिल्लीमे पिछला दिन लागल जेना बिहारमे आबि गेल छी. होली आओर महिला दिवसक अवसर पर बिहार उत्सवक आयोजन कएल गेल. लोक बिहारक लोकगीत आओर लोकनाटकक संग कत्थक नृत्यक आनंद उठएलन्हि. नृत्यांगना पुनीता शर्मा अपन बेहतरीन नृत्यसँ लोककेँ झूमय लेल मजबूर क' देलखिन्ह. कत्थक नृत्य यात्रा थीम पर छल. एहिमे जीवन यात्राक मर्मकेँ खूबसूरतीसँ पेश कएल गेल. कत्थक नृत्यक फ्यूजनमे बचपन...युवा आओर प्रौढावस्थाक संग सुख-दुख...राग-द्वेष...प्रेम-नफरत जैसन विविध रंगसँ जीवनक मर्म समझाबय के कोशिश कएल गेल.
ई कार्यक्रम दिल्लीक सामाजिक संस्था राग विराग एजुकेशनल एंड कल्चरल सोसाइटी क ओर सँ कएल गेल. कार्यक्रमक शुरूआत संतोष नागर जीक वायलिन वादनसँ भेल. एहि के बाद भेल छल यात्रा. पुनीता जीक कोरियोग्राफीमे भेल एहि नृत्य नाटिका राग भटियार... बागेश्वरी... दरबारीसँ होइत राज जोगसँ खत्म भेल. एहिमे सविता अधिकारी... साक्षी कुमार आओर सुलगना राय अपन नृत्यसँ मन मोहि लेलखिन्ह. एहि नृत्य नाटिका यात्राकेँ संगीत देलन्हि कासिफ खान.
उत्सवक आखिरमे युवा कलाकार अंशुमाला बिहारमे पावनि... त्योहार...खुशीक मौका पर गाबय जाए वाला गीत पेश कएलन्हि। एहिमे कजरी... जट-जटिन... शादी-विवाह आओर होली पर गाबय जाय वाला गीत छल. लोक नाटक वाला हिस्सामे जयशंकरजी खुशबू आओर वंदनाक संग 'जट-जटिन' प्रस्तुत कएलन्हि.

Wednesday, December 24, 2008

गप नहि मानलहुं

अहां दोषी छी
अहां अपराधी छी
अहां चोर छी
अहां अभागल छी
अहां देशद्रोही छी
अहां स्वार्थी छी

ई गप हम नहि
काल कहि रहल अछि
ई गप हम नहि
इतिहास कहि रहल अछि
ई गप हम नहि
अहांक आत्मा कहि रहल अछि

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
समाजक फूइसगर
प्रतिष्ठाक पाछु भागैत रही
ताहि लेल छी दोषी

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
फूइसगर ठाठ-बाट लेल
घुइट-घुइट कए जिलहूँ जिनगी
ताहि लेल छी अपराधी

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
ख़ुद क नीक कहबाक लेल
अपन चैन चुराबैत छी
ताहि लेल ची चोर

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
ख़ुद कए भाग्यवादी देखबाक लेल
अभागल बनल रही
ताहि लेल छी अभागल
अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
देश सेवाक जज्बा रहैत
देशकए लूटलहुं
ताहि लेल छी देशद्रोही

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
समाजक सेवा करैत-करैत
अपन सेवा करय लगलहुं
ताहि लेल छी स्वार्थी।

Tuesday, December 23, 2008

नीक लोक

नीक लोक ओ
जे रहैत छैक ईमानदार
बेइमानी जखन धरि
रहैत अछि नुकायल

नीक लोक ओ
जे रहैत छैक सत्यवादी
पकड़ल नहि जाइत छैक
जखन धरि झूठ

नीक लोक ओ
जे रहैत छैक संस्कारी
जखन धरि आगू नहि
आबैत अछि राक्षसी प्रवृति
नीक लोक ओ
जे रहैत छैक विश्वासी
जखन धरि मुंह नहि
खोलैत अछि धोखा पाउल लोक
नीक लोक ओ
जे नहि करत अश्लील गप
जखन धरि आगू नहि
आबैत अछि कामक प्रस्ताव

नीक लोक ओ
जे करत लोक संग मीठ गप
जखन धरि आगू नहि
आबैत छैक प्रताड़ित पत्नी.

Friday, December 05, 2008

गामक गप

एक युग मे होइत छैक बारह बरख
आउर एक बरख मे होइत तीन सौ पैसंठ दिवस
एक दिवस मे होइत छैक चौबीस घंटा
एक घंटा मे होइत साठ मिनट

हम कोनो अहां के
गणित आ समयक
हिसाब-किताब नहि
बुझा रहल छी

हम जोइर रहल छी
कतेक समय सं
गाम नहि गेलहु
आधा युग बीत गेल गाम गेला

जहि दिवस स
बाहरि अलों
शहर के रंग-ढ़ंग मे
रंगहि गेलों

सोचैत छी
हम एतहि बदलि गेलों
तहि गाम
कतेक बदलल होइत

छोटका काकाक द्वार पर
आबो लागैत हेतै घूर
दलान पर बैठकी मे
होइत हेत सभ शामिल

सूर्य उगलाक स पहिल
केए सभ जाइत हेतै लोटा लकए
दतमैन स मुंह
आबो धोइत हैत कि नहि गामक लोक

पांच बरख मे
सरकार बदलि जाइत छैक
गामक लोकक मे
सेहो परिवर्तन भेल हेता

लकड़ी-काठी से चूहलि
जलैत हेतै कि नहि
बभनगमा वाली भौजी
चायपत्ती मांगइलै आबैत हेतै कि नहि

गोबर स घर-द्वार
नीपैत हेतै कि नहि
दरवाजा पर माल-जालक
टुन-टुन बाजैत हेतै कि नहि

ई सभ सोचैत काल
हम एक-एक गप पर तुलना करैत छी शहर से
गाम आउर शहर मे फ़र्क भ गेल छैक
जमीन आ आसमानक

मुदा,
सब कुछ गाम मे
बदैल गेल
नहि बदलल छैक त आत्मीयता.

SAGAR RATI DEEP JARAY Compilation of Proceedings of ‘Sagar Raati Deep Jaray’ a tri-monthly people's night-long Maithili story recitation Programme- compiled by Dr. Umesh Mandal

  सागर राति दीप जरय (त्रैमासिक अपठित, अप्रसारित मैथिली कथा-पाठ गोष्ठी) संकलन – डॉ. उमेश मंडल।