भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Friday, August 01, 2008
'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ )संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा चश्री आद्याचरण झा
संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च
श्री आद्याचरण झा (१९२०- )।मंगरौनी। संस्कृतक महान विद्वान। मैथिलीमे मिहिर, बटुक, वैदेहीमे रचना प्रकाशित। दरभंगा संस्कृत वि.वि. केर प्रतिकुलपति। राष्ट्रपतिसँ सम्मान प्राप्त।
भगवत्याः सीतायाः संरक्षकोजनकः- “विदेह”- एकं महनीयं विवरणम्
- श्री आद्याचरण झा
१.मिथिला राजधान्यां जनकपुरे एकदा महर्षिः अष्टावक्रः समायातः। तेषां वकू शरीरं दृष्ट्वा तत्र समुपस्थिताः जनाः हसितवन्तः। तं दृष्ट्वा महर्षिः उक्तवान्- अत्रत्याः जनाः केवलं व्आह्य रूपं शरीरं पश्यन्ति।आत्मानं न जानन्ति। एतेषां नागारिकाणां भवान् कथं “विदेहः” इति ज्ञातुं न शक्नोति।
२.महाराजः जनकः उक्तवान्- यथार्थता इयं नास्ति। केवलं वक्र शरीरम् अवलोक्य विद्वांसः हसितवन्तः, किन्तु सर्वे महान्तः ज्ञानिनः सन्ति।
३.”विदेह” उक्तवान्- भवन्तां मस्तके जटायां एकस्मिन् पात्रे जलं प्रपूर्य स्थापयामि। भवता सह एकः मनीषी गच्छति। भवन्तः सम्पूर्णं राजभवनं भ्रमन्तु (पश्यन्तु)। किन्तु पात्रस्थं जलं यदि एकं विन्दुं यत्र पतिष्यति ततः एव परावर्तयिष्यति स विद्वान्।
४.महर्षिः अष्टावक्रः समग्रं राजप्रासादं पश्यन्-भ्रमन् परावर्तितः। महाराजेन जनकेन पृष्टम्। किं राजभवनं दृष्टवन्तः भवन्तः? महर्षिणा कथितम्- ’राजभवनं न भ्रमितं, किन्तु मम ध्यानं जलविन्दु पतने आसीत्, न किमपि दृष्टम्।
५.विदेहः जनकः कथितवान्- ’भवन्तः जिज्ञासायाः समाधानं तु जातम्। भवन्तः समग्रं राजभवनं भ्रमन्तः न किमपि दृष्टवन्तः। तर्थेवाहं सर्वाणि कार्याणि कुर्वन् न तत्र मनसा- आत्मना च संलग्नः अस्मि।
महर्षिः समायाचनां कृत्वा परावर्तितवान्। उपर्युक्त घटनाचक्रं प्रमाणयति यत् मनः एव सर्वं करोमि। ’मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः”- श्रीमदभगवद्गीता..”
संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च
(मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्)
(आगाँ)
-गजेन्द्र ठाकुर
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः।
यथा चित्तं तथा वाचो
यथा वाचस्तथा क्रिया।
चित्ते वाचि क्रियायां च
महता मेकरूपता॥
इदानीम श्रुतस्य सुभाषितस्य तात्पर्यम् एवम् अस्ति।
लोके विविधाः जनाः भवन्ति- सज्जनाः-दुर्जनाः च। सज्जनानां विचारः यः भवति सा एव वाणी भवति यथा विचारः भवति तथा वाणी भवति-यथा वाणी भवति तथा तेषां व्यवहारः भवति- ते यथा चिन्तयन्ति तथैव वदन्ति- यथा वदन्ति तथैव व्यवहारे आचरन्ति- अतः सज्जनानां विचारः वाणी अनन्तरं व्यवहारः च समानाः भवन्ति। एतएव सज्जनानां लक्षणः अस्ति।
यदि तपं करोति तर्हि मोक्षं प्राप्नोति। यदि तप करब तँ मोक्ष प्राप्त होएत।
अहं दशवादने निद्रां करोमि। हम दस बजे सुतैत छी।
षड्वादने उत्तिष्ठामि। छःबजे उठैत छी।
अहं दशवादनतः षड्वादनपर्यन्तं निद्रां करोमि। हम दसबजेसँ छः बजे धरि सुतैत छी।
भवान् कदा निद्रां करोति। अहाँ कखन सुतैत छी।
भवान् कदा अध्ययनं करोति। अहाँ कखन अध्ययन करैत छी।
भवती कदा क्रीडति। अहाँ कखन खेलाइत छी।
गजेन्द्रस्य दिनचरी
०५०० – ०६०० योगासनं
अध्ययनम्
स्नानम्
पूजा
जलपानम्
गृहकार्यम्
विद्यालयः
क्रीडा
अभ्यासः
भोजनम्
१००० निद्रा
सोमवासरतः शुक्रवासरपर्यन्तं विद्यालयः अस्ति।सोमदिनसँ शुक्रदिन धरि विद्यालय अछि।
फेब्रुअरीतः मईमासं पर्यन्तं विद्यालयः अस्ति। फरबरीसँ मई मास धरि विद्यालय अछि।
भारतदेशः कन्याकुमारीतः कश्मीरपर्यन्तम् अस्ति। भारतदेश कन्याकुमारीसँ कश्मीर धरि अछि।
राजधानी एक्सप्रेस दिल्लीतः मुम्बईनगरंपर्यन्तम् गच्छति। राजधानी एक्सप्रेस दिल्लीसँ मुम्बइ धरि जाइत अछि।
धन्यवादः। पुनर्मिलामः। धन्यवाद। फेर भेँट होएत।
सुन्दरः कुत्र अस्ति। सुन्दर कतए अछि।
आगत् श्रीमन्। आऊ श्रीमान्।
जानाति-कः समयः। जनैत छी- की समय अछि।
कुत्र गतवान। कतए गेलाह।
सार्ध पंचवादनम्। एतावत कालपर्यन्तम्। साढ़े पाँच। एखन धरि?
किं कुर्वन् आसीत्? की करैत छलहुँ?
अत्रैव आसन्। श्रीमन्। बहिः। एतहि छलहुँ। श्रीमान्। बाहरमे।
हन्यतं मा वदतु। झूठ नहि बाजू।
कदा कार्यालयं आगतवान्। कखन कार्यालय अएलहुँ?
सार्ध नववादने। साढ़े नौ बजे।
तदा किं कृतवान्? तखन की कएलहुँ?
स्वच्छतां कृतवान्। साफ-सफाई कएलहुँ।
कदा। कखन?
नववादनतः सार्धनववादनपर्यन्तम्। नौ बजेसँ साढ़े नौ बजे धरि।
ततः किं कृतवान्। तकर बाद की कएलहुँ?
ततः सार्धएकादशवादने चायपानार्थं गतवान्। तकर बाद चाहपानिक लेल गेलहुँ।
ततः कदा आगतवान्। तकर बाद कखन अएलहुँ?
सपादद्वादशवादने। सबाबारह बजे।
तन्नैव सार्धएकादशवादनतः सार्ध द्वादशवादनपर्यन्तम् अपि चायं पीतवान् वा। तकर बाद साढ़े एगारह बजेसँ साढ़े बारह बजे धरि सेहो चाहे पिबैत रहलहुँ की?
ततः किम् कृतवान्? तकर बाद की कएलहुँ?
द्विवादनतः त्रिवादनपर्यन्तं भोजनविरामः तदा भोजनं कृतवान् खलु। दू बजेसँ तीन बजे धरि भोजनविराम छल तखन भोजन कएलहुँ नञि?
आम् सत्यम्। हँ ठीक।
त्रिवादनतः चतुर्वादनपर्यन्तं स्वस्तानि एव मित्रा कृतवान्, उद्याने विहारं कृतवान्। तीन बजेसँ चारि बजे धरि मित्रत कएलहुँ, उद्यान विहार कएलहुँ।
तथा नैव श्रीमन्। त्रिवादनतः चतुर्वादनपर्यन्तं पत्राणि संचिकाषु स्थापितवान्। तेना नञि अछि श्रीमान्। तीन बजेसँ चारि बजे धरि पत्रसभ संचिकामे रखलहुँ।
सर्वमपि जानामि। सभटा जनैत छी।
स्वारभ्यां अहं सार्धनववादनतः भवान् किं किं करोति इति अहम् एव परीक्षां करोमि। काल्हिसँ हम साढ़े नौ बजेसँ अहाँ की की करैत छी ई हम अपनेसँ निरीक्षण करब।
यदि आलस्यं दर्शस्यसि तर्हि उद्योगात् निष्कासयामि। यदि आलस्य देखायब तँ रोजगारसँ हम निकालि देब।
गच्छतु। जाऊ।
भवत्सु प्रतिदिनं योगासनं के के कुर्वन्ति। अहाँमे सँ के के सभ दिन योगासन करैत छी।
अहं करोमि। हम करैत छी।
भवान् करोति। अहाँ करैत छी।
अवश्यं करोतु। अवश्य करू।
अद्यारभ्य प्रतिदिनं योगाभ्यासं करोतु। आइसँ शुरू कए सभदिन योगाभ्यास करू।
अद्यारभ्य मास्तु। आइसँ नहि।
श्वःआरभ्य योगासनं करोतु। काल्हिसँ शुरू कए योगासन करू।
अद्यारभ्य भवन्तः किं किं कुर्वन्ति। आइसँ आरम्भ कए अहाँ सभ की की करब।
अहम् अद्यारभ्य अधिकं न क्रीडामि। हम आइसँ बेशी नहि खेलाएब।
अहम् अद्यारभ्य आलस्यं त्यजामि। हम आइसँ आलस्य त्यागि देब।
अहम् अद्यारभ्य सत्यं वदामि। हम आइसँ आलस्य त्यागि देब।
अहम् अद्यारभ्य योगासनं करोमि। हम आइसँ योगासन करब।
परश्वः आरभ्य। प्रसूसँ आरम्भ कए।
अहम् अर्जुनस्यकृते चमषं ददामि। हम अर्जुनकलेल चम्मच दैत छी।
अहं यतीन्द्रस्य कृते सुधाखण्डं ददामि। हम अर्जुनक लेल चॉक दैत छी।
अहं जयन्तस्य कृते कारयानं ददामि। हम जयन्तक लेल कार दैत छी।
अहं विदिशायाः कृते दूरवाणीं ददामि। हम विदिशाक लेल टेलीफोन दैत छी।
अहं पत्रिकां ददामि। हम पत्रिका दैत छी।
भवन्तः मम कृते किं किं यच्छन्ति। अहाँसभ हमरा लेल की की दए रहल छी।
अहं शिक्षिकायाः कृते चमषं ददामि। हम शिक्षिका लेल चम्मच दैत छी।
अहं भवत्याः कृते पत्रिकां ददामि। हम अहाँक लेल पत्रिका दैत छी।
जयन्त-जयन्तस्य कृते। जयन्त-जयन्तक लेल।
विदिशा-विदिशायाः कृते। विदिशा-विदिशाक देल।
लता गोपालस्य कृते मधुरं ददाति। लता गोपालक लेल मधुर दैत अछि।
लता शिक्षकस्य कृते पुस्तकं ददाति। लता शिक्षकक लेल पुस्तक दैत अछि।
लता पुष्पायाः कृते सूचनां ददाति। लता पुष्पाक लेल सूचना दैत अछि।
लता भगिन्याः कृते धनं ददाति। लता बहिनक लेल धन दैत अछि।
लता श्रीमत्याः कृते उपायनं ददाति। लता श्रीमतिक लेल पहिरना दैत अछि।
लता मित्रस्य कृते संदेशं ददाति। लता मित्रक लेल संदेश दैत अछि।
माता पुत्रस्य कृते किं किं ददाति? माता पुत्रक लेल की की दैत छथि?
कस्य कृते किं किं यच्छन्ति? ककरा लेल की की दैत छथि?
अहं यथा करोमि भवान् तथा करोतु। हम जेना करैत छी अहाँ तेना करू।
अहं लिखामि। हम लिखैत छी।
विदिशे आगच्छतु। विदिशा आऊ।
अहं यथा लिखामि तथा लिखति वा। हम जेना लिखैत छी तेना लिखब की।
आम्। हँ।
लिखतु। लिखू।
अहं यथा लिखामि तथा विदिशा लिखति। हम जेना लिखैत छी तेना विदिशा लिखैत छथि।
चैत्रा उत्तिष्ठतु। चैत्रा उठू।
अहं यथा वदामि तथा भवती करोति वा। हम जेना बजैत छी अहाँ तेना करब की?
क्षीरः हस्पृश्यतु। कण्डुयनं करोतु। खीरकेँ हाथसँ डोलाऊ।
उपनेत्रं सम्यक करोतु। चश्मा ठीक करू।
कर्णं स्पृश्यतु। कान स्पर्श करू।
कालिदासः यथा काव्यं लिखति तथा कोपि न लिखति। कालिदास जेना काव्य लिखैत छथि तेना क्यो नहि लिखैत छथि।
यथा चित्रकारः चित्रं लिखति तथा कः लिखति। जेहन चित्रकार चित्र बनबैत छथि तेहन के बनबैत छथि।
यथा चित्रा अभिनयं करोति तथा यतीन्द्रः न करोति। जेहन अभिनय चित्रा करैत छथि तेहन यतीन्द्र नहि करैत छथि।
अहं वाक्यद्वयं वदामि। भवन्तः यथा तथा योजयन्ति।
रमा गीतं गायति। गीता अपि गायति।
रमा गीत गबैत छथि। गीता सेहो गबैत छथि।
यथा रमा गीतं गायति तथा गीता अपि गायति।
जेना रमा गीत गबैत छथि तेना गीता सेहो गबैत छथि।
भीमः खादति। कृष्णः न खादति।
यथा भीमः खादति तथा कृष्णः न खादति।
जेना भीम खाइत छथि तेना कृष्ण नहि खाइत छथि।
सुरेशः चित्रं लिखति। रमेशः अपि चित्रं लिखति।
सुरेश चित्र बनबैत छथि। रमेश सेहो चित्र बनबैत छथि।
यथा सुरेशः चित्रं लिखति तथा रमेशः अपि चित्रं लिखति।
जेना सुरेश चित्र लिखैत छथि तेना रमेश सेहो चित्र लिखैत छथि।
नर्तकी नृत्यं करोति। भवती नृत्यं करोति।
नर्तकी नृत्य करैत छथि। अहाँ नृत्य करैत छी।
यथा नर्तकी नृत्यं करोति तथा भवती नृत्यं करोति।
जेहन नर्तकी नृत्य करैत छथि तेहन अहाँ नृत्य करैत छी।
कथा
रामपुरे सुब्रह्मण्यं शास्त्री इति कश्चन् गृहस्थः आसीत्। तस्य पत्नी शान्ता। तद्द्वौयो अपि सर्वदा अपि कलहः कुरुतः स्म। एतेन् पार्श्वगृहस्याः सर्वे बहुकष्टः अनुभवन्ति स्म। एकदा तम् ग्रामं कश्चन् योगीश्वरः आगतवान्। सः सिद्धिम् प्राप्तवान् इति वार्त्ता सर्वत्र प्रश्रुता। तदा शान्ता तत्र गत्वा योगीश्वरं दृष्टवती। सा वदति- भोः महात्मन्। अस्माकं गृहे सर्वदा कोलाहलः भवति। एतेन् अहं बहुकष्टम् अनुभवामि। पार्श्वे सर्वे जनाः माम् उपहसन्ति। अतः एतस्य निवारणं कृपया वदतु। तदा योगीश्वरः नेत्रे निमील्य किंचित् कालम् उपविष्टवान्। अनन्तरम् उक्तवान्- भद्रे चिन्तां न करोतु। एतस्य परिहारम् अहं वदामि। अहं भवत्यै दिव्यं जलं ददामि। भवती गृहं गत्वा एतद् जलं पत्युः आगमनात् पूर्वं मुखे स्थापयित्वा उपविशतु। अनन्तरं योगीश्वरः जलं दत्तवान्। शान्ता गृहं गतवती। पत्युः आगमनात् पूर्वं जलं मुखे स्थापयित्वा उपविष्टवती। सायंकाले सुब्रमन्यः सर्वाणि कार्याणि समाप्य गृहम् आगतवान्। यदा गृहम् आगतवान् तदा शान्ता तस्मै पानीयं दत्तवती। पानीयं पीत्वा सः कोपेन् उक्तवान्- एतद् किं पानीयम्- एतद् पातुम् एव न शक्यते। अनन्तरं सः बहिः गतवान्- उपविष्टवान्। यद्यपि शान्तायाः कोपः आगतः तथापि सा मौनम् उपविष्टवती- यतः तस्याः मुखे योगीश्वरेण दत्तं दिव्यं जलम् आसीत्। एवमेव कानिचन् दिनानि अतीतानि। तेषां गृहे कोलाहलः एव न श्रुयति स्म। एतेन् पार्श्व गृहस्याः सर्वे संतोषम् अनुभवन्ति स्म। एक मासानन्तरं योगश्वरं दत्तं जलं समाप्तम्। अनन्तरं शान्ता योगीश्वरस्य समीपं गतवती- उक्तवती- भोः स्वामी। जलं सर्वं समाप्तम् अस्ति। अतः पुनः दिव्यं जलं ददातु।
तदा योगीश्वरः मन्दहासपूर्वकम् उक्तवान्- मया दत्तं जलं सामान्यं जलम् एव। भवती यदा जलं पूरयित्वा उपविशति स्म तदा किमपि वक्तुम न शक्नोति स्म। एतेन भवत्याः पतिः अपि किमपि वक्तुं न शक्नोति स्म। यथा एकेन् हस्तेन् करतारणं न भवति तथा एकेन् अपि कलहं न कर्तुं शक्यते। तथा एव अहं श्रेष्टः, अहं श्रेयाम् इत्यपि स्पर्धा अपि न भवति। एतेन् गृहे शान्तिः भवति। योगीश्वरस्य एतद् वचनं श्रुत्वा संतुष्टा शान्ता गृहं प्रत्यागतवती।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ ) १३. संस्कृत मिथिलाश्रीकर- –गजेन्द्र ठाकुर
श्रीकर-
श्रीकर प्रथम मैथिल निबन्धकार छलाह। विज्ञानेश्वर, हरिनाथ, जीमूतवाहन चण्डेश्वर ठाकुर ई सभ श्रीकरक विचारक उल्लेख कएने छथि। श्रीकर एहि हिसाबसँ सातम शताब्दीक बुझना जाइत छथि।
श्रीकर याज्ञवल्क्य आऽ लक्ष्मीधरक बीचक सूत्र छथि। ओऽ कल्पतरु लिखलन्हि, जाहिमे १४ भाग छल, मुदा हुनकर कोनो कार्य एखन उपलब्ध नहि अछि।
श्रीकरक अनुसार आध्यात्मिक लाभ उत्तराधिकारक लेल आवश्यक अछि। चण्देश्वर ठाकुर अपन राजनीतिरत्नाकरमे श्रीकरक सिद्धांत ई सिद्धांत रखने छथि, जे गरीबक अधिकार राजा आऽ राज्यक सम्पत्तिमे छैक।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Monday, July 28, 2008
'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )7.संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च
संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च
(मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्)
(आगाँ)
-गजेन्द्र ठाकुर
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः
अमन्त्रमक्षरं नास्ति
नास्ति मूलमनौषधम्।
अयोग्यः पुरुषो नास्ति
योजकस्तत्र दुर्लभः।
वयं इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुतवन्तः। तस्य अर्थः एवम् अस्ति।
वर्णमालायां बहूणि अक्षराणि सन्ति। तादृशम् एकम् अपि अक्षरं नास्ति मंत्राय उपयोगः न भवति इति। एवमेव प्रपंचे बहुमूलानि सन्ति। तादृशम् एकमपि मूलं नास्ति औषधाय योग्यं न इति। एवमेव प्रपंचे बहुजनाः सन्ति- ते सर्वे अयोग्याः न। यदि कश्चन् योजकः मिलति तर्हि ते सर्वे योग्याः भवितुम अर्हन्ति।
कथा
पूर्वं कलिंगदेशं अशोकमहाराजः पालयति स्म। एकदा सह मंत्रिणा सह विहारार्थं बहिर्गतवान् आसीत्। तत्र मार्गे काचित् बौद्ध भिक्षुः सह दृष्टवान्। सः भिक्षोः समीपं गतवान्। भक्तया तस्य पादारविन्दयोः शिरः स्थापयित्वा नमस्कारं कृतवान्। भिक्षुः आशीरवादं कृतवान्। परन्तु एतत् सर्वमपि तस्य मंत्री आश्चर्येण पश्यन् आसीत्। एतद् तस्मै न अरोचत्। सः महाराजं पृष्टवान्- भोः महाराज। भवान् एतस्य राजस्य चक्रवर्ती अस्ति। भवान् किमर्थम् तस्य पादारविन्दयोः शिरः स्थापितवान्। इति। तदा महाराजः किमपि न उक्तवान्। मौनं हसितवान्। काचन् दिनानि अतीतानि एकदा अशोकः मंत्रिणं उक्तवान्। भोः मंत्रिण। भवान् इदानीम् एव गत्वा एकस्य अजस्य एकस्य व्याघ्रस्य एकस्य मनुष्यस्य शिरः आनयतु। तदा मंत्री अरण्यं गतवान्। एकस्य व्याघ्रस्य शिरः आनीतवान्। मांस्वापणं गतवान। तत्र एकस्य अजस्य शिरः आनीतवान्। तथा एव स्मसानं गतवान्। तत्र एकः मनुष्यः मृतः आसीत्। तस्य शिरः अपि आनीतवान्- महाराजाय दत्तवान्। महाराजः उक्तवान्। भोः एतत् सर्वम् अपि भवान् नीत्वा विक्रीय आगच्छतु। मंत्री विपणीम् गतवान्। तत्र कश्चन् मांसभक्षकः अजस्य शिरः क्रीतवान्। अन्यः कश्चन् अलंकारप्रियः व्याघ्रस्य शिरः क्रीतवान्। परन्तु मनुष्यस्य शिरः कोपि न क्रीतवान्। अनन्तरं मंत्री निराशया महाराजस्य समीपम् आगत्य निवेदितवान्। महाराजः उक्तवान्- भवतु भवान् एतद् शिरः दानरूपेण ददातु। इति। पुनः मंत्री विपणीम् गतवान्। तत्र सर्वाण उक्तवान्- भोः एतद् शिरः दानरूपेण ददामि। स्वीकुर्वन्तु- स्वीकुर्वन्तु। परन्तु कोपि न स्वीकृतवान्। मंत्री आगत्य-महाराजं सर्वं निवेदितवान्। महाराजः उक्तवान्- इदानीं ज्ञातवान् खलु। यावत् जीवामः तावदेव मनुष्यस्य शरीरस्य महत्वं भवति। जीवाभावे मनुष्यशरीरं व्यर्थं भवति। तदा शिरसः अपि महत्वं न भवति। अतः जीवितकालेएव वयं यदि सज्जनानां श्रेष्ठानां पादारबिन्दयोः शिरः संस्थाप्य आशीर्वादं स्वीकुर्मः तर्हि जीवनं सार्थकं भवति। एतत् श्रुत्वा मंत्री समाहितः अभवत्।
कथायाः अर्थं ज्ञातवन्तः खलु।
सम्भाषणम्
स्वराज्यं जन्मसिद्ध अधिकारः- इति तिलकः उक्तवान्।
स्वराज्य जन्मसिद्ध अधिकार अछि- ई तिलक कहलन्हि।
एतदैव वाक्यं वयं परिवर्तनं कृत्वा वक्तुं शक्नुमः।
माता उक्तवती यत् एकाग्रतया पठतु।
माता कहलन्हि जे एकाग्रतासँ पढ़ू।
शिक्षकः उक्तवान् यत् द्वारं पिदधातु।
शिक्षक कहलन्हि जे द्वार सटा दिअ।
अहं वदामि यत् संस्कृतं पठतु।
हम बजैत छी जे संस्कृत पढ़ू।
सेवकं वदति यत् द्वीपं ज्वालयतु।
सेवक कहैत छथि जे दीप जड़ाऊ।
इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः।
वैद्यम् उक्तवान् यत् फलं खादतु।
वैद्य कहलन्हि जे फल खाऊ।
वैद्यम् उक्तवान् यत् सत्यं वद धर्मं चर।
वैद्य कहलन्हि जे सत्य बाजू धर्म पर चलू।
बालकः शालां गच्छति।
बालाक पाठशाला जाइत छथि।
अहमपि शालां गच्छामि।
हम सेहो पाठशाला जाइत छी।
अहं चायं पिबामि। अहमपि चायं पिबामि।
हम चाह पिबैत छी। हम सेहो चाह पिबैत छी।
रोगी चिकित्सालयं गच्छति। अहमपि चिकित्सालयं गच्छामि।
रोगी चिकित्सालय जाइत छथि। हम सेहो चिकित्सालय जाइत छी।
मम नाम गजेन्द्रः। अहं शिक्षकः/ युवकः/ देशभक्तः अस्मि।
अहं बुद्धिमान्/ क्रीडापटु/ ब्रह्म अस्मि।
हमर नाम गजेन्द्र छी। हम शिक्षक/ युवक/ देशभक्त छी।
हम बुद्धिमान/ क्रीडापटु/ ब्रह्म छी।
कृष्णफलके कतिचन् शब्दाः सन्ति।
अहं वैद्यः/ कृषकः/ चालकः/ गायिका/ वैज्ञानिकः/ धनिकः/ अध्यापकः/ अस्मि।
हम वैद्य/ कृषक/ चालक/ गायिका/ वैज्ञानिक/ धनिक/ अध्यापक छी।
भवान् शिक्षकः अस्ति। अहं शिक्षकः अस्मि।
अहाँ शिक्षक छी। हम शिक्षक छी।
अहं नायकः अस्मि। वयं नायकाः स्मः।
हम नायक छी। हम सभ नायक छी।
अहं देशभक्तः अस्मि। वयं देशभक्ताः स्मः।
हम देशभक्त छी। हम सभ देशभक्त छी।
अहं भारतीयः अस्मि। वयं भारतीयाः स्मः।
हम भारतीय छी। हम सभ भारतीय छी।
अहं गायकः अस्मि। वयं गायकाः स्मः।
हम गायक छी। हम सभ गायक छी।
अहं वैद्यः अस्मि। वयं वैद्याः स्मः।
हम वैद्य छी। हम सभा वैद्य छी।
वार्ता
-हरिओम्।
-हरिः ओम्। श्रीधरः खलु।
-आम्।
-अहं ललितकुमारः वदामि।
-अहो ललितकुमारः। कुतः वदति।
-अहं भोपालतः वदामि। भवान् इदानीं कुत्र अस्ति।
-अहं बेङ्गलूर नगरैव अस्मि।
-बेङ्लूरनगरे कुत्र अस्ति।
-गिरिनगरैव अस्मि।
-तन्नमा गृहैव अस्ति।
-गृहतः प्रस्थितवान्। मार्गे अस्मि।
-एवं भवन्तः सर्वे कथं सन्ति।
-वयं सर्वे कुशलिनः। भवन्तः।
-वयं सर्वे कुशलिनः स्मः।
-एवं कः विशेषः।
-विशेषः कोपि नास्ति। कुशल वार्तां ज्ञातमेव दूरभाषं कृतवान्। एवं धन्यवादः।
-नमोनमः।
चाकलेहः। चाकलेहम् इच्छन्ति।
चाकलेट। चाकलेट लेबाक इच्छा अछि।
आम्। इच्छामः।
हँ। इच्छा अछि।
अत्र का इच्छति। यदि चाकलेहम् इच्छति तर्हि अत्र आगच्छतु।
एतए की इच्छा अछि। जौँ चॉकलेट लेबाक इच्छा अछि तखन एतए आऊ।
यदि अहं तत्र आगच्छामि भवान् ददाति वा।
जौँ हम ओतए अबैत छी अहाँ देब की।
आम्। अवश्यं ददामि।
हँ। अवश्य देब।
धन्यवादः।
धन्यवाद।
स्वागतम्।
स्वागत अछि।
फलम् इच्छन्ति।
फलक इच्छा अछि?
आम्। इच्छामः।
हँ। इच्छा अछि।
कः फलम् इच्छति।
के फलक इच्छा करैत अछि।
अहम् इच्छामि।
हम इच्छा करैत छी।
यदि फलम् इच्छति तर्हि अत्र आगच्छतु।
जौँ फलक इच्छा अछि तखन एतए आऊ।
यदि अहम् अत्रैव भवामि तर्हि तत् फलं न ददाति वा।
जौँ हम एतहि रहैत छी तखन अहाँ फल नहि देब की?
न ददामि। यदि फलम् आवश्यकम् अत्र आगच्छतु।
नहि देब। जौँ फल आवश्यक अछि तखन एतए आऊ।
आगच्छामि।
अबैत छी।
स्वीकरोतु।
स्वीकार करू।
धन्यवादम्।
धन्यवाद।
स्वागतम्।
स्वागत अछि।
पिपासा अस्ति वा।
पियास लागल अछि की?
न पिपासा नास्ति।
नहि। पियास नहि लागल अछि।
अस्ति।
लागल अछि।
कस्य पिपासा अस्ति।
किनका पियास लागल छन्हि।
यदि पिपासा अस्ति तर्हि जलं पिबतु।
जौँ पियास लागल अछि तखन जल पीबू।
आगच्छतु। स्वीकरोतु।
आऊ। पीबू।
धन्यवादः।
धन्यवाद।
यदि व्याघ्रः आगच्छति तर्हि भवान् किं करोति।
जौँ बाघ आएत तँ अहाँ की करब।
यदि व्याघ्रः आगच्छति तर्हि अहं व्याघ्रं ताडयामि।
जौँ बाघ आएत तँ हम ओकरा मारब।
यदि व्याघ्रः आगच्छति तर्हि अहं तत्रैव उपविशामि।
जौँ बाघ आएत तँ हम ओतहि बैसल रहब।
यदि व्याघ्रः आगच्छति तर्हि अहं धावामि।
जौँ बाघ आएत तँ हम भागब।
यदि व्याघ्रः आगच्छति तर्हि अहं शवासनं करोमि।
जौँ बाघ आएत तँ हम शवासन करब।
भवान् किम करोति? भवती किम् करोति?
अहाँ की करब? अहाँ की करब?
यदि अहं विदेशं गच्छामि तर्हि अहं तत्र जनानां संस्कृतं पाठयामि।
जौँ हम विदेश जाएब तखन हम लोक सभकेँ संस्कृत पढ़ाएब।
यदि माता तर्जयति तर्हि अहं पितरम् आश्रयामि।
जौँ माता मारैत छथि तखन हम पिताक शरणमे जाइत छी।
भवन्तः तर्हि योजयन्ति।
यदि धनम् अस्ति तर्हि ददातु।
जौँ धन अछि तखन दिअ।
यदि वृष्टिः भवति तर्हि शस्यानि आरोपयतु।
जौँ बरखा होए तखन फसिल रोपू।
यदि परीक्षा आगच्छति तर्हि सम्यक पठति।
जखन परीक्षा अबैत अछि तखन नीक जेकाँ पढ़ैत अछि।
यदि जलम् अस्ति तर्हि स्नानं करोति।
जखन जल रहैत अछि तखन स्नान करैत छथि।
यदि प्रवासं करोमि तर्हि ज्ञानं सम्पादयामि।
जौँ प्रवास करब तखन ज्ञानक सम्पादन कए सकब।
यदि शान्तिम् इच्छामि तर्हि भगवदगीतां पठामि।
जखन शान्तिक इच्छा होइत अछि भगवदगीता पढ़ैत छी।
यदि ज्ञानम् इच्छति तर्हि वेदं पठतु।
जौँ ज्ञानक इच्छा अछि तखन वेद पढ़ू।
यदि देशसेवां करोति तर्हि संतोषः भवति।
जखन देशसेवा करैत छी तखन संतोष भेटैत अछि।
यदि उत्तमा लेखनी अस्ति तर्हि मम कृते ददातु।
जौँ उत्तम कलम अछि हमरा लेल दिअ।
यदि संस्कृतं पठति तर्हि आनन्दः भवति।
जखन संस्कृर पढ़ैत छी तखखन आनन्द पबैत छी।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Sunday, July 27, 2008
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ 7. संस्कृत शिक्षा चमैथिली शिक्षा च
मैथिली शिक्षा च (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्)
(आगाँ)
-गजेन्द्र ठाकुर
गते शोकं न कुर्वीत भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
वर्तमानेषु कालेषु वर्तयन्ति विचक्षणाः।
वयं इदानीम यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवं अस्ति- गते शोकं न कुर्वीत। वयं गत विषये प्रौर्त विषये दुःखम न करणीयं तथैव भविष्ये अपि स्वपनः न द्रष्टव्यः। भविष्ये एवं भविष्यति एवं करिष्यामि- इति स्वप्नः अपि न द्रष्टव्यः। दुखम् अपि न करणीम्- भूते यत् प्रवृत्तम् अस्ति- पूर्वम् यत् प्रवृत्तम् अस्ति- तत्र दुःखम् अपि न करणीयम्- अग्रे यत् भविष्यति तस्य स्वप्नः अपि न द्रष्टव्यः। वर्तमानकाले एव व्यवहर्णीयं- वर्त्तमानकाले एव तातव्यं- तस्मिन् विष्ये एव यद करणीयं यत न करणीयं तदविषये चिन्तनीयम्- एवं विचक्षणाः नाम बुद्धिमान्- बुद्धिमन्तः एवं कुर्वन्ति।
कथा
एकम् अरण्यम् अस्ति। अरण्ये एकः संन्यासी अस्ति। सः प्रतिदिन भिक्षायाचनं कृत्वा जीवनं करोति। तस्य हस्ते एकं सुवर्ण कङ्कणम् अस्ति। सः चिन्तयति सुवर्णकङ्कनस्य दान करोमि- इति। सः एकस्मिन् दिने जनान् आह्वयति- घोषणां करोति। बहवः जनाः सम्मिलिताः भवन्ति। तदा संन्यासी घोषयति- अहम् अत्यन्त निर्धनाय सुवर्णकङ्कणं ददामि। अत्र कः निर्धनः अस्ति- इति। तदा बहवः जनाः- अहं निर्धनाः, अहं निर्धनाः इति संन्यासी समीपम् आगच्छति। परन्ति संन्यासी कस्मै अपि सुवर्णकङ्कणं न ददाति। एकस्मिन् दिने तस्य देशस्य महाराजः तेन् मार्गेन् आगच्छति। सः संन्यासी वचनं श्रुणोति। सः संन्यासी आश्रमं गच्छति। संन्यासी महाराजं समीपं आह्वयति- सुवर्णकङ्कणं महाराजाय ददाति। सः संन्यासीं पृच्छति। अहं महाराजा अस्मि। मम समीपे प्रभूतम् ऐश्वर्यम् अस्ति। परन्तु भवान् मम कृते किमर्थं सुवर्णकङ्कणं ददाति। तदा संन्यासी वदति- यस्य आशा अधिकम् अस्ति तस्मै एव अहं सुवर्णकङ्कणं ददामि। यद्यपि भवान् महाराजः अस्ति- तथापि भवतः आशा अधिका अस्ति। भवतः इच्छा अस्ति- अहम् अन्यस्य राजस्य उपरि आक्रमणं करोमि- जयं सम्पादयामि- इतोपि अधिकम् ऐश्वर्यं सम्पादयामि। अतः भवान् निर्धनः एव। अतः अहम् एतद सुवर्णकङ्कणं भवते दातुम् इच्छामि। संन्यासिनः वचनं श्रुत्वा महाराजस्य ज्ञानोदयः भवति। सः लज्जया स्वराज्यं प्रति गमिष्यति।
सम्भाषणम्
नमोनमः।
केचन् प्रश्नार्थकाः सन्ति। किछु प्रश्नार्थक शब्द अछि।
तत्र सप्त प्रसिद्धाः सन्ति। ओतए सात टा प्रसिद्ध छथि।
यथा।
किम्
कुत्र
कति
कदा
कुतः
कथम्
किमर्थम्
अहम् इदानीम् उत्तरं वदामि। हम आब उत्तर बजैत छी।
भवन्तः सर्वेपि एतेषाम् अर्थं जानन्ति। अहाँ सभ सेहो एहि सभक उत्तर जनैत छी।
अहम् उत्तरं वदामि। हम उत्तर बजैत छी।
भवन्तः प्रश्नं पृच्छतु। अहाँ सभ प्रश्न पूछू।
यथा-
रामः पुस्तकं पठति। राम पुस्तक पढ़ैत छथि।
रामः किम् पठति? राम की पढ़ैत छथि।
भवती किम् वदन्त? अहाँ (स्त्रीलिंग) की बजैत छी?
तत कृष्णफलकम्। ओतए कृष्णफलक अछि।
तत किम्? ओतए की अछि।
लखनऊ उत्तरप्रदेशे अछि। लखनऊ उत्तरप्रदेशमे अछि।
लखनऊ कुत्र अस्ति? लखनऊ कतए अछि?
अधिकारी कार्यालये अस्ति। अधिकारी कार्यालयमे अछि।
भवती कुत्र वसति? अहाँ (स्त्रीलिंग) कतए बसैत छी?
अत्र नव बालकाः सन्ति। एतए नौ टा बालक छथि।
अत्र दश दण्डदीपाः सन्ति। एतए दस दण्डदीप अछि।
मार्गे नववाहनानि गच्छन्ति। मार्गमे नौ टा वाहन जाइत अछि।
मम समीपे दश पुस्तकानि सन्ति। हमरा लग दस टा पुस्तक अछि।
भवत्याः गृहे कति जनाः सन्ति? अहाँक (स्त्रीलिंग) लग कैकटा पुसतक अछि?
चत्वारः। चारिटा।
सूर्योदयः प्रातः काले भवति। सूर्योदय प्रातःकालमे होइत अछि।
सूर्यास्त सायंकाले भवति। सूर्यास्त सायंकालमे होइत अछि।
रमेशः दशवादने विद्यालयं गच्छति। रमेश दस बजे विद्यालय जाइत अछि।
भवती कदा पाकं करोति? अहाँ (स्त्रीलिंग) कखन भोजन बनबैत छी?
मित्रः विदेशतः आगच्छति। मित्र विदेशसँ अबैत छथि।
सखी चेन्नईतः आगच्छति। सखी चेन्नईसँ अबैत छथि।
गङ्गा हिमालयतः प्रवहति। गङ्गा हिमालयसँ प्रवाहित होइत छथि।
भवती कुतः मोदकम् आनयति। अहाँ (स्त्रीलिंग) कतएसँ मोदक अनैत छी।
स्वास्थ्यं उत्तमम् अस्ति। स्वास्थ्य उत्तम अछि।
भवत्याः स्वास्थ्यं कथम् अस्ति? अहाँक (स्त्रीलिंग) स्वास्थ्य केहन अछि?
अनीता पाठनार्थं विद्यालयं गच्छति। अनीता पढ़ेबाक लेल विद्यालय जाइत छथि।
अनीता औषधार्थम् औषधालयं गच्छति। अनीता औषधिक लेल औषधालय जाइत छथि।
गृहणी भोजनार्थं पाकशालां गच्छति। गृहणी भोजनक लेल भनसाघर जाइत छथि।
भवती किमर्थं पठति? अहाँ किएक पढ़ैत छी?
भवन्तः एतेषाम् अर्थम् सम्यक ज्ञातवन्तः। इदानीम् भवन्तः माम् प्रश्नं पृच्छन्तु। अहम् उत्तरं वदामि। इदानीं भवतु एकः आगच्छतु। अनन्तरं भवन्तः सर्वे तम् प्रश्नं पृच्छन्तु। राजा उत्तिष्ठतु। भवान् आगच्छतु। इदानीं भवन्तः प्रश्नं पृच्छन्तु। सः उत्तरं वदति।
भवान् कदा निद्रां करोति। अहाँ कखन निद्रा करैत छी।
भवान् कुतः आगच्छति। अहाँ कतएसँ अबैत छी।
भवान् किम खादति। अहाँ की खाइत छी।
भवतः अध्ययनं कथं प्रचलति। अहाँक अध्ययन केहन चलि रहल अछि।
भवान् किमर्थम् गीतं गायति। अहाँ किएक गीत गबैत छी।
भवान् कुत्र वसति। अहाँ कतए बसैत छी।
मञ्जुनाथः गच्छति। मञ्जुनाथ जैत अछि।
गृहं गतवान। गृह गेल।
मञ्जुनाथः गृहं गतवान। मञ्जुनाथ गृह गेल।
मञ्जुनाथः न गतवान। मञ्जुनाथ नहि गेल।
मञ्जुनाथः आगतवान। मञ्जुनाथः आबि गेल।
मञ्जुनाथः उपविष्टवान। मञ्जुनाथ बैसि गेल।
पठति- पठितवान पढ़ैत अछि- पढ़लक
लिखति- लिखितवान लिखैत अछि- लिखलक
करोति- कृतवान करैत अछि- कएलक
अम्बिका पीतवती/पीतवती अम्बिका पिबैत आचि/ पीलक
अम्बिका लिखति/ लिखितवती अम्बिका लिखैत अछि/ लिखलक
अम्बिका गच्छति/ गतवती अम्बिका जाइत अछि/ गेल
अम्बिका आगच्छति/ आगतवती अम्बिका अबैत अछि/ अम्बिका आबि गेल
बालकः गतवान बालक गेल
बालिका गतवती बालिका गेलि
क्रीडितवान/ क्रीडितवती खेलेलक/ खेलेलीह
पृच्छामि- श्रुणोमि पुछैत छी (हम) / सुनैत छी (हम)
वदामि- उक्त्तवान –उक्त्तवती बजइत छी/ बजलहुँ/ बजलीह
अहम् अद्य पश्यामि हम आइ देखैत छी
अहं श्वः द्रक्ष्यामि हम काल्हि देखब
मञ्जुनाथः गमिष्यति मञ्जुनाथ जायत।
वेदवती गमिष्यति वेदवती जयतीह
भवन्तः किम् किम् करिष्यन्ति
अहं काव्यं लेखिष्यामि हम काव्य लिखब
वयं काव्यं लिखिष्यामः हम सभ काव्य लिखब
तस्य नाम ओमः ओकर नाम ओम अछि
ओम उपविशतु ओम बैसू
तस्याः नाम आस्था ओकर नाम आस्था अछि
आस्थे उपविशतु आस्था बैसू
गीतम्
बालोऽहम
वर्ण प्रसारयतु होली आयाति
बालोऽहम जगत् भ्रमयामि
वर्णं स्नेहं सुखं प्रसारयतुम
दुःखेन निवारयतुम गच्छामि।
बालोऽहम जगत् भ्रमयामि।
वाणी मधुरा परन्तु प्रखरा
मेलयतुम उच्चैः स्वरे
शान्तं समृद्धिं उन्नतः मार्गे
सर्वे मिलित्वा गच्छामः
बालोऽहम जगत भ्रमयामि।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक ११ १३. संस्कृत मिथिलाचाणक्य...कौटिल्य –गजेन्द्र ठाकुर
चाणक्य...कौटिल्य
चाण्क्य भारतकेँ एकटा सुदृढ़ आऽ केन्द्रीकृत शासन प्रदान कएलन्हि, जकर अनुभव भारतवासीकेँ पूर्वमे नहि छलन्हि।
चाणक्यक जीवन आऽ वंश विषयक सूचना अप्रामाणिक अछि। चाणक्यक आन नाम सभ सेहो अछि। जेना कौटिल्य, विष्णुगुप्त, वात्स्यायन, मालांग, द्रामिल, पाक्षिल, स्वामी आऽ आंगुल। विष्णुगुप्त नाम कामंदक केर नीतिसार, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस आऽ दंडीक दशकुमारचरितमे भेटैत अछि। अर्थशास्त्रक समापनमे सेहो ई चर्च अछि जे नन्द राजासँ भूमिकेँ उद्धार केनिहार विष्णुगुप्त द्वारा अर्थशास्त्रक रचना भेल। अर्थशास्त्रक सभटा अध्यायक समापनमे एकर रचयिताक रूपमे कौटिल्यक वर्णन अछि। जैन भिक्षु हेमचन्द्र हिनका चणकक पुत्र कहैत छथि। अर्थशास्त्रमे उल्लिखित अछि जे कौटिल्य कुटाल गोत्रमे उत्पन्न भेलाह।
पन्द्रहम अधिकरणमे कौटिल्य अपनाकेँ ब्राह्मण कहैत छथि। कौटिल्य गोत्रक नाम, विष्णुगुप्त व्यक्तिगत नाम आऽ चाणक्य वंशगत नाम बुझना जाइत अछि।
धर्म आऽ विधिक क्षेत्रमे कौटिल्यक अर्थशास्त्र आऽ याज्ञवल्क्य स्मृतिमे बड्ड समानत अछि जे चाणक्यक मिथिलावासी होयबाक प्रमाण अछि।
अर्थशास्त्रमे(१.६ विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनक केर पतनक सेहो चर्चा अछि।
तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा
दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...।
अर्थशास्त्रमे १५ टा अधिकरण अछि। सभ अधिकरण केर विभाजन प्रकरणमे भेल अछि।
कौटिल्यक राज्य संब्धी विचार सप्तांग सिद्धांतमे अछि।स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, दंड आऽ मित्र केर रूपमे राज्यक सातटा अंग अछि। कऊतिल्यक संप्रभुता सिद्धांतमे राज्यक प्राशसनिक विभा वा तीर्थक चर्च अछि- ई १८ ट अछि। १.मंत्री२.पुरोहित३.सेनापति४.युवराज५.दौवारिक६.अंतर्वांशिक७.प्रशास्त्र८.संहर्त्ता९.सन्निधात्रा१०.प्रदेष्टा११.नअयक१२.पौर व्यावहारिक१३.कर्मांतिक१४.मंत्रिपरिषदाध्यक्ष१५,.दंडपाल१६.दुर्गपाल१७.अंतर्पाल१८.आत्विक।
विधिक चरिटा श्रोत अछि- धर्म, व्यवहार, चरित्र आऽ राजशासन।
कौटिल्यक अतरराज्य संबंध केर सिद्धांत मंडल सिद्धांत केर नामसँ प्रतिपादित अछि। विजिगीषु राजा- विजय केर इच्छा बला राजा- केर चारू कात अरिप्रकृति राजा आऽ अरिप्रकृति राजाक सीमा पर निम्न प्रकृति राजा रहैत छथि। विजुगीषु राजाक सोझाँ मित्र, अरिमित्र, मित्र-मित्र आऽ अरिमित्र-मित्र रहैत छथि आऽ पाछाँ पार्ष्णिग्राह९फीठक शत्रु), आक्रंद (पीठक मित्र), पार्ष्णिग्राहासार (फार्ष्णिग्राहक मित्र) आऽ अक्रंदसार (आक्रंदक मित्र) रहैत छथि।
विजिगीषुक षाड्गुण्य सिद्धांत अछि, संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय आऽ द्वैधीभाव। कऊटिल्यक अर्थशास्त्रक प्रथम अधिकरणक पन्द्रहम अध्यायमे दूत आऽ गुप्तचर व्यवस्थाक वर्णन अछि।
भारतीय शिलालेखसँ पता चलैत अछि जे चन्द्रगुप्त मौर्य ३२१ ई.पू. मे आऽ अशोकवर्द्धन २९६ ई.पू. मे राजा बललाह। तदनुसार अर्थशास्त्रक रचना ३२१ ई.पू आऽ २९६ ई.पू. केर बीच भेल सिद्ध होइत अछि।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० ७. संस्कृत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर
(आँगा)
-गजेन्द्र ठाकुर
काचित् वृद्धा आसीत्। तस्याः चत्वारः पुत्राः आसन्। ते पुत्राः अतीव सूराः आसन्। माता वृद्धा सर्वदा अपि तान् मातृभूमेः विशये कथाः श्रावयति स्म। अतः ते सर्वे अपि राष्ट्र विषये, अस्माकम् देश विषये बहु श्रद्धालवः आसन्। एकदा देशस्य उपरि शत्रूणाम् आक्रमणं भवति। तदा सर्वस्मिन् गृहे अपि एकैकः युद्धार्थं गच्छति। तदा वृद्धा माता प्रथम् पुत्रम् आह्वयति। तिलकं धारयति- भवान् युद्धार्थं गच्छतु- इति वदति। अनन्तरं प्रथमः पुत्रः युद्धार्थं गच्छति- तत्र शौर्येन युद्धं करोति, किन्तु वीर स्वर्गं प्राप्नोति। तदा एषा वृद्धा माता प्रथमः पुत्रः मृतः- इति वार्त्तां श्रुणोति। वृद्धा माता द्वितीय पुत्रं आह्वयति- तमपि युद्धार्थं प्रेषयति। सः अपि शौर्येन् युद्धं करोति। सः अपि वीर स्वर्गं प्राप्नोति। तदा वृद्धा माता तृतीय पुत्रं आह्वयति। तृतीय पुत्रम् आलिङ्गति-प्रीत्या वदति। पुत्र, भवान् अपि युद्धार्थं गच्छतु। देशस्य रक्षनं करोतु। अस्माकं देशस्य कर्त्तव्यं अस्ति, अतः भवान् गच्छतु- इति वदति। तृतीयः पुत्रम् अपि युद्धार्थं गच्छति। वीरं स्वर्गं प्राप्नोति। तृतीयः पुत्रः अपि युद्धार्थं गतवान्। तत्राभि कर्मयुद्धं प्रवृत्तम्। किंचित् दिनानन्तरं वार्त्ता आगता- तृतीयः पुत्रः अपि मृतः। तदा ग्रामस्ताः सर्वे अपि वृद्धायाः समीपम् आगतवन्तः। ते सर्वे वृद्धाम् उक्त्तवन्तः- मातः- भवत्याः तृतीयः पुत्रः अपि रणरंगे मृतः अस्ति। भवत्याः अंतिम समये सः भवत्याः रक्षणार्थं भवत्याः कर्त्तव्यपालनार्थम् आवश्यकम् अस्ति। अतः भवती चतुर्थं पुत्रं मा प्रेषयतु। तदा वृद्धा माता तेषां वचनं न श्रुणोति। वृद्धा माता चतुर्थं पुत्रम् आह्वयति। वीर तिलकं धारयति- वदति अपि। पुत्रः भवान् गच्छतु- विजयं प्राप्यम् आगच्छतु। अस्माकं देशस्य रक्षनम् अस्माकं कर्त्तव्यम्। अतः भवान् गच्छतु। इति चतुर्थ पुत्रम् अपि प्रेषयति। एवं रणरंगेभि कर्मयुद्धं प्रवृत्तम्। अनन्तरं वार्त्ता आगच्छति- चतुर्थ पुत्रः अपि मृतः अस्ति। तदा मातुः नेत्रे अश्रुणि आगच्छति। तदा ग्रामस्य अधिकारी वृद्धायाः समीपम् आगच्छति। सः मातरं वदति- भोः मातः- वयं पूर्वमेव उक्त्तवन्तः- भवती चतुर्थं पुत्रं न प्रेषयेतु। परन्तु भवती न श्रुतवती। चतुर्थम् अपि पुत्रं प्रेषितवती। वयम् इदानीं किम् कुर्मः। भवती इदानीं रोदनं करोति चेत्- किम् प्रयोजनम्- इति पृच्छति। तदा माता वदति- भो महाशया। मम् चतुर्थः पुत्रः मृतः इति रोदनं नास्ति। दुःखं नास्ति। मम् मातृभूमेः रक्षणम् अवश्यं करणीयम्- इति इच्छा भवति। किन्तु देशस्य रक्षणार्थं प्रेषयितुम् मम् पञ्चमः पुत्रः नास्ति खलु इति दुःखं भवति। एवम् अस्माकं देशस्य रक्षणाय कतिचन् मातरः शत् पुत्राणां बलिदानं कृतवत्याः- अतएव इदानीम् अपि अस्माकं देशः सुरक्षितः अस्ति।
सुभाषितम्
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः।
षड् दोषाः पुरुषेणेह ह्यातव्या भूतिमिच्छिता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्य दीर्घसूत्रता॥
वयम् इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। यः पुरुषः ऐश्वर्य्यम् इच्छति, समृद्धिम् इच्छति, अभिवृद्धिम् इच्छति, संपदाम् इच्छति, सः एतान् सर्वान् दोषान् दूरी क्रियात्। के के दोषाः। निद्रा- सर्वत्र निद्रा न करणीयम्। तंद्रा- सर्वदा निद्रावस्थायामेव भवति तथा न भवेत- तंद्रा न भवेत। भयम्- सर्वेषु विषयेषु भयं न भवेत्। क्रोधः/ कोपः- यत्र-यत्र आवश्यकता अस्ति, तत्र कोपः करनीयः- यत्र कोपस्य आवश्यकता नास्ति, तत्र क्रोधः न दर्शनीयः। आलस्यम्- वयं तु सर्वदा विद्यार्थिनः एव। जीवने सर्वस्मिन् क्षणे अपि वयं शिक्षणं प्राप्नुमः, अतः अस्माषु कदा आलस्यं न भवेत्। दीर्घसूत्रम्- कार्यम् अद्य करोमि न श्वः करोमि परश्वः करोमि परश्वः सायंकाले करोमि एवं विलम्बः न भवेत् अद्यतन् कार्यम् अद्य करोमि, इदानीमेव करोमि इति एवं भवेत्।
सम्भाषणम्
रामः प्रीतिम्/ लतां पृच्छति।
रामः काम् पृच्छति।
अहं विज्ञानं जानामि।
अहं गृहतः आगच्छामि।
अहं विदेशतः/ विद्यालयतः/ मार्गतः/ कार्यालयतः/ हिमालयतः/ वाटिकातः/ नदीतः/ मन्दिरतः/ पुष्पतः
अहं पेटिकातः उपनेत्रं स्वीकरोमि।
कूप्यां जलम् अस्ति।
अहं कूपीतः जलं स्वीकरोमि।
अहं संचिकातः पत्रं स्वीकरोमि।
अहं शारदातः लेखनीम् स्वीकरोमि।
अहं गजेन्द्रतः करवस्त्रं स्वीकरोमि।
अहं कोषतः लेखनीं स्वीकरोमि।
अहं नदीतः जलम् आनयामि।
भवन्तः कुतः किम् आनयन्ति।
गङ्गा हिमालयतः प्रवहति।
गङ्गा कुतः प्रवहति।– प्रश्नं कुर्वन्।
रामः विद्यालयतः आगच्छति।
रामः कुतः आगच्छति।
अहं गच्छामि। अहम् आपणं गच्छामि।
आपणतः गृहं गच्छामि। गृहतः विद्यालयं गच्छामि। विद्यालयतः गृहम् आगच्छामि।
रमानन्दः कुतः कुत्र गच्छति।
रमानन्दः लखनऊ गच्छति। लखनऊतः अहमदाबादं गच्छति।
अहमदाबादतः बेङ्गलुरु गच्छति।
ज्ञानार्थं रामायणं पठामि।
अहं पाठनार्थं पठामि।
आनन्दार्थं नृत्यं करोमि।
आनन्दार्थं गीतं गायामि।
पठनार्थं ग्रंथालयं गच्छामि।
ओषधार्थम् औषधालयं गच्छामि।
अहम् उत्तरं वदामि।भवन्तः प्रश्नं वदन्तु।
राधाकृष्णः किमर्थं विद्यलयं गच्छति।
राधाकृष्णः पठनार्थं विद्यालयं गच्छति।
रामः ध्यानार्थं मंदिरं गच्छति।
रामः किमर्थं मंदिरं गच्छति।
रामः किमर्थं दूरदर्शनं पश्यति।
रामः आनन्दार्थं दूरदर्शनं पश्यति।
भोजनार्थम् उपहारमन्दिरं गच्छति।
रवीन्द्र उत्तिष्ठति। आदित्यः अपि उत्तिष्ठति।
रवीन्द्र उपविशति। आदित्यः अपि उपविशति।
शारदा लिखति। चित्रा अपि लिखति।
नाटकं पश्यति। चित्रम् अपि पश्यति।
अहं वाक्यद्वयम् अपि वदामि।
भवन्तः वदन्तु। वदन्तिवा।
अस्तु- अस्तु आगच्छामि।
अस्तु पिबामि।
विद्यां ददातु। तथास्तु। देवः किम् वदति।
देवः प्रत्यक्षः भवति। सः भवान्/ भवती पृच्छति।
पूर्वः- प्राची- इन्द्रः
दक्षिणः- अवाची- यमः
पश्चिमः-प्रतीची- वरुणः
उत्तरः-उदीची- कुबेरः
पूर्व-दक्षिण कोणः- आग्नेयकोणः-अग्निः
दक्षिण-पश्चिम कोणः- नैर्ऋत्यकोणः-नैऋत्य
पश्चिम-उत्तरकोणः- वायव्यकोणः- मरुतः
उत्तर-पूर्व कोणः- ईशानकोणः- ईशः शङ्करो
पद्य
सत्कार्यं प्रति रमणीयम्,
असत्य वचनं न वदनीयम्,
पापकर्म न करणीयम्,
क्रोधलोभ मम त्ययणीयम्।
विपत्तिकाले शत्रु आगता,
तत्र स्थापिता मम सहनीयम्,
पूर्णविजय मम करणीयम्,
सत्कार्यं प्रति रमणीयम्।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १० १३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर म.म. शंकर मिश्र
म.म. शंकर मिश्र
शंकर मिश्रसँ संबंधित बहुत रास जनश्रुति प्रसिद्ध अछि। अयाची वृद्ध भए गेल छलाह, परन्तु पुत्रविहीन रहथि। पत्नी भवानी दुःखसँ काँट भए गेल छलीह। तखन अयाची मिश्र बाबा वैद्यनाथसँ पुत्रक याचना कएलन्हि आऽ हुनकर मनोकामना पूर्ण भेलन्हि-स्वयं शंकर भगवान अवतरित भेलाह आऽ ताहि द्वारे बालकक नाम शंकर पड़ल। जन्म पर गामक आया किंवा चमैन इनाम मँगलखिन्ह, मुदा परिवारक लगमे किछु नहि छल आऽ ताहि हेतु भवानी वचन देलखिन्ह जे बालकक प्रथम कमाइ अहाँकेँ दए देब। से जखन एक बेर राजा शिव सिंह खुशी भए बालककें कहलखिन्ह जे अहाँ जतेक सोना-चाँदी लए जा सकी लए जाऊ। बालक मात्र धरिया पहिरने छलाह तेँ मात्र किछु सोनाक छड़ लए जाऽ सकलाह, आऽ सेहो भवानी अपन वचनक अनुरूपें आया-चमैनकेँ दए देलखिन्ह। चमैन ओहि पाइसँ एकटा पोखरि सरिसवमे खुनबएलन्हि, जे चमनियाँ पोख्रिक नामसँ एखनो विद्यमान अछि।
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विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 7. संस्कृत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर
(आँगा)
-गजेन्द्र ठाकुर
कथा
कश्चन् आश्रमः तत धौम्यः इति महर्षिः पाठेति स्म। बहुशिष्याः तस्य समीपे पाठनार्थम् आगच्छति स्म। एकदा महती वृष्टिः आसीत्। क्षेत्रं सर्वम् अपि जलपूर्णम् आसीत्। जलप्रवाहः आसीत्। धौम्यः शिष्यं व्दति- शिष्या कृषिक्षेत्रं सर्वं जलपूर्णम् अस्ति। सर्वत्र प्रवाहः अस्ति। अतः कुत्रापि जलबन्दः नष्टः। अस्य भवान् कृषिक्षेत्रं गत्वा तत् निवारयतु। इति वदति।शिष्यः कृषिक्षेत्रं गच्छति। सर्वत्र पश्यति। एकत्र जलबन्दः नष्टः अस्ति। शिष्यः चिन्तयति। यत्र जलबन्दः नष्टः अस्ति तत्र मृत्तिकां स्थापयति। किन्तु जलप्रावाहः अधिकः अस्ति। इति कारणतः तत न तिष्ठति। बहुजलं तत्र गच्छति। अतः शिष्यः चिन्तयति, किम् करोमि।आम्। एवं करोमि। इति चिन्तयति। स्वस्य शरीरमेव तत्र स्थापयति, स्वशिरः स्थापयति। जलबंधं सम्यक करोति। एवं जलबंधं सम्यक् कर्त्तुं स्वशरीरं स्थापयित्वा तत्र जलबंधस्य समीकरणं करोति। किंचित् समयानन्तरं शिष्यः न आगतः। गुरु चिन्तयति। शिष्यः कुत्र गतः। न आगतः। इति चिन्तयित्वा कृषिक्षेत्रं गच्छति। तत्र पश्यति। शिष्यः जलबंधे स्वशरीरं स्थापयित्वा शयनं कृतवान् अस्ति। गुरुः तम् पश्यति। गुरोः शिष्यं दृष्टवा अतीव आनन्दः भवति। सः अतीव संतुष्टः तस्मै ज्ञानं ददाति। संतोषेण तम् आलिङ्गति च एवं स्वशरीरेण जलबंधनं समीकृत्य गुओः वच्नस्य परिपालनं कृतवान्। कर्त्तव्यं सम्यक कृत्वा समापितवान्। सद्वैत शिष्यः अस्ति आरुणिः इति। तस्य उद्दालकः इति अपरं नामधेयम् अस्ति। अहो शिष्यस्य कर्त्तव्यपरतः। कथायः अर्थ ज्ञातः किल।
सुभाषितम्
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः।
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।
फलान्यापि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषाः इव॥
वयम् इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। अस्मिन् सुभाषित सुभाषितकारः वदति, वृक्षाः सत्पुरुषाः इव- वृक्षाः सत्पुरुषाः यथा परोपकारं कुर्वन्ति तथैव कुर्वन्ति। कथम् इत्युक्त्ते वृक्षाः स्वयम् आतपे तिष्ठन्ति, स्वयं कष्टम् अनुभवन्ति, किन्तु अन्येषां जनानां छायां कल्पयन्ति। छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति, तिष्ठन्ति स्वयं आतपे। तस्मिन् वृक्षे यानि फलानि भवन्ति तानि फलानि अपि वृक्षाः स्वयं न खादन्ति। फलानि अपि परार्थाय। एवमेव सत्पुरुषाः यत् सम्पादयन्ति तदपि अन्येषाम् निमित्तम्। समाजनिमित्तमेव ते एतस्य उपयोगं कुर्वन्ति\ अतः वृक्षाः सत्पुरुषा इव।
वयं पूर्वतन् पाठे पुरतः पृष्ठतः, अधः,, वामतः इत्यादिनम् अभ्यासं कृतवन्तः स्म। अर्थः ज्ञातः एव पुनः एकवारं तस्य विषये वयम् अभ्यासं कुर्मः।
भवत्याः नाम् किम्।
लक्ष्मीः कुत्र अस्ति।
विनोदः मम पृष्ठतः अस्ति।
आकाशः उपरि अस्ति।
भूमिः अधः अस्ति।
सङ्गणकस्य उपरि अस्ति।
विद्यालयः पुरुषस्य दक्षिणतः अस्ति।
फलं शकटस्य उपरि अस्ति।
कूपी अस्ति।
इतः नयतु।
भवान् ततः पुस्तकम् आनयतु।
तत किम।धनस्यूतः।
धनस्यूतः तत । अत्र प्रेषयतु।
मम न आवश्यकम्।
इतः नयतु।
इतः। ततः।
चषकः कुतः पतति।
चषकः हस्ततः पतति।
उपनेत्रम् हस्ततः न पतति।
फलं वृक्षतः पतति।
अहं गृहतः आगच्छामि।
भवति कुतः आगच्छति।
भवान् कुतः आगच्छति।
अहं विद्यालयतः आगच्छामि।
मन्दिरतः/ चित्रमंदिरतः/ ग्रामतः/ गृहतः/ ग्रंथालयतः/ अरण्यतः/ उज्जयनीतः/ काशीतः/ दिल्लीतः/ लखनऊतः/ चेन्नैतः/ चन्द्रलोकतः/ विदेशतः/ आगच्छमि।
नगरम्/ नगरतः
वनम्/ वनतः
ग्रामम्/ ग्रामतः
स्वर्गः/ स्वर्गतः
गृहम्/ गृहतः
अहं विद्यालयतः आगच्छामि।
न श्रुणोमि।
इदानीम् एकम्-एकं वाक्यं वदन्तु।
भवती एकं वाकयं वदतु।
न श्रुणोमि।
उच्चैः वदतु।
शुभाङ्गी शनैः वदति।
प्रसन्नः उच्चैः वदति।
सर्वे उच्चैः वदन्तु।
अहम् इदानीम् एकं सुन्दरं संस्कृत गीतं श्रवयामि।
सर्वे श्रुण्वन्तु। उच्चैः। शनैः।
कुक्कुरः उच्चैः भषति।
कुक्कुरः कथं भषति।
रेलयानं उच्चैः शब्दं करोति।
शिशुः/ बालकः उच्चैः रोदनं करोति।
प्रसन्नः कथं वदति।
प्रस्न्नः उच्चैः/ शनैः वदति।
सिंहः गर्जति।
अहं शीघ्रं गच्छामि।
अहं मन्दम् आगच्छामि।
अर्थः ज्ञायेत्। उत्तिष्ठतु। आगच्छतु।
एकं वाकयं लिखतु।
शीघ्रं लिखतु।
अहल्या शीघ्रं लिखति।
अहल्या कथं लिखति।
वयम् इदानीम् एकां क्रीडां क्रीडामः।
अहम् इदानीम् एकस्य गणस्य एकं सुधाखण्डं ददामि।
एतस्य गणस्य एकं सुधाखण्डं ददामि।
भवती सुधाखण्डं तस्यै ददातु।एवं दातव्यं सा तस्यै ददातु।
भवान् तस्मै ददातु।
सः तस्मै ददातु।
शीघं दातव्यम्। यः गणः शीघ्रं कार्यं समापयति तस्य जयः।
किन्तु दान समये शीघ्रम् इति वक्त्तव्यम्।
सुधाखण्डः भग्नः न भवेत्।
ज्ञातम्। आरम्भं कुर्मः।
स्वीकरोतु।
कथं गर्जति। भषति एवं प्रश्नः कुर्मः।
ममः केशालंकारः अस्ति।
इदानीं मम् केशालंकारः।
कथम् अस्ति। सम्यक् नास्ति।
अहं कथं लिखामि। सम्यक लिखामि।
माधुरी सम्यक गायति।
अहं प्रातःकाले षटवादने उत्तिष्ठामि।
अहं दशवादने भोजनं करोमि।
भोजने अहम् अन्नं/फलं खादामि।
अहं भोजने रोटिकां/फलं/पायसं खादामि।
अहम् अन्येन सह फलं खादामि।
भोजनस्य अंते दुग्धं पीबामि।
गीतम्
वर्षा आगच्छति झम् झम् झम्,
पतति बिन्दुः मम गृह मध्यम्।
नौका निर्मितकागदम् तरन्ति,
वर्षामध्ये बालाः स्नानं कुर्वन्ति।
न आगच्छति चेत् कृषकाः,
पश्यति आकशे पूजति पर्जन्यः।
हे पर्जन्य ददातु वर्षा,
आ जायताम् पच्यन्ताम् फलवत्यः,
कृषिः वर्द्धन्ति बालाः हसन्ति,
यत् वर्षा आगच्छन्ति झम् झम् झम्।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8 8. संस्कृत शिक्षा(आँगा)-गजेन्द्र ठाकुरः
(आँगा)
गीतम्
-गजेन्द्र ठाकुर
पथिकः चलितुं गच्छति दूरे,
तत्र आगमिष्यति लक्ष्यम् एकम्।
किमपि न चलितुमं शक्नोमि मम,
इति चिन्तयति सः पथिकः भीते।
तत्र आगच्छति साहसम् एकम्,
पृच्छति वत्स चिन्तयति किम हृदयम्।
मस्तिष्के चिन्तयतु प्राप्नुम लक्ष्यम्,
पथिकः चलति गच्छति अग्रे शीघ्रम्,
प्राप्यते लक्ष्यं सिद्धयति स्वप्नम्।
सुभाषितम्
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्वः।
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।
आरिषु यः साधुः स सादुरिति कीर्तितः॥
वयम् इदानीम यत सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके केचन् जनाः अस्माकम् उपकारं कुर्वन्ति, अन्य केचन् अपकारं कुर्वन्ति। ये उपकारं कुर्वन्ति तेषां विष्ये सर्वे संतुष्टाः भवन्ति, तेषां विषये साधुत्वं दर्शयन्ति एव, किन्तु यः अपकारं करोति तस्य विषये अपि यः साधुत्वं दर्शयन्ति यः तस्यापि उपकारं करोति सः वस्तुतः साधुः। अन्यथा यः मम उपकारं करोति तस्य अहम् उपकारं करोमि चेत् तत्र साधुत्वं किमपि नास्ति। यः अपकारं करोति तस्यापि यः उपकारं करोति सः वस्तुतः साधुः।
कथा
अहम् इदानीम् एकं लघु कथां वदामि।
कश्चन् ग्रामः आसीत्। तस्मिन् ग्रामे एकः पण्डितः आसीत्। सः महान् विद्वान्, अनेकेषु शास्त्रेषु निष्णातः आसीत्। सः प्रतिदिनम् अध्ययनं करोति, प्रतिदिनम् अध्यापनम् अपि करोति, प्रतिदिनं पाठं करोति। दूर-दूरतः अपि छात्राः प्रतिदिनं तस्य समीपम् आगत्य शिक्षणं प्राप्तवन्ति।, प्रतिदिनं पाठार्थम् आगछन्ति। तस्य पण्डितस्य एकः पुत्रः आसीत्। पुत्रस्य विषये पण्डितस्य महती प्रीतिः आसीत्। सः पुत्रः अपि सम्यक पठति स्म। एकस्मिन् दिने छात्राः यथापूर्वं गुरोः समीपम् आगतवन्तः। गुरुः तान् सर्वान् यथापूर्वं पाठितवान्। व्याकरण वा न्यायशास्त्रं वा किंचित्
शास्त्रं सः सर्वान् छात्राण् यथापूर्वं पाठितवान्। छात्राः सर्वे पाठं श्रुत्वा सन्तुष्टाः स्व ग्रामम् अन्नतरं गतवन्तः। सायांकालः अभवत्।
तस्मिन् दिने अकस्मात् तस्य पण्डितस्य पुत्रस्य महान् ज्वरः आगच्छ। सः औषिधम् आनीतवान्। परन्तु प्रयोजनं न भवथ। रात्रि समये सः बालकः मृतः एव अभवत्। पण्डितस्य एकः एव पुत्रः। सः पुत्रः अपि मृतः अभवत्। पण्डितस्य महत् दुःखं जातम्। सहजं सः बहुदुःखेन् एव पुत्रस्य कार्याणि याणि करिणियानि तानि सर्वानि कृतवान्। तस्य शिष्याः सर्वे अन्य ग्रामेषु निवसन्तु। ते एतां वार्त्तां न जानन्तु। अनन्तर दिने प्रातः काले ते सर्वे यथा पूर्वं पाठार्थम् आगतवन्तः। गुरुः दृष्टवान्। सर्वे छात्राः पाठार्थम् आगतवन्तः। गुरुः स्वस्थाने उपविष्टवान्। सर्वानापि पाठितवान्। प्रतिदिनम् यथा पाठयति तथैव एक घण्टा पर्यन्तं पाठनं कृतवान्। पाठः समाप्ता छात्राः सर्वे गुरोः पुत्रं न दृष्टवन्तः। अद्य पुत्रः न दृश्यते। कुत्र इति तेषां संशयाः भवन्ति। ते गुरुं पृष्टवन्तः।
भवतः पुत्रः कुत्र।
तदा गुरुः सर्वम् उक्त्तवान्।
छात्राः उक्त्तवन्तः- कीदृशः भवान्।
किमर्थम् अस्मान् पूर्वमेव न उक्त्तवान्। तदा गुरुः उक्त्तवान्- भवन्तः सर्वे दूर-दूर ग्रामतः पाठं श्रोतुम् आगतवंटः। एतावंटः शिष्याःदूरतः पाठं श्रोतुम्
आगतवन्तः। अहं पाठं न करोति चेत्, भवताम् सर्वेषाम् समयः व्यर्थः न भवति ? अतः पाठनं मम् धर्मम्।
--------------------
सम्भाषणम्
वयम् आरम्भे पूर्वतन् पठस्य किंचित् स्मरण कुर्मः।
ददाति ददामि दापयामि दापयति
पठति पठामि पाठयामि पाठयति
अत्र बहूनि वस्तूनि सन्ति।
करदीपः अस्ति।
अहं करदीपं स्वीकरोमि।
अहं उपनेत्रं ददामि।
स्वीकरोतु।
करदीपं ददामि।
तथा वाक्यानि वदामः।
इदानीं भवन्तः एकम् एकं वाक्यं वदन्ति एव, किम् किम् ददति।
वदन्तु।
भवती फलं ददाति।
अहं लेखनीं ददामि।
कृपया उपनेत्रं ददातु।
मम् समीपे बहूनि वस्तूनि सन्ति।
अहम् एकम् एकं वस्तु दर्शयामि।
करदीपः- कृपया करदीपं ददातु।
दंतकूर्चः- कृपया दंतकूर्चं ददातु।
ध्वनिमुद्रिकाम्
सान्द्रमुद्रिकाम्
-अन्यम् एकम् अभ्यासम् कुर्मः।
-अहम् एकम् वाक्यं लिखामि।
मयूरः पठति।
अहम् अन्नं खादामि।
चिन्तयन्तु। अहल्याः मम् अतिथिः अस्ति। सा मम् गृहम् आगच्छति। अहं कथं सम्भाषणं करोमि । श्रुणवन्तु।
भो:। आगच्छतु। उपविशतु।
कुशलं वा। आम् सर्वं कुशलम्।
अत्रापि सर्वं कुशलं।
गृहे सर्वं कुशलम्।
माता कुशलिनी अस्ति।
किंचित् पानीयं ददामि।
संकोचं मास्तु।
मास्तु।
किंचित् स्वीकरोतु।
किंचित्।
चायं ददामि।
सम्यक् अस्ति।
किंचित् स्वीकरोतु। मास्तु।
किंचित् शर्करा आवश्यकी।
किंचित् न आवश्यकम्।
सावधानं स्वीकरोतु।
कः विशेषः।
मम् गृहे श्वः पूजा अस्ति।
कस्मिन् समये पूजा।
भगिनी नास्ति वा।
सर्वे आगच्छन्तु।
आगच्छामः।
पुनर्मिलामः।
आगच्छतु।
धन्यवादः।
कुशलम् वा।
आम कुशलम्।
कः विशेषः।
विशेषः कोपि नास्ति।
गृहे सर्वं कुशलम्।
आम् कुशलम्।
पिता कार्यालयं गतवान्।
अनुजस्य परीक्षा समाप्ता।
भो विस्मृतवान्।
किमपि।
पानीयं किम् स्वीकरोति। मास्तु।
संकोचः मास्तु।
किंचित् किंचित् ददातु।
स्वीकरोतु भोः।
किम् ददामि।
फलरसम् ददातु।
अस्तु ददामि।
अन्य विशेषः कः।
कोपि नास्ति।
अस्तु अहं गच्छामि।
किंचित् कालं तिष्ठतु।
न गच्छामि।
अस्तु धन्यवादः।
आसन्दः मम् पुरतः अस्ति।
उत्पीठिका मम् पृष्ठतः अस्ति।
संगणकं पुरतः अस्ति।
कूपी पृष्ठतः अस्ति।
प्रिया मेघायाः पुरतः अस्ति।
अहल्या मेघायाः पृष्ठतः अस्ति।
विजयः पुरतः आगच्छतु।
न न पृष्ठतः गच्छतु।
प्रसन्नः दक्षिणतः अस्ति।
प्रिया मम् वामतः अस्ति।
मम् दक्षिणतः कः अस्ति।
मम् वामतः कः अस्ति।
स्वर्गः आकाशः उपरि अस्ति।
पातालं भूमिः अधः अस्ति।
रघुवंशः रामायणस्य उपरि अस्ति।
ब्रह्मसूत्रं महाभारतस्य उपरि/अधः अस्ति।
रामायणं महाभारतस्य अधः अस्ति।
पुरतः/पृष्ठतः/वामतः/दक्षिणतः/उपरि/अधः/
अहं पठयामि।
एवं तिष्ठतु।
पुरतः/पृष्ठतः/दक्षिणतः/वामतः/
हस्तम् एवं करोतु।
पुरतः/पृष्ठतः/दक्षिणतः/वामतः।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Saturday, July 26, 2008
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
आ’ नियत तिथिकेँ शुरू भेल दानवीर दधीची नाटक।स्कूल खुजबासँ किछु काल पहिनहि हम सभ पहुँचि गेलहुँ स्कूल। बरण्डाक एक कोनमे गाम परसँ आनल चद्दरिक पर्दा बनल। रस्सी ठीकसँ नहि लागि सकल से ईएह निर्णय भेल चद्दरिकेँ ऊपर उठा-खसा कए काज निकालल जाएत।तकरा बाद कलाकार सभ अपन अप ड्रेस पहिरए लगलाह। ड्रेस की छल मात्र पाउडर लगा’ कय आ’ गमछा, धोती पहिरि कय सभ सभ तरहक ड्रेस पहिरि लेलक। जाहि मास्टरसाहेबक ड्यूटी लागल छल नाटकक संचालनक हेतु, हुनका कोनो आवश्यक कार्य मोन पड़ि गेलन्हि, से ओ’ ओहि दिन छुट्टी मारि देलन्हि। गामक पैघ तुरियाकेँ तावत बुझबामे आबि गेलैक,जे प्राइमरी स्कूलक छौड़ा सभ नाटक क’ रहल अछि। से तुरत्तेमे दस टा पैघ बच्चा सभ जूटि गेल आ’ पिहकारी देनाइ शुरू क’ देलन्हि। हम सभ कलाकारकेँ कहलियन्हि, जे ई सभ उत्तेजित क’ कय हमर सभक नाटककेँ दूरि करत। मुदा छोटे भाइ भीड़ि गेलाह।कहय लगलाह जे हे बौआ सभ, हम नाटकक ड्रेसमे छी, तेँ ई नहि बुझू जे मारि नहि करब। एखने ड्रेस फेकि-फाइक क’ हम सभ कर्म क’ दइ जायब अहाँ सभकेँ। मुदा पिहकी पारनहारक संख्यामे घटती नहि भेल। आ’ छोटे भाइ बाजि उठलाह जे छोड़ू आइ एहि नाटककेँ। हिनका सभक बदमस्ती हम एखने ठीक करैत छी। आ’ खुट्टा उखाड़ि कय दौड़लाह। तावत थाम्ह-थोम्ह करय बलाक जुमान भ’ गेलैक आ’ तकरा संगहि नाटक दानवीर दधीची जे हमर लिखल छल आ’ जकर मंचनक निर्देशन हम करए बला छलहुँ, बीचहिमे खतम भ’ गेल। किछु दिन धरि छोटे भाइसँ मूहा-फुल्ली रहल। ओ’ आबथि आ’ कहथि जे की करू, तामस उठि गेल छल। ओहो सभ अतत्तह क’ देने छल। फेर किछु दिनुका बाद सभटा सामान्य भ’ गेल। रामलीलाक आ’ नाटकक भूत सेहो एहि घटनाक बाद हमरा परसँ उतरि गेल।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
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विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
सुभाषितम्
अन्नदानं परं दानं विद्यादनमतः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यवज्जीवं च विद्यया॥ दानम करणेतु। अन्नदानं यदि कुर्मः महादानम् इति वदन्तु। यदि अन्नदानं कुर्मः, यदा वुभुक्षा भवति तावत् पर्यन्तम तिष्ठति। यदि विद्यादानम् कुर्मः यावत् जीवन् तिष्ठति।
कथा
एकः ग्रामः अस्ति। ग्रामे एकः धनिकः अस्ति। सः महान् धनिकः। तस्य सुन्दरं भवनम् अस्ति। पत्नी अस्ति, पुत्राः सन्ति। गृहे सेवकाः सन्ति।कृषिः भूमिः अस्ति। सर्वम् अपि अस्ति। तस्य कापि न्यूनता नास्ति। अतः सः सर्वदा उपविशति।तथा सः धनिकः तिष्ठति। परन्तु आश्चर्यम् नामा तस्य समीपे सर्वम् अपि अस्ति। किन्तु सः धनिकः निद्राम् न प्राप्नोति। रात्रौ निद्रामेव कर्त्तुम् सः न शक्नोति। एकदा सः स्वगृहे उपविष्टवान् आसीत्। चिन्तनं कुर्वन् आसीत। तस्मिनपि दिने तस्य निद्रा न आगता। किमर्थं मम् एवं भवति। इति तस्य मनसि महती चिन्ता उत्पन्नः। तस्मिन्नैव समये दूरतः सः एकम् गीतं श्रुणोति। मधुरं गीतम् आसीत्। कः एवं गायति। इतिः सः न जानाति। तथापि पश्यामि इति चिन्तयित्वा सः गीतस्य ध्वनिम् अनुसरन् अग्रे-अग्रे गच्छति।तस्य गृहतः समीपे एव एकं कुटीरं पश्यति सः। तस्मिन् कुटीरे कश्चन् निर्धनः आसीत्। सः तत्र शयनं कृतवान् आसीत्। शयनं कृत्वा, भित्तिम् आलव्य शयनं कृत्वा उच्चैः गायन् आसीत्। संतोषेन सः गायति। तस्य मुखे संतोषः दृश्यते। तद्दृष्ट्वा धनिकस्य आश्चर्यं भवति।अतः सः प्रश्नं पृच्छति।भो भो मित्रा। भवान् एतावता आनन्देन गायन अस्ति। भवतः आनन्दस्य किम् कारणम् इति पृच्छति। तदा सः निर्धनम् उत्तरं वदति। महाशयः, मम् समीपे धनं किमपि नास्ति। सत्यम्। तत् अहं जानामि। किन्तु अहं बहिः पश्यामि। प्रकृतिं पश्यामि। इदानीं प्रकृतिः कथं शोभते। वसन्तकालः अस्ति। सर्वं पुष्पाणि विकसन्ति। भ्रमराः संचारं कुर्वन्ति। वसन्तकालस्य सौन्दर्यं सर्वत्र दृश्यते। एतद् अस्ति अहं तद् पश्यामि। भवान् वस्तुतः किम् करोति। मम् समीपे तत् नास्ति, एतत् नास्ति,अन्यत् नास्ति। तदैव चिन्तनं करोति। यद्यपि भवतः समीपे बहुः बहुः अस्ति, तथापि भवान् यत् नास्ति तस्य विषये चिन्तनं करोति। अतः दुःखम् अनुभवति। अहं यत् अस्ति तस्य विष्ये चिन्तनं करोमि, अतः अहं सुखं अनुभवामि। एतदैव रहस्यम् इति निर्धनः वदति। तस्य वचनं श्रुत्वा धनिकस्य ज्ञानोदयः भवति। सत्यमेव खलु। वयं सर्वदापि अस्ति। तस्य विषये चिन्तनं कुर्मः चेत्। संतोषम् अनुभवामः। यत् नास्ति तस्य विषयेव चिन्तनं कुर्मः चेत् वयम् अपि दुःखम् अनुभवामः।
कथायाः अर्थः ज्ञातः।
गीतम्
वर्षाकाले आकाशे, चटका विचरति आगच्छति। शीतल समीर,चपला, मेघ गर्जति तीव्रा, जल-बिन्दु निपतति, विद्युत झंझति।
सम्भाषणम्
अद्य शनिवासरः। श्वः रविवासरः/भानुवासरः। अद्य कः वासरः। शनिवारः कदा। परश्वः सोमवासरः। रविवासरः कदा। सोमवासरः कदा। अद्य शनिवासरः। ह्यः शुक्रवासरः।
परह्यः गुरुवासरः। गुरुवासरः कदा। प्रपरश्वः मंगलवासरः। प्रपरह्यः बुधवासरः।
वयं प्रतः काले मिलामः। किम् वदामः। सुप्रभातम्। रात्रौ वदामः। शुभ रात्रिः। अन्य समये। नमोनमः/नमस्कारः/नमस्ते।
यदा दूरवाणी आगच्छति। हरिओम्। इति वदामि-हलो स्थाने। पुनः वदन्तु। एवं कृत्वा वदन्तु।
क्षम्यताम्। आम्।वेंकटरमणन्ः।
कुशलम्। अस्तु। सायंकाले आगच्छामि। पंचवादने आगच्छामि। अस्तु धन्यवादः। पश्यतु। दंतकूर्चः अस्ति। दण्डः अस्ति। अहं दण्डं स्वीकरोमि।
अहं शिक्त्तवर्त्तिकां स्वीकरोमि। अहम् अङ्कनीं स्वीकरोमि। अहं लेखनीं स्वीकरोमि।
अहं दूरवाणीं स्वीकरोमि। अहं करवस्त्रं स्वीकरोमि। अहं पुस्तकं स्वीकरोमि। इदानीम् अहं पुस्तकं/लेखनीं/अङ्कनीं/दण्डं/दंतकूर्चं स्थापयामि।
पुस्तकं/दण्डं ददामि। दूरवाणीं/शिक्त्तवर्त्तिकां/ दंतकूर्चं/लेखनीं/ न ददामि। अहम् अङ्कणीं न ददामि। अहं पुस्तकं/चमषं न ददामि।
भवती किम् ददाति। अहं दंतकूर्चं ददामि। भवती किम् ददाति। अहं पुस्तकं ददामि। भवत्याः नाम् किम्। अहं वेदवतीं पृच्छामि। भवतः नाम् किम्। अहं शुशीलेन्द्रम् पृच्छामि। रमानन्दः- रमानन्दम्
वित्तकोषम्/विद्यालयम्/मंदिरम्/पुस्तकम्/मालविकाम्/शुशीलाम्/कूपीम्/ घटीम्/अङ्गुलीम्। अहं भगवतगीतां पठामि। अहं रामायणं/काव्यं/महाभारतं/सुन्दरकाण्डं/सुभाषितं पठामि।
अहं विद्यालयं गच्छामि। भवन्तः कुत्र-कुत्र गच्छन्ति। अहं मुम्बई/तिरुपति नगरं गच्छामि।
अहम् अरण्यं गच्छामि।
माधवः ग्रामं/मथुरां/वाटिकां/पुरीं/दिल्लीं गच्छति।
इदानीं भवन्तः वाक्यं वदन्तु। कः-कः कुत्र गच्छतेति। पवित्रा चलचित्रमन्दिरं/इन्द्रलोकं गच्छति।
बालकः आपणं गच्छति। गणेशः विदेशं/नगरं/वनं/वाटिकां/नदीं गच्छति।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
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विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 10. पंजी प्रबंध पञ्जी संग्राहक-श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार
श्री विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा, पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
श्रोत्रिय ब्राह्मण सात श्रेणीमे क्रमबद्ध छथि, आ’ योग्य एवम् वंशज पन्द्रह श्रेणीमे। पञ्जीक संख्या 209 अछि, जाहिमे 56 पंजी श्रोत्रिय आ’ 153 पंजी योग्य आ’ वंशजक अछि।
पंजी-प्रबन्धक प्रारम्भ राजा हरसिंहदेवक कालमे शुरू भेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह।
आइ काल्हि पञ्जी-प्रबंध मात्र मैथिल ब्राह्मण आ’ कर्ण-कायस्थक मध्य विद्यमान अछि। मुदा प्रारम्भमे ई क्षत्रिय(प्रयः गंधवरिया राजपूत)केर मध्य सेहो छल।
वर्णरत्नाकरमे 72 राजपूत कुलक मध्य 64 केर वर्णन अछि, जाहिमे बएस आ’ पमार दोहराओल अछि। दोसर ठाम 36 राजपूत कुलक वर्णन अछि। 20 टा नामक पूर्वहुमे चर्च अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे, जे प्रायः हुनकर नेपाल प्रवासक क्रममे लिखल गेल छल, चन्देल आ’ चौहानक वर्णन अछि। गाहनवार वा मिथिलाक गंधवरिया राजपूतक दू टा शखा मिथिलामे छल, भीठ भगवानपुर आ’ पंचमहला(सहर्सा, पूर्णियाँ)। गंधवरिया,पमार,विशेवार,कंचिवाल, चौहान आदि मिथिलाक महत्त्वपूर्ण राजपूत छथि।मुदा गंधवरिया मिथिलामे महत्त्वपूर्ण छथि आ’ एखनहु मधुबनीसँ सहरसा-पूर्णियाँ धरि छथि।
वर्णरत्नाकरक राजपूत कुलवर्णनक निम्न लगभग 62 टा कुल अछि। सोमवंश,सूर्यवंश, डोडा, चौसी, चोला, सेन, पाल, यादव, पामार, नन्द, निकुम्भ, पुष्पभूति, श्रिंगार, अरहान, गुपझरझार, सुरुकि, शिखर, बायेकवार, गान्हवार,सुरवार, मेदा, महार, वात, कूल, कछवाह, वायेश, करम्बा, हेयाना, छेवारक, छुरियिज, भोन्ड, भीम, विन्हा, पुन्डीरयन, चौहान, छिन्द, छिकोर, चन्देल, चनुकी, कंचिवाल, रान्चकान्ट, मुंडौट, बिकौत, गुलहौत, चांगल, छहेला, भाटी, मनदत्ता, सिंहवीरभाह्मा, खाती,रघुवंश, पनिहार, सुरभांच, गुमात, गांधार, वर्धन, वह्होम, विशिश्ठ, गुटिया, भाद्र, खुरसाम, वहत्तरी आदि। एखनो गंगा दियारामे राजपूत आ’ यादव दुनूक मध्य ‘बनौत’ होइत छथि, आ’ दुनूमे बहुत घनिष्ठता अछि।
पर्वतमे रहनिहार आ’ वनमे रहनिहारक वर्णन सेहो अछि वर्ण रत्नाकरमे। जनक राजाक विरुद ज(कबीला) सँ बनल प्रतीत होइत अछि।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 11. मिथिला आ’ संस्कृत( सर्वतंत्रस्वतंत्र बच्चा झाक जीवनी-दोसर भाग)
11. मिथिला आ’ संस्कृत( सर्वतंत्रस्वतंत्र बच्चा झाक जीवनी-दोसर भाग)
सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (1860 ई.-1918 ई.)
महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक सिंहासनारोहणक बहुत दिन बाद धरि धौत परीक्षा नहि भेल छल। ई परीक्षा दरभंगा राजक संस्थापक श्री महेश ठाकुर द्वारा प्रारम्भ कएल गेल छल आ’ एहिमे मौखिक परीक्षा द्वारा श्रेष्ठ पंडितक चयन कएल जाइत छल। महाराज रमेश्वर सिंह एकर आयोजन करबओलन्हि आ’ श्री गंगानाथ झाकेँ एकर दायित्व देल गेल। श्री गंगानाथ झा परीक्षार्थीक रूपमे सेहो आवेदन कएने छलाह। महाराज परेक्षाक हेतु लिखित पद्धतिक आदेश देने छलाह। प्रश्निक नियुक्त्त भेलाह श्री बच्चा झा आ’ श्री शिव कुमार मिश्र। ई दुनू गोटे क्लिष्ट प्राश्निक आ’ कृपण परीक्षक मानल जाइत छलाह। मुदा ताहि पर श्री गंगानाथ झाकेँ 200 मे 197 अंक भेटलन्हि। महाराज पुरान परम्पराक अनुसार हिनका धोती तँ देलखिन्ह, मुदा नवीन पद्धतिक अनुसार दुशाला नहि देलखिन्ह, कारण संस्कृतक विद्वान् होयतहुँ श्री गंगानाथ झाक झुकाव अंग्रेजी दिशि छल। श्री बच्चा झा प्रकाण्ड पण्डित छलाह। महाराष्ट्र आ’ काशीक पण्डितक प्रसंगमे ओ’ कहैत छलाह जे शब्द खण्डक प्रसंगमे ओ’ सभ किछु नहि जनैत छलाह। ओहि समयमे महामहोपाध्याय दामोदर शास्त्री काशीक एकटा प्रसिद्ध वैयाकरण छलाह। विद्वान लोकनिक सुझाव पर दरभंगा महाराज गुरुधाममे एकटा पंडित सभाक आयोजन कएलन्हि। एहिमे हथुआ महाराज विशिष्ट अतिथि छलाह। काशीक सभ प्रमुख विद्वान एहिमे उपस्थित छलाह। प्रतियोगी छलाह पं.बच्चा झा आ’ म.म. दामोदर शास्त्री भरद्वाज। निर्णायक छलाह पं.कैलाश शिरोमणि भट्टाचार्या आ’ म.म.पं शिव कुमार मिश्र। एकटा सरल समस्यासँ शास्त्रार्थ प्रारम्भ भेल। एकर नैय्यायिक पक्ष लेलन्हि बच्चा झा आ’ व्याकरण पक्ष पंदामोदर शास्त्री।
दामोदर शास्त्री अपन जवाब अत्यंत सरल शब्दमे वैयाकरणिक आधार पर द’ देलन्हि। आब बच्चा झाक बेर आयल। बच्चा झा गहन परिष्कार प्रारम्भ कएलन्हि। विद्वान लोकनिमे विवाद भेलन्हि जे हुनकर प्रश्न प्रासंगिक छन्हि वा नहि। निर्णायक लोकनि एकरा प्रासंगिक मानलन्हि। जौँ-जौँ बच्चा झा आगू बढ़ैत गेलाह हुनकर उत्तर दामोदर शास्त्री आ’ निर्णायक लोकनिक हेतु अबोधगम्य होइत गेलन्हि। मध्य रात्रि तक ई चलल। अन्ततः अनिर्णीत राखि कए सभा विसर्जित भेल।
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Friday, July 25, 2008
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 11. मिथिला आ’ संस्कृत( सर्वतंत्रस्वतंत्र बच्चा झाक जीवनी)
सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (1860 ई.-1918 ई.)
मिथिला आ’ संस्कृत स्तंभमे एहि अंकमे सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा जिनकर प्रसिद्धि बच्चा झाक नामसँ बेशी छन्हि, केर जीवनी द’ रहल छी।
मधुबनी जिलांतर्गत लवाणी(नवानी) गाममे हिनकर जन्म भेलन्हि। वाराणसीमे श्री विशुद्धानन्द सरस्वती आ’ बालशास्त्रीसँ शिक्षा ग्रहण करबाक बाद गाम आबि गेलाह आ’ शारदा भवन विद्यापीठक स्थापना गामेमे कएलन्हि।गुरुकुल पद्धति सँ एतय संन्यासी आ’ गृहस्थ शिक्षा ग्रहण करैत छलाह। विद्यार्थीगणक खर्चा गुरुजी उठबैत रहलाह। द्वारकाक शंकराचार्य हिनका आमंत्रित कए नव्यन्यायक अध्ययन कएलन्हि। आस्तिक आ’ नास्तिक आ’ नव्यन्यायक विद्वत्तक दृष्टिये हिनका सर्वतंत्र स्वतंत्रक उपाधि देल गेलन्हि। हिनका बच्चामे लोक बच्चा झा कहैत छलन्हि, आ’ ईएह नाम धर्मदत्त झाक अपेक्षा बेशी प्रचलित रहल। हिनक कृति सभ अछि। 1. सुलोचन-माधव चम्पू काव्य, 2.न्यायवार्त्तिक तात्पर्य व्याख्यान, 3.गूढ़ार्थ तत्त्वलोक(श्री मदभागवतगीता व्याख्याभूत मधुसूदनी टीका पर) 4.व्याप्तिपंचक टीका 5.अवच्छदकत्व निरुक्त्ति विवेचन 6.सव्यभिचार टिप्पण 7.सतप्रतिपक्ष टिप्पण 8.व्याप्तनुगन विवेचन 9.सिद्धांत लक्षण विवेक 10.व्युत्पत्तिवाद गूढार्थ तत्वालोक 11.शक्त्तिवाद टिप्पण 12.खण्डन-ख़ण्ड खाद्य टिप्पण 13. अद्वैत सिद्धि चन्द्रिका टिप्पण 14.कुकुकाञ्जलि प्रकाश टिप्पण.
विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
वज्रादपि कठोराणि मृदुणि कुसुमादपि। लोकोत्तराणाम चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति।
श्रुतस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। कदाचित महापुरुषाणाम् चेतांसि( मनांसि) वज्रादपि कठोराणि भवन्ति। पुष्पादपि मृदुणि भवन्ति। अतः सुभाषितकारः वदति। कः महापुरुषाणाम् ज्ञातुम् शक्नोति। ज्ञातुमेव न शक्नुमः।
कथा
चन्द्रगुप्तः इति एकः महाराजः आसीत्। सः महाराजः मगधदेशम् पालयति स्म। मगध देशस्य राजा आसीत्। तस्य अमात्यः -चन्द्रगुप्तस्य अमात्यः-चाणक्यः इति। सः बहु विद्वान् निस्पृहः आचार्य आसीत्। यद्यपि सः महाराजस्य अमात्य तथापि सः सरल जीवनयापयति स्म। एकदा चन्द्रगुप्तः चाणक्यम् प्रजाभ्यः दातुम् कंबलम् यच्छति। सः चाणक्यः तस्य कंबलम् कुटीरे नयति। । सः सामान्य कुटीरे वासं करोति। शीतकालः आसीत्। सः कंपति स्म। एकः चोरः मित्रे संग आगतवान्। सः पश्यति। बहूनि धनानि संति। कंबलान् राशिः अस्ति। परंतु चाणक्यः न धृतवान्। सः सुप्तवान् अस्ति। पत्नी अपि सुप्तवती अस्ति। चाणक्य उठापेत्।चाणक्य मुखापेत पृच्छति।भोः। किमर्थम् आगतवन्तः। अनंतरं सः चोरः वदति। शीतकालः अस्ति। निद्रां करोति, कंबलान राशिः अस्ति। तथापि न धृतवान्। चाणक्यः वदति। कंबलानां मदर्थं न दत्तवान। प्राजाभ्याः वितरणम् कर्त्तुम् दत्तवान्। अतः अहम् एतानि कंबलानि न धराम्। तदा चोरः चाणक्यं पृच्छति। भवान् कीदृशः दयालुः।निस्पृहः अस्ति। वयम् इतःपरम् चौरकार्यं न कुर्मः। अतः भवतः सकाशः वयं शिक्षितवन्तः। ते चौरकार्यं त्यक्त्तवा सज्जनः भवन्ति। क्षमाम् याचन्ति। भवतः निस्पृहताम् दृष्ट्वा अस्माकं लज्जा भवति। वयम् इतःपरं चौर्कार्यं न कुर्मः। इति क्षमायाचन्।
पद्य
नृत्यति पुत्तलिका ग्रामे, बालः पश्यति अवैरामे। विहसति, गायति,रोदति सा
यदा सा जीवति बाला। सा अस्ति मनोहरा बाला, अहं इच्छामि पुत्तलिका।
नमोनमः ।
संस्कृतभाषा शिक्षणे भवताम् सर्वेषाम् स्वागतम्। आरम्भे मम परिचयं वदामि। मम नाम गजेन्द्रः।अहं शिक्षकः। भवान वदतु। भवान् कः। भवती का।
भवान् उत्तिष्ठतु। भवान् उपविशतु।
भवान् उत्तिष्ठति। भवती उपविशति। भवंटः उत्तिष्ठन्ति। भवत्यः उपविशन्ति। उपविशति- उपविशन्तु। वदतु- वदन्तु। गायतु- गायन्तु।
अहं एकवचनं वदामि। भवन्तः बहुवचन वदन्तु। नृत्यतु- नृत्यन्ति। अहम् उत्तिष्ठामि।– अहम् उपविशामि। अहं पठामि। वयम् उत्तिष्ठामः। भवन्तः उपविशामः। भवान् गच्छति।– भवन्तः गच्छन्ति। भवती गच्छतु।– भवत्यः गच्छन्तु। सः-ते एषः- एते कः- के तत्- तानि एतत्- एतानि किम्- कानि। अहं गच्छामि। वयं गच्छामः। भवान् गच्छतु-।- भवन्तः गच्छन्तु।
भवती गच्छतु- भवत्याः गच्छन्तु।एतस्य-तस्य(पु.) एतस्याः-तस्याः(स्त्री.) सा ताः एषा- एताः का- काः
गच्छतु- गच्छन्तु।
अत्र कति पुस्तकानि सन्ति। चत्वारि पुस्तकानि सन्ति। हरीशः गणयतु। कति अङ्कन्याः सन्ति। कति पर्णानि सन्ति। षट् पर्णानि सन्ति। कति चमषाः सन्ति। अष्ट चमषाः सन्ति।
पाण्डवाः कति जनाः। पाण्डवाः पञ्च जनाः। कौरवाः कति जनाः। कौरवाः शत जनाः। वर्षे कति मासाः सन्ति। वर्षे द्वादश मासाः सन्ति। मासे त्रिंशः दिनानि सन्ति। पक्षे पञ्चदश दिनानि सन्ति। अत्र त्रिंशत जनाः सन्ति। अत्र कति जनाः सन्ति। त्रिंशत दन्ताः सन्ति। कति दन्ताः सन्ति। एषः दण्डः/हस्तः।
दण्डः हस्ते अस्ति। दण्डः कुत्र अस्ति। एषः आसन्दे अस्ति। एषः स्यूतः।
एतत् धनम्। धनं कोषे अस्ति। वार्त्ता पत्रिकायाम् अस्ति।
स्थालिका/फलं स्थालिकायाम् अस्ति। जलं कूप्याम् अस्ति। अङ्गुल्यकम् अङ्गुल्याम् अस्ति।
वृक्षः- वृक्षे आपणः- आपणे वित्तकोषः- वित्तकोषे विद्यालयः- विद्यालये पुस्तकः- पुस्तके हिमालयः- हिमालये मार्गः- मार्गे आसन्दः-आसन्दे
मन्दिरम्- मन्दिरे नगरम्- नगरे स्थालिका- स्थालिकायाम्
संचिका- संचिकायाम्
पेटिका- पेटिकायाम्
कूपी- कूप्याः घटी- घट्याः अङ्कनी- अङ्कन्याः लेखनी- लेखन्याः]
स्यूते पुस्तकम् अस्ति। वाटिकायां फलम् अस्ति। लेखन्याः मसी अस्ति। नद्याः नीरः अस्ति। इदानीम् अहं शब्दद्वयं वदामि। भवन्तः योजयित्वा/ मिलित्वा वदतु। लखनऊ उत्तर प्रदेशे अस्ति। भोपाल मध्यप्रदेशे अस्ति। मुम्बई महाराष्ट्रे अस्ति। मैसूर कर्णाटके अस्ति। इदानीं भवन्तः एकेकं वाक्यं कथयन्तिवः। कः वदति आरम्भे। शिक्षकः विद्यालये अस्ति। दन्ताः मुखे सन्ति। मम गृहं भारत देशे अस्ति।
भारत देशे कुत्र अस्ति। मम गृहं भारत देशे बिहार प्रदेशे अस्ति। बिहार प्रदेशे कुत्र अस्ति। बिहार प्रदेशे मधुबनी मंडले अस्ति। मधुबनी मण्डले कुत्र अस्ति। मधुबनी मण्डले मेहथ ग्रामे अस्ति। मेहथ ग्रामे कुत्र अस्ति। तत्रैव अस्ति। अहं पञ्चवादने उत्तिष्ठामि। भवान् कदा उत्तिष्ठति। भवान् कदा दंतधावनं करोति। अहं सार्द्ध सप्तवादने योगाभ्यासं करोमि। अहम् अष्टवादने विद्यालयं गच्छामि। भवती कदा विद्यालयं गच्छति।
भवती कदा पूजां करोति। इदानीं कदा इति शब्दम् उपयोज्य प्रश्नं पृच्छन्तु। अहम् उत्तरं वदामि। भवान् कदा पूजां करोति। अहं पञ्चवादने पूजां करोमि। अहं न क्रीडामि। रवीन्द्रस्य दिनचरे अत्र अस्ति। इदानीम् अहं चित्रं दर्शयामि। भवन्तः वाक्यं वदन्तु। रवीन्द्रः पादोन अष्टवादने स्नानं करोति। रवीन्द्रः अष्टवादने अल्पाहारँ स्वीकरोति।
(अनुवर्तते)
Thursday, July 24, 2008
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
संस्कृत कथा
गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल।
कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।
सुभाषितम्
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।
पद्य ( गजेन्द्र ठाकुर)
चटका चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे। रचयति नीडं चटका वृक्षे आकाशे।
नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे। आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा, न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।
कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे, कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।
------------------------------------------------
नमोनमः। भवतां सर्वेषाम् अपि स्वागतम्।
जलम् आवश्यकम्।
काफी आवश्यकम्।
मास्तु।
चायम् आवश्यकम्।
मास्तु। मास्तु। पर्याप्तः।
किम् आवश्यकम्। जलम् आवश्यकम्।
किंचित् आवश्यकम्।
आम्।
पुनः किंचित् आवश्यकम्। धनम् आवश्यकम्। चाकलेहः आवश्यकः। मिष्टान्नम् मधुरम् आवश्यकम्। शिक्षणम् आवश्यकम्। मास्तु। संस्कृतम् आवश्यकं वा। आवश्यकम्। ताडनं मास्तु। वस्त्रं धनं आवश्यकम्। द्वेषः कोलाहलः मास्तु। अहं भवतः युतकं ददामि। सर्वे वदंतु। चतुर्वेदस्य युतकम्। भवान युतकम्। मम युतकम्। वदतु। भवतः युतकम्। भवतः नासिका। समीचीनम्। सुनीते। भवति आगच्छतु। अहं भवत्याः आभूषणं वदामि। भवति मम् आभूषणं वदतु। भवन्तः सुनीतायाः आभूषणम् इति वदन्तु। भवत्याः घटी। भवत्याः केशः। साधु-साधु। पुनः एकम् अभ्यासः कुर्मः। कः कस्य मित्रम्। अथवा का कस्याः सखी। इति भवन्तः। लता प्रियङ्कायाः सखी। वदन्तु। उदाहरणं वदामि। इदानीम भवन्तः वदन्तु। रोहितः अभिषेकस्य मित्रम्। उत्तमम्। इदानीं वयं बहुवचनस्य अभ्यासं कुर्मः। छात्रः- छात्राः। दंतकूर्चः-दंतकूर्चा।
उत्तमम्। चशकः- चशकाः। बालकः- बालकाः। सैनिकः- सैनिकाः। वृक्षः- वृक्षाः। शिक्तवर्तिका- शिक्तवर्तिकाः। पेटिका- पेटिकाः। उत्पीठिका- उत्पीठिकाः। लेखनी- लेखन्यः। अङ्कनी- अङ्कन्यः। घटी- घट्यः। कूपी- कूप्यः। पर्णम्- पर्णानि। पुस्तकम्- पुस्तकानि। कङ्कनम्- कङ्कणानि। फलम्- फलानि। सङ्गणकम्- सङ्गणकानि।
अहम् एकवचने वदामि। भवन्तः परिवर्त्तनं कुर्वन्।
छात्रः अस्ति- छात्राः सन्ति। छात्रा अस्ति।– छात्राः सन्ति। दंतकूर्चः अस्ति। - दंतकूर्चाः सन्ति। चमषः अस्ति।– चमषाः सन्ति।
अङ्कणी अस्ति। अङ्कन्यः संति।
पर्णम् अस्ति।पर्णानि सन्ति।
वृक्षः अस्ति।– वृक्षाः सन्ति। बालकः अस्ति।– बालकाः सन्ति। गायकः अस्ति।– गायकाः सन्ति।
लेखकः अस्ति।– लेखकाः सन्ति। बालिका अस्ति। बालिकाः सन्ति। पत्रिका अस्ति। पत्रिकाः सन्ति। पत्रम् अस्ति।पत्राणि सन्ति। पुष्पम् अस्ति।पुष्पाणि सन्ति। मन्दिरम् अस्ति।मन्दिराणि सन्ति। फलम् अस्ति। फलानि सन्ति। पर्णम् अस्ति। पर्णानि सन्ति।
अङ्कणि अस्ति। अङ्कण्यः सन्ति। लेखनी अस्ति। लेखन्य सन्ति।
इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः।
बालिकाः सन्ति। बालकाः सन्ति। बालकः एकवचनं वाक्यं वदति। बालिकाः बहुवचनं रूपं वदन्तु।तस्य वाक्यस्य बहुवचन रूपं वदति।
बालिकाः एकवचनं वाक्यं वदति। बालकाः परिवर्त्तनन्ति। अस्तु वा। अस्तु। पुस्तकम् अस्ति।पुस्तकानि सन्ति। लेखनी अस्ति। लेकण्याः सन्ति। घटी अस्ति। घट्याः सन्ति। सः छात्रः। ते छात्राः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। सः कः। सः पुरुषाः। ते के। ते पुरुषः। कः पुरुषः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। ते के। ते पुरुषाः। के पुरुषाः। ते पुरुषाः। हस्तं दर्शयन्तु। अक्षता उत्तिष्ठन्तु। ताः बालिकाः। सा बालिका। सा पेटिका। ताः पेटिकाः। सा का। ताः काः। का पेटिका। सा पेटिका।
काः पेटिका। ताः पेटिकाः। तत् चित्रम्। ताणि चित्राणि। तत् किम्। ताणि कानि। ते वृक्षाः। एते वृक्षाः। एते छात्राः। ताः घट्यः। ते के। एते के। एताः बालिकाः। एताः घट्यः। ताः बालिकाः। एताः काः। ताः घट्यः। काः घट्यः। तानि फलानि। एतानि फलानि। एतानि पुस्तकानि। तानि पुस्तकाणि। एतानि फलानि। एतानि कानि। तानि फलानि। भवान् बालकः। भवन्तः बालकाः। भवती बालिका। भवत्यः बालिकाः। अहं भारतीया। वयं के। वयं भारतीयाः। वयं भारतीयाः।
अहं देशभक्त्तः। वयं देशभक्ताः। भवन्तः बालकाः। भवन्तः के। वयं बालकाः। भवत्यः बालिकाः। भवत्यः काः। वयं बालिकाः। अहम् एकवचनं वदामि। भवन्तः बहुवचनं वदन्तु। एकम् अभ्यासः कूर्मः। अहं भारतीयः।अहं राष्ट्रभक्तः। अहं चतुरः। अहं मूर्खः। वयं मूर्खाः।
सिद्धिरस्तु।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) मधुश्रावणी अरिपन
चित्रकार- उमेश कुमार महतो, गाम-बहादुरगंज(जिला किशनगंज,बिहार, भारत), उम्र-18 वर्ष, पिताक नाम- श्री केशव महतो।
श्रावन कृष्ण पंचमी (नाग पंचमीसँ) प्रारम्भ भ’ कय श्रावन शुक्ल तृतीया पर्यन्त नीचाँक अरिपन पर विभिन्न नागक पूजा कएल जाइत अछि, आ’ वृद्धा लोकनि एहि अवसर पर कथा सेहो कहैत छथि। नव वर-वधूकेँ संग बैसा कय पूजाक समापन होइत अछि। इइ अरिपन दूटा मेना-पात आ’ पूजा करयबालीक दुनू दिशि भूमि पर बनाओल जाइत अछि। वाम पात पर 101 सर्पिणी सिनूर आ’ काजरसँ आ’ दहिन कातक पात पर 101 सर्पिणी पिठारसँ बनाओल जाइत अछि। वाम कातक सर्पक मुखिया कुसुमावती आ’ दहिन कातक वौरस नागक पूजा होइत अछि। मेना पातमे सर्प वशीकरण शक्त्ति होइत अछि। संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 9. बालानां कृते राजा सलहेस
राजा सलहेस
राजा सलहेस सुन्दर आ’ वीर छलाह। मोरंग नेपालमे रहैत छलाह। ओ’ दुसाध जातिक छलाह आ’ दबना नामक मोरंग राजाक मालिन सलहेससँ प्रेम करैत छलि। राजक वैद्य ओकरासँ प्रेम करैत छलाह आ’ दबनाक अस्वीकृतिसँ ओ’ आत्महत्या कए लेलन्हि। सलहेस छलाह मोरंगक तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाक सिपाही। सलेहस छलाह मोनक राजा। सभकेँ विपत्तिमे सहायता दैत रहथि। ताहि द्वारे दबना दिशि हुनकर कोनो ध्यान नहीं छलन्हि। सभ हुनका राजा कहैत छलन्हि, से ओ’ तालुकदारकेँ पसिन्न नहीं पड़ल। एक दिन दरबारमे ओ’ सलहेसकेँ पुछलक- अहाँक नाम की? सलहेस कहलन्हि- हमर नाम छी राजा सलहेस। तखन थापा कहलकन्हि, जे अहाँ अपन नाममे राजा नहीं लगाऊ। सलहेस कहल्न्हि, जे ई पदवी छी, जन द्वारा देल पदवी। कोना छोड़ब एकरा। हमारा चोड़ियो देब लोक तँ कहबे करत।तखन थापा कहलकन्हि जे लोककेँ मना क’ दियौक। सलहेस कहलन्हि जे लोककेँ कोना मना करबैक। लोकक मोन जे ओ’ ककरा की बजाओत। निकलि गेलाह सलहेस ओतयसँ। आब नहि निमहत ई नोकरी। आइ कहैत अछि नाम छोड़य लेल, काल्हि किछु आर कहत। पितियौत बहिन रहैत छलन्हि मुंगेरमे। बहिनोइ राज दरभंगाक नोकरीमे छलाह। एम्हर कुसमी दबनाकेँ कहि देलक जे सलहेस जा’ रहल अछि मोरंग छोड़ि कय। दबना छलि कमरू-कमख्यासँ तंत्र-मंत्र सिखने। कहलक ओ’ सलहेसकेँ जे हम राजाक दरबारमे सात सय सिपाहीक सरदार चूहड़मलकेँ हटबा क’ अहाँकेँ सरदार बना देब। सैह भेल। बड़का जलसा देलक दबना, गेलक गीत- रौ सुरहा, बारह बरस तोरा लेल आँचर बन्हलौँ।
मुदा, केलक चोरि चूहड़मल, चोरेलक नौ लाखक रानीक हार आ’ नुका देलक सलहेसक ओछैनमे। राजाकेँ कहलक चूहड़मल जे सलहेसक घरक तलासी लेल जाय।सलहेसक गेरुआक खोलसँ खसल हार। दबना काली मन्दिरमे तंत्र साधना शुरू कएलक। भूत-प्रेतकेँ नोतलक। खून बोकरबेलक चूहड़मलसँ। चूहड़मल सभटा बकि देलक। सलहेसकेँ जेलसँ छोड़ि देल गेल आ’ ओकर ओहदा बढ़ा देल गेल। चूहड़मलकेँ भेलैक जेल। दबना आ’ सलहेस विवाह कए खुशीसँ रहय लगलाह।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 11. मिथिला आ’ संस्कृत
कामेश्वरसिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा त्रैमासिकी संस्कृत पत्रिका ‘ विश्वमनीषा’ निकलैत छल। 1975 ई. सँ 1994 ई. धरि ई पत्रिका प्रकाशित होइत रहल, मुदा 14 वर्षसँ एकर प्रकाशन बंद अछि। हिन्दीमे मिथिलाक इतिहासक अतिरिक्त सात खण्डमे मैथिलीक परम्परागत नाटकक ( 1300 ई. सँ 1900ई. धरिक 16 टा नाटक)प्रकाशन कएल गेल छल। मैथिलीमे पं गोविन्द झा लिखित वातावरण नाटकक संस्कृत अनुवाद श्री पं शशिनाथ झा कएलन्हि आ’ तकरा विश्वविद्यालय प्रकाशित कएलक। ‘ स्मृति-साहस्री’ जे 20म शताब्दीक विद्वान्-साधकक जीवन पर आधारित प्रथम मैथिली महाकाव्य अछि, आ’ जकर रचयिता श्री बुद्धिधारी सिंह’रमाकर’ छथि केर प्रकाशन सेहो विश्वविद्यालय कएने अछि। रूपक समुच्चयः नामक पुस्तकमे चारि गोट रूपक अछि। एहि मे चारिम संस्कृत रूपक म.म.अमरेश्वर कृत धूर्त्तविडम्बन प्रहसनम् मैथिली अनुवादक संदेल गेल अछि। म.म. भवनाथ उपाध्यायक राजनीतिसारः सेहो मैथिली अनुवादक संग देल गेल अछि।
संप्रति विश्वविद्यालयक कार्य सालमे एकबेर पंचाङ बनेबा धरि सीमित बुझाइत अछि।
विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
देवनागरी लिखबामे बराह आइ.एम.ई. केर योगदान विशिष्ट अछि। एहिमे संस्कृतक उदात्त , अनुदात्त आ’ स्वरित केर संगे बिकारी, देवनागरी अंक आ’ संगीतक नोटेशन लिखबाक सुविधा अछि। विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभ बिना एकर सहयोगक संभव नहि छल। मंद्र सप्तक, तीव्र आ’ कोमल स्वरक नोटेशन एहिमे अछि। ऋ,ॠ आ’ ऌ,ॡ आ’ ऍ, ऎ अ, ~ हलन्तक बाद अअर जोड्बाक सुविधा एहिमे सुविधा छैक। अनुदात्त क॒ उदात्त क॑ आ’ स्वरित क॓ सेहो उपलब्ध अछि।
ई विस्टामे सेहो कार्य करैत अछि। आ’ यूनीकोड फॉंटमे रहबाक कारण इंटरनेट पर पठनीय अछि। विदेहक सम्मुख पृष्ठ पर देवनागरीसँ संबंधित तीनटा लिंक राखल गेल अछि। पहिल दू टा लिंक पर जानकारीक संग सॉफ्टवेयर डाउंलोडक लिंक अछि। तेसर लिंक पर ऑनलाइन ताइपिंगक सुविधा अछि, एतय टाइप क’ कय कॉपी कय वर्ड डोक्युमेंटमे पेस्ट कए सकैत छी किंवा ईमेलमे सोझे टाइप केलाक बदला एतयसँ कॉपी कय पेस्ट कए सकैत छी।
(अनुवर्तते)
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