पछिला चारि-सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, बन्न स लहलहाइत खेत, पानि स इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंग स लऽ कऽ गाय, महीसि, बकरी स भरल रहैत छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जेँका। बीरान। सबहक (गामक लोकक) मन मे एक्के टा विचार अबैत जे आब इ गाम नै रहत। जँ रहबो करत त सिर्फ माटिये टा। किऐक त जहि गाम मे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीवैक लेल पानि नहि रहत, तहि गामक लोक कि हवा पीबि कऽ रहत। जहि मातृभूमिक महिमा अदौ स सब गबैत अएलाह ओ भूमि चारिये सालक रौदी म पेटकान लाधि देलक। मुदा तइओ लोकक टूटैत आशाक वृक्ष मे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरुर निकलि रहल अछि। किऐक त आखिर जनकक राज मिथिला छिअए की ने। जहि राज्य मे बाहर-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तहि राज मे, हो न हो, जँ कहीं ओहने फल फेरि भेटए। एक दिशि रौदीक (अकालक) सघन मृत्युवाण चलैत त दोसर दिशि स आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकावला करैत। जेकर हसेरियो नमहर। ऐहनो स्थिति मे दुनू परानी डोमनक मन मे जीबैक ओहने आशा बनल रहल जेहने सुभ्यस्त समय मे। कान्ह पर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथ पर सिंही माछ आ बिसाँढ़ स भरल पथिया नेने पाछु-पाछु सुगिया, बड़की पोखरि स आंगन, जिनगीक गप-सप करैत अबैत। चाइनिक पसीना दहिना हाथ स पोछि, मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि बुझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत?’ पत्नीक बात सुनि डोमन पाछु घुरि सुगियाक चेहरा देखि बिनु किछु बजनहि, नजरि निच्चा कऽ आगू डेग बढ़बै लगल। किऐक त खाइक ओते चिन्ता मन म नहि, जते पीबैक पाइनिक। डोमन कऽ अपन खेत-पथार नहि मुदा दुनू बेकती तेहन मेहनती जे नहियो किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सब काजक लूरि रहितहुँ ओ कोनो गिरहस्त स बन्हायल नहि ओना समय-कुसमय, अपना काज नहि रहने, बोइनो कऽ लइत। अपना खेत नहि रहने खेती त नहिये करैत मुदा दस कट्ठा मड़ुआ, सब साल बटाइ रोपि लइत। जहि स पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मड़ुआ बीआ उपजबै मे बेसी मिहनत होइत अछि किऐक त सब दिन बीआ पटबै पड़ैत अछि। शुरुहे रोहणि मे बड़की पोखरिक किनछरि मे डोमन बीआ पाड़ि लइत। लग मे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरु बीरार, तेँ बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिन मे बीआ रोपाउ भऽ जायत। मिरगिसिया मे पानि होइतहि अगते मड़ुआ रोपि लइत। मुदा अहि (एहि) बेरि से नइ भेलइ। बरखा नहि भेने बीआ बीरारे मे बुढ़हा गेल। एक्को धुर मड़ुआक खेती गाम मे नहि भेलइ। आने कियो अखन धरि धानक बीरार क खेत जोतलक आ ने बीआ वाओग केलक। रौदीक आगम सबहक मन मे हुअए लगल। मुदा तइओ ककरो मन मे अन्देशा नहि! किऐक त ढ़ेनुआर नक्षत्र सब पछुआइले अछि।
भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Sunday, September 13, 2009
कथा- बिसाँढ़- जगदीश प्रसाद मंडल
पछिला चारि-सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, बन्न स लहलहाइत खेत, पानि स इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंग स लऽ कऽ गाय, महीसि, बकरी स भरल रहैत छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जेँका। बीरान। सबहक (गामक लोकक) मन मे एक्के टा विचार अबैत जे आब इ गाम नै रहत। जँ रहबो करत त सिर्फ माटिये टा। किऐक त जहि गाम मे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीवैक लेल पानि नहि रहत, तहि गामक लोक कि हवा पीबि कऽ रहत। जहि मातृभूमिक महिमा अदौ स सब गबैत अएलाह ओ भूमि चारिये सालक रौदी म पेटकान लाधि देलक। मुदा तइओ लोकक टूटैत आशाक वृक्ष मे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरुर निकलि रहल अछि। किऐक त आखिर जनकक राज मिथिला छिअए की ने। जहि राज्य मे बाहर-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तहि राज मे, हो न हो, जँ कहीं ओहने फल फेरि भेटए। एक दिशि रौदीक (अकालक) सघन मृत्युवाण चलैत त दोसर दिशि स आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकावला करैत। जेकर हसेरियो नमहर। ऐहनो स्थिति मे दुनू परानी डोमनक मन मे जीबैक ओहने आशा बनल रहल जेहने सुभ्यस्त समय मे। कान्ह पर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथ पर सिंही माछ आ बिसाँढ़ स भरल पथिया नेने पाछु-पाछु सुगिया, बड़की पोखरि स आंगन, जिनगीक गप-सप करैत अबैत। चाइनिक पसीना दहिना हाथ स पोछि, मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि बुझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत?’ पत्नीक बात सुनि डोमन पाछु घुरि सुगियाक चेहरा देखि बिनु किछु बजनहि, नजरि निच्चा कऽ आगू डेग बढ़बै लगल। किऐक त खाइक ओते चिन्ता मन म नहि, जते पीबैक पाइनिक। डोमन कऽ अपन खेत-पथार नहि मुदा दुनू बेकती तेहन मेहनती जे नहियो किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सब काजक लूरि रहितहुँ ओ कोनो गिरहस्त स बन्हायल नहि ओना समय-कुसमय, अपना काज नहि रहने, बोइनो कऽ लइत। अपना खेत नहि रहने खेती त नहिये करैत मुदा दस कट्ठा मड़ुआ, सब साल बटाइ रोपि लइत। जहि स पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मड़ुआ बीआ उपजबै मे बेसी मिहनत होइत अछि किऐक त सब दिन बीआ पटबै पड़ैत अछि। शुरुहे रोहणि मे बड़की पोखरिक किनछरि मे डोमन बीआ पाड़ि लइत। लग मे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरु बीरार, तेँ बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिन मे बीआ रोपाउ भऽ जायत। मिरगिसिया मे पानि होइतहि अगते मड़ुआ रोपि लइत। मुदा अहि (एहि) बेरि से नइ भेलइ। बरखा नहि भेने बीआ बीरारे मे बुढ़हा गेल। एक्को धुर मड़ुआक खेती गाम मे नहि भेलइ। आने कियो अखन धरि धानक बीरार क खेत जोतलक आ ने बीआ वाओग केलक। रौदीक आगम सबहक मन मे हुअए लगल। मुदा तइओ ककरो मन मे अन्देशा नहि! किऐक त ढ़ेनुआर नक्षत्र सब पछुआइले अछि।
Wednesday, July 15, 2009
बाणवीर- कथा- गजेन्द्र ठाकुर
साढ़े तीनसँ चारि फीटक बीच लेटराक लम्बाइ छल। सभ कहैत छैक जे ओकर माए-बाप दोसराक बच्चाकेँ देखि कए भुट्टा-भुट्टा कहैत रहैत छलथि।से पता नहि की भेलैक लेटरा तकरा बादसँ बढ़िते ने अछि, ओकर लम्बाइ एकदम्मेसँ बढ़ब रुकि गेलैक।
“धुर! माए-बापक कतहु नजरि लगैत छैक बच्चाकेँ”।
“नञि यौ, माएक तँ लगिते छैक, देखियौ ने लेटराकेँ”।
गौआँ सभ आपसमे गप करथि। जे से, सभ बच्चा पैघ भेल। बढ़ए लागल । मुदा लेटरा घुटमुटाएले रहल। सभ क्यो ओकरा परोक्षमे लेटरा आ मुँहपर लेटरबम कहए लगलाह।
लेटरबमक माए-बापकेँ जमीन-जाल ततेक नहि। से महीसेपर निर्भर छलन्हि हुनकर सभक जीवन। लेटरा महीसक सेवामे भोरेसँ लागल रहैत छल। भोरमे भोरहा कातमे रगड़ि-रगड़ि कऽ चिक्कन बना दैत छल महीसकेँ। पुआरक नूरीसँ साफ करैत काल गोट-गोट अठौरी निकालि दैत छल। बेरू पहर बौआ-चौड़ीमे महीस चरबैत काल निसभेर भऽ सूति रहैत छल महीसक पीठपर।
लोक सभ हँसीमे कहितो रहए जे लेटरबम बौआ-चौड़ी हाइ स्कूलसँ मैट्रिक पास कएने अछि। महीसो लक्ष्मी रहए ओकर। आन माल-जाल सिंह लड़ाबए तँ लेटरबमक महीस घास चरबामे लागल रहए। से साँझमे घर-घुरैत काल जखन आन सभ गोटेक महीसक पेट पाँजरमे धसल रहैत छल, लेटराक महीसक दुनू पेट दुनू दिसन फूलि कए लटकि जाइत छल। बिना परिश्रम पन्हाइत छलैक महीस।
लेटरा अपन माए-बापकेँ तैयो प्रसन्न कए सकल की? ओ दुनू गोटे लेटराक गुजर कोना चलतैक, ओकरासँ बियाह के करतैक- एहि बात सभकेँ लऽ सोचिते रहैत छलाह।
गाममे बैतरणी नाटक आएल रहैक। कठपुतली सभ, मनुक्खक मरलाक बाद बैतरणी धार पार करबाक दृश्य, जे भयावहे-भयावह छल, खूब नीज जेकाँ प्रदर्शित करैत छलाह।
लेटरबम सेहो माए-बापक संग नाटक देखि अएलाह। आ एतहिसँ लेटराक जीवन एकटा दिशा लए लेलक। लेटराक बाबूक पाछाँ बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लागि गेल। धरोहि दऽ देलक, साँझ-भोर ओकर घरपर पहुँचए लागल।
लेटरा अपन महिसबारीमे मगन रहैत छल। मुदा ओ अनुभव करए लागल जे आइ-काल्हि माए-बाप ओकरापर किछु बेशीए ममता राखए लागल छथि। सभ कहैत रहओ जे लेटराक जीवन कोना के चलतए, से की ओकर माए-बाबूपर आब कोनो असरि थोड़बेक पड़तए।
मुदा बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लेटराक बापक पाछाँ पड़ि गेल। कहए लागल जे ओ तँ लेटराकेँ नीक नोकरी दियबा रहल अछि। लेटरबमक बाबू सभसँ पुछथि जे की करी? सभ यैह कहैत रहन्हि जे ओ लेटराकेँ कीनि रहल अछि, नोकरी नहि दऽ रहल अछि। ई नाटक कम्पनी सभ बणवीर सभकेँ गामे-गाम तकने फिरैत अछि आ शहरी सर्कस कम्पनी सभकेँ बेचि दैत अछि। फेर एक बेर जे बेटा जएत तँ की घुरिकऽ अएत? बेटा धन छी, बाणवीरे सही!
अकश-तिकश करैत एक दिन माए-बाप लेटरसँ पुछलन्हि- “भगवानक इच्छा सर्वोपरि। भगवान पेट दइ छथिन्ह तँ ओकरा पोसबाक जोगार सेहो करैत छथिन्ह। लोक सभ कहैत रहल जे लेटराक गुजर कोना चलतए तँ ककरो गपक हम मोजर नहि दैत छलियैक। मुदा ई बैतरणी नाटक कम्पनी बला तँ पाछूए पड़ि गेल अछि। लोकसभ कहए-ए जे ई सभ शहरी सर्कस कम्पनीक लेल बाणवीर सभक ताकिमे गामे-गाम फिरैत अछि आ ओहि कम्पनी सभमे ओकरा सभकेँ बेचि दैत अछि। मुदा ई कहए-ए जे से नहि छैक। सभ दिनुका दिनचर्जा छैक। शहरे-शहरे घुमैत अछि ई सभ। जखन कतहु सर्कस नहि लगैत छैक तँ छुट्टिओ भेटिते छैक। आर के नोकरी देत एतेक कम लम्बाइ बलाकेँ? से हम अहींसँ पुछैत छी जे की कएल जाए”।
लेटराक तँ आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैक। गौआँ सभ ठीके कहैत रहए। माए-बाप तँ लागैए निर्णय कऽ लेने छथि।
“माए-बाबू। हमरा बुझल अछि जे हमर बियाह-दान नहि होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरिये लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि देलकउ, से ठीके अछि की”?
आब तँ कन्नारोहट उठि गेल। माए-बापक संग लेटराक कानबसँ अँगनामे अनघोल मचि गेल।
जेना सुति कऽ उठलाक बाद ढेर-रास गप महत्त्वपूर्ण कोटिसँ उतरि कऽ अमहत्वपूर्ण वा ततेक महत्वपूर्ण नहि रहि जाइत अछि, तहिना दिन बितैत लेटरा सेहो अपन मोन मना लेलक। कनी देखियैक बाहरक दुनियाँ केहन होइत छैक। माए-बाप तँ बेचिए लेने छथि, ओतेक सिनेह रहितन्हि तँ बेचबे करितथि? तँ हमहीं किएक अधभगिया सिनेह राखी?
बैतरणी कम्पनीबला लेटराकेँ एकटा सर्कस बला लग लऽ गेल।
ओतए ई लगैत रहए जे जेना सभ बाणवीरक नोकरीक ओतए जोगार होअए। दुनियाँक सभ बाणवीरक नोकरी ओकरा लग पक्का रहए। लेटरा जेना बाणवीरक देशमे पहुँचि गेल छल। मोँछबला, निमोछी, पातर-मोट, नव-बूढ़- मुदा सभ धरि बाणवीर।
लेटरा ओकरा सभक बीच रहए लागल। किछु दिन धरि तँ ओकरा लगैत रहए जे ओ कोनो विशिष्ट व्यक्ति अछि आ तेँ बेशी दुखी अछि आ दोसर बाणवीर सभ तँ अही योग्य अछि। मुदा आस्ते-आस्ते जखन संगी-साथी सभसँ ओकरा गप होमए लगलैक, तखन ओकरा बुझबामे अएलैक जे सभक एक्के खेरहा छैक।
फेर ओहि जेलरूपी घरमे हँसी-खुशीसँ, छोट-छीन झगड़ा-झाँटी आ मान-मनौअलक संग ओ आगाँ बढ़ए लागल। अपन जिनगीक ई रूप ओकरा एहन सन लगैत छलैक जेना ओ नोकरिहारा होअए। ओहो घुरि जएत गाम आ फेर आपस अएत नोकरीपर। गामक दोसर नोकरिहारा सभकेँ ओ देखैत छल। गाम अबैत काल जतबे उल्लसित रहैत छलाह, नोकरीपर घुरैत काल सभक घुघना लटकि जाइत छलन्हि।
धुर, माए-बाप हमरा बेचलक थोड़बेक अछि। हमरा सन बाणवीरकेँ एहिसँ नीक आर कोन नोकरी भेटतैक। सर्कसमे जखन हम कला देखबैत छी तँ बच्चा सभ कोना पेट पकड़ि हँसैत अछि, कतेक थोपड़ी पड़ैत अछि। थोपड़ीक अबाज तँ निसाँ आनि दैत अछि। काल्हि ओ दु जुट्टी बला बचिया, केहन लगैत रहए जेना अपने लोक रहए। गाममे बड़का कक्काक बेटीक बियाह नौगछिया भेलन्हि तँ हुनको दिआ तँ लोक सभ उरन्ती उड़ेने छल जे बेटी बेचि लेलन्हि। कतेक दुरगर बियाह करा देलन्हि!
ई लोको सभ, बुझु इनारक बेङ सभ छी। दिल्ली-मुम्बइ घुमत गऽ तखन ने बुझबामे अओतैक जे भागलपुर-नौगछिया कोनो ततेक दुरगर नहि छैक। माए-बाप हमरा बेचि लेत?....आ ई सोचिते लेटराक कंठ सुखा गेलैक आ आँखि पनिया गेलैक।
“रे भाइ, चल । तैयारी करबा लेल घण्टी बाजए बला छैक। ओहिसँ पहिने किछु खा-पीबि ली”।
Monday, June 01, 2009
कथा- नबी बकस- गजेन्द्र ठाकुर
नबी बकस
“एकटा प्लम्बर, एकटा पेन्टर आ तीन टा जोन लागत। सात दिनमे घर चमका देब। अहाँक काजमे कमाइ नहि करबाक अछि हमरा। अहाँक अहिठाम एतेक रास लोक अबैत छथि, लोक देखत तँ पूछत ई काज के कएने अछि। तहीसँ हमरा चारि ठाम काज भेटि जाएत तेँ। अपन एरियाक लोक दिल्लीमे कतए पाबी”। नबी बकस नाम रहए ओकर।
“अपन एरियाक लोक छी, कतए घर अछि”?
“कटिहार। हम तँ कहब जे बाथरूम आ किचनक काज सेहो करबाइए लिअ”।
“अहाँ तँ पोचारा आ पेन्ट करैत छी, संगमे राजमिस्त्रीक काज सेहो करैत छी की”?
“हम नहि करैत छी मुदा हमर गौआँ ई काज करैत अछि। ओ कहैत रहए जे साहबसँ पुछू काजक लेल। ओना ओकर काज बड्ड ठोस होइत छैक। हम बजबैत छी, मात्र भेँट कऽ लियौक। नहि तँ हमरा कहत जे तूँ साहबसँ पुछनहिये नहि हेबहुन्ह”।
ओ मोबाइलपर फोन मिलेलक आ कोनो सर्फुद्दीनकेँ बजेलक।
सर्फुद्दीन किचेन बाथरूम सभक मुआएना केलक आ करणीसँ देबालपर मारलक तँ प्लास्टर झहरि कऽ खसि पड़लैक। नलक टोटीकेँ घुमेलक तँ ओ टूटि कऽ खसि पड़लैक। फेर ओ बाजल-
“सरकारी काज छियैक। नीव तँ मजगूत होइत छैक मुदा फिनिसिंग नहि होइत छैक। आ भइयो गेलए २० साल पुरान ई सभ। देखू एहि देबाल सभक हाल। सभटा अन्डरग्राउन्ड पाइप सभ सरि-गलि गेल अछि। तकरे लीकेजसँ देबाल सभक ई हाल अछि। सभटा पाइप बदलए पड़त से सीमेन्ट तँ झाड़इये पड़त। ओना सीमेन्टमे कोनो जान बाँचलो नहि छैक। तखन देबालमे पाथर सेहो लगबाइये लिअ। ई बम्बइया-मिस्त्री गणेशीसँ जे अहाँ बरन्डा रिपेयर करेने छलहुँ तकर बालु देखियौक कोना झड़ि रहल अछि। टेस्ट करए लेल एहि सीमेन्टकेँ हम झाड़ि कऽ नव सीमेन्ट लगबैत छी, पाथर नहि बनि जाए तँ कहब। तखन मोन हुअए तँ काज देब आ नहि तँ नहि देब”। से कहि ओ बरन्डाक किछु हिस्साक सीमेन्ट झाड़ि कऽ करिया सीमेन्ट लगा देलक आ चलि गेल।
“ई नबी बकसक छोट भाए छियैक। बड्ड काजुल। दिन भरि लागले रहैत अछि, नाम छियैक ओकील। नबी बकस तँ आब ठिकेदार भऽ गेल अछि, करणीकेँ हाथो कहाँ लगबैए। ओकील बुझु मजदूरी करैए अपन भाए लग। आ ठीकेदारक भाएक ओहदासँ आन मजदूर सभपर नजरि सेहो रखैए”।
फेर कनेक काल धर, ई जे प्लम्बर मिस्त्री रहए, खलील जकर नाम रहैक, से चुप रहल। ई हरियाणाक रहए आ बुझू जे नबी बकसकेँ हमरासँ भेँट करेनिहार ईएह रहए। एकटा छोट भङ्गठी करेबाक रहए ताहि द्वारे एकरा बजेने रही।
“दुनू गोटे नबी बकस आ सर्फुद्दीन संगे राज-मिस्त्री रहए। मुदा नबी-बकस लाइन बदलि लेलक। आ आब एक-दोसराकेँ काज दिअबैत रहैत अछि”।
फेर खलील हमरा दिस ताकि बाजल-
“अहाँ दिसका लोक सभमे बड्ड एकता होइत छैक”।
ओकील आ खलीलमे काजक बिचमे गप-शप होइत रहैत छलैक।
“हमरा सभक पुरखा मुसलमान बनबासँ पूर्व राजपूत रहथि मुदा ई सभ राजमिस्त्री रहए-धीमान, एखनो हरियाणामे होइत अछि”। खलील इशारासँ ओकील दिस देखैत हमरा सुना कए कहलक।
“हम सभ तँ धीमान छलहुँ मुदा तोरा सभ के छलँह से तोरा एतेक फरिछा कए कोना बुझल छौक”। बहुत कालसँ ओकील बिन बजने काज कए रहल छल। मुदा पहिल बेर ओकरा उत्तर दैत सुनलियैक। ओकर सभक बीच गप आ हँसी ठट्ठा चलैत रहैत छल।
हमर घरमे बरंडाक एकटा कोनक मरम्मतिसँ काज शुरु भेल रहए। खलीलकेँ कहलियैक तँ ओ एकटा गणेशी मिस्त्री, जकरा सभ बम्बइया कहैत रहए, केँ बजा कए काज करा देलक। फेर पोचारा बला आकि पेंटबला नबी बकसकेँ ई बजेलक। आब ई पोचारा-पेन्टबला नबी बकस ओहि सर्फुद्दीन राज-मिस्त्रीकेँ बजा लेने अछि। सर्फुद्दीन पाइप सभक काज खलील प्लम्बरकेँ दिआ देलक से खलीलकेँ बिन मँगने काज भेटि गेलैक। आ एक दोसराकेँ परिचय करबैत आब तँ लकड़ी बला आ बिजली मिस्त्री सेहो घरमे पैसि गेल चल।
एक दिन सर्फुद्दीन मुँह लटकेने आएल। कहलक जे गणेशीसँ झगड़ा भए गेल।
“से कोना”?
“कहैए जे तोँ साहेबक घरक काज हमरासँ छीनि लेलँह, इलाकाक लोकक नाम पर। बुझू अहाँ हमर काज देखि कऽ ने हमरा काज देने छलहुँ। आ ई तँ छोड़ू, ईहो कहैत रहए जे...”।
“की? कहू ने”।
“कहैत रहए जे मुसलमानपर कहियो विश्वास नहि करबाक चाही”।
हमर तँ तामसे देह लहरि गेल। कहलियैक जे तुरत ओकरा बजा कए आनू गऽ। मुदा ओ थोम्ह-थाम्ह लगा देलक। फेर बादमे एक दिन गणेशीकेँ बजा कए हम बुझा देलियैक।
“एहि महानगरमे हम आ सर्फुद्दीन एके भाषा बजैत छी, ई मात्र एकटा संजोग अछि। एकर काज देखियौक आ अपन काज देखू फेर अहाँकेँ बुझा पड़त जे सर्फुद्दीनसँ अहाँ किएक पाछाँ रहि जाइत छी”।
ओम्हर एक गोटे वूडेन फ्लोरिंग केर विचार देलक ताहिपर सर्फुद्दीन ओकरासँ झगड़ि गेल जे नीचाँ मे पाथरे नीक होएत, बाथरूम आ किचनमे पाथर अछि तँ सभ ठाम ईएह रहबाक चाही। रूममे किएक वूडेन फ्लोरिंग होएत? मुदा वूडेन फ्लोरिंग बला कहलक जे एक दिनमे लगा देब आ पाइयो सस्त कहलक से हम ओकरे हँ कहि देलियैक।
भरि दिन अनघोल होइत रहैत छल। नीचाँ फ्लोर बलाक बेटाक बारहम कक्षाक परीक्षा रहए से ओ जे राजमिस्त्री सभक आबाजाही देखलक तँ कहए लागल जे रूम सभमे तँ पाथर नहि लागत? हम कहलियन्हि जे नहि वूडेन फ्लोरिंग काल्हि कए जाएत तँ हुनका साँसमे साँस अएलन्हि।
”पाथर लगाबएमे तँ माससँ ऊपर ई सभ लगबितए, हमर बेटाक परीक्षा अछि, से हम तँ पाथर सभ पसरल देखि कए चिन्तित भए गेल रही”।
“नहि मात्र बाथरूम आ किचेन लेल ई पाथर सभ अछि”।
सर्फुद्दीन, खलील आ नबी बकससँ अबैत जाइत काजक अतिरिक्त घर-द्वारक गप सेहो होमए लागल। नबी बकस कटिहारसँ दिल्ली आएल , छह भैयारीमे सभसँ पैघ, एकटा बहिन सेहो रहैक। अपन हमशीरा(बहिन)क वर आ ओकर सासुरक विषयमे नबी बकस प्रेमपूर्वक सुनबैत रहैत छल। सर्फुद्दीनक शागिर्दीमे राज मिस्त्रीक काज सिखलक। आस्ते-आस्ते सभ भाँएकेँ दिल्ली बजा लेलक। ओकील तँ ओकरे संग रहैत छैक, आन भाए सभ बियाह करैत गेल आ अलग होइत गेल। मुदा ओहो सभ आसे-पासमे रहए जाइए। बियाह तँ ओकीलोक भेल छैक मुदा अछि ओ सुधंग। से आन भाए सभ कहैत-कहैत रहि गेलैक जे नबी बकस मँगनीमे खटबैत रहैत छौक, अलग भए जो गऽ मुदा ओ तँ भाएक भक्त अछि। भाएक सोझाँमे एको शब्द की बाजल होइत छैक?
एक दिन ओकीलकेँ बोखार भेल रहए आ दोसर भाए सभ ओकरा काजपर अएबासँ मना कएने रहैक। मुदा ओ नहि मानलक। ओकर सुधंगपना देखि हमर माँ, पत्नी, बच्चा सभ ओकरा खूब मानए लागल रहथि। ओहि दिन काजक बीचमे ओ खएबा लेल माँगलक आ बालकोनीमे सूति रहल। फेर बेरिया पहरसँ काज शुरू कएलक। साँझमे घर जएबाक बेरमे जखन हम कहलियैक जे डेरा जएबाक बेर भए गेल तँ कहलक जे नहि, आइ काज लेटसँ शुरू कएने रही से खतम कइये कऽ जाएब। आ आस्तेसँ बड़बड़ाइत बाजल जे देखैत छियैक जे आइ क्यो बजबए लेल आबैए आकि नहि।
आठ बजे करीब मोटरसाइकिलपर दू गोटे आएल। ओकील कहलक जे ई दुनू ओकर छोटका भाए सभ छैक। दुनू गोटे तेसर तल्ला स्थित हमर फ्लैटपर आएल आ ओकीलकें गप करबा लेल बजेलक। ओकर सभक गपमे आपकता मिश्रित क्रोध रहैक। ओकील ओकरा सभकेँ कहैत रहए जे ओहेन कोनो गप नहि छैक, आइ आधा दिन सुतल रहए तेँ सोचलक जे काज पूरा कइए कए जाइ। तावत नबी बकस सेहो ओतए पहुँचि गेल आ ओकीलकेँ लए गेल।
दोसर दिन नबी बकस भोरे-भोर आएल।
“देखियौक ई भाए सभ।...
“बेटा जेकाँ बुझलियैक एकरा सभकेँ आ हमरापर आरोप लगबैत अछि जे तूँ दू रंग करैत छह। तीनू भाँए काल्हि हमरासँ खूब झगड़ा करए गेल जे तोँ ओकीलकेँ नोकर जेकाँ रखैत छहक। बुझू! ई ओकील अछि सुधंग। कतबो कहैत छियैक जे नीकसँ कपड़ा लत्ता पहिर तँ ओहो झोलंगे जेकाँ रहैत अछि।
- काल्हि हमरा तँ ओकीलसँ भेँटो नहि अछि। सर्फुक काज दोसर साइटपर चलि रहल छैक, ओतहि गेल छलहुँ जे कोनो स्कीमसँ काज भेटि जइतए तँ अहाँक एहिठाम काज खतम भेलापर ओतहि लागि जएतहुँ। बिल्डर अंसल बलाक ऑफर आएल रहए जे हमरा एहिठाम आबि जाऊ मुदा भाए सभक द्वारे हम मना कए देलियैक। आ ई सभ.. ओना ई सभटा हमर पटना बला भाए मंडलक करतूत छी”।
“मंडल!!”, हमरा किछु पुरान गप मोन पड़ल।
- अहाँक गाममे एकटा जयशंकर सेहो छथि की”?
“हँ! हँ! अहाँ कोना चिन्हैत छियन्हि हिनका सभकेँ। ओना असली नाम तँ हमर भाएक सलीम छियैक। ऑफिसक नाम मंडल। घरक सलीम। सरकारी ड्राइवर अछि। घरमे सलीम कहने ओकर अहलिया (कनियाँ) घबड़ाइ छैक”।
“सभटा बुझल अछि हमरा”।
अपन विद्यार्थी जीवनक एकटा घटना मोन पड़ि गेल हमरा।
पटनामे पढ़ैत रही। पड़ोसमे एक गोटे जयशंकर रहैत छलाह। भाइ-भाइ कहैत छलियन्हि। दू बियाह। पहिल बियाहक हुनकर बेटा भागि गेल छलन्हि। ओना दोसर बियाह पहिल पत्नीक मुइलाक अनंतर भेल छलन्हि। किछु दिन दिल्ली-बम्बइ घुमि पहिल बियाहक ओ बेटा आपस अएलन्हि। सभ ओकरा पुछलकै जे की करमे? ओ कहलक जे सभ काज हमरासँ होएत मुदा पढ़ाइ छोड़ि कए। फेर सभ मिलि कए ओकरा ड्राइवरीक लाइनमे जएबाक लेल कहलक। ओकरो मोन रहैक ड्राइवरी सिखबाक। भोरे-भोर एक दिन जयशंकर कहलन्हि जे आइ एक ठाम चलबाक अछि।
“बेटा कहैत अछि जे ड्राइवरी सीखब। ड्राइविंग स्कूल बड्ड महग। एक गोटे गौआँ सलीम अछि ड्राइवर, सरकारी ऑफिसमे। गाममे एहि बेर छुट्टीमे भेटल रहए। ओकरो सभक ईद पाबनि छलए, से आएल रहए गाम। कहलक जे रवि दिन कऽ ओकरा छुट्टी होइत छैक ऑफिसमे आ आन दिन पाँच बजे भोरेसँ सिखा सकैत अछि। दू सए टाकामे एकटा सेकेंड हैंड साइकिल बेटाकेँ कीनि देने छियैक। ओकर डेरा ऑफिसे लग छैक। ऑफिस बजेने अछि, ओतहिसँ घर देखाओत”।
“ऑफिस देखल अछि?”
“हँ, कताक बेर गेल छी”।
ऑफिसक बेरमे हम सभ गाँधी मैदानक बगलक कचहरी सन ऑफिस पहुँचैत गेलहुँ।
“मंडलजी ड्राइवर साहेब छथि?” जयशंकर एक गोट हाकिमक ऑफिसक बाहर ठाढ़ चपरासीसँ पुछलन्हि।
“हँ , ओम्हर छथि”।
हम जयशंकरकेँ पुछलियन्हि जे हमरा सभ तँ सलीमसँ भेँट करबा लेल आएल छी, ई मंडल के छथि?
ओ इशारामे हमरा चुप रहए लेल कहलन्हि आ ईहो मुखर रूपमे कहलन्हि जे एहिमे कोनो बात छैक, बादमे कहताह।
आब जे मंडलजीसँ हुनका गप होमए लगलन्हि तँ बीच-बीचमे ओ सलीम भाइ, सलीम भाइ कहि हुनका सम्बोधन करैत रहलाह। फेर हुनका संगे हम सभ हुनकर डेरा पहुँचलहुँ। फेर बिदा होइत काल सलीम भाइ जयशंकरकेँ हमरा दिश इशारा करैत कहलन्हि जे हिनका कहि देलियन्हि ने। जयशंकर कहलखिन्ह जे कहि देबन्हि।
ओतए सँ निकललाक बाद जयशंकर कहलन्हि जे कटिहार लग जयशंकरक गाम छन्हि। मारते रास भाइ बहिन छैक सलीमक। सलीम हुनकर लंगोटिया यार, संगे पढ़लन्हि। फेर रोजगारक क्रममे दुनू गोटे दूर चलि गेलाह। सलीम कोनो हाकिमक घरपर काज करए लागल। ड्राइवरी कहिया कतए सँ ओ सीखि लेने छल, से हुनरबलाकेँ नोकरीक तँ ओहुना दिक्कत नहि होइत छैक। बादमे एकर स्वभाव देखि कए ओ हाकिम एकरा कोनो दोसर आदमी जकर नाम मंडल रहए, आ कतहु मरि-खपि गेल रहए, केर नामपर टेम्परोरी राखि लेलकैक। फेर किछु दिनमे ओ पर्मानेन्ट भए गेल।
जयशंकर हमरासँ कहलन्हि- एकर ऑफिसमे वा एकर संगी साथी लग- ओना अहाँसँ फेर कहिया एकर भेँट हेतए- एहि गपक धोखोसँ चरचा नहि करब। ओना पर्मानेन्ट भए गेल छैक मुदा लोक सभ केहन होइ छैक से नहि देखइ छियैक। क्यो किछु लिखि पढ़ि देतैक तँ मंगनीमे बेचारकेँ फेरा लागि जएतैक।
मोनमे घुमरल एहि गपकेँ नबी बकसकेँ हमारा कहलियैक। ताहिपर ओ बाजल-
“ओहो स्कीम धरेनिहार हमहीं छी। एकटा कम्प्लेन कऽ देबैक तँ जाहि नोकरीपर एतेक फुरफुरी छैक से घोसरि जएतैक। मुदा सोचैत छी जे ओकर नोकरी जएतैक ते हमरे माथपर आबि खसत। तेँ अल्ला पर सभटा छोड़ि देने छियैक”।
नबी बकस ओना तँ बड्ड व्यस्त रहैत छल मुदा ओहि दिन लागैए हमरे सँ गप करबा लेल समय निकालि कए आएल रहए। जखन लोक मानसिक फिरेशानीमे रहैत अछि तँ अपन दुखनामा दोसराकेँ सुनबए चाहैत अछि। मुदा तकर श्रोता भेटब मोश्किल। मुदा हम अपन मानवविज्ञानक कॉलेजिया पढ़ाइक प्रभावक कारण सभ काज छोड़ि अनायास श्रोता बनि जाइत छी से नबीकेँ बुझल रहैक। भदबरिया लधने छल से हमहूँ कतहु बाहर जएबाक हरबड़ीमे नहि छलहुँ। से ओ अपन खिस्सा ओ शुरु कएलक।
“कतेक कष्ट कटने छी से की बयान करू। आ मदति के सभ कएलक ? एकटा खालू-खाला (मौसा-मौसी) आ खलेरा भाए आ खलेरी बहिन मोन पड़ैए आर क्यो नहि। अब्बूक मरलाक बाद बड़ा अब्बू (बड़का काका), छोटा अब्बू (छोटका काका) सभ पराया भए गेल। शौहरक मरलाक बाद अम्मीक हालत की रहैक से ई सभ की बुझत-गमत?
-खाला दिल्लीमे रहैत रहथि। अम्मीक मृत्युक बाद हमर पढ़ाइ छुटि गेल। कटिहारमे पढ़ैत रहितहुँ, फूफीजाद भाए (पिसियौत) कहनहियो रहए जे तोरा जतेक पढ़बाक छौक पढ़, मुदा ई सभ तखन गाममे ईँटा उठबितए से हमरा देखल होइतए? आ ई गप एकरा सभकेँ हम बुझैयो नहि देने छियैक।
-आ ई सभ की कहैये जे हम अपन अहलिया (स्त्री) आ सारि-हमजुल्फ(सारि-साढ़ू)क पाछाँ एकरा सभपर ध्यान नहि दऽ रहल छियैक? दू रंग करैत छियैक?
-दिल्लीमे आएल रही गाम छोड़ि कए तँ पहिने नोएडामे पितरिया बर्त्तनक दोकानमे ब्रासोसँ बर्तन साफ करैत रही। अल्लाहक करमसँ सर्फू भेटि गेल। खालाजाद भाए (मौसेरा भाए) केर संगी रहए सर्फू। ओकरेसँ सभ ईलम सिखलहुँ। मुदा ई कहि दिअए जे हम कहियो ओकरा दगा देने होइयैक। सर्फूक स्वभाव तँ अहाँकेँ बुझले अछि। कनियो अन्याय आ बेइमानी ओकरा पसन्द नहि छैक, सभसँ बतकही भेल छैक, मुदा हमरासँ आइ धरि कोनो मोन मुटव्वल नहि भेल छैक। हमर से नीयत रहितए तँ ओकरो संग ने हमर संबंध टुटितए। आ एहि शहरमे ओ आन भए हमरा अप्पन बुझलक आ ई सभ। ओ तँ गौआँ छी, मुदा खलील? ओकरोसँ पुछियौक।
-माएक मोन पड़ि जाइए जहिया ई भदवरिया लाधैए। मोन नहि पाड़ए चाहैत छी, आ ताहि लेल व्यस्त रहैत छी। मुदा आइ माएक ओ मृत्यु रहि-रहि कोढ़ तोड़ि रहल अछि।
नबी बकसक कंठ कहैत-कहैत भरिया गेलैक। मुदा कनेक पानि पीबि फेर ओ माएक स्मरण करए लागल।
“नबी साहेबजादे, कनेक ओहि कठौतकेँ खुट्टाक लग कए दिऔक। बड्ड पानि चूबि रहल छैक ओतए। ई बादरकाल सभ साल दुःख दैत अछि। सोचिते रहि गेलहुँ जे घर छड़ायब। मुदा नहि भए सकल। घरोक कनी मरोमति कराएब आवश्यक छल, मुदा सेहो नहि भए सकल। ठाम-ठाम सोंगर लागल अछि। फूसोक घर कोनो घर होइत छैक? ठाम-ठाम चुबि रहल अछि, ओतेक कठौतो नहि अछि घरमे। खेनाइ कोना बनत से नहि जानि। ओसारापरक चूल्हिपर तँ पानिक मोट टघार खसि रहल अछि। एकटा आर अखड़ा चूल्हि अछि मुदा जे ओ टूटि जाएत, तखन तँ चूड़ा-गुड़ फाँकि कए काज चलबए पड़त। समय-साल एहेन छैक जे चूल्हि बनाएब तँ सुखेबे नहि करत। जाड़नि सेहो सभटा भीजि गेल अछि। भुस्सीपर खेनाइ बनाबए पड़त”।
पइढ़िया उजरा नुआक आँचर ओढ़ने, थरथराइत करीमा बेगम चौदह बरखक अपन बेटाक संग, कखनो सोंगरकेँ सोझ करथि तँ कखनो कठौतकेँ एतएसँ ओतए घुसकाबथि। जतए टघार कम लागन्हि ओतएसँ घुसकाकए, जतए बेशी लागन्हि ओतए दए दैत छलीह। सौँसे घर-पिच्छर भए गेल छल। कोनटा लग एक ठाम पानि नञि चूबि रहल छल। ततए जाए ठाढ़ भए गेलीह।
“कतेक रास खढ़ चरमे अनेर पड़ल छल। पढ़ुआ काकाकेँ कहलियन्हि नहि। घर छड़बा लेने रहितहुँ”।
“यौ बाबू। घर छड़एबाक लेल पुआर तँ भेटनिहार नहि। आ गरीब-मसोमातक घर खढ़सँ के छड़ाबए देत”।
हमरा खढ़सँ आ पुआरसँ घर छड़बयबामे होमयबला खरचाक अन्तर तहिया नहि बुझल छल।
“से तँ अम्मी, खढ़सँ छड़ाएल घरक शान तँ देखबा जोग होइत छैक। पढ़ुआ काकाक घर देखैत छियन्हि। देखएमे कतेक सुन्दर लगैत अछि आ केहनो बरखा होअए, एको ठोप पानि नहि चुबैत अछि”।
“से तँ सभसँ नीक घर होइत अछि कोठाबला”।
“एह, की कहैत छी? गिलेबासँ आ सुरखीसँ ईँटा जोड़ेने कोठाक घर भए जाइत अछि? आ नेङराक घर तँ सीमेन्टसँ जोड़ल छैक, मुदा परुकाँ ततेक चुबैत छल से पूछू नहि”।
“से?”
“हँ यै अम्मी। सभ बरख जौँ छड़बा दी, तँ ओहिसँ नीक कोनो घर होइत छैक?”
“चारिम बरख जे छड़बेने छलहुँ तकर बादो पहिल बरखामे खूब चुअल छल”।
“पहिलुके बरखामे चुअल छल ने आ फेर सभ तह अपन जगह धऽ लेने होएत। तखन नहि चुअल ने बादमे”।
“हँ, से तँ तकरा बाद तीन साल धरि नहि चुअल”।
तखने काकी बजैत अएलीह-
“जनमि कए ठाढ़ भेल अछि आ की सभ अहाँकेँ सिखा रहल अछि। कनेक उबेड़ जेकाँ भेलैक तँ सोचलहुँ जे बहिन-दाइक खोज पुछाड़ि कए आबी”।
बुन्नी रुकि गेल छल। नबी, काकाक घर दिस गेलाह आ दुनू दियादनीमे गप-शप शुरू भए गेल।
साँझक झलफली शुरू भेल, भदबरिया अन्हारक तँ काकी बहराइत कहैत गेलीह-
“बहिन दाइ, आगिक जरूरी पड़य तँ हमर घरसँ लए जाएब”।
“नञि बहिनदाइ। सलाइमे दू-तीन टा काठी छैक। मुदा मसुआ गेल छैक। हे, ई डिब्बी दैत छियन्हि, कनेककाल अपन चुल्हा लग राखि देथिन्ह तँ काजक जोगर भए जाएत। नबी दिआ पठा दिहथि”।
“देखिहथि। उपास नञि कऽ लिहथि से कहि दैत छियन्हि, बच्चा सभ तँ हमरा एहिठाम खा लेत”-दियादिनी कहैत बिदा भेलीह।
करीमा बेगम माने हमर माए ओसारापर खुट्टा भरे पीठ सटा बैसि गेलीह। तावत हमहूँ पहुँचलहुँ।
“की सोचि रहल छी अम्मी। कहू ने”।
“यैह फुसियाही गप सभ, अहाँक अब्बूक पहलमानीक। काका हुनका कहैत रहथिन्ह सैह।
-“खुट्टा पहलमान छथि ई”।
-“से नहि कहू काका। जबरदस्तीक मारि-पीटि हम नहि करैत छी, ताहि द्वारे ने अहाँ ई गप कहि रहल छी”।
-रहमान काका आ हुमायूँ भातिज। पित्ती-भातिजमे ओहिना गप होइत छलन्हि, जेना दोस्तियारीमे गप होइत छैक। अखराहामे जखन हुमायूँ सभकेँ बजाड़ि देथि तखन अन्तिममे रहमान हुनकासँ लड़य आबथि। काका कहियो हुनका नहि जीतए देलखिन्ह।
हुमायूँक कनियाँ माने हम नवे-नव घरमे आएल छलहुँ। कोहबर लहठी सभ होइत छलैक ओहि समयमे। आब ने जानि मुल्ला सभ किएक एकर विरोधी भए गेल अछि, तैयो लोक करिते अछि की। मुल्ला सभक गप जे मानए लागी सभ ठाम तखन तँ भेल!
आ एहि तरहक वातावरण घरमे देखलहुँ तँ मोन प्रसन्न भऽ गेल। घरक दुलारि छलहुँ आ सासुरो तेहने भेटि गेल। समय बीतए लागल। मुदा हुमायूँक विधवा एतेक जल्दी कहाय लागब से नहि बुझल छल तहिया। आब तँ सभ प्रकारक विशेषणक अभ्यास भऽ गेल अछि। झगड़ा-झाँटिक बीच क्यो ईहो कहि दैत अछि- वरखौकी, वरकेँ मारि डाइन सिखने अछि !
-हुमायूँक जिवैत जे सभक दुलारि छलहुँ तकर बाद सभक आँखिक काँट भए गेलहुँ। इद्दतक बाद नैहरसँ दोसर बियाह करएबा लेल सेहो भाए सभ आएल मुदा अहाँ सभक मुँह देखैत रहबाक इच्छा मात्र रहल।
नबी बकस बाजल-“उजरा नूआ, बिन चूड़ी-सिन्दूरक माएक वैधव्य बला चेहरा एखनो हमरा मोने अछि। फेर ओहि भदबरिया रातिमे माए आगाँ कहए लगलीह।
-“रहमान काका हमर पक्ष लए किछु बाजि देलखिन्ह एक बेर, तँ हमर सासु-ससुर कहए लगलखिन्ह जे हमर पुतोहुकेँ दूरि कए रहल छी। आ ईहो जे मुद्दीबा सभक अपना घरमे घटना हेतैक, तखन ने बुझए जाएत।
-“आब तँ ने रहमाने चाचू छथि आ ने सासु ससुर से मरल आदमीक की खिधांश करू। मुदा एकोट झूठ गप ई सभ नहि अछि।
-“लोक कहैत छैक जे सुखक दिन जल्दी बीति जाइत अछि, मुदा हमर दुखक दिन जल्दी बीतैत गेल, सुखक दिन तँ एखनो एक-संझू उपासमे खुजल आँखिसँ हम देखैत रहैत छी, खतमे नहि होइत अछि।
-“विधवा भेलाक अतिरिक्त आन घटनाक्रम अपन नियत समयसँ होइत रहल। हमर अब्बू-अम्मीक मृत्यु भेल, सास-ससुर आ पितिया ससुर रहमान कका तँ पहिनहिये गुजरि गेल छलाह।
-“घरमे जखन बँटबारा होमय लागल तखन सम्पत्तिक आ खेत-पथारक बखरा, चारि भैयारीमे मात्र तीन ठाम होमय लागल। हुमायूँक हिस्सा तीनू गोटे (जिबैत भैयारी सभ) बाँटि लेलन्हि। हम किछु कहलियन्हि जे हमर गुजर कोना होएत, छह टा बेटा आ एक टा बेटी अछि तँ हुमायूँक मृत्युक दोष हमरा माथपर दए हमर मुँह बन्न कए देल गेल।
-“ तीनू भाँएक मुँह हुमायूँक समक्ष खुजैत नहि छलन्हि मुदा हुनकर मृत्युक बाद हुनकर विधवाकेँ हिस्सा नहि देबऽ लेल तीनू भाँय सभ तरहक उपाय केलन्हि। हम नैहर जा कए अपन भायकेँ बजा कए अनलहुँ। पंचैती भेल आ फेर अँगनाक कातमे एकटा खोपड़ी अलगसँ तीनू भाँय बान्हि देलन्हि,
हमरा आ हमर बच्चा सभक लेल। धान, फसिल सभ सेहो जीवन निर्वाहक लेल देबाक निर्णय भेल। हम चरखा काटए लगलहुँ। से कपड़ा-लत्ता ओतएसँ तेना निकलि जाए।
“लिअ सलाइ”। दियादिनी आबि कहलन्हि।
“हँ”। भक टुटलन्हि करीमा बेगमक। दियादिनी सलाइ पकड़ाए चलि गेलीह।
“-एहि बेर बाढिक समाचार रहि रहि कए आबि रहल अछि। बाट घाट सभ जतए ततए डूमि रहल छलए, खेत सभ तँ पहिनहि डूमि गेल छलए। अहाँक पढ़ुआ काकी पहिनहिये सुना देने छथि जे एहि बेर वार्षिक खर्चामे कटौती होएत। काल्हि कहैत रहथि जे कनियाँ सभटा फसिल डूमि गेल, एहि बेर वार्षिक खरचामे कटौती हेतन्हि। हम कहलियन्हि जे एँ यै । जहिया फसिल नीक होइए तँ हमर खरचामे कहाँ कहियो बेशी धान दैत छलहुँ? ई गप अहाँक पढ़ुआ काका सुनि रहल छलाह। बजलाह-राँड़ तँ साँढ़ भए गेल। अहाँक पढ़ुआ काकीक इशारा केलापर ओ ससरि कए दलान दिशि बहरा गेलाह आ हम नोर सोंखि गेलहुँ। आइ गप निकलल तँ.......
माएक खिस्सा कहैत-कहैत नबी फेर रुकि गेल। आँखि आ कंठ दुनू संग छोड़ि रहल छलैक ओकर। किछु काल चुप रहि बाजल।
“ई खिस्सा भाए सभकेँ हम कहबो नहि कएने छियैक। सोचलहुँ जे कहबैक तँ मँगनीमे प्रतिशोध जगतैक। जे काज करबाक से नहि कएल होएतैक। आ सुनलियैक अछि जे हमर ओ मंडलबा भाए ओहि पढ़ुआ काकाक कहलमे आबि गेल अछि”।
नबी बकस फेर चुप रहल। भाए सभक प्रति ओकर प्रेम ओकरा सभक विषयमे बेशी बजबासँ ओकरा रोकैत छलैक। फेर ओ माएक खिस्सा शुरू कएलक।
“माए आगाँ बजैत रहलीह।
-“धुत्त दिनमे तँ खेनहिये छलहुँ, एहि अकल-बेरमे केना खेनाइ बनाएब। कनियाँ-मनियाँ छलहुँ तखने विधवा भऽ गेलहुँ आ अहू वयसमे तैँ सभ कनियाँ-काकी कहैत अछि। हुमायूँ कतेक मानैत छल अपन भाए सभकेँ। अपन पेट काटि भागलपुरमे राखि पढ़ओलन्हि छोटका भाइकेँ आ आब ओ पढ़ुआ बौआ एहेन गप कहैत छथि।
-“ सोचिते-सोचिते नोर भरि गेलन्हि माएक आँखिमे।
हमरा संग एकबेर हज करए लेल गेल रहथि। धन्य भारत सरकार जे हमरा सनक गरीब-गुरबाक माए सेहो हज कए आएल। आ अपन बड़की दियादिनीकेँ सुनबैत रहथि खिस्सा जे बहिनदाइ, ततेक भीड़ छलए ट्रेनमे, गुमार ततबे। गाड़ीमे बेशी मसोमाते सभ छलीह। एक गोटे कहैत छलीह जे जतेक कष्ट आइ भेल ततेक तँ जहिया राँड़ भेल छलहुँ तहियो नञि भेल छलए। हवाइ जहाजकेँ अम्मी गाड़ी कहैत छलीह।
-“फेर ओहि भदबरियाक रातिमे हमर अम्मी करीमा बेगमक मुँहपर बाड़ीक हहाइत पानि आ चारसँ टपटप चुबैत पानिक ठोपक आ घटाटोप अन्हारक बीच कनेक मुस्की आबि गेलन्हि। हमरा काकाक दलानपर जाए लेल कहलन्हि जतए आर भाए बहिन सभ छल।
-“ सोचिते-सोचिते खाटपर टघरि गेलीह करीमा बेगम, भोर होइत-होइत बारीक पानि बान्हपरसँ अँगना दिस आबि गेल।तीनू भैयारी अपन-अपन हिस्साक आंगन भरा लेने छलाह से सभटा पानि सहटि कऽ हमर सभक धसल आँगनसँ खोपड़ी दिस बढ़ि गेल। घरमे चारि आँगुर पानि भरि गेल। भोरमे किछु अबाज भेल आ जे उठैत छी तँ खाटक नीचाँ पानि भरल छल, एक-कोठी दोसर कोठीपर अपन अन्न-पानिक संग टूटि कऽ खसल छल। आब की हो, बड़की दियादनीक बेटा सभसँ पहिने आबि कऽ खोज पुछाड़ि केलकन्हि, अबाज दूर धरि गेल छलए। सभटा अन्न-पानि नाश भऽ गेलन्हि। अन्न पानि छलैन्हे कोन? दू-टा छोट-छोट कोठी, ओकरे खखरी-माटि मिलाऽ कऽ दढ़ करैत रहैत छलीह हमर आम्मी।
-“ मुदा भोर धरि ओ हहा कऽ खसल आ मसोमातक जे बरख भरिक बाँचल मासक खोरिस छल तकरा राइ-छित्ती कऽ देलक। करीमा बेगम सूप लऽ कऽ अन्नकेँ समटए लेल बढ़लीह, हमर आँखिक देखल अछि।
-“ मुदा बाढ़िक पानिक संग पाँकक एक तह आबि गेल छल घरमे। सौँसे टोल हल्ला भऽ गेल जे देखिऔ केहन भैंसुर दिअर सभ छै, अपना-अपनीकेँ अपन-अपन अँगना भरि लए गेल अछि। मसोमातक अँगना तँ अदहासँ बेशी धकिआ लऽ गेल छलैहे, जे बेचारीक बचल अँगना अछि से खधाई बनि गेल अछि। बड़की दियादिनी सहटि कऽ अएलीह कारण दिआद टोलक लोक सभ आबए लागल रहथि। करीमा बेगमक सोंगरपर ठाढ़ घरक दुर्दशा देखि सभ काना-फूसी करए लागल रहए। अँगनाक एक कोनसँ दोसर कोन, अपन घरसँ दोसराक घर!
-“पानि पैसबाक देरी रहैक आ आस्ते-आस्ते हमर घरक एक कातक भीतक देबाल ढहि गेल। टोलबैया सभ हल्ला करए लागल जे करीमा बेगम भितरे तँ नञि रहि गेलथि। बड़की दिआदिनी खसल घर देखि हदसि गेलीह। बजलीह जे अल्ला रक्ष रखलन्हि जे सुरता भेल आ नबीक भाइ-बहिनकेँ घर लए अनलियैक नहि तँ दियादी डाह नहि बुझल अछि। सभ कलंक लगबितए अखने।
-“मुदा दियादिनी!
-“दियाद सभ सभ गप बूझि अपन-अपन घर जाए गेलाह। हम अम्मी लग अएलहुँ। मार्क्सवादी विचारक रही, कटिहारमे पढ़ैत छलहुँ। विधवा-विवाह, जाति-प्रथा सभ बिन्दुपर पढ़ुआ काकासँ भिन्न विचार रखैत छलहुँ। घरक नाम नबी छल मुदा स्कूल कॉलेजक नाम नबी बकस। मुदा घरमे कोनो मोजर नहि छल, कहल जाइत रहए जे पहिने पढ़ि-लिखि कऽ किछु करू।
-“ अम्मीसँ कतेक गमछा-झोड़ा भेटैत छल, चरखाक सूतक कमाइक। जय गाँधी बाबा, विधवा लोकनि लेल ई काज धरि कऽ गेलाह।
-“गाममे भोजमे खढ़िहानक पाँति आ बान्हपरक पाँति देखि विचलित होइत छलहुँ। जोन-बोनिहारकेँ बान्हपर बैसा कऽ खुआबैत देखैत छलहुँ आ बाबू-भैयाकेँ खढ़िहानमे। खढ़िहानमे बारिक लोकनि द्वारा खाजा-लड्डू कैक बेर आनल जाइत छल । बान्हपरक पाँतीमे एक बेर आ नहियो।
-“मुदा हमर अम्मी। की भेलन्हि हुनका। भाए बहिन सभ तँ ओम्हर अछि!”
-“अम्मी!!!!!!!!!!!!!!
-“हमर चित्कारसँ सौँसे टोलमे थरथरी पैसि गेल रहए। नहि नबी कानए नहि अछि कानल अछि तँ कोनो गप छैक।
-“नञि अम्मी। ई कोनो गप नहि भेल। किए हमरापर अहाँ भरोस छोड़ि देलहुँ। नबी बकस नाम छी हमर। पाँचो भाए आ छोटकी बहिनक भाए नहि बाप छियैक हम। मुदा अहाँ हमरापर भरोस छोड़ि चलि गेलहुँ। या अल्ला!!!!!!!!!!!”
-“टोल जुटि गेल मैयतक चारू दिश। के की सभ कएलक से नहि बुझलहुँ। अम्मीकेँ गुसुल (नहाओल) कराओल गेल। कफन पहिराओल गेल। जनाजाक खाट आएल। ताहिपरसँ माएक गाँधी चरखासँ बनाओल चादरि ओढ़ाओल गेल। तीनू काका आ हम जनाजाक खाअकेँ कान्ह देलहुँ। कब्रिस्तान लग ठाढ़ भए जनाजाक नमाज पढ़लहुँ आ अम्मीकेँ दफन कएलहुँ।
नबी बकस फेर चुप भए गेल। हम ओकरा टोकए नहि चाहैत छलहुँ। दस मिनट धरि ओ चुप्पे रहल आ हम बैसल रहलहुँ। फेर ओ बाजल।
-“अम्मीक मृत्युक चालीस दिन धरि शोक मनओलहुँ। आ वैह चालीस दिनक आराम हमरा एहो जोग बनेलक जे फेर पएरमे घिरणी लागि गेल। अम्मीक मृत्युक बाद पढ़ाइकेँ नमस्कार कए खाला लग आबि गेलहुँ, दिल्ली नगरियामे ।
नबी बकस अपन आँखि पोछि रहल छल। फेर दस मिनट ओ चुप रहल।
“नबी बकसकेँ अम्मीक इन्तकालक दिन लोक पहिल आ अन्तिम बेर कनैत देखने रहए। मुदा ई सभ आइ फेर हमरा आँखिसँ नोर चुआ देलक। ओकीलक तँ बियाहो नहि होइत रहए। सभ कहैत छल जे बुरबक छैक। मुदा जेना भीष्म पितामह धृतराष्ट्रक बियाह करेलन्हि तहिना हम एकर बियाह करबओलहुँ आ ई सभ कहैत अछि जे हम ओकरा नोकर जेकाँ रखैत छियैक”।
तावत कॉलबेलक घंटी बाजल रहए। ओकील नबी बकसक सोझाँमे आबि ठाढ़ भऽ गेल।
“भैया, सभ कहैत अछि जे हम बुरबक छी। काल्हि अहलिया (कनियोँ) केँ ई सभ यैह गप कहि देलकैक। ओ कहलक जे तोहर चिन्ता ककरो नहि रहए छैक, मुदा हम नहि मानलहुँ। से काल्हि हम कनेक लेट भए गेलहुँ। सरकेँ कहबो केलियन्हि जे देखैत छी जे ओ सभ आबैए आकि नहि। कनियो तँ सुधंगे ने अछि। आइ ओहो दियादिनीक गड़ा पकड़ि कऽ खूब कानल अछि। बुधियार सभ ने अहाँकेँ छोड़ि चलि गेल, मुदा ई बुरबकहा अहाँकेँ छोड़ि कहियो नहि जाएत भाए।
Wednesday, May 06, 2009
कथा- पराधीन सपनहुँ सुख नाहि – शेफालिका वर्मा
हे अय, अहाँ सभ तँ नारी-स्वतंत्रताक लेल एतेक बात बजैत छी, एतेक कथा करैत छी मुदा हम बाजी। हमर तेवर देखतहि ड्राइंगरूममे बैसल तीनू गोटे चौंकि गेलाह हमरा उत्साहित करैत बजलाह-हँऽ हँऽ बाजू, अहींक विचार हम सभ सुनी-
हमर मुँहपर तीन जोड़ आँखि अपन पाँखि फड़फड़ाव लागल। मुदा, हम निर्द्वन्द्व छलौं। लोक बजैत अछि जे स्त्रीकें परिवारमे बान्हि छान्हि कऽ बेड़ी पहिरा कऽ राखि देल गेल अछि। हम तै मतक एकदम विरुद्ध छी। "आँय-सुदेश बाबू चौंकि गेलाह, प्रभास अकचका गेल आ ई मन्द मुस्की संग बाजलाह-’तखन आगू मेम साहब?’ विधाता सृजन कयलनि स्त्रीक आ पुरूषक। दुनूक देहयष्टिक निर्माण मे भिन्न-भिन्न तत्त्वक योग अछि। दुनूक निर्माणक फारमूला भिन्न अछि।
"नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तलमे
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल मे-ई बात मिथ्या नय अछि।
भौजी, अहींक जाति तँ नारा उठौलक-ममतामयी दुर्बलताक लाभ उठा कऽ स्त्रीक बटरिंग कयल गेल अछि- आ अहीं बजैत छी...सुदेश विस्मित सन टेबुल पर अपन आंगुर ढक-ढक करैत बाजल। सुदेश बाबू, स्त्रीक निर्माण जाहि तत्त्वसँ कयल गेल अछि, ताहि लेल ओकर सभसँ उत्तम वा सहज स्वरमे कहल जाय जे ओकर यथोचित स्थान ओकर परिवार अछि। हम स्त्रीके राजनीतिमे भाग लेनाइ तखनै नीक बुझैत छी जखन ओ पारिवारिक नीति मे सफल होय। अपन हिन्दू धर्ममे सभ दिनसँ संयुक्त परिवारक परंपरा चलि आबि रहल अछि, एकटा मर्यादाक संग, एकटा गरिमाक संग। कोनो संयुक्त परिवार बिना कोनो गृहनीति वा राजनीति मे नहि चलि सकैत अछि। गृह संचालनो पालिटेक्से अछि। आ ओहि राजनीतिक प्रधानमंत्री रहलीह स्त्री। कोनो संयुक्त परिवार रहबाक या टुटबाक मुख्य कारण स्त्रीए छथि। ओकरापर तँ समस्त परिवारक सुख-दुःख नीक बेजाय सभटाक भार रहैत अछि जे अपन त्याग आ सहिष्णुताक कारण स्त्रीए सोझरा सकैत अछि। तखने ने भरत सन भारतक सन्तानो पैदा कऽ सकैत अछि। ओकर प्रकृतिए ताहि प्रकारक अछि जे ओ सभ किछु सहि सकैत अछि-रौ छाहरि नोर-मुस्कान, हँसी रूदन...
दीदी, यू आर ग्रेट-बीचमे प्रभास बाजि उठल-
ग्रेट हम की रहलौं प्रभास। पश्चिमसँ आय हवा आइ पूरबक स्त्रीके बेसहारा पात जकाँ उड़ौने जा रहल अछि। स्त्री अपन परिवारक राजनीतिमे एतेक असफल रहलीह जे आइ शत-प्रतिशत परिवार टूटि रहल अछि। कोनो घरमे चैन नहि।
डॉ० राजेन्द्रप्रसाद, नेहरू आदिक बाद कोनो भविष्यमे देशक संतान नय अछि जे अनुकरणीय होय। एकर मुख्य कारण थीक प्रधानमंत्रीक अयोग्यता।
भौजी बीचमे बात काटैत सुदेश बाबू बजलाह-अयोग्यता तँ अहूँ मे किछु अछि।
आब अकचकएबाक बारी हमर छल। एतेक कालमे हम सभ प्रधानमंत्रीक भाषण सुनि रहल छी, मुदा एक कप चाहक व्यवस्था एहि स्पेशल सभा लेल नय अछि...हीयर, हीयर-प्रभास थपड़ी पाड़ि उठल। हम लजा गेलौं-
ह ऽ ह ऽ शिवा, अहाँ हारि तँ मानलौं अपन सिगरेट जरबैत ई बाजि उठलाह। हम तँ साँचे अपन सोहमे बिसरि गेल छलौं जे एहिठाम हमर आत्माभिव्यक्तिक हुनका समक्ष शब्दमे, भाषणमे नहि, चाहक गरम गरम कप चाही, जाहि संग चाहल अनचाहल सभ घोंटा जाइत अछि।
भनसाघरमे चाह बनबैत छलौं। कानमे ड्राइंगरूमक गप आबि आबि अपने बैसि जायत छल।
हिनकर स्वर छल...शिवाके हम चाहितो पालिटिसियन कहाँ बना सकलहुँ-हमर मोनमे हँसी आबि गेल हिनक सरल कल्पना पर। खुदा न खास्ता हम कोनो मंत्री बनि जइतौं तैं पाछाँ-पाछाँ एकटा पुर्जी लय हमरासँ भेंट करबो लेल बेहाल रहताह। पता नय-तखन हमर मोन केहेन रहत-"आ हम कल्पनामे डूबल छलौं। हमरा तँ स्त्रीकें नौकरीयो केनाय पसिन्न नय। जाहि घरमे पति पत्नी दूनू नौकरी करथि। दूनू थाकि हारि घर आबथि, संगे संग बालबच्चा सेहो स्कूलसँ थाकल ठेहिआयल घर आबय-सभ एक दोसरापर बिगड़ल, खौंझायल। घर के कोनो व्यवस्था नय, कोनो सलीका नय, ओहि घरक की होयत? नौकरपर घर छोड़ल जाय तँ जे घरमे वस्तु अछि, सभ स्वाहा। बच्चा सभ स्नेहक अभावमे, ममत्वक अभावमे सुखा जाइत अछि, ओकर प्रकृति रूच्छ भए जाइत अछि...कतेक घर हम देखने छी आ दुःख होयत अछि जे दू पैसा यदि पति कमाइत अछि तँ ओ नोन रोटी खाय किएक नय संतोष करैत अछि। आवश्यकत तँ अनेक वस्तुके चाहब, हेबे करत। जावत संतोष नहि तावत आनंद नहि। आफिसक थाकल ठेहिआयल पति जखन घर अबैत अछि, बाल बच्चा भूखल पिआसल अबैछ, तखन स्त्री अपन घरके नेहक कान बनौने, एकटा स्वर्गक मुस्कान अधर पर नेने पलक पाँखि दरवज्जा पर बिछौने रहैत अछि। पत्नीक अधरक मुस्की देखैत पतिक सभ थकान दूर, माताक स्नेहिल बाँहि भेटैत देरि कि मुरझायल मौलायल नेना हरिअर भए जायत छैक। एक स्त्रीक लेल एहिसँ पैघ गौरव की। भौजी-चाह बनबैत छी कि कविता कऽ रहल छी-सुदेश बाबूक स्वरसँ हमरामे चेतना भरि गेल। चारि कप चाह थोड़ेक निमकी प्लेटमे राखि ड्राइंगरूम अबैत छी। ठहाकाक गरमीसँ कोठरी उसनाइत छल। थ्री चीयर्स फॉर दीदी-निकीक प्लेट देखैत प्रभास उछलि गेल-लांग लीव आवर प्रधानमंत्री-चाहक कप उठबैत सुदेश बाबू बजलाह।
हौ-तोरा सभ हमर घरके रहऽ देबहक कि नय? देहक फुला-फुला कऽ दिमाग आसमान पर चढा। हिनकर स्वर पर हम हिनको दिसि चाहक कप बढ़यलौं आग्रह मिश्रित कर्तव्यक संग।
जे कहऽ, विशेष की कहू। तों बड्ड फारचुनेट छह। जाहि ठाम सेक्रेटरिएटक बाबूगिरी करैत करैत लोक असमयमे बुढ़ा जायत अछि-ओकर कोनो भविष्य नय, कोनो अतीत नय-समरस, समतल जीवन, ताहिठाम तोहर घर एतेक प्राणवंत, एतेक जीवंत रहैत छह। एकर प्रत्यक्ष प्रमाण भौजी छथुन, नो डाउट। सुदेश बाबू चेहराक लकीर गहराय गेल-भरि दिन खटि मरि घर जाइत देरी वएह हरहर-खट खटेनाय अछि। ओ नय अछि। अरे भाग्यवान, पूर्णिमाक दिन तँ सभटा दरमाहा, अहींक हाथमे दऽ दैत छी, आब अहाँ सम्हारू। हम ककर जेब काटब, ककर गर काटब मुदा नय, आइ फल्लां ओतऽ एतेक बढिया शरबत सेट आयल अछि, फल्लाँक कनिया नीक नुआ पिन्हने अछि। एहि ठाम तँ शरबत राखबाक उपाये नय आ शरबत सेट एकटा विद्रूपता भरल स्वर छल सुदेश बाबूक।
कोठलीमे एकटा गंभीर उदासी पसरि गेल ओह, सुदेश बाबू, ई कोन रूदनक गान लऽ बैसलहुँ-प्रभास अपन चहकी सँ उदासी तोड़बाक प्रयत्न केलक-सभ क्यों तँ एके बाटक बटोही थिकहुँ। आ हमरा संग-एहि विग्रह बाबू सभक बिना तँ एहि देशक, एहि सरकारक कोनो काज नहि चलऽ वाला छैक। सरकारक इमारतक न्यों हमही थिकहुँ। ने आगॉं किछु उन्माद आ नय अतीतक अवसाद। छोडू ओ सभ-प्रभासक मजाको सँ सभ जेना काँपि गेल।
सुदेश बाबू-ई एकटा निसांस लैत बजलाह - हम तँ सरिपों भागवंत छी। मुदा, शिवाक समक्ष स्वयंकें अपराधी बुझैत छी। आय दस बरीस ब्याहक भऽ गेल मोन नय अछि जे कहियो एक खंड नूआ आ कि कोनो वस्तुक फरमाइश केने होयत। तीन तीन बच्चाक पढाई आ पटनाक खरचा। कहियो कोनो शिकाइत हमरा लग नय कयलनि। कतेक बेर मूड खराब रहैत अछि, आफिसक तामस हिनकापर उतारि दैत छी मुदा-शिवा घरमे टेपरिकार्डर जकाँ चलिते रहैत छथि। अहॉं देखिते छी जे हिनकर एहि गुणक कारणें दोस्त सभ हमरा घेरने रहैत छथि। करवनो कखनो हिनक ऐ गुण सँ हमरा ईर्ष्या भऽ जायत अछि-
कनखियाकऽ हमरा दिस तकैत ई हमरा कचकचौलनि। बेस-बेस, बड़ भेल। बड़ सुन्दर भाषण प्रेसिडेन्टक रहल। हम थपड़ी पाड़ैत बाजलहुँ। ई खिसिया कऽ चुप भऽ गेलाह। वातावरण पुनः हल्लुक भऽ गेल। दीदी, एकटा बातक उत्तर हमरा दैए दिअऽ। आठ बाजि रहल अछि। आब हम सभ चलि जायब-प्रभासक उत्सुक नयन दिस हम प्रश्न वाचक दृष्टि देलहुँ।
एक क्षण लेल मानि लिअऽ दीदी, अहाँ ऐहि देशक प्रधानमंत्री, भऽ जायब तँ की करब?
हद भऽ गेल प्रभास जी। अहाँ तँ मजाक करऽ लगलौं-हम लजा गेलहुँ। नहि-नहि भौजी, सुदेश बाबू बाजि उठलाह-"आब तँ एहि प्रश्नक उत्तर अपन बुद्धिमती घरनीक भाषणमे सुनबे करब। प्लीज भौजी-
अरे शिवा, बाजू, बाजू जे जमौनाई अछि, एहि चंडाल चौकड़ीमे जमा लिय। फेर ई मौका नय आओत। ईहो गपक गुदगुदी हमरा लगबऽ लगलाह।
हम कने संयत भेलहुँ-देखू, जखन अहाँ सभ पुछैत छी तँ अपन आन्तरिक विचार हम कहैत छी। भारत ग्राम प्रधान देश अछि। एहि देशक उन्नति तखने होयत जखन गामक उन्नति होय। हम सभसँ पहिलुक नियम बनबितहुँ कोनो मंत्री कोनो बाहरमे आम सभा नय कऽ सकैत अछि। ओ जखन कोनो मीटींग वा सभा करैथ देहातेमे।
हिनकर ठोरपर हँसी पसरि गेल। सुदेश आ प्रभास सरल शिशु जकाँ हमर कथन आत्मसात कऽ रहल छलाह-से किएक भौजी?
एकर बहुत कारण अछि सुदेश बाबू। सभसँ पहिने अन्हारमे पड़ल गामक लोक देखत जे हमर देशक कर्णधार के छथि जिनका हम प्रतिनिधि चुनि के पठौने छी। जनतामे नवीन उत्साह जागत। कोनो ग्रामके सड़कक व्यवस्था नहि छैक। यदि कोनो मंत्री कोनो ग्राममे अपन सभा राखैत छथि तँ अधिकारीगण ओहि ग्राम धरि पहुँचबा लेल सड़क बनवाय देताह। समस्त गामक सफाई भऽ जायत। जाहि ढंगक दौरा मंत्रीगणक रहैत छनि, रोज कोनो ने कोनो मंत्री, कोनो ने कोनो गामक दौरा करताह आ तखन देखतहि देखतहि सभ गामक काया पलट भऽ जायत। सुदेश बाबू, जा धरि ग्राम नहि उन्नति करत, ता धरि देश नय उन्नति करत।
भौजी एतेक बात अहाँ कतऽ सँ सीखने छी-सुदेश बाबू विमोहित छलाह। ओहि दिन चूड़ा वाली आयल छली सुदेश बाबू। सौंसे देहमे हड्डी पर चाम लटकल। हम सभ कोटामे जानितो नय छी की आबैत अछि आ की भेटैत अछि? एक मुट्ठी चीनीयो बाल बच्चा कोटा महक नय खेलक। हमरा सभ लेल कोन देवता आ कोन सरकार? क्यो नहि-हमर छाती मे आगि धधकि गेल छल सुदेशबाबू-आँखि मे जल-
माँ माँ आठ बरीसक रींकु हमर कोरसँ झुलि गेल- माँ भूख लागल अछि...
एतेक सुन्दर साँझ लेल धन्यवाद भौजी-
हँ दीदी सरिपों- दूनू गोटे उठैत बजलाह।
हँ भौजी सभ किछु, आ जे भौंजीके अनलक से किछु नहि-
अहाँ दीदी से धन्यवाद लऽलेब-प्रभासक उक्ति संग एकटा ठहाका अन्धकारमे विलीन भऽ गेल।
हमर जिनगी, कोन घाटी, कोन पर्वतमाला, कोन अरण्यमे गुजरि रहल अछि, केओ जनैत नय अछि। ड्राइंगरूमक फिलासफी आ जिनगी दूनूमे कतेक अन्तर अछि। जिनगी जिनगी अछि जकर अपन सिद्धान्त अछि, अपन नियम अछि, अपन कानून अछि लोकके प्रताड़ित करबाक, लोकके रूदनक सरगम सुनयबाक, लोकके दुःख पहुँचएबाक-ताहिमे हमर जिनगी? जितगीसँ फराक एक आर जिनगी अछि, जाहि ठाम आँखिक आकाशमे सपनाक इन्द्रधनुष उगल रहैत अछि। सभक दुःखके अपन दुख बनाय घंटो ओकरा लेल सोचैत रहैत छी। एतेक कुंठा आ संत्रासक मध्य हम हँसिते रहैत छी मात्र अपन परिवार लेल। स्त्री जावत जीबैत अछि खंड-खंडमे, दोसरा लेल बाँटल, ओकर अपन किछु नय होयत छैक-जखन ओकर मृत्यु होयत अछि तखन ओ संपूर्ण भऽ कऽ विदा होयत अछि। के व्यथा बुझत? सून आंगन, सून दुपहरिया आ छहक एक कप लेल हमर मोन छटपटा उठल। जहिना लोक शराबमे अपन दुःख बिसरि जायत अछि तहिना हम चाहक कपमे अपनाके विस्मृत कय हँसीक एकटा टंकी एकत्रित कय लैत छी। ओहि दिन ई कहने छलाह शिवा, अहॉं एतेक चाह नय पीबू। ई स्लो प्वायजनिंगक काज करैत अछि- हम चौंकि उठल छलौं/स्लो प्वायजनिंग, ई तँ हम कहियो नए सोचने छलौं। ठीके तँ अछि। तखन तँ मॄत्यु दिसि शीघ्र बढ़बाक हमर प्रयास भीतरे भीतर-शतप्रतिशत सफल भऽ जायत। ई स्लो प्वायजनिंग काज करैत? हमर माथ भारी भऽ गेल। अपनासँ भगवाक प्रयास हम करैत छी-एकान्त हमरा अपनामे लील लैत अछि-शिवा, अहाँ कोनो कॉलेज ज्वाइन कऽ लियऽ। हिनक मोन हमर मोनक सँ संवेदनशील भऽ उठैत अछि-भरि दिन एकसर घरमे किछु सोचैत रहैत छी- हम हुनक मुँह बन्न कऽ दैत छी नय-नय हमरा अपना घरमे खूब मोन लगैत अछि।
मुदा, नय हम स्वयं के बहटारैत छलौं। हमर परिवारके ककरो कोनो चिन्ता नय होय आ अपनाके कुशल सिद्ध करबा लेल हम सभके खुश राखबाक प्रयत्न करयऽ लागलौं। जनैत छी, एक आदमी सभके खुश नय राखि सकैत अछि मुदा हमर ई प्रयास। प्रतिफल भीतरे भीतर हम टुटैत गेलहुँ, कतहु बड़ दुःखी रहऽ लागलौं। जनैत छी, महगी बड़ बढ़ि गेल अछि। जोड़ैत छी तँ आमदनीसँ बेसी खर्चे भऽ जायत अछि। कहियो-कहियो लगैत अछि दुनियाक जतेक अपराध अछि, जतेक दुर्भाग्य अछि, सभक मूलमे हमही छी। सभटा अनर्थक जड़ि हमही छी। आ हमर मोन दस बरीस पहिलुक विस्मृत अतीतक अन्हार प्रकोष्ठ जकरा हम एकदम बिसरि गेल छलौं, प्रायः अवचेतनक दुआरि खोलि आस्ते से आबि गेल-जखन हम द्विरागमनमे सासुक पएर छूने छलौंह, झनकारैत स्वर सासुक सुना पड़ल- हँऽह, दान दहेज किछु नय कथीपर पएर छूब? अहाँ सभक लक्षण तँ हम पहिनहि देख लेने छलौं। कोन डकैत सभक फेरमे पड़ि गेल छी-हम कानऽ लागल छलौं। हम नय बुझैत रही जे एहन दुर्व्यवहार हमरा संग किएक भऽ रहल अछि? ई तँ साँच अछि जे हमर बाबूजी दस हजार टाका, दान दहेज नय दऽ सकलाह-मुदा, तकर प्रतिफल की एतेक? हम साहसक केलौ अपन घरके अपन बनएबाक, अपन सासु ससुर, देआदिनी सभक स्नेही बनबाक। भरि-भरि दिन खटैत छलौं मुदा हमर सासु टोल-पड़ोसक संग हमर खिस्सा करैत छली। हम केकरोसँ घृणा नय कऽ सकलौं। जनैत रही जे घृणा घृणाकें जन्म दैत अछि। कहियो प्रेमकें जन्म नय दऽ सकैत अछि। भैया कहैत छलाह साँच पुतहु वएह थिकीह जे बेटी बनि सासुरमे राज करथि। मुदा, हम देखि लेलौं अपन समाज पुतहुकें कहियो बेटी नय मानि सकैत अछि। ओकरासँ खाली अपेक्षा रहैत छैक। हम बेटी बनऽ चाहलौं मुदा सासुक उपदेश आ तिरस्कार भेटल। एक दिन घरमे कोनो अप्रिय घटना भऽ गेल छल, जकर मूलमे हमरा राखल गेल, जखनकि हम जानितो नय छलौं कि की भऽ रहल छैक आ की भऽ गेलैक? तैयो हम सासुक पएरपर खसि पड़लौं-हमरा सँ अनजाने कोनो गलती भऽ गेल तँ माफ कय दिहथि। हमर नैहरक लोक जे लोक गलती केने होय मुदा हम तऽ आब हिनकर बेटी छियनि। आब तँ इएह हमर माए छथि। हिनकर खुशी हमर खुशी छी। अपन बेटी पर तमसाएल नय रहथु? आ हम फफकि-फफकि कानऽ लागलौं। पएर खीचैत माय बमकि उठल छलीह-
’हे हमर पएर तएर नय छूबू। एतेक नकलपचीसी हमरा पसिन्न नय। हमर बेटी सभक परतर करब कोन बूतापर? जतऽ गेल रूप आ धनसँ घर भरि देलक। माय बापमे हौंसले नय रहए। हौसला रहितैक तखन ने? बेटी भारी लागलैक हमरा घरमे फेकि देलक। हम कहियो प्रतिवाद नय केलौ। एकटा दहेजक कुप्रथा समाजक कोढ़क कारणें हमर ई गंजन होइत रहल। हुनकर लेल तँ आर बेटा बेटी छल मुदा हमरा लेल तँ एकटा वएह सास-ससुर फेर हम हुनकर बातक दुःख किएक मानी?
ठक-ठक ठक...क्यो केबाड़ खटखटौलक। सिनेमाक रील जकाँ आगू मे सभटा अतीत पसरि गेल। केवाड़ खोलैत छी ’मालकिनि, दूधक हिसाब कऽ दितियैक। हमर चेहरापर म्लान मुस्की आबि गेल-
’आब तँ साँझ पड़ल जाइत छैक। आफिससँ, स्कूलसँ एबाक बेर भऽ गेल। काल्हि हिसाब कऽ देब।’
दूधवाली प्रायः हमर म्लान चेहरा, नोरायल आँखि आ व्यथित अंग देखि मुस्की मारैत चलि गेल- ओह आय मालिक अओता तँ...टूटल चूड़ी देखि हास हमर अधर पर आबि गेल। एनामे अपन चेहरा अपने अनचिन्हार लागि रहल अछि। पाइप लग जा कऽ मुँह हाथ धोय अतीतकें अपनासँ अलग धकेलैत छी। सभ अबैत होयत, मुदा, हमर समस्त तन मनके अतीत अपन बाहुपाशमे कसने अछि। नय नय, अहाँ जाउ। हमरा जीबऽ दिअऽ प्लीज़। कहियो काल अहाँके की भऽ जायत अछि, जे एकटा उद्धत प्रेमी जकाँ हमरा आलिंगन बद्ध कयने रहैत छी? एतेक नय सताउ हमरा। हम अतीतक बाँहि अपन तन मोन परसँ हँटबैत रहलौं-हिनका एबासँ पहिने, सुदेश, प्रभासके एवा सँ पहिने अतीत कें भगाबैक प्रयासमे रहलौं-ठक...ठक...ठक...
मेम साहब-ई तरकारीवालाक स्वर छल। मोन जेना फेर चंचल भऽ आर्थिक जगत मे आबि गेल-
’मेमसाब, पहिलुका पैसा दऽ दैतियैक-’पैसा-पैसा-पैसा। विग्रह बाबू सभक राजमे मासक पन्द्रह-बीस तारीखसँ अमावस्या शुरू भऽ जाइत अछि। पेटीमे देखैत छी पन्द्रह टाका मात्र बाचल अछि। पाँच टाका दय देबैक तँ बचल दस टाका आ मासक शेष दिन आर-
आइ दऽ दियऊ। बच्चा सभ लेल आटा कीनने जायब-हमर माथ पर झन्न सँ ओकर करूण स्वर लागल-उठा कऽ पाँच टाका ओकरा दऽ देलहुँ। मोन पड़ल पचीस टाका भोरमे हिनका देने छी। मोन किछु ठाढ़ भेल। कहुना मिलाय जुलाय-अमावस्याक दिन काटिए लेब-हमर मोन पुनः हल्लुक भऽ सिमरक फूल जकाँ मुक्त पवन संग बिहरऽ लागल। सभ बच्चा जलखै कय खेलएबा लेल चलि गेल। ड्राइंग रूममे आइ ई असगरे रहथि। वातावरण सर्द छल, कोनो चौकड़ी, नय कोनो फिलासफी, कोनो डायलाग कोनो भाषण किछु नय छल। हुनक चेहरा भाव शून्य छल।
’की बात नय शिवा, थाकि गेल छी।’ ’चाह बनाय दिअ की?’
’चाह?’ कनि हँसैत बजलाह-अहाँ अपना रूममे शिवा हमरा बकसि दिअऽ।’
छीः की बजैत छी।’ हम एक गिलास नेबि पानि हुनका आगू राखि दैत छी-एकटा बात बाजी-’हम हँसिते-हँसिते बाजलौं। हम जनैत छी जे हिनको साइकोलौजी विचित्र अछि। दोस्त सभ लग एकदम सहज रोमांटिक मूडमे रहैत छलाह। एकसर हमरा लग? सौंसे संसारक टेंशन हमही भऽ जायत छी। हमर चेहरा पर अपन दृष्टि निक्षेपमे लैत ’अहाँक संगमे किछु टाका अछि?’
नय नय, नय अछि। की बात थीक? हिनका स्वर विचित्र छल
दूधवालीके टाका देबाक अछि।
’आब दस टाका...’
मुँहक बात मुँहे रहल-
सभटा टाका खतम भऽ गेल। बाकी दस दिन आर मासक बाकी अछि। कोना चलत? की भऽ जाइत अछि टाका सभ?हमरा संग किछु नय अछि। अहाँ जाउ, आ ई पएर पटकैत, बड़बड़ाइत विदा भऽ गेलाह।आ तखन हमर मोने अपन सभ हँसी, सभ फिलासफी, सभ डायलाग, भाषण, सभ सिद्धान्त मुँह दुसैत नेना सन लागल। कतऽ गेल सुदेश आ प्रभास। प्रत्येक पुरुषक दुई रूप होयत अछि। जकरा झेलऽ पड़ैत छैक स्त्रीके। हम अपना लेल नय, घरेमे खर्च करैत छी-टाका हुनकर जेबमे ओहिना पड़ल छल। हम अपन प्रतिवाद अपने भऽ गेलौं। हमर हृदयक अन्तरतमनसँ जेना प्रतिरोधक एकटा चीत्कार क्षण भरि लेल उठल-स्त्रीक आर्थिक स्वाधीनता अत्यावश्यक अछि। जाहिसँ एक एक पाइक लेल ओकरा मर्दक मुँह नहि ताकऽ पड़य। आर्थिक स्वाधीनता-आह ’पराधीन सपनहुँ सुख नाहि’ रोम-रोममे प्रतिरोध उठऽ लागल।
Wednesday, April 22, 2009
विधिक विधान-कथा- लिली रे
झुग्गीमे सबसँ पहिने चटनी पीसैत छल। तकरा बाद स्टोव पर गेंट क गेंट रोटी पकबैत छल। ओकर बेटी तकरा बिल्डिंग साइट पर बेचैत छल। कुली-मजदूर टटका रोटी कीनए। चटनी मुफ्त भेटइ।
हिसाब-किताब पूनम राखए। ओ पाँच क्लास तक पढ़लि छल। स्कूलमे पाँचहि क्लास तक छलै। से भ’ गेलइ त’ पानमती पूनमकें काज लगा देलकै। बासन माँजब घर पोछब नइं। पूनम करैत छल कपड़ामे ‘इस्त्राी’। फाटल कपड़ाक सिलाइ, बटन टाँकब। इसकूलिया बच्चाक माइ लोकनि पूनमकें मासिक दरमाहा पर रखने छलीह। सस्त पड़नि।
चोरी, मुँहजोरी, दुश्चरित्राता-तीनूमे कोनो दोष पानमतीमे नइं छलै। झुग्गी कालोनीक लोककें ओकरासँ ईष्र्या होइ। नियोजक लोकनि लग पानमती सम्मानक पात्रा छल। पूनम आठ वर्षक छल जखन पानमती ओहि इलाकामे आएल। पचास टाका मास पर झुग्गी किराया पर नेने छल। आब ओकरा चारि टा अपन झुग्गी छलै। एकमे रहै छल। तीनटा किराया लगौने छल। सौ रुपैया मास प्रति झुग्गी। आब इच्छा छलै एकटा सब्जीक दोकान करबाक। दखली-बेदखलीवला नइं, रजिस्ट्रीवला दोकान। जकरा केओ उपटा नइं सकए। दुनू माइ-बेटी रुपैया जमा क’ रहल छल। बेटी समर्थ भ’ गेल रहै। तकर बियाह करब’ चाहैत छल। नीक घर-वर। विश्वासपात्रा।
पूनम पानि भरबा लेल लाइनमे ठाढ़ि छल। बुझि पड़लै जेना केओ ओकरा दिस ताकि रहल होइ। मुँह चीन्हार बुझि पड़लै। अधवयसू व्यक्ति। उज्जर-कारी केश। थाकल बगए। ताबत लाइन आगू घसकि गेलइ। पूनम सेहो बढ़ि गेल। आगू पाछू लोकक बीच अ’ढ़ क’ लेलक। ओ लोक सेहो दोसर दिस मूड़ी घुरा लेलक।
पूनम सेहो तीन घरमे काज करैत छल। मुदा ओकरा देरीसँ जाइए पड़ै। तहिना देरीसँ अबैत छल। तीनू ठाम चाह-जलखइ भेटै। माइ-बेटी तीन ठाम नइं खा सकए। एक ठाम खाए, बाकी ठाम चाह पीबए। जलखइ’क पन्नी घर आनए। बेरहट रातिमे चलि जाइ। कहियो काल भानस करए।
पूनम जलखइ ल’ क’ बहराए त’ माइ ठाढ़ि भेटइ। पूनमसँ दुनू पन्नी ल’ माइ घर घूरि जाइ। माइ जाबत अदृश्य नइं भ’ जाइ, पूनम देखैत रहए। तखन पुनः काज पर जाए।
फेर ओएह व्यक्ति सुझलइ। ओ पूनमकें नइं, पानमतीकें अँखियासि क’ देखि रहल छल। दूरहि दूरसँ। पानमती निर्विकार भावसँ जा रहल छल।
तकरा बाद ओ व्यक्ति नइं सुझलइ। पूनम सेहो बिसरि गेल।
पानमती स्टोव पर रोटी पकबैत छल। गरमीमे पसीनासँ सराबोर भ’ जाइत छल। काज परसँ घूरए त’ सबसँ पहिने अपन झुग्गीक पाछू पाॅलिथिनक पर्दा टाँगए। पानिक कनस्तर आ मग राखए। तकरा बाद माइ’क बनाओल रोटी-चटनीक चंगेरी उठा साइट पर बेच’ जाए। पानमती स्टोव मिझा, स्थान पर राखि, नहाइ लेल जाए।
ओहि दिन रोटी कीननिहारक जमातमे ओहो व्यक्ति छल। सभक पछाति आएल। रोटी कीनबाक सती अपन गामक भाषामे बाजल-माइ कि एखनहुँ सुकरिया कहइ छउ? पूनम अकचकाइत पुछलकइ-अहाँ के छी?
-तोंही कह जे हम के छियौ तोहर?-फेर ओएह भाषा।
-बा... बू... !-पूनम कान’ लागल।
-विधिक विधान! जहिया तकैत रहियौ, नइं भेटलें। आशा छुटि गेल त’ भेट गेलें। अकस्मातहि।
-तों चुपहि किऐ पड़ा गेलह? हमरा लोकनिकें कतेक तरद्दुत उठाब’ पड़ल-पूनम कनैत बाजल।
-विधिक विधान। हमर दुर्भाग्य। भेल जे आब एहि ठाम किछु हुअ’ वाला नइं। आन ठाम अजमाबी। गम्हड़ियावाली काज करैत छल। तइं भेल जे तोरा लोकनि भूखल नइं रहबें। कहि क’ जएबाक साहस नइं भेल। घूरि क’ अएलहुँ त’ ने ओ नगरी, ने ओ ठाम। गउआँ सभक ओतए खोज लेब’ गेलहुँ त’ सुनलहुँ जे ओ बाट बहकि गेल। गाम नइं जा मजूरक संग चल गेल। कोनो पता नइं छलइक ओकरा सबकें।
धत्! हमर माइ ओहेन नइं अछि।-पूनमकें हँसी लागि गेलइ। छलछल आँखिसँ हँसैत बाजल, गामक लोक कंठ ठेका देने रहइ गाम घूरि जाइ लेल। जबर्दस्ती ल’ जाइत। तइं माइ नुका क’ मंजूर मामाक मोहल्लामे आबि गेल।
-मंजूर कत’ अछि?
-पता नइं। मामा बड़ जोर दुखित पड़ि गेलै। दवाइ दारूमे सब पाइ खर्च भ’ गेलै। रिकशा सेहो बेच’ पड़लै। पाछू नोएडामे ओकरे गामक कोनो साहेब रहथिन। सएह क्वार्टर देलखिन। रिकशा कीनै लेल पैंच देलखिन। शर्त रहनि जे मेमसाहेबकें स्कूल पहुँचाएब, आ घर आनब। तकर बीचमे अपना लेल चलाएब। मेमसाहेब डी. पी. एस.मे टीचर छली। पहिने भेंट कर’ अबैत रहै। एक दूू बेर मामी, बच्चा सबकें सेहो अनने छल। आब त’ कत्ता वर्ष भ’ गेलइ। कोनो पता नइं। मंजूर मामाक झुग्गी हमरा लोकनि कीनि लेलहुँ।
-वाह।
-तीन टा झुग्गी आर अछि। किराया पर लगौने छी। सबटा माइक बुद्धिसँ। तों की सब कएलह?
-से सब सुनाबी त’ महाभारत छोट भ’ जेतइ। हम अभागल, दुर्बल लोक।
-चल’ घर चल’। माइ बाट तकैत होएत।
पानमती नहा क’ भीतर आबि चुकल छल, जखन पूनम आएल।
-माइ, देख त’ हम ककरा अनलिऔ? चीन्हइ छही?
पानमती चीन्हि गेलै। मुदा किछु बाजल नइं।
-कोना छें?-ओ पुछलकइ।
-एतेक दिनसँ जासूसी चलैत रहइ, बूझल नइं भेलइ जे कोना छी।-पानमती अपन पैरक औंठा दिस तकैत नहुँ-नहुँ बाजल।
-तकर माने जे तोंहू चीन्हि गेलें।-ओ हँसबाक प्रयास कएलक।
पानमती किछु उत्तर नइं देलकै। ओहिना अपन पैरक औंठा दिस तकैत रहल। पूनमक ध्यान ओहि दिस नइं गेलै। ओ अपनहि झोंकमे छल-आब लोकक सोझामे माइ पूनम कहैत अछि। मुदा जखन दुःखित पड़ैत छी त’ कह’ लगैत अछि-हमर सुकरिया, नीके भ’ जो।-माथो दुखाइत त’ एकर हाथ पैर हेरा जाइत छै। कौखन नीको रहै छी त’ दुलार कर’ लगैत अछि। मारि मलार-हमर अप्पन सुकरिया। सुकरी! की-कहाँ नाम दैत अछि। पूनम नाम त’ तोरे राखल थिक ने? स्कूलमे। नइं? के रखलक हमर नाम सुकरिया?
-गाममे। तोहर जन्म शुक्र क’ भेलौ, तें सब सुकरिया कह’ लगलौ। हमरा केहेन दन लागए। मुदा ओतेक लोकसँ के रार करए। एत’ अएलहुँ त’ नाम बदलि देलियौ। तोहर नाम पूनम। तोहर माइक नाम पानमती। आ’ अपन नाम जागेश्वर मंडल।-पूनम ठठा क’ हँस’ लागल। जागेश्वरकें सेहो हँसी लागि गेलै। पूनम बाजल-कतेक सुखी रही हमरा लोकनि तहिया।
जागेश्वर लए सबसँ सुखक समय रहै ओ। मालिक सीमेण्ट, ईटाक खुचरा व्यापारी छल। अपन साइकिल ठेला छलै, जाहि पर समान एक ठामसँ दोसर ठाम पठबै। कइएक ठाम छोट छोट कच्चा गोदाम बनौने छल। तहीमे एक गोदाम लग एकटा झुग्गी जागेश्वर लेल सेहो बना देलकै। जागेश्वर अपन परिवार ल’ अनलक। सामनेक कोठीमे पानमतीकें बासन मँजबाक काज भेटि गेलै। म्यूनिसिपल स्कूलमे पूनम पढ़’ लागल।
मालिक रहै छल दक्षिण दिल्लीमे। अपन कोठी छलनि। तहीमे एक राति हुनकर परिवार सहित हत्या भ’ गेलनि। पुलिस आ वारिस लोकनिक गहमागहमी हुअ’ लागल। गोदामक जमीन मालिक केर नइं छलनि। जागेश्वरकें झुग्गी छोड़’ पड़लै। जाहि घरमे पानमती काज करैत छल, तत’ जगह खाली नइं छलै। दोसर एक कोठीमे टाट घेरि, टिनक छत द’, जगह देबा लेल राजी छलै, यदि पानमती ओहि कोठीक काज करब गछए। पानमती दुनू कोठीमे काज कर’ लागल।
जागेश्वरकें काज नइं भेटि रहल छलै। नब मालिक पुलिसक झमेला समाप्त होएबा तक प्रतीक्षा कर’ कहलखिन। झमेला अनन्त भ’ गेल छल। ओ मंजूरकें पकड़लक। मंजूर बाजल, हमर इलाकामे मजूरी बड़ कम छै। ओहि ठाम अधिकांश लोक नोकरिया। स्त्राीगण सब सेहो आॅफिस जाइत छथि। तैं ओहि ठाम घरक काज कएनिहारक मांग छै। पाइयो तहिना भेटै छै ओहि सब घरमे। छह बजे भोर जाउ, नौ बजेसँ पहिने काज खतम करू। घरवाली अपस्याँत भ’ जाइत अछि जाड़मे। नागा भेल, त’ पाइ कटि गेल। हमरा पोसाइत त’ किऐ अबितहुँ एतेक दूर काज ताक’?
मंजूर प्रीतमपुरामे रहै छल। भिनसर बससँ उत्तर दिल्ली अबैत छल। जगदीशक संग मालिक केर साइकिल ठेला पर माल उघैत छल। साँझ क’ फेर बससँ घर घुरैत छल। ओहि ठाम मालिककें कोनो गोदाम नइं छलनि। मंजूर तीस टका मास किरायाक झुग्गीमे रहै छल। ओकर योजना छलै एकटा अपन रिक्शा किनबाक। तकर बाद अपन स्त्राीक काज छोड़ा देबाक।
मंजूरक योजना सुनि जागेश्वर सेहो योजना बनबैत छल। पानमती सेहो। जागेश्वरकें झुग्गीक किराया नइं लगैत छलै। तैं ओ अपनाकें मंजूरसँ अधिक भाग्यवान बुझैत छल। बुद्विमान सेहो। भविष्यमे ओ झुग्गी बनएबाक सोचैत छल।
-पहिने जगह सुतारब। ठाम ठाम झुग्गी बना किराया पर लगा देबै। तखन तोरा काज कर’ नइं पड़तौ।
-नइं, हम काज नइं छोड़ब। झुग्गी किरायासँ साइकिल ठेला कीनब। एकटा नइं कइएक टा। माल उघै लेल किराया पर देबै।
-मालिककें?-जागेश्वर कौतुकसँ पूछै। पानमतीकें हँसी लागि जाइ। पूनम सेहो हँस’ लागए।
किछु नइं भेलै।
फरीदाबाद तक बउआएल। ढंगगर काज नइं भेटलै। शुभचिन्तक सब दिल्लीसँ बाहर भाग्य अजमएबाक सलाह देलकै। अपनहुँ सएह ठीक बुझि पड़लै। पानमती कन्नारोहट करत, ताहि डरसँ चुप्पहि चल गेल।
पूनम नेना छल। तैयो ओ दिन मोन पड़ि गेलै। स्कूलसँ बहराएल त’ बाप फाटक लग ठाढ़ भेटलै।
-नोकरी भेटलह?-पूनम पुछलकै।
-भेटि जायत।
-कत’?
-बड़ी दूर। तों नीक जकाँ रहिहें। माइक सब बात मानिहें। जाइ छी।
-कत?
-काज ताक’-जागेश्वरक आँखि छलछला गेलै।
-नइं जाह।
-फेर आबि जएबौ।
जागेश्वर चल गेल। तीन मास जखन कोनो खबरि नइं भेटलै, त’ पानमती पूनमक संग रघुनाथ रिक्शवाला लग गेल। ओकरहि गामक रहै। रघुनाथ बाकी गौंआं सबकें खबरि देलकै। सब पहुँचलै। घर घुरि जएबाक सलाह देलकै। पानमतीकें नइं रुचलै। सब जोर देब’ लगलै। पानमतीकें मान’ पड़लै। तय भेल जे अगिला मासक आठ तारीख क’ जे जमात गाम जाएत, ताहि संग पानमती आ पूनम सेहो रहत। सात तारीख क’ लोक आबि क’ ल’ जेतै अड्डा पर। ताबत पानमती दुनू घरसँ अपन दरमाहा उठा लिअय।
दुनू मलिकाइन दिल्ली छोड़बाक सलाह नइं देलखिन। कहलखिन, काज ताकए गेल छौ, घुरि अएतौ। चाहत त’ आब एत्तहु काज भेटि जेतै। हमरा लोकनि देखबै।
-अपन लोकवेदक से विचार नइं छै। ओ आबि जाए त’ कहबै जे हमरा जल्दी गामसँ ल’ आबए।-पानमती बाजल।
मंजूर भेंट करए अएलैक। पानमती ओकर पैर पकड़ि लेलकै। कान’ लागल। बाजल-हमरा अपन इलाकामे ल’ चलू। ओहि ठाम काजक लोकक माँग छै।
माइकें कनैत देखि, पूनम सेहो माइक बगलमे लोटि गेल। माइ बात दोहराब’ लागल।
मंजूर अकचका गेल। बाजल-ओहि ठाम रहब कत’?
-झुग्गीक किराया द’ क’। जेना अहाँ रहै छी।
-झुग्गीक किराया आब बढ़ि गेलै अछि। पचास टाका मास। आ पचास टाका सलामी भिन्न।
-देबै। जे नुआ फट्टा अछि, बेचि क’ द’ देबै।
मंजूरक बहु किछु दिनसँ काज पर जाइ काल नाकर नुकर क’ रहल छलै। हाथ-पैर झुनझुनाइत रहै। बदलामे पानमती सम्हारि देतै त’ दरमाहा नइं कटतै।
सएह सोचि क’ मंजूर राजी भ’ गेल। पानमती तखनहि बिदा हेबा लेल वस्तु जात बान्ह’ लागल। रघुनाथकें खबरि दइ लए पूनमकें दौड़ा देलकै।
-रघुनाथ काका! हमरा लोकनि गाम नइं जाएब।
-किऐ?
-मंजूर मामा लग रहब।
रघुनाथकें तखन सवारी रहै। ओ अधिक खोध वेध नइं केलकै। जागेश्वर प्रीतमपुरामे कत्ता बेर छानि मारलक। ने मंजूर भेटलै, ने पानमती, ने पूनम। अपने लोकबेद जएबासँ रोकै। बेर बेर बुझबै-केओ ककरो संग भागत, त’ पुरान डीह पर थोड़े बसत। ओ त’ तेहेन ठाम जाएत, जत’ ओकरा केओ नइं चीन्हइ। केहेन मूर्ख छें तों।
-महामूर्ख छी हम-जागेश्वर घाड़ नेरबैत बाजल। पूनम सेहो घाड़ नेरबैत बाजल-नइं। तों कदापि मूर्ख नइं छह। झुग्गी बना क’ किराया लगएबाक विचार तोंही कएने छलह। हमरा लोकनि जे ठेला किनलहुँ, से जकरा चलब’ देलिऐ, सएह ल’ क’ भागि गेल। माइ त’ निश्चय क’ लेलक अछि, बिना रजिस्ट्रीक सब्जी दोकान नइं करत। आब तों आबि गेलह। तोंही दोकान चलएब’। आदना लोककें नइं देबै।
पूनम अपन माइ दिस तकलक। माइ अपन पैरक औंठा दिस दृष्टि गड़ौने ओहिना ठाढ़ि रहए। पूनमकें आश्चर्य भेलै। पूछलकै-माइ! तों किछु बजै नइं छें?
एक क्षण आर चुप रहि, पानमती बाजल-सब्जी दोकानमे देरी छै। रुपैया जमा हैत, जगह भेटत, रजिस्ट्री हैत-एखन त’ नाम पर लगैत बट्टा बचएबाक अछि।
-बट्टा?
-नौ वर्षसँ एहि इलाकामे छी। सब जनैत अछि जे हमरा एक बेटी छोड़ि, आगू पाछू केओ नइं अछि। तखन एकटा पुरुष क्यो।
-केओ एकटा पुरुष नइं। तोहर वर, आ हमर बाप थिक।
-केओ नइं मानत। सब आंगुर उठाओत।
-के आंगुर उठाओत? प्रति तेसर लोक जोड़ी बदलैत रहै अछि एतए।
-तइं त’ ककरो विश्वास नइं हेतै सत्य पर!-पानमती अइ बेर जागेश्वर दिस ताकि बाजल, बेटी लेल नीक घर वर चाहैत छी। एहने समयमे...
-माइ! एहेन कठोर जुनि बन। बाबू हारल थाकल अछि। कहियो त’ भरि गामक लोकसँ लड़ाइ क’ क’ हमरा लोकनिकें एत’ अनलक। बेटी-पुतोहुकें बाहर पठएबा ले ने तोहर लोकवेद राजी रहौ, ने बाबूके। बाबू नइं अनैत त’ गाममे गोबर गोइठा करैत सड़ैत रहितहुँ आइ।
-तोरा जनैत नीक दशा बनबै वाला तोहर बाप छौ। माइ जहन्नुममे देलकौ!
-नइं माइ, नइं। हमर तात्पर्य से नइं छल। हमरा सन माइ ककरो नइं छै।
-गामसँ अनलक ठीके। बैसा क’ नइं खुऔलक। तहू दिनमे बासन मँजैत रही। आइयो सएह करैत छी। तहिया दू घर काज करैत रही, आइ तीन घर करैत छी।
पूनमकें उत्तर नइं फुरलै। ओ दहो-बहो कान’ लागल। पानमती फेर अपन पैरक औंठा दिस ताक’ लागल।
जागेश्वर नइं सहि सकल। हाथसँ बेटीक मुँह पोछैत बाजल-चुप भ’ जो। माइसँ बढ़ि क’ तोहर हित-चिन्तक आन नइं हेतौ। ओकर बातसँ बाहर नइं होइ। ओकरा खूब मानी। चलै छियौ।
-नइं।-पूनम केर कोंढ़ फाट’ लगलै।
जागेश्वर बिदा भ’ गेल। पानमती ठाढ़िए रहल। पूनम अपन माइकें बड्ड मानैत छल। कहियो कोनो विरोध नइं कएने छल। दरमाहा बख्शीस जे किछु भेटै, माइक हाथ पर राखि देअए। माइ प्रति बेर ओहिसँ किछु पूनमकें दैत कहै-ले अपन सौख-मनोरथ लेल राख।
पूनम एकटा बटुआमे सौख मनोरथक रुपैया रखैत छल। पूनम फुर्तीसँ ओ बटुआ आ जलखैक एकटा पन्नी उठा बाहर दौड़ल।
जागेश्वर मंथर गतिसँ जा रहल छल। पूनम हाक देलकै-बाबू... कनेक बिलमि जा।-जागेश्वर थमि गेल। पूनम बटुआ ओकर हाथमे दैत कहलकै-ई एकदम हमर अपन पाइ थिक। तोरा लेल। जतबा दिन चल’, भूखल नइं रहिह’।
-नइं, नइं। ई राख तों, हमरा काज भेटल अछि।
-तैयो राखि लैह। तोहर बेटीकें संतोष हेतह। आ’ इहो लैह। जे घड़ी ने क’लमे पानि अएलहि अछि। हाथ मुँह धो क’ पेटमे ध’ लैह।
-एतेक मानै छें हमरा?-जागेश्वर आर्द्र कंठसँ बाजल।
-तों कोनो कम मानै छ’, हमरा राति क’ खिस्सा कहैत रह’। गीत सुनबैत रह’। कतेक दुलार-मलार करैत रह’। कहियो नइं बिसरल। ने कहियो बिसरत।-पूनम फेर कान’ लागल।
जागेश्वर हाथसँ नोर पोछि देलकै। बाजल किछु नइं। पूनम अवरुद्ध कंठसँ कहलकै, दू सौ सत्तासी नम्बर वैशाली नगरमे हम काज करैत छी। फाटक पर घरवैयाक नाम पता लिखल छै। ओहि ठाम चिट्ठी दिह’। नीक आ अधलाह सब हाल लिखिह’। आर एकटा बात...
-की?
-माइकें माफ क’ दिहक। कठोर मेहनति करैत-करैत ओकर मोन कठोर भ’ गेलै अछि। मुदा हमरा विश्वास अछि जे एक दिन ओ पिघलत। आ’ हमरा लोकनि पहिने जकाँ संग रह’ लागब, प्रेमसँ।
V.L.F. VIDEHA LITERATURE FESTIVAL
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