भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Saturday, April 18, 2009
कथा- माउगि - विभा रानी
माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि, बुझै छैं कि नञि गै!
हँ यो! तैं त' हम भेलहुँ माउगि - माने ओकलाइन, डाक्टराइन, मास्टराइन - आ हड़ही-सुड़ही सभ भेल मौगी, जनी जाति, हमरा आओर स' हीन। नञि बुझलियै। धुर्र जाऊ! हमरा आओर स' ऊपर भेलीह स्त्रीसभ, जेना किरण बेदी, मेधा पाटकर, फ्लेविया एग्नेस त' ई सभ, त' ओ सभ आ सभ स' ऊपर नारी - आदरणीया, परमादरणीया; जेना सीता, जेना सावित्री, जेना गांधारी, जेना कुंती, जेना द्रौपदी ... उँह! द्रौपदीक नाम नञि ली। हे! बड़ खेलायल मौगी छली। ओकरा नारीक पद पर प्रतिष्ठित केनाई! सत्तरि मूस गीड़ि के बिलड़ो रानी चललीह गंगा नहाए। ऋषि-मुनि आओर के कोन कथा - एतेक ताप-तेजबला साधु महातमा सभ आ माउगि के देखतही वीर्य चूबि जाइ छै; घैल में त' पात पर त' माछक पेट मे त' कहाँ दनि, कोम्हर दनि दान द' देइत छथि जेना हुनक वीर्य-वीर्य नञि भेलै कोनो रत्नक खान भ' गेलै।
छोडू ई सभ कथा-पेहानी। आऊ असली बात पर - माने माउगि पर। की कहू, कतबो ई नारी, स्त्री, माउगि, मौगीक वर्गीकरण भ' गेल हुअए, मुदा वास्तविकता त' ई छै जे मूलत: हम सभ माउगे छी - माउगि।
अहिना दू गोट माउगि छली, माने मध्यवर्गीय परिवारक दू गोट माउगि। अहाँ चाही त' सुभीता लेल हुनक नाम राखि सकै छी - दीपा आ रेशमा। दुनू पड़ोसिया। एकदम दूध मे चीनी जकाँ बहिनपा, दुनू के एक-दोसराक घरक हींग हरदिक पता, ई दुनूक घर में एक एकटा मौगी छल, कहि लिय' जे ओकर दुनूक नाम छल भगवती आ जोहरा आ ओ दुनू ई दुनूक ओहिठाम चौका बासन करैत छली। संयोग छल, जोहरा दीपा ओहिठाम काज करै छलै आ भगवती रेशमा ओहिठाम. हौजी, बड़का शहर मे ई सभ चलै छै। ओहिना, जेना आइ काल्हि शहर मे दंगा आ खून-खराबा फटाखा जकाँ फुटैत रहै छै आ लोक आओर तीमन-तरकारी जकाँ कटाएत रहै छै। की कहू जे जाहि शहर मे ई चारू माउगि रहै छली, ओहि शहर मे दंगा संठीक आगि जकाँ धधकि उठलै। आ सभ माउगि एके जकाँ भ' गेलै - मांगि आ कोखिक चिन्ता स' लहालोट।
आब जेना दीपे के देखियौ। शहर मे तनाव छलै। तइयो लोग अपन-अपन ड्यूटी पर निकलि गेल छलै। मुदा बेरहटिया होबैत-होबैत पता लागलै जे शहरक स्थिति आओर खराब भ' गेलै त' सभ किओ 'जइसे उडि जहाज कौ पंछी, पुनि जहाज पै आयौ' बनि बनि अपन अपन जहाज दिस पडाए लागल। रेशमा स' दीपा के ई समाचार भेटलै, ओम्हर ठीक दू बजेक बेरहटिया मे मनोज बाबू घर स' बहिरा गेलाह। दीपा टोकबो कएलकै - 'शौकत भाइक फोन आएल छलै रेशमा कत' जे शहरक हालति आओर खराब भ' गेल छै। लोग-बाग घर घुरि रहल अछि आ अहाँ सभ किछु जानि-बुझिक' तहयो बाहरि निकलि रहल छी। जुनि जाऊ।'
आब ओ मरद मरदे की जे अपना घरवालीक कहल राखि लियए। आ दीपा त' माउगि स' एक कदम आगां छली - स्त्री छली - पढ़ल-लिखल, सुंदर, स्मार्ट आ अपन बिजनेस सेहो चलब' बाली, जकरा मे सभटा आभिजात्य भरल रहनाइ अपेक्षिते नयिं, परम आवश्यक अछि। मुदा बावजूद एकटा सफल स्त्रीक, ओ छली त' माउगे।
सत्ते, कहियो कहियो के मायक कहल ई कथा मोन पडिये जाइत अछि जे माउगि कतबो पढ़ल हुअए कि सुंदर कि स्मार्ट कि बिजनेसवुमन, रहत त' माउगे आ तैं चूल्हि त' फूंकैये पडतै आ घर वा घरबलाक चिंता मे सुड्डाहि होबैये पडतै ओकरा। तैं रातुक एगारह बाजि गेलाक बादो मनोज के नहिं घुरलाक कारणे ओ अत्यन्त चिंतित आ परेशान छलै। ओकरा रहि-रहि क' बुझाए जे कॉलबेल बजलै, खने दरबज्जा फोलए त' खने खिड़की पर जा क' ठाढ़ भ' जाए। सांस भांथी जकाँ चलि रहल छलै आ मोनक सभटा परेशानी मुंह पर लिखा गेल छलै। मना कएलो पर जहन मनोज नञि रूकल छलाह त' कहने छलै - जल्दीए आएब। जवाब भेटल छलै -'आइ त' फल्ना डेलीगेशन आएल अछि।'
'माने रातिक एक-डेढ़ बजे धरिक छुट्टी।' दीपाक माउगि ओकर भीतरे-भीतरे बाजलै। तहन कियैक एगारहे बजे स' एतेक बेचैनी छै? ओकरा त' दू बजे रातिक बाद परेशान होएबाक चाही। मनोज बाबू लेल दू बजे रातक घुरनाई कोनो नव कथा त' छलै नञि! मुदा दंगा जे नएं कराबए।
हारि-थाकि क' ओ घर स' निकललै आ अपना बगले बला कॉलबेल दबेलकै। अहू मे एकटा माउगि छलै - रेशमा। परेशानी ओकरो संपूर्ण देह पर अक्षर-अक्षर लिखाएल। ओकरो घरबला घुरल नञि छलै। मुदा फोन कएने छलै -'हालति बड्ड खराब छै। दरबज्जा आदि नीक स' लगाक' राखने रहब। हाथ मे सदिखन एकटा चक्कू वा एहेने कोनो चीज सेहो राखने रहब। पतियाएब नञि ककरो पर चाहे ओ कतबो नजदीकी हुअए।'
दुनू माउगि एक-दोसरा के देखि क' तेना चेहैली जेना एक-दोसरक सोझा मे दूध चीनी सनक संबंधवाली दीपा आ रेशमा नञि, गहुँमन आ बिज्झी हुअए। रेशमा एतेक देर राति मे ओकर आएब पर चेहैली त' दीपा रेशमाक गस्सा मे फंसल चक्कू देखि क'।
माउगि त' माउगे होइत छै - एतेक अविश्र्वास स' काज थोडबे छलै छैक। आ ई स्त्री माने दीपाक त' सौंसे देहे पर परेशानी छपाएल छलै। शौकत त' फोनो क' देने छलाह। मुदा मनोज के त' तकर कोनो परवाहिए नञि छलै। रहितियैक त' एतेक प्रतिकूल परिस्थिति मे ओकरा मना करबाक बादो जयतियन्हि की? आ मानि लिय' जे बड्ड खगता छलैन्हे जेबाक, तें चलि गेलाह। मुदा चलि गेलाक माने ई त' नयिं जे एकदमे स' निश्चिन्त भ' क' बैसि जाइ; बेगर ई महसूस कएने जे दीपा कतेक चिंतित आ परेशान हेतीह। धुर्र? माउगि आओर लेल किओ एतके परेशान हुअए!
दुनक दुनू माउगिक मुंह मे जेना बकार नञि छलै। अंतत: रेशमा सेहे चिनियाबदाम जकाँ एक-एक टा शब्द चिट चिट क' क' तोडैत-भांगैत बाजलै -
'बच्चे सो गए? मेरे तो अभी-अभी सोए हैं।'
'हँ! हुनका आओर के की पता जे दंगा-फसाद की सभ होइ छै। स्कूल नञि गेनाई त' ओकरा आओर लेल पिकनिक भ' गेलै'। भरि दिन ऊधम मचा-मचाक' थाकि-हारिक' एखने सूतल अछि।'
'मनोज भैया लौटे?'
'घुरि गेल रहितियन्हि त' हम की अईठां रहितहुँ?' स्त्री मोने मे बाजलै। प्रत्यक्षत: मूड़ी नयिं मे डोला देलकै।'
'ये भी अभी तक नहीं लौटे हैं। मगर फोन कर दिया है कि लौटेंगे। फिर भी गर हालात ज्यादा खराब हुए तो उधर ही कहीं किसी रिश्तेदार के यहाँ रूक जाएंगे।' माउगि बाजलै।
स्त्री चुपचाप ओकर मुंह तकैत रहि गेलै। ओहि दीपा रूपी स्त्रीक चेहरा पल-पल बदलि रहल छलै। माउगि रेशमा कहलकै - 'उनका फोन नहीं आया है तो तू ही पता कर ले न?'
'कत'? ओ कत छथि, हमरा कहि के जाइ छथि जे कहै छी जे फोन करी आ की दनि करी, कहाँ दनि करी।' स्त्री अपन विवशता मे खौंझैली।'
'हौसला रखो। सब ठीक हो जाएगा।'
मुदा सभ ठीक नञि भेलै। माउगिक मरद आबि गेलै। शौकत भाइ के देखि क' रेशमाक मुंह मुरझाएल फूल पर मारल पानिक छींटा जकाँ तरोताजा भ' उठलै। दीपाक चेहरा पर सेहो आंशिक आश्र्वस्तिक भाव उभरलै। बेस! एक गोट त' सकुशल आबि गेलाह। आब दोसरो आबि जाथि त' आ निश्चिंत भ' जयतियैक। अहिना सबहक सर समांग सकुशल अपना अपना बासा घुरथि जाथु त' सबहक घरक जनी जाति के कतेक आश्र्वस्ति भेंटतैक! ओ शौकत भाइ स' शहरक मूड पर कनेक गप सप कर' चाहै छलै। मोन मे छलै जे आकर परेशानी आ चिंता स' शौकत भाइ सेहो कनेक सरोकार राखति। पूछथि कनेक मनोजक मादे, कहथि कनेक शहरक हालचालि। मुदा शौकत भाइ त' तेहेन ने सख्त नजरि स' घूरि क' रेशमा के देखलनिह कि ओहि नजरिक कठोरता आ बेधकता दीपा सेहो बूझि गेलै आ कहलकै -'चलै छी रेशमा, बच्चा सभ असगरे छै।'
बाहर मे दंगा आ घर मे भूकंप आबि गेलै। मर्द प्रतिवादक गाड़ी पर फर्राटा स' सवार भ' गेलै -'कहा था न कि किसी अपने कहे जानेवाले पर भी भरोसा मत करना। क्या जरूरत थी इतनी रात को इसे बिठाए रखना? इन काफिरों का कोई भरोसा है क्या?'
'रेशमा, ई कोफ्ता शौकत भाइ लेल। दिने मे बनौने छलहुं। हमरा बूझल अछि जे हिनका कोफ्ता बड्ड पसंद छै।' स्त्रीक फेर प्रवेश भेलै। माउगि फेर सहमि गेलै। मर्द फेर तनतना गेलै।ओ अई लल्लो-चप्पो स' प्रसन्न ¬नञि भेलै। स्त्रीक गेलाक बाद गरजलै -'फेंक दो इसे डस्टबिन में। क्या ठिकाना, कुछ मिला-विला कर लाई हो।'
माउगिक करेज कनछलै -'अहीं सभ एक-दोसरा लेल दुश्मन भ' सकै छी। माउगि त' माउगे होइत छै। सभटा दुख त' ओकरे माथ पर बजरै छै। ओकर मरद के किछु भ' जेतै त' ओकरा अहिना अपन सगरि जिनगी काट' पड़तै। आ अहाँ आओरक घरवाली मरतै त' कब्र मे देह गललो ¬नञि रहतै कि दोसर निकाहक मुबारकबाद बरस' लागतै। यौ - माउगि हिन्दू-मुसलमान आ कि क्र्रिस्तान नञि होई छै। ओ खाली माउगे होइत छै।'
मुदा नञि! माउगि खाली माउगे नञि होइ छै। ओ नारी, स्त्री, माउगि, मौगी सभ भ' जाइ छै। आ सेहो कठपुतरी बनिक'। आब देखियौ ने! शौकत भाइ एम्हर पहिने आगि जकां बररसलन्हि आ फेर कने प्रेमक फूंही खसबैत आस्ते आस्ते क' क' तेना ने बुझेलखिन्ह जे कि रेशमा सेहो पतिया गेलै आ तय क' लेलकै जे ई कोफ्ता काल्हि भिन्सर मे बर्तन मांजयबाली के द' देल जेतै। ओम्हर दू बजे राति मे घुरल मनोज बाबू नामक मरदक फरमान सेहो निकललै जे आओर कतहु जाइ त' जाइ, बगल बला घर मे कथमपि नञि। ठीक पुरना जमानाक राजकुमार बला कथा जकाँ - पूब जाउ, पच्छिम जाउ, उत्तर जाउ मुदा दक्षिण कहियो नञि जाउ आ अहि अतिरिक्त सावधानी मे ओ सभस' पहिल काज कएल जे अपन दरबज्जा पर साटल 'ऊँ' स्टिकर के नोंचि-चोथि क' उजाड़ि देलन्हि।
आबी, कनेक एम्हर ईहो दुनू गोट मौगीक खोज खबरि ल' ली। ई दुनू मौगी ऊपरका दुनू स्त्री आ माउगि स' जुड़ल छली से त' अहां अओर के मोने हएत। ई दुनू छल भगवती आ जोहरा जे दीपा आ रेशमाक घर मे बर्तन चौका करै छल। ईहो एकटा संयोगे छल जे भगवती नामक मौगी रेशमा नामक माउगिक घर मे काज करै छलै आ जोहरा नामक मौगी दीपा नामक स्त्रीक घर मे। ईहो दुनू मौगी उपरकी दुनू माउगे जकां पड़ोसिया छलै।
आइ भगवतीक घर मे भम्ह लोटै छलै। आध सेर आटा बांचल छलै। तकरे रोटी बनाक' अपन चारू धिया-पुता के खुआ देने छलै - भिन्सरे मे। आब बेरहटिया स' ई अधरतिया भ' गेलै। दोकान बंद आ पाइक खूँट खुल्ला। कोनो दिस स' रस्ता नञि! धिया-पुता के ठोक-ठाकि क', एक-दू चमेटा खींचि क' सुता देने छलै। आब जागल-जागल भरि पोख पहिने अपन मरद के गरियौलकै जे ठर्रा आ अढ़ाई सौ रूपैयाक लालचि मे दंगा फोड़'बला लेल काज कर' चलि गेल छलै। ओहि स्त्री दीपे जकाँ ईहो भगवती मौगी अपना मरद के रोकबाक प्रयास कएने छलै आ मनोजे बाबू जकाँ ओकरो मरद ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे रोपैत चलि गेल छलै आ बाद मे चेथड़ी भेल देह ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे स' निकालि क' माथ मे राखि देलकै। मुदा एखनि त' माथ मे राखल अक्किल सेहो भुतियाएल छलै। हारि थाकि क' ओ धिया-पुता लग ढेर भ' गेलै जे आब त' भिन्सरे मे भ' सकै छै किछु। करफू लागल रहौ कि किछु। पुलिसबला गोली मारौ कि डंडा। मेम साब ओहिठां त' जाइए पड़तै। दू गोट लोभ - पगार भेटबाक आ सदिखन जकाँ अहू बेर ततेक बचल-खुचल भेटि जेबाक आस जाहि स' चारू धिया-पुताक खींचखाचि क' जलखई त' भइये जाइ छै। मुदा भिन्सर त' हुअए पहिने! हे सुरूज महराज! जल्दी बहार आबथु!'
सुरूज महाराज त' प्रकट भेलाह, मगर दोसर मौगी ई मौगीक रस्ता छोपि देलकै -'तुम बच्चावाली औरत! तुम किधर कू जाएगा ये आफत में। मेरे कू जाने दो। अपुन का क्या है? अकेला औरत। पुलिसबाला गोली मार भी दिया तो क्या हो जाएंगा। और जो नहीं मारा तो तेरा मेम साब का भी काम अपुन करके आ जाएंगा आउर तेरा पगार आउर खाने-पीने का जो कुछ भी देंगा वो सब लेके आ जाएंगा। ठीक?' आ अंचरा मे स' गरम-गरम चारि टा भाखरी निकालि क' थम्हा देलकै - एतबे बचल छलै, तैं एतबे ...
जाबथि भगवती किछु सोचय, किछु बाजय, जोहरा नामक ई दोसरकी मौगी चिड़ै जकाँ फुर्र स' उड़ि गेलै। भगवती मौगी थकमकाएले रहि गेलै, जेना जोहराक मरद दंगा बलाक बीच मे फंसल थकमकाएले रहि गेल छलै आ पछाति मे अपन टूटल - भांगल फलक ठेला आ ओहि पर सजाओल सभटा फले जकाँ पिचा-पिचू के थौआ-थौआ भ' गेल छलै। दीन ईमानक पक्का, पाँचो बेरक नमाजी आ सभटा जनानी के दीदीए आ भाभी कहैबला ओकर मरद जोहरा हिरदै में जिनगी भर लेल कांट छोड़ि गेलै - ओकर देह भरि पोख देखबाक साध मोने मे रहि गेलै आ तहिये स' ई काँट कहियो ओकर पूरा देह मे गड़' लागै छै आ कहियो अपन मरदे जकाँ मौगीक अपनो सौंसे मोन आ देह थौआ-थौआ भेल बुझाए लागै छै।
नुका-चोरा क', झटकारि क' जोहरा दुनू स्त्री आ माउगिक घरक काज कर' पहुँचि गेलै। वाह रे पुलिसबलाक चौकस नजरि! अल्लाह! जोहरा शुक्र मनौलकै। जाए बेर सेहो नञि पडए ओह दरिंदा सभक नजरि त' बेस। आएल त' असगरे छलै, जाएत त' भगवतीक दरमाहा आ खाए-पियक समान सेहो रहतै। खेनाइ-पिनाइ त' रोड पर चलि जेतै आ पाइ जानि नञि ककरा पाकिट मे - दंगाबलाक कि पुलिसबलाक।
माउगि आ स्त्री कतेक बेर दुनू मौगी स' ठट्ठा केने छलै - "गै, दुनू अपन-अपन मेमसाब बदलि ले। मियां मियांक घर मे आ हिंदू हिंदूक घर मे। तहियाक मजाक आइ दुनू माउगि आ स्त्री के वास्तविक लागि रहल छलै - दुनू मरद जे झोटैंला पंचक ई मजाक पर कहियो कान नञि देलन्हि, आइ गंभीर फैसलाक तीर, कटार ई दुनू माउगि पर संधानि देलन्हि। फर्मान बंदूक स' गोली जकाँ बहिरा गेल छलै आ ई दुनू के आब ओहि गोली के अपना-अपना करेज मे धँसा क, धँसलाक बाद अपना-अपना के जीवित, चालू पुर्जा राखैत ओहि फर्मान पर अमल करबाक छलै।
जहिया ठेला छलै, फल छलै आ फलक ताजगी जकाँ मुस्की मारैत ओकर मरद छलै, तहिया जोहरा के काजक कोनो दरकार नञि छलै। दीपा ओकर चेहराक मासूमियत आ खबसूरती देखि क' सोचै बेर-बेर - जे कोनो नीक घरक स्त्री रहितियैक त' रूप-रंग झाड़-फानूस जकाँ चमकतियैक। मुदा एखनि त' ओकर उदास मुंह, उड़ल रंग आ बेजान कपड़ा। हठात ओकरा जोहरा मे रेशमाक झलक भेटलै त' बड़ी जो स' ओ चेहा उठलै। मोने मोन अपना के लथाड़लकै। जतेक गारि अबै छल, सभटा अपना मोनक ऊपर खाली क' देलकै। जोहरा काज क' क' रेशमा ओहिठां चलि गेल छलै। मनोज बाबू सुतले छलाह। दीपा फ्रिज मे स' झब-झब समान सभ बाहर कर' लागलै।
फेर कॉलबेल। फेर दीपाक मुंह। फेर रेशमाक बदलैत रंग। रेशमा स' कोनो औपचारिक रिश्ता त' छलै नञि! तै धड़ाधड़ि भन्से मे चलि गेलै -'जोहरा! ई खाए पियक समान सभ छै। भगवती के द' दिहें।'
'लेकिन मैं जो ये सब तुझे दे रही हूँ, ये सब केवल तेरे लिए हैं। किसी काफिर-वाफिर को नहीं देगी तू और सुन! कल से तू उधर नहीं, इधर काम करेगी। दस रूपए ज्यादे ले लेना। चलेगा। वो चाहे तो उधर करले। कल साहब यही कह रहे थे।'
थकमक भेल स्त्री दीपा देखलकै - भन्साघरक स्लैब पर जोहराक देल खाद्य सामग्री मे रतुक्का कोफ्ता। ओम्हर कोफ्ता ओकरा अंगूठा देखा रहल छलै आ एम्हर रेशमाक गप्प ओकर करेज पर आड़ी चला रहल छलै। त', कतेक पतिव्रता स्त्री छै। पति जे कहलकै, तुरंत ओकर ताबेदारी मे लागि गेलै। आ ओ? दू बजे राति मे घुरल मनाज् बाबू स' फिरकापरस्ती पर बहस केलकै आ जोहरा भगवतीक प्रसंग पर मना क' देलकै जे ओ नञि करतै काज कर' बालीक अदला-बदली।
मुदा आब? जौं ई मौगी मानि गेलै त' ओकरा त' डबल फैदा। आ ओम्हर बेचारी भगवतीक काजक नोकसान। तहन त' नीके छै ई अदलाबदली। तैं ओहो दही में सही मिलेलकै। ओना त' ओहो अदला-बदली के व्यावहारिकताक जामा त' पहिराइये देने छलै जहन कि फ्रिज से खाद्य सामग्री निकालि क' ओ भगवती लेल आनने छलै। कहियो ई नञि देखल-सुनल जे काज करए किओ आन आ खाएक पियक भेटै कोनो आन के।
मुदा ई मौगी ! जोहरा मौगी! केहेन खरदार! केहेन जबर्दस्त! केहेन जोरगरि! ओ चकचक करैत दुनू माउगिक मुंह देखलकै। बाजलै किछु नञि। खाली रेशमा स' कहलकै -'करफू लगा हुआ है। भोत मुश्किल से आया मैं। कल आने को होएंगा कि नेई, मालूम नेई। भगवती अपना पगार वास्ते बोला है। आप दे देंगा तो मैं ले जाके उसकू दे देंगा।'
'बोल उसे वो खुद आकर ले जाएगी। जब तू आ सकती है तो वो क्यों नहीं। और अच्छा है न! पुलिस की नजर चढ़ गई तो एक काफिर तो घटेगा कम से कम।'
कि माउगि गै माउगि! हम माउगि, तों माउगि, ई माउगि; ओ माउगि - सभ माउगे-माउगि! इहो चारो माउगे माउगि। मुदा ई मौगी - छोटहा लोग - मसोमात जोहरा त' जेना पुलिसक गोली आ दंगाबलाक ईंट, पत्थर, बोतल घासलेट तकरो सभ स' बेसी आक्रांत भ' उठलै। काली जकाँ, दुर्गा जकाँ, चंडी जकाँ ! 'मेम साब! आप दोनों अपना-अपना सामान रख लो। मेरे कू नेई चाहिए ऐसा खाना, जिसमें शैतानी खून बोलता हो। ई दंगा - आप दोनों का मन मे इतना फरक पैदा किएला है कि आप दोनों एक मिनट में अपना से गैर बना दिया। भगवती तो बच्चा लोग का खातिर आने को तैयार था। मईच रोका उसकू कि मेरा क्या! मइ अकेला माणस। पुलिस गोली मारेंगा तो भी क्या चला जाएंगा मेरा। पण उसकू कुछ होएंगा तो उसका बच्चा लोग यतीम हो जाएंगा, जैसे मइ हो गया अपना मरद का जाने से। आपलोग बड़ा लोग। इसलिए आपलोग का बड़ा बात। बड़ा समझदारी। मेरे कू तो खोपड़ी नेई। आपको भगवती को नेई रखना, मति रखो। उसका पगार नेई देने का, मति दो। लेकिन कल से मइ भी काम पर नेई आने का। लेकिन उसका पहिले अभी आपका घर मे मइ जो काम किया, वो पइसा मेरे कू अब्भी का अब्भी देने का। वो मेरा हक्क है। मइ उसकू लेके जाएंगा आउर जो मर्जी आएंगा, करेंगा। आपका ई भीख नेई चाहिए मेरे कू।'
मौगियो आओर बाजि सकै छै, सोचि-समझि सकै छै! एहेन अजगुत कथा ! बाप रौ बाप! दुनू माउगि के साँप सुंघा गेलै। ई मौगी भ' क' एतेक नाटक! माउगिक सोझा मे एकर एतेक टनटनी छै ने। कनेक साहेबक सोझा मे पड़' दियौक। सभटा बिलाडिपन एके क्षण मे घुसडि जेतै आ ओ फेर केथरी जकां गुड़िया-मुड़िया जेतै। रेशमा सोच लागलै। यदि शौकत मियां उठि क' आबि जाथु त' एकर मुंहक टनटनी एखने बंद भ' सकै छै।
नीक भेलै। शौकत मियां आबि गेलाह! भन्साघरक स' भोरुक्का चाहक गन्धक बदला ई खिच-खिचक गंध बर्दाश्त नञि भेलै आ अधकचरा भेल नीनक खौंझ स' भरल ओ बाहर निकललाह!
'क्या हुआ? सुबह-सुबह चाय देने के बदले घर को कर्बला का मैदान क्यों बना रखा है?' ड्राइंग रूम भड़कलै। रेशमाक चेहरा चमकलै। दीपा शरीर स' एम्हर छलै आ मोन स' मनोज कत'। तैं ओ संभ्रमित सेहो भेलै। मुदा जोहरा ओहीठां छलै - तन आ मोन दुनू स'। कतहु कोनो तरहक बनावटी चमक नञि, मुंह पर कोनो तरहक भ्रमक चेन्हासी नञि। ओ माथ पर ओढ़नी धेलकै आ भन्साघरक खिचखिच के ओतहि छोड़ैत ड्राइंगरूम में पहँुचि गेलै -'साब! मेरे कू बताओ, ये दंगा हम और आप कराया क्या? आओर जो कराया, उसका बदन का एक बाल भी गिरा क्या? भगवती का आदमी गया, मेरा मरद गया। तो क्या ये सब उसका, मेरा या आपका चाहने से हुआ? कल को खुदा न करे, आपको या वो साब को कुछ हो जाता तो वो सब आपका या आपका मेमसाब लोग का चाहने से होता था क्या? आओर ये मारामारी का फरक किसका पर गिरेंगा साब। हम औरत लोग पर। बेवा तो अपुन लोग होता है न साब! और बेवा खाली बेवाइच कहलाता - हिन्दू बेवा आ मुसलमान बेवा नेई। साब, मइ जाता। बस मेरा आज का काम का पइसा दे दो। उस पइसा से मेरे जो मर्जी करेंगा, जिसके लिए मन करेगा सामान खरीदेंगा।'
ड्राइंगरूम गरजलै -'क्या बकवास लगा रखी है। रेशमा, तुम इनलोगों को यहाँ से भगाती क्यों नहीं?
भन्साघर फेर डेराएल चिड़ई भ' गेलै। दीपा स' आब सहन नञि भेलै। ओ जाए लेल डेग उठेलकै। जोहरा एक पल भन्साघर मे मोजद दुनू माउगि के देखलकै। फेर ओकरो डेग उठलै। आ भन्साघर जेना भूकंप स' डोल' लागलै। आब कनेक स्थिर भेलै। स्वरक अरोह-अवरोह मे सेहो स्थिरता अएलै। उठल डेग स्वर स' मिलान कर' लागलै -'जोहरा, ये सब ले जाओ और भगवती की पगार भी। हालात ठीक होने पर ही उसे घर से निकलने देना और तुम भी तभी आना। और दीपा, बैठो न! चाहो तो तबतक शौकत मियां से बात करो या फिर यहीं किचन मे मेरे साथ। मैं तुरंत चाय बनाती हूँ। जोहरा, तुम भी पीकर जाना।'
वाह रे तिरिया चरित्तर वाह! ऋषि मुनि सभ कहिये गेलैन्हिए जे देवो नञि जानि सकलाह त' पुरूषक कथे कोन? किन्तु अईठां एहेन कोनो गुंफित रहस्य नञि छलै, नञि त' काम केलिक कोनो नुका छिपी छलै, ने नैनक कटाक्ष आ बैनक मुस्कान छलै। अईठाँ त' एकेटा चीज पसरल छलै - चाह मे, पत्ती में, चीनी मे, कप मे - माउगे -माउगि। चाह, दूध, चीनी आगिक गरमी स' एके रंग ध' लेइत छै, एकमेक भ' जाएत छै। बनल चाह मे से चाहक रंग, दूध, चीनी के अलग-अलग करब मोश्किल। ईहो माउगि सभ चाहे जकाँ एक मेक भ' गेल छलै।
शौकत साहब ड्राइंगरूम में चाहक चुस्की ल' रहल छलाह। चाहक भाफ ड्राइंगरूम ठरल, बर्फ भेल सर्दपना के तोड़लकै कि नञि, पता नञि; मुदा सौंसे भन्साघर मे भाफक नरम गरमी पसरि गेलै। आ ओहि नरम-गरम माहौल मे देखाई पड़लै जे एकटा मौगी चीज बतुस आ भगवतीक पगार ल' क' झटकल चलल जा रहल छै। एक गोट स्त्री आ दोसर माउगिक आँखिक पानि टघरि क' चाहक प्याली मे खसि रहल छलै। चाह नमकीन भेलै कि मीठे रहलै, सेहो नञि बुझेलै। खाली एक गोट स्वर ओहि भन्साघर मे बरकि गेलै - बरकैत गेलै - 'दीपा हम औरतों के दुख कितने एक समान होते हैं न!'
'भगवान नञि करथु ककरो माँगि आ कोखि उजड़ै।'
'आ श्मशानक मनहूसियत ककरो घर मे पैंसए।'
लोक आओर कहे छै, माउगि-माउगि अलग होई छै - नारी, स्त्री, महिला, माउगि, मौगी, जनी - हौ जी ई एतेक नाम द' देने ओ सभ बदलि जाइ छै की ? कहू त' ! एहनो कतहु भेलैये !
Friday, November 21, 2008
मिथिला विभूति 2- मिथिलाक महिला विभूति
(१९२४- )—समीक्षिका, अनुवादिका, सम्पादिका।प्रकाशन: मैथिली लोकगीत, वसवेश्वर (अनु.) आदि। लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज, कलकत्तामे पूर्व प्राध्यापिका।
लिली रे
जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार।मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित।विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। प्रबोध सम्मान प्राप्त।
शांति सुमन
जन्म 15 सितम्बर 1942, कासिमपुर, सहरसा, बिहार, प्रकाशित कृति, “ओ प्रतीक्षित, परछाई टूटती, सुलगते पसीने, पसीने के रिश्त, मौसम हुआ कबीर, समय चेतावनी नहीं देता, तप रेहे कचनार, भीतर-भीतर आग, मेघ इन्द्रनील (मैथिली गीत संग्रह), शोध प्रबंध: मध्यवर्गीय चेतना और हिन्दी का आधुनिक काव्य, उपन्यास: जल झुका हिरन। सम्मान: साहित्य सेवा सम्मान, कवि रत्न सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान। अध्यापन कार्य।
शेफालिका वर्मा
जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।
इलारानी सिंह
जन्म 1 जुलाई, 1945, निधन : 13 जून, 1993, पिता: प्रो. प्रबोध नारायण सिंह सम्पादिका : मिथिला दर्शन, विशेष अध्ययन: मैथिली, हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान एवं लोक साहित्य। प्रकाशित कृति: सलोमा (आस्कर वाइल्डक फ्रेंच नाटकक अनुवाद 1965), प्रेम एक कविता (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विषवृक्ष (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विन्दंती (1972), स्वरचित: मैथिली कविता संग्रह (1973), हिन्दी संग्रह।
नीरजा रेणु
जन्म: ११ अक्टूबर १९४५,नाम: कामाख्या देवी,उपनाम:नीरजा रेणु,जन्म स्थान:नवटोल,सरिसबपाही ।शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) एम.ए.,पी-एच.डी.,गृहिणी ।प्रकाशित रचना:ओसकण (कविता मि.मि., १९६०) लेखन पर पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेशक प्रभाव।मैथिली कथा धारा साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथाक पन्द्रह टा प्रतिनिधि कथाक सम्पादन ।सृजन धार पियासल कथा संग्रह,आगत क्षण ले कविता संग्रह, ऋतम्भरा कथा संग्रह,प्रतिच्छवि हिन्दी कथा संग्रह,१९६० सँ आइधरि सएसँ अधिक कथा, कविता, शोधनिबन्ध, ललितनिबन्ध,आदि अनेक पत्र-पत्रिका तथा अभिनन्दनग्रन्थमे प्रकाशित ।मैथिलीक अतिरिक्त किछु रचना हिन्दी तथा अंग्रेजीमे सेहो।
उषाकिरण खान
जन्म:१४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात।मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल (उपन्यास), नाटक, उपन्यास।
प्रेमलता मिश्र ’प्रेम’
जन्म:१९४८,जन्मस्थान:रहिका,माता:श्रीमती वृन्दा देवी,पिता:पं. दीनानाथ झा,शिक्षा:एम.ए., बी.एड.,प्रसिद्ध अभिनेत्री दू सयसँ बेशी नाटकमे भाग लेलनि ।भंगिमा (नाट्यमंच) क भूतपूर्व उपाध्यक्षा, पत्रिकाक सम्पादन, कथालेखन आदिमे कुशल । ’अरिपन’ आदि अनेक संस्था द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित।
आशा मिश्र
जन्म:६-७-१९५० ई.,प्रकाशित कथा मे मैथिकीक संग हिन्दी मे सेहो । सभसँ पैघ विजय मैथिली कथा संग्रह।
नीता झा
जन्म : २१-०१-१९५३,व्यवसाय:प्राध्यापिका । लेखन पर समाजक परम्परा तथा आधुनिकताक संस्कार सँ होइत विसंगतिक प्रभाव।प्रकाशित कृति : फरिच्छ, कथा संग्रह १९८४, कथानवनीत १९९०,सामाजिक असन्तोष ओ मैथिली साहित्य शोध समीक्षा।
ज्योत्स्ना चन्द्रम
मूल नाम: कुमारी ज्योत्स्ना ,उपनाम : ज्योत्स्ना आनन्द ,जन्मतिथि: १५ दिसम्बर, १९६३,जन्मस्थान : मरूआरा, सिंधिया खुर्द, समस्तीपुर,पिता: श्री मार्कण्डेय प्रवासी,माता: श्रीमती सुशीला झा,कार्यक्षेत्र : अध्ययनाध्यापन ।,रचना प्रकाशित : झिझिरकोना (कथा-संग्रह), एसगर-एसगर (नाटक),बीतक संग संकलन एवं सम्पादन।एकर अतिरिक्त दर्जनाधिक कथा ओ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित तथा आकाशवाणीक पटना, भागलपुर, दरभंगा केन्द्रसँ प्रसारित।शिक्षा : पटना विश्वविद्यालयसँ हिन्दी साहित्यमे एम.ए,।
सुस्मिता पाठक
जन्म:२५ फरवरी, १९६२,सुपौल, बिहार । परिचिति कविता संग्रह प्रकाशित । कथावाचक, कथासंग्रह प्रकाशनाधीन । राजनीति शास्त्रमे एम.ए.। संगीत, पेंटिंगमे रुचि । मैथिलीक पोथी पत्रिका पर अनेक रेखाचित्र प्रकाशित । समकालीन जीवन, समय, आ तकर स्पंदनक कवयित्री । अनेक भाषामे रचनाक अनुवाद प्रकाशित।
विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।
विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि।
'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।
श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि।
ज्योति
www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।
रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन), पल्लवमिथिला, प्रथम मैथिली इन्टरनेट पत्रिका,वि.सं. २०५९ माघ (साहित्यिक), सम्पादन-सहयोग।
गजेन्द्र ठाकुर समग्र
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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डाॅ. देव शंकर नवीन (जन्म: 2 अगस्त 1962) मैथिली तथा हिन्दी मे एम.एण्, पी-एच.डी., भौतिकी मे एमए स-सी. तथा पुस्तक प्रकाशन एवं अनुवाद मे पी.जी. ...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...