भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Thursday, June 19, 2008

भालसरिक गाछ: संगीत शिक्षा

भालसरिक गाछ: संगीत शिक्षा

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: फूसि-फटक
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य

“कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।

“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि”।

“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।

“अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे लिखल रहैत छैक”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”। मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल।

ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक, जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक, तँ सभसँ यैह उत्तर भेटैत अछि-

“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आऽ से जानि कचोट भऽ रहल अछि”।

आऽ जखन ओऽ ओतएसँ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-

“सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।

भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-

“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।

“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।

“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी।

भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। कलक्टर तमसा कए बाहर जएबाक लेल मीत भाइकेँ कहलखिन्ह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल मीत भाइ हुनका देखि-चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।

“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।

“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।

“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय?”

“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।

तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आऽ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओऽ मीत भाइकेँ।

"मीत भाइ। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।

"पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल।

"दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।

“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।

"ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर शिवलिंगकेँ दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे महादेव हुनको हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि, तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ, तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि की? आब कहितहुँ जे नहि पीबि रहल छथि, तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि। से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। से हमहुँ सभकेँ कहलियन्हि, जे भगवान हमरो हाथसँ दूध पीलन्हि।

"सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू"। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।

"दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत-सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल, जे ओकर कोन तरहेँ सत्कार होमए बला छैक। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि, तँ सौँसे देह पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि।

"जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि, तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।

“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू।

"बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ? माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?

मीत भाइ मूरी गोतने "हँ" मे मूरी डोलओलन्हि।

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट

मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि आऽ काका लग दिल्ली पहुँचलाह नोकरी करबाक हेतु, मुदा यावत लाल काका-काकी लग रहलाह, तावत कनैत-कनैत हुनका लोकनिकेँ अकच्छ कऽ देलखिन्ह।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि, तँ भरि दिन उकठपन करैत रहथि। से कथाक बीचमे हमरा जेना-जेना मोन पड़ैत जायत, तेना-तेना हम हुनकर उकठपनक खोरिष कहैत रहब। जौँ मीत भाइक खिस्सा सुनबाक होए तँ यावत ई-सभ अहाँकेँ बुझल नहि रहत तावत धरि नहिये खिस्सा नीक लागत आऽ नहिये बुझबामे आएत।

तँ उकट्ठी छलाह से सिद्ध भेल। आहि रे बा। उकठपनक एकोटा खिस्सा सुनबे नहि कएलहुँ आऽ मानि लेलहुँ जे सिद्ध भए गेल तँ सुनू।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि उकठपनी करैत रहैत छलाह। एक बेर पसीधक काँटक रस पोखड़िमे दऽ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देने रहथि। मुदा ई तँ पसीधक रससँ जुड़ल हुनकर एकटा छोट अपराध छल। पसीधक काँटासँ जुड़ल हुनकर एकटा पैघ अपराधक चर्च आगाँ आब होएत जाहिसँ सौँसे गाम दहसि गेल छल।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक, तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। अऽ ई कहि मीत भाइ महीँस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह।

एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखाऽ पड़लन्हि मीत भाइकेँ तँ पुछलखिन्ह-जे

"हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल"?

बुझू। मीत भाइ एक तँ गलत कारण बतओने छलाह आऽ फेर ओकर दुष्परिणामक सेहो अहलदिलीसँ बाट जोहि रहल छलाह। एहि घटनासँ बड़ थू-थू भेलन्हि गाममे मीत भाइक। ओऽ तँ धन रहल जे मरीजक बाप जखन कलमसँ पसीधक काँटा नेने घुरि रहल छलाह तँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलन्हि आऽ पूछि देलकन्हि। नहि तँ ओऽ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जाऽ रहल छलाह।

मीत भाइ एहि घटनाक बाद कंठी लऽ लेलन्हि। माने आब माँछ-मौस नहि खायब, ई प्रण कएलन्हि। मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आऽ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि। आऽ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह। आब फेर मोसकिल। पहिने बाबा दोगहीक अर्थ बुझि लिअ। नहि तँ कथा फेर बुझबामे नहि आएत।

‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल,कारण जे क्यो बच्चो ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।

आब कथा आगाँ बढ़ाबी। गोनर भाइ मोनमे ई सोचैत रहथि, जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आऽ ओऽ ई सोचि बजलाह।

“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी”।

”यौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”। मीत भाइ बजलाह।

अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।

एहिना एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह-

“की देखि रहल छी”।

गोनर झा कहलखिन्ह- जे

“टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।

“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।

”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।

”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।

आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,

” यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।

मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।

किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।

मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइखा कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित मुदा सुननहार ठाकल बुझि पड़ैत छथि।
मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलन्हि तँ कहए लगलीह
“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।
तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह,
“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।
आ’ बूढ़ी फेर सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।
मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आ’ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ लोकि लेलकन्हि।
”ई की छी”।
”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।
”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।
” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।
”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।
”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”
” ल’ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।
मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।
दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा’ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा ल’ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।
मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ’ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि मीत भाइ जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भ’ गेलाह।
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: >: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट: मीत भाइक दिल्ली यात्रा आऽ आगाँ

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटलाक स्थितिमे अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। बुधि जेना हेरा हेल छलन्हि, वा अपनासँ बेशी बुधियार लोकनिसँ सोझाँ-सोझी भए जाइत छलन्हि। अहाँ कहब जे पहिने की भेल से तँ कहबे नञि कएलहुँ तखन हमरा सभ कोना बुझब जे की भेल। तँ सुनू, एकर उत्तर सेहो हमर लग अछि। हम एहि कठाक कथाकार छी से हमरा सभटा बुझल अछि जे की होएबला अछि। ओना यावत हम कथा सुनबैत रहब तावत बीचोमे पुरनका प्लॉटसँ हटि कए हम कथा कहए लागब। मुदा विश्वास करू जे कठा चहटगर बनाबए लेल हम ई करब। हमर अपन कोनो स्वार्थ एहिमे नहि रहत।

तँ आगाँ बढ़ी। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ मीत भाइक सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलखिन्ह तँ कहए लगलीह -

“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।

तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह-,

“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।

आऽ बूढ़ी फेर मीत भाइकेँ सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।

मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आऽ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए मीत भाइक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर लोकि लेलकन्हि।

”ई की छी”।

”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।

”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।

” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।

”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।

”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”

” लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।

मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।

दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगाऽ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।

मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचाऽ जाइत छलन्हि आऽ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। मीत भाइ लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भऽ गेलाह। मुदा लालकाकी दिल्ली घुमि लिअ, लाल किला देखि लिअ, ई कहि दू-चारि दिनक लेल रोकि लेलखिन्ह। मुदा असल गप हमरा बुझल अछि। लालकाकी हुनकासँ गामघरक फूसि-फटक सुनबाक लेल रोकने छलखिन्ह।

strong>मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइ आऽ लालकिलाक भारत रत्न सभ

अपन मित्रकेँ लाल काकीक घरक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। आब अहाँ कहब जे मित्रक नाम किएक नहि कहि रहल छी, तँ सुनू हमर एकेटा मित्र छथि। आऽ से छथि जे अपन तरहक एकेटा छथि, आऽ से छथि मीत भाइ।

आब आगाँ बढ़ी। मीत भाइ हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।


भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे मीत भाइ अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह। मीत भाइकेँ एहि बजारसँ, सस्त आऽ नीक चीज, किनबाक लूरि नहि छन्हि से हम कहैत छलियन्हि।

ओहि परीक्षणक दिन, मीत भाइक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे मीत भाइक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। मीत भाइक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ मीत भाइ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएलन्हि जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह।

“अहाँ कहूतँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”।

तखन झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।

हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।

हमर मीत भाइक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल।

विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने मीत भाइक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर (चोर बजारक चोर विक्रेता महाराज) मुताबिक मूरे-मूर छल,जुत्ता देनाइ गछलखिन्ह। विक्रेता महाराज जुत्ताकेँ अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।

आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।

“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखी तँ पैरके सरा दैत रही आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन लाल काकीक घरक एहि सीढ़ीसँ उतरैत रही, तखने जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तसँ बाहर आबि गेल।

"मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे"।

फेर बजैत रहलाह-

“आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू ”।

आब हमरा तँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल मीत भाइ गाम चलि गेलाह। आऽ हम प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ जे नहि तँ अगिला रविकेँ चोर बजारक आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल अछि, जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

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संगीत शिक्षा

पहिने कमसँ कम 37 ‘की’ बला कीबोर्ड लिय।
एहिमे 12-12 टाक तीन भाग करू। 13 आ’ 25 संख्या बला की सा,आ’ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ’ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम 12 मंद्र सप्तक, बादक 12 मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन 12 तार सप्तक कहबैछ। 1 सँ 36 धरि मार्करसँ लिखि लिय। 1 आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ’ दहिन हाथ चलत।

12 गोट ‘की’ केर सेटमे 5 टा कारी आ’ सात टा उज्जर ‘की’ अछि।
प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ’ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि।
वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ’ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ’ बुढ़बा आँगुरसँ सां।
दहिन हाथसँ 12 केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ’ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ’ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर 12 केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा।
दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ’ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ’ अवरोह करू।
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Wednesday, June 18, 2008

भालसरिक गाछ: AFTER JULY 2004

भालसरिक गाछ: AFTER JULY 2004

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: फूसि-फटक
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य

“कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।

“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि”।

“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।

“अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे लिखल रहैत छैक”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”। मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल।

ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक, जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक, तँ सभसँ यैह उत्तर भेटैत अछि-

“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आऽ से जानि कचोट भऽ रहल अछि”।

आऽ जखन ओऽ ओतएसँ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-

“सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।

भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-

“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।

“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।

“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी।

भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। कलक्टर तमसा कए बाहर जएबाक लेल मीत भाइकेँ कहलखिन्ह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल मीत भाइ हुनका देखि-चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।

“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।

“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।

“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय?”

“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।

तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आऽ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओऽ मीत भाइकेँ।

"मीत भाइ। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।

"पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल।

"दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।

“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।

"ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर शिवलिंगकेँ दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे महादेव हुनको हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि, तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ, तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि की? आब कहितहुँ जे नहि पीबि रहल छथि, तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि। से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। से हमहुँ सभकेँ कहलियन्हि, जे भगवान हमरो हाथसँ दूध पीलन्हि।

"सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू"। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।

"दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत-सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल, जे ओकर कोन तरहेँ सत्कार होमए बला छैक। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि, तँ सौँसे देह पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि।

"जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि, तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।

“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू।

"बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ? माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?

मीत भाइ मूरी गोतने "हँ" मे मूरी डोलओलन्हि।

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट

मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि आऽ काका लग दिल्ली पहुँचलाह नोकरी करबाक हेतु, मुदा यावत लाल काका-काकी लग रहलाह, तावत कनैत-कनैत हुनका लोकनिकेँ अकच्छ कऽ देलखिन्ह।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि, तँ भरि दिन उकठपन करैत रहथि। से कथाक बीचमे हमरा जेना-जेना मोन पड़ैत जायत, तेना-तेना हम हुनकर उकठपनक खोरिष कहैत रहब। जौँ मीत भाइक खिस्सा सुनबाक होए तँ यावत ई-सभ अहाँकेँ बुझल नहि रहत तावत धरि नहिये खिस्सा नीक लागत आऽ नहिये बुझबामे आएत।

तँ उकट्ठी छलाह से सिद्ध भेल। आहि रे बा। उकठपनक एकोटा खिस्सा सुनबे नहि कएलहुँ आऽ मानि लेलहुँ जे सिद्ध भए गेल तँ सुनू।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि उकठपनी करैत रहैत छलाह। एक बेर पसीधक काँटक रस पोखड़िमे दऽ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देने रहथि। मुदा ई तँ पसीधक रससँ जुड़ल हुनकर एकटा छोट अपराध छल। पसीधक काँटासँ जुड़ल हुनकर एकटा पैघ अपराधक चर्च आगाँ आब होएत जाहिसँ सौँसे गाम दहसि गेल छल।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक, तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। अऽ ई कहि मीत भाइ महीँस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह।

एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखाऽ पड़लन्हि मीत भाइकेँ तँ पुछलखिन्ह-जे

"हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल"?

बुझू। मीत भाइ एक तँ गलत कारण बतओने छलाह आऽ फेर ओकर दुष्परिणामक सेहो अहलदिलीसँ बाट जोहि रहल छलाह। एहि घटनासँ बड़ थू-थू भेलन्हि गाममे मीत भाइक। ओऽ तँ धन रहल जे मरीजक बाप जखन कलमसँ पसीधक काँटा नेने घुरि रहल छलाह तँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलन्हि आऽ पूछि देलकन्हि। नहि तँ ओऽ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जाऽ रहल छलाह।

मीत भाइ एहि घटनाक बाद कंठी लऽ लेलन्हि। माने आब माँछ-मौस नहि खायब, ई प्रण कएलन्हि। मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आऽ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि। आऽ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह। आब फेर मोसकिल। पहिने बाबा दोगहीक अर्थ बुझि लिअ। नहि तँ कथा फेर बुझबामे नहि आएत।

‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल,कारण जे क्यो बच्चो ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।

आब कथा आगाँ बढ़ाबी। गोनर भाइ मोनमे ई सोचैत रहथि, जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आऽ ओऽ ई सोचि बजलाह।

“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी”।

”यौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”। मीत भाइ बजलाह।

अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।

एहिना एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह-

“की देखि रहल छी”।

गोनर झा कहलखिन्ह- जे

“टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।

“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।

”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।

”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।

आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,

” यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।

मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।

किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।

मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइखा कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित मुदा सुननहार ठाकल बुझि पड़ैत छथि।
मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलन्हि तँ कहए लगलीह
“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।
तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह,
“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।
आ’ बूढ़ी फेर सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।
मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आ’ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ लोकि लेलकन्हि।
”ई की छी”।
”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।
”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।
” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।
”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।
”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”
” ल’ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।
मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।
दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा’ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा ल’ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।
मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ’ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि मीत भाइ जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भ’ गेलाह।
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: >: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट: मीत भाइक दिल्ली यात्रा आऽ आगाँ

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटलाक स्थितिमे अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। बुधि जेना हेरा हेल छलन्हि, वा अपनासँ बेशी बुधियार लोकनिसँ सोझाँ-सोझी भए जाइत छलन्हि। अहाँ कहब जे पहिने की भेल से तँ कहबे नञि कएलहुँ तखन हमरा सभ कोना बुझब जे की भेल। तँ सुनू, एकर उत्तर सेहो हमर लग अछि। हम एहि कठाक कथाकार छी से हमरा सभटा बुझल अछि जे की होएबला अछि। ओना यावत हम कथा सुनबैत रहब तावत बीचोमे पुरनका प्लॉटसँ हटि कए हम कथा कहए लागब। मुदा विश्वास करू जे कठा चहटगर बनाबए लेल हम ई करब। हमर अपन कोनो स्वार्थ एहिमे नहि रहत।

तँ आगाँ बढ़ी। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ मीत भाइक सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलखिन्ह तँ कहए लगलीह -

“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।

तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह-,

“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।

आऽ बूढ़ी फेर मीत भाइकेँ सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।

मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आऽ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए मीत भाइक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर लोकि लेलकन्हि।

”ई की छी”।

”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।

”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।

” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।

”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।

”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”

” लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।

मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।

दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगाऽ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।

मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचाऽ जाइत छलन्हि आऽ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। मीत भाइ लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भऽ गेलाह। मुदा लालकाकी दिल्ली घुमि लिअ, लाल किला देखि लिअ, ई कहि दू-चारि दिनक लेल रोकि लेलखिन्ह। मुदा असल गप हमरा बुझल अछि। लालकाकी हुनकासँ गामघरक फूसि-फटक सुनबाक लेल रोकने छलखिन्ह।

strong>मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइ आऽ लालकिलाक भारत रत्न सभ

अपन मित्रकेँ लाल काकीक घरक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। आब अहाँ कहब जे मित्रक नाम किएक नहि कहि रहल छी, तँ सुनू हमर एकेटा मित्र छथि। आऽ से छथि जे अपन तरहक एकेटा छथि, आऽ से छथि मीत भाइ।

आब आगाँ बढ़ी। मीत भाइ हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।


भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे मीत भाइ अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह। मीत भाइकेँ एहि बजारसँ, सस्त आऽ नीक चीज, किनबाक लूरि नहि छन्हि से हम कहैत छलियन्हि।

ओहि परीक्षणक दिन, मीत भाइक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे मीत भाइक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। मीत भाइक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ मीत भाइ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएलन्हि जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह।

“अहाँ कहूतँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”।

तखन झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।

हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।

हमर मीत भाइक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल।

विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने मीत भाइक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर (चोर बजारक चोर विक्रेता महाराज) मुताबिक मूरे-मूर छल,जुत्ता देनाइ गछलखिन्ह। विक्रेता महाराज जुत्ताकेँ अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।

आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।

“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखी तँ पैरके सरा दैत रही आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन लाल काकीक घरक एहि सीढ़ीसँ उतरैत रही, तखने जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तसँ बाहर आबि गेल।

"मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे"।

फेर बजैत रहलाह-

“आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू ”।

आब हमरा तँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल मीत भाइ गाम चलि गेलाह। आऽ हम प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ जे नहि तँ अगिला रविकेँ चोर बजारक आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल अछि, जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

भालसरिक गाछ: MAHABHARAT

भालसरिक गाछ: MAHABHARAT
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: फूसि-फटक

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य

“कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।

“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि”।

“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।

“अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे लिखल रहैत छैक”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”। मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल।

ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक, जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक, तँ सभसँ यैह उत्तर भेटैत अछि-

“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आऽ से जानि कचोट भऽ रहल अछि”।

आऽ जखन ओऽ ओतएसँ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-

“सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।

भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-

“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।

“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।

“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी।

भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। कलक्टर तमसा कए बाहर जएबाक लेल मीत भाइकेँ कहलखिन्ह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल मीत भाइ हुनका देखि-चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।

“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।

“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।

“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय?”

“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।

तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आऽ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओऽ मीत भाइकेँ।

"मीत भाइ। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।

"पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल।

"दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।

“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।

"ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर शिवलिंगकेँ दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे महादेव हुनको हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि, तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ, तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि की? आब कहितहुँ जे नहि पीबि रहल छथि, तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि। से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। से हमहुँ सभकेँ कहलियन्हि, जे भगवान हमरो हाथसँ दूध पीलन्हि।

"सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू"। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।

"दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत-सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल, जे ओकर कोन तरहेँ सत्कार होमए बला छैक। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि, तँ सौँसे देह पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि।

"जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि, तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।

“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू।

"बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ? माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?

मीत भाइ मूरी गोतने "हँ" मे मूरी डोलओलन्हि।

भालसरिक गाछ: MAHABHARAT

भालसरिक गाछ: MAHABHARAT
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: फूसि-फटक
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य

“कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।

“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि”।

“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।

“अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे लिखल रहैत छैक”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”। मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल।

ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक, जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक, तँ सभसँ यैह उत्तर भेटैत अछि-

“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आऽ से जानि कचोट भऽ रहल अछि”।

आऽ जखन ओऽ ओतएसँ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-

“सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।

भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-

“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।

“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।

“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी।

भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। कलक्टर तमसा कए बाहर जएबाक लेल मीत भाइकेँ कहलखिन्ह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल मीत भाइ हुनका देखि-चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।

“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।

“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।

“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय?”

“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।

तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आऽ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओऽ मीत भाइकेँ।

"मीत भाइ। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।

"पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल।

"दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।

“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।

"ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर शिवलिंगकेँ दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे महादेव हुनको हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि, तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ, तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि की? आब कहितहुँ जे नहि पीबि रहल छथि, तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि। से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। से हमहुँ सभकेँ कहलियन्हि, जे भगवान हमरो हाथसँ दूध पीलन्हि।

"सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू"। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।

"दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत-सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल, जे ओकर कोन तरहेँ सत्कार होमए बला छैक। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि, तँ सौँसे देह पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि।

"जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि, तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।

“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू।

"बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ? माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?

मीत भाइ मूरी गोतने "हँ" मे मूरी डोलओलन्हि।

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachhhttp://www.videha.co.in/

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachh
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट

मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि आऽ काका लग दिल्ली पहुँचलाह नोकरी करबाक हेतु, मुदा यावत लाल काका-काकी लग रहलाह, तावत कनैत-कनैत हुनका लोकनिकेँ अकच्छ कऽ देलखिन्ह।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि, तँ भरि दिन उकठपन करैत रहथि। से कथाक बीचमे हमरा जेना-जेना मोन पड़ैत जायत, तेना-तेना हम हुनकर उकठपनक खोरिष कहैत रहब। जौँ मीत भाइक खिस्सा सुनबाक होए तँ यावत ई-सभ अहाँकेँ बुझल नहि रहत तावत धरि नहिये खिस्सा नीक लागत आऽ नहिये बुझबामे आएत।

तँ उकट्ठी छलाह से सिद्ध भेल। आहि रे बा। उकठपनक एकोटा खिस्सा सुनबे नहि कएलहुँ आऽ मानि लेलहुँ जे सिद्ध भए गेल तँ सुनू।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि उकठपनी करैत रहैत छलाह। एक बेर पसीधक काँटक रस पोखड़िमे दऽ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देने रहथि। मुदा ई तँ पसीधक रससँ जुड़ल हुनकर एकटा छोट अपराध छल। पसीधक काँटासँ जुड़ल हुनकर एकटा पैघ अपराधक चर्च आगाँ आब होएत जाहिसँ सौँसे गाम दहसि गेल छल।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक, तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। अऽ ई कहि मीत भाइ महीँस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह।

एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखाऽ पड़लन्हि मीत भाइकेँ तँ पुछलखिन्ह-जे

"हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल"?

बुझू। मीत भाइ एक तँ गलत कारण बतओने छलाह आऽ फेर ओकर दुष्परिणामक सेहो अहलदिलीसँ बाट जोहि रहल छलाह। एहि घटनासँ बड़ थू-थू भेलन्हि गाममे मीत भाइक। ओऽ तँ धन रहल जे मरीजक बाप जखन कलमसँ पसीधक काँटा नेने घुरि रहल छलाह तँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलन्हि आऽ पूछि देलकन्हि। नहि तँ ओऽ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जाऽ रहल छलाह।

मीत भाइ एहि घटनाक बाद कंठी लऽ लेलन्हि। माने आब माँछ-मौस नहि खायब, ई प्रण कएलन्हि। मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आऽ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि। आऽ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह। आब फेर मोसकिल। पहिने बाबा दोगहीक अर्थ बुझि लिअ। नहि तँ कथा फेर बुझबामे नहि आएत।

‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल,कारण जे क्यो बच्चो ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।

आब कथा आगाँ बढ़ाबी। गोनर भाइ मोनमे ई सोचैत रहथि, जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आऽ ओऽ ई सोचि बजलाह।

“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी”।

”यौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”। मीत भाइ बजलाह।

अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।

एहिना एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह-

“की देखि रहल छी”।

गोनर झा कहलखिन्ह- जे

“टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।

“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।

”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।

”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।

आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,

” यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।

मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।

किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।

मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइखा कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित मुदा सुननहार ठाकल बुझि पड़ैत छथि।
मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलन्हि तँ कहए लगलीह
“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।
तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह,
“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।
आ’ बूढ़ी फेर सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।
मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आ’ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ लोकि लेलकन्हि।
”ई की छी”।
”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।
”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।
” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।
”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।
”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”
” ल’ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।
मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।
दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा’ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा ल’ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।
मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ’ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि मीत भाइ जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भ’ गेलाह।

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उदात्त, उदात्ततर, अनुदात्त, अनुदात्ततर, उदातानुरक्तस्वरित, अनुदात्तानुरक्तस्वरित आ’ प्रचय केर विषयमे हमरा सभ परिचय प्राप्त कएने छलहुँ। स्वरित दू प्रकारक अछि- अनुदातानुरक्त आ’ उदातानुरक्त। एहिमे अनुदात्तानुरक्तस्वरित केर 3 प्रकार छैक। ह्र्स्व दीर्घ आ’ प्लुत।
आब एकर विस्तृत विवरण दैत छी।
1.उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानसँ उर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि- जेना अग्नेयम् मे अ आ’ यम् उदात्त अछि। उदात्तक हेतु कोनो चेन्ह नहि देल जाइत अछि। 2. उदात्ततर- जे कण्ठादिक अति उर्ध्व भागसँ बाजल जाइछ। गृभीतान् वौ3षट् एहि मे वौ3षट् उदात्ततर अछि। 3. अनुदात्त- जे कण्ठादिक अधः स्थानसँ बाजल जाइत अछि। अ॒न॒व॒द्यैः – एतय अ॒ आ’ न॒ अनुदात्त अछि।
४.अनुदत्ततर- जे कण्ठादिक अत्यत अधः स्थानसँ बाजल जाइत अछि। अ॒न॒व॒द्यैः मे व॒ अनुदात्त अछि।
व॒रि॒वो॒धात॑मोभव मे वो॒ अनुदात्ततर अछि।
+ जाहिमे एकहि स्वरमे किछु उदात्त आ’ किच्हु अनुदात्त उच्चारण होय, से स्वरित भेल।
५.उदातानुरक्त- पु॒रोहि॑तम् मे हि॑ उदातानुरक्त अछि।
६.अनुदातानुरक्त- जाहि स्वरितस् उदात्त वा स्वरित किवा दुनू बादमे होय। ई तीन प्रकारक अछि-
ह्र्स्व- अ॒प्स्व॒ एक॑(१) न्त एहिमे स्व स्वरितक बाद न्त उदात्त अछि। ताहि लेल स्वमे नीचां ऊपर दुनू चेन्ह लागल।
दीर्घ-रथा॑ना॒ नये॑१राः॒ मे ये॑१ जकरा ये२ सेहो लिखल जाइत अछि दीर्घ भेल।
प्लुत- अ॒भी॒ ती॒न॑(३)ममघ्न्या॑ ममघ्न्या उदात्त स्वरित अछि।
७.प्रचय- स्वरितक बादक अनुदात्तकें एकटा श्रुति स्वर भ’ जाइत छैक, एकरा प्रचय किवा तान कहल जाइत अछि।
दे॒वेषु॑ गच्छति । एतय गच्छतिमे श्रुति स्वर अछि, ऎकर कोनो चेन्ह नहि होइत छैक। मुदा जाहि स्वरित पर अनुदात्तक आगू उदात्त वा स्वरित होयत ओ’ अनुदात्त बनल रहत। ह्यो॑ वर्तनिः एतय ह्यो॑ स्वरितक आंगा व एक श्रुति भेल मुदा त अनुदात्त रहल कारण आगां निः उदात्त अछि।
ऋगवेदमे उदात्त पर कोनो चेन्ह नहि अछि। सामवेदमे ओहि पर 1 संख्या अछि। ऋगवेदमे स्वरित पर ऊपर ठाढ़ रेखा, सामवेदमे संख्या 2 अछि। अनुदात्तमे ऋगवेदमे पड़ल रेखा तँ सामवेदमे संख्या 3 अछि।स्वरितक बादक अनुदात्त(प्रचय) पर दुनू वेदमे कोनो चेन्ह नहि छैक। प्रत्येक वेदक अपन प्रतिशाख्य अछि, जे मोटा-मोटी वेदक व्याकरण अछि। मने पूर्णतया व्याकरणक संगे एहिमे संगीतक ध्वनि सेहो अछि।
सामवेद गेय अछि, बुझू जे ऋगवेदक ऋचाकेँ म्युजिक नोटेशनमे बदलि मात्र देल गेल अछि। सामवेद दू भागमे विभक्त अछि। 1. पूर्वार्चिक, 2.उत्तरार्चिक।
विशेष जानकारीक हेतु http://www.videha.co.in देखू।

बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?

बाट जोहि जोहि ,
मोन ऐछ थाकल ,
मुंह देखे लेल,
मोन ऐछ लागल,
बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?

बीटल बसंत पंचमी, आ,
गेल होली कहिया नै ,
सब पाबैइन अहाँ बिनु बीतल ,
कुन कुन के लिय नाम यौ,
बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?

सहर्षा बाला काका एला,
दुमका बला आईब क गेला,
कहिया आयत अहांके बेटा,
सब पूछैत ऐछ, सब ठाम यौ,
बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?

पाहिले लिखित छलों चिट्ठी-पत्री,
कखनो पठ्बैईत छलौं सनेश,
आब त फ़ोन पर,
क लैएत छी छोट सन राम राम यौ,
बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?

मानल, परदेस बहुत कमेलौं,
हमरो सब लेल खूब पठेलौं,
मुदा माय-बाप के प्रेम सन पैघ,
के द देत दाम यौ,
बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?

कलम-गाछी , अंगना-दालान,
बिनु अहाँ, सब सुनसान,
गाछ मजरल, बाट ताके लगलौं,
आब त पाईक रहल ऐछ आम यौ,
बौवा, कहिया आयब गाम यौ ?


आय मिथिलांचल के हेरेक माँ , अपना बौवा सन येह पूईछ रहल छाई.......



Monday, June 16, 2008

ग़लती ..


ग़लती भेल आय हमरा से
तकर कुनो जबाब नही आय
जकर दुःख -दर्द हम बुझैत छि
लोक लाज से भीने मरैय छी
दूर देश के आय पराई त छी
क्याकी .............

ग़लती भेल आय हमरा से ......

छोटका न्नाह बचा संन छेलो
गुली डांटा मे समय बीतेलो
बाबू काका डटायत रहीगेल
मूर्खख संग मूर्खे भोगेल
मान मे अयल से हम केलो
अपन उमर के मोज उरेलो
क्याकी ..........

ग़लती भेल आय हमरा से ......

पढ़ाई लेल जे कियो किछ बाजे
अपने ही सर पर थापर मारी
मूर्खे अच्छी ई सबटा दुनिया
सोचि -सोच्ची हम नही हिया हरी
बाबा -दादा के संपति नही कम
उही देख के उमर बितैत अच्छी
क्याकी ..........

ग़लती भेल आय हमरा से ......

टी वी भिसियार देखते देखते
गम घर मे घूमते घूमते
नेता सब के भाषण सुन-सुन
ग्न्नू झा के कहानि सुनी -सुनी
अपन कपार हम अपने पिटैय छि
क्याकी .........

ग़लती भेल आय हमरा से ........

माय -बाबू के बात नही मानलो
सर समाजाक मान नही रखलो
चॉक -चोरहा मे हसी उरबी
बारका भैया की सब केलायत
छोट्कि भोजी नहियर ग़मेलायत
ई बात सब हम सोचिते राहलो
अपन कपार मे आगी लगेलो
क्याकी............

ग़लती भेल आय हमरा से ........

पढ़ल लिखल छैथ लूटन बाबू
की अपन ओ नाम बानेलैथ
ओही से निक अक्वाली भैया
महीस चरबैत कोठा बनबेलैथ
फुलबा के अच्छी फुशिक खेती
मुसाए बाबा के फाटल धोती
देखलो गामक ई सब रीत
गबैत रहलो इहा हम गीत
क्याकी .............

ग़लती भेल आय हमरा से.........

अपन जीवन के हम की कहू
खापैर- बारहैंन से नयन जुरेलो
फIशी चढ़लो हम मरी जायब
ज़हरो ख़ाके स्वरगो से एलो
हारल थाकल मिथिला लैब मे बैस्लो
ओ -पी जी कहलायत ई की केलो
मिथिला के आहा नाक कटेलो
क्याकी .............

ग़लती भेल आय हमरा से..........


जय मैथिली, जय मिथिला

~: लेखक :~

मदन कुमार ठाकुर
कोठिया पट्टीटोला
झंझारपुर (मधुबनी)
बिहार - ८४७४०४
मो - ०९३१३०१९९३२

प्रिय मिथिला बंधूगन यदि अपनों अपन कुनू रचना इ ब्लॉग पर राखे चाही तs अपन रचना हमरा इ-मेल करू या ब्लॉग मं सदस्यता ग्रहण के कs ख़ुद अपन रचना काय प्रकाशित करू ..........

~: धन्यवाद :~

Tuesday, June 10, 2008

मोन पौडेत ऐच्छ कलम गाछी

मोन पौडेत ऐच्छ,
आम के कलम,
ओग्रैये छलौं ,
दिन - राईत,
नहिं आब रहलौं,
हम गाम के,
नहिं आब औ ,
गाछ छईथ ॥

सोन्हा-बेलवा, मालदा -कलकतिया,
सिन्दुरिया आ कृष्न्भोग,
कीछ सुखायल , किछ मुर्झायल,
सब गाछ में लागल रोग॥

हमरा मोन ऐच्छ नीक जकाँ,
आम गाछ मजरल जहाँ,
पटिया गेरुआ ल सब भागल गाछी ,
गाम पर रुकल कियो कहाँ ॥

फेर त कियो टिकुला बीछैत,
कियो जोगाड़ में गोपी के,
आन्हर बीहैएर में कियो गमछा भैरेय,
कियऊ मोटरी बनाबे धोती के॥

खट्टा चटनी कुच्चा अचार,
त कियो बेहाल ऐच्छ अम्मत्त में,
आब त गाछी सुनसान पडल ऐच्छ,
जेना ठाढ़ छी मरघट में...




सत्ते हमरा त गाम के कलम-गाछी बड मोन पदैत ऐच्छ, आ अहाँ के

एही चिट्ठा पर हमर अगला पन्ना : सब ठाम रहैत छाईथ एक टा कट्ठ्पिंगल...



Wednesday, June 04, 2008

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachhhttp://www.videha.co.in/

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachh

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट

मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि आऽ काका लग दिल्ली पहुँचलाह नोकरी करबाक हेतु, मुदा यावत लाल काका-काकी लग रहलाह, तावत कनैत-कनैत हुनका लोकनिकेँ अकच्छ कऽ देलखिन्ह।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि, तँ भरि दिन उकठपन करैत रहथि। से कथाक बीचमे हमरा जेना-जेना मोन पड़ैत जायत, तेना-तेना हम हुनकर उकठपनक खोरिष कहैत रहब। जौँ मीत भाइक खिस्सा सुनबाक होए तँ यावत ई-सभ अहाँकेँ बुझल नहि रहत तावत धरि नहिये खिस्सा नीक लागत आऽ नहिये बुझबामे आएत।

तँ उकट्ठी छलाह से सिद्ध भेल। आहि रे बा। उकठपनक एकोटा खिस्सा सुनबे नहि कएलहुँ आऽ मानि लेलहुँ जे सिद्ध भए गेल तँ सुनू।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि उकठपनी करैत रहैत छलाह। एक बेर पसीधक काँटक रस पोखड़िमे दऽ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देने रहथि। मुदा ई तँ पसीधक रससँ जुड़ल हुनकर एकटा छोट अपराध छल। पसीधक काँटासँ जुड़ल हुनकर एकटा पैघ अपराधक चर्च आगाँ आब होएत जाहिसँ सौँसे गाम दहसि गेल छल।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक, तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। अऽ ई कहि मीत भाइ महीँस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह।

एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखाऽ पड़लन्हि मीत भाइकेँ तँ पुछलखिन्ह-जे

"हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल"?

बुझू। मीत भाइ एक तँ गलत कारण बतओने छलाह आऽ फेर ओकर दुष्परिणामक सेहो अहलदिलीसँ बाट जोहि रहल छलाह। एहि घटनासँ बड़ थू-थू भेलन्हि गाममे मीत भाइक। ओऽ तँ धन रहल जे मरीजक बाप जखन कलमसँ पसीधक काँटा नेने घुरि रहल छलाह तँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलन्हि आऽ पूछि देलकन्हि। नहि तँ ओऽ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जाऽ रहल छलाह।

मीत भाइ एहि घटनाक बाद कंठी लऽ लेलन्हि। माने आब माँछ-मौस नहि खायब, ई प्रण कएलन्हि। मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आऽ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि। आऽ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह। आब फेर मोसकिल। पहिने बाबा दोगहीक अर्थ बुझि लिअ। नहि तँ कथा फेर बुझबामे नहि आएत।

‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल,कारण जे क्यो बच्चो ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।

आब कथा आगाँ बढ़ाबी। गोनर भाइ मोनमे ई सोचैत रहथि, जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आऽ ओऽ ई सोचि बजलाह।

“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी”।

”यौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”। मीत भाइ बजलाह।

अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।

एहिना एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह-

“की देखि रहल छी”।

गोनर झा कहलखिन्ह- जे

“टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।

“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।

”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।

”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।

आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,

” यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।

मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।

किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।

मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइखा कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित मुदा सुननहार ठाकल बुझि पड़ैत छथि।
मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलन्हि तँ कहए लगलीह
“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।
तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह,
“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।
आ’ बूढ़ी फेर सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।
मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आ’ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ लोकि लेलकन्हि।
”ई की छी”।
”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।
”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।
” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।
”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।
”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”
” ल’ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।
मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।
दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा’ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा ल’ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।
मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ’ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि मीत भाइ जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भ’ गेलाह।

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भालसरिक गाछ: bhalsarik gachh

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य: मीत भाइ आऽ लालकिलाक भारत रत्न सभ

अपन मित्रकेँ लाल काकीक घरक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। आब अहाँ कहब जे मित्रक नाम किएक नहि कहि रहल छी, तँ सुनू हमर एकेटा मित्र छथि। आऽ से छथि जे अपन तरहक एकेटा छथि, आऽ से छथि मीत भाइ।

आब आगाँ बढ़ी। मीत भाइ हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।


भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे मीत भाइ अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह। मीत भाइकेँ एहि बजारसँ, सस्त आऽ नीक चीज, किनबाक लूरि नहि छन्हि से हम कहैत छलियन्हि।

ओहि परीक्षणक दिन, मीत भाइक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे मीत भाइक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। मीत भाइक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ मीत भाइ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएलन्हि जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह।

“अहाँ कहूतँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”।

तखन झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।

हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।

हमर मीत भाइक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल।

विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने मीत भाइक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर (चोर बजारक चोर विक्रेता महाराज) मुताबिक मूरे-मूर छल,जुत्ता देनाइ गछलखिन्ह। विक्रेता महाराज जुत्ताकेँ अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।

आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।

“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखी तँ पैरके सरा दैत रही आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन लाल काकीक घरक एहि सीढ़ीसँ उतरैत रही, तखने जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तसँ बाहर आबि गेल।

"मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे"।

फेर बजैत रहलाह-

“आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू ”।

आब हमरा तँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल मीत भाइ गाम चलि गेलाह। आऽ हम प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ जे नहि तँ अगिला रविकेँ चोर बजारक आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल अछि, जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

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1.
भजन विनय
प्रभू बिनू कोन करत दुखः त्राणः॥ कतेक दुःखीके तारल जगमे भव सागर बिनू जल जान, कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल सोर ने सिनई छी कानः॥ अहाँ के त बैनि परल अछि पतित उधारन नाम ।नामक टेक राखू प्रभू अबहूँ हम छी अधम महानः॥ जौँ नञ कृपा करब एहि जन पर कोना खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहिँ सहारा दोसर के अछि आनः॥
2. भजन लक्ष्मी नारायण जीक विनय
लक्ष्मी नारायण अहाँ हमरा ओर नञ तकइ छी यौ। दीनदयाल नाम अहाँके सभ कहए अछि यौ। हमर दुःख देखि बिकट अहाँ डरए छी यौ। ब्याध गणिका गिध अजामिल गजके उबारल यौ। कौल किरात भिलनी अधमकेँ उबारल यौ। कतेक पतितके तारल अहाँ मानि के सकत यौ। रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ के धाम गेलायो। ज्यों न हमरा पर कृपा करब हम कि करब यौ। रामजी अनाथ एक दास राखु यौ। 3. भजन विनय भगवती
जय जय जनक नन्दिनी अम्बे, त्रिभुवन के तू ही अवलम्बेः। तुमही पालन कारनी जगतके, शेष गणेश सुरन केः। तेरो महिमा कहि न सकत कोउ, सकुचत सारभ सुरपति कोः। मैँ हूँ परमदुखी एहि जगमे, के नञ जनए अछि त्रिभुवनमेः॥ केवल आशा अहाँक चरणके, राखू दास अधम केः॥ कियो नहि राखि सकल शरणोंमे, देख दुखी दिनन केः॥ जौँ नहि कृपा करब जगजननी, बास जान निज मनमे। तौँ मेरो दुख कौन हटावत, दोसर छाड़ि अहाँकेः॥ कबहौँ अवसर पाबि विपति मेरो कहियो अवधपति को, रामजी को नहि आन सहारा छाड़ि चरण अहाँकेः॥
4. भजन विनय
प्रभु बिनु कौन करत दुःख त्राणः।। कतेक दुखीके तारल जगमे भवसागर बिनु जल जानः॥ कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल, स्वर नञ सुनए छी कानः।। अहाँके तौँ बानि पड़ल अछि,पतित उधारण नामः।
नामक टेक राखु अब प्रभुजी हम छी अधम जोना।
कृपा करब एहि जन पर कोन खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहि सहारा दोसर के अछि आनः॥

5. विहाग

भोला हेरू पलक एक बेरः॥ कतेक दुखीके तारल जगमे कतए गेलहुँ मेरो बेरः॥ भूतनाथ गौरीवरशंकर विपत्ति हरू एहि बेरः॥ जोना कृपा करब शिवशंकर कष्ट मिटत के औरः॥ बड़े दयालु जानि हम एलहुँ अहाँक शरण सुनि सोरः॥ रामजीके नहि आन सहारा दोसर केयो नहि औरः॥
6. भजन महेशवाणी
भोला कखन करब दुःख त्रान? त्रिविध ताप मोहि आय सतावे लेन चहन मेरो प्राण॥ निशिवासर मोहि युअ समवीने पलभर नहि विश्रामः॥ बहुत उपाय करिके हम हारल दिन-दिन दुःख बलबान, ज्यौँ नहि कृपा करब शिवशंकर कष्ट के मेटत आन॥ रामजीके सरण राखू प्रभु, अधम शिरोमणि जान॥भोला.॥
7.
विनय विहाग
राम बिनु कौन हरत दुःख आन कौशलपति कृपालु कोमल चित जाहि धरत मुनि ध्यान॥ पतित अनेक तारल एहि जगमे, जग-गणिका परधान।। केवट,गृद्ध अजामिल तारो, धोखहुषे लियो नाम, नहि दयालु तुअ सम काउ दोसर, कियो एक धनवान।। रामजी अशरण आय पुकारो, भव ले करू मेरो त्राण॥रामबिनु॥

8. भजन विनय
लक्ष्मीनारायण हमर दुःख क्खन हरब औ॥ पतित उधारण नाम अहाँके सभ कए अछि औ, हमरा बेर परम कठोर कियाक होइ छी औ।। त्रिविध ताप सतत निशि दिन तनबै अछि औ॥ अहाँ बिना दोसर के त्राण करत औ॥ देव दनुज मनुज हम कतेक सेवल औ, कियो ने सहाय भेला विपति काल औ॥ कतेक कहब अहाँके जौँ ने कृपा कर औ, रामजीके चाड़ि अहाँक के शरण राखन औ॥
9. भजन विनय एक बेर ताकू औ भगवान, अहाँक बिना दोसर दुःख केहरनाअन॥ निशि दिन कखनौ कल न पड़ै अछि,
कियो ने तकैये आन केवल आशा अहाँक चरणके आय करू मेरे त्राण॥ कतेक अधमके तारल अहाँ गनि ने सकत कियो आन, हमर वान किछु नाहि सुनए छी, बहिर भेल कते कान॥ प्रबल प्रताप अहाँक अछि जगमे
के नहि जनए अछि आन, गणिका गिद्ध अजामिल गजके जलसे बचावल प्राण॥ जौँ नहि कृपा करब रघुनन्दन, विपति परल निदान, रामजीके अब नाहि सहारा, दोसर के नहि आन॥
10. महेशवानी
सुनू सुनू औ दयाल, अहाँ सन दोसर के छथि कृपाल॥ जे अहाँ के शरण अबए अछि सबके कयल निहाल, हमर दुःख कखन हरब अहाँ, कहूने झारी लाल॥ जटा बीच गंगा छथि शोभित चन्द्र विराजथि भाल, झारीमे निवास करए छी दुखियो पर अति खयाल॥ रामजीके शरणमे राखू, सुनू सुनू औ महाकाल, विपति हराऊ हमरो शिवजी करू आय प्रतिपाल॥

11. महेशवानी

काटू दुःख जंजाल,
कृपा करू चण्डेश्वर दानी काअटू दुःख जंजाल॥ जौँ नहि दया करब शिवशंकर, ककरा कहब हम आन, दिन-दिन विकल कतेक दुःख काटब
जौँ ने करब अहाँ खयाल॥ जटा बीच गंगा छथि होभित, चन्द्र उदय अछि भाल, मृगछाला डामरु बजबैछी, भाँग पीबि तिनकाल॥ लय त्रिशूलकाटू दुःख काटू, दुःख हमरो वेगि करू निहाल, रामजी के आशा केवल अहाँके, विपति हरू करि खयाल॥

12. महेशवानी
शिव करू ने प्रतिपाल, अहाँ सन के अछि दोसर दयाल॥ भस्म अंग शीश गंग तीलक चन्द्र भाल, भाँग पीब खुशी रही , रही दुखिया पर खयाल। बसहा पर घुमल फिरी, भूत गण साथ, डमरू बजाबी तीन
नयन अछि विशाल॥ झाड़ीमे निवास करी, लुटबथि हीरा लाल, रामजी के बेर शिव भेलाह कंगाल॥
13.
महेशवानी
शिवजी केहेन कैलौँ दीन हमर केहेन॥ निशिदिन चैन नहि
चिन्ता रहे भिन्न, ताहू पर त्रिविध ताप कर चाहे खिन्न॥ पुत्र दारा कहल किछु ने सुनै अछि काअ ताहू पर परिजन लै अछि हमर प्राण॥ अति दयाल जानि अहाँक शरण अयलहुँ कानि, रामजी के दुःख हरू अशरण जन जानि॥

14.
महेशवानी
विधि बड़ दुःख देल, गौरी दाइ के एहेन वर कियाक लिखि देल॥ जिनका जाति नहि कुल नहि परिजन, गिरिपर बसथि अकेल, डमरू बजाबथि नाचथि अपन कि भूत प्रेत से खेल॥ भस्म अंग शिर शोभित गंगा,
चन्द्र उदय छनि भाल
वस्त्र एकोटा नहि छनि तन पर
ऊपरमे छनि बघछाल,
विषधर कतेक अंगमे लटकल, कंठ शोभे मुंडमाल, रामजी कियाक झखैछी मैना गौरी सुख करती निहाल॥

15.
विहाग
वृन्दावन देखि लिअ चहुओर॥
काली दह वंशीवट देखू, कुंज गली सभ ठौर, सेवा कुंजमे ठाकुर दर्शन, नाचि लिअ एक बेर॥ जमुना तटमे घाट मनोहर, पथिक रहे कत ठौर, कदम गाछके झुकल देखू, चीर धरे बहु ठौर॥ रामजी वैकुण्ठ वृन्दावन घूमि देखु सभ ठौर, रासमण्ड ल’ के शोभा देखू, रहू दिवस किछु और।। 16. विहाग
मथुरा देखि लिअ सन ठौर॥ पत्थल के जे घाट बनल अछि, बहुत दूर तक शोर, जमुना जीके तीरमे, सन्न रहथि कते ठौर॥ अस्ट धातुके खम्भा देखू, बिजली बरे सभ ठौर, सहर बीच्मे सुन्दर देखू, बालु भेटत बहु ढ़ेर॥ दुनू बगलमे नाला शोभे, पत्थल के है जोर कंशराजके कीला देखू देवकी वो वसुदेव॥ चाणूर मुष्टिक योद्धा देखू कुबजा के घर और, राधा कृष्णके मन्दिर देखू, दाउ मन्दिर शोर॥ छोड़ विभाग
रामजी मधुबन, घूमि लिअ अब, कृष्ण बसथि जेहि ठौर॥ गोकुल नन्द यशोदा देखू कृष्ण झुलाउ एक बेर॥
17. महेशवानी
भोला केहेन भेलौँ कठोर, एक बेर ताकू हमरहुँ ओर॥ भस्म अंग शिर गंग विराजे, चन्द्रभाल छवि जोर।।
वाहन बसहा रुद्रमाल गर, भूत-प्रेतसँ खेल॥ त्रिभुवन पति गौरी-पति मेरो जौँ ने हेरब एक बेर, तौँ मेरो दुःख कओन हरखत सहि न सकत जीव मोर॥ बड़े दयालु जानि हम अयलहुँ, अहाँक शरण सूनि शोर, राम-जी अश्रण आय पुकारो, दिजए दरस एक बेर॥
18. भजन विनय
सुनू-सुनू औ भगवान, अहाँक बिना जाइ अछि
आब अधम मोरा प्राण॥
कतेक शुरके मनाबल निशिदिन कियो न सुनलनि कान, अति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥ बन्धु वर्ग कुटुम्ब सभ छथि बहुत धनवान, हमर दुःख देखि-देखि हुनकौ होइ छनि हानि।। रामजी निरास एक अहाँक आशा जानि, कृपा करी हेरु नाथ, अशरण जन जानि॥
19. महेशवाणी
देखु देखु ऐ मैना, गौरी दाइक वर आयल छथि, परिछब हम कोना। अंगमे भसम छनि,भाल चन्द्रमा
विषधर सभ अंगमे, हम निकट जायब कोना॥ बाघ छाल ऊपर शोभनि,मुण्डमाल गहना, भूत प्रेत संग अयलनि,बरियाती कोना॥ कर त्रिशूल डामरु बघछाला नीन नयना हाथी घोड़ा छड़ि पालकी वाहन बरद बौना॥ कहथि रामजी सुनु ऐ मनाइन, इहो छथि परम प्रवीणा, तीन लोकके मालिक थीका, करु जमाय अपना॥

20.
महेशवानी
एहेन वर करब हम गौरी दाइके कोना॥ सगर देह साँप छनि, बाघ छाल ओढ़ना, भस्म छनि देहमे,विकट लगनि कोना॥
जटामे गंगाजी हुहुआइ छथि जेना, कण्ठमे मुण्डमाल शोभए छनि कोना॥ माथे पर चन्द्रमा विराजथि तिलक जेकाँ, हाथि घोड़ा छाड़ि पालकी,बड़द चढ़ल बौना॥ भनथि रामजी सुनु ऐ मैना, गौरी दाइ बड़े भागे, पौलनि कैलाशपति ऐना॥

21.
भजन विहाग
राम बिनु विपति हरे को मोर॥ अति दयालु कोशल पै प्रभुजी, जानत सभ निचोर, मो सम अधम कुटिल कायर खल, भेटत नहि क्यो ओर॥ ता’ नञ शरण आइ हरिके हेरू प्लक एक बेर, गणिका गिद्ध अजामिल तारो पतित अनेको ढेर॥ दुःख सागरमे हम पड़ल छी, जौँ न करब प्रभु खोज, नौँ मेरो दुःख कौन हारावन, छड़ि अहाँ के और॥ विपति निदान पड़ल अछि निशि दिन नाहि सहायक और, रामजी अशरण शरण राखु प्रभु, कृपा दृष्टि अब हेरि॥ 22. भजन विहाग
विपति मोरा काटू औ भगवान॥
एक एक रिपु से भासित जन, तुम राखो रघुवीर, हमरो अनेक शत्रु लतबै अछि, आय करू मेरो त्राण॥ जल बिच जाय गजेन्द्र बचायो, गरुड़ छड़ि मैदान, दौपति चीर बढ़ाय सभामे, ढेर कयल असमान॥ केवट वानर मित्र बनाओल, गिद्ध देल निज धाम, विभीषणके शरणमे राखल राज कल्प भरि दान॥ आरो अधम अनेक अहाँ तारल सवरी ब्याध निधान, रामजी शरण आयल छथि, दुखी परम निदान॥

23.
महेशवानी
हम त’ झाड़ीखण्डी झाड़ीखण्डी हरदम कहबनि औ॥ कर-त्रिशूल शिर गंग विराजे, भसम अंग सोहाई, डामरु-धारी डामरुधारी हरदम कहबनि औ॥ चन्द्रभाल धारी हम कहबनि, विषधरधारी विषधरधारी हरदम कहबनि औ॥ बड़े दयालु दिगम्बर कहबनि,गौरी-शंकर कहबनि औ, रामजीकेँ विपत्ति हटाउ, अशरणधारी कहबनि औ॥
24.

चैत नारदी जनानी
बितल चैत ऋतुराज चित भेल चञ्चल हो, मदल कपल निदान सुमन सर मारल हो॥ फूलल बेलि गुलाब रसाल कत मोजरल हो, भंमर गुंज चहुओर चैन कोना पायब हो॥ युग सम बीतल रैन भवन नहि भावे ओ, सुनि-सुनि कलरव सोर नोर कत झहरत हो॥ रामजी तेजब अब प्राण अवधि कत बीतल हो, मधुपुर गेल भगवान, पलटि नहि आयल हो॥
25. भजन लक्ष्मीनारायण
लक्ष्मीनारायण हमरा ओर नहि तकय छी ओः॥ दीन दयाल नाम अहाँक सब कहैये यौ हमर दुखः देखि विकट अहूँ हरै छी योः॥ ब्याध गणिका गृध अजामिल गजके उबाड़ल यो कोल किरात भीलनि अधमके ऊबारल यो कतेक पैतके तारल अहाँ गनि के सकत यो रुद्रपुरके भोल्मनाथ अहाँ धाम गेलायोः॥ जौँ नञ हमरा पर कृपा करब हम की करब यौ रामजी अनाथ एक दास राखू योः॥
26. महेशवानी
शिव हे हेरु पलक एक बेर हम छी पड़ल दुखसागरमे
खेबि उतारु एहि बेर॥ जौँ नञ कृपा करब शिवशंकर हम ने जियब यहि और॥ तिविध ताप मोहि आय सतायो
लेन चह्त जीव मोर॥ रामजीकेँ नहि और सहारा, अशरण शरणमे तोर॥

27.
समदाउन
गौनाके दिन हमर लगचाएल सखि हे मिलि लिअ सकल समाजः॥ बहुरिनि हम फेर आयब एहि जग दूरदेश सासुरके राजः॥ निसे दिन भूलि रहलौँ सखिके संग नहि कएल अपन किछु काजः। अवचित चित्त चंचल भेल बुझि
मोरा कोना करब हम काजः। कहि संग जाए संदेश संबल किछु दूर देश अछि बाटः॥ ऋण पैंच एको नहि भेटत
मारञमे कुश काँटः॥ हमरा पर अब कृपा करब सभ क्षमब शेष अपराध रामजी की पछताए करब अब
हम दूर देश कोना जाएबः॥

28.
महेशवाणी
कतेक कठिन तप कएलहुँ गौरी
एहि वर ले कोना॥
साँप सभ अंगमे सह सह करनि कोना, बाघ छाल ऊपरमे देखल, मुण्डमाल गहना॥ संगमे जे बाघ छनि,बरद चढ़ना,
भूत प्रेत संगमे नाचए छनि कोना॥ गंगाजी जटामे हुहुआइ छथि कोना, चन्द्रमा कपार पर शोभए छथि कोना। भनथि रामजी सुनुए मैना, शुभ शुभ के गौरी विवाह हठ छोड़ू अपना॥

Friday, May 30, 2008

खट्टर काका सं वार्तालाप (मिथिला के संदर्भमे)



(हम खट्टर काका के दलान पर जखन पहुचलो खट्टर काका भोजनोपरांत कुर्सी पर बैसल छालैथ)

हम कहाल्यैन खट्टर काका गोर लगैत छी !

खट्टर काका - जिवैत रहू हम आहा के पह्चैन नै पेलो आहा के थिको !

हम - हम मैथिल और मिथिला सं आयल छी , हमर नाम मदन कुमार ठाकुर भेल, हमर घर कोठिया - पट्टीटोला अछि

खट्टर काका - तखन आहा हमरा सं की पुछेय चाहैत छी !

हम - आई सं किछ साल पहिने अपनेक ओहिठंम हरिमोहन भईया आयल छालैथ ओ आहा सं चुरा दही चीनी के मूल तत्व के वर्णन जाने आयल छलाह ! तीनो लोक से मिल के बनल अछि जे इ चुरा दही चीनी से आहा सं जानकारी हुनका भेटलैन ! ओही उद्देश सं हम आय अपनेक समक्ष मिथिला विकाश के संदर्भ मं किछ बात करै लेल आयल छी यदि अपनेक के आज्ञा होय त हम किछ अर्ज करी !

खट्टर काका - बाजल जाऊ आहा की पूछे चाहेत छी !

हम - खट्टर काका हम मिथिला के संस्कृति पर पहिने ध्यान देब चाहैत छी जे हमर संस्कृति कहेंन अछि, एकर मान - सम्मान, आचार - वैवहार एक दोसर के प्रति आदर - सत्कार, प्रेम - भावना कहेंन अछि ! आगा जेके एकर मिथिला के उत्पवित संतान पर कतेक प्रभाव परते और नारी जाती के कतेक सम्मान रहते ! मिथिला महान बनत की नै से हम अपने सं जाने चाहे छी !

खट्टर काका - मदन बाबु यदि मिथिला के संस्कृति के बात करी त पहिने बीतल इतिहास के देखि ! आय से कई साल पहिने विद्यापति जी छला मंडनमिश्र, अयाची मिश्र शंकराचार्य जी इत्यादि अनेक महाविद्वान सब भेलैथ ओ सब अपन - अपन कर्तव्य पुरा के क मिथिला के मान - सम्मान दैत चल बैसला ! एतबे नै हम राजा जनके लग सं सुनैत छी मिथिला वर्णन, मिथिला दर्शन, मिथिला के आचार - बिचार दोसर के प्रति सदभावना मधुरबचन इ सब त अपन मिथिला के देन अछि ! दोसर थम कथापी इ कतो नै भेटत क्येक त इ मिथिला मेखूबी छै जे एक - दोसर सं प्रेम मधुर बोली केना बाजल जायत अछि, आय यदि मिथिला बासी चाहैथ जे हमरा संस्कृति पर कुनू आंच नै आबय त पहिने अपन घर के संस्कृति पर ध्यान देब परतेय ! क्येक त हम आय घर - घर मे देखैत छी जे अपन संस्कृति के छोड़ी विदेशी कल्चर लोग अपनाबैत अछि ! माँ - बाबूजी कहब त दूर आब मोम - डैड कहल जायत अछि ! एक दोसर के प्रणाम केनाय त दूर आब हेल्लो - हाई बाजल जायत अछि ! मानलो आई - कैल मे लोग सब किछ अंग्रेजी ज्यादा पैढ़ - लिख लेलक अमेरिका लन्दन सब जाय लागल तकर माने की हम अपन संस्कृति के छोरी दिए इ हमर कर्तव्य अछि इ हमर अधिकार अछि जे विदेशो मे जाय के अपन संस्कृति के उपयोग करी ताहि मे हमर सब मिथिला वासी के कल्याण होयत , और हर मिथिला राज्य आगा - आगा मार्ग पर चलैत रहत ! हमर इ कामना आर दुवा अछि !

हम - खट्टर काका हम देखैत छी जे हमरा मिथिला मे महान - महान कविगन, लेखक, डॉक्टर, इंजिनियर,प्रेस रिपोर्टर सब छैथ ताहि उपरांत हमर मिथिला राज्य आगा विकाश क्येक नै के रहल अछि ! एकर की कारन अछि ?

खट्टर काका - देखु मदन बाबु आय कैल के जूग मे सब अपन - अपन रोजी - रोटी के मार्ग बनबैत छैथ ! दोसर से दोसर के ककरो - ककरो त मेलो - मिलाप नै होइत छैन ताहि हेतु ओ मिथिला विकाश की ओ त अपन घरो के विकाश नै कs सकैत छैथ !

हम - खट्टर काका हम देखैत और सुनैत छी जे आय कैल मे सरकार शिक्षा पर पूर्णरुपे खर्चा कs रहल अछि ! ताहि उपरांत कुनू परिवर्तन नै देखैत छी , सब कियो दिल्ली - मुम्बई भागैत फिरैत अछि !

खट्टर काका - सुनु सब के मन के सोच अपन अलग - अलग होइत छै यदि कुनू आदमी के पैसा ज्यादा भ जायत छै त ओकरा पैसा कूट-कूट काटे लगे छै त ओ अपन पाई के जोगार करतै न ! हुनके सब के देख के आस - पास के जे रहनिहार सब छैथ सब सोचैत छैथ जे फलना के बेटा दिल्ली गेले त हमर बेटा क्येक नै मुम्बई जेता इ जे गाम-घर के रित रिवाज बनल अछि दे बड ख़राब अछि ! अहि मे शिक्षक गन की करता ओ अपन हाजरी लगबैत छैथ और तनखा पबैत छैथ ! अहि मे मारल जायछी हम गाम - घर के गरीब लोकसब (नै घर के नै घाट के) और विषेस की कहब !

हम - खट्टर काका हम हर सहर मे सुनैत छी जे उत्तरी बिहार के सब जिला के सड़क यातायात पर केन्द्र सरकार के सेहो नज़र गेलैन हं ओ नितिस जी के माध्यम सं दिल्ली आसाम रोड सेहो बनी रहल अछि और साथ मे ग्रामीण सरक व्यवस्था के सेहो सूधार भ रहल अछि !

कट्टर काका - हाँ हाँ से तs हमहू सुनैत और देखैत छी सब इ चैल नेता सब के जे N H और ग्रामीण सरक व्यवस्था भ रहल अछि ! की कहू आहा के आय सs साठ साल पहिने हमरा गाम से पूरब पुल टूटल से त एखन तक कियो सोंगर दै बाला नही आयल ! बाढ़ी मे गामक गाम दैह गेल से तs देखेय लेल कियो नही आयल और आहा कहैत छी जे रोड बनबैत अछि ! पिछिला साल न्यूज़ मे सुनलो जे केवल मधुबनी बिकाश के लेल चारी हजार करोड़ रुपैया केन्द्र सरकार देल्कैय से तs नेता और मुखिया सब कुनू पैर - पैखी नही लगेय देल्कैय आ आहाँ कहैत छी जे यातायात व्यवस्था बरहल अछि यो मदन बाबु सब कियो अपन कुर्सी के फ़ायदा उठा रहल अछि !

हम - खट्टर काका तखन किसान भाई के लेल सेहो काफी मुवाब्जा भेट रहल अछि जेनाकी दहार के सुखार के और जगह जगह पर बिजली पम्प के व्यवस्था हर गाव हर पंचैत मे चालू होई बाला अछि कई जगह सब मे नहर के सेहो व्यवस्था भगेल और भो रहल अछि ! अहि विषय पर अपने'क की विचार अछि !

खट्टर काका - सुनू मदन बाबु हमरा सं जे पूछी तs हम सचे कहब की गामक - गाम दहा जायत छै आ मुवाब्जा भेटैय छै एक दु गाम मं जिनकर गाम मे कुछ नाम गाम छै ओ अपन पुरा पुरा प्रोपटी के नाम लिखा दैत छै इये हाल सब जिला के हरेक ब्लोक मे अछि ! और बिजली व्यवस्था के की कहू जिला मे दु तीन थम के नाम सुन्लीय हम आ नहर व्यवस्था व्यवस्था सब चौपट कs गेल जेता किसान भाई के खेती करैय बाला जमीन छल से तs नहर मे चल गेल ओ खेती की करता ! खेत गेला के बात हम १० वर्ष से देखैत छी जे नहर मे पैन नै, आब कतेक नहर पैन के आशा ओ तs धन्यवाद दियोंन इन्द्र देवता के जे हुन्कर कखनो कखनो दया दृष्टि हमरो सब पर भो जैट छैन !

हम - खट्टर काका हम मिथिला बासी के मुह सं सुनैत छी जे हमरा मिथिला राज्य चाही ताहि मे अपने'क की राय अछि ?

खट्टर काका - यदि हमर मिथिला राज्य अलग भो जायैत अछि तs बहुत गर्व के बात छी फेर पुनः मिथिला विदेहक नगरी कहाओत और मिथिला के मान - सम्मान पान मखान सं होयत

जय मैथिली, जय मिथिला

~: लेखक :~
मदन कुमार ठाकुर
कोठिया पट्टीटोला
झंझारपुर (मधुबनी)
बिहार - ८४७४०४
मो - ०९३१३०१९९३२

प्रिय मिथिला बंधूगन यदि अपनों अपन कुनू रचना इ ब्लॉग पर राखे चाही तs अपन रचना हमरा इ-मेल करू या ब्लॉग मं सदस्यता ग्रहण के कs ख़ुद अपन रचना काय प्रकाशित करू ..........

~: धन्यवाद :~

Monday, May 19, 2008

मैथिली भाषा gajendrathakur: bhalsarik gachhhttp://www.videha.co.in/

gajendrathakur: bhalsarik gachh

मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट: मीत भाइक दिल्ली यात्रा आऽ आगाँ

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटलाक स्थितिमे अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। बुधि जेना हेरा हेल छलन्हि, वा अपनासँ बेशी बुधियार लोकनिसँ सोझाँ-सोझी भए जाइत छलन्हि। अहाँ कहब जे पहिने की भेल से तँ कहबे नञि कएलहुँ तखन हमरा सभ कोना बुझब जे की भेल। तँ सुनू, एकर उत्तर सेहो हमर लग अछि। हम एहि कठाक कथाकार छी से हमरा सभटा बुझल अछि जे की होएबला अछि। ओना यावत हम कथा सुनबैत रहब तावत बीचोमे पुरनका प्लॉटसँ हटि कए हम कथा कहए लागब। मुदा विश्वास करू जे कठा चहटगर बनाबए लेल हम ई करब। हमर अपन कोनो स्वार्थ एहिमे नहि रहत।

तँ आगाँ बढ़ी। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ मीत भाइक सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलखिन्ह तँ कहए लगलीह -

“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।

तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह-,

“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।

आऽ बूढ़ी फेर मीत भाइकेँ सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।

मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आऽ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए मीत भाइक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर लोकि लेलकन्हि।

”ई की छी”।

”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।

”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।

” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।

”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।

”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”

” लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।

मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।

दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगाऽ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।

मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचाऽ जाइत छलन्हि आऽ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। मीत भाइ लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भऽ गेलाह। मुदा लालकाकी दिल्ली घुमि लिअ, लाल किला देखि लिअ, ई कहि दू-चारि दिनक लेल रोकि लेलखिन्ह। मुदा असल गप हमरा बुझल अछि। लालकाकी हुनकासँ गामघरक फूसि-फटक सुनबाक लेल रोकने छलखिन्ह।

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