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Tuesday, January 20, 2009

सन्त साहेब रामदास- डॉ. पालन झा

सन्त साहेब रामदास

साम्प्रदायिक अर्थें मैथिली साहित्यमे सन्त कविक रूपमे साहेब रामदासक प्रमुख स्थान अछि। पचाढ़ी स्थानक महंथ बंशीदासजीक सानिध्यमे कवीश्वर चन्दा झा हिनक पदावलीक संकलन कए १९०१ . मे प्रकाशित कएने छथि। एहि पदावलीमे परिचयक क्रममे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि:

शिवलोचन मुख शिव सन जखन, साहेब रामदास तिथि तखन।

प्रबल नरेन्द्र सिंह मिथिलेश, शासित छल भल तिर्हुत देश॥

अर्थात् ११५३ साल (१७४६ .) मध्य महाराज नरेन्द्र सिंहक राज्यकालमे रहथि।

छादनसँ न्याय-तत्त्व-चिन्तामणि कर्ता गंगेश उपाध्याय वंश कुलोद्भव साहेब रामदास कुसुमौलग्रामक ( जरैल परगना, जिला- मधुबनी ) एक मैथिल ब्राह्मण छलाह।हिनक छोट भाइक नाम कुनाराम ओऽ एकमात्र प्राणसमप्रिय पुत्र प्रीतमछलनि। हिनक पूरानाम साहेब राम झा छलनि, मुदा अन्य सन्त कवि जकाँ ईहो अपन नामक आगाँ भक्ति-भावनासँ दासशब्द जोड़ि लेलनि। साहेब रामदासक पदावलीमे लगभग ४७८ टा पद संकलित अछि। एहि कविता मध्य अपन नाम साहेबराम, साहेबदास, साहेब, साहेबजन सेहो रखने छथि।

साहेब रामदास आरम्भहिसँ भक्ति-प्रवण विचारक लोक छलाह। ई सदिखन ईश्वरहिक ध्यान-चिन्तनमे लीन रहैत छलाह। सन्यास बादमे ग्रहण कएलनि। एहि पाछाँ एकटा दुखद घटना घटित भेल- हिनका एकमात्र पुत्र प्रीतमछलनि। ओऽ अधिक समय दुखित रहए लगलाह। उवावस्था छलनि। एकबेर प्रीतम अधिक दुखित भए गेल छलाह। हिनक जीवनक अन्तिम कालक भान भए जएबाक कारणेँ साहेबरामदासविकल भए कानए लगलाह। मरण शय्या पर रहितहुँ प्रीतमकेँ एहन दुःखद दृश्य देखि नहि रहल गेलनि आऽ ओऽ अपन पितासँ पुछैत छथिन,बाबूजी! अपने एतेक विकल किएक भए रहल छी? पिता उत्तर दैत छथिन पुत्रक आवश्यकता एहि चतुर्थ अवस्थामे होइत छैक, से तँ अपने हमरा पहिने छोड़ि कए जाए रहल छी, तैँ सोचि-सोचि खिन्न चित्त भए व्याकुल भए रहल छी। पुत्र प्रीतम प्रत्युत्तर दैत कहैत छथिन, संसार असार थिक, क्षणभंगुर थिक, एहिमे स्त्री-पुत्र-पुत्री केओ अपन नहि थिक, सभटा अनित्य थिक, माया-मोह थिक। सभटा स्वार्थमूलक थिक तेँ एहि सभसँ माया-मोह रखनाइ अनुचित थिक। हम तँ अपनेक भगवन्-भजनमे विघ्न मात्र छलहुँ, आब अपने निर्विघ्नपूर्वक भगवन्-भजनमे लागि जाऊ। एतेक बात कहैत देरी प्रीतमक प्राण-पखेरू उड़ि गेलनि। साहेब रामदास विकल भए कानि-कानि कए गाबए लगलाह-

प्रीतम प्रीति तेजि भेल परदेसिआ हो

साहेब रामदासकेँ प्रीतमक देहावसानसँ बड़ आघात लगलनि, प्रीतमक उपदेशकेँ धारण कए परिवार-समाजकेँ तिलाञ्जलि दए सन्यास ग्रहण कए लेलनि।

पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि।

बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि-

साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि,

आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी।

नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता,

आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की।

सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला,

आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की।

सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल,

आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की।

साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि,

आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की।

गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ-

“गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है।

अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”।

कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन।

साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास।

पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक पचाढ़ीगाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि।

कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि

“पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम।

चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥

पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि।

पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि।

साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि।

राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि-

“साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख,

करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”।

एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि-

“अब न चाहिए अति देर प्रभुजी,

अब न चाहिए अति देर।

विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन,

लियो है असुरगण घेरि”।

गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल।

एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि।

साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि।

“निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”।

“धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”।

साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि।

मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ-

“प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण।

कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥

जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार।

धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”।

हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि-

“ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम।

कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥

हाथ भसम केर गोला हे राम।

वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥

विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि:

“कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक।

कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥

के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल।

लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥

जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम।

हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥

आदि”

मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि।

साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि।

Saturday, January 17, 2009

सत्यानास केलक बिमारी - मदन कुमार ठाकुर

(हम आइ एक महिना सँ हॉस्पिटल मे बेड रेस्ट यानी बीमार आवस्था मे छी ! जाहि सँ कतेक फोन, कतेक ई-मेल, कतेको फरमाईस, कतेको मज़बूरी, कतेको तगेदा, कतेको उदासी, कतेको घबराहट, आ बहुतो आर्थिक स्थिति आय हमरा सामने आइब गेल अछि ! जकर उदाहरण हम मैथिल आर मिथिला (मैथिली ब्लॉग) पा लs के पाठक गनक समक्ष हाजिर छी !)


यमराजक याद आ संदेश .....

हमरा बीमार अवस्था मे यमराजक संदेश सेहो बुझै मे आबैत छल ! किएकी पुरा एक महिना बिमारी के भs गेल छल ! बिमारी छूटए के नाम नञि लैत छल लागैत छल जे कही अहि बिमारीक कारण हम हुनकर सिकार नञि भs जाय ! यदि एहेंन नौबत आयत तँ हमर घर संसार सभ चौपट भस जायत ! ई बात सोचि - सोचि के हम आर बेसी बिमार पड़ि जाइत छलहुँ !


कम्पनीक तरफ सँ फोन ....

हमरा बिमार अबस्था मे कम्पनीक तरफ से सबसे बेसी फोन आबैत छल जे ... आप को केवल १५ दिन का छुट्टी मिला था ! मगर अब पुरे एक महिना से भी ज्यादा हो गया हैं ! अगर आप इस सप्ताह ड्युटी ज्वाइन नहीं करेगे तो आपको कम्पनी के निष्कासित कर दिया जायेगा .... ई बात फोन से सुइन सुइन के हम आर बेसी बिमार पैर जायत छलो !


बौवा आ बुच्चीक स्कुल सँ नोटिक .....

हमरा बिमार अबस्था मे बौवा आ बुच्चीक स्कुल सँ सेहो नोटिक आइब गेल छल, लिखल छल जे ... आपके लड़के और लड़की की स्कुल फिस और बस फिस पिछले महिने से जमा नहीं हुवा हैं ! जिसके चलते आप के दोनों बच्चो को स्कुल से निकाल दिया जायेगा ! अन्यथा फिस जमा करने का यथा शीघ्र कस्ट करे ... हमर बौवा आ बुच्ची आब कोना स्कुल में पढ़त लागैत अछि जे आब धिया - पुताक जीवन ख़राब भs जायत ई नोटिस पैढ़ - पैढ़ के हम आर बेसी बिमार पैर जायत छलो !


दोकानदार लालाक तगेदा......

हम बिमार अबस्था में (हॉस्पिटल) में रही ताहि समय मे दोकानदार लालाक सेहो तगेदा आबिगेल छल, ओ हमर अर्धांग्नी के कही गेलैन जे ... आपका बहीखाता का हिसाब पिछले महिना से ही बांकी हैं ! आप जब दोनों महीने के रुपैया जमा करायेगे तभी हम आगे से रासन का सामान दे पायेगे अन्यथा दुसरे दूकान दार से संपर्क करे ! ई समाद हमरा कान मे पहुंचल, सोच्लो आब तs हमर घर के चूल्हा सेहो कोना कs जरत ! ई समाद सुनी सुनी के हम आर बेसी बिमार पैर जायत छलो !


गाम - घरक चिठ्ठी आ फोन ....

हम बिमार अबस्था मे (हॉस्पिटल) में रही तान्ही समय मे गाम से सेहो चिठ्ठी आबी गेल छल जाही में लिखल अछि .... जे बोआ अहाँ त देखते आ सूनैते हेब टी।वी यही समाचार मे हे हर साल गाम घर में बैढ़ आबई छैक तहि से धान पान ही हेतै सगे घर सेहो खैस परल अछि यानी गाम मे सभ तरहे बेसाहे चलैत अछि ! बाबु आर माय भैया सभ अहि के आस लगेना बैसल छैथ ! जे दिल्ली सs बौआ कहिया पाई पठेता ! गाम घरक ई चिंता सुनी सुनी आ पैढ़ पैढ़ के हम आर बेसी बिमार पैर जायत छलो !


बैंक से फोन आ ईमेल ....

एतबे नै हमर बीमारीक अबस्था में कतेक बैंक से सेहो फोन आ ईमेल स information के देल गेल छल ! जे अभी तक आप के किसी भी क्रेडिट कार्ड का पेमेंट पिछले दो महीने से नहीं हुवा हैं ! जिस के चलते आप के क्रेडिट कार्ड को स्थाई रूप से बंद कर दिया जायेगा अन्यथा पेमेंट जारी रखे ! बार बार हम ई सोचैत छलो जे आगूक पेमेंट हॉस्पिटलक हम कोना के करब ! ई information पैढ़ पैढ़ के हम आर बेसी बिमार पैर जायत छलो !


LIC कम्पनिक तरफ से नोटिक .......

हमरा बिमारी अबस्था मे LIC के एजेंटक नोटिस सेहो आबिगेल छल कहैत छल जे ठाकुरजी आपके तीनो LIC का किस्त दो दो महिना से पिछे चल रहा हैं ! अगर आप को इस बिच (समय) में कुछ हो गया तो इस का जिम्मेवार LIC कम्पनी नहीं होगा ! अन्यथा तीनो पॉलिसी का पेमेंट जारी रखे ! आप का आभारी LIC एजेंट.... ई LIC के नोटिस देख देख आ सुनी सुनी के हम आर बेसी बिमार पैर जायत छलो ! जे हमरा मरलाक बाद हमर परिवारक की गति हेत !


गाम से पाई आबैत छल से भेल चोरी ....

गाम मे जखन सभ के धीरे धीरे पता चललैन जे बौआ एक महिना से हॉस्पिटल मे भरती अछि ! ओकर आर्थिक स्थिति बड ख़राब छैक, त बाबु अपन दुई बिघा खेत कs भरना लगे देलैथ ई सोइच के जे बौआ जखन ठिक भs जेत ते भरना खेत छोरे लेब ! से पाई लs के बाबु आ भैया आबैत छलैथ ! रस्ते में कुनू चोर ट्रेन में हुनकर बेग चोरे लेल्कैन ! ओताही से ओ दुनु आदमी घर वापस चली गेला ! ई खबर जखन सुनलो हम आर बेसी बिमार पैर गेलो !


डॉक्टरक आदेश ....

डॉक्टरक आदेश सेहो भेट गेल छल जे इनका बिमारी का ईलाज हमारे हॉस्पिटल में नहीं हो सकता ! क्योकि हमारे समझ मे यह नहीं आता की इनको बिमारी कौन स हैं ! इसको किसी तांत्रिक जी के पास ले जाए वही इनका कुछ उपचार कर सकेगे ! अन्यथा इनका जान जा सकता हैं ! ई बात हम कान से सुनी सुनी के आर बेसी बिमार भs गेलो जे हमर परिवार, हमर खानदान, हमर समाजक लोक हमरा लेs केs कते कते दर दर भटकत !


गाम से भगतक आगमन .....

गामक लोक के जखन हमर बिमारीक कुन्नु चारा आस नै भेतलैन त तखने हमर बाबु भगत काका के कहलखिन जे दिल्ली मे हमर बौआ बहुत बिमार अछि से अहाँ ओतय चलू ! अहाँ भैरब बाबाक फूल आ बिभुत बौआ के देबैय तहि से हमर बौआ ठिक भs जायत ! भगत काका दिल्ली एलैथ हमरा फूल बिभुत देलैथ तखने से हमर सभ बिमारी धीरे धीरे दूर हुवे लागल ...



अहि दुवारे कहल गेल अछि जे ...


नै वैध डॉक्टरक, भेल भगता के काज !

शहरी रोगी के, भेल गामक इलाज !!



जय मैथिली, जय मिथिला,
मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोल, झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४,
मोबाईल +919312460150 , ईमेल - madanjagdamba@rediffmail.com

Tuesday, January 13, 2009

‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिकाक २५-२६-२७ म अंक

अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर २७ टा अंक http://www.videha.co.in/
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। "वि दे ह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आऽ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि, ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। विदेहक सालाना २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो शीघ्र आएत।
अहाँसँ सेहो "विदेह" लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
२.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
“विदेह” पढबाक लेल देखू-
http://www.videha.co.in/

आऽ अपन रचना-सुझाव-टीका-टिप्पणी ई-मेलसँ पठाऊ-
ggajendra@videha.com पर।

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनवरी २००८) ७३ देशक ७११ ठामसँ १,४६,१६१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।




(c)२००४-२००९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक १ आ’ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि, आऽ एहिमे मैथिली, संस्कृत आऽ अंग्रेजीमे मिथिला आऽ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। विदेहक नवीन अंक सभ मासक ०१ आऽ १५ तिथिकेँ ई-प्रकाशित कएल जाइत अछि। ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।http://www.videha.co.in/

"विदेह" ई- पत्रिका डाटाबेसक आधारपर प्रकाशित पोथी सभ:-

१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव

५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर

६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर

७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”

९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)

स्पॉनसर केनिहार प्रकाशक : श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com

मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि:
http://www.videha.co.in/ "विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

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