भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).

ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

 

(c) २००-२०२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.htmlhttp://www.geocities.com/ggajendra  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Thursday, February 12, 2009

विदेह २६ म अंक १५ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २६)-part 1

विदेह २६ म अंक १५ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २६)-part 1


एहि अंकमे अछि:-

एहि अंकमे विशेष:-
खुलल दृष्टिसँ नहि भऽ रहल अछि समीक्षा : राजमोहन झा
भाइ-साहेब राजमोहन झाकेँ प्रबोध सम्मान २००९ देल जएतन्हि। एहि अवसरपर वरिष्ठ पत्रकार विनीत उत्पल हुनकासँ आइ-धरिक सभसँ पैघ साक्षात्कार लेलन्हि।

सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१. १. एकाकी-सुभाषचन्द्र यादव २. कबई-इच्छा अनलकांत (कथा)
२.२. श्यामसुन्दर शशि-श्रद्धांजलिआह उमा ! वाह उमा !
२.३.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी
२.४. रिपोर्ताज-नवेन्दु कुमार झा
२.५. राजमोहन झा (प्रबोध सम्मान २००९) सँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार
२.६. सुशांत झा-हमर सपना केर मिथिला

३.पद्य
३.१. धीरेन्द्र प्रेमर्षि
३.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (आठम खेप)
३.३. कुमार मनोज कश्यप
३.४.ज्योति
३.५. पंकज पराशर
३.६.रूपेश झा "त्योँथ"
३.७.बिनीत ठाकुर

४. बालानां कृते-ज्योति झा चौधरी
५. भाषापाक रचना-लेखन
६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
६.1.Original Maithili short story of Devshankar Naveen translated into English by GAJENDRA THAKUR
७. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( तिरहुता आ देवनागरी दुनू लिपिमे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Tirhuta and Devanagari versions both ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक तिरहुता आ देवनागरी दुनू रूपमे
Videha e journal's all old issues in Tirhuta and Devanagari versions


१.संपादकीय

प्रिय पाठकगण,
विदेहक नव अंक ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक मृत्यु

रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक मृत्यु- हिन्दुस्तानी संगीतक गायक, शिक्षक आ वाग्यकार/ शास्त्रकार श्री रामाश्र झा “रामरंग” जीक मृत्यु १ जनवरी २००९ केँ कोलकातामे भऽ गेलन्हि। ओ ८० बरखक छलाह। संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्लीक २००५ मे पुरस्कार प्राप्त श्री रामरंग केँ यू.पी. संगीत नाटकक फेलोशिप सेहो प्रदान कएल गेल छलन्हि।
श्री रामाश्रय झा “रामरंग”क जन्म १९२८ ई. मे मधुबनी जिलाक खजुरा गाममे भेलन्हि। हिनका संगीतक प्रारम्भिक शिक्षा अपन पिता सुखदेव झा सँ भेटलन्हि। बादमे ओ वाराणसीमे नाटक कम्पनीमे बहुत दिन धरि संगीत देलन्हि फेर पं भोलाराम भट्टसँ एलाहाबादमे संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। एलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागमे ई प्रोफेसर आ हेड रहलाह।
रामरंग ढेर रास खयाल रचना बनओलन्हि आ कतेक रास नव रागक निर्माण कएलन्हि। हिनकर पाँच खण्डमे नव आ पुरान रागक वर्णन आ समालोचना “अभिनव गीताञ्जलि” हिनक बड्ड प्रसिद्दि प्रदान कएलकन्हि आ ई “अभिनव भातखण्डे” नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेलाह। अपन ध्रुपद आ खयाल रचनाक आधारपर श्री “रामरंग” हनुमानकेँ समर्पित “संगीत रामायण”क रचना सेहो कएलन्हि।
मैथिलीमे “विदेह” ई पत्रिका लेल पठाओल हिनकर “राग विद्यापति कल्याण”, “राग तीरभुक्ति”, “राग वैदेही भैरव” आदि नव राग आ ओहिपर आधारित मैथिली भाषाक रचना पाठकक मोनमे एखनो अछि।
हुनकर स्मरण: एहि पंक्तिक लेखकक संग वार्तालापमे रामरंग जी अपन जीवनक समस्त अनुभव कहि सुनेने रहथि। रामरंग जीकेँ हजारो रचना कंठस्थ मोन छलन्हि मुदा बादमे हुनकर हाथ थरथड़ाइत छलन्हि आ ओ वार्ताक क्रममे कहनहिओ छलाह जे- के सीखत आ के लिखत।
राजमोहन झा केँ एहि बर्खक प्रबोध सम्मान


श्री राजमोहन झा केँ एहि बर्खक प्रबोध सम्मान देल जएतन्हि। मैथिली साहित्य सभसँ प्रतिष्ठित सम्मानमे एक लाख भा.रु. देल जाइत छैक।

श्री राजमोहन झाक जीक जन्म २७ अगस्त १९३४ केँ । शिक्षा- मनोविज्ञानमे एम.ए. । कृति : “एक आदि : एक अन्त” (१९६५) , “झूठ साँच” (१९७२) , “एक टा तेसर” (१९८४) , “आइ काल्हि परसू” (१९९३) , “अनुलग्न” (१९९६) कथा संग्रह आ “गल्तीनामा” (१९८३) , “टिप्पणीत्यादि” (१९९२) , “भनहि विद्यापति” (१९९२) , आलोचनात्मक निबन्ध संग्रह प्रकाशित। प्रायः तीन गोट पोथी जोगर लेख , संस्मरण , टिप्पणी आदि पत्र-पत्रिकामे छिइआयल छन्हि । “आइ काल्हि परसू” कथा संग्रहपर १९९६ क साहित्य अकादेमी पुरस्कारक अलावा वैदेही पुरस्कार एवं कथा एवार्ड प्राप्त । मैथिली पत्रिका “आरम्भ” केर सम्पादक ।

हुनकर स्मरण : २४-२५ साल पहिलका हुनकर सुनाएल स्मृतिक स्मृति मोन पड़ैत अछि। राजमोहन जी अपन पिता हरिमोहन झा जीक स्मृति सुना रहल छलाह। हरिमोहन बाबू अपन गाम बाजितपुर जाऽ रहल छलाह। बसमे एक गोटे पुछलखिन्ह, - “अहाँ डी.पी. मे कतए जाऽ रहल छी”।
हरिमोहन बाबूकेँ डी.पी. केर फुल फॉर्म नहि बुझल रहन्हि से पुछलखिन्ह- “डी.पी. माने की”।
ओ सज्जन उत्तर देलखिन्ह- “डी.पी. माने दुर्गापूजा”।
हरिमोहन बाबू अब उत्तर देलखिन्ह- “हम डी.पी. मे बी.पी. जाऽ रहल छी”।
आब ओ सज्जन प्रश्न केलखिन्ह- “बी.पी. माने की”?
हरिमोहन बाबू उत्तर देलखिन्ह- “बाजितपुर”।

प्रबोध नारायण सिंह (1924-2005) क स्मृतिमे देल जाएबला प्रबोध सम्मान स्वास्ति फाउंडेशन द्वारा हुनका जीवन कालहिमे 2004 सँ शुरू कएल गेल । एहि पुरस्कारकेँ प्राप्त केनिहार छथि:

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )
प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )
प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )
प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )
प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )
प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )

श्री मंत्रेश्वर झाकेँ एहि बेरक साहित्य अकादमी पुरस्कार

श्री मंत्रेश्वर झाकेँ एहि बेरक मैथिलीक साहित्य अकादमी पुरस्कार देबाक घोषणा भेल अछि।

श्री मंत्रेश्वर झा भारतीय प्रशासनिक सेवासँ अवकाश ग्रहण कएने छथि। हिनकर जन्म ६ जनवरी १९४४ ई.ग्राम-लालगंज, जिला-मधुबनीमे भेलन्हि। हिनकर प्रकाशित कृति छन्हि: खाधि, अन्चिनहार गाम, बहसल रातिक इजोत (कविता संग्रह); एक बटे दू (कथा संग्रह), ओझा लेखे गाम बताह (ललित निबन्ध)।

मैथिली कथा संग्रहक हिन्दी अनुवाद “कुंडली” नामसँ सेहो प्रकाशित छन्हि।

दि फूल्स पैराडाइज अंग्रेजीमे ललित निबन्धक संग्रह छन्हि।
"कतेक डारि पर" पोथी हिनक आत्मकथा छन्हि।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)
१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)
१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)
१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)
१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)
१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)
१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)
१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)
१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)
१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)
१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)
१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)
१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)
१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)
१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)
१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)
१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)
१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)
१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)
१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)
१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)
१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)
१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)
१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)
१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)
१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)
१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)
१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू)
१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)
१९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य)
१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)
२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)
२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)
२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)
२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)
२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)
२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)
२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)
२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा
२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा))

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार


१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)
१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)
१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)
१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)
१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)
१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)
१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)
१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)
२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)
२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)
२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)
२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)
२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)
२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)
२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)
२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ जनवरी २००८) ७१ देशक ६९२ ठामसँ १,४१,००९ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in

२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।

२.गद्य
२.१. १. एकाकी-सुभाषचन्द्र यादव २. कबई-इच्छा अनलकांत (कथा)
२.२. श्यामसुन्दर शशि-श्रद्धांजलिआह उमा ! वाह उमा !
२.३.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी
२.४. रिपोर्ताज-नवेन्दु कुमार झा
२.५. राजमोहन झा (प्रबोध सम्मान २००९) सँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार
२.६. सुशांत झा-हमर सपना केर मिथिला


२.१. १. एकाकी-सुभाषचन्द्र यादव २. कबई-इच्छा अनलकांत (कथा)
एकाकी
आब कोनो चीजक कोनो ठेकान नहि रहलै । कुसेसर सोचैत रहय जे डाक्टर राउण्ड पर एतै तऽ अस्पतालक एहि नरकसँ फारकती लऽ कऽ ओ घर चल जायत । भोरे सँ ओकर मन खनहन बुझाइत रहै । ओकरा दोसरे सन बुझाइत रहै जेना आब ओ नीके भऽ गेल हुअय । भर्ती भेल छल तखन बहुत तेज बोखार रहै आ होइ जे नहि बचब । जाधरि बेसोह रहल, घरनी रहलै । बोखार कने उतरलै तऽ चल गेलि । घर पर छोट-छोट बच्चा रहै ।
अस्पतालमे अटकब कुसेसरकेँ आब नीक नहि लागैत रहै । घर जेबाक आसमे बिछौन पर पड़ल-पड़ल पूरा दिन बीत गेलै । साँझ पड़ि गेलै तइयो डाक्टर नहि एलै । ओकरा बुझेलै जे आब आइयो ओकरा नहि जा भेलै । ओकर मन भारी आ उदास भऽ गेलै ।
भादोक स्याह अन्हार पसरि गेलै । सब चीज रहस्यमय आ भयाओन बुझाय लगलै । एकटा रोगी नहि जानि कहिया सँ बेहोस पड़ल छलै । ओकरा पानि चढ़ैत रहै । एकटा बूढ़, जकरा खाली हाड़े टा बचल रहै, अथबल भेल पड़ल छलै ।पता नहि ओकरा कोन रोग रहै ।
घंटी भेलै । वार्डक मुँहथरि पर रोगी सभक खाइक एलै । एकटा असकरुआ रोगी दालि लेबाक खातिर कुसेसर सँ गिलास माँगि कऽ लऽ गेलै । सगरे ततेक घिनायल आ गंध टुटैत रहै जे कुसेसरकेँ अस्पतालमे मन नहि बसै । ओ खाइक नहि लेलक । बिछौन पर पड़ल रहल । ओकरा कमजोरी रहै । बेसी काल बैसने डाँड़ दुखाय लगै ।
कोनो चीज क्यो देखऽ वला नहि छै । ओ घर गेल कि नरक मे पड़ल अछि, ताहिसँ ककरा कोन मतलब छै । इएह सभ सोचैत ओ खौंझायल चल जाइत रहय कि तखने एकटा मित्र एलै । मित्र कैँ देखि ओकरा अतीव प्रसन्नता भेलै । मित्र कैक बेर जेबा ले उठलै, लेकिन कुसेसर ओकरा रोकि लैत रहै । ओकरा होइ मित्रक जाइते जेना सभ चीज छूटि जेतै । बैसल-बैसल मित्र अकच्छ भऽ गेलै । तखन मित्रक संग ओहो विदा भेल। सोचलक कोनो दोकानमे किछु खा-पी लेत आ ओतबा काल अस्पताल सँ दूर रहत ।
मित्रकेँ विदा कऽ कऽ जखन ओ दोकानसँ घूरल तऽ रातिक एगारह बजैत रहै । सभ सूति गेल छलै । दू-तीन गोटय जागल रहै। मेघौन आ गुमकी कऽ देने छलै । कुसेसर लोहाक पलंग केँ घीच कऽ खिड़कीक बीचोबीच केलक । बिछौन ठीक केलक । एतबे सँ ओ थाकि गेल आ ओकरा पियास लागि गेलै। पानि दूरसँ आनय पड़ैत रहै । अन्हार आ थाल-कीच मे ओतेक दूरसँ पानि आनब अबूह बुझाइत रहै । एहिठाम वार्ड मे ओ ककरा कहतै आ के आनि देतै। की करय-ओ सोचैत रहल । राति भरि पियासल रहि जाय ? ओकरा बुझेलै जेना ओ एकदम असकर पड़ि गेल हुअय।
दोकान सँ जखन ओ घूरल रहय तऽ वार्डमे ढुकिते ओकरा भेलै ओ बेकारे अस्पताल मे रहि गेल । ओकरा तखने चलि जेबाक चाही छल जखन साँझ केँ डाक्टर राउण्ड पर नहि एलै । अस्पतालमे रहि कऽ ओ की कऽ रहल अछि । आब कोन बेमारी ओ ठीक कराओत ? डाक्टरसँ देखेने बिना जँ ओ चलि जाइत तऽ की भऽ जइतिऐक । ओ मरि थोड़े जाइत । ई सभ बात ओकरा पहिने किएक नहि फुरेलै ? कुसेसर बहुत पछताय लागल ।
ओकर घर डेढ़ कोस पर रहै ।आब एतेक रातिकेँ घर जेबाक समय नहि रहलै । रिक्शो नहि भेटतै ।
कुसेसर कछमछ कऽ रहल छल । मच्छर कल नहि पड़य दैत रहै । पानि रहितैक तऽ निन्न वला गोटी खा कऽ ओ सूति रहैत । दू-तीन बेर मुँह-तुँह झाँपि ओ सुतबाक कोशिश केलक । लेकिन गुमार लागऽ लगैक आ होइ जेना दम औनाय जायत ।
कुसेसर वार्डसँ बाहर निकलि आयल । पानि-थाल टपैत कल पर गेल । पानि पीलक । फेर घूमल । लेकिन वार्ड दिस घुमिते ओकर मन भारी भऽ गेलै । ओ ठमकि गेल । चारू कात हियासलक । दूर एकटा रिक्शा अभरलै । कुसेसर बड़ी काल धरि ठाढ़ भेल सोचैत रहल । दू बजि गेल हेतै । तीन घंटामे भोर भऽ जेतै । आब एतबा काल ले की हेतै । ओकरा बिलमि जेबाक चाही । ओ वार्ड दिस घूमल । लेकिन ओकरा बुझेलै जेना क्यो पयर छानि लेने हो । घर जेबाके छै तऽ बिलमि कऽ की करत ?
ओ रिक्शा लग पहुँचल । रिक्शावला रिक्शे पर घोंकड़ी लगेने निसभेर सूतल छलै । हिला—डोला कऽ जगेलक, लेकिन जेबा ले तैयार नहि भेलै। ओकरा भेलै पयरे चल जाय । सामान काल्हि आबि कऽ क्यो लऽ जेतै । एहि अन्हार गुज्ज रातिमे असकर एतेक दूर जायब ओकरा भयाओन बुझेलै । ओ दुविधामे पड़ल बढ़ल चल जाइत छल, लेकिन बहुत धीरे –धीरे जेना टहलि रहल हो । ओकरा अखनो विश्वास नहि रहै जे ओ ठीके घर चल जायत । सड़क कातक कोनो—कोनो दोकानमे ढिबरी बरैत रहै । दूरसँ बुझाइ जेना ओ सभ खूजल हो । लेकिन सभ निसबद आ बेजान रहै।
अचानक पानि झिसिआइ लागलै । चेहरा पर पड़ैत फूही ओकरा बहुत शीतल आ सुखद बुझेलै । भेलै एकदम भिजैत चल जाय । लेकिन भीज गेला पर सर्दी भऽ जेतै आ ओ फेर दुखित पड़ि जायत । ओ आपस वार्ड चलि आयल ।
वार्डमे भिनसरबाक निस्तब्धता छलै । पानि झिसिआइत रहै आ हवा सिहकैत रहै । एक-आध टा मच्छर अखनो लागैत रहै । कुसेसर मूड़ी गोंति कऽ सुतबाक चेष्टा करऽ लागल । निन्न जेना अलोपित भऽ गेल रहै।
पता नहि कते काल एना रहलै । क्यो कानब शुरू केलकै । कुसेसर अकानैत रहल । बुझाइत नहि रहै आवाज कतऽ सँ आबि रहल छै । क्यो मद्धिम स्वरमे कानैत रहै । ओकर कानबमे तेहन वेदना छलै जे कुसेसर विचलित भऽ गेल । जेना खिंचायल चल जा रहल हो तहिना बिछौन छोड़ि आवाजक दिशामे ओ विदा भऽ गेल । मद्धिम स्वरक कारणे बुझाइ जेना कतौ दूरमे क्यो कानि रहल हो। लेकिन ओ वार्डक मुँहे लग छलै । एकटा अधेड़ स्त्री कानैत रहै । मुँह-तुँह झाँपि कऽ ओ चित्त पड़लि छलै । देखने सँ लगै जेना सूतल हो ।
एहि स्त्रीकेँ की भेल छै ? वार्डक मुँहथरि पर ठाढ़ भेल कुसेसरकेँ छगुन्ता भेलै । बड़ी कालक बाद ओहि बाटे जाइत आदमी कहलकै---ओकर घरवला मरि गेल छै । ओकर झाँपल—तोपल लहास वार्डक गेटे लग कुसेसरक बगलमे पड़ल छलै । ओहि रोगीकेँ दिनमे एक बेर कुसेसर देखने रहै । ओकर जर्जर शरीर केँ देखिते कुसेसरकेँ अपन पिता मोन पड़ल छलै ।
जखन ओ दोकान चल गेल रहय ओही बीच ओ मरल हेतै । कुसेसरकेँ एकदम पता नहि चललै । एगारह बजे रातिमे जखन ओ घूरल रहय तखनो लहासक बगले देने गेल रहय, लेकिन ओकर ध्यान नहि गेलै । तखनो लहास झाँपल रहै आ नीचामे धूपबत्ती जरैत रहै ।
एना होइत छै । सोगमे लोग कानैत—कानैत सूति रहैत अछि आ निन्न टुटिते फेर कानय लगैत अछि । ओहि स्त्रीक विलाप एहने रहै ।
कुसेसर अवसन्न आ उदास भेल ठाढ़ छल । पानिमे तीतल जड़ौन हवाक झोंक आबि रहल छलै । स्त्रीक विलाप पानि—बुनी वला ओहि कारी स्याह भदवरिया रातिकेँ और भारी बना रहल छलै । स्त्रीक विलाप कुसेसरक कोंढ़क भीतरी तहमे पैसि रहल छलै आ ओकरा भेलै जेना आब ओ फाटि जेतै। ओ ओहिठामसँ हटि गेल । लेकिन अपन बिछौन धरि जाइत—जाइत ओकर बुक भांगि गेलै । ओ बिलखय लागल । फेर अपनाकेँ सम्हारलक । चुप भेल । भोर भऽ रहल छलै आ ओकरा घर जेबाक रहै ।
कथा
कबइ-इच्छा
अनलकांत
अगस्त, १९९२
श्रीकान्तक दोकान मे सभ साँझ छोट-मोट महफिल जमैत छलै । जाहिमे ओहि बीच लगातार तीन दिन धरि आरएल उर्फ रतन लाल सेहो, सँझुका पहर बुलै लेल बहराय तँ, शामिल भ’ जाइ छल ।
साल-दू साल पर आरएल जहिया कहिया कहियो एम्हर अबै छल, एहि महफिलक शोभा बड़ेबाक अवसरि ओकरा प्राय: भेटि जाइ छलै । एहि बेर कने बेसी आ नियमित छल । से एहू लेल जे एक तँ बेसी दिन पर आयल छल, दोसर सासुरक स्थिति सेहो बदलि गेल छलै । दुनू सारक बीच बाँट-बखरा भ’ गेल छलै । करजाईन बजारक पुरना दोकान जाहि मे रेडियो-टीवी मरम्मतिक काज होइ छलै जेठका श्रीकान्तक फाँट मे आयल छलै । छोटका मदन अपन नव आ भव्य इलेक्ट्रॉनिक्सक दोकान नवे जिला बनल शहर सुपौल मे शुरू कयलाक बाद सपरिवार ओतहि रह लागल छल । करजाईन बजारक सटले गाम गोसपुर सँ मदनक सम्बन्ध टूटि जकाँ गेल छलै। साल मे दू-एक बेर आम-कटहर आकि उपजाक हिस्सा लेव’ सन काज सँ अबैत रहै । श्रीकान्तक परिवार गामे छलै । ओ नित्य भोरे घर सँ दोकान अबैत आ खूब राति केँ घर घुरैत ।
इलाहाबाद मे बैसि गेल आरएल सन खानदानी दरभंगिया बिना प्रयोजने एते दूर सासुर जाइवला कहाँ ! ई तँ ओकर सासुक अचानक गंभीर रूपेँ असक पड़ब आ कनियाँ विभाक फालतू जिदक कारणेँ आब’ पड़ल रहै । ओना विभाक जिदक मोकाबिला क’ सकबा जोग बहाना तँ बना सकैत छल ओ, मुदा एक टा गलती उत्साहवश अनजाने मे ओकरे सँ भ्’ गेल छलै । भेलै ई जे एक दिन ऑफिस विदा होइ काल वोभा एक किलो एअसगुल्लाक फरमाइश क’ देलकै । तत्काल तँ ओ कोनो ढंगक उतारा धरि नइँ द’ सकलै, मुदा साँझ मे घुरल तँ दू किलो रसगुल्लाक संग !...
महँगी आ तंगी सँ गड़बड़ गणितक चलते जे आर्थिक किच-किच आ कृपणता स्थाइ भाव बनि गेल छलै ओहि मे आरएलक ई अप्रत्यशित उदारता दुर्घटना साबित भ’ गेलै । बहस आ आरोप-प्रत्यारोप मर्यादाक सभ सीमा नाँघि गेलै आ आधा राति धरि कानब-खीजब, रुसब-फुलब संग चलैत वाक्-युद्धक कारणेँ रातुक भोजन सेहो स्थगित भ’ गेलै । ई सभ सहि क’ भुखलो सुति सकै छल ओ, मुदा सुतैत काल विभा तेना ने नाक सुड़कैत हिचकब शुरू कयलकै जे ओकरा आत्म-समर्पण करहि टा पड़लै । एहने क्षण मे कयल करारक कारणेँ सासुक जिज्ञासा मे सासुएअक ई यात्रा आरएलक कपार बथायल छलै । देह-धर्म लेल निरोध-सम्बन्धी खर्च पर जे बीस बेर मनन करैत हो, तकरा लेल एहि यात्राक खर्च !...
जे-से, सासुर अबै आकि एहि सँ पहिनेक घटना सभ आरएल लेल रहल-खेहल छलै । सार सभक बीच भेल बाँट-बखरा आकि सासुक असक पड़लाक बाद श्वसुरक रंग-रभस मेभेल प्रगति सेहो कोनो नव बात नइँ छलै । विभा तँ कीर्तिमान बनेबे कयलक, मुदा ओकरा बुझैक शक्ति, नव ऊर्जा आ उत्तेजना जाहि स्त्री सँ आरएल केँ भेटलै तकरा ओ कखनो बिसरि नइँ सकल ।
भेलै ई जे आरएलक पहुँचला पर पहिल साँझ दारू आ मुरग फ्राइक खर्च उठब’वला जाहि दू टा चिक्कन मुल्ला केँ फँसाक’ श्रीकान्त अनने छल, ओ दुनू दूए पेग मे बहक’ लगलै । दू पीस पहिनहि एक टा खाकी लिफाफ मे फराक क’ कतहु पठा देने छलै श्रीकान्त । बाकी मे सभ कने-कने टोंगने छल कि प्लेट मे बचल अंतिम टुकड़ी लेल सभ एक-दोसरा केँ ’अहाँ लिअ’ अहाँ लिअ’?...’क अनावश्यक आग्रह कर’ लागल । ताहि पर पहिल मुल्ला दोसर सँ कहलकै, “एखने एक प्लेट आरो आबि जाइ तँ सभ सँ पहिने टाँग तोकीं घीचमें!”
“खाय नइँ सकै छी, से तँ नइँ कहलियौ हम ? आधा किलो तँ आराम सँ आरो खा सकेते छी!” दोसर गुल्ला बजलै ।
“हम तीन पाव आरो ख सकै छी ।“ पहिल कहलकै ।
“हम तँ सवा किलो मे एक्को टुक नइँ छोड़ि सकै छी ।चाटि-पोछि क’ खत्म क’ देबौ । नइँ खा सकबौ तँ एक सय टाका जुर्माना ! जाँच कर’क हौअ ककरो तँ ऑर्डर द’ सकै छें!” श्रीकान्त कहलकै ।
“हम दू किलो मे एक्को टा पातर सन दड्डी धरि नइँ फेकब । नइँ खाय सकलौ तँ पन्द्रह दिन मुफ्त खटब ।...चलू पूरा महीनाक दरमाहा काटि लेब ।“ मेवालाल चहकैत बाजल ।
“चुप हरामी! दू किलो मुरगा एक थारी मे परसल कहियो देखबो केलही ?” श्रीकान्त डाँटि केँ बरजलक ।
सभक अतृप्त क्षुधाक ध्यान राखि आरएल सन मक्खीचूसोक मन कयलकै जे एक प्लेट अपना दिस सँ मँगवा दै । मुदा नमरी बहरेला पर एक्को पाइ वापस नइँ भेटबाक आशंका सँ ओ चुप्पे रहल । दोसरो केओ साहस नइँक’ सकल ।...सभक मन छोहायलै रहलै ।
दोसर साँझ एक टा बूढ़वा मुल्ला केँ फँसौने छल श्रीकान्त आ दारूक संग डेढ़ किलो रेवा-बचबा माछ फ्राइ करबाओल गेल छलै । आरएल अझक्के देखलक, किछु माछ एक टा खाकी लिफाफ मे राखिक’ श्रीकान्त स्वयं दोकानक पछुआड़ दिस गेल छल । घरिक’ पेग बनौलक आ सभ गोटे कौआ-चिल्हा जकाँ बेसी सँ बेसी माछ झपटैत दारूक घोंट लेब लागल । जखन गिलास-प्लेट साफ भ’ गेलै, तँ काज-धंधाक संग गप्प हँकैक दौर शुरू भेलै । गप्पक विषयक ओना तँ कोनो सीमा नइँ छलै—गाम-घर आ बजारक बदहाली सँ राजनेताक दलाली धरिक चर्चा एक समान भ रहल छलै—मुदा बेसी बात घुमि-फिरिक’ खायबे-पीब पर आबि जाइ छलै । सहसा तखने सभ सँ बेसी माछ उदरस्थ क चुकल खूस्सट बूढ़वा कहलकै, “एहि पर सँ रसगुल्ला भेटि जाइत, तँ आनन्द आबि जाइत !...पचास तँ एक साँस मे गटकल जा सकै छै ।“
“हम तँ पचहत्तरि धरि एम्हर-ओम्हर नइँ ताकब ।“ श्रीकान्त लेर खसबैत बाजल ।
“हम एक सय नइँ खाय गेलौ तँ एक मास मुफ्ते खटब ।“ मेवालाल उत्साह सँ भरिक’ कहलकैओ ।
“चुप हरामी ! हरदम हमरा सँ बढ़िए क’ बाजत !...कहियो एक सय रसगुल्ला देखबो कयलही?” श्रीकान्त दहाड़लक ।
आरएल गौर कयने छल जे एहन गप्प जखन-जखन छिड़ैत, मेवालाल सरिपहुँ सभ सँ बड़िक’ बाजी लगबै छल आ श्रीकान्त कखनो डाँटब बिसरैत नइँ छल ।
ओहि साँझ घर घुरैत काल रस्ता मे मेवालालक मादे श्रीकान्त सँ फैल सँ पूछताछ कयने छल आरएल । शुरू मे तँ श्रीकान्त गुम्मी लाधने रहलै, मुदा फेर नीक जकाँ बतौनहुँ छलै, “आसल मे मेवालाल आदमी तँ बड़ काजक यए! खूब हुनरमंद सेहो, मुदा व्यवहार सँ तेहने चटोर आ अहदी!...चलबैऐ भरि दिन रिक्शा, मुदा दारू आ नीक-निकुत तरल-बघारल रोज चाहीएकरा । घरवाली आ तीन-तीन टा बेटी छै, तकर चिन्ते ने एक्कोरत्ती !...ई तँ मदनक कृपा जे आइ ओ हमरा संग ऐश क’ रहकऐ !...”
किछु क्षण बिलमि ल’ भेद खोललक, “भेलै ई जे एक दिन ओ हमरा दोकान आयल आ एक टा एहन रेडियो जकरा ठीक करैत हम हारि गेल रही, ओ पाँचे मिनट मे चालू क’ देलकै । हम पुछलिऐ, ई काज कहिया सीखलही ?’ तँ बतेलक जे मदनक दंग उठैत-बैसैत किछु गुण पाबि गेलिऐ भैया!’...असल मे पहिने हम तँ कमे दोकान पर बैसैत रहिऐ । बाबूजीक बाद मदने सम्हारने रहै ई पूरा कारबार । बीन भेलाक बाद कपार पर अयलै, तँ...। तैयो की? हम तँ एखनो कमे काज ठीक-ठीक क’ सकै छिऐ । एहि हरामी मेवालाल केँ हमरा सँ बेसी इल्म आ अनुभव छै, मुदा से पता आ विश्वास नइँ छै ओकरा ।“ एही संग अनायास खूब जोरगर ठहाका मारलक श्रीकान्त आ धनुखटोलीवला मोड़ पारक फेर कह’ लागल, “...तेँ हम साँझ टा केँ तीन घंटा अपना संग बैसायब शुरू कयलहुँ, र्तान-चारि मास सँ । पन्द्रह टके रोज, उपर सँ दारू-नाश्ता फ्री!...मंगल-मंगल हाटरोज एकर घरवाली एक सय पाँच टाका ल’ जाइ छै । दिन भरि रिक्शा सँ जे होइ छै, सेहो दारू मे नइँ उड़ै छै आब! दिन घुरि रहल छै ।...”
“तीन घटा मे अहाँ केँ ई रोज कतेक लाभ दै यए?” आरएल पूछलकै ।
“रोज एक्के रंग तँ नइँ होइ छै, तखन ई बुझियौ जे डेढ़-दू सयक एकन कज क’ए दै छै जकरा पहिने हम घुरा दै छलिऐ ।“ श्रीकान्त सहज ढंगेँ कहलकै ।
“तखन होलटाइम किऐ नइँ राखि लै छिऐ?” तह धरि जयबा लेल आरएल आरो कुरेदलक ।
“असल मे तक्लर कैक टा कारण छै । एक तँ छोट बजार, ओतेक काजे नइँ अबै छै । दोसर, सभ सँ पैघ बात ई जे दिन भरि काज कयने एकरा पता चलि जयतै जे ई हमर कतेक काज करै छै। आ ईहो जे कतेक जनै छै । तखन भ’ सकै छै जे बेसी पाइ माँगय आकि मदन सँ मीलिक’ अलग काज शुरू क’ दिअ’ आकि ओकरे लग चलि जाय तेँ हम एकरा ग्राहक सँ नइँ बतियाब’ दै छिऐ, नइँदिन मे काज लै छिऐ आ बिना दारूक सेहो नइँ। दारू पीबि ई की बाजै आ करै छै से हमरा जनैत बाद मे एकरा मन नइँ रहै छै ।...”
आरएल आरो किछु पूछ’ चाहै छल, ताबत घर आबि गेल रहै ।
तेसर साँझक महफिल मे थानाक हवलदारक संग एक टा स्थानीय नेता सेहो छलै जे विधानसभाक टिकट लेल एक संग कतेको पाटी मे जोर अजमाय रहल छलै । एहि साँझक खर्च श्रीकान्ते केँ उठब’ पड़ल छलै। एहू साँझ आरएल ध्यान देने छल जे जलखै मे मँगाओल आमलेट-भूजा आ सलाद-पकौड़ी मे सँ किछु अंश ओही लिफाफ मे अलग क’ पैकेट श्रीकान्त स्वयं पछुआड़ दिस ल’ गेल छल महफिल समाप्त भेला पर पान खयलाक बाद नेता आ हवलदारक संग लागल श्रीकान्त जखन थाना दिस चलि गेल, तँ मौका पाबि ओ मेवालाल सँ पूछलक, “अहाँ सँ एक-दू टा बात पूछ’क मन होइ यए । जँ अहाँ बेजाय नइँ मानी तँ...?
“यौ मेहमानजी, अहाँ तँ चौहद्दीबान्ह’ लागलिऐ ! सोझे मुँहेँ पूछू ने, जँ फूसि कही तँ बहिन चोद होइ, देह काज नइँ आबय!” मेवालाल कड़कि क’ बाजल ।
“तीनू साँझ देखलहु मुरगा, माछ, अंडा जे किछु आयल, तकर एक हिस्सा एक टा लिफाफ मे अलग क’ श्रीकान्तजी पछुआड़ ल’ गेलथि। से ककरा लेल ?” आरएल नहुए पूछलकै । अगिला प्रश्न पर जाइ लेल शुरुआत यैह ठीक लगलै ओकरा ।
मेदालाल कान लग फुसफुसाक’ बाजल, “एहि मकानक मालकिन पछिला साल भरल जवानी मे विधवा भ’ गेलि । पति फौज मे रहै, बोर्डर पर बर्फ मे गुम भ’ गेलै । बेचारी ब्राहाणी ई सभ कोना बना-खाय सकतै?तेँ श्रीकान्त जी चोरा-नुका...” आओ मुस्किआब’ लागल ।
किछु क्षण बाद फेर हीं-हीं करैत ओ आरएल दिस तकलक, “एक टा बात कही, प्रेम मे कमीना सँ कमीना प्राणी सेहो मनुक्ख भ’ जाइ छै!...नइँ बुझलिऐ मेहमानजी?”
“बुझलहुँ-बुझलहुँ!” प्रकटत: तँ आरएल मुस्किआ देने छलै, मुदा भीतर सँ सरकि गेल रहय । किछु क्षण पहिने धरि ओहिस्त्रीक प्रति आरएलक भीतर जे भाव छलै, से अनायास बदलि गेलै । सहसा ओहि स्त्रीक प्रति सम्मान सँ भरि गेल छल ओ । फेर पूछने छल, “अच्छा, एक टा आर बात कहू ! तीनू दिन हम देखलहुँ जे अहाँ मुरगा, माछ, रसगुल्ला सब मे सभ सँ बेसी खाइक बाजी लगा लैत छी । ई कहू जे घर मे रोज कते खाइ छिऐ ?”
अचानक मेवालाल गंभीर भ’ गेल ! किछु क्षण चुप रहिक’ ओ बाजल “मेहमानजी हमहू अही सभ जकाँ खाइ छी । कने भात कि एकाध टा रोटी बेसी !...सैह, कोनो हाथी-घोड़ा नइँ ! अहाँ ईहो बुझ चाहै हैबै जे घर मे हमर पेट भरै छै कि नइँ ? भरै छै मेहमानजी, भरै छै! हमहू भरि पेट खाइ छी, हमर घरवाली आ बच्चा-बुतरू सब सेहो ।...कहियो-कालक बात छोड़ि दियौ, से बहुतो केँ होइ छै। हँ, रसगुल्ला आकि मुरगा सन चीज भरि मन कहियो नइँ खेलिऐ । नइँ जानि कहिया सँ ई लौलसा लागल यए, से कहियो-काल निसाँ मे भरमिक’ किछु बोलि दै छिऐ । मुदा कैथ-बाभन आरू केँ देखियौ, बराती मे जते खायत नइँ तते छुतायत । तैयो हरदम खाइ लेल लेर चूबबैत डिंग हाँकैते रहत !”
आरएल चुपे रहल । आक्रोश सँ भरल मेवालांलक ठोर काँप’ लगलै । सोझाँ मे खुजल रेडियोक पोइन्ट्स चेक करैत, राँगा हटबैत-लगबैत, रेडियो पर आबि रहल गीत बजैत आ बंद होइत रहलै । ओहि रेडियोक काज पूराक’ सहसा ओ फेर बाज’ लागल, “मेहमानजी, खाइ केँ ल’क’ हम गपो मारै छिऐ तँ एक मासक दरमाहा दाव पर लगा क’ । कियो हिम्मती कखनो तैयार भ’ गेल आ हम किनसाइत हारियो जायब, तँ एक बेर भरि मन रसगुल्ल खाइक मनोरथ तँ पूर भ’ जायत ने !”
“चलू हम खुआबै छी । देखै छी, कते खाइ छी अहाँ ?”
“नइँ मेहमानजी, बिना बाजी लगौने नइँ खायब हम । फेर आइ सयवला भूखो नइँ यए, नइँ तेहन मूडे ।...” ओ रेडियो मे नजरि गड़ौने बाजल ।
आरएल केँ अफसोच जकाँ भेलै जे ओ बेकारे ओकर घ कोड़ि आहत क’ देलक । तेँ संयत स्वर मे पूछलकै, “आइ कते ? पचास तँ खाय लेब ने, बिना रस गारने ?”
“साठि खाय् लेब, मेहमानजी!”
“चुप हरामी!” तखने घुरिक’ आयल श्रीकान्त अनचोके दहाड़लक ।
मुदा आरएल हस्तक्षेप कयलक, “श्रीकान्तजी अकाँ शान्त रहू । आइ हम खुएबे एकरा । मँगबाउ सामनेक दोकान सँ ।”
“शर्त की छै?” श्रीकन्त सेरायल स्वर मे पूछलकै ।
“तय क’ लिअ’!” ओ डराइते-डराइत बाजल ।
“जँ नइँ खाय सकल तँ एक सय बीरा रसगुल्लाक दास एकरा दरमाहा सँ काटिक’ अपना सभ दारू-मुरगा आ रसगुल्ला खायब । आ, जा धरि अपन सभ खायब? एकरा कान पकड़िक’ उठ-बैसि करैत रहय पड़तै ।...पुछियौ, शर्त मंजूर छै?” श्रीकान्त नजरि फेरिक’ बाजल।
“मंजूर छै!” मेवालाल पूर्ववत गंभीर आ कड़क आवाज ने बाजल, “जँ खाय गेलौ, तँ ...?”
“इनाम मे स्पेशल पान!” श्रीकान्त मुश्किल सँ तामस दबवैत कहलक ।
आरएल किछु बाज चाहैतो पत्नीक जेठ भाइक लिहाज क’ चुप्पे रहल ।
मेवालाल सात मिनट मे छप्पन रसगुल्ला खयने छल कि ओकरा आँखि सँ नोर झहर’ लगलै ।
आरएल पूलकै, “कि भेल मेवालाल?”
“मेहमानजी, पछिला दशहरा दिन हमर जेठकी बेटी रसगुल्ला लेल जिद पकड़ि लेलकै । तमसा क’ हम दू-तीन चाट मारि देलिऐ । पाइक तेहन दिक्कति रहै जे...। से ओकर माय राति भरि झगड़ैत रहलि जे अपना दारू लेल एकरा पैसा होइ छै, बेटी केँ एक टा रसगुल्लाक बदला पबनियो-तिहार केँ थपड़े ! अपना जीह पर साँप नइँ कटा होइ छै!...तहिया सँ कते बेर सोचलिऐ जे कहियो ल’ जायब रसगुल्ला । सात मास बीति गेलै, नइँ ल’ जा सकलिऐ । जेना भेलै, हम तँ गपागप गिड़िए रहल छिऐ!...” एते कहैत-कहैत ओकर हिचकी जोर पकड़ि लेलकै आ नोर झहरब आरो बढ़ि गेलै । प्लेट मे बचल चारो रसगुल्ला अखाद्य वस्तु जकाँ पड़ल ओत’क वातावरण केँ भारी बना देने छलै ।
“खा नइँ सकलें ने तों! बाजी हारि रहल छें । आब चुर्माना लागि जयतौ ।” श्रीकान्त ओकरा जरल पर नोन छिटैत बाजल । मुदा तखने दोकानक बाहर देबालक निकट अचानके आबिक’ ठाढ़ि भेलि आमक फाड़ा सन-सन आँखि वाली गोर-नार युवा स्त्री केँ देखतहि ओकर पारा नरम भ’ गेलै । आरएल केँ सहसा खाकी लिफाफ सभक स्मरण अयलै !... एखनो ओकरा प्रति सम्मनक भाव सँ भरल छल ओ ।
“नइँ, हारलौं नइँ! ई चारि टा की, खा तँ सकै छी पाँच-दस टा आरो। हम प्रेम सँ कहलौं, जँ हारि नइँ मानी तँ ई चारो रसगुल्ला घर लेल ल’ जाइ । तीन टा तीनू बेटी आ एक टा...।“ मेवालालक बोली लड़खड़ा गेलै आ सरिपहुँ हिचकि-हिचकिक’ कानय लागल ओ । ओत’ ठाढ़ि कोशी-कमलाक बाढ़ि जकाँ दलमलित करयवाली स्त्री आब दोकानक भीतर मेवालालक लग आबि गेलि छलि आ किछु बाज’ जा रहलि छलि...!
...कि ठीक ओही क्षण गाम सँ एक टा छौंड़ा दौड़ल हाँफैत अयलै आ हकलाइते जेना-तेना श्रीकन्तक कान मे किछु कहलकै ।
फेर श्रीकान्त आरएल दिस तकलकै—एक संग तामस, घृणा, धिक्कार, दया आ प्रार्थना भरल नजरि सँ !
आरएल तखन किछु बुझि तँ नइँ सकल छलै, मुदा कोनो पैघ अनहोनीक आशंका जरूर ओकरा कँपाब’ लागल छलै ।
तुरंत मेवालाल केँ चाभी थमा, दोकानक सभ टा जिम्मेदारी ओकरा पर सौंपि, श्रीकान्त बाहर भेल छल । श्रीकान्तक पाछू-पाछू संशयग्रस्त डेगेँ आरएल सेहो बहरायल रहै ।
गाम सँ आयल छौंड़ा केँ रोकिक’ ओत’ ठाढ़ि स्त्री घटनाक मादे खोदबेद कर’ लागलि छलि । मुदा झट-पट सभ बात उगलि छौंड़ा सेहो दौड़िक’ हुनके सभक पछोड़ ध’ लेने छलै।
दौड़िक’ आयल छौंड़ाक पयरक धमक पर आरएल पाछाँ तकलक । ओकर नजरि छौंड़ा केँ पार क’ दोकान मे ठाढ़ि स्त्री पर गेलै—ओ स्त्री मेवालालक आरो लगीच जा गप्प करैत रोमांचक मुद्रा मे फ्रीज भ’ गेलि आरएलक स्मृति-पटल पर ।
किछुक काल बाद आरएल केँ गामक घटना मादे जानकारी देने छलै श्रीकान्त ।...जे विभा अपन मोटरकार वला बहनोइक संग हुनका गाम माछ खाय लेल भागि गेल !...
आरएल केँ एतबे मन पड़ल छलै तखन जे ओकर साढ़क गामक कबइ बड़ मशहूर छै । वैह कबइ जे पानि सँ बहराय गाछ पर चढ़िक’ हवाखोरी करैत छै!...वैह जीवट कबइ!...मुदा...।
आ यैह सभ सोचैत कखन घर पहुँचल आ कोना बेहोश भ’ गेल छल आरएल, से सभ किछुओ मन नइँ छै ओकरा !....

११ अगस्त, २००२
आरएलक छोटकी बेटी नीनाक पहिल बर्थ-डे छलै । साँझ उतरि रहल छलै—एखन ओते सघन अन्हार नइँ भेल छलै, मुदा बाहरक ओसरा मे अन्हारक आभास होअय लागल छलै । ओसराक आगाँ लॉन मे आरएलक पिता एकसरे बैसल खाँसि रहल छलाह । नै सालक बेटी नीरा आ पाँच सालक बेटा रून्नू अपन दोस्त सभक संग भीतरका कोठली मे चहल-पहल मचौने छल जत’ बर्थ-डेक सजावटिक संग नीनाक साज-श्रृंगार सेहो भ’ रहल छलै । पड़ोसक एक टा सहेलीक संग किचन मे व्यस्त रहलाक बादो विभा गुनगुना रहलि छलि। मुदा बाहरक ओसरा मे कतेको साल बाद भेटल अपन एक टा पुरान मित्रक संग रहलाक बादो आरएल उदास छल । दस साल पुरान कैसेट जहिना समाप्त भेलै, आरएल चुप भ’ कतहु दूर हेरायल-हेरायल जकाँ भटक’ लागल छल ।
सहसा ओ दोस्त आरएलक ध्यान भंन करैत चुप्पी तोड़लक, “मीत, ई कह’ जे एहन की बात भेलै तकरा बाद जे तों ओहि घटनाक सदमा सँ आइ धरि उबरि नइँ सकलह? एहि सँ बढ़ियाँ तँ ई होइतह जे तों ओही समय तलाक ल’क’ अलग भ्’ जयतह । एना घुटु-घुटि क’ तिले-तिले मरैत रहब...?”
किबीचे मे दोस्त केँ रोकिक’ आरएल बाजल, “नइँ-नइँ, तों नइँ बुझलह मीत ! तों बुझियो नइँ सकै छह! बिलकुले ने बुझि सकलह तों हमर पीड़ा!...” फेर किछु क्षण रुकिक’ ओ कहलकै, “असल मे महत्त्वपूर्ण ई नइँ छै जे माछ खाय लेल ओ भागलि आ भागिक’ कत’-कत’ गेलि !...आकि एकसरे भाइक बुतेँ किऐ नइँ घुरलै आ घुराब’ लेल के-के गेलै आ कोन-कोन तरहक शक्तिक जरूरति पड़लै?...ई सभ कोनो बात नइँ...महत्त्वपूर्ण ई छै जे घुरिक’ अयलाक बाद ओकरा अपन कयल पर पछतावा आकि हीनताबोध नइँ भेलै । महत्त्वपूर्ण ई छै जे हम दबिक’ रहलहुँ तँ रहलहुँ, ओकर ठसक बरकरार छै!...हम ओकरा छोड़’क बात निश्चिते सोचि सकै रही, मुदा नइँ सोचलहुँ! जनै छह, किऐ?”
क्षणभरि बिलमि फेर वैह कह’ लगलै, “श्रीकान्तक दोकान मे जे विधावा भेटलि छलि, ओ हमरा ई अकील देलक जे मनुक्ख सरिपहुँ जीवित अछि तँ ओ अपन भूखक कारणेँ । आ भूखक सम्,मान लेल जरूरी छै ओहि दिशा मे रुचि आ कबइ सन इच्छा । हमरा तँ एहि बातक गौरव अछि जे हम ओहि स्त्रीक पति छी जे बदनामीक हद धरि जाक’ ओ अपन भीतरक मनुक्खक रुचि आ इच्छाक पाँखि कतरब नइँ जानलक । दुख मात्र एतबे जे हम एहि गौरव केँ भीतर सँ स्वीकार करैतो व्यवहार मे नइँ आनि सकलहुँ, तेँ अपन इच्छाक पाँखि उठेबा मे असमर्थ होइक दंड भोगै छी।“ फेर एक टा पैघ सन चुप्पी पसरि गेलै जकरा तोड़बाक इच्छा दुनूक भीतर जीवित होइतो, साइत अपन सामर्थ्य गमा चुकल छलै। आ, दुनूक बीच टेबुल पर राखल खाली कपक अलावा नाश्ताक प्लेट मे दू तिहाइ सँ बेसी बचल पकौड़ी सेराय गेल छलै ।

२.२. श्यामसुन्दर शशि-श्रद्धांजलिआह उमा ! वाह उमा !
श्यामसुन्दर शशि - श्रद्धांजलि



आह उमा ! वाह उमा !
ठिक्का डेढ वर्ष पूर्व रेडियो टुडेक वास्ते कार्यक्रम संचालक आ समाचार वाचकके छनौट प्रकृयाक क्रममे पहिल बेर जनकपुर उद्योग वाणिज्यष संघके सभाकक्षमे हमरा ओकरासंग भेंट भेल छल । ऊ प्रतिष्परर्धीक रुपमे हमरासभक सामने खाढ छलीह आ हम, जनकपुर टुडेक सम्पा दक बृजकुमार यादव,संचारकर्मी तथा साहित्यभकार रमेशरंजन झा,रेडियो टुडेक प्रवन्धज निर्देशक अनुराग गिरी एवं पत्रकार महासंघ धनुषाक वर्तमान सभापति उमेश साह परीक्षकके रुपमे छलहुँ । तहिया ओ २३वर्षक छलीह मुदा आधुनिक युगक एहि युवतीमे आधुनिकताक नामोनिसान नहि छल । मलिछांह रंगक समीज—सलवार,सामान्यय चप्पेल ,मेकअप विहीन सादा मुदा चमकैत मुखमण्डाल,नदी किनारमे लत्तरिक फूलल अनेरुवा गुलाव जका लागि रहल छलीह ओ । ओकर सुख्खनल देहयष्टिा ओकर भीतरके पीडाके बखान क रहल छल । स्नाेतकके अन्तिरम वर्षक परीक्षाक वाद ओ व्यासवसायिक जीवनमे प्रवेश करए चाहैत छलीह । यद्यपि एहिसँ पूर्व सेहो ओकर संचार जगतसंग प्रत्यकक्ष आ परोक्ष सम्बवन्धन रहैक ।छापा आ विद्युतीय संचार सम्ब न्धीय अनेकौ तालिम,सभा सेमिनारआदिमे सहभागी भ चुकल ओहि युवतीक सपना रहैक—रेडियोक लेल समाचार संकलन करबाक आ अपन भाषा मैथिलीमे समाचार वाचन करबाक़़़़। हमरालोकनि ओकरा ई मौका सेहो उपलब्धक कराओल । साँच कही त ई अवसर हमरालोकनि दयासँ नहि ओकरा अपनहि प्रतिभाक वलपर प्राप्तउ भेलैक । हमरालोकनि निमित्त मात्र बनलहुँ । आओर बेसी कही त प्रतिष्परर्धीसभमध्यउ ओ सर्बोत्तम छलीह ।लगभग तीन वर्ष पूर्व माओवादीद्वारा पिता आ भैयाके वेपत्ता बनौलाक बादसँ ओकरा बहुत किछु कहवाक छलैक । सम्भओवतः अपन बात कहवाक वास्ते ओ संचारक्षेत्रमे आवए चाहैत छलीह । अएवो कएलहि ।
एहि तरहे अपन सादगी आ प्रतिभाक वलपर पहिलहि भेंटमे हमरामात्र नहि सभ परीक्षकके प्रभावित करएवाली ओ युवती छलीह हमर सहकर्मी आ विद्यार्थी उमा सिंह । तकराबाद एक महिने तालिम आ करीव ९महिना ओकरासंग काज करबाक मौका भेटल । हमर आठ महिने कतार प्रवासक क्रममे सेहो उमासंग बेर बेर ईन्टएरनेट मार्फत बात चित भेल अछि । एहि बीच ओकर एकगोट उलहन रहैत छलनि—सर अहाँक गेलाक वाद हमर भाषाक शुद्धा शुद्धी केओ नहि देखि दैत छथि । ओएह उमासिंहक विषयमे सोमदिन भोरे अत्यरन्तट अशुभ समाचार सुनलहुँ । भोरे ओछानेपर छलहुँ तखने जनकपुरक एक गोट सहृदयी मित्र फोन कऽकऽ ई अशुभ समाचार सुनौने छलाह । मोन घोर भ गेल छल । एक गोट फूलके नीकसँ फूलवासँ पहिनहि निचोरि देल गेल अछि । कोन अधमके कुदृष्टिो पडि गेलै एहि सम्भाेवनावान मज्जहरिपर ? भोरेसँ घटनाक विवरण आ कारणपर गंथन मन्थनन क रहल छी । मुदा एक्कघहीगोट निचोडपर पहुचैत छी । जे भेल से बड अधलाह भेल । एकगोट अक्षम्यो अपराध । उमामे एकगोट संचारकर्मीमे होवएवला सभ गुण छल । ओ अध्य।यनशील छलीह,मेहनती छलीह,निडर छलीह आ पेसाप्रति निष्टामवान सेहो । सम्भअवतः हुनकर ईहे गुण ,हुनकर मृत्यु,क कारण बन्‍ाल । लगभग तीन वर्ष पहिने माओवादी कार्यकर्तासभ उमाक पिता रंजीत सिंह आ भैयाके सिरहाक रामनगर मिर्चैयासँ अपहरण कऽ बेपत्ता बनौने छल । दुनूगोटेक एखनोधरि कोनो अत्ता—पत्ता नहि छनि । घरक मुखियासभ बेपत्ता बनौलाक वाद उमा अपन घरक एसगर मुखिया छलीह । बेसहारा माय,भाउज,बहिन आ भतिजा—भतिजीक देखभाल आ अपहरित पिता तथा भैयाक खोजीक पहल करब हुनके जिम्मा मे आवि गेलै । बाबू आ भैयाक अपहरण पश्याेखभात् घरक बिगरैत आर्थिक संकटके भार सेहो ओकरे पर छलै । पारिवारिक जिम्मेबवारी वोधक कारणे ओ एखनधरि विवाह पर्यन्तआ नहि कएने छलीह । अपन पिता आ भैयाक मुक्तििक लेल ओ राष्ट्रिकय तथा अन्तारराष्ट्रििय निकायसभमे हार गुहार करैत आएल छलीह । जाधरि ओ सिरहामे छलीह हुनका बेर बेर धमकी देल जाईत छलनि । धमकीक कारणसँ सेहो ओ सुरक्षित वसोवासक वास्तेक जनकपुर आएल छलीह मुदा एतहु सुरक्षित नहि रहि सकलीह ।
करीव दू वर्षसँ ओ जनकपुर नगरपालिका १४,रजौल स्थि त एक साथीक घरमे भाडापर रहैत आएल छलीह । रविदिन सन्यासँ ओ सात वजे ओ अपन एहि डेरामे छलीह तखने हतियारधारीक एक समूह आएल आ हुनका उपर अन्धानधुन्धक खुकुरी प्रहार कएलक । जाहिसँ ओ गंभीररुपसँ घायल भेलीह । रेडियो टुडेेमे कार्यरत महिला पत्रकार उमाके उपचारार्थ काठमाण्डुा ल जाईत काल बाटेमे मृत्युी भेल छल । समाचारक बिषय ल क हुनक हत्याम भेल हाएवाक प्रारम्भिरक अनुमान अछि । नेपालमे हत्याम कएलगेल उमा पहिल महिला पत्रकार अछि ।
दोषीके पहिचान आ गिरफ्तारी नहि होएवाधरि उमासिंहके हत्यातक वास्तलविक कारण पत्ता लागव कठिन अछि । वर्तमान सरकार दोषी पत्ता लगा दोषीके दण्डिात करत तकर सम्भाावना बहुत न्युतन अछि मुदा पत्रकार उमासिंहक बलिदान बेकाज नहि जाएत कारण कलमके धार अवरुद्ध करएवला कहियो जिवीत नहि रहि सकल अछि । कलमके नीव तोडएवलासभक अस्विअवर समेत नस्टव भेल घटनाक साक्षी ईतिहास अछि । अपन देशक रक्षा वास्ते रणक्षेत्रमे मृत्युभ वरण करएवला सैनिकके शहीद कहल जाईत अछि । ओ मृत्युि आदरण्‍ीय होईत अछि जे देशक हितमे भेल रहैत अछि । उमा ! अहाँ सौभाग्यलशाली छी । समाचार लिखवाक आ पढवाक कारणसँ अहाँ प्राण गेल । मनुक्खभक नैसर्गिक अधिकारक वकालत करैत प्राण देनिहारि हे बीराङ्गणा ! अहाँ दुनियाभरिक कलमजिवीसभक मनमानसमे रहव । आह उमा ! वाह उमा !
अन्तनमे गुरुवर डा़धीरेन्द्रलक एहि पंक्तिरद्वारा श्रद्धा सुमन व्‍यक्तर करए चाहव स्वी्कार करु । हे ! हमर सहकर्मी आ शिष्याम ।
नोरक टघारेसँ जीवन जँ निर्मित
आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे
कठिन युद्ध अछि ई त लडिए रहल छी ।
हारव ने कहियो अहंक (हमर) जीत निश्चिित ।
२.३.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी
भाग रौ
(संपूर्ण मैथिली नाटक)
लेखिका - विभा रानी

पात्र - परिचय

मंगतू
भिखारी बच्चा 1
भिखारी बच्चा 2
भिखारी बच्चा 3
पुलिस
यात्री 1
यात्री 2
यात्री 3
छात्र 1
छात्र 2
छात्र 3
पत्रकार युवक
पत्रकार युवती
गणपत क्क्का
राजू - गणपतक बेटा
गणपतक बेटी
गुंडा 1
गुंडा 2
गुंडा 3
हिज़ड़ा 1
हिज़ड़ा 2
किसुनदेव
रामआसरे
दर्शक 1
दर्शक 2
आदमी
तांबे
स्त्री - मंगतूक माय
पुरुष - मंगतूक पिता



भाग रौ
(संपूर्ण मैथिली नाटक)

दृश्य : 1

(ट्रेनक दृश्य। (ट्रेन नञि भ' क' ई कोनो हाट- बजार अथवा मेला-ठेला सेहो भ' सकैत अछि।) ट्रेन मे महिला आ पुरूष यात्री। भीख माँग' बला तीन टा बच्चा चढ़ैत अछि। एक के गला मे हारमोनियम, दोसराक हाथ मे पाथरक दू टा खपटा। तेसरक हाथ मे खँजड़ी। तेसर बच्चा उमिर में सभ स' छोट। तीनू क तीनू फाटल, चीकट कपड़ा मे अछि। बच्चा नं. 1 हारमोनियम पर सभ' स' नवीन फिल्मी गीतक धुन बजाक गाबि रहल अछि। दोसर बच्चा खपटा बजा-बजाक' ओकरा संगे गएबाक प्रयास क' रहल अछि। छोटका बच्चा खंजड़ी बजा रहल अछि आ गीतक पंक्ति पकड़बाक प्रयास मे आधा-छिया पंक्ति गबैत अछि। तीनूक स्वर; सुर-ताल में कोनो एकरूपता नञि अछि। सभस' छोटका; बच्चा नं. 3 सभ स' पाई मँगैत अछि। किओ देइत अछि, किओ डपटैत अछि, किओ कोनो दोसर दिस तकैत अछि, किओ ऑंखि मूनि लेइत अछि।)
(ट्रेन रूकैत अछि। तीनू बच्चा उतरि जाइत अछि। मंचक एकटा कोन्टी मे तीनू ठाढ़ भ' क' दिनु भरका कमाई गिनैत अछि।)
बच्चा 1 : कतेक?
बच्चा 2 : साढ़े एगारह।
बच्चा 1 : बस? भरि दिन ट्रेने-ट्रेने घूमल आ तइयो साढ़े एगारहे? अकरा मे त' अपना सभक लेल चाहो-मूढ़ी नञि। (सभस' छोटका बच्चा स') आँए रौ, खाए लेल भरि थारी आ माँग' मे सभ स' पिछारी! ठीक स' माँगै कियै नै छें रे?
(बच्चा 3 बिटिर-बिटिर तकैत रहैत अछि।) मुंह की निहारि रहल छें? हम कोनो की गोविंदा छी कि रितिक रोशन। आ तोहों आमिर खान नञि छें। जतेक गरीब छें, तकरो स' बेसी गरीब बनल रह। तखने दू टा पाइ भेटतौ।
बच्चा 3 : (सहमैत) ई पटना छै कि दानापुर?
(दुनू बच्चा ई सुनि हठात ठठा पड़ैत अछि। छोटका फेर बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि।)
बच्चा 3 : रौ बूड़ि। ई पटना नञि छै, जकरा ककरो स' नञि पटै छै। दानापुर माने दाना स' पूरम पूरा। हमर आओरक पेट मे त' मरल सनकिरबो नञि अछि। की करबहीं रौ जानि क' की हम कत' छी?
बच्चा 1 : भूख लागलए।
बच्चा 2 : तकरा लेल पटना-दानापुर मे रहब जरूरी छै? भूख त' कखनो आ कतहु लागि जाइ छै। दम धर।
बच्चा 3 : पटना सिटी?
बच्चा 2 : ऊँ हूँ। पटना साहेब। सिटी त' कहिया ने बदलि गेलै।
बच्चा 1 : रौ बता, सिटी स' साहेब भ' गेला स' की भ' गेलै? की बदलि गेलै?
बच्चा 2 : बदलि गेलै ने? जनाना स' मर्दाना भ' गेलै।
बच्चा 1 : माने? (गंभीर भ' क')
बच्चा 2 : माने.. सिटी जनाना आ साहेब मर्दाना (दुनू हँसैत अछि। बच्चा 3 ओहिना बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि)
बच्चा 1 : नाम बदल' स' तकदीर सेहो बदलै छै की? सिटी स' साहेब भ' गेलै त' हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की? अपना आओर के काज भेटलौ? पाइ भेटलौ? तहन कियैक एतेक मगजमारी? पटना कि दानापुर कि साहेब की फारबिस गंज.. हुँह!
बच्चा 3 : (उसांस भरिक') भूख लागल अछि।
बच्चा 1 : रौ सार! जो, कोनो हाथी पकड़ि ला आ घोंटि जो। सार.. भूख लागलए, भूख लागलए.. नकिया देलक ईत'..
बच्चा 2 : आजुक समाचार?
बच्चा 2 : बच्चा बेमार। हजारो नेन्ना मरि गेलै, खाएक अभाव मे..
बच्चा 3 : हमरा खाए ला दे। नञि त' हमहू मरि जाएब।
बच्चा 1 : त' मरि जो। प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त' देसक काज-धंधा थम्हि जेतै।
बच्चा 3 परधानमंत्री कोनो खायबला चीज होइ छै। केहेन होइ छै? कत' भेटै छै?
बच्चा 2 : (ओकर बात पर धेयान देने बेगर) तों कोना बुझलही? तों त' अखबार नञि पढ़ै छैं।
बच्चा 1 : टेसन मे टीबी छै ने। ओकरा मे देखलियै। बढ़िया स' बूझाब' लेल मँगतुआ त' अछिए।
बच्चा 2 : ओकरा कोना बूझल छै?
बच्चा 1 : ओ पढुआ छै। अखबार पढ़ै छै।
बच्चा 2 : भिखमंगो सभ अखबार पढ़ै छै? बाप रौ!
बच्चा 1 : ओ कीनै नञि छै। प्रेसक बाहर बैसै छै। चौकीदार ओकरा द' दै छै अखबार।
बच्चा 3 : भीख मे अखबार! भीख मे चाह-मूढ़ी.. (बजैत-बजैत थम्हि जाइ छै: दुनू बच्चा ओकरा घूरै छै।)
बच्चा 2 : मंगतू सभटा पढ़ि लेइत छै?
बच्चा 1 : हँ, रौ। पूरा अखबार चाटि जाइत छै। पूरा दुनियाक हाल ओकरा बूझल रहै छै। ओ पढ़ल छै।
बच्चा 3 : पढ़ल की होइ छै? पटना-दानापुर जकाँ कोनो टेसन छै की?
बच्चा 2 : (स्नेह स') तो नञि बुझबे अखन।
बच्चा 1 : पढ़ल बहुत पैघ चीज होइत छै। पढ़ि-लिखि क' लोक बहुत पैध-पैध लोक बनि जाइत अछि। मुदा अपना आओरक तकदीर मे ई नञि अछि।
बच्चा 2 : (भरोस दियबैत) नञि छै त' नञि छै। मंगतुआ छै नें पढ़ल-लिखल। अपने बिरादरीवाला। अपना आओर स' गप्प-सप्प सेहो करै छै। दुनिया जहानक समाचार त' दइते छै।
(अई बेर तेसरका बच्चा कएक बेर हाथ मुंह स' भूख लगबाक संकेत द' चुकल अछि। सभ बेर दुनू बच्चा ओकरा घूरैत अछि। तेसरका सभ बेर डेराक शांत भ' जाइत अछि।)
बच्चा 1 : हे.. देख ओम्हर! अपन गोबिन्दा।
बच्चा 3 : ई कोनो नव भिखमंगा ऐलै की? आब त' आओरो भीख नञि भेटत। .. भूख..
बच्चा 2 : मंगतुआ छै।
बच्चा 3 : ई एतेक पैघ घर ओकर छै? आ तइयो भीख..
बच्चा 1 : धुरि बुडि.बक। ई अखबारक ओफीस छियै। अई ठाँ क सभस' पैध अखबारक ओफीस।
बच्चा 2 : ऐं मारल! वो गुड्डी बकाट्टा। बुझा गेल जे ओकरा पढ़ब-लिखब कोना एलै।
बच्चा 1 : अखबारक बगल में रहला स' किओ पढ़ि जाइ छै। मू.ढ़ीक दुकान लग रहला स' मूढ़ी भेटि जाइत छै?
बच्चा 3 : मूढ़ी.. भूख..
दुनू : चोप!
बच्चा 2 : कोनाक' ऊ पढ़ि गेलै तहन?
बच्चा 3 : हमहू पढ़ब।
बच्चा 1 : रौ, कुकुरक नांगरि। पढ़िक' की बनबही? सोनिया गांधी कि मनमोहन सिंह?
बच्चा 2 : राबड़ी देवी। पढ़क जरूरते नञि।
बच्चा 3 : (खिसिया क') पढ़ नञि देबें, खाए लेल नञि देबें, त' करब की? मूति!
बच्चा 2 : पढ़ाईक गेरंटी नञि । खाएक गेरंटी त' आओरो नञि।
बच्चा 1 : कोना पढ़बही रे? मंगतुआ गप्प दोसर छै। ओकरा लग टेम छै। ओकरा भीखो खूब भेटै छै?
बच्चा 3 : पढ़ले सन्ते ने! हमहू पढ़ि लेब त' हमरो बेसी भीख भेटत।
बच्चा 1 : चल, चल ..
बच्चा 3 : कोम्हर? हमरा भूख लागलए।
बच्चा 2 : मंगतुआ लग चल। ओकरा खेनाइयो-पिनाई बहुत रास भेटै छै?
बच्चा 3 : पढ़िक' भीख मांगला स' खेनाइयो फ्री.. हमरा पढ.ा दे।
बच्चा 1 : (दुनू क हाथ पकड़िक एक दिस ल' जाइत) चल, चल पानि सेहो बरस' बला छै। चल ओम्हर (दुनू रास्ता क्रॉस करबाक अभिनय करैत अछि। तेसरका पाछा रहि जइत अछि। दोसरका ओकरा पार करबाक इशारा करैत अछि। तेसरका डेराइत अछि। दोसरका फेर एम्हर अछि। ओकरा एक धौल लगाबैत अछि। फेर खींचिक' रोड पार करैत अछि। पार क' क' तीनू मंगतू लग पहुंचइत अछि। एक गोट मोटरी, एक गोट कटोरा, किछु पाइ ओकरा लग पड़ल अछि। प्रकाश तीनू बच्चाक संगे-संगे आब मंगतू पर।)
बच्चा 1 : की रौ मंगतुआ। की भ' रहल छौ।
मंगतू : के? ओह! चनरा, गोबरा, झुनमा रौ! आ बइस, केहेन चलि रहल छौ धंधा-पानी?
बच्चा 2 : भीख माँगब धंधा पानी होइ छै? आ सेहो अई अंधड़ पानि में!
बच्चा 1 : हमरा त' फूटलो आँखि नञि सोहाइये ई बरखा- बुन्नी। लोक आओर घर मे, आफिस में बन्न। दुकान दौरी सेहो ठप्प। लोक आओरक धंधा-पानी नञि त' हमरा आओर के भीख के देत?
मंगतू : हमरा त' बड्ड नीक लगैय' ई बरिसात। चारू दिस हरियाली, मोन के बड्ड सोहाओन लगैत अछि।
बच्चा 1 : पेट भरल रहला पर बनरनियो रानी मुखर्जी लागै छै।
बच्चा 2 : अपना घर मे बइसक' चाह पकौड़ी उड़ाब' मे केकरा मजा नञि एतै?
(चाह पकौड़ीक नाम स' बच्चा 3 फेर हाथ स' भूख बतबइत अछि।)
बच्चा 1 : हमरा आओरक कोनो ठेकाने नञि! देखै छियै नें जे जहन पानि बरसै छै, तहन भिजैत माय कोरा मे भीजैत बच्चा के ल' क' बिल्डिंगे-बिल्डिंग, घरे-घर बउआ अबैत छै। मुदा कतहु-कोनो चौकीदार ओकरा अपना बिल्डिंग के नीचा आसरा नञि देई छै।
मंगतू : छै। तइयो पानि बरसै छै त' नीक लागै छै। देह मे जिनगी सुरसुराय लागै छै। पानि छै तैं। जिनगी छै नै रौ..! (स्वर बदलिक') आ, तों सभ भिंगमे कियै। तोरा-आओर के त' घर छौ। हमरा जकाँ नञि छौ ने।
बच्चा 1 : हं, सहीए । तोरा नाहित नञि छियै रौ। रहितियैक त' भरि दिन ई टरेन, ऊ बस, नञि करैत रहितहुँ। लोकक लात-बात नञि सुनतहुँ। ई गर्दनि देख.. चिकरि-चिकरि के बाँस जतेक पैध भूर भ' गेल अछि।
बच्चा 2 : आ जे दू टा पाइ भेटै छै, ओहू में पुलिस, दादा सभक..
(ओ बाजिए रहल अछि कि एकटा पुलिस डंडा घुमबैत ओम्हर अबैत अछि। तीनू के देखिते तीनू पर ताबड़तोप. डंडा बरसाब' लगैत अछि। तीनू एम्हर-ओम्हर बचबाक प्रयास करैत अछि। ओही मे देह छीपि-छीपि के पुलिस से नञि मारबक नेहोरा करैत अछि। मंगतूक सेहो प्रयास। अई क्रम मे एक -दू डंडा ओकरो लागि जाइत अछि।)
पुलिस : सार सभ! फेर एम्हर आबि गेलैं। चढ़बे बस ट्रेन में माँग' लेल भीख, आ करबें पाकिटमारी।
बच्चा 1 : नञि साब! हम सभ त'..
पुलिस : चोप.. भोसड़ी के.. सार, बहिनक इयार! ई डंडा एम्हर स' घुसतौ त' मुंह दने निकलतौ। चल भाग, जो ओई गल्ली मे।
(तीनू पुलिसक बताओल गल्ली मे भागि जाइत अछि। पुलिसबाला विजयी भाव स' बस स्टैंड पर ठाढ़ लोक आओर के देखैत अछि आ फेर मंगतू दिस।)
मौज कर रो बाउ, मौज कर। तोहरे भाग मे मौज लिखल छौ। ऐहेन ने देह बना के आएल छें जे मौजे-मौज छौ।
(कहैत ओ गल्ली दिस बढ़ैत अछि।)
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दृश्य : 2

(यात्री सभ आपस मे गप्प करैत अछि)
यात्री 1 : एह! ई पुलिसवाला सभ त'..
यात्र 2 : राज-पाट त' एकरे सभक छै ने। कहबी छै ने जे जकरे लाठी, तकरे महीस।
यात्री 3 : कतेक डंडा बरसौलकै ओहि बच्चा सभ पर। बुझाई छै जे ओकरा अपना धिया-पुता नञि छै। आ अईठांक लोग आओर! तमासे देखैत रहि गेल। बाज' लेल किओ नञि ।
यात्री 1 : सभक मुंह मे त' जाभी लागल छलै। अहीं कियैक ने बजलियै?
यात्री 2 : अहाँ बाजतहुं त' हमरो सभक हिम्मति बढ़ितियैक ने।
यात्री 3 : (मंगतू दिस) एकरो पर कम नञि बरसलै। हमरा आओर स' नीक त' इएह छल। एहेन देह- दसा होइतहुँ बचब' लेल त' गेलै।
यात्री 1 : के छै ई?
यात्री 3 : (चिढ़ क') अनिल अंबानी।
यात्री 3 : खासियत छै एकरा मे।
यात्री 1 : से की?
यात्री 3 : पढ़ल लिखल छै। रोज अखबार पढ़ै छै।
यात्री 2 : त' जहन पढ़ल छै त' कोनो काज-धंधा कियै नञि करै छै?
यात्री 3 : एतेक अनटेटर गप्प किओ कएलए! अएँ यौ, ओकर देह नञि देखै छियै? के देतै ओकरा काज? अहीं द' दियऊ ने! ओ त' बड्ड प्रसन्न हएत।
यात्री 2 : से कियैक यौ?
यात्री 3 : कियैक त' भीख माँगब ओकरा बड्ड गर्हित कर्म बुझाइ छै।
यात्री 1 : आब अहूं त'। एहेन अनसोहाँति गप नञि करू।
यात्री 2 : अहाँ करी त' किछु नञि, हम करी त' जुलुम?
यात्री 1 : हम कत' स' ओकरा काम देबै? हम त' अपने सेठ के ओहिठाँ बेगार खटै छी।
यात्री 3 : त' खटू । मालिकक दया दृष्टि पर खेबैत रहू। हे, अहीं की, हम सभ किओ सेठक दया-दृष्टिक भीख जोहैत रहै छी। तमासा मे तमासा ई जे हमर सभक मेहनति पर मालिक सभ मौज करैत अछि। काला पानीक कैदी जकाँ माह भर हमरा आओर खटै छी। माहक आखिर मे भीखे जकाँ दस टा पत्ता हमरा आओर दिस फेंक देल जाइत अछि।
(बस अयबाक ध्वनि। यात्री सभ मे हलचल। 'हमर बस आबि गेल', 'हमरो'। 'हमर एखनि धरि नञि।' 'फेर घर पहँुच' मे लेट भ' जाएत' - यात्री सभक उक्ति आ बस द्वारा प्रस्थान।)
कुकुर जकाँ छी, सेठक पगारक सूखल हड्डी चुसैत हम सभ। (बस अबै छै। ओहो लपकि' क' चढ़ि जाइत अछि।)
(प्रकाश तीनू बच्चा पर।)
बच्चा 1 : रौ, जल्दी स' पचटकिया निकाल आ बाकी सभ एम्हर रख। रकसबा अबिते हैतौक।
बच्चा 3 : ओकरा रकसबा कियैक कहै छहौक।
बच्चा 2 : त' की भगवान कहियै? (बच्चा 3 स) तों एकदम किछु नञि बाजबें। कहि देइ छियौ (बच्चा 3 हं में मूंड़ी डोलबैत अछि। पुलिसक प्रवेश।)
पुलिस : रौ हीरो। की भेलौ रौ? ब्रह्मा, विष्णु, महेश? आ कि सलमान खान, आमिर खान, शाहरूख खान। ओकरो.. ऊ लंगड़ा के सेहो पकड़ि ले त' आओर कोनो नाम द' दही नारद बाबा, कृष्ण जी, बलराम जी.. फिल्मी चाही त' जायद खान। एकदम टटका खान छौ। ऐं! कतेक माल बटोरले रे! लेडीज डिब्बा मे सेहो गेल छले ने! अरे, तोरा जकाँ हम रहितियौक ने, त' हम त' खाली लेडीज में जयतियौ। नञि भेंटतियैक भीख, नञि भेंटौ, मुदा मौगी सभके छुबाक अवसर त' भेटितियैक ने! (ठोर भिजबैत अछि) अच्छा चल, निकाल माल! देरी नञि ।
(बच्चा 1 पाँच टकाक रेजगी निकालि क' देइत अछि। पुलिस वाला गिनैत अछि।)
पुलिस : सार! तोरा सभक संगे इएह सभ झंझट अदि। देबें चार गो छदाम आ गिनेबे एक घंटा जे गनैत-गनैत हाथ मे ऐंठी होब' लागय।
बच्चा 1 : साब! आई कतेक पानि बरसलै अछि। देखियौ ने साब। कतेक घटाटोप बरिसाति छियै। भिन्सरे स' ट्रेने-ट्रेन घूमल, मुदा ई पाँच टका स' जास्ती नञि भेटल। साब, एकरा मे स' किछु हमरो सभक भेटि जाए। भिन्सर स' उपासले छी। ई छोटकाक त' अंतड.ी सुखा गेलैय'। (सलाम ठोकैत अछि।)
(पुलिस निर्लज्ज हंसी हंसैत छै। फेर एक धौल बच्चा 1 के लगबैत अछि।)
पुलिस : दलाल स' दलाली एकरे कहै छै ने। ऐ हीरो, बेसी एक्टिंग नञि। (दर्शक स') देखियौ छौड़ा सभक ढिठाई। देत पांच गो टाका, आ ओहि मे आपसो चाही। माने हफ्ता मे हफ्ता। (गब्बर सिंह स्टाइल मे बाजैत अछि) सोच, सोच। हमरा आओरक सोच। सरकार कहै छै, भीख नञि माँग' लेल। कानूनो बना देलकै। मुदा हमरा आओर के दया आबि जाइत अछि तोरा आओर पर। भीख नञि माँगबे त' खेबे कत स'? रौ, मेहरबानी बूझ, मेहरबानी। आ, आब ई पाँच टका स' किछु नञि होब बला छौ। रेट बढ.ा, रेट। देखै नञि छही, कतेक मँहगाई बढ़ि गेलैये।
(डंडा घुमाबैत चलि जाइत अछि.. तीनू एक दोसरा के देखैत अछि। पुलिस के जाइत देरी कि तीनू पाथरक नीचा दबाक' राखल पाइ दिस लुझैत अछि।)
बच्चा 3 : भूख लागलए हमरा।
बच्चा 1 : (खिसिखा क' एक झांपड़ लगबैत अछि। ले, हमर देह काटि क' खा ले हे, ओम्हर जे पांच टका छै ने, तकरा मे बिसरियो के हाथ नञि लगबिहै। नञि त' ओ हाथे कन्हा स' अलग भ' जेतौ। दादाक हिस्सा छै, दादाक।)
बच्चा 2 : त' आब बचलौ की?
बच्चा 1 : डेढ़ टाका। जकरा मे एक गिलास सतुओ नञि एतौ।
बच्चा 2 : तहन .. भूख त' लागल अछि। हमरो, तोरो। चल न फेर मंगतुए लग। ओकरा ल'ग खेनाइयो-पिनाईक समान सभ खूब रहै छै।
(तीनू ओकरा दिस बढ़ैत अछि । मंगतू किछु बड़बड़ क' रहल अछि।)
बच्चा 1 : की रौ मँगतुआ! की डैलोग मारि रहल छैं। नाना पाटेकर जकाँ।
मंगतू : (चौेंकि क') अँए.. किछुओ त' नञि ।
बच्चा 3 : भूख ..
बच्चा 1 : चुप सार, कुकुरक पोंछि।
बच्चा 2 : मारि लें डैलोग। तोरे राजपाट छौ रौ। मौज छौ तोरे। ने कोम्हरो एनाइ ने गेनाई। एम्हरे बइसल-बइसल पाइ बरसै छौ तोरा पर। हमरा आओर के देख। भरि दिन ट्रेने-टेन घूमल, तइयो कतेक भेटल? साढ़े एगारह टाका। पाँच टाका पुलिस के, पाँच टाका दादा के। बचलौ कतेक? डेढ़ टाका? अब अई डेढ़ टाका मे की खाऊ हम आओर, जाहि स' पेट भरए? तोरा त' ई सभ नञि सोचबाक छौ ने। तैं कहलियौ जे बड्ड भगमंता छें।
मंगतू : (तिक्त स्वर म') तोंहों भगमंता बनि सकै छें।
ब. 1+2 : (एके स्वर म') हँ, कोना? बता कने! पाइ लेल किछुओ क' सकै छी हम सभ।
मंगतू : किछुओ क' सकै छे ने! त' आ, तोहों बनि जो हमरे जकाँ लूल्हि, लांगड़ .. फिर तोरो लग बरसतो पानिक बदला मे पाइ .. आ .. आ .. बना दियौ .. आबि जो ..
(खूँखार हाव-भाव स' ओकरा दिस बढ़ैत अछि। दुनू बच्चा चिचियाइत अछि। बच्चा 1 ओकरा मार' लेल हाथ उठबैत अछि। फेर नीचा क' लेइत अछि। बच्चा - 3 बच्चा 2 के हाथ स' भूख लगबाक इशारा क' रहल अछि। बच्चा 1 ओकरा देखि लेइत अछि आ मंगतू पर उठाओल हाथ, जे नीचा आबि रहल छलै, ओकरा बच्चा 3 पर जमा देइत छै।)

(अंधकार । प्रकाश। सोझा स' दु गोट पत्रकार युवक-युवती अबैत अछि। युवती जींस आ बॉडी टाइट टी शर्ट मे अछि। कटल केश, कंधा पर शांतिपुरी झोरा, गर्दनि मे पेन आ मोबाइल लटकल। युवक सेहो जींस आ खूब ढोल ठक्कल टी शर्ट मे अछि। कन्हा पर पोर्टफोलियो बैग, गर्दनि मे कैमरा, मुंह मे सिगरेट। सिगरेट पिबैत धुआँ छोड़ैत छै। धुआं युवती दिस पहुँचै छै। युवती हाथस' धुआं हटबैत तेज नजरि स' युवक के देखै छै।)
युवक : सॉरी, सॉरी। की करू। सभ ठाँ त' नो स्मोकिंग जोन बना देने छै। दफ्तर, पार्क, होटल, अस्पताल - कतहु नञि पीबि सकै छी।
युवती : त' नञि पियू। पानि नञि छै ने, जे मरि जाएब।
युवक : पानि नञि प्राण अछि। अनका लेल अपन प्राण गमाएब हमरा मंजूर नञि ।
(गप्प करैत-करैत युवतीक दृष्टि मंगतू पर पड़ैत छै। ओ भीख लेल सिक्का निकालैत अछि। युवती रोकि देइत अछि।)
युवती : ऊँहू!
युवक : (मजाकिया स्वर मे) त' ई सिगरेटे द' अबै छियै।
युवती : सभ समय मजाक नञि ।
युवक : तहन?
युवती : ओकरा पर चलू एकटा स्टोरी करै छी।
युवक : फेदा।
युवती : ओ पढ़ल-लिखल छै। शारीरिक रूप स' नचार । पढ़ल छै, तैं भ' सकैछ जे भीख माँगब ओकरा पसीन नञि हुअए। मजबूरी मे..
युवक : कह' की चाहै छी अहाँ?
युवती : कर' चाहै छी स्टोरी ।
युवक : व्हाट? (किछु सोचैत अछि) हँू .. फिजिकली इनेबल, मेंटली शार्प, लिटरेट .. काज कएल जा सकैय'।
युवती : छपला स' जे पाइ भेटत, तकरा मे स' आधा एकरा द' दबै। ओकरो लागतै जे भीख स' अलग किछु ओकरा भेटलैय'। आत्मविश्र्वास बढ़तै ओकर।
युवक : यदि हम फिल्म धरि सोची त'? 'अ हैंडीकैप्ट लिटरेट'..। नीक बनि गेल त' अवार्ड-तवार्ड सेहो..
(अवार्डक नाम पर युवतीक ऑखि चमकैत छै।)
युवती : नॉट अ बैड आइडिया।
(दुनू मंगतू लग पहूँचइत छथि।)
युवक : रौं, नाम की छौ तोहर।
(मंगतू चेहाक' ओकरा दिस देखै छै। किछु बोलबाक होइ छै, मुदा दोसरे पल मुंह बन्न आ चेहरा कठोर क' लेइत अछि।)
युवती : अहीं स' पूछि रहल छी जे की नांव भेल।
(मंगतू एखनो चुप अछि। मुदा ओकरा मे एकटा नाराजगी भरल उत्तेजना बढ़ि रहल अछि।)
युवक : सुन! हम सभ तोरा पर किछु काज कर' चाहै छी। अई में तोहर सपोर्ट चाही। माने सहायता।
युवती : अहाँक नाँव, गाम, ठेकान। अहिठाँ कोना पहुंचलहुँ..
(मंगतू एखनो दुनू दिस ताकिए रहल छै। युवक मे रोष पैदा होई छै। युवती स')
युवक : ही इज डफर। एक्टिंग। नोइंग हिज इंपोर्टेंस। लेट्स मूव।
युवती : बी पेशेंट। ही विल टॉक। (मंगतू स') भाई, कनेक अहाँक सहयोग चाही। अहीं पर हम सभ काज कर' चाहै छी। दुनिया के बताब' चाहै छी जे अहाँ के छी, कोना छी। लोक-आओरक धेयान खींच' चाहै छी- अहाँक गुण पर, जे अई हालति में रहियो क' अहाँ पढ़लौं।
मंगतू : (अकस्मात) अहाँ के कोना बूझल?
युवती : देखै छियै ने। अबैत-जाइत। अखबार पढ़ैत, लोक आओरक चिट्ठी पढ़ैत।
मंगतू : (एकटा धार मे बहैत जकाँ) हुँ बहुत लोक छै, जे पढ़' नञि जानै छथि। हुनका गाम आओर स' चिट्ठी अबै छै। ओ सभ हमरा लग अबैत अछि। हम पढ़ि दै छियै। हमरा लिखहू अबैय'। हे, (बाम हाथ देखबैत) देखियौ। पहिने त' अच्छर खराब होई छल। आब कने ठीक भ' गेलै। मुदा, अहाँ कियै पूछि रहल छी ई सभ?
युवक : कहलियौ ने रे जे तोरा पर एकटा स्टोरी करबाक अछि।
मंगतू : ओहि स' हमरा फेदा? हमरा भीख माँग' से' छुट्टी भेंटि जाएत? कोनो काज भेंटत हमरा? अहाँ त' अपन काज बना लेब आ लाति मारि क' चलि देब। चिन्हबो नञि करब।
युवती : एहेन गप्प नञि छै..
मंगतू : त' केहेन गप्प छै? सभ किओ अपना मतलब साध' लेल अबैत अछि। अहूँ आओरक मतलब अछि। नञि त' .. अहाँ दुनू त' रोजे ई बिल्डिंग मे अबै छी। लोक आओर त' एक नजर एम्हर मारियो लेइत अछि, अहाँ दुनू त' सेहो नञि ..
युवती : एहेन किछु नञि छै। कहियो न कहियो, ककरो न ककरो नजरि त' पड़बे करै छै। अहाँ पर आई गेल आ हमर दुनूक गेल। भ' सकै छै जे हमर लेख पढ़ि क' किओ अहाँ स' भेंट कर' आबथु, गप्प करथु। भ' सकै छै, जे अहाँ के अपना जिनगीक कोनो राह भेंटि जाए।
मंगतू : कोनो एहेन नञि आओत जे हमरा बाट देखाओत। हँ, भीखक चवन्नी -अठन्नी बीग' लेल अबस्से आबि जाएत। काज कोनो नञि देत। की करब अहाँ सभ जानि क' जे हम के छी, कत' स' आएल छी..
युवक : एना मोन हारला स' किछु भेटै छै की? (युवती दिस) ई कहबे केली ने जे भ' सकै छै, हमर स्टोरी पढ़ि क' किओ तोरा कोना काज-धन्धा देइये दै। अरे आसे पर त' ई दुनिया ठाढ़ छै। तों नञि बाजबें त'..
युवती : ईहो भ' सकै छै ने जे अहांक कथा पढ़ि-सुन क' दोसरो लोक आओर मे नव जिनगीक संचार हुअए। अहां त' उदाहरण भ' जाएब। प्रेरणा पुंज..
मंगतू : कहबाक गप छै ई सभ। नञि किओ आएत, नञि हमरा काज देत। हम अहिना भीख मँगैत, मँगतुआ कहबैत मरि जाएब- अही ठाँ, अही फुटपाथ पर। मुन्सीपाल्टीबला आओत, अपना गाड़ी मे ल' जा क' कतहु देह के ठेकान लगा देत.. भिखमंगे बनल मरि जाएब। (युवक स') कहू त', हमर कोन कसूर जे जनमते हम मोरी मे बिगा गेलहुँ। मात्र अही लेल ने जे हम नजायज छी। मुदा कहू जे छोट-छोट, भोला-भाला बच्चा सभ कोना क' नजायज भ' गेलै। (तेज नजरि स' युवती के देखै छै।)
युवती : सही। कोनो नवजात नाजायज कोना भ' सकै छै?
मंगतू : सएह त'। नजायज त' हुनकर संबंध भेलै ने। आ सेहो नजायज कियैक? बच्चा जनमाएब कोनो नजायज कर्म छिकै ? तहन त' हे, ई पूरा दुनिये नजायज अछि। समाजक रीति-नीति नञि मानू त' सभ किछु नजायज.. ई समाज हमरा भिखमंगा बना देलक, ई नजायज नञि भेलै?
युवक : हूँ, बात मे दम छौ तोहर!
मंगतू : (जेना अतीत मे।) हम एहेन नञि छलहुँ। एकदम पूरा देह छल हमर, अहीं आओरक माफिक - दू टा पएर, दू टा हाथ। तीर जकाँ भगैत छलहुँ, लट्टू जकाँ नचैत छलहुँ.. घिर्र.. (लट्टू जकाँ गोल-गोल घुमबाक प्रयास करैत अछि।)
युवती : फेर?
मंगतू : फेर की? (रिजर्व होइत) छोड़ू! की रखल छै ऊ सभ मोन पाड़ि क'। नञि त' ऊ दिन घूरत आ ने हमर हाथे-गोर।
युवती : एना नञि बाजी। कहलहुँ ने हम जे हमर स्टोरी पढ़ि क' कोनो मातबरि, दयालु पहुँचि सकैत छथि अहाँक मदति लेल। भ' सकैछ, जे ओ अहाँक पएरे बनवा देथु। आइ-काल्हि खूब चलल छै ने जयपुरी लेग। देखैयो में एकदम असली लागै छै आ काजो एकदम असलीये जकाँ करै छै।
युवक : तों त' पढ़ल छें। पढ़नेही ही हेबें एकरा मादे।
मंगतू : (अही प्रवाह मे) हँ, सुधा चंद्रनक पएर जकाँ।
युवक : एकदम सही। यदि किओ तोरो पएर एना बनबा देलकौ त' तोहों हमरे सभ नाहीत चलि-फिरि सकबें.. मुदा ई त' बता जे ई सभ भेलौं कोना। जन्मे स' एहेन नै छें एखने कहलें..
मंगतू : (बीच ही मे) पूरा छलहँु हम' एकदम अहीं सभ जकाँ। नान्हि टा छलहुँ छौंड़ा सभक संग खेलाए छलहुँ। अकास मे गुड्डी देखल हे.. ऊ.. बकाट्टा सभ गुड्डी लूट लेल पड़ाएल। हमहूँ पड़ेलौ.. भागलहुँ, भगैत गेलहुँ, भगैत गेलहुँ- होस छोड़िक'। नञि बूझ' में आएल जे सोझा स' बस.. (कनेक स्थिर भ' क') ई गणपत काका (केलावाला दिस इशारा करैत) छथि, सएह हमर माय-बाप बनि गेलाह। अस्पताल ल' गेलाह, जतेक भ' सकलै इलाज पानी करौलन्हि!
युवती : आ अहाँक माय-बाप?
मंगतू : दाइ, कियैक कटल पर नून बुरकै छी? अरे हम भेलहुँ हरामी, सुअरक औलाद! हमरा आओरक माय-बाप कोन? एतबे हिम्मति रहितियैक त' जनम के बाद हमरा मोरी मे त' नञि ध' देने रहितियैक'ने। आब त' गणपते कक्का हमरा लेल माय-बाप सभ छथि।
युवक : चलू, जान त' बांचि गेलौ ने!
मंगतू : (फेर भड़कैत) ई जान? ई जिनगी? अहाँ के चाही एहेन जिनगी? त' ल' लिय' ने! खुशी-खुशी द' देब। मुदा नञि । अहीं के कियैक, ककरो नञि चाहीं एहेन जिनगी। ई कटल-भांगल, लोथ, अपाहिज जिनगी। अरे साहब, कहब बहुत आसान छै। अपन जीह छै ने।
युवती : कह' सुन' स' मोन हल्लुक भ' जाए छै।
मंगतू : नेनपने स' भीख मांगब हमरा बड्ड अक्खजि बुझाइत छल। नेनपनि मे, जाधरि हाथ-गोर सही सलामति छल, एम्हर-ओम्हर काज क' क', टिकुली-ककही बेचि क', कप प्लेट धो-धो क' जिनगी बसर केलहुँ। सुनने छलियै जे काज कर' बला धिया-पुता लेल राति मे स्कूल चलै छै.. सोचने छलहँु जे नाम लिखा लेब। पढ़ि-लिखि जाएब त' कोनो छोट-मोट काज भेटि जाएत। मुदा.. ऊ गुड्डी अपने की बकाट्टा भेलै, हमर जिनगी के सेहो बकाट्टा क' देलकै। आनक आसरे भ' गेलहुँ हम। मांगि-चाँगि क', खेनाई! छिया-छिया, कतेक गर्हित कर्म छै ई। कएक बेर सोचल, जे नञि माँगब भीख- लग मे फेंकल पाई सेहो नञि उठबै छी। घिन अबैय'। मुदा, ई पापी पेट घिन स' बढ़ि क' भ' जाइए।
युवक : नाम की भेलौ तोहर!
मंगतू : नाम त' ओकर होई छै ने यौ बाबू, जकर माय-बाप रहै छै! रोडबला लोकक कोनो नाम होई छै.., जे-जे कह' लागल, सएह नाम भ' जाइत छै.. माँगि-चाँगि क' खेने सन्ते लोक आओर हमरा मंगतू कह' लागल। मंगतू स' मँगतुआ। (करूण हंसी)
(मंगतूक गप्प युवक-युवती नोट-बुक मे नोट करैत रहैत छथि।)
मंगतू : आओर साब, हम जहन..
युवक : (अचानक नोट बुक बंद करैत) अच्छा मंगतू, फेर होइत अछि भेंट-घाट।
(युवती सेहो नोट-बुक बंद क' देइत अछि। मुदा ओकर आँखि मे अथाह प्रश्न व आश्चर्यक भाव छै। मंगतू हतवाक युवक दिस देखिते रहि जाइत अछि। ओ किछु बाजबाक प्रयास करैत अछि, मुदा ओ दुनू ओहिठाँ से उठि जाइत छथि। ओ दुनू मंच स' प्रस्थान करैत, मंच क' दोसर भाग स' पुन: अबै छथि, गप्प-सप्प करैत। प्रकाश ई दुनू पर । मंगतू फ्रीज अवस्था में..)
युवती : बाप रौ बाप! कतेक सीरियसली गप्प करैत छलै। कतेक कन्सर्नं भ' क! संबंध नजायज होई छै, बच्चा नञि! ..कतेक आसानी स' हम सभ अपन भूलक चद्दरि दोसराक माथा ओढ़ा अबैत छी। आ, बना लेइत छी अपना के पाक-साफ। ई मंगतू, कतेक भाव भरल छै एकरा भीतर। कतेक नीक जकाँ सोचै छै। आ हम सभ पढुआ लोक, मात्र एकटा भीखमंगा बूझि ओकरा टालि जाइ छी।
युवक : हे! बेसी भावुक नञि बनी। स्टोरी कर' आएल छी, ओकर जिनगीक रामनामी चद्दरि ओढ़' नञि। बूझि पड़ैत अछि, किछु बेसीए प्रभावित क' देलक ओ लुल्हबा। कोनो चक्कर-उक्कर त' शुरू नञि भ' रहल अछि.. एकदम फिल्मी स्टाइल मे।
युवती : शटअप! अहाँ सभ के एकरा अलावे आओर सूझबे की करत?
(दुनूक प्रस्थान। प्रकाश मंगतू पर। ऊ ई दुनू के जाएत देखैत छै, किछु.. किछु असंतुष्ट, किछु-किछु संतुष्ट।)
मंगतू : चलि गेलाह! भरि पोखि गप्प भेबो नञि कएल आ.. (संतुष्टि क भाव स) तइयो पहिल बेर आई कोनो पढ़ल लिखल लोक स' गप भेल। मोन त' होइ छल जे बतियबिते रही। मुदा.. बीचहि मे.. भ' सकै छै, जतेक सूचना चाही, भेंटि गल हुअए.. तइयो.. जतबे गप्प भेल, नीक लागल.. हम त.. हमरा त' मोन होइते रहैत अछि जे हम एहेन-एहेन लोक सभ स' गप्प करी - देस, दुनिया, समाज आ अपना पर। (उल्लसित स्वर मे) गणपत कक्का! देखलहुँ अहाँ। ओ सभ हमरा स' गप्प केलाह। पत्रकार सभ.. पढुआ लोक सभ। आब जरूर हमर जिनगी बदलि जाएत। हमरा पएर भेटत, काज भेटत.. कतेक सोहाओन समय हेतै ओ..
(गणपत काका केराक चंगेरी उठौने ओकरा लग अबैत छै आ सभ' स' उतरल केरा ओकरा दै छै।)
गणपत : ले, खो!
मंगतू : काका.. हमर गप्प नञि सुनै छी !
गणपत : सभ सुनै छी। पत्रकार छथि। हुनका आओरक काजे छै दोसरा आओरक जिनगी बनेनाइ।
(केरा देइत) ले, खतम क' ले त' हम जाइ..
मंगतू : कत?
गणपत : घर! बेटी बाट तकैत होएत। सीधा-पानी ल' क' जेबै, तहने ने चूल्हि मे आंच पजरतै।
मंगतू : (नमगर सांस लेइत) हँ, घर! अई ठाँ सभ के नीक-बेजाय, पैघ, छोट- अपन घर छै, परिवार छै, धिया-पुता छै, ओकरा आओर लेल ओकरा सभ के घुरबाक छै। पच्छिम दिस डूबैत घुरैत सुरूज जकाँ। आरामक ओसांसि लेल, परिवारक बीच अपन सुख-दुख बाँट' लेल।
गणपत : (ओसांसि भरिक') हँ रौ, घर आ परिवार! टिनाक चदरा, पोलथीन स' छारल चार बित्ताक घर, जाहि मे ठामें-ठाम भूरि। सेहो चार-छओ मास पर मुंसीपाल्टीबला खसा दै छै। सभ बेर के तोड़ि-फोड़ि में पांच मे स' टीन टा चीज गायब भ' जाइ छै। बेटी जवान भ' गेल। लोक आओर घूरैत रहै छै, हम किछुओ नञि क' पबै छी। (उठि क' बिदा होइत अछि। प्रकाश ओकरा पाछां। एक कोन्टा मे माथ पर स' चंगेरी उतारबाक अभिनय। संगहि पार्श्र्व स' 'ऐ चमेली', गै छप्पन छुरी, कोम्हर जाइ छंै करेजाक छप्पन टुकड़ी क' के', 'एम्हर आ, एक्कहि राति मे रानी बना देबौ' 'ऐ, आती क्या खंडाला' सनक स्वर ।)
.. बेटा जवान भ' गेल अछि। मुदा चारि टा पाइ कमेनाइ अपना इज्जत पर बट्टा बूझैत अछि।
बेटा : (घुसैत) रौ बुढ़बा, भरि दिन सेठ जकाँ बइसल रहले कि किुछ बेचबो केलें। (नेपथ्य दिस मुंह क' क') किओ अछि? किछु छैहो खाए-पिय' लेल कि सभ ठुंसा देलही ई महाराजा के।
(नेपथ्य दिस स' 18-19 वर्षक एकटा लड़की हाथ में थारी ल' क' अबैत अछि। एम्हर स' ऊ थारी ल' क' अबैत अछि आ दोसर दिस स' दू-तीन टा गुंडा सनक लोक अबैत अछि आ लड़की के अश्लील रूप स' घूरैत अछि। लड़की भाई के थारी देइत अछि। भाइ थारी देखिक' फेंक देइत अछि।) ई सूखल-टटाएल रोटी आ पानि जकाँ तीमन! ई खाएक छै?
गुंडा 1 : रौ राजू! तोंहो कत' आबि जाइ छै मगजमारी कर' लेल। रौ मीता, चल हमरा संगे। तोरा तंदूरी चिकन खुएबौ। मुर्गीक टंगड़ी (बोतलक इशारा करैत) एकदम मेम चीज.. मोन खुस भ' जेतौ.. मुदा..
राजू : मुदा की?
गुंडा 2 : किछु लेब' लेल किछु देब' पड़ै छै ने यार!
राजु : हमरा लग अछिए की? ई बुढ़बा राखलए किछु हमरा लेल?
गुंडा 3 : नगीना रौ नगीना। एकदम पटाखा छौ तोहर घर मे आ कहै छैं जे बुढ़ऊ किछु छोड़बे नञि केलकौ अछि?
गुंडा 1 : एहेन मोट-ताज मुर्गी । कहियो हमरो टेस्ट करा यार!
(निर्लज्ज हंसी। लड़की सुकुचाक' भीतर चलि जाइत अछि। गणपत खिसिया क' ओकरा दिस बढ़ैत अछि, मुदा बेटा बीचहि मे छेकि लेइत छै।)
बेटा : हे हमर परम पूज्य पिताजी! कत' जा रहल छी अहाँ? ई सभ के छथि, बूझलए अहाँ के? .. ई सभ हमर दोस्त छथि आ हमरा तंदूरी मुर्गा खुआब' ल' जा रहल छथि। (चिचियाक') रौ बुढ़बा, ला, निकाल, जे छौ तोरा ल'ग। (जबर्दस्ती ओकर पाइ छीनैत छै। गणपत चिकरैत अछि। ओकर चिकराब सुनि लड़की भीतर स' अबैत अछि आ बाप के बचाब' लेल बाप दिस भगैत अछि। एक गुंडा ओकर गाल छुबि लेइत अछि, दोसर ओकर हाथ खींचिक' बाहर ल' जाइत अछि। ई देख गणपत पाइ छोड़ि बेटी के बचाब' भागैत अछि। बेटा पाछाँ स' एक लात ओकरा जमबैत अछि। गणपत मुंहक भरे खसैत अछि। बेटा समेत सभ कियो ठठाइत निकलि जाइत अछि। पार्श्र्व स' लड़कीक चिकरब आ गुंडा सभक अट्टाहास आ अश्लील प्रलाप सुनाइ दैत छै। तेज संगीत.. बेंजोक तेज ध्वनि हठात समाप्त होइत अछि। मंच पर घोर अंधकार आ सन्नाटा!)
(अगिला अंकमे जारी)
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२.४. रिपोर्ताज-नवेन्दु कुमार झा
रिपोर्ताज-


नवेन्दु कुमार झा
अंशकालिक सभाचार वाचक सऽ अनुवादक
मैथिली ’ संवाद’, प्रादेशिक समाचार एकांश
आकाशवाणी , पटना
छात्र संघक चुनावक प्रति उदासीन अछि सरकार
नवेन्दु कुमार झा *
छात्रसंघक अस्तित्व बिहार मे समाप्त भऽगेल अछि । दुर्भाग्य ई अछि जे जाहि छात्र आन्दोलनक माधम सऽ राजनीतिमे अपन पैढ बना सत्ताक कुर्सी धरि पहूचि लालू प्रसाद एखन केन्द्रीय राजनीतिक धुरि बनल छथि हुनक पन्द्रह वर्षक शासन कालमे छात्र संघ चुनावक प्रति ओ उदासीन रहलाह मुदा एखनो छात्र आन्दोलन क कोख सऽ जनमि बिहारक सत्ता संचालन क रहल मुख्य मंत्री नीतीश कुमार आ उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी क सेहो एहि प्रति उदासीन रवैया सऽ छात्र सभमे आक्रोश अछि। वर्तमान राजग सरकार तीन वर्षक कार्यकालमे हालाकि कतेको बेर छात्र संघ चुनाव होएबाक सुगुबुगाहट भेल अछि मुदा ओकर सार्थक परिणाम एखन धरि सोझा नहि आएल अछि ।
बिहार सभ विश्वविद्यालयमे प्रति वर्ष नामांकनक समय छात्र संघक नाम पर टाका लेल जाईत अछि । मजेदार बात ई अछि जे पटना विश्वविद्यालय केऽ छोड़ि शायदे कोनो विश्वविद्यालय लग एहि टाकाक हिसाब-किताब उपलब्धा अछि । प्रदेशक छात्र क संग भऽ रहल एहि धोखाधरी पर सरकारक मौन एहि बात क प्रमाण अछि जे ओ छत्र शवित क ताकत केऽ नजर अंदाज कऽ रहल अछि । हालाकि दू वर्ष पहिने राज्यपालक मंजूरिक बाद प्रदेश सरकार छात्र संघ चुनाव करैबाक संकेत देने छल । एहि संदर्भमे सभ विश्वविद्यालय केऽ चुनाव सऽ संबंधित दिशा –निदैश देने छल । मुदा ओ मात्र छात्र सभक आखिमे गर्दा छोकब छल किएक तऽ एहिमे कोनो समय सीमा निर्धारित नहि कएल गेल छल तेँ कतेको विश्वविद्यालय ओहि दिशा-निदैश क किछु बिन्दु पर अपन आपत्ति व्यवत करैत एहिमे सुधारक लेल प्रस्ताव पुन: सरकार केऽ पढा देलक अछि । सरकाक एहि डेगक बाद मात्र भागलपुर विश्वविद्यालयमे चुनाव भऽ सकल । एहि मध्य छात्र संगठन सभ जखन विश्वविद्यालय प्रशासन पर छात्र संघ चुनावक लेल दबाब बनबैत अछि तऽ ओ संशोधित प्रस्ताव क मंजूरिक बहाना बना अपन जिम्मेदारी सऽ मुक्त भऽ जाईत अछि ।
छात्र आन्दोलन रास्ता सत्ताक शिखर धरि पहूँचल बिहारक वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व छात्र संघक ताकत केऽ बुझैत अछि । चाहे लालू प्रसाद होथि या कि नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी आ राम विलास पासवान सभ छात्र आन्दोलन उपज छथि । ओ अपन राजनैतिक नेतृत्व केऽ एहि छात्र संघक माध्यम सऽ भेटए बाला राजनैतिक चुनौती सऽ परिचित छथि । तेँ प्रदेशमे कोनो नया नेतृत्व नहि ठाढ़ भऽ सकए ताहि लेल एकटा रणनीतिक अन्तर्गत छात्र संघ चुनाव करैबाक प्रति उदासीन रवैया अपनौने छथि । प्रदेशमे छात्र संघक अंतिम
चुनाव १९८४ मे पटना विश्वविद्यालयमे भेल छल । जाहिमे महासचिवक रूपमे विजयी भेल रणवीर नंदन भारतीय जनता पार्टीक प्रदेश पदाघिकारी छथि । अपन नीजि कम्पनीक रूपमे राजनीतिक दलक उपयोग करै बाला नेता सभकेऽ ई जनतब छनि जे छात्र संघक विजयी प्रतिनिधि भविष्यमे दलक राजनीति मे आवि सकैत छथि ओ हुनका लेल खतरा बनि सकैत छथि तेँ एकर सभ सऽ कड़ गर उपाय छात्र संघ चुनाव नहि कराएब अछि ।
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भाषाई अकादमीक विकासक लेल उठल सरकारक डेग
नवेन्दु कुमार झा
बिघरमे लोक भाषाक समृद्धि आ भाषाक विकासक लेल कतेको भाषाई अकादमी कार्यरत अछि मुदा एहि अकादमी सभक ठेकान पाता लगाएब मुश्किल अछि । बदहालीक मारि झेलि रहल अकादमी सभक जखन विकास नहि भऽ सकल तऽ ओ भाषाक कतेक विकास करत ई सोचब अनुचित होएत । प्रदेशमे कार्यरत मैथिली, मगही , भोजपुरी संस्कृत , बग्ला आ दक्षिण भारतीय भाषा अकादमी एखनो विकास सऽ कोसो दूर अछि जहॉ-तहॉ चलिरहल एहि अकादमी सभ एखन धरि कोनो स्थायी ढेकान नहि अछि ।
न्यायक संग विकासक तीन वर्ष पूरा कऽ चूकल वर्तमान राजग सरकार क नजरि आब एहि अकादमी दिस गेल अछि । एहि संस्थान सभ काम काज पटरी पर अनबाक लेल प्रयास शुरू कएलक अछि । मानव संसाधन विकास विनागक नियंत्रणाधीन एहि संस्थान सभक विकासक लेल एकटा ब्लू प्रिन्ट विभाग द्वारा तैयार कएल गेल अछि । एहि योजनाक अन्तर्गत विभाग एहि भाषाई अकादमी सभमे शोधक काजक संगहि पाण्डुलिपि सभक प्रकाशन आ ओकर बिक्रीक व्यवस्था करबाक योजना बनाओल जा रहल अछि । राजधानी मे जत्र-तत्र चलि रहल एहि संस्थान सभक कार्यालय एक छतक नींचा अनबाक प्रयास सेहो तेजी सऽ चलिरहल अछि ।
सभ भाषाई अकादमी एकहि परिसरमे रहए एहि लेल राजधानीमे स्थलक चयन कएल जा रहल अछि । एहि क्रममे बिहार राष्ट्र्भाषा परिषद् परिसर आ एहि लगमे स्थित संस्कृत विधालयक खाली पड़ल जमीनक चयन कएल गेल अछि । विभाग एहि दूनू स्थान मे सऽ कोनो एकटा स्थान पर सभ भाषाई अकादमीक लेल सुविधा सम्पन्न परिसर बनैबा पर गंभीरत सऽ विचार कऽ रहल अछि । सरकारक मंशा एहि अकासमी सभक उद्देश्य पूरा करब अछि आ एहि क्रममे पहिल प्राथमिकता एहि लेल आधारभूत संरचनाक विकास करब अछि । एकर बाद स्थानीय भाषाक विकास आ शोधक काज शुरू कएल जाएत संगहि पाण्डुलिपि क प्रकाशन आ प्रकाशित पुस्तकक ब्रिक्रीक व्यवस्था कएल जाएत जाहि सऽ एहि अकादमी सभ केऽ आर्थिक रूप सऽ मजगूत बनाओल जा सकए ।
कतेको वर्ष पूर्व जाहि उद्देस्य सऽ एहि संस्थान सभक गठन कएल गेल छल ओहिमे कतबा सफलता भेटल से एहि संस्थान सभक वर्तमान स्थिति केऽ देखि स्पष्ट भऽ जाईत अछि । प्रारंभिक कालमे अपन उद्देश्य दिस बढ़ल एहि संस्थान सभक गतिविधि कतेको वर्ष सँ मंद पड़ल अछि । मात्र किछु गोटेक दरमाहा आ किछु साहित्यकार केऽ महिमा मंडित करए बाला एहि संस्थान सभक गतिविधि सुचाढ रूप सऽ चलैबाक लेल सरकार द्वारा प्रयास प्रारंभ करब स्वागत योग्य अछि । ज्यो एहि दिस सरकार इमानदारी सऽ प्रयास कएलक तऽ कतेको लर्ष्ध साहित्यकारक दुर्लभ पाण्डुलिपि पुस्तककार रूपमे साहित्यप्रेमीक सोझा आओत आ भाषाक विकासक रास्ता भेटत । शोध आदिक काज शुरू भेला सऽ भाषाक संदर्भमे नव-नव जनतब सेहो सोझा आओत जकर लाभ साहित्यक शोधार्थी आ छात्र सभ केऽ भेटि सकत ।

२.५. राजमोहन झा (प्रबोध सम्मान २००९) सँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार
खुलल दृष्टिसँ नहि भऽ रहल अछि समीक्षा : राजमोहन झा
साहित्यकार भाइ-साहेब राजमोहन झाक कैक टा कथा संग्रह आ चारि टा समालोचनात्मक पोथी लिखल छन्हि। मैथिली भाषामे हुनकर एहि योगदानकेँ देखैत २००९ सालक प्रबोध सम्मान हुनका देल जाऽ रहल छन्हि। हुनकासँ मैथिलीक भूत, वर्तमान, भविष्य आ समीक्षाक गप, संग-संग पारिवारिक आ सामाजिक जिनगीक ताना-बानाक गप वरिष्ठ पत्रकार विनीत उत्पल बातचीत मे बुनलन्हि।

• विनीत उत्पल : अहांक जन्म कतय भेल, दिन-वर्ष की छल?
• राजमोहन झा : हमर जन्म गाम मे भेल, कुमार बाजितपुर (वैशाली)। साल छल १९३४, अगस्त माहक २७ तारीख।
• विनीत उत्पल : आ प्रारंभिक लालन-पोषण ?
• राजमोहन झा : प्रारंभिक लालन-पोषण गाम मे भेल। किछु दिनक बाद पटना आबि गेलहुं, आगू पटनेमे भेल।
• विनीत उत्पल : शिक्षा-दीक्षा कतय भेल ?
• राजमोहन झा : प्रारंभिक शिक्षा तँ गाममे भेल। पटना अएलाक बाद टी.के. घोष एकेडमी मे आठवां मे नाम लिखेने रहि, जतय सs मैट्रिक पास केलहुं। एकर बादक पढाई पटना कालेज, पटनासँ भेल। हमर विषय मनोविज्ञानक संग-संग लाजिक, हिन्दी आ अर्थशास्त्र छल।
• विनीत उत्पल : पितामह कतेक मोन छथि ?
• राजमोहन झा : हमर पितामह जनार्दन झा संस्कृतक विद्वान छलाह। हुनकर मृत्यु १९५१ मे भेलनि। गाम मे हमर पढाई हुनकर संरक्षण मे भेल छल। मिडिल स्कूल तकक पढाई तँ हम गाम मे केने रहि। ओ मैथिली मे सेहो लिखैत रहथि। ताहि लेल हमहूँ मैथिलीमे लिखबाक लेल प्रेरित भेलहुँ। मैथिली साहित्य मे रूचि जागल। ओ कतेक ठाम घुमि-घुमि कs रचना केलथि। महावीर प्रसाद द्विवेदीक सरस्वतीक संपादन करैक संग ओ मिथिला मिहिरक संपादक सेहो रहथि। करीब एक सौ टा बंगला उपन्यासक हिन्दी मे अनुवाद केलथि, जाहि मे विषवृक्ष, देवी चौधराइन उपन्यास प्रमुख अछि।
• विनीत उत्पल : साहित्यक प्रारंभिक प्रेरणा केकरा सँ भेटल ?
• राजमोहन झा : प्रारंभिक प्रेरणा तँ पितामह सँ भेटल। पितामहे शिक्षाक आरम्भ करोलथि। गाममे मिडिल तक पढाई काल तक पितामहे गार्जियन रहथि। पटना एलहुं तs बाबूजीक (हरमोहन झा) संग रहलहुं।
• विनीत उत्पल : घर मे किनका सँ अहां बेसी नजदीक रही ?
• राजमोहन झा : पितामह संग पितामहीक सबसँ नजदीक रहि।
• विनीत उत्पल : संस्कृत परंपरा सँ अंगरेजी परंपरा दिस कोना प्रवृत भेलहुँ ?
• राजमोहन झा : समय बदलैत गेल, पहिने लोक संस्कृत पढैत रहथि। संस्कृत धीरे-धीरे लुप्त होइत गेल। अंगरेजी शिक्षा स्थान लेलक आओर प्रभाव बढ़ैत गेल। तखन अंगरेजी आ हिन्दी दिस लोक झुकए लागल। हमहुं ओही दिस प्रवृत भेलहुँ।
• विनीत उत्पल : साहित्य कए अतिरिक्तेक की पेशा छल ?
• राजमोहन झा : इम्प्लायमेंट आफिसर रही। आब रिटायर्ड छी।
• विनीत उत्पल : कोन-कोन शहर मे रहल छी ?
• राजमोहन झा : जमशेदपुर, मुजफ्फरपुर, रांची, बोकारो, पटना, दिल्ली मे नौकरी काल रहलहुं। पॉँच साल दिल्ली मे जनशक्ति भवन मे डिप्युटेशन पर रही।
• विनीत उत्पल : कनि भाई-बहिनक संबंध मे बताऊ ?
• राजमोहन झा : चार भाई आ एक बहिन छलहुं। दू भाईक मृत्यु भए गेल आ दू भाई छी एखन। सबसे पैघ हम छी। हमारा सs छोट कृष्ण मोहन झा रांची विश्वविद्यालय मे मनोविज्ञानक शिक्षक रहथि। तेसर भाई विश्वमोहन झा गाम मे रहथि। सबसे छोट मनमोहन झा सी.एम.कालेज, दरभंगा मे मनोविज्ञानक शिक्षक छथि। सबसँ जेठ बहिन ऊषा झा छलीह, जे दरभंगा मे छथि। बहनोई शैलेन्द्र मोहन झा १९९४ मे दिवंगत भए गेलाह । ओ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक मैथिली विभागक अध्यक्ष छलाह।
• विनीत उत्पल : बाल-बच्चा कए टा आ की करैत अछि ?
• राजमोहन झा : तीन टा बेटी अछि। ब्याह केकरो नहि भेल अछि। सबसे छोट मिनी झा टीचर छथि। जेठ बेटी ग्रेजुएशन क संग ब्यूटी-आर्ट एंड क्राफ्टक- ट्रेनिंग लेने छथि।
• विनीत उत्पल : अहांक मनपसंद रचनाकार के छथि ?
• राजमोहन झा : एकर निर्णय करब मुश्किल अछि। ललित, मायानंद, राजकमल चौधरीक लिखब लोक पसिन कए रहल अछि। आधुनिक मैथिली कए प्रारम्भ ओतहिसँ मानल जाइत छैक ।
• विनीत उत्पल : अहांक अपन नीक रचना कोन ?
• राजमोहन झा : सेँ तँ आने लोक कहत। एकर निर्णय करब मुश्किल अछि। रचनाकार कोनो रचना करैये तँ अपन तरहे बेस्ट करैत अछि। जेकरा दिलसँ करब कहबै, ओ करैत छैक। सबसँ नीक देबाक कोशिश करैत छैक। कोनो रचना सुपरसीड करैत छैक, कोनो नहि करैत छैक। ई सब बहुत रास फेक्टर पर निर्भर करैत छैक।
• विनीत उत्पल : अहांक पहिल रचना कोन छल ?
• राजमोहन झा : रचनाक शुरुआत हम कविता सँ कएने रही। तखन हम बी.ए. मे रही, १९५४ क ई गप छी। ओकर बाद कविता लिखब एक तरहेँ बंद भए गेल। कविता लिखब छुटि गेल। हमर लेखकीय जीवनक दोसर फेज १९६५सँ शुरू भेल। एखन कथा हमर मुख्य विधा भए गेल अछि।
• विनीत उत्पल : कोनो कविता सुनेबई ?
• राजमोहन झा : कविता कए मन पारब नहि चाहब। ओहि ट्रेडिशन मे हम लिखैत रही जे ओहि समय मे लिखल जाइत रहय। हमर लेखनक शुरुआती दौर छल, ओहि समयक जे साहित्य प्रभाव सँ लिखल गेल, से रहए। अपने हमरा बुझाएल जे ई कोनो कर्मक नहि छैक, तकरा बाद हम ई लिखब बंद कए देलहुं।
• विनीत उत्पल : कविता कोनो पत्रिका मे छपल ?
• राजमोहन झा : कविता 'वैदेही' मे छपल। 'मिथिला मिहिर' आ 'मिथिला दर्शन' मे सेहो छपल.
• विनीत उत्पल : आ कहानी ?
• राजमोहन झा : मिथिला मिहिर मे मुख्यतः कहानी छपल। मिथिला दर्शन मे सेहो।
• विनीत उत्पल : अपनेक रचना लिखब आ छपल मे बाबूजी (हरिमोहन झा) कए कतेक सहयोग रहल?
• राजमोहन झा : बाबूजीक सहयोग किछु नहि रहल, प्रभाव रहल। बाबूजीक संग रचनाक गप करबाक प्रश्न नहि उठैत छल। हमर लेखन हुनकर प्रभावक अंतर्गत नहि छनि। हुनकर लेखन सँ इतर हमर लिखब शुरू भेल। एकरा मे दूनू गप अछि। हुनकर प्रभाव रहल आ नहियो रहल। हुनकर क्षेत्र सँ हम अपना कए अलग कए लेलहुं। ओना प्रभाव सँ अलग कोना कए सकैत छी।
• विनीत उत्पल : 'आई-काल्हि-परसू' पर अकादमीक पुरस्कार ठीक समय पर भेटल वा नहि?
• राजमोहन झा : ठीके समय पर भेटल। ई महत्वपूर्ण नहि छल की पहिने भेटबाक चाही छल या बाद मे भेटबाक चाही छल। मन मे एहन कोनो गप नहि छल।
• विनीत उत्पल : साहित्यक अभियान मे पत्नीक कतेक सहयोग रहल ?
• राजमोहन झा : साहित्य सँ ओतेक संप्रक्ति नहि छन्हि। सहयोग-असहयोग कए ताहि द्वारे प्रश्न नहि छैक।
• विनीत उत्पल : हुनकर नहियर कतए भेलन्हि ?
• राजमोहन झा : हमर सासुर तँ दिल्ली भेल। ससुरक पिता अलवर महाराजक चीफ जस्टिस रहथि। विवाह हमर दिल्ली मे भेल।
• विनीत उत्पल : अहां कोन-कोन भाषा मे रचना केलहुं आ कतेक पोथी लिखलहुं ?
* राजमोहन झा : हिन्दी आ मैथिली मे हमर लेखन भेल। दस टा पोथी कथा संग्रह आ चारि टा समालोचनात्मक पोथी छैक.
• विनीत उत्पल : भविष्यक की योजना अछि ?
• राजमोहन झा : संस्मरण लिखबाक अछि। सुमनजी आ किरणजी पर लिखबाक बाकी अछि।
• विनीत उत्पल : साहित्यक दावं-पेंच कए कतय तक बुझलियइ ?
• राजमोहन झा : दांव-पेंच मैथिली मे नहि सभ भाषा मे चलैत रहैत छैक। ई कोनो नब गप नहि छी। एहि अर्थ मे प्रभावित भेलहुँ। ई तँ स्वाभाविक प्रक्रियाक रूप अछि। ओहिनो ई गप बेसी मेटर नहि करैत छैक।
• विनीत उत्पल : कोन रचना एहन अछि जेकरा मे अहां केँ अपन आत्मकथ्य हुअए ?
• राजमोहन झा : सभ रचना मे जीवनक अंश आबिए जाइत छैक। किया कि अनुभवक आधार पर लोक लिखय यै। अनुभवक अंश तँ रहबे करत। आत्मकथात्मकता तँ आबिये जाइत छैक।
• विनीत उत्पल : 'निष्कासन' कथा तँ नहि छी आत्मकथात्मक ?
• राजमोहन झा : स्पेशिफिक नहि करए चाहब। सभटा कथा मे कोनो-ने-कोनो रूपेण आत्मकथा भेटत।
• विनीत उत्पल : समीक्षा लेल की कहब अछि ?
• राजमोहन झा : समीक्षा खुलल दृष्टि सँ नहि भऽ रहल अछि। लोक अपन ईर्ष्या-द्वेष सँ रचना कए समीक्षा कए रहल अछि। निष्पक्ष व निर्भय भए कए समीक्षा नहि भए रहल अछि। आई-काल्हि जे समीक्षा भए रहल अछि ओहि मे धैर्यक अभाव अछि। ऑब्जेक्टिव नहि रहैत छैक लोक। जकरासँ रूष्ट रहए छथि तकर ठीक सँ समीक्षा नहि करैत छथि आ जकरा सँ नीक संबंध छैक ओकर प्रसंग खूब उठाबैत छथि। समीक्षा लेल दृष्टि काज करैत छैक।
• विनीत उत्पल : की समीक्षा करबा मे व्यक्तिगत आक्षेप आवश्यक अछि ?
• राजमोहन झा : समीक्षक बुझैत छथि, जे हम समीक्षा कए रहल छी, तँ लेखक पर उपकार कए रहल छी, हुनका हम उपकृत कए रहल छी। एकांगी दृष्टिकोण बड़का फेक्टर अछि। समीक्षा मे रचनाक समीक्षा होएबाक चाही नहि कि व्यक्तिगत आक्षेप।
• विनीत उत्पल : ई गप कहिया सँ छैक ?
• राजमोहन झा : पहिनो रहए, आबो छैक। संकीर्णता बेसी भए गेल अछि। हमर विचारे पहिने एतेक नहि छल जे एखन भए रहल छैक। अपन लोक कए घुसाबैक लेल मारामारी भए रहल छैक। हालत जेहन भए रहल छैक तकर विरोध होएबाक चाहि।
• विनीत उत्पल : नवतुरुआक लेखनकेँ कोन दृष्टि सँ देखैत छी ?
• राजमोहन झा : नबका लोक भाषाक दिस उदासीन छथि। बेसी लोककेँ भाषाक प्रति मोह नहि छनि, अपनत्व नहि छनि। जहिना-जहिना जेनरेशन आगू भेल, भाषाक उदासीनता बढ़ल गेल। बेसी लोक मैथिली बाजब छोडि देने छथि।
• विनीत उत्पल : मैथिली मे दलित साहित्य लेल अहांक मंतव्य की ाछि ?
• राजमोहन झा : साहित्य मे वर्गीकरण प्रवृति जे भए रहल अछि, ओ विखण्डित कए रहल अछि। साहित्य सृजनात्मकता सँ ध्यान हटा कए विशेष वर्ग पर ध्यान देबासँ साहित्य विखण्डित होएत। दलित कए लेखन मे अएबाक चाही।
• विनीत उत्पल : स्त्री लेखक लेल की कहब अछि ?
• राजमोहन झा : स्त्रीगण कए साहित्य लेखन मे जरूर अएबाक चाही। कोनो वर्गक लेल समग्र साहित्य कए विखण्डित नहि करबाक चाहि। खंडित दृष्टि नहि हेबाक चाहि। एकरा लेल चाही समग्र दृष्टि।
• विनीत उत्पल : मैथिली भाषा मे स्त्री लेखकक संख्या किएक कम अछि ?
• राजमोहन झा : सबहक मूल मे शिक्षा अछि। मिथिला मे स्त्री शिक्षाक प्रचार-प्रसार नहि भेल। सहभागिता आ सहृदयताक कमी रहल।
• विनीत उत्पल : मैथिली केँ संविधानक आठम अनुसूचीमे शामिल हेबासँ विकासक लेल की कहब अछि ?
• राजमोहन झा : जतय तक भाषाक प्रश्न छैक, संविधान संगे यूपीएससी परीक्षा मे शामिल होयबाक गप छैक, एकरा सँ किछु खास बल भेटहि बला नहि छैक। भाषाक समृद्धिक लेल समर्पण चाही। तकर ह्रास भए रहल अछि।
• विनीत उत्पल : तखन की कएल जाए ?
• राजमोहन झा : मूल गप भाषामे प्रवृत बच्चा सभ हुअए। स्कूल सँ पहिने परिवार छैक। परिवार मे भाषाक समुचित स्थान देल जाए, तखने बच्चा सबहक विकासक संग भाषाक विकास होएत। ई गप धीरे-धीरे कम भए रहल अछि।
• विनीत उत्पल : नवलोकक लेल कि कहब अछि ?
• राजमोहन झा : हुनका सभ कए साहित्य सँ ओ लगाव नहि छनि जे पहिलुका लोक कए छल। जखन धरि नवलोक कए साहित्य सँ लगाव नहि होएत तखन धरि किछु नहि होइत। एकर बादे मैथिली कए उज्ज्वल भविष्य छैक।
• विनीत उत्पल : एखुनका समीक्षा लेल की कहब अछि ?
• राजमोहन झा : मूल वस्तु लोक छैक। समीक्षाक लेल यैह छैक। जाऽ तक लोक नहि बदलत, दृष्टिकोण नहि बदलत, ऑब्जेक्टिव नहि होएत, तखन धरि किछु नहि होएत। समीक्षाक लेल तटस्थता चाही, निरपेक्षता चाही।
• विनीत उत्पल : मैथिली भाषाक प्रचार-प्रसार लेल की करबाक चाही ?
• राजमोहन झा : ई निर्भर करत सरकार पर, ई काज बेसी नीक जकाँ कए सकैत अछि। सामूहिक प्रयास लोकक होएत, संस्था आगू आएत, तखन होएत। मैथिलीक नाम पर जे तमाशा होइत अछि, ओकरा बंद कई पड़त। लोक रुचि जगाबक लेल काज करए पड़त।
• विनीत उत्पल : प्रचार-प्रसार लेल नवलोककेँ कोन दृष्टि सँ देखैत छी ?
• राजमोहन झा : समय-समय पर सभ किछु बदलल। नव जनरेशन आयल। समय मे परिवर्तन भेल। अपन संस्कृति लेल, भाषाक लेल पहिलुक लोक मे समर्पण बेसी छल। जेना-जेना जनरेशन बदलल, समर्पण कम भए गेल। एक तरहे कहि सकैत छी जे वैश्विक सम्पूर्णता दिस बेसी बढ़ल गेल अछि, स्थानीयक विशिष्टता पाछु छुटि रहल अछि। ग्लोबल बेसी हुअए लागल लोक, लोकल गौण भए गेल। एकरा मे सामंजस्य रखबाक चाही। एकरा बूझए पड़त। विशिष्टता आ सारभौमता स्थानीयता मे छैक। सभ संग हेबाक चाही। अपन जे विशिष्टता छैक तकरा बिसरि जाइ सेहो उचित नहि छैक। सबहक संग-संग चलैत अपन विशिष्टता नहि छोड़बाक चाही।
• विनीत उत्पल : लेखन में जीवनानुभवक की स्थान छैक ?
• राजमोहन झा : जीवनानुभव लेखनक समस्त आधार छैक। अनुभव पक्ष शून्य रहत तँ अहां की लिखब। अहांक लिखब साहित्य नहि रहत।
• विनीत उत्पल : आजुक युगक बाजारवादी दुनिया आ साहित्यक लेल की कहब अछि ?
• राजमोहन झा : जावत अहां बेसिक नीड्स मे अपना कए सीमित राखब तखन की होएत। साहित्य आगूक चीज छैक। भौतिक साधना मे अपनाकेँ सीमित राखब तँ साहित्य दिस विमुखता उत्पन्न हेबे करत। ई मूल जरूरत छैक, ई आवश्यक छैक, तकरा संग-संग नैतिक मूल्य साहित्यक लेल आवश्यक छैक। नैतिक मूल्यों उपेक्षित नहि रहए, ई पक्ष सबल हुअए। मूल जरूरत दिस लोकक बेसी ध्यान छैक, ई ट्रेंड चलि रहल छैक आ आगुओ ई रहत। जहिना-जहिना भौतिक सुख-सुविधा बढ़ल उच्च मूल्य मे ह्रास होइत गेल। ओहि दिस सँ देखब तँ राजनीति प्रमुख होइत गेल। दोसर पक्ष ई जे अध्यात्म पक्षक ह्रास होइत गेल, जखन विकास बढ़ल। भाषा मे तकनीकक विकास तँ भेल, मुदा जे मूल्य बेसी रहनि ओहि्मे ह्रास भए रहल अछि। बाहरी विकास बढ़ला सँ जे विशिष्टता, जे स्मिता छैक ओ कम भेल। बहुत लोक कहि रहल छथि जे भाषा मरि रहल अछि, से ठीक कहैत छथि। घर सँ निष्कासित भए रहल छैक ई भाषा। पारिवारिक भाषा नहि रहल ई, मरबाक लक्षण छैक।
• विनीत उत्पल : एकर उपाय की ?
• राजमोहन झा : समयक धार कए कोनो प्रयास सँ बंद नहि कए सकैत छी। शिक्षाक विकास भेल अछि। पढ़ए बलाक संख्या बढ़ल। स्कूलक संख्या बढ़ल। जाहि अनुपात मे ई बढ़ल ओहि अनुपात मे आंतरिक मूल्य घटल। जानकारी तँ बेसी बढ़ि गेल अछि, सूचनात्मक ज्ञान बच्चामे जतेक बेसी छैक, ओहि उम्र मे ओहि जमाना मे नहि रहै। मुदा, ज्ञान धरले रहि गेल। शिक्षा मे जे विकास भेल अछि, ई वृद्धि संख्यात्मक अछि, गुणात्मक विकास नहि भेल अछि। ई बात सही छैक, जतेक स्कूलक संख्या बढ़ल, ज्ञान ओतबेक कम भए गेल।
• विनीत उत्पल : तखन विकास ख़राब गप अछि ?
• राजमोहन झा : स्त्री शिक्षा पहिने नहि रहए, काफी वृद्धि भेलए। मुदा, बहुत रास साइड इफेक्ट भेल। दवाई बढ़ल, साइड इफेक्ट मे वृद्धि भेल। ओकरा रोकबाक कोनो उपाय नहि भेल अछि।
• विनीत उत्पल : अहां श्रेष्ट रचना ककरा कहब ?
• राजमोहन झा : सर्वश्रेष्ट रचना ओ होयत अछि, जे ओहि युग बीत गेलाक बादो श्रेष्ट रहत अछि। कालजयी छैक। कायम रहैक छैक पोथी आ रचनाकार। सुमनजी, किरणजी, आरसी बाबू श्रेष्ट रचनाकार रहथि। हुनकर रचना एखनो श्रेष्ट मानल जाइत अछि।
• विनीत उत्पल : एहन कोन रचना छैक जकरा फुर्सत भेटला पर अहां बारंबार पढैत छी ? जखन मानसिक परेशानी रहैत अछि तखनो ?
• राजमोहन झा : एहन कोनो पोथी नहि अछि। जखन जे भेट जाइत छैक, तकरे पढैत छी। मानसिक सुधाक शांति लेल जे पोथी उपलब्ध रहैत अछि सैह भऽ जाइत अछि।
• विनीत उत्पल : मानसिक शांति लेल की करैत छी ?
• राजमोहन झा : एहन कोनो काज नहि छैक। उपलब्धता पर हम कोनो काज करैत छी। लिखबाक मन होइत अछि तँ लिखियो लैत छी। मनक अनुरूप काज ताकि लैत छी।
• विनीत उत्पल : साहित्यक रचनाक लेल की योजना अछि ?
• राजमोहन झा : बाबूजीक रचनावली निकालबाक लेल सोचने छी। तीन खंड निकालि चुकल छी आ तीन खंड बाकी अछि। अपन तीन टा पोथी दिमाग मे अछि। पहिल- संस्मरण संग्रह आ दोसर आलोचनात्मक/समीक्षात्मक लेख संग्रहित करबाक अछि। तेसर ई जे कथा सभ छूटल छैक, लेख सभ सेहो छूटल छैक, ओकरा निकलबाक अछि।
• विनीत उत्पल : जीवनक लेल की योजना अछि ?
• राजमोहन झा : प्लानिंग क हिसाब सँ जीवन नहि चलैत छैक। पानि जहिना बाट ताकि लैत छैक, तहिना जीवन चलैत छैक। प्लानिंग सँ बहुत काजो नहि होइत अछि। एकर आवश्यकता सेहो नहि होइत अछि। प्लानिंगक अनुसार सभ काज भए जाइत, एहनो नहि होइत अछि। Men proposes God disposes. हम तँ सोचैत छी जे propose नहि कएल जाएत। एहिना जीवन छैक।
• विनीत उत्पल : जीवन आ सहित्यक दृष्टि सँ अपनेक कोन समय सभसँ बेसी नीक छल?
• राजमोहन झा : 1965 सँ 1975 धरि समय सबसँ नीक रहल, साहित्य दृष्टि सँ सेहो आ सामान्य दृष्टि सँ सेहो। ओकरा बाद खराबे कहि सकैत छी. कहिया धरि चलत नहि जनैत छी।
• विनीत उत्पल : रचना करैत काल की ध्यान रखबाक चाही ?
• राजमोहन झा : कालजयी रचना लेल कोनो सिद्धांत वा प्रशिक्षण नहि होइत अछि। साहित्य रचनाक लेल कोनो पाठ नहि होइत अछि। एकर कोनो उपयोगिता नहि होइत अछि। आन कलाक लेल स्कूल छैक। साहित्य लेल नहि छैक। कोनो एहन ट्रेनिंग स्कूल नहि छैक जे साहित्यकार बनायत। कोनो विज्ञापन नहि छैक जे छह मास मे ई चीज सिखा देत।
• विनीत उत्पल : मैथिली सहित्य मे नव लेखक केँ की सुझाव देब ?
• राजमोहन झा : मार्गदर्शन आ सुझावक पक्ष मे हम नहि छी। जिनका मे ओ प्रतिभा/योग्यता होएत, ओ अपन बाट ताकि लेताह। सिखओने सँ कियो सीखबो नहि करत। मूल वस्तु अनुभव छैक. अनुभव संपन्न छी, अनुभवक संवेदनाक पकड़बाक हुनर अछि। से लेखक मे अंतर्निहित रहैत छैक । रचनाक लेल अनुभव करबाक तागति जरूरी छैक। तकरा बिना लेखन नहि होएत। अभिव्यक्तिक देबाक लेल कौशल आ भाषा हेबाक चाही। जतय ई विकास होएत, सफ़ल होएत। प्रशिक्षण वा मार्गदर्शनक जरूरत नहि छैक।
*विनीत उत्पल : प्रबोध सम्मान 2009 प्राप्त करबाक लेल बधाई।
२.६. सुशांत झा-हमर सपना केर मिथिला
सुशांत झा
हमर सपना केर मिथिला
हमर सपना के मिथिला केहन अछि...हम भविष्य के दीस टकटकी लगा कय देखि रहल छी आ एकटा सुन्दर आ समृद्ध इलाका के तस्वीर मोने मोन बना रहल छी। हमर सपना के मिथिला में एखनतक किछुए रंग भरल गेल अछि-जेना दरभंगा में एकटा यूनिवर्सिटी आ मेडिकल कालेज, जयनगर तक बड़ी लाईन आ नेशनल हाईवे के तहत बनय बला चारि लेनवला सड़क जे मिथिला के हृदयस्थली बाटे गुजरत। हम कल्पना कय रहल छी जे एहि हाईवे के किनार में दर्जनों इंजिनीयरिंग आ मेडिकल कालेज खुजि जायत। हम ई सोचिं रहल छी जे झंझारपुर के बायोट्कनालाजी के कालेज में केरल के बच्चा सब जखन एडमिशन लेत त कतेक नीक हेतै।

हम ओहि दिन के कल्पना कय रहल छी जखन नार्थ-इस्ट आ दक्षिण भारत के बच्चा सब गाड़ी रिजर्व कय काठमांडू के टूर पर निकलत तखन लौकहा-जयनगर के नजदीक कोनो ढ़ावा पर ओकरा सबके डोसा खाइके सीन केहेन हेतैक। एखन जकरा हमसब कस्बा कहैत छियैक से झंझारपुर, निर्मली, सकरी, सुपौल आ उदाकिसुनगंज में ढे़र रास उद्योग धंधा खुजि जायत।हम सोचि रहल छी जे ओ दिन केहन हेतैक जखन मिथिला के इलाका में अपन घर लग सबके रोजगार भेटि जेतै, ,सबके अपने घर लग इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज में एडमिशन भेटि जयतैक आ बड़का बड़का कंपनी अपन कार्यालय दरभंगा आ पूर्णिया में खोलत। हम ई सोचि रहल छी जे हमर मखान के दुनिया भरि में ब्रांडिग भय जेतैक आ ओकरा ईस्ट-वेस्ट कारिडोर बला हाईवे के द्वारा गोवाहाटी आ ओतय सं इंडोनेशिया तक भेजल जा सकैछ। कखनो ई सोचैंत छी जे हाईवे बनि गेलाक के बाद सिक्किम आ दार्जिलिंग तक 3-4 घंटा के रास्ता भ जेतैक। तखन मिथिला के बच्चा सब सेहो दार्जिलिंग पढ़य जा सकत, आ युगल लोकनि हनीमून मनबय के लेल सिक्किम।


हमर मिथिला में मानव श्रम के कोनो कमी नहि, पानि के कोनो कमी नहि, मेधा के कोनो कमी नहि-कमी अछि त नियोजन के। अगर हम अपन मानवशक्ति के रोजगार प्रदान क दी त हमरा सं बेसी विकसित कियो नहि भ सकैत अछि।
कोसी पर रेलवे पुल सेहो बनि रहल अछि, आ हाईवे के तहत सड़क पुल सेहो बनबे करत। एहि तरहे ई दुनू पुल फेर सं मिथिला के जोड़ै बला साबित होयत-कोसी नदी मिथिला के दू फांक में बांटि कय राखि देने छल। हम ई सोंचैत छी जे एही तरहक एक टा फोर लेन हाईवे अगर मोकामा सं जयनगर तक भाया समस्तीपुर बनि जयतैक त केहेन बढ़िया होयतैक। सरकार के चाही जे मुजफ्फरपुर सं बरौनी आ आगू गोहाटी जायबला हाईवे नंबर 28 के सेहो फोर लेन बना दैक-ताकि अहि इलाका के समग्र विकास संभव भ जाईक। हम ईहो कल्पना क रहल छी जे नेपाल में जल्दीए शांति आ सुव्यवस्था कायम भ जेतैक आ नेपाल सं प्रचुर मात्रा में बिजली मिथिला के इलाका के जगमगैत।

नेपाल आबैबला अंतराष्ट्रीय टूरिस्ट लोकनि सेहो मिथिला के रुखि करताह। लेकिन हुनका सबके आकर्षित करैक लेल हमरालोकनि के अपन पर्यटन स्थल के विकास करय पड़त। मिथिला में बहुत रास ऐतिहासिक स्थल नहि छैक-लेकिन हमसब अपन संस्कृति के नीक पैकेजिंग कय क टूरिस्ट लोकनि के आकर्षित कय सकैत छी। सीता के जन्मस्थान आ मिथिला के प्राचीन राजधानी जनकपुर, वैशाली आ पाटलिपुत्र-बोधगया-नालंदा के जोड़यबला सर्किट के ढ़ंग सं विकास कयल जाय त झुंड के झुंड टूरिस्ट सबके आकर्षित कयल जा सकैत अछि। मिथिला के लोककला, गीत आ पेंटिंग पर आधारित कार्यशाला आ म्यूजियम बनबैके आवश्यकता छैक।

हमरा इलाका में पोखरि के कोनो कमी नहि। हम अगर एकरा ढ़ंग सं व्यवस्थित करी त ई माछ-मखान के उत्पादन के पैघ आधार त भइये सकैये, संगहि एकरा सौन्दर्यीकरण कय हम कय तरहक आर्थिक गतिविधि के सेहो बढ़ावा दय सकैत छी। हम इहो कल्पना कय रहल छी जे दरभंगा आ पूर्णिया मेडिकल हब के रुप में उभरत आ मुजफ्फरपुर निर्णाण आ मोटर उद्योग के केंद्र के रुप में। भागलपुर फेर सं सिल्क आ हस्तकला के क्षेत्र में ख्याति अर्जित करत आ मधुबनी में कला पर आधारित पैघ-पैघ अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार होयत। कखनो क हम सोचैत छी जे अगर कोसी के बाढ़ि पर काबू भय जयतैक त केहेन बढ़िया सोलो भरि कोसी में स्टीमर चलैल जा सकैत छलैक-एकटा एहने स्टीमर में हम अपन सबस प्रिय मित्र के संगे कलकत्ता तक के यात्रा करितहुं। भारत-आ नेपाल के बीच ओहने संबंध भ जयतैक जेहेन अमेरिका आ कनाडा के बीच छैक-आ दूनू देश के संसाधन के उपयोग इलाका के विकास में कयल जयतैक।

३.पद्य
३.१. धीरेन्द्र प्रेमर्षि
३.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (आठम खेप)
३.३. कुमार मनोज कश्यप
३.४.ज्योति
३.५. पंकज पराशर
३.६.रूपेश झा "त्योँथ"
३.७.बिनीत ठाकुर

३.१. धीरेन्द्र प्रेमर्षि
धीरेन्द्र प्रेमर्षि
एमकीक जतरा

भाइ रे, एमकीक जतरा निम्मन छै
देखही सालक पहिलही दिनमे, रोटीपर आइ तिम्मन छै

निसफिकरी भऽ खटलि बहुरियो, एमकी चौरी-चाँचरमे
कोनो गिरहतबा हाथ ने देलकै, ओइ लजबिज्जीक आँचरमे

चिल्हका मूहसँ छीनल दूधक, शिवमठमे ने टघार भेलै
बहु-बेटीके इज्जति मीता, देख, ने कतौ उघार भेलै

भोरे नन्हकू इसकुल गेलै, जलखै कऽ बस्ता लेने
कएल काजके बोनि जे पेलकै, धुथरो आइ विन खेखिएने

सबके भेटलै सुपत मजुरी, एमकीके बोनिहारीमे
ककरो सपना उधिएलै नइ, फेन भोँटक पैकारीमे

कोनो मजूरक एमकी भाइ रे, अपटी खेतमे गेलै ने जान
लाश गनाकऽ कोनो हकिमबा, बनलै नइ रौ कतौ महान

दुःख-दलिदरा जते छलै से, टिशनेपर जनु छूटि गेलै
खुशहालीक जेँ टेन ससरलै, चट्ट दऽ निन्ने टूटि गेलै

हमहीँटा छली सपनलोकमे, सबकुछ पुरने ठिम्मन छै
भाइ रे, अखनो कुछ नइ निम्मन छै
हमरासबहक खून-पसेना, ओकरे सँझुका तिम्मन छै

हमरासभक मुस्कीक मोन्हिकेँ एखनोधरि जे अपन धोधिसँ मुनने अछि ओहि धोधिकेँ कुतरैत समतामूलक समाजक निर्माणमे अग्रसर होइत हमसभ सफलता पाबि सकी, जाहिसँ हमरासभक नववर्षक यात्रा सरिपहुँ आह्लादकारी भऽ सकए।
३.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (आठम खेप)
गगेसश गुंजन
. श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"क पहिल खेप।-सम्पादक।
गुंजन जी लिखित रचना सभ डाउनलोड करबाक लेल नीचाँक लिंककेँ क्लिक करू -
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गुंजनजीक राधा
विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल।
अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक ।
आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल-
जगमगाएल अछि। सुस्वागतम!
लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी।

राधा (आठम खेप)
सत्य तँ होइत अछि सत्ये
मन नहि माननि कोनो भावेँ कोनो तर्के,
बेचारी राधिकाक,
विकल प्राणे सोर कयलनि, त्यागि क सब टा लज्जा आ मर्यादा
-कतऽ छी कृष्ण!
कियेक ई कऽ रहल छी, एना माया?
पुछैत छी यदि कुशल तँ सुनबो करब,
भनहि एक्के क्षण बस।
एना कियेक सिनेहकेँ खौला रहल छी
लोहियामे (कड़ाही केर) दूध सन, विशाल कालक चूल्हिपर
आब कतेक औंटब आर!
कतेक बनायब गाढ़?
रस आ वस्तु दुनू अपना अपना कऽ रहैछ संगे मुदा स्वाधीन,
तखनहि दुनूक मर्यादा आ दुनूक स्वाद
नहि तँ जे कनिक अव्वल हो से बर्बाद, अस्तित्व ध्वस्त
ई नहि स्नेह केर निस्पत्ति,

राधाक मनोदशा किछु तेहन जे कहल नहि जा सकय। एतेक युगसँ एतेक युगसँ आइ धरि मनुख जीवनक यात्रा सृष्टि-सृजनक महागाथा आ अनादि-अनन्त जीवनक अनुभव सब टा तँ मनुक्खकेँ परिचित छैक, जीवनक सर्वश्रेष्ठ आनन्द, जीवनक सर्वोच्च शोक। सब अनुभव नितान्त परिचित! प्रेम, घृणा, विश्वास, विश्वासघात, हिंसक व्यवहार! सब तँ परिचित अनुभव आ सभक अभिव्यक्ति परम्परे आ प्रथा जकाँ चिरन्तन् ! किछु टा अपरिचित आ प्रथम नहि।

मुदा तथापि राधाक ई मनोदशा कियेक बुझा रहल अबूझ, पहिल बेर- बिल्कुल प्रथमे बेर जेकाँ ने व्याख्या संभव आ ने कोनो परिभाषा, ई केहन मनः स्थितिमे कोना पड़लि राधा :
हारि पछताइत उत्कट व्यग्र भेलीह-
चतुर्दिक् अन्हारकेँ छानल जे कतहु होथि कृष्ण,
नुकायल, दिक् करबा लेल।
कतहु नहि, कोनो नहि लक्षण, आभास!
हारि पछता, अहुँरिया काटि बदललनि करौट
अखियासऽ लगलीह ओ, स्वर:
“-आब केहन मन अछि राधे अहाँक?’ :
तं कृष्ण अहाँ
-आब केहन मन अछि राधे अहाँक’? स्त्री स्वरमे इयेह प्रश्न&प्रतिध्वनि !
तँ की राधा केलनि ई आत्म संबोधन।
हृदयमे कृष्णक आत्मस्थापन,
छल की राधाक ई आत्मसंबोधन !
बड़ अशान्त बड़ व्याकुल,
केहन दन मन..

(अगिला अंकमे जारी)
३.३. कुमार मनोज कश्यप
कुमार मनोज कश्यप
नहिं सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि

अमर देश केर अमर पुत्र आहाँ, भारत माता केर संतान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

भगवान राम केर धनुष चढ़ा लिय, गुंजय तीनू लोक टंकार ।
साम-गान सँ जग अनुनादित, गुंजय वाणीक वीणा झंकार ।
भगवान कृष्ण केर चव्रᆬ सुदर्शन, आसुर लीला केर संहार ।
शोणित-रत्तᆬ सँ आई करक आछ, भारत माता केर श्रृंगार ।

असंख्य अमर बलिदानीक शोणित, के आछ करक सम्मान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

शपथ आहाँ के आई मातृभूमि के , शपथ आछ भगवान के ।
नहि बिसरब निज गौरव-महिमा, नहि बिसरब बलिदान के।
राजनीति केर बात ने कथमपि , बात आछ केवल शैतान के ।
मात ृ- भूमि हित रक्षा मे तऽ , दंश नहि कोनो टा वाण के ।

दुश्मन देशक हँसि रहल आछ, करू मर्दन ओकर आई गुमान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

आगाँ मे जौं शास्त्र रहल , तऽ पाछाँ शस्त्र रहल सदि काल ।
शरणागत के शरण देल , तऽ भू-लुंठित कयल आरक भाल ।
रत्तᆬ-बीज के उन्मूलन मे, उष्मित शोणित सदिखन लाल ।
फन थवुᆬचई मे तारतम्य ने, जौं मित्रहु बनय काल - व्याल ।

विश्व-शांति उद्घोषक के, नहि मानय दुनियाँ कायर-निदान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

हल्दी-घाटीक रण - प््राांगण मे, एखनो गुंजित राणाक हुंकार ।
वीर शिवाजी सिखा रहल छथि, दुर्दम्य रण - कौशल संस्कार ।
वीर मराठा , राजपूत केर उष्मित रत्तᆬक अखनो प््राबल संचार ।
वीर जवानक कर्मभूमि ई, भारत आछ सरिपहुँ वीरक संसार ।

जीवि कऽ मरय लोक अनुखन, मरिकय जीवय लोक महान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

गोपनीय अणु-अस्त्र उठा कय, देखा दिय अपन शत्तिᆬ अपार ।
दुश्मन देशक सिहरि उठय, देखि रूप आहाँ केर प््रालयंकार ।
कैल जौं घुसपैठ दुश्मन तऽ , कय देब ओकर हम पूर्ण संहार ।
दोस्त सँ दोस्ती यद्यपि आछ , दुश्मन सँ बढ़ि कऽ प््राहार ।

रण-भूमि मे रण-चंडी आछ तैयार करक हेतु रण-आभयान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

बाजि गेल रण - डंक आब , तारतम्य के गुंजाईश कहाँ आछ ।
राजनीति के क्षुद्र-घाट पर पानि पियब ने आहाँक काज आछ ।
युवा-वीर बढि चलू समर मे, लाज देश केर आहंक हाथ आछ ।
द्रौपदीक चीर ने पेᆬर हरण हो, गांडीव-गदा आहंक हाथ आछ ।

उर्जित हो सम्पूर्ण देश , तानि दिय आई नव-निर्माण वितान ।
मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥

३.४.ज्योति
एक भीजल बगरा -ज्योति झा चौधरी
एक भीजल बगरा
बरसातक समयमे
सकपकायल बैसल
आँगनक छहरदिवारी पर
आँखि छोट पैघ होएत
पंख सऽ पानि झरैत
कतेक असहाय आ निरीह
कोना ओकरा विश्वास दियाबी
मानै लेल तैयार नहिं
मनुषो होएत अछि दयावान
जखन ओहि दिस गेलहुं
पड़ायल आर दूर
फेर एक तौनी के दू टा
तार पर पसारिकय एलहुं
कनि देरमे आयल ओहि बीच
तौनीक छाह मे शरणलऽ
पंख सऽ पानि झाड़ै लागल
संगे पंखो खसै छल
फेर एकटा सरबामे
कनी धान राखि एलहुं
भीजल धान चुगऽ लागल
पानि थम्हिते भागल
मुदा रोज हाजिरी दैत अछि
अपन सरबामे तकैत अछि
अन्नक दानाक आस लऽ
हमहुं खुश छी ओकरा परिकाकऽ
एक संगीक पाबि कऽ
जकर बोलीक मतलब
मस्तिष्कमे नहिं वरन्
हृदयमे बुझायत अछि

३.५. पंकज पराशर
पंकज पराशर,

डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।

राग सामन्ती पचगछिया
(मांगैन गवैयाकेँ समर्पित)
रामचतुर मल्लिक आ अभय नारायण मल्लिक जी हमरा क्षमा करू
मोन नहि पड़बाक लेल
आ हौ मांगैन तोरासँ की क्षमा
तों तँ अल्हैया-बिलावल बनल छह हमरा मोनमे

मालकोश गबैत एकाकार भेल वाद्य यंत्रक ध्वनिमे
हमरा लेल तँ गबिते रहअ आ किनसाइत अपना लेल सेहो

मारबा केर मारक आलापसँ विह्वलित तोहर मुखाकृति
आइ मोन पड़ैत अछि पंडित जसराजकेँ सुनैत
तोहर स्वर-संपन्न कंठक भीमपलाशी
आ कोशीक कछेरमे साकार होइत रेगिस्तानक नादसंपन्न टप्पा

राजधानीक कमानी सभागारमे इत्रगंधित श्रोता सबहक नजरिसँ
जखन देखैत छी स्वयंकेँ अवांछित तँ बेर-बेर मोन पड़ैत अछि
मिथिलाक गंधसँ परिपूरित ठुमरी एहिहामक गंधहीन ठुमरीक बाद
राग मारबा केर अमारक आलाप अकूत धनक तालमे निबद्ध

निकट दर्शनक अभ्यस्त हमरा कहियो नहि सोहायल दूर-दर्शन
आ एहि अस्सी वर्खक वयसमे सिनेमा-तिनेमा आब की...
तोरा बूझल छह हमर सबटा रुचि आ व्यवहार

धिया-पूताक लेल आउटडेटेड हम पचगछिया ड्योढ़ी छोड़ि
एतय स्टोर रूममे रखैत छी अशक्त शरीर विष्णण दुर्दशा
आ तोरो मादे सोचैत छी एहि विशाल सभागारमे

क्यो चीन्हि सकतह पाँच सय टाकाक टिकट लऽ कए बैसल
विश्वमोहन भट्ट आ शुभा मुद्गलक श्रोता?

तों जखन शुरुह करैत रहह राग जैजैवन्ती पंचम केर असीमित सीमांत धरि
तँ महाराज दड़िभंगोक ठोरपर आबि जाइत छल आनन्दक मुस्की
आ एतय तँ हौ मांगैन जखन-जखन दलमलित होइए पोकरण
आ मुस्कियाइत छथिन बुद्ध
तँ मियाँ तानसेन सेहो लाजेँ काठ भ जाइत हेताह
सदल-बल दिल्लेश्वरक एहि सभागारमे जखन गबैत छथिन
पंचममे अपस्याँत एहि बुढ़ारियोमे भीमसेन जोशी

भैरवीक एहि समयमे जखन हम जागि गेल छी
तँ अपनहि घरसँ अबैत अछि निर्लज्ज फुसफुसाहटि
हौ मांगैन! कहिया आओत यमराजक बजाहटि?

आब तँ पचगछिया पॉपगछिया बनि गेल
भग्नावशेष टा बाँचल अछि हमरा बाहर आ भीतर
राग दीपकसँ प्रदीप्त हमर आत्मामे आत्मस्थ अछि ओ समय
जे नहि घुरत आब कहियो कालक प्रवाहसँ पाछू

जकर पोताकेँ ठुमरीक नामसँ घुमरी लगैत होइ
आ दादरा केर अर्थ लगबैत होइ मुम्बई शहर केर दादर
तकरा सबहक लेल ध्रुवपद केर कथे कोन हौ मांगैन
जकर आलाप अक्षांशसँ देशान्तर धरि चलैत छल

जाहि भूगोलमे जनम अवधि हम रूप निहारल
आ उत्कीर्णित भेल आत्म-पटलपर बिदापत नाच केर छवि
संग्रहीत भेल कर्ण-कुहरमे तोहर स्वरमे राग मारू विहाग
आ खचित अछि मोनमे स्वरविद्ध आसावरी

दीर्घ अनिद्रासँ पीड़ित आब भरि राति हम बौआइत छी
तोहर स्वर-संस्मरणक सांगीतिक बाट भसियाइत
आइयो व्याकुल कयनेँ अछि तोहर स्वरमे
राग यमन केर आकुल आलाप!

३.६.रूपेश झा "त्योँथ"
मैथिल के? -

-रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

मिथिलाक अति पावन महि पर
जकर भेल थिक जन्म
वा जे करैछ एहि भूमि पर
अपन जीवनक कर्म
जे कए रहलैछ प्रवास
मुदा पुरुषा सभ करैत छलनि
मिथिले मे वास
चाहे ओ
कोनो धर्मक कियए ने हो
धर्मक अन्तर्गत कोनो जातिक
कियए ने हो
एहि सोच पर अबैछ घृण
जे मैथिल अछि मात्र ब्राह्मण
मैथिल छलथि राजा जनक
हुनक सुता छलीहए सीते
जाहि पर गर्व करैछ सगरे मिथिला
ने वैह छलाह ब्राह्मण, ने हुनकर धिये
कि ओ मैथिल नहि?
ई जुनि कहि
अछि मिथिला कतेको विभूति जनने
सदति रहू सीना तनने
पुरा काल सँ ई माटि
उपजबैत अछि बड़-बड़ विद्वान
सुनू खोलि कऽ दुनू कान
बसै छथि कलकत्ता, काठमांडू
वा न्यूयार्क ओ दिल्ली
ओ छथि सुच्च मैथिल जिनक
ठोर पर खेलि रहल छथि मैथिली
सभ मैथिल मिलि निज मिथिला केँ
दियाबू एकर मान-सम्मान
जे उभरय विश्व मानचित्र पर
बनि एकटा विशिष्ट चान
बुझलहुँ ने, जे कहलहुँ से
आब नहि पूछू, मैथिल के?

३.७.बिनीत ठाकुर

गीत

ब्‍स्तिबमे छायल सन्नािटा चौँह दिश उजार लागे
साँझे जँ हम घरसँ निकली असगर डर लागे

च्‍ौँह दिश देख हरियाली निक लगैत छल गाम
घर घरमें शुखक अनुभुति छल ई पावन धाम
के बहुरुपिया शुख सभ छिनलक सुन्नँ बजार लागे

घानक रुनझुन बालासँ निकलैत छल संगीत
ऋो संगीतमें झुईम क मैना गबैत छल प्रेमक गीत
आई ओ मैना हिचुकिक बाजे जिनगी जहर लागे

सुरुजक नव लालीसंग उदीत अछि अपन पृत
अखन भले करियाएल सुरुज हायत सत्यअके जीत
फसल सामय काल चक्रमे ताँय बसन्तप पतझर लागे


४. बालानां कृते-ज्योति झा चौधरी
बालानां कृते
ज्योति झा चौधरी

देवीजी ः गणतंत्र दिवस समाराेह
देशके साठम गणतंत्र दिवस समाराेह पर विद्यालयमे बहुत हलचल छल।बहुत तरहक कार्यक्रमक तैयारी कैल गेल छल।नववर्षमे विद्यालयक खुजिते सब अहि तैयारीमे भीड़ल छल।जिलाक प््राकशासनिक विभागक उच्चाधिकारी के मुख्यज अतिथिक रूपमे आमंत्रित कैल गेल छल।हुनके हाथे तिरंगा फहरायल गेल।एन सी सी़ स्काउट आ गाइडक विद्यार्थी पैरेड करैत तिरंगाके सलामी देलक। अहिमे बैण्ड ग्रुपक बच्चा सब सेहाे साथ देने छल।राष्ट्रगाण सहित अनेकाे देशभक्तिैक गीत गायल गेल।

अहिसबमे भारतक स्वतंत्रता संग्रामक कथा बेर र् बेर दाेहरायल गेल। आ बतायल गेल जे भारत भने 15 अगस्त 1947 कऽ स्वतंत्र भेल छल मुदा वास्तवमे स्वावलम्बी 26 जनवरी 1950 क भेल रहै जहिया सऽ अकर अपन कानून व्यवस्था प््रा ारंभ भेलै। देशके प््रावथम राष्ट्रपति स्वर्गीय डाॅक्टकर राजेन्द्र प््रा साद अहि दिन अपन पद सम्हारने छला।पंचवर्षीय याेजना तथा अन्य विकासक कार्यक प््राबारंभ सेहाे अहि दिन भेल छल। भारतके प््रा थम पंचवर्षीय याेजनामे कृषि के विकास पर ध्यान देल गेल छल।
26 जनवरी 2009 कऽ गणतंत्र भारत अपन 59 साल पूरा केलक।दिल्लीमे स्वतंत्रता दिवस कऽ प््रााधानमंत्री द्वारा तथा गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रध्वज फहरायल जाएत अछि।राष्ट्रपतिके देशक तीनू प््रादकारक सेना र् जल़ थल आर नभ के मुखिया मानल गेल अछि। सुप््रा िम काेर्ट तक के फैसला के बदलै के अधिकार राष्ट्रपति के भेटल छैन।अहि दिन राजपथ पर सब सेनाक प््रा तिनिधि द्वारा पैरेड तथा सैनिक उपकरणके प््राेदर्शनी हाेएत अछि।वायुसेना द्वारा आकाशमे करतब सेहाे देखायल जायत छै।अहि सबहक अतिरिक्त विविध प््रााकारक सांस्कृतिक झाॅंकि प््रा त्येेक राज्य सऽ हाेएत छै।
तहिना प््राित्ये्क राज्यक राजधानीमे स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यनमंत्री एवम् गणतंत्र दिवस कऽ राज्यपाल तिरंगा फहराबैत छैथ। अहि परम्पराक पालन करैत मुख्यज अतिथि सहित प््रारधानाचार्य झण्डा फहराबक कार्य केला।बच्चा सबमे मिठाइर् बाॅंटल गेल आ गणतंत्र दिवसक कार्यक्रमक समाप्ति् भेल।
मध्य प्रदेश यात्रा
दाेसर दिन ः
24 दिसम्बर 1991़ सोमदिन:
दूर - दूर तक पसरल हरियर मखमल सन खेत-पथार के पार करैत़ कतेकाे स्टेशन के फानैत हमर सबहक ट्रेन भाेरे 8ः15 मे विलासपुर पहॅुचल।आेतय स्टेशनके नजदीकक भाेजनालयमे भाेजन केलाक बाद हम सब आॅटाे रिक्शा8सऽ हाेटल चन्द्रिका पहुंचलहुं।आेतय हमरा सबके सुसज्जित डबल बेडरूम भेटल।एक रूममे हम सब साकची गर्ल्स स्कूलक 5 टा छात्रा छलहुं।प्रत्येकक काेठलीमे एक टा डबल बेड़ साेर्फासेट़ वारड्राेब्सह्यआलमीराहहृ़ अटैच्ड बाथरूम़ ग्लास़ पानि सऽ भरल जग इत्याठदि छल।हमसब तैयार भऽ गेलहुं आ कनिके दूर पर स्थित ‘संताेष भाेजनालय’ मे शाकाहारी भाेजन केलहु।अपन पूर्व कार्यक्रमानुसार हमरा सबके अमरकण्टक जायके छल लेकिन थकान के कारण हमसब अपन कार्यक्रम काल्हि लेल स्थगित कऽ देलहुं। विलासपुर मे बस सड़क पर आ बजार कनी मनि घुमलहुं सेहाे भाेजनालय जाय काल़ आर किछु विशेष भ्रमण नहिं भेल अतऽ।
हमसब भाेजनाेपरान्त सामूहिक कार्यक्रम केलहुं।दहेज पर विशेष रूपसऽ विचारविमर्श भेल।सब शिक्षक सबसऽ चिन्हारक सेहाे बेसी बढ़ियासऽ भेल।बातेबातमे जानकारी भेटल जे मध्यप््रा्देशमे शाकाहारी भाेजन बहुत सुलभता सऽ उपलब्ध छै। जखन हमसब पश्चिम बंगाल गेल रही तऽ माछके बड अधिकता छल। हमर सबहक माेन उकता गेल छल। शाकाहारी भाेजनमे सेहाे माछक गंध आबैत रहैत छल।अतऽ से सब नहिं हैत तकर आश्वासन भेटल। अकर अलावे अतक आॅटाे रिक्शा सेहाे बहुत अलग छल जाहि लऽ कऽ हम सब बहुत देर तक हॅंसैत रहलहुॅं।काल्हिक कार्यक्रमक जानकारी देलाक बाद आहिके सभा समाप्तह भेल। काल्हि हमरा सबके अमरकण्टक जायके छल।

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विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-part-4

विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-part-4

छवि झा/ कुमुद सिंह
लेखिका छवि झा पिछला तीस वर्ष स मिथिला चित्रकला कए अर्थ पर काज कए रहल छथि। संप्रति ओ 'स्नेह छवि मिथिला स्कूल ऑफ आर्टÓ, दरभंगा क निदेशक छथि आ एकरा परिभाषित करबा मे लागल छथि।
लेखिका कुमुद सिंह मैथिलीक पहिल इ-पेपर समादक संपादक छथि।

मिथिला चित्रकला : अर्थक अधिकता आ सार्थकता

1960 क दशक मे मिथिला चित्रकला कए दीवार स कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भ गेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक।



सब कलाकृतिक एकटा अर्थ होइत छैक। जेकर कलाकृति स घनिष्टï संबंध होइत अछि। कलाकृति आ ओकर अर्थ ओ कृतिक सार्थकता कए सिद्घ करैत अछि। मिथिला चित्रकलाक संबंध मे जखन विचार करैत छी त कर्ठटा गप सामने अबैत अछि, मुदा एकटा गप स्पस्ट होइत अछि जे मिथिला आ भारतक विद्घान एहि कलाक प्रति आइ धरि अपन नजरिया नहि बना सकलथि अछि। पिछला पांच दशक मे विदेशी विद्वान जे एहि कलाक प्रति नजरिया स्थापित केलथि अछि, देशक विद्वान ओकरे आधार मानि कए आगू बढैत रहलथि अछि। च पूछु त देशी विद्वान कहियो अपन नजरिया प्रस्तुत करबाक प्रयास तक नहि केलथि। मिथिला चित्रकलाक एहि गुप्त आ जटिल वास्तविकता कए धुंध स निकालबाक पहिल प्रयास सेहो अमरीका मे कैल गेल। 1984 मे अमरीका स प्रकाशित मानव शास्त्र पर आधारित पत्रिका मे पहिल बेर एहि गप कए रोचक आ गंभीरतापूर्वक उठाउल गेल जे अर्थक अधिकता स केना एहि कलाक सार्थकता खत्म भ रहल अछि।
उत्तर बिहार आ नेपालक तराई मे पसरल मिथिला क महिला द्वारा अपन घरक दीवार आ आंगना मे बनाउल जाइवाला एहि चित्रक संबंध मे एखन धरि कई बेर लिखन जा चुकल अछि आ कई ठाम कहल जा चुकल अछि। एतबे नहि कई टा अंतरराष्टï्र्रीय मंच पर एकर प्रस्तुति सेहो भ चुकल अछि। मुदा एकर संबंध मे लिखल साक्ष्य बेसी पुरान नहि अछि। 1949 मे पहिल बेर एहि पुरातन कलाक संबंध मे कागज पर किछु लिखल गेल। डब्ल्यू जी आरचर अपन किताब मे एहि चित्रकला कए अद्भुत आ आश्र्चयजनक कहने छथि। मुदा 1962 मे प्रकाशित लक्ष्मीनााि झाक पुस्तक मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला सही मायने मे एहि चित्रकला पर पहिल आधिकारिक दस्तावेज अछि। देसी नजरियाक संग-संग एकर भाषा मे सेहो हिंदी आ मैथिलीक मिश्रण अछि, जाहि स अर्थक भाव अंगरेजी स बेसी साफ बुझबा मे अबैत अछि। देशी नजरियावाला एहन पुस्तक कए पाठक तक नहि पहुंचब एहि कलाक अर्थक अधिकताक मूल कारण कहल जा सकैत अछि।
मिथिला चित्रकलाक अर्थक संबंध मे समय-समय पुस्तक क प्रकाशन होइत रहल अछि। 1952 मे ब्राउन आ लेन्यूइस, 1966 मे माथुर, 1977 मे इब्स विको (वैक्यूवाद) आ 1990 मे जयकर एहि कलाक अर्थक संबंध मे बहुत किछु लिखलथि। अविश्वसनीय मुदा सत्य अछि जे एहि किताब सब मे जे किछु लिखल गेल अछि ओ मिथिला मे प्रचलित अर्थक स सर्वथा भिन्न अछि। एहि संबंध मे अमरीकाक चीको विश्वविद्यालयक कैरोलिन ब्राउन लिखैत छथि जे मिथिला चित्रकलाक अर्थ कए हरदम गलत आ भ्रमक तरीका स विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। एकर मुख्य कारण इ रहल जे एहि पर देशी खास कए मिथिलाक विद्वान गंभीर काज नहि केलथि, जे काज भेल ओ विदेशी विद्वानक शोध स भेल। मिथिलाक अंगना मे बनाउल गेल एहि चित्रक संबंध मे पुख्ता जानकारी लेब कोनो विदेशी लेल हरदम एकटा चुनौती रहल अछि। लोककला कए बुझलाक बाद ओकर सही अर्थ बुझब आ फेर ओकरा सही रूप मे परिभाषित करि अभिव्यक्त करब कोनो विदेशी शोधकर्ता लेल राई क पहाड़ सन काज अछि। 1986 मे एसैड, वैल, मारकस आ फिसर, 1988 मे क्लिवाड आ 1992 मे वूल्फ क आलेख स बुझबा मे अबैत अछि जे ओ किछु एहने सच्चाई स सामना केने हेताह। कैरोलिन ब्राउन एहि संबंध मे साफ तौर पर लिखैत छथि- हम पश्चिम कए लोक एहि चित्रकला कए परिभाषित नहि करि सकैत छी, ताहि कारण हम सब एहि अद्भुत विषय कए तोडि़-मरोड़ी कए पेश करैत रहलहुं अछि। हालांकि एहि मे कोनो संदेह नहि अछि जे एकटा समाज मे भिन्न-भिन्न लोकक अगल-अलग नजरिया भ सकैत अछि, ओ एकटा चित्रक भिन्न-भिन्न अर्थ कहि सकैत छथि, मुदा विभिन्न अर्थक बीच मे एकटा समानता होइत अछि, जे अर्थ कए कतहु ने कतहु जोड़ैत अछि। उदहारण लेल मिथिला मे पुरुख कर्मकांड, न्यायशास्त्र सन शास्त्रीय विधा मे नीक पकड़ रहैत छथि आ ओहि स जुड़ल पावैन-तिहार क व्याख्या नीक जेका करि लैत छथि, ओतहि मौगी घरेलू पावैन-तिहार पर नीक पकड़ी रखैत छथि आ ओकर अपन अनुसारे व्याख्या सेहो करैत छथि। एहि लेल कुलदेवीक पूजा या गौरी पूजा मे पुरुखक योगदान कम देखबा मे अबैत अछि।
एकर पाछु कारण इ अछि जे अत्यंत गूढ़ संसार आ अत्यधिक विकसित समाजक सबटा गपक ज्ञान राखब असंभव अछि। ओना मिथिला समाज कए अत्यंत विकसित समाज बहुत कम विद्वान मानने छथि। जेना कि 1991 मे दरिदा आ 1994 मे वाल साफ तौर पर लिखने छथि जे एहि चित्रकलाक सही अर्थ मिथिला मे आब गिनल-चुनल लोक बता सकैत अछि। वेल क कहब अछि जे मिथिला मे जे चित्रक अर्थ कहि सकैत छथि ओ चुप रहय चाहैत छथि, जखन कि अर्थ नहि जननिहार लोक कए चुप राखब एकटा कठिन काज अछि। ओना एहि संबंध मे ब्राउनक मत किछु अलग अछि। ब्राउन कहैत छथि, 'इ सच अछि जे आम मैथिल एहि कलाक संबंध में कम जानकारी रखैत छथि, मुदा बहुत विद्वान लेल इ कोनो महत्व नहि रखैत अछि जे मैथिल एहि संबंध में कतेक बुझैत अछि आ की कहैत अछि। अधिकतर विद्वान मैथिलक भावना कए अपन शोध मे तोडि़-मरोडि़ कए प्रस्तुत करबा स पाछु नहि हटला अछि। दुर्भाग्य अछि जे एखन तक कोनो देशी विद्वान एहि तथ्य कए रेखांकित नहि केलाह अछि, मुदा ब्राउन अपन मिथिला प्रवासक दौरान किछु एहने महसूस केलीह।
असल मे सबस पैघ गप इ अछि जे पाश्चात्य संस्कृति, व्यवहार आ शिक्षा हमरा लोकनि क सोच कए दबा देलक अछि या इ कहू जे सीमित करि देलक अछि। एकर अलावा हमरा लोकनि मे अनुवाद करबाक क्षमता सेहो कम भ चुकल अछि। आब सवाल उठैत अछि जे एतेक जटिल आ गुप्त तथ्यक कोनो एक व्यक्ति द्वारा कैल अनुवाद कए सर्वोच्च मानल जा सकैत अछि? एहि ठाम इ कहब जरूरी अछि जे एकटा चित्रक कई टा अर्थ भ सकैत अछि, मुदा ओकर सूत्र दूटा नहि भ सकैत अछि। वैह एकटा सूत्र ओकरा आन स भिन्न करैत अछि। एहि सूत्रक चारुआत ओकर अर्थ घुमैत रहैत छैक। एहन सूत्र मिथिला मे एखनो किछु महिला कए बुझल छैन, मुदा ओ निश्चित रूप स व्यावसायिक नहि छथि। ताहि लेल हुनका स ओ सूत्र बुझब कोनो देशी विद्वान लेल कठिन काज अछि, एहन मे विदेशी विद्वानक गप करब बेकार अछि। दरअसल मिथिलाक मौगी एहि सूत्र कए अपन शरीरआ आत्मा मे बसा रखने छथि आ नव पीड़ी कए थोड़े-थोड़े करि कए बुझाउल जाइत रहल अछि। एहन मे अल्प ज्ञानी स जानकारी लेलाक बाद विदेशी विद्वान मिथिलाक सूत्र जनिनिहार महिला कए नजरअंदाज करि दैत छथि।
मिथिला चित्रकला क सबस प्रचलित चित्र कोहबरक पुरैन कए ल कए सबस बेसी भ्रमक स्थिति अछि। अधिकतर विद्वान एकरा कोहबर नाम स परिभाषित केलन्हि अछि, जखन कि पुरैन कोहबरक अनेक चित्रगुच्छक एकटा सदस्य मात्र अछि। आइ जे पुरैनक स्वरूप देखबा मे आबि रहल अछि, ओ जानकार महिला मे भ्रम पैदा करि रहल अछि। हालांकि एतबा अवश्य अछि जे एकटा गोलाकार आकृतिक चारुआत छह टा मौगिक मुंह बनाउल गेल अछि, जेकर बीच मे सातम मुंह सेहो अछि जे छह टा मुंह स कनि पैघ आकारक अछि। एहि चित्र कए रेखाचित्रक रूप मे बनाउल गेल अछि। पुरैनक सूत्र पर बनाउल गेल एहि रेखाचित्र स भ्रण हेबाक कईटा कारण अछि। मिथिला मे पुरैन रेखाचित्र नहि, बल्कि भित्तिचित्र अछि आ पांचटा रंग स बनाउल जाइत अछि। हालांकि आइ अधिकतर कागज पर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, लेकिन एहि चित्रक विशेष मे साफ तौर पर कहल गेल अछि जे एकरा दीवार पर बनाउल जाइत अछि। मिथिला मे रेखाचित्र कए अरिपन कहल जाइत छैक आ ओ जमीन पर बनाउल जाइत अछि। ओनाओ मिथिला मे पुरैनक दू टा सूत्र अछि। एकटा ब्राह्मïण आ दोसर कर्णकायस्त लोकनिक पुरैन। दूनू मे सूत्रक अंतर अछि। मुदा एहि चित्र मे एकर प्रारूपक कोनो चर्च नहि अछि। सातटा मौगिक मुंहक संग सांप, कछुआ, माछ आदिक चित्रक औचित्य जखन मिथिलाक लोक लेल बुझब कठिन अछि तखन विदेशी की बुझत? विदेशी विद्वान लेल इ मात्र एकटा भीड़वाला चित्र अछि, जाहि मे संदेशक कोनो स्थान नहि अछि। बहुत रास विदेशी विद्वान त एकरा जादू-टोना आ भूत-प्रेत लेल बनाउल गेल चित्र कहलथि अछि। मुदा ब्राउनक कहब अछि जे इ पुरैनक नव रूप अछि आ कायस्त प्रारूप स मिलैत-जुलैत अछि।
मिथिला मे पुरैन कमलक लत्ती कए कहल जाइत अछि। ब्राह्मïण प्रारूप मे नौ आ कायस्थ प्रारूप मे सातटा कमलक पात दर्शाउल जाइत अछि। चूंकि कमलक लत्ती पाइन मे होइत अछि, ताहि लेल एकर संग-संग पाइन मे रहैवाला वस्तु आ जीवक चित्र बनाउल जाइत अछि। लक्ष्मीनाथ झा एहि संबंध मे लिखैत छथि जे पुरैन मुख्य रूप स वंश वृद्घिक लेल नव दंपति स सांकेतिक अनुरोध अछि। जेना कमलक एकटा लत्ती पोखरि कए कहियो कमल विहीन नहि हुए दैत अछि, तहिना नव दंपति कए घर कए कहियो वंश विहीन नहि हुए देबाक कर्तव्य निभेबाक चाही। एतबा त जरूर अछि जे 20वीं शताब्दी मे पश्चिम मे पलल-बढ़ल कोनो व्यक्ति एहि स्त्रीत्व कए(स्त्री कए हृदय मे वास करैयवाला भावना) घेरा नहि बुझि पाउत। आइ जखन बियाह एकटा अलग अर्थ ल चुकल अछि, एहन मे पुरैनक औचित्य जरूर प्रासंगिक भ गेल अछि।
1960 क दशक मे एहि चित्र कए कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक। सच कहल जाए त मिथिलाक महिलाक एहि विलक्षण प्रतिभा कए परिभाषित करबा मे एखन धरि कोनो विद्वान सफलता नहि पाबि सकलथि अछि। समस्त मिथिला मे बनाउल जाइवाला एहि चित्र कए किछु चारि-पांच टा गाम मे समेट देबाक अलावा इ विद्वान लोकनि एहि चित्र कए कएटा अनपढ़-गवांर मौकी द्वारा बनाउल गेल चित्र स बेसी किछु नहि साबित कए सकलथि अछि। मिथिला मे एखनो कई टा महिला अपन फाटल पुरान कॉपी निकालि देखबैत छथि, जाहि मे कईटा विदेशी विद्वानक लिखल वाक्य अछि। दुख आ तामस तखन होइत अछि जखन कॉपी पर लिखल वाक्य पढ़ैत छी, जाहि मे लिखल रहैत छैक जे इ चित्र एकटा पिछड़ल समाजक गवांर, अनपढ़ आ मूर्ख महिला द्वारा बनाउल गेल अछि। विदेशी विद्वान मे इ सोच अचानक नहि आबि गेल अछि। हुनका कई प्रकार स इ बतेबाक बेर-बेर प्रयास भेल अछि। दुनिया मे इ धारण कए स्थापित करबाक श्रेय इब्स विको कए अछि। विको स बेसी शायद कोनो विद्वान एहि चित्रकला पर काज नहि केलथि अछि, मुदा ओ जतेक एहि चित्रक करीब अबैक कोशिश केलाह, एकर अर्थ स ओ ओतेक दूर होइत गेलाह। विको राय औवेन्स क संग एकटा फिल्म सेहो बनौलथि, जेकर नाम 'मुन्नीÓ अछि। ओ एकटा फ्रंच फिल्म सेहो बनउलथि, मुदा चित्रक अर्थ बुझबा आ बुझेबा मे सब बेर असफल भेलथि। विको तखनो हार नहि मानलथि, ओ 1994 मे एकटा विडियो फिल्म 'मिथिला पेंटरस...Ó बनौलथि, मुदा नव किछु नहि कहि पैउलथि। आइ स्थिति एहन भ चुकल अछि जे समाजक सब लोक इ बुझबा मे लागल अछि जे आखिर इ परंपराक कौन वस्तु बारे मे थिक।
एहि चित्रकलाक संबंध मे सबसे लोकप्रिय स्रोत विकोक 1977 मे छपल किताब' द वीमेंस पेंटर ऑफ मिथिला...Ó अछि। जखन कियो एहि पुस्तकक एक-एक टा चित्र कए गौर स देखैत अछि आ ओकर रूपरेखा कए पढ़ैत अछि त ओकर सामना एकटा आश्र्चजनक, अद्भुत आओर लगभग असंभव सन प्रतीत होइवाला संसार स होइत अछि।
विको लिखैत छथि जे मिथिला समाज मे मुख्यपात्र महिला छथि आ एहि ठाम पुरुषक भरमार अछि। एहि ठाम युवती हमउम्र युवक स विवाह करबा लेल तरह-तरह स प्रयास करैत छथि।(1977, पृष्ठ- 17)।
विको एहि गप कए बाजारू आओर रोचक बनबैत आगू लिखने अछि जे मिथिला मे एकटा युवती अपना लेल सुयोग्य युवक कए चुनैत अछि आ विवाहक प्रस्ताव स्वरूप ओकर सामने कोहबर रखैत अछि ।(1977, पृष्ठ- 17)। ओ लोक जे मिथिला कए नीक जेका नहि चिन्हाल अछि, हुनको इ वाक्य पढ़लाक बाद आश्र्चय हेतेन जे विको केना मिथिला समाज कए अतेक चरित्रहीन बना देलथि। इ अद्भुत मुदा सत्य सन आलेख कए पढ़लाक बाद एहन प्रतीत होइत अछि जे विको कए एहन अनुवादक भेटलन्हि जेकरा मिथिला समाज, संस्कृति आ सभ्यता स कोनो वास्ता नहि रहैन, संगहि हुनका मिथिलाक रिति-रिवाज आ लोकाचार तक कए ज्ञान नहि रहैन। सच पूछु त अनुवादकलेल विको मात्र टका देनिहार विदेशी छलाह। ओना देखल जाए त विको क इ किताब एहि विषय पर लिखल गेल पहिल अथवा आखिरी किताब नहि थिक। इ पुस्तक एहि लेल महत्वपूर्ण भ गेल अछि, किया कि मिथिला चित्रकला पर शोध केनिहार अधिकतर विद्वान एहि पुस्तक स प्रभावित छथि। एतबा धरि कि भारतीय विद्वान उपेंद्र ठाकुर तक अपन किताब मे विको क नजरिया कए नजरअंदाज नहि केलथि अछि। विको क एहि किताब क महत्व पर ब्राउनक कहब अछि जे पश्चिमक विद्वान जखन कोनो विषय पर काज शुरू करैत छथि तखन ओहि विषय पर लिखल गेल पूर्वक किताब स काफी प्रभावित होइत छथि। मिथिला चित्रकलाक संग सेहो किछु एहने भेल। अधिकतर विद्वान विकोक रूप-रेखा स प्रेरणा लेलथि, किछु त हुनकर नकल तक कैलथि। ताहि लेल इ अन्य पुस्तक बेसी महत्वपूर्ण भ जाइत अछि। दोसर इ जे विको बहुत दिन धरि एहि विषय पर काज केलथि अछि आ कई प्रकार स एकरा दुनियाक समक्ष अनलथि अछि, एहन मे विदेशी विद्वान लेल हुनका नजरअंदाज करब कठिन रहल अछि। एहि प्रकारे विको भ्रमक आओर सर्वथा गलत तरीका स अनुवाद करि झूठ कए एकटा सत्य स बेसी सत्य रूप मे स्थापित केलथि अछि।
ओना अधिकतर विदेशी विद्वानक कहब अछि जे मिथिला समाज विश्वक सबस चरित्रवान समाज मे स एक अछि। एकर संस्कृतिक संबंध मे प्राख्यात चिकित्सक डॉ कैमेल क कहब अछि जे आइ 'जीनÓ(अणु)क संबंध मे दुनिया भरि मे शोध भ रहल अछि, जखनकि मिथिला मे पंजी व्यवस्था ओकरे एकटा रूप अछि। मिथिलाक ब्राह्मïण आ कर्णकायस्थ लग एखनो बीस-बीस पीढिक़ जानकारी उपलब्ध अछि।
विको कए शायद इ नहि बताउल गेल कि मिथिला मे युवतिक विवाह पंजीकारक राय स तय कैल जाइत अछि। युवतिक इच्छा एहि ठाम कोनो मायने नहि रखैत अछि। एहि तथ्य कए ब्राउन बहुत साफ तौर पर रखने छथि। ब्राउन कहैत छथि जे ओ मिथिला प्रवासक दौरान पंजीक विधिवत शिक्षा ल चुकल छथि। ओ एहि गप कए सेहो साफ करबाक प्रयास केलथि अछि जे मिथिला मे कहियो युवति कए पति चुनबाक अधिकार नहि रहल अछि। सीताक संबंध मे सेहो ब्राउनक मत स्पष्टï अछि। ओ कहैत छथि जे सीताक स्वयंवर नहि छल ओ एकटा सशर्त विवाह छल। इ सच अछि जे ओहि विवाह मे पंजीक कोनो व्यवस्था नहि छल, मुदा धणुष रामक बदला मे रावण उठा लैत त कि सीताक इच्छा रहितो राम स विवाह संभव छल? सीताक इच्छा हुनक विवाह मे कोनो मायने नहि रखैत छल। ब्राउल इ तर्क देलाक बाद आखिरी फैसला मिथिलाक लोक पर छोड़ैत कहैत छथि जे मेरे एहि मत स शायद मिथिलाक लोक सहमत नहि हेताह।
वैकसेनेलक शब्द मे कहल जा सकैत अछि जे मिथिला चित्रकला एकटा आंखिक भांति अछि जे समयक संग-संग अपना कए बदलैत रहल अछि, मुदा अपन मूल सिद्घांत स कखनो समझौता नहि केलक अछि। इ कला जगतक एकटा अद्भुत औजार अछि जेकरा स कलाकार अपन समाजक संग-संग पूरा विश्वक गुढ़ गप आ रिति-रिवाज कए चित्रक माध्यम स प्रस्तुत करैत आइल अछि। (1972,पृष्ठ-38) जे किछु हुए एतबा त अवश्य भेल अछि जे मिथिलाक संस्कृति कए दुनियाक सामने सर्वथा गलत तरीका स परिभाषित केल गेल अछि। आइ मिथिला चित्रकला अधिकतर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, जेकर एतुका संस्कृति स कोनो लेनादेना नहि अछि। आवश्यकता अछि एहि चित्र क गंभीरता स शोध करबाक आ एकर अर्थक अधिकता कए समाप्त करबाक, नहि त इ चित्र हरदम लेल हमरा लोकनिक अज्ञानताक द्योतक बनल रहत।
शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफक जन्म आन्ध्र प्रदेशक कडापा जिलामे भेल छल।
जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन।
तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद
गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)।

जुम्मा

हमर अम्मीक निर्दोष मुखमंदल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमर विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहए-ए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि।
हम काजमे व्यस्त छलहुँ जखन फोन बाजल। फोन उठेलहुँ तँ दोसर दिस अम्मी छलीह..हुनकर फोन ओहि समय नीक आ सहज लागल।
एहिसँ पहिने कि हम “अम्मी..” कहितहुँ ओ चिन्तित स्वरेँ “हमर बाउ...!” कहलन्हि।
“की अहाँकेँ ई बुझल छल...?” हम पुछलियन्हि।
“हँ एखन तुरत्ते हमरा ई पता चलल..अहाँ सतर्क रहब! ...लागै-ए अहाँ आइ मस्जिद नहि गेल रही हमर बाउ।” हम हुनका डरसँ सर्द अवाजमे बजैत सुनलहुँ।
जिनगीमे पहिल बेर हमर मस्जिद नहि जएबासँ ओ प्रसन्न भेल छलीह। ई विचार हमरा दुख पहुँचेलक। की हमर अम्मी ई गप बाजि रहल छलीह? ई ओ छथि जे हमरासँ ई पूछि रहल छथि? ई हमर अम्मी छथि जे एहि तरहेँ डरलि छथि? हमर मस्तिष्क विचरक विस्फोटसँ भरि गेल आ स्मृतिक बाढ़िमे बहए लागल।

हमर अम्मीकेँ जुम्माक नवाज आस्थाक दृष्टिसँ नीक लगैत छलन्हि। ओ कोनो चीजक अवहेलना कऽ सकैत रहथि मुदा जुम्माक दिन नमाजक नहि, से ओ हमरा सभकेँ ओहि दिन घरमे नहि रहए दैत रहथि। अब्बा सेहो हुनकर दामससँ नहि बचि पाबथि जे ओ घरपर रहबाक प्रयास करथि। हुनकर सन डीलडौल बलाकेँ सेहो हाथमे टोपी लए मस्जिद चुपचाप जाए पड़न्हि।
हमरा सभक घरमे काजसँ दूर भागए बला, आलसी बच्चा, शिकारी हम आ हमर अब्बा हरदम मस्जिद नहि जएबा लेल बहन्नाक ताकिमे रहैत छलहुँ। हमर अब्बा भोरेसँ छाती तनैत कहैत रहैत छलाह जे आइ जुम्मा अछि से कोनो हालतिमे मस्जिद जएबाके अछि। मुदा जखने समय लग अबैत रहए हुनकर बहन्ना शुरू- “अरे! अखने कादोमे हम खसि पड़लहुँ...” हमर अम्मी लग कोनो रस्ता नहि बचन्हि। जे से, तखन ओ हमरा सेहो मस्जिद नहि पठा सकैत छलीह...हमरा नहबैत, हमर कपड़ा धोबैत, ओ कोना कऽ सकितथि? तैयो ओ हाथमे छड़ी लेने आँगन आबथि, हमरापर गुम्हरैत, हमर पुष्ट पिटान करैत आ हमरा अँगनामे कपड़ा जकाँ टँगैत। से हम ई चोट खएबासँ नीक बुझैत रही नमाजे पढ़ब। हमर आलसपना मस्जिद पहुँचिते अकाशमे उड़ि जाइत रहए।
एक बेर ओतए पहुँचिते हम दोसर बच्चा सभ संग मिझरा जाइत रही आ सभटा नीक वरदानक लेल प्रार्थना करैत रही- जेना हमर अब्बा लग खूब पाइ होन्हि, हमर अम्मीक स्वास्थ्य नीक भऽ जान्हि, हमर पढ़ाईमे मोन लागए आ की की।
हमर अम्मा बुझाबथि- “हमरा सभकेँ मस्जिद मात्र वरदान प्राप्त करबाक लेल नहि जएबाक चाही, हमर बाउ..हमरा सभकेँ नमाज पढ़बाक चाही...अल्लामे आस्था हेबाक चाही। वैह छथि जे हमर सभ कल्याण देखैत छथि”।
जखन दोसर हुनका हमर उपराग देन्हि जे हम नमाज काल आस्ते-आस्ते गप करैत रहै छी तँ ओ हमरा आस्तेसँ दबाड़ि बाजथि- “हमर बाउ, प्रार्थनाक काल बजबासँ अपनाकेँ रोकू...कमसँ कम मस्तिष्कमे दोसर तरहक विचारकेँ अएबासँ रोकू। बगलमे बम किएक ने फाटय तैयो सर्वदा अपन मस्तिष्ककेँ अल्लापर केन्द्रित राखू...”। हुनका ओहि दिन एहि गपक अन्देशा नहि रहन्हि जे एक दिन ठीकेमे मस्जिदमे बम फाटत। से आश्चर्य नहि जे ओ एतेक आत्मविश्वाससँ बाजि रहल छलीह। आब जखन ठीकेमे बम विस्फोट भेल अछि, हुनका ई अनुभव भऽ रहल छन्हि जे कतेक भावह ई भऽ सकैत अछि।
हम हुनकर वेदनाकेँ नहि देखि पाबि रहल छी। ओ डरायलि छलीह। ओ नमाजसँ डरायल छलीह। ओ अल्लासँ सेहो डरायल छलीह।
“अम्मी...”। हम उद्यत भऽ कहलहुँ।
“हमर बेटा...”। ओ दोसर कातसँ बजलीह। “अहाँ आइ मस्जिद नहि गेलहुँ, नहि ने, हमर बाउ”? ओ फेरसँ कहलीह।
हमर हृदय डूमि रहल रहए। शब्द हमर संग छोड़ि रहल रहए। हमर कंठ सूखि रहल रहए। हम घुटनक अनुभव कएलहुँ। विचार ज्वारि जकाँ हमरा भीतर उठि रहल छल। हमरा लागल जे क्यो हमरा ठेलि कए सोखिं कए भूतमे लऽ जाऽ रहल अछि।

जुम्माक दिन मस्जिदसँ घुरलाक बाद हम सभटा घटनाक आवृत्ति अम्मी लग करैत छलहुँ। हम नमाजक एकटा छोट संस्करण हुनका लगमे करैत छलहुँ। हमरा प्रार्थना पढ़ैत देखि ओ हमरा आलिंगन मे लऽ चुम्मा लैत छलीह, “अल्ला हरदम अहाँक रक्षा करताह, हमर बाउ...”। ओ हमरा आशीर्वाद दैत रहथि। तखन हम निर्णय कएलहुँ जे जहुँ हमरा कोनो ज्ञानप्राण अछि तँ हमरा कोनो नमाज नहि छोड़बाक चाही। सभ जुम्माकेँ ओ नमाजक महत्वपर बाजथि आ मस्जिद जएबापर जोड़ देथि। आन चीजक अतिरिक्त ओ एहि गपक विषयमे बाजथि जे कुरान अही दिन बनाओल गेल रहए, कि मनुक्ख अपन कर्मक लेल अही दिन उत्तर दैत अछि आ जे विश्व जीवन रहित जे कहियो होएत तँ सेहो अही दिन होएत।
हमर माथ, छोट रहितो, ई गप बुझि गेल जे जुम्मा किएक मुसलमान लेल पवित्र अछि।
सभ बच्चा जुम्मा दिन साँझ धरि स्कूलमे रहैत छलाह, मात्र हम दुपहरियाक बादे स्कूल छोड़ि दैत छलहुँ, मस्जिद जएबाक बहन्ने झोरा झुलबैत घर घुरैत छलहुँ। हमर अम्मी शिक्षकसँ परामर्श कए केने छलीह।
दोसर छात्र सभ हमरा एतेक शीघ्र घर जाइत देखि ईर्ष्या करैत छलाह। ओ हमरा भाग्यशाली बुझैत छलाह आ अपनो मुस्लिम होएबाक मनोरथ करैत छलाह।
हुनकर ईर्ष्यालु मुख देखि हम भीतरे-भीतर हँसैत रही। हम खुशी-खुशी घर घुरैत रही जेना हाथीक सवारी कएने होइ।
हमर अम्मी ओहि महत्वपूर्ण उपस्थितिक लेल हमरा तैयार करैत रहथि- गरम पानिसँ नहबैत रहथि, हमर आँखिमे काजर लगबैत रहथि, हमर केशक लटकेँ टोपीक नीचाँ समेटि कए राखथि। हम सभ दिन तँ हाफ पैंटमे रहैत छलहुँ मुदा ओहि दिन उजरा कुरता पैजामामे चमकैत छलहुँ।
दोसर स्त्रीगण हमरा देखि अपन हाथ हमर मुखक चारू दिस जोरसँ घुमाबथि आ कोनो दुष्टात्माकेँ भगाबथि आ कहथि, “जखन जुम्मा अबैत अछि अहाँ जुम्माक सभटा चक लए अबिते ने छी”!!
अहाँ जुम्माक साँझमे ई खुशी सभ घरमे देखि सकैत छी, दरगा केर फ्रेम कएल चित्रक सोझाँमे जड़ैत लैम्प, अगरबतीक सुगन्धी वायुमे हेलैत; अपन माथ झँपने स्त्रीगण घरक भीतर-बाहर होइत; आ नारिकेलक दाम दोकानक खिड़कीपर बढ़ैत। दरगा केर फ्रेम कएल चित्र पर नारिकेल चढ़ेबाक विधक वर्णन एतए अहाँ नहि छोड़ि सकैत छियैक।
किएक तँ हमर अब्बाकेँ अर्पण विधक ज्ञान नहि छलन्हि से ओ हजरतकेँ छओटका रस्तासँ घर अनैत रहथि। हमर अम्मी ई सिखबाक लेल हुनकर पछोर धेने अबैत रहथि।
“अहाँकेँ ई अन्तरो नहि बुझल अछि कलमा..आकि गुसुल...हमरा अहाँसँ निकाह करेबाक लेल अपन अम्मी-अब्बाकेँ दोषी बनाबए पड़त...कियो अहाँसँ नीक हुनका सभकेँ नहि भेटलन्हि, अहाँसँ हमर बियाह करेलथि। आब बच्चो सभ अहींक रस्ता पकड़लथि हँ...” ओ हुनकासँ एहि तरहेँ विवादपर उतरि जाथि।
“अहाँ ..घरक...ई उत्पीड़न हमरा लेल असह्य भऽ गेल अछि..”। पजरैत, ओ मस्जिद जाइत रहथि लाल-पीयर होइत हजरतकेँ घर अनबा लए।
हजरत नारिकेलक अर्पण विध पूरा करबाक बाद अपन मुँह आ पएर धोबि आ अपन दाढ़ीमे ककबा फेरि बाहरमे खाटपर बैसैत रहथि। एहि बीच हमर अम्मी फोड़ल नारिकेलक गुद्दा निकालि ओकर कैक भाग कए ओहिमे चिन्नी मिलाबथि। ओ तखन एहि मिश्रणकेँ बाहर हातामे जमा भेल सभ गोटेमे बाँटथि। ओ अन्तमे हमरा लेल राखल दू-तीन टा टुकड़ी लेने हमरा लग आबथि।
हम शिकाइत करियन्हि, “यैह हमरा लेल बचल अछि”? “हमरा सभकेँ अल्लाकेँ अर्पित कएल वस्तु नहि खएबाक चाही, हमर बेटा..हम दोसरामे एकरा बाँटी तैयो जहुँ हमरा सभ लेल किछु नहि बचए”। ओ हमरा शान्त करथि।
हुनकर मीठ बोल हमरा मोनसँ नारिकेलक पर्याप्त हिस्सा नहि भेटबाक निराशाकेँ खतम कए दैत छल। बादमे हमर पिता आ हजरत साँझमे अबेर धरि बैसि गप करैत रहथि। अपन वस्त्र बदलि सामान्य वस्त्रमे हम, अपना संगी सभक संग पड़ोसक एकटा निर्माण स्थलपर बालूक ढेरपर खेलाय लेल चलि जाइत रही।
ई सभ सोचि हमर आँखिमे नोरक इनार बनि गेल...
“हमर पुत्र, अहाँ किएक नहि बाजि रहल छी? की भेल? हम डरक अनुभव कऽ रहल छी...बाजू...” हमर अम्मी पुछैत रहलीह। ओना तँ हैदराबाद एनाइ तीन बरख भऽ गेल मुदा एको दिन हम नमाज नहि पढ़लहुँ। असमयक पारीमे काज करबा अनन्तर हम ईहो बिसरि गेलहुँ जे नमाज पढ़नाइ की छियैक। “अम्मी..” हम उत्तर लेल शब्द तकैत बजलहुँ। “अम्मी, हम कहिया हैदराबादमे नमाज पढ़बाक लेल मस्जिद जाइत छी जे अहाँ एतेक चिन्तित भऽ रहल छी”? हम पुछलहुँ।
हम मोन पाड़लहुँ ओहि दिनकेँ जखन ओ हैदराबाद आएल रहथि कारण हम कहन्र् रहियन्हि जे हम हुनका हैदराबाद नगर देखेबन्हि। मुदा हैदराबाद आबि अपन विरोध देखबैत ओ बजलथि, “हम कतहु जाए नहि चाहैत छी...हमरापर किएक पाइ खर्च कऽ रहल छी”? हम हुनकर मोनक गप बुझैत रही। ओ हमरापर बोझ नहि बनए चाहथि, मुदा हम हुनकर विरोधपर ध्यान नहि देलहुँ। हमर जोर देलापर ओ एक बेर अएलीह। हम हुनकर हाथ पकड़ि रस्ता पार करबामे मदति करियन्हि। एक बेर खैरताबादक लग सड़क पार करबा काल हुनकर आँखि नोरसँ आद्र भऽ गेलन्हि।
“अहाँ कतए जन्म लेलहुँ...कतए अहाँ बढ़लहुँ...अहाँ कतेक टा भऽ गेलहुँ? अहाँ एहि पैघ नगरमे कोना रहए छी? अहाँ बहुत पैघ भऽ गेलहुँ...” ओ बड़ाई करैत कानए लगलीह।
“अहाँ जखन बच्चा रही तखन हम अहाँकेँ नानीगाम बससँ लऽ गेल रही। हम अहाँक हाथ कसि कऽ पकड़ने रही कि अहाँ कतहु हेराऽ ने जाइ। आब अहाँ एतेक पैघ भऽ गेलहुँ जे हमर हाथ पकड़ि बसपर चढ़बामे मदति करी”। ई कहैत ओ नोरक द्वारे ठहरि गेलीह। ओ खखसलीह, “खुस...खुस...” परिश्रमसँ अपन श्वास वापस अनलन्हि।
ओ जखन भूतकेँ मोन पाड़ि रहल छलीह हम हुनका सान्त्वना देलियन्हि आ हुनकर नोर पोछलियन्हि।
“अम्मी...हम एतए जीबाक इच्छासँ अएलहुँ। हम साहस केलहुँ आ कतेक रास कठिन क्षणकेँ सहन कएलहुँ। जखन दुखित रही, हम अपनेसँ दबाइ लए ले जाइ आ संगमे तखनो प्रत्यन करी।, ई सभ अम्मी...ई सभ अहाँक आशीर्वादसँ भेल, आकि नहि? एहि नगरमे अपना कहि कऽ संबोधित करए बला हमर क्यो नहि अछि, तखनो हम एतए बिना असगर रहबाक अनुभूतिक रहैत छी”। अपन आँखिक नोर पोछि कऽ ओ हमरा आशीर्वाद दैत कहलन्हि, “दीर्घायु रहू हमर पुत्र”।
समस्याक आरम्भ तकर बाद भेल।
“सभ जुम्मा..जुम्मा...अहाँ नमाज पड़ए छी हमर बाउ”? ओ पुछलन्हि।
“नहि माँ। कहू ने, कखन हमरा पलखति भेटैत अछि”?
“अहाँकेँ कहियो समय नहि भेटत, मुदा अहाँकेँ करए पड़त, एकरा छोड़बाक कोनो गुन्जाइश नहि अछि। मुस्लिमक रूपमे जन्म लेबाक कारण अहाँकेँ, कमसँ कम सप्ताहमे एक दिन समय निकालए पड़त”, ओ कहलन्हि।
आगाँ कहलन्हि, “धनिक आ गरीब नमाजक काल संग अबैत अछि। ओ सभ कान्हमे कान्ह मिलाए नमाज पढ़ैत छथि। ओहि दिन ई बेशी गुणक संग अबैत अछि। एक बेर हरेलापर अहाँ ओ आशीष कहियि घुरा नहि सकैत छी। ताहि द्वारे धनिक आ एहनो जो लाखमे रुपैयाक लेनदेन करैत छथि, अपन व्यवसायकेँ एक कात राखि नमाज पढ़ैत छथि। दोकानदार सभ सेहो अपन व्यवसाय बन्न कऽ दैत छथि बिना ई सोचने जे कतेक घाटा हुनका एहिसँ हेतन्हि। संगहि ओ गरीब सभ जे प्रतिदिनक खेनाइक जोगार नहि कऽ पबैत छथि, सेहो नमाज पढ़ैत छथि”।
हमरा डर छल जे हमर माँ वैह पुरान खिस्सा फेरसँ तँ नहि शुरू कऽ देतीह। विषय बदलि कऽ हम कहलियन्हि, “की अहाँकेँ बुझल अछि जे एतए निजाम नवाब द्वारा निर्मित एकटा पैघ मक्का मस्जिद अछि...”?
“एहन अछि की? हमरा अहाँ ओतए नहि लऽ चलब”? ओ उत्साहसँ बजलीह।
“जखन अहाँ ओतए पहुँचब तँ हमरा नमाज पढ़बा ले अहाँ नहि ने कहब”। हम विनयपूर्वक प्रार्थना कएलियन्हि।
“हमर बाउ...अहाँ ई की कहैत छी...हम अहाँकेँ ई सुझाव अहाँक अपन भलाइ लेल दैत छी”।
“ठीक छैक..चलू चली”! हम सभ ओतएसँ बस द्वारा सोझे मस्जिद गेलहुँ। ओ चारमीनार दिस देखलन्हि जे मस्जिदकक मीनारसँ बेशी पैघ रहए।
“अम्मी ओ छी चारमीनार। हम पहिने ओतए चली..आकि मस्जिद”? हम पुछलियन्हि।
“ओतए चारमीनारमे की अछि हमर बाउ”?
“ओतए किछु नहि अछि...कोनो दिशामे देखू एके रंग लागत। मुदा अहाँ ऊपर चढ़ि सकैत छी। ओतएसँ अहाँ मक्का मस्जिद स्पष्ट रूपमे देखि सकैत छी...आब देरी भऽ गेल अछि। हम चारमीनार बादमे देखि सकैत छी...अखन तँ हमरा सभ मस्जिद देखी”। ओ स्वीकृति देलन्हि।
मस्जिदक भीतरमे शान्ति रहए। शान्तिक साम्राज्य छल। ई शीतल, सुखकारी आ विस्तृत रहए। आगन्तुकक आबाजाही बेशी रहए। अम्मी भीतर जएबामे संकोच कऽ रहल छलीह कारण स्त्रीगण सामान्यतः मस्जिदमे नहि प्रवेश करैत छथि। मुदा ओ किछु बुरकाधारी स्त्रीगणकेँ ओतए देखि ओम्हर बढ़ि गेलीह।
अपन सारीक ओरकेँ माथपर लैत ओ बजलीह, “हमहूँ अपन बुरका आनि लैतहुँ ने”? घरसँ चलैत काल ओ एहि लेल कहने रहथि मुद ई हम रही जे हुनका एकरा पहिरएसँ रोकने रही। अपन ठामपर हुनका लेल एकरा छोड़नाइ सम्भव नहि छलन्हि मुदा हम एहि नव स्थानपर हुनका एहि झंझटसँ मुक्ति देमए चाहैत रही। मुदा अपन सम्प्रदयक स्त्रीगण बीचमे बिना बुरका पहिरने ओ अपनाकेँ बिना चामक अनुभव कऽ रहल छलीह। जखन हम हुनका स्तंभित आ थरथराइत चलैत देखलियन्हि तखन हम हुनका बुरका नहि पहिरए देबाक लेल लज्जित अनुभव कएलहुँ। तैयो अपन रक्षा करैत हम कहलियन्हि, “हम कोना ई बुझितहुँ अम्मी जे हमर सभकेँ मस्जिद घुमबाक ब्योँत लागत”।
ओ किछु नहि बजलीह।
“एहिसँ कोनो अन्तर नहि पड़ैत अछि...आऊ”। हम बादमे ई कहि हुनका भीतर लऽ गेलहुँ। ओ हमर संग अएलीह। हम सभ अपन चप्पल कातमे रखलहुँ जाहिसँ बादमे ओकरा लेबामे आसानी होए। कतेक गोटे मस्जिदक सीढ़ीयेपर आलती-पालथी मारि कए बैसल रहथि। परबाक संग खेलाइत किछु गोटे ओकरा दाना खुआ रहल रहथि। किछु परबा उड़ि गेल आ किछु आन घुरि कए उतरल। किचु परबा पानिक चभच्चाक कातमे बैसि कऽ एम्हर-ओम्हर ताकि रहल रहए, एकटा आह्लादकारी दृश्य। अम्मी हुनकाँ आश्चर्यित भऽ देखलन्हि। बादमे ओ हमर पाछाँ अएलीह जखन हम सीढ़ीक ऊपर प्लेटफॉर्मपर पहुँचलहुँ।
प्लेटफॉर्मकेँ चारू दिस देखैत ओ चिकरि कए बजलीह, “हमर बाउ, एक बेरमे कतेक गोटे एतए बैसि कऽ नमाज पढ़ि सकैत छथि”?
“हमरा नहि बुझल अछि अम्मी...कैक हजार हमरा लागए-ए। रमजानक दिनमे लोक चारमीनार धरि बैसि कऽ नमाज पढ़ैत छथि”। हम उत्तर देलियन्हि। “हँ, ई टी.वी. मे देखबैत अछि” अम्मी प्रत्युत्तर देलन्हि। ओ एकरा नीकसँ चीन्हि गेल रहथि, हम अपनामे सोचलहुँ। चारू कात देखाऽ कऽ अन्तिममे हम हुनका मस्जिदक पाछाँ लऽ गेलहुँ। पाथारक फलक चिड़ैक मलसँ मैल भेल रहए। परबा सभ देबालक छिद्रमे खोप बनेने रहए।
ओ मीनारक देबालकेँ छूबि आ आँखिसँ श्रद्धापूर्वक सटा कऽ अति प्रसन्न भऽ गेलीह।
“एतए नमाज पढ़ब पवित्र गप अछि, हमर बाउ”, ओ कहलन्हि। हम एहि बेर कोनो अति सम्वेदना नहि भेल।
“हँ। ठीके, हम एतए कमसँ कम एक बेर नमाज अवश्य पढ़ब”। हम अपनाकेँ कहलहुँ।
हम जतए रहैत छी मक्का मस्जिद ओतएसँ बड्ड दूर अछि। जुम्मा आ छुट्टीक दिन बससँ एतए अएनाइ बड्ड दुर्गम अछि। तैयो, अगिला बेर हम एतहि नमाज पढ़बाक प्रण कएलहुँ।
“हम अगिला सप्ताह् एतए आबि नमाज पढ़ब अम्मी”, हम कहलियन्हि। ओ प्रफुल्लित अनुभव कएलन्हि आ हमरा दिस आवेशसँ देखलन्हि।
“एहि सभ ठाम नमाज पढ़बामे अपनाकेँ धन्य बुझबाक चाही”, ओ कहलन्हि।
“अहाँक अब्बा ओतेक दूर रहैत छथि, ओ की नमाज पढ़बाक लेल एतए आबि सकैत छथि? अहाँ अही नगरमे छी..एतए नमाज पढ़ू”, ओ कहलन्हि। “नहि मात्र एतए, जतए कतहु पुरान मस्जिद होए ततए नमाज पढ़ू। कतेक प्रसिद्ध लोक एतए नमाज पढ़ने होएताह। एहि सभ ठाम नमाज पढ़लाक बाद कोनो घुरए केर गप नहि अबैछ। अल्ला अहाँकेँ निकेना रखताह”।
हम मस्जिदमे एना ठाढ़ रही जेना जादूक असरि होए। हम हुनकर गप सुनलहुँ, कान पाथि कऽ। बदमे, बाहर निकललाक बाद हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ। अपन मस्जिद जएबाक प्रतिज्ञाकेँ सेहो हम कात राखि देलहुँ। ओही संध्यामे हम अम्मीकेँ बस-स्टैण्डपर छोड़लहुँ। तकर बादा दू टा जुम्मा बीतल, मुदा से एना बीतल जेना ओ कोनो जुम्मा नहि छल। आब बम विस्फोटक एहि समाचारक बाद हम जुम्मासँ भयभीत छी।
“अम्मी...अहाँकेँ ईहो बुझल अछि जे कोन मस्जिदमे बम फूटल छल”? हम फोनपर पुछलियन्हि।
“कोनमे हमर बाउ”? ओ उत्सुक भऽ पुछलन्हि।
“अहाँ एक बेर हैदराबाद आएल रही, मोन पाड़ू? हम नञि अहाँकेँ एकटा मस्जिदमे लऽ गेल रही...मक्का मस्जिद...पैघ सन? ओतहि, ओही मस्जिदमे...खुनाहनि ओही मस्जिदमे अम्मी...खसैत लहाश.. अहाँ कहने रही जे कियो जे ओतए नमाज पढ़त, धन्य होएत...ओही मस्जिदमे अम्मी”। हम कहलियन्हि। “छोट बच्चा सभ...ओकर सभक देह खोनमे लेपटाएल...परबा सभ सेहो मरल...”।
नोर अनियन्त्रित दुखमे बहए लागल। हम बाथरूम लग नोर पोछबाक लेल गेलहुँ। हुनक हृदय हमर काननि देख फाटए लगलन्हि। ओ सेहो कानए लगलीह। हम आगाँ कहलहुँ, “अम्मी, नहि कानू...अब्बाकेँ होएतन्हि जे हमरा किछु भऽ गेल अछि...हुनका कहियन्हि जे हम नीकेना छी”।
कनैत ओ हमरा पुछलन्हि, “फोन नहि राखब हमर बाउ”।
“जल्दी अम्मी, कहू”।
“अहाँ चलि आउ...गाम चलि आउ...हमर गप सुनू”।
“हमरा किछु नहि भेल अछि अम्मी”।
“बाहर नहि जाएब..हमर बाउ”।
“ठीक छैक अम्मी”।
“ओहि मस्जिदमे नहि जाएब, हमर बाउ”।
हमर हृदय फटबा लेल फेर तैयार अछि। हम हुनका ई आश्वासन दैत जे ओहि मस्जिदक लगो कोनोठाम हम नहि जाएब, फोन रखलहुँ।
मुदा विचारक आगम बढ़ैत रहल। कतेक विभिन्नता! कतेक परिवर्तन काल्हिसँ! ई हमर अम्मी छथि जे एना बाजि रहल छथि? ई ओ छथि जे हमरा ई बाजि रहल छथि जे मस्जिदक लगो कोनोठाम नहि जाऊ? अल्ला कोनो आन भऽ गेल छथि अपन बच्चाक प्रेमक आगाँ? अपन खूनक आगाँ अल्ला अस्वादु भऽ गेलथि? नमाज विरोधक योग्य भऽ गेल? अल्ला माफी दिअ! क्षमा करू! आन जुम्माकेँ कोनो खुनाहनि नहि हो..औज बिल्लाही..मिनाशैतान...निर्राजीम..बिस्मिल्लाह इर्रहमा निर्रहीम...!
(ओहि सभ अम्मीजानकेँ समर्पित जिनका मक्का मस्जिदक बाद अपनाकेँ हमर अम्मी जकाँ परिवर्तित होमए पड़लन्हि...लेखक)



अजय सरवैया, गुजराती कवि
गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा।

अहाँक तामस हमर स्वागतपथ
“अहाँ आवेष्टित छी प्रतिध्वनि आ मोहक स्वरसँ”. पाब्लो नेरुदा
चक्रधर आ पीयुषक लेल

१.
“कहि धरि हम खिचैत रहब एना”? ओ पूछत
आद्र मुखसँ
हेराएल आँखिसँ

हम राखब सोझाँ शब्दकेँ, ओ रखतीह नियमावली
हम करब सोझाँ अपन इच्छा, ओ भ्रमकेँ
हम देबन्हि मेघ, ओ चक्र
हम आनब प्रश्न, ओ पलायन
हम प्रतिभाक प्रेमी, ओ बन्धनक
हम स्वप्नक आकांक्षी, ओ निर्जनताक

कहिया धरि? हम बुझलहुँ नीक जकाँ
हमर भाग्य रहए फराक
हमरा सभक दिन राति सेहो
ऋतु आ पाबनि तिहार जकाँ
समय काल हमरा सभक अन्तर
हमरा सभक विभिन्नता रहए विभिन्न

हमरा सभ प्रेम करैत रही
कतेक दिन धरि?


राजेन्द्र पटेल, गुजराती कवि
गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा।

हम किएक कऽ रहल छी अनुभव
धरा बिन शाखक
बिना एहि हाथक?

पसारैत दूर आ विस्तृत
जीवित साँपक ताकिमे
ई सभ हाथ एक दोसरमे ओझराएल
आ समाप्त होइत मात्र नहक वृद्धिमे।

बाबाक छड़ीक पकड़िसँ
बसक ठाढ़ होएबला लटकल चक्र
मुट्ठी अनैत अछि वैह अविचल शून्याकाश।
ओकर कए अनुभूति
ई सभ खेंचल कार कौआक हाथ
घुमि जाएत आकाश दिस
सभटा खेत अंकुरित प्रफुल्लित

पृथ्वीक गत्र-गत्रक
पाँजर खेतमे औंगठल
बाँहि जकाँ।
सभटा हरक फारक चेन्ह
भाग्य रेखा हाथक।

पंक्ति जोखि सकैए
मात्र हाथक लम्बाई
नहि एकर जड़ि
पहिने हम कए सकी एकर निदान
हाथक आक्रमण जड़िपर
श्वेत धरापर
रोशनाईसँ पसरल
अपन नव अंकुरित आँखिए
उड़ि गेल नव-जनमल पाँखिए
ओहि धूसरित गगनक पार
आब
सभटा मस्तिष्क कोशिकामे
हाथ रहैछ अहर्निश
प्रवेश कए रहल गँहीर आर गँहीर जड़िमे
पीयूष ठक्कर, गुजराती कवि
गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा।
सांध्य बेला
साँझ होइते
शिशिर आह पर्वतक
आच्छादित कएल अकाश
अविलम्ब पड़त सम्पूर्ण आकाश फाँसमे
एहि पर्वतक छाहक
पर्वतकेँ भेटत अकाश
प्रकाशकेँ छाह
शरीर सुतत
हृदय दुखित

ओहिना जेना
ईश्वरकेँ भेटल मनुक्ख
पन्ना त्रिवेदी, गुजराती कवि
गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा।
आमद
हे विदेशी!
देखाऊ हमरा एहन दृश्य
यदि अछि कोनो एहन
बिनु प्रकाश
बिनु गद्दक ओछाओन
बिनु छाह
जतए
नहिए अछि
चुप्पीक अंश
व्यथित हृदयक ध्वनि
नहिए ध्वनिक आँगुरक नोकक स्पर्श
देखाऊ हमरा ओ दृश्य
यदि अछि कोनो एहन
हौ विदेशी!
जतए
क्यो नहि करैछ एकत्रित
स्वासक मालगुजारि।

बाबू सुथार, गुजराती कवि
गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा।
गृहमोह
१.
गंध पहिल बुन्नीक
आ हम
बैसि आ
पसारी एक-दोसराक दिस

भेदित पड़पड़ाइत बुन्नीक बुन्द
बलुआही माटि भेल
यथार्थ छननी

अएल प्रखर रौदक फोका
पाथरक चामपर

अविलम्ब
झझायत
छातक खपराक भूर
धारक संग उगडुम करत
नवतुरिआ बरद कछेरपर नाचत।
सभटा गलीमे
बरद सभ आनत पानि
सोलह टा पालो बान्हि गरदनिमे
सभ घरमे
धरनि सभ नहाएत जी भरि
देबालपर
गाछक छातीपर
स्मृतिक शिलालेखपर
हदसैत पानि
खोलत
हस्ताक्षर भगवानक पूर्वजक।

बराखक संगे
चमकैत आकाश
माएक कोमल तरहत्थी।
सूर्य करत आच्छादित
वृक्षक
शाखक
पातक
पँखुडिक।
टाँगल पक्षिक आवास
सभ गृहक बाहर
मयूर सभ करत नृत्य।
जेना प्रिय नव वधु
मयूरीक माथपरक जलक घट
गामक दोगहीसँ निकलत
अनबा लए पानि
छिटैत नहक आकारक झील
वैतरणी डुमाएत
रीढ़युक्त नागफनीक पात।

संग
जीव आ शिव
करत अष्टमी आ एकादशी
चन्द्रमा उगत
चुट्टीक कटगर पीठपर

चाली सभ बहराएत
आडम्बरसँ राजसी मुकुट धेने

सत्ये
किछु अकठ अछि हमरा सभक भाग्यमे
आइ

आइ
गंध पहिल अछारक
आ हम
बैसि आ
पसरैत एक दोसरामे।




वासुदेव सुनानी, ओड़िया कवि
ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा
अनुमति
हमरा अनुमति अछि श्रीमान!

हम कए ली विश्राम कनेक काल?

अहाँक आदेशानुसार
छाह केँ देने अछि बहारि,
बत्तू केँ देने छी खोआए,
अहाँक नालाकेँ कए देने छी साफ,
नहि रहत कोनो दुर्गन्ध आब।

हमर अछि ढोल बजबए बला मधुमाछी
युगसँ अहाँक मनोरंजनार्थ
आ हमर आँगुर स्थिरताक राखए आश
हम करी विश्राम थोड़बे काल?

हम करैत छी अनुभव पुरखाक स्वेद
हमर देव, हमर मृतात्मा।

ताहि लेल प्रिय श्रीमान्
घंटा भरिक विश्राम मात्र अभिवादन जकाँ
किएक तँ हमर दुर्गन्ध, स्वेदक आ किछु आन वस्तुक।

हम करए छी प्रतीक्षा अहाँक नीक समय तृप्तिक
संगहि अपन कीट-संक्रमित जिनगीक समाप्तिक संकेतक।

प्रतीक्षा सेहि भरि दैत अछि थकान, श्रीमान् प्रियवर
विशेषकए लाख बरखक जहुँ ई होए।

से हम करए छी विश्राम थोड़ेक काल, श्रीमान्?
कारण हमरो सन् तुच्छकेँ बुझल छैक छोट-मोट विद्रोहक कला।

भरत माँझी, ओड़िया कवि
ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा

हमर घुरलाक बाद

हमर घुरलाक बादो ओहि स्थानके नहि छोडू रिक्त
पकड़ने रहू ओकरा।

फूल सभकेँ नहि फेकू
की कोनो महत्व अछि एकर जे ओ टटका फुलाएल अछि आकि अछि मौलाएल?

खोलू हमर सभटा नुकाएल भोथियाएल स्वप्न,
ओकरा अलंकृत कए।

उनटि दिअ सभ ठामक लैम्पकेँ,
आ रोकि दिअ अन्हारक प्रति घृणा

बिना घबरेने देखू समुद्र
आ तखनो नहि करू घृणा अकाससँ।

नेहोरा अछि!!!

पृथ्वीकेँ बुझू एकटा सममिश्रित स्थान
प्रयास करू आ ठाढ़ रहू ओतए।

कृपया बाट ताकू अपन
आ से करए काल, रहू जागल!

मोन राखू, हम घुरब एहि पृथ्वीपर जे एहन एकेटा अछि
राखू मोन कि हम घुरब
हम बाउग केने छी पथकेँ सरिसवक बीआसँ,
मोन राखू ओ पथ
बालानां कृते
१.उमेश कुमार-२.ज्योति झा चौधरी
उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज
एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए।
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले।
३.वैर भाव नहीं राखए ले।
४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले।
राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक।
राजकुमार राजा बनि गेल।
पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल।
१.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचल मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल।
२.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देलक आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल लेल राखि देलक।
३.ओ सभटा बैरक गाछ काटि कऽ हटा देलक।
४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए।
एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते-करिते राजपाट खतम भऽ रहल छलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक।
गामक एक बुजुर्ग सँ ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तँ ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सँ पुछू।
चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही बुजुर्ग आदमी सँ पुछलक जे हमरा तँ तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल।
बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख सँ ८० बरखक आदमी केँ तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसैत अछि तँ ओकर मूरी झुकि जाइ छैक आ ठेहुन ऊपर उठि जाइत छैक आ से ओ तीन मूरी जकाँ भऽ जाइत छैक।
राजा एहेने एकटा मनुक्खकेँ ताकि क' पुछलक।
“पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक।
राजा कहलक।
“ओ बतेलथि-
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले।
३.वैर भाव नहीं राखए ले।
४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”।

“पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा क' खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटत।
दोसराक मतलब घरक आगाँ घूर लगा देबा लऽ जाहिसँ द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत।
तेसरक मतलब झगड़ा-झाँटि सँ दूर रहि दोस्ती मिलान सँ रहू।
चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलू”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक।
एकरापर अमल केलापर राजाक राजपाट वापस आबए लगलैक।

देवीजी: ज्योति झा चौधरी
देवीजी :
देवीजी कंप्यूयटर शिक्षा
विद्यालयमे नव वर्षक पहिल दिन छल। एना लागैत छल जे विद्यालयके इमारतमे किछु नवीनीकरण कैल गेल छल।सब प्रार्थना लेल एकत्रित भेल। नववर्षक संग नया कक्षामे जायके शुभकामना देलाक बाद शिक्षकगण रहस्यमय मुस्कान देबऽ लगला। विद्यार्थी सबहक उत्सु कता चरम पर छल।तखन देवीजी समय व्यर्थ बिताैनाइ छाेड़ि सबके सूचित केलखिन जे पाठशालामे कंप्यूुटर शिक्षाक व्यवस्था कैल गेल अछि।

वर्त्तमान वैज्ञानिक विकासक परिपेक्ष्यमे कंप्यूूटर के ज्ञान अत्यंथत आवश्यक छल।आहिकाल्हि सब जगह कंप्यू टरक उपयाेग भऽ रहल छै। सब विषयमे कंप्यूषटरक समावेश छै।चाहे आे विज्ञान हाेए वा कला। चित्रकला तकमे कम्प्यूभटरक उपयाेगिता छै। डिगिटल आर्ट़ लाेगाे डिज़ाइऩ फैशन डिज़ाएऩ एनिमेशऩ अतऽ तक जे फिल्म निर्माता सब एक्शकन सीन के कंप्यूेटर पर एनीमेशन कऽ स्टण्ट मास्टर के देखाबैत छथि जाहि सऽ बात बुझमे सहायता हाेएत छै।
ताहि द्वारे प््रा धानाध्यापक अहिलेल विशेष प््रा यास केने छलैथ।बड पहिने सऽ लागल छलैथ तखन अहि वर्ष इर्च्छा पूर्ण भेलैन। विद्यार्थी सब सेहाे अहि समाचार सऽ बहुत आह्लासदित भेलैथ।हुनका सबलेल तऽ मानू स्वप्नष साकार भऽ गेलैन।तकर बाद प््रा धानाध्यापक इहाे कहलखिन जे अगिला साल तक इंटरनेट के इंतज़ाम सेहाे हाेयत।
सबके बेर्राबेरी कम्प्यूरटर रूमक दर्शन कराआेल गेलैन। कंप्यूनटर के बाह्यर बनावट माॅनीटऱ सेन्ट्रल प््राबाेसेसिंग यूनिट ह्य सी पी यू़हृ़ तथा की बाेर्ड के संक्षिप्तू विवरण देल गेल। इंटरनेट के प््रा्याेग सऽ सम्पर्क स्थापना कतेक सरल आ सस्ता भऽ गेल अछि तकर जानकारी सेहाे देल गेल। तकर बाद विद्यार्थी सब अपन कक्षा दिस नव उत्सा ह संग विदा भेल।सबहक उत्सााह देख प््रादधानाध्यापक के अपन प््रा यास सफल बुझेलैन।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

१०.विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत
(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
७. मानक मैथिली
इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष

इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।

मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।
१.कृषि-मत्स्य शब्दावली २.बसैटी (अररिया) बिहार, शिव मन्दिरक मिथिलाक्षर शिलालेखक देवनागरी रूपान्तरण।
कृषि-मत्स्य शब्दावली- गजेन्द्र ठाकुर

माँछ वंशीसँ सेहो मारल जाइत अछि।
छोट माँछक लेल जाल- भौरी जालक प्रयोग होइत अछि।
भिरखा- हाथसँ उठा कए फेंकल जाइत अछि। एहिमे सूत आ लोहाक गोली प्रयोग होइत अछि, २५-२५ ग्रामक लोहाक गोली लगभग २-१/२ सँ ५ किलो धरि प्रयोगमे आनल जाइत अछि। अन्ता जाल छोट होइत अछि आ कछारमे रातिमे लगाओल जाइत अछि।
कोठी जाल पैघ होइत अछि आ एहिमे बाँसक प्रयोग होइत अछि।
बिसारी जाल- दिनमे माँछ हरकि जएतैक से रातिमे खुट्टी लगा कऽ रातिमे माँछ मारल जाइत छैक।
चट्टी जाल- प्लास्टिकक, पैघ-छोट दुनू, दिनमे आषाढ़-साओन दुनू मे। ५-१० मिनटमे उठाओल जाइत छैक।
सूतक मोट पैराशूट जाल, सूत आ नाइलनक मिश्रणक करेन्ट जाल, सूतक बड़का हाटा जाल होइत छैक।
पैराशूटसँ छोटकी माँछ उड़ि जएतैक।
पैघ मछली बड़का वंशीसँ, बड़का चट्टी जालसँ, सूताक महाजालसँ मारल जाइत अछि।
पैघ छोट दुनू माँछ बाँसक जंघासँ मारल जाइत छैक। एकरा ४ हाथ खड़ा नारियल आ नाइलोनक डोरीसँ बान्हल जाइत छैक।
बाँसक करचीक छीपसँ सेहो माँछ मारल जाइत छैक।
पटुआक सण्ठीक १००-२०० पुल्ली एकसाथ लगा कए सेहो माँछ मारल जाइत छैक।
हाटा जाल किमी धरि पैघ होइत अछि आ सूताक बनैत अछि।
चाँच कहड़ा बाँसक होइत अछि।धार/बदहाल घेरकेँ मारल जाइत अछि। पानिकेँ फुलाऽ कए डगरी लगाओल जाइत छैक, चाँच फहड़ामे चाँच फहड़ासँ घेरल जाइत अछि।
माँछक प्रकार
डाँरा मछली (डेरका मछली), मूँहा मछली, पोठी, लत्ता (पिआ माँछ), गड़इ, पलवा, टेंगड़ा, सिंघी, माँगुड़, चपड़ा, पैना, रेवा, गड़ही, उड़न्था, मोहुल, बुआरी, बामी, बगहार, चेलवा, कौअल, गोर्रा, सौल,भौरा, कजाल, कलबौस, चित्तल, भोइ, कत्ती, भौकुड़ी, सिलोन, रेहू, मिरका, बिलासकप, सिल्वरकप, चाइना माँगुर, कबइ, चाइना कबइ।
दरबा- छोट, पातर- २-३ इन्चक, पीठपर कारी, बगल सफेद
गड़ई- कारी
चोपड़ा- चाकर, कारी, मलिन
पलबा- दुनू दिस काँट, पीठपर सेहो काँट, रंग- पीयर-उज्जर, मोंछ सेहो होइत छैक।
टेंगड़ा- पैघ माँछ, एकरो तीन टा काँट, मुँहपर मोँछ।
सिंघी- पातर, दू टा काँट दुनू दिस, लाल रंगक आ लाल आ हल्का कारी
मँगुरी- मोट आ महग सेहो।एकरो दू टा काँट, लाल आ हल्का कारी
पैना- सफेद रंगक, पीठपर काँटा
रेवा- सफेद, पौआ-आधा किलोक
डढ़ी- पीठपर काँटा, सफेद
उरन्था- पीठपर काँट, नीचाँ गामे झुकल, सफेद
भालु- लम्बाइ मुँह, सफेद- खड़ा(पीयर), ऊपरमे काँटा, नाभिक लग काँट(सभ माँछमे)
बोआली- पैघ मुँह- २० किलो तक, सफेद, पीठपर काँट, पखना दुनू दिस (सभ माँछमे)
बामी- लम्बा, बिलमे रहैत अछि, मुँह आगू, गोल मुँह, सूआ जकाँ लम्बा, पीठपर काँट, नाभिपर दू टा काँट
सौंस- माँछकेँ खाइत अछि।
बघार- छोट, १ पौआसँ क्विंटल भरिक, कारी-खैरा (पीयर), काँट- पीठपर एकटा, बगलमे दू टा, पुच्छी-चाकर, मुँह चापट, चकड़ाई- बेसी।
चेलबा- उज्जर, काँट नहि होइत छैक। चलैक लेल दुनू दिस पखना, माँछमे तेजगर।
कौअल- सफेद, मुँह नमगर।
गोर्रा- मोँछ, दाढ़ी, काँटा, आगाँमे टेढ़
साउल- लाल आ पीयर, नमगर, २-३-५ किलोक
भौरा-(गजाल), साउल, चितफुटरा, पैघ २०-२५०४० किलो तक, गोल-गोल उज्जर, हरियर आ कारी
कलबौस- रंग हल्का कारी
अंदाजी माँछ
चित्तल- चकरगर बेसी, २०-२५ किलोक, २-३ फीट चकरगर
सिलोन- पालतू,३-४ किलोक,पोखरिमे पोसल जाइत अछि।
रोहु-पीयर, हल्का उज्जर, पीठपर काँट
मिरका- हल्का लाल सफेद
सिल्वरकप- पालतू
चैना माँगुर- चलानी (पालतू), दुनू दिस काँट
चैना कबइ- पालतू (चलानी), पीठपर जहाँ-तहाँ काँट
कबई- कनफर आ पीठ दुनू ठाम काँट
चेंगा माँछ- सुखायलोमे दूर धरि चलि जाइत अछि, कबई जकाँ
सौंस- पानिमे माँछ खाइत अछि, आदमीकेँ नोकसान नहि, आदमी संगे खेलाइत अछि, सीटीक अवाज (डोलफिन)
घड़ियाल- कुर्सेला लग गंगामे, मुँह लम्बा, एक-डेढ़ हाथ,दाँत- आँगुरक जेकाँ, रंग लाल, पुछरी नमगर, ३ हाथ
बोँछ- आदमीक रंग रूप, कारी, माथपर चूल- केश पकड़िकेँ डुमा दैत छैक
कृषि-

जोड़ा बैल/ हर
ईश- हरमे जोड़ि कऽ पालोमे बान्हल जाइत छैक।
लगना
पालो- कन्हापर
पालोमे दू टा कनैल दुनू बगल बरदकेँ एने- उने (एम्हर-ओम्हर) नञि होमए दैत छैक।
कनैलसँ हटि कऽ एक सवा फीटक डोरी बान्हल जाइत छैक। समैल (पौन फीटक लकड़ीक/ बाँसक) मे डोरी बान्हल जाइत छैक।
ईशक नीचाँमे पेटार ईशकेँ खुजए नहि दैत छैक, ऊँच-नीच करए दैत छैक।
हलमे पुट्ठी, नीचाँमे दू-फीटक अगल फल्ली पुट्ठीमे सेट कएल जाइत छैक, माटि उखाड़ैत छैक।
परहत (लगना)- हरवाह एहिपर हाथ धरैत अछि। तीन फीटक/ ६ इन्चक मुट्ठी पकड़ैबला लगनामे ठोकल जाइत छैक (मुठिया)।
नाधा- पालो-ईशमे बान्हिकेँ जोड़ल जाइत छैक, डोरी होइत छैक ४-५ फीटक।
दू टा मैडोर (डोरी)- १०-११ फीटक दू टा- एकरा चौकीमे बान्हि कऽ बरदमे बान्हि कऽ हरवाहा चौकी दैत अछि।
चौकी- (बाँस/ लकड़ीक) ६-७ फीटक एहिपर हरवाह छढ़ि कऽ चौकी दैत अछि। हरवाहाक हाथमे एक टा झूर/ ज्वोली/ लाठी बरद हाँकए लेल रहैत अछि।
गेहूँक जोताई ३ इन्च गहरा कऽ ४-५ टा चास दऽ होइत अछि।
मक्कइ लेल ४-५ इन्च गहराइ करए पड़ैत अछि।
बीया- एक एकड़ (१०० डिस्मिल) मे २ मन गहूमक बीया, १० किलो मक्कइक बीया।
खाद- एकड़मे २० कि. डी.ए.पी., ५ किलो पोटाश, ५ किलो यूरिया, ५ किलो जिंक गहूम बाउग करबा काल देल जाइत अछि।
मकइमे डेढ़ सँ दू फीटक भेलाक बाद माटि चढ़ाओल जाइत अछि। २ कतार २ फीट चौड़ाइसँ। एकड़मे २ क्विंटल खाद देल जाइत अछि। १०० किलो डी.ए.पी., ५० किलो यूरिया, २० किलो साल्फिक, १२० किलो पोटाश, १० किलो जिंक। पानि पटवन समयमे खाद दऽ कऽ माटि चढ़बैत छियैक, फेर पानि पटबैत छियैक। पानि पटेलाक बाद यूरिया एक एकड़मे एक क्विंटल देल जाइत अछि।
तर-तरकारीक प्रकार
सिंघिया करैला- बड़ा- हाइ ब्रेक/ प्लेन
छोटकी करैला- हजरिया/ जुल्मी
सफेद करैला- पटनिआ (नजली- मध्यम खुटक)
तारबूज-
नामधारी-स्वादिष्ट- भीतरमे लाल, ऊपरमे सफेदी/ चितफुटरा (हरियर-उज्जर)
माइको- हल्का कारी
पहुजा- माइकोसँ बेशी कारी
राजधानी- कारी रंगमे
महाराजा- पैघ छोट कारी रंगमे
सैनी आ सुगरदीबी- कारी रंगक
नाथ- हल्का चितफुटरा (उज्जर/ हरियर)
गंगासागर- कुम्हर जेकाँ उज्जर साफ
सोरैय्या- चितफुटरा

खीरा
जुल्मी- छोट
हाइब्रीड
माइको- नमगर/ हरियर/ पीअर
महाराजा- खीरा
खेतीबारी- हरियर रंगक , नमगर कम, पाछाँमे मोट बेशी आगाँ कम।

बसैटी (अररिया) बिहार, शिव मन्दिरक मिथिलाक्षर शिलालेखक देवनागरी रूपान्तरण।

वंशे सभा समाने सुरगन बिदिते भू सूरस्यावतिर्ना।
राजाभूतकृष्णदेवोनृपति समरसिंहा मिधस्यात्मजातः॥
यस्मिन् राज्याभिषेकं फलयितु मिवतद्भक्तितुष्टोमहेशः।
कैलाशाद् भूगतेद्योप्यधिन सतितरा वैद्यनाथेन नाम्नाः॥
तस्य तनुजः सुकृतिनृपवरौ विश्वनाथ राजा भूत।
विरनारायण राजस्तस्याप्यासीद् सुतस्य॥
नरनारायण राजो नरपति कुल मौलि भूषणम् पुनः।
अर्थिनकल्पद्रूमदूव सुरगन वंसावतंसोत्भूत॥२॥
तस्मादि वैरिकुल सूदन रामचन्द्र नारायणो नरपतिस्तनयो वभूक।
संमोदिता दश दिशो निज कीर्ति चन्द्र ज्योतिस्नेहाभिरार्थ निवहः सुरिवतश्चयेण॥३।।
यद्दानवारि परिवर्द्धित वारि राशि सक्तान्त कीर्ति विमलेन्दु मरिचिकाभिः।
प्रोद्योतिता दशदिशः सतनुज इन्द्रनारायणोस्य कुलभूषण राजराजः॥४॥
तेनच सत्कुल जाता तनया मनबोध शझणिः कृतिनः।
परिणीता बन्धु यत्नैस्त्रिलोचननाद्रि पुत्रीव॥५॥
यस्या प्रतापतरणावुदितेऽपिचिते
चिन्तारजविन्द वनमालभते विकासम
सौहृदय हृदय मकरन्द च उद्येन
तत्रैव यद् गुणगणा मधुपन्ति योगात्॥६॥
यज्ञेवर्देव गणो द्विजाति निवहः सस्तायनत्यादरैः।
दर्दानैपूर्णः मनोरथोऽर्थपरन सन्तितिनिः सज्जना॥७॥
गर्ज्जद वैरि मदान्धवारण चपश्चञ्चःपेतापांकुरौ।
र्वस्याः सर्वदृशेकृतागुण चमेर्मस्याश्च भूमीतने॥८॥
श्री श्री इन्दुमति सतीमतिमती देवी महाराज्ञिका
जाता मैथिल माण्डराऽमिछकुलात् मोधोसरी जानयाः।
दानै कल्पलता मधः कृतवती श्री विष्णु सेवा परा
पातिव्रत्य परायणाच सततं गंगेर सम्पारणी॥९॥
शाकेन्दु नवचन्द्र शैलधरणी संलक्षित फाल्गुने
मासि श्रेष्ठतरे सिताहनि शितेपक्षे द्वितीयायां तिथौ।
भूदेवैर्वर वैदिकेर्म्मठमयं निर्भारय सच्चिनिमिः
तत्रे सेन्दुमति सुरस्य विधित्र प्राण प्रतिष्ठाव्यधात्॥१०॥
सोदरपुर सम्भव राजानुकम्पापजिवनिकृतिनः।
श्री शुभनायस्य कृतिर्मिदं विज्ञेक्षं सन्रन्तताम्॥११॥

मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा
2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६



आब 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आऽ 2. मैथिली अकादमी, पटनाक मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।

ग्राह्य / अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/ क
216.जाऽ/जा
217.आऽ/ आ
218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)
219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो

8. English Translation of Gajendra Thakur's (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

SahasraBarhani:The Comet
translated by Jyoti
We stayed in the village for 18 months and when my father got transferred to Patna then I came to Patna via Pahlejaghat and Mahendrughat. There was a rule of entrance test for admission in the school. Dad made my brother to give test for admission in class seven and he made me to give test for admission in class six and seven. Now I came to know why my father had inspired me to learn maths of class six when I was in class five.
Well, my brother passed the test for class seven and I passed the test for both class six and class seven in District school. There was rule of wearing uniform for students even in the Government school in urban area. We, both brothers went to shop with my father and our school uniforms were prepared –one shirt and one pair of half pants for each of us. On the very first day of school a fight was just to happen as one boy tried to tease us. First he called us ‘dehati’ (people from rural area, not stylist) but that didn’t made us angry because at that age we were considering that word good but now I realise that he had said that with wrong sense. Anyway when he found us unaffected then he started calling us ‘Bengali guys’. That was intolerable. We both were looking like very gentle and quiet so he dared to call us so. I couldn’t bare this insult and ran to fight with him but my brother stopped the fight.
Now that boy started crying and ran to call some senior student. When he came back he was not crying and he told me that I was lucky as the boy he went to call had not come to school that day.
I remained scared for two three days thinking about what would happen if that boy would come with his hero senior. After a few days the boy quarrelled with someone else and his hero friend was present that day. He came to our class and hit my classmate on his stomach. Nobody saved that boy at that time but after those boys left we had decided that nobody will talk to that querulous boy and we would make a complaint against that boy to our class teacher so that he could forward that complaint to the class teacher of that boy. That quarrelsome boy became worried and again showed his crooked attitude. He went to his senior friend and said that everyone was conspiring against him. Then the senior boy came and told every one to stand up but nobody stood up. Then he told me to stand up. I followed his instruction and stood up. He repeated that with three or four more boys and all of them stood up one by one. Then he instructed the entire class to stand up. All followed him. Then that senior boy started threatening us. But our class monitor acted courageously that time. He told him about the naughty behaviour of his friend. He gave my reference and asked him whether I looked like a quarrelsome boy but his friend had teased me too. Then that senior boy was convinced and he warned his little friend not to repeat such mischievous acts.
The school days were passing by so on. Once, a boy whistled to tease the teacher. That boy had escaped to Bombay to be a child actor but returned from there. Some one once asked him why did he returned from Bombay then he replied that people working there were B.A., M.A. so he decided to complete at least matriculation. Now the teacher had left teaching and started investigating about who the culprit was. According to the majority of opinions one side was separated then one bench was pointed now it was to be found out that who was that boy among those six boys sitting on that bench. Then a question was raised that where the sound was came from- right side or left side. At last the teacher’s investigation ended on two boys. Out of those two boys one was that Bombay returned hero whose story of trial to be an artist was favourite time pass in our leisure classes. It couldn’t be confirmed who that culprit was among those two.
The diary was blank after that. Nand had returned that diary to his son and there was nothing to be ashamed of in that diary but Aaruni’s siblings used to tease him for that incident. Therefore Aaruni torn his diary one day out of anger and this autobiography couldn’t be turned as a novel.

The mission of Nand to fix disorganisation was at its leisure. Kids had stayed in the village for 18 months. His salary was stopped for that period. His elder brother helped him to quit the job of field work and find the job of drawing project in an office by influence of a politician. He also instructed Nand to visit office, take care of his children and establish harmony with people around him.
Nand was very obedient to his brother when he came to Patna. He sought one house nearby the Women’s college in which his daughter got admission. For admission of two sons he submitted the required forms for entrance examination with correct information. He invited everyone to Patna. He instructed his nephew to come with all. He also told him to catch the steamer of the Bihar Government at Pahlejaghat. He didn’t like the private steamer of Bachcha Babu because it used to be over crowded and not very scheduled. On the other hand the Government’s steamers were very punctual and they were not accepting excess passengers. That was the reason why there was a crisis of tickets. One more advantage in Government’s steamers over private steamer was that in the Government’s stearmers life of each passenger was to be insured by a Bima company.
His wife and children reached with his nephew. Nand was living isolated life in the Ganga Bridge Colony. He had also prevented his family to associate with neighbours. But every thing was reversed in Patna. There were three neighbours - one retired soldier, one policeman of Bihar Government and one worker of Bihar Legislative Council. Nand had visited three of them with his both sons and introduced himself and his sons. Nand’s children had started going to school. Nand was travelling 5 kilometres on his feet to go to the office and while returning to home he used to do domestic works too like buying green vegetables and other groceries items from the weekly fair on each Thursdays. The fair was held on Sundays too and he used to buy all household things by himself. The only job children had to do was to study. Milkman used to drop packed milk at door. Getting fresh milk was disturbing children’s study as they were supposed to bring it from the house of the milkman. His elder son, who used to destroy neighbours’ garden by snipping flowers or throwing grabbles to other’s windows in the Ganga Bridge colony, was turned much disciplined after staying in the village for 18 months. Nand remembered that he had to go to a neighbour’s house with his elder son and his elder son asked for his apologise to the lady at whom he had thrown grabbles when she was looking out through her window. When Nand returned from office then he came to know about that incident and he immediately made his elder son to say sorry. The younger son had hit a stone to an elder boy while he was riding the bike. Actually that boy had promised to stop after completing one circle but he didn’t stop and continued by saying that he was stopping after completing. He couldn’t convince the younger one to say sorry as in his opinion he had not done anything wrong. Well those incidents happened in the Ganga Bridge Colony. When Nand visited to his neighbours this time his elder son was totally changed but his younger son was like stubborn.
Both sons of Nand were securing first positions in their classes. Life was going quite smoothly at that time. All worries of past days were seemed to be gone. A couple of people from the village were also living in Patna. They used to go for outing on one Sunday each month - either to their villagers or to a zoo. Once they were visiting zoo then Aaruni asked Nand “We have come to the zoo, it is written ‘Botanical Garden’ on the board outside and at the gate it is printed as ‘Biological Garden’.
“In early days, immigrated birds were exhibited in the Sonepur Mela so people starting calling it as a Zoo. The acres of this land have treasured many trees and each tree has its name and botanical description written on it so this garden is also a botanical garden. Later on, it was realised that there are mainly two parts of biology – one is botany and other is zoology. And in this garden apart from trees, birds and animals like lions, tigers etc. are also kept. So people found ‘Biological Garden’ as the most suited name for this place. Old name boards were not removed”, Nand replied.
Once they were in villagers’ house then the topic of discussion was inauguration of the new Bridge on the Ganges. The inauguration had been postponed for last two three years. They asked Nand, “In your opinion when will this be inaugurated? The Chief Minister had said that the bridge would be inaugurated this year only”.
“It will never be inaugurated. I have been hearing this for two three years. When one pillar is completed, because of excess of sand, it stars cracking after some period. Again the pillar is broken and new construction begins”
When that discussion started Nand started thinking of those labourers who fell down from the breaking pillar. Nand was crossed with his colleagues and the contractor of the project. Nand had expressed his disagreement during constructing one pillar and after some time that pillar was cracked. The pillar was tried to be broken during night time and when it was not done then a big tent was hung to cover the crack mark so that no one could see that. That incident was remained as a big issue for a long time. The workers working in that project started respecting Nand a lot after that incident but at the same time Nand had become a villain for contractors and his colleague engineers.
Everything was good in those days. Nand’s sons used to finish learning all maths and science of the new class from January to March. But since Nand was doing all works by himself his children were totally unaware of the world outside. They only knew the path between home and the school. Where ever they were going out they were going with their father so their personalities were developed in different way. Nand was leading a normal life but any discussion about the Ganges Bridge project was enough reason to disturb him. Therefore he started avoiding his friends by and by and at last he neither was visiting any one’s house nor does he has any friend. There was a Japan made transistor of medium wave available in the market in those days. That was the only source of entertainment in Nand’s house. His children used to call it radio then Nand used to clarify that radio was very bigger machine in respect of transistor. When nand had started earning he bought a transistor of the Bush company and took that to the village. The villagers had crowded to hear that. That Japanese radio was consuming battery too fast. The batteries used to be finished till 10th day of a month and those were bought once in a month with the grocery. So that source of entertainment was not working for rest of twenty days of a month. During those days Nand’s sons used to play vivid games. Both boys used to make two goal posts at two ends of the bed. The goal posts were made by joining two plastic toys. Those toys were gifted to them by someone in the Ganga Bridge Colony. They were using combs to kick the balls and the plastic made letters used to be balls. The challenge was to make goal by hitting the ball from opposite goal post in one stroke. The rules of the game were also different. In that way Nand’s sons were creating many new games.
The days were passing by in that way. The outing was minimal. Two incidents happened after that. The first was inauguration of the Ganges Bridge and the other was that Nand’s both sons couldn’t secure first positions in their classes for the first time. After that Nand was somehow upset. However, those two incidents were not inter-related. Since Nand was not justified by the system of the Government and his sons were not got the first positions, Nand was disappointed. Nand’s blind faith in the almighty and omnipresent God was again strengthened. Every incident has its reason and when the reason is not visible then people’s attraction for the invisible God becomes stronger. And Nand used to be very theist from his childhood.
“Is Nand at home?” an elderly man having black teeth because of chewing paan too much, dark complexion and thin body asked after knocking the grill of Nand’s house.
“No, he has not yet returned from the office. He must be coming very soon. Come in please”, Nand’s son told.
“I am coming after some time”, that man replied.
After some time Nand returned in his usual manner of without noticing his surrounding just hopping towards the home. That man came following him. As soon as Nand saw him he greeted- “Oh! Shobha Babu! You’re seen after a long time.”
“You recognised me”, said that man.
In return Nand sat down and started crying, “You crazy man, you are still a mad.” Shobha Babu was pleased at heart to get such respect.
Shobha Babu was from the Kachabi village. He was younger brother of husband of Nand’s eldest sister. Nand’s sister was dead. Daugher of his sister was living with them but she also died after suffering from the deadly pain in stomach. His brother-in-law was used to ride horse to collect taxes. But after death of the daughter of Nand’s sister his relation with his brother-in-law was also weakened without any intention. And suddenly Shobha Babu met him in Patna after 25 years.
“How is my brother-in-law? We told him a lot for re-marriage but he was not convinced.”
“Those old royal days are gone now. With the end of jamindari the status of the family had also diminished. But the habit of leading luxurious life was still existed. How long can one survive by selling lands and properties? People started moving towards towns to earn. We told him that you are the eldest one. You are habituated to live in luxury so you cannot labour. We won’t feet it dignified.”
Shobha Babu stopped speaking by making an excuse of chewing paan. But the fact was that his eyes and throat were unable to hide his grief. After taking a break he restarted,
“After telling this to my brother I left home with some chura and jiggery without asking for his permission. I went to Simariya Ghat and had a bath in the holy river Ganges then crossed the river by a boat and finally reached Patna. I worked in a tea stall for some days. People from our region were not in such a large number in those days and I was also young. I continued my work there for many years. Meanwhile many rumours about me were spread in my village like I was dead or I became a priest etc. Then I started my own tea stall after what I sent a postcard to my family. I have been running my own tea stall near B.N. Collegiate School for last five years. I have also started a paan stall near that”, narrated Shobha Babu.
“Shobha babu! All your teeth are broken.”
“I got addiction of tea while working in tea stall. But that was not a problem. When I started a paan shop then I started chewing cold paan after having a cup of hot tea. This sequence of hot and cold damaged my teeth.”
Both of them started laughing at that.
Again they started chatting. Sister-in-law of Shobha babu died otherwise the relationship between Mehath and Kachabi villages would be warm now. All misfortunes came together. Nand recalled that his niece (daughter of his sister) was playing so nicely. Suddenly his mother told that someone of some family had touched his niece’s stomach and she started feeling strange pain in her stomach just after that. Even if many remedies were tried but that strange pain lead to her mysterious death.
“If your niece was live then relation would be alive too”, said Shobha Babu.
But Nand was lost in some other world. He was thinking about the life of his choice. That family life he was leading at that time, buying groceries, worrying about children’s results, all those things were just a way to obey his elder brother.
The new bridge on the Ganges was inaugurated and his sons had not got first ranks in their classes. His daughter had opted for Science i.e. Biology in Graduation. There was no connection between the inauguration of bridge and degradation of his sons in study but in Nand’s opinion children’s progress or retardation is reflection of their parents’ good or bad deeds respectively. He considered his failure in stopping the corruption in the construction of the bridge and earning to take care of his family to follow his elder brother’s instruction in stead of fighting against the corruption as reasons behind his sons’ degradation.
Meanwhile, children’s uncle and Nand’s elder brother arrived Patna. Nand asked him whether he came through the new bridge or crossed the river by a steamer.
“I came by streamer because I was unaware of the fact that the bridge was opened for public use. I will go through that while returning home as I came to know that many deluxe coaches are available to cross the bridge”, replied Nand’s brother.
“No, don’t go through that bridge. There are many corruptions done to make that bridge. Any time it may collapse.”
The elder brother couldn’t understand what happened to Nand.
“Are you ok? How is your health? Is your problem of asthma in control?” asked the elder brother as both brothers were suffering from asthma.
“No, that is fine. I tried my level best to forget the past, whatever happened during construction of that bridge, according to your order. I have seen many workers falling from the collapsing pillars. Hundreds of workers died. The engineers earned a lot by corruption. Now when the bridge was inaugurated then list of only 17 workers’ names are sculptured on the stone and kept near bridge and the engineers were rewarded. This bridge can fall down anytime. When I tried struggling against the corruption then they retained my salary. Every time I got transferred my salary is retained and I have to leave my family. Following your instruction I accepted this transfer. I tried to forget everything, the falling bodies of workers into water, crying families of those workers. I was having nightmares of such incidents. And now degradation in the results of my three children; they used to get the first positions but now condition is changed. This is result of my own deed. I shouldn’t have left my struggle without completion”, said Nand.
“Are you mad? People who had done corruption they will have to pay one day. You did your duty at your utmost. Who doesn’t take care of his family? Neglecting own children because of other’s fault is not wise. What is fault of your children?” said Nand’s brother.
Again both started talking about the village. Nand used to be lost in some other thoughts while conversation. The elder brother understood that the storm in Nand’s brain was not going to stop. He kept on consoling Nand. But he had known Nand from his childhood. He knew that Nand is very stubborn. So he was scared. He was not talking to Nand’s wife directly but he told her that everything was dependent on her.
Nand went to drop his elder brother to the steamer at Mahendrughat because he couldn’t trust his brother. He suspected that his brother could go through the bridge without telling him and the bridge might collapse anytime.
After that Nand started learing astrology. He and his children started wearing variety of stones in rings. One day, he bouth Hanumaan chalisa for every one at home. He kept five to ten books extra in stock and started giving to visitors. During that time Nand met a fake tantrik. He caught Nand’s psychology so nicely that Nand accepted him as a prophet. That priest had all solutions to Nand’s problems- like how to punish the corrupted people, how to improve children’s result and many more. The basis of solution was mantra and tantra on which Nand never had disbelief.
That priest started asking for money for doing all needful rituals. That priest told Nand that the goddess told him in his dreams that everything would be fine in next month. He taught him some yoga postures and Nand started following his instructions like a student followed his teacher’s instructions. Nand tried that for the entire month but nothing happened. In that way a year passed. Meanwhile that priest had some financial problem and Nand had to bear his personal expenses too. That priest’s children also started tantra. Once a child said, ‘the Goddess is under the bed’ and Nand started looking underneath the bed to find the Goddess. Again the priest gave proposal of marriages of his son and his daughter with Nand’s nephew and Nand’s son. Nand was fed up of his diverted behaviour till then. Nand was happy to be associated with him but he never liked his children to be associated in that circumstances. At the same time when Nand’s villagers came to know about that then Nand’s nephew and Nand’s elder brother quarrelled with the priest and the priest had accepted the fact that he was not a real tantric. He promised to return the money he took from Nand but he never returned that.
That incident was a bid shock for Nand. He was passing by the priest’s house but he was not talking to him and the priest was also not taking any initiative. Nand’s daughter got married and again Nand started leading a lonely aimless life.

(continued)



महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com
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महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।


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आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

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आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन


अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८
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