१. शिवशंकर श्रीनिवास २ .विकास झा रंजन ३. जगदीश प्रसाद मण्डल ४. मुन्नाजी हाइकू ५. रामबिलास साहू- टनका
१
शिवशंकर श्रीनिवास
दूटा गीत
१
रोटी भातक नै छै पत्ता
अगबे हर-हर गीत।
इमान मुखौटा लगा बहादुर
लऽ रहल छै जीत॥
औ जी बुद्धिक छै बलिहारी।
कहै छै दूध , मुदा छै ताड़ी॥
जतहि हथौरब कतहु किछु नै
अगबे चाले-चाल।
छुच्छ हाथमे कतहु किछु नै
जिनगी भेल बेहाल॥
पेपर लिखै बम- वम वम
टीबी नाचै छम छम छम
औजी अद्भुत छै अपियारी।
कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥
करौछ छिपाओल गरम पानिमे
कऽ रहल छै छनाक-छनाक
हूले- ले ले , हूले- ले ले
भऽ रहल छै दनाक-दनाक
औजी अद्भुत छै बुधियारी।
कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥
२
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ॥
कनियाँ औती बच्चा आओत
जागत गामक प्राण॥
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ।
नव ज्योति जे छिटकि रहल अछि
ओकरा आनू खेत
नदी पानि जे छै बौआयल
ओकरो मोरू रेत
महमह चास वासमे
प्रातीक सूनब टान।
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ॥
अहाँ बिना ई गाम उदास
कानै रन्ना माय
दूध भात के अङना खेतै
कनने चन्ना जाय।
अहाँ आयब तऽ ठुमकत आङन
हँसता मामा चान
आउ श्रमिक जन आउ
अपन गाम घुरि आउ
सुकरातीक आङनमे
अरिपन फेर लिखेतै।
आँचर तर हे दीप
नेह दुलारल जेतै॥
वासमती आ जलबा गमकत
लौकत मड़ुआ धान।
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ॥
२
विकास झा रंजन गजल
हमर घरक भीत लाईग छोट सन बाट
बाटक ध कगनी हुनक ताकि हम बाट
चान सुरुज देखि देखि घोर भेल नैना
जिनगीक चान आई उगती ई बाट
हसोथब कोना हुनक रूपक इजोत के
टहाटही अभरत आई इजोर ई बाट
हमरे सन हुनको भेल हेतैन धकमकी
देखि देखि इ सब मुसुकी देत ई बाट
हुनके गछेर हम कह्बैन निजगुत
जरे जरे काटब जिनगीक ई बाट
३
जगदीश प्रसाद मण्डलजगदीश प्रसाद मण्डल
कविता-
सान-धार-धारा
अबैत जखन मनुखमे सान
शानसँ चलए लगैत।
एक दोसरमे सान चढ़ा
परिवारक शान बनबए लगैत।
चढ़िते सान परिवारमे
बर्खा-बून बनि धरियाए लगैत
धरिआइत-धरिआइत धरिआ ,
धारा बनि धड़धड़ाइत चलैत।
अपन-अपन माटिक रसे
अपन-अपन सभ धार सजबैत ,
संग मिलि चालि-चलैत
नीक-अधला रहए बनैत-बिगड़ैत।
जइ बर्खाक जेहन बून
तेहन से बनबैत धार
धार मिलि धरा धार
अपना गतिये बदलैत धार।
जे धारा सृजए गंगा
कमला कोसी ओ महानन्दा
ओ धार कहिया धरि ठमकि
मानैत रहत फंदा ?
४.
मुन्नाजी हाइकू
१
पजेबा काँच
ठीकाक मकान
भसैक गेल
२
पीड़ित नारी
प्रमोशन रुकै नै
तेँ मुँह बन्न
३
नोकरी नीक
भीतरमे गञ्जन
एयर होस्ट
४
हाक सूनल
मारि खेबाक डरे
नै बचौलक
५
भोगने बिना
जीवनक दर्शन
सत्यसँ दूर
६
अग्नि पीढ़ीमे
होहल्ला भेल बेसी
काजमे शून्य
७
मैथिली मध्य
ओलि वसूलीकेँ
समीक्षा बुझू
८
जाति पातिक
भेदभाव घटल
समरसता
९
इलाज भेल
हास परिहाससँ
एक माध्यम
१०
आब अछि नै
जीवनक विक्षोभ
कमौआ लेल
५
रामबिलास साहू किछु टनका
30. पान मखान
िमथिलाक सम्मान
धानक खान
जनकपुर धाम
िमथिलाकेँ प्रणाम।
31. पढ़ैत सुग्गा
कहैत राम नाम
िपंजड़ा बन्द
रहैत छै गुलाम
अछि संत समान।
32. सँाच बजैत
जग मारल जाय
झूठ बजै तँ
जगत पतियाय
नै छोरू सँाच बानि।
33. नीमक गाछि
सुतल रही खाट
सपनैति छी
चलितो पछताति
नदी तटक बाट।
34. दु:खक बात
नै कहियो ककरो
सुनि हसँत
हानि करत मान
नै िमलत सम्मान।
35. जीवन दैत
जल जीव जन्तुकेँ
शीतल चँाद
चँादनी िछटकैत
शोभा छै धरतीकेँ।
36. आमक डारि
झूला झूलैत राधा
कृष्ण पुकारै
संगे-संग झूलव
वृन्दावनक झूला।
37. पानक पात
मखानक प्रसाद
स्वर्गक बास
नदी तटक चास
नै होएत विश्वास।
38. मायक गोद
धरतीकेँ बिछौना
फूलक सेज
सुख पाबै बेजोर
नै िमलै परलोक।
39. बँासक वंशी
स्वर बजै मधुर
माया पसारै
स्वर छै अनमोल
सुनै सभ विभोर।
40. कारी काजर
मुखड़ा िबगारैत
कारी कोइली
मधुर गीत गबै
सभकेँ ललचाबै।
41. चँादनी राति
कहै मनक बात
प्यासल प्रेमी
प्यास बुझाबै राति
दिलसँ करै बात।
42. देव धर्मसँ
उपर माय-बाप
तीर्थक खान
धरती माता अछि
हिन्दुस्तान महान्।
43. मान घटै जँ
िनत्य जाय सासुर
मान बढ़ै जँ
करै अतिथि सेवा
सेवासँ िमलै मेवा।
44. कालक मुँह
खुलल छै िवशाल
क्रमश: सभ
समाय बचै नहि
कोय एहि चक्रसँ।
45. चमेली फूल
गमकै िदन-राति
गजरा बनि
देवौकेँ नहि चढ़ै
नारी सजाबै केश।
46. कमल फूल
िबराजै लक्ष्मीजी
सुख शान्ति दै
अन्न , धनसँ भरै
सभक छै कल्याण।
47. सावन मास
जलक बुन्न पड़ै
आसमानसँ
बेंगक बाजा बजै
खन्ता डबरा भरै।
48. पानिक बुनन
मोतीसँ महग छै
मोतीसँ नहि
िमटै भूखक रोग
पानि िजनगी दैत।
49. मैथिली भाषा
मौध सन मधुर
जे नहि पढ़ै
वो बाजितौ लजाय
पावै पढ़िते मान।
50. मौध मखान
रेहू माछक खान
पानसँ मान
पाग सँ बढ़ै शान
िमथिलाकेँ िनशान
. अन्जनी कुमार वर्मा २. विनीत उत्पल १
अन्जनी कुमार वर्मा
१
ओजक भोज
,,,,,,,,,,,,,,,
इ आत्मीयता थिक मृगमरीचिका
जाहि पाछु आम लोक सदृश
स्थिति कें खुआ रहल छी ओजक भोज
झाँपल हाड़ भ गेल बहार
वसन तर सं द रहल अछि देखार
इ कर्तव्यक द्वार ,केयो नै पाबैछ पार
गलब अछि सहज मुदा
स्वर्ण बनब कठिन
इ सम्बन्ध अछि अनंत
इ आत्मीयता अभिन्न ....
२
दुई गोट भूख
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
खसि गेलैक -ए आँखिक पानि
आब लोक चौबटिया पर बेच दैछ
अप्पन अस्तित्व ,
खोलि दैछ नीबी -बंध
कियैक त s पेटक होम कुंड म s
देबय परैछ आहुति ...
बढ्ले जा रहल अछि दिनानुदिन
अनंत दिशा में वासना केर भूख
वासनाक भूखल किनी लेछ
रोटीक लेल छटपटाइत लोकक अस्तित्व
लोक में आब कोन वृत्ति आबि गेल अछि
दानवी , पाशविक आ की कोनो तेसर ......
एकर वर्गीकरण करब अछि असंभव
दुव s भुखक सम्बन्ध भ s गेल अछि
अन्योन्याश्रय .....
३
समस्या
,,,,,,,,,,
आबक लोक की करत बसंतक अनुभव
की सुनत कोइलीक गीत
की घुमत पुष्प वाटिका में ,
कपार पर राखल करिया पाग कए
उघैत - उघैत बनल रहैछ बताह
नहि पाबि सकैछ थाह
नहि सुति सकैछ सुख सं
नहि बाजि सकैछ दुःख सं
गोंताह पानि में डूबल रहैछ कंठ धरि
छटपटाइत रहैछ , बऊआयत रहैछ मन
सपनहूँ में देखैछ सदिखन दुःख धंधा
घेंट में लागल फंदा ,
नहि रौदक चिंता अछि ,नहि पानिक
मात्र चिंता अछि सबकें अप्पन पेटक
फंदा लागल घेंटक ....
३
विनीत उत्पल तात -तात औ तात , सभ दिश अछि भ्रष्टाचार देखै छी
के राजा के रंक , सभक यैह अछि शिष्टाचार देखै छी
घूस दियो , घूस लियो , घूस पिबू ,घूस खाइ जाउ यौ
घूस अछि हमर ब्रहम , ई अछि सदाचार देखै छी
घूसं ब्रह्मा , घूसं विष्णु , घूसं देव महेश्वरः सुनै छी
घूसं जीवन आ मरणं , इत्तेक छी हम लाचार देखै छी
हाय पैसा , हाय पैसा , सभ किछु अछि पैसे -पैसा किए ई
धर्म करू , कर्म करू , छोडू ई सभटा दुराचार देखै छी
आजुक कालमे व्याकुल उत्पल कहि रहल अछि
नीक काज नै करब , नाम पर होयत मूत्राचार . देखै छी
१. डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा" १.
मिथिलाक माटि सँ दूर एतए ,
यौ अहाँ पुछै छी केहेन लगैए ।
त्वरित वेग , पर एकरस जिनगी ,
पुरिबा – पछिबा बुझि ने पड़ैए ।।
की बसन्त – बरसात – घाम ,
सभ एक्कहि रंग मधुमास लगैए ।
की आयल , की गेल , से नञि कहि ,
शरद – शिशिर – हेमन्त बितैए ।।
सौ - सौ उर्वशि - रति - मेनका ,
आँखिक सोझाँ सदा रहैए ।
रुचिर प्रकृति - मनोहर - सुन्नर ,
नन्दन - वन सन रोज हँसैए ।।
मुदा तदपि नञि जानि एतऽ किए ,
हमर मोन , मिसियो ने लगैए ।
ओ मिथिला – भू याद आबैतछि ,
मिथिला – भाषा कहाँ भेटैए ??
जे देखल , से कहि ने सकै छी ।
बिनु कहने , चुप रहि ने सकै छी ।
की पूणे नगरी छी रे भैय्या ,
दूरहि देखि कऽ कहि ने सकै छी ।
जे देखल , से कहि ने सकै छी ।।
देव मानि , आदर्श बुझै छी ।
जकरा हम सब नित्य पुजै छी ।
इन्द्रक कृत्य कतोक देवमय ,
निज जीनगी अनुसरि ने सकै छी ।
जे देखल , से कहि ने सकै छी ।।
भोरक सूर्य - शान्त ओ सुन्नर ।
दूरहि , चान - तरेगन सुन्नर ।
लऽग सँ कक्कर दृश्य केहेन की ,
कोना कहू , किछु कहि ने सकै छी ।
जे देखल , से कहि ने सकै छी ।।
पूणे - नगरी , विद्या केर नगरी ।
बहुत पैघ बान्हल तेँ पगरी ।
नहि फूसि एकहु आखर एहि मे ,
ओहो विद्या , जे ने वरणि सकै छी ।
जे देखल , से कहि ने सकै छी ।।
हे चान ! अहाँ धन्य छी ।
हमर मृत्यु पर प्रशन्न छी ।
अहँक हृदयहीनता सँ , हऽम अवसन्न छी ।
हे चान ! अहाँ धन्य छी ।।
जिनगी भरि रटलहुँ हम , अऽहीं केर नाम ।
मनमे अऽहींक छवि , बसल अभिराम ।
की हम कहू , अहाँ पाथर अनमन्न छी ।
हे चान ! अहाँ धन्य छी ।।
अहीं हमर इच्छा , अहीं हमर काम ।
अहीं हमर काया , अहीं हमर प्राण ।
हम तऽ अहाँक , छद्म रूप देखि सन्न छी ।
हे चान ! अहाँ धन्य छी ।।
अहीं केर वियोगेँ , हम त्यागै छी प्राण ।
अहँक ठोर निष्ठुर , छिड़ियाबै मुस्कान ।
सोचि रहल छी , अपनेँ पाथर प्रणम्य छी ।
हे चान ! अहाँ धन्य छी ।।
अहाँ सपनहि मे आबै छी , आयल करू ।
मोन सपनहि मे क्षणिकहु , जुड़ायल करू ।।
हम चाही ने आओर किछु , अहँ सँ प्रिय ।
अहँ बनि कऽ गुलाब , मुस्किआयल करू ।।
पाबि सकलहुँ ने अहँ केँ जदपि हम प्रिय ।
अहँ ओहिना , कौमुदि केँ लजायल करू ।।
अहँ दूरहि रही , अहाँ अनकहि सही ।
दीप प्रेमक हमेशा , जड़ायल करू ।।
प्रेम प्रेमहि रहत , ओ मेटा ने सकत ।
अहँ चाही तऽ सपनहु ने आयल करू ।।
प्रेम मोनक मिलन , नहि कामक सदन ।
अहँ जाहि ठाँ छी ,ओहि ठाँ फुलायल करू ।।
२. नवीन कुमार "आशा" दफ्तर
दफ्तरक सब के खसता हाल जखन पहुँचब बुझु हएब हलाल .
दफ्तरक चक्कर बड खराब ,ओतय ने अछि कोनो जवाब ..
जँ अहा छी बड जल्दीमे ,स्वागत करियौनि नकदी सँ ..
ओतय चलए सब तरहक रेट ,सब कियो लै छथि अलग सँ भेट ..
बरका होथि वा छोटका सभकेँ दियौन टटका
जँ करबनि सिनाजोरि
हेत काज मे देरी ...
देख ओतुक्का नजारा
चढल हमरा पारा ,
बुझितय ओकर इलाज
पर हमरो तँय छल काज ..
मोनमे आएल सबक सिखाबि ,फेर आएल याद .
जँ हिनका सब सँ करब सिनाजोरि
तँ होयत काजमे देरी
कि करतै बेचारा आशा नै छलै आर कोनो आस .
.जेबीसँ निकाललक टाका आ करा देलक ओ निर्गत ...
कनिको ने सोचलक ओ जँ ऐकरा देब बढावा
तखन तँ चढबै पड़त चढावा ..
दफ्तरक ई हाल
१. रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार ’ २. नवीन ठाकुर
१
रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार ’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार ’क गीत आ झारु।
झारू
भािग गेला अंग्रेज अकेला।
छोरि कऽ पाछू ढेरो जाित॥
कर रंगदारी वसुल रहल अछि।
मारि मारि कऽ सभकेँ लाति॥
गीत (1)
लोभी लालची कामी क्रोधी।
भूमि भरल दूर-दूर हौ॥
बाजह हौ काका केना कऽ हेतह।
देशक गरीबी दूर हौ॥......2
हाथ कड़ोरो काम जे कैरतै।
सोनसँ खजाना भैरतै॥
घर बैसल घरघुसरा बैनि कऽ।
कला कौशल मजदूर हौ॥ बा....
व्यर्थ बैसल मानव संसाधन।
हाथ पैर मेंहदी आँखिमे आजन॥
भरि दिन चौकपर तास खेलै छै।
और मचबै छै हुर हौ॥ बा....
सी.ओ , बी.डी.ओ , सरपँच मुखिया।
धरतीपर सभसँ ई दुखिया॥
फँड कोना सभ हम्मर हेतै।
हरदम भाजै भूर हौ॥ बा....
शान्ति सभकेँ दँात काटै छै।
एक दोसर लऽ दुख बाँटै छै॥
अपने भायकेँ लहु चाटै छै।
बनि कऽ महिषासूर हौ॥ बा....
काम-क्रोध और लोभ भरल छै।
आगि अज्ञानमे सभ जड़ल छै॥
आम जानि कऽ सभ रोपै छै।
गजड़ा काँट बबुर हौ।। बा....
सूस्त परल छै राजक कर्मी।
सेवामे बर्तै छै नर्मी॥
सत् कर्मकेँ सभकोई छोड़ि कऽ
सुखसँ भेलै दूर हौ।। बा....
राजकोषपर नजर गरल छै।
हथियाबक लोभ भरल छै।।
हम्मर की कर्तव्य बनै छै।
ज्ञान हिनकासँ दूर हौ॥ बा....
जाति धरम मानवता भेदी।
लोग बनल सभ अही केर कैदी॥
धरम आगिमे जड़ि ई जनता।
बनि गेल छह सभ क्रुड़ हौ।। बा....
धरम इमानसँ लोग छै वंचित।
काम क्रोध और लोभ छै संचित।।
निष्ठा नीति मानवताकेँ।
जड़ा तापल केर घुर हौ।। बा....
अन्धविश्वास छै सभकेँ धरने।
कुरितीसँ घर छै भरने।।
अज्ञानक अग्निमे जड़लै।
सबहक करम कपुर हौ।। बा....
वोटक खाितर आजुक नेता।
मारै छै चानी केर जूता॥
कुछ पापी तँ वोट बेच कऽ।
खाधि खसल छै जरूर हौ।। बा....
गप्पे-गप्पमे लफड़ा बढ़लै।
शाशक सिरपर टेन्शन चढ़लै।।
अलुल-जलुलसँ लड़ि ई शाषक।
भेलह चकना चूर हौ।। बा....
मुँह देखैल पंचैती होई छै।
घूस पंच भगवानो खाइ छै।।
आब ककड़ापर आश करतै।
गामक लोग मजबूर हौ।। बा....
ज्ञानले नै कोइ स्कूल जाइ छै।
नौकड़ी कऽ ई जड़ि देखाइ छै।।
शिक्षामे सभ कोई खोजै छै।
पाइ अड़जि कऽ लुरि हौ॥ बा....
२
नवीन ठाकुर , गाम - लोहा (मधुबनी ) बिहार , जन्म - १५ -०५ -१९८४ , सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ ), रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. )१
गीत --
किए जिनगीक आशा अहाँ सँ केलहुं / ........................(मुखरा )
अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ //
किए जिनगीक ................................//
मोनक बाते मोने रहि गेल , ..............................(अंतरा )
उपजल जे ललसा कोना मरि गेल //
कंठ अधीर भऽ सुखाएल जाइए ,
अपन अधरक जाम सँ वंचित केलहुँ /
किए जिनगीक ...............................//
जनलहुँ ने दोख जे हमरा सँ भेल ,
प्रेमकेँ जं दोख बुझी हमरा सँ भेल //
प्रेमक परिभाषा बुझलिऐ ने कहियो ~
धनक बेगरता अहाँ प्रेममे सिखलहुँ /
किए जिनगीक ..................................//
बैसिते फुलवारीमे याद पड़ि गेल
टिशक दू संझा सँ आँखि भरि गेल //
प्राणक बिना कोनो जिनगी भेलैए ~
अहाँ देहकेँ बिसरि हमर प्राण लऽ गेलहुँ /
किए जिनगीक ..................................//
अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ //
किए जिनगीक ..................................////
२
मिथिला दर्पण १
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखू क्लेश ! !
ने बिसरू संस्कृति ने बदलू व्यवहार
मैथिल के देखिते नै बनू अनचिन्हार
संगठन बिन एकताक ने पूर्ण हएत उद्देश्य !
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतति छी जुनि राखू क्लेश !!
अपना धरोहरकेँ कए बुझैत छी बेकार
दोसराक उत्सवमे जा पुरैत छी हकार
धियो - पुता केँ उनटा - सीधा दैत छी उपदेश
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !
धर्म केर ई भूमि अछि मिथिला महान हमर
बुद्ध , जानकी , महावीर क धाम छी गाम हमर
सहेजू पुलकित भऽ एहन दुर्लभ सन्देश
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !
ने छी कम किनको सँ , छी ने किछुमे पाछू
भ्रान्ति जे मोनक अछि तकरा मेटाबू
अपने दहीकेँ खट्टा कहि , करैत छी खुदसँ द्वेश
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !
छी नै अनभिज्ञ अहाँ मिथिलाक इतिहास सँ
बुझितो जे मुहं फेरै छी अपना विकाश सँ
मिथिलाक उत्थान हेतु बन परत मिथिलेश
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !
३
मिथिला दर्पण २
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर !
पटुवा ,बथुवा और खेसारी साग बड छल अनमोल
बारीक़ कोबी आर कदीमा छोटका बरका ओल !
मति मारलक जे हमरा लागल बारीक़ पटुवा तीत
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !
भोजक दिनमे भोरे सँ भरि दिन मचबैत छलहुँ हल्ला
कियो कहैत सकरौरी छै कियो कहैत छल रसगुल्ला
देखिते चुरा - दही पात पर , मुहं सँ छुबैत छल नीर
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !
आमक महिना गाछी बिरछी बाध -बोन बौएतौं
कृष्णभोग , बम्बैया ,मालदह चोभा मारि कऽ खैतों
किछुओ जे छुबतौं हमर आमकेँ होइतौं हम अधीर
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !
छैठ , दिवाली , दुर्गा पूजा , भरदुतिया सन नै पाबैन
जे कियो नै बुझला मिथिला दर्पण हुनका के बुझाबैन
आस्था मिथिलाक प्रेममे बंधने अछि हमरा जंजीर
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !
विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१. ज्योति सुनीत चौधरी २. श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४. इरा मल्लिक ५. राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ६. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु / मिथिलाक जिनगी ) १ .
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार , मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे , लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस् ’ प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि।
२. श्वेता झा (सिंगापुर)
३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी , सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।
४ .इरा मल्लिक
५
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला ( https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )
६.
उमेश मण्डल
मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )
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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा): लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
बालानां कृते
(बालगीत)
हम फूल बनब , हम काँट बनब ।
कोमलतम् , टाँट सँ टाँट बनब ।।
नहि ककरहु हम , अधिकार हरब ।
नहि ककरहु हम पथविघ्न बनब ।
पर अपन प्रगति - पथ - रोड़ा लेऽ
हम लोहक दण्ड समाठ बनब ।।
पानिक संग बनि कऽ माछ रहब ।
शत्रु लेऽ विषधर साँप बनब ।
सज्जन लेऽ शिव अभिराम सही ,
दुर्जन लेऽ हर विकराल बनब ।।
मिथिला केर पारावार हमर ।
मिथिला भाषा अधिकार हमर ।
अछि तुच्छ एतए , संसार सगर ।
मिथिला भाषा सभसँ मीठगर ।
आँखि उठाओत जे एकरा दिशि ,
तकरा लेऽ चूल्हिक आँच बनब ।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१ . प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही , आ ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि , करक मध्यमे सरस्वती , करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा , दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम , कुमारस्वामी , हनूमान् , गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि , हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा , यमुना , गोदावरी , सरस्वती , नर्मदा , सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या , द्रौपदी , सीता , तारा आऽ मण्दोदरी , एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि , हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा , बलि , व्यास , हनूमान् , विभीषण , कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र ( शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२ , मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि , आ ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली , बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ –बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण , हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला , राजन्य-वीर ,तीरंदाज , दूध दए बाली गाय , दौगय बला जन्तु , उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि , फल देय बला गाछ पाकए , हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
8. VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH
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