१.
शिवनाथ यादव आ अर्चना कुमारी २.
हेम नारायण साहु ३.
शिव कुमार यादव
१
शिवनाथ यादव आ अर्चना कुमारी
इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया,
हकन कनै छै गामक दुखिया, सबटा खा गेलै मुखिया।
इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥
गरीब सभकेँ बुझै छै कुमहरक बतिया,
सुनिते सिखाय दै छै जनताकेँ लतिया,
घरसँ बेऽघर भेलै दुखिया,
सभटा खा गेलै मुखिया।
इन्दिरा आवासक रुपया
सभटा खा गेलय मुखिया॥
हयौ जनता कतऽ जा करत अपन फरियाद यौ,
किरानी चपरासी अफसर एके दियाद यौ,
सबहक जालमे ओझरा गेलै दुखिया
सभटा खा गेलै मुखिया।
इन्दिरा आवासक रुपया
सभटा खा गेलै मुखिया॥
बी.डी.ओ. विधायक डी.एम., सी.एम.
लऽ गेलै,
मुखियाकेँ मोछ कनिको नै टेढ़ भेलै,
दौड़धुपमे बिलटि गेलै दुखिया,
सभटा खा गेलै मुखिया,
इन्दिरा आवासक रुपया
सभटा खा गेलै मुखिया॥
२
हेम नारायण साहु
कविता
जोन-बोनिहार
हमर
कमाइपर सभ राज करैए
हमरे
मिलि सभ शोषण करैए।
अपनामे
सभ एक बनल-ए
दबलाहा
सभकेँ बैरजना बनबैए।
जोन-हरबाह
बना खटबैए
खटबैत-खटबैत
पसिना चुबाबैए।
उचित
बोनि जँ मांगए जाइ छी
बिनु
पौने आपस होइ छी।
भऽ
जाइ छै अनभुआर जकाँ
दौगैए
पगलाएल कुकुड़ जकाँ।
की
दबल छी, दबाएले
रहब
कतेक
दिन एना सहैत रहब?
धोबिया
पाट जकाँ पिटाइत रहब
चक्कीक
गहुम जकाँ पिसाइत रहब?
ऐ
सबहक किएक ने मोन बदलैए
दलित-गरीब
दिस ने कियो तकैए।
हवाक
रुखि आब बदलि रहल अछि
दलित-पिड़ित
सभ जागि रहल अछि।
सबहक
बेटा-बेटी पढ़ि रहल अछि
ज्ञानक
दिया जराए रहल अछि।
पलटी
भऽ जाएत शोषणक चक्का
मारत
मिलि सभ चौका-छक्का।
३
शिव कुमार यादव
मिथिला गीत
एक माटिमे जनमल हमसब
एक पानिसँ पलल-बढ़ल
अखनो धरि अछि पसरल यौ
माँ
मिथिलेक सर-समाज
यौ भलमानुष सुनु-सुनु -2
तै मिथिलाकेँ बिसरि कोना जेबए
छै 'मैथिल'क ई निहोरा
यौ भलमानुष सुनु-सुनु- 2
अंतरा:-
1. एहि मिथिलामेऽऽऽ
एहि मिथिला मे जनम लेलनि मंडन, अयाची, विद्यापति
एहि मिथिलामे रहैत छलथि लोरिक, सलहेस, वाचस्पति
सभ केओ संदेस दऽ गेलथि, सभ केओ कत्तर्व्य
निबाहि गेलथि
ताहि कत्तर्व्यकेँ निबाहि, ताहि संदेस पर
चलु-चलु
यौ भलमानुष सुनु-सुन----2
2. एहि मिथिला मे ऽऽऽ
एहि मिथिला मे गीत सुनाबै कोशी-कमला आ बलान
एहि मिथिला मे धार बहैए गंगा-जमुना आ गंडक
नित-दिन धारक पानि चलैछ, नवरंगक नव बिचार लबैछ
ककरो सँ नहि पानि डरैए, अप्पन बाट बनाबी-बनाबी
यौ भलमानुष सुनु-सुनु---2
माँ मिथिले-------4
3. एहि मिथिला मेऽऽऽ
एहि मिथिला मे नै कोनो कमी अछि परब-तीहार आ सनेसक
एहि मिथिला मे अछि पसरल कुटुम-सम्बंधी-अपनैती
लोक समाज मे रहैत अछि हिलि-मिलि सभ केओ काज करैछ
माँ मिथिले केँ आजाद करू, अनकर बाट कि
जोहैत-जोहैत
यौ भलमानुष सुनु-सुनु---2
शिकुया "मैथिल"
१.
अनिल मल्लिक २.
अंशु माला पाण्डेय ३.
शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४.
आशुतोष मिश्र
१
अनिल मल्लिक
गजल
अहाँ मुसुकीसँ चान’क ईजोर भ’गेलै
राति छलैहे लगलै जेना भोर भ’गेलै
हम
अयलौं जखन अहाँ भन्सामे छलौं
मोनक इक्षा त’ तपैत इन्होर भ’गेलै
राति निसबद छलै हमहुँ चुप्पे छलौं
अहाँक हँसी त’ पानिमे हिलोर ल’एलै
घोघ कमाल केलकै हम सोचिते छलौं
श्याम रँग छलै कोना आब गोर भ’गेलै
हम बजलौं कहाँ लोक बुझलक कोना
बौआ एतै चर्चा कोना बड्ड जोर भ’गेलै
हमर हाल अहाँसँ कहि सकलौं कहाँ
कोमल ह्रदय ई कोना कठोर भ’गेलै
दू मासक ई छुट्टी बितलै कत्तेक जल्दी
फेरो बिरहा आँखिमे देखू नोर ल’एलै ll
(सरल वर्ण१५)
2
अंशु माला पाण्डेय
मिथिला महान
तरुआ तिलकोर तरल,
खीर छल मखान,
शीतल जल, मन भरल
मुख
सोहे पान।
चनमो गगनमा,
करै गुणगान
मैथिल छी, मान अछि
मिथिला महान।।
३
शान्तिलक्ष्मी चौधरी
जर-जाजन
भरिघर हुलिमालि-हुलास छै
ईह, की पिहकारी, हास छै
जमाय सुहासिनक जुमरट
सारि-सरहोजिक
रास छै
आँखिक चलै सतखेल
दायकेँ फुटै परास छै
जुमटल कुमार-वारक
हिनके अखिहास छै
ककरो मचै प्रणय-उधम
ककरो प्रेमक उपास छै
परदेसी पी केँ प्राण कटै
प्रीतक टाटट निसास छै
कुटुम-अतिथी सत्कारमे
सभकियो दासम-दास छै
अँगनाक तँ छोरू पिहानी
दूआरो तेहने उलास छै
किओ चितंग अखरे चौकी
कतौ मसलंगक विलास छै
किओ टाँग उठौने टिटही
अगरल अँगनीक घास छै
किओ धरै बहिनियारैक छौरीकेँ
समधिकेँ समधीनक पिआस छै
जीवह पपूकका सनक रसिक
की गप्प, गप्पठंग, गपास
छै
छोटका चौकी दs पानि भरल
सेवामे तत्पर खबास छै
जनौसँ पीठ कुरियावैत कुटुमक
बस जल्दीसँ आबैक आस छै
नहायकेँ समधि मंत्र जापय
माथ मे पड़ल तेल-फुलास छै
लागल छप्पन-भोग आसन
परसल समधिक परिहास छै
हौ लियौ, और लियौ
...मर्र एतै टा लहास छै
छल्हिघर-दहि, गुदगर-रसगुल्ला
आह, की खुआक सुवास छै
अन्नक छै निसाँ चढ़ल
बहैत लेरोक की हवास छै
माँछी नै दै कsल लेबै
तैयौ नाक बाजेत खरास छै
किनको तलक पान-सुपारिक
किनको खैनिक तलास छै
किनको खुब चलैल कलक
ठंढ पानिक तरास छै
मनोरंजनक समा बान्हल
तीन ठाम पसरल तास छै
रंग-डबल, गुलाम-पीयर
पटक पर उठैत होहास छै
टोले टोल बिजहो भेलय
भरिगाँ भोजक हुलास छै
कहुना मैया पार लगेथिन
मनमे इयह अभिलास छै
बाबा छथिन पतियाल धेनय
मन कनै आँहुर-उदास छै
जँ भेलय कनियो चौपट
सभ खरचक सत्यानास छै
ब्राह्मण-रैजपुत-सोल्हकन खेलकै
आब स्त्रीगणक झौंकास छै
तखन बचतै करवारीक-घरवै
चलु जल्दीये भेटल उगरास छै
किओ कहै जगकेँ थै-थै
कतहुँ चुटकी-उपहास छै
सर-समाजक काजे कून
तैमे मिथिला किछ खास छै
४
आशुतोष मिश्र
अहाँ किए
अखन एना छी
अखन अहाँ बहुत नेन्ना छी
माए बापकेँ अहाँ सपना
नीक रहब अहाँसँ परिकल्प्ना
मोती सँ हम शब्द लिखी
अहाँ ओ हमर पन्ना छी
अहाँ किए अखन एना छी
अखन अहाँ बहुत नेन्ना छी
विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला
स्लाइड शो
चित्रमय
मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )
उमेश मण्डल
मिथिलाक वनस्पति
स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु
स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी
स्लाइड शो
मिथिलाक
वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/
)
विदेह
नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल
हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली
अनुवाद
३.कनकमणि
दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र
प्रेमर्षि)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग-
हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद
विनीत उत्पल)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग
दोसर परिच्छेद
ऋष्यश्रृङ्क जन्मक वृतान्त
महाकाव्य, पुराण
आ दोसर पुरना ग्रंथक निर्मल जलमे प्रक्षेपक शैवाल जाल कम नै अछि। प्रक्षेपमे
संकलित पुराकथाक तात्विक नीर क्षीर विवेचन निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि।
महाभारतक वनपर्वक 110 केर ई वृतांत विश्वसनीय भऽ सकैत अछि जे
महर्षि विभाण्डक मृगिसँ संभोग केने छल। कतेक परवर्ती ऋषिकेँ लऽ कऽ एहेन चर्चा अछि।
ऋषि दम सेहो मृगिक संग संभोग केने छल। मृगवेशमे अप्पन कनियाक संग रतिक्रीड़ा करैत
एकटा ऋषि पांडुक द्वारा वध कऽ देल गेल छल, आदि। (आदि पर्व 118)
मुदा, नहि तँ ई विश्वसनीय
अछि आ नहिये कोनो चिकित्साशास्त्रक आधार पर तथ्यपरक अछि जे कोनो मृगिक पेटसँ मनुखक
शिशु जन्म लेने अछि। ऋष्यश्रृंङ्ग केँ लऽ कऽ कतेक आधारहीन लोकोक्ति प्रचलित अछि। कतेक कथामे हुनका मृगिक पेटसँ जन्मल मनुखक नेनाक रूपमे देखाएल गेल अछि,
जे पूरा तरहे भ्रामक अछि। महाभारत (शांतिपर्व 296) सँ ज्ञात होइत अछि जे वशिष्ठ, ऋष्यश्रृङ्ग, कश्यप, वेद, तांड, कृपाचार्य, कक्षिवत, कमठ,
यवक्रीत, द्रोणाचार्य, आयु,
मतंग, दत्त, द्रुमद,
मात्स्य आदि ऋषि अशुद्ध योनीमे जन्म लऽ कऽ तपस्या कऽ मूल पिताक
वर्णमे पहँुचल। ऐसँ ई स्पष्ट अछि जे ऐ सभ ऋषिक माय आर्येतर आ ब्रााह्णेतर स्त्री छली। तइसँ हुनका अशुद्ध योनि कहल गेल। मुदा कर्मक सिद्धांतक अनुसार,
ओ ऋषि अप्पन कठोर तपस्या आ साधनाक बल पर अप्पन पिताक कोटिमे पहुँचल।
ई स्मरण रहबाक चाही जे स्त्री योनीक बिना मनुखक संततिक उत्पति असंभव अछि।
पुरना भारतक संस्कृतिमे आत्मसात आ
समन्वयक प्रवृत्ति एत्ते प्रबल छल जे तहियौका दूटा आदिम समूह आर्य आ अनार्यक
परवर्ती जुग मे ऐ तरहेँ परस्पर समन्वय भऽ गेल जे ओ अप्पन गुणक कर्मक अनुसार चारि
वर्णमे बँटि गेल। पूर्व वैदिक कालमे आठ तरहक विवाह नै छल। ई उत्तरकालक देन अछि, जे
सूत्रकाल धरि आबैत-आबैत पूरा तरहे संगठित भऽ गेल छल। तहियौका समाज विवाहक सभ रूप
केर मान्यता देने छल। स्थापना उत्तर वैदिक कालमे बड़ प्रचलित छल आ ऐ समन्व्यवादी
प्रवृत्तिक प्रवर्तक दूरदर्शी ऋषिगण छल। ई भारतीय समाजक उत्कर्षक द्योतक छल।
महर्षि विभाण्डक उत्तर वैदिककालक ऋषि
छल। कोनो संदेड नै जे हुनकर स्त्री आर्येत्तर नारी छल। हुनका गर्भसँ एकटा प्रखर
शिशुक जन्म भेल जे ऋष्यश्रृङ्गक नामसँ विख्यात भेल अछि। “भागवत
दर्शन"क मुताबिक, विभाण्डक त्यागी,
तपस्वी, संयमी आ स्वाध्याय-परायण छल। एक दिन
पोखरिमे ठाढ़ भऽ कऽ मुनि तप कऽ रहल छल। ओइ काल स्वर्गसँ उतरि कऽ उर्वशी ओतए नहाबै
लेल आएल। हुनकर अनुपम रूप लावण्य देखि कऽ मुनिक मन विचलित भऽ गेल। ओ अपलक ओइ
अप्सराक सौंदर्य देखैत रहल। अनजानमे हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। ओइ काल आश्रममे
पलय बला एकटा हिरणी जल पीबय लेल आएल छल। ओ जलक संग ओइ अमोघ वीर्यकेँ सेहो पीब
लेलक। ओ गर्भवती भऽ गेल। ओकर उदरसँ महामुनि ऋष्यश्रृङ्क जन्म भेल।1
कहल जाइत अछि जे ओ साधारण हिरणी नै
छल। पूर्व कालमे ओ एकटा देवकन्या छल। कोनो पुण्यात्मा राजाकेँ देखि कऽ ओ हिरणी
जकाँ अप्पन पैघ-पैघ आँखिसँ राजाक अनुराग पाबैक लेल हुनक विलोक कऽ रहल छल।
ब्राह्माजी कन्याक ऐ अविनय व्यवहारकेँ देखि कऽ तमसा कऽ शाप दऽ कऽ मृत्य लोकक हिरणी
बना देलक। शापमे आगू ई व्यवस्था देल गेल जे ओकर उदरसँ यशस्वी ऋषिक जन्म हएत, तखन
ओ शापसँ मुक्त भऽ जाएत। वएह देवकन्या एतए हिरणी बनि कऽ रहए लागल। ओ अप्पन शापक
खत्म हेबाक प्रतीक्षा करैत रहल। एक दिन उर्वशी ओम्हरसँ निकलल। जखन ओ अप्पन सखीकेँ
हिरणीक रूपमे देखलक तँ ओइपर ओकरा बड़ रास दया आबि गेलै। ओ सोचए लागल जे कोन तरहेँ
ओकर उदरमे ऋषिक शुक्राणु पहुँचए। ओइ काल पोखरिमे तपस्यारत विभाण्डक ऋषिपर उर्वशीक
दृष्टि पड़ल। ओ लज्जा भरल भावकेँ देखाबैत पोखरिमे उतरल आ नहाबैक बहानासँ अप्पन
समूचा अंगकेँ अनावृत करए लागल।2 विधिक विधान, मुनिक दृष्टि हुनकापर पड़ल। ओ कामातुर भऽ उठल आ हुनकर वीर्य स्खलित भऽ
गेल। मृगी ओकरा पीब गेल आ एकटा पुत्रकेँ जन्म दऽ कऽ स्वर्ग सिधारि गेलि। मुनि
विभाण्डक ओइ नेनाकेँ गो दूध पिया कऽ पालन-पोषण करए लागल।
महाभारत आ श्रीमद्भागवतमे, विभाण्डक
आश्रममे शापित देवकन्या मृगीक उदरसँ ऋष्यश्रृङ्गक जन्मक उल्लेख अछि।3 आजुक काल मे आदिवासी लोकमे पशुक नाम पर ओकर गोत्र जानल जाइत अछि, जेना डुंगडुंग (माछ), कच्छप (कछुआ), हांसदा (हंस) आदि। ओइ तरहेँ ऋष्यश्रृङ्गक मां मृग गोत्रीय आर्येतर कन्या
छल। ओ एकटा रूपवती छल उर्वशी तरहे। तइसँ पुराणकार हुनका उर्वशीक सखिक तरहे उल्लेख
केने छल। ऋष्यश्रृंगक मां केँ एकटा हिरण हेबाक एकटा मिथक अछि। ओ अयोनिज संस्कृतिमे
जन्म लऽ कऽ ओकर नैसर्गिक गुण व रूप सौष्ठवक परिचायक छल। ओकर नाम मृगम्बदा छल। ओ
रूपवती कन्या आषाढ़ पूर्णिमाक दिन एकटा महान शिशु केँ जन्म देलक जे संपूर्ण
आर्यावर्तक तत्कालीन इतिहासकेँ एकटा नब धारा प्रदान कऽ गरिमा युक्त कऽ देलक।4
वाल्मीकि रामायणमे महर्षि कश्यपक
पुत्र विभाण्डक आ महर्षि विभाण्डक पुत्र सुप्रसिद्ध मुनि ऋष्यश्रृङ्ग भेला।5
शास्त्रक गहन अनुशीलनसँ एहन लागैत अछि
जे ऋष्यश्रृङ्ग अप्पन पिताक संग वनमे रहैत छल आ वनमे हुनकर लालन-पालन भेल छल। कोनो
पुरनका महाकाव्य, काव्य वा पौराणिक ग्रंथमे हुनकर माँक उल्लेख नै
भेटैत अछि। प्राचीन आख्यानमे योनिज आ अयोनिज, ऐ दू तरहक जातक
उल्लेख भेटैत अछि। योनि शब्दक अर्थ मूलत: “घर" होइत अछि
आ पुरान ग्रंथमे ऐ अर्थमे एकर प्रयोग भेटैत अछि।6 जिनकर जन्म
घरमे नै भेल अछि, ओ अयोनिज संतान अछि। सीता, शकुंतला, द्रौपदी आदि अप्पन माता-पिताक अयोनिज संतान
अछि। यज्ञभूमि मे 'वामदेव्यव्रत" केर उत्पन्न नेना सेहो
ओइ कोटिमे आबैत अछि। जइ नेनाक जन्म अप्पन घरमे भेल ओ योनिज कहाबैत अछि। हम्मर
विचारसँ ऋष्यश्रृंङ्ग अप्पन पिताक योनिज आैरस संतान छल। जन्मक पश्चात ऋषि अप्पन
नेनाकेँ आर्येतर माँ सँ अलग कऽ विद्याध्ययन केर अप्पन तपोस्थलीमे राखलक।
एकटा दोसर वृतान्तक मुताबिक, शिशुकेँ
जन्म दऽ कऽ माँ स्वर्ग सिधार गेलि। तइसँ पिता विभाण्डक अपना लग राखि कऽ शिशुक
लालन-पालन आ सभटा संस्कार देलक। महर्षि विभाण्डक ब्राह्माक मानस पुत्र मरीचिक वंश
परंपरामे परम तेजस्वी आ वेद केर प्रकांड पंडित छल। महर्षि व्यास एकर वर्णन एना
केने अछि,
मरीचिॅ मानसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:।
मश्यपात्काश्यप: जात: तस्य सुतो
विभाण्डक:
ऋष्यश्रृङ्ग तस्य पुत्रास्ति।।7
महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृङ्गक
छह बरखक आयुमे उपनयन संस्कार करा कऽ यज्ञोपवीत धारण करौलक आ वेद विधिसँ वेदारंभ
संस्कार कऽ गायत्री मंत्र प्रदान केलक। ब्राह्मचर्य धारण करा कऽ ब्राह्मचारी कठिन
व्रत, तप, स्वाध्याय, प्रात: सायं
गायत्री जप आदि कराबैत वेदक अध्ययन करौलक।8
(जारी...)
बालानां
कृते
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय
श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू
हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक
चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये
सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते
करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि,
करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित
छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये
जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः
सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा,
दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित
छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं
वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं
दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम,
कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़
आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत
छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन्
सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती,
नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव
दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र
सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे
भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी
तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं
महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या,
द्रौपदी, सीता, तारा आऽ
मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च
विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते
चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा,
बलि, व्यास, हनूमान्,
विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा
चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर
वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु
प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला
सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि
जगत्त्रयम् ॥
१०.
दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ
ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः।
षड्जः स्वरः॥
आ
ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः
शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः
सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो
जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां
योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः
सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ
दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे
भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ
दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक
सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि।
अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा
परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए
आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें
कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे
वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न्
- विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे
- देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म
विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ
जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒-
बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ
तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ
रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध
पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः
धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑-
पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ
जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ
पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम
सभामे
युवास्य-युवा
जेहन
यज॑मानस्य-राजाक
राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ
पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त
कार्यमे
नः-हमर
सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा
होए
फल॑वत्यो-उत्तम
फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां-
पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य
लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा
सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ
होए
ग्रिफिथक
अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय
बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर
वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम
सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
विदेह
नूतन अंक भाषापाक
रचना-लेखन
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ
आगू
बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।