भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Saturday, April 04, 2009

विदेह ३० म अंक १५ मार्च २००९ (वर्ष २ मास १५ अंक ३०)-part-i

विदेह ३० म अंक १५ मार्च २००९ (वर्ष २ मास १५ अंक ३०)-part-i


एहि अंकमे अछि:-
संपादकीय
२. गद्य

२.१. कथा-सुभाषचन्द्र यादव- कैनरी आइलैण्डक लॉरेल / कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण

२.२. मैथिली भाषाक साहित्य - प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)

२.३. भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी

२.४. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन

२.५. कथा- फानी-श्रीधरम

२.६. होलीपर विशेष-. विद्या मिश्र

२.७. 1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन
३. पद्य
३.१. सतीश चन्द्र झा- शब्द

३.२. 1.बुद्ध चरित 2.महावीर

३.३.ज्योति- एक हेरायल सखी

३.४.कामिनी कामायनी: चक्काल

३.५. पंकज पराशर

३.६.सुबोध ठाकुर


५. गद्य-पद्य भारती -मूल अँग्रेजी कथा : अनदर संडे कथाकार : गैस्पर अल्मीडा मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह

६. बालानां कृते-मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी
७. भाषापाक रचना-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]
8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
8.1. ON ENGLISH_MAITHILI DICTIONARY BY GAJENDRA THAKUR- UDAYA NARAYANA SINGH
8.2. The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions
संपादकीय
मैथिली भाषासं सेहो कम्प्युटर अपरेट कएल जाए ताहिलेल प्रयास शुरु भेल अछि । परिष्कृत आ समृद्ध भाषा मैथिली एखनो आन भाषाक अपेक्षा कम्प्युटर प्रविधिमे पाछुए अछि ।
पटनामे फ़्युल प्रोजेक्ट अन्तर्गत मैथिली कम्प्युटरीकरण शब्दावलीक मानकीकरणलेल दु दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न भेल अछि । फ़्युल (फ़्रिक्वेन्टनली युज्ड एन्ट्रीज फ़र लोकलाईजेशन) एक ओपन सोर्स प्रोजेक्ट अछि । ई विभिन्न प्लेटफ़र्मके लेल प्रयोग कएल जाएबला कम्युटर शब्दावलीके मानकीकरणके काज विभिन्न भाषाक लेल कएल करैत अछि ।
एहि अवसरपर मैथिलीक विद्वान पण्डित गोविन्द झा कम्प्युटरलेल विशेष रुपे शब्द गढल जएबाक चाही मुदा एखन सामान्य शब्दसं काज चलि जाए त नीक । मैथिली एकेडमीक निर्देशक रघुवीर मोची जमीनी शब्द प्रयोग करबापर जोड दैत कहलनि जे मैथिलीके अपन क्षेत्र विस्तार करबाक चाही । कम्प्युटरमे मैथिलीक लेल कएल जारहल काजके दूरगामी प्रभाव रहल ओ कहलनि ।
प्रोजेक्ट संयोजक राजेश रंजन फ़्युलक कम्प्युटर मानकीकरणके कार्यविधिके विषयमा जनतब दैत कहलनि जे इ समुदाय आधारित प्रोजेक्ट अछि । कार्यक्रममे कम्प्युटरमे बेशी प्रयोग होब' बला 5 सय 78 शब्दपर गहन विचार क" मानक पर आम सहमति बनाओल गेल । मैथिली कम्प्युटक लेल शब्द गढबालेल ई पहिल प्रयास छल ।
कार्यक्रम एएन सिन्हा इन्स्टिच्युट अफ़ इन्स्टीच्युट अफ़ सोसल स्टडिजमे भेल छल जाहिमे रामानन्द झा रमण, मोहन भारद्वाज, सुधीर कुमार, जयप्रकाश, राकेश रोशन, संगीता सहितक विद्वान, अनुवादक आ कम्प्युटर उपभोक्ता सहभागी छल ।विकी फुएल, विकी मैथिली आदि प्रोजेक्ट इंटरनेटपर चलि रहल अछि।
मैथिलीक भारतीय ओपेन ऑफिस, मल्टी प्रोटोकोल मेसेंजर,कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम, स्क्राइबस, सनबर्ड कैलेंडर, ई-मेल क्लाइंट, की-बोर्ड ड्राइवर, फॉंट, वेब ब्राउसर, आ द्विभाषीय डिक्शनरी आब आबि गेल अछि। ई सम्भव भेल अछि टेक्नोलोजी डेवेलपमेंट फॉर इंडियन लैंगवेजेज प्रोग्राम, सेंटर फॉर डेवेलोपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्युटिंग आ साहित्य अकादमीक सहयोगक परिणाम स्वरूप।
मैथिली साफ्टवेयर अओजार आ फान्ट नाम्ना एहि सी.डी.पर विद्यापतिक फोटो लागल अछि।


मैथिली भाषाक कतेक डारिपर संस्मरण कृतिके एहिबेरके साहित्य एकेडमी पुरस्कार 2008 देल गेल अछि । भारतक राजधानी नयी दिल्ली स्थित साहित्य एकेडमीद्वारा आयोजित एक समारोहमे विभिन्न 23 भारतीय भाषाक कृतिके पुरस्कृत कएल गेल अछि । साहित्य एकेडमी पुरस्कार अन्तर्गत 50 हजार भारतीय नगद आ ताम्रपत्रसं सर्जकके सम्मान कएलक । मैथिली भाषाक संस्मरण कृति कतेक डारिपरके लेखक मन्त्रेश्वर झा के इ सम्मान देल गेलन्हि । एहि पोथीमे झा अपन प्रशासनिक जीवनक अनुभव सहेजने छैथ । झा मैथिली साहित्यिक, सांस्कृतिक अभियानमे सक्रिय छथि ।
झा मैथिली साहित्य समृद्धिक लेल पाठक संख्या बढएबापर ध्यान देल जएबाक चाही कहलनि । मन्त्रे•ार झा पटनावि•ाविद्यालयसं स्वर्ण पदक आ राजनीतिमे स्नातकोत्तर कएने छैथ । हिनक अन्चिन्हार गाम, बहसल रातिक इजोत, कांटक जंगल आ पलाश, चाही एकटा नोकर जेहन कृति प्रकाशित छन्हि । हिनक जन्म सन् 1944 मे बिहारक मधुवनी जिलामे भेल छन्हि ।
सन 1972 में झाक प्रथम कृति खाधि कविता संग्रह प्रकाशित भेल रहनि । एखनधरि हिनक 25 टा कृति प्रकाशित भ चुकल छन्हि । पुरस्कृत पोथी मैथिलीमे नव आयामक पहिल आत्म कथा मानल गेल अछि ।
18 फरबरीकेँ राजेन्द्र भवनमे एकल पाठक अवसरपर हुनकासँ भेँट भेल। गंगेश गुँजन, अनिल मिश्र आ सेक्रेटरी श्रीवास्तव जी सेहो रहथि।

मिथिला मिहिरमे हुनक गंगापर कविता जकर कारण सुधँशु शेखर चौधरीकेँ क्षमा याचना करए पड़ल रहन्हि सँ ओ कविता पाठ शुरू कएलन्हि।


स्व. अनिलचन्द्र ठाकुर जीक जन्म 13 सितम्बर 1954 ई.केँ कटिहार जिलाक समेली गाममे भेलन्हि। 1982 ई.मे हिन्दी साहित्यमे स्नातकोत्तर केलाक बाद नवम्बर '93 सँ नवम्बर '94 धरि "सुबह" हस्तलिखित पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन कएलन्हि आ कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकमे अधिकारी रहथि। मैथिली, अंगिका, हिन्दी आ अंग्रेजीमे समानरूपेँ लेखन।
मृत्युक पूर्व ब्रेन ट्यूमरसँ बीमार चलि रहल छलाह।
प्रकाशित कृति:
आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- पहिने भारती-मंडन पत्रिकामे प्रकाशित भेल, फेर मैलोरंग द्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित भेल।
कच( अंगिकाक पहिल खण्ड काव्य,1975)।



संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ 13 फरबरी २००९) ७८ देशक ७८० ठामसँ १,६५,४५९ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।

अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।

गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in

२. गद्य

२.१. कथा-सुभाषचन्द्र यादव- कैनरी आइलैण्डक लॉरेल / कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण

२.२. मैथिली भाषाक साहित्यद- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)

२.३. भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी

२.४. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन

२.५. कथा- फानी-श्रीधरम

२.६. होलीपर विशेष-. विद्या मिश्र

२.७. 1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन

कथा
सुभाषचन्द्र यादव- कैनरी आइलैण्डक लॉरेल / कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण

चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द

सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।

कैनरी आइलैण्डक लॉरेल
तुलसियाही बहुत दूरस्त छैक। ई सोचिते ओकरा आलस आबऽ लगैत छैक । ओतऽ जयबाक निर्णय गिरगिट जकाँ रंग बदलऽ लगैत छैक । ताकति छीन भऽ गेलैक अछि । पयरेँ चलब पहाड़ बुझाइत रहैत छैक । ओकरा दू दिन धरि साइकिलक बाट देखऽ पड़लैक अछि । उपिया एखन दस बजे लऽ कऽ आयल छैक । बैसाखक रौद झट दऽ कपार पर चढ़ि गेलैक अछि । रौद दिस तकिते ओकर साहस निपत्ता भऽ जाइत छैक । चौकी पर ओठंगि जाइत अछि । उपिया कहैत छैक—'आइ नहि जा सुभाष बाबू ।’ ओ बाहर ताकऽ लगैत अछि — रौद...बाध ...मालजालक हेंज...। सात बरस भऽ गेल छैक तुलसियाही गेना । ओकरा छगुन्ता नहि होइत छैक जे एतेक समय कोना बीति गेलैक। खाली समयक एकटा दूरीक अनुभव होइत छैक । दीदी कतेको बेर समाद पठौलकैक आबऽ लेल । दीदीक आग्रहमे ओकरा कहियो उत्कट गंभीरता नहि बुझयलैक । ओकर नहि जयबा मे तुलसियाहीक दूरस्त भेनाइ सेहो एकटा कारण रहल होयतैक । ओ एक मास सँ किछु टाकाक जोगाड़मे अछि , नहि भऽ रहल छैक । पाँच दिन पहिने निर्णय लेलक । दीदी धनीक छैक । मँगतैक तँ टाका सहजेँ दऽ देतैक । जँ नहि दैक तखन ? ई प्रश्न ओकर दिमागक सैकड़ो फेरी लगौलकैक अछि । आ सभ् बेर ओ सोचलक अछि जे टाका नहि देतैक तँ ओकर एतेक दूर गेनाइ व्यर्थ भऽ जयतैक । एहन सोचैत काल ओ उदास होइत रहल अछि । ‘ममियौतक आवाज ओकर तल्लीनता तोड़ैत छैक—'मर हो सुबहास ! जेबह तँ जाह ,रौद भेल जाइत छह । नै तँ आइ छोड़िये दहक । अन्हरगरे उठिहऽ आ चलि दिहऽ । ओ जयबा लेल तत्पर होइत अछि । उपिया हँसैत कहैत छैक—'जा ने, धारक ओइ कात बालु पर बुझियहक केहन होइत छैक मजा ।’ ओकर निर्णय एकबेर फेर कोसीक धसना जकाँ खसऽ चाहैत छैक। एकटा निष्प्रा ण मुस्कीप ओकरा चेहरा पर अबैत छैक। ओ फेर चौकी पर बैसि जाइत अछि आ बाहर देखऽ लगैत अछि...रौद...दूरस्त... धार.... बालु आ रुपैया । ओकरा मे एकाएक स्फूर्त्ति आबि जाइत छैक । ओ बिहाड़ि जकाँ साइकिल उठबैत अछि आ चलि दैत अछि । उपिया कहैत रहि जाइत छैक—'नहि जा सुभाष बाबू हे हौ... औ !’ घाटक ठीकेदारक खोपड़ी लग ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि । खोपड़ीमे चारि – पाँच गोटे छैक । ठीकेदार गामक कोनो गंभीर घटनाक व्याख्या कऽ रहल छैक । ओकर मोन होइत छैक, खोपडीमे जा कऽ बैसय । फेर ई सोचि रूकि जाइत अछि जे कानमे झड़ पड़तैक । ओ ठीकेदारक नामे ममियौतक लिखल चिट्ठी हाथा—हाथी बढ़ा दैत छैक । ठीकेदार 'जाउ ’ कहि भाषण चालू कऽ दैत छैक । ओ कटारि पर देने नाह दिस चलि दैत अछि । ओकरा कटारिक डर होइत छैक । कतहु खसि नहि पड़य । धारमे गेरूवा पानि आबि गेल छैक । नाह छीट पर उतारि दैत छैक । छीटक बाद बहुत दूर धरि भरि जाँघ पानि छैक । ओ साइकिल कनहा पर उठा लैत अछि । अधे लग्गा टपैत साइकिल जानसँ ऊपर भारी लागऽ लगैत छैक । ओ साइकिल हेला दैत अछि । बालु आगि जकाँ तबि गेल छैक । साइकिल ससरैत नहि छैक । डेग रखिते लगैत छैक , झरकि गेल । कपड़ाक जुत्ता हैंडिलमे बान्हल छैक । एहन धीपल बालु पर जुत्तो अगिया जाइत छैक । ओ जी-जान सँ साइकिलकेँ ठेलैत दौड़ऽ लगैत अछि । पाछाँ सँ एकटा मोसाफिर कहैत छैक—'साइकिल ससुरारि मे देलक-ए ? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक ।’ ओ बान्ह टपि कऽ निर्मली बजार अबैत अछि । कंठ सूखि गेल छैक । घामसँ गंजी –अंगा सभ भीजि गेल छैक । एकटा चाहक दोकानमे बैसि जिराय लगैत अछि । पीठपर फलिया बन्हने मोटिया सभ एहि गद्दी सँ ओहि गद्दी जाइत-अबैत छैक । 'रामेसर,चाह दहक दू टा ।’- धोती-गंजी पहिरने एकटा दुब्बर-पातर आदमी कहैत छैक । 'उधार नहि हेतह ।’ 'अरे, हीयाँ नकदी माल है बाबू-ह ।’ ओकर उत्तरसँ ओकरा प्रसन्नता होइत छैक । ओ अपनो लेल चाहक ऑर्डर दैत अछि । थोड़े-थोड़े धुक्कड़ शुरू भऽ जाइत छैक । गरदासँ आँखि बचयबाक लेल ओ आँखि मूनि लैत अछि आ डेस्क पर माथ टिका दैत अछि । आँखि लागि जाइत छैक । किछु हड़हड़ाइत छैक । ओ हड़बड़ा कऽ तकैत अछि । बोरा जकाँ लोककेँ लदने एकटा मोटर मनक मन गरदा उड़बैत कुनौली दिस जा रहल छैक । भरिसक चारि सँ पहिने चलऽ वला समय नहि होयतैक । ओ प्रतीक्षा करैत रहैत अछि । लोकपेरिया पर, लीखपर धुक्कड़क विरूद्ध ओकर साइकिलक पहिया फेर संघर्षरत होबऽ लगैत छैक । ओकरा कतेको बेर लगैत छैक , आब साइकिल नहि हाँकल जयतैक । जाँघ लोथ भऽ गेलैक अछि । ओ कतेको ठाम बिलमि कऽ पूछैत अछि—तुलसियाही कतेक दूर होयतैक । जेना ओ माउण्ट एवरेस्टक चढ़ाइ कऽ रहल होअय । ओकरा जाइत –जाइत अन्हार भऽ जाइत छैक । ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि । ओकर पीसाक जेठका भाय पुछैत छैक— ' के छियह हौ ?’ ओ गोड़ लगैत कहैत छैक— 'हऽऽम सुभाष ।’ 'सुबहास?’- ओ मोन पाड़बाक प्रयास करैत छैक । फेर कहैत छैक – 'आब चीन्हि गेलियह । हे ओइ चौकी पर बैसह । ’ ओ ओकर पिसियौतकेँ हाक पाड़ऽ लगैत ऐक – ’रेऽऽ उगना ऽऽ... उगना रे ऽऽ।’ उगना आबऽ लगैत छैक तँ ओ कहैत छैक-'देखही के अयलौ । 'उगना' के छियै’ बुदबुदाइत ओकरा लग आबि जाइत छैक । आ ओकर मुँह निहारऽ लगैत छैक । सात बरस पहिने उगना बड़ छोट छलैक । ओ आत्मीय ढँग सँ परिचय देबाक प्रयत्न करैत अछि । उगनाक चेहरा निर्विकार बनल रहैत छैक । दीदी आ पीसा खाइत काल एतेक दिन नहि अयबा पर आश्चर्य व्यनक्त् करैत छैक । ओ कमजोर हँसी हँसैत रहैत अछि । बिआओन पर निन्न नहि अबैत छैक । लालटेम हेट कऽ एकटा किताब उनटाबऽ लगैत अछि । पीसाक जेठका भाय मसहरीक तरसँ बिगड़ैत ककरो सँ पुछैत छैक – ' लालटेम किएक जरैत छैक रे-ए?’ भोरमे ओ अबेर कऽ उठैत अछि । दीदी कहैत छैक – ' उगना चल गेलौ-ए इसकूल । कहने गेलौ-ए, कहि दिहैक भइयाकेँ हमरो आबऽ दै ले । बड़की पोखरि जयबैक । जँ बेसी अबेर भऽ जाइ तँ कहि दिहैक भैयाकेँ नहा लै ले ।’ उगनासँ लगाव अनुभव करैत ओकरा प्रसन्नता होइत छैक । मुदा ओ ओकरा संगे नहि नहा पबैत अछि । पीसा चाँरि लगा कऽ पठा दैत छैक । खाइते काल टा ओकरा दीदी आ पीसासँ गप्प करबाक अवसर भेटैत छैक । आन समय ओ सभ व्यस्त रहैत छैक । दीदी पछिला सालक अपन बेटीक बियाहक चर्च विस्तारसँ करैत छैक जे कोना कोटक खातिर दू दिन धरि बियाह रूकि गेल छलैक । फेर प्रसंग बदलैत कहैत छैक ' आब नोकरी कऽले । बेसी पढ़ने आदमी बताह भऽ जाइत छैक । देखैत ने छीही मास्ट रकेँ, बताह जकाँ करैत छैक ।’ ओ चुपचाप सुनैत रहैत अछि । दुआरि पर ओकर पीसाक जेठका भाय बैसल छैक । 'ओ ओकरासँ पितियौत देया पुछैत छैक – ’अनूपा गाम गेलौ, भेंट भेल छलौ की-ई ?’ अनूपाकेँ ओकर पित्ती दीदीये लग पठा देने छलैक जे एतऽ पढ़तैक । गाममे खरचहर होइत छलैक । सात-आठ दिन पहिने ओ मायसँ भेंट करऽ चल गेलैक । दीदी कहैत छलैक, अनूपा आ उगनामे कखनो ने पटैत छैक । पीसाक जेठका भाय फेर कहनाइ शुरू करैत छैक — 'छौंड़ा छलै तेज । मुदा तोहर दीदीये नहि पढ़ऽ दैत छैक। भैंसमे पठा देलक आ ताहूसँ नहि भेल तँ दुआरि परक ई टहल, ऊ टहल। तोहर पीसा कहबो करैत छैक जे 'पढ़ऽ दही, तँ ओ कहैत छैक, जे पढ़ऽ बेरमे पढ़तैक ।' ओ किछु नहि बजैत अछि । ओकरा अनूपाक प्रति दुख होइत छैक । ओ चौकी पर पड़ि रहैत अछि । ओकरा काकाक क्लान्त चेहरा मोन पड़ैत छैक । काकीक कनैत – कनैत फूलल लाल चेहरा, पितियौत बहिन सभक आँखिक असहाज दयनीयता । रातिमे ओ दीदीसँ कहैत अछि — 'हम भोरे चल जेबौ ।' दीदीकेँ भरिसक प्रसन्नता – अप्रसन्नता किछु नहि होइत छैक । टाका मँगबाक ओकर विचार नहि जानि कतऽ निपत्ता भऽ गेल छैक । दीदीक व्यवहार ओकरा धुंध जकाँ अस्पष्ट लगैत छैक । ओ चाहैत अछि बेसी सँ बेसी तटस्थ भऽ जाय । टाकाकेँ बीचमे ठाढ़ कऽ सम्बन्धक बारेमे नहि सोचय । भोरोमे दीदीक व्यवहार ओहिना रहैत छैक । जलखै खाइत काल दीदी गमछामे दू गो टाका बन्हैत कहैत छैक—'आइकाल्हि एक्को टा पैसा हाथपर नहि रहैत छैक ।’ फेर जेना दुलार करैत जीवित स्वरमे पूछैत छैक । - 'बौआ, रस्ता लेल कने चूड़ा बान्हि दियौक ?’ ओ मना कऽ दैत छैक । 'उगना ,जो भैयाकेँ एकपेरिया देने सड़क पकड़ा दिहैक । सुभीता हेतैक । आ तोँ घूरि अबिहें ।'- दीदी कहैत छैक । उगना अस्वीकार कऽ दैत छैक । ओ खाइ ले मँगैत कहैत छैक जे ओकरा स्कूल जेबाक छैक । उगनाक इच्छा छलैक जे ओ आइ रहि जाय । काल्हि एकबेर आग्रह कयने छलैक । ओ तुरन्त बात टारि देने छलैक । नहि टारितैक तँ बादमे असुविधा भऽ सकैत छलैक । ओ बड़ तीब्रतासँ अपना पर उगनाक स्थिर दृष्टिक अनुभव करैत अछि । दीदी की कहि रहलि छैक, ओकरा नहि बुझाइत छैक । ओकर सम्पूर्ण चेतना पर उगना पसरि गेल छैक । ओ पनिमरू चालिमे विदा भऽ जाइत अछि । गोहाली लग ओकरा अपना पाछाँ ककरो उपस्थितिक अनुभव होइत छैक । उगना थिकैक । 'जेबही सड़क धरि ?' ओ पुछैत छैक । किछु नहि पुछनाइ उगनाकेँ अप्रिय लागि सकैत छलैक । ओ कोनो उत्तर नहि दैत छैक । दुनू संग-संग चलैत रहैत अछि । दीदी नमहरगर डेग दैत एकाएक आबि जाइत छैक । एकटा रुपैया दैत कहैत छैक — 'ईहो राखि ले । सकुन्ती धेने छलैक ।’ ओकरा सभ वस्तु कुरूप आ अधलाह बुझाय लगैत छैक । मात्र उगनाक एसकर होयबाक कल्पना ओकरा नीक लगैत छैक । दीदी उगनासँ पुछैत छैक — 'जेबही?’ ओ अपूर्ण आ अस्पष्ट शब्दैमे प्रश्नक औपचारिकता पर खौंझाइत छैक । दीदी कहैत छैक —'जाह, रौद भऽ जेतह।’
ओकरा लगैत छैक जेना उगना जिंजीर भऽ गेल होइक । उगनाक समस्त मनोभाव चुप्पी मे बदलि गेल छैक । ओकर चेहरा शांत आ उद्वेगहीन लगैत छैक । मुदा सोचला पर ओकर स्थिरता बड़ उदास लगैत छैक। ओकर साइकिल एकपेरियापर ससरऽ लगैत छैक । रौद... धार... बालु... माउण्ट एवरेस्ट ...।
कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण

दृष्टिकोण

राजपत्रित पदाधिकारी के पद पर चयनक जे खुशी रजत के भेल छलैक से व्रᆬमशहे एकटा अनजान भय मे परिणत होईत चलि गेलैक । मोन मे धुकधुकि पैसऽ लगलैक, कारण --- सरकारी कार्यालयक कार्य-प््राणाली आ कार्य-संस्कृति दुहू सँ अनभिग़्यता । जखन सँ श्यामबाबू अपन आंखिक देखल घटना सुनेलखिन ओकरा जे कोना एकटा किरानी धोखा सँ आधकारी सँ फाईल पर दस्तखत करा लेलकै आ बेचारा निर्दोष आधकारी पँᆬसि गेलैक ; तखन सँ रजत आर बेसी विचलित भऽ गेल आछ। दोसरो घटना ओहने सुनेने छलखिन ओ जे एकटा कर्मचारी घूस खा कऽ कोर्ट-केसक फाईल दबा देलकै आ एकपक्षिय पैᆬसला सरकार के खिलाफ भऽ गेलैक आ कोना बेचारा आधकारी के परिणामस्वरुप सस्पेंड कऽ देल गेलैक। ई सभ सुनि रजत के लगलैक जे ओ कांटक ताज पहिरऽ जा रहल आछ़़़ अबूह लागऽ लगलै ओकरा। सोचैत-सोचैत डरे पसेना-पसेना भऽ गेल रजत़़़क़ंठ सुखाय लगलैक ओकर।

आईये योगदान करबाक छैक ओकरा। जँ-जँ समय लगीच आयल जा रह्ल छैक, तँ-तँ ओकर बेचैनी बढले जा रहल छैक। भीतर सँ सद्यः डेरायलो रहैत बाहर सँ वुᆬबा देखेलक ओ। कँपैत डेगें तैयार भऽ ओ बाबूजीक पायर छुबि आशिर्वाद लेबऽ गेल। बाबूजीक पारखी आँखि सँ रजतक मनोदशा नुकायल नहि रहि सकलैक। माय-बाप आ संतान बीच सत्ये कोनो टेलिपैथी काज करैत छैक जे बिना मुंह खोलनहु सम्वेदनाक आदान- प््रादान करैत छैक। बगलक वुᆬर्सी पर बैसबाक ईशारा करैत रजत के बुझाबऽ लगलाह - ''बाऊ! घबराईत कियैक छी? ई खुशी आ संगहि गर्वक बात आछ जे आहाँ भारत सरकारक एकटा उच्च पद पर आसीन होमय जा रहल छी। आहाँक योग्यताक पूर्ण परीक्षा कईयेकऽ आहाँ के ई जिम्मेदारीक पद सौंपल गेल आछ ।'' पेᆬर पानक खिल्ली पनबट्टी सँ निकालि मुंह मे लैत आगू बजलाह- ''के पहिने सँ ऑफिसक काज सँ भिग्य रहैत आछ? समय सभ कें सभ ग़्यान करा दैत छैक। अहाँ एतबा धरि करब जे आँखि आ कान दुहु खोलने रहब सदिखन। जतऽ कोनो प््राकारक परेशानी बुझाय तऽ सलाह लेबा मे कोनो टा संकोच नहि करब - चाहे ओ अहाँक मातहते कियैक ने हो!''

बाबूजीक बात सँ रजत के जेना कोनो दिव्य दृष्टि भेट गेलैक। लगलैक जेना मृग जकाँ कस्तुरी ओकरा संगे मे छैक आ ओ नाहक लोकक बात सुनि-सुनि चिंता मे पड़ल छल। एकटा मुस्की पसरि गेलै ओकर ठोर पर।

ऑफिस मे कार्य-भार सम्हारिते दर्शन भेलै फाईलक अम्बार सँ। उपर सँ एकटा फाईल उठा पढिकऽ बुझबाक प््रायास करऽ लागल; मुदा निष्फल। कतबो अपना भरि प््रायास केलक रजत मुदा नहि बुझबा मे एलई ओकर विषय-वस्तु आ ने आगूक प््राव्रिᆬया । ़पेᆬर खखसिकऽ उच्च स्वरे बाजल-''किनकर फाईल आछ ई? ई आँक़डा आहाँ कतऽ सँ लेलंहु?''

सुनितहि किरानी अपन वुᆬर्सी सँ उठि कऽ दौड़ल आयल जेना ओकरा सँ कोनो गलती भऽ गेल हो। पेᆬर विस्तार सँ सभ बात बुझा देलकै। रजत ओकरा सभ के फाईल पर फरिछायल नोटिंग करबाक हिदायत दैत ओकरा अपन सीट पर जेबाक ईशारा केलक पेᆬर विजयी भावें आँखि उठा कऽ तकलक। विजयी एहि दुआरे जे आधनस्थ कर्मचारी पर धाख जमाकऽ ओकरा सभक नजरि मे नवसिखुआक आभास नहि होमय देलकै संगहि कार्यक आरम्भ सेहो शुभ रहलै। शुरु भला तऽ अंतो भला। टेबुल पर राखल पानिक गिलास के एके छाक मे खाली क लेने छल रजत।

ओम्हर आधनस्थ कर्मचारी सभक बीच मे यैह चर्चा होमऽ लगलै जे साहेब बड़ क़डा मिजाज के छथि।




डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।

कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन-
गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२

मैथिली भाषाक साहित्य-
विद्यापतिक परवर्ती मैथिलीक कवि लोकनिक रचनादि केँ प्रोत्सा हित कयनिहार नरेश लोकनि मे कंसनारायणक नाम अग्रगण्यल अछि जनिक दरबार मे जतेक कवि रहथि ओ सभ विद्यापति द्वारा चलाओल शैली केँ सर्वाधिक प्रश्रय देलनि जाहि मे उल्लेिखनीय छथि महाकवि गोविन्द दास (1663-4-1670-71)। हिनक एकमात्र रचना ‘श्रंृगारभजनावली’ (1938) प्रकाशित अछि। हिनक कवितादि सॅ श्रृंगारिकताक बोध होइछ, किन्तुह ओ भक्ति विषयक रचना थिक। बंगालक वैष्ण्क भक्ता कवि हिनका बंगाली बनयबाक प्रयास कयलनि, किन्तुय ई मिथिलाक रहथि जनिक रचनाक अर्थक दुरूहताक कारणेँ प्रसिद्ध अछि। विद्यापतिक पश्चा‍त् ई मैथिलीक दोसर प्रसिद्ध कवि छथि। महाराज कंसनारायणक संग हुनका ओही रूपक सम्बान्ध‍ छलनि जे विद्यापति केँ महाराज शिवसिंहक संग छल। मैथिलीक हिनक पदावली साहित्य‍ समस्तओ पूर्वान्च ल मे एहि नवीन पद्धतिक पोषक सिद्ध भेल।


विद्यापतिक उत्तदराधिकारी कवि लोकनि मे महाकवि लोचन (1650-1725) क नाम अग्रगण्य‍ अछि। यद्यपि मैथिली मे हिनक अधिकांश रचनादि नहि उपलब्धि भ’ रहल अछि तथापि जे उपलब्धद भ’ रहल अछि ओ कलाक दृष्टिसँ उच्च‍ कोटिक थिक। किन्तु एकमात्र ‘रागतरङिनी;’ (1924) उपलब्ध भ’ रहल अछि। हिनक हाथक लिखल ‘नैषधीय चरित’ क एक प्रति ललित नारायण मिथिला विश्वमविद्यालय पुस्त्कालय मे सुरक्षित अछि। लोचन संस्कृ त क निष्णाकत विद्वान, संगीतक मर्मज्ञ आ कवि रहथि। हिनक कवितावली ‘रागतरङिणी’ मे उपलब्ध अछि।

ओइनवार वंशक पतनोपरान्तग अनेक वर्ष धरि मिथिला मे अराजकता आ अस्थिरताक स्थिति प्रबल रहल। पुन: मिथिलाक विद्वान, कवि, संगीतज्ञ आश्रयक अन्वे षण मे अपन समीपवर्ती राष्ट्रछ नेपाल चल गेलाह। एम्ह:र दिल्लीिक सिंहासन पर अकबर केँ बैसबाक पश्चातत् उत्त र भारतक राजनीतिक स्थिति मे परिवर्तन भेल। एही समय मे मिथिलाक शासन-सूत्र खण्ड वलाकुलक महेश ठाकुर (1556-1569) केँ भेटलनि आ दिल्ली केन्द्रच सँ मिथिलाक निकट सम्पनर्क स्थाछपित भेल। महेश ठाकुरक अधिकांश समय पश्चिम मे व्य तीत भेल छलनि, अत: पश्चिमक भाषा-साहित्य क एतय प्रचार-प्रसार नहि भेल, प्रत्युनत स्थाअनीय साहित्यम सेहो प्रभावित भेल। इएह कारण भेल, प्रत्युत स्थाधनीय साहित्यल सेहो प्रभावित भेल। इएह कारण थिक जे लोचन राग्तरङिणी मे राग-रागिनीक उदाहरण स्वशरूप ब्रजभाषाक अनेक स्वपनिर्मित पद उदृत कयलनि अछि।

मैथिली साहित्य क मघ्यपकालीन साहित्यिक रचनाक दृष्टिऍं स्वतर्णकाल कहल जा सकैछ। यद्यपि एहि समयक राजनैतिक दृष्टिसँ उथल-पुथल भेल. किन्तुं साहित्य्पर एकर कोनो प्रभाव नहि पडल। एहि राजनैतिक उथल-पुथल क कारणेँ मैथिल विद्वत-वर्ग एतय सँ पडाक’ नेपाल चल गेलाह। ओ सभ ओहि ठामक राजदरबार मे संरक्षण आ प्रोत्सा्हनक हेतु गेलाह। नेपाल सुसंस्कृ त शिक्षा-प्रेमी लोकनिक द्वारा मैथिलीकेँ नेपाल मे साहित्यिक भाषाक रूप मे स्वीलकार कयल गेल। ओहि समय मे मल्लावंशक शासल छल। मल्ला शासक लोकनि काव्यय आ नाटकक अत्यालधिक प्रेमी रहथि। मल्लर राजवंश द्वारा मैथिल साहित्यककार लोकनि केँ प्रोत्साहित कयल गेल जकर फलस्वारूप मैथिलीक प्रारम्भिक नाट्य-साहित्यिक रचना नेपाल मे प्रारम्भर भेल। विद्यापतिक परिपाटी पर रचना केनिहार स्व्तंत्र पदक अतिरिक्तर एहि कालावधिक अधिकांश पद नाटक मे गुम्फित अछि। मैथिली गीत सँ गुम्फित संस्कृवत-प्राकृत नाटकक रचनाक श्रीगणेश ज्यो तिशीश्वमर कयने रहथि जकरा उमापति उपाघ्या्य आगॉं बढौलनि जे एहि कालावधि मे विशेष प्रचलित भेल। क्रमश: संस्कृथत प्राकृतक व्य वहार कम होअय लागल आ मैथिली मे सम्पूपर्ण नाटक लिखल जाय लागल। पदावली-साहित्यरक समान मघ्य्कालीन नाटक नेपाल आ आसाम धरि व्यालपक भ’ गेल। एहि एकारेँ मैथिली नाटकक विकास तीन केन्द्रक मे भेल-मिथिला, नेपाल आ आसाम।

नेपालक मैथिली नाटककार लोकनिक कार्य भूमि भातागॉव, काठमाण्डून आ ललितपुर पाटन मे रहल। नेपाल मे मैथिली नाटक संस्कृ्त नाटक परम्पथराक स्थाणनपर मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल। ओहि समय मे मुसलमानक प्रभाव सँ नेपाल मुक्तट छल जकर फलस्व्रूप सांस्कृथतिक आ साहित्यिक क्रिया-कलाप मे कोनो तरहक व्यवधान नहि भेल। एहि प्रकारेँ नेपाल मे मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल जे एक भाग अपन नव-शिल्प क उत्थाहन मे लागल रहल आ दोसर भाग प्राचीन संस्कृ त-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाट्य स्वलरूप केँ किछु दिन धरि अपन पूर्ववर्ती स्वारूप केँ सुरक्षित राखलक। नेपाल मे मैथिली नाटकक जे श्रृंखला स्था्पित भेल ओकर सब श्रेय मल्लच राजवंश केँ छैक। भातगॉव मे प्रचुर परिमाण मे नाटक लिखल गेल आ उल्लेथखनीय नाटककार मे जगज्योवतिर्मल्लॉ (1613-1633), जगत्प्रनकाश मल्लर (1637-1672), सुमतिजिता मित्रमल्ले (1672-1696), रणजीत मल्ल (1722-1772),भूपतीन्द्र् मल्ल1 (1696-17क22) आ श्रीनिवास मल्ल् (1658-1685) छथि। रणजीतमल्लल सबसँ बेसी नाटकक रचना कयलनि। काठमाण्डू आ पाटनक उल्ले1खनीय नाटककार मे वंशमणि आ सिद्ध नरसिंह देव (1622-1657) क नाम लेल जाइत अछि। ई नाटककार लोकनि प्रचुर परिमाण मे नाटकक रचना कयलनि जाहि मे जगत्ज्योतिर्म्मलक ‘हरगौरी विवाह’ (1970). विश्वँमल्ल क ‘विद्याविलाप’ (1965) आ जगत्प्र काश मल्लाक ‘प्रभावती हरण’ नाट्क अद्यापि प्रकाशित भ’ पाओल अछि। शेष अन्यव नाटककार लोकनिक नाटकक प्रकाशन अद्यापि नहि भ’ पाओल अछि जे नेपाल दरबार लाईब्रेरी मे संरक्षित अछि। शेष अन्या नाटकादिक प्रकाशनसँ मैथिली नाटकक उदय आ विकास पर नव प्रकाश पडि सकैछ। एहि नाटकादि मे गीतक प्रधानता अछि, कथानक पौराणिक अछि, नाटककार क्योा होथु, किन्तु् ओहि मे प्रयुक्ता गीतादि अन्य कवि लोकनिक उपललब्ध होइछ। सभ नाटक अभिनीयता सँ पूर्ण अछि आ ओकर भाषा मानक मैथिलीक प्रतिमान प्रस्तु त करैत अछि। महाराज पृथ्वीूनारायण साह (1768-1775) क आक्रमणक फलस्विरूप मल्लउ राजवंश द्वारा स्थाापित परम्पारा समाप्त6 भ’ गेल आ ओकरा स्थालन पर गोरखा राजवंशक स्था पना भेल। एकर फलस्वजरूप काठमाण्डूय आ पाटन मे नाटकक परम्प’रा क समाप्ति भ’ गेल, किन्तुं भातगॉव मे अद्यापि ई परम्पपरा सुरक्षित अछि।

नेपालक उपर्युक्त परम्पकराक क्षीण आलोक मिथिला मे सेहो भेटैत अछि। मिथिला मे जे नाटक लिखल गेल ओकर नाम केँ ल’ कए विद्वान लोकनि मे मतैक्य क अभाव अछि। डा. जयकान्तक मिश्र (1922) एकरा ‘कीर्तीनयॉं नाटक’ रमानाथ झा (1906-1971) ‘कीर्तनियॉं नाच’ आ डा. प्रेमशंकर सिंह (1942) ‘लीला नाटक’ नामसँ अभिहित कयलनि अछि। एहि नाटककादिमे मूलरूप सँ शिव तथा विष्णु9 क लीला प्रस्तुदत कयल गेल अछि। एहि नाटकादि केँ नाट्य मण्ड ली आदि कृष्णव आ शिवसम्ब्न्धीस विविध कथादि केँ आधार बना क’ प्रदर्शन करैत छल. एहि कोटिक नाटक मे उपलब्ध सामग्री सभकेँ तीन काल खण्डद मे बाॅटल जा सकैछ: प्रथम उत्थानन, द्वितीय उत्थामन आ तृतीय उत्थातन । प्रथम उत्थाबनक नाटक कार मे गोविन्दमक ‘नलचरितनाटक’ रामदास (1644-1671) क ‘आनन्दत विजय नाटक’, देवानन्द‍क ‘उषाहरण’ आ रमापतिक ‘रूकिमणीहरण’ इत्या6दिक नामोलेख कयल जा सकैछ। द्वितीय उत्था‍नक उल्लेकखनीय नाटककार लोकनि मे लाल कविक’गौरीस्वायंवर’ (1960), नन्दीेपतिक ‘कृष्णमकेलिमाला नाटक’ (1960), गोकुलानन्दड क ‘मानचरित नाटक’, शिवदतक ‘पारिजात हरण’, कर्णजयानन्दतक ‘रूकमागद नाटक’ श्रीकान्त9 गणक ‘श्रीकृष्णा जन्मत रहस्यि’, काल्हाारामदासक’ गौरी स्वनयंवर नाटक’, रत्नकपाणिक ‘उषाहरण नाटिका’, भानुनायक ‘प्रभावती हरण’ आ हर्षनाथ झा (1897-1898) क ‘उषाहरण’, ‘माधवानन्दा’ एवं ‘राधाकृष्णा मिलन लीला’ (1962) आदि साहित्यिक दृष्टिसँ उल्लेकख

अछि। तृतीय उत्था‍नक नाटककार मे विश्व9नाथ झा क ‘रमेश्वटरबन्द्रिक’ चन्दा, झा क ‘अहल्या् चरित नाटक’ महामहोपाघ्याकय परमेश्वार झा क ‘महिषासुर मर्दनी’ आ राज पण्डित बलदेव मिश्र (1897-1975) क ‘राजराजेश्वारी’ एवं ‘रमेशोदय नाटक’ उल्लेबखनीय थिक। एहि मे सँ किछु नाटक अनुसंधाता लोकनिक अथक प्रयास सँ प्रकाश मे आयल अछि, किन्तुय अधिकांश अद्यपि अप्रकाशित अछि। ई नाटककार लोकनिक नाटकादि मे नाटकीयताक अभाव परिलक्षित होइत अछि तथापि एहि कालक नाटकक बुझैत दीपक क्षीण आलोकक अभास भरैत अछि।

मैथिली नाटकक विकसित आ सुव्यझवस्थित स्व रूप हमरा असम मे उपलब्धअ होइत अछि। महाप्रभु चैतन्यसक वैष्णयव धर्मक समस्तू पूर्वान्चलल क भारतीय साहित्यप पर यथेष्टम परिमाण पडल जकर परिणाम भेल जे साहित्य् पूर्णत: भक्तिमय भ’ गेल। फलत: साहित्यि मे रसक दृष्टिसँ विशेषत: कृष्ण्क अवतार लीला कथा केँ अधिक प्रश्रय देल गेल। वैष्णिव कवि लोकनिक अभिव्यिक्तिक भाषा अन्धवकारमय छल। विद्यापतिक श्रृंगार रसक पदावली मे राधाकृष्णक उल्ले ख रहलाक कारणेँ चैतन्यभदेव ओकरा भक्तिरस क कविता बुझलनि। ओ वैष्णरव धर्मक प्रचारार्थ विद्यापतिक कविता केँ माघ्य म बनौलनि। जखन विद्यापतिक भाषा आसाम पहुँचल तखत युगपुरूष शंकर देव (1449-1568) आ हुनक शिष्य माधवदेव (1489-1556) विद्यापतिक भाषाक अनुकरण क’ कए ओकरा संग असमिया केँ मिश्रित क’ कए एक नूतन भाषा ब्रजबुलिक जन्मथ देलनि। आसमाक ब्रजबुलि असमिया साहित्ययक मेरूदण्डि थिक। एकरा माघ्य्म सँ असमिया-साहित्यआ रस-समृद्ध भेल अछि। एक दूरूप थिक: वरगीत आ अङकीयानाट। युगपुरूष शंकरदेव वैष्ण्व धर्मक प्रचारार्थ नाटक केँ माघ्य म बनौलनि। अङकीयानाट मे गद्य आ पद्यक समविभाग थिक। सबसँ आश्च र्यक बात थिक जे महापुरूष शंकरदेव विशुद्ध आसमिया मे कयलनि, मुदा विद्यापतिक भाषासँ ओ एतेक अधिक प्रभावित भेलाह जे मैथिली-मिश्रित असमिया मे वरगीत आ नाटकक रचना कयलनि। असमी साहित्यर मे एकर एहि विशिष्ट-ता पर प्रकाश दैत अछि। डा. वाणीकान्तस कातकी क कथन छनि, ‘जाहि प्रकारेँ प्रचण्ड वात्या. वन मं लागल दत्वासगिन केँ प्रज्वकलित करबा मे सहायक होइत अछि ओही प्रकारेँ साहित्यज जातीय एवं महाजातीय आन्दोयलन केँ प्रेरित करैछ। नाटक, गीत एवं पद ई तीनू शंकर देवक वैष्ण व-आन्दोोलन केँ शाक्ता प्रदेश मे एतेक व्यािपक आ लोकप्रिय बनौलक जाहि प्रकारेँ मरूभूमिक ऊँट जलक गन्धी-सूत्र पकडि क’ जलाशयक खोल मे चलि पडैछ ओही प्रकारेँ तृषित जनता परगीतक सौरभसँ आकृष्टक भ’ कए शंकर माधवक शरणापन्न भेलाह ‘असमिया साहित्यस, 510 वाणी कान्ताक काकती)।

युगपुरूष शंकरदेव अपन तीर्थ-यात्राक क्रम मे विद्यापति क वैष्ण व-वंश्कक गुरूमानि मिथिला अयलाह। ओहि समय मैथिली-काव्या आ नाट्य-साहित्य विकासक अपन चरमपर छल। उमापति उपाघ्याओय रचित ‘पारिजातहरण’ क अभिनय अत्य्धिक भ’ रहल छल। एकर विषय-वस्तुद सेहो राधाकृष्णि छल। पारिजातहरण अभिनीत होइत देखिक’ प्रयोक्ता शंकरदेव अत्यारधिक प्रभावित भेलाह। एस. के. भूइयॉंक मतानुसार, ‘आङ्कीयानाटक भाषा मैथिलीक तथा आसमियाक मिश्रणक विलक्षण उदाहरण प्रस्तुपत करैत अछि। ‘ (Oh Anita NAT, She. BHUYAN, Page 288-289) (शंकरादेव अपन अद्वितीय प्रतिभा आ अप्रतिभ बैदुष्यक बल पर असमिया साहित्य. मे अङ्कीयानाटक जनकक रूप मे प्रख्याभत छथि। नाटककार लोकनि पुराणादि सँ उपादान क चयन कयलनि आ एहि सन्द र्भ मे भागवत पुराण, हरिवंश पुराण एवं रामायण हुनक प्रधान उपजीव्यि रहल। शंकरदेवक निम्नांमकित नाटक कालिदमन (1518), पत्नीु प्रसाद (1521), केलिगोपाल (1540), रामविजय (1568), रूक्मिणी हरण (1568) संतपारिजात हरण (1568) आ माधवदेवक भोजजनविहार, भूमि लोखा, अर्जुन भंजन (1538), विम्प रा-गुचोबा, रासझुमरा, चोरधरा, कटोरा-खेलोबा, भूषण हेरोवा एवं ब्रहमा-मोहन आदि प्रकाशित आछि। एकर अतिरिक्त् गोपाल अता (1533-1688), द्विजराजभूषण (1507-1571), रामचरन ठाकुर (1521-1600) आ दैत्यावरि ठाकुर (1564-1622) आदि नाटककार उल्लेनखनीय छथि। यद्यपि एहि नाटक सभक कथा-वस्तुत पौराणिक रहल, किन्तुष संस्कृात और प्राकृतक स्थादन पर मैथिली-असमिया-मिश्रित गद्यक प्रयोग भेल। गीतक स्थिति यथावता रहल, किन्तुर संस्कृ्त-प्राकृतक प्रयोग नहि कयल गेल जतय ओ अनिवार्य छल। एहि नाटकादिक उद्देश्य मनोविनोद नहि, प्रत्युथत वैष्णृव धर्म प्रचार करब छल। एहि लेल अधिकांश नाटकादि मे कृष्णयक वात्सुल्यपमय आ दासत्वण भावक पूर्ण लीलाक रूप मे वर्णन कयल गेल। रंगमंचक दृष्टिसँ ई अधिक सुव्यमवस्थित अछि।



एहि नाटकादि विषय-वस्तुस, रूप-रचना, भाषा आदि विशिष्टूता केँ देखनासँ प्रतिभाषित होइत अछि जे युग पुरूष शंकरदेव असमक लोक मनोरंजनक विधा पर मैथिली आ ब्रज क्षेत्र मे प्रचलित रंग-शैलीक आरोपन ओहिना कयलनि जेना संस्कृमत नाटकक शास्त्रोेक्त परम्पवरा छल, कारण नाटकक माघ्यषमसँ ओ वैष्णलव धर्मक प्रचार-प्रसार करय चाहैत छलाह। मघ्यशकालीन अन्य उल्ले खनीय सामग्री सभ मे मैथिली गद्यक प्राचीन परम्पकरा केँ जोडबाक निमित प्राचीन दस्ता वेजादि मे एकरारनामा, गौरीवचरिका, बहिखत, अजातपत्र, एकररपत्र, निस्ता र पत्र, दानपत्र, फैसलापत्र आ चिट्ठी-पत्री उपलब्धग होइत अछि। एहि अभिलेखादि मे कतहु साहित्यिक सौन्द र्य भेटैछ। मैथिली साहित्यम मे एकर महत्व् एहि बात केँ ल’ कए अछि जे ई सब मैथिली गद्यक विकास-क्रम विच्छिन्नर परम्पतराक पूर्ति करैत अछि।



पद्य-काव्यवक परम्पनरा तँ पूर्णवते रहल, किन्तु एहि युग मे महाकाव्य , चरित-काव्यत, संस्मजरण आदि लिखबाक परम्पकराक शुभारम्भ भेल। नव राजनैतिक, सांस्कृअतिक, सामाजिक आ साहित्यिक स्वबरूपक जन्मा भेल आ मैथिली मे नवयुगक प्रारम्भ भेल। एहि समय मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा संकलित एवं सम्पा दित रचनादि मे मैथिली क्रस्टोामैथी (1882) तथा ट्वेन्टी वन वैष्णरव (1884), भोल झा द्वारा सम्पाददित मैथिली संस्कृ2त भक्ति गीतादिक संग्रह, मैथिल भक्त प्रकाश (1920) आ जितेन्द्रि नारायण झा द्वारा संकलित आ कविशेखर बदरीनाथ झा (18931974) द्वारा सम्पातदित मैथिली गीत रत्नारवली उल्लेखखनीय अछि। एहि कालखण्ड4 मे गीतिकाव्य9 क परम्प्राक विकास भेल। विद्यापतिक परम्पनराक अतिरिक्त गीति-काव्याक काव्याकार भेलाह ओहि मे भन्जान कवि, लालकवि, कर्णश्यातम अछि प्रमुख छथि।



परवर्ती मघ्ययकाल मे एक नव-धारा चलल जकरा सन्त काव्यकक नाम सँ सम्बोीधित कयल जाइछ जकर आधार स्तभम्भए मे साहेबराम दास (लगभग 1746), महात्मा रोहिणीदत गोंसाई, महात्मार तारादत गोंसाई, महात्माा रामरूपदास, महात्मान लक्ष्मीानाथ गोंसाई, तारादत गोंसाई, महात्मात रामरूपदास, महात्माई हकरू गोंसाई, महात्माग परमानन्दन दास आ रघुवर गोंसाई प्रमुख छथि। लक्ष्मीानाथ गोंसाई क ‘गीतावली’ (1969) मे प्रकाश मे आयल अछि।



विद्यापतिक श्रृंगार-प्रधान गीत परम्पाराक विपरीत मनबोध (निधन 1788) कथा काव्‍यक माघ्यष मे ‘कृष्णाजन्म्’ (1934) क रचना कयलनि। हिनक लोकप्रियताक प्रमुख कारण थिक जे ई ग्राम्यत-शब्दा्दिक स्वईच्छ)न्दन भ’ कए प्रयोग कयलनि। इएह कारण अछि जे मैथिली साहित्या मे हिनक महत्व पूर्ण स्थादन अछि।



अनेक दृष्टिऍं मैथिली साहितयक आधुनिक काल मे अत्या‍धिक आधुनिकताक आभास भेटैत अछि। सन् 1857 ई. क सिपाही विद्रोह क पश्चा‍त् भारत वर्षक राजनैतिक क्षेत्र मे बड पैघ परिवर्तन भेल जाहि सँ साहित्य. सेहो अछूत नहि रहल। जतय अन्याकन्य भारतीय भाषादि मे साहित्यन मे गद्यक दिशा मे अत्याहधिक प्रगति भेल ततय मैथिली उपेक्षित रहल। एकर प्रमुख तत्वत छल फोर्ट विलियम कालेजक द्वारा उपेक्षा, मिशीनरी द्वारा उदासीनता, लिथो आ टाइप प्रेसक अभाव, समाज-सुधार सम्ब्न्धीष आन्दोमलनक अभाव, नव-शिक्षा योजना आ कचहरीक भाषा मे मैथिलीक उपेक्षा, मैथिल पण्डित लोकनिक संकीर्ण दृष्टिकोण तथा मैथिली भाषा-भाषी मे जनजागरणक अभाव। एहि दिशा मे उपर्युक्त् उपेक्षा नीतिक फलस्व रूप मैथिली भाषा-भाषी जतय रहथि ततय एहि गेलाह। आधुनिक युग मे एहि साहित्यकक जे प्रगति भेल अछि ओकर श्रेय कवीश्व र चन्दािझा, लालदास आ साहित्य रत्ना्कर मुंशी रघुनन्दगन दास केँ छनि से मौलिक, अनूदित रचनाक द्वारा मैथिली साहित्यझक श्रृंगार कयलनि।



मैथिली मे पत्र-पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्वररूप गद्य-साहित्य्क विकास भेल जकरा माघ्य्मे सुन्दीर भाषाक निर्माण भेल, शब्दव-भंडार मे श्रीवृद्धि भेल आ विश्वसविद्यालय स्तसर पर मैथिली केँ पाठ्य-विषयक रूप मे स्वीभकार कयल गेल। बीसम शताब्दी क प्रारम्भिक दशक मे मैथिली मे पत्र-पत्रकादिक प्रकाशनक शुभारम्भा भेल जकर फलस्वतरूप आधुनिक गद्य-साहित्यिक विकास मे तीव्रता आयल। मुद्रण कलाक नवीन वैज्ञाानिक प्रगतिक फलस्वजरूप पत्रिकादिक प्रकाशन मे जोरदार प्रगति भेल। मैथिली पत्रकारिताक प्रारम्भिक अवस्थाल तप, उत्समर्ग आ पीडादायक रहल अछि। मैथिलीक सर्वप्रथम पत्रिका मिथिलेतर क्षेत्र जयपुर सँ प्रकाशित भेल मैथिल हित साधन (1905)। एकर प्रकाशनक दोसर वर्ष काशीसँ मिथिलामोद (1906) क प्रकाशन भेल। मिथिलामोद मातृभाषाक जागरणक जे शंखनाद कएलक ओकरा निरर्थक नहि कहल जा सकैछ, कारण मैथिलीक आङनमे बैह शंखनाद क्रान्तिक स्वकर बनल। निर्भीकता, व्यंकग्य।, मैथिलीत्वरक समर्थन, मैथिली भाषाक ओजस्विता एहि पत्रिकाक प्रधान गुण छल। मिथिला सँ मिथिला मिहिर (1907) उदित भेल। प्रारम्भज मे एकर स्वारूप मासिक रहल आ पाछॉं जा क’ ई साप्ताअहिक भ’ गेल। मैथिली मे ई पत्रिका दीर्घजीवी रहल। सन् 1960 ई सँ 1989 धरि ई प्रकाशित होइत रहल। जतय धरि मैथिली सेवाक प्रयत्न अछि एकर योगदान सराहणीय रहल। एकरा द्वारा गद्य केँ अभिवर्द्धित करबाक उदेद्श्यत सँ उत्प्रे रित भ’ कए वर्तमान गद्य-गंगा विविध रूप सँ समलंकृत भेल अछि। स्वाितन्त्रो त्तँर काल मे मैथिली गद्य-साहित्यगक विकास विभिन्नू विधा यथा उपन्या स, कहानी, निबन्धत, आलोचना, यात्रा, संस्म्रण, साक्षात्कावर आदि गद्यक संभावित विधादिक विकास मे एकर बहुमूल्या योगदान रहल। प्रथम विश्वायुद्ध क पश्चादत् मैथिली पत्रिकादिक प्रकाशन मे तीव्रताक संचार भेल। एहि कालावधि मे अनेक पत्रिकादि प्रकाशित भेल जे साहित्यिक जागरण मे सहयोग दैत रहल। ई पत्रिकादि मातृभाषाक प्रति जे शिक्षित जनमानसक घ्यािन आकृष्ट् होइत रहल जकर प्रतिफल तँ एकरा अवश्येा कहब। मैथिल प्रभा (1920-192, मैथिली प्रभाकर (1929-1930), श्री मैथिली (1925-1927), मिथिला (1929-1931), मिथिलामिश्र (1931-1932), मैथिल बन्धुर (1935), मैथिलयुवक (1931-1941), जीवन-प्रभा (1940-1950), भारती (1937), विभूति (1936-1938), मैथिली साहित्यसपत्र (1937-1938) आदि अनेक पत्रिकादि साहित्य5क जागरण मे सहयोग दैत रहल अछि।



देशक स्वासधीनताक पश्चाछत् तँ मातृभाषादिक महत्वय आर वेशी बढि गेल अछि। जनसाधारणक घ्या न मातृभाषाक दिस गेल आ सचेष्टँ एवं जागरूक भ’ कए एकर विकास मे संलग्नण भेलाह। स्वातंत्रताक प्रभात मे स्व देश (1948) क अभ्युएदय भेल। पटना सँ मिथिला ज्योसति (1949) प्रकाशित भेल। सीतामढी सँ वैदेही (1950) प्रकट भेल। मातृभाषाक एहि नवोत्था ान मे मिथिला दर्शन (1952), पल्ल1व (1क948), मिथिला सेवक (1954), निर्माण (1955), इजोत (1960), मिथिला दूत (1954), बटुक (1949) घीयापूता (1957), कर्णामृत (1981), अन्तिका (1998), पूर्वातर मैथिल (2000) एवं घर बाहर (2001) इत्या दि सब पत्रिकादिक योगदान अछि।

(अगिला अंकमे जारी)
भाग रौ
(संपूर्ण मैथिली नाटक)- (आगाँ)
लेखिका - विभा रानी

पात्र - परिचय

मंगतू
भिखारी बच्चा 1
भिखारी बच्चा 2
भिखारी बच्चा 3
पुलिस
यात्री 1
यात्री 2
यात्री 3
छात्र 1
छात्र 2
छात्र 3
पत्रकार युवक
पत्रकार युवती
गणपत क्क्का
राजू - गणपतक बेटा
गणपतक बेटी
गुंडा 1
गुंडा 2
गुंडा 3
हिज़ड़ा 1
हिज़ड़ा 2
किसुनदेव
रामआसरे
दर्शक 1
दर्शक 2
आदमी
तांबे
स्त्री - मंगतूक माय
पुरुष - मंगतूक पिता



भाग रौ
(संपूर्ण मैथिली नाटक)
अंक : 2
दृश्य : 3

सांझुक समय। तेज बरिसाति आ मेघ बिजली गर्जन-तर्जनक स्वर। पहिलुका तीनू भिखमंगा' छौंड़ा मे स' सभस' छोटका आब रूमाल बेचैत अछि। ओ अपन समान सभ प्लास्टिक स' तोपबाक चेष्टा करैत बस स्टैंड दिस अबैत अछि। मंगतू अपना जगह बइसल पानि बरिसब देखि रहल अछि। ओकरा लग भीखक पाइ छितराएल छै। छौंड़ा दूरे स' मंगतू के देखैत अछि आ फेर अपना पेन्टक जेबी उन्टा क' देइत अछि। मंगतू लग पड़ल पाई दिस ओ चुंबक जकाँ आकर्षित होबैत बढ़ल चलैत अबैत अछि। मंगतू पानि छोड़ि ओकरा दिस देख' लगैत अछि। छौंड़ा दू-चार डेगक दूरी पर एकाएक थम्हि जाइत अछि।
मंगतू : की रौ झुनमा, की भेलौ।
झुनमा : किछु नञि ।
मंगतू : त' रूकि कियैक गेलें?
झुनमा : अहिना।
मुंगतू : मुंह एना छाउर जकाँ कियैक केने छें? माल-ताल नञि बिकलऊ की?
झुनमा : ई बरखा-बैकाल मे लोक घर भागत की समान कीनत।
मंगतू : (कनेक काल चुप रहिक' जेना बात बदलिक) ई त' तों नीक केलें, जे भीख मांगब छोड़ि काज पकड़ि लेलें। अच्छा झुनमा, ई बता, तोरा पानि नीक लागै छौ?
झुनमा : पेट भरल रहला पर गदहियो करीना कपूर लगै छै।
मंगतू : (जेना अपनही प्रवाह मे) हमरा बड्ड नीक लगैत अछि ई बरिसाति! आ, सुनबै छियौ, किताब आओर मे केहेन-केहेन गप्प सभ लिखल छै, बरिसाति लेल - कारी-कारी मेघ, झमझम बरिसति पानिक धार - चांनी जकाँ, भीजल धरतीक सोंन्हिपन, जेना कुम्हारक आबा मे बासन आओर पाकि रहल हुअए। हवा मे सिहकी आ मोन मे कामनाक ज्वार! प्रिय स' मिलनक इच्छा..।
(पार्श्र्व स' कजरीक मद्घम स्वर)
सखी हे आएल रात अंधियारी
बदरा कारी-कारी ना
झींगुर, मोर, पपीहा बोले
दादुर दमके ना, सखि हे
दादुर दमके ना, सखि हे
आएल रात अंधियारी
बदरा कारी-कारी ना।
झुनमा : रह' दे रौ, रह' दे। पोथीक गप्प रह' दे। पोथी लिख' बला पढुआ लोक छै। ओकरा सभ के भरिसकि नञि बूझल छै जे पानि एला स' बाढ़ि अबै छै, घर, जान-माल डूबि जाइ छै, सभटा जमा पूँजी स्वाहा..
मंगतू : (फेर अपनही रौ मे) आ ओकरो स' त' नीक लागै छै बरिसातिक बादक रौद। एकदम नहाएल धोएल, स्वच्छ काया जकाँ।
झुनमा : (खौंझा क') रौ सार! एतेक साहरूख खान कियै बनल जाए छें रे। एहेन बरखा-बैकाल मे तोरा सनीमा सूझै छौ, हमरा राहत बाँट'बला देखाई पड़ैत अछि। हे.. ऊ देख.. हवाई जहाज स' पाकिट सभ खसि रहल छौ, हे एम्हर.. हे ओम्हर.. हौ, हौ जी, एकटा एम्हरो खसाबहक ने! यौ भाई जी, भाई जी यौ, एकटा एम्हरो खसबियौ ने यौ। बड्ड भूख लागलए.. एको छदामक माल नञि बिकाएल..।
मंगतू : रौ झुनमा। ओम्हर की चिकरि रहल छें। ले, ई पाइ ल' ले, आ ल' आन किछु.. गप-सप्प करैत खा-पी लेब। आ हे, सूत'क मोन करओ त' सुतियो जइहें। अही ठाँ स' धंधा पर निकलि जैहें।
(झुनमा पाइ लेइत अछि आ चलि जाइत अछि। मंगतू फेर स' अपन दुनिया मे भुतिया जाइत अछि। ओ गबैत अछि..)
'बरसात में हमसे मिले तुम सजन
तुमसे मिले हम, बरसात मे।'
(झुनमा अबैत छै आ एकटा ठोंगा ओकरा थमा देइत छै।
झुनमा : ले रौ हमर आमिर खान! खो।
(दुनू खाइत अछि। मंगतू स्वाभाविक रूप स' आ झुनमा हबड़-हबड़ खाइत अछि।)
मंगतू : चौप खूब नीक बनल छै ने।
झुनमा : हूँ..
मंगतू : काल्हि कोनो आओर चीज आनिहें।
झुनमा : हूं..
मंगतू : किछु बाजै कियै ने छें?
(झुनमा हाथ स' थम्ह' के इशारा करैत अछि। मंगतू ओकरा देखैत रहैत अछि। झुनमा पूरा खेलाक बाद ढेकरैत अछि आ बजैत अछि।)
झुनमा : हँ, आब बाज! पेट खाली रहला पर दुनिया बड़का अंडा देखाई छै। आब पेट भरि गेल अछि आ भरल पेट मे त' सुअरनिओ रबीना टंडन लागै छै। (गबैत अछि) तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त।
(खाए पीबि क' दुनू ठोंगा ओही ठाँ एक कोना मे बीगि देइत अछि। दुनू पानि पिबै अछि आ ढेकरैत अछि। दुनू एक-दोसरा के देखैत ठठाक' हॅँसि' पड़ैत अछि।)
झुनमा : कतेक बाजल हेतै?
मंगतू : दस स' कम की भेल हेतै! पानि त' कहैय' जे आइ छोड़ि काल्हि हम बरसबे नञि करब।
झुनमा : (उदास होइा) एतेक पानि बरसतै त' रोड सभ टूटि जेतै। पटरी डूबि जेतै। बस ट्रेन चलल बन्न भ' जेतै।
मंगतू : त' अई लेल तों मलिन कियैक भ' गेलें?
झुनमा : रौ, बस-ट्रेन नञि चलतै त' पसिन्जर नञि ऐतै। ओ सभ नञि एतै त' हमर बिक्री-बट्टा.. बिक्री नञि त' पाइ नञि.. पाइ नञि त' दाना नञि।
मंगतू : रौ झुनमा, एक बात बता। तों बस-ट्रेन स' कतेक दूर धरि गेल छें? पटना स' मुजफ्फरपुर धरि.. किऊल धरि.. दानापुर.. पटना साहिब.. केहेन सोहनगर लागैत हेतौक ने देख' मे.. हजारो लोकक एके संग चढ़ब, एके संगे उतरब। फर्र-फर्र भागैत बस- ट्रेन। सर्र-स' छूटैत लोक, घर, खेत, खलिहान, गोरू बरद.. । हमरो हाथ-गोर रहतियैक त' जएतहुँ ने तोरे आओर जकाँ।
झुनमा : हँ, जेतें आ पुलिसक डंडा आ पब्लिक गारि-बात खेतें। बम फ़ुटनें जान गमबितें। एम्हर बम ओम्हर बम, एतेक मरलै, एतेक घायल.. याहि सभ त' आइ काल्हिक नूज छै।
मंगतू : (दीर्घ साँस लेइत) जानक की। ऊ त' अई ठाँ बइसलो बइसलो जा सकै छै। के जानए, एगो बम एम्हरो फाटय आ हम सभ' लत्ता बनि उड़ि जाइ.. बम, गोली, दंगा- ई सभ त' आइ काल्हिक रीत भ' गेलैये। एगो बम फूटै छै आ सैकड़ो लोक एक्के मिनट मे अपाहिज, लोथ भ' जाइ छै। किओ पूछय हमरा स' लोथ भेलाक दर्द। रौ.. हम त' रोजे मनबै छी जे हमरा मौगत आबि जाए। ई लोथ जिनगी स' की फेदा!
झुनमा : हमहँू सभ त' इएह बाजै छी।.. की सोचै छें? ऊपरवाला लग एतेक टेम छै हमरा आओरक गप्प-सुनबाक। नमगर लाइन हेतै रौ भाइ! (ओकासी मारैत अछि।)
मंगतू : नींद आबि रहल छौ। सूति रह अही ठाँ।

(दुनू मिलिक' मंगतूक चीकट कथरी ओछा ओठँगि जाइत अछि। कनेक देरी मे दुनू फ़ोंफ़ि काट' लगैत अछि। मंचक प्रकाश शनै:-शनै: लाल होब' लगैत अछि। नीने में मंगतू बड़-बड़ाइत अछि-'हम जीय' नञि चाहै छी, 'हमरा मौगत द' दिय!' 'हमरा मौगत कियैक नञि अबैत अछि।' झुनमोक अस्फुट स्वर बहिराइ छै -'हं', जिय' नञि चाहै छी।' 'ई केहेन जिनगी अछि! मरने बेसी नीक' आदि। प्रकाशक लाली मंगतू पर केन्द्रित। मंगतू नींने मे उठि क' बैसि जाइत अछि आ अलसाएल नजरि स' अपना के देखैत अछि। जेना-जेना ओ अपना के देखैत अछि, तेना-तेना ओकर आँखि स' नींद गायब भेल जाइत अछि आ ओहि स्थान पर आश्चर्य भर' लागैत छै।)
मंगतू : अरे, ई की? हमर हाथ? आ पैर सेहो?.. जेना जमीन स' बीया फूटि रहल अछि - सुंदर, कोमल, नरम.. ई केहेन चमत्कार! भगवान, अहाँ सचमुच कृपालु छी..
(शनै: शनै: मंगतू मंच पर पूर्ण व्यक्तिक रूप मे ठाढ़ भ' जाइत अछि।)
हम.. हम एक गोट पूरा-पूरा आदमी, दुनू हाथ, दुनू गोर.. पतियाऊ की नञि पतियाऊ। (अपने बांहि मे बिठुआ कटैत) नञि, पतियाएबला गप्प नञि छै। (फ़ेर अपने स') कियैक नञि छै? हमर हाथ गोर घुरि आएलए हमरा लग, त' अइ मे नञि पतियाएबला गप्प की भेलै? आब हम अपन हैसियत बदलि सकै छी.. नीक समांग़ बनि सकै छी। भीख माँगब .... ई गर्हित कर्म स' हमरा मुक्ति भेंटि जाएत.. भेटत की.. भेटि गेल! हे.. ई लिय'.. छोड़लहुँ हम भीख माँगब.. (हँसैत अछि।) आई स', एखनि स'। आब हमरा अई जिनगी स' कोनो सिकाइत नञि ।
(किलकि उठैत अछि। झुनमा ओकर आवाज सुनि उठैत अछि। मंगतू के अई रूप मे पाबि क' हैरान रहि जाइत अछि। मंगतू कनखी मारि क' खुशी प्रकट करैत अछि।)
झुनमा : ई जादू छै।
मंगतू : ऊँहूँ! सच।
झुनमा : भइए नञि सकै छै। ई जरूर कोनो जादू छै अथवा नैना -जोगिन।
मंगतू : अहँ! एकदम सच। छूबि के देख।
(झुनमा ओकरा छुबै छै। अपन आँखि मलैत छै, फेर छुबै छै।)
झुनमा : हँ, बुझा त' रहलए सचे सन! जौं ई सच छै, त' गुरू, कहू, आब की इरादा?
मंगतू : इरादा? अरे, आब त' हम खुजल आसमानक मुक्त पंछी छी। (गबैत अछि)
'पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में
आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में'
झुनमा : एतेक आजाद नञि छें, जतेक बूझै छें।
मंगतू : माने?.. जीवन एतेक सुंदर भ' सकै छै, हम त' ई सोचबो नञि केने छलहँु। देख, ई रोडक बत्ती.. बरिसातक पानि मे केहेन सतरंगी किरण छोड़ैत अछि। ई चाकर रोड, एखन शांत अछि - भिनसर होइत होइत कतेक जगजियार भ' जाइ छै.. (गबैत अछि) 'ई सहर बहुत हसीन है।' (आगाँ बढ़ैत अछि।)
झुनमा : कत' जा रहल छें।
मंगतू : पता नञि। हम त' खाली बूझ' चाहै छी, ई पूरा-पूरा देहक सुख उठाब' चाहै छी। भगवान, हम अहाँ के कएक बेर गारि पढलहुँ। आई अहाँ के धनबाद दइ छी। हमरा माफी द' दिय'.. (आओर तेजी स' चलैत अछि) की करब! लोक आओर जहन दुखी होइ छै, अहिना बाजै छै.. (खूब तेज-तेज चलैत अछि।)
झुनमा : रौ, हवाइ जहाज जकाँ कियैक उड़ल जा रहल छें?
मंगतू : चल, चल (गबैत अछि) 'दो दीवाने शहर में, रात मे या दोपहर में, आबो दाना ढँूढ़ते हैं, इस आशियाना ढँूढ़ते है।'
झुनमा : रौ, हम थाकि गेलहूँ। गमे - गमे चल।
मंगतू : हमर त' मोन भ' रहलए जे हम ई पूरा-पूरा धरती मापि ली, बामन भगवान जकाँ.. पूरा संसार के अपन अंकबारि मे भरि ली.. खूब चिकरि-चिकरि के गाबी -
'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन।
शरारत करने को ललचाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन।'
झुनमा : (डेराइत) मंगतू, एना सनकाह - बताह जकाँ नञि कर। हमरा डर होइए।
मंगतू : झुनमा, हमरा आइ केहेन लागि रहलए, बूझल छौ?
झुनमा : .. ..
मंगतू : आई हमरा मोन मे एकटा कामना, एक गोट इच्छाक मूर्ति बनि रहलए.. प्रेमक नरम अनुभूति.. आइए.. एखने.. लागि रहलए जे कोनो नरम, नाजुक अंचरा मे अपन मुंह तोपि ली.. ओकर प्रेम भरल स्पर्श हमर केश, देहक रग-रग मे पहुँचए आ अमृतक समुन्दर मे गहीर, खूब गहीर ल' जाए.. जत' प्रेम स' भरल संसार हएत..कियैक भ' रहल अछि एना?
झुनमा : भ' गेल ई आमिर खान.. आब गाओत 'आती क्या खंडाला!'
मंगतू : प्रेमक लालसा अई स' पहिने नञि भेल छल कहियो! झुनमा, सुन, तोहर भौजी.. (कनेक लजाइत अछि)
झुनमा : भेल आब ई सलमान खान (गाबैत अछि)
तेरे बिना, तेरे बिना..
(मंगतू आगॉं बढ़ैत अछि.. पाछू-पाछू झुनमा सेहो..)
मंगतू : देख, ई श्रमक जीबैत रूप.. मेहनति स' लोक एतेक ने थाकि जाइत छै जे.. ओ कहबी छै ने जे 'नींन नञि जानै टूटल खाट।' हमहू.. एकरे आओर जकाँ खटब.. एतेक जे बस, खसिते फोंफ काटब शुरू। (फोंफ काटैत अछि।)
झुनमा : मुदा तों काज की करबें रे! के देतौ काज तोरा? लूल्हि-नांगड़ि. मंगतुआ के सभ किओ जनैत छै.. मुदा आजुक ई नमगर, सोहनगर रितिक रोसन के काज के देतौ? जास्ती स' जास्ती उपदेस देतौ, जाहि स' पेट चलतौ नञि।
(फोंफ काटबाक नकल करैत मंगतू एकदम स' चेहाइत अछि। फोंफ बीचहि मे रूकि जाइत अछि। मुंहक चमक, खुशी बिला जाइत अछि।)
मंगतू : ऐं? की करब हम? (हँसैत अछि।) एकदम सही पकड़लें तों.. की करब हम?.. नञि, की क' सकै छी हम? ..रौ, तोंही बाज ने, की क' सकै छी हम?
झुनमा : खाली भीख माँगि सकै छें। सेहो लोथ-नांगर भ' क! एहेन मुस्टंडा भ' क' नञि ।
मंगतू : एह! एना नञि बाज । एतेक दिन बाद हमरा ई सनेस भेटलए, ओकरा.. (हठात ओकर गर्दनि पकड़ि लेइत छै।) फेर जुनि बजिहें ई.. रौ तों त' चारि हाथ-गोर बाला आदमी भेलैं। तो की बूझबें लोथक पीर।
झुनमा : (गर्दनि छोड़बैत) त' कलक्टरी कर। डाक्टरी कर। हम तोहर चपरासी, कंपोडर बन' लेल तेयार छी।
मंगतू : तों हमर हौसला बढ़ेबाक बदले ओकरा खसा रहल छें। हमरा लग डिग्री अछि जे..
झुनमा : त' कोनो धंधा क' ले.. किरानाक दोकान, कपड़ाक दोकान.. किछुओ.. हमरा अपना दोकान पर राखि लिहें।
मंगतू : कियैक मजाक क' रहल छें.. धंधा शुरू कर' लेल पूँजी चाही.. तों मदति की करबें, उन्टे.. चलि जो हमरा लग स'..
झुनमा : जाइ छी, जाइ छी। काल्हि फेर एबौ। अई बेर सिंघाड़ा खुअबिहें..
(जाए लागै छै। बीच-बीच मे मुड़ि-मुड़ि क' देखै छै जे मंगतू ओकरा बजा लियए। मंगतू ओकरा दिस ध्यान नञि देइत अछि। ई देखि ओ अपने स' एक कोन्टा में ठाढ़ भ' जाइत अछि आ मंगतू के देखैत अछि..)
मंगतू : (जेना फेर अपना धुन मे) एह! एतेक सोहनगर समय। भोर भ' रहल छै..। हे, ई सुनू, पाखीक स्वर। भोरक मंद- मंद बेयार। हे देखियौ, ई सूतल अछि। एक उठल कि सभ किओ उठि जाएत.. बल्कि, देखियौ, जनीजात सभ त' उठियो गेलीह। ओ ओम्हर चूल्हि सुनगा रहल छै.. एम्हर ई अपना बच्चा के दूध पिया रहल छै.. आ ओकरा देखियौ, ऊ चाहक पानि सेहो चढ़ा देलकै.. ओम्हर एकटा बच्चा माय के देखि मुस्किया रहल अछि.. कतेक सोहनगर छै.. पाजेबक छुन-छुन जकाँ जिनगी छनकि रहल अछि.. मंगतू.. रौ.. हिम्मत जुनि हारि.. काज भेटतौ तोरा.. धैरज धर..
(ओ ई सभ बाजिए रहल अछि कि पाछू स' बम फ़ुटबाक भयंकर आवाज़ होइत छै। पलखतिए मे रोआ- कन्नटि, भागा दौड़ी मचि जाइत अछि। मंगतू किछु नञि बूझला सन्ते अकबकायल ओहि ठां ठाढेक ठाढ रहि जाइत अछि। दिग्भ्रमित भेल ऊ चारू दिस देखैत अछि, फेर माज़रा सभ बूझ' मे अबितही चिकर' लागैत अछि..)
मंगतू : अरे, ई की भेलै.. ऊ दूध पियबैत माय! .... बच्चा ओकरा हाथ स' .... एतेक दूर खसि ..... आ ओ अपने गेंद जकाँ.. माथ फाटि गेलै.. ओ, ओ चूल्हि सुनगबैत स्त्री.. ओकर त' हाथे-गोर उड़ि .. अरे, ई निचिन्त सूतल लोक सभ.. कागज-पत्तर, खढ -पात जकाँ उड़िया.. (चिकरैत अछि) रौ, .. रौ रछसबा सभ.. जल्लाद, कसाइया सभ.. रौ, जिनगीक एक गोट साँस त' द' नञि सकै छें, मुदा.. कियैक छीन रहल छें हमर जिनगी? कियैक लोथ बना रहल छें हमरा? हमर अपराध की?
(पार्श्र्व स' ध्वनि.. जन्म लेबक अपराध केने छें तों सभ.. आब भोग।)
(चीख-पुकार एखनो मचल छै। मंगतू असहाय सन ठाढ़ अछि.. हठात ओकर कान में जोरदार आवाज अबैत छै 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचो.. भाग रौ.. ' (भीड़क भागबाक ध्वनि। मंगतू, सेहो बिनु किछु बूझने बदहवास चिकरैत भाग' लागैत अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' रसे- रसे अई भगदडि. मे सभटा पात्र सम्मिलित भ' जाइत छथि.. सभ चिकरि. रहल छथि.. 'भागू, जान बचाऊ.. भाग रौ.. भाग.. ' रसे- रसे स्वर शांत होइत अछि.. सभटा चरित्र एक-दोसराक हाथ पकड़ने मंचक एकदम अग्रभाग मे ठाढ़ भ' जाइत छथि। समवेत स्वर मे सभ बाजैत छथि।)
समवेत स्वर : हुअए खाहे युद्घक विभीषिका
वा खूनक बाजार गर्म
मुदा नञि थाक' बला, हार' बला
हम! ओ परम पिता,
ओ काल..
अहीं सं', हँ, अहीं स' अछि टक्कर हमर..
हम खसब, लड़ब, मरब,
मुदा फेर ठाढ़ भ' उठब
साठि हजार सगर-पुत्रक भाँति
ई संसार खल अछि, कामी अछि,
दुष्ट अछि, पिशाच अछि,
मुदा तइयो छै अई मे जीवनक आभा
जे अछि सत्यो स' बढ़ि क' सत्य..
शिवो स' बढ़ि क' शिव
अमरो स' अमर
सुंदरतो स' सुंदर..
जीवन, नञि अछि एतेक सस्त
जे बिछलि जाए
मुट्ठी मे बंद बालु जकाँ
हम जीयब, आ पारब रेघ
कालोक सम्मुख
ललकारब मौत के
बढ़ब विजय पथ पर
रचब नित नवीन अभियान
नित नवीन विहान
नित नवीन वितान
(अंतिम पंक्ति बाजैत-बाजैत सभ किओ आधा-आधा हिस्सा मे बॅंटिक' मंचक दुनू ओर ठाढ़ भ' जाइत छथि। प्रकाश मंगतू पर.. ओ अपन पहिल स्थिति मे अछि.. आ निन्न मे बड़बड़ क' रहल अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' । ओ नींने मे एम्हर स' ओम्हर भागबाक प्रयास क' रहल अछि। सभ पात्र वृत्ताकार मे ओकरा घेर लेइत अछि। फेर सभ एक दोसराक हाथ पकड़ि पाछू दिस झुकैत अछि, जाहि स' एकटा मानव-पुष्पक निर्माण होबैत अछि.. सभ कविताक अंतिम चार पंक्ति बाजि रहल छथि.. 'बढ़ब विजय- पथ पर, रचब नित नवीन अभियान.. ' बाजैत-बाजैत सभटा पात्र फ्रीज भ' जाइत छथि। परदा खसैत अछि।)

(समाप्त)

डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप मे विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे मे कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास)
सुशीलाजी जें कि आर्थिक रूपें समृद्ध आ निश्चिन्त छथि, आकर्षक
परिधान पहिरबाक क्षमता आ उन्मादक देहक स्वामिनी छथि, आइ भुवनजी, काल्हि
कमलजी, परसू केओ आओर... रंग-विरंगक स्वादमे मस्त रहै छथि। सभा-सोसाइटीमे,
बुद्धिजीवी लोकनिक बीचमे अपन उपस्थिति बनौने राखए चाहै छथि, प्रतिष्ठित आ
विद्वान लोकनिक नयनतारा बनल रहए चाहै छथि, तें ज्ञान नहिओ रहैत साहित्य,
कला, संस्कृति आ मिथिला-मैथिलीक प्रगतिगामी आन्दोलनसँ जुड़ल रहए चाहै
छथि; स्वस्थ आ सम्पूर्ण पुरुषक सान्निध्य हुनका लेल बड़ पैघ बात थिक। मदिरतम
मुस्कान, भू्र-भंगिमा, रति-सुरतिक प्रभावें विद्वत जनक आँखिमे बसल रहब हुनकर
नेत छनि (पृ. 39-40)। सुशीलाक राति आ निर्मलाक राितमे इएह अन्तर अछि आ
इएह समानता।...वस्तुतः सुशीला आ निर्मला, दुनू दू वर्ग स्त्राी छथि। एक गोटे प्राण
रक्षा लेल, नोन-रोटी लेल, अपन आ परिवारक क्षुधा मेटएबा लेल, स्वयं निष्काम
बनि दोसरक कामोत्तेजना शान्त करबाक साधन बनै छथि; दोसरक यौन-पिपासाक
शमन करै छथि; तँ दोसर यौन-पिपासासँ व्याकुल भेल दोसराकें पीबि जएबा लेल
उताहुल रहै छथि; नित नव-नव माछ पर जाल फेकै छथि।--निर्मला जी छथि
सभा-सोसाइटीक प्रेमिका। पुरुख-समाजमे गेला बिना नीक नहि लगै छनि। मैथिल
समितिक द्वारा ई भुवनजीक सम्पर्कमे अएलीह, आ भुवनजीक द्वारा मैथिल समितिक
सम्पर्कमे। आ भुवनजी हिनका अपनामे लपेट लेलथिन। निर्मलाजीकें ई गप्प अध्
ालाह नहि लगलनि। आब त’ सौंसे समाजकें बूझल छै जो ओ भुवन जीक प्रेयसी
छथि। हेम बाबूकें सेहो बूझल छनि। हेम बाबूक जमायकें सेहो खबरि छनि। ओ
बेचारा तँ लाजें कलकत्ता अबितो नहिएँ...(आन्दोलन/पृ. 39)।
विचारणीय विषय इहो थिक जे अर्थाभावे टा मानव जीवनक मूल समस्या
नहि होइत अछि। यौन-तृप्ति लेल विवाहेटासँ निश्चिन्त नहि भेल जा सकैत अछि।
निर्मलाजी तकरहि उदाहरण थिकीह, हुनका सन बिआहलि स्त्राी; विधुर पिता आ
परदेशी पतिक संयुक्त कमाइ पर एकछत्रा अधिकार रखनिहारि स्त्राीक ई आचरण कथी
लेल?
नीलूक चरित्रा अपेक्षाकृत बेसी व्याख्येय आ विश्लेषणपरक अछि। ओ
अनाथ छथि, मुदा भुवनजी सन निविष्ट व्यक्तिक छत्राछायामे लालन-पालन भेलनि।
जन्महिसँ महानगरमे छथि, मुदा महानगरीय अपसंस्कृतिक असरि हुनकर आचरण
पर नहि छनि। मैथिल संस्कार आ सभ्यतासँ परिपूर्ण छथि। वाक्चातुर्य, साहस,
शालीनता, प्रगतिकामना, रूढ़ि द्रोहसँ सम्पन्न तेरह-चैदह बर्खक किशोरी छथि।
अतिथि सत्कारमे पटु, काँचहि उम्रमे लोक-समाज आ देश-दुनियाँकें चिन्हबाक
क्षमतासँ परिपूर्ण, कोनहुँ परिस्थितिमे कोनहुँ व्यक्तिक समक्ष अपन बात निडरतासँ
रखबाक स्पष्टता छनि। विष्णुदेव ठाकुरकें ठाँय-पठाँय लोफर कहि देलनि (पृ. 16)।
नीलू भावुक छथि, कमलजीकें कमल भैया एहि लेल नहि कहती जे हुनकर
एकटा कमल भैया टी.बी. रोगसँ मरि गेलनि (पृ. 22-33)। कमलजीक जेबी आ
मनीबेग टेबैत रहै छथि, छोट हेबाक अधिकार मँगै छथि (पृ. 32)। घरमे एकाकी
जीवन व्यतीत करैत अकच्छ छथि आ कमलजीकें कहै छथि जे अहाँकें तँ हमरा दिश
तकबाक पलखति नहि होइए (पृ. 47-48)। निर्मलासँ कमलजीक हेम-क्षेम नीलूकें
नीक नइं लगै छनि (पृ. 48)। कमलजीसँ नीलूक हेम-क्षेम भुवनजीकें सन्देहास्पद
लगै छनि (पृ. 49)। कमलजी नीलूक करतब पर संशकित रहै छथि (पृ. 48)।
नीलूकें होइत रहै छनि जे ओ दिन राति कमलजी लग बैसल रहथि। राति कए
अर्द्धनग्न अवस्थामे कमलजीक ओछाओन धरि पहुँच जाइ छथि (पृ. 50-51)।
सम्पूर्ण कथामे नीलूक करतबकें एकटा ‘पाठ’ बूझि जँ एहि पर विचार-विमर्श हो, तँ
सब किछु झलफल बुझाइत अछि। कमलजी आ भुवनजीक शंका, नीलूक ईष्र्या,
बहिन-भाइक सम्बोधन, यौन-पिपासाक दैहिक आवश्यकता अथवा मनोवेग-उद्वेग
अथवा काम-युद्ध लेल उन्मादित योद्धा, आन्हर राक्षस...सब किछु गड्ड मड्ड भ’
जाइत अछि। कखनहुँ त’ मानवीय मनोवेगक सहजात चरित्रा लगैत अछि कखनहुँ
घनघोर रहस्यमय। सर्वगुण सम्पन्न किशोरी नीलूक यौनोन्माद हुनका समस्त नैतिकता,
मर्यादा, वर्जना आ सम्बन्ध-सम्बोधनक सीमासँ मुक्त क’ दै छनि। मनौन लेल
घिघियाइत कमलजीक समस्त प्रस्तावकें नकारैत साफे-साफ कहै छथि जे लोक किछु
कहए, हमरा नइं रहल जाइए, अहाँ हमरासँ विवाह क’ लिअ’ (पृ. 51)। मनोवेग आ
कामोत्तेजनाक खौंतकें एहि उपन्यासमे मानवीय प्रवृत्तिक रूपमे जतेक स्पष्टता आ
वैविध्यसँ व्याख्यातित कएल गेल अछि, ताहिसँ प्रमाणित होइत अछि जे सत्ते
यौनोन्मादमे गाय धरि बाघिन भ’ जाइत अछि। स्थापित मर्यादाक अधीन तृप्तिक
बाट साफ भेल तँ भेल, नहि भेल तँ उद्वेग लेल कोनहुँ सीमा, कोनहुँ मर्यादाक
अनुपालन काम्य नहि थिक। समस्त नायक-नायिका एवं सहयोगी पात्राक जीवन-प्रक्रिया,
रहन-सहन आदिक वर्णन एतए अत्यन्त स्वाभाविक ढंगें भेल अछि।
एकटा गौण स्त्राी पात्रा छथि कमलजीक भौजी। कमलजी अपन प्रवासक
श्रेय हिनके दै छथि। भौजी कहलकनि--गामक जीवन अहाँकें सहल नहि जाएत।
सहलो जाएत तँ... गामक लोक निन्दा करत। कहत, घरमे विधवा भौजी छथिन, तें
ई नौकरी छोड़ि गाममे बैसल अछि...(पृ. 13)। अइ वक्तव्यमे सेहो मानवीय वृत्तिक
सहज आशंका अछि--समाजक मोनमे संशय हेबाक आशंका, अपने मोनक सम्भावना
पर आशंका, कमलजीक धारणा पर आशंका...। आगि आ ख’ढ़ एक ठाँ रहत,
जानि नहि कहिआ की भ’ जाएत! ‘भौजी’ मैथिल समाजक अथवा मैथिल नारीक
विचित्रा उदाहरण थिकीह। जीवनक भार, सन्तानक भार, मर्यादाक भार, देहक भार,
समाजवृन्दक मोनमे उठैत कल्पनाक भार... मिथिलाक कोनो विधवा स्त्राीक जीवन
कोन तरहें, तरुआरिक धार पर चलबा लेल विवश रहैत अछि, तकरा उपन्यासकार
मात्रा एक वक्तव्यमे स्पष्ट क’ देने छथि।
सम्पूर्ण सृष्टिमे दू टा अभिकरण महत्वपूर्ण अछि -- एकटा समाज व्यवस्था, जाहिमे
राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, मूल्यनीति आदिक मर्यादा, कानून-कायदा आ
सीमा शर्त अबैत अछि; आ जकर प्रतिनिधित्व अइ उपन्यासमे मैथिल समिति द्वारा
चलाओल आन्दोलन थिक। एहि आन्दोलनमे सब किओ अपन-अपन पैरुख-प्रतिभाक
अनुकूल अपन-अपन महत्व साबित करए चाहै छथि, स’क भरि जे क’ पबै छथि,
करै छथि, तृप्त अथवा कुण्ठित होइ छथि; निन्दा-शिकायत, च’र-चुगलखोरी, ईष्र्या-द्वेषमे
लिप्त रहै छथि। अपन हैसियत लेल हरदम अत्यानुमान आ अदना लेल न्यूनानुमानक
धारणासँ ग्रस्त रहै छथि। मैथिल समितिक क्रिया-कलापकें जँ प्रतीक अर्थमे ली तँ
सम्पूर्ण भारतीय समाज व्यवस्थाक गुण-सूत्रा एहिमे भेटि सकैत अछि। दोसर अभिकरण
थिक मानवीय मनोवेगक सन्धान व्यवस्था। सत्य तँ ई थिक जे एकर कोनो व्यवस्था
नहि होइत अछि, कोनो स्थापित आ शाश्वत व्यवस्थासँ ई संचालित नहि होइत
अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक क्षण विशेषक मनोवेग अलग-अलग व्यवस्था विधान निर्मित
करैत अछि। रोटी, सेक्स, सुरक्षाक आवश्यकता पूर कर’ लेल कखन कोन व्यक्ति
की करत, तकर पूर्वानुमान असम्भव अछि। कैक कोटिक स्त्राी पुरुषक मनोवेगक
विश्लेषण आ चित्राणसँ एहि उपन्यासकें जाहि तरहें समृद्ध कएल गेल अछि; से
विवेकशील रचना पाठ प्रक्रियाक माँग करैत अछि। ताहि आधार पर ई कहबामे
कोनो संकोच नहि हेबाक चाही जे भारतीय नागरिकक जीवन-व्यवस्थाकें गम्भीरतासँ
रेखांकित करबा लेल ई छोट सन वृतान्तक कथा, भारतीय साहित्यक अपूर्व निधि
थिक, निदर्शिका थिक।
तुलनात्मक रूपें देखी तँ आदिकथाक देवकान्त आ आन्दोलनक कमलजीमे विराट
अन्तर अछि। देवकान्त मर्यादा आ मनोवेगमे सामंजस्य स्थापित नहि क’ पबै छथि।
दुनू स्थितिक संघर्षक ज्वालामे स्वयंकें भस्म करैत रहै छथि। मुदा कमलजी बेसी
सहज छथि। नैतिकता आ मर्यादाक रक्षा करबामे कतहु कोनो हूसल डेग नहि उठबै
छथि; काम-तृप्ति हेतु समर्पित नीलूकें अपना कोठलीसँ आपस तँ क’ दै छथि, मुदा
मनोवेगकें मारि कए अपनाकें प्रतारित नहि करै छथि। चल जाइ छथि राति
बेच’बाली सुशीला नामधारी स्त्राीक खाट पर। ई दीगर बात थिक जे ओतएसँ दोसर
मनोवेग बेसाहि अनै छथि।... दुनू नायकक दू परिदृश्य, दू जीवन, दू बाट, दू सीमा
अछि। आन्दोलन, जीवन-संग्राममे तल्लीन मैथिल नागरिकक चारित्रिक विश्लेषण,
सामाजिक-राजनीतिक पर्यवस्थितिक कोलाज थिक, वृत्तान्त थिक; तँ आदिकथा
सामन्ती संस्कारक कोखिमे पुष्पित-विकसित विकृति आ मानवेतर भाषा, व्यवहार,
व्यवस्थादिक कुत्सित स्वरूपक गाथा। आन्दोलनक नीलूक उन्माद वयसोचित आचरण
थिक, अजोह वयसक एकटा कन्याक क्षणिक उद्वेग थिक; ओहिमे ने तँ दुतरफा
प्रेमादर्शक कोनो रूपाकृति अछि, ने वासनात्मक भूखक कोनो नियोजित अवधारणा।
ओहिमे कोनो स्वस्थ, सुविचारित सोच आ दूरगामी चिन्तनशीलताक कोनो आशा
नहि कएल जा सकै अछि; सम्भवतः तें ओकरा बुझ-सुझा क’ बाट धराएब आसान
छल। मुदा आदिकथाक सुशीला परिपक्व, प्रौढ़ आ प्रगल्भ स्त्राी छथि। कुलीन
घरानाक एहि विवाहित आ अतृप्तकामा नायिकासँ हिनकर स्वस्थ मानसिकता, तीव्र
मनोवेग आ ठोस निर्णयक उमेद कएल जा सकैत अछि। हिनकर प्रेम निवेदनकें
नकारल जा सकै अछि, तिरस्कृत कएल जा सकै अछि, हिनका बुझाओल नहि जा
सकै अछि। नीलूक उन्माद भेल लुत्ती, जकरा सुनगैसँ पूर्वहि मिझाओल गेल; मुदा
सुशीलाक उन्माद भेल दावानल, ओकर मिझाएब असम्भव अछि, ओकर तृप्ति
आवश्यक अछि, ओहिसँ धाह उठब उचित अछि। दोसर बात ई जे नीलूक उद्वेग
एसगर उठल दोसर मिझौलक; मुदा सुशीलाक उद्वेग जखनहि उठल, देवकान्तक
उद्वेगसँ घी-बसात पबैत गेल। दावानल बनि गेल...। दुनू उपन्यासक दू परिदृश्य
अछि, दू पर्यवस्थिति अछि...। तथापि लेखकक जीवन-दृष्टिक अन्तर्धारा सब ठाँ
व्याप्त अछि। दू उपन्यासक दू परिदृश्य आ दू पर्यवस्थितिक नायक छथि--कमलजी
आ देवकान्त। मुदा सब किछु भिन्न रहलाक बादहु नायकक स्वभावमे एतबा साम्य
छनि जे कमलजीक नजरिमे चाह-काॅफीमे दूध, चीनी मिलाएब ओकर कौमार्य नष्ट
करब थिक (आन्दोलन/पृ. 43) दोसर दिश बिना दूध-चीनीक चाह पीब देवकान्तक
प्रवृत्ति भ’ गेल छनि (आदिकथा/पृ. 37)। सामान्य अर्थमे त’ ई अत्यन्त सरलीकृत
आ चलताउ वाक्य लगैत अछि, मुदा गम्भीरतापूर्वक विचार कएला पर, प्रतीक
अर्थमे वस्तु आ विचारक मौलिकता बनौने रखबाक, ओकर दोषादोष संग ओकरा
ग्रहण करबाक ईमानदारी थिक।
विद्वान लोकनि तँ मानिते छथि, पाठकीय दृष्टिकोणसँ सेहो ई प्रमाणित भ’ चुकल
अछि, जे कथोकथन आ वार्तालापसँ कोनहुँ कथाकृतिमे नाटकीयता आ जीवन्तता
अबैत अछि। उपन्यासक स्थितिमे तँ ई सर्वाधिक प्रभावी होइत अछि। कथा विस्तार
आ घटना विकासमे कथोकथन जते बेसी हो, उपन्यास ओतबे जीवन्त हएत। एतबा
धरि अवश्य जे कथोपकथनक सम्वाद, भाषण नहि भ’ जाए, से भेलासँ उपन्यासक
रोचकता आ प्रभाव आहत होइत अछि। हमरा जनैत ओ उपन्यास सर्वाधिक रोचक
आ प्रभावकारी होइत अछि, जकर पात्रा आपसमे बेसी काल गप-शप करैत कथाकें
गति दैत अछि। उपन्यासकारकें कथाभूमिमे जते कम जाए पड़नि, प्रभाव तते बेसी
प्रबल हएत। मुदा ई गप-शप लद्धर नहि हो, से ध्यान राख’क थिक। सम्वादमे
पात्राक मनोभाव आ आचरणक संकेत हो। अर्थात् नाटकीय शैलीक उपन्यास
लिखब एकटा पैघ जोखिमक काज थिक, जे उपन्यासकें संक्षिप्त, दीप्त, रोचक आ
प्रभावकारी बनबैत अछि। ओना एकटा विकराल जोखिम संग लागल रहैत अछि --
कौशलमे कनेको चूक भेल तँ सब गुर गोबर।
एहि मामिलामे राजकमल चैधरीक दुनू उपन्यास--आन्दोलन, आदिकथा--
प्रभूत सफल उपन्यास थिक। दू भिन्न विषय, दू भिन्न मनोभावक उपन्यासमे
कथानककें विस्तार दैत कथोपकथन, घटना विशेषक परिस्थिति आ वातावरण
निर्माणमे अपूर्व सफलता प्राप्त केलक अछि। पात्राक आवेग, प्रेरणा, भावना, घटना
विशेष पर ओकर प्रतिक्रिया आ पारस्परिक प्रभावक झाँकी दुनू उपन्यासक कथोपकथनमे
हरदम देखाइत रहैत अछि। छोट-छोट वाक्य आ कथन खण्डक कारणें ई प्रभाव
आओर रोचक भेल अछि आ उपन्यासमे निखार आएल अछि। आन्दोलनमे सुशीला
सन वेश्यासँ कमलजीक वार्तालाप(पृ. 38-39), निर्मलाजीसँ भेंट-घाँटक मादे कमलजी
आ नीलूक वार्तालाप(पृ. 48), भाषणक रूपमे देल गेल वक्तव्यक अछैत सुदर्शनजीक
स्थिति-चित्रा विवरण(पृ. 51-53), अइ बातक प्रमाण थिक जे छोट-छोट वार्तालापसँ
कोना एकटा वेश्याक दारुण कथा, अथवा कोनो पुरुष दिश अनुरक्त एकटा
युवतीक दोसर स्त्राीसँ ईष्र्याभाव, अथवा कोनो अनैतिक-अवांछित घटनासँ कोनो
युवकक आक्रोशक उद्वेग स्पष्ट होइत अछि; आ कोन वैशिष्ट्यक संग तकर प्रभाव
पडै़त अछि।
आदिकथा यद्यपि वर्णनात्मक शैलीमे लिखल गेल उपन्यास थिक तथापि
वार्तालाप द्वारा पात्राक मनोभाव आ चारित्रिक वैशिष्ट्य एतए अंकित अछि।
राजकमल चैधरीक कथालेखनक ई खास विशिष्टता थिक, जकर समावेश अइ
उपन्यासमे नीक जकाँ भेल अछि। वार्तालापक पश्चात एहि उपन्यासमे कतोक ठाम
उपन्यासकार पात्राक क्रिया, आवेग, मनोदशा आदि पर अपन टिप्पणी दैत आगू बढ़ै
छथि; मुदा से टिप्पणी अपन गसावक कारणें वार्तालापक संयोजक बिन्दु साबित
होइत अछि। प्रथम भेंटक प्रारम्भिक सम्वादमे सुशीला, देवकान्तसँ पूछब शुरुह करै
छथि जे--अहाँ जमीन्दार छी?... आ अन्त करै छथि जे -- अप्पन घर त’ अहाँ हमरा
सबकें द’ देलऊँ, अपने कतए सूतब?...(पृ.34-35)। अइ वार्तालापमे दुनूक अनुरक्तिक
सूक्ष्म विश्लेषण होइत नजरि अबैत अछि। कोनो स्त्राी-पुरुष एक दोसरा दिश कोना
अनुरक्त होइ छथि, अनुरक्तिक उद्भव कोना होइत अछि, संकेत कोना होइत अछि,
दू अपरिचित व्यक्तिक अपरिचित संकेतक जाँच परताल कोना होइत अछि, दुनू
आपसमे कोना खुजैत जाइत अछि... आदिकथाक कथोपकथन एहि समस्त मनोभाव
आ परिस्थितिक वार्तालापक विशिष्ट उदाहरण थिक। विश्लेषणात्मक शैलीमे लिखल
गेल उपन्यासमे, पात्राक मनोविश्लेषणकंे रेखांकित करैबला कथोपकथन, अक्सर
उपन्यासक प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि आ उपन्यासकारक विश्लेषणात्मकताकें गति
आ आलन दैत अछि, से एतए भेल अछि। जखन देवकान्तक माम अनिरुद्ध बाबू
देवकान्तकें मातृकमे किछु दिन आओर रहि जेबाक आग्रह करै छथि, तखन सुशीला
आ देवकान्तक प्रेमाभिव्यक्ति स्पष्ट शब्दमे होइत रहैत अछि, प्रेमिकाक पतिकें सेहो
अर्थ स्पष्ट लगैत रहै छनि, मुदा प्रेमक नहि, मामि-भागिनक मर्यादापूर्ण स्नेहक (पृ.
67-68)। बहुअर्थक कथोपकथनक ई कौशल चमत्कृत करैत अछि। दैनन्दिनक
बोली-बानी, भाषा-संस्कारकें तरासि कए रोचक कथोपकथन बनाएब पैघ कौशलक
बात थिक। राजकमल चैधरीकें भाषा संरचनामे एहि तरहक चमत्कार उत्पन्न
करबाक महारत प्राप्त छनि।
कोनहुँ उपन्यासक कथाक्रम, पात्राक आचरण आ करतब, क्रिया-कलापक
परिणति तथा सामाजिक प्रतिक्रिया आदिक प्रभाव भावक पर तखनहि फलित होइत
अछि, जखन ओकर विश्वसनीयता कायम भ’ सकए। विश्वसनीयता स्थापित नहि
भेला पर कतोक बेर सत्यकथा, फूसि लगैत रहैत अछि, आ तखन पाठक ओकरा
खिस्सा-पिहानी बूझि बहटारि दैत अछि। एहना स्थितिमे साहित्य-सृजनक मूल लक्ष्य
--सामाजिक परिदृश्य संशोधन अथवा मानवीय व्यवस्थाक संस्थापनक पूर्ति नहि भ’
पबैत अछि, ओहेन साहित्य मात्रा मनोरंजन बनि कए रहि जाइत अछि। मनोरंजन
कथा साहित्य लेल आवश्यक अवश्य अछि, मुदा ओ साधन थिक, साध्य नहि।
कोनहुँ कथा साहित्य लेल मनोरंजन एतबे अर्थ रखैत अछि, जे पाठक ओकरा
आश्रयमे रचनासँ आद्योपान्त जुड़ल रहए। कथा साहित्यक असल उद्देश्य समाप्तिक
पश्चात शुरुह होइत अछि, जखन ओकर प्रभाव भावकक मोनमे चलैत रहैत अछि।.
..एहि स्थिति लेल कथाक्रमक विश्वसनीयता प्रमुख तत्व थिक। अविश्वसनीय
कथासूत्रा कोनहुँ पाठकक चेतनाकें झकझोड़ि नहि सकैत अछि। तें हरेक घटनाक्रम
लेल, चरित्रा चित्राण लेल, देश-काल-वातावरणक व्यवस्थित स्वरूपक निरूपण आवश्यक
अछि। कोनहुँ पात्राक आचरण, करतब, मनोवेग, क्रिया-कलाप, कथोपकथन आदिक
स्वाभाविकता सुनिश्चित करबा लेल वातावरण, देश, काल आदिक औचित्यक
सूचना आवश्यक होइत अछि। निर्मलाजीक कामोन्माद, अनेक पुरुष संग
घुमबा-फिरबाक प्रवृत्ति कलकत्ताक परिवेशमे मात्रा चर्चाक विषय थिक, मिथिलाक
कोनो गाममे ई घटना होइत, तँ आगि लागि जइतए। मुदा इंगलैण्ड-अमेरिकामे एहेन
किछु नहि होइतए। ठीक तहिना, नीलूक विवाह लेल हुनकर आश्रयदाता ब’र तकै
छथि, कमलजी संगे हेम-क्षेम देखि चिन्तित होइ छथि; मुदा पाश्चात्य देशमे ई बात
अप्रासंगिक होइतए। एम.ए. पास युवक कमलजी मिथिलाक कोनो गाम, कोनो
टोलमे ट्यूशनकें अपन जीविका नहि बना सकितथि। कतबो पढ़ल-लिखल होथु,
कोनो युवती ग्रामीण परिवेशमे सभा-सोसाइटीमे उठब-बैसब नहि क’ सकितए।
पाश्चात्य संस्कृतिमे अनिरुद्ध बाबू कतबो उच्च कुलशीलक होइतथि, कतबो
सम्पत्तिशाली होइतथि, सुशीला सन उद्दाम जवानीक स्त्राी बियाहि क’ घर नहि
अनितथि; कदाचित अबियो जैतनि तँ ओ कुलानन्द सन समवस्की युवकक मातृत्व
नहि स्वीकारितथि, अपन यौन तुष्टि लेल कखनहुँ कोनो देवकान्त, अथवा कुलानन्दक
बाँहि ध’ लितथि। कुलानन्दक स्त्राी हुनकर अत्याचार नहि सहितनि; हरिनगरबालीक
चैताली नहि चलितनि...।
वातावरण निर्माण लेल सेहो आलोच्य समाजक सभ्यता, संस्कृति,
आचार-विचार, व्यवहार, रीति-रिवाज, वेश-भूषा, सामाजिक परिवेश भौगोलिक आबोहवा,
प्राकृतिक परिस्थिति...सब किछु उत्तरदायी होइत अछि। कोन परिवेश, कोन वातावरणसँ
प्रभावित भ’ कए कोन कालमे आदिकथाक सोना मामी देवकान्त पर अनुरक्त होइ
छथि, रुष्ट होइ छथि; कोन रीति रिवाजक कारणें कुलानन्द संगे रहबा लेल विवश
होइ छथि, कोन कारणें हुनकासँ घृणा होइ छनि, कखन आ किऐ हफीम खा लै छथि,
हरिनगरवाली पर किऐ तामस उठै छनि; आन्दोलनक नीलू कोन संस्कार आ
सास्कृतिक अनदानक कारणें कोन समयमे कमलजीक स्वागत करै छथि, आदर करै
छथि, प्रेम करए लगै छथि, सर्वस्व अर्पित करए चल जाइ छथि; कोन समयमे
निर्मलाक शांतिगीतक प्रस्ताव अनर्गल साबित होइत अछि; कोन परिस्थितिमे
आन्दोलनक सुशीला बनगाम बालीक शरणमे जाइ छथि; निर्मला भुवनजीक संग
छोड़ि कमलजी दिश लपकै छथि... एहि समस्त प्रश्नक उत्तर देश-काल-वातावरणसँ
देल जाइत अछि। कोनो घटना खास भौगोलिक परिवेशक खास परिस्थिति आ खास
समयमे घटित भ’ कए अर्थवान अथवा अर्थहीन होइत अछि। कोनहुँ पात्राक
मनोदशा अथवा क्रिया-कलाप स्थान-काल-पात्रा आ वातावरणक अनुसार स्थिर आ
परिवत्र्तनशील होइत अछि। उपन्यासक कथाक्रममे एकर बड़ महत्व होइत अछि। से
राजकमल चैधरीक एहि दुनू उपन्यासमे सहजतासँ रूपायित अछि।
चित्राकलासँ राजकमल चैधरीकें बड़ बेसी अनुराग रहलनि अछि। कतोक
बेर मित्रा लोकनिकें पत्रा लिखैत अपन किछु धारणा चित्रामे अभिव्यक्त केलनि अछि,
किछु कविता, चित्राक संग लिखने छथि। इएह कारण थिक जे हुनकर कथा, कविता,
उपन्यासमे कतोक ठाम पढ़बासँ बेसी कोनो मनोरम अथवा मार्मिक अथवा हृदय
विदारक पेंटिंग देखबाक अनुभव होइत रहैत अछि, अर्थबहुल आ संकेतबहुल पेंटिंग
देखबाक अनुभव -- शरदक पवित्रा आकाशमे श्वेत तनु चन्द्रमा उगल छल। कती
राति बीतल होएत, किछु ज्ञात नहि। हमर मोन अपन गाम दिश भागि चलल।
चरखा काटि कए गुजर करैबाली माइ, बदरिकाश्रम-केदारनाथ-अमरनाथ जएबाक
मनोरथ जकर पूर नइं भ’ सकलइ... आ हम दू बेर सुमेरु पर्वत आ तिब्बतक
अन्तिम सिमान धरि भ’ आएल छी। हमर अग्रज गामक हाई स्कूलमे गणितक
अध्यापक छलाह... अपन पेट काटि कए हमरा एम.ए. पास करौलनि... गाममे
महामारीक उत्पात भेल, टन्नसँ रहि गेलाह। आब विधवा भौजी छथि, सोन-सन
हुनकर कन्या छनि आ चारू कात भूख, दरिद्रता, संक्रामक बीमारी सभक जाल
पसरल अछि... भौजी हमरा संगें नइं रहै छथि, समाजक भयसँ... आ हम बिआह नइं
करै छी... (आन्दोलन/पृ. 21)।
एहि छोट सन स्थिति-चित्रामे उपन्यासकार कैक बर्खक समय, कैक
मनोभाव आ स्वप्नखण्डक वितान, कैक मनोवृत्ति आ व्यवस्था-मर्यादा-दायित्वक
बन्धन आ कैक विवशताक दारुण विडम्बनाकें जीवन्त क’ देने छथि। एतेक छोट
चित्रामे विराट परिदृश्यक समावेश कोनो कलाकारक श्रेष्ठ कौशल आ गम्भीर
जीवन-दृष्टिक परिचायक थिक। अहिना आदिकथा उपन्यासमे--अहाँ देवबाबूक संगें
सुलतानगंजक जल-मन्दिर देख आउ। हम नइं जा सकब। कैकटा मोकदमाक
कागज-पत्रा तैयार करबाक अछि...।...सुलतानगंजमे गंगाक बीच धारामे अछि प्रसिद्ध
अजगैबीनाथ महादेवक प्राचीनतम मन्दिर।...भागिन आ मामी नाह किराया क’ कए
मन्दिर पर अएलाह। भोरक आठ-नौ बजल हएत। सूर्यक किरण जाद्दवीक जल पर
सतरंग चित्रा बना रहल छल।...अकारणे खिलखिलाइत, सुशीला पुछलथिन--महादेवसँ
की वरदान मँगबैन?...की कहबैन? लाज किऐ होइ’ए...?...तावत तीन-चारि टा
पण्डा हिनका सबकें धनीक कुलशीलक दम्पति बूझि कए संग भ’ गेलनि...(आदिकथा
पृ. 44-46) ...स्थिति चित्राक एहि तरहक उत्कर्ष चमत्कृत करैत अछि। शब्द, कथन,
आ वाक्यांशक अर्थ कैक परतमे कैक तरहक व्यंजना दैत रहैत अछि। सन्तुलित आ
संयमित कौशलसँ देश-काल-वातावरणक चित्रांकन सर्वथा, सर्वदा कोनो रचनाकें
विराट आ शाश्वत साबित करैत रहल अछि, से राजकमल चैधरीक हरेक रचनामे
भेटैत अछि।
वस्तुतः राजकमल चैधरी बहुविधावादी रचनाकार छथि। अंग्रेजी आ
बांग्लामे त’ सब विधामे रचना नहि केलनि मुदा मैथिली आ हिन्दीमे ओ सब विध्
ाामे रचना केलनि। विवेचक लोकनिमे बड़ बेसी विवाद अछि, किओ हुनका
सफलतम कवि, किओ कथाकार, किओ उपन्यासकार, किओ निबन्धकार मानै
छथि। हमरा जनैत, राजकमल चैधरीकें मूलतः कवि माननिहार लोकक धारणा ई
रहैत हेतनि, जे हुनकर भाषा-शिल्प मूलतः कविताक शिल्प थिकनि। सम्पूर्ण गद्य,
एते धरि जे डायरी आ पत्रा धरिमे कविताक लय भरल रहैत अछि। ई बात
उल्लिखित समस्त उदाहरणहुँसँ प्रमाणित कएल जा सकैत अछि। छोट सन वाक्य
खण्ड लिखि कए विराट व्यंजना दिश संकेत क’ दै छथि, आ तखनहिसँ पाठक/भावक
दोहरी विचार-व्यवस्था संग वेगमयी जलधारामे बहैत चल जाइत अछि। जखनहि
पाठक--भौजी (विधवा) हमरासंगें नहि रहै छथि, समाजक भयसँ...अथवा...महादेवसँ
की...कहबैन?लाज किऐ होइए...? ... सन उद्धरण देखै छथि, एक टा कथा ओ पढ़ैत
रहै छथि, आ एक टा कथा हुनका भीतर सेहो जनमैत जाइत अछि। दू कथाधाराक
विकास एक संग होइत जाइत अछि, कखनहुँ समानान्तर, कखनहुँ ओझराइत,
कखनहुँ स्पष्ट होइ...राजकमल चैधरीक गद्यक ई विशेष छटा थिक। मानव जीवनक
पारस्परिक सम्बन्धक विचार, भावना, आवेग, प्रेरणा आदिकें अभिव्यक्ति दै वला
महत्वपूर्ण विधा, आ महत्वपूर्ण रचनामे तकर उपयोग करैत गेल छथि।
मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन: उदाहरण
पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट
कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा
सकै’छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित
मैथिली कथा संचयन(सन् 2005) आ सन् 2007मे तारानन्द वियोगी द्वारा
सम्पादित देसिल बयना(सन् 2007) पाठकक बीच लोकप्रिय भ’ए रहल छल कि
प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह
उदाहरण छपि क’ आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ
प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य
अछि।
उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा
संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत
अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल
तत्पर अछि, जे संकलनकत्र्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार
राजकमल चैधरीक कथा ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’ घाघ मैथिल समाजक
टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि
गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक
घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ
हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि
बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि
शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह
वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें
ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि।
बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ
छलाह।
पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक
कथा ‘भए प्रकट कृपाला’ साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल
सार्थक हिन्दी सिनेमा ‘पेज थ्री’ जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी
नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें
कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। काॅरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम
बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक
नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ’ जाउ।
लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ‘विधिक
विधान’मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें
कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा
‘त्यागपत्रा’मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल
नहि भ’ सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित
चम्पा काॅलेजमे पढ़’ चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर’ चाहैत अछि। मुदा
आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक
केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ‘और भी ग़म
हैं’ कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकंे विस्तृत आयाम नहि द’ पबैत अछि।
मनमोहन झाक कया ‘फयदा’मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन
खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क’ स्त्राी जाति कोन पक्षक
उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब
दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई
महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत
अछि।
स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ‘मकड़ी’ अपेक्षाकृत मेच्योर्ड
आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह
करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत
अछि। सिलाई मशीन चला क’ ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ
एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल’ क’ अपन व्यक्तित्वकें
विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला
पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क’ क’ भागि जाइत अछि।
सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ ई कृत्य
केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश
ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ‘पेंपी’ पति-पत्नीक सम्बन्ध
विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव
आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे
सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि
भ’ सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ‘भोजन’
कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क’ जाइत छथि। राजमोहनजीक
दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क’ ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि।
राजकमल चैधरीक ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’, धूमकेतुक
‘भरदुतिया’, गंगेश गुंजनक ‘अपन समांग’(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित
अछि), तारानन्द वियोगीक ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ आ अशोकक ‘तानपूरा’
एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ‘भरदुतिया’ व्यक्ति
स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक
मनुख अहू पाबनिकंे नहि छोड़लक। ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ वियोगीक सफल
राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि
जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत
खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब
मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त’ आवास आ रोजगार छीनि
बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ
निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे
आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ
ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान
हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’
कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक।
कहबा लेल त’ ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल,
प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ’ गेल
छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान
चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा
महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त’ ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर
बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन
करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो
रहम कर बहिं...।’’
अशोकक कथा ‘तानपूरा’ मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार
क’ देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा
मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद
बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा
करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै
छनि त’ दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो
तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स’ख हुनक बेटाकें रुपैया
कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत
नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ’ पुत्राक एहि अव्यावहारिक स’ख’क केठ
मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि।
संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन
आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क’ रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा
ततेक सरलीकृत भ’ गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै़छ।
एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो
कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक
विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त’ एहन इतिवृत्त
निपट गद्य बनि क’ रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक
बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक
फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ‘नागदेसमे अयनाक
व्यवसाय’मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ
कथा बुनबाक प्रयास त’ केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल।
एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा) आ
हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही।
हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क’ यथार्थ बनल रहल अछि।
मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार
राष्ट्रीय स्तर पर भ’ रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि
आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट
कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत
साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें
महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण
नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही।
हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि
अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि
समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे
छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ‘चितकबड़ी इजोरिया’ आ ‘रूपांतर’ कतोक
दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर
बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ‘नेपथ्य अभिनेता’ आ
‘जहां पमन को गमन नहीं’ आदि लीकसँ हटि क’ लिखल गेल कथा थिक।
‘उदाहरण’मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि।
समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी
सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि
कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चैदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक
सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि।
मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य
अछि।

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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