भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Tuesday, September 01, 2009

पेटार २७

डॊ. देवश‌ंकर नवीन
आकुल-व्याकुल मोनक रचनाकार


बीसम शताब्दीक आठम दशक मे मैथिलीक जाहि समर्थ आ झमटगर पीढ़ीक सृजन
यात्रा प्रारंभ भेल, तइ मे विभूति आनन्द अत्यंत महत्वपूर्ण नाम थिक। सृजनरत तं
विभूति पहिनहि सं छलाह, मुदा सन् 1977 ई. मे पहिल बेर हिनकर कविता सभक
संकलन धीरेन्द्र सिंहक संग ‘डेग’ नाम सं प्रकाशित भेल। तकर सात बर्खक बाद
विभूतिक दोसर कविता संग्रह ‘उपक्रम’ 1984 मे आएल। मुदा बीचहि मे 1981
मे हिनकर चैंतीस गोट गजलक संग्रह आएल। मैथिली मे गजलक ई पहिल संग्रह
छल, जे ‘उठा रहल घोघ तिमिर’ नाम सं प्रकाशित भेल। फेर 1988 मे कुल चालीस
गोट नवगीत-गजलक संकलन ‘झूमि रहल पाथर मन’ आएल। अइ सं पूर्वहि 1982
मे हिनकर पहिल उपन्यास ‘गाम सुनगैत’ प्रकाशित भ’ चुकल छल। 1979 मे
हिनकर दसटा कथाक संकलन ‘प्रवेश’ आएल छल। ‘पराजित-अपराजित’ उपन्यास,
‘खापड़ि महंक धान’ कथा संग्रह आ ‘समय संकेत’ नाटक सेहो प्रकाशित भेल। किछु
संपादित पोथी गीतनाद (लोक गीतक संग्रह), विद्यापति पदावली, एकटा छला गोनू
झा (चरित कथा), कथा-कहिनी (लोक कथाक संग्रह), अड़हुल (विभिन्न कथाकारककथाक संकलन) प्रकाशित भेल। 1992 मे फेर हिनकर सत्ताइसटा बीछल कविताक
संग्रह ‘पुनर्नवा होइत ओ छौंड़ी’ आएल आ 1999 मे फेर पैंतीसटा कविताक संग्रह
‘नेहाइ पर स्वप्न’। एतद्रिक्त बीच-बीच मे जतेक कथा लिखैत रहलाह अछि, कथा
गोष्ठी सभ मे पढ़ैत रहलाह अछि, पत्रिका सभ मे छपैत रहलनि अछि, से असंकलिते
छनि। ‘फेर बघुआइ छौ तोरे पर’ उपन्यास अप्रकाशिते छनि मुदा ‘ललित आ हुनक
कथायात्रा’ समालोचना पोथी प्रकाशित छनि। समय-समय पर किछु निबंधो लिखैत
रहलाह अछि। पत्रिकाक संपादन आ संपादन सहयोगक तं गिनती नइं अछि।अभिनय सेहो कएने छथि, वृत्ति सं प्राध्यापक छथि...।

बहुमुखी प्रतिभा आ बहुविधावादी रचनाधर्मक दृष्टिएं जं देखैत छी तं विभूति


भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आ राजकमल चैधरी सन प्रतिभावान बुझाइत छथि। मैथिली मे
हमरा एहेन एकहु टा आन रचनाकार नइं देखाइ छथि, जे एके संग एतेक ठाम, एतेक
रूप मे क्रियाशील होथि आ सब ठाम एक्के रंग प्रभावशाली साबित भेल होथि।रचनाक स्वभाव आ तेवर सं ल’ कए रचनाकारक प्रवृत्ति धरि पर जं चर्चा करी, विभूति
नव चेतनाक एकटा ‘होल टाइमर’ कार्यकर्ता बुझएताह। मुदा ई अचरजक विषय
थिक जे शताब्दीक अंतिम दशक मे हिनकर क्रियाशीलता मात्रा कमिए टा नइं गेलनि,
ई अपना कें ततेक बेसी समेटि लेलनि, जकर किओ उमेदो नइं क’ सकैत छल।
आठम दशकक अंतिम चरण सं ल’ कए नवम् दशकक प्रायः अंत धरि विभूति
मनसा, वाचा, कर्मना जाहि तरहें क्रियाशील रहलाह, ताहि मे ज्वालमुखीक ताप छल;
कोशी, बागमती आ गंगाक उद्दाम प्रवाह छल, मृगराज जकां स्वशक्ति आ जनशक्ति
पर हिनका आस्था छल, हिनकर सांस मे भूकंप सं पूर्वक हुंकार छल...तुलना करैत
उपर जं भारतेन्दु आ राजकमलक नाम लेल गेल अछि, तं तकर उचित तर्क अछि..
मुदा अचानक विभूति कोन मोहभंगक कारणें अथवा कोन आतंकें अपना कें समेटि
लेलनि, से कहब कठिन अछि।

खैर...विभूतिक नाटक, उपन्यास आ कथा लेखन पर किंचित चर्चा आनो आन
निबंध मे कएल जा चुकल अछि, तें एतए कविता टा पर चर्चा करब। पाखंडक
आवरण, अंधकार आ कुहेस आ मेघक झलफली, रूढ़िक सड़ाइन गंध आदिक विरोध
आ नव ज्योति पुंजक स्थापना दिश संकेत हिनकर रचनाकर्मक मूल स्वभाव रहलअछि। रोजगारविहीन जीवनक मनोदशा आ जीवन-यापन, सेवानिवृत्तिक बाद शेष-जीवनक
दशा, दांपत्य आ पारिवारिक आनो आन संबंधक गहन पक्ष...अत्यंत तीक्ष्ण तेवरक
संग हिनकर कथा, आ नाटक मे उपस्थित भेल अछि। अइ समस्त स्थितिक संग
केंद्रीय राजनीति आ स्थानीय तिकड़मक संयुक्त प्रभाव सं सोझ-सपाट, निश्छल-निर्विकार,
छल-छद्मविहीन जनता अपरिचित रहैत अछि, ओ एतेक करिया-झूमरि बुझैत नइं
रहैत अछि। मुदा ओतए रथक टूटल पहियो, अइ जनता कें बड़ सहयोग करैत छैक..
ई समस्त स्थिति विभूतिक उपन्यास, कथा आ नाटकक विषय होइत अछि, आ एहि
सभक प्रस्तुति अत्यंत प्रभावकारी होइत अछि। अइ समस्त विपरीत परिस्थितियहु मेविभूतिक कृति-नायक विजयश्री प्राप्त करैत अछि। गाम सुनगैत (उपन्यास), समय
संकेत (नाटक) आ प्रवेश, खापड़ि महंक धान (कथा संग्रह) आदि अही विजयश्रीक
गाथा थिक।

बीसम शताब्दीक आठम दशकक उत्तरार्द्ध भारतीय बुद्धिजीवीक लेखें
¯ककत्र्तव्यविमूढ़ करबाक स्थिति छल। इन्दिरा सरकारक आततायीपन भारतीय
जनताक माथ पर नंगटे नचैत छल। लोकनायक जयप्रकाश इन्दिरा सरकारक विरोध्
ाक बिगुल बजा चुकाल छलाह आ हुनका समर्थन मे भारतीय छात्रा अपन मौलिक
अधिकारक सुरक्षा हेतु आ स्वेच्छारिणी सरकारक नृशंसता सं मुक्ति हेतु जयप्रकाशकजीक

नेतृत्व मे छात्रा आंदोलन प्रारंभ क’ चुकल छल। संपूर्ण देश मे कांग्रेस विरोधी
वातावरण व्याप्त भ’ गेल छल। आम चुनाव भेल। कांग्रेस पराजित भेल आ सर्वदलीय
संगठनक आयोजन सं जे टीम बनल से भारतक गद्दी पर काबिज भ’ गेल। मुदा
कुकरालूझि झट द’ शुरुह भ’ गेल। स्वयं लोकनायकक अवमानना भेलनि आ हुनकर
मोहभंगक संग संग संपूर्ण भारतक युवाशक्ति मोहभंगक शिकार भ’ गेल। नक्सलबाड़ी
आंदोलन, तेलंगानाक किसान आंदोलनक प्रभाव मुखरित भ’ चुकल छल। अइ
समस्त स्थितिक अराजक प्रभाव आ सुधारक प्रभाव मिथिलाक जनमानस पर पड़ल।यद्यपि सौंसे दुनिएंक ई हाल अछि, मुदा अधोमुखी प्रवृत्तिक नकल मिथिला मे कनेक
बेसिए पसरि जाइत छैक, तें अइ समस्त घटनाक दुष्प्रभाव तेजी सं पसरल। एकर
किछु जे सुधारक संकेत छल, से रचनाकारक नजरि मे अभरल। विभूति ओही
रचनाकार मे सं एक छथि। अही समस्त विपरीत परिस्थिति मे अइ सं किछु पूर्वहु
सं हिनकर गजल आ नवगीत लिखा रहल छल। मैथिलीक आ विभूतिक सेहो, पहिल
गजल संग्रह मे संकलित गजलक पंक्ति सभ अइ समस्त परिस्थितिक चित्रा उपस्थित
करैत अछि, जतए आशा, प्रेम, घृणा, राग, द्वेष, प्रकाश, अन्हार, भय, आतंक, साहस,
डांट, फटकार, पाखंड, प्रगति कामना सब चीज अपन-अपन अस्तित्वक संग
उपस्थित अछि। आ, अइ उपस्थिति मे हरदम कवि प्रगतिकामी, साहसी आ
आस्थावान, आशावान जनशक्तिक पक्षधर छथि। अइ संपूर्ण विकराल स्थिति कें
गीत-गजल सन कोमल रचना मे प्रभावी ढंग सं व्यक्त क’ सकलाह, से बात रेखांकित
कर’क थिक।

विभूतिक रचनाकाल मात्रा राजनीतिक कुटिलता, धार्मिक पाखंड, असामाजिक
तत्वक विकास आ सामंती अपराधे टाक फल नइं थिक। अइ काल मे सभ सं बेसीविकृत स्थिति उत्पन्न करबा मे अहम भूमिका बुद्धिजीवी वर्गक छनि, जे अइ समस्त
समाज विरोधी आ जन विरोधी शक्तिक दलाल बनि गेलाह आ आत्मप्रचार तथालाभ-लोभक मोह मे दानवीय हरक्कति कें समर्थन दैत रहलाह। विभूति अपन कृति
कर्म मे अहू वर्ग कें नांगट करबा मे नीक जकां सफल भेल छथि। ‘झूमि रहल पाथर
मोन’ संकलनक नवगीत सब सेहो अइ स्थितिक उदाहरण थिक। कविता हो, गीत
हो, गजल हो विभूतिक आग्रह किरिण, प्रात, भोरुकबा, सुरुज, उन्माद, पसेना, फूल,
खेत, फसिल, चूल्हि, अन्न, ढेकी, वसंत, भोर, ताप, ऊष्मा, रश्मि आदि दिश रहैत
छनि; ई आग्रह विभूतिक आस्था थिक। दोसर दिश अन्हार, भूख, उदासी, चिंता,
श्मशान आदिक चर्चा क्रोधावेश मे करैत छथि, ई चर्चा ओकर तिरस्कार लेल करैत
छथि।

परंपरा सं जे किछु हमरा लोकनिक जीवन मे शुद्ध, सौम्य आ शांतिक प्रतीक
बनल रहल अछि, सुरक्षाक आधार बनैत आबि रहल अछि, से सब जखन अपवित्रा
भ’ गेल, जखन ‘घोंका चुकल अछि पोखरिक जल/टूटि चुकल छै घाटक सभ खरंजा’


तखनहुं विभूतिक मानब छनि, जे ‘खखरी नहि भेल अछि गहूमक गोटा/भोंथ नहि
अछि हांसूक धार/हथौड़ाक निहाइ-चोट एखनो सकुशल अछि...’। विभूतिक इएह
आस्था, इएह साहस समाजक अधिसंख्य कें वेदना आ पीड़ा सं उबारि सकबा मे
सफल होएत, ओकरा अपन पराक्रमक प्रति सचेत क’ सकत।

समाज मे आधुनिकताक प्रवेशक बादो किछु लोकक पाखंडी प्रवृत्ति, आधुनिकतासं उत्पन्न विकृति, नवीन शिक्षा पद्धति मे शकपंज भेल बाल मनोविज्ञान, सुशिक्षित
पति द्वारा पत्नीक शोषण, स्त्राी शोषणक सहजात नैरंतर्य...सबटा हिनकर नवीनतम
कविता संग्रह ‘पुनर्नवा होइत ओ छौंड़ी’ आ ‘नेहाइ पर स्वप्न’ मे उतरि आएल अछि।
बहुविधावादी हेबाक कारणें प्रायः हिनकर कविता मे कथात्मकता आ नाटकीयता तथा
कथो मे काव्यमयताक समावेश रहैत छनि, मुदा से रचनाक दोष जकां नइं, गुण आ
वैशिष्ट्य जकां उपस्थित होइत अछि। यद्यपि संयुक्त क्रियापद आ कारक विभक्ति
बहुल विशेषणक आधिक्य सं ठाम-ठीम अर्थ बाधा उपस्थित होइत अछि, मुदा तकर
परिमाण बड़ कम अछि। बेसी ठाम ठेंठ शब्दावलीक मुहावरा जकां प्रयुक्ति, किताबी
आ शास्त्राीय शब्दावली सं परहेज, हिनकर कविता कें आओर बेसी उत्कर्ष देलकनि
अछि ई देश की आजाद भेल/फुसिएक बबाल भेल/ठाम-ठाम बेंतल जाइए लोक/कतौ
चास लेल/कतौ बास लेल/अनेरो रेतल जाइए लोक सन कवितांश देखि कए कैकबेर हिनकर कविता पढ़बा काल चकित होअए पड़ि सकैत अछि। स्वातंत्रयोत्तर
कालीन देश मे पुनर्वास योजना पर अइ तरहें प्रसंगवश टिप्पणी कतेक गंभीर चोट
करैत अछि !

परिवार, समाज आ कुटुंबक संबंधजन्य भावना, अतीतक स्मृति, भविष्यक
चिंता, वर्तमानक समझ हिनकर कविताक प्राणतत्व थिक आ अही क्रम मे ई अपनउत्कृष्ट दृष्टिबोधक परिचय दैत बढ़ि चलैत छथि। अपेक्षाकृत नमहर हिनकर जतेक
कविता छनि, ताहि मे विभूति अपना परिवेशक कोलाज बनौने छथि। एकहि
कविताक किछु-किछु पंक्ति मे कैकटा कविता कहा जाइत छनि आ अंत मे
समग्रताक संग फेर ओ अलग काव्य रसक संचार करैत छनि।

एम्हर आबि कए विभूतिक शब्द संस्कार थोड़ेक प्रदूषित भेलनि अछि। ठेंठ
शब्दक सुरक्षा हेतु विभूतिक रचना संसार कें अभिलेखागार मानल जाइत छल, मुदा
से विभूति, अइ प्रदूषणक शिकार कोन कारणें भेलाह अछि, कहब कठिन अछि।

‘नेहाइ पर स्वप्न’ कविता संग्रहक कविता सभ कविक आकुल-व्याकुल
मनःस्थितिक कविता थिक, दीर्घकाल सं धैर्य धारण करैत रहबाक सूचना थिक, दीर्घ
अवधिक संघर्षक सूचना थिक, आ एखन धरि अपेक्षित उपलब्धि सं दूर रहबाक
सूचना थिक जे, जे कोनो स्वप्न छल, से नेहाइ पर आबि गेल अछि, आब
थोस-थाम्हक स्थिति नइं अछि। की तं, नेहाइ पर कुटाइत अपन स्वप्न कें देखैत पीड़ा
भोगैत रहू, वा अही नेहाइ पर सं उछलि जाउ आ किछू करू।...एतबा तं तय अछि,

जे विभूतिक रचना हो-हल्ला, नाराबाजी सं बेसी विश्वास ‘एक्शन’ मे रखैत अछि।
जतए कतहु ई जोश-खरोश, मारि-लड़ाइ, युद्ध-संघर्षक गप करैत छथि, ताहू मे कोनो
चिकरा-भोकरी नइं। लगैत अछि कोनो पंच, आराम सं समझा रहल होथि। ई रोचकबात अछि, जे परिवत्र्तन आ प्रगतिक कामना सं भरल रचनाकार विभूतिक कविताबहुत आराम सं, बहुत गंभीरता आ शांति सं समस्त परिवत्र्तनक गप करैत अछि, तंदोसर दिश मैथिलक उत्कृष्ट परंपरा, पारिवारिक-सामाजिक-कौटुंबिक संबंधक सौष्ठव,
गामक ग्राम्य संस्कृति, परिवारक ममत्वपूर्ण स्नेहसूत्रा, प्रेमबंधनक ओर-छोर, ग्राम्य-कलाआ लोक-संस्कृति...सब कें बचा कए राखए चाहैत अछि। हड़बड़ी मे तं कोनो
व्यक्ति एकरा रचनाकारक द्वैध कहि कए निकलि जाएत, मुदा ई ततेक हड़बड़ी मे
देल जाए वला निर्णय नइं थिक। विभूतिक सृजन संसार संभावित मिथिलाक
संरचनात्मक चित्रा थिक, जतए मैथिल आ मैथिली अपन समस्त श्रेष्ठ परंपरा आ
आवश्यक प्रगतिक संग उपस्थित रहत। अपन समस्त रचना मे ई प्रारंभहि सं अइ
प्रयोगक आग्रही रहलाह अछि। हिनकर समस्त गीत, गजल, नाटक, उपन्यास, कथा,
कवितादि अही प्रयोगक उदाहरण थिक। अतीत मोह हिनका पर हरदम सवार रहैतछनि, मुदा तें हिनका प्रतिमुखी अथवा प्रत्यावत्र्तनक कवि नइं कहल जा सकैत अछि।
अलग सं कहबाक कोनो प्रयोजन नइं अछि, जे विभूतिक कविता
घटना-कारण-विन्यास-विचार-परिणति- निर्णयक कविता थिक। अर्थात्, कवि अपन
रचना मे अइ तरहें विचार करैत अंत मे निर्णय सुनबैत छथि। ‘नेहाइ पर स्वप्न’ संग्रह
एक अर्थें निर्णयक कविता थिक। अइ निबंधक अंत विभूतिएक एकटा निर्णय सं
हो तं उत्तम

एखन धरि मांगि क’ आगि

काज निकालबाक परिपाटीक विरुद्ध

एकटा श्वेतपत्रा जारी करबाक होएत

जे छाउरक ढेरी मे सुनगैत चिनगी

भुम्हुर बनैत अछि

जे ओ बहुत-बहुत काल धरि टिकैत अछि..




नव कथ्य-शिल्पक मांसल कथा


कथा मानव जीवनक सूक्ष्म-सं-सूक्ष्मतर क्षणक भोगल तीत-मीठक रिपोर्ताजक रूप
मे अपन परिचिति बना चुकल अछि। एहि सत्य कें विश्व-साहित्यक कथा-लेखनक
स्तर पर सेहो देखल जा सकैत अछि। मैथिली कथा सेहो, अभिव्यक्तिक एहि सीमा
धरि आबि अपन तीक्ष्णतम शैलीक निर्माण मे लागल अछि। पुरना कथाक विविध
उपांग सभ सं मुक्त भेल सातम दशकक कथा अपन परवर्ती कथा लेखन कें थातीक
रूप मे कथ्य आ शिल्प दिश केंद्रित कएलक। आठम आ नवम दशकक कथा-लेखन
कें अपन पूर्वक पीढ़ी सं प्रेरणा भेटलैक, समकालीन आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक
व्यवस्था भैटलैक, धार्मिक पाखंड सं युद्ध करैत प्रगतिशीलताक जोश भेटलैक,
प्रकाशनक सौविध्य भेटलैक, भाषांतर साहित्य द्वारा विश्व-साहित्यक कथा-मंच भेटलैकआ विश्व-स्तरक चिंतनशीलता एवं ओकर सांस्कृतिक, सामजिक धरोहरि सं परिचित
होएबाक सुयोग भेटलैक। एतेक रास सुविधाक मध्य मैथिलीक कथाकार अपन
कथ्य-चयन आ शिल्प-निर्माण मे संलग्न भ’ गेलाह। कथाकार अशोक, एही व्यवस्थाक
बीच लेखनरत ओहेन सृजनधर्मी छथि, जे अपन कथाभूमि गाम सं शहर धरिक परिवेश
मे सूक्ष्मतापूर्वक ताकि लेलनि अछि। दुनू परिवेश मे जीबैत प्रायः सभ वर्गक व्यक्तिक
जीवन हिनकर कथाकारक लेल अवलोक्य भेलनि अछि। अपन प्रत्येक कथा कें
ई व्यक्ति-सत्यक रूप मे उपस्थापित करबा मे पूर्ण सफल भेल छथि। व्यक्ति-सत्य
कथाकारक ग्रहण आ पाचन क्रिया मे बेस जकां प्रसिद्ध भेल अछि। व्यक्तिगत
जीवन क यथार्थ हिनकर सृजनशील, कल्पनाशीलता आ अभिव्यक्ति शैलीक त्रिवेणी
मे ततेक नीक जकां भीजल अछि, जे ओकरा समष्टि-सत्य आ युग यथार्थ बनबा
मे कोनो बितय नहि रहलैक अछि।

‘व्यक्ति-सत्य समूह-सत्यक मात्रा भागफल नहि होइछ’, कुलानन्द मिश्रक एहि
पंक्तिक सत्य कें स्वीकारैत, हम कहब, जे वस्तुतः व्यक्ति-सत्य, कहिओ आ कोनो

समय मे समूह-सत्यक भागफल नहिएं टा होइत अछि। ज्यामितीय भाषा मे ई
व्यक्ति-सत्य, समूह-सत्यक गुणनखंड होइत अछि, ओकर भाजको भ’ सकैत अछि।
अशोक गुणनखंड सभ कें जमा क’ क’ संख्या बनएबाक प्रयास कएलनि अछि
आ सफल भेलाह अछि।

अशोकक कथा कहबाक जे शैली छनि ताहि मे समूह-सत्य कें आनला सं,
एकर बेसी संभावना छल जे हिनकर कथ्य ओझरा जइतनि। ‘ओ मनुक्ख भ’ गेल’
कथा मे कथाकार सर्वाधिक रूपें अभिव्यक्त भ’ सकैत छलाह, अपना कें पूर्ण रूपेंदेखा सकैत छलाह, अपन अनुभूति कें चमत्कृत ढंग सं प्रस्तुत क’ सकैत छलाह,
जं ई कथाक शिल्प ताक’ मे नहि अगुतबितथि। एकटा श्रेष्ठ कथ्य, हिनकर शिल्पक
कमजोरीक कारणें एकटा सहज संप्रेषणीय कथा होएबा सं बांचि गेल। कथा मूलतः
संबोधनात्मक स्वरूप मे आएल आ कथाकारक दर्शन, विचार-मंथनक बाहुल्यक कारणें
उबाउ भ’ गेल। जखन कि मानवीय जीवनक विडंबना कें सर्वथा नव दृष्टिकोणें
देखबाक प्रयास कएल गेल अछि। ड्राइडनक उक्ति छनि च्तवेम पे जीपदापदह तिवउ’
मुदा तें कथा मे सेहो चिंतनशीलता एहि तरहें भरि देल जाए, से उचित नहि।

अशोक अपन कथाक कथ्य गाम आ शहरक संस्कृतिक घालमेल होइत
परिस्थिति सं उठबैत छथि, निम्न मध्यमवर्गीय जीवन जीबैत मानवक विकासोन्मुख
प्रवृतिक आपाधापी सं उठबैत छथि। सामान्तया मनुष्य ऐश्वर्य प्राप्तिक चरम समाधान
अर्थ संचय मानि लैत अछि। एहि उपलब्धिक अगुताहटि मे पीढ़ीगत द्वंद्व सं निकलल
समाधानक बाट मनुष्य कें कोन संकटक आवा मे झोंकि दैत अछि, तकर जाग्रत
उदाहरण थिक ‘तेसर प्रश्न’। पुरान पीढ़ीक कें समृद्धि चाही आ नव पीढ़ी तकर
समाधान लेल निचेन सं नहि, अगुता क’ बाट तकैत अछि। अगुताहटि मे मात्राअवैधानिके मार्ग टा बांचि जाइत अछि। एहेन पात्रा युग-यथार्थक भोक्ताक लघुत्तम
इकाइ होइत छथि। अइ तरहक जिनगी सं एकटा विशाल समूह कें साक्षात्कार कर’
पड़ि रहल छैक। कथानायक एहि समूहक गुणनखंड थिक। कथाकार एहि व्यक्तिपरक
जीवनक आधार ल’ क’ समूहपरक यथार्थ दिश अपन अंगुरी उठबैत छथि। पुरान
पीढ़ी अक्सर आदर्श आ सिद्धांतक दोहाइ दैत रहैत छथि। मुदा, एतए तर्कक वस्तु
ई अछि, जे ओहि पीढ़ीक प्रतिबद्धता की छनि ? आदर्शक मूल्य पर की अपन
ऐश्वर्य आ अर्थ समृद्धिक लोलुपता कें तिलांजलि द’ सकैत छथि ? कथाक संदर्भमे उत्तर होएत नहि। तखन, फेर ओहि पीढ़ीक आदर्श आन ठाम कोना सुरक्षितरहओ। आजुक पीढ़ीक गत्र्तगमन मे पुरान पीढ़ीक ई सर्वतोन्मुखी प्रोत्साहन कोनहुकथाकारक तटस्थ मनोवृत्ति कें कोना नहि मथओ।

आजुक कथाकार कथ्यक चयन युग-जीवनक अंतःपक्ष सं करैत छथि। एहि
क्रम मे घोड़ाक घास खएबाक प्रक्रियाक चित्राण लेल रचनाकार द्वारा घास खाएब
आवश्यक नहि। यथार्थक अनुभूति मात्रा भोक्ते टा नहि, प्रेक्षको प्राप्त क’ सकैत


छथि। प्रेक्षण, अवलोकन आ भोग एहि तीनू अभिक्रियाक माध्यमे भोक्ताक संवेदना
धरि कोनो सृजनशील प्राणी पूर्ण सफलता सं पहुंचि सकैत छथि, जं हुनकरकल्पनाशीलता ंऊर्वर होनि, अनुभूतिक कौशल पकिया होनि, वस्तुतः रचनाकार अपनहु
भोगक समय मे एकटा प्रेक्षके रहैत अछि। भोगक समय मे एक दिश हुनकर व्यक्ति
भोग मे लागल रहैत छनि, तं दोसर दिश हुनकर रचनाकार हुनकर सहयात्राी बनि
प्रेक्षण मे लागल रहैत छनि। एक्के समय मे ओहि काल मे ओ दू टा जीवन जीबैतछथि। आ, अइ तरहें हुनकर अनुभूति सुच्चा सामाजिक जीवनक प्रतिकृति भ’ जाइत
अछि। ई घटना अशोकक ‘ओ मनुक्ख भ’ गेल’ कथा मे नीक जकां देखल जा
सकैत अछि।

अपन आन समस्त कथा मे अशोक अनुभूत-सत्यक एहि सूक्ष्म परिभाषा कें
अक्षुण्ण रखलनि अछि। घर-अंगना मे छिड़िआएल उपेक्षित बिंदु सभ कें समेटि क’
कथाकार जे उत्कर्ष देलनि अछि, अति सामान्य सन बात कें जतेक महिमामंडित
कएलनि अछि, से सहजहि प्रशंसनीय। कथा ‘डेरबुक’ एही कोटिक बात कें उठबैत
अछि। सुभाष आ मंजूक जीवनक जाहि मर्मस्पर्शी बिंदु कें कथाकार एहि मे उठौलनि
अछि आ एकरा दुनूक जीवन मे जे महत्वपूर्ण परिवर्तन आएल अछि, से तं सामान्य
ढंगें कथाकार कहि गेलाह, मुदा मानवक मनोवेग कतेक प्रबल होइत अछि तकर
चित्राण बिना किछु कहनहि सर्वांश मे क’ देलनि। ई बिंदु एकटा गंभीर अनुशीलनक
थिक। एकटा ग्राम्य बाला कें सुभाष की सोचि ढेपा फेक’ सं मना करैत छथि आ
की भ’ जाइत अछि। एते क्षिप्र गतिएं स्थिति बदलि जाइत अछि, मुदा कथाकार
कें कोनो अफरा-तफरी नहि छनि।

एकटा बालाक आगू सौंसे जीवन ठाढ़ अछि, मुदा मनोवेग ओकरा किछु सोचए
देबाक पलखति नहि रह’ दैत अछि। पुनः नारी सन लजकोटरि जाति एतेक साहस
सं आगू भागि जाइछ, जखन कि साहस आ शौर्यक उदाहरण मर्द, नांगरि सुटका
लैछ।एकटा कथा मे एतेक तरहें अपना कें स्पष्ट क’ सकबाक सफलता निश्चित
रूप सं कथाकारक अनुभूतिक गहनता आ शिल्पक मौलिकताक परिचायक थिक।

‘ओहि रातिक भोर’ आ ‘मिर्जा साहेब’ क बीज रूप एक्के थिक प्रायः। एक
टा जातिवादी द्वेषक बात करैत अछि, जखन कि दोसर संप्रदायवादी। मूल अंश
मे दुनू एके बात भेल, मुदा दृष्टिकोणहिक विस्तृतिक कारणें दुनू कथा कें दू स्वरूप
मे ठाढ़ कएल गेल। ‘मिर्जा साहेब’ कथा मे मानवताक प्रति गलैत-भखरैत आस्थाकें आओरो उत्प्रेरण देनिहार तत्व सभक कुकृति पर चिंता कएल गेल अछि, जतए
नकारात्मक दिशासोची व्यक्तिक तर्क कें बल भेटैत अछि, जे अइ समाजक सत्य
थिक जखन कि ‘ओहि रातिक भोर’ मे भोरक संग-संग अनावश्यक कारणें द्वेषपोषीक
मोक्ष मे मानवताक किरिण फुटैत अछि।

सामान्य जन-जीवनक भीतरी खोह मे वस्तुतः पीड़ाक विपुल साम्राज्य बनल

अछि, जतए रंग-बिरंगक गढ़ल सपना थौआ भ’ जाइछ। लोक सोचैत अछि किछु,
आ भ’ जाइत अछि किछु, लोक विश्वास क’ अबैए आ ओकरा आस्थाक संग सांप
सभ अपन बिक्खक फगुआ खेला अबैत अछि। श्ठसववक पे जीपबामत जींद ूंजमतश्
रटि अबैए मुदा खूनक संबंध छलफट्टू भ’ जाइछ। पारिवारिक संबंध बना अबैत
अछि, मुदा धोखा भ’ जाइत अछि। दोसर दिश कोनो मित्राक बहिनक रूप-लावण्य
पर मोने-मोन गुड़ चाउर खाइत रहैत अछि, किंतु ओकर संबोधनक पवित्राता सं
डेरा उठैत अछि। मानसिक उद्वेलनक एहि खैंचा-तानी मे, निर्णयहीनताक स्थिति
मे आबि कोनो व्यक्ति भगीरथ प्रयासक पश्चात् एहि द्वंद्व सं मुक्त होइछ। तेसर
दिश आंगिक निश्चेष्टताक कारणें एकटा अर्थ-विपन्न लोक अपन निम्नवर्गीयताक
अभिशाप भोगैत रहैत अछि। खूब रतिगर कें हवेली सं आपस भेल पत्नीक अभिक्रिया
पर, ओकर सेन्ट-पाउडर आदि प्रसाधन-सामग्री व्यवहार कएला पर मोन मे असंख्य
प्रश्न जमा करैत अछि, मुदा किछु पूछि नहि पबैत अछि। डरें नहि, विवशतें। पत्नी
कें सभटा दुनियावी सुख दोसर ठाम भेटि जाइत छैक, मुदा ओ पूर्ण रूप मे समर्पित
अछि पतिक लेल। पतिक लेल ई समर्पण ओकर समाजिक विवशता नहि, ओकर
नैसर्गिक विवशता थिक। पति, अपन पत्नीक एहि सभ परिस्थिति कें जनैत अछि,
मुदा किओ दोसर जखन एहि तरहें कलंक थोपैत अछि, तं ओकरा हार्दिक पीड़ा
होइत छैक। एहि सभ परिस्थितिक जीवंत उदाहरण थिक कथा ‘सरोकार’, ‘जहल
मे टांगल मोन’ आ ‘बौका चुप छल’ आजुक समाज मे व्याप्त ई समस्त परिस्थिति
हमरा लोकनिक सामूहिक जीवन कें, मानवताक धरातल कें कोन तरहें खोंख कएने
जा रहल अछि से भकरार भ’ कए एहि कथा सभ मे आएल अछि।

युगीन चटक-मटकक पाछू पिआसल हरिण जकां लोकक बेतहाश भागब,
छल-छद्मक शिकार बनल लोकक निष्क्रियता, ओकर कायरता, नपुंसकता, फैंटेसीआ वत्र्तमानक खोह मे निसभेर सूतल लोकक भविष्यक प्रति उदासीनता, मुदा षड्यंत्रा
वा कुचक्र दिश उन्मुखता, दांपत्य जीवनक मध्य कुहेस जकां परसरैत संशय,
नारी-मुस्कानक घातक मूल्य सं परिचित कोनो महिला द्वारा अपन हंसी बेचबाकअभिक्रिया, मुदा तकरा अपन-चारित्रिक स्खलन नहि बुझबाक प्रवृत्ति...आदि-आदि
बिंदु मैथिली अथवा आनहु साहित्यक लेल विषयक स्तर पर भने पुरान हो, मुदा
ताहि मे सं कथ्य निकालबाक क्षमता आ तकरा उपस्थापित करबाक शिल्प मे निश्चित
रूप सं अशोक नवीनता देखओलनि अछि। ‘धरती गोल छै’, ‘एकटा दोसर ब्रह्मा’,
‘एकटा चैक माने चण्डीनाथ’, ‘सरिसवक साग’ आदि कथा मे से सहज¯ह ताकल
जा सकैछ।

कथा ‘हेयरपिन’ आ ‘खौंझ’ दांपत्य जीवन मे रबड़ जकां नमरैत आ सिकुड़ैत
तनाव आ प्रेमक कथा थिक। हमरा समाजक जे पुरुष अपन मनोवेगक कारणें, अपन
उन्मादक कारणें, एकटा दूध बेच’ वाली लग एतेक छोट भ’ भ’ जाइत अछि, से


अपन समर्पित स्वभावक पत्नीक चरित्रा पर संदेह करैत अछि। अर्थात् चरित्राहीनो
पति कें पवित्रा पत्नी पर कलंकिनी भ’ सकबाक संदेह करबाक सामाजिक अधिकार
प्राप्त छनि। नारी जाति एकरा सहि रहल अछि, पुरुष वर्ग लगातार एहि दिश बढ़ि
रहल अछि, नारी कें भाइओक संग मुसकिआ कए गप्प करबाक स्वतंत्राता नहि,
मुदा पुरुष असंख्य जनानीक संग कामतृप्ति करैत रहैत अछि। कथा हेयरपिन मे
एही तथ्य कें अगाध प्रेमक नाटकीय दृश्य सं प्रारंभ करैत संदेहक बिंदु पर ठाढ़,
कएल गेल अछि। बीच-बीच मे प्रसंगवश आएल पंक्ति सब कें कथाकार उल्लेखनीय
प्रसंगक लेल प्रस्तुत कएलनि अछि। चन्दर द्वारा दूधवाली कें दू सय टाका देबा-लेबाक
प्रसंग सन घटना आनो आन कथा सभ मे ताकल जा सकैछ।

‘खौंझ’ कथाक दांपत्य तनाव आ ‘हेयरपिन’ क तनाव मे अंतर अछि।‘हेयरपिन’क तनाव लेल मात्रा पुरुष उत्तरदायी अछि, मात्रा ओकर अपन घटिया चरित्राउत्तरदायी छैक, जखन कि ‘खौंझ’ क तनावक लेल मर्द कम आ परिस्थिति बेसी।
‘हेयपिन’क तनावक परिवेश ओकर पुरुष पात्राक सृजन थिक, जखन कि ‘खौंझ’क
तनावक परिवेश व्यवस्था सं उद्भूत अछि। अर्थतंत्राक धाह आ श्रमक पहाड़क यातना
सहि क’ आॅफिस सं आएल प्रत्येक मर्दक ई स्वाभाविक प्रक्रिया थिक, जे ओहिकाल
ओ समस्या सं दूर रहए चाहैत अछि। मानसिक रूप सं खौंझाएल रहैत अछि।
मुदा सामान्य महिलाक सेहो ई स्वभाव होइत छनि, जे ओ एही समय मे पति कें
सभ समस्या सं अवगत करओतीह। अशोक एही बिन्दु कें उत्कर्ष देलनि अछि।
हिनकर एहि दुनू कथाक नारी विशेष होशियारि, बुधियारि आ समझौता क’ कए
रहनिहारि छथि, जखन कि ‘हेयरपिन’ क पुरुष पात्रा धृष्ट आ धोखेबाज।

कथा ‘अंतिम राह’ अर्थाभावक घूर सं उठल धुआंक कुंठापूर्ण परिणाम थिक,
जतए गामक समृद्ध पारिवारिक दानवीय प्रवृत्ति आ निम्नवर्गक शोषित होएबाकघटना चित्रित अछि। श्रमिक वर्गक विजय दिश उन्मुख कथाकारक प्रवृत्ति हिनकर
प्रगतिशीलताक द्योतक थिक। किंतु कथाशीर्षक प्रतीकात्मकता कें पूर्ण बनएबा मे
किछु अंश मे कमजोर रहि गेल छनि।

‘एकटा मुसकुराइत आंखि’ कें संस्मरणात्मक कथा कहल जएबाक चाही।कथा मे भाषाक प्रवाह बहुत शांत चित्त सं जाइत रहल अछि। मुदा कथाक उद्देश्य
बिंदु कें बेस भकरार होएबा मे बाधा उपस्थिति भ’ गेल छनि। ई बाधा हमरा जनैत
कथाक भाषा मे भावनात्मक प्रभावक कारणें भेल अछि। भावनात्मक प्रवाहमयी भाषा
अधलाह नहि थिक, मुदा जखन रचनाकार ओहि भावना मे डूबि जाथि, तं अपन
मंतव्य सं आगू बढ़ि जएबाक संभावना रहिते टा अछि। कथा ‘हड्डी’ छोट सन कथा
मे बहुत बात ल’ कए सोझां आएल अछि। कथा नायकक वैयक्तिक समस्या कें
उठा क’ ओकर मानसिक यात्रा कें जाहि ढंगें कथाकार प्रस्तुत कएलनि अछि, तेना
कहल कम जाइत अछि।

‘जहिआ सुरुज नहि उगलै’ आ ‘नचनियां’ मानवताक Ðास नहि ओकर हलालक
कथा थिक। गृहस्थक वेश मे व्याधाक कथा थिक, मनुष्यक वेश मे गिद्धक कथा
थिक। जतए दुनू ठाम, नारी अपन बापक द्वारा देल गेल उपहारक अभिशाप भोगि
रहल अछि। एक ठाम कम दहेज ल’ कए अएला पर कलंकिनी होइत अछि, तं
दोसर ठाम अपन जवानीक उमेरिक कारणें वयसाहु पतिक अशक्यताक दंड क्रूरतमबाटंे भोगैत अछि। एहि दुनू कथाक नारी मे सं दोसर नारी अपेक्षाकृत साहसी अछि,
जे अपन सुख-सुविधाक बाट ताकि लैत अछि। ओना, मोटा-मोटी, अशोकक नारी
पात्रा प्रायः बेसी होसगरि छनि, जखन कि पुरुष पात्रा कतहु डेरबुक, कतहु क्रूर,
कतहु पलायनवादी, कतहु भ्रष्ट, कतहु संशयी, कतहु पुंसत्वहीन, कतहु कायर आ
कतहु-कतहु उदारो छनि। अपन कथ्य कें पूर्ण रूपें स्पष्टता देबा मे कथाकार
कतहु-कतहु कथो मे किछु उपकथा गढ़ि लैत छथि, से सराहणीय ढंगें, आ से
अप्रासंगिको नहि होइत छनि।

अशोकक संपूर्ण कथा संसारक अनुशीलन, ई स्पष्ट करैछ, जे वर्ष 1989,
प्रायः हिनकर नव शिल्पक अनुसंधान आ पछिला शिल्पक त्यागक संक्रमण काल
थिक। एहि अंतरालक कथा मे अशोक अपन पछिला कथा सभक शिल्प सं दूरस्थ
छथि। यद्यपि कथ्यक दिशा मे कथाकार किछु विस्तृति पाबि लेलनि अछि, जखन
कि शिल्पक स्तरपर एखन प्रायः नव निर्माण मे लागल छथि। कथित अंतरालक
कथा सं पूर्वक कथा सभक शिल्प मे कथाकार अपन नितांत मौलिकताक संग ठाढ़
भेल छथि, जतए सर्वथा भिन्न तरहक शिल्प निखरल अछि। मौलिक रूप सं कथाकारक
समस्त कथाक कथ्य अत्यंत छोट होइत अछि, जकरा कथाकार अत्यंत छोट सन
जगह मे कहि लैत छथि, मुदा से जगह ई अपन कथाक अधोभाग मे रखलनि अछि।
किंतु, ओहि प्रस्तुतिक लेल स्पष्टता आ श्रेष्ठ संप्रेषणीयताक लेल एकटा शानदार
पृष्ठभूमिक निर्माण करैत छथि। वस्तुतः हिनकर कथाक पृष्ठभूमि अधिकांश जगह
छेकैत छनि अर्थात् अपन कथ्योत्कर्षक लेल निचेन सं वातावरणक निर्माण करैत
छथि। इएह निचेनी हिनकर कथाक सहजताक मूलमंत्रा थिक।

प्रारंभ मे शिल्प-अनुसंधानक नव प्रयास कथाकारक कथ्य कें नीक जकां सजएबा
मे सफल नहि होअए दैत छलनि। कथाक गसाइन कनेक ढिल-ढिल रहि जाइत
रहनि, मुदा बाद मे से सम्हरि गेलनि। एहि नव-निर्माणक प्रक्रिया मे ‘जहिआ सुरुज
नहि उगलै’ आ ‘ओहि रातिक भोर’ शिल्पक स्तर पर सेहो, विकासोन्मुख कथा मानल
जाएत जखन कि शिल्पक कमजोरीक कारणें ‘नचनियां’ एक रती टगि गेल अछि।
कथाकारक शिल्प-अनुसंधानक ई नव प्रयास हिनकर कथालेखन कें एकटा नव क्षितिज
द’ सकल, से तोषक बात थिक।


विसंगतिक भीड़ मे सहज संधान


बीसम शताब्दीक आठम दशक मे लेखन प्रारंभ क’ कए जे युवा पीढ़ी अपन हस्तक्षेप
मैथिली कथा लेखन मे कएलक ताहि मे प्रदीप बिहारीक महत्वपूर्ण स्थान अछि।
लगभग डेढ़ सय कथा, पचास गोट लघुकथा, दर्जन भरि एकांकी, दूटा उपन्यास
आदि पुस्तकाकार अथवा पत्रा पत्रिका मे प्रकाशित छनि। हिन्दी आ नेपाली मे कैकटा
रचनाक अनुवाद भेल छनि। मैथिलीक किछु कथा संकलितो छनि। सन् 1983 मे
हिनकर उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ प्रकाशित भेल आ सन् 1986 मे दोसर उपन्यास
‘विसूवियस’। ‘विसूवियस’ मैथिली उपन्यासक विकास-क्रम मे परिचित संबंध आ
मानव-चरित्राक चित्रा प्रस्तुत करैत सोझां अबैत अछि। ई उपन्यास नेपालक एकटा
शोषित पराजित भूखंडक जन-जीवन कें केंद्र मे राखि कए लिखल गेल अछि। जं
दृष्टि कें व्यापक कएल जाए तं ई जनपद प्रातिनिधिक रूप मे कतौको शोषित
जनता क संकेत द’ सकैए। एतए अस्तित्व रक्षा मे जुटल जनताक जीवनक सूक्ष्म
चित्रा प्रस्तुत कएल गेल अछि। उपन्यासक कथानायक मनीशक संग भावनात्मक
अंतरंगता स्थापित क’ कए समाजक परदा तर झांपल दुर्गंध सं परिचित भेल जा
सकैछ, व्यवस्थाक चद्दरिक एक-एकटा भूर कें देखल जा सकैत अछि।

पोथीक नाम आ आवरण चित्रा बहुत रास गूढ़ तत्वक रहस्योद्घाटन करैत
अछि। ‘विसूवियस’, शब्द संपूर्ण उपन्यासक एक्को पंक्ति मे कतहु व्यवहृत नहि
अछि। निश्चित रूपें एहि उपन्यासक कथा-भूमि सं विसूवियसक कोनो ताल-मेल
हएबाक चाही।

जापानक धरती पर ज्वालामुखी पर्वत शृंखलाक बाहुल्य अछि आ पर्वत शृंखलाक
बाहुल्य नेपालो मे अछि। ई आंचलिक उपन्यास नेपालक जाहि भूखंडक आंचलिकता
सं भरल अछि, ततए अदौ सं श्रमशील मानवक शोषण होइत आएल अछि। ई
उपन्यास ओही शोषणक तांडव आ प्रतिवाद लीलाक चित्रा प्रस्तुत करैत अछि। अर्थात्,

साबित होइत अछि, जे अइ जनपदक ई पर्वतमाला मात्रा निर्जीव पाथरक ढेरी नइं
थिक, ई ‘विसूवियस’क ज्वालामुखी बनि सकैत अछि। चाउर-तेलक मील मे धान
उसनैत-कुटैत, तोड़ी-सरिसो पेड़ैत विशाल जनसमूह एकटा दीर्घ अवधि सं धानक
संगें अपन आत्मा कें उसनैत, सुखबैत, कुटैत रहल अछि; अपन-अपन जीवन केंपेड़ि कए खोशमदिया हंसीक तेल निकालैत रहल अछि; दारुण सं दारुण विपत्ति
कें सहि कए शोषण कें बर्दाश्त करैत चुप रहैत आएल अछि। अनेक वर्ष सं मधेसी
आ पहाड़ीक एहि शोषणक प्रतिरोध मे उठैत चिनगी दबैत रहल, जमा होइत रहल
आ अचक्के मे ई चिनगी सब एक दिन बनि गेल ज्वालामुखी; नेपालक सभ पहाड़
बनि गेल ‘विसूवियस’। शोषणक इएह प्रतिवाद ‘विसूवियस’ मे स्पष्ट रूपें मुखरित
भेल अछि।

पोथीक आवरण चित्रा थिक मटियाह, करिछौन रंगक पर्वत शृंखला सं उठैत
लाले-लाल बड़का धधरा। पहाड़ आ पहाड़क पाथर, निर्दयता आ क्रूरतापूर्ण शोषण
कें घोषित करैत अछि तथा पहाड़क चोटी सं निकलैत धधरा, अदौ सं शोषित जनसमूह
द्वारा एकत्रित आक्रोशक लहरि कें; जे ज्वालामुखी बनि निकलल अछि। ई सभटा
बिंब-प्रतीक; पोथीक कथाभूमि मे चित्रित यथार्थ; विकासोन्मुख सर्वहाराक शक्तिक
प्राबल्य; ओकरा अपन अस्तित्व बोध होयबाक सूचना; अपन मूल्य बूझि लेबाक
स्थिति आ विकासोन्मुख एहि शक्ति द्वारा पराजित होइत पतनोन्मुख बुर्जुआक चित्रा
ठाढ़ करैत अछि।

कथाभूमिक चयन मे प्रदीप बिहारी सफल रहलाह अछि। कैक तरहें विसूवियसक
कथानक कें सराहल जा सकैत अछि। पोथीक भूमिका मे जीवकांत प्रदीप कें ‘जनवाद’
सं बेसी निकट कहलनि अछि। कथानकक दृष्टिएं ठीके ई जनवादक बेसी निकट
छथि। भद्रपुर स्थित मील मे धरती-आसमान एक क’ कए, खून-पसेना बहा कए
खटनिहार मजूरक व्यथागाथा आ पहाड़ी क्षेत्रा, जंगली क्षेत्रा मे जारनि बेचि कए गुजर
करबा मे शासकीय तंत्रा द्वारा उपस्थित व्यवधानक स्थिति कें मस्तिष्क मे राखि ओहि
पर तैयार कयल कथानक प्रशंसनीय अछि। उपन्यास मे आधिकारिक कथावस्तु आ
प्रासंगिक कथावस्तु, दुनूक निर्वाह सफल ढंगें भेल अछि। ई बात भिन्न, जे कथानकक
तानी-भरनी मे कतहु-कतहु फांक बुझाइत छनि। औपन्यासिक शिल्पक खील
कतौ-कतौ ढील लगैत छनि। मुदा घटना क्रमक तीव्रता आ तीक्ष्णता तकरा झांपि
दैत अछि।

मनीशक पढ़ाइ, कथानायकक माइक रुग्नावस्था, पिताक मृत्यु सं ल’ कए
यूनियनबाजीक माध्यमे मील मालिक पर विजय प्राप्ति धरिक कथा आ ‘चम्पक’
तथा विधवा ‘लिपिका’क रागात्मक संबंधक कथा, बेबीक परिवारक जनीजातिक स’खसं अथवा लाचारीवश देह बेचबाक कथा, चम्पक सं पित्तीक झंझटिक कथा,
मेवा-इजोतिया-भगलुआ इत्यादिक कथा सभक संयोजन कलात्मक ढंग सं भेल अछि।


विसूवियसक कथानायक मनीश कें संपूर्ण उपन्यास मे एहेन एकोटा कथानायिका
नहि भेटलैक जे कथानायक कें कतहु कोनो क्षेत्रा मे प्रेरित कयने हो। स्त्राी पात्राक
संबंध मे प्रदीपक समस्त रचना संसार कें देखि कए बद्धमूल धारणा सन लगैत
अछि। हं, ‘माइ’ एकटा एहेन चरित्रा अवश्य अछि जे प्रतीक रूप मे अइ मे उपस्थित
अछि।

चरित्रा-चित्राणहु मे कैक प्रकारक कलात्मकता देखाओल गेल अछि। कतहु
मनीश कें सरल-सपाट तरहें चित्रित कएल गेल अछि, कतहु एकटा बेरोजगार युवकक
अत्यंत खिन्न मानसिकता, तं कतहु मील मे रोजगार पाबि लेलाक बादहु ओतुक्का
मजूरक शोषण देखि कए औनाहटि छटपटाहटि, तं कतहु क्रांतिक अगुआ आ सभ
सं अपूर्व बात जे मील मलिकिनीक प्रेम निवेदनक मुक्त आमंत्राण कें अस्वीकार
करब तथा मील मालिकक बेटीक न्योछावर कयल यौन भरल पुष्ट-कोमल देहक
उपेक्षा क’ कए चलि देब अत्यंत मनोविश्लेषणात्मक ढंगें भेल अछि। ‘विसूवियस’
मे कथोपकथन अपेक्षाकृत बेसी अछि।

पात्राक बहुविध चित्राण करबा काल ओकर देश, काल, वातावरण, कथोपकथन
इत्यादिक समावेश करबा मे उपन्यासकार सचेष्ट रहलाह अछि। सामाजिक परिवेश,
भौगोलिक परिवेश, भौतिक परिवेशक वैविध्य रीति-रेवाज, वेश-भूषा, आचार-विचार
इत्यादि कलात्मकता सं व्यक्त भेल अछि।

मात्रा ई उपन्यासे टा नहि, प्रदीप बिहारीक कोनो कृति पर नजरि दी तं स्पष्ट
होएत जे हिनकर संवेदना मध्यम वर्ग आ निम्न मध्यम वर्गक जीवनक संघर्ष आ
ओकर विसंगति सं संबद्ध अछि। प्रारंभ मे हिनकर लेखनक कथाभूमि समान्यतया
नेपालक जनजीवन होइत छल। आब ई मिथिलाक पारिवारिक आ सामाजिक पाखंडसं उद्भूत जटिलता आ विसंगति दिश अभिमुख भेलाह अछि। ‘फांक’, ‘लुत्ती’,
‘मकड़ी’, ‘मोटबाह’, ‘उपरौंझ’ आदि कैकटा हिनकर स्मरणीय कथाक नाम लेल जा
सकैत अछि। यौन-क्रीड़ा आ यौन-पीड़ा हिनकर कथा मे बड्ड मुखर रहैत अछि।
हिनकर कथा संसारक एकटा विचित्रा विडंबना अछि जे अधिकांश स्त्राी पात्रा देह
तुष्टि सं मुक्त नइं भ’ पबैत अछि। मानवीय जिजीविषाक पहिल शर्त थिक ‘रोटी’।
तइ रोटीक प्राप्ति हेतु हिनकर पुरुष पात्रा तं जान-प्राण लगौने रहैत अछि, मुदा हिनकर
स्त्राी पात्रा एखनहु, देह भोग सं उपर नहि आबि सकलनि अछि। यद्यपि ओ स्त्राी
पात्रा प्रायः सभ ठाम हिनकर संघर्षशील नायकक संबल अथवा कही तं उद्देश्य केंद्रित
संधान मे विचलन विरोधी तत्वक रूप मे अबैत छनि। मुदा ओहि स्त्राी पात्राक अस्तित्व
हिनकर रचना संसार मे स्वावलंबी जकां नइं बनि पबैत अछि।

प्रदीपक रचना संसार मे एकटा आओर समस्या, पूर्वक लेखन मे छल। हिनकर
कथा सभक बुनावटि मे फांक रहि जाइत छल। कथा बनि तं जाइत छल, मुदा
एतेक संख्या मे कथा लिखलाक बाद ओहि मे जाहि निस्सनताक आ सघनताक

अपेक्षा रहैत छल, से अबैत नइं छल। कथा कहबाक लूरि छनि, तें ई कोनहुं वस्तु-विषय
पर कथा लिखि लैत छलाह, यद्यपि ओ कथा होइत छल मात्रा लूरिक बलें। मुदा
से पाछू आबि कए दूर भ’ गेलनि आ एखन प्रदीप अपन कथा-लेखन मे पर्याप्त
सावधान छथि। वस्तु आ शिल्प दुनू स्तर पर।

पेशा सं बैंक कर्मी, रुचि सं रंग कर्मी आ कर्म सं कथाकर्मी, स्वभाव सं आयोजन
कर्मी समय आ ऊर्जाक ई बहुआयामी उपयोग हिनकर लेखन कें कतेक प्रभावित
अथवा अप्रभावित करैत छनि, से कहब कठिन अछि। मुदा अइ समस्त व्यस्तता
आ अस्त-व्यस्तताक बीच प्रदीपक कथा-लेखन समृद्ध भ’ रहल अछि, ई तोषक बात
थिक। कहल जा सकैत अछि जे प्रदीप तुमुल कोलाहल आ व्यवधानक पहाड़ कें
चीड़ि कए आगू बढ़ि रहलाह अछि।


प्रवहमान भाषाक डिक्टेटर


आठम दशक मे उभल रचनाकार लोकनिक पीढ़ी मे तारानन्द वियोगी एक महत्वपूर्ण
नाम थिक।

वियोगी समकालीन साहित्यक प्रायः सभ विधा मे रचना कयलनि। मुदा, हमरा
बुझने, समकालीन साहित्यक परिसर मे हुनकर जे विधा सभ सं सार्थक हस्तक्षेप
करैत अछि, से थिक आलोचना, जे कि ओ अपेक्षाकृत कम लिखलनि अछि। मैथिली
लघुकथाक क्षेत्रा मे सेहो हिनकर काज महत्वपूर्ण अछि। बेछप विषय-वस्तु आ नूतन
शैली हिनकर विशेषता थिकनि। वियोगी गजल सेहो लिखलनि। हिनकर गजल-संग्रह
‘अपन युद्धक साक्ष्य’ प्रकाशित अछि।

मैथिली मे गजल बहुत दिन सं लिखल जाइत रहल अछि। पहिल गजलकार
पं. जीवन झा 1904 मे गजल लिखलनि। मुदा, ई धरि निश्चित जे मैथिली गजल
एहि शताब्दीक नवम दशकक प्रारंभ मे आबि क’ चर्चाक विषय बनल। 1981
मे मैथिलीक पहिल गजल-संग्रह, विभूति आनन्दक ‘उठा रहल घोघ तिमिर’ प्रकाशित
भेल, आ यैह ओ वर्ष थिक जहिया मैथिली गजल पर पहिल बेर आलोचकीय प्रयास
भेल, आ ई प्रथम निबंधकार छलाह तारानन्द वियोगी। पहिल बेर एत्तहि आबिमैथिली गजल बृहत्तर आयाम मे चर्चाक विषय बनल। गजलक मादे छपल। तहिया
वियोगी गजल नहि लिखैत छलाह, आलोचनादि लिखैत छलाह। तकर दू बर्खक
बाद ओ गजल-लेखनक क्षेत्रा मे प्रवेश कयलनि।

ई कहब किन्नहु अतिशयोक्ति नहि जे मैथिली गजल कें वियोगी धारदार
आ जुझारू तेवर देलनि अछि। हिनकर गजल सभ चर्चित आ लोकप्रिय सेहो भेल।
बहुत गोटे कें हिनकर गजलक अनेक पांति मोन होयतनि।

1983 मे वियोगी गजल-लेखन दिस उन्मुख भेलाह, आ सात बर्खक बाद
1990 मे हिनकर गजल सभक पहिल संकलन प्रकाशित भेल। एकर बाद 1996

मंेे वियोगीक छियालीस गोट शानदार मैथिली कविताक संकलन ‘हस्तक्षेप’ आ 1997
मे अड़तालीस गोट लघुकथाक संकलन ‘शिलालेख’ तथा ग्यारह गोट कथाक संकलन
‘अतिक्रमण’ प्रकाशित भेल।

‘अपन युद्धक साक्ष्य’ मे तारानन्द वियोगीक चालीस गोट गजल संकलित
अछि, जे कथ्य आ बुनाबटि दुनू स्तर पर बहुरंगी दृश्य उपस्थित करैत अछि। वियोगी
जीवंत रचनाकार छथि, तकर प्रमाण ईहो जे समकालीन जीवन सं जुड़ल प्रायः सबसंदर्भ, सब प्रसंग हिनकर रचनाक वृत्त मे मुखर भेल अछि।

कोनो रचनाक तथ्यान्वेषण करबा काल परिदृश्य दिस देखि लेब आवश्यक
होइत अछि। एहि संदर्भ मे सर्वप्रथम हमरा समक्ष समाजक नारकीय दृश्य अभरैतअछि, जतय मनुष्य कें सामाजिक, सांस्कृतिक आ धार्मिक कथित अनुशासनक टांक
सं टांकि क’ ओकर संपूर्ण जिनगी मे एकटा गुमसड़ाइन वातावरण तैयार क’ देल
गेल अछि।

मनुक्ख कें ई जीवन-प्रक्रिया आजिज कयने अछि, मुदा मुक्ति पयबाक कोनहुटा बाट ओ ने तं ताकि सकैत अछि, आ ने तकबाक लेल पेट-प्राणक समस्या-पूत्र्ति
सं पलखति पबैत अछि। वियोगीक गजल, कविता, कथा आ लघुकथा अइ स्थितिक
अलबम थिक।

समकालीन विश्वसाहित्यक गर्भस्थल, गंहीर आत्मबोधक प्रतिफलन थिक।
आत्मबोधक सर्वोच्च शिखर पर बेस सामथ्र्यक संग पहुंचि पयबाक लेल जतेक
आवश्यक शर्त सभ अछि, ताहि मे पहिल थिक लेखकक अपन दृष्टिकोण। से
खाहे जीवन मे हो अथवा लेखन मे। जीवन कें अतीव निर्ममता सं देखबाक प्रक्रिया
आ अपन रचनाकार कें ओहि भोग-क्षण सं अलग क’ कए ओहि अभिक्रियाक प्रेक्षक
बनयबाक कलात्मकता वियोगी मे ततेक मौलिक छनि जे सहजहि हिनकर व्यक्ति-भोग,
समुदाय-भोगक दस्तावेज बनि जाइत अछि। एहि परिप्रेक्ष्य मे वियोगी अद्यावधि
उपलब्ध दृष्टिकोण सं जीवन कें जीबाक तरीका अपनौलनि, जाहि क्रम मे आत्म-परीक्षण
आ आत्म-बोधक अवसर हाथ लगलनि। ई अवसर हिनकर मोह-भंगक प्रतिफलन
थिक। हिनकर रचना-संसारक विषय मे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कारिक,
भावनात्मक विद्रूपता एत्तहि सं अपन वास्तविक रूप मे आयल।

समकालीन जन-जीवनक सौविध्यक नियामक शक्ति थिक राजनीति। एकरा
बिना आजुक जीवन-प्रक्रिया संभव नहि। मैथिली-लेखन सं जुड़ल कतोक गोटे
राजनीतिक दृष्टि सं तटस्थ रहबाक बात कहैत छथि। मुदा, एकर अर्थ होयत सामाजिक
व्यवस्था आ जन-जीवनक प्रति नपुंसक तटस्थता। कारण, समकालीन परिवेशक आ
जीवन-जगतक कोनहु टा पक्ष राजनीतिक प्रभाव सं फराक नहि अछि। तें, एकरा
प्रति लेखन मे तटस्थता देखायब वस्तुतः नपुंसक तटस्थता होयत, जे रचनाशीलताक
प्रासंगिकता मे बाधक थिक। यद्यपि संपूर्णता मे राजनीतिक प्रतिफलन कें पकड़ब


कठिन अछि। एकर विस्तार आ व्यापक प्रभाव कें रचना मे गंभीरतापूर्वक उठेबाक
लेल बहुत बेसी धैर्य आ संलग्नशीलताक अपेक्षा अछि। मैथिली मे जं राजनीतिक
रूप सं दृष्टिसंपन्न रचना कम आयल अछि, तं तकर मूल कारण एही धैर्य,
संलग्नशीलता आ गंभीरताक कमी थिक।

वियोगीक गजल सभ पूर्णतया एकटा राजनीतिक काव्य-रचना थिक, जकरा
संगें उचित संलग्नशीलता आ धैर्य तं छैके, गंभीरतापूर्ण दृष्टि सेहो आद्योपांत छैक।

राजनीतिक लेखन मे एकटा जोखिम आओर रहैत अछि। से ई जे बदलैत
समय-धाराक संग रचनाक प्रासंगिकता न्यून होइत जयबाक भय सदैव व्याप्त रहैछ।
ई जोखिम उठब’ मे वियोगी कतहु अपन कान्ह नहि छिपलनि। ओना, आजुक लेखन
मे साहसिकता एक आवश्यक शर्त जकां भ’ गेल अछि, अन्यथा अनुभूतिक
अभिव्यक्तिए एकटा समस्या भ’ जायत, भ’ ईहो सकैत अछि जे बदलैत समय-धाराक
क्रम मे वियोगीक राजनीतिक लेखनक प्रासंगिकता सेहो न्यून भ’ जाइक; मुदा एहि
सूचना सभक पक्ष मे सभ सं पैघ बात ई अछि, जे ने तं एहि मे कतहु कलात्मकताक
कमी आयल अछि, आ ने गंभीरताक।

जे प्रमुख विषय-वस्तु वियोगीक गजल सभ मे मुखर भेल अछि, से थिक राजनीतिक
विद्रूपता, विविध समस्या सभ सं गछारल जन-जीवनक अकुलाहटि, कुंठारहित आसम-वेदनामय जीवन जीबाक आग्रह, अंध-वृत्तिक विरोध, वैज्ञानिक आ प्रगतिशील
विचार-प्रणालीक प्रति आस्था, धार्मिक रूढ़िक विरोध आदि।

उर्दू-फारसी सं सीखल वा उधार लेल गेल गजलक जे सामान्य परिभाषा बनैत
अछि, तकरा आधार पर एकटा प्रश्न मस्तिष्क मे उठैत अछि की मतला, मक्ता,
शेर, यैह थिक गजल ? हमरा विचारें, किन्नहु नहि। एहि समस्त काव्यांगक संग
सभ सं बेसी महत्वपूर्ण अछि एकर अन्विति, एकर चमत्कारिक उपस्थापन। आ,
ताहि अन्विति आ उपस्थापन मे वियोगी बहुत सफल छथि। रदीफ आ काफियाक
एतेक समधानल प्रयोग कम गजलकारक रचना मे भेटैत अछि।

उर्दू शब्दक प्रयोग वियोगीक गजल मे अखरैत रहैत अछि। एकरा बदला मे
दोसरो शब्द सभ सहजता सं ताकल जा सकैत छल। बोधगम्य होइतहु एहन शब्दक
बाहुल्य रचनाकारक ठेठ मैथिली शब्दक दारिद्र्यक बोधक थिक। तें हिनका अइ
तरहक प्रयोग सं बचबाक चाहिअनि।

ग्राम्य परिवेशक फकरा, कहावत, मोहावरा आदिक प्रयोग आ वाक्य-विन्यासक
सहजता ततेक जानदार ढंग सं ई सहियारैत छथि जे ई सभटा मिलि क’ एकटा
अनुपम शैलीक स्वरूप ठाढ़ करैत अछि। फेर उर्दू शब्दक जबर्दस्ती प्रयोगक की
प्रयोजन !

अत्यंत संयमपूर्वक बात कहबाक अभ्यासी वियोगी जे रचैत छथि, बहुत आराम
सं रचैत छथि। हुनका कतहु अगुताइ नहि रहैत छनि। विलंबित शैलीक ई प्रवाह

हिनकर कलात्मकता कें बेस उंचाइ दैत छनि। हिनकर भाषा संस्कार ततबा फरीछ
छनि, जे प्रेषणीयताक उत्कर्ष सभतरि देखाइत अछि। भाषाक सादगीक कारणें
संप्रेषणीतयताक स्थिति हिनक रचना सभ मे ई अछि, जे कविता हो, कथा हो,
गीत-गजल-आलोचना किछु हो, ओ समाजक सभ वर्गक अतल मोन धरि पहुंचैत
अछि। भाषा-शिल्प मे पांडित्य भरनिहार लेखक लोकनि कें ई मोन राख’क चाहिअनि,
जे, जं रचनाक पाठ सामान्य श्रोता/पाठक कें पकड़ि नइं सकए, तं ओ रचना नइं
भेल। कहल गेल अछि, जे ‘हरिण तं गीत रस लंपट, जे गीत प्यासल गाय कें
पानि देखि दौड़ैत काल ठामहि रोकि दिअए, से भेल गीत’। अर्थात् साहित्यकार
अथवा कोनो आन अनुशासनक विद्वान तं पढ़बाक लेल अभ्यस्त होइत अछि। जन
साहित्य तं असल मे ओ भेल, जकर पाठ अनपढ़ व्यक्ति धरि कें प्रभावित क’
दिअए। तइ रूप मे वियोगीक साहित्य जन-साहित्य थिक। ओना ई जीवकांत बला
ओ चुइंगम नइं थिक, जे वियोगीक कविता संग्रह पर चर्चा करैत ओ देने रहथिन ‘वियोगीक
कविता दलित साहित्यक मैनीफेस्टो थिक’। अइ चुइंगम कें जं वियोगी चिबाएब
शुरुह करताह तं मसुहरि खराब भ’ जेतनि। जीवकांत ई पांती निश्चिित रूप सं
बिना सोचने विचारने लिखने हेताह। हिन्दी मे दलित साहित्यक झंडा फहराएब
एकटा राजनीति थिक। मैथिली मे अइ राजनीतिक कोनो प्रयोजन नइं अछि। जे-से


वियोगीक कथा, कविता, गजल, गीत, आलोचना; वस्तु, शैली, शिल्प सब
अर्थें जनपद आ सामान्य जनजीवन कें संबोधित अछि। हिनकर कविताक मूल स्वर
थिकनि आम जनताक इच्छा-आकांक्षाक हंता वर्गक विरोध, प्रतिपक्षक भूमिका आ
कथाक मूल स्वर थिकिअनि ग्रामीण जनपद मे अर्थ तंत्राक पराभव सं खौंझाएल
सामंती स्वभावक कुटिल आचरण कें उघारब, श्रमशील मानवक आर्थिक दशाक क्रमिक
सुधारक प्रशंसा करब... आदि। अही जटिल परिवेश आ कुटिल परिदृश्य मे रचल
गेल वियोगीक रचना संसार सहजहिं जनसाहित्य भ’ जाइत अछि, तं ई श्रेय वियोगीक
जनसंबंध कें जाइत छनि।


स्वाभाविक आ स्वाभिमानी जीवनक कथा


बीसम शताब्दीक आठम दशक मैथिली कथा लेखन लेल ऐतिहासिक दशक थिक।
पर्याप्त संख्या मे अइ दशक मे मैथिलीक बेस समर्थ कथाकारक प्रवेश भेल आ किछु
प्रविष्ट कथाकार, अपन परिचिति बनौलनि। अइ दशकक कथाकार सभ मे महत्वपूर्ण
छथि विभूति आनंद, विनोद बिहारी लाल, नवीन चैधरी, तारानन्द वियोगी, शिवशंकर
श्रीनिवास, अशोक, प्रदीप बिहारी, शैलेन्द्र आनन्द, रमेश आदि। शिवशंकर श्रीनिवास
अपन संपूर्ण पीढ़ी मे बेछप छवि बनौनिहार कथाकार छथि। शिवशंकर ओना किछु
कविता, किछु गीत, किछु आलोचनात्मक लेख, किछु लघुकथा सेहो लिखने छथि,
थोड़ेक संपादन कार्य आ किछु शोध कार्य सेहो कएने छथि। मुदा हम मूलतः हिनका
कथाकार मानैत छी। कथा लेखन मे एखन धरि ई अपन जे स्थान बना सकलाह
अछि, तकर तुलना मे आन विधाक लेखन झूस साबित होइत छनि। चर्चो-बर्चा
हिनका पर नीके जकां होइत रहल अछि। पहिल बेर ‘त्रिकोण’ नामक साझी संकलन
मे हिनकर किछु कथा अशोक आ शैलेन्द्र आनंदक कथाक संगें संकलित भेल।
तदुपरांत 1991 मे पहिल बेर हिनकर स्वतंत्रा संकलन ‘अदहन’ प्रकाशित भेल। अइ
संकलन मे हिनकर पंद्रह गोट विशिष्ट कथा संकलित अछि। तत्पश्चातो लगातार
हिनकर कथा सभ पत्रा-पत्रिका मे अबैत रहल अछि आ कथा गोष्ठी सभ मे ई पाठ
करैत रहलाह अछि।

‘अदहन’ हिनकर कथासंग्रहक नाम थिक। अइ शीर्षकक एको गोट कथा अइ
मे नइं अछि। तथापि अइ संकलनक अइ नामक सार्थकता अछि। संघर्ष मे डेग
लेबाक उपयुक्त वातावरण दिश ‘अदहन’ संकेत करैत अछि से कथाकारक कहब
छनि। वस्तुतः अदहन जेना खौलैत अछि आ जेना हुमरैत अछि, हहाइत अछि,
भारोत्तोलनक ऊर्जा ओहि मे जेना व्याप्त रहैत अछि, चाउर सन अंकड़ा आ कुपाच्य
दाना कें भात सन सिद्धान्न आ सुपाच्य आ स्वस्थ्यवर्द्धक बनबैत अछि शिवशंकरक

कथा सभ सैह अदहन थिक। हिनकर कथा-कौशल आ स्वानुभूति मे ओ ताप अछि,
ओ उष्मा अछि, जे अनिष्ट कें जरा सकैत अछि आ अभीष्ट कें पनगा सकैत अछि।

आजुक समय मे शताब्दी कें विदा करैत-करैत मिथिला असंख्य समस्या सं
संघर्ष क’ रहल अछि। बेरोजगारी, बेकारी, फूसि, फरेब, धोखा, पाखंड, हत्या, दंगा,
फसाद, चोरि, बटमारि, अशिक्षा, अनुपयुक्त शिक्षा आ राजनीतिक अपराधीकरण,
सत्ता-लोलुप व्यक्ति द्वारा समाज विरोधी हरक्कति सब मिथिला मे व्याप्त अछि।
समाजिक शिष्टाचार, पारिवारिक संबंध, जनपदीय संवेदना सभक लोप भ’ चुकल
अछि। अभाव पराकाष्ठा पर, जमाखोरी ताहू सं आगू एहि त्रासद वाातावरण मे
शिवशंकर श्रीनिवास पेशा सं शिक्षक, मुदा गाम मे रहि कए मिथिलाक सुच्चा
नागरिकक संग जीवन बिता रहल छथि, कथा रचि रहल छथि, कथानक बुनि रहल
छथि, कथ्य बीछि रहल छथि। प्रायः इएह ग्रामवास हिनकर कथाकार कें जीवन-रसआ रचनात्मक ऊर्जा द’ रहल छनि।

वर्तमान समय मे तीक्ष्णतर ढंगें जे कथा सभ लिखा रहल अछि, ताहि मे
शिवशंकर श्रीनिवासक नाम महत्वपूर्ण ढंगें लेल जाइत छनि। कथ्य आ शिल्प दुनू
स्तर पर शिवशंकर मैथिली कथाक विकास मे पर्याप्त योगदान देलनि अछि, द’
रहलाह अछि। समाजक त्याज्य आ अनदेखल विषय वस्तु कें अपन कथा मे उठबैत
छथि, किछु एहेनो विषय सभ, एहनो समस्या सभ, जे मूलतः ग्रामीण जनपदक नइं
थिक, ओ वैज्ञानिक प्रगति आ शहरक आक्रमण सं नव-नव समस्या उत्पन्न भेल
अछि, आ ग्रामीण समस्या सं मिलि कए क्राॅस-ब्रीड समस्या बनबैत अछि। हालहि
मे हिनकर एकटा कथा सुनल अछि ‘चिंता’। वायुमंडलीय प्रदूषण, कृषि कर्म पर
आघात, ग्रामीण युवकक पलायन, ई पलायन गाम सं, दायित्व सं, संबंध सं, मानवता
सं; युवकक माता-पिताक अइ चिंता मे अनेक मानसिक व्यायाम, ओहि माता-पिताक
हार्दिक पीड़ा, संतान विछोहक दुख ई सबटा मिलि कए अइ कथा मे जे प्रभाव
उत्पन्न केलक अछि, से मैथिली कथाक लेल उपलब्धि थिक।

जेना कि कहल गेल, शिवशंकरक कथाभूमि सामान्यतया गाम छिअनि, मुदा
तें ई नइं कहल जाए जे हिनकर कथाक विषय राष्ट्रीय नइं अछि। शिल्प ई अपना
तरहें विकसित कएलनि अछि, आ एहि शैल्पिक विकास मे हिनक ग्रामवासक
योगदान पर्याप्त छनि। नगर-महानगर मे रहनिहार व्यक्तिक संवेदना आ धैर्य दुनू
आहत रहैत अछि। महानगरीय जीवन-पद्धतिक आपा-धापी सं प्रभावित भेला बिना,
कोनो व्यक्ति कोना रहि सकत ! आ जकर जीवने आपाधापी सं, हड़बड़ी आ बेचैनी
सं प्रभावित रहत ओ कथा की लिखत ? ओतहु ओकरा हड़बड़ी पछाड़ने रहतै।
असल मे कथाकार कोनो डाकिया अथवा अखबारक हाॅकर नइं होइत अछि, जे
हांइ-हांइ कए चिट्ठी आ कि अखबार फेकलक आ फेर दोसर दुआरि पर। कथावाचन
आ कथा श्रवण प्रारंभहि सं राति कए होइत छल, जखन लोक जीवन यापनक


समस्तक हलचल सं नि¯श्चत भ’ जाइत छल। धैर्य सं कथा कहल आ सुनल जाइत
छल। शिवशंकर धैर्य सं कथा कहै छथि, अर्थात् लिखै छथि। एक-एकटा बातक
‘डिटेल’ कहताह। अइ ‘डिटेल’ मे कतहु-कतहु अतिकथन भ’ जाइत छनि, मुदा एना
नइं होइत अछि जे कथा असंप्रेषित रहि जाए।

शिवशंकर श्रीनिवासक जांच पड़ताल जं हिनकर रचनाक माध्यमे कएल जाए,
तं गजब समन्वय भेटत। वर्तमान समय मे मनुष्यक स्वभाव विचित्रा तरहें परिवर्तित
भेल अछि संस्कृति-रक्षाक नाम पर परंपरा सं अबैत लोकाचार कें निमाहबाक जिद
मे किछु कट्टरपंथी एहेन भेटि जएताह, जे स्थान-काल-पात्राक विचार कएने बिना
अव्यावहारिक आ अप्रासंगिको बात कें पकड़ने रहताह अथवा प्रगतिशीलताक नामपर
परंपराक अव्यावहारिको बात कें नकारैत रहताह। शिवशंकर अइ दुनू विचारक विरोधी
छथि। प्रगतिशील हेबाक पाछू कतहु ई अति क्रांतिकारी नइं देखाइ पड़ताह आ ने
परंपरा रक्षकक रूप मे कतहु पाखंडी। इएह कारण थिक जे ‘सीतापुुरक सुनैना’
कथाक नायिका कें आर्थिक स्वनिर्भरताक सलाह देलनि अछि। ई कोनो अति
क्रांतिकारी जकां ओकर पुनर्विवाह नइं करबैत छथि, हिनकर कोनो पात्रा आत्म निर्भरहेबाक प्रयास मे रहैत अछि, हिनकर पात्राक ऊर्जाक अपव्यय नइं जकां देखाइतअछि। ऊर्जाक व्यावहारिक उपयेागक चित्राण, ने मात्रा कथा मे उत्कर्ष आ चरित्रा-चित्राण
मे जीवंतता भरैत अछि, बल्कि सामाजिक निर्माण मे सेहो विशिष्ट योगदान दैत
अछि। चूंकि रचनाक माध्यमे सामाजिक शिष्टाचारक प्रतिस्थापन मे साहित्यकारक
भूमिका महत्वपूर्ण होइत अछि, तें कोनो रचनाक समग्र प्रभावक संग संग ओकर
एक-एक पंक्ति महत्वपूर्ण होइत अछि।

स्त्राी, किसान आ वृद्ध ई तीन वर्ग मिथिला मे आर्थिक आ शैक्षिक परतंत्राताक
कारणें उपेक्षाक शिकार होइत आएल अछि। अइ तीनू वर्गक दुर्दशाक प्रति शिवशंकर
बेस चिंतित आ योजनाबद्ध ढंगें अइ तीनू वर्गक समस्या सोझरएबा मे लागल छथि।
अही बीच एकटा खास बात ईहो देखाइत अछि, जे हिनकर पात्रा पर्याप्त बुझनुक आ
समय सं पहिने चेत जाइ वला आ अपन भाग्य-निर्माता स्वयं बनै वला सब छनि।

सिनुरहार, सीतापुरक सुनैना, अपना लेल, आदि कतोक कथा स्त्राी समस्या कें
केंद्र मे राखि कए लिखल गेल अछि। स्त्राीक पराश्रयी हएबे ओकरा जीवनक सब
सं मूल समस्या थिक। सामान्यतया आन-आन भाषा-साहित्यक नारीवादी (?) स्त्राी
पात्रा सं हो हल्ला मचबौताह, पुरुष-पात्रा सं हाथा-पाही करबौताह, मोकदमा करबौताह,
कोर्ट कचहरी, नारी सेल आदिक चक्कर कटबौताह, मुदा हिनका ओतए नारीक
ओहन कोनो कल्पने नइं अछि, परिवार आ परिवारक स्त्राीक प्रति एक भव्य-दिव्य
धारणा संपूर्ण कथा लेखन मे भेटैत अछि। जं हिनकर रचना मे नारीक स्थिति कतहु
थोड़ बहुत गड़बड़ अछि, तं तकर मूल कारण पारिवारिक कम आ सामाजिक बेसी
होइत अछि, नियतिक कारण बेसी होइत अछि।

‘सिनुरहार’ कथा मे स्त्राी दुर्दशाक लेल के दोषी मानल जाएत ? घर-परिवार
आ टोल-पड़ोसक स्त्राी, जे अपनहि परिवारक विधवा युवती कें समस्त शुभ अवसर
सं वंचित रखैत अछि ? आकि ओ समाज, जे ई आचार संहिता मानि रहल अछि ?
आकि कैक पीढ़ी पाछूक पितर लोकनि, जे परंपरा बनौने हेताह ? कुला मिला कए
देखी, तं केओ दोषी नइं अछि, अइ समस्त कुरीतिक अंत लेल सामाजिक नवजागरणक
आवश्यकता अछि। आ, से संकेत हिनकर कथा सब मे अबैत रहैत अछि।
‘सीतापुरक सुनैना’ तं अद्भुत कथा अछि। पहिल पंक्ति सं अंतिम पंक्ति धरि
जिज्ञासाक तार घिचाइत रहैत अछि। कथा-पाठ काल पाठक उत्सुकतावश कथाक
अगिला घटनाक अनुमान करैत जाइत अछि। मुदा ई कथा हरेक पंक्ति मे पाठकक
सभ अनुमान कें असफल करैत एकटा एहेन परिणतिक संग समाप्त होइत अछि,
जे चकित भ’ जाए पड़ैत अछि। इएह थिक कथाक सफलता। एहिना ‘अपना लेल’
कथा मे निर्मला आ आशा एहि दुनूटा बालिका कें जीवन संधानक पूर्वाभ्यास
कराओल जाइत अछि, निर्मला, संभावित सासु-ससुर-ब’र-सासुर कें प्रसन्न करबाक
प्रशिक्षण पाबि रहल अछि आ आशा, अपना कें प्रसन्न रखबाक प्रशिक्षण पाबि रहल
अछि। अइ तुलनात्मक चित्राण मे शिवशंकर एकटा आओर महत्वपूर्ण काज कएलनि
अछि, आ से थिक ई संदेश जे प्रगति कामना पीढ़ीक विकास सं नइं बढ़ैत अछि।
आशाक माइ-बाप पुरान पीढ़ीक रहितहुं प्रगतिकामी आ व्यावहारिक जीवन-दृष्टि
रखनिहार छथि, जखन कि निर्मला नव पीढ़ीक रहितहुं, पढ़लि-लिखलि होइतहुंजीवनक प्रति व्यावहारिक दृष्टि सं च्युत रहलीह। कथा कें मांसल(उत्तेजक आ
अवमाननाक अर्थ मे नइं) आ प्रवाहमयी बनाएबाक क्रम मे कोनो महान घटनाक
सृजन कएने बिना कथाकार एतेक महान बात क’ जाइत छथि, जे वस्तुतः ओ कथो
सं महान भ’ जाइत अछि।

पात्रा आ घटनाक विवरण मे वैधता आ अवैधता ताकए लागी, तं हिनकर कथा
पढ़ैत काल कैक बेर गुनिधुनिक स्थिति उत्पन्न भ’ जाइत अछि। कैक बेर हिनकर
कथा मे ई निर्णय करब कठिन भ’ जाइत अछि जे, के ठीक अछि, के गलत ? सबटा
परिस्थितिक दोष बुझाइत रहत। ‘आदंक’ कथा मे ‘अमिरती’क बेटा क मृत्यु, ब’र
सं दुराव आदिक कारण की से निर्णय करब कठिन अछि। शुद्ध मनोविश्लेषणात्मक
धरातल पर लिखल ई कथाक विषय एहेन उपेक्षित जीवनांश सं उठाओल गेल अछि,
जेम्हर ककरहु नजरि नइं गेल होएत। बाल-मनोविज्ञान सं परिवार आ दांपत्य जीवन
मे एतेक गंभीर आ भयानक समस्याक उदयक संभावना ताकब, निश्चित रूप सं
शिवशंकरक श्रेष्ठ कथादृष्टिक परिचायक थिक। मिथिला मे कनैत बच्चा कें चुप
करएबा लेल भय आ आदंकक सूचना देब आम बात भ’ गेल अछि। मुदा अइ
तात्कालिक शांतिक लेल ओ संपूर्ण जीवनक संतानसुख आ दांपत्यसुख कोना लुटा
सकैत अछि, तकर चकित करबा योग्य चित्राण अइ कथा मे भेटैत अछि। यद्यपि अहू


कथाक अंतिम अंश मे कथावाचकक पति-पत्नी संवाद सं स्त्राी स्वावलंबनक जतेक
मजबूत आधार स्पष्ट भेल अछि, से प्रशंसनीय थिक।

अही तरहें, अर्थ लोलुप उच्च शिक्षित वर्गक अनाचार, पाइ आ सामाजिक
मान्यताक जोर पर सिद्धांतवादी आ नैष्ठिक लोकक अवमानना, वृद्ध-बुजुर्गक असुरक्षाबोध, कृषि आ लोक-कला, लोक-संस्कृतिक प्रति अनुराग आदि हिनकर कथा मे बेस
जगह पौलक अछि।

धोखा, अविश्वास, अनास्था, नितांत निर्धनतो मे निष्ठा आ व्यावहारिकताकनिर्वाहक प्रति आग्रह आदि चित्रा हिनकर कथाकृति मे चित्रित भेल अछि। ‘इजोत’,
‘बांट-बखरा’, ‘पनिडुब्बी’, ‘बसात मे उड़िआइत लोक’, ‘अपन-परार’ आदि कथा सभ
मे एहि स्थितिक चित्रा अपन संपूर्ण अस्तित्वक संग उपस्थित अछि।

कुल मिला कए शिवशंकर श्रीनिवासक कथाक लक्ष्य एकटा शांत, सहज आ
स्वाभिमानी जीवन व्यतीत कर’वला परिवार आ समाजक स्थापना थिक। अर्थात्
हिनकर कथा सुच्चा अर्थ मे सहज मानवीय संबंधक प्रति आग्रही रहैत अछि। कथा
नायक, आकि कथाकार जनैत छथि, जे समाज मे ढोंग, पाखंड, गरीबी, बेकारी,
समस्या, आतंक, फूसि, फरेब, धोखा, अनास्था, अवमानना, अपमान, रूढ़ि...सब छैक,
मुदा सब किछुक अछैत जं मनुष्य चाहए तं ओकरा जीवन जीबा लेल, अपन अस्तित्वकायम कर’ लेल, अपन अस्मिता बनब’ लेल जाहि आगि, जाहि ऊष्माक प्रयोजन
छैक, तकरा लेल चिनगी सेहो अही समाज मे छैक। शिवशंकरक कथा अही चिनगीक
अनुसंधान करैत आबि रहल अछि, क’ रहल अछि।

अद्यतन विषयक मनमौजी कवि


रमेश, मैथिली साहित्यक कथा, कविता आ गजलक क्षेत्रा मे अपन मौलिक अनुभूतिक
धरातल सं उठाओल विषयक कारणें तथा जनसामान्यक प्रति अपन औदार्यक कारणें
स्वतंत्रा अस्मिता बना चुकल छथि। कथाकार रमेशक स्तरीयताक परिचय कथा संग्रह
‘समाङ’ आ गजलकार रमेशक स्तरीयताक परिचय हिनकर स्वतंत्रा संग्रह ‘नागफेनी’
तथा गजल संकलन ‘लोक वेद आ लालकिला’ मे ताकल जा सकैत अछि।

आठम दशकक उत्तराद्र्धे सं रमेश बेस क्रियाशीलता आ प्रखर रचनाधर्मिताक
संग सृजनशील रहलाह अछि। हिनकर कविता 1990 मे आबि कए संग्रहित
भ’ सकल।

देश स्वतंत्रा अछि, सब कें समानताक अधिकार प्राप्त अछि, मुदा केओ भूखें
मरि रहल अछि, केओ भूख जगाब’क इलाज करबैत अछि, केओ अनेरो बकि रहल
अछि, ककरो अपन दर्द कहबाक छूट नहि; दिन भरि परिश्रम कएनिहार माटि पर
सूतए मुदा ओकरा पर जूति चलएनिहार पलंग पर ई वैषम्य रमेश कें नहि देखल
भेलनि। अपन संपूर्ण क्षमताक संग कएल परिश्रमक बदला मे उचित पारिश्रमिककअभाव, शोषण, अनाचार, प्रपंच आदि सामाजिक विकृति हिनकर कोमल स्वभाव कें
बेस प्रभावित कएलकनि अछि। एहि सत्य सं हिनका परिचित हेबा मे देरी नहि
लगलनि, जे पूंजीवाद आ अफसरशाही दुइए टा मूल कारण थिक शोषणक।
पूंजीपति, व्यापारी, सूदखोर, जमाखोर, अनाचारी आदि-आदि असामाजिक तत्व कें
सरकारी संरक्षण भेटैत अछि; ई समस्त अंग समाज मे दोसर दिश भूख, समस्या,
बेकारी, अनाचार, शोषण, हत्या, लूटि आदिक फैक्ट्री चलबैत अछि एहि सृजित
विडंबना सं रमेश नीक जकां परिचित छथि। फलस्वरूप, संघर्षशील नागरिकक प्रति
हिनकर संवेदना अत्यधिक आपकता रखैत अछि।

विषयक स्तर पर सर्वत्रा, कविक संवेदना एकल स्वरूप मे अछि। खाहे


प्रेम-प्रसंग मे उपस्थित बाधा हो अथवा बेकारीक समस्या सं कुश्ती लड़ैत मनोदशा;
शोषणक जांत मे पिसाइत व्यक्तिक आत्र्तनाद हो अथवा प्रगतिक बाट मे कांट
उपस्थित देखि प्रगतिकामी सर्वहाराक व्यथागीत सभ ठाम कवि एकहि रूप मे ठाढ़
छथि। आ, सगरे हिनकर नैतिकता निम्न आ निम्न मध्यवित्त व्यक्तिक संग जुड़ल
अछि। सभ ठाम हिनकर कविताक विषय ओही वर्गक जीवन-यथार्थ बनैत अछि।
मुदा, दृष्टिकोणक स्तर पर, अपन समस्त कविता मे, कवि दू स्वरूप मे ठाढ़ होइत
छथि। यथास्थितिक भोग आ ताहि पर व्यथित मोन सं चिंतन-रोदन एवं यथास्थितिक
भोगक कारणें मोन मे उठल विद्रोहक भावना। कविता शीर्षक ‘यथास्थितिक बादक
लेल’, ‘एकटा दोसर दिशा मे बढ़बाक थिक’, ‘गूड़’, ‘सर्चलाइट कें हाथक इशारा करू
दोस’, ‘भगत सिंहक वसीयतनामा’, ‘शून्य काल सं शून्य काल धरि’ आदि। दोसर
दृष्टिकोणक रचना थिक, जतए कवि अपन दैन्यक प्रतिकार लेल फुफकारि उठल
छथि।

रमेशक कविता संग्रह ‘सङोर’ वस्तुतः ओहि शक्तिक संङोर थिक, जकरा मेसमाजक एहि विकृति, वैषम्य, शोषण, प्रपंच आदिक विरोधक ज्वाला अछि। एहि
समस्त कविता मे कवि अपन दैन्यक लेल दुःखी छथि, मोन मे आक्रोशक आवा पजरि
रहल छनि; अराजकता आ शोषणक प्राणदायी तत्व कें नैतिकताक पाठ पढ़बैत छथि;
एहि समस्त विरोधक चिनगी, ज्वाला बनि उठल अछि एवं कवि अपन समस्त
चेतनाक संग विद्रोहक स्वर सं फुफकारि रहल अछि।

‘लक्ष्मण-रेखा अपन-अपन’, ‘जुनि चुचकार’, आ ‘चाहे किछु भ’ जाए’ आदि
कविता मे कवि अनाचारीक संभावित दुर्दशाक घोषणा करैत छथि, अपन शक्तिक
प्रखरता आ सहनशीलता आ दुर्दांत कष्ट सहैतो विरोधक स्वर उन्मुख रखबाक साहस
रखैत छथि। मुदा ‘मनरोग’ शीर्षक कविताक पांती...आनक बखरा खेने/होइतहि टा
छै मनरोग’ हिनका अपन क्षमताक प्रति कमजोर करैत अछि। ‘एकटा चुरीन’,
‘जीवन-संगिनी’, ‘ई प्रेम-पत्रा नहि थीक’, ‘डाक्टर सं’, ‘एकटा जीबैत लहास’ प्रभृति
कविता सभ मे यद्यपि कवि अपन दैन्य पर कानि रहल छथि, व्यथा सं छटपटा रहल
छथि, मुदा व्यथाक एहि पराकाष्ठा पर सेहो ई कायर नहि देखि पड़ैत छथि। व्यवस्थाक
प्रति अपन असंतोष कें ई अपन अशक्यताक झूल नहि पहिरौलनि। फलस्वरूप ईहो
कविता सभ आक्रोशक स्थिति मे विद्रोहक झंडा ताकि रहल अछि।

‘सङोर’ कवितासंग्रह असंतोष, मोह-भंग, अनास्था आदि सं ल’ कए विद्रोह
धरिक यात्रा थिक; जाहि मे कवि उजड़ल मनक व्यथा सं, डंरखिल गामक कथा सं,
जीबैत लहासक दशा सं, बेरोजगार लोकक मुंहक गन्ह सं, सामाजिक विद्रूपताक दंश
भोगैत जन सामान्यक बिसबिस्सी सं परिचित होइत छथि; एहि समस्त विडंबनाक
भुक्तभोगी समुदाय सं प्रश्न पुछैत छथि ‘कहिया धरि ?’

रमेशक कविताक दोसर संकलन थिक ‘समवेत स्वरक आगू’। अठावन गोट

गद्य कविता अइ पोथी मे संकलित अछि। यथार्थ भोगक सूक्ष्मता, गहनता आ
ईमानदारीक स्तर कोनहुं रचनाकारक प्रतिभा कें रचनाक विधा आ फार्म तय करबाक
निर्देश दैत अछि। जाहि रचनाकारक प्रतिभा अइ निर्देश कें ठीक सं ग्रहण क’ लैत
अछि, से ओइ विधा आ फाॅर्म मे सफल होइत छथि, अन्यथा संप्रेषणीयता आ
प्रभावोत्पादकताक पांतर मे बैसल आलोचकक आश तकैत रहैत अछि। रमेश अइ
फार्म चयन मे आ अनुभूतिक संप्रेषण मे सफल भ’ सकलाह अछि, से बात ‘समवेत
स्वरक आगू’ पुस्तक कहैत अछि।

अइ संकलनक समस्त कविता सन् 1990 सं सन् 1995 धरि लिखल गेल
अछि। ई बात संपूर्ण भारते टा नहि संपूर्ण विश्वक जनता जनैत अछि जे वर्तमान
शताब्दीक अंतिम तीन दशक भारतक जनता लेल कोन तरहें पीड़क दशक साबित
भेल अछि। तीव्र सं तीव्रतर गतिएं एतए सरकार बदलैत गेल, आम चुनाव, मध्यावधि
चुनाव, गठबंधन, समर्थित सरकार, वैशाखी परस्त सरकार आदि-आदि देश आ राज्य
मे होइत रहल। कहियो भारतक जनता कें अपन प्रतिनिधिक चयन कर’ लेल
सुचिंतनक अवसर नइं देल गेल। आकुलता आ व्यग्रता मे भारतक जनता अपन
प्रतिनिधि बदलैत गेल। रमेश अही विकराल परिस्थितिक प्रतिफलन कें अपन
कविताक विषय बनौलनि।

बिंब-प्रतीकक चयन मे किछु ठाम रमेश असंप्रेषित रहि गेलाह अछि। मुदा
ई तय अछि जे ‘शब्द’, ‘पद’, ‘लोकोक्ति’ आ ‘कहबी’ सभ कें ई नव-नव अर्थ देबाक
उद्योग सतत करैत अएलाह अछि। ताहि मे कतोक ठाम सफलतो भेटलनि, तं
कतहु असफलतो।

रमेशक सृजन संसार मे विज्ञान, पर्यावरण, संस्कृति, इतिहास, दर्शन, भूगोल,
भूमंडलीकरण, राजनीति, साहित्य, परंपरा, वेद, पुराण, आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता,
अंतरिक्ष, सौरमंडल, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समस्या कोनो वस्तु
त्याज्य नइं थिक। मुदा तें अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा उठबैत काल हिनकर कविता भाषा सं
मैथिली आ विषय बोध सं कोनो आन भाषाक नइं भ’ जाइत अछि। ओहू काल हिनक
विषय-विधान खांटी मैथिल रहैत अछि।

वैज्ञानिक अवदान सं प्रभावित समाजक मनोवृत्ति आ क्रिया-अनुक्रिया तथा
इलेक्ट्रोनिक आक्रमण सं आतंकित आ एक सीमा धरि अनुशासित समाजक
जीवन-चक्र रमेशक कविता मे एन-मेन उतरि जएबा सं बाज नइं अबैत अछि।
राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय...सभ
फलक पर रमेशक कविता अद्यतन रहैत अछि। एक सीमा धरि रमेशक कविता कें
करेंट इवेंटक डायरी जकां पढ़बाक आ गुनबाक अवसर पाठक निकालि सकैत छथि।
अर्थात् रमेशक बेसी कविता कें सज्ञान, सचर आ बेस अधीत लोकक लेल बेसी उपयोगी
कहल जा सकैत अछि।


अलंकारक बोझ आ एकहि पंक्ति मे कैकटा संबंध कारक विभक्ति सं
विशेषणक सृजन किछु ठाम कविताक सम्हार मे नहि अबैत छैक आ ताहि सं
कविताक किछु पंक्तिक सौंदर्य प्रभावित भ’ जाइत अछि। मुदा कविता मे लुप्त होइत
शब्द आ उपमा कें रमेश पुनर्जीवित कएलनि अछि।

सकारात्मक स्वरक प्रगतिकामी कविता


‘भोरक आयब/निविड़ अन्हार कें/फांसी द’ देबाक सूचना आनब नहि थिक/प्रकाश
आनब थिक/ जे हमर बन्न खिड़की पर/अपना हाथक थाप दीअय’ एहि पांतीक
कवि नारायण जी मैथिलीक कोमल आ परिपक्व मिजाजक कवि छथि। धनात्मक
दृष्टिक तीक्ष्ण तेवर वला थोड़ कवि छथि मैथिली मे, जे चिकरा-भोकरी मे विश्वास
नइं रखै छथि। एते धरि, जे उलहन-उपराग धरि मे हिनकर भाषा संयते रहैत छनि।
कैक बेर एहेन होइत अछि, जे चिकरा-भोकरी मे कविक तेख-तामस निरर्थक जियान
भ’ जाइत छनि, फलस्वरूप ओकर प्रभाव दीर्घकालीन नइं रहि पबैत अछि। नारायण
जी अइ सत्य सं प्रारंभे सं परिचित रहलाह अछि। तें अपन कविता मे क्रोध कें
भाषाक भट्ठी मे द्रवित कएलनि अछि। स्पष्ट अछि, जे द्रवीभूत क्रोध भाषा आ उक्ति
वैचित्रयक कारणें व्यंग्य मे परिवर्तित भ’ जाइत अछि, जेना मैथिली मे यात्राी, राजकमल,
मायानंदक कविता मे आ हिन्दी मे रघुवीर सहाय, शमशेर आ केदारनाथ सिंहक
कविता मे होइत अछि।

साहित्य मे नारायण जीक प्रवेश आठम दशकक मध्यांतर मे होइत अछि, ई
समय भारतक लेल इमरजेंसीक समय थिक। अइ शब्द कें अनूदित क’ कए कही,
तं बात बेसी फरिछाएत। ई समय ‘संकटकालीन’ छल। प्रश्न उठैत अछि, जे संकट
ककरा लेल छल ! राजसत्ता लेल, जे मनुष्य कें छागर-पाठी जकां पटकि-पटकि बधिया
करैत छल आ जन-हितैषी कें बरद जकां पकड़ि-पकड़ि अड़गड़ा (जेल, आकि मीसा,
आकि कांजी हाउस) मे ठूसि दैत छल ? अथवा जनसत्ता लेल, जाहि मे सत्ता तं
छलहे नइं, आ ‘जन’ केर हाल तं उपर्युक्ते छल ?३ई समय जयप्रकाश आंदोलनक
छल, युवा शक्तिक पराक्रम सं भीख मांगल जा रहल छल, किछु नढ़िया सभ जयप्रकाश
नारायण सन तपस्वीक पोसुआ बनि कए दा सुतारै मे लागल छल।...ई समय,
तेलंगानाक किसान आंदोलन आ नक्सलबाड़ीक जनांदोलन सं मिथिला कें परिचित


करा चुकल छल। यात्राी, किसुन, राजकमल, सोमदेव, मायानन्द, धीरेन्द्र आ गुंजन,
रेणु, जीवकान्त, धूमकेतु, रामलोचन, सुकान्त, महाप्रकाश, महेन्द्र आदिक काव्य कृतिक
परिणाम आ अइ विकराल स्थितिक संग नारायण जीक प्रवेश मैथिली साहित्य मे
भेल।

एतए धरि आबि कए मैथिली कविता मिथिलाक पारिवारिक आ आन स्थानीय
समस्या सभक अतिरिक्त राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय नीक बेजाएक खोज-खबरि बेस जकां
लेब’ लागल छल। अही समय मे बेस तीक्ष्ण तेवरक संग नारायणजी सन समर्थ
युवा कविक पदार्पण मैथिली मे भेल। हिनकर अनुभव, युग यथार्थ आ पूर्ववर्ती परंपराक
अही दबावक संग अभिव्यक्त होअए लागल। परिस्थिति, भयवहता हरेक सुधातु
कें मांजैत अछि, नारायण जी एकदम सं मंजा कए बाहर अएलाह, परिणाम स्वरूप
हिनकर कविता हमरा लोकनिक समक्ष अछि।

लिखबा लेल नारायण जी कथो लिखै छथि, कहियो कहियो समीक्षा आ
टिप्पणीत्यादि दिश सेहो घूमि जाइत छथि। मुदा हम मूलतः हिनका कवि मानैत
छी। किछु प्रारंभिक कथा सभ मे तं ई हास्यास्पद रहलाह, बादक कथा सभ मे थोड़ेक
परिपक्वता देखएलनि, मुदा कविता मे अपन जाहि इमेजक संग ठाढ़ भेलाह, से
इमेज कथा मे नइं अयलनि। कविता निरंतर लिखैत रहलाह अछि। पछिला दू दशकभारतीय राजनीति, राजसत्ता, लोकतंत्रा, कुटिलतंत्रा (जे मोन होअए कहि लिअ’, कारण,
शब्द आ पद केर अर्थविकृति जतेक अइ दुनू दशक मे भेल अछि, ततेक, न भूतो,
न भविष्यति) मे घोर अराजकता व्याप्त भ’ गेल। आ तें अंततः मिथिलाक संपूर्ण
सामाजिक संरचना सब अर्थें अस्त-व्यस्त रहल अछि। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक
उथल-पुथलक कारण देशक कोन-कोन प्रभावित भेल, सहजहिं मिथिलाक जनजीवन,
स्थानीय अस्तित्व आ सार्वदेशिक अस्मिता आहत-मर्माहत भेल। नारायणजीक कविता
अही पृष्ठभूमि पर अपन पैर रोपलक। सन् 1993 मे 1984 सं 1993 धरिक पचपन
गोट कविताक संकलन ‘हम घर घुरि रहल छी’ प्रकाशित भेल। ताहि सं पूर्वहु, आ
तकर पश्चातहु वृहत् संख्या मे नारायण जी कविता लिखलनि अछि, लिखैत रहलाह
अछि।

प्रश्न, जिज्ञासा, भविष्यक प्रति आस्था, समाद कहबाक सुनबाक ललक,
जीवनक सद्परिणाम’क प्रति आश्वस्ति, सूचना, चेतावनी, आत्मस्वीकृति, प्रतिज्ञा,
विचार, मंथन, आत्मविश्लेषण, समाचार संप्रेषण, उलहन आदि तत्व हिनकर कविताक
प्रमुख अंग थिक। वैज्ञानिक युगक आक्रमण सं प्रगतिक नाम पर दिशाहारा पड़ाइत
जन जीवनक स्थिति देखि हिनकर व्याकुलता हिनकर कविता मे स्पष्ट परिलक्षित
होइत अछि, जतए ई देखि रहल छथि, जे विनाश दिश उन्मुख हमरालोकनि अपनसबटा विरासतीय हथियार त्यागि रहल छी, ओहि समस्त आचार-विचार आ संस्कृति
सं विच्छिन्न भ’ रहल छी, जे हमरा लोकनि कें विज्ञानक संहारक रुचि सं, ध्वंसात्मक

एप्रोच सं अपना के बचा पएबाक प्रेरणा देत। अपन अतीत आ अपन विरासत,
लोक संस्कृति, लोक-कला, लोक निष्ठाक प्रति ई प्रेम नारायणजीक कथो मे परिलक्षित
भेल अछि। मुदा कविता मे ई एहि सब बिन्दु पर बेसी व्यवस्थित भ’ कए व्यक्त
भ’ सकलाह अछि। ‘सोचू कतेक सही थिक’, ‘लाबन’, ‘बीस वर्ष बाद’, ‘दूभि’,
‘हम घर घुरि रहल छी’, ‘मैयां अरिपन लिखैत छथि’ आदि कविता उदाहरणार्थ देखल
जा सकैत अछि। ‘लाबन’ कविता एक तरहें तीन पीढ़ीक कथा थिक आ अइ कथा
मे विकासक माध्यमे पकड़ाइत नव नव क्षितिज आ तकरा कारणें उद्भूत पुरान
क्षितिजक निर्थकता मे बिसराइत इतिहास जोगाओल अछि। ई छोट सन कविता
पुरना जीवन पद्धति आ लोक जीवनक प्राचीनता कें मात्रा बिसारि देबाक कथे टा
नइं, अपितु ओहि भयावह स्थितिक सूचना दैत अछि, जे आब’ बला समय मे,
जहिना आइ ‘लाबन’ गोठुल्ला मे हेराएल अछि, तहिना हमर इतिहासो हेराएल रहत।

‘भोरक आयब’ कविता सं नारायण जी पर बात शुरुह कएल गेल अछि।
कविक दृष्टिकोण ओतहि साफ भ’ जाइत छनि, जतए हिनका लेल इजोतक आगमन
महत्वपूर्ण अछि, अंधकारक निष्क्रमण नइं। जे किछु उपलब्ध भ’ रहल अछि तकर
महत्व कविक नजरि मे तुलनीय छनि, सुखक प्राप्रि सुखद थिक, दुखक निबटारा
सं सुखी हएबाक कोनो उद्योग हिनका ओतए नइं देखाइत अछि। प्रायः इएह कारण
थिक जे नारायण जीक कविता मे घृणा तत्वक समावेश कतहु नइं भेटैत अछि।
प्रेम, भोर, सूर्य, सृजन, धरती, स्त्राी, वसंत, इजोत, प्रकाश, आकाश, हंसी, फसिल
आदि शब्दक उपयोग हिनकर कविता मे विभिन्न रीतिएं भेल अछि। संज्ञा रूपें,
प्रतीक रूपें, आशा आ संभावनाक रूपें अइ शब्दावलीक उपयोग हिनकर कविता
सभ मे भेल अछि।

ई बात अकाट्य सत्य थिक जे कोनो आधुनिकतम हथियार सं बेसी उपयोगी
मनुष्यक दृढ़ता, ओकर प्रतिज्ञा होइत अछि। हथियार नहियों रहए, मुदा इच्छा शक्ति
मजगुत रहए तं हथियारक इंतजाम कहुना भ’ए जाइत अछि मानलहुं/लड़बा लेल
ओकरा हथियार नहि छैक/मुदा, फसिल काटबाक कचिया त’ छैक/खुर्पी आ कोदारि
आ हरबाही पैना त’ छैक/सभ सं पैघ बात थिक/ओकर अपन दुनू हाथ मौजूद छैक/
किछुओ करबा लेल ओकरा अपना अधीन/ओकरा की नहि छैक ?

वस्तुतः, ‘हाथ छैक, तं की नइं छैक !’ ई कनी टा बात नइं थिक। ‘हाथ’
शब्दक उपयोग एतए देखबा मे बड़ सहज आ सामान्य बुझाइत अछि, मुदा एकर
व्यंजना बहुत विराट, व्याख्येय आ विशिष्ट अछि। कोनो मनुष्यक हाथ ओकरा जीवनक
संपूर्ण संधान, संघर्ष, संग्राम कें द्योतित करैत अछि। मनुष्यक हाथ जं दुरुस्त, सशक्त
आ मुक्त छैक, तं संसारक कोनहुं टा वस्तु कें अपना अधीन ओ क’ सकैत अछि,
‘खाली विचार टा करबाक छैक पक्का’। मनुष्यक अही आस्था कें नारायणजीक कविता
पुष्ट करैत अछि।


‘गोधन मियां ह’र ट्रैक्टर जकां चला रहल अछि’, ‘हम इजोत सं प्रेम करैत
छी’, ‘हम घर घुरि रहल छी’, ‘बसंत आबि रहल अछि’ आदि कविता समाद, सूचना,
समाचार वाचनक शैली मे कहल तं गेल अछि, मुदा अइ सब मे जीवनक विराट
व्याख्या निहित अछि, खैंक भरिक बीया मे वटवृक्षक विशालता वला व्याख्या। गोधन
मियां कें छोट सन उपलब्धि भेटलैक अछि, जे पुत्राक कमाइ सं अपन जमीन किनलक
अछि, आब ओइ जमीन कें जोतैत काल गोधन मियां ट्रैक्टर जकां ह’र चला रहल
अछि। ई छोट सन समाचार, कोनो पैघ पाठ केर व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि। अर्थात
गोधन मियां थकान विहीन जोताइ क’ रहल अछि, बेर उनहि गेलैक, मुदा हर जोतिए
रहल छैक; अथवा खेत चूंकि अपन थिकैक, तें ओहि मे जोतैत ह’रो कें ओ कोनो
ट्रैक्टर सं कम नइं बुझैत अछि३एहेन एहेन व्याख्याक संभावना नारायणजीक कविता
मे जतए ततए ताकल जा सकैत अछि।

हिनकर कविताक उत्स ताक’ लेल बेसी उद्योग अथवा श्रमक प्रयोजन नइं
बुझाइत रहैत अछि। आ, हिनकर कविता सभक व्याख्या-बहस लेल कोनो
आलोचना-समालोचनाक ग्रंथ पढ़बाक प्रयोजन नइं पड़ैत अछि। सुच्चा मैथिल ठाठक
ई शुद्ध मैथिली कविता सहज-सरल-संप्रेषणीय भाव-भाषा मे मानव जीवनक रनिंग
कमेन्ट्री थिक, सामान्य सं सामान्य पाठक कें एकहु बेर कतहु कोनो अर्थबाधा नहि
होइत छनि। शुद्ध रूप सं ई कविता, खेत-खरिहान मे काज करैत, हर जोतैत, कमठौन
करैत, खेत तमैत जन-मजूरक श्रमक टोह लैत, तीर्थ-बर्थ करैत, भानस भात करैत,
सोइर सेबैत, बच्चा पोसैत, प्रेम करैत विचार विमर्श करैत, चिंतन करैत, समाजक
सुखद भविष्यक संकेत तकैत बुद्धिजीवीक पीड़ा, जनता सं प्रपंच करैत, कुर्सीक
षड्यंत्रा रचैत, फूसि कें सत्य आ सत्य कें फूसि बनबैत राजनीतिज्ञक आ जनप्रतिनिधिकमनोविश्लेषण, अपन विरासत, अपन संस्कृति, अपन परंपरा, अपन लोकाचारक
निर्वहण करैत निष्ठाक उपेक्षा आ अपमान आदिक व्याख्या थिक। एहि समस्त कवितामे एक दिश काव्यमयताक उत्कृष्ट लय गुंफित अछि, जकरा कारण कविताक व्याकरण
अनेरे आकर्षक बनि पड़ल अछि तं दोसर दिश शब्दक प्रयोग आ भाव संप्रेषण एतेक
स्पष्ट आ सहज, जे सामान्यो पाठकक लेल सहज संप्रेषणीय भ’ उठल अछि।

नारायणजीक कविताक पाठ ठामे ठाम ई जनतब दैत रहैत अछि, जे हमरा
लोकनि जाहि गतिएं आगू मुंहें जा रहल छी, से मान्य, सर्वथा मान्य; मुदा ताहि
मूल्य पर जाहि तीव्रताक संग हम अपन प्राचीन धरोहरि सं मूलोचिछन्न भ’ रहल
छी, से कदापि उचित नइं।

समयक दाब सं थकुचाएल मिथिलाक आम जनजीवनक समस्या आ यातना
बहुल चित्रा आइ सोझां मे ठाढ़ अछि। अभाव, अकाल, बेकारी, यातना, प्रपंच, हत्या,
दंगा, फसाद, लूटि, सूदखोरी, घूसखोरी, राजनीतिक तिकड़म, राजनीतिकहत्या-अपहरण-शोषण, शैक्षिक उद्दंडता, शैक्षिक दरिद्रता, शिक्षा माफिया, संस्कृति

माफिया, शोषण, बलात्कार३समस्त अमानवीय आचरण आइ समाज मे व्यापत अछि।
मुदा अइ विकराल परिस्थितियहु मे नारायणजी अपना लेल जतबा टा क्षेत्राक चुनाव
कएने छथि, ताहि मे विषय बोध, भाव संप्रेषण, अतीत स्मृति, परंपराक प्रति आसक्ति,
शब्द माधुर्य, उत्कृष्ट प्रतीकार्थ आ स्पष्ट बिंब निरूपणक लेल पूर्ण रूप सं सफल
छथि। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय भावनाक उदय हिनकर कविता मे होइत अछि अवश्य,
मुदा, से अत्यंत शालीन भावें। मैथिली कविता कें एखन मरखाह बनब जरूरी छैक।
मरखाह क्षेत्रा मे कविक प्रवेश आवश्यक छैक। नारायणजीक भाषा ततबाक सम्हरल
छनि, जे विषय टा जं बढ़ि जाए, तं मरखाहो क्षेत्राक कविता हिनकर भाषाक चमत्कार
पाबि कए सांघातिक भ’जाएत। जहिना धरती मे, स्त्राी मे, बीया मे, बसंत मे, सूर्य
मे, डिबिया मे, दूभि मे, ओस मे आदि-आदि तत्व मे सृजन, उत्पादन, प्रकाश, किसलय,
शीतलता आदिक संभावना अछि, तहिना, देश मे व्याप्त हत्या, फसाद, दंगा, बलात्कार,
शोषण, अत्याचार आदिक नरमेध पर्व मे एकटा बिहारि, एकटा आंदोलनक संभावना
ताकल जा सकैत अछि, आ ई संभावना जखन प्रस्फुटित हएत, तं ओ ‘छाउर पर
ठाढ़’ भ’ कए ‘आगि पर ठाढ़ होएबाक, अपन वीरता’ नइं देखाओत, ओ सत्ते आगि
पर ठाढ़ होएत आ आगि उगलत/नारायणजी सं ओहू दिशाक कविताक अपेक्षा अछि।

बहुपठित, बहुज्ञ आ विराट अध्ययनशीलताक कारणें नारायणजी कें देशी-विदेशी
प्रचुर साहित्यक सान्निध्य प्राप्त छनि, ताहू कारणें हिनका अपन विषयबोध के फरीछ
करबा मे आ शिल्प-शैली कें धारदार बनएबा मे सहयोग भेटल होइन, से संभव
थिक। मुदा कवि नारायणजी मे जे कोना संभावना छनि, तकर प्रतीक्षा हुनकर पाठक
वर्ग कें छनि।

स स



1 comment:

  1. बहुत सुन्दर आकलन अछि।किछु स्थापना सं असहमत क्यो भ' सकै छथि मुदा कुल मिला क' एहि प्रकारक मूल्यांकनक अपन असंदिग्ध महत्त्व अछि।बहुत बधाइ।
    तारानन्द वियोगी

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