भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, November 29, 2010

'विदेह' ७० म अंक १५ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ७०)- PART II



१.तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप २. साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य




सार्थक बाल साहित्यक प्रसार सं मैथिली कें नवजीवन भेटत 
       तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप
                

अनिल--बाल साहित्यक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल अहां कें बधाइ भाइ। हमरा सभक लेल ई बहुत                     खुशीक बात थिक। घोषणा सुनि क' अहां कें केहन लागल?
ता..वि.--धन्यवाद भाइ। हमरो नीक लागल अछि। एहि तरहें चयन भेने ई आस्था बनल अछि जे हमरा भाषाक नेतृत्वकर्ता लोकनि मे, निर्णायक लोकनि मे गुणग्राहकता अवश्य छनि। ओना तं कही जे हमर साहित्य-लेखनक जे लक्ष्य अछि से बहुत दूरगामी अछि आ पुरस्कार भेटने वा नहि भेटने कोनो बात बनैत वा बिगडैत हो, से बात एकदम्मे नहि अछि। तखन होइ की छै जे अहां अटट्ट दुपहरी मे सोर-फोर कतहु जा रहल होइ आ रस्ता मे कोनो ठाम छांहदार गाछक शीतलता भेटि जाय वा एक लोटा ठंढा जल भेटि जाय, तं नीक तं लागबे करत। दोसर बात ई होइ छै जे बाहर अहांक भने बहुत सम्मान हो मुदा एकटा विडम्बना जरूर बाहरक लोक कें सालैत रहैत छै जे हिनका घरक लोक सब कतेक हृदयहीन छथिन। जे किछु। नीक तं हमरो लागल अछि।
अनिल-- अहां कहलियै जे दूरगामी लक्ष्य अछि। की अछि अहांक दूरगामी लक्ष्य?
ता..वि.--देखू भाइ, कोनो लेखकक जीवन के चरम सार्थकता की थिक? यैह जे ओ अपन भाषा, जाहि मे लेखन करैत अछि, के तागत बढाबए। एहि-एहि प्रकारक नवीन अनुभूति आ अभिव्यक्ति अपन भाषा मे लाबए, जाहि लेल कदाचित ओकर भाषा एखन धरि अक्षम छल, बेगरतूत छल। आ से कोनो तात्कालिकताक हिसाबें नहि। भाषा-साहित्यक अविरल इतिहासक हिसाबें। से भेल मूल बात। दोसर दिस पुरस्कारे कें जं लिय' तं अनेक एहन पुरस्कार अछि जाहि मे अहांक लेखन कें सम्पूर्ण भारतीय भाषा वा सम्पूर्ण विश्वक भाषाक प्रतिस्पर्धा मे राखल जाइत अछि। जेना ज्ञानपीठ वा बुकर आदि। काल्हि धरि मैथिली मे लिखि क' अहां एतए धरि सोचियो नहि सकैत रही। आइ सोचि सकै छी। मुदा, एहि लेल तं असाधारण कोटिक साधना आ अभ्यास चाही कि ने।
अनिल--मुदा मैथिली मे की अहां ताहि तरहक माहौल देखै छियै? एतए तं कहांदन डेग-डेग पर गुटबाजी छै।
ता..वि.--माहौल कें देखबाक हमरा फुरसति हो, तखन ने? हमरा तं अपन काजे सं फुरसति नहि भेटैत अछि। अहां कें प्रायः बूझल हो जे हम नियमित रूप सं तीन-चारि घंटा रोज लेखन करै छी। दोसर दिस, नोकरी एहन अछि, जाहि मे ने तं अल्ली-टल्ली मारि सकै छी, ने एहन हमर प्रवृत्तिये अछि। एखनहु, एहू जुग मे किताब आ पत्रिके पढब हमर मनोरंजनक साधन अछि। साहित्ये सं जीवन भेटैए, साहित्ये सं मनोरंजन। कहि लिय' जे 'उसी से ठंढा, उसी से गरम'। एहना हालति मे, की हम गुट बनाएब आ की हम गुट सभक गतिविधि बूझब। एकटा समय छल, जखन मैथिली मे जखन किछु गलत होइ तं बड जोर सं रिएक्ट करी। ओहुनो हाइपर सेन्सेटिव टाइप के हम आदमी छी। आब मुदा, हम सोचै छी जे गलत के प्रति रिएक्ट केने अहां बहुत किछु नहि क' सकै छी। सही बात ई भेलै जे अहां सही लाइन परअपन काज केने चलू। ओहुना, जं अहां वास्तविक अर्थ मे एक लेखक छी तं अहांक काज सही लाइन पर लेखने करब हेबाक चाही, गलत लेखनक प्रति रिएक्ट करब मात्र नहि। यौ भाइ, अपन लिखलके अन्ततः काज अबै छै। हम तं अपना गाम-घरक परिसर मे सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी मे सेहो लागल रहलहुं अछि। लेकिन, मानै छी जे लेखनक कोनो विकल्प नहि होइ छै।
        गुटबाजी के जहां धरि बात अछि, तं एहि सम्बन्ध मे हमर विचार सर्वथा भिन्न अछि। गुटबाजी कें हम किन्नहु अधलाह नहि मानै छी। गुट माने की? दू-चारि गोटे एकठाम जुटलहुं-जुडलहुं, सैह ने? एहि लेल तं लाइक माइंड हएब सर्वथा जरूरी छै। एम्हर, अपना ओतक परंपरित संस्कृति की थिक?  हम सब, प्रत्येक व्यक्ति अपने कें सब सं महान, सब सं काबिल मानै छी। एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति। एहना स्थिति मे जं दू-चारि गोटे एकठाम बैसथि, विचार-विमर्श करथि आ समाज कें तकर किछुओ आउटपुट भेटैत देखार पडैत हो तं ई तं बहुत नीक बात भेलै। हमरा जं परिभाषा करए कहब तं हम तं गुटबाजीक यैह परिभाषा करब। मुदा, एहि तरहक गुटबाजी कतहु होइत हो मैथिली-परिसर मे, से तं हमरा देखार नहि पडैत अछि। तखन बचल बात-- खिधांस आ कुटिचालि के,तं तकर तं कोनो व्याकरण नहि हो। की एसगर आ की झुंड बना क"। तकर उद्देश्य की तं सृजनात्मक काजक विरोध करब। हम हिनका सभक परबाहि नहि करैत छी। जं परबाहि करितहुं तं आइ महिषी गाम मे हरबाही करैत रहितहुं। अहूं सब कें कहै छी जे हिनका सभक परबाहि नहि करी।
                     अपन भाषा मे किछु वरेण्य साहित्यकार सब भेलाह अछि, जनिकर सान्ध्य-गोष्ठी बहुत नामी अछि आ बहुत फलप्रद भेल अछि। जेना सुमन जीक सान्ध्य-गोष्ठी। एखनहु जं कतहु एहन होइत हो, एहि सं रचनात्मक, सार्थक आउटपुट बहराइत हो,एहि सं समाज मे मिलि-बैसि क' किछु सोचबाक-करबाक (सह वीर्यं करवावहै) उत्साह भेटैत हो, तं हम तकर स्वागत करै छी।
अनिल-- अहां कें बाल साहित्यकारक रूप मे पुरस्कृत कएल गेल, जखन कि अहां मूलतः बाल साहित्यकार नहि, एक गंभीर सृजनात्मक लेखक छी। अहां कें तं साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटबाक चाहैत छल। ई बात अहां कें नहि अखडल?
ता..वि.-- यौ भाइ, हम बाल साहित्यकार छी, एहि बात सं सदैव अपना कें गौरवान्वित अनुभव करैत छी। सार्थक बाल साहित्यक सृजन एक असाधारण बात थिक, से कृपया मोन राखू। (हंसैत) ओना तं हम बहुत किछु छी। एकटा खिस्सा कहै छी। एक कार्यक्रम मे रांची गेल रही। ओतए डा० धनाकर ठाकुर सं परिचय भेल। पहिले भेंट छल। ठाकुर जी हमर नाम पुछलनि। हम कहलियनि--तारानन्द वियोगी। ओ कहए लगलाह--'यौ, मैथिली मे तं कहांदन कैक टा तारानन्द वियोगी छथि। एकटा छथि जे मिथिलाक धरोहर सब पर काज करै छथि। एकटा आर छथि जे सदरि काल 'दलित-दलित' करैत रहै छथि।   एकटा छथि जे बड सुन्दर कविता-कथा-आलोचना सब लिखै छथि। एहि मे सं अहां कोन तारनन्द वियोगी छी?' तं, से सैह बात।
                बात पुछलहुं अखडै के। किए अखडत? हम साफ करै छी जे अखडैत नहि अछि। तकर कारण अछि। अहां भने कतबो नीक लेखन करैत होइ, ओकर परखबाक जखन बात अबै छै तं ओहि मे रुचि-भिन्नता एक महत्वपूर्ण कारक बनैत अछि। अहां कें जं हमर लेखन पसिन्न नहि पडल, तं एकर मतलब छै जे ओ अहांक लेल नहि लिखल गेल अछि। रुचि-भिन्नताक कारण ओ अहां कें नहि पसिन्न पडल। मुदा, तै दुआरे हम दुखी होइ वा हमरा अखडए, तकर हम कोनो कारण नहि देखै छी।
                   हमर तं सोच अछि जे लेखक कें एतबा इमान्दार हेबाक चाही जे जं ओकरा बेइंसाफीक संग वा साहित्येतर कारण सं पुरस्कृत कएल जा रहल हो, तं ओकरा पुरस्कार कें ठुकरा देबाक चाही। अहां कें प्रायः बूझल हो जे चेतना समिति, पटना जखन हमरा 'महेश पुरस्कार' देने छल, तं समुचित रूप सं तकर कारण बतबैत हम ओहि पुरस्कार कें स्वीकार करबा सं इनकार क' देने छलियनि।
अनिल- मुदा भाइ, सुनबा मे आएल अछि जे फाइनल राउन्ड मे प्रसिद्ध लेखक लोकनिक मोट-मोट किताब सब प्रतिस्पर्धा मे छलै। तकरा सभक बदला अहांक एक पातर-सन पोथी कें पुरस्कारक लेल चुनि लेल गेल। ई बात जरूर जे निर्णय सर्वसम्मति सं भेलै। मुदा की एकरा अहां बेइंसाफी नहि मानै छियै?
ता..वि.- क्षमा करब भाइ। जं अहां मोट-मोट पोथी आ छोट-छीन-पातर पोथीक आधार पर बाल साहित्य कें बुझबाक दाबी करै छियै तं हम साफ कहब जे बाल साहित्य कें अहां साफे नहि बुझै छियै। ओ बच्चाक लेल लिखल गेलैए ने यौ। सेहो कोन बच्चाक लेल? मिडिल स्कूल मे पढनिहार छठा-सतमाक बच्चाक लेल। सुनियोजित ओकर फारमेट छै। ओकर अपन टारगेट ग्रुप छै। एक दिस अहां कहै छियै जे बच्चाक स्कूल बैग कें हल्लुक करब अपना सभक राष्ट्रीय आवश्यकता छै, आ दोसर दिस, ओकर मनोरंजन आ प्रेरण लेल मोट-मोट पोथीक जरूरति देखैत छिऐक, तं ई तं उचित बात नहि भेलै। मुदा तैयो, अहांक जानकारी लेल कहि दी जे बाल साहित्य-कृतिक लेल जे अन्तर्राष्ट्रीय मानदंड छै, ताहि पर ई पोथी दुरुस्त उतरल अछि। मैथिली मे आई.एस.बी.एन. नंबरक संग कम पोथी छपल अछि। सेहो नंबर एकरा भेटल छै।
                   असल मे, मोट-पातरक आधार पर बाल साहित्यक मूल्यांकने नहि कएल जा सकैए। मूल बात छै जे ओकर विषय-वस्तु, आजुक बच्चा लेल, आजुक जुगक चैलेंज के सन्दर्भ मे, कतेक उपयोगी छै। कतेक प्रासंगिक छै। दोसर जे ओकर भाषा आ शिल्प टारगेट ग्रुपक बच्चाक लेल कतेक सम्प्रेषणीय छै। ई नहि ने हेतै जे अहां लिखबै बच्चाक लेल, आ बिम्ब आ प्रतीक आ कथन-भंगिमा राखबै निज अप्पन। परकाया-प्रवेश तं अहां कें करैए पडत।
 अनिल- मुदा अहां उपनिषद-कथा पर लिखलियै-ए। की एकरा प्रासंगिक कहल जेतै? की ई मौलिक कृति भेलै?
ता..वि.--मौलिक कृति तं  ई १००  प्रतिशत भेल। कारण, उपनिषदक कोनो कथाक ई अनुवाद नहि थिक। अहां एक सय आठ उपनिषद उनटा लिय'। कत्तहु एक ठाम ई कथा अहां कें अविकल नहि भेटत।  असल मे ई शब्द द्वारा ओहि युगक पुनर्सृजन थिक। उद्देश्य अछि- सकारात्मक जीवन-प्रणाली कें बच्चाक सामने उद्घाटित करब। ओहि युगक लोक कोन तरहें सोचै-बिचारै छला, केहन हुनकर जीवन-प्रणाली छलनि, आपसी सम्बन्ध आ पर्यावरणक प्रति हुनकर कतेक सकारात्मक नजरिया छलनि, जीवन मे प्राथमिकताक निर्धारण कोन तरहें करी एहि सम्बन्ध हुनका लोकनिक तरीका छलनि, आदि-आदि अनेको विन्दु सभक पुनर्सृजन ई कथा-पुस्तक थिक। मजेदार बात ई छै जे एहि पोथीक जे प्रेरण-तत्त्व छै से एकर बाल-पाठक कें अलग सं कतहु देखारे नहि पडत। दोसर बात छे जे एहि समस्त कथा-वस्तु कें अत्यन्त मनलग्गू ढंग सं गूथल गेलै-ए। एहि किताबक योजना हम एना कए बनौने रही जे हमर अधिकांश बाल पाठक एकरा दू-तीन सिटिंग मे पढि जाथि। मुदा, बाद मे पता लागल जे बेसी पाठक तं एक्के सिटिंग मे पढि गेलाह अछि।   
              प्रासंगिकताक जहां धरि सवाल अछि, हम तं देखै छी जे आजुक एहि उपभोक्तावादी व्यक्तिवादी कठमुल्लावादी समय मे एहि तरहक सोच राख' बला कृतिक बहुते महत्व छै। ततबे बेसी प्रासंगिकता छै। असल मे, अपना ओतए, मिथिला मे, शुरुहे सं ई चलन रहलै-ए जे उपजीव्य ग्रन्थ तकबाक हो तं रामायण मे ढुकू अथवा महाभारत मे। बड बेसी भेल तं भागवत मे। हम बेबाक भ' ' कह' चाहै छी जे आजुक युगक चुनौती सभक सन्दर्भ मे उपनिषद, जातक-कथा, त्रिपिटक साहित्य आदि बेसी उपयोगी आ प्रासंगिक  अछि। महाभारत  मे वन कें जराओल जाइ छै जखन कि उपनिषद मे वनक संग मैत्री कएल जाइ छै। अहां कें की चाही? अहांक युगक बच्चा वनक प्रति की रुख अपनाबय? की ओकरा संस्कार मे अहां देब' चाहै छियै? सोचियौ।
अनिल-- बहुत अनमोल बात कहलियै भाइ। एही तरहें सोचबाक चाही। बाल साहित्य कें ल' ' आगुओ अहांक कोनो योजना अछि?
ता..वि.--बहुतो योजना अछि। असल मे, बाल साहित्य पर हम सांस्थानिक ढंग सं काज करए चाहै छी। हमरा स्पष्ट लगैत अछि जे आगू जे मैथिली जीयत आ बढत तं ताहि मे बाल साहित्यक बहुत पैघ भूमिका हेतै।एकर प्रसार मैथिली मे नवजीवन भरि देत।
            मधुबनी मे जखन हमर पोस्टिंग छल तं अनेक तेजस्वी युवा लोकनिक संग हमर मित्रता भेल। एहि मे वशिष्ठ  (ऋषि वशिष्ठ) छला महाकान्त ठाकुर आ प्रकाश झा छला। किशोरनाथ, सुधीर कुमार मिश्र,  राकेश कुमार मिश्र, रघुनाथ मुखिया--ई सब गोटे हमरा टीम मे रहथि। हम सब एक सुचिन्तित योजनाक तहत बाल साहित्यक लेखन, प्रकाशन आ वितरणक काज एकदम संस्थागत तरीका सं करब शुरू केलहुं। एक हजार प्रति किताबक संस्करण छपए। टीमक सदस्य लोकनि एकरा स्कूले स्कूल जा क' बेचि आबथि। सही हाथ धरि पोथी पहुंचि जाए। एक बच्चा जं पोथी कीनए तं ओकर परिवारक सदस्य आ अडोसिया-पडोसिया मिला क' पन्द्रह-बीस पाठक हमरा लोकनि कें भेटि जाथि। हम युवक मित्र लोकनि कें लेखन मे आगां केने छलियनि। हम तं बुझू पाछू लागल लिख' लगलहुं। एखनहु वशिष्ठ महाकान्त आ हुनक टीमक सदस्य लोकनि एहि काज कें आगू बढा रहल छथि। हम अपनहु एहि योजना कें जारी रखबाक लेल प्रतिश्रुत छी। लेखन अपन ठाम पर अछि,तकर महत्व सर्वोपरि छै,मुदा एक्टीविज्म के सेहो बहुत बेगरता छै। हम जकरा लेल लिखी तकरा धरि जं पहुंचय, तं एहि सं बढि क' आनन्द नहि हो।
अनिल-- हम प्रश्न करए चाहैत रही जे लेखन कें ल' ' की सब योजना अछि?
ता..वि.-- एकटा तं हमर योजना अछि जे 'मिथिला' सं बच्चाक आत्मीय परिचयक लेल एक पुस्तक-माला तैयार करी। उद्देश्य जे भावी पीढीक भीतर अपन देस-कोसक प्रति अनुराग जाग्रत करए। मिथिलाक गौरवशाली इतिहास, एकर नायक, एकर सांस्कृतिक सौरभ, एकर जीवन-पद्धति---एहि समस्त चीज पर। खास बात ई जे सब टा प्रकरण कथात्मक हेतै आ से तते मनलग्गू जे हमर बालपाठक ओकरा दू-तीन सिटिंग मे पूरा पढि जाथि। उद्देश्य एकैसम शताब्दीक सुपुरुष मैथिल तैयार करब। मात्र अतीत-गान नहि, ओहि मे सकारात्मक तत्वक खोज, आडेन्टिटीक खोज---जे आब' बला युग मे हुनका जीवनक काज आबि सकए।
             एकटा पोथी हम, एम्हर तैयार केलहुं-ए गोनू झा पर। छुच्छ हंसी-ठट्ठाक लेल गोनू झाक खिस्सा के अनेक पोथी पहिनहि सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सब मे गोनू झाक कोनो व्यक्तित्व ठाढ करबाक कोशिश नहि भेल अछि, मिथिलाक एहि नायकक चरित्र नहि गढल जा सकल अछि। असल बात छै जे हमरा समक्ष कोनो चीज स्पष्ट रहत तखने ने हम अपन साहित्य द्वारा ओकरा पुनर्सृजित करबाक चेष्टा करब। एहि तरहक एक पोथी हम गोनू झा पर लिखनहु छी, जे नेशनल बुक ट्रस्ट सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सं हम सन्तुष्ट नहि छी। उदात्त मैथिल मानुसक रूप गोनू झाक व्यक्तित्व ठाढ करबाक लेल जे औपन्यासिक कलेवर चाही, से अहां कें हमर अगिला किताब मे भेटत।
        तहिना, लोक साहित्य, संस्कृत वाङ्मय,त्रिपिटक साहित्य--एहि सब मे अनेक मजेदार आ अति प्रासंगिक वाकया सब आएल अछि। इच्छा अछि जे तकरा सब कें बच्चाक लेल प्रस्तुत करी। एहि समस्त योजना सभक मूल्यगत उद्देश्य यैह जे अपन बाल पाठक मे हम विज्ञान-बुद्धि, लोकतांत्रिक संस्कृति,  पर्यावरणक प्रति संवेदनशीलता, आ अपन आइडेन्टिटीक प्रति आत्मतोष देखए चाहै छी।
अनिल-- एहन बहुमूल्य वार्तालापक लेल भाइ, अहां कें धन्यवाद।
ता..वि.-- अहूं कें धन्यवाद। 

२.

तारानन्द वियोगी

सन्दर्भ : साहित्य अकादेमीक बाल साहित्य पुरस्कार

साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य

आदरणीय अध्यक्ष महोदय आ मित्र लोकनि,
                            साहित्य अकादेमीक एहि विशेष समारोह मे हम सब गोटे आइ, एतए एकत्र भेलहुं अछि। भारतीय साहित्यक जीवन्त-जागन्त उपवन एतए मौजूद अछि, जाहि मे किसिम-किसिम के, रंग-बिरंग के फूल फुलाएल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ कहल करथि जे हमर भारत माता बीसो-पचीसो भाषा मे बजैत छथि। से ठीके, ओहि भारत माता कें एतए जीवन्त अनुभव कएल जा सकैत अछि। एहन महत्वशाली अवसर पर हम अपना कें एतए, अहां सभक बीच पाबि क' गौरवान्वित अनुभव क' रहल छी। हम साहित्य अकादेमी कें, हमर मैथिली भाषाक प्रतिनिधि कें, हुनकर सहयोगी लोकनि कें हृदय सं धन्यवाद दैत छियनि।
                 हमरा सं अनुरोध कएल गेल अछि जे एहि अवसर पर हम अपन किछु अनुभव, किछु चिन्ता अपने लोकनिक बीच शेयर करी। ई जरूरियो बहुत अछि। हमरा लोकनिक भारतीय साहित्य आइ जाहि दौर सं गुजरि रहल अछि, जे संकट आ चुनौती आइ एकरा सामने विद्यमान छै, तकरा अकानैत तं ई आरो बेसी जरूरी अछि। बन्धु, हम कोशी क्षेत्रक बसिन्दा छी। अहां सब कें साइत बूझल हो जे कोशी बहुत विकराल, बहुत मनमौजी नदी छैक। ठाम-ठाम एहि नदी पर बान्ह बान्हल गेल छै। अक्सरहां एहन होइ छै जे नदी बान्ह तोडि दैत अछि। पानिक भयावह रेला बहि चलैत अछि। लोक जहां-तहां फंसि जाइत छथि। सरकारी-गैर सरकारी एजेन्सी सब तं बाद मे पहुंचैए, पहिने तं ई होइ छै जे लोक आपस मे मिलि-जुलि क' अपन मदद करै छथि, एक दोसरक जान बचबैत छथि। कोशीक विकराल रेती मे जं क्यो एसकर पडि जाय तं ओकर जान बचब कठिन होइत छैक। एहना स्थिति मे लोक की करै छथि जे एक-दोसरक हाथ मे हाथ ध' ' मानव-शृंखला बना लैत छथि, टेकक लेल दोसर हाथ मे लाठी ल' लैत छथि, आ एहि तरहें सुरक्षित स्थान धरि पहुंचि जाइत छथि। सब गोटे साइत अनुभव करैत हएब जे आइ हमहूं सब क्यो एहने परिस्थिति सं गुजरि रहल छी। भूमण्डलीकरणक एहि दौर मे छोट-छोट भाषा सभक नित्तह मृत्यु भ' रहल छै। साहित्य कें निरन्तर अप्रासंगिक करार देल जा रहल अछि। भावाभिव्यक्ति मे एक जाहिल प्रकारक उथ्थरपनी चारू दिस देखार पडि रहल छै। एत्तेक तेजी सं दुनियां रोज-रोज बदलि रहल अछि जे युग आ काल सं सम्बन्धित हमरा सभक परंपरित अवधारणा कतोक बेर धोखा करैत प्रतीत होइत अछि। ई तं भेल मुदा एक पहलू। दोसर दिस हम सब इहो  पाबि रहल छी जे हमर जे पीढी युवा भ' ' आइ दुनियांक मुकाबला करैक लेल तैयार भ' रहल अछि,  ताहि पीढी मे अपन आइडेन्टिटी, अपन अस्मिता कें ल' ' एक सात्विक तडप सेहो साफे देखाइत अछि। एक व्यापक आ परिपूर्ण भारतीयताक समझ ओकर सभक आत्माक मांग बनि रहल छै। तं, एहि तरहें, ई एक एहन समय थिक जे बूझि लिय'--थोडे खट्टो अछि, थोडे मिट्ठो अछि। चुनौती हमरा सभक सामने ई अछि जे एहना परिस्थिति मे हम सब, आ हमरा सभक साहित्य एहि पीढीक, आब' बला पीढीक कोन काज आबि सकैत अछि? एकटा जबाना रहए कि जहिया बडका-बडका लोक छोट-छोट बच्चाक लेल लिखब गौरवक बात बूझथि। सेहो जबाना आब बीति चुकल अछि। एहन हाल मे, एक तं हम बुझै छी जे संग-संग मिलि-जुलि क' लगातार काज करबाक  प्रयोजन छै, दोसर युग के चुनौती कें एहि तरहें स्वीकार करब सेहो जरूरी छै जे आगू आब' बला पीढी हमरा सब पर ई दोख नहि लगाबए जे जखन रोम जरि रहल छल तं नीरो बंसुरी बजा रहल छल।
                 भाइ लोकनि, अहां अधला नहि मानब, एहि तरहें हम सोचै छी तं घटाटोप अन्हार राति मे बिजलौकाक चमक सन जे चीज हमरा देखाब दैत अछि, से थिक--बाल साहित्य। सार्थक ढंग सं लिखल बाल साहित्ये ई काज क' सकैत अछि जे आब' बला पीढीक लेल साहित्यो एक प्रासंगिक चीज, ओकरा सभक जीवनक काज आब' बला चीज बनि क' रहि सकय। आब' बला युगक अनुभूति-संस्कार कें ई परिमार्जित क' सकैत अछि। भावाभिव्यक्तिक उथ्थरपनीक बदला एक स्थैर्य, एक गहराइ कें ओकर जीवन-शैलीक अंग बना सकैत अछि। भूमंडीक एहि बजारक जीवन-पद्धति अछि--द्विआयामी, जाहि मे बस वस्तु अछि आ क्रिया अछि।  त्रिआयामी जीवन-पद्धति, जाहि मे वस्तु आ क्रियाक संग-संग चिन्तन सेहो हो, तकर विकास बाल साहित्य क' सकैत अछि। हमरा तं लगैत अछि जे ठीक ढंग सं लिखल गेल बाल साहित्यक प्रसार छोट-छोट भाषा सभक मृत्यु-दर कें कम क' सकैत अछि आ हमरा सभक उखडैत पएर कें एक ताजगी-भरल मजगूती प्रदान क' सकैत अछि।
                          जे चिन्ता आइ हमर अछि, हमर ख्याल अछि जे ई अहूं सभक चिन्ता अछि, सौंसे देशक, सौंसे दुनियांक चिन्ता अछि। एहना मे हम बहुत आभारक संग साहित्य अकादेमी कें आ संस्कृति मंत्रालय कें धन्यवाद दैत छी जे भारतीय भाषा सभ मे बाल साहित्यक विकास हेतु ओ लोकनि नव तरहें सोचब शुरू केने छथि।
               लगधग चारि साल भेल, जे एही चिन्ता सब सं जूझैत हम, अपन भाषा मैथिली मे, एहि दिशा मे किछु काज करबाक शुरुआत केने रही।  मैथिली मे बाल साहित्यक स्थिति अत्यन्त दुर्बल अछि। दोसर बात इहो छै जे हमरा ओतय, मैथिली-प्रकाशनक सम्बन्ध मे ई कहबी बहुत प्रचलित छै जे लेखकक छपाओल किताब बिकैत नहि अछि आ पाठक कें ओकर पसन्दक किताब भैटैत नहि अछि। हम सब किछु नव तरहें समाधान तकबाक कोसिस केलहुं। युवा लेखक आ साहित्य-कर्मी लोकनिक हम सब टीम बनेलहुं। बाल साहित्य पर गम्भीरताक संग काज शुरू कएल। सतमा-अठमा क्लासक बच्चा कें हम सब टारगेट केलहुं। विषय एहन-एहन चुनलहुं जे एकैसम सदी मे वयस्क होब' बला हमर बालपाठकक जीवनक काज आबि सकय। उपजीव्यो ग्रन्थ जं चुनबाक हो, तैयो हम सब लीक सं हंटि क' चलबाक मन बनाओल। हमरा ओतय दुइये टा उपजीव्य मुख्यतः चलन मे रहल अछि--रामायण आ महाभारत। हम सब उपनिषद कें पकडलहुं, जातक कथा कें पकडलहुं। मिथिला मे लोककथा, लोकगाथा आ लोक-किम्वदन्ती सभक विशाल भंडार एखनो श्रुति-परम्परा मे विद्यमान अछि। हम सब ओकरा पकडलहुं। अहां देखबै जे महाभारत मे जंगल कें जराओल जाइ छै, जखन कि उपनिषद मे जंगल-संग दोस्ती कएल जाइ छै। प्रश्न अछि जे आइ हमरा की चाही? , किताब कें फारमेट सेहो हम सब किछु अलग तरीका सं केलहुं।  भाषा, अभिव्यक्ति-शैली,कथन-भंगिमा--एहि सभक प्रति सेहो हम सब बहुत सजग रहलहुं।  लोक-किम्वदन्तिये सभक पुनर्सृजन करैत हमर महाकवि विद्यापति कहियो 'सुपुरुष' के अवधारणा प्रस्तुत केने छला। हमरा सभक लक्ष्य भेल--'सु-मानुस', जाहि मे सुपुरुषक संग-संग 'सु-नारी' सेहो सम्मिलित अछि।हमरा सभक ई 'सु-मानुस' एक्कहि संग जतबा मैथिल छथि, ततबे भारतीय आ ठीक-ठीक ततबे वैश्विक।
               मुदा, हम सब इहो अनुभव केलहुं जे ई काज जं भ' सकैए तं अपन मातृभाषाहिक माध्यमें। जाहि भाषा मे बच्चा अपन माय-संग गप करैए, अपन दादी-नानी सं खिस्सा-कहानी सुनैए, ठीक ताही भाषाक माध्यमें ओकरा दुनियां-जहान मे प्रवेश करए देबाक चाही। साहित्यक द्वारा 'सु-मानुस' के विकासक साइत ई अनिवार्य प्रक्रिया थिक। हमरा बच्चाक लेल ओकर सर्वश्रेष्ठ साहित्य अनिवार्यतः ओकरा मातृभाषे मे लिखल जा सकैत अछि। ई सब करबाक कोसिस हमरा लोकनि कएल। हमरा टीमक युवा साहित्य-कर्मी लोकनि मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल मे पहुंचथि आ सस्त संस्करण बला ई पोथी सब प्रत्यक्षतः अपन पाठक सब कें सौंपि आबथि। जाहि घर मे पोथीक एक प्रति पहुंचय, परिवारी-जन आ अडोसी-पडोसी मिला क' औसतन पन्द्रह-बीस पाठक हमरा सब कें भेटि जाथि।
                              बन्धुगण, अहां सब कें लागि रहल हएत जे हम विषयान्तर भ' रहल छी। अहां कहि सकै छी जे साहित्यकारक काज लिखब थिक। एतेक तूर धुनब साहित्यकारक क्षेत्र सं बाहरक बात थिक। ई तं शुद्ध एक्टीविज्म भेल। मुदा, विश्वास करू। हमहूं मूलतः एक साहित्यकारे छी। सृजन करबाक लेल सघन एकान्त हमरो चाहबे करी। किन्तु, अपन अनुभवक बात कहै छी--साहित्यक संग निरन्तर जीबैत कहियो एहनो स्थिति बनै छै जे अहां कें टीम बनेबाक खगता होइए। ओना तं अहां अदृश्य पाठकक लेल लिखै छी मुदा कहियो एहन मोड आबै छै जखन अहां कें अपन पाठक कें दृश्यमान करबाक बेगरता होइए। हमरा लागल अछि जे एहन मोड पर 'साहित्यकार' 'साहित्य-कर्मी' के फरक मेटा जाइ छै।
                     मित्र लोकनि, हमरा सभक विडम्बना तं अथाह अछि। उत्तर आधुनिकताक एहि दौर मे आइ जखन हमरा सभक मध्यवर्गीय लोक अपन अस्मिताक प्रति साकांक्ष भेलाह अछि, तं अपन जडि सं, अपन भाषा सं जुड' चाहैत छथि। एम्हर संकट ई अछि जे दुनियां भरि के बात हुनका बूझल छनि, मुदा अपन मातृभाषा पढब नहि जनैत छथि। एक दौर छल, जखन मातृभाषा कें अयोग्य मानि क' ई लोकनि ओकर उपेक्षा केलनि। हिनका सभक सोचब रहनि जे मातृभाषा कें पकडि क' रहब विकास-विरोधी थिक। मोन पाडू जे एही तरहक मनोवृत्ति बला लोक सब, दुनियां भरि मे, अपन-अपन मातृभाषा कें उजाडलनि। मुदा, आइ ई लोकनि आइडेन्टिटी तकैत छथि आ अपन मातृभाषा-संग जुड' चाहैत छथि। हम सब जे लिखै छी से तं असल मे हिनका सभक धियापुताक लेल लिखै छी। मुदा, बच्चाक लेल लिखल ई पोथी सब जखन हमर ई बन्धु लोकनि पढैत छथि तं अपनो मातृभाषा पढबाक हुनर सिखैत छथि। हमरा सब कें तं बुझू दुगूना खुशी भेटैए। भविष्य कें ठीक करबाक प्रयास मे वर्तमानो ठीक होइत जाइए। ई बाल साहित्य क' रहल अछि। बाल साहित्ये ई कइयो सकैत अछि।
                   एखने हम कहने छलहुं जे मैथिली मे बाल साहित्यक स्थिति दुर्बल अछि। मुदा हम साफ करए चाहब जे ई दुर्बलता निज आजुक समयक यथार्थ थिक। अतीत मे ई हालति नहि रहए। साठिक दशकक समय, ओ काल छल, जखन हमर बडका-बडका साहित्यकार लोकनि छोट-छोट बच्चाक लेल लिखलनि। यात्री नागार्जुन लिखलनि। राजकमल चौधरी लिखलनि। मैथिली मे सब सं सुन्दर बालकथा सब जकरा कहबै, से ओही पीढीक लिली रेक लिखल छनि। ओहि दिन मे बडका घरानाक पत्रिका 'मिथिला मिहिर' मे तं बाल साहित्यक लेल स्थायी स्तम्भ होइते छल, बच्चा सभक लेल अलग सं पत्रिका सेहो प्रकाशित होइत रहए। 'बटुक, 'धियापुता'क अपन उज्ज्वल इतिहास छैक।  मुदा, ई सब तहियाक बात थिक, जहिया मिथिला-क्षेत्रक साक्षरता-दर मात्र एकैस प्रतिशत रहैक। आइ साक्षरता अडतालिस प्रतिशत अछि। साक्षरताक ई बढल प्रतिशत ओहि परिवार सभक कथा सेहो कहैत अछि, जकरा खान्दान मे पहिल बेर अक्षरक इजोत जरल, पहिल बच्चा जन्म लेलक जे 'अ आ क ख' लिखब-पढब सिखलक। लोक साथ अबैत गेला, कारवां बनैत गेलैक। मुदा, बच्चाक लेल लिखै बला लोक सब अलोपित भ' गेला। बच्चा सभक पत्रिका बन्द भ' गेलै। आन पत्रिका सब मे सं बाल साहित्यक कालम हंटा देल गेलै। गाम-घर मे टी.वी. पहुंचल आ हमर एहि होनहार सब कें इल्मी-फिल्मी लुच्चा सब हथिया लेलक। एकर कारण सब निकाल' लगबै तं बहुतो कारण निकलतै। मुदा, एतबा तं साफ अछि जे हमरा लोकनि छोडि देलियै तं क्यो आन हथियौलक। आइ जखन आरो अधिक लोकक जरूरति रहै, आरो बेसी तत्परताक संग काज करबाक खगता रहै, बाल साहित्यक मैदान खाली अछि। हम बडका-बडका लेखक लोकनि बडका-बडका बात लिखै छी आ दुखी होइत रहै छी जे हमर बात क्यो नहि सुनैए। के सुनत? जे सुनत, तकर निर्माणक वास्ते हम की क' रहल छी? , सांच पूछी तं हमरा सभक टारगेट  एही परिवारक बच्चा थिक भाइ, जाहि मे अक्षरक इजोत पहिल बेर बरलैए।
                       बन्धुगण, एतेक बात एही लेल कहलहुं जे अपना सभक सुख आ दुख दुनू साझी अछि आ अहां सब कें सामने पाबि सुख-दुख बतियेबाक एक अवसर हमरा भेटल। एहि अवसरक लेल पुनः धन्यवाद। हमर अपन भाषाक कर्णधार लोकनि कें, अपन टीमक युवा साहित्य-कर्मी लोकनि कें सेहो धन्यवाद। आ, एतेक ध्यानपूर्वक अहां सब हमरा सुनलहुं, ताहि लेल तं बहुते धन्यवाद।

जगदीश प्रसाद मंडल
कथा-
दोहरी मारि‍

दस सालसँ डायवीटीज आ साढ़े-सात सालसँ ब्‍लड-पेसरक शि‍कार सरसठि‍म सालक प्रोफेसर गुलाब पाँच साल पहि‍ने कओलेजसँ सेवा-नि‍वृत भेल छलाह। सूर्यास्‍तक समए, सोफापर आेंगठि‍ पाँचो आलमारीक पोथीमे नजरि‍ खि‍ड़बैत रहथि‍। पत्‍नी -लालमनि‍- चाह नेने कोठरीक मुँह टपि‍ते छलीह कि‍ भुख दऽ मड़कड़ी बरि‍ उठल। ओना अन्‍हारक आक्रमण तहि‍ रूपे नहि‍ भेल छलैक मुदा कीड़ी-फतींगि‍क आवाहन बाहरसँ घर (कोठरी) दि‍स हुअए लगल छलैक। टूटल अगि‍ला दाँतक मुँहसँ मुस्‍की दैत लालमनि‍ पति‍ दि‍स बढ़ि‍ कप बढ़बैत बजलीह- कॉफी सठि‍ गेल छलै। पहि‍लुके चाह पत्ती घरमे छलै सएह बनेलहुँ। मुदा चाहक गंध कोनादन लागल।‍
पत्‍नीक बात सुनि‍ गुलाबक मन अमता गेलनि‍। मुदा जहि‍ना पाकल अमतीक खट-मधुर सुआद होइत तहि‍ना प्रोफेसर गुलाब अपन चौहुक टूटल मुँहसँ मुस्‍कि‍आ देलनि‍। मुदा मन कलपि‍ उठलनि‍। एहेन समए भऽ गेल जे एक कप चाहो पर.....। ठीके बूढ़-बुढ़ाहनुसक कहब छनि‍- करनी देखब मरनी बेर।‍ पत्‍नीक हाथसँ कप पकड़ि‍ मुँहमे लगौलनि‍। मुँहमे चाह अवि‍तहि‍ ठोर बि‍जैक गेलनि‍। हाँइ-हाँइ कऽ चाह तँ घोटि‍ गेलाह मुदा जाकरी पत्तीक सुआद मनकेँ हौड़ि‍ देलकनि‍। चाहक कप टेबुलपर रखि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइते रहथि‍ कि‍ आकि बुझि‍ पड़लनि‍ जे उल्‍टी हएत। दुनू हाथसँ छाती दाबि‍ पुन: सोफापर बैसि‍ गेलाह। चौसठि‍ बर्षीय लालमनि‍ गैस्‍टि‍कसँ आक्रान्‍त। पेटक गैससँ मन अस-बि‍स करैत। जोरसँ ढकार भेलनि‍। मन हल्‍लुक होइते पति‍क पीठ ससारए लगलीह। रसे-रसे प्रोफेसर गुलाबक मन खनहन हुअए लगलनि‍। मन खनहन होइते पत्‍नीकेँ पुछलखि‍न- मन बेसी गड़बड़ ते ने अछि‍।‍
दुनि‍याँक रागसँ ऊपर उठि‍ लालमनि‍ चहकि‍ उठलीह- की गड़बड़ आ कि‍ नीक, कोनो कि‍ तेहैया बोखार छी जे तीन दि‍न जाइते चलि‍ जाएत। नि‍रकटौबलि‍ भऽ कऽ छुटि‍ जाएत। गोटीक चाह करै-ए। जाइ छी एकटा गोटी खा लेब, ठीक भऽ जाएत।‍ कहि‍ लालमनि‍ दोसर काठरीक रास्‍ता धेलनि‍। प्रोफेसर गुलाबक नजरि‍ चाहक कपपर गेलनि‍। मुदा चाहक कपपर नजरि‍ नहि‍ अटकि‍ पोथीक आलमाड़ीपर पहुँच गेलनि‍। अखनक जे जि‍नगी अछि‍ ओ आइधरि‍ कि‍अए ने बुझलौं? जँ अपने नहि‍ बुझलौं तँ जि‍नगी भरि‍ पढ़ौलि‍ऐ की? आकि‍ दि‍मक बनि‍ पोथीकेँ माटि‍ बनौलि‍ऐ? तहि‍ बीच ब्‍लड पेसरक जोर पबि‍तहि‍ गरजलाह- एकटा गोटी खाइमे कते देरी लगै-ए।‍
पति‍क बात सुनि‍ लालमनि‍ बुझि‍ गेलीह जे ब्‍लड पेसरक झोंक छि‍अनि‍। धड़फड़ाइते कोठरीमे आबि‍ मुस्‍की दैत आलमारीसँ गोटी नि‍कालए बढ़लीह। गोटी नि‍कालि‍, गि‍लासमे जगसँ पानि‍ लऽ पति‍क हाथकेँ दइते रहथि‍ आकि‍ सि‍रमाक बगलमे मोबाइल टनटनाएल। हाँइ-हाँइ कऽ गोटी मुँहमे दैत पानि‍ गुलगुलबैत मोबाइलपर हाथ बढ़ौलनि‍। मोबाइल उठा नम्‍बर देखलनि‍। लीलाकान्‍तक (बेटाक) देखि‍ पत्‍नी दि‍स मोबाइल बढ़बैत बजलाह- ननुगर बेटाक फोन छी। लि‍अ....।‍
कहि‍ प्रोफेसर गुलाब अपनाकेँ बेटा रूपमे देखलनि‍। मन पड़लनि‍ माए-बाप। कि‍ जि‍नगी छल कि‍ आइ अछि‍। जाधरि‍ पि‍ता जीबैत छलाह परोपट्टाक कि‍सानक समाज रूपी समुद्रमे बसल छलाह। माल-जालसँ लऽ कऽ बीआ-बालि‍ धरि‍क कारोवार छलनि‍। लेब-देब छलनि‍। सोझे लेब-लेब नहि‍ छलनि‍। लेब-लेबसँ बेसी देब-देब छलनि‍। खीरा-झि‍ंगुनी आकि‍ नव कोनो अन्न-फल-फलहरी होय, बीआक मूल्‍य कहाँ लइ छेलखि‍न। मुदा हमरा कोन दुरमति‍या चढ़ि‍ गेल जे एक तँ कओलेजक नोकरी भेटल तइपर सँ पि‍ताक देल घर-घरारी धरि‍ उजाड़ि‍ देलहुँ। कि‍ हम दरमाहाक पाइसँ जीवन नहि‍ चला सकै छलौं। तरे-तर अपन पैछला वि‍चारपर सेवा-नि‍वृति‍ प्रोफेसर गुलाब गरमा गेलाह। मुदा जहि‍ना खढ़-पातक धधरा धुधुआ कऽ उठैत आ लगले पझा कऽ ओहन छाउर बनि‍ जाइत जेकरा हवाक सि‍हकि‍यो उड़ि‍या दैत, तहि‍ना लगले मन खढ़क झोली जकाँ ठंढ़ा गेलनि‍। मन घुरलनि‍, कि‍छु मजबूरि‍यो भेल। एक तँ परोपट्टामे बहरबैया जमीनपर लड़ाइ सुनगि‍ गेल, दोसर अपन पि‍ति‍औत कारी भायकेँ बटाइ खेत करए कहलि‍एनि‍ तँ कहलनि‍ जे एक बाबाक अरजल सम्‍पत्ति‍ (जमीन) छी, सेहो कीनल नहि‍ दान देल, ताहि‍ जमीनक उपजा बाँटि‍ बटेदार बनब। अहाँ कि‍यो आन छी जहि‍ना सभ दि‍नसँ एक परि‍वार बनल रहल अछि‍ तहि‍ना रहत। जखने हम बाँटि‍ कऽ देब तखने बटेदार भऽ जाएब। कि‍सान जँ बटेदार भऽ जाए तँ ओकर प्रति‍ष्‍ठा बँचले कोना? पावनि‍-ति‍हारसँ लऽ कऽ काज-उद्यम (परि‍वारि‍क यज्ञ काज) धरि‍ जहि‍या गाममे रहब अपन परि‍वारक समांग जकाँ रहब। मौका-मुसीबत (कोट-कचहरी, काओलेज, अस्‍पताल)मे दरभंगा जाएब तँ अपन घर जकाँ हमहूँ रहब। कहलनि‍ तँ वि‍चारणीय बात मुदा से उचि‍त भेल? बजारक चमक-दमक देखि‍ अपनो मन उधि‍याएल। महग बुझि‍ घरारि‍यो बेचि‍ मकान बना बैंकमे रखि‍ लेलौं। फेरि‍ मन घुरलनि‍, कि‍ आजुक बजारवादक नींव हमहीं सभ ने तँ देलौं। आइ कि‍ देखै छी, भरि‍ मन चाहो नहि‍ पीवि‍ सकलौं। हुनके (पत्‍नि‍ये) कि दोख देवनि‍, तीन दि‍नसँ बजारमे करफू लागल अछि‍। दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी सभ बन्न अछि‍। सौंसे बजार भकोभन लगैए। बंदूकधारी पुलि‍स आ पुलि‍सक गाड़ी छोड़ि‍ सड़कपर अछि‍ कि‍? पनरहे दि‍न मेहतरक हड़ताल भेल, गंदगीसँ बजार भरि‍ गेल। बीमारीक प्रकोप बढ़ि‍ गेल। तहि‍ना पानि‍क अछि‍। ताड़ी-दारू, चोरी-डकैती, लूट-पाट, अपहरण तँ आम भऽ गेल अछि‍। एक दि‍स गाम छोड़लौं, दोसर दि‍स बेटा-पुतोहू राँि‍चयेमे सभ व्‍यवस्‍था कऽ लेलक। दुनू परानी रोगसँ अथबल बनल छी, कोना दि‍न कटत? कि‍ अछैते औरूदे परान त्‍यागि‍ ली? हे भगवान जनि‍हह तूँ? जहि‍ना पूसक ओस सदति‍ काल प्रकृति‍केँ ठंढ़ बनौने रहैए तहि‍ना हृदय शीतल भऽ गेलनि‍। पत्‍नी दि‍स आँखि‍ उठा कऽ देखलनि‍ तँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे जहि‍ना हमर मन जि‍नगीसँ नि‍राश भऽ कानि‍ रहल अछि‍ तहि‍ना हुनकर (पत्‍नीक) मन बेटाक फोन सुनैले कोढ़ी सदृश्‍य बि‍हँुसि‍ रहल छनि‍। मन आरो व्‍यथि‍त भऽ गेलनि‍। जहि‍ना असमसानक बरि‍आतीक मन खाएब-पीबि‍सँ हटि‍ मृत्‍युक घाटपर बैसि‍ गंगा (नदी, सरोवर) मे डूब दऽ पवि‍त्र होएवा लेल कछमछाइत तहि‍ना प्रोफेसर गुलाब बावूक मन जि‍नगीक घाटपर वौआ गेलनि‍। पुष्‍कर (राजस्‍थान) जकाँ अनेको घाट। उन्‍मत्त मन आलमारीक पोथी दि‍स पड़लनि‍। सत्तहवीं शताब्‍दी धरि‍ अर्थशास्‍त्र-राजनीति‍शास्‍त्र सझि‍या भाए छल। संगे-संग जीवन-यापन करैत छल। जे भीन भऽ गेल। हम सभ खुट्टा गाड़ि‍ राजनीति‍शास्‍त्रकेँ धेलहुँ। गामसँ लऽ कऽ दुि‍नयाँ भरि‍केँ अधि‍कार कर्तव्‍य सि‍खबै छि‍ऐ मुदा जाहि‍ अवस्‍थामे अखन दुनू परानी जीवि‍ रहल छी ओ कोन अधि‍कार-कर्तव्‍य छी? कि‍ बारह बजे राति‍मे डॉक्‍टर ऐठाम जा सकै छी? जँ से नहि‍ हएत तँ ि‍क रोग (बीमारी) हमरा मुकदमाक तारीक जकाँ भरि‍ राति‍क मोहल्‍लत दऽ देत?
जि‍नगीक काँट-कुश फानि‍ लालमनि‍ मोवाइल कानमे सटौने पति‍सँ फुट भऽ सुनैक वि‍चार केलनि‍। मुदा मुँहसँ नि‍कलि‍ गेलनि‍- वौआ, नूनू।‍
हँ, हँ। पाँचम दि‍न वौआ- कल्‍पनाथक मूड़न छी। टावर हटने लाइन कटि‍ गेलनि‍। मुदा लालमनि‍ से नहि‍ बुझलीह। बुझि‍ पड़नि‍ जे कम जोरसँ बजने नहि‍ सुनैत अछि‍। छातीसँ जोर लगा-लगा जोर-जोरसँ बाजए लगली- सभ प्राणी नीके छह कि‍ ने?
प्राणीक नाओ सुनि‍ कोठीक चाउर जकाँ गुलाब बावूक मान गुमसरए लगलनि‍। जहि‍ना सड़ल आ नीकक बीच अपन-अपन सेनाक बीच रणभूमि‍क दृश्‍य होइत तहि‍ना गुलाबो बावूकेँ भेलनि‍। मुदा जहि‍ना बेटा-पुतोहूपर खौंझ उठल तहि‍ना पत्‍नीक अनभि‍ज्ञता (मोबाइल नहि‍ बुझव) पर हँसी लगलनि‍। पत्‍नीक हॅसी दौड़ल आबि‍ हृदएकेँ सुतल आदमी जकाँ डोलबऽ लगलनि‍। मुँहसँ नि‍कललनि‍- सभ प्राणीक कुशलमे अपनो लगा कऽ कहलि‍एनि‍ कि‍ अपन छोड़ि‍ कऽ।‍
बाजि‍ तँ गेलाह मुदा लगले मन धि‍क्कारए लगलनि‍। पत्‍नी अज्ञानी रहि‍ गेलीह, तइमे अपन (हमर) कोनो दोख नहि‍? दि‍नमे डेरासँ बाहर रहै छी मुदा बाकी समए....।
अपने कएल लोककेँ काज अबै छै। जते अपना दि‍स देखति‍ तते ओझरी लगए लगलनि‍। एक कालखंडक पढ़ल-लि‍खल कर्ता (परि‍वारसँ लऽ कऽ समाज धरि‍) रहि‍तहुँ कि‍ आइ धरि‍ एकरा (एहि‍ वि‍षयकेँ) बुझैक कोन बात जे मनोमे नहि‍ उठल। मन कानए लगलनि‍।
अपने रोपल गाछी भुताहि‍ भऽ गेल। दलकैत मनमे उठलनि‍ गाछी तँ फूल-फलसँ लऽ कऽ बगुर धरि‍क होइत मुदा कहबैत तँ सभ गाछि‍ये। तहि‍ना तँ जि‍नगि‍यो अछि‍। भदबरि‍या अन्‍हार जकाँ इजोत कतौ देखबे ने करैत। तहि‍ बीच पत्‍नी मोबाइल बढ़बैत कहलकनि‍- देखि‍यौ ते, कि‍ भऽ गेलै। बजवे ने करै-ए।‍
पत्‍नीक बात सुि‍न पुन: गुलाब बावूक मनमे आशा जगलनि‍। हाथमे मोबाइल लऽ कहलखि‍न- टाबर चलि‍ गेल। तँए नइ अवाज अबै-ए। फेर टाबर आओत ते अवाजो आओत।‍
लालमनि‍ टाबर बुझवे ने करैत। बजलीह तँ कि‍छु नहि‍ मुदा जहि‍ना दोकानसँ कोनो वस्‍तु झोरामे अनैत काल, झोरा मसकि‍ गेलासँ वस्‍तु गि‍रए लगैत तहि‍ना मनसँ पति‍पर आक्रोस गि‍रए लगलनि‍। गुलाब बावूक मनमे उठलनि‍, पाँचम दि‍न पोता- कल्‍पनाथक मूड़न छी। मूड़न कि‍ छी संस्‍कार छी। संस्‍कार तँ समाजमे भेटैत छैक (देल जाइ छै)। राँची समाज आ मि‍थि‍ला समाज तँ एक नहि‍ छी। तहूमे बजारक समाज तँ आरो गजपट भऽ गेल अछि‍। पुन: मोबाइलमे रि‍ंग भेल। रि‍ंग होइते पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- आबि‍ गेल टाबर। लि‍अ।‍
पाँचम दि‍न कल्‍पनाथक मूड़न वैष्‍णो देवी स्‍थान (कश्‍मीर)मे छी। अहाँ दुनू गोटे (माता-पि‍ता) भोरूके गाड़ी पकड़ि‍ चलि‍ आउ। परसुका टि‍कट बनवा नेने छी।‍
बेटाक फोन सुनि‍ प्रोफेसर गुलाबक छाती छहोछि‍त भऽ गेलनि‍। मुँह मलि‍न, नोरसँ ढबकल आँखि‍, देहक (शरीरक) पानि‍ उतड़ल, मन्‍हुआएल स्‍वरमे लालमनि‍केँ कहलखि‍न- कनी मोबाइल लाउ।‍
मोबाइल दइसँ पहि‍ने लालमनि‍ बेटाकेँ कहलनि‍- बाउ, बावूसँ गप्‍प करह।‍
बौआ।‍
हँ बावू। अपने असि‍रवाद देबै.....।‍
पोताक असि‍रवाद सुनि‍ गुलाब बावूक वकार नहि‍ फुटलनि‍। हि‍चुकि‍क अबाज सुनि‍ लीलाधर पुछलकनि‍- अपने कनै.......।‍
खखसैत गुलाब बावू बजलाह- मोबाइल छोड़ि‍ असि‍रवादो कोना दऽ सकब। तीन दि‍नसँ‍ बजारमे करफू लागल अछि‍। सि‍पाहीसँ सड़क भरल अछि‍। एहेन स्‍थि‍ति‍मे घरसँ कोना नि‍कलब।
कओलेजोमे छुट्टी लऽ नेने छी। टि‍कटो कटा नेने छी तहन.....?


    १.बिपिन कुमार झा, मिथिलांचल आ बिहार चुनाव २.सुमित आनन्द
भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना

बिपिन कुमार झा ,IIT Bombay

मिथिलांचल आ बिहार चुनाव


एक बेर पुनः अपन मिथिलांचल चुनावी रंगक चादर ओढि एहि महोत्सव मँ जुटल अछि। प्रत्येक बेरक भांति अहू बेर जनसभा, भाषणवाजी, आरोप-प्रत्यारोप केर संग स्वप्नक सौदागर जनता जनार्दन के सेवा मे तत्त्पर भय स्वप्न देखि रहल छथि।

मिथिलाक गौरवमयी भूमि ज्ञान-विज्ञानक तपस्थली छी। संगहि गुणवान, विद्वान आओर महात्मा क जन्मस्थली छी मुदा आइ अपन मिथिलांचल अफ्रीका क कालाहाण्डी श्रेणि सम दरिद्रस्थली सेहो बनि गेल अछि जतय दरिद्रता अशिक्षा आ पिछडापन कारुणिक रूप सँ विद्यमान अछि। एहि स्थितिक उत्तरदायी शासकप्रशासकवर्गक संग समाजक बुद्धजीवीवर्ग सेहो छथि। एहि मे कोनो सन्देह नहिं। कतिपय भ्रष्ट राजनितिज्ञ प्रशासक आ भ्रष्ट बुद्धिजीवी वर्ग मिथिलांचल के ओहि स्थिति मे आनिलेलक जतय स्वर्ग स सुन्दर मिथिलाधाम नरक स बदतर मिथिला गाम मे बदलि गेल।

चुनाव मे एहि बेर विकासक मुद्दा जोर पकडि लेलक ई सुनि अत्यन्त प्रसन्न्ता केर अनुभूति भेल मुदा चुनवक दिन सवर्ण, पिछडा, दलित गुट्वन्दी आ वोट्बैंकवाजी देखि सवटा वास्तविकता सामने आबि गेल। अस्तु अत्यन्त निराशा केर वातावरण देखि पडल। बुद्धि जीवी वर्गक हृदय एहि कारुणिक स्थिति मे विलाप कय रहल अछि-

बाबा आबहु जागू हो
मिथिला में अन्याय मचैया
बाबा आबहु जागू हो


ई प्रार्थना मात्र ईश्वर स नहि अपितु समस्त प्रबुद्ध वर्ग सँ अछि। आब अति भय गेल जागू अपन मिथिला क उत्कर्ष हेतु आब जागू। अपन मिथिलाक उत्कर्ष हेतु कोन शासक आवश्यक अछि ई कोना प्राप्त होयत। एहि प्रश्नक उत्तर सम्पूर्ण बुद्धिजीवी वर्ग लग अछि। एहि पर चर्चा निरर्थक। आब एहि बातक चिन्तन हो कि मातृभूमिक प्रतिष्ठा क रक्षण कोन तरहें हो। आशा अछि जे मिथिला में विद्यमान आ संगहि मिथिला स दूर विद्यमान समस्त बुद्धिजीवी वर्ग अपन अपन भूमिकाक निर्वहन करताह किं वा हुनका कर्तव्यक आत्मबोध हेतन्हि आ एकबेर पुनः अपन मिथिलांचल न केवल सभक निर्णय के प्रतिष्ठान होयत अपितु एहि विश्वक समक्ष एक आदर्श स्वरूप प्रस्तुत कय सकत।

(लेखकक मन्तव्य मात्र मिथिला में विद्यमान चुनावगत समस्याक समाधान आ मिथिलाक उन्नति हेतु प्रशासक आ बुद्धजीवी वर्ग के जगायब छन्हि, कोनो शब्दक वैयक्तिक अर्थ नहिं लेल जाय। टिप्पणी सादर स्वीकार्य अछि- kumarvipin.jha@gmail.com)
२.
सुमित आनन्द
भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना

भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावनापर संगोष्ठी बी.पी.कोइराला नेपाल-भारत प्रतिष्ठान, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्लीक तत्वावधानमे मधुबनी नगर भवनमे भेल। आलेख वाचन सत्र १८.०९.१० केँ आयोजित भेल। उद्घाटन सत्रक प्रारम्भ १८.०९.१० केँ मधुबनीक जिलाधिकारी श्री संजीव हंस (आइ.ए.एस.) द्वारा दीप प्रज्वलितक संग भेल। श्री जयप्रकाश नारायण पाठक, नयन कुमार मांझी, मेधा कुमारी, आरती मिश्रा आ ज्योति द्वारा मंगलाचरण तथा ओडिसी नृत्य प्रस्तुत कयल गेल। अतिथि गण सभक सम्मान एवं स्वागत भाषण अध्यक्ष, विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग डॉ. पुष्पम नारायण द्वारा कयल गेल। अंजली श्वेता आ तुलसी द्वारा स्वागतगान गाओल गेल। मंच संचालक डॉ. अमरनाथ सिंह बीजभाषण लेल विश्वविद्यालय इतिहास विभागक अवकाशप्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश्वर मिश्रकेँ आमंत्रित कयलनि। उद्घाटन भाषण जिलाधिकारी श्री संजीव हंस कयलनि। एहि कार्यक्रममे दुनू देशक कलाकारगण उपस्थित छलाह। मुख्य अतिथिक रूपमे श्री उमाकान्त पाराजुली, सांस्कृतिक परामर्शदाता, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्ली छलाह। मुख्य अतिथि अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. संजय कुमार मंजुल छलाह। अध्यक्षीय उद्बोधन विश्वविद्यालय हिन्दी विभागक अवकाश प्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार वर्मा कयलनि। कार्यक्रमक संचालन डॉ. अमरनाथ सिंह, अंग्रेजी विभाग, कुंवर सिंह महाविद्यालय, दरभंगा कयलनि। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शम्भू कुमार साहू, अध्यक्ष, भूगोल विभाग, जे.एम.डी.पी.एल., महिला कॉलेज, मधुबनी कयलनि।

प्रथम सत्र आलेख वाचन सत्रक शुभारम्भ अपराह्ण ०४.३० बजे भेल। कार्यक्रमक संयोजिका डॉ. पुष्पम नारायण पाग एवं चादरिसँ विद्वान आलेख वाचक एवं मंचस्थ अतिथि लोकनिक स्वागत कयलनि। एहि सत्रक अध्यक्षता श्री उमाकान्त पाराजुली कयलनि। एहि सत्रक आलेख वाचक लोकनि छलाह- श्री महेन्द्र मलंगिया, श्री कृष्ण कुमार कश्यप, श्रीमति मंजू ठाकुर, श्रीमति रानी झा, डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद साहा एवं डॉ. कमलानन्द झा। हिनका लोकनिक व्याख्यानक विषय क्रमसँ छलनि:

-भारत की मिथिला हस्तशिल्प कला की प्राचीनता एवं आज का स्वरूप
-मिथिला हस्तशिल्प कला में बाजारीकरण की सम्भावना
-मिथिला हस्तशिल्प और महिला रोजगार- नेपाल के सम्बन्ध में
-मिथिला हस्तशिल्प कला और महिला रोजगार- भारत के सम्बन्ध में
- मिथिला हस्तशिल्प कला की कठिनाइयाँ
- मिथिला हस्तशिल्प कला में ह्रास- एक चिन्तन

सांस्कृतिक कार्यक्रम सत्र १८.०९.१० सांस्कृतिक कार्यक्रमक अन्तर्गत डोमकछ आ पमरियाक प्रस्तुति कलाकार द्वारा कयल गेल। एहि सत्रक संचालक रंगकर्मी डॉ. सुनील कुमार ठाकुरजी रामचरित मानसक प्रथम श्लोकसँ वाणी आ विनायकक आराधना कयलनि। कार्यक्रमक अन्तमे डॉ. सुनील कुमार ठाकुर सत्रावसान “जय हिन्द, जय नेपाल” कहि कऽ कयलनि।

द्वितीय सत्र १९.०९.२०१० केँ १०.३० बजे डॉ. नरेन्द्र नारायण सिंह निराला जीक अध्यक्षता तथा श्री सुनील मंजुल एवं श्रीमति रानी झा क मंच संचालनसँ सत्र प्रारम्भ भेल। एहि सत्रमे मुख्य अतिथिक रूपमे नेपाल राजदूतावासक सांस्कृतिक परामर्शदाता श्री उमाकान्त पाराजुली एवं श्रीमति शशिकला देवी छलथिन। हस्तशिल्प एवं वस्त्र मन्त्रालय, भारत सरकारक प्रतिनिधि विपन कुमार दास, चित्रकार कृष्ण कुमार कश्यप, रमेश झा (भारतीय स्टेट बैंक), प्रो. अरुण कुमार मिश्र, प्रो. ब्रज किशोर भंडारी, स्वैच्छिक संस्थाक सुनील कुमार चौधरी, महेन्द्र लाल कर्ण एवं प्रो. गंगा राम झा प्रश्न, समस्या एवं सुझाव प्राप्त कयलनि।

 ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

नानीक खिस्सा: हम जखन चारि पाँच वर्षक रही तखनसँ मोन अछि जे ई खिस्सा नानी सुनाबै छलथि। व्याहक बाद बहुत दिन हुनकासँ भेंट नहि भेल। बादमे जखन भेटली तँ हम फेर कहलियनि खिस्सा सुनाबऽ तँ हुनका खूब हॅंसी लगलनि। कहलन्हि जे आब तँ बाऊ हइ तूँ अपन बच्चाकेँ सुनेबहीं। हम बिसरि गेल रही मुदा़ नब्बेसँ बेसी वर्षक अवस्था भेलाक बादो हुनका सभटा खिस्सा मोने छलनि। हम बस कोशिश कऽ रहल छी हुनके जकाँ कहैक।
1 भलुनिया मौसी:
      सुखनी आ दुखनी नाम कऽ दू बहिन छली। नामक अनुरूपे सुखनीक बियाह खूब सम्पन्न घरमे भेलनि आ दुखनीक गरीब घरमे। सुखनीक स्वभाव घमण्डी आ टेढ़ छलनि आ दुखनीक बड्ड शालीन आ मृदुल। सुखनीकेँ अपन बहिनक प्रति कखनो दया नहि आबैत छलनि। बहिनक बच्चा सभ जखन कखनो किछु माँगै लेल आबैत छलनि तँ दुत्‍कारि कऽ भगा दै छलखिन।
      एक दिन दुखनी फर-फूल ताकै लेल बोन दिस चलि गेली। जाइत-जाइत एकटा घर देखेलनि। खिड़कीसँ भीतर तकली तँ एक टा दुर्गन्ध गन्धाइत भलुनिया केँ सूतल देखलनि। ओतएसँ पड़ाइते छली आकि ओ भलुनिया देख लेलकनि आ अपन कर्कश बोलीमे पुछलकनि के छैं गै
आब सुखनी डेरा तँ खूब गेल रहथि मुदा कोनो रस्ता नहि छलनि। तुरन्त हॅंसय लगली आ बड्ड आपकतासँ जवाब देलनि- नहि चिन्हलैं गइ मौसी़, हम दुखनी। बड्ड मोन लागल छल तोरा देखै लेल।  
भलुनिया फेर कहलकनि हम तँ ठीके नहि चिन्हलियौ। एतँ की करै छलैं
हम देखै छलहुँ तोहर घर, कतेक नीक कोठा छौ। मोन होइत अछि तोहर खूब सेवा करियौ। अतेक दिन बाद भेटलैं। कहै ने, की काज कऽ दियौ।" दुखनी जवाब देलखिन।
      अतेक नीक बोलीसँ भलुनिया खुश भऽ गेल। दुखनीकेँ अपन घर घुसेलक । अन्दर खूब बड़का घर छल। एक कोठली सोना़ चाँदी़ हीरा़ असर्फीसँ भरल छल तँ एक कोठली कपड़ा लत्ताक ढ़ेर छल। भन्सा घर तरह-तरहक पकवाऩ फल आदिसँ भरल छल। दुखनी पूरा घर नीप कऽ साफ कऽ देलखिन। तकर बाद भलुनियाक सेवा करऽ लगली। तेलसँ मालिस कऽ खूब जाँति देलखिन। भलुनिया बड्ड प्रसन्न भेल आ दुखनीकेँ खूब समान पाती संगे विदा केलक।
      पूरा ठेला गाड़ी सोना-असर्फी़ कपड़ा-लत्ता आ पूरी-पकवानसँ भरि कऽ दुखनी घर पहुँचली। बच्चा सभकेँ पहिल बेर भरि पेट भोजन करेलथि। फेर अपन बेटीकेँ कहलखिन जे मौसीसँ तराजू लेने आ। सिखा देलखिन जे भलुनिया दऽ किछु नहि कहियैन। दुखनीक बेटी जखन सुखनी लग तराजू माँगऽ गेल तँ सुखनीकेँ आशंका भेलनि। ओ तराजूक पलड़ाक नीचाँ गोंद लगा देलखिन। दुखनी पूरा सोना-असर्फी सभ तौल कऽ तराजू लौटबा देलखिन। एकटा असर्फी आ किछु सोना तराजूमे सटि कऽ सुखनि लग पहुँचि गेलनि। आब तँ सुखनी दौगल गेली बहिन लग। बड्ड निहौरा करै लगलखिन तँ दुखनी सभटा बता देलखिन।
      लोभी सुखनी सेहो गेली बोनमे भलुनिया लग। फेर ओहिना भलुनिया देख लेलकनि आ पुछलकनि तँ ई कहलखिन जे हम दुखनी छी। भलुनिया तुरत अन्दर बजा लेलकनि। सुखनी भीतर गेली आ सभसँ पहिने ठेलामे घर लऽ जाइ लेल समान पाती बान्हि लेलनि। फेर भलुनिया लग एली तँ ओकर महकैत शरीर नहि बर्दाश्त भेलनि से बाजऽ लगली -गए मौसी गए मौसी़ तोहर देह केहेन महकै छौ गए़। घर केहेन घिना कऽ रखने छैं गए़, एनामे केना रहल होइत छौ।
      एतेक सुनक छलै आकि भलुनियाकेँ तामस उठलै। ओ उठल आ सुखनीकेँ कण्ठ मरोड़ि कऽ मारि कऽ खा गेल।

2 सिन्नुरक पुल :
      एकटा ब्राह्‍मण छलथि जे भीख माँगिकऽ अपन दिन काटैत छलथि। एक घर भीख माँगैत छलथि तैयो एक सेर चाऊर होइत छलनि आ चालीस घर माँगैत छलथि तैयो एके सेर होइत छलनि। हुनकर संगे एक टा कुक्‍कुर आ एक टा बिलाड़ि सेहो रहैत छलनि। कुक्‍कुरमे आसपासक खतरा देखैक शक्‍ति छलै आ बिलाड़िमे भविष्य देखबाक दिव्यदृष्टि छलै।
      एक दिन ब्राह्‍मण भीख लऽ कऽ लौटि रहल छलथि तँ बिलाड़ि कहलकनि जे मालिक अहाँकेँ काल्हि बड धन सम्पत्ति भेटत़ ताबे कुक्‍कुड़ भौंकऽ लागल। मुड़ि कऽ देखलनि तँ एकटा नाग साँप कादोबला खत्तामे  खसि पड़ल छलै। ब्राह्‍मण ओहि नागकेँ एकटा डारिक सहारे बाहर निकालि देलखिन। ओ नाग साधारण सर्प नहि छल। ओ ब्राह्‍मणकेँ एकटा मणिबला अंगूठी देलकनि आ कहलकनि जे अहाँ भोरेमे नहाकऽ ठाँवकऽ पूब मुँहे बैसि कऽ अहि अंगूठीक पूजा करब तकर बाद जे मांगब से भेटत। ब्राह्‍मणके विश्वास तँ नहि भेलनि तैयो ओ लऽ कऽ विदा भेला।
      भोरे जखन ब्राह्‍मणक नींद खुजलनि तँ मोन भेलनि जे अंगूठीके जाँचल जाय। सभटा बताएल तरीकासँ पूजा कऽ ओ अपना लेल एकटा सुन्दर महल आ खूब धन सम्पत्ती मंगलनि। सभटा पूरा भऽ गेलनि। तकर बादसँ ब्राह्‍मणक दिन बदलि गेलनि। जखन जे जरूरत से माँगि लैत छलथि। एक दिन किछु लोक ढिंढोरा पीट आएल जे जमीन्दार साहब कहलखिन हेँ जे हुनका अपन सुन्दरी बेटी लेल एकटा वर चाहियनि। जे जमींदारक घरसँ शुरू कए अपन घर तक सिन्नूर पुल बनाओत तकरासँ ओ अपन बेटीक ब्याह करेथिन। गछलाक बाद नहि बनेलासँ सजा भेटत। ई ब्राह्‍मण गछि लेलखिन। विदा भेला सेवक सभ संगे। कुक्‍कुर कहलकनि अंगूठी हम अपन मुँहमे लऽ कऽ जाएब। ब्राह्‍मण मानि गेलखिन। बिलाड़िकेँ किछु अनर्थ होइक आशंका भेलै से ओहो संगे लागि गेल।
      रस्तामे एकटा पोखरिक कात सभ विश्राम लेल रूकला। कुक्‍कुरकेँ पोखरिमे अपन प्रतिबिम्ब देखेलै। ओ ओकरा अपन संगी बूझि उत्तेजित भऽ कऽ भौंकऽ लागल। एनामे अंगूठी पोखरिमे खसि पड़लै। आब ब्राह्‍मण बहुत दुखी भऽ गेला। सेवककेँ कहलखिन जे आब हमरासँ नहि हएत पुल बनाओल। सेवक सभ हुनका कैद कऽ लेलकनि आ जमींदार लग विदा भेल। बिलाड़ि ओतै रूकि गेल। कुक्‍कुर कारण पुछलकै तँ कहलक जे काल्हि एतय माछ मारल जाएत। अंगूठी एकटा माछ गीर गेल अछि। जखन मल्लाह सभ माछक भोंटि फेकत तँ हम ओहिमे सँ अंगूठी निकालि लेब। कुक्‍कुर सेहो रूकि गेल।
      भोरे सभटा ओहिना भेलै जेना बिलाड़ि कहने रहै। बिलाड़िकेँ इम्हर उम्हर घूमैत देख मल्लाह सभटा मांछक भोंटि ओकरा दिस फेक देलकै। कुक्‍कुर बिलाड़ि दुनु सभटा भोंटि चबाबय लागल। आखिर एकटामे अंगूठी भेटलै। दुनु अंगूठी लऽ कऽ जमीन्दारक कोठा दिस विदा भेल। ओतए ब्राह्‍मण कारावासमे बन्द छलथि। बिलाड़ि घुसियाकऽ गेल आ अंगूठी देलकनि। ब्राह्‍मणक जानमे जान एलनि। तुरन्त सेवक सभक द्वारा जमींदारकेँ खबरि देलखिन। जमींदार सेवक सभकेँ बढ़ियासँ ठाँव करै लेल कहलखिन। भोरे ब्राह्‍मण नहाकऽ पूब दिस बैसि कऽ अंगूठीक पूजा केलन्हि आ फेर सिन्नुरक पुलक मांग केलखिन । पुल तुरत बनि गेल।
      जमींदार प्रसन्न भेला आ अपन बेटीसँ ओहि ब्राह्‍मणक विवाह करा देलखिन। फेर ब्राह्‍मण अपन पत्‍नी आ कुक्‍कुर-बिलाड़ि लऽ कऽ सिन्नुरक पुले बाटे अपन महल आबि गेला आ खुशी-खुशी रहए लगला।
3 एक राजाक सात मेहरी :
      एकटा राजा रहथि जिनकर सात टा रानी रहनि। राजाक छोटकी रानी अपन सरल स्वभाव द्वारे सभसँ बेसी प्रिय रहनि जाहि कारणे बाँकी छौओ रानीकेँ ओकरासँ बड्ड डाह होइत छलै। राजाकेँ एकोटा संतान नहि छलनि तैं संतान प्राप्‍ति लेल यज्ञ केलनि। साधु कहलकनि जे अहाँ आमक गाछ़मे बाम हाथे झट्ठा फेकू आर दहिना हाथे आम लोकू़ तखन ओहि आमकेँ सातो रानीकेँ कहियनु खाइ लेल। एना केलासँ अहाँकेँ शीघ्र पुत्र प्राप्‍ति हएत। राजा सएह केला आ लोकल आमकेँ बड़की रानीकेँ देलखिन आ कहलखिन जे सभ बाँटिकऽ खा लिअ।
      बड़कीरानी छोटकी रानीकेँ नहि देलखिन आ सभटा आम छहो रानी मिलि कय खाय गेली आ आंठी खोंइचा छाउरक ढ़ेर पर फेक एली। जखन छोटकी रानीकेँ पता लगलनि तँ ओ छाउरक ढ़ेर पर सँ आंठी खोंइचा आनि कऽ ओकरा धो कऽ चाटि गेली। समय बीतल, छहो रानीकेँ किछु नहि भेलनि आ छोटकी रानी गर्भवती भऽ गेली। राजाकेँ ज्ञात भेलनि तँ ओ तुरन्त सभ सेविका सभकेँ छोटकी रानीक बेसी ध्यान राखैक निर्देश दऽ देलखिन। एहिसँ आन रानी सभ आरो तमसा गेली। जखन छोटकी रानीकेँ प्रसव भेलनि तँ बड़की रानी हुनकर नवजात बेटाकेँ छाउरक ढ़ेरपर फेकवा देलखिन आ कान खापैड़ देखा कऽ कहलखिन जे छोटकी रानीकेँ यएह संतान भेलनि। छोटकी रानी खूब कानय लगली। राजा सेहो बड्ड निराश भेला।
      उम्हर एकटा सियारिऩ जे राहड़िक खेतमे रहै छल़ रोज राजमहलक पछुआड़मे छाउरक ढ़ेरमे खाना ताकै आबै छल। ओ जखन ओहि बच्चाकेँ देखलक तँ सभ बात बूझि गेल। ओ सियारिन ओहि बच्चाकेँ अपन खोहिमे लऽ गेल आर अपन दूध पिया कऽ पालय लागल। राजमहल सँ चोरा चोरा ओकर पूरा पहिरन ओढ़न राजकुमार जकाँ राखने छल। एकटा सेविकाकेँ ई बात ज्ञात भऽ गेल। ओ बड़की रानीक पाइक लोभमे सभटा कहि देलक। बड़की रानीकेँ भेलनि जे सियारकेँ मरबा देब तँ बच्चा फेर अनाथ भऽ जाएत आ कुनो जानवर ओकरा खाऽ जेतै। ओ तुरन्त बिमार होयके भग्गल कऽ लेलन्हि। राजा पुछलखिन जे की भेल तँ कहलखिन जे हम बड्ड बिमार छी। हमरा राहरिक खेतबला सियारक कलेजी तरि कऽ खाय पड़त नहि तँ हम मरि जायब। राजा तुरन्त अपन सैनिककेँ कहलखिन जे ओहि सियारकेँ मारिकऽ आनू। सैनिक सभ सियारकेँ मारिकऽ बड़की रानी लग हाजिर केलकनि, रानी फेर प्रसन्न आ स्वस्थ भऽ गेली।
      ओहि बच्चाक अड़ुदा अखन बाँकी छलै। एकटा चिल्होड़ि जे नदीक कातक गाछपर घर बना कऽ रहैत छल़ से ओ बच्चाकेँ रहड़िक खेत सँ उठा अपन घोंसलामे आनि कऽ पोषण करै लगलै। ओकर पहिरन देखि कऽ ओ चिन्हि गेलै जे ई राजकुमार अछि। ओहि घाटपर राजमहलक कपड़ा सभ धुआइत छल। चिल्होड़ि सेहो उम्हरसँ कपड़ाकेँ चोराकऽ बच्चाकेँ पहिराबय लागल। जगह-जगहसँ खाना लुझि कऽ बच्चाकेँ आनि कऽ दैत छलै। आब बच्चा कनी ठेकनगर भऽ गेल छल। तँ चिल्होड़ि ओहि बच्चाकेँ एकटा फकड़ा सिखेलकै आ कहलकै जे ई गाबि-गाबि कऽ तूँ लोक सभसँ भीख माँग। बच्चा से करय लागल।
      जखन ई गीत राजमंत्रीक कानमे गेलनि तँ ओ राजाकेँ कहलकनि जे राजा ई गीत तँ अहींक खिस्सा लागैत अछि। अहाँक छोटकी रानीकेँ बच्चा भेल रहनि। सभ कहलक कान खापड़ भेलनि से लागैत अछि झूठ अछि। राजा बच्चाकेँ राजमहल बजेलनि। कहलखिन जे अपन गीत गाबै। बच्चा गौलक- एक राजा के सात मेहरी, छोटकी मेहरी मोर महतरिया,  रहड़िक खेतमे फेक देली, चिल्होरि ने पाओलिय,  हम समचरिया़, भिक्षा दे मैया।राजाक माथा ठनकलनि। ओ सेविका सभकेँ डराकऽ सभ बात ज्ञात केलनि। रहड़िक खेत तकक खिस्सा सेविका कहलकनि आ बाँकी के ओ चिल्होड़क सिखायल गीतसँ बुझा गेलनि। बिना देर केने राजा छौहो रानीकेँ मृत्‍युदण्ड देलखिन आ चिल्होड़िकेँ इनाम देलखिन। अपने छोटकी रानी आर राजकुमार संगे महलमे खुशी खुशी रहऽ लगला।
4 पन्साया कुम्मरि :
      एकदिन एकटा राजा शिकार पर गेला। जाइत-जाइत ओ एक जगह पहुँचला जतए एकटा विशाल सुन्दर पानक पात छल। राजा जैने ओ पात तोडै़ लगला आकि ओ पात एकटा सुन्दर राजकुमारीमे बदलि गेल। राजा मोहित भऽ गेला। ओहि राजकुमारीक नाम पन्साया कुम्मरि छल। राजा पन्साया कुम्मरिसँ ब्याह कऽ हुनका अपन महलमे आनि लेलनि आ खुशीसँ रहय लगला।
      किछु दिनक बाद राजा फेर शिकार पर गेला। फेर जाइत-जाइत ओ थाकि गेला तँ एकटा महल देखेलनि। राजा ओहि महलमे प्रवेश केलनि तँ ओकर वैभव देखि चकित भऽ गेला। अन्दर जाइते नौकर चाकर हुनकर सत्‍कारमे लागि गेल। राजा बहुत प्रसन्न भेला। तखन एकटा राजकुमारी एलखिन आ कहलखिन जे जॅं अहाँकेँ हमर सत्‍कार नीक लागल तँ हमरासँ ब्याह करू। राजा फॅंसि गेला। ओहि राजकुमारीक नाम छल पहुनाइ।
राजा पहुनाइ सऽ ब्याह कऽ ओहि महल मे रहय लगला।
      समय बीतल। राजा घर नहि घुरला से पन्साया कुम्मरि चिन्तित रहय लगली। ओ सैनिक पठेली चारू दिस राजाक खोजमे। सैनिक सभ खबरि आनि कऽ देलकनि। पन्साया कुम्मरि एकटा पत्र राजाक नामे पठेलखिन जाहिमे राजासँ घर लौटक आग्रह केने रहथि। पत्र महल तँ पहुँचल मुदा  राजासँ पहिने पहुनाइक हाथ लागल। पहुनाइ जवाब पठौलखिऩ-
जरथु मरथु पन्साया कुम्मऱि दय बसहु पहुनाइ।
जाहि देस रहत पन्साया कुम्मरि ताहि देस पिया घुरि नहि जाय।।
      जवाब पढ़ि पन्साया कुम्मरि तमसा गेली। अपन सेवककेँ कहलखिन हमरा एक पेटी मूस आ एक पेटी झिंगुर दिअ। जुल्हा सँ काँच रंगमे रंगल खूब चटकदार साड़ी मंगेली। चटकदार साड़ी पहिन पेटी लऽ विदा भेली पहुनाइक महल दिस। पहुनाइक महल लग रूकि कऽ नाचय लगली। पहुनाइक नजरि हुनकर साड़ी पर गेलनि। राजासँ जिद्द करय लगली जे हमरा वैह साड़ी चाही। राजा बड्ड बुझेलखिन जे हम अहूसँ नीक आनि देब मुदा ओ जिद्द पर अड़ि गेली। हारिकऽ  पन्साया कुम्मरिकेँ बजाओल गेल। पन्साया कुम्मरि राजासँ कहलखिऩ  हम एकेटा शर्त पर अपन साड़ी देब। काल्हि भोरमे अहाँ हम्मर साड़ी जेहेन अखन अहि तहिना लौटायब। नहि तँ अहाँकेँ हमरा संगे चलय पड़त।राजा शर्त मानि गेलखिन।
      रातिमे जखन पहुनाइ ओ साड़ी पहिन कऽ सुतली तँ पन्साया कुम्मरि हुनकर कोठलीक खिड़की बाटे भरि पेटी मूस आ भरि पेटी झिंगुर अन्दर दऽ देलखिन। राति भरिमे मूस साड़ीकेँ जतय ततय काटि देलकनि आ झिंगुर सभटा रंग चाटि गेलनि। भोरे पहुनाइ जखन ऊठली तँ साड़ीक दुर्दशा देखि कानय लगली। मुदा राजा एकटा नहि सुनलखिन। अपन वचनबद्धताक कारण पन्साया कुम्मरि संगे विदा भऽ गेला।
5 सुहान बोन :
      एकटा राजाकेँ सात टा रानी रहनि। सभ मिलजुलि कऽ नीकसँ रहैत रहथि। किछु दिनका बाद छोटकी रानी गर्भवती भेलखिन। राजा खूब प्रसन्न भेला। एक दिन ओ शिकारपर गेला। जाइत-जाइत ओ सुहान बोन पहुँच गेला जतय एकटा राक्षसीक राज रहै। राक्षसीक एकटा बेटी रहै जकर नाम सुहान रहै। राक्षसी जखन राजाकेँ देखलक तँ अपन बेटीकेँ खूब सुन्दर रूप दऽ कऽ राजाक रस्तामे बैसा देलक। राजा ओकर रूपपर मोहित भऽ ओकरासँ विवाह कऽ लेला। आब सुहान सेहो सातो रानी संगे महलमे रहऽ लागल। अपन राक्षसी प्रवृतिक अनुसार ओ सभकेँ खूब तंग करऽ लागल। राजाकेँ जखन अकर आभास भेलनि ओ सुहान पर सँ ध्यान हटाबऽ लगला। सुहानकेँ से बर्दाश्त नहि भेलै  आ ओ सातो रानीक आँखि निकालि कऽ जंगल दिस बैला देलक। सातो रानीक चौदह टा आँखिकेँ ओ अपन मायकेँ दय देलक। ओकर माय ओहिकेँ सीक पर कऽ टाँगि कऽ राखि लेलक। जखन राजा पुछलखिन सुहानकेँ जे बाँकि रानी सभ कतय छथि तँ सुहान कहलकनि जे ओ सभ महल छोड़ि कय भागि गेली। राजाकेँ बड्ड क्षोभ भेलनि।
      एम्हर सातो रानी फल-फूल खा कऽ गाछक नीचाँ जीवन काटै लगली। एहनेमे छोटकी रानीकेँ बेटा भेलनि। दिन बीतैत गेल आ ओ बेटा पैघ भेल। एक दिन ओ जंगलसँ जाड़नि जमाकऽ शहरमे बेचलक आ जे पाइ भेलै ताहिसँ सभ लेल भोजन कपड़ा आदि किनने आयल। अतेक दिनका बाद अन्न खा कऽ सभ माय ओ बच्चाकेँ खूब आशीर्वाद देलखिन। धीरे-धीरे ओ बच्चा एकटा झोपड़ी सेहो बना लेलक। अहिना एकदिन ओ बच्चा जाड़ैन ताकैत रहय तँ ओकरा फूलक ढ़ेर देखेलइ। लग गेल तँ ओ एकटा पूजाक स्थल रहय। ओ तुरन्त सभ निर्मालकेँ बहा कऽ जगहकेँ नीप पोइछ कऽ ठीक कऽ लेलक आ नुकाकऽ ताकऽ लागल जे अतऽ के पूजा करैत अछि। कनिक कालक बाद एकटा साधुबाबा एला। जगह साफ देखिकऽ बड खुश भेला। ओ आवाज देला जे जे कियो ई केलहुँ हेँ से सामने आऊ। बच्चा सामने गेल तँ साधु बाबा कहलखिन जे अहाँ वरदान माँगू तँ बच्चा कहलकनि जे हमर माय सभकेँ सभटा पहिनेबला सुख आँखिक रौशनी़ राजमहल आदि भेट जाय। साधु कहलखिन जे सभटा भेटत मुदा अहाँकेँ अपने प्रयास करऽ पड़त।
      साधु अपन दिव्य दृष्टिसँ देख कऽ सुहानक मायक घरक रस्ता पता केलनि। फेर एकटा उड़ैबला घोडा बनेला। तखन कहलखिऩ अहाँ सुहान बोनमे सुहानक नइहर जाउ । घोड़ाकेँ बाड़ीमे नुकाय कऽ ठाढ़ कय लेब आ अपने कौआ बनिकऽ चारपर बैसकऽ ई फकरा गायब बुढ़िया मैया नात़ि सुहान मैया पूत़ लवा खाँऊ खाँऊ खाँऊ। सुनि कऽ ओ राक्षसनी बूझत जे अहाँ ओकर नाति आ सुहानक बेटा छी। अहाँके असौरा पर बैसाकऽ कहत जे माछी मारि-मारि कऽ फाँकू। हम रोपणी आ कटनी केने आबै छी। ओ बारहो मास धान रोपै छै आ बारहो मास काटै छै। जखने ओ खेत दिस जायत अहाँ मनुखक रूप धऽ सीक पर सँ आँखिक कोहा ऊठाकऽ घोड़ापर चढ़ि भागि जायब।ओ बच्चा सभटा तहिना केलक जेना साधु बाबा सिखेने रहथिन। मुदा जखन ओ भागै छल तँ सुहानक माय पाछाँ-पाछाँ भागय लगलै आ कहऽ लगलै़  रे मुड़ि़ घुरि ताक रे मुड़ि़ घुरि ताक।ओ बच्चा जैने पाछाँ तकलक की बच्चा आ घोड़ा जरि कऽ भष्म भऽ गेल। सुहानक माय फेर सँ सबटा आँखि सीक पर टाँगि लेलक। साधु बाबा कहनाइ बिसरि गेल रहथिन जे पाछाँ घुरिकऽ नहि ताकब।
      समय बीतल। आन्हर माय सभकेँ भेलनि जे बच्चाकेँ कुनो जानवर खा गेल। साधु बाबाकेँ सेहो कनी दिन बाद ध्यान एलैन जे ओ बच्चाक हाल बुझियै। जैने दिव्य दृष्टि दौगेला तैं अपन गलतीक ज्ञान भेलनि। तुरन्त अमृत छींटकऽ बच्चा आ घोड़ाकेँ जियेला। एकटा काज आर केला जे सुहानक मायकेँ अहि घटनाक स्मृति हरि लेलखिन। फेरसँ बच्चा ओहिना सुहानक माय लग गेल, सभटा ओहिना भेलै मुदा अहि बेर बच्चा पाछाँ घुरि कऽ नहि ताकलक। अहि बेर ओ सुरक्षित आँखि लऽ कऽ आबि गेल छल। आब सभटा आँखि ओ माय सभकेँ लगा देलक। सातो रानीकेँ सूझय लगलनि। सभ बड्ड प्रसन्न भेली। सभ साधुबाबाकेँ खूब धन्यवाद देलखिन आ बेटाकेँ खूब आशिष।
      साधु सहित सभ कियो मिलि कऽ राजमहल गेला। राजाकेँ सभ बात कहलखिन। राजा सुहान आ ओकर मायकेँ मृत्‍युदण्ड देलखिन आ बाँकी सभसँ माफी मॅंगला। फेर सभ कियो संगे खुशीसँ रहय लगला।
१.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू३ टा बाल कथा २.मुन्नाजी- पथ दर्शन ३
अनमोल झा- किछु बालकथा

शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू

३ टा बाल कथा-
नारि‍यर- गाछ

बाबूजी सरायरंजन प्रखण्‍डमे कार्यरत छलाह। गामसँ दूर रहबाक कारण शनि‍ दि‍नकेँ अबैत छलाह, फेरि‍ सोमन भि‍नुसरबेमे गामसँ वि‍दा...।
     बुझू जे आन पाँच दि‍न हमरा सबहक लेल पि‍कनि‍क जकाँ छल। हम आ हमर पि‍सि‍औत शंभू एकतुरि‍या छलहुँ। भोरसँ सॉझ धरि‍ धमगि‍ज्‍जड़ि‍, ककरोसँ डर नहि‍। बाबा बूढ़, खाट धएने छलथि‍। हुनक जुआनीक खि‍स्‍सा सुनि‍ देह सि‍हरि‍ जाइत छल। बड़ अनुशासि‍त शि‍क्षक छलाह मुदा आब हमरा सबहक मास्‍टरीक आगाँ चुप्‍प भऽ जाइत छथि‍।
     रवि‍ दि‍न भाेरे बाबा, बाबूजीकेँ उपराग देलनि‍- ‍टि‍ल्‍लूकेँ कतेक दि‍नसँ कहैत छी, प्रयाग बाबूक ओहि‍ठाॅ सँ नारि‍यरक गाछ आनैले मुदा हमर के सुनय।
हमरा दि‍स बाबूजीक आँखि‍ पड़ल डऽरसँ औना गेलहुँ।
वि‍नय भायकेँ संग कऽ प्रयाग बाबूक टोल बंडि‍हा चलि‍ देलहुँ। प्रयाग बाबू समाजक लेल कोनो अपरि‍चि‍त नाओ नहि‍। जाति‍क वि‍षम समाजमे रहि‍तहुँ कोनो ब्रह्मण वा अन्‍य जाति‍क लोकसँ बाबू छोड़ि‍ कोनो दोसर नाओ नहि‍ हुनका लेल सुनने छलहुँ। करि‍यन गामक पूर्व मुखि‍या आ प्रसि‍द्ध बैध प्रयाग बाबू ककरोसँ इलाज करबाक क्रममे फीस नहि‍ लैत छलाह। एकर परि‍णाम कनेक-कनेक मोन अछि‍ जे सन 1977ई.मे रोसड़ा वि‍धान सभाक नि‍र्दलीय वि‍धायकक रूपमे नि‍र्वाचि‍त भेल छलाह। फेर दोसर बेर चुनाव नहि‍ लड़लनि‍, पहि‍ले चुनावक खर्चमे कि‍छु जमीन वि‍का गेल छलनि‍। समाजमे एतेक सम्‍मान न भूतो न भवि‍ष्‍यति‍। दलानक प्रांगणमे पहुँचैत देरी खूब सम्‍मान पूर्वक आवाहन कएल गेल- बौआ हम तँ मास्‍टर साहेबकेँ पंद्रह दि‍न पहि‍ने नारि‍यरक गाछ लेल कहने छलहुँ आ अहाँ सभ एखन आबि‍ रहल छी।‍ प्रयाग बाबूक एहि‍ प्रश्‍नपर हम दुनू भाँइ मौन सद्वमति‍ देलहुँ। फेर खुरपीसँ नारि‍यरक थल्‍ला कोरि‍ एकटा गाछ हमरा हाथमे थमहा देलनि‍।
हुनक बालक वसन्‍त बाबू दलानपर बैसल छलाह। बैद्यजी हुनका बजा कऽ कुट्टी काटएबला कत्ता मंगौलनि‍। क्‍यारीमे 15-16गोट आओर नारि‍यरक गाछ रोपल छल। सभटा गाछकेँ एक नि‍शामे वि‍धायक जी उखारि‍ कऽ लकड़ीक गाड़ल कुट्टी कटबाक लेल साङग लग लऽ जा कऽ अष्‍टमीक वलि‍प्रदान जकाँ नाि‍रयर गाछक बलि‍ चढ़वए लगलनि‍। हम अजगुतमे पड़ि‍ गेलहुँ। कोन अपराधक दंड एहि‍ गाछ सभकेँ भेट रहल अछि‍। अपन हाथमे लेल छोट नारि‍यर गाछकेँ ठामहि‍ं माटि‍पर राखि‍ अपन टोल दि‍स दौड़ि‍ गेलहुँ। वि‍नय भाय सेहो पाछाँ....।
दलानपर अाबि‍ बाबाकेँ सभ कथा सुनवए लगलहुँ नहि‍ की बाबूजी कानपर जोरसँ एक थप्‍पर जड़ि‍ देलनि‍। हमरा पकड़ि‍ कऽ प्रयाग बाबूक दलानपर बाबूजी अनलनि‍। डॉक्‍टर साहेवसँ बाबूजी हमर अपराधक जि‍ज्ञासा कएलनि‍ तँ प्रयाग बाबू कहलथि‍न- नहि‍-नहि‍ एहि‍ नेनाक कोनो अपराध नहि‍। एखन धरि‍ हम पचास गोट नारि‍यरक गाछ वॉटि‍ देने छी। समाजक लोकक ‍लागल अछि‍। ककरा देब ककरा नहि‍....। एहि‍सँ बढ़ि‍या नहि‍ रहतै वाॅस आ नहि‍ बजतै बॅसरी, तेँ सभटा गाछकेँ काटि‍ देलहुँ। बड़ सऽख सँ बि‍चड़ा खसौने छलहुँ हमरो दलानपर शोभा बढ़त आ कि‍छु समाजक लोकेँ सेहो देब, मुदा....। अहाँक नेनाक गाछ देवालक कातमे राखल अछि‍ अपने लऽ जा सकैत छी।
बाबूजी गाछ लऽ कऽ चलि‍ देलनि‍ की सोचैत वि‍दा भेलथि‍ ई हम कहि‍यो नहि‍ पुछ सकलहुँ।  

तरेगन देखाय हय
बाल लघुकथा-

सन सतासीक बाढ़ि‍मे सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लांचल छि‍न्न-भि‍न्न भऽ गेल। स्‍वाभावि‍क छल हमरो गाम कोना बचैत? जि‍रात सभमे खाधि‍ फूटि‍ गेल छल। पानि‍क माेंका सभ कि‍सानकेँ बुड़ि‍बक बना देलक। भदैयाक कोन गप्‍प जे रब्‍बी सेहो कोसी, बागमती आ करेजक लीलासँ नहि‍ पनकि‍ सकल।
रौ काल्हि‍ सम्‍मत छै, कि‍छु नार-पुआर तँ नहि‍ उपजलौ, आक धतूरोक संठीक जोगार तँ करबेँ।‍ बावूजीक एहि‍ जि‍ज्ञासापर हमरा सबहक नेना टोलीक नेता रंजीतमे जोश आबि‍ गेल। ओ पंकज, लाला, प्रदीप, हेमन्‍त, बबलू आ हमरा संग कऽ चलि‍ देलक होलि‍काकेँ जड़एबाक लेल व्‍यवस्‍थामे.....।
कतहु कि‍छु नहि‍ भेटल। शस्‍य श्‍यामला करि‍यनक वसुन्‍धरा मरूस्‍थलि‍ भऽ गेल छथि‍। की करू कि‍छु नै फुराइत अछि‍? सोचैत बढ़ैत छलहुँ की ललबा बाजल- रौ टि‍ल्‍लू एकटा उपाए छौ।‍ रामलोचन यादवक भि‍राठमे पािन नै लागल छलै, ओ साग तरकारी लगेने छथि‍। हम ओकर ति‍तम्‍भासँ खि‍न्न भऽ गेलहुँ- एक दूटा भाटा तोड़ि‍ ओहि‍मे होलि‍का सन मा ‍उगि‍ कऽ कोना जड़बेँ?”
नहि‍-नहि‍ रामलोचन जीक खोपड़ी उखाड़ि‍ कऽ लऽ जाएव। चलने एखन ओरि‍आन कऽ लैत छी राति‍मे खोपड़ी....।
सभ छौंड़ा खोपड़ी लग गेलहुँ। ओहि‍ठाम केओ नहि‍ छल। सभटा खुट्टाक जड़ि‍केँ कोरि‍ बगलमे गाड़ल चापाकलसँ पानि‍ लऽ कऽ जड़ि‍केँ फुलाओल गेल। सुक्‍खल माटि‍सँ फेर ओहि‍ खुट्टाक जड़ि‍केँ ललवा झॉपि‍ देलक। ओ हमरा दलक न्‍यूटन छल। एतेक ध्‍यान जौं पढ़वामे लगबिते तँ आइ कि‍छु आर रहि‍ताए। हम पुछलहुँ- एना कि‍ए कएलेँ?”
ओ ठामहि‍ं बाजल- एखन सूर्यास्‍तो नहि‍ भेलै खोपड़ी लऽ कऽ चलबेँ तँ केओ देखि‍ लेतौ फेर आगाँ की हएत से तँ बुझले छौ।‍ परूकॉं साल हाकि‍मक गहूमक बोझ सम्‍मतमे जड़एवाक लेल चोरि‍ करैत पकड़ा गेल छलहुँ। ओ दादाकेँ परचारि‍ देलनि‍। ततेक मारि‍ खएलहुँ जे, जौं एखनो पुरबा बसात बहैत अछि‍ तँ पीठमे दर्द हाेमए लगैत अछि‍।‍
ठीक राति‍ नौ बजे हम सभ फेर लक्ष्‍य भेदनक लेल खोपड़ी लग आबि‍ गेलहुँ। खोपड़ीक भीतर एकटा खाटपर रामलोचन बाबा अधसर सॉप जकाँ दीर्घश्‍वास लैत छलाह। बगलमे हुनक पॉच बरखक पोता सूतल छल। राति‍मे ओ साग तरकारीक ओगरबाही करैत छलाह। ई गप्‍प ललबाकेँ बूझल छल। तेँ खोपड़ीक खुट्टा लगक माटि‍केँ पानि‍सँ गि‍ल्‍ल कऽ देने छल। ई गप्‍प हम आब बुझलहुँ। जय लंकेशक मंदध्‍वनि‍सँ हम सभ खोपड़ी उखाड़ि‍ चलि‍ देलहुँ।
पोखरि‍क दछि‍नबरि‍या मोहारपर सम्‍मतक स्‍थान छल। ओतऽ पहुँचैत देरी दूरसँ गाड़ि‍क ध्‍वनि‍ सुनलहुँ। जि‍रात पोखरि‍क उत्तर कातमे छल। हम सभ बूझि‍ गेलहुँ। सम्‍मतक मुहूर्त तँ चारि‍ बजे भोरमे अछि‍। आव की करवें? आगि‍ तँ वएह लगाओत जकर बाप मरल हुअए। हम सभसँ पि‍तृयुक्‍त छी। हमर एहि‍ टि‍प्‍पणीपर ललवा बगलक कंसारसँ आगि‍ खोड़ि‍ कऽ आनि‍ सम्‍मतपर धऽ देलक। खोपड़ी कुरू-कुरू स्‍वाहा।
राति‍मे पंचैती लागल। सरपंच श्री रामप्रकाश यादव जी लोचन बाबासँ पुछलनि‍- अहाँ कोना बुझलहुँ जे खोपड़ीक चोरि‍ भेल?
‍हमर पोता डोला कऽ उठौलक। बाबा हौ बाबा, तोरी बाहि‍ं तरेगन देखाय हाय। हम अकचका कऽ उठलहुँ, खोपड़ीक चारमे तरेगन....।कोना उगल? उठि‍ कऽ देखलहुँ चारक कोन कथा, खुट्टा सेहो गोल अछि‍।
सभ पंच ठोहि‍ पारि‍ कऽ हॉसि‍। हम सभ मॉफी मांगि‍ लेलहुँ। काज तँ समाजक लेल कएने छलहुँ तेँ रामलोचन बाबा माफ कऽ देलनि‍।
बाबाक पोता आब जवान भऽ गेल छथि‍। एखनो जौं केओ ओकरा तरेगन देखाय हय कहैत अछि‍ तँ ओ मंद-मंद मुस्‍की मारि‍ फेर अपन स्‍वर्गीय बाबाक स्‍मरणमे शांत भऽ जाइत अछि‍.....।
पि‍तृयुक्‍त ललवा सम्‍मतमे आगि‍ लगौलक, अठासीक कोन कथा ओकर पि‍ता एखन धरि‍ स्‍वस्‍थ छथि‍। भगवान हुनका एहि‍ना लहलहाइत राखथु।


दहीक ठोप

राति‍मे शि‍वनगर कुर्मी टोल रामखेलावनक वि‍देशि‍या नाच देखैले चलि‍ गेल छलहुँ। बाबाक हुरपेटलाक वाद भोरे देरीसँ नीन फूजल। भोरूका स्‍कूल छल। झटपट स्‍नान कऽ बसि‍का रोटी आ पलॉकी साग हूरि‍ वस्‍ता समेटलहुँ।
हमर लङौटि‍या संगी सभ जेना रवि‍, धनश्‍याम पहि‍ने वि‍द्यालयक लेल वि‍दा भऽ गेल छल। एकसेर झटकल चलि‍ देलहुँ। बाटमे उत्वाकल चांडालचौखरी भेटल। सभ सहपाठि‍ए छल, मुदा वि‍द्यासँ ओकरा सबहक कोनो संबंध नहि‍। सभ दि‍न गुरूजी सँ धुनाइत छल, मुदा कोनो प्रभाव नहि‍। नहि‍ चाहि‍तहुँ संग लागि‍ गेलहुँ। ककर रोहि‍नि‍याँ आम तोड़त, कतए की उजाड़त पता नहि‍।
गामसँ कोस भरि‍ दूरमे बैद्यनाथपुर उच्‍च वि‍द्यालयमे पढ़ैत छलहुँ। आइ लगै छै कि‍छु नै फबतै, हलधर ठाकुर अपने आमक जड़ि‍केँ पजि‍औने छै। जि‍तबाक एहि‍ हि‍लकोरकेँ सुनि‍ करेज कॉपय लागल। एतबामे उत्‍क्षूंखल संघक नेता आशुतोष चि‍चि‍आएल- रौ हि‍रबा दौड़ आगाँ भरि‍या जा रहल छै....। भार छीनि‍ कऽ दही चाखब।‍ सभ दौड़ल नहुॅ-नहुॅ भरि‍या लग आबि‍ गेल छलहुँ। भरि‍या प्रलयक संकेत बूझि‍ ठाढ़ भऽ गेल।
हौ ककरा ओहि‍ ठाम भार लऽ कऽ जाइ छहक? आशुतोष बाजल। तोरा ओइसँ की मतलब, बेसी टभ-टभ करवेँ तँ उठा कऽ पटकि‍ देबौ?” भरि‍या बि‍गड़ि‍ कऽ बाजल। सरि‍पहुँ ओ नेना सबहक उद्येश्‍य बूझि‍ गेल छल। हम आशुतोषसँ वि‍नती कएलहुँ, छोड़ि‍ दहीं गऽ कोनो अहि‍वाती बहि‍नक भार छै। आशुतोष हमरा दि‍श ऑखि‍ गुररैत बाजल- रौ हरि‍श्‍चन्‍द्रक नाति‍ तोँ भाग एहि‍ ठामसँ हम सभ दही अवश्‍य खाएव।‍
हमर नि‍वेदनपर दलमे फूटि‍ पड़ि‍ गेल। हमरा संग-संग कि‍छु छौंड़ा आगाँ बढ़ए लागल। जि‍तबा बड़ पारखी छल, ओ ई गप्‍प बूझि‍ गेल, उद्धोषण कएलक- जे छौंड़ा एहि‍ दहीसँ अपन माथमे चानन ठोप नहि‍ करत ओकर बाप तीन दि‍नक भीतर मरि‍ जाएत। ई कहैत पहि‍ने ओ दहीमे भूर कऽ अपन मॉथमे ठोप कएलक। हमर वि‍रोध असफल भऽ गेल अपन डेग पाछॉ करैत पि‍तृमोहक दुआरे हमहूँ राजति‍लक लगएलहुँ। देखि‍ते-देखैत दहीक पाति‍लमे अकाशक तरेगन जकाँ सहस्‍त्र छि‍द्र भऽ गेल।
भरि‍या भारकेँ छोड़ि‍ ठामहि‍ं गायघाट गाम दि‍शि‍ गाड़ि‍ पढ़ैत भागल। सभ छौंड़ा ओहि‍ दहीसँ पारन कएलक।
हम मूकदर्शक छलहुँ। वि‍द्यालय पहुँचैत देरी महेन्‍द्र बाबू मास्‍टर साहेबक सटक्कासँ रक्‍त रंजि‍त भऽ गेलहुँ। ओ सभ खा कऽ धुनाएल आ हम बि‍नु अपराध कएने।
सोचऽ लगलहुँ हमर कोन दोख हम तँ पि‍तृमोहमे फॅसि‍ गेलहुँ।
मुन्नाजी
पथ दर्शन
अहाँकेँ एतेक मना केलौं, परञ्च नहिये मानब अहाँ, तऽ जाऊ।
मुदा रौद बड़ करगर छै, बचिये के रहब।
भइया आइ विभिन्न प्रकारक सांस्कृतिक कार्यक्रम छै स्कूलमे।
हँ, उद्घाटन सत्र तँ बेजोड़ हेतै, की कहू एगदम धमगिजर, अहूँ एबै ने भइया?

हम मौन रहि गेल रही। मुदा लाउडीस्पीकरक अवाज, ओहिपर विभिन्न वाद्ययंत्रक पेँ...पोँ...आ शिक्षा मंत्रीक भाषण, हमर सबुरक बान्ह तोड़ि देलक। विदा भेलौं स्कुल दिस...।

विद्यालयक प्राङ्गणमे पएर रखिते हमर शरीर थरथरा उठल। कानमे परल नेना सभक समवेत स्वरसँ...आवारा हूँ...आवारा हूँ। चोट्टहि घुरि एलौं घर। मोनमे उकस पाकस होमय लागल- “कि, इएह थिकैक आइ-काल्हिक स्कूली सांस्कृतिक कार्यक्रम। आ गुरुजी दैत छथिन्ह एहने शिक्षा?” वाह रे भविष्य।
दोसर दिन गुरुजीकेँ शिकायत केलापर उतारा भेटल- जे बच्चा जेहेन धरनदार छै तेहने तैयारियो रहैत छैक।

आ अहाँ सब की करै छीयै?
“हम सब तँ मात्र रस्ता देखबैत छियैक आगाँ बढ़बाक लेल”।
 
अनमोल झा 1970-
गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
भण्डाफोर

ओ कहबी नहि छैक जे बूढ़ भेने लोक दूरि जाइत अछि, सैह बात। ओना गाम बाबा संगे से बात नहि छलनि। बूढ़ तँ छलाहे बेचारा मुदा लोककेँ लगै जे थोड़े ई नाटको करै छथि।

जखन कियो आबनि दलानपर आ कहनि गोर लगै छी बाबा, चिन्हलौं हमाअ? तँ कहि उठथिन- परिचय देब तखन ने चिन्हब। माने ओ जेना कम देखैत होथि आ आगन्तुक अपन परिचय दैत छल तखन ओ चिन्हैत छलखिन।

एहिना एक दिन ईंटाक भट्ठाक मालिक पाइक तगेदामे हिनका ओतय आयल आ कहलकनि- बबा प्रणाम। चिन्हलौं हमरा। तँ कहलखिन- नहि तँ। हम सियाराम, ईंटा भट्ठाबला। एतबे कहिते गाम बाबा बमकि उठलाह- ऐँ हौ, हमरा सभटा दू नम्बरक ईंटा दऽ देलह। तोरा ठकै लेल हमहीं भेटलियह की? आ मार-मार कऽ उठलाह बाबा ओकरा।

सियाराम कहलनि- बाबा हम सात फीटक जवान छी से अहाँ सामनेमे ठाढ़ छलौं, बिना परिचयक अहाँ चिन्हबे नहि केलौं आ सात इंचक ईंटा छैहो नहि से अहाँ एक नम्बर आ दू नम्बर चिन्ह गेलियै...!!

चिन्ता

लोआ नसईक बच्चा इसकूलसँ जखन एलै तँ मायकेँ कहलकै- मम्मी-मम्मी हमरा सब इसकुलमे पढ़ै कालमे जखन टीचर नहि रहैत छैक तँ मूड़ी झुकाकऽ पायलकेँ अथी देखै छीयै घघराक नीचाँ।

मायक मोन चेहा गेलै। कहलकै कथी रौ, कथी देखै छहिन।
बच्चा कहलकै- अथी गै, कछिया, उजरा कछिया।
माय कहलकै- गन्दा बात। ई गन्दा बात भेलै। ई नहि करक चाही। आ फेर पुछैत छैक- ओ की देखै छहिन। ओ देखिकऽ की होइत छौ।

बच्चा कहने रहै- नीक लगैए गै। देखैत नीक लगैए। मायक चिन्ता बढ़ि गेल अहै...!

बुद्धि
केकबला दोकानपर बाप-बेटा दुनू जा कऽ ऑडा दऽ देने रहय। अतुलक पाँचम जन्म दिन छलै। दोकानदार कहलकै जे केकपा अतुल लिख देबै सैह ने?

ओ बच्चा बाजल नहि। केकमे अतुल चौधरी लिखि कऽ दिअ। हमरा पारा(मोहल्ला)मे चारिटा अतुल छैक। कोन अतुलक जन्म दिन छैक से लोक कोना बुझतै?

दोकानदार आ अतुलक पपा दुनू एक दोसराक मुँह देखय लागल रहय। दोकानदाअ एकटा नीक केक दोकानसँ निकालि कऽ अतुलक हाथमे मँगनिये खाइ लेल देलकै आ कहलकै- ठीक छैक बेटा, अतुल चौधरीये लिखल रहत अहाँक केकमे...।

कंट्रोल

हम रिभियाकेँ इशारा देलियै आ ओ एम्हर ओम्हर ताकि हमरा लग आबि गेल छल। कान लग ओ मुँह सटा कऽ कहलक- तूँ बढ़ कलम, हम अबैत छियौ। एखन माय-बाबू दुनू गोटा अंगनेमे छथि। कनी देरियो हेतै तैयो हम एबे करबौ, तूँ खोपड़ीक मचानपर रहिहेँ!

हम ओतऽ सँ की कहाँ सोचैत खेतक आइ आ एक पेरिया रस्ता धेने चल गेल रही कलममे। हम खोपड़ीमे पहुँचलहुँ तँ कियो कतौ नहि छल। हम ओहिपर जा कऽ बैसि रहलहुँ। आमक मास अनेरे बड़ नीक लगैत छैक, से हम गाछ सभकेँ निहारऽ लागल रही।

बड़ी कालक बाद रिभिया आयल। मचानपर चढ़ि रबरबला पेन्टकेँ फलका ओहिमेसँ अपना खाय लेल जे माय लीची देने छलै से ओहिमे सँ निकालि दूटा हमरा देलक आ दूटा अपनो खेलक। आ तकरा बाद हमाअ सब नीचाँ उतरि सतघराक धुचि कोड़ल जगह लग आबि दुनू गोटा दुनू भाग बैसि सतघरा खेलाय लागल रही।

से ताहि दिनमे जानथि भगवान, हम किछु नहि बुझैत रही। जखन ओ गुलाब कली सँ फूल भऽ फूटल तँ कियो आबि ओकरा तोड़ि कऽ चलि गेल। हम आब जखन ओ समय आ बात सब मोन पाड़ै छी तँ अपना आपकेँ कंट्रोल नहि कऽ पबैत छी! एखनो हम सपनामे ओकरे देखैत छी। पता नहि ओ हमरा देखैत अछि की नहि...!


चिन्तन

-हे कनी ऋणो-पैंच कऽ कऽ कोनो छोटो-छीन शहरमे एकटा कनियो टाक घर बान्हैक जोगार करू ने।
-गाम सन वातावरण कतऽ पायब ओतऽ यै। पाल्युशनसँ भरल, ककरोसँ ककरो कोनो मतलब नहि। सब अपने लए बेहाल।
- से जे रहय। धीया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइ डाक्टर-वैद्य आदिक सुविधा तँ रहत ने ओतय। आ ई चीज जतय छैक ततय मनुक्खकेँ आगाँ बढ़ैत समय नहि लगैत छैक, से बुझल अछि ने..अहाँकेँ...


बोध

ऑफिस लेल बैग टांगि बिदा भेल ओ। मेन गेटसँ निकलि गेटक छिटकिन्नी लग तीन-चारि डेग आगाँ बढ़ल आकि पाछाँसँ गेट खोलि तीन सालक प्रियांशु दौगिकऽ आबि पाछाँसँ बैग पकड़ि घिचलक। कहलकै- पपा हमरा चॉकलेट कीनि दिअ।

पपा कोरामे उठा कहलकै- नै बेटा, चॉकलेट नै खाइ।
-तँ कैडबेरिये कीनि दिअ।
-नै बाबू। ई सभ खेलासँ दाँतमे पिल्लू लागि जाइत छैक।

-तँ पाँचटा चुम्मा लिअ हमरा, तखने जाए देब अहाँकेँ ऑफिस ।

पपा ओकरा करेजमे साटि हँसय लागल रहय। आ दुनू गालपर दू-दू टा कऽ चुम्मा लऽ कहलकै- जाउ बेटा, आब चलि जाउ, हमरा अबेर होइत अछि।

प्रियांशु कहने अहै, नै पपा, पाँचटा चुम्मा कहाँ भेल। एकटा लोलपर लिअ ने। पपा लोलोपर एकटा चुम्मा लेलकै। आब ओ अपने कोरासँ उतरि गेटक भीतर टाटा-बाइ-बाइ करैत आबि गेल रहय...

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