भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Thursday, July 17, 2008

पेटार ८

सुकान्त सोम


निषेधाज्ञा
हे हमर मालिक परवरदिगार।
अहाँक आज्ञाक अक्षरशः पालन करैत
डिगडिगिया पीटबा दैलिऐ’ए
बसन्त आबि गेलै’ए। सभकें
सामूहिक वसन्तोत्सवमे अनिवार्यतः भाग लेबहि टा पड़तै
सरकारक हुक्मउदूली कर’बलाकें
एकेटा बस एकेटा उपहार भेटतै
ई ओकर अन्तिम बसन्तोत्सव हेतै
मालिक, अपनेक आदेश आ पालन नहि हो। ई
आठम आश्चर्य हेतै, तैं त’
लोककें बुझा देल गेलै’ए
सभकें मस्तीमे झूमि-झूमि
फाग आ जोगीड़ा गएबाक छै
घ’र-आँगनमे नहि, शहर आ बाजारमे
राजपथ पर टोलीमे बँटि क’
रंग-अबीर खेलएबाक छै, कि
सरकारक रथ बहराइत त’ ओकर चक्का
रंग-अबीरक दलदलिमे
दच द’ फँसि जाइक
सरकारक ठोर पर मुस्की लहरा जाइक...
श्रीमान्, अपनेक आदेश
ककरा अनसोहाँत लगतै
जान छै, जहान छै
एखनो जीवन भार नहि भेलै’ए
कथीक कमी छै? जँ
दू पाइ बेसिये लगलै त’ की भेलै
एखनो दूध-दही भेटिए जाइ छै
घी’क बदला डालडासँ काज चलिए जाइ छै...
सत्ते कहै छी, सरकार
अपनेक कृपा छै। एक बेर जँ
कनडेरियो देखि लेबै
जीवन धन्य भ’ जेतै!
मालिक, विश्वास कएल जाए
ई मुँहदेखल बात नहि, कि
अहाँ मुस्काइ छी: चाउरमे आगि लागि जाइ छै
अहाँ मुस्काइ छी: गहूमक लहलहाइत खेत झरकि जाइ छै
अहाँ मुस्काइ छी: सरिसो की रैंची की तीसी अकास चढ़ि जाइ छै
अहाँ मुस्काइ छी: मटिया तेल अपनहि लहकि जाइ छै
अहाँ मुस्काइ छी: बाँगक खेती सुड्डाह भ’ जाइ छै
अहाँ मुस्काइ छी: गाड़ीक पहिया जाम भ’ जाइ छै
अहाँ मुस्काइ छी: हमर दाम्पत्यमे दरारि फाटि जाइ’ए
सरकार, अहाँक एकटा मुस्की
अरब-खरबसँ बेसी महत्त्वपूर्ण अछि
सरकार, अहाँक एकटा मुस्की
अखबारक सुर्खी बनै’ए
सरकार, अहाँक एकटा मुस्की पर
कुर्बान अछि करोड़ोक देश-दुनियाँ...
गरीबनवाज, मुदा, माफ कएल जाए
एकटा खानगी बात
कठोर आ चिन्तनीय बात जे
कहितहुँ नहि बनै’ए आ
नहि कहनाइयो अपराधी बनबै’ए
आइ-काल्हि एना बताह जकाँ
पछबा किऐ लपटै छै?
आर किछु नहि त’
खढ़-पात खराइ छै
नाँगट गाछक सुखाएल ठारि सभ
एक दोसरसँ टकराइ छै
सत्ते कहै छी मौसमक एहि अक्खड़पनीक
किछु लोक लाभ उठा सकै’ए
से दियासलाइ किनबाक साहस क’ सकै’ए
मालिक, हम नमकहराम नहि छी
एकटा निवेदन
अपने आदेश जारी कएल जाए
पछबाक लपटब पर प्रतिबन्ध लगा देल जाए
मालिक, परवरदिगार! बस
इएह टा उपाय रहि गेल’ए आब
एक्के टा, इएह टा।



आगिक बेगरता

ओहि दिन की भ’ गेल रहै, की ने!
अहाँ बियनि हौंकैत रहि गेल रही
चूल्हिकें ऊपर-नीचाँसँ फुकैत रहि गेल रही
गोइठा-खुहरी कोंचैत रहि गेल रही...
अहाँ अपस्याँत भ’ गेल रही।

आगि पजारबाक अपन अगुताइमे
बेहाल अहाँ अँगनासँ बहरा क’
भरि गाम बौआएल रही। मुदा,
एकटा बात कहू
एहनो त’ होइ छै जे
पझाएल छाउरमे
करचीक कने टा टुकड़ी किम्बा
गोइठाक मिसिया भरिक खण्ड
जरिते रहि जाइ छै
एकटा जीवित अग्नि-पिण्ड...

अहाँ से कहाँ तकने रहिऐ?
चूल्हिमे भरल छाउर कहाँ उधेसने रहिऐ??
सत्ते कहै छी
अहाँक अगुताइ आ भरि गाम फिफिआएब
हमरा कनियों नहि सोहाएल रहए। ओना,
एहनो त’ होइ छै जे कतेको बेर
ककरोसँ माँगि क’ आनल आगि
चूल्हि धरि जाइत-जाइत मिझा जाइ छै, आ तखन
कते दुख आ तामस उठै छै! सत्ते
आगि त’ आगिये थिकै आ
आगिक बेगरता आन कोनो विकल्पसँ
कोना पूरा भ’ सकै छै!

निज संवाददाता द्वारा
1
सेवामे श्रीमान् सम्पादक महोदय, हुजूर!
एम्हर त’ बरोबरि इलाकाक खबरि छपिते रहलैक अछि
राम बाबूक गाछीक नहि मजरबाक समाचार
बाबू साहेबक महीसकें एक्के संग सात गोट पड़रू होएबाक
दरोगा साहेबक तुलसी सुखएबाक समाचार...
सभटा छपैत रहलैक अछि हुजूर!

रेलवेसँ सोलह आ सड़कसँ बारह मील दूर
नदी आ पहाड़ीक बीच बसल एहि इलाकाक
एहि गरीब संवाददाता पर अपनेक विशेष कृपाक
कोना बखान करी-- अवगतिए की?

मुदा, आजुक समाचार त’
अद्भुत अछि अजगुत अछि। एहन खिस्सा
ने कहियो देखल ने सुनल अछि
श्रीमान् कृपा करबै
एहि समाचारकें पहिले पन्ना पर स्थान देबै
नीक जकाँ देखि सुनि
दू काॅलम की तीन काॅलममे
मोटका-मोटका पैघ-पैघ अक्षरमे एकर शीर्षक देबै।
हुजूर, एहि समाचार पर
अपने गाम-घरक
जिला जयबारक बुझि ध्यान देबै!

2

तहिया सौंसे इलाकामे खलबली मचि गेल रहै
एहन विशाल हाथी आइ धरि ने क्यो देखने रहए, ने सुनने रहए
बूढ़-बूढ़ानुसक कहब छनि
रामपुरक बाबू साहेब किम्बा राजपुरक राजा किम्बा
हमरा लोकनिक महाराजोक हथिसारमे
एहन ऐरावत-सन हाथी नहि छलनि। मुदा
से त’ खिस्साक पेनी थिक! बात शुरू होइ छै कि
रजोखरिक पहाड़ सन महार पर ई हाथी
कहिया आ कोना अएलै आ अबिते तुरन्ते किऐ मरियो गेलै
इएह त’ प्रश्न छै जकर थाह-पता ककरो नहि छै
मामिला गम्भीर छै! सत्ते रहस्यक पर्दा बड़ मोट छै।

मुदा, हुजूर सम्पादक महोदय!
एकरा बाद बात आरो बढ़ै छै
प्रेत-लोकक खिस्सा जकाँ रहस्य-दर-रहस्य बनै छै।
हाथीक लहास पर
पहिने एकटा गिद्ध फेर अगिला दिन दोसर गिद्ध खसल रहै। से
पहिलकें दोसर आ दोसरका कें पहिल एकदम्मे नइं सोहाएल रहै, कि
अपन-अपन पाँखि सम्हारि लोल आ चाँगुर पिजबैत
एक दोसरा पर टूटि पड़लै! आ तै खन
देश भरिक गिद्ध दू दलमे बँटि क’
रजोखरिक पहाड़ सन मोहार पर आबि गेल।
युद्ध घमासान रूप लेलक
गिद्ध सभ मरैत रहल-मारैत रहल
मुइल हाथीक देह पर एक लोल मारि
अपन-अपन प्रतिद्वन्द्वी पर टूटैत रहल।
एकटा रहस्यक पर्दा उठैत नहि छै कि दोसर रहस्य जनमैत छै। आ
एहने समयमे एकटा बुढ़िया रजोखरिक पहाड़ सन मोहार पर
पहुँचल, श्रीमान्! आ,
जे बात ने देखल छल ने जानल
ने बूझल छल ने सूनल से इएह थिक कि
बुढ़ियाक मुँहमे तीने टा दाँत छलै
तीनू सुल्फा सन मुँहसँ एक बीत बाहर धरि लटकल
लोकक पैरमे जेना बगुलबा काँट गड़ै छै, तहिना
कोनो वस्तुमे धँसै छलै
दू टा दाँत दुनू गलफरसँ आ
एकटा सोझाँसँ बहराएल छलै। से,
हुजूर, श्रीमान् देखि-देखि लोककें त्राटक लगै छै
बुढ़ियाक आगमनसँ दुनू बुढ़बा गिद्धक चेहरा पर मुस्कान अएलै
ओकर अगवानीमे किछु काल लड़ाइ रोकि देल गेलै।
गिद्ध सभ बाट देलकै। बुढ़िया हाथी धरि गेल
हाथीक लहासमे अपन सुल्फा सन दाँत गड़ौलक
बु़िढ़याक आकृति हरियर भ’ अएलै, कि तै खन
गिद्ध-संघर्ष फेर शुरू भ’ गेलै।

3
बस! एखन त’ एतबे समाचार अछि, आगू
गिद्ध सभक आपसी संघर्ष जारी छै, हुजूर!
गलती-सलती माफ करबै
अशुद्धकें सुधारि क’
समाचारकें बड़का-बड़का मोटका शीर्षक द’
पहिले पन्ना पर सजा क’
छापि देबै, श्रीमान्
रहस्यकें सार्वजनिक बहसक विषय बना
समाधानक सार्वजनिक उद्योगक दिशामे
इलाकाक जनताक उपकार कएल जाए, श्रीमान्! जत’
गिद्धक संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़िते जा रहल छै, हुजूर!

एकटा युद्धक तैयारी
पिता, हम घुरि आएल छी। हमरा
कतहु किछु नहि भेटल। एक हाथमे
ह’रक लागनि आ दोसरमे पेना नेने
नासिकाग्र पर जमल पसेना बुन्नवला
अहाँक आकृति नहि बिसरि सकलहुँ। नहि बिसरि सकलहुँ
मेघडम्बर तर बिताओल गेल जेठक दुपहरिया।
मोने अछि आहिना
कोना कोना अहाँ बबूरक गाछ कटैत गेलहुँ आ
फेर कोना कोना ओ उगैत रहलै। बगुलबा काँटसँ घेरल
गाम स्वतन्त्रा नहि भेलै।
गामक मुखियाक चाँगुर बड़ चोखगर छलै आ अहाँक
आकृतिकें कैक ठाम ने छीलि देने रहए। तहिया
हम नेना रही आ
हमर तामसकें नेनपनीक संज्ञा द’ देल गेल रहए।

मोने अछि
पच्चीस वर्ष पहिने अहाँ बाजल रही
ई सपना हमर नहि थिक। ई आकास हमर नहि भ’ सकै’ए आ
मुखियाक समधानल चाट अहाँक गलफर पर बजरल रहए कि
छट द’ बारह टा दाँत मुँहसँ छिटकि गेल रहए।
ओलतीमे पसरल खून पर माछी भिनकैत रहलै।
सत्ते कहै छी
जमल आ सुखाएल खूनक कारी रंग नहि बिसरल छी। मुदा ओ रंग
हमर कवितामे नहि आएल। नहि आएल हमर कवितामे
अहाँक दाँतविहीन मुँहसँ बहराएल चीत्कार। अहाँक मसकूरसँ
उठैत रक्तक फब्बाराक एक्कोटा बुन्न
हमर कविताक कापी पर नहि खसल।
तैयो, अहाँ कें बड़ आशा रहए
हुनक माँसल तरहत्थीक स्पर्श हमरा सुख देत। मुदा
से नहि भेलै। हुनक
एकटा हाथ कोमल आ दोसर बघनखा बला रहनि।
हुनक स्नेहक गवाही हमर पीठ पर भेटत अहाँकें। हमर
आँतकें ओ ताँति बना क’ छोड़ि देने छथि, पिता!
मुदा, तैयो
हमर आँखिसँ लुत्ती नहि बहराएल। हमरा सोझाँ
अहाँक दाँतविहीन मुँहसँ बहराएल चीत्कार नचैत रहल। ई
हमर सभसँ पैघ गलती रहए, पिता!
आ, आब किछु नहि चाही, मात्रा
भूमिस्थ भेल अहाँक ओ बारहो टा दाँत आ कंकाल भेल आकृति।
अहाँक नरकंकालकें पीठ पर लादि बारहो टा दाँतकें हथियार बना
एकटा युद्ध आरम्भ करब, कि
मृत्युक उपत्यका ई देश हमर नहि भ’ सकैछ
महा-श्मशान बनल ई देश हमर नहि भ’ सकैछ
जल्लाद सभक ई देश हमर नहि भ’ सकैछ
जोआन आकृतिकें तेजाबसँ जरा देब’वला ई देश हमर
नहि भ’ सकैछ
ई देश हमर नहि भ’ सकैछ, पिता!



पूर्णेन्दु चैधरी



चारि गोट कविता
1
हमर अहाँक पाँच बर्खक
प्रेमक उपलब्धि --
अहाँ दू बच्चाक
माइ बनि गेलहुँ
आ, हमर सभटा केश पाकि गेल।

2
गाल पसेनासँ छनि भीजल,
जेना, शीतसँ
गुलाब फूल रहैत अछि तीतल

3
खुलल केश आ
पसेनासँ भरल चेहराक बीच
ठोप चमकि रहल छनि
जेना भोरुकबा उगि आएल हो

4
सम्भव जे आइ ककरो पर ठनका खसैक
ओ पान खा क’
जा रहलि छथि साँझ देब’
शिव मन्दिर।

स्वार्थक शुभ-लाभ
कोन-कोन झाड़ि-बहारि क’
घरकें करै छी साफ
बाहरक अन्हारकें भगब’ लेल
जरबै छी दीपमालिका
शुभ-लाभक लेल करै छी अर्चना
मुदा,
हम सभ अपन हृदयमे
लागल रह’ दै छी झोल-झंखार
मोनमे रहैत अछि गुज्ज-अन्हार
स्वार्थक शुभ-लाभक करै छी सर्जना।


महेन्द्र

बहुत अछि अपना लेल...

ओरिया क’ राखू
पा भरि दूध/एक कनमा घी
थोड़बो मूंगक दारिम
सरिया लिअ’...
अपना लेल तँ नून आ
पियाजुक फाँके बहुत अछि
जीवन खेप’ लेल
एहिसँ फाजिल आर की चाही
आर की चाही
पसिन्जर ट्रेनक टिकटक दाम
बटखर्चामे थोड़ेक सातु आ नोन
आ तकर बाद...
घण्टा-घण्टी पीबा लेल पानि
पानि आ पानि बस...
पानिक स्वाद जँ नीक नहि लागए मीत!
तँ पुनः कण्ठ तर उतारि लेब
चुटकी मरि सातुक घोर
आ पहुँचि जाएब
अपना देशक कोनो नगर वा महानगरमे
जत’ मजूरी करैत अछि
अहाँक आँखि/अहाँक लाठी
माइक ममता आ पुतहुक सोहाग...
तें फेर कहै छी मीत!
ओरिया क’ राखि लिअ’
पा भरि दूध/एक कनमा घी
थोड़बो तोड़ी-सरिसबक साग बस...
अपना लेल तँ
नून आ पियाजुक फाँके बहुत अछि

बाट अछि निस्तब्ध...
एहि बाटें आएल रहथि कहियो
सुरम्य घाटीक एकटा प्रफुल्लित राजकुमार
माथ पर मौर कानमे कुण्डल
राजसी पोसाकसँ गतानल/चमकैत
सौंसे देह
गर्दनिमे झुलैत रंग-विरंगक
चिन्हार-अनचिन्हार मणि माणिक्यक माला
आपादमस्तक टप-टप चुबैत कान्तिक कलाकार
एही बाटंे
एहि दूभि पर बाटें चल गेल रहथि ओहि दिस
आ बसातक संग पसरि गेल रहए
नाना प्रकारक इत्राक सुगन्धि
अप्रत्याशित अलौकिक

एही बाट पर धरोहि लागल हाँजक हाँज गामक लोक
पछोर धएने रहए
लाल पीयर हरियर पताका चमकबैत
अन्हरिया-इजोरियाक
बिनु परवाहि कएने चलैत रहए
राजकुमारक देहमे औंसल
इत्रा-फुलेलक सुगन्धिक पाछाँ
कोसक कोस दुलकैत रहल
एही बाटें
आ ई बाट पड़ल-पड़ल सुनैत रहल
दुलकल जाइत लोकक पग-ध्वनि
सतुआक सोन्हगर गन्धक संग
फुटहाक चर्वणी चिन्हैत रहल
ई बाट!
सुरम्य घाटीक कान्तिमय राजकुमारक प्रतीक्षामे
पड़ल-पड़ल घटा लेलक अपन ओजन
निस्तब्ध, निरुत्तर
ई बाट

आ ई बाट
अनुभवैत अछि राजमहलक खालीपन
पिताक निस्तेज आँखि
माइक ममताक सुखाएल खेत-खरिहान
तृषित तकैत अछि
अभिसप्त दरबज्जा
बिनु बाहरल आँगनक कोन-कोनमे जनमल
अनेरुआ घासक जंगल
ई बाट
प्रतीक्षा करैत-करैत सुटका लेलक अछि
अपन काया
तथापि निरास नहि अछि बाट
स्तब्ध अछि
खाली स्तब्ध...

समय
समयक बसातमे
पसरि रहल अछि एकटा अप्रत्याशित गंध
बिर्रो जकाँ घनीभूत भ’ रहल अछि
रंगक समय
दरकि रहल-ए लगातार
अपन ‘रेकार्ड’ कएल भाषण पर
प्रतिबन्ध लगाउ
गीत अप्रासंगिक अछि
कतेक घोसब ओएह पुरनके शब्द
पुरनके वाक्यकें कहिया धरि उघैत रहब
कहिया धरि मठाधीशक पाँतिमे रहब ठाढ़
विराम लगाउ। आब’ दियौ नवजीवनकें आब
समुद्रक लहरि अपन मूड़ी उठौने
कड़गर बरखाक संग
ल’ क’ आबि रहल अछि
अस्त-व्यस्तताक सनेस
कोकनल गाछक टूटल डारिसँ
कहिया धरि बचब मीत!
चेतू...! आब’ दियौ नवका समयकें...

नखदर्पण में नित्तह

लाल कका भोरे भोर
वक्रतुण्ड महाकाय... आ
कराग्रे बसते लक्ष्मी.... क मन्त्रासँ
वातावरणकें सिक्त करैत
देखै छलाह दुनू हाथक रेखामे
अपन गामक चैहद्दी
खेतक आरि। लाल कका
आरिसँ घेरल अपन चासक उपजाक
स्मरणार्थ पसारैत छलाह तरहत्थी
हाथकें निहारैत
उठि जाइ छलाह ओछाओनसँ--
लाल कका नखदर्पणमे
अपन भूत, भविष्य, वत्र्तमानकें
देखैत प्रसन्न भ’ उठै छलाह भोरे भोर

लाल कका
चैंकि उठै छलाह
आन्दोलित आँगनक अधोखी लग ठाढ़ि
पुतहुक मुँहसँ बहराइत अवाच्य कथा
तीर जकाँ आहत मोनकें
लाल कका सम्हारैत
हाथकें झाँपि लै छलाह ओढ़ना तर
आ मेटा दै छलाह हाथक रेखा
बिसरि जाइत रहथि वक्रतुण्ड... आ
कराग्रे... सन सन समृद्धिक मन्त्रा
बिसरि जाइ छलाह
अपन अतीत
अपन भविष्य
आ वत्र्तामानक संग समझौतामे
जुटि जाइ छलाह
बेचारे लाल कका नित्तह


अन्हारक अन्हार...
सेहन्ताक
लाल सुरुज
उगिते
अन्हार घरक
फाँक बाटे
पैसि गेलै
लालरंग आ
निर्वस्त्रा
क’ दैलकै
नुकाएल
मोनक अहिबात
ओकर दीपकें
देखार करैत
चढ़ि गेलै
माथ पर
सेहन्ताक जीवन
डूबि गेलै
अन्हारक अन्हार
आब ओकरा
खूब
सोहाइ छै।



ललितेश मिश्र

एकटा जारज युद्ध
महाशक्ति, महिषासुरमर्दिनी ठाढ़ि छथि!
अप्रतिभ, खलखल हँसैत,
हाथमे तरुआरि नेने
महाशक्ति ठाढ़ि छथि!
आ’ हमरा लोकनिक पूर्वज
बिलखि रहलाह अछि अनवरत
अपन सभटा राग-विराग
नीक अधलाहकें मोनहि मोन समेटने
क’ रहलाह अछि गोहारि...
--रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जहि ...
भगवती -- महामाया छथि क्षुब्ध
होम’ लगैत अछि बरखा
शीत ताप नियन्त्रिात बालु पर
जयन्ती बढ़’ लगैत अछि।
आ हमर पूर्वज लोकनि, आबालवृद्ध
क’ रहलाह अछि अश्रुपात।
क्षुब्ध आ विस्मित
हाथमे तरुआरि नेने ठाढ़ि छथि
आदिशक्तिक भग्नावशेष!
विस्फारित नेत्रासँ तकैत महामाता
सँ मधु-कैटभक जारज पुत्रा--
हमरालोकनि, भोग-लालसासँ
माँगि रहल छी
सत्ता, राशन आ बलात्कारी बल
अणु आयुध आ छल...
महाशक्ति-आद्या ठाढ़ि छथि
क्षुब्ध आ विस्मित
हमरा लोकनि पुनः पुनः चिकरैत रहि
जाइत छी--
--या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी... निद्रा... शक्ति रूपेण संस्थिता...
नहि झहरैत अछि आब बरखा
अविश्वस्त जारज सन्तान,
हमरा लोकनि सदलबल तोड़’ लगैत छी
खण्ड-पहण्ड!

नियति
आब हमरा आँगनमे
नहि झहरैत अछि सिंगरहारक फूल
डबरिआएल भदबरिया मेघ...
नहि पसरैछ
भनसाघरक चूल्हिसँ बहराइत
कोनो सोन्हगर गन्ध
कोनो सृजनरत स्त्राीक आँखिसँ
कोनो अर्थ, कोनो संगीत--
वयसक एहि दुर्गम पहाड़ पर
चढ़ैत-चढ़ैत हम भ’ गेल छी
सर्वथा क्लान्त
जीवन सन्ध्यामे हम
भेल छी झूर-झमान!
अनायासहि प्रारम्भ भेल
एहि जीवनयात्रामे हमरा लोकनि
प्रत्येक क्षण तकैत रहलहुँ अछि
कोनो सार्थक नाम
कोसिकाक दर्द, अन्हारमे डूबल अपन
गाम ओ खरिहान...
भ्रान्त इच्छा ओ आकांक्षाक
एकटा समुद्र बनल एहि जीवनमे
नहि भेटल अछि कहियो कोनो अर्थमय संगीत
अनिश्चिततासँ त्राण
कालजयी जीवन प्राप्ति हेतु
अनावश्यक ओ सार्थक वितान
भ’ गेल अछि साँझ!


एकटा भ्रान्त संकल्प
कतोक बर्खसँ
अपन पीठ पर
दुःसाध्य व्रणक पीड़ा भोगैत
हेंजक हेंज लोक लेल
आब के करतै ओगरबाही
के देतै आहुति?
दूइ धूर घराड़ी आ
थोड़ेक आन कोनो ‘आफियत’ लेल
आब तँ हमरे घर पैसल अछि हाहुति...
नित्य प्रति हम आँखि-कान बन्न कएने,
पढै़त छी अखबारमे भूख आ ठण्डसँ मृत्यु
रोग आ आण्विक युद्धक समाचार
उद्वेलित आ चिन्तित नहि भ’
कोनो निसाँमे मातल
हम चलि पडै़ छी धारक कात
मन्द धारक प्रवाह
आ कुन्द भेल हमर गतिशीलता
उपस्थापित करैछ एक गोट वैचारिक द्वन्द्व
जे थोड़बे रास स्वच्छ बसातक अन्वेषणमे,
अपन दीन-दुनियाँ ठीक करबा लेल
हम ढाह’ चाहै छी छत आ देबाल
मुदा, निष्क्रियता आ
उद्देश्यहीनताक दबावमे जकड़ल
प्रतीक्षारत रहि जाइत अछि हाथ
ओना, आँखि-कान मुनने
हम पढै़ जरूर छी,
सभटा समाचार!

मिथ्या परिचय
हमरा लोकनि
आन्हर नहि होएबाक भ्रमकें
सत्यापित करबा लेल
पीढ़ी-दर पीढ़ी
चूसैत जाइत छी
एक दोसराक रक्त ओ चाम
फल लोकैत छी हम
जाहि लेल बहैछ
दोसराक ऊष्ण भेल शरीरक
पसेना वा घाम...
अन्ध होएबाक अनिवार्य नियतिकें
खण्डित-विलोपित करबा लेल
एकटा मिथ्या परिचय प्रस्तुति लेल,
डूबैत-उतराइत छी
पोथी-पतराक शब्द-जालमे
तीर्थ-दान-व्रतक अनन्त
सिलसिलामे...
कठिन बनल ई सत्यापन अछि मुदा विभ्राट
सत्य अछि एतबे
जे अर्थ, स्वार्थ संकुल
हमर मनुष्यताक
भ’ गेल अछि उच्चाट

कामना गीत
रोगग्रस्त भेल हमर शब्दसँ
नहि निकलैत अछि आब
कोनो अर्थमय संगीत
नहि ध्वनित होइछ निर्झरिणीसँ
राग भरल गीत
पटल अछि ई दुनियाँ
अनेक प्रकृतिक लोकसँ
हिंस्र बनल लोकक दुनियाँमे
जत’ कतहु बाँचल अछि
ऊर्वर, शस्य श्यामल धरती
ओतहि संग्रहित होइछ ‘पावडर केग’
संयमित करबा लेल
अपन जीवन डेग
हम अपन आँगुरसँ कौखन
लिखै छी
‘मन्दाकिनी’क पारदर्शी वक्ष पर
एक गोट कामना गीत...
अस्तांगत ओ निस्तेज होइत
ताराक मध्य
स्खलित ओ रिक्त भेल रातिक पश्चात
कखन होएत प्रात
सूर्य पिण्डक आलोकसँ
ऊष्णित होएत कहिया
जीवन-प्रकृतिक गात।



विभूति आनन्द

एहि तरहें अबैत अछि भोर
सिरमामे आबि क’
बैसि गेल अछि उजास
खिड़की पर फुदकि रहल अछि फुद्दी
आ हम
भोरका सपनाक संग मस्त छी

सिरमामे बैसल उजास
उबिया क’ बजा अनलक अछि रौदकें
ओ हमर दिनचर्यामे
सेन्ह मार’ चाहि रहल अछि
आ हम
अपना भीतर अनुभव कर’ लागल छी
कोनो तेज बरछीक प्रहारकें

सिरमामे बैसल
उजासक संग रौद आब
ठीके बरछी सन भ’ गेल अछि
आ हम
अपन रोगग्रस्त पिता जकाँ
कछमछ कर’ लागल छी

ठीक एही कालमे
चोर-पैर संगंे अबैत अछि
हमर छोटका बेटा गप्पू
आ हाथमे रखने सलाइक काठीसँ
दिक करब शुरू कर दैत अछि
हमर कानकें...।
अन्ततः हमर आँखिक पल
फुजि जाइत अछि, आ ओ
भभा क’ हँसैत पड़ा जाइत अछि

हम अपन आँखिक कडु़आहटिकें
तरहत्थीसँ दुलारैत छी
आ खिड़की पर बैसल रौद आ चिड़ैसँ
गप कर’ लेल बढ़’ लगैत छी

नीचाँमे बैसलि माँ
चूल्हि महक छाउरसँ
चिनगी बीछि रहल छथि
आ कुमारि बसात
हमर त्वचाकें दुलरा रहल अछि


धनछूहा
आवश्यक अछि जीहमे स्वाद
आँखिमे दृष्टि, आ
मोनमे उत्साह

मुदा आवश्यक अछि
ताहि लेल ओकरा पढ़ब
पढ़ि क’ गूनब
गूनि क’ किछु डेग उठाएब

ताहिसँ पहिने, कि
हम सभ बन्हकी बना लेल जाइ--
आवश्यक अछि
दुनियाँ भरिक तमाम सियासी माथापच्चीकें
परखि क’ तय करब एक सुगठित सोच

एहि लेल
आवश्यक अछि इंधन

कम्प्यूटरीकृत आँकड़ा
आ उदार ग्लोबल अर्थव्यवस्थाक बीच
मिझा ने जाए ई इंधन
आवश्यक अछि एकरा पजारि क’ राखब

धनछूहा इंधन ल’ क’ आबि रहल अछि
इंधन ल’ क’ भागि रहल अछि धनछूहा

विडम्बना
हम अपनहि भीतर दौगि रहल छी --
गाममे पहिल बेर आएल
पेट्रोल-गन्ध सुँघबा लेल
दलानसँ अबैत
दादाक कण्ठसँ प्राती छनबा लेल
एकक आह पर तबाह
पूरा गामक प्रवाह देखबा लेल
सोहरसँ निर्गुण धरिक
सम्पूर्ण यात्रा गुनबा लेल

बहुत नीक लागल रहए
गाममे चरिपहिया गाड़ीक आएब
नीक लागल रहए जे
आस्ते-आस्ते गाममे पक्की सड़क
पहुँचि रहल अछि भीतर धरि

मुदा ई नहि बुझि सकल रही, जे
एक दिन एही सड़क द’ क’
हमर अपन गामसँ गाम भागि जाएत
ल’ जाएत भगा क’ हमरो, आ
बहुत सहजतासँ
स्मृतिमे सिहरबा लेल छोड़ि जाएत

तैयार अछि पृथ्वी
बहुत दिनुक बाद
भरल मेघ नीचा आएल अछि
रभसल अछि पृथ्वी
‘स्टेपिंग’ लेब आरम्भ क’ देलक अछि
एहि सोन्हगर सुगन्धित संसारमे
नृत्यक पाहुन भाव
ग’ब बनबा लेल आतुर अछि
ह’र-बरद कोदारिक संग
बालिग भेल धानक खरुहनि
पानिक संग फाड़ आ खूढ़क संगति
बिलह’ लागल अछि ‘छप-छप’ संगीत
संस्कार-पर्व पर पुलकित अछि
सुखाएल-सिरसिराएल हरियरी

ग’बक आतुरता देखि
डेराएल खेत सिहरि रहल अछि
तथापि, नहि जानि किऐ
जननी हेबा लेल
विकल लागि रहल अछि पृथ्वी

बहुत दिनुक बाद
भरल मेघ नीचा आएल अछि
उदासमना पृथ्वी
फेर मदिराएल अछि...

इच्छा
चाहैत छी
जाड़क एहि लजकोटर रौदकें
आँखिमे पकड़ने रही एहिना
जिह्ना पर आर किछु नहि रहए
अतृप्त पियासक अतिरिक्त

चाहैत छी
भाफ छोड़ैत चाह आ
मुँहसँ बहराइत गर्म साँस--
दुनू मिलि सिरजय
उत्तमसँ उत्तम कोनो स्वाद
मुड़ेर पर बैसल परबाक जोड़ा
स्पर्श करैत एक-दोसरक शरीर
बतियाबए
अपन-अपन लयमे सुख-दुख राग
आ हम
निन्न बेचि क’ स्वप्न कीनैत भेटी अनवरत

चाहैत छी
जखन-जखन बाबी गाबथि प्राती
आ साँझ पूजथि दीदी
तखन-तखन
हुनका लोकनिक एहि विश्वास पर
फेकी भोरक ई आँजुर भरि रौद
आ बुझाबी, जे
जाड़क चन्द्रमा नहि थिक अहाँ सभक जिनगी
आ नहि तँ
एकर सर्द इजोरिये थिक अहाँ सभक नियति

चाहैत छी
खूब-खूब नहि कानए सूर्य
सूर्य तपैत भेटए बसात
धुनियाँ जेना धुनि-धुनि क’ उड़ाओल करैए रूइ
जत’ तत’ थम्हल-उड़ैत देखी कुहेस
दाँतसँ कटकट संगीत बहराए
घरे-घर अगियासीक लिलसा होइ
आ हम
आकाशसँ सहयोगक अपेक्षा करैत भेटी--
भरि देह रौद...
देह भरि रौद...
रौदे-रौद

हाक
गजपट भ’ रहल अछि जीवन-शिल्प
प्रमाद आ अवसादमे
शक्ति-परीक्षण भ’ रहल अछि
क्यो हमरा जेना हाक द’ रहल अछि

हाट-बजारक गहमागहमी अछि
कतहु कलम बिका रहल अछि
कतहु मरौसीक नीलामी चलि रहल अछि
क्यो हमरा जेना हाक द’ रहल अछि

हमरा एकटा बान्ह चाही
हमर आँजुरमे रौदी अछि
बाहर
दाहिए-दाही अछि
आँखि-आँखिमे रोपल जा रहल अछि सपना
आ कलबले तितली-वंशक
पाँखि छपटल जा रहल अछि
क्यो हमरा जेना हाक द’ रहल अछि

गाछ-गाछसँ
पीयर पात सभ तूब’ लागल अछि
पलकक नीचाँ
अचरज गुजगुजा रहल अछि
ढलान पर उड़ियाए लागल अछि
योजना सभक फाहा
तथापि, वसन्त आबि रहल अछि
क्यो हमरा जेना हाक द’ रहल अछि

खुट्टासँ बान्हल बरद
कौआसँ खोधबा रहल अछि रीढ़
मुनहरमे सूड़ा,
आ खेतमे कीड़ा पोसा रहल अछि
क्यो ड्योढ़ीसँ हुलकि क’
माँगि रहल अछि आँगन
आ हम एक अजाएब सन
पदचाप अनुमानि रहल छी
क्यो हमरा जेना हाक द’ रहल अछि

शताब्दी आइ
मुँह लटकौने ठाढ़ अछि
विलुप्त होएबा लेल तत्पर अछि
अपेक्षाक संस्कृति
बहुत मश्किल भ’ रहल अछि
मित्राक स्नेहकें बुझनाइ
शत्राुक प्रार्थनाकें समझनाइ
संगहि संग
इमानदारीमे बुधियारीकें परखनाइ
मोहक त्याग केनाइ तँ
किछु एहन सहज भ’ रहल अछि
जे नोर खसएबाक
पलखतिए नहि भेटि रहल अछि
हास्यास्पद ढंगसँ
बिलख’ लागल अछि निर्भीकता...
तथापि कनी बिलमि जाउ प्राण!
मोनक आँगनमे
निरन्तर शेष रहि रहल अछि
जीवनक संगीत
क्यो हमरा जेना हाक द’ रहल अछि


हरे कृष्ण झा

जिमूतवाहन
अपना डीह परसँ निकली हमरा लोकनि
कि बहराइ अपन गामक सिमानसँ,
तखनहि टा मूड़ी हमरा सभक कटि क’
झाँपल रहल लाल पीयर साड़ी तर
जितियाक डाला पर,
से कोनो जरूरी नहि छै
कोनो टा जरूरी नहि छै से।
कोठलीमे रहितो,
जागल कि सूतलमे,
नहाइत कि खाइत काल,
कि अपन बच्चाकें कोरामे खेलबैत काल
से भ’ सकैत अछि।

बसातमे भाला चलैत रहैत अछि सदरि काल,
रौदमे फरसा चमकैत रहैत अछि,
अन्हारमे अंगोर बरसैत रहैत अछि।

भादबक राति
हमर अहाँक माइ
आँखियेमे काटि दै छथि...
मुदा डाला परहक जाहीजूही
भगवतीक सीरेमे झरकि जाइत अछि,
एकरंगा कपड़ा खकस्याह
भ’ जाइत अछि।
एक चुरू पानियो धरि
पिबै नहि छथि हमर अहाँक माइ
चैबीस कि छत्तीस घण्टा धरि;
मुदा जे भँगै छी डाला परहक नारिकेर
हमरा सभ अगिला दिन,
से उजरा फ’रक बदलामे
बहराइत अछि तेलिया साँप
ओहिमेसँ।
कतए छथि जिमूतवाहन,
कतए छथि?

अकाजक काज
चोरा क’ देखै छी गेनाक फूल
पूस मासक रौदमे!

चैदिस चकुआइत,
अधे-छिधे,
अझक्के,
कहुना क’ बस
देखि टा लै छी
हजारी गेनाक
सन्तोला रंगक फूल!

छाउर
छिटबाक अछि
गहुमक खेतमे;
अहगर क’ पटेबाक अछि आलू
कमठानक बाद;
माघ चढ़बासँ पहिनहि
अँटियेबाक अछि नार
टालक लेल।

तुराइक लेल
जुगता क’ राखल टाकासँ
हुनका लेल दम्माक दवाइ
किनबाक अछि;
कण्टिरबीक गरम कपड़ा
कें अनठा क’
दरोगाक हाथ गरमेबाक अछि,
दियादी कुन्नहमे भेल मोकदमा
कें हलुकेबा लेल।

सन्तोलाक रस
मेह धरि उछलैत अछि
खरिहानमे
माथ आ पाँखुर पर दने बहैतः
सन्तोलाक रस
छिलक’ चाहै अछि चैदिस
कानोकान करैत प्रानकें!

सन्तोलाक रसक दहाबोह
धरती पर
पूस मासक रौदमे!

गेनाक नमहर थोका सभ
चुभकैत अछि
एहि पमारमे:
खुशीसँ उभचुभ करैत
उझकैत अछि
नीलाकाशमे!

चैचंग भेल
एक छनक निकालै छी
पलखति,
मुदा सुगन्धिक खुशफैल
मे डूमि क’ नहि
निधोख भ’ क’ नहि
निरखैत धन्य
भ’ क’ नहि;
धड़कैत छाती
सँ धड़धड़मे
देखै छी गेनाक फूल,
जे कहीं केओ देखि ने लिअए
देखैत,
आ हँसि ने दिअए
पिहकारी दैत,
एहि अकाजक काज पर!

छपकि क’ देखै छी
गेनाक फूल
पूस मासक रौदमे!

छागदान
ठीक सोझाँमे भगवतीक
होइत अछि छागदान,
पूर भेल अछि
मनकामना कोनो भक्तक।

आखिर की होइ छै एहेन
छागरक शोणितमे
जाहिसँ तृप्त
होइ छथि भगवती
रहै छथि सहाय
सदति अपन भक्त पर?

ठीक सोझाँमे ठाढ़ भगवतीक
डुकरैत अछि प्राण:
की अछि हमर शोणितमे,
की हमर प्लाज्मामे?

यदि बात ई धँसि जानि
हमर बान्धवक मोनमे,
जे हमर शोणितसँ
कतोक बेसी तृप्त
हेतीह भगवती,
पूर करथिन
कुल्लम मनोकामना हुनक:
यदि बात ई किनसाइत
ध’ लैन हमर हीत-मीतक मोनकें!
किऐ एना सोचना जाइत अछि
आइ-काल्हि
रहरहाँ
अपन कि आन लोकक बीचमे?

एना त नहि जे
हमर अहाँक तानल मुट्ठी
महकारिक फ’र
कोना भ’ गेल:
सोचने त’ रही
जे सिनुरिया लिच्चीक
घौरछा सभ
बहराएत एहिमे सँ
अमारक अमार!
हमरा अहाँक बीच
अनगिनित मोनि
कोना फुटि गेल,
जाहिमे सोनित
अपने लोकक
चकभाउर दैत
रहैत अछि:
सोचने त’ रही
जे लाल टुहटुह चंगेरा
हरिनकेर धानसँ उमटाम
साजल रहत
दीया-बातीक दीपक
पाँत जकाँ
निरसल लोक सभक लेल!
हमर अहाँक
हृदय आ माथ
अपन अपन तानल मुट्ठीमे
सुन्न कोना
भ’ गेल:
सोचने त’ रही
जे एहिमे सँ
बहराएत गनगन करैत
खनहन भोर
अभिनव वसन्तक!

खाहे कतबो अनूप होथि सुर्ज आनक,
आखिर कतेक दूर धरि
काजक हेताह ओ
हमरा सभक लेल:
एना त’ नहि जे
अपन माटि-पानि
अपन सुधि-बुधिसँ
अपन सुर्ज रचबाक
कनियों चेत नहि भेल,
कहियो चेत नहि भेल।

अनेरे

कोनो सभ किछु
अनेरे
अबूह
भ’ जाइत अछि!
माघक झपसी
मे लाधल टिपटिपक बीच,
पछबाक हेमाल हलफी
रोम-रोम होइत
बहैत रहैत अछि
जेना कोनो उजड़ल एकचारी होइत,
आ कोना साँस लेब
पर्यन्त
अबूह भ’
जाइत अछि:
आत्मा कोना
जलफाँफी
भ’ जाइत अछि-
दीन
आ अर्थसँ
विहीन!

आकाश
मुदा साफ होइत अछि,
सुर्जक धाहीसँ
पतनुकान
लैत अछि हलफी,
आ गुलाबी ऊनक पोला जकाँ
भ’ जाइत अछि दिन!
बेर चढ़ला पर
नहुएँ बहैत बसात
उघारि क’
छितरा दैत अछि
एहि पोलाकें,
जाहिमे मिझरा क’
गुड्डी जकाँ
पताए लगैत अछि
मोन-प्रान
गाछ-बिरिछक फुनगी
चिड़इ चुनमुनीक संग

तैयार भ’ क’
जे बहराइ छी
काज पर जएबा लेल,
त’ एकटा सुसुम पुलक
अनेेरे
प्रानमे
उमक’ लगैत अछि
आत्मा
गुलाबी हवा-मिठाइक
मर्तबान
भ’ जाइत अछि,
जाहिमे सँ
एकेक साँसक संग
मिठौंस निसाँस
रोम-रोम होइत
निकस’ लगैत अछि...
आ कोना-कोना!
सभ किछु अनेरे
सहल भ’ जाइत अछि
जिनगी दहिना हाथक खेल
भ’ जाइत अछि
आत्मा जीवनसँ गाढ़
अर्थसँ
नेहाल भ’ जाइत अछि!



अग्निपुष्प
इजोतक लेल
अन्हार गुज्ज गाम दिस
आस्ते-आस्ते
बढ़ल आबि रहल अछि
कोनो हमर संगी
इजोतक लेल
लतरल जाइत हो जेना
कजरी लागल देबाल पर
कोनो मुक्तिकामी अपराजिता
फूलक लत्ती।

गाम जत’ अनघोल होइ
जत’ रीलीफक रोटी
फाँसीक फन्ना सन बुझाएल होइ
सामन्त, मुखिया आ पुलिसक
एकटा छुट्टा गोल होइ
गाम अनघोल होइ
अन्हार घरक डिबियाक

ममरी लागल बत्तीकें
कने आर उसका देलकै’ए
हमर संगी -- इजोतक लेल
हमर घरक इजोत पसरि गेलै’ए
सौंसे गाममे।

गाम जत’ युवककें
पकड़ि लेलकै’ए कोतबाल
देबाल पर नारा लिखबाक अपराधमे
आ अपराधी बसल हो
पुलिस-कैम्पक देखभालमे
गाम जत’ आब सिंगरहारक
फूल नइं झड़ैत होइ
सब टोल बबूरबोनी बुझाइत होइ
कतौ बाढ़ि होइ
कतौ दरारि होइ।
बाबू साहेबक डरें आब
लोक गाम छोड़ि नइं पड़ाइए
अन्हारोमे एक-दोसराक
बाँहि पकड़ि आगू बढ़ि जाइए
एक गामसँ दोसर गाम धरि
बढ़ि जाइए हमर संगी
इजोतक लेल
हमर संगी जे हमर विचार अछि
हमर संघर्ष अछि
अन्हार गुज्ज गाम दिस।

भोर
बाजल कौआ भेल सिनुरिया भोर
सिंगरहारक सुगन्धिसँ माँतल कन कन ओस
गाम जागल
मजूर-किसान जागल
भागल अन्हरिया आ कुहेस
किला जकाँ ठाढ़ छै पुलिस
गामक चारू ओर।

उड़ल चिड़इ चोंच भरि दाना लेल
खेतहिमे सुखाएल कुसियार दिस
आँखिमे फाटल धरती
भूखें कनैत बच्चाक नोर।
कोठी भरल
उमरल छल दलान
मालिकक आँगनमे
आइ नाचत
सोलहो कलासँ इन्द्रधनुषी भोर
केहन ई भोर
गुड्डी जकाँ कतबो ओ
उड़ए आकाश
हमरे सक्कत हाथमे छै अनन्त डोर
उमड़ल बलान सन
बढ़ल जा रहल’ए लोक
अही माटि पर खसल छल
घाम हमर इनहोर।
अपन साम्राज्य बढ़ेबाक
चारू कात छै होड़़
हमरे सोणितसँ सुग्गा सन छै
रूसी आ अमरीकी शासकक ठोर
हमरे गाम सन छै एल-साल्वाडोर

की चुनू
रातुक शृंगार चुनू
आ कि भोरक सिंगरहार
आकाशमे छिड़िआएल तरेगन
चुनू आ कि टूटल सितार

ऊँच गाछ तारक चुनू
आ कि काँट लुबधल खजूर
कुसियारक काँप चुनू
आ कि सघन बोन बबूर
खढ़-पतवार चुनू आ कि
तिजोरीक खूजल ताला
सगरो घोटाला चुनू
आ कि षड्यन्त्राक हवाला

स्वप्नमे फुलाएल
पारिजात चुनू आ कि
धूरामे लेढ़ाएल निर्माल
उफनैत नदीक कछेर चुनू
आ कि टूटल नाहमे मझधार
फेर अपन अलच्छ हाथ चुनू
आ कि हथलग्गू हथियार

सदानीराक स्नेह
एतेक गँहीर आ विशाल
समुद्रक पानि
आखिर खाड़ किऐक होइ छै
हमर श्रम आ संघर्ष
अहाँक अस्तित्व लेल
आखिर नारा किऐक होइ छै

डेग-डेग पर उखडै़त
हमर साँस आ पिसाइत हड्डी
एहि महानगरक सम्पदा नहि
आखिर चारा किऐक होइ छै

एहि ठाम एक टा लेल रातुक चकाचैंध
हमरा लेल कनाॅट प्लेसक भुलभुलैया
आ दिनमे तारा किऐक होइ छै

सरनरियाक एहि शहरमे
एकटा निरापद ऊँच फुनगी
ताकब कतेक मुश्किल अछि
सदानीराक स्नेह पाएब
कतेक मुश्किल अछि
निर्गन्ध यमुनाक कछेरमे
बसल एहि महानगरमे

दादागिरी
अपन धरती पर
अपने फसिल हम
आइ काटल अछि
अहाँ अनेरे तमतमाएल छी
हम एकरा खातिर
दिन-राति बितौने छी
चान नहि रुकै छै
आकाशमे
लहरि नहि रुकै छै
समुद्रमे
नव पल्लव होएब
नहि रुकै छै
कोनो गाछ पर
कोनो प्रतिबन्धसँ

बारुदक ढेर पर बैसि क’
शान्तिक लेल अहाँक
ई केहन दादागिरी अछि
ई केहन साझी बिरादरी अछि

स्नेहक समस्त सुर
अहाँक नाम नागफनीक
दुर्लभ फूल
अहाँक एकान्त प्रतीक्षामे
हम बिनु बसातक धूल
अहाँक नाम सांगह बिनु
लतरैत अपराजिताक लता
हम बरिसातोमे अतृप्त
झोझरिक पात

अहाँक नाम निर्जन वनमे
अविरल बहैत अमृत धार
आतुर आकांक्षाक संग
कछेरमे हम ठाढ़
अहाँक नाम मन्दिरमे
आराध्य भव्य मूर्ति
हम कोनो कातमे फेकल निर्माल
अहाँक नाम उगैत सूर्यक
विस्तृत लाल क्षितिज
हम चहुँ दिस पसरल
अन्हार गुज्ज अन्हरिया
अहाँक नाम स्नेहक समस्त सुर
चारू पहरक समस्त राग
अहाँक नाम साधल
वीणाक तार
हम असमय हहाइत
बाँसक बेसुरा स्वर
ज्ञात-अज्ञात गन्ध
हम इन्द्रधनुष सन
सतत बदलैत अपन रंग
अहाँक नाम शाश्वत
चतरल वटवृक्ष
हम जेना नदी छोड़ि
देने हो अपन मूल कूल

अशोक

मोछ
काल्हि हमर डेरा पर
आबि ओ
अपन नवका विदेशी
पिस्तौल देखा गेलाह।
गना गेलाह एक-एक क’
ओकर विशेषता
मारक क्षमता।
छोट-छीन टुनमुनियाँ
कारी चमकैत पिस्तौल
देखबामे लगैत छल
हिलसगर।
ओ गद्गद् भ’
सुनबैत रहलाह
पिस्तौल प्राप्तिक खिस्सा।
मैथिलक बदलैत
प्रकृति, आवश्यकता--
आ, विकासक संगक
अस्त्राक अनिवार्यता पर
दैत रहलाह भाषण।
--ई व्यक्ति जे काल्हि
हमरा पिस्तौल देखा गेलाह
कहियो क’ अबैत
रहै छथि।
आ’ अयाची मिसरक विरुद्ध
तर्क करैत
कहियो क’ अपन गाछक
एक झोरा लताम
अपन बाड़ीक एक हत्था केरा
अपन पोखरिक
एक फड़ी माछ
हमरा लेल अनैत रहै छथि।
किछु कहला पर
लगै छथि देब’ उपदेश,
बड़का भैया संग
स्कूलमे छलाह पढ़ने
तैं अपने मोने हमरा
अपन अनुज मानै छथि।
अपने मोने सुनबैत
रहै छथि
के, कोना कमाइ’ए तकर गप्प!
आ’ अग्रज तुल्य
अधिकारक संग
खराब होइत दुनियाँ
दिल्लीसँ पटना धरिक
चलैत व्यापार
दुख कटैत परिवार आ
सामाजिक सरोकारक
उदाहरण द’
किछु-किछु चलब’ लेल
उकसबैत रहै छथि।
अपने मोछ नहि
रखने छथि
तैं हमर मोछक
रहै छनि बड़ चिन्ता।
ओना त’ कहैत रहै छथि
जे कटा लिअ’ मोछ,
अनेरे किऐ छी रखने,
पैघ लोक कतहु मोछ राखए?
देखा दिअ’ कोनो पैघ लोककंे
जे मोछ रखने हो।
ओ जमाना चल गेलै
जहिया मोछ पुरुषत्वक
चेन्ह रहए,
आब त’ पुरुषत्वे
पैघ लोक हेबाक
मार्गमे अछि
बड़का बाधक।
तैं कहैत रहै छथि
हमरा अनुज बुझनिहार,
पैघ लोक हेबाक अछि त’
मोछ कटा लिअ’
अथवा एना क’ काज
करू, कमाउ
जे मोछमे नहि लागए।

दाँत
कहने रहै माँकें
दुरागमन काल
हमर नानी
मुँहमे रखने रहिहें पानि
सासुरमे।
हमर माँ ई बात
कहियो नइं बिसरल।
ककरो, कतबो गन्जन पर
कोंचला पर, टोकला पर
मान आ अपमान पर
उपेक्षा आ अपेक्षा पर
नैहरोक खिधांश पर
मुँह सँ नहि टघरलै पानि
रखनहि रहल मुँहमे पानि।

कहलक हमरो
दुरागमन काल
हमर माँ
मुँहमे रखने रहिहें पानि
सासुरमे।
हमरो ई बात,
बिसरल नहि होइ’ए।
पानि रखलासँ
मँुह त’ दूरि नहि होइये,
मुदा दाँत--
कमजोर भेल जाइ’ए।
हम दन्तहीन नहि
हुअ’ चाहै छी
माँ जकाँ।
ठीक छै जे--
हमर माँ
दाँतक उपयोग नहि केलक
अथवा हमर माँक
दाँतक उपयोग नहि भ’ सकलै।
मुदा हमहूँ उपयोग
नहि करब
अथवा हमरा दाँतक उपयोग
नहि हैत से--
कोना कहि सकै छी।

बुधियार
रहरहाँक रस्ता छोड़ि
दोगे-दोग निकसैत
बनल-विराट
नट-सम्राट
तों बड़ बुधियार छह कक्का!
लेबल-मुनल घरमे रहनिहार
नाककें तौनीसँ झाँपि क’
चलनिहार
हरेक सुन्दर मुँह पर
आँखि गड़ौनिहार
धतपत्-धतपत्
हरिओम तत्सत्
तों बड़ बुधियार छह कक्का!
बिजुरी सन छिटकि क’
अनकर आँगनकें उघार करैत
ब’ड़ आ पीपर सन
घरे-घर दरारि तकैत
चाहक चुस्की
चैअनियाँ मुसकी
तों बड़ बुधियार छह कक्का!
शुभ-लाभ हेरैत
वंशी टेरैत
विवशताक बोर द’
तरेरा छिपैत
बिलगबैत
पनिअबैत
तों बड़ बुधियार छह कक्का!
कक्का हौ,
बूड़ि तोहर भातिज सभ
सिक्का चढ़ौने तोरा
बापक भाइ मानै छह
बपहारि काटै छह
दुख स्रष्टा
चिर विपटा
तोँ बड़ बुधियार छह कक्का!

ई के सोर करै’ए?
ई कोन बाघ
घात लगौने
पैर मारने
आबि रहल’ए
सहटल-सहटल
ई कोन मृगशावक
निश्चिन्त, मचैने अछि
उछल-कूद?
ई कोन नदी
बहि रहल’ए
शान्त, मन्थर
अविराम!
ई कोन गाछ
फुला रहल’ए?
ई के अपन टाँग
झुला रहलए?
अकस्मात ई के सोर करै’ए?
भीतरसँ बाहर
अएबाक लेल
ई के
जोर करै’ए?
ई के सोर करै’ए?

फेरसँ
फेरसँ हमर
छोटका बेटा
भ’ गेल अछि
दुखीत।
फेर कारी मेघ
कर’ लागल अछि
टण्डैली।
अवारा, लुच्चा
कारी मेघकें देखि
हम दूनू परानी
फेरसँ डेराए लागल छी
फेरसँ हमर
दुखीत बेटाक
गाल पर
पसरि गेल’ए
आँखिक काजर
फेरसँ हम
लिख’ लागल छी
एक नब कविता


शिवशंकर श्रीनिवास

लाठी
कतेको दिनसँ
ताकि रहल छी
लोक कहै’ए--
नहि भेटत
आब नहि भेटत
की पहिने भेटै छलै?
तखने तँ हमरा मोनमे
जागल इच्छा
आ हम ओकरा अपन वेगरता बूझि--
ताकि रहल छी
एक टा सहारा
एक टा सुरेगबर लाठी
कने उठि क’ ठाढ़ होएबाक लेल
कने पैर रोपबा लेल।
लोक पुछला पर हँस’ लगै’ए
जेना हम पुरान जमानाक लोक होइ
तेना देखि, किछु टोन’ लगै’ए।
तकै छी भरोससँ मित्रा सभ दिश,
हम एते कमजोर
किऐ भेलहँु जे लाठीक काज भ’ गेल
तै लेल देब’ लगै छथि हुतबाहि हमर मित्रा बन्धु।
हम हताश होइ छी
ओ अपनाकें अ’ढ़ क’ लै छथि।
हम बढ़ै छी
ठाढ़ होइ छथि साहु जीक दोकानक आगू
ओ हमर गप्प पर हँसैत कहै छथि--
लाठीसँ त’ महींस हाँकल जाइ छै
वा, ‘रैली’ मनाओल जाइ छै
अहाँकें मोंछ नहि अछि
तैयो लाठीसँ अपन मोछ देखाओल
जाइ छै।--साहु जी माने महाजन
अपन अनुभवसँ हमरा चेतबैत ज्ञान दै छथि
हम अर्थक बुत्ता पर ठाढ़ भ’ सकै छी
ओ बुत्ता अछि त’ एक टा नहि
हजार टा लाठी सुरक्षामे आगू-आगू नचैत चलत
हवाबाजी, विज्ञापन आ कलाबाजीसँ
मिथ्याके सत्यक कैप्सूल बना बेचि सकै छी
फेर लाठीकें तकबाक कोन प्रयोजन?
लाठी हमरा तकैत रहत।
आ, फेर हम जखन लाठीकंे तकैत
पाछू बढ़ै छी गामक सीमानसँ कने आगू--
तकै छी वाँस-काठ दिश,
गाछ-वृक्ष दिश
त’ लगै’ए जे ओ सभ हमरा
देखि हँसै’ए।
ओ सभ जेना हँसैत कहै’ए
जे आब लाठी ओकरा सभ’सँ
नहि बनै छै।
हँ, आब लाठी ओकर राजनीतिसँ
बनि सकै छै
ओ सभ सुखा रहल’ए।
ओ सभ कटा रहल’ए।
तकरा हम राजनीति बना सकै छी
तखन अपने किऐ?
बहुतोकंे टिका सकै छी।
एहिना हम चारू कात तकै छी
हमरा लगैत अछि
एहिना जँ हम, लाठी तकैत रहब
त’ हमरामे सँ जीवन बहार भ’ जाएत
आ, हम बनि जाएब
ककरो हाथक मात्रा एक टा लाठी


बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए
जेना पीठिया घा बहि गेल होइ
तहिना भ’ रहलै’ए उग्रास
बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए।
गायक सद्यः प्रसूत टुन्ना जकाँ
टाँग सोझ करबाक
घटन्ती बोध क’
मोन कुदकि रहलै’ए।
बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए।

उछाल भेल गोसाँइ पोखरिमे
पसरल पुरैनिक पात पर
वर्षाक बुन्द जकाँ
चारू कात सम्वाद छिहलि रहलै’ए
बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए।

पसरि रहलै’ए ई समाचार
ई समाचार पूरा गाममे
फहरा रहलै’ए
देखि रहल’ए भरि गाम
सुनि रहल’ए भरि गाम
जेना कारगिलमे
भारतीय सेना जीति रहलै’ए।
जेना भारतीय सेनाकें
शत्राुक शिविर पर कब्जा भ’ रहलै’ए
बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए

मिथिलाक गामक रेडियो
एखन इएह टा बाजि रहलै’ए
बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए।

कनेक काल लेल
बाढ़ि आएल छै
डूबि गेलै खेत-पथार
आँगन भेल पोखरि
हुुहुआ रहलीहे
घरमे कमलादेवी।
दिन
राकस बुझाइ’ए
रातिमे
जेना हुराड़ पैसि गेल होअए
सुरसाक मुँह भेल अछि
एक-एक घड़ी
एहि साँझमे
आइ-माइ लोकनि
देखा रहलीहे दीप
गाबि रहलीहे साँझ--
‘जय हे कमला मैया
भगवती तोहर हम आरती उतारी....।’
बलचनमा कहै’ए
डेराएल छथि दाइ-माइ लोकनि
तँ क’ रहलीहे आरती
मुदा पण्डित विसेसर मिसर कहै छथि
ई थिक एहि माटिक संस्कृति
डाकिनी रहथु वा देवी
घर औती त’ स्वागत हेबे करतनि...।
...ऊँचका महार पर
छप्पर-छप्पर पानिमे रेेंकैत
उमकैत किलकिला रहल’ए बाल-गोपाल
एक दोसरा पर माटि फेकि रहल’ए
एक दोसरा पर पानि फेकि रहल’ए
आ, सभ एक्के बेर
ततेक जोरसँ मारै’ए किलकारी
जे, पानिक हुहुआएब त’र पड़ि जाइ छै
कने कालक लेल।
बाढ़ि आएल छै।

रामधन राम चैठी पासवान
ओहि कोनमे बिलाड़ि
एकदमसँ दम सधने अछि
चुप्प अछि
किन्तु, ओकरा चुप्प कहबै?
ओ अपन मूसकें देख’ैए
ओ अपन चुप्पी सँ ओकरा ठक’ चाहै’ए
ओकर शिकार कर’ चाहै’ए
अप्पन दूरा पर सोचैत अछि
रामधन राम चैठी पासवान।

जे बोल सभ दिन जुत्ता-लाठी चलौलक
ओहि बोल सँ चुबैत अछि जिलेबीक रस
रामधन रसकें टपकैत देखैत अछि
ओहि रसक भीतर दानासँ लदल
देखैत अछि चिड़ैक लेल फन्ना
रामधन चैंकेैत अछि
रामधन रस्ता चलैत अछि।

रामधनकें मोन पड़ै छै मायामे घेरलि जमुना
पराशरक मोहनी बोल, इजोरियाक भ्रम
सुरक्षाक नाम पर कुहेसक देवाल
आ फलमे फल गुल्लरिक फल
वेद भगवान, बासन भगवान।

आइ, ओ सभ अथ इतिकें मोन पाडै़त
इतिहासकें चैबटिया पर ठाढ़ करैत अछि
चारू पौआकेें छोड़बैत
वर्तमान गढै़त, सोचैत
आगू बढै़’ए रामधन राम चैठी पासवान।

रामधन मौसम पढै़’ए
मधुमे मिलाएल बिक्खक रंग चिन्है’ए
(किऐ ने चीन्हत? भरि जन्म त’ बिक्खे पीबैत आएल’ए)
आ बुझै’ए जखन मधु पीबि ने मरत, ने रुकत
तखन एक बेर चैपायाक मगजसँ फूटत
भयंकर नाश फटक्का
ओ बीचो-बीच फुटै छै
ओकरा सभटा गमल छै
एखन बहुत चीज तोडै़’ए, बहुत चीज फुटै’ए
कैक ठाम भ’ जाइ छै खत्ता
कैक ठाम फुटि जाइ छै मोनि
कैक ठाम भ’ जाइ छै ढिमका
रचनाक प्रक्रिया देखार भ’ रहलै’ए
शिशु जन्म ल’ रहलै’ए
ओ कहाँ रुकै’ए?
ओ आगू बढै’ए।
रस्ता चलै’ए रामधन राम चैठी पासवान।


अहाँक नहि आएब
जखन हम फँसल रही
खसल रही, रही घायल
पीड़ाकें थोड़ करबाक प्रयासमे
लागल रही
तखन हम अहाँक प्रतीक्षा करैत रही।

मानल हमर दैहिक पीड़ा
मात्रा हमर छल
मुदा, हम त’ अहाँक रही?
हम नहि जनैत रही
ओहि समयमे अहाँ कत’ छलहुँ।
हम त’ दर्दक भीतर बन्द भ’ गेल रही
बाहर कत्तौ ने देखी
हम सीमित भ’ गेल रही
हम अहाँक प्रतीक्षा करैत रही।

नीक कएल अहाँ नहि अएलहुँ।
अहाँक अनुपस्थिति हमरा अपना दिश तकौलक।
हम त’ अहाँक संग-सुखसँ
अपन पीड़ाकें तोप’ चाहैत रही।
अहाँकें अपनामे लेपटा क’
पीड़ित जीवनकें बिसर’ चाहैत रही
सत्ते, कते हम संकीर्ण भ’ गेल रही।

हम बहुत कमजोर वा हताश भ’ गेल रही
हम अहाँमे अपनाकेें आरोपित क’
अपन खाधिकें भर’ चाहैत रही
ठीके, कोनो स्थितिमे हारल रही।
से केओ कहि सकै अछि
अहूँ, कहि सकै छी, हमहूँ कहै छी।

मुदा, नीक केलहुँ अहाँ नहि अएलहुँ
अहाँक नहि आएब
हमरा अपना पर काबू करौलक।
नीक कएलहुँ अहाँ नहि अएलहुँ
अहाँक नहि आएब हमरा हारबसँ बचैलक
पीड़ासँ बहरेबाक अवगति सिखौलक
नीक कएलहुँ अहाँ नहि अएलहुँ।





तारानन्द वियोगी

मीता, अहाँक हँसी
जिनगी
बहुत अदगोइ-बदगोइ भेल जाइत अछि।
साँझकें डुबैत जे अछि सुरुज
उगैत नहि अछि भोरकें नित्तह
रातुक कालिमा किछु आर घटाटोप भेल जाइछ।
सुनू मीता!
एहिना खिलखिलाइत रहियौ
एहिना खण्ड-खण्ड बाँटू कालक शाश्वतता
सुनू मीता!
अहाँक हँसी अन्हारक एक-एक कपाट
तोड़ि खबसैत अछि।
अहाँक हँसीक इजोतमे
बहुत साफ देखाइत अछि--
एक-एक टा बाट। लक्ष्य-बिन्दु।

किन्नहु कठिन नहि अछि जीवन
जँ एहिमे अहाँक हँसी हो
अहाँक उपस्थिति हो आलोकमय
सुनू मीता!
किन्नहु अन्हार नहि रहत राति
जँ हाथमे मशाल हो
किन्नहु भयप्रद होयत नहि नदी
जँ मजगूत नाह हो संग।

बहुत तँ प्रयास केलक अछि अन्हार
बहुत-बहुत बेर तँ आक्रमण केलक अछि
जानि नहि कतोक बेर
त्राहि-त्राहि मचा देलक अछि अन्हार
मुदा तैयो
कहाँ उकन्नन क’ सकल प्रकाशक वंश?
सुनू मीता!
एहि सुरक्षित प्रकाश-वंशक
सम्बल थिक अहाँक हँसी
सुनू मीता!
एहिना खिलखिलाइत रहियौ
एहिना खण्ड-खण्ड बाँटू कालक शाश्वतता।
सुनू मीता!
अहाँक हँसी अन्हारक एक-एक कपाट
तोड़ि खसबैत अछि
अहाँक हँसीक इजोतमे
बहुत साफ देखाइत अछि
एक-एक टा बाट
लक्ष्य-बिन्दु।

पितामहसँ
हे, हम अपन श्रमहि
सन्तुष्ट छी पितामह!
कनियों नहि भरमबैत अछि हमरा
उपलब्धिक मोह
पुरस्कारक आसक्ति
छूबि नहि पबैछ चेतनाकें।

अपन रक्तक एक-एक बुन्नसँ
गोहरबैत छी --
स्वतन्त्राता! स्वतन्त्राता!!
श्वासक एक-एक धुन
हमर कत्र्तव्यकें मोन पाडै़त अछि।

ई अहाँ की कहैत छी पितामह!
नहि नहि
कहियो नहि हम त्यागब अपन ज्वलन्त विचार
कहियो नहि लगतै कजरी विवेक पर!

मूल्यांकन तँ हम अवश्श करै छी अपन कर्मक
मुदा, एकर असली निर्णायक होएत -- समय
समय -- जे एखन नहि आएल अछि!

अहाँ विश्वास राखू पितामह !
अपन उपलब्धिसँ परितृप्त होएबाक अवकाश
नहि अछि हमरा
हम अपन श्रमहिसँ सन्तुष्ट छी पितामह !

बागडोरामे भिनुसरबा
तोहर बनाओल चाह
अक्कत लगैत अछि हौ बाउ होरीपोदो राय,
टूटल नहि अछि एखन धरि निशाँ
झम्फ एखनो बाँकी अछि, लगैत अछि--
वातावरणेमे बेसी नमी अछि अथवा हमरहिमे
ग्रहण-शक्तिक कमी अछि।

तोहूँ बरु बलेलक बलेले रहि गेलें प्रदीप
ने जानि कते बेर अएलें-गेलें अइ इलाका
मुदा अनभुआरे रहि गेलौ मौसमक मिजाज --
अन्हरियासँ जे बनै छै बिम्ब सभ रौ बच्चा
से सभटा मृत्युएक प्रतीक नहि होइछ।

अमलतासक नबका सुपुष्ट पात सभ पर
झूला झूलए लागल अछि बसात,
नीमक गाछ पर चुनमुनीक बसेरा अकुलाए लागल अछि।
ओहि फुदकी चिडै़याकें देखही
कोना अतत्तह क’ रहल अछि!
दौड़ि एत्तय भागि ओत्तए
हमरा तँ लगै’ए एक तोड़
आह्लादें जान बहरा जएतैक एहि बतहियाक!

हँ कौआ नहि बाजल अछि एखन धरि!
मुदा कौआ करए उद्घोषणा, तखनहि मानी भोर--
एहि कुबोधसँ जनमैए
क्रान्तिमे चिल्होर!

देख-देख प्रदीप तोहूँ देख
प’ह फटबाक संकेत द’ रहल अछि क्षितिज-सीमान्त,
आब लाइन होटलक एहि खाट परसँ, उठ प्रदीप
फड़िच्छ होब’ लागल अछि, देख
चल आब हम सभ चली
नक्सलबाड़ी थोड़बे दूर बचल छौ आब!

बाबा
अहाँ तँ आब बूढ़ भेलहुँ बाबा!
अपन एहि दाँत सभसँ
रोटी चिबा होइए?

रातिकें सुझै’ए बाबा?

बाबा, बिना चश्माक तँ नहि देखि पबैत हेबै
अपन पौत्रा सभक मुँह?

रातिकें भरि पोख निन्न होइए?
पाचन-शक्ति तँ ठीक नहिएँ रहैत हएत?
दुखाइत रहैत हएत हड्डीक पोर-पोर,
कोस भरि पैदल चलबाक साहस तँ
नहिएँ जुटा पबैत हेबै की ने?
की करबै बाबा!
अहाँक तँ आब उमेर भेल
जुग बीतल

की करबै!

मुदा, धन्न छी अहूँ बाबा!
एत्ते संघर्ष!
एत्ते प्रतिकार!!
एहन प्रतिहिंसा!
एत्ते धधरा!!

ओह!
अहीं ठीक कहै छी बाबा
अन्यायक विरुद्ध लड़बाक उमेर
कहियो नहि बीतै छै


प्रभु राग
एहने-एहने चिन्ता दिअ’ प्रभु हमरा
एहने-एहने फिरिशानी।
थोड़े आर दुख दिअ’ हमरा प्रभु
थोड़े आर तकलीफ।
एहने-एहने यन्त्राणा दिअ’ प्रभु हमरा
एहने-एहने सन्त्रास
एहने-एहने पीड़ा एहने-एहने क्लेश

विह्नलता दिअ’ तँ एहने-एहने प्रभु
एहिना मारैत रहू डाँग

आर तँ अहाँ द’ की सकब एहि मूत्र्तिभंजक-आकारकें
देने चलू देने चलू अनन्त जनमक वनवास

मुदा, स्मरण राखब हमर प्रभु!
हमर बाट एतहिसँ निकसत।
एतहिसँ प्रारम्भ हएत विजय-यात्रा
एहि दुनियाँसँ नीक दुनिया बनेबाक संकल्प
एहि ठाम जन्म लेत। जनमताह विश्वामित्रा।

अहाँ चाही तँ
हमरा थोड़े आर दुख दिअ’ प्रभु
थोड़े आर यन्त्राणा।

संलग्न
परदेशमे छी निपट एकसरुआ। ने माइ ने बाप। सखा-
सन्तान नहि। ने गाम ने समाज। हर्ख भेल तँ बरु नाचि
सकै छी सड़को पर मुदा दुख भेल तँ कान’ पड़त
भीतरे-भीतर। मर’ जँ चाहथि मियाँ एत्त’ तँ अपनहि
सँ खूनि लेब’ पड़तनि अपन कब्बर। ओफ् ... ई
परदेश थिक की काल-कोठली?

मुदा पड़ि जखन गेल छी बेराम
माथ पर हाथ राखि आशीष देब’ एलीह माइ
सिरमा दिस ठाढ़ भ’ पिता समझा रहल छथि
सदति स्वस्थ रहबाक भाँज। पत्नी बेर-बेर ठानि
रहल छथि जिद्द कि हम सौंसे गिलास दूध पीबि ली।
नहुँए-नहुँए बुधियार होइत बेटा हमरा ललाट
कें हाथसँ छूबि करैए प्रश्न-- बाबूजी, कोसीक पानि
तँ कहियो बेराम नहि पडै़ छै कि ने?

गामसँ हज्जार कोस दूर एहि अपरिचित शहरमे --
दुमहला-चैमहलाक एहि जंगलमे --
बेराम जखन पड़ै छी हम, ततेक लोेक अबै’ए जिज्ञासामे
अकच्छ रहै छी हम। जते तरहक लोक, तते तरहक
उपचार। मना कका पीसि अनै छथि बरियारक सीड़।
सरजुग कका वैद्य बजौने अबै छथि। नबकी काकी बना
लबै छथि काढ़ा। रघुनाथ भैया भगवती थानक भभूत
नेने जुटै छथि। साइकिल सम्हारने मुँहथरि पर ठाढ़
देखाइत अछि भगवानजी। वाह जी वाह, अजगुत
फजगज अछि सौंसे कोठलीमे।

आ, निपट एकसरुआ एहि काल-कोठलीमे किऐ
हमरा एक्को बेर लागत कि हम बेराम छी।

अद्वैत
स्वपाकी छी तें करै’ए पड़त भानस, माँजै’ए पड़त बासन अहल भोरे
से मुदा एखन एहि सोहारी बेलैत काल
अचानक हम अतिशय-अनन्त ममत्वपूर्ण भ’ गेल छी।

नहुएँ-नहुएँ बहुत आस्तेसँ
सानल आटाक लोइया पर चलबै छी बेलना
बहुत ममता अछि हमरा हाथमे। लगै’ए जेना
अपन नान्हि-सन बेटाक कपोल सहलाबैत होइ
अत्यन्त प्रिय पोथीक कोनो प्रियतर पृष्ठ सहेजैत होइ जेना।
आस्तेसँ चलबै छी बेलना, जेना सोहारीक चाम
छिला जएबाक आशंका हो। किऐ अछि हमरा हाथमे एते ममता?

वैदिक ऋषि होइतहुँ कोनो... नहि विश्वामित्रा तँं गृत्समद
तँ मन्त्रा उचारितहुँ--
अन्न! हमरा बुभुक्षा-द्वार द’ क’ पैसि क’ जाउ हमरा
रक्तमे। परिनिष्ठित करू संस्कार। अमोघ आतुरता
दिअ’ हमरा; अजस्त्रा सन्ताप। मुदा अन्न, मजगूत करू
हमर मोन कि ई फूल, ई वनस्पति, बह्म-तन्त्राी केर ई
अनुराग-तन्त्रा हमरासँ होअए विभूति-सम्पन्न!
अन्न! बुभुक्षा-मार्ग द’ क’ पैसू भीतर आ परिनिष्ठित
करू संस्कार!

वैदिक ऋषि तँ नहि छी हम मुदा, हमरो हाथमे भरल
अछि अमोघ-अजस्त्रा ममता। हमर कायामे अजगुत-अजगुत
बिम्ब-स्फोट। हमरो आत्मा झुलैए झूला चोंचाक खोतामे
ताड़क गाछ पर लटकल अण्डाक संग हौले-हौले! यद्यपि
कि वैदिक ऋषि किन्नहु छी नहि हम।
स्टोव पर चढ़ाओल तवा तपि गेल अछि मुदा हमरा लेल
धनि-सन। सिनेहसँ थपथपाओल कोमल कपोलबला
ई सोहारी चढ़ा नहि पाबि रहल छी तवा पर। केहन
भयाओन अछि ई भावुकता! एकरे कहै छै माया?
ई अग्नि आ ई अन्न जँ करत नहि संयोग
कतए सँ आनि पाओत परिनिष्ठित संस्कार?
वैदिक ऋषि जें कि छी नहि हम असलमे
हमर ममता बेर-बेर बनि जाइए माया।
वैदिक ऋषि जें कि हम भेलहुँ नहि,
कोना भ’ पाएब कवि?

मिथिलाक लेल एक शोक-गीत
हमरे चेतनाक दोमटसँ जनमल छल
ई छाँहदार वृक्ष सभ
जकर एक-एक डारि पात काटि-काटि
हम अपना पशु-वर्गकें खुआएल अछि।
राजा शिवसिंहक पगड़ीकें हम
लंुंगी बना क’ पहिरल अछि अपन एकान्तमे।
अपन एकान्तमे हम
कहियो नहि सुन’ चाहलहुँ अछि अपने आवाज।
मिथिला बिराजै तँ छली हमरा तन-मनमे सम्पृक्त
मुदा व्यसनी हम तेहन
जे अपने तन-मन खखोड़ि-खखोड़ि
समिधा जकाँ झोकलहुँ अछि
बेहोशीक कुण्डमे।
सौंसे पृथ्वी, सम्पूर्ण देश, समस्त समाज
हमर बेहोशीक केलक अछि अभ्यर्थना
मुदा विडम्बना एहि समयक!
लटुआएल झूर-झमान मिथिला
हमरे आत्मामे थरथराइत रहल छथि
पीपरक पात जकाँ पूरे समय।

एहि भूमण्डलीकृत समयमे
सभ क्यो क’ रहल अछि
हमर बेहोशीक अभ्यर्थना
जखन कि देखू
अपने दुनू पैरक
सिन्दूरकाभिषिक्त अरिपन बना क’
टाँगि जँ लितहुँ कोठलीमे चैबगली,
सेहो बनि सकै छल
हमर जागरणक कारण।

बुद्धक दुख
पैंतीस बरस पर घुरलाह अछि बुद्ध
रहलाह एहि बीच पटना संग्रहालयक कारागारमे।

पैंतीस बरस पहिने मनुआँ धारमे बासा छलनि
आब बसै छथि कारू संग्रहालयक धमनभट्ठीमे
देह लगा क’ टाँगल छनि साइनबोर्ड
जे ओ मनुआँ धारसँ बरामद भेलाह।

संस्कृति, जाहिमे झुमका बरामद होइत हो दुमकामे
आ कनबाली काशीमे,
बुद्ध बरामद होथि मनुआँ धारमे, कोन आश्चर्य?

तरह-तरहें लोक व्यक्त क’ जाइए अपन ओछपन
आ बुद्ध आँखि मुनने
निश्चेष्ठ बैसल रहै छथि।

बुद्धकें एखन आर बहुत
दुख भोगबाक छनि बुझाइ’ए!
पण्डित-पण्डा लोकनि, केलनि अछि प्रयास
बुद्ध फेरसँ मनुआँ नदी-तट पहुँचथि।
ओ लोकनि महामान्यगणकें क’ रहलाह अछि प्रभावित
ब्राह्मण-ब्राह्मणक दैत दोहाइ।

मनुआँ-कातमे पहिने बनतनि मन्दिर
जतए बुद्ध कालभैरव वा शीतला माइ
कहि क’ पूजल जेताह।

जहिया कहियो फेर
कएले उद्घाटनकें उद्घाटित करै जेताह
इतिहासकार लोकनि
जे ओ शीतला माइ नहि, गौतम बुद्ध थिकाह,
एक बेर फेर मनुआँ धारमे गोड़ल जेताह बुद्ध।

जानि नहि फेर कहिया
बहरेेताह मनुआँ धारसँ
आ फेर पहुँचताह
कहिया पटना संग्रहालय?

केदार कानन

हमर भावी पीढ़ी
एखनेसँ लदने अछि
अपनो ओजनसँ भारी
अपन-अपन पीठ पर पोथी
ई नेना सभ
एखनेसँ झुकि क’ चलैत अछि
एहि देशक भावी पीढ़ी
माथक नस एखनेसँ तनल छै
चेहरा पर एखनेसँ
पसरल छै एकटा अगुताहटि

हम जनै छी
डाँड़ झुकएबाक
ऊब पसारबाक आ
नेनु जकाँ कोमल-प्राण चेहरा पर
तेजाब छिटबाक भ’ रहल अछि
षड्यन्त्रा निरन्तर
हमर भावी पीढ़ी पर

हम एखनेसँ एहि नेना सभक
मोन-प्राणमे भरि देबए चाहै छी
षड्यन्त्राक सूचना
सूत्राधारक सभटा योजना
हम करए चाहै छी नेतृत्व
जे हम नहि क’ सकलहुँ
भ’ सकैछ
हमर अनुभवक जोगसँ क’ सकए ओ सभ किच्छु
हमर भावी पीढ़ी...

हम चाहै छी
जे ई नवका फसिल तनि क’ चलए
माथक नस घिचाएल नहि रहैक
अगुताहटिक जगह पर
खिलखिल प्रसन्नता औन्हल रहए
एहि एक-एक फसिल पर
एक-एक नेनामे भरल रहल आत्मविश्वास
एकर सभक प्रत्येक डेग
उठए आस्थाक संग

हम चाहै छी
कहियो झुकए नहि
रुकए नहि कहियो
हमर भावी पीढ़ी
लहलहाइत रहए
ई फसिल सदिखन

हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
हमरा चाही ओ हाथ
जे बरखाक बाद
उखाड़ैत अछि बिराड़
करैत अछि रोपनी-डोभनी
हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ हाथ
जे खेतकें तमैत अछि
फसिलक कमौनी करैत अछि
गाडै़त अछि मेह
करैत अछि दाउन
खरिहानमे ओसबैत अछि अन्न
हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ हाथ
जे बनबैत अछि देबाल
सानैत अछि चिक्कनि माटि
बनबैत अछि कोठी
काटैत अछि बाँस करची आ छिपाठी
बनबैत अछि टाट-फरक
दैत अछि बन्हन
करैत अछि छौनी
ठाढ़ करैत अछि घर बेर-बेर
हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ हाथ
जे खरड़ैत अछि थड़ि
उठबैत अछि गोबर-करसी
करैत अछि घूर
पथैत अछि भीत पर चिपड़ी
निपैत अछि आँगन
दैत अछि अरिपन
जरबैत अछि काँच माटिक दीप
तुलसी चैड़ा पर नित्तह
हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ हाथ
जे काटैत अछि चरखा
बुनैत अछि सूत
तैयार करैत अछि कपड़ा
तुनैत आ धुनैत अछि रूइ
भरैत अछि सीड़क
हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ हाथ
जे खुनैत अछि खदान
तोड़ैत अछि पाथर
बहार करैत अछि कोयला
घर-घर जकर श्रम-स्वेद गन्ध
पसरैत अछि धुआँक संग
उठौने रहैत अछि छेनी हथौड़ा आ बेलचा
ओकरे थकानसँ थकित ई धरती
ओकरे उल्लाससँ उल्लसित ई धरती
श्रमक धमकसँ रक्ताभ हाथ
हमरा चाही ओ हाथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ हाथ
जे उठबैत अछि बोझ
सहैत अछि जेठक दुपहरिया
भादवक अजस्त्रा बरखा
भोगैत अछि चिन्ता-दुश्चिन्ता
हमरा चाही ओ माथ एक बेर
चुम्बनक लेल

हमरा चाही ओ आँखि
जे देखैत अछि हरियर फसिल
माल जाल, हुँकरैत पड़रू
धान गहूम ओ मकइक बालिक देखैत अछि स्वप्न
निन्न टूटलाक बाद
अजोह मकइक बालिक गाढ़ दूध
भोरका ओसक संग
सद्यः उतरि जाइत अछि जाहि आँखिमे
हमरा चाही हलसि क’ ओ आँखि एक बेर
चुम्बनक लेल

जनताक कवि
एते तँ भेलै बरखा
अछोह
सूपक-सूप
जा नहि सकलहुँ खेतमे
देख नहि सकलहुंँ
भरैत छै कोना
अतृप्त पृथ्वी
अपन कोखि

अदृश्य रहि गेल हमरासँ
जखन कि
हमर बाट जोहैत रहल होएत
नान्हि-नान्हि टा फसिल
अँकुराइत बीया
लगातार जोतल बड़द

कहाँ जा सकलहुँ हम
केहन कवि
कहै टा लेल
जनता केर

राति भरि
बेचैनीमे आँखि थपकबैत रहल निन्न
एकटा भयानक स्वप्न जकाँ
बीच-बीचमे हमर कवि
धिक्कारैत रहल हमरा
भोरमे अवश्ये जाएब
खेतमे
धँसब भीतर धरि
जा धरि माटिसँ
जुड़ा नहि जाएत आत्मा
सिंचित नहि भ’ जाएत
घामसँ खेत
चैन नहि आओत
ठीके चैन नहि आओत हमरा

भरि घर भोरका हवा
हम खोलए चाहै छी खिड़की
बन्न दरबज्जा
राति भरि
निमुन्न घरमे सूतल प्राण
कटैत रहैत अछि अहुँछिया
कखन खोलब खिड़की
कखन खोलब ई दरबज्जा
सूति क’ उठिते
सभसँ पहिने देखए चाहै छी ओस
देखए चाहै छी रौद
भरए चाहै छी भरि घर
भोरका हवा
औनाइत प्राण-आँगनमे
भरए चाहै छी
जीवनक उष्मा आ उत्ताप
भरि गाम
पसारि देबए चाहै छी भोर

भरि गाम
पसारि देबए चाहै छी हरियरी
पसर खोलैत महिसबारक परातीमे
मिलबए चाहै छी अपन स्वर
भिनसरेसँ अकानैत रहै छी
सन्धानैत रहै छी
मोने-मोन उचारैत रहै छी
परातीक शब्द-संगीत
ताल लय ध्वनि
हम खोलए चाहै छी
खिड़की
सभटा बन्न दरबज्जा

बिझाएल ह’रक फार
नच्चूक आँखिमे
नचैत बिस्कुट
तोषीक आँखिमे पावरोटी
टुस्सीक ठोर पर
पापा-पापा
हम परती खेत जकाँ निस्पन्द

पत्नीक आँखिमे
अनेक इच्छा-आकांक्षा
कतेक तृषित पिआस
केतक अनकहल प्रसंग
हम बौक-बहीर जकाँ निस्पृह

टनकैत घाओ
माइक कुहरब
अनेक बेमारीक एकटा लहास
अपन माथ पर उघैत
हम कहाँ कतहु छी, मीत!
हम अनुर्वर खेतमे
अनेरुआ जिम्मर जकाँ
गड़ल छी एकसर
उपेक्षित

हम कोनो किसानक
एकचारीक ओलतीमे खोंसल
उपेक्षित
बिझिआएल ह’रक फार छी
जोतल नहि जा सकैछ
जाहिसँ
ई वसुन्धरा

मुदा दीपित अछि
हमरा भीतरक विश्वास
जे कहियो
लहलहाएब हमहूँ
तनब हमहूँ
उन्मुक्त ब्योमसँ
आँखि मिलबैत

शीश जकाँ झुकब कहियो
अन्नसँ लदल
धरतीकें चुमबाक लेल
व्याकुल-उताहुल

आइ ने तँ काल्हि
हम छी प्रतीक्षा-निमग्न
तनबाक लेल
झुकबाक लेल
मीत!


एतएसँ ओतए धरि
एखन तँ शुरुहे भेल अछि
यात्रा
आ अहाँ ताकए लागल छी
सुरक्षित स्थान
कोनो खोह
जाहिमे बचा सकी स्वयंकें
ककरा-ककरासँ बचाएब
कोना-कोना बाँचब
कतेक चाही सुरक्षा
कतेक बनाएब खोल
आइ ने तँ काल्हि
बहार तँ होब’ पड़त
तिक्ख रौदमे
अजस्त्रा बरखामे
अन्हड़-तूफानमे
मीत!
अहाँ अनेरे खिया लेब
अपन शरीरकें
अपन मोनकें
एहि बखेरासँ नीक
जे उठू आ बहरा जाउ
सभटा बाट
अहींक प्रतीक्षामे पसरल अछि
एतएसँ ओतए धरि

रमेश

कोसी सरकार

घोड़ा टैक्स असुलै’ए कोसी-पेटमे।
कमीशन फड़िछाबै’ए घोड़ा दरोगासँ कोसी-पेटमे।
कोसी पेटमे विधि-व्यवस्था देखै’ए,
राइफलधारी
अपहरण-विशेषज्ञ घोड़ा निचैनसँ।

घोड़ा खम-खम करै’ए थाना लग।
नाल नइं ठोकल छै खूरमे।
मलेटरीवला जुत्ता छै घोड़ाक पैरमे।
एक्के वर्दी थाना आ घोड़ा दुनू पहिरै’ए--कोसी पेटमे।

आइ घोड़ा लेल घी डुबौल लिट्टी बनतै।
गोइठाक क’ह-क’ह आगि पर।
काल्हि भोट छै।

घोड़ाक नाकमे लगाम गाँथ’वला सूआ
हेरा गेलै’ए बकुनियाँ ओ.पी. प्रभारीक हाथें।
तेॅं कैफियैत देब’ गेल छथि
प्रभारी महोदय एस.पी. लग।
तें हुनको बखराक लिट्टी आइ खाएत घोड़े।

आ तखन निकलत विधि-व्यवस्था डुइटीमे
‘बिहार सरकार’ फल्लाँ-गिरोहक घोड़ा

वायरलेससँ छूटल हवा गन्हाइत गण्डौलमे-
पुइं...पुइं...कुइं...पुट्...पुट्...पुट्...

आदि कथा
पानि आ माँछ छिड़िया जाइ छलै इलाकाक बहियारमे
कोसीक साम्यवादी बाढ़ि
सकठे नाह पसरि जाइ छलै--जीवनक संचार लेल,
बाढ़ि अबै छलै लोकक मोनमे/भावनाक,
सम्वेदना लग्गा ल’ क’ खेबै छलै पड़ोसिनक बिन खेवा के,
जीवनमे रसभंग नइं क’ पबै छलै कोसी आ सौमनस्यता
छलै जगजियार कोसिकनहामे
मगर डकूबा इन्जीनियर आ चोरनियाँ सरकार बान्हि देलकै
जीवनक तटबन्धक जुन्नामे ऐंठि क’ सकठे,
कोसी-लोकक जीवनकें गति-हत क’ देलकै
पोथी-पण्डित/नेता मिलि क’,
कोसी-देसक मोन आ हृदय भ’ गेलै दू फाड़
कोसीक आर-पार कमला-बलानक मार
आ धेमुरा-तिलयुगाक पहाड़, कोसीक आर-पार

अपना कन इन्जीनियर भ’ गेलै अँगरेज आ नेता
भ’ गेलै तुरुक। हीनी कोट सिया लेलकै, हूनी कुरता,
हम्में ओइ पार रहि गेलिऐ, तुहें अइ पार,
तोंहें केन्ने जेबहो, हम्मे केकरे बोलबै?

ओइ पार अइ पार
तोरा कन जेल, हमरा कन फाँसी।
तूहें कहियो-काल जेलसँ निकलबो करबही,
हम्मे कोसी-बान्ह टुटलै त’ फाँसी रे फाँसी।
तोरा पूस मासक दिनमे तरेगन लखा जाइ छौ
मोरा बारहो महीनामे तेरहम महिनमा
कतिका मास लखा दै छै भैय्या मोरे!

मोरा बान्ह टूटै के आदंक फा’मे देलकै सरकार
तोरा हमरा नामे ईर्खा फा’मे देलकै सरकार।
तोंहे रिलीफ के ओस चाटहो बिला गेलौ
मेहनति के संस्कार, हमरा बैंक लोन नइं देलकौ,
जिनगी भेलै पहाड़।
हौ बाबा कारू खिड़हरि हौ बाबा सोखा।
हौ बाबा लछमी गोसाँइ!
ल’ जाहो कोसी, ल’ जाहो बान्ह के
हमरा ने जिनगी पड़ै छै पोसाय।

मरसीया
तीन दिन भ’ गेलै नाह पर।
भावहु-बेटी-वेदराक लाजें
नद्दी नइं फीड़ल जाइ छै।
डीह-डाबर डूबि गेलै
घर-माल भासि गेलै
सरकारी खड़ाँतक एक लप चूड़ा गूड़...
नइं गीड़ल जाइ छै।

धैन पनिजाब जे मुरगा-बकरी
अपने मेथला कसाइ छै
केतना दिन पर एलै जमैया
पिलही-बेटी झमाइ छै।

टक-टक ताकै पंजबिया बेटा
पुतहुआकें किछु ने फुराइ छै
केकरे घर के लक्षमी पुतुहआ
नँगटे भासल जाइ छै।

कोसीकें सेवि क’ किछुओ नइं भेलै
बुढ़िया किच्छु नइं खाइ छै
सुन्न-मशान भकोभन फरकिया
गामक गाम बिलाइ छै।

धँसना धँसि क’ खेत बिलाइ छै
जुआनी भूत खेलाइ छै
सकठे भाइ कोसियाइटिस फड़लै
मनुखक मासु बिकाइ छै।

कोसीकनहाक आम बात
कोसिकनहाक खास बात
कोसीमे उतरै छथि सूर्ज त’
आठ मास कोसिकनहा राजस्थान बनि जाइए।
आ कोसीमे उतरै
छथि हिमालय त’ चारि मास
सम्पूर्ण कोसिकनहा बनि जाइ’ए हिन्द महासागर।
कोसिकनहा छी बालुक हिमालय।
मटमैल पीरा पानिक हिन्द महासागर छी कोसिकनहा,
जतए आदमी नामक जीवकें बालु भकोसै’ए आ पानि ढकोसै’ए।
असलमे बाढ़ि कोनो घटना नइं छी।
मनुक्ख नामक जीवकें लहास बनेबाक
इन्तजाम वा औजार छी बाढ़ि।
होइ छै एना जे हिमालयसँ
कोसीमे उतरल ग्लेशियर
तटबन्धक रिंग-बान्हक दराड़िमे
गहा जाइ’ए आ रिंग-बान्हक दराड़िसँ
निकलि-निकलि मूस-साँप-चुट्टीक थोका,
कोसी तटबन्धक प्रमण्डलक आइ.वी.मे पड़ा जाइ’ए।
तखन फेर सूर्ज कुरता-धोती पहिरि क’
सर्किट हाउसमे उतरै छथि त’
सम्पूर्ण सर्किट हाउसमे शिमलाक
हरियरी आबि जाइ’ए। आ शेष
कोसिकनहामे ओहिनाक ओहिना
राजस्थाने राजस्थान रहि जाइए।

तें कोसीमे सूर्जक उतरब आम बात छी।
हिमालयक उतरब आम बात छी कोसीमे।
कोसिकनहाक राजस्थान बनब आम बात छी।
आम बात छी तटबन्धक दराड़िमे
ग्लेशियरक गहा जाएब। रिंग-बान्हक दराड़िमे
आदमी नामक जीवक डम्फ भेल
लहासक गहा जाएब आम बात छी।

मुदा खास बात छी सर्किट हाउसक
शिमला बनब। आइ.वी.मे उज्जर
दप-दप सूर्जक उतरब खास बात छी।
खास बात छी अनन्त।
अनन्त...अनन्त आम बात,
मात्रा एकटा खास बात छी।
मात्रा एकटा खास बात छी-
अनन्त...अनन्त...आम बात
--कोसिकनहामे।

गाम
खेतमे अन्न, पेटमे जुन्ना।
मनुक्खपना पर आस्था, कसाइपनाक भोग।
बाधमे राग मल्हार, बस्तीमे समदाउन।
पोखरी मोहार पर करजन्नी,
करजन्नी सन-सन आँखिमे पोखरि।
कलममे आम, बरखपाछुक सेहन्ता।
कुसियारक राटन धनीक,
हाफक जेबी गरीब।
एक टोनी लेल दँतखिसरी, कोला-कोलाक पुर्जी।
एक बुन्द दूध, मखानक पात आ मुँह।
घूर त’र पंच-न्याय, पलंग पर मत्स्य-न्याय।
सम्बन्धमे आड़ि-धूर, बाधमे दुष्टताक कोदारि।
दिनमे ‘हरे-हरे’ राति क’ घ’रे-घ’रे।
मोनमे काट आ ऊपरसँ हीया फाट।
भावहु पर घात आ
एक सय एगारह नम्मर वला तिनफट्टा चानन,
ठोर पर सूदिक हिसाब आ झक-झक वैष्णवी आनन।

बजार
सोन-चानीक उपजा,
लोह सन हृदय।
रुपैयाक मिसिल,
भावनाक राजस्थान।
बजार समितिक वधस्थल
अपस्याँत अभिमन्यु यादव।
लाल फित्ताक चक्रव्यूहमे किसान,
सात जनमक पियासल सूरा।
धर्म-काँटाक, पाप-पासंग।
मिसरीक व्यवसायी मिसरी दास,
चिरैताक ग्राहक।
जय मातादी, राधे-राधे।
घी’मे डालडा,आधे-आधे।
जय श्याम बाबा, जय श्याम बाबा,
पेस्तौल-बुलेट के दूध आ लावा।

विवेकानन्द ठाकुर

गिद्ध बैसल मन्दिर
सौंसे इलाका गनगना गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
कोनो पुरखाक बनबाओल मन्दिर
बड्ड पुरान/ने छोट/ने पैघ/घुटमुटार

लखुरिया पजेबाक चारू देबाल
जाहि पर औन्हल गोल गुम्बर
बीच मे गाड़ल बीझ लागल त्रिशूल

शीत-ताप पानि पाथर
झक्कड़-धक्कड़ सहैत-सहैत/कारी सिआह भेल
जेना अगबे छाउरसँ/हो ढौरल

मन्दिर बनल रहल ओंगठन-छाहरि
अनेक लोक लेल अनेक बर्ख धरि
एक्केटा शहसँ मुदा, सभ भ’ गेल मात
मन्दिर पर भ’ गेल पैघ वज्रपात

पपिआहाक बात सभ पतिया गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
सौंसे इलाका गनगना गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
मन्दिर छुआ गेल ओंगठन छुआ गेल
छाहरि छुआ गेल

देवता जे छलाह जागन्त
आब भ’ गेलाह आदंक
लोक सभ डेरा गेल पुजेगरी पड़ा गेल
चोरबा सभ कें फबलइ राता-राती
लोहक सिक्कड़ काटि चोरा लेलक
बड़का पितरिया घण्टा, दीप, घण्टी, घड़ी-घण्टा
सभकें बेच आएल ओजनसँ ठठेरी बजारमे
ने बेचनिहारके कोनो ग्लानि
ने किननिहारकें कोनो दुविधा

इलाका भरिक श्रद्धा आ विश्वास
ओजनसँ बिका गेल ठठेरी बजारमे
रहि गेला पाथरक देवता
हुनका नहि पुछलक चोरबा

अन्हार घुप्प मन्दिरमे आब भम पड़इए
केओ ओम्हर कखनो घूरि नहि तकइए
एकटा प्रश्नक मुदा, नहि भेटइए उत्तर
पाथरक देवता फेर भ’ गेला पाथर?
सत्ते भ’ गेला पाथर, सत्ते भ’ गेला पाथर

भूख आ पियासक अर्थ
पण्डितजीक प्रवचन घण्टा भरि चललनि
जे-जे छलाह सुद्धा-बुद्धा
से-से गपियाइत-गपियाइत लगला हफिआए
पण्डितजी प्रवचनक समापन एना कएलनि
कहबाक तात्पर्य ई...
घण्टा भरिमे तात्पर्यक खुलासा नहि भ’ सकलनि

जाबे ओ तात्पर्यक खुलासा करथि-करथि
ताबे सुद्धा-बुद्धा अपन-अपन गामक आधा रास्ता लगचिऔने
चन्द्रविन्दु-अनुस्वार अर्द्धविराम-पूर्णविराम
आओर किछु चिन्हार किछु अनचिन्हार
संकेत एहि सभक बीच शब्द-समूह ओझराएल
पहिने बूझू शब्दार्थ तखन बूझब भावार्थ
शब्दार्थ बुझब कठिन नहि
मुदा, भावार्थ बूझब जेना पहाड़ पर चढ़ब
कतेको सुद्धा-बुद्धा पढ़बाक प्रयत्न कएलनि
बुझबाक प्रयत्न कएलनि एही दुआरे
मुदा, बीचहिमे उलार भ’ जाइ गेला

ओ दिन कहिया आओत
जखन भूखक अर्थ हैत सोझ क’ भूख
क्षुधा नहि
पियासक अर्थ हैत सोझ क’ पियास
तृष्णा नहि
ओहिना, जेना जखन कोनो भुखाएल नेना
कोनो पियासल नेना, मायके कहै छै
माय गे...भूख लागल
माय गे...पियास लागल
माय तखन भूख आ पियासक
जे अर्थ बुझै छै सैह अर्थ
सोझ क’ सैह अर्थ

जकर ने कोनो शब्दार्थ ने कोनो भावार्थ
ने कोनो शब्दार्थ ने कोनो भावार्थ



सियाराम सरस

एक आँखि कमल दोसर अढूल
जकरा घरमे दीप ने जरलै तकर कुशलता डुमरिक फूल
तकरा पूछबै हाल-चाल तँ गत्रा-गत्रामे गड़तै शूल
बासगीत केर परचा भेटलै मुखमन्त्राीसँ तेसरे साल
असलो घ’र उजड़लै तै ले’ अड़खिसमे ढोढ़बा कंगाल
अहिना तन्त्राक थेथड़पनीमे कलुआ भोगै कष्ट फजूल

मासमे कए-कए टा हरिवासल बरमहल हो हमरे टोल
बिसुखल एतहि जमाहिर जोजना की सोहाओन छल दूरक ढोल
आँत ऐंठि क’ मुइलै मधुरी से की हेहरी करत कबूल

जकरा नै छै चास बीत भरि जकरा घर नै होइ लवान
जकरा दू कौड़ी नै आमद मरन छोड़ि की आर निदान
दोहरी मानदण्डिका हाथें कते दिन चलतै ई रूल

की बुझबैक अहाँ, खटनी पर लवड़ी सेरक बोनि-ब्यथा
की बुझबै जे श्रम-सीकर केर केहेन धार आ मोनि-कथा
की बुझबै जे नयन-कमल पर किए फुलाएल लाल अढूल


सत्यसँ साक्षात्कार
सात भाग नोरक सागरमे एक भाग मुसकान जिन्दगी
अनचिन्हार सन चैबटिया पर हेरए ठ’र ठेकान जिन्दगी

नित-नित नूतन सपनक खेती खन जापानी खने विलेंती
संगहि सपनक ओवा-मरकी अपनहि बूनी टाटी-फरकी
ईंच-ईंच पर सारा-गाड़ा सपनक कबरिस्तान जिन्दगी

लगइछ चोट-मचोड़ पडै़ए अनगिन खोंच नछोड़ लगैए
मोड़ लैछ घटना-दर-घटना पल-पल लाख-लाख दुर्घटना
कत’ कत’ हो मलहम-पट्टी सगरो लहू-लुहान जिन्दगी

चण्ठ बनैए लण्ठ बनैए पैर घिचैए कण्ठ दबैए
सदिखन उक्खी-बिक्खी लागल छिच्छा जेना साफ हो पागल
क्वीण्टल भरि बदमाशीक पाछाँ रत्ती भरि इनसान जिन्दगी

हरेक प्रीति पहिने रसगुल्ला हरेक प्रीति पाछाँ बुलबुल्ला
तट पर लहरिक आबाजाही जन्मक बरखा मृत्यु-पसाही
हरेक मिलनमे गर्भित विरहक आतपसँ अनजान जिन्दगी

कहाँ देखै छी शिमला घाटी कहाँ कतौ बम्मइ चैपाटी
कहाँ कतौ गुलमोहर फुलाएल अन्हड़-झक्खड़-पतझड़ आएल
एक पाइ भरि काश्मीर आ बाँकी राजस्थान जिन्दगी



देवशंकर नवीन

माइक कथा

अइ सादा कागत पर
कोनो श्रान्त-क्लान्त आँखिक नोेर जकाँ
उगि आएल शब्दकें अहाँ कोनो कथा कहबै?
आ कि कहि देबै हमर व्यथाक गीत?

माइक गर्भ दादीक कोर, बापक हथझूलासँ
सासुक लेहाज, ससुरसँ परदा, पतिक आदेश धरिक यात्रामे
हमर माइ
कोना ध्वस्त केने हएत अपन स्वप्न महल
कोना हमरा छ’हर बनब’मे
अपनाकें खाधि बनौने हएत ओ
अपना मादे सोचबाक कामनाकें
कोना बिसारि देने हएत माइ
हमरामे एक-एक कनोजरि निकलैत देखबा लेल
कोना निर्निमेष तकैत आ जगैत रहल होएत माइ--
हमरा किछु बूझल नइं अछि
आन्दाजो करब हमर स’क नइं अछि

बूझल अछि मात्रा एतबे
जे गाढ़ नीनमे सूतल सन्तानक मुखमण्डल पर मुस्कीक कोनो रेख
बड़ दीब लगै छै माइकें
माइकें सुखकर लगै छै
सन्तानक बलशाली आ वैभवशाली हेबाक कल्पना
ओकरा नीक नइं लगै छै
अपन प्रशंसा, अपन परिचय
ओ अपन पतिक पत्नी आ सन्तानक माइ हेबाक तथ्येकें
अपन परिचय बूझैत अछि

एक जीवनक अद्र्धांश बिता कए
आइ धरि हम इएह बूझि सकलहुँ अछि
जे कनियाँ-पुतराक खेल कहिया ने उड़न छू भ’ गेल माइक जीवनसँ
आब थाकि गेला पर हाफी आ अंगेठी-मोड़ जकाँ मोन रखैत अछि माइ
सासुरक चूल्हा-चिनवार
माइक स्मरण-शक्ति बड़ तीक्ष्ण अछि
के.जी.क्लासक नेना जकाँ राइम्स रटैत माइ
मोन रखैत अछि
सासुक भक्ति, ससुरक सेवा
पति देवताक पूजा, सन्तानादिक लालन-पालन
माइ, पल-पल अस्वस्थ रहैत अछि
माइ, अपनाकें एको पल अस्वस्थ नइं कहैत अछि
अपनाकें धूपकाठी जकाँ जड़बैत माइ कहैत अछि--
बेटीसँ पत्नी आ पत्नीसँ माइ बनबाक सार्थकता
तों नइं बुझि सकबहक बाउ !


मजूर
अगबे फूहीसँ हमर काज नइं चलत मेघ !
कने जमि कए बरसू !
ई फूही तँ महल-अटारीक अलस-भाव ओछाओन
आ पार्क-विलासी जोड़ी लेल सुखकर भ’ सकै’ए
हमरा तँ मूसलाधार बरखा चाही
मेघ! बरसू ने
ई आत्मा
ई शरीर
ईट्टाक छाहरिमे नइं
अहाँक थपकीसँ तृप्त होइत अछि
तन, मन, प्राण आ पेट धरिक तृप्ति तँ
हमरा अह° द’ पबै छी
रोपनीक मौसिम छै
कने जमि कए बरसू ने !

उखड़ल गाछ
विश्वग्रामक धारणा,
वसुधैव कुटुम्बकमसँ उन्नत लगै अछि अइ देशमे
चूल्हा, चिनवार, खेत, खरिहान,
ह’र, फाड़, ढोइस, करीन
दलान-चैपाल, घूर-धुआँ, गोबर-करसी
भदेस आचरण थिक अइ देशमे
संग्रहालयमे बन्न भ’ गेल लोक-कला
एहनामे
ईस्ट इण्डिया कम्पनी जँ एक बेर फेरसँ आबिए गेल अइ देशमे--
त’ की करबै अहाँ
1857 अथवा 1942 क स्मरण ठीक होएत
मुदा मोन राखू
विद्रोहक आधार भाषा आ संस्कृति होइत अछि
से अहाँ बिसरि चुकल छी



कने रोकि लिअनु हुनकर मृत्यु

हे दाता दीनानाथ !
अहाँ कतहु छी ?
जँ छी, तँ एना करब अइ अनाथ सब लेल
हमरा देशक मन्त्राी, प्रधानमन्त्राी आब बदलए नइं देब
जँ बदलिओ जाथि
हुनकर बदलब जँ अहाँ रोकि नइं पाबी
तँ क’ल जोडै़ छी
दोहाइ हे दाता दीनानाथ !
हुनका मरए नइं देबनि
हुनकर मृत्यु रोकि सकै छी अहाँ--
से सुनल अछि हमरा लोकनि
हुनकर मृत्यु हमरा सब सन निस्सहाय लेल अनिष्टकारी होएत भगवन!
कित्ताक कित्ता जगह फेर घेरा जाएत हुनकर समाधिमे
आ जँ अहिना होइत रहल
तँ कत’ बैसती हमर घरनी
चूल्हा-चिनवार लेल
कत’ गुरकुनियाँ काटत देशक बच्चा
कतए लागत ओकरा देहमे देशक माटि
आ, फेर ओ पैघ भ’ कए कोना कहत
जे अइ देशक माटिसँ पुष्ट भेल अछि हमर शरीर


झरना

अपना दलान पर मजमा लगा कए
अहाँक कुमारि कन्याँकें नोत देब
मंच पर ल’ जा कए ओकर स्तुति गान करब
मनवांछित अवस्थामे ओकर फोटो घीचब
फोटो सहित ओकर समाचार छापब...
ई स’बो टा आचरण ओकर व्यापार थिकै
आब घोषणा हएत--
ई कन्या महाबलीक नजरिमे भगवती आ भागवती छथि...
आ दुनियाँ मानि लेत

लाज लेहाज आ कपड़ा बस्तर उतारि
दूरदर्शन पर आबि ओ भागवती अहाँकें कहती--
महाबलीक कम्पनीमे बनल टायर सस्त आ टिकाउ होइत अछि
अहाँ इएह टा कीनू, आन नइं--
अहाँकें अनर्गल किऐ लागत?

अखबार, दूरदर्शन
आ अहाँक कुमारि कन्याँ लेल
अहाँक नोन सागक ओरिआओन निरर्थक अछि
भागवती घोषित भेलाक बाद कोनो कन्याँ
साग-वतीक सन्तान नइं
उपदेशक बनि जाइत अछि

दुनियाँ-दारी

दाही-जारीक कारणें
हमरा गामक किसान आत्महत्या क’ लेलक
बेतला वनखण्डमे कोनो अवर्ण, सवर्ण स्त्राी संग दुराचार भ’ गेल
थानामे रपट लिखैत पुलिस ओकर ‘अनुभव’ बढ़ौलक
गामक सरपंच अपन पुतौहकें जरा देलनि
दहेज दंशमे किछु युवती आत्महत्या क’ लेलक
बेटी नइं बियाहि सकबाक सन्तापसँ कोनो नागरिक बताह भ’ गेल
ई स’बो टा समचार निरर्थक छल
बिकाऊ नइं छल
रेडियो, दूरदर्शन, अखबार, पत्रिका
एखन पुनीत काजमे लागल अछि
महाबलीक वैवाहिक आ व्यापारिक चिन्तासँ बेसी पुनीत काज
आन किछु नइं
भूख, बोझ, रोग, शोकसँ हत, आहत, मर्माहत
आदिवासी स्त्राीक निस्ेतज चित्रा
अखबार, दूरदर्शनकें की देत
मुख्य मन्त्राीक चरणामृत लैत, आदिवासी स्त्राीक मुस्कान
अहँूकें रमणगर लगैए
अइमे अखबारक कोन दोख?

समाचार

निर्णय लेल गेल अछि
जे पिपरक एकटा पात पहिरि कए
मात्रा एकटा पात, आन किछु नइं
निर्णय लेल गेल अछि
जे पीपरक मात्रा एकटा पात पहिरि कए
भारत देशक शीलवती युवती
महाबलीक संग मंच पर नाचती
महाबली आ दर्शक लोकनि तकर रस लेताह
महाबली ओहि युवतीकें चुम्मा लेताह
आ युवतीक नक्षत्रा जागि जाएत
युवती, सामान्य कन्याँसँ नगर-कन्याँ
फेर राज-कन्याँ आ ब्रह्माण्ड-कन्याँ भ’ जेतीह
अखबार, रेडियो, दूरदर्शन पर युवतीक इन्टरव्यू लेल जाएत
ओ विशिष्ट युवती अहाँ लोकनिकें
आ देशक सामान्य कन्याँकें अकादमिक उपदेश देतीह
एक पातसँ झाँपल दैहिक भूगोल
आब शील-सभ्यताक सीमा निर्धारित करत
आ संस्कृति मन्त्राी दूरदर्शन पर ई दृश्य देखैत
कृत्-कृत् हेताह



बिज्जू स्त्राीवाद

इजलास पर जज बैसल छथि
कठघरामे एक दिश राम
आ एक दिश जानकी ठाढ़ि छथि
ऋषिक कुटीमे सम्मन पहुँचल रहनि
जानकीकें मोआबजा दिअएबा लेल
कोनो नारीवादी ओकील मोकदमा केने छलखिन्ह
जिरह भ’ चुकल अछि

जानकी चैंकि उठलीह
बजलीह --
नइं श्रीमान
हमरा अइ पुरुषसँ नइं चाही मोआबजा
हिनकासँ मोआबजा ल’ कए हम हिनकर अहंकें आओर ऊँच नइं करए
चाहै छी
हिनकर कमाइ खा कए हम अपन आत्मा आ सम्मानकें
आहत नइं करए चाहै छी...
परित्यक्त छी, परित्यागी छी
मुदा सम्मान बचा कए राखए चाहै छी
रामराज्यक कत्र्तापुरुष आ दुनियाँ भरिक मर्दकें
देखा देब’ चाहै छी
जे कोनो स्त्राी
धन, सुरक्षा, सेना आ राज-पाटक बलें पैघ नइं होइत अछि
ओ पैघ होइत अछि अपन सृजनसँ
लव-कुश सन वीर सन्तानक जननी बड़ पैघ होइत अछि
रामराज्यक राजा रामसँ बड़ पैघ
दुनियाँकें ई बूझ’क चाही जे
जानि नइं कते हजार बर्ख धरि वंश परम्पराक टेमी उत्पन्न कर’वाली
आ तकर लालन पालन कर’वाली
स्त्राीक परीक्षा लेब’ काल हरेक पुरुष
ओहिसँ पैघ परीक्षा स्वयं दैत रहैत अछि
हुनका बूझल रह’क चाही जे
विवाहसँ पूर्व कोनो पुरुष एसगर रहैत अछि
आ विवाहक बाद आधा भ’ जाइत अछि
मुदा स्त्राी?
ओ तँ सर्वदा पूर्ण रहैत’छि
परित्यागक बाद पुरुखक पितृत्व छिना जाइत अछि
मुदा स्त्राीक मतृत्व आ ममता ओकर संग रहैत छै
हजूर
अहाँ हिनकासँ मुआवजा हमरा जुनि दिआउ!



तराजू
आँखि आ कान
अतिशय सुविधाभोगी होइए
अतिशय सौन्दर्यवादी
जे बात वा चीज ओकरा नीक नइं लगै छै
तकरा ओ नइं देखत, अथवा नइं सूनत
मुदा माथ?
माथ से नइं करैए
आँखि वा कान द्वारा असुन्दर घोषित कएल प्रसंगोकें
ओ गीजैत रहैए
बिसरै नइं ए
जेना, अहाँ जमशेदपुर आ भागलपुरक दंगा
नइं बिसरल हएब
गोधरा, निठारी नइं बिसरल हएब
नन्दीग्राम नइं बिसरब
मुदा उत्तर-आधुनिक विमर्शमे
ई सब टेक्स्ट भेल--सम्वेदना नइं
ई सब पाठ भेल
अर्थात् आब अइ पर विचार हएत

हमरा लगै’ए
हम सब एके संग आदिम आ उत्तर-आधुनिक युगमे जीबै छी
छागर-पाठी, हरिण, खढ़िया, मूस-बेंग, साँप, आॅक्टोपस,
गाय-महीस, सुग्गर, कुकूर, तीतिर-बटेर, मुर्गा पड़बा, बगुला खा क’
मौज मार’बला हमरा लोकनि
मानव आ मानव-अंगक व्यापार त’ क’ए रहल छी
फेर खएबामे कोन हर्ज


नारायणजी

निर्बल भोगत जीव-सुख भुवनमे
अरना पाड़ाक कोन कथा
हाथी लंक ल’ पड़ाइत अछि
सिंहक प्रकट होइतहि जंगलमे

जैवशास्त्राी लोकनि कहै छथि--
सिंहक संख्या निरन्तर घटि रहल अछि धरती पर

भयानक डायनासोरक हम कल्पना धरि नहि कएने रही
‘जुरासिक पार्क’ फिल्म देखलासँ पहिने
जे एहनो प्राणी सम्भव भ’ सकैत अछि जगतमे
से लुप्त भ’ गेल करोड़ों बर्ख पहिने

आद्र्राक पहिल बर्खामे
खेतमे बुलैत अछि डोका
ठाम-ठाम ओ सभ एना घोदिआएल अछि
लगैत अछि,
पीबि रहल अछि एक-दोसराक माझक विभाजक रेखा

ससरैत अछि
नहुँ-नहुँ
घास पर
घासक जड़िमे
भोरुका रौदमे देखाइत अछि दिव्य

आद्र्राक फूहीमे
हम सभ बर्ख देखै छी
नाँगट-उघार खढुआनक उत्सव--
मासु लेल जोहि-जोहि खोंचड़िमे बिछैत डोका
सभ बर्ख देखै छी डोकाक पथार
घास पर, घासक जड़िमे
थालमे, करीनक प’टमे धरती पर ससरैत
धरतीकें जनबैत जीव-ताप
नहुँ-नहुँु ससरैत
बचबैत धरतीकें भोगैत अत्यल्प
सदैव रहत
सहज सौन्दर्य संग
निर्बल
भोगत जीव-सुख भुवनमे

कत’ चलि गेल भयानक डायनासोर?
जंगलक राजा सिंह कत’ जा रहल छथि?

कोसी
कोसी सभ बर्ख अबैत रहए
हमर गाममे
हमर घर-अँगनामे हूलि जाए
कोसी रहए
जाति आ जातिमे भेद नहि करए
ओकर प्रहारमे रहैक मात्रा प्रान-रेख

गामसँ हटि
आब बान्ह भ’ गेल अछि
कोसी
गामसँ हटि गेलीह अछि

कोसीसँ सुरक्षित भ’ गेल अछि गाम
अभेद्य भ’ गेल अछि सीमा
भय-मुक्त भ’ गेलहुँ अछि हम
हम भय-मुक्त भ’ गेलहुँ अछि
हम बाभन भ’ गेलहुँ अछि
हम जादब भ’ गेलहुँ अछि

पैंजाब हमर अँगनाक गीतनाद छी
पैंजाबमे
सूर्ज जे जगै छै
से सूर्जकें जगबै छै भैया

भैयाकें
पैंजाबमे सभ भैया कहै छै
सरदारजी सेहो
भैया संग काज करै छै

पैंजाबमे
भैया कटै छै जीरी
जीरी नहि
बोनिमे पाइ भेटै छै
नोकरिहारा जकाँ

पैंजाबमे
गुरु गोसाँइ रछिया करौ भैयाक
भैया संगमे रहौ कारू बाबा

हमर अँगनामे
एखन शुरू करै जाओ भजन
गबै जाओ गीतनाद

हँ हओ रामटहल!
पैंजाब
हमर अँगनाक भजन-भाव छी
पैंजाब हमर अँगनाक गीतनाद छी

जल, धरतीक अनुरागमे बसैत अछि
जल
धरतीक अनुरागमे बसैत अछि
बसैत नहि अछि
शिखरक दर्पमे
शिखरक पराक्रममे आ उत्कर्षमे
बसैत नहि अछि
शिखरक स्वर्गमे

एकटा भकरार दिन
जलक माथ पर बिहुँस’ लगैत अछि
रुधिर संग बह’ लगैत अछि शिरामे
अपना लेल मानैत नहि अछि
जल
कोनो लक्ष्मण-रेखा
अपन असहाय क्षणोमे
जीबाक सम्भावना थोड़ रहि गेल रहैत अछि शेष
शेष रहैत शिखरक कामनोमे
जलक कामनामे जन्म नहि लैत अछि कोनो शिखर
बनैत नहि अछि
कोनो प्रार्थना वा प्रस्तुति वा प्रादर्श

शिखरसँ हेठ होइत जल
चाहैत नहि अछि
अपना लेल कोनो आर शिखर
दौगैत अछि धरती पर
बेकल पीबा लेल हीक भरि
धरती
प्रस्तुत रहैत अछि जल लेल
बेकल

जल धरतीक
सर्वाधिक पतित धरतीक
अनुरोध थिक
लोटाइत अछि धरती पर
उत्सवित
जल, धरतीक अनुरागमे
बसैत अछि।

पृथ्वी मोन रखैत अछि प्रेम
पृथ्वी
पृथ्वी होइत अछि
हम जखन चलैत रहै छी रस्ता पर
अपन धुनिमे मस्त
अपन ठाम पर रहैत अछि

माँ कहैत अछि --
जखन बेटीक जन्म होइत अछि
पृथ्वी सवा हाथ धँसि जाइत छथि नीचाँ
हम से कहियो नहि पाओल

हम देखल अछि
एक गोटेकें
जे क्रोधमे रहथि
पराजयक धार बीच डुबैत
निरन्तर पैर पटकि रहल रहथि पृथ्वी पर
अपन विस्मृतिमे
अपन जीतसँ क’ रहल छलाह आश्वस्त स्वयंकें
पृथ्वी काठ बनि गेलि रहए

हम देखल अछि
काठ बनल पृथ्वी
जनैत अछि मनुक्खक कोप आ आघात
मुदा, मोन नहि रखैत अछि
के फेकलक अछि थूक पृथ्वी पर?
एहि दुश्चिन्तामे कहियो नहि पड़ल
जे क्यो ओकरा मलिन क’ रहल छै

हम देखल अछि
एक राति जखन आकाशमे चान नहि छल
आ हवा अपन दायित्वमे बाझल छल
बिहुँसैत हम
कने आग्रह संग पृथ्वीसँ भेंट कएल
आ पाओल
पृथ्वी मोन रखैत अछि प्रेम
अपन कोखिमे निःशब्द खसाओल
बीज
मोन रखैत अछि स्नेह आ दुलार
अभिभूत होइत
जनमा लैत अछि गाछ अपन छाती पर
अपन अस्थि आ माँस आ मज्जाक मन्थनसँ

पृथ्वीमे हाथसँ अर्पित करैत अभिलाषा
माथ पर उठबितहि बोझ
बोझ उघ’ लगै छी
सुतै छी
त’ सुतै छी भरिपोख
सोचै नहि छी
फुद्दी भ’ जाइ
नाँघि आबी कैलाश
सूतलमे

हम सूतल रही
आ खरहोरिमे लागि जाए कलम-बाँस
लुबुधि जाए पसिनक फूल भरि गाछ
अँगनामे अपनहि
से सभ सोचलासँ की लाभ?

चालीस बर्ख पूर्व घर त्यागल
बताह बाप घुरि आबथि धरतीक अपरिचित विस्तारसँ
देखा जाथि घराड़ीक सीमा
आब सपना नहि अछि
सपनामे भरल-पुरल चास अछि
अन्न-धन लक्ष्मी
श्रद्धासँ झुकि जाइ छी पृथ्वीक आगू
किछु फौड़ै छी
तोड़ै छी
कटै छी किछु सपनाक ठाँओ लेल
स्मृतिसँ बिछै छी इच्छा
टोभै छी परिचितिक संसारमे

चाहै छी
एखन बर्खा नहि होइ
बाँचल रहि जाए हमर कामना

चिन्तासँ
पैघ विश्वास रहैत अछि
पृथ्वीमे हाथसँ अर्पित करैत अभिलाषा
फसिलक सपनामे भ’ जाइ छी निमग्न

पेटार ९

ज्योत्स्ना चन्द्रम

पुल
सुन्न-हेराएल
थाकल हारल
रिक्त भेल आँखिमे
सपनाक एक सुन्दर संसार जेना उतरल
आइ मने
एक गाछ अमलतास तन-मनमे पनुगल

तखने जेना
साँस-साँस गमगमा उठल
ठहरल-ठिठुरल-ठेहिआएल दिन जेना बीतल
लागल मने
इच्छाक आम-गाछ मजरल
रुद्ध-अवरुद्ध समय
दीर्घ अन्तराल बाद सम्हरल

सूर्य देलक तखने भरि देह ऊष्मा
नदी
भरि इच्छा प्रवाह
तखने मने
चिड़ै जेना बिलहि गेल अपन उन्मुक्तता
चान ल’ क’ ठाढ़ भेल मुँहथरि पर अपन शीतलता
आ माटि अपन सुगन्धि पसारलक...
पानि जखन ओकरा लागल गुदगुदाब’
बसात तखन
सम्पूर्ण परिसर-परिवेशकें लागल डोलाब’... झुमाब’...
तखने जेना लागल,
सभ ऋतु हमर अंग अंग छू’लक... बतिआएल...
आ काटल समय पर
लागल जेना पुल बनि आएल

वैदेहीक नाम
विदेह पुत्राी अहाँ
सर्वगुणसम्पन्ना... राजदुलारी...
ठनलनि जनक ऋषि धनुष यज्ञ आ
विशाल नर-समुद्र मन्थनक बाद हेरलनि अमृत--
पौरुष-निकष पर सफल
मर्यादा पुरुषोत्तम राम!

जानकी!
बड़ भागमन्त भेलहुँ
राम-सन पति
दशरथ सन ससुर
कौशिल्या सन सासु, ओ
लक्ष्मण सन देओर पौलहँु
आ अनवरत तखनहिसँ
मधुर चासनीमे बोरल चिरैता
घांेटैत रहलहुँ सभ दिन, आ
सहधर्मिणी बनि छाहरि जकाँ चलैत रहलहुँ

उर्विजे!
तैयो देब’ पड़ल अग्नि-परीक्षा
भोग’ पड़ल बनवास
अक्षुण्ण रखैत अपन स्वाभिमान आ
रक्षा करैत अपन अस्मिताकें
अंततः शरणागत भेलहुँ धरणी-माँक कोरामे

मैथिली !
अन्तर नहि अएलैक अछि
एखनो धरि स्त्राीक नियतिमे
अहीं जकाँ एखनो देब’ पडै़ छै परीक्षा
सती सुलक्षणा होइतहुँ भोग’ पड़ै छै मनस्ताप
पीड़िता परित्यक्ता बनि
मुक्ति तकैत अछि मृत्युक बाटमे एखनो धरि...

वैदेही !
प्रश्न पुछैत छी अहींसँ एकटा,
जे अहाँक जीवन देखलो पर
किऐ ने टुटैत छनि भक्क जनक ओ सुनयनाक?
अगहनमे सीता बियाहलि गेलीह
दुखे भोगलनि सभ दिन
तें ‘धीया नइं बियाही अगहनमे’ कहनिहार माइ बाप
दोष तँ ताकि लेलनि मासमे मुदा
किऐ ने तकलनि दोष राममे?
किऐ एखनो धरि सभ जनक, सभ सुनयना
तकै छथि राम-सन जमाय आ
सभ धीया चाहै छथि सिया-सन भाग्य?
किऐ? किऐ बहिन वैदेही ??

अक्षर-पुरुषक दुहिता
टटका फुलाएल कनैल जकाँ
रौद हँस’ लागल अछि
बसातमे मोहक मात्सर्य छै पसरल
चिन्नी जकाँ छिड़िआइत झीसीकें
एकर पाश्र्व-धमक नचब’ लगलै अछि

ठीके, बहुत दिनुक बाद
आइ पानि बरिसत
टपकैत बुन्नमे
अप्रतिम गमककें आइ पानि सानत

भिजबा लेल आतुर/सुखाएल धरती
आँंचर पसारने
रोम-रोमसँ पीबाक इच्छा नेने
अस्त-व्यस्त अछि...
हरियरीक चुनरी लहरा क’
कली आ आँकुर सभसँ फुसफुसा क’
व्यक्त क’ रहल अछि अपन आभार

अखाढ़क पहिले अछारमे उमकी जेना बढ़ि गेल छै
बरदक पैर घोड़ा टाप-सन कसमसाइ छै
बिराड़ेमे बीया उल्लास-गीत गुनगनाइ छै
बाबा
आइ भिनसरेसँ पगलाएल छथिन
मैयाँक तरहत्थी पर
ज’न बरिजनाक रोटी कखनसँ ने खेलाइ छै...

अनायासे
हम अपन मैयाँसँ
क’ उठैत छी विकल प्रश्न --
मैयाँ गै
गृहस्थक पौत्राी हम
कोना क’ भ’ गेलहुँ अक्षर पुरुक्षक दुहिता?


छठि
एकटा समय छल
जखन आसिन अबिते
जोड़ाए लगै छल
आँगुर पर दिन
भरि पितर-पक्ष
होइत छलनि
पितर लोकनिक आवाहन/तर्पण
फेर, विजया-दशमीक उल्लास
पूजन-अर्चन, मेलाक उछाह
कोजागराक फोका मखान
मुंगबा-खाजा, नारिकेर आ पान

दीयाबातीक पूर्वेसँ
बनबै छलहुँ गाहीक गाही दीप
नीपल छछारल घर आँंगनक संगहि
उमंग भरल आकृति पर
झलकि अबैत छल पाबनिक रंग
गबै छलहुँ सखी बहिनपाक संग --
सुख-सुखराती दीयाबाती
तकरे छबे छठि...

छठिक अर्थमे जेना
समटि अबैत छल सम्पूर्ण समर्पण
सूप पर जरैत दीप सन
निष्कम्प निष्ठा भक्ति आ
ठकुआक मिठाससँ
बिलहाए लगै छल जेना आशीष

एकटा समय अछि
जखन आसिन अबिते
साकांक्ष भ’ उठैत अछि मोन --

पाबनि... पाबनि... फेर पाबनि...

मुदा सुखाएल नहि आस्तिकताक नदी
भक्ति आ भावमे
नहि आएल मिसियो भरि अन्तर

मुदा केचुआ छोड़ल ई अभावक साँप!
हेरा गेल जेना पाबनिक अर्थ मलिन भेल प्रकाश...
गुम भेलि ठकुआएलि हम
ताकि रहलि छी अपन चारू भर
शान्त-स्थिर नदीक दुनू कछेर
कछेरसँ बान्ह धरि करमान लागल लोक
कोदारिक चाँछल घाट
घाटक काते-कात गाड़ल केराक थम्ह
पतियानी लागल सूप, कूरा, सरबा, ढाकन...
सभमे साँठल
ठकुआ, भुसबा, केरा, नारिकेर...
सभ अध्र्यमे
अँकुरी, आरतक पात, बद्धी आ जरैत दीप...

लगैत अछि जेना
पाबनिक स्वरूप त’ आर सुन्नरे भेल छै
लाल-पीयर वस्त्राक चमकसँ
होइत अछि--ठीके, ठीके कहै छै लोक
जे देश अपन
आर्थिक उन्नति क’ रहल अछि...

तखने ठुनकैत अबैत अछि उत्सव
तोड़ि दैत अछि ओकर नूपुरक ध्वनि ध्यान --
‘हमहूँ लेब फुकना, बाजा, फटक्का...
बम, राकेट, साँप...’
हम तकै छी अपन आँचरक खँूट
कहाँ अछि किछु !
उदास-उदास सन गिरह
मुँह दुसैत हमरा वत्र्तमान पर...

मोन पड़ि जाइत अछि--
बन्न वेतन
बनियाँक उधारी
दूध ओ मकान मालिकक तगेदा
अप्पू-गप्पूक फीस
जीट-जाट/फीट-फाट...
... फेर, समस्त आवश्यकतामे कतरब्योंत...
... आ हम
देशक आर्थिक उन्नतिक संग
जोख’ लगै छी अपनाकें
अपन मोनकें
अपन मनोरथकें...

सेहन्ता औनाए लगैत अछि--
नहि,
छठिक एहि घाट पर
कोनो टा मीन-मेख नहि
एत’ मात्रा
ई नदी, ई घाट, ई अध्र्य
क’ल जोेड़ने ठाढ़ व्रती
आ हवाक संग सिरसिराइत/फहराइत
वन्दनाक लहरि
भावनाक हिलकोर...
हम हेराए चाहै छी
हम इति भ’ जाए चाहै छी
डूबि जाए चाहै छी एहि आलोकमे

उठि रहल छनि दीनानाथक गीत--
‘उग’ हो दीनानाथ’
भेल अरघ’क बेर...’
मुदा, बहरा नहि पबैत अछि
ओ टाँस/ओ टोप-टहंकार...

वाह रे हमर परम्परा !
जुग-जुग जीबू हमर परिवेश
धर्म शास्त्रासँ गछारल
अर्थशास्त्रासँ
पछड़ि रहल अछि समाजशास्त्रा
तैयो हम गबैत छी गीत
फटैत नहि अछि लौकिकताक कोेंढ़

लगैत अछि जेना
कोकनल मेहसँ बान्हल
मेहिया बरद जकाँ घूमि रहल छी
नहि लगैत अछि घुर्मा
नहि लगैत अछि चान्ह
नहि उठैत अछि तर्जनी
ई हम केहन मनुक्ख छी
जाहि समयमे जीबै छी
ताहि समयकें नहि पढै़ छी
ई हम केहन मनुक्ख छी !


फराक-फराक नहि सोचब
नापि रहल छै ओकर साँस
अहाँक उड़ानक उँचाइ
नापि रहल छै ओकर चेतना
अहाँक पाँखिक शक्ति

ओ सूतल नहि अछि
श्लथ सेहो नहि भेल अछि
आ ने निस्पन्द भेल छै ओकर इच्छा
ओ त’ अन्तरिक्षकें देखि रहल अछि
आ लीन अछि अपन अन्तसमे
समेटने सम्पूर्ण ऊर्जा-पुँजकें
रचबा लेल अपन आ
अपन चारू दिस मंगलमय सृष्टि
ओकर करजनी-सन आँखिमे
पसरल छै निखिल विश्व
आ, जे संजोगि रहल अछि
अहाँकें देबाक लेल
पाँज भरि रौद
भरि मुँह हंँसी, आ
सूप भरि प्रेरणा ओ साहस --
कि जत’ अहाँ चूकी
समेटि लिअए अपन आँजुरक परिधिमे
अहाँक Ðास
अहाँक टूट, आ
अहाँक घुटन

अहाँ भ्रममे नहि रहब
ओ एसगरि नहि अछि
आ ने अहाँसँ दूरे अछि
ओ लाजवन्ती सेहो नहि अछि
ओ त’ आधार शक्ति अछि जे
अहाँक संग
सदिखन
डेग-डेग पर गतिशील अछि

ओकरो अन्दर
जाड़क दुलरुआ रौद छै
बसातक वासन्ती लय छै
ठोर पर गीत छै
सकल विश्व मीते-मीत छै ओकरो

अहाँ देखब
फराक-फराक नहि सोचब
सम्भावनासँ फराक
नहि छै ओकर हाथ
सीढ़ी लगाएब जनैत अछि ओहो आकाशमे
आ नापबाक आकांक्ष करैत अछि ग्लोबकें
ओकर करजनी सन आँखिमे
रक्ताभ किरिण छिटकि रहल छै

देखब
अहाँ देखब
फराक-फराक नहि सोचब



सुस्मिता पाठक

कखन होएत भोर
आइ काल्हिक राति
बहुत नमहर होब’ लागल अछि
दिनक अपन रातिमे पूछैत अछि
परिचय

हवा आतंकित
अन्धकार स्तब्ध
चुप्पीकें चीरैत
सर्द घामसँ जागल चेहराकें
भिजा दैत अछि
हल्लुक सन आहटि
आ कोनो छोटो सन ठक-ठक
एक क्षणक मृत्युक अनुभव
आँचरमे सटि जाइत अछि

घड़ी भ’ गेल अछि बन्न
अथवा ई राति बितबे नहि करत
नहि जानि कखन चिड़ै अनघोल करत
कखन बाजत घण्टी
भोर कखन होएत
कखन होएत भोर

जे कखन फूल फुलएबाक
बचा लेबाक लेल लहलहाइत फसिल
कखन, कोन राति क्यो गढ़त हथियार
सर्द चुप भेल मृत राति
आ सन्देहास्पद आहटि
ठक-ठक केर विरुद्ध
कि भोर कखन होएत
कखन होएत भोर

हमर कविता
रूसि क’ चल गेल
जिद्दी नेना जकाँ
थूड़ि सबटा तार्किकता
बताह भेल
शब्दक ढेरी त’र नुका गेल कविता

ओकरा चाही छल
अन्हारक विरुद्ध
एकटा छोट सन दीप
प्रत्येक मौसमक
ठीक-ठाक चेहरा
छल-छर्किं समीकरणसँ च्युत
मानवीयता

हम
एहि सभ उपकरणकें
ताकि रहल छी
जे पाँति-पाँतिमे
आबि क’
फेरसँ बैसि सकए
हमर कविता

हमर निस्तब्धताकें थपकी दैत अछि चान
खोलि क’ अपन खिड़की
हम प्रतिदिन
स्वागत करै छी
भोरका ठरल बसातक
आँगनमे जमि जाइत अछि
रातिए भरिमे कजरी
जबकल पानि पर डोलैत अछि सेमार
कोनो एकान्त खधारिमे
ओकरा खोखरि क’
हम फेकि अबै छी प्रतिदिन
आँगन सेहो उपकृत भ’ उठैत होएत

हम गाछ केर पातक
सरसराहटिक तालमे
रहै छी दिन भरि गतिमान
ई चिन्ता हमरा लेल
नहि आएल अस्तित्वमे
जे ऊबि जाइत होएत माटि
हमर पदचापसँ

प्रत्येक राति
हमर निस्तब्धताकें
थपकी द’ जाइत अछि चान
तरेगन
हमरा पहुँचसँ बहुत दूर अछि
दिन चढ़िते
सूर्ज
हमर छातीमे होइत अछि।

हथियार
किछु काल सोचि लै छी
तँ कने हँंसि लै छी
कने लिखि लेलहुँ
तँ जीवि जाइत छी
चारि दिन आओरो

हँसबाक
आ जीबाक लेल
सोचब

लिखब

बड्ड जरूरी अछि
अपन-अपन युद्ध लेल
अपन-अपन
हथियार।


कत’सँ शुरू करू
कत’सँ शुरू करू गनती
धर्मक ठेकेदार सभ
ओछौने अछि अधर्मक सीढ़ी पर जे
लाहासक असंख्य पाँति
मलबाक चित्रा भीड़मे
एकसर एकटा
चटकैत शहतीर
अबोध आ जीवनक लिप्सामे
छटपटाइत बच्चाक
सुखाएल खूनक डिडीर
आगिक तापसँ
दहकैत जमीन आ
स्त्राीक जरैत केशक चिराइन गन्ध
कत’सँ देखब शुरू करू!
की कहब शुरू करू एकरा!!
धर्मयुद्ध
क्रान्ति-युद्ध
वा सत्ताक कुत्सित पीड़क प्रवंचना...
जनिक सौजन्यसँ सजल बरात
टैªक्टर, लारी आ ट्राम पर
भरल बन्दूक, गोला-हथगोला आ तोप
सुनियोजित षड्यन्त्रा
पूर्वनियोजित तिथि
एक्के बेर पाटि गेल
पूरा शहर
मरि गेल हुनक आत्मा
सूति गेल सम्वेदना
जागल मात्रा
हिंसा आ प्रतिहिंसाक लपलपाइत कामना

जरैत मानव देहसँ
लगा क’ लुआठीमे आगि
दोहराओल गेल प्रतिज्ञा
कोना सोचब शुरू करू।

कत’ अछि अन्त
ओहि शान्तिक
मृत्युक बाद ओछाओल गेल अछि जे
फाटल जमीन पर
चेथड़ीमे लेपटाएल किछु...।

भोरक खोजमे
निन्नक बेसोह यात्रा केर सहचर स्वप्न
खुरदुराएल हाथसँ घिचैत
ऊपर-नीचाँ पथराएल बाट पर
बालुक गत्र्तमे धँसबैत
निच्छोह हाँकैत अछि हमरा

बदहवास भेल देखैत रहि जाइ छी हम
अन्हारमे
अन्हारक देबालमे सहमल
भगजोगनीक पिपनी केर झपकीमे पंक्तिबद्ध आतंक
अपाहिजक अनन्त पंक्ति
दुर्गन्ध आ गिजगिजाहटि
घृणा आ आवेगसँ संचालित होइत हम
बदलि जाइ छी अकस्मात
एकटा चीत्कार, एकटा धड़कन, एकटा निस्तेज मुरूतमे

क्यो घिचैत अछि हमर हाथ
दोहाइ दैत अछि गलि गेल हाथ केर
क्यो हमर आँखि फोड़ि देब’ चाहैत अछि
जे हुनकर अधःपतनकें नहि देखि सकी हम
क्यो हमर जीह काटि लेब’ चाहैत अछि
जे हुनकर पाप रहि जाए अचर्चित

हम चाहब
जे क’ लिअए हमर इन्द्रिय केर अपहरण
ओ अपाहिज
हाथ-पैर-आँखि-जीह अवश्ये काटि लिअए
एकटा सम्पूर्ण काया क’ तँ लिअए प्राप्त
ओ अपाहिज

हमर फड़फड़ाइत साँस
काएम रहत
स्वप्नक धृष्टताकें बेधैत
स्वस्थ-सृजनोन्मुख भोरक खोजमे



शिवेन्द्र दास

पाइ
चबूतरा पर अतरबला; टाटक नीचाँ
पसरैत धुआँक बीच भुटकुन केर उदास आस
जे बरसि गेल मेघ भोरका बिक्री पर
सतसाला बेटी पजारैत अछि चूल्हि
माँजैत अछि करिखा
बनबैत अछि चाह
ओसुलैत अछि पाइ
चीत्कारमे बदलि गेल छै
ओकर नटखट रागक जलतरंग
ओ नेना अछि, युवती अछि, बूढ़ि अछि
आखिर कोन शब्द सम्भव भ’ सकैछ ओकरा लेल
थाल-कीचक एहि मौसममे
जखन कि चुप आ उदास अछि ओ
ककरासँ झगड़ा-दन करत
जखन कि ग्राहके नहि अछि।

ओ बेचैत अछि चाह
ओकरा किछुओ बाजबाक लेल
जरूरी छै जे ओकर चाह बिकय
एकटा सूर्य छै ओकर आँखिमे
जे कसाइन धूआँक पनिआएल छाँहमे तोपल अछि

अतरबला
पीबि चुकल अछि चाह
ओ सराबोर क’ देब’ चाहैत अछि सुगन्धसँ
एहि सतसाला बेटीकें
मुदा ओ लड़ि जाइत अछि
सुगन्धक विरुद्ध
आ चिचिया क’ मँगैत अछि
अपन चाहक पाइ!

सम्भावना
करौछुक खनक-ताल पर
आकुलता भरि पेट भोजनक
भरि पोख निन्नक

कतेक श्रमसाध्य थिक
पाबि लेब, पकड़ि लेब एहन कोनो क्षण
कस्बासँ ग्लोब धरिक बाजारमे!

कि भरि मोन पीबि ली इजोरिया
भरि छाँक होइ
आँगन-घर सुहास आलोड़ित
रस!
गाबि ली स्मृतिमे जोगाओल
छेड़छाड़क कोनो फिल्मी गीत!

करौछु चलब’वालीक गजरा पर
टीपि दी एकटा फकरा
आइ फेर/दाम्पत्यक एहि बीसम सालमे
पूनोक ई राति/कते जटिल छै!
जखन एकटा पूरा पीढ़ीकें
नैपकिन पहिरबाक/तहजीब सिखाओल जा रहल अछि
घोघ उठएबाक गप
कोना कएल जा सकैत अछि?

समय
जटिलतासँ व्यस्त अछि
काॅलगेटी चुम्बनमे/नमी सोख’मे
आ कि तबलासँ क्रूज मिसाइल धरि बनल
बजारक चकचोन्ही पर मुग्ध, त्रास्त, आन्दोलित।

उमगैत अछि मन
समेटि ली चानक पसरल चादरि
ओढ़ा दी हुनका पूनोक एहि राति
आ कही कि अहींक करौछुक ताल-छन्द पर
नृत्य थिक पृथ्वी पर सम्भावना आइयो!

कि नुकाइए-चोरा क’/ताकि तँ ली
बजारक चकचोन्हीक विरुद्ध
रचि तँ ली कोनो/षड्यन्त्रा
आँखिए-आँखि!
थाकल-हारल देहमे/प्राणमे
उतरि जाइ
चान-लोरी गबैत

कते खतरनाक थिक सोचब एहन किछु
जखन कि समय बाजार थिक--
स्त्राीक विरुद्ध: बच्चाक विरुद्ध
क्रूज मिसाइल थिक
--चानक विरुद्ध!!


विरोधक कविता
प्रत्येक नामक संग सम्बोधन हेरैत लोकक
हेंजसँ फराक भ’ हम
चिन्हबाक चेष्टा करै छी
प्रत्येक सम्बोधनमे कोनो नाम
कोनो चेहरा स्नेहसिक्त जीवन्त
सम्बन्ध आ सम्बोधनक पाकड़िक नीचाँ
ककरा-कहिया लागि सकलैक अछि प्रच्छन्न रौद
आ के भीजि सकल अछि आपादमस्तक?
‘वाद’क अन्तरराष्ट्रीय नारासँ ल’ क’
घरक देहरि धरिक चिन्हासकें तकैत कोनो अपन चेहरा
अनाम किन्तु उष्ण...
हम विरोधी भ’ गेल छी
स्वर्ग-सुख लेल आतुर हुनक
जे भिखारि सभ लेल कोनो दिन
आ कि सभ दिन धूत्र्त चेहरा नेने
भोजन करबैत अछि...

हम विरोध करै छी
ओहि भगवानक जे छीनि लेलनि अछि
मनुक्खसँ ओकर ऊँचाइ पापक नाम पर
ओकर धवल चमकैत चादरि पर
दाग हेबाक शंका फुलाइत रहल
जानल बात अछि शंकाक इलाज
हकीम लुकमान धरि बिसरि गेल छलाह
हँ, हम करै छी विरोध
प्रत्येक तेज गति स्वचालित सीढ़ीक
जाहि पर परेशान मनुक्ख ऊपर जएबा लेल
करैत अछि बहुविध नाटक-विधान
बिना तय कएने नीचाँक कोनो मंजिल
ऊपरे-ऊपर भगैत अछि
हम विरोध करै छी

हमरा नहि चाही कोनो चेहरा दयनीय
कोनो चेहरा उपेक्षित
कोनो अपेक्षित सम्बन्ध
हमरा चाही एकटा घर अपन
एकटा देश अपन
एकटा पघिलैत लोहाक संग
एकटा तप्त चेहरा-समूह
चमकैत जकरा आँखिमे एकटा करुणा
एकटा चैतन्य करुणा।


विद्यानन्द झा

गामसँ पत्रा

माँ हमरा लिखै छथि पत्रा
टेढ़-मेढ़ आखरें
एकटा कार्ड आ कि अन्तरदेसी
छोट भाइ वा पितियौत
(वत्र्तमानसँ खौंझाएल
तैयो भविष्यक प्रति आशावान)
खसबै छथि ओकरा
बेचन ककाक दलान पर टाँगल
लाल डाकबला बक्सामे
जे कैक सालसँ
धान आ कि गहूमक बोझक बीच ठाढ़ रहला उत्तरो
बिसरल नहि अछि अपन साहेबी
आ दैत रहैत अछि हरदम
एकटा नागरीय मुस्की

शिबू भाइ लगबै छथि
मोहर ओहि पत्रा पर
(सियाही कने सुखाएल जकाँ छै तैयो)
चिन्तनमे लीन
ख’ढ़क जोगारमे
अबैत बरखा कोना काटब राति
बिचारैत शिबू भााइ
लगबै छथि मोहर हल्लुकेसँ
जानकी एक्सप्रेस आ कि पैसंेजरमे चढ़ि
प्रारम्भ करैत अछि
एकटा सुदीर्घ यात्रा
पत्रा
कैक टा नव-पुरान पोस्टमैन
कैक टा चिन्ता आ आशाक वाहक
आ भण्डार पोस्टमैनक हाथें
कैक टा नगर-गाम
बाध-बोन
धार आ पहाड़ टपैत
पहुँचैत अछि हमरा लग अंततः
ई पत्रा
आ हमरा शंका होब’ लगैछ जे
माँ पठौलनि अछि
पत्रा नहि
कोनो पार्सल।

किऐ गमकैछ
नव धान जकाँ
ई पत्रा?

हम आ अहाँ

अहाँक ठोर परहक
कोनो गीत छी हम
जतबा अहाँ गाएब
ततबा हम हएब

हमर कोनो भास नहि
पूर्वनिर्धारित
शास्त्राीय

कखनहुँ
भनसामे अपस्याँत
आटा सानल हाथंे
उनटे हाथें
पसेना पोछै काल
नहुँए नहुँए दै छी
अहाँ हमरा आकार
टुकड़ी-टुकड़ी

कखनहुँ
मोन पाडै़त
अपन गाम
गामक पोखरि
आ भगवती स्थान
दू क्षणक पलखतिमे
ओलरल ओछान पर
पसरल दुपहरियामे
विलम्बित सन भासमे
गबैत छी हमरा अहाँ
समदाउन जकाँ

कखनहुँ
नहाइत काल
अपन नितान्त एकान्तमे
मजैत अपन पैर
कोनो झिटुकासँ
मोन पाडै़त
हमर अहाँक संग
सुख दुःख
राग विराग
झगड़ा झंझटि
उचिती मिनती
गबै छी हमरा अहाँ
बटगमनी जकाँ

कखनहुँ
रात्रि शेषमे
चिड़ै सबहक चहचहाएब सुनैत
अपन अनिद्रा संग
एकटा असहज समझौता करैत
ठेलैत मोनक तहखानामे
हुलकी मारैत अपन
नितान्त निजू
इच्छा आ आकांक्षा
स्वप्न आ निराशाकें
तैयार करैत छी अहाँ अपनाकें
आब’बला दिन लेल
गबैत हमरा
पराती जकाँ

सत्ते
अहाँक ठोर परहक
कोनो गीत छी हम
जतबे अहाँ गाएब
ततबे हम हएब।

अहांँक गएबासँ फराक
कोनो टा
अस्तित्व नहि हमर

कोनो टा नहि



एहना समयमे
एहना समय
अएलहुँ अहाँ
जखन
अहाँक माइकें
लगै छलनि गन्ध
बसातक सिहकीमे
मालभोग धानक शीष फुटबा कालक
आ अपस्याँत छलहुँ हम
जे हमरा समयक
अपशेषक गन्ध
मिज्झर नहि भ’ जाए
माल-भोग गन्धमे

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन इजाद क’ रहल छल नुस्खा
बहुराष्ट्रीय निगम सभ
हमरा सभक वस्त्राकें
साफसँ साफ
झक झक साफ करबाक

मैलसँ मैल
आर मैल
चिक्कट मैल
भेल जा रहल छल
हमरा सभक नूआ-बिस्तर

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन दूध पी रहल छल
मूत्र्ति सभ
अवाक पीबि रहल छल लोक
एहि दृश्यकें
कोनो मसीहाक प्रतीक्षामे
आ खून पीबि रहल छला
धर्मक ठेकेदार सभ
नुकाएल भाँति-भाँति रंगक चोंगामे

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
दन्तहीन निरीह आकृति
गाँधीक अहिंसाक
देखैत रहै छल
परमाणु अस्त्रा सभकें
गणतन्त्रा दिवसक परेडमे
मुँह बओने

धानक हरियर कचोर खेत सभ
बदलि रहल छल
चाँदमारी मैदानमे

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
स्थविर गिद्ध सभ
सुख भोग करै छल
ययाति जकाँ
आ लहठी फोड़ैत
हिचुकैत रहै छली
पुरुक विधवा सभ

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
देशोन्मादक बूटी
घसि-घसि पिऔने जाइ छल
टीवीक परदा सभ
आ देसक भीतर बलि चढै़ छला
सरल देशभक्त
बेरोजगार लोकनि

एहना समयमे
अएलहुँ अहाँ
जखन
लक्ष्य तँ देखार छल
हमरा सभक
मुदा रस्ता नुकाएल छल धोन्हिमे
संशयक एकटा पैघ रातिमे

तैयो
नेने अएलहुँ अहाँ
एकटा छोट सन
उत्सवक मौसम
आ भविष्य पर विश्वास
(खाहे ओ अतार्किक किऐ ने हो)

मृत पितासँ वात्र्तालाप
आइ काल्हि
गामसँ हजारन कोस दूर
कैक राति
हम निन्नेमे उठै छी
आ नपैत चलि जाइत छी
भसियाइत डेगें
कोसक कोस

अहाँकें मन अछि बाबू
जाहि साल
मणिकर्णिकामे
थरथराइत हाथें
देने रही अहाँकें मुखाग्नि
ताही साल
अहाँक परम मित्रा
मित्तन बाबू जकाँ
(जे फेरि नेने रहथि मुँह
देखि क’ हमरा)
अपरिचित भ’ गेल छलीह
कमला
आ हहाइत फुफुआइत
गीड़ि गेल छलीह
ब्रह्मोत्तरमे रोपल
करिया कामोदक कोली

ताही साल
ओरा गेल छल
पुबरिया घरक
छोटकी कोठीमे राखल
करिया कामोदक बीया

उतरीधारी
गृहस्वामीक भूमिकामे हम
निन्नेमे उठै छी
आ नपैत चलि जाइत छी
भसियाइत डेगें
कोसक कोस
सेर आध सेर
करिया कामोदक बीयाक खोजमे
कैक राति
आइ काल्हि

खिचकाहनिमे चलैत
पसरल चारू कात
पाँक हमरा सभक
बासि स्वप्नक
कादो हमरा सभक
अपूरल स’खक
थाल हमरा सभक
अकर्मण्यातक
कीच हमरा सभक
दुर्भाग्यक

चलैत चल जाइत छी
हमरा सब
थाहैत थाहैत
समधानल डेगें
खिचकाहनिमे

नहि सुझाइ छै
बेसी दूर
खिचकहानिमे
डेग दू डेग मात्रा
रुक्ख एकटा जगह
आ कि
पजेबा एकटा अर्धभग्न
ओतबे टा देखाइ छै

कातक नाला --
भरल अपशेषसँ
आकि घर-घरसँ बहराइत
उच्छिष्टक टघार
उपभोगक अवशेष,
आब’ जाइ बलाक मुँह
किछुओ तँ नहि देखाइ छै--
मात्रा डेग दू डेग

चिन्ता रहैत छै
मात्रा अप्पन देह
अप्पन पैरक
अप्पन नूआ
अप्पन बिस्तरक
अनकर तँ किन्नहु नहि

खिचकाहनिमे चलैत
बचबैत देह कहुना
चलैत चल जाइत छी
हमरा लोकनि
प्रतीक्षा करैत
सुखेबाक रस्ता सभक
वा ब्योंत लगबैत
पड़ा जएबाक खिचकाहनिसँ
वा स्वप्न देखैत
पाँकमे कमल
फुलेबाक

बहतरा भ’ जाइत अछि लोक
मरबासँ पहिने
बहतरा भ’ जाइत अछि
कतेक लोक
मतिसुन्न भ’ जाइत अछि
मरबासँ पहिने

भरि जनम
बितौलनि जे
घाड़ खसौने
खसल आँखिए
पतिबरता भ’
चलबैत घर आँगन
करैत बरसाइत आ
आन व्रत उपास
पतिक मंगलकामनामे
से बुरही,
मरबासँ पहिने,
सैह बुरही,
उठै छथि अहल भोरे
आ पराती जकाँ
उठबै छथि
राग-भासमे गारि
करै छथि उद्धार
बुरहा आ
हुनकर सात पुरखाक

उठैत सुरुजक संग
उठैत अछि बुरहीक राग
शान्त होइत अछि
साँझ भेला पर
थाकि गेला पर

सत्ते
मरबासँ पहिने
बहतरा भ’ जाइत अछि
कतेक लोक,
कतेको लोक
मतिसुन्न भ’ जाइत अछि
मरबासँ पहिने


टीवी
ने माइ-बाप,
ने मास्टर-मास्टरनी
ने बाबा-बाबी
ने नाना-नानी
सभसँ पैघ
सभसँ काबिल
शिक्षक अछि
टीवी
हमरा बेटी लेल

टाॅम आ जेरीक
कार्टूनी हिंसा
दौड़ा-दौड़ी
चपटा क’ देब
मारि मारि क’ बना देब एक दोसरकें
तीन विमाक जीबैत जागैत
मनमे भरल
इच्छा आ आशा
सम्वेदना आ निराशासँ भरल लोककें
मात्रा एकविमीय निर्जीव
कार्ड बोर्डक बनल आकृतिमे
सिखबैत अछि
कार्टूनी हिंसा हमरा बेटीकंे
बौआएब
एकसर,
भकोभन्न मतिसुन्न एहि बियाबानमे
जत’
जीवित अछि मात्रा ओएह टा
आ मृत छै, एकविमीय आन सब।

सासु पुतहु
बेटी जमाइ
कुटिलतासँ भरल
चालि आ कुचालि
सिखबैत छै ओकरा
नहि विश्वास करी ककरो
कखनहुँ
एकसर,
मात्रा एकसर छी हमरा लोकनि
एहि सुन्न मसान
भकोभन्न बियाबानमे

हँसैत
माॅडल सभ, अभिनेत्राी सभ
अभिनेता सभ, कौखन नेता सभ,
हाथ बढ़बैत हँसि-हँसि
फेकैत डोरि
एहि उत्पाद
ओहि अनुभवक
पार कर’क लेल
एहि इहलोक वैतरणी

सिखैत अछि
बेटी हमर --
हम छी
कारण जे हम
उपभोग करैत छी



कृष्णमोहन झा


अहाँ बिसरि जाएब हमरा
हमर चारू कातक चीज रहत यथावत्--
फूल-पातक रंग ओतबे टुहटुह
मौसमक मिजाज जतबा सम्हारि सकतैक ओकरा
जिम्मरिक ठाढ़ि पर बैसल घनछोहाक डेन
रहत ओतबे बेकल
जतबा कोंढ़क धाह ओकरा बनेतैक
हमर मोनक देह आ ओसारक पीठ रहत ओतबे सरबल
एहि धरतीक नाभि पर बैसलि एकटा स्त्राीक उसझब
एहि चिनुआर-ओसार
आ घर-दुआरकें जतबा भिजेतैक...

सभ किछु रहत यथावत्
खाली पनबट्टीमे राखल एकटा सरौताकें छूब’ बला
आँखिक इजोत
पिपरमिन्टक पैखना लगा क’ हवामे बिला जाएत
नेरूक पीठ पर चतरल हमर हाथक स्पर्श
गोहालक गोंत आ अन्हारमे कतहु
हाफक बटन जकाँ हेरा जाएत
कोरमे दुबकल बगरोक बोलीकें पढ़बाक सेहन्ता
हमर देहक भाउरिमे घूमि-घूमि क’ सेरा जाएत...
एक दिन एकादसीक पारनक बाद
तौनीमे मुँह झपने जखन नीनक आवाहनमे रहब व्यस्त
या जिनगीक कोनो नीक-अघलाह काजमे ओझराएल-सोझराएल रहब
चक्रवातक पीठ पर दुलकी दैत एकटा गाड़ी आएत
आ हमरा केओ
ओहि पर चढ़ा क’ पड़ा जाएत।

सभसँ पहिने तखन
कुर्सीक पौआकें कुतरैत घूनक समुदाय करत शोक-प्रस्ताव
फेर डेढ़ी पर ठाढ़ कटहरक गाछ
पीयर गात खसा क’ व्यक्त करत अपन गिलगर मनोभाव
तकर बाद
लोक-बेदक कानब-उसझबमे घर-दुआर दहा जाएत

हमर कपड़ा-बस्तरकें
बहुत दरेगसँ फरकी पर बान्हि-छान्हि
चारि कनहा पर एक गोटाक स्मृति लदने आ राम-राम जपने
डबडबाइत आँखिएँ
जखन आरा दिस अहाँ सभ विदा होएब
तँ लगातार अकानैत आ बेर-बेर ऊपर तकैत झबरा कुकूरक अतिरिक्त
आर केओ हमर बोली-बचन नहि सूनि पाएब

पा भरि चानन आध सेर घी
आ एक ढेरी लकड़ीकें जरा-तरा क’
अहाँ सभ हमरा
निरन्तर मिझाइत खिस्साक एकटा कोन्टीमे स्थापित क’ बिसरि जाएब
मुदा टुग्गर चिलका जकाँ अहाँ सभक मुँह तकैत
असंख्य नक्षत्राक ओलतीमे ठाढ़ भेल भिजैत
हम एकटा अनन्त प्रबासकें बिताएब




नर्क-निबारन-चतुर्दसी
एहि ठामसँ दिन भरि यात्रा कएलाक बाद
गोहाटी अबैत अछि
गोहाटीसँ भरि राति आ भरि दिनक बाद
अबैत अछि--कटिहार
कटिहारसँ चारि-पाँच घण्टा निरन्तर
ढचर-ढचर सुनलाक बाद मधेपुरा देखार दैत अछि
आ मधेपुरासँ लटकल-फटकल पहुँचै छी--सिंहेसरथान
फेर सिंहेसरथानसँ--
चल बुढ़िया डेगाडेगी...
सुपौल मे कीन देबौ हबागड़ी...
मुदा हमर हवागड़ी सुपौलमे नहि
उतरबरिया घरक मोखाक गन्ध त’रमे राखल अछि
जत’ पहुँचि क’---एक जोड़ा फाटल पैरकें छुबिते हम
पच्चीस बर्खक यात्रा एक क्षणमे पूरा करै छी
आ देखैत छी जे---एक टा नर्कविहीन दुधमुँहा जीवनक
हरियर-कचोर दृश्यमे---नर्क-निवारण-चतुर्दशी
तुलबुलिया झिंगनीक पीयर टुहटुह फूल जकाँ खोंसल अछि
आ ओकर कातमे बिजलता सन चमकैछ
डाभि आ गौखलासँ भरल आरि
जे भोर आ दुपहर आ साँझकें मटियाबैत
अन्ततः दैत अछि ओही बर’क गाछ तक अदारि
ओहि गाछक डाँड़ पर एक टा धोधरि अछि
आ गाछक कन्हासँ फूटल अछि अनेको ठाढ़ि
ओकर एक टा ठाढ़ि पर अछि---पहड़िया मैनाक एक टा खोंता
आ सभसँ ऊपर लटकल हरिअर-पीयर मंूँगाक झालरि...
नर्कविहीन जीवनक ओ झालरि आ निष्कपटताक ओ अज्ञात पुण्य
दूधिया दाँत जकाँ टूटि क’ कतहु भ’ गेल विलीन
आ जीवनक एहि नर्कमे छटपटाइत
ई टुग्गर मोन---भ’ गेल अछि एतेक तिक्त आ श्रीहीन
कि एकरा
ने कोनो एकादशी ने द्वादशी ने त्रायोदशी आ ने चतुर्दशी
क’ सकैत अछि श्रापमुक्त ज्वरविहीन

पच्चीस-छब्बीस बर्खक पहाड़क ओहि पारक जीवन
अछि एतेक निष्पाप
आब लगैत अछि एतेक दुर्गम---कि कहियो-कहियो ओ
पूर्वजन्मक कोनो स्फटिक क्षण बुझाइत अछि
मुदा कखनहुँ-कखनहुँ ओ लगैत अछि एतेक लगीच
एहेन अन्यतम---कि कुड़ियाब’ लगैत अछि हमर पीठ
टहक’ लगैत अछि हमर प्राण



स्त्राीक आँखिएँ
नहि
एक्को टा शब्द नहि
उच्चारणक एक टा हल्लुको आघात
जलरंगक एहि लिपिकें थरथरा सकैत अछि
तें एना करू
कि एहि भाषाकें अपन उद्गममे घूरि जाइ दिऔ
आ प्रस्तुत अछि जे
ओकरा एक टा स्त्राीक आँखिएँ देखिऔ--

गाछ-पातसँ झाँपल रहलाक अछइतो
एहि जल-प्रवाहमे जँ
झिलमिला रहल अछि सूर्य
तें ओकरा सूर्यास्त कहि क’
एक टा सम्भावनाकें अपना हृदयमे नष्ट नहि करिऔ

भ’ सकैत अछि
एहि निर्जल समयक पीड़सँ बेकल ई नदी
पुनः हो गर्भवती
आ अपन मातृत्वक कान्तिमय वेदनामे
कुन्तीए जकाँ सिहरि-सिहरि क’ चमकि रहल हो!

एक दिन
आइ नहि तँ काल्हि
काल्हि नहि तँ परसू
परसू नहि तँ तरसू
एक दिन अहांँ घूरि क’ आएब अही चैकठि पर
आ बेर-बेर अपनहिसँ कहब अपना--
धन्यवाद! धन्यवाद!!


ओहि स्त्राीक कानब
घरक सभ गोटाकें खुआ-पिआ क’
अपनहु खा क’ आ भनसा घरक फट्टक लगा क’
पैर धुआ क’ एकटा स्त्राी अहाँ लग अबैत अछि
आ अहाँक पाँजरमे दुबैक रहैत अछि।
मसहरीसँ हाथ निकालि अहाँ लालटेम मिझबै छी
आ जीवनक अज्ञात उछाहमे
डबडब करैत
स्त्राीक अन्हारमे अपन सुख तकै छी।
फेर माछ-भात
फेर धनियाँ-मूरक चटनी आ फेर नेबोक स्वाद
फेर जाफरानी पत्ती आ फेर स्त्राीक अन्हार...
फेर अहाँ अपन उज्जर-सफेद जिनगीक कारीगरकें
मोने-मोन सुमरै छी
आ सन्देहसँ सोचैत छी बुद्धक दुख-दर्शन।
सुनू
खाली सपता-विपतासँ बान्हलि नहि
सात हजार विपैतसँ गछारलि अहाँक स्त्राी
नूनक कोही लग तेलचिट्टा जकाँ भटकि रहलि अछि
तेसर सालक तम्मा जकाँ
अछि कोठीक दोगमे दुबकलि
बरदक नाँगैड़क कपचल केस जकाँ
टाटक बत्तीमे खोंसलि अछि
सोमबारीक ताग जकाँ पीपरक गाछसँ लटकलि...
आ अहाँ
वाइलक बदला छपुआ साड़ी द’ क’ करैत छी
अगाध प्रेमक प्रदर्शन।
जहिना बहुत रास लड़ाइ आ बहुत रास प्रेम
बहुत रास लौलसा बहुत रास याचना
बहुत रास कानब बहुत रास भागब
खसि पडै़ छै समयक सभसँ पैघ डबरामे
अहूँक स्त्राी खसि जाइत अछि।
अपन माथ मुड़ा क’ आ श्राद्ध करा क’
विगलित मोनें गुमसुम बेटीकें देखै छी
त’ अहाँकें ओहि स्त्राीक कानब सुनाइ पड़ै अछि
जे अहाँक बेटीक देह आ आत्मामे
रसे-रसे पसरि रहल अछि।

रमण कुमार सिंह

उलटबाँसी
कृषि प्रधान एहि देशमे
किसान निरन्तर क’ रहल अछि आत्महत्या
जनकल्याणकारी राज्यक संसदमे
रोज बनैत अछि कानून मुदा
बनिया आ विदेशी सौदागरक लेल
स्कूल-काॅलेजमे आब चरित्रा
निर्माणक नहि
दोसराक जेबी सँ अपना जेबीमे पाइ
झटकबाक देल जाइत अछि शिक्षा
न्यायालयमे अभियुक्तक हैसियत
देखि क’ होइ छै फैसला
आ पमरियाक तेसर जकाँ
लोकतन्त्राक तथाकथित चारिम खाम्ह
अपन अस्तित्व लेल करैत
अछि नित्तह दिन संघर्ष
बाबा कबीर!
उलटबाँसी अहींक समयमे नहि
हमरो समयमे अछि
मुदा कतएसँ लाउ हम
अहाँ सन भाषा आ
अहाँ सन अपन शब्दमे असर
ईहो एक टा उलबाँसीए अछि, माफ करब कबीर!

फेरसँ हरियर
एक टा वयसक एकाकीपनसँ त्रास्त
हम आ अहाँ भेल छलहुँ संग
दुःख, उमेद आ उत्सवक ओहि राति

एक दोसरासँ अपन-अपन दुःख बाँटैत
पता नहि कहिया क’ नेने छलहुँ निर्णय
जे जहिया कनियों टा सुख क’ लेब अर्जित
दुनू गोटए मिलि क’ भोगब
साँचे कहै छी मीता
अहाँक आँखिमे चमकैत आकांक्षा देखि
मौसम अनेरो लाग’ लागल छल सोहाओन
हमर साँसमे व्यग्रता और
शब्दमे उत्साहक होमए लागल संचार
अहर्निश अहींक संगीत गूँजै छल
हमरा हृदयमे
अपन सपनाक एकान्तमे रचने छलहुँ एक टा
सुख-संसार
मुदा यातना आ प्रेमक एहि कथाक
अन्त भेल संशय आ नाउमेदीक कुहेसमे
सब किछु सूगा-मैनाक कथा जकाँ
व्यर्थ भेल मीता
कोनो कथाक एहन अन्त
कतेक दारुण होइ छै से बूझल अछि मीता?
तकर बाद किछु बाकी नहि रहै छै
निपट रिक्तता आ बेमतलब जीवन
अपने मोन समझाबै छै अपना मोनकें
दैत रहै छै भरोस
मित्रा-परिजन सब बुझबैत रहैत अछि
जीवनकें फेरसँ सुखमय बनेबाक व्योंत
नाउमेदीक एहि दौरमे कतहुसँ
उमेदक एक टा टुस्सी फुटैत अछि
आ जिनगी होमए लगैत अछि
फेरसँ हरियर।

किछु अंतरंग मित्राक प्रति
करीब तीनेक साल संग-संग रहैत
कहियो बुझाएल नहि छल जे
हम सभ छी फराक-फराक
केओ दुखित होइ छल तँ दुःखी
भ’ जाइ छलौं सभ गोटए
एकर कोनो मतलब नहि छल
जे के पाइ कमबैत अछि आ
के खरचैत अछि
के खाइत अछि पान आ के
ओकर पाइ चुकबैत अछि
धुआँ-गरदासँ रोगियाह एहि
महानगरमे बाँचल छल हमरा
सभक ठोर पर मुस्की
अखबारक कोनो हेडलाइनसँ नहि
कोनो ने कोनो कविताक पाँतिसँ
होइ छल हमरा सभक भोर
आ खिस्सा-पिहानीक संग होइ छल राति
मुदा आइ ई सब बीतल युगक कथा भ’ गेल
अपन-अपन परिवार बसएबाक क्रममे
उजड़ि गेल हमरा सभक ओ
निश्चिन्त आ उन्मुक्त जीवन
ई तँ हम नहि मानि सकै छी जे
हमरा सभक पत्नी आ बच्चाक कारणें
छोट भ’ गेल हमरा सभक दुनियाँ
हालाँकि दुनियाँ बदलबाक
हौसला नहि रखने छलहुँ हम सभ
मुदा परिवर्तनकामी विचार तँ
रखिते छलहुँ
फेर ई की भेल जे एक्के शहरमे
रहितो ने हम अहाँसँ क’ पबै छी भेंट
आ ने अहाँ सभकें रहैत अछि हमर खबरि
निश्चये दोष अहीं सभ टा केर नइं अछि भाइ
कतहु ने कतहु हमहूँ दोषी छीहे
मुदा एना तँ नहि होएबाक छल भाइ
ई तँ सोचनहुँ नहि छलौं कहियो
जे रोजी-रोटीक भागम-भागमे
बिसरि जाएब हम सभ अपनाकें
ई किऐ भेल भाइ?
जँ अहाँ सभकें एहि प्रश्नक कोनो
उतारा भेटए तँ हमरो कहब
भेंट नहि होअए तँ की हेतै
एसएमएम तँ क’ सकै छी!

आस्थाक गीत
सूर्य अपन लालिमा छोड़ि डूबि रहल
अछि पश्चिममे
सूर्य आइ डूबि रहल अछि
फेर काल्हि भोरे पूरबमे
उगबा लेल
सूर्य काल्हि फेर आओत
बिलहत अपन प्रकाश आ अपन तेज
एक दिन आओर भेटत जिनगी
सूर्य काल्हि फेर आओत
बिलहत वनस्पतिमे रंग
सूर्य अपन उगबाकें व्यर्थ नहि
होअए देत
फेर काल्हि किसान सूर्यक संगें
विदा होएत खेत दिस
नवका फसिल उगबाक तैयारी लेल
फेर काल्हि चिड़ै अपन पाँखि
सम्हारत नव उड़ान लेल
फेर काल्हि हमहँू जीयब एक टा
नव जिनगी
आइ सूर्य डूबि रहल अछि
फेर काल्हि बिलहत जिनगी।




सड़क बनौनिहार
दुर्गमसँ दुर्गम जगह पर आकि
व्यस्त महानगरक कोनो ठाम जएबा काल
सड़क परसँ सर्र द’क’ निकलैत
की कहियो उठल अछि अहाँक मोनमे ई प्रश्न
जे एहि सड़क सभकें बनौनिहार लोक सभ
पहुँचलाह कोनो ठाम आकि नहि?
एक टा सड़क जाइत अछि
देशक बहुत पैघ स्कूल दिस
एक टा सड़क राजधानी दिस
एक टा सड़क उद्योग नगरी जाइत अछि
एक टा सड़क जाइत अछि रंगशाला
मुदा कहियो अहाँ सड़क बनौहिार लोक सभकें
नहि देखने होएब स्कूल, राजधानी,
औद्योगिक प्रतिष्ठान आकि रंगशालामे

एना किऐ होइत अछि जे
जिनगी भरि हमरा अहाँ लेल
नव-नव बाट बनौनिहार लोक
रहि जाइत अछि बाटहिमे
कोनो मंजिल धरि नहि
पहुँचि पबैछ कहियो...?

अहीं सभ लेल
(दफ्तरी लोकक अत्मविलाप)
अहीं सभ लेल तँ हम बौआइ छी रने-बने
करैत रहै छी छल-छर्
िंअहीं सभ लेल रहै छी भरि दिन फिरीशान
मालिकक मुँहलगुआ सुग्गा बनल
डोलबैत रहै छी अपन नाँगरि

नहि निकालि पबै छी अहाँ लेल समय
धीया-पुताक संग नहि खेला पबै छी एको क्षण
मित्रा परिवार सम्बन्ध-बन्ध सभ छूटल
घ’रो पर आफिसेक काजमे रहै छी बाझल
घरसँ आफिस आ आफिससँ घरक तिरपेछन करैत
सोचैत रहै छी जे ई सभ क’ रहल छी अहीं सभ लेल

ई तीन टा शब्द--‘अहीं सभ लेल’
दैत अछि हमरा सन्तोष
ई तीन टा शब्द बनल अछि
हमर रक्षा कवच
अहाँ सोचियो नहि पबै छी जे
घरसँ निकललाक बाद घर घुरै धरि
दिन भरि हम की-की करै छी
आ कत’-कत’ जाइत छी
ई तीन टा शब्द झाँपि लैत अछि
हमर सभ टा अपराध!



अविनाश
सभ दिन रातिमे
सभ दिन रातिमे चारि टा लोक घरक देबाल
सभ दिन रातिमे ताशक कोटपीस
की कतहु किछु भ’ रहल छै गड़बड़
से के कहत?
सभ दिन रातिमे सजमनि सोहारी
सभ दिन रातिमे निन्नक खुमारी

विविध भारतीक छायागीतमे डूबल अछि लोक
ओ समय नहि जे
लोकमे डूबल अछि लोक
जीवनक पुरबा-पछबामे सदाबहार रेडियो
आ नेनपनक झिझिरकोना

बुचनूक घरमे क्यो नइं खेलकइ आइ
हम की क’ सकै छी भाइ?
क्यो की क’ सकैछ?
जखन देशक दुर्भाग्य
गाम-गाम
आत्मा बनि भटकि रहल हो
हम अपन सुखमे कते क’ सकैत छी बाँट-बखरा
हम अपन दुखकें कतेक पोसि सकै छी एकसर

हम एकसर पड़ल दुखी नागरिक
भयक बहन्ना छी बनौने
साँझमे बन्न क’ दै छी देशक दुर्दशाक विरुद्ध युद्ध
जेना युद्ध हो कोनो आॅफिसियल काज

सभ दिन रातिमे चकल्लस
सभ दिन रातिमे रंग-रभस

की हम सभ कोनो भोरक प्रतीक्षा क’ रहल छी?

की हम पछुआएल छी
आह, भरि दुपहरियामे औना रहल अछि मेघक नेह
फूजल खिड़कीसँ बरखा-बुन्नी देखि रहल अछि लोक
लोक, जे कम्प्यूटर पर दुनियाँ देखि रहल अछि
कते प्रसन्न अछि जे बरखाक एकटा बुन्नी
खिड़की नाँघि
आँखिक पपनीक ऊपरका चमड़ी पर
टप्पसँ खसल
कते हिलोर!
कते उत्साह!

बोल्ड ब्रिटनीक दिव्य दर्शन उपलब्ध अछि हमरा
आ कोनो दोसर देसक बरखा-बसात सेहो
हमरा मोन अछि
कतेको भण्डाफोड़मे दर्शक दुनियाँ सम्भव भेल सरहद
पार, समुद्दर पार
हम एकटा कोन धेने उत्साहित नहि
जे कोनो कोन हमरासँ विलग नहि

तखन, अपन देसक बरखाक मात्रा एकटा बुन्न
हमरा किऐ क’ रहल अछि विभोर
पुलकित पोर-पोर

की हम पछुआएल छी?
जखन अपसियाँत आधुनिकतामे
बिला गेल हो दिन-राति
हमरासँ प्रतिस्पर्धामे अछि भोर
भोरे-भोर
की हम पछुआएल छी?

कहबाक कला होइ छै

हिसाब-बाड़ी कहियो नइं भेल
आँगुरक बीचमे भूर अछि
जे अरजल सभटा राइ-छित्ती भेल
छिपलीमे बाँचल कनखूर अछि

हमर गाममे छल एकटा चैंसठ
कहैत छल,
अरजबाक कला होइ छै

जेना बिदापत मंच सँ कहै छथिन कमलाकान्त
कहबाक कला होइ छै

कलाजीवी झाजी आ कलाजीवी कर्णजी!
कलाजीवी हुकुमदेव आ कलाजीवी फातमी!

बाढ़िमे दहा गेलनि जिनकर गाम
सुन्न छनि जिनकर कपार
गुम्म छनि मुँहमे बकार

नचारीमे नइं ल’ पओता आनन्द

केओ उद्घाटन बाती जरओता
केओ देता अध्यक्षीय भाखन
जाड़-बसातमे चमक चाँदनी देखि
दुखित जन पीयर पुरान कागत पर लिखबे टा करत,
मुँहकें सी’बाक कला होइ छै

कतबो कहथु कमलाकान्त
सुनबाक कला होइ छै
हल्ला-गुल्ला जुनि मचाउ बाउ
छी संस्कारी लोक

कहबाक कला होइ छै!


सन्दिग्ध विलाप
गाममे आब सगरो ठाढ़ अछि कोठाबला घर
दूमंजिला सेहो
लोहाबला दरबज्जा लागि गेलनि बहुतोकें
दलनाक परिपाटी आब रहिए नइं गेल
सभ नुकाएल छथि घर’क दोगमे

दुपहरियामे रिक्शा पर टघरैत-टघरैत
हम हुलक’ चाहै छी दीयाद-बादक घर-आँगन
मुदा मन्हुआएल देबाल
बन्न खिड़की-दरबज्जा कहि दैत अछि
जे आब लोककें तकलासँ नहि भेटत लोक

नद्दी कातक सभटा खेत बहि गेल
गाछी अगोरने अनका गामक लोक

एतेक दिनक बाद अएलहुँ गाम
अबिते हम घूर’ चाहैत छी
परसौनी बाली काकी मुदा दुखित भ’ गेलीह सुनि कए

कत’ जाएब नूनू
भरि मुँह अखनि देखबो नइं केलहुँ अहाँकें
रौद खसला पर कचहरीसँ कक्का एता
त’ दौड़ेबनि हुनके
ल’ अनता माछ

हमरा बूझल अछि--
स्वाद ओएह पुरान हमरा भेटत
मुदा गाम हमरा नहि भेटल ओएह!

मोनक चैबटिया पर ठाढ़ भ’
स्मृतिक एहन हेराफेरी देखि हम विलाप क’ रहल छी
अनचिन्हार लोककें हमर विलाप लगैत अछि हृदय विदारक
ओ समवेत कहैत अछि-- वाह!

मुदा अहीं कहू
जे गाम छोड़ि क’ उन्नति केलहुँ हम सभ
गामक पुरान सन अवगतिमे किऐ घूर’ चाहै छी?




पंकज पराशर

बिहाड़िक बीच बाट तकैत

कोना हहाइत आएल काल-वैशाखी
जे अनसम्हार क’ देलक अछि ठाढ़ो रहब-
माझ बाधमे आड़ि बन्हैत कहलनि जामुन महतो

रंग-बिरंगक पतक्का सब जे उड़िया रहल अछि एहि बिहाड़िमे
देखार भ’ गेल जे किछु छल झाँपल-तोपल एते दिनसँ

केहेने-केहेन मोटगर गाछ नहि थम्हि सकल
गाछीक बीचोमे एहि रच्छछा बिहाड़िक जोर
मुदा एकसरुआ भेल गोटेक टा पीपर गाछ
आइयो अछि ओहिना ठाढ़ गामक सीमान्त पर
कैक बरखसँ

हओ बाबू!
गामक ठाम तँ छियह ओएह
मुदा लोक सब कतए जाइ गेलै हओ?

--चकोन्ना होइत कहै छथिन जामुन महतो
आ गाब’ लगै छथिन अकस्मात आइ-माइ जकाँ चिकरि-चिकरि क’
एक-पर-एक सोहर आ मूड़न-उपनयनक गीत
बेश टहंकारसँ

चकबिदोर भेल हम देखै छी हुनकर सबटा किरदानी
... आ कि ता हरो-हरो क’ आब’ लगै छथि कुहेसक धोन्हि फाड़ि क’
हेराएल-भुतियाएल हमरा गामक साकिन सब
लोक-कथासँ बहरा-बहरा क’ ओहिना करे-कमान

अन्हरिया रातिमे गोरिल्ला युद्धक ओरियाओनमे अपस्याँत
गामक युवक सब सकपंज भेल लोक दिस तकैत अछि
तेहेन नजरिसँ जेना फेर नहि घुरि सकत ओ
अपन गाम-ठाममे कहियो

जानि नहि कहिया होएत उग्रास हओ दिनकर-दीनानाथ!
कहिया शान्त होएत काल-वैशाखीक रच्छछा जोर-
पेटकुनिया देने हमर बाबी
लिबलाहा एकचारीमे गोहरबैत छथिन देवता-पितरकें

जानि नहि कतए-कतएसँ अबैत अछि ई काल-वैशाखी
कोन हवा केर दाब क्षेत्रामे साजैत अछि ई एहेन-एहेन मारुख साज-बाज
हम बहार होइ छी तकर उत्स केर खोजमे
मुदा भेटैत नहि अछि कोनहुना बाट।

राग मालकोश
दूपहर राति धरि लैपटाप पर अस्याँत ओ बिसरि चुकल अछि
अपन पत्नीक सेहन्ता
आ गर्भस्थ शिशुक आगमनक चिन्ता

योग्यताक समुद्र-मन्थनमे एखन एकाग्रचित ओ
अन्तरिक्षोसँ आगू जेबा पर अछि बिर्त

खेनाइ बनेबामे नितान्त अपटु ओकर रोबोट फोन क’ चुकल छै
फास्ट फूड केर दोकानकें
त्वरित होम डिलिवरीक निमित्त

उच्च तकनीकसँ सम्पन्न संचार व्यवस्थाक बीच
ओकरा मुट्ठीसँ बिलाइत रहै छै समय
समय-प्रबन्धनक उच्च डिग्रीक अछैतो

ओकर किन्नहु सक्क नहि चलै छै समय पर
ने दिन बिलमैत अछि नहि राति रुकैत अछि
कोनो अदृश्य लोक पर ओ अनेरो खौंझाइत रहैत अछि

थ्री-जी मोबाइल फोन पर अठबारे-अठबारे फोन केनिहारि
ओकर निरक्षर माइक आवाज
जेना कोनो नरहा इनारसँ अबैत अछि आध्ादित--
हाई लेवल मीटिंगक व्यंग्योत्राीक बीचमे

निराशाक सीमान्त धरि व्यथित माइक स्वर
पुत्रा केर एक्सक्यूज मीक खिसिआएल
द्रु्रत विलम्बित भासमे हेरा जाइत अछि

जकरा लेल चोरि केलहुँ सएह कहलक चोरा...
आ तकर तुरन्ते पंचम स्वर बाट धरैत अछि धैवत दिस...
हमर अभाग हुनक नहि दोष... हमर अभाग...



मारु(ख) विहाग

श्मशानसँ घुरि क’ लोह-पाथर छुबैत बारम्बार करै छी प्रयत्न
एहि असार संसारमे हृदयकें पाथर बनेबाक
मुदा चचरीमे बान्हल एकटा आओर लहास हमर कान्ह केर प्रतीक्षामे
पहिनहिसँ रहैत अछि अहर्निश रुदनांजलिसँ सिक्त भेल

कोना फड़फड़ाएल बमवर्षाक विहग सब महाशक्ति केर विरोधी आकाशमे-
तड़ित लयमे खसैत रहल कलस्टर बम सब निरीह जन अरण्यमे
आ हर्षित होइत रहलाह हाहाकारी स्वर-साधनामे निष्णात घरानाक गायकवृन्द!

मृत्यु-रागमे निष्णात नाटो देशक संगतिया सब अपन-अपन तानपूरा संग
मात्रा एकटा संकेतक प्रतीक्षा क’ रहल अछि पहिनहिसँ तैयार मंच पर बैसल
तबला मिलेबाक ठकठकीसँ दलमलित होइत रहैत अछि मानवताक आत्मा

थाटक बाट बिसरल अपन अश्मेधी टैंकसँ मीडियाकें जवाब दैत
सबटा कोमल स्वरकें बजेबाक भार दैत अछि ‘एंबेडेड जर्नलिज्म’ केर
नव-नव स्वरोत्सर्गी साधक लोकनिकें सम्पूर्ण विश्वक संगीत-पिता(ह)

कहरवा पर कुहरबाक साधनामे दीक्षित करौनिहार संगीताचार्य
नगर-नगरमे पहिनहि खोलि चुकल छथि हँसी मापक दोकान
धोधि लुप्तक मशीन सबसँ भरल अनेक तरहक अंगतराश
एमहर कैक बरखसँ खाली अफ्रीका आ एशियामे ताकि रहल छथि
विश्व-सुन्दरी आ ब्रह्माण्ड-सुन्दरी सितारक तार पर सुता क’ अखबारक पेज-थ्री पर

कोन-कोन राग बाबा हरिदास नहि सिखौलखिन तानसेनकें
मुदा अतृप्त अकबर आब ठोंठ पर चढ़ि क’ निकालि रहल छनि
सबटा राग पेंटेंटक अपन साफ्टवेयरमे संरक्षित करबा लेल

छोट-छोट तानसेन सब आँखि मुनने निमग्न भ’ क’ गाबि रहल अछि
मिनट-मिनट पर राग-मारु(ख) विहाग गुरुहन्त दिवसक पूर्व-सन्ध्या पर
विकासशील श्रोता समूह देशक नव-नव फरमाइशकें ध्यानमे रखैत

खयाल

श्मशानमे फुलाएल फूलक गन्ध मिज्झर होइत
रातरानी फूलक गन्धमे पसरैत अछि दहो-दिस
तीव्रगन्धी चिराइन गन्ध जकाँ

भैरवीक तान जकाँ तबला मिलबै काल क्यो हमरा
हाक द’ रहल अछि कैक युगसँ ओलतीमे ठाढ़ घोघ तनने

उतप्त श्वास केर परागकण सन्हियाइत अछि
मोनक कोनमे उठैत बोल खसैत अछि स्मृतिक तीव्र धारमे
आ भसियाइत चलि जाइत अछि हमर अधजरू लहास
सरगम केर तान जकाँ कपरजरूक विशेषण सुनैत-सुनैत

अहाँक एहि यमन-कालमे
हम नहि क’ सकलहुँ नीक जकाँ संगत से ठीके भेल बहुुत असंगत
कहरवा बजबैत ठोह पाड़ि क’ कनैत एहि मरुभूमिमे
मुखड़ा केर मृगतृष्णाक पाछाँ बौआइत रहि जाइत छी सन्तापित
संलापित कैक योजन धरि अवरोहणक प्रवाहमे


ध्रुपद

घरवलाक मारि वा सासुक तेखाएल बात पर खौंझा क’
बोनगामवाली भौजी काँख तर नुआ ल’ क’ विदा होइ छलीह नैहर लेल
आ गामक क्यो ने क्यो आइ-माइ घुरा अनैत रहनि हुनका
किरिया-सप्पत दैत, नेहोरा-मिनती करैत बौंसि क’ बीच बाटसँ

नैहरक बाट पर जखन जनमि गेलनि दूबि
तँ तामसें आन्हर भेल धी-पूतसँ भरल परिवारक बोनगामवाली भौजी
धारमे डुबबा लेल बहराइत रहथिन घरसँ दहो-बहो भेल
आ तकर बादो क्यो ने क्यो कहि-सुनि क’ हुनका घुरा अनै छलनि बीच बाटसँ

एकटा दीर्घ आलापक आरोह उठै छल नादक ओर धरि टहंकारसँ
जकर छोर पकड़ि क’ घुरा लै छलनि अवरोहक मान
स्त्राीत्वक आहत मोन पर सम्मानक लेपन करैत सुदीर्घ सरगमसँ

अन्तराक अन्तराल भसियाइत चल जाइत अछि दूर-दूर धरि
समन्धक रेगिस्तानमे पानिक दू बुन्न लेल ‘टप्पा’ दिस घीचैत
जीवन-रागक तान कोनहुना घुरैत अछि सम पर
एहि विषम युगक अजगुत थाटकें मोन पाडै़त

आइ मोतियाबिन्नसँ आन्हर भेल बोनगामवाली भौजी
थाहै छथिन स्वर-धार पर करबाक निमित्त साधन्स पानिमे
कोनो बिसरल तरानाक एको क्षणक आसरा
मुदा जीवन पंचमक थालमे लसकल बदलि रहल छनि
एक गोट अनन्त आकुल पुकारमे
विलम्बित केर बिसरल ताल कें मोन पाडै़त आब ओ
गनैत रहै छथिन मृत्युशय्या पर पड़ल-पड़ल
एक...दू...तीन...एक...दू...तीन...


अजित कुमार आजाद

मृतकक बयान
पहिने हमर नाम पूछल गेल
ओ नहि पतियाएल

फेर ओकर नजरि
हमर गरदनि दिस गेलै
ओ नहि परखि सकल जे ओतए
बद्धी छै कि ताबीज

तखन ओ हमरा नाँगट क’ देलक सरेआम
ओकरा तैयो विश्वास नहि भेलै

अन्ततः ओ हमरा मारि देलक
मुदा आश्चर्य
एकर बादो ओ निश्चिन्त कहाँ अछि?

लिंग भेद
अहाँ
मस्जिदकें
मन्दिरमे बदलि देलिऐ

अहाँ ओहिमे
राता-राती रोपि देलिऐ लिंग
टाँगि देलिऐ घण्टी
बजब’ लगलहुँ घड़ीघण्ट
गाब’ लगलहुँ आरती

हे नरेन्द्र
अजानक विरोधमे
खतना कएल हजारक हजार जान लेलाक बाद
की अहाँ कहि सकै छी
अहाँक देवताक लिंग खतल नहि छनि


बारूदक विरोधमे
शान्ति आ सम्मानक लेल युð कएनिहारि आंग सान सू चीक लेल
जखन कखनहुँ
कोइली कुहकैत अछि
दाबि देल जाइत अछि ओकर कण्ठ
कतरि लेल जाइत अछि ओकर पाँखि
लिखले छै पिंजड़ा
सुग्गाक भागमे सभ दिनहि...
परबोक घुटरब कहाँ सहाज छै ककरो

जखन कखनहुँ
कियो देखैत अछि स्वतन्त्राताक स्वप्न
तोड़ि देल जाइ छै ओकर निन्न
तंे कि लोक छोड़ि देलक अछि
सपना देखब...

हे भारतीक प्रतिरूप
अहाँक चाँछ लागल गाल पर
बरु लोक लगबैत रहल नोन-बुकनी
लोहाक माला आ डँरकस पहिर
अहाँ आरो सुन्नरिये भेलहुँ अछि

जुनि घबराउ हे सू ची दाइ
अहाँक डेन पर
जनम’ लागल अछि पाँखि
कोटि-कोटि कण्ठमे
आबए लागल अछि अहाँक स्वातन्त्रय-गीत
आब जखन कि
फूजि गेल अछि लोहाक फाटक
चलू, बारूदक विरोधमे
एक बेर फेर लड़ी लड़ाइ
हम सभ अहाँक संग छी

पिताएल छथि प्रभुगण
चान पर जाएत लोक
मंगल पर ओछाओत जीवन
वृहस्पति पर करत प्राणायाम
किन्तु पृथ्वी पर किन्नहुँ नहि रहत

एत्ते टाक सौंस पृथ्वी
किन्नहुँ कम नहि भ’ सकै छल
अपन सन्तानक लेल
तँ की सत्ते पृथ्वी पर कम भ’ गेलैक अछि जग्गह

प्रकृति गढ़लनि जोंक-झिुंगर-बाघ
ओ गढ़लनि सुग्गा-हाथी-मनुक्ख
मुदा, मुनक्खकें छोड़ि
आर कियो नहि जाएत चान पर, मंगल पर

मनुक्ख चानो पर बनाब’ चाहै’ए
चीन-जापान-अमेरिका
मंगलो पर कर’ चाहै’ए अमंगल
रोप’ चाहै’ए ओत्तहु
गया-नवादा-जहानाबादक बीहनि

बीत-बीतमे बँटल एहि सौंस पृथ्वीक प्रभुगण
एखनहुँ छथि पिताएल
पृथ्वीकें बाँटि लेब’ चाहै छथि दू-दू आँगुरमे
जड़ीब-कड़ीक संग आएल राष्ट्रसंघक अमीन
चिनबारेसँ शुरू करत नापी

चान-मंगलक चिन्तामे डूबलि पृथ्वीक देह
चँछाइत अछि कड़ीक रग्गड़सँ
छातीमे भेंसाइ छै कड़ीदारक गाड़ल खुट्टी
आत्र्तनाद करैत अछि पृथ्वी
आ ओम्हर गाछक जड़िमे बैसल
चान परहक ओ बुढ़िया
चरखा कटबामे निमग्न अछि

अघोषित युद्धक भूमिका
व्यस्त अछि लोक
एकटा
अघोषित
अपरिभाषित
युद्धक भूमिका लिखबामे

रंगमंच पर
रक्तबीजक सन्तान
भान करौने अछि अपन उपस्थितिक
सम्वादहीन दृश्यक परदा
एखन नहि खसतै भाइ

अछियाक हाथें बेचि देल गेल अछि चूल्हिक आगि
आयातित हँसी पर
जुनि भरमाउ संगी
संस्कृतिक रक्षार्थ
ढेकार लेब हमर विवशता थिक

हालाँकि बिझाएल नहि अछि ह’रक फार
कोदारिक बेंट नहि भेल अछि कमजोर
ढील नहि भेल अछि मुरेठा
आर-तँ-आर
लागि रहल अछि जेना
लगहिमे कतहु
पड़ि रहल होइक नगाड़ा पर चोट
आ हम
एहि संक्रमण-कालक परिधिसँ
बाहर अएबाक क्रममे
अपनाकें
रणभूमि मध्य ठाढ़ पबैत छी


कामिनी

अन्हारक सत्ता
घरमे पसरल अछि
बहुत रास अन्हार
आ बाहर टिप-टिप करैत
बरसि रहल अछि
घमाघट मेघ
सोझाँक उछाल खत्तामे
गाबि रहल अछि मल्हार
मदमस्त ढौसा बेंग
लोक कहैत अछि
एहि बेरुका बरसातमे
टूटि क’ रहतै बान्ह
महार पर जएबाक तैयारी
क’ नेने छै लोक
एक टा आतंक
पसरल अछि चारू कात
भय निराशा आ मोह
घेरने अछि चारू कातसँ
सलाइक काठीसँ
निकालै छै इजोत
आ क्षण भरिमे
अन्हार चाँपि लै छै ओकरा
अपनामे
अन्हारक सम्पूर्ण सत्ता
व्याप्त अछि हमरा चारू कात
आ विलीन क’ लेबए चाहैत अछि
अपनामे
एहि घरक सम्पूर्ण व्यवस्थाकें।

चारि पाँती
जहिया धसि जेतै दुनिया
जनसंख्याक भारसँ
आ पसरि जेतै चारू कात
पृथ्वीक एहि झंझर भेल शरीर पर
समुद्रक पानि
जहिया फुटि जेतै अपनहि
प्रयोगशालामे राखल
हजारक हजार बम
जहिया पसरि जेतै
एहि दुनियामे
मारक गैस
जहिया लागि जेतै
सम्पूर्ण जंगलमे
अपनहि आगि
गीत! कत’ बचा पाएब
चारि पाँती?

छौंड़ीक आँखिमे
एक टा छोट छीन छौंड़ीक आँखिमे
समाएल छै दुनियाँ
एक टा भरल-पुरल दुनियाँ
जै’मे कतौ नदी बहै छै
कतौ उतरैत अछि झरना
पहाड़ परसँ
हहाइ अछि कतौ
बाँसक पैघ-पैघ बोन
पुरबा पछबा बसातमे
कतौ उड़ान भरै अछि प्लेन
दूर धरिक यात्रा तय करबा लेल
लगाओल जाइत अछि कतौ
प्रदर्शनी
किछु बेचबा लेल
किछु कीनबा लेल
छौंड़ीक आँखिमे
हँसी अछि/एक बुन्न नोर अछि
पूरा दुनिया अछि
मुदा छौंड़ीक आँखिमे
छौंड़ी नइं अछि
कतौ नै अछि ओकर अस्तित्व
ओकर इच्छा/ओकर आकांक्षा
ओकरा तँ दौड़ाएल जा रहल छै
बेटीसँ पत्नी
पत्नीसँ माइ बनबा लेल।

मादा
मुनिगाक फुनगी पर बैसल मैना
ताकि रहल छै स्नेहसँ
मैनी दिस
ओ छूबि रहल छै
ओकर पाँखि आ ओकर ठोर
ओ करए चाहैत अछि
ओकरा आँखिमे
अपनाकें प्रतिष्ठित
ओहि समयमे
जखन कि पसरल छै निराशा
चारू कात
प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूपें
लड़ैत अछि सब
अपन-अपन युद्ध
सम्हारने अछि सब
अपन-अपन मोर्चा
अपना जगह पर
संशयात्मक दृष्टिएँ
देखि रहल अछि मैनी
मैना दिस
की एकैसम शताब्दीक अँगनामे खेलाइत
दुनियामे
बचल छै प्रेम सनक
किछु संजीवनी तत्व
जे उपहारमे ओकरा देल जा सकै
जकरा सम्पूर्ण रूपसँ
मात्रा मादा बुझल जाइ छै!

दुनिया बड़ छोट छै
ओकरा बेर-बेर मोन पडै़ छै
अपन माइ
जे ओकरा जीवनक कामना करैत
कहै छलै
दुनिया बड़ पैघ छै
जीतै तँ कतौ कमा क’ खेतै
मुदा कोनो पैघ बिल्डिंगक पाछूमे
कड़कट बीछैत
नाली साफ करैत
रेलवे पटरीक काते-कात कोयला बीछैत
इम्हर-ओम्हर फेकल
ऐंठ पात चटैत
ओकरा बेर-बेर बुझाइ छै
भूखक तुलना मे
दुनिया बड़ छोट छै।

लोली/ काँकड़ु/ एकटा आर कोपर / गद्दरिक भात/ बिकौआ/ दूध/दि’न/ पुत्रप्राप्ति/ कोठिया पछबाइ टोल/ कैप्टन/जाति

लोली
एहि शब्द पर भेल धमगिज्जर,
लोल हम्मर अछि नहि बढ़ल,
एतेक सुन्दर ठोढ़केँ छी,
अहाँ लोली कहि रहल।
हँसल हम नहि स्मृतिकेँ,
छोड़ि छी सकलहुँ अहाँ,
फैशन-लिपिस्टिक युगोमे,
लोलीकेँ खराब बुझलहुँ अहाँ।

काँकड़ु
काँकड़ुगणकेँ छोड़ल एकटा ड्रममे,
नहि बन्न कएलक ऊपरसँ,
पुछल हम छी निःशंक अपने।
यौ मिथिलाक ई अछि काँकड़ु सभ,
एक दोसराक टाँग खींचत,
बक्शा बन्द कर्बाक करू नहि चिन्ता,
खुजलो सभटा सभ ठामे रहत।


एकटा आर कोपर
गप्प पर गप्प,
प्रकाण्डताक विद्वताक।
हम्मर पुरखा ई,
हाथीक चर्चा,
सिक्कड़ि-जंजीर टा जकर बचल।
आँगनमे लालटेन नहि
वरन् डिबिया टिमटिमाइत,
लालटेन गाममे समृद्धिक प्रतीक।
फेर दलान पर गप्पक छोड़,
एकटा कोपर दियौक आउर।

गद्दरिक भात
गत्र- गत्र अछि पाँजर सन,
हड्डी निकलल बाहर भेल।
भात धानक नहि भेटयतँ,
गद्दरियोक किए नहि देल।
औ’ बबू गहूमक नहि पूछू,
दाम बेशी भेल।
गेल ओ’ जमाना बड़का,
बात-गप्प नहि खेलत खेल।
बिकौआ
बड़ पैघ भोज उपनयनक,
पछबारि पारक छथि नव-धनिक।
बी.के.झा नाम नहि सुनल,
ओतय ठाढ़ ओ’ धनिक।
आरौ बिकौआ छँ तूहीँ,
दूटा पाइ भेल ओ’ भाइ,
कलकत्ता नगरीक प्रतापे।
नहि तँ मरितहुँ बिकौए बनि,
झा,बी.के. नाम भेल।

दूध

महीस लागल छल लागय,
बहिन दाइक ठाम।
पहुँचलहुँ आस लेने,
ठाँऊ भेल बैसलहुँ ओहि गाम।
दूध छल जाइत औँटल,
मुदा बहिन दाइकेँ गप्पमे
होस नहि रहल।
भोजन समाप्ते प्राय छल,
दूध राखल औँटाइते रहल।
कहल हम हे बहिन दाइ,
अबैत रही रस्तामे देखल,
साँप एक बड़-पैघ,
एतयसँ ओहि लोहिया धरि,
दूध जतय औँटाइछ।
ओह भैया बिसरलहुँ हम,
दूध रहल औँटाइत,
मोनमे बात ततेक छल घुमरल,
होश कहाँ छल आइ।
दि’न

विवाह दिन तकेबाक बात,
युवक बाजल पंडितजी अहूँ,
नहि बुझलहुँ अमेरिकाक प्रगति,
ओतय के दि’न तकबैत अछि कहू।
अहाँ अधखिज्जू विद्वान सुनू।
हमर तकलाहा दिनमे विवाह कय,
झगड़ा-झाँटि करितहु बुझु,
जिनगी भरि पड़ै अछि निमाहय।
ओतय बिनु दिनुक विवाह,
भोरसँ साँझेमे भय जाइछ समाप्त।


पुत्रप्राप्ति
लुधियानाक मन्दिर पर रहैत छी,
पूजा पाठ करैत छी।
कहैत छी अहाँ ठकि कय हम खाइत छी,
गाममे तँ एक साँझ भुखले रहैत जाइत छी।
दस गोटेकेँ पुत्र प्रप्तिक आशीर्वाद देल,
पाँचटाकेँ फलीभूत भेल।
पुत्री जकरा भेलैक से हमरा बिसरि गेल,
मुदा पुत्रबला कएलक हमर प्रचार,
मिथिलाबाबाकेँ ठक कहैत छह,
गामक हमर ओ’ दियादी डाह।

कोठिया पछबाइ टोल

बूढ़ छलाह मरैक मान,
पुत्र पुछल अछि कोनो इच्छा,
जेना मधुर खयबाक मोन,
नीक कपड़ा पहिरबाक मोन,
फल-फूल खयबाक मोन।
कोठाक घर बनयबाक इच्छा,
पूर्ण भय पायत किछु सालक बादे,
कहू कोनो छोट-मोट इच्छा,
पूर करब हम ठामे।

हौ’ कहितो लाजे होइत अछि,
पछिबारि टोल कोठियाक रस्ता,
दुरिगरो रहला उत्तर ओकरे धेलहुँ,
जाइत दुर्गास्थान कारण,
टोल छल ओ’ अडवांस्ड।
मोनमे लेने ई इच्छा जाइत छी,
जे ओहि टोलमे होइत विवाह।
कहैत तावत हालत बिगड़ि गेलन्हि,
ओ’ बूढ़ स्वर्गवासी भेलाह।

कैप्टन
वॉलीवॉलमे खेलाइत काल,
पप्पू भाइक होइछ हुरदंग,
खेलायब हम फॉरवार्डसँ,
नहि नीक खेलैत छे नीक,
आगू खेलाय देखैब हम।
सभ सोचि विचार कय,
बनाओल कैप्टन पप्पू भायकेँ,
टीमक हारि देखि कय जिद्द,
खेलाय पाछुएसँ।
फारवॉर्ड बनू अहीं सभ
नहि तँ मैच हारू आगुएसँ।
जाति
ऑफिसमे छल काज बाँझल,
किरानी पर एकगोट तमसायल।
कोन जातिक छी अहाँ,
धैर्य आब नहि बाँचल,
दशो लोककेँ कैक दिनसँ छी झुट्ठो घुमाओल।

छाती ठोकिकय जातिक नाम छल ओ’ बाजल,
दसोलोकक दिशि निन्गहारि ताकल,
ताहिमेसँ एक सजाति उठल बाजल,
घोल-आसमर्द्दक बीच कहलक नहि बाजू,
जातिक नाम धय कय,
ई यादि राखू।
काज अछि हमरो बाँझल,
मुदा जातिक अछि बात जौँ,
अछि कलेजावला जाति ई,
से काज कतबो लेट हो।

गाम

गाम
तीस वर्ष नौकरी कइयो कय,
नहि बनल एकोटा मित्र।
आस-पड़ोसी चिन्हैतो नहि अछि,
ऑफिसक पूछू नहि गति।
गाम छोड़ि शहर छी आयल,
हमर मुदा अछि मोन।
सात जनम घूरि नहि जायब,
गाम छोड़ि नगरक कोनो कोन।

क्रिकेट-फील्डिंग

क्रिकेट-फील्डिंग

हम बाबा करू की पहिने,
बॉलिंग आ’ कि बैटिंग।
बॉलिंग कय हम जायब थाकि,
बैटिंग करि खायब जे मारि।
पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह,
से सुनह हमर ई बात बौआ,
बटिंग बॉलिंग छोड़ि-छाड़ि,
पहिने करह ग’ फील्डिंग हथौआ।

मैट्रिक प्लक

मैट्रिक प्लक

हौ सभकेँ सुनलहुँ केने बी.ए.,एम.ए.,
मुदा बुझल नहि छल डिग्री,
दोसरो होइछ आनो-आनो।
आइ एक पकठोस बटुक,
अछि आयल दलान पर पूछल,
कोन अंग्रेजिया डिग्री छी लेने,
मैट्रिक प्लक एहने किछु बाजल।
हौ काका अछि की ओ’ गेल,
ओकर गेलाक बाद हम बाजब,
कारण अछि भेल ओ’ फेल।

समुद्री


समुद्री
संस्कृतक पाठ नहि पढ़ल,
कोन पाठ अहाँ पढ़ने छी,
पंडित कहि बजबैत अछि सभ क्यो,
त्रिपुण्ड धारण कएने छी!
रहथि हमर पुरखा पंडित,
छोड़ू हमरा इतिहास देखू।
मिथिलाक गौरव याज्ञवलक्य,
कपिल कणादक देश छी ई,
जैमिनीक,गौतमक अछैतहुँ,
पुछै छी पण्डित केहन छी।
सामुद्रिक विद्या ज्योतिषिक जनय छी,
नहि सुनल फेर बहस किए छी केने।
फेर छी हँसी करैत अहाँ यौ,
भविष्यक छी हम हाल लेने।

बानर राजा

बानर राजा
सिँह राजसँ भेल पीड़ित वन-जन,
इलेक्शन करायल मिलि सभ क्यो,
संख्या वानरक हरिण मिला कय,
छल बेशी से भेल ओ’ राजा।
सिंहराजकेँ तामस अयलन्हि,
खा’गेल हरिणराजक बच्चा एकदिन।

दाबीसँ हरिण गेल सम्मुख,
वानर राजा कहलन्हि,
बदमाशी अछि सिंहक,
कहि निकलि गेल जंगल बिच।
गाछक डारि पकड़ि छिप्पी धरि,
खूब मचेलक धूम।
तामसे विख भय सिंह राज,
खएलक बच्चा सभटा मृगराजक,
जखन सुनाओल जाय वनराजकेँ,
फेर वैह धूम फेर मचाओल।
मृगराज कहल हे नृप,
एहि हरकंपसँ होयत,
जीवित हमर संतान।
कहल नृप कहू भाय,
हम्मर मेहनतिमे अछि की कमजोरी,
करल प्रयास हम भरिसक मुदा,
बुझू हमरो मजबूरी।

श्राद्ध नहि मरा जाय

श्राद्ध नहि मरा जाय
एक मृत्यु फेर दोसर मृत्यु,
नेनाक पिताक-काकाक।
कक्काक लोकवेद छलन्हि दबंगर,
से चिन्तित छ्ल छोटका भाइ।
श्राद्धावधिमे दोसर मृत्यु भेने,
एक्के श्राद्धसँ होइछ दोसराक श्राद्ध,
एकक श्राद्ध जायत मराय,
छल चिंतित दूनू भाय।
कमजोरहाक संग पण्डितो देत नहि,
शास्त्र धरि किछुओ कहय,
मामागाम खबरि दियौक,
पिताक श्राद्धने मरा जाय।

मसोमात

मसोमात
मलेमासक मेला-ठेला,
ट्रेनक धक्का मुक्की।
हँसैत-हँसैत पेट छी पकड़ल,
हे यै कनियाकाकी।
कहैइत छलीह एकटा मसोमात,
भीड़मे ओहि गाड़ीमे,
एतेक दुःखतँ ओहू दिन नहि भेल,
भेलहुँ राँड़जाहि दिन,
हौ सवारी।

असत्य

असत्य
हम कक्कर काज नहि कएलहुँ,
बेर पर मुदा काज क्यो आयल?
असत्य नहि कहियो छी बाजल,
सत्यक आस नहि छोड़लहुँ आ’
असत्यक बाट सेहो नहि ताकल।
यौ अहाँ, एहनो क्यो बजैत अछि,
असत्य नहि छी कहियो बाजल,
एहिसँ पैघ कोनो असत्य अछि।
क्यो दुःखी कहलकतँ काज केलहुँ,
अपने जा कय तँ नहि पुछलहुँ,
ओक्कर काज भय जाइत छैक,
तँ उपकरि कय पुछैत छी,
जौँ काजमे भाँगठ होइत छैकतँ,
निपत्ता भय जाइत छी,
बेर पर एहने काज अहाँ अबैत छी।

हम आलांकारिक प्रयोग केलहुँ तेँ,
टाँग पकरैत जाइत छी।

पाइ

पाइ
देखू पाइ नहि लिय’ अहाँ,
बेटा विवाहमे कारण जे,
पुतोहु करत उछन्नड़,
पाइ बाली आयत जौँ।
पूछल अहाँ सभ जे छलियैक लेने,
बेटा विवाहमे पाइ जे,
कहलन्हि अहूमे गप्प अछि दूटा।
पहिल जे पाइ दबबैत अछि लोककेँ।
मुदा दोसर,
जे दबा दैत छियैक,
हमरासभ पाइकेँ ।
जे कहलहुँ गुनू तकरे,
हमरा पर नहि आउ दाइ गे।

बापकेँ नोशि नहि भेटलन्हि

बापकेँ नोशि नहि भेटलन्हि
यौ बुझलहुँ बुच्चुनक गप्प,
नहि करैत छी खिधांश,
सुनू हम्मर साँच।

समयक छल नहि हमरो अभाव,
कहल हँ सुनाउ किछु भाषण-भाख ।

देखि पुछलियैक बुच्चुनकेँ हौ,
ई की उजरा नाँकसँ सुँघने जाइत छह,
कहलक काका खोखीँ होइत छल,
खोखीँक दवाइ अछि ई।
औ बाबू बाप मरि गेलैक,
मोशकिल रहय नौँसि भेटब,
मुदा देखू बेटा सोँटैत अछि विक्स वेपोरब।

गाय

गाय
लाठी मारबामे कोनो देरी नहि,
बछी भेला पर शोको थोड़ नहि,
परन्तु छी पूजनीया अहाँ,
निबंध लिखैत छी अहाँ पर क्षमा।

क-ख सँ दर्शन

क-ख सँ दर्शन
ट्युशन पढ़बय जाइत छँह,
इज्जततँ करैत छौक?
जलखै तँ नहिये परञ्च,
चाहो-पानिक हेतु पुछैत छौह।
ट्युशन कय खाइत छी,
की कहलहुँ हे से नहि बाजू।
द्रोणक नव अवतार छी हम,
से छियन्हि कहि देने,
जाइत देरी करह जलखैक व्यवस्था,
करू नहितँ छी नहि हम द्रोण,
औठाँक नहि कोनो लालसा थोड़।
मात्र पढ़ेबन्हि छओ महिना,
दर्शन नहि होयतन्हि क-ख केर,
नहि से नहि बाजू,
खुआ पिया कय केने अछि ढेर।

होइ अछि जे हुम लुक्खी नहि छी

होइ अछि जे हुम लुक्खी नहि छी
देखि हुनका(गारिपढ़ुआकेँ),
देबय लागलथि गारि,
लुखीक नाम लय कय,
सात पुरखाकेँ देलन्हि ताड़ि।
ओ’ अनठेने ठाढ़ बूझल,
दैत अछि ई लुक्खीकेँ गारि।
कहल अन्तमे(गारि पढ़निहार),
हौ की छह होइत ई,
मूँहतँ छह केहन अप्पन,
लुक्खी नहि अपनाकेँ बुझैत छी।

बेचैन नहि निचैन रहू

बेचैन नहि निचैन रहू
दौरि-दौरि कय पोस्ट-ऑफिस,
भेलहुँ जखन अपस्याँत किएकतँ,
मनीऑर्डरक छल आस।
पुछल एखन धरि अछि नहि आयल,
मनीऑर्डर यौ प्रभास।
चिट्ठीयेक संग पठेने छलथि पाइ,
चिठी तँ समयेसँ पहुँचल,
टाका किए नहि बाउ।
पोस्ट बाबू जे कए नेने रहथि,
हुनकर पाइसँ कोनो उद्यम,
कहल चिट्ठी अबैत अछि,
बेटा अछि अहाँक छट्ठु,
पाइ पठबैत समयसँ तँ पहुँचैत,
मुदा पठबैत अछि छुच्छे संदेश।

बेचैन किए छी,
की अप्पन उद्यम करब हम अहाँक टाकासँ,
से बुझैत छी।

दोसर गामक पोस्टबाबू,
फेकैत अछि चिट्ठी कमलाक धारमे,
हम छी बँटैत तेँ कहैत छी जे भेटल अछि संदेश।

की-की गछलियन्हि

की-की गछलियन्हि
ट्रेनमे भेटलाह घटक,
यौ फलना बाबू।
मुँह देखाबक जोग नहि छोड़ल,
आगाँ की-की बाजू।
शांत बैसू भेल की।
अहाँक अछैत होइत की,
एहि गरीबक पुत्रीक,
कन्यादान संभव की भाइजी।
औ’ अहाँ गछि लेलियन्हि,
भेल कोजगरा द्विरागमनो,
भेटलन्हि किछुओटा नहि वरागतकेँ,
कोनोटा इज्जत नहि राखलन्हि ओ’।
यौ अहूँ हद्द कएलहुँ।
यादि नहि की-की गछलियन्हि।
ओहि सुरमे छलुहुँ बेसुध,
हँ मे हँ टा मिलेलियन्हि।
कहैत गेलाह ओ’ एक पर एक,
नहि कहि कय बुरबकी करितहुँ।
लक्ष्मीपात्र छथि से लक्ष्मी देलियन्हि,
आबोतँ जान बकसू।
मॉटरसायकिल लय की करतथि,
देहो-दशा ताहि लेले चाही,
चेनक लेल बेचैन किय छथि,
निचेन रहथु,
बाकी अछि बात ई।
ताकि रहल छी पुत्रक हेतु,
तकैत रही अँहीक आस,
औ’ छलहुँ कतय भाँसल,
अहाँ यौ घटकराज।
कोनो मोटगर असामी,
आनि करू उद्धार,
तीनू बेटीक कर्जसँ उबारथि जे,
चाही एहन गुणानुरागी।

चोरबजारक जुत्ता

चोरबजारक जुत्ता
ओह नहि मोन पारू,
बुझल अपनाकेँ बुधियार,
आनल ई जुत्ता ततयसँ,
गेलहुँ जहिया चोर बजार।
सैंत कय राखल एकरा,
थाल कीच नहि लागय देल।
पैर दैत छलहुँ पानिमे आ’
जुत्ताकेँ हाथमे लेल। दु
इये दिन तँ पहिरल एकरा,
सीढ़ीसँ छलहुँ उतरैत,
सोलसँ उखड़ि सोझँहि निकलल,
शरीर आत्मासँ रहित जे भेल।
सीबि-साबि कय ची पहिरि रहल,
पाइ वसूली तैयो हएत।
नहि पूछू जौँ पूछय छथि क्यो,
मोन कनैछ भोकारि-पारक लेल।

मरकरी डिलाइट

मरकरी डिलाइट
सोझाँसँ त्रिपुण्ड-चानन, देने आयल रहथि उदना।

देखल गामक प्रवासी जहिना, कहल रौ छँ तोँ भाइ उदना।
संग कटलहुँ बाँस, जड़िमे बान्ही गमछा हम आवाजकेँ दबेबा लेल, आ’ टेंगारीसँ दू छहमे काटय छलह तोँ, पुरनाहाक डबरामे लीढ़क नीचा नुका कय, करी संपन्न ई काज बिन विघ्न।

हम पश्चात् भेलहुँ प्रवासी, मरकरी-डिलाइट दयकेँ तोँ, भेलह गामक वासी।
पंडितक अकाल छल नहि, छलह कोनो कंपीटीशन, भेलहुँ अहाँ औ’ भजार, गामक नव उदयनाचार्य।

फ्रैक्चर

फ्रैक्चर

हॉस्पीटलमे आबाजाही
गामक प्रवासीक।
बुझैत छलाह जखन समाचार पिताक भर्त्तीक।
ठामहि दरभङ्गा बस-स्टैंडहिसँ,
गाम जयबाक बदला अबैथ हॉस्पीटल।

की केलहुँ शरीरकेँ,
आ’ नहिये बनेलहुँ जमीन-जत्था।
बच्चा सभक लेल नहि
राखल दृष्टि यैह व्यथा।
की सभ करैत,
कतय नहि पढ़ैत,
चण्डाल किए भेलहुँ हे कक्का।

ओतहि बैसल छलाह टुटियाँ,
पिताक समक्ष,
पहिनहिँ बुझने छलाह जे,
छल ई फ्रैक्चर।
कहल पहिने समाचार तँ पुछिअन्हु,
चाहो आब अबैत होयत,
पैर हाथ धोआय अनिहन्हु।
कहल पैर टुटि गेल की कका,
पिता किछु बजितथि,
बजलाह टुटियाँ,
होइछ टूटब आ’ फ्रैक्चर होयब एक्के,
नहि छलन्हि बूझल से,
कहल नहि चिंता करैत जाउ,
भगवान रक्ष रखलन्हि,
फ्रैक्चरे भेलन्हि,
पैर टूटल नहि बाउ।

स्मृति-भय

स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहल्मे
, बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,
आ’ एकरा संग लागल भय,
भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।
समयाभाव,आ’कि फूसियाहिंक व्यस्तता,
स्मृति भय आ’कि हारि मानब,
समस्यासँ,आ’ भय जायब,
स्मृतिसँ दूर,भयसँ दूर,
सामाजिकरणसँ दूर-खाँटी पारिवारिक।

मुदा फेर भेटल अछि समय,युगक बाद,
बच्चा नहि,भ’ गेलहुँ पैघ;
फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,
लिखबाक हेतु लिखना,मुदा
दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,
युग बीतल,स्मृति बिसरल,भेलहुँ एकाकी।
सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,
घटनाक्रमक जंजाल,फूलि गेल साँस,

हड़बड़ाक’ उठलहुँ हम,
आबि गेल हँसी,
स्वप्नानुशासन,
लट्पटाकेँ खसलहुँ नहि,
धपाक; भ’ गेलहुँ अछि पैघ।

बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,
खसैत छलहुँ आ’ उठैत छलहुँ,
शोनितसँ शोनितामे भेल,
उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,
स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,
ब्रह्मांडक कोलाहल,
गुरुत्वसँ बान्हल,
चक्कर कटैत,करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,
आ’ तकर पार कैकटा सूर्य।
के छी सभक कर्ता-धर्ता,
आ’ जौं अछि क्यो,त’ ओकर
निर्माता अछि के’,
ओह! नहि भेटल छोड़।
लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,
नहि करब चिन्तन,तोड़ल कलम,
करची आ’ दवात।
के छी ई सहस्त्रबाढ़नि
, घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,

शापित दानव आकि कोनो ऋषि,
ताकैत छोड़ समस्याक,
आ’ समस्यातँ वैह,
के ककर निर्माता आ’
तकर कतय अंतिम छोड़,
के ककड़ स्वामी आ’
सभक स्वामी के?
आ’ तकरो के अछि स्वामी!

भेटल स्वप्नानुशासन,
टूटल शब्दानुशासन,
तकबाक अछि समाधान,
फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,
खसब नहि धपाक,तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान ल’ग,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।

जेना कोनो भय,कोनो अनिष्ट,
बढ़ा देलक छतीक धरधरी,
आ’ कि नेनत्वक पुनरावृत्ति!
जन्म-जन्मांतरक रहस्य,आत्माक डोरी?
आ’ कि किण्वन आ’ विज्ञान
केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आ’ विषक संकल्पना,
स्वाद तीत,कषाय,क्षार,
अम्ल कटु की मधुर!
खाली बोनमे उठैत स्वर,
षडज, ऋषभ, गान्धार,
मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!
खोजमे निकलि गेलथि अत्रि,
अंगिरा, मरीचि, संग लेने
पुलऋतु,पुलस्त्य आ’ वशिष्ठ।
प्राप्त करबालेल अष्टसिद्धि अण्मिक,
महिमाक, गरिमाक, लघिमाक,
प्राप्तिक, प्राकाम्यक, ईशित्व
आकि वशित्व, सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।
नौ निधिक खोज-पद्म,महापद्म,
शंख,मकर, कच्छप, मुकुन्द,कुन्द,
नील आ’ खर्व,
बनल आधार दशावतारक।
मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद,
सप्तर्षिकेँ, आ’ संगे मनुक परिवार।
कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आ’
वासुक व्याल, आनल सुधा-भंडार।
वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,
चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश,
मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद,
मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल,
दू पगमे पृथ्वी आ’ तेसरमे दैत्यराज।
परशुराम, राम आ’ कृष्ण;
केलन्हि असुरक संहार,
आ’ बुद्धि बदललन्हि तकर विचार।
तैं की जे हुनक प्रतिमा,
खसौलक देवदत्तक संतान।
छिः।क्यो रोकि नहि सकल बामियान।
नहि कल्कि नहि मैत्रेय,
जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,
चौदह भुवन आ’ तेरह विश्वक,
अनबा युग-कलधौत।
अर्णवक कोलाहलमे जाय छल,
नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन,
ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।
दशावतारे तँ छथि,
उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।
मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह,
फेर नरसिंह,
तखन वामन।
एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,
ताकय लेल छल निकलल।
दऽ देलन्हि अवतारक नाम,
भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,
कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,
ओ’ ताहि द्वारेतँ नहीं एलाह मैत्रेय।
लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,
फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ’,
आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,राजनीति,
गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।
कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय,
बिहारिमे अंधविश्वासक।
दर्शन भेल जतय अनुत्तरित,
आ’ विज्ञान देलक किछु समाधान,
तँ पकरब छोर एकर गुरुवर,
जे केलक समस्या दूर।
एकर परिधि भने अछि छोट,
यदि परिधि करब पैघ,
तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर,
दर्शनकेँ धर्ममे आ’ धर्मकेँ
नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आ’ एस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी

विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर।
तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू,
मुदा भरत-तनय छथि पाछू।
लीलावतीयोमे,भानुमतीयोमे
कोना तकताह जातिगत भेद,
एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख
मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।
सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।
विज्ञान आ’ कला,भूख आ’ अन्न;
भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।
यादि पड़ल गामक भोज,ब्राह्मण आ’
शोलहकन्हक फराक पाँति,
पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू
परसन पर परसन,
दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।
रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,
भेटल राहूक ग्रास।
यादि पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,
भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,
आ’ साँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आ’
ग्रहणक कलन,
दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।
रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,
कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।
ब्यास्जीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ
सामाजिक समरसताक;
अखनहु धरि अछि जीवंत,
नहीं भेल खतम;
दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;
सुखायल किएक विद्या,
सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,
सुखा गेलीह बिनपानिक बिन बुद्धिक।
फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,
एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज,
कि होयत बंद? आ’कि
एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,
युधिष्ठिर-शकुनिक
एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।
कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह
पक्का बारहमे, आ’ करताह अपन पौ-बारह।
तीनटा पासा आ’ चारि रंगक सोरे-भरि गोटी,
करत भाग्यक निर्माण?
चौपड़क चारि फड़ आ’
एक फड़मे चौबीस घर,
की ई फोड़त भारतक घर?
युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,
जे चारि लोकक सोझ केला पासाक,
खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।

दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,
खेला खेलक संग नहि वरनT खेलेलहुँ
देश आ’ प्त्नीक संग।
तैं दैत छी ह’म ई उपराग,
शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि
आबय ठोकर मारि पड़ाय,
सतघरिया; ती-ती –तीतार तार
मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ
आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ
द्विरागमनक बाद भड़फोड़ी
तक कनियाक संग।
वासर-रैन
हे युधिष्ठिर-रूपी
भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,
सभकेँ दियऽ ई शिक्षा,
दिअऊ संगीतक मेल;
स्मृति भय तोड़ल सुर,
दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,
गाबि सकी हमारा गीत।
कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,
मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,
उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;
सएह होयत हमर परिणीत।
झम्पि बादर दूर भेल भय,
गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,
हृदय मध्य बाउग कए,
मौलि-मउल छाउर दए।
शंख-फूकब वीर रससँ,
करब शुरु भय-भंजन;
स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,
खनहि तोड़ब खन-खन,
करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,
गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।
खोलब बंद बुद्धि-विवेक,
रुण्डमालमसानीसँ,
तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।
गाम गाम रहत नहितँ,
डुबायब भागीरथीक धारसँ;
जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,
डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।

भेल भूमि विलास कानन,
निविल बोन विहसि आनल;
कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,
दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।
धरणि विखिन छल,
गंगा-तनु झामर,नहि कल-कल।
विज्ञान गणितक कोमल-गल,
अभाग्य तापिनि केल’क छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,
अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,
गामक लोकहि बजायब ठाम,
सोंपलि गाम,पाँति तोहाऊ,
चलब दर्शन-अद्वैत मोहाऊ,
गामेमे रहब हम मीत,
गायब नव-दर्शनक गीत।
अपन दर्शनक लेल जे देलक,
अहाँकेँ गामक वनवास,
लेब तकर बदला हमारा जा कय,
कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,
दुइ सहस्त्राब्दिक खेल केलेलन्हि जे,
तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,
बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,
कुसुम ततय आनब हम आनब।
सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,
पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,
जे अज्ञात तकरो ताकब हमारा तात,
परञ्च जे ज्ञात,
तकर त’ करए दिय’ हिसाब-किताब।

महाबलीपुरममे

महाबलीपुरममे
असीम समुद्रक कातक दृश्य,
हृदय भेल उमंगसँ पूरित।
सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग,
आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम।
नूनगर पानि जखन मुँह गेल,
भेलहुँ आश्चर्यित,गेलहुँ हमारा हेल।
लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय,
अंग-अंग सिहरि-सिहराय।
देखल सुनल समुद्रक बात,
बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास।
सुनेलक ‘मणि’ गाइड ई बात,
एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य,
पल्लव वंशक ई छल देन,
भारतवसी बिसरल तनि भेर।
मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर,
राजा खतम भेल बिसरल जन,
हरि-हरि। टूटल इतिहासक तार जखन,
स्वाति भेल ह्रास अखन;
कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर,
भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित।
आब एखन अछि हम्मर ई हाल,
गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात।
छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर,
प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़।

सन सत्तासीक बाढ़ि

सन सत्तासीक बाढ़ि

कमलामहारानीकेँ पार कएल पैरे,
बलानकेँ मुदा नाउक सहारे।
मुदा आइ ई की भेल बात,
दुनू छ’हरक बीच ई पानि,
झझा देत किछु कालमे लियऽ मानि।

चरित्रक ई परिवर्तन देलक डराय,

नव विज्ञानक बात सुनाय।
बाँध-बाँधि सकत प्रकृति की?
भीषण भेल आर अछि ई।
हृदयमे देलक भयक अवतार,
देखल छल हम गामक बात।
बड़का क’लम आ’ फुलवारीमे,
बड़का बाहा देल छल गेल;
पानिक निकासी होइत छल खेल।
नव विज्ञानी ई की केलथि,
बाहा सभटा बन्न भऽ गेल।
फाटक लागल छहरक भीतर,
बालु मूँहकेँ बन्न कय देल।
एक पेड़िया पर छलहुँ चलल हम,
आरिये-आरिये, देखल रुक्ष।
पहिने छल अरिया दुर्भिक्ष,
आब दुर्भिक्ष अछि छुच्छ।
सिल्ली, नीलगाय सभटा सुन्न,
उपनयनमे शाही काँट अनुपलब्ध।
जूड़िशीतलक भोगक छल राखल,
गाछक नीचाँ सप्ताह बीतल।
नहि क्यो वन्यप्राणी आयल खाय,
चुट्टीक पाँत पसरायल जाय।

छहरपर ठाढ़ अभियन्ताक गप,
छलहुँ सुनैत हम निर्लिप्त।
मुदा जाहि धारकेँ कएल पैर पार,
तकर रूप अछि ई विस्तार।
नवविज्ञानिक चरित्रानुवाद होयत एहन नहि छल हम जानल,
मुदा देने छल ओकरा दुत्कार,
कुसियारक किछु गाछ,पानिक बीचमे ठाढ़।
माटिक रंगक पानि,आ’ हरियर कचोड़ गाछ,
छहरक ऊपरसँ झझायल पानि,
लागल काटय छहरकेँ धारक-धार।
ठाम-ठाम क़टल छल छहर,
ऊपरसँ बुन्नी परि रहल।
सभटा धान-चारु,भीतक कोठी,
टूटि खसल,पानिक भेल ग्रास।
हेलिकॉप्टरसँ खसल चूड़ा-गूड़,
जतय नहि आयल छल बाढ़ि,
किएकतँ पानिमे खसाकय होयत बर्बाद।
हेलीकॉप्टरक नीचाँ दौड़ैत छल भीड़,
भूखल पेट, युवा आ’ वृद्ध।
ओ’ बूढ़ खा’ रहल छथि चूड़ा-गूड़,
बेटा-पुतोहुक शोक की करि सकत पेटक क्षुधा दूर?

एकटा बी.डी.ओ.क बेटा छल मित्र,
कहलक ई सरकार अछि क्षुद्र,
ओकरा पिताकेँ शंटिंग केलक पोस्टिंग,
गिरीडीह सँ झंझारपुरक डिमोशन, कनिंग।
मुदा भाग्यक प्रारब्ध अछि जोड़,
आयल बाढ़ि पोस्टिंग भेल फिट।
सोचलहुँ जे हमरेटा प्रारब्ध अछि नीच,
शनियो नीच, सरस्वती मँगेतथि की भीख?
पहुँचलहुँ गाम, पप्पू भाइक मोन छोट,
विकासक रूपरेखा, जल-छाजन,निकासी..,...
बात पर बात फेर सरकारक घोषणा,
बाढ़ि राहत, एक-एक बोरा अनाज,
सभ बोरामे पंद्रह किलो निकाललथि ब्लॉकक कर्मचारी।
बूरि छी पप्पू भाई अहूँ,
मँगनीक बरदक गनैत छी दाँत,
पिछला बेर ईहो नहीं प्राप्त।
हप्ता दस दिनक बादक बात,
क्यो गेल बंबई,क्यो धेलक दिल्लीक बाट;
गाममे स्त्री,वृद्ध आ’ बच्चा,
बंबईमे तँ तरकारी बेचब,बोझो उठायब;
सभ क्यो केलक ई प्रण,
मायक स्वप्न अछि कोठाक होय घर,
अगिलहीक बाद फूस आ’ खपड़ा,
पुनः बनायल बखाड़ी जखन भेल बखड़ा।
भने भसल बाढ़िमे भीत,
बनायब कोठाक घर हे मीत।
खसल लागल ईंटा गाममे,
कोठा-कोठामे भेल ठाम-ठाममे।
पुरनका कोनटा सभ गेल हेराय,
जतय हेरयबाक नुक्का-छिप्पी खेलायल ह’म भाय।
आब सुनु सरकारक खटरास,
आर्थिक स्थिति सुधारल
ह’म मेहथमे क’ खास।
आदर्श ग्राम प्रखंडक एकरा बनाओल,
कहैत छी जे ह’म बंबई दिल्लीमे कमाओल,
सुनु तखन ई बात,
जौं रहैत अस्थिर सरकार,
तँ रहैत नहीं दिल्ली नहि बम्मई,
विजयनहरम साम्राज्यक हाल,
पुरातात्विककेँ अछि बूझल ई बात।
धन्यभाग ई मनाऊ,
हमरा जितबिते रहू हे दाऊ।
प्रगति-परिश्रम अहाँ करू,
हमर समस्यासँ दूर रहू।
बाढ़ि आयल सत्तासीमे,
तबाही देखलहूँ,
मुदा कहैत छी हम,
देखू आबाजाहीकेँ।

धन्यभाग हे नेता भाई,
अहीसँ तँ मनोरंजन होइत अछि,
मेला-ठेला खतम भय गेल,
हुक्कालोली भेल दिवाली,
आ’ जूड़िशीतलक थाल-कादो-गर्दा
भेल होली।
तखन अहूँक बात सुनने दोष नहि ,
कमायलेल हमहूतँ दिल्ली-बंबई आयल छी,
कमसँ कम अहाँक ई बड़कपन,
जे गामकेँ नहि छोड़ल,
मनोरंजनो करैत छी,
कमाइतो छी,खाइतो छी।
आ’ दिल्ली बंबइ सेहो घुमैत छी।

सूर्य-नमस्कार

सूर्य-नमस्कार

ॐ मित्राय नमः।।1॥
आँखि करताह ठीक मह,
हिनकर लाली’ कत्था-पान,
दाँतक त’रमे जखन चबान,
हनूमानक सूर्यक ग्रहण पड़ल मोन,
लाली देखल चढ़िकय मचान।
सूर्य-ग्रहणक वर्ण अछि,
नहि ई राहुक ग्रास,
विज्ञानक छैक सभ बात,
कहलन्हि कुलदीप काक।
पृथ्वी घुमैछ पश्चिम सँ पूर्व,आऽ,
सूर्य केँ घूमबैत अछि पूर्व सँ पश्चिम।
मुदा कहू जे गर्मीमे उत्तर-पूर्व आऽ
जाड़मे उत्तर-पश्चिम कियै छथि सूर्य।

की नहीं चलैत छथि अपन अक्ष,
ग्रहणक हेतु राहुक नहि काज,
चन्द्रमा बीचमे किरणक करै छथि ग्रास।
सभ गणना कय ठामे देल,
बूड़ि पंडित केलक अपवित्रक खेल।
खेल-खेलमे देश गेल पाछू,
आबहुतँ सभ आगू ताकू।
पुनि-पुनि करि दण्ड हम देल,
स्थिरचित्त नेत्र ई सभक लेल;
राहू-केतु सभक दिन आब गेल।
गंगामे गोदावरी तीरथमे प्रयाग,
धन्यभाग कौशल्यामायकेँ राम लेल अवतार।
स्नानक बादक मंत्रक ई भाग,
खोलत भरत प्रगति-एकताक द्वार।
शक्ति देहु हे भानु मामहः; ॐ रवये नमः।।2॥

मेरुदण्ड-पग होयत सबल,
सूर्य-नमस्कारक परञ्च पाठ प्रबल।
सूर्यवंशीयोक अहह अभाग,
कर्ण-तर्पणक नहि करू बात।
जाति-कर्मक ज्ञानक ओर,
छल ओतय, नहि किएक पकड़ल।
राहू-ग्रासक बातक मर्म, अहह;
ॐ सूर्याय नमः॥3॥
सात अश्व-रथक उमंग,
रथमूसल अजातशत्रूक संग,
महाशिलाकंटकक जोड़,
केलक मगध काज नहि थोड़।
जर्मनी-इटलीक एकताक प्रयास,
दुइ सहस्त्राब्दी पहिनहि काश,
रश्मिक सात-अश्वक रहस्य,
बूझल मगध ताहिये पहर।
छोड़ल भाव पकड़लहूँ अर्थ,
हा’ भरतपुत्र केलहुँ अनर्थ।
भरु शक्ति हे सूर्य अहाँ;
ॐ भानवे नमः।

श्वासक-कुंभक केलहूँ अभ्यास,
यादि पड़ल कुन्तीक अनायास।
सूर्यमेल सुफल भऽ गेल,
कवच-कुण्डल भेटल,
सेहो इन्द्रहि संगे गेल।
एकलव्य पहिनहि द्रोण केलन्हि फेल,
अर्जुन, कर्ण-विजय कय लेल?
अखनहुँ ई प्रतियोगितामे अछि भेल,
प्रतिभाक रूप छय विकृत कैल,
अखनहूँ धरि की तू ई सहबह !!
ॐ खगाय नमः॥5॥
सूर्या आश्विन गमनमे फेर,
अछि परस्पर द्वंदक देरि,
गुरु बृहस्पति ठाढ़े-ठाढ़ ,
करतथि ई सभक उद्धार।
अखनहुँ गुरु छथि गूड़,
शूल दैत जोड़ पर हमारा ऋणी,
कहैत जे बनओताह हमरा चिन्नी,
रहताह स्वयं कुसियारक गूड़,
गुरुक-गुरुत्व उष्ण-सुड्डाह हह,
ॐ पूष्णे नमः॥6॥
जकर अंकसँ निकलल विश्व
विश्वक प्राण, आऽ तकर श्वासोच्छवास,
गुरुत्वक खेलकेँ बनेलहूँ अहाँ, काछुक,
सहस्त्रनागक फनि जानि कि-की?
एकटा रहस्य आर गहिरायल,
भरत-पुत्र गेल हेरायल।
तकर ध्यान हेयास्तदवृत्तयः;
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः॥7।।
सूर्यकिरण पसरि छय गेल,
कतेक रहस्य बिला अछि गेल,
तिमिरक धुँध भेल अछि कातर,
मुदा ई की अद्भुत भेल।
रात्रि-प्रहर देखलहुँ सप्त-ऋषिगण,
दिनमे सभ-किछु स्वच्छ अछि भेल,
मुदा नहीं तरेगणक लेल ई भेल।
सत्यक परत तहियायल बनल खेल,
हाऽ विश्ववासी शब्दक ई मेल,
अहाँक दर्शनक स्तंभ किए भेल।
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः।
ॐ मरीच्ये नमः॥8।।
अहँक तेजमे हे पतंग प्रभाकर,
सागराम्बरा अछि जे नहायल,
सौर ऊर्जाक नव-सिद्धांत,
नहीं की देलक कनियोटा आस,
मेघा-मास नहि अहाँक अछि जोड़,
तखन मनुक्खक बात की छोड़।
पढ़ल ग्रंथ ब्रह्मांडक बात,
तरणि सहस्त्र एकरा पार,
अंशुमाली तपनसँ पैघगर गाल।
तकर ऊष्णता की हम सहब;

ॐ आदित्याय नमः॥9॥

पिताक बात अछि आयल मोन,
बिना सावित्रीक गायत्रीक की मोल,
दुइ वस्तुक मेल कखनहुँ नीक,
कहुखन परिणाम भेल विपरीत।
कटहर-कोआ खेलाह तात,
देलन्हि ऊपर पानक पात।
पेट फूलल भेल भिसिण्ड,
परल मोन रसायन-शास्त्र।
तीव्रसंवेगानामासन्नः;
ॐ सवित्रे नमः॥10॥

मोन पड़ल चोरी केर बात,
चोरक आँखिमे आकक पात,
पातक दूध पड़ला संता चोर,

सोचलक आब आँखि गेल छोड़ि।
कहलक मोने बुद-बुद्काय,
करु तेल नहि देब मोर भाय।
अर्कक दूधक संग करु तेल,
बना देत सूरदासक चेल।
गौवाँ केलन्हि बुरबकी एहि बेर,
चोरक बुनल जालक फेर।
तेल ढ़ारि पठौलन्हि चोरकेँ गाम।

मुदा रसायन भेल विपरीत,
चोरक आँखि बचि गेल हे मीत।
गौआँक काजक हम लेब नहि पक्ष,
बस सुनायल रटन्त विद्याक विपक्ष।
ध्यान धरह आ’ ई कहह;
ॐ अर्काय नमः॥11॥
पोथीक भाष्य आ’ भाष्यक भाष्य,
अलंकारक जाल-जंजाल,
विज्ञानक पाखंड,
ऋतम्भरा बुद्धि कतय छल गेल।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः;
ॐ भास्कराय नमः॥12।।
करु स्वीकार हमर ई कविता,
हे दुःखमोचन हे, हे सविता।
दूर करू विकार संपूर्ण;
केलहुँ सूर्य-नमस्कार हम पूर्ण।

ट्रेन छल लेट

ट्रेन छल लेट

जायब दिल्ली कोना,
अस्पतालक भर्ती कक्ष,
ट्रेन अछि लेट, डॉक्टर अछि व्यस्त।
पहुँचलहुँ दिल्ली,
दिल्ली दूर अस्त,
दिल्लीक सरकारी डॉक्टर,
आइ,काल्हि,परसू,भेलहुँ पस्त।
युग बदलल,गणतंत्र आयल,
मुदा ट्रेन दिल्ली जायबला,
आ’ डॉक्टर दूनू फुर्र,
दिल्ली अखनहुँ अछि दूर।

वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ


वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ
सफदरजंग हॉस्पीटलसँ,
आइ देखल हम मीत,
डॉक्टर-पेशेंट फ्री इलाजक,
दंभ भरइ छथि,हा’ इष्ट।
साबुन-तेल सभपर टैक्स,
भरइ छथि सभ वासी,
लैटरीन गंदा अछि पुछने,
नर्स बिगरि देखबइ छथि अपोलोक पगपाती।
जाऊ अपोलो गंदगी जौँ लागय,
टैक्सक बात फिनान्स मिनिस्टरेकेँ जाऊ बूझाबय।

इच्छा-मृत्यु

इच्छा-मृत्यु


हे भीष्म अहाँक कष्टक बखान,
सुनल छल खाइत पान-मखान,
मुदा बुझलहुँ नहि ई बात ,
ईच्छा-मृत्यु किए कै तात!
भीषणताक’ कथा नहि थोड़,
भूख,अत्यचार गरीब पर जोड़,
हरिजन शोलकन्ह थोड़हि-थोड़,

केलन्हि भयावह क्षत्रिय तोर,
घोषनि-ब्राह्मण सभ मोर,
केलन्हि रटन्ता विद्या तोर।
एक युधिष्ठिरपर छोरिकय राज,
छोड़ल अ’हाँ निसास।
हमर युधिष्ठिर पाँच सय चालीस,
पहिरथि खादी-रेशमी खालिस,
बुझल भीष्म हम आब ई बात,
पेलहुँ इच्छा-मृत्युएँ अहाँ निजात।

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