भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, July 18, 2008

इमानदारीक ग्लैमर

इमानदारीक ग्लैमर

घर अबैत काल मोन कोना दनि करहल छल। सभ क्यो एक दोसरा सँ किछु असंभव घटित होयबाक गप करहल छलाह। हम दुनू भाय सातम कक्षामे पढ़ैत छी, संगहि-संग। मुदा आइ पैघ भायक पेटमे दर्द छल से ओटिफीनक बाद छुट्टी लघर चलि गेल छलाह। स्कूलमे सभकेँ हँसैत देखैत छी, तँ अपन घरक स्थिति यादि पड़ि जाइत अछि।ईर्ष्य़ा सेहो होइत अछि आन बच्चाक भग्य पर। फेर मोनमे ईहो होइत अछि, जे हमरे सभ जेकाँ परिस्थिति होयत एकरो सभक। मुदा झुट्ठे प्रसन्नताक नाटक करैत जाइत अछि।घरमे माय बापक कलहक बीच डरायल सन रहैत छी। लगैत रहैत अछि जे ई सभ परिस्थिति कहियो खत्म नहि होयत। नहितँ दोसरसँ गप्प कय सकैत छी, नहिये ककरो अपन मोनक गप्पे कहि सकैत छी। बेर-बखत कहियो अपन सहायताक हेतु सेहो सोर नहि कसकैत छी। माय ठीके घरघुसका, मुँहदुब्बर आदि विशेषणसँ विभूषित करैत छलीह। साँझमे घुमनाइ आकि दुर्गापूजाक मेला गेनाइ, ई सभ बात हमरा सभक जीवनसँ दूर छल। एक बेर भूकम्प जेकाँ आयल छल, सभ क्यो ग्रील तोड़ि कय बहरायल, मुदा हम खाट पर पड़ले रहि गेलहुँ। किछुतँ अकर्मण्यतावश आकिछु ई सोचि कय , जे की होयत घर टूटि देह पर खसत तँ समस्यासँ मुक्तियोतँ भेटत। एक बेर बाबूजीकेँ कटहरक कोआ खेलाक बाद पेट फूलि गेलन्हि, दू बजे रातिमे। ईहो नहि फुराइत छल, जे बगलमे श्रवनजीक बाबूकेँ बजा लियन्हि, जे कोनो डॉक्टरकेँ बजा देताह। फुरायलतँ छल, मुदा कहियो ग्प नहि छल, तँ आइ काज पड़ला पर कहियन्हि, से हियाऊ नहि भेल। माय केबाड़ पीटि कय पड़ोसीकेँ उठेलन्हि, कनैत खिजैत रहलीह। पड़ोसी डॉक्टरकेँ बजओलक, तखन जाकय बाबूजीक जान बाँचल। माय श्राप सेहो दैत रहल आईहो कहैत रहल जे पाँच वर्षक बेटा रहैत छैक तँ सभ भरोस दैत छैक, जे कनैत किएक छी, अहाँकेँ तँ पाँच वर्षक बेटा अछि। आई सभ .....जाह, अपने भोगबह हमतँ दुनियासँ चलि जायब। बहिन कॉलेजमे पढ़ैत छलीह। कॉलेजक रस्ता पैरे जाय पड़ैत छल। आकॉलेजसँ आँगा स्कूल छल। बहिन कहलन्हि, जे अहूँ सभ संगे हमरा सभक संगे चलू। एक दिन हमरा सभ गेलो रही। मुदा गप बिनु केने हम दुनू भाँय आगू-आगू झटकैत चल गेलहुँ। मोनमे ईहो भव छल, जे छौड़ा सभ चीन्हि नहि जाय जे हमरा सभक ई बहिन छथि। आब ई सोचैत छी जे चिन्हिये जाइत तँ की होइत। अपन व्यक्तित्त्वक विकासक कमी छल ई? बादमे पैघ भेल छी तँ माँ-बापकेँ उकटैत छियन्हि, जे घरघुस्सू आमुँहचुरूक संज्ञा जे देलहुँ अहाँ सभ, कहियो ई सोचलहुँ, जे कोनो पड़ोसीसँ गप्प नहि करबाक, संगी-साथी नहि बनयबाक, घूमब-फिरब नहि करबाक उपदेशक पाछू, जे अहाँ सभ उपदेश देलहुँ, ओकर पाँछा इच्छा समाजक बुराइसँ दूर करबाक उद्द्य्श्य छल, परंतु यैह तँ बनेलक मुँहचुरू आघरघुस्सू हमरा सभकेँ। रातिमे माय बापक झगड़ाक सीन सपनामे देखैत छलहुँ आडरा कय उठि जाइत छलहुँ। पैघ भाय बहिनसँ हमरा खूब झगड़ा होइत छल, मुदा एक बेर माय-बापक झगड़ाक पछति, खूब कानल छलहुँ, खूब बाजल छलहुँ। किछु दिनसँ भाय-बहिनसँ झगड़ाक बाद टोका-टोकी बन्द छल। सभ बेर वैह लोकनि आगाँ भटोकैत छलाह। मुदा एहि बेर हम कानैत-कानैत बहिनकेँ टोकलियैक आफेर कहियो बहिनसँ झगड़ा नहि भेल। भाय पिठिया छल, संगे पढ़ैत छल ताहि हेतु ओकरासँ तँ झगड़ा होइते रहल, मुदा कम-सम। एहि सभ गपक हेतु माँ पिताजीकेँ जिम्मेदार ठहराबथि, जे सभसँ पड़ोसी-संबंधी, जान-पहचानसँ गप करबासँ ओकहियो नहि रोकलन्हि आसभटा दोष पिताक छलन्हि। एक बेर ग्लोब किनबाक जिद्दक बाद कएक बेर समय देल गेल, जे आइ आयत काल्हि आयत। हम पढ़ब छोड़ि देलहुँ। आतखन जाकय ग्लोब आयल। बहिन अखनो कहैत छथि, जे ग्लोब अनबाक जिद्दक पूरा भेलाक बाद हमर पढ़ाइक लय टूटि गेल। वर्गमे स्थान प्रथमसँ नीचाँ आबि गेल आपिताजी एकर कारण तंत्र-मंत्रमे ताकय लगलाह। एकटा तांत्रिकसँ भेँट भगेलन्हि। कतेक दिन हमरा सभ गाममे रहैत जाइत गेलहुँ। कॉलोनीमे एकटा एकाउन्टेंट बाबू छलाह। ओबाबूजीकेँ कहलखिन्ह, जे अहाँ तँ घूस नहि लैत छी, मुदा अहाँक पत्नी अहाँक नाम पर घूस लैत छथि। सभ ट्रांसफरक बाद बिहार सरकारक नौकरीमे दरमाहा बंद भजाइत छैक।आताहि द्वारे सभ ट्रांसफरक बाद बाबूजी हमरा सभकेँ गाम पठा दैत छलाह। एहि क्रममे हमरा सभ गाममे छलहुँ। पिताजीक चिट्ठी माँक नामसँ गाम आयल छल। हमही पढ़ने रही। बाबूजी मायकेँ लिखने छलाह, जे जौँ अहाँ पाइ लेने छी तँ लौटा दियौक। हम विजीलेंसकेँ लिखने छी, छापा पड़त तखन पाइ निकलत तँ बड्ड बदनामी होयत। एहि सभ परिस्थितिमे स्कूलमे हम घरक परिस्थितिकेँ बिसरि जयबाक प्रयास करय लगलहुँ। झुट्ठेकँ हँसय लगलहुँ। ई आदति पकड़ने छी। घरक बड़ाई करय लगलहुँ। लोक सभ बाबूजीक ईमानदारीक तँ चर्चा करिते रहय। हम सभ घरक कलहक विषय घरक बाहर अनबासँ परहेज करय लगलहुँ, लोक बुझत तँ हँसत। आबुझू जे ईमानदारीक ग्लैमरकेँ जिबैत जाइत गेलहुँ। सोचबाक आगुनधुनीक आदति एहन पड़ल, जे सुतैत सपनामे आजगैत लिखबा-पढ़बा काल धरि ई पाँचाँ नहि छोड़लक। दसमामे छमाही परीक्षा किछु दिन पहिने देने छी। कॉमर्सक परीक्षामे एकटा प्रश्न बनेलहुँ। मुदा ओगलत बनि गेल, फेर दोसर अतेसर बेर प्रयास केलहुँ। सभटा प्रश्नक उत्तर अबैत छल मुदा पहिलो प्रश्नक उत्तर पूरा नहि भरहल छल।कॉपीकेँ अंगाक नीचाँमे नुका लेलहुँ। आपानि पीबाक बहन्ने जे बहरेलहुँ, तँ घर पहुँचि गेलहुँ। पढ़ैत-पढ़ैत सोचय लगैत छी। एक्के पन्ना उनटेने घंटा बीति जाइत छल। चिड़ियाखाना गेल रही एक बेर। किछु गोटे,हमर सभक संबंधी लोकनि, ओतय हमरा सभकेँ भेटि गेलाह। बड्ड हाइ-फाइ सभ। ओनतँ कहलन्हि किछु नहि मुदा हुनकर सभक बगेबानी देखि कय, हमरामे हीन भावना आयल।चुप्पे भीड़मे निकलि घरक लेल निकलि गेलहुँ। जेबीमे पाइ नहि रहय से पैरे निकलि गेलहुँ। ओतय चिड़ियाखानामे सभ डराइत रहल जे कतय हरा गेल। सभकेँ कहलहुँ जे सत्ते भोथला गेल रही। सत्त बात ककरो नहि बतेलहुँ। सभ लोक जे भेटय यैह कहय जे अहा, फलनाक बेटा छथि। बेचारे भगवाने छथि। हिनकर पिताक पे-स्लिप बिना पाइयेक बना दियन्हु। पिताजीसँ नहितँ सहकर्मी खुश छलन्हि नहिये ठीकेदार सभ। सहकर्मी एहि लकय जे नहि स्वयं कमाइत अछि, नहिये दोसराकेँ कमाय दैत अछि। पैघभायक गिनती बच्चामे बदमाशमे होइत छल। एक बेर ट्रांसफरक बाद जखन हमरा सभ गाम गेलहुँ, तँ पैघ भाय जे सभक फुलवाड़ीसँ नीक-नीक गाछ उखाड़ि कय अपना घरक आगाँ लगालैत छल, से आब एकहि सालमे दब्बू,सभसँ पाचू बैसनिहार विद्यार्थीक रूपमे गिनतीमे आबि गेल।एहि बेर ट्रांसफरक बादक  गाममे गामक निवास किछु बेशी नमगर भगेल छल। फेर मुख्यमंत्री पदक दावेदार एकटा नेताजी जखन गाममे वोट मँगबाक लेल अयलाह, तखन काका हुनकासँ भेँट कएलन्हि, कहलखिन्ह जे हमर भायकेँ वर्क्ससँ नन-वर्क्स मे ट्रांसफर कए दियौक, बच्चा सभ पोसा जयतैक। नेताजी कहलन्हि जे जौँ हम जीति गेलहुँ तँ ई काज तँ हम जरूर करब। वर्क्समे जयबाक पैरवी तँ बहुत आयल मुदा नन-वर्क्समे जयबाक हेतु ई पहिले पैरवी छी। संयोग एहन भेल जे ओनेताजी जीति गेलाह आमुख्यमंत्री सेहो बनि गेलाह। ओशपथ ग्रहण केलाक बाद ई काज धरि केलन्हि, जे पिताजीक ट्रांसफर कय देलखिन्ह। आहमरा सभ पुनः शहर आबि गेल रही। गाममे रहीतँ एक गोटे जे हमर भायक संगी छलाह, केर गप यादि पड़ि जाइत अछि जे ओककरो अनका प्रसंगमे कहने छलाह। हुनकर अनुसार हुनकर मायक स्वभाव तीव्र छलन्हि, खेनाइ खाइते काल झगड़ा करय लगैत छलीह। मुदा ओहि दिन ककरो अनका ओआर तीव्र स्वभावक देखने छलाह। खराब आर्थिक स्थितिक उपरांत होयबला कलहक परिणाम हमरो सभ देखि रहल छलहुँ। दू टा घटना आइयो हमरा विचलित कए दैत अछि। एकटातँ इनकम टैक्स कटौतीक मास- मार्च मास। ई घटना तँ सभ साले होइत छल, मुदा कटौती बढ़ैत-बढ़ैत एहि साल धरि आबि कय पूरा मार्च मासक दरमाहा काटि लेलक। माँ कहैत छलीह जे आब भोजन कोना चलय जयतौह। आब भीख माँगय जइहँ गसभ। मुदा बाबूजी एकटा गामक भातिजकेँ पोस्टकार्ड पठेलन्हि आआठ सय टाका आनि कय दय गेलखिन्ह, तखन जाकय असुरक्षाक भावना खत्म भेल छल। भीख मँगैत अखनो जौँ ककरो देखैत छी तँ मोन कलपय लगैत अछि। दोसर घटना अछि जखन हमरा घरक आँगा एकटा एक्सीडेंट भेल छल आओकरा बाद हमर भाइ खेनाइ छोड़ि देने छलाह आकानि-कानि कय आँखि लाल कए लेने छलाह। पिताजी जखन बुझबय लगलाह तँ ओजवाब देलन्हि, अहाँकेँ जौँ किछु भय जायत, तखन हमरा सभक की होयत। पिताजी इंश्योरेंस बेनीफिट, जी.पी.एफ., ग्रेच्युटी आदिक हिसाब लगाय भायकेँ बुझेलन्हि जे 99000 रुपय्यातँ तुरत भेटत आफेर महिने-महिने पेंशनो भेटत। लगभग एक घंटा तक बाबूजी भायकेँ बुझबैत  रहलाह।

  हमरा सभक ओहिठाम एक गोट पीसा आयल छलाह। आइयो घर्मे क्यो अबैत छथि, तँ हम सुरक्षित अनुभव करैत छी। बाबूजीक हुनकर सार भेलखिन्ह से एहि ओहदासँ हँसी सेहो चलि रहल छल। ओकहलन्हि जे हमरे पिताजी जेकाँ ईमानदार एकटा बी.डी.. साहेब झंझारपुरमे छलाह। पिताजी हुनकर मलाह छलखिन्ह, कष्ट काटि अफसर भेलाह। मुदा हमरे सभक घर जेँका हुनको घरमे खाटे टा छलन्हि। पीसा कहलखिन्ह जे कथी ले अफसर भेलहुँ, गाममे रहितहुँ आमचान पर बैसि माछ भात खएतहुँ। माछक कारबारमे फायदा होइत।

बहिनक विवाह बाद घरमे कखनो काल बहनोइ अबैत छलाह। जमायक अबिते देरी माँक झगड़ा पिताजी सँ शुरू भय जाइत छल, किएकतँ घर इंतजाम तँ किछुओ रहिते नहि छल।

ट्रांसफरक बाद पिताजीक अभियान घूसखोरकेँ सजा देबय पर चलल। आजखन सरकारी तंत्र परसँ विश्वास खतम भए गेलन्हि, तखन एकटा तांत्रिकक फेरमे पड़ि गेलाह। घरमे माता-पिताक बीच कलह बढ़ि गेल। एक दिन पिताजीसँ हमरो बहसा-बहसी भए गेल आतीनू भाय बहिन गरा लागि कय कानय लगलहुँ। तकरा बादसँ भाय-बहिन सभसँ झगड़ा होयब समाप्त भय गेल।

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अनेर गुनधुन करैत रही, घरक लगमे पहुँचलहुँ तँ भीड़ देखि मोन हदसि गेल, जे बाबूजीकेँ तँ किछु नहि भगेलन्हि। घरमे पहुँचलहुँ तँ माँ-बहिन सँ पूछय लगलहुँ, जे की भेल? सभ बोल भरोस देबय लगलथि तँ आरो तामस उठय लागल। जोरसँ कानि कय बाजय लगलहुँ जे बाबूजी मरि गेलाह की? कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर। ताहि पर बहिन कहलन्हि जे नहि, हुनका किछु नहि भेलन्हि। अहाँक संगी जे मकान मालिकक बेटा अछि, से ओओकर चोट भाय , ओकर पिता आरिक्शाबला, चारू रिक्शा पर जाइत छल। बेचारा रिक्शा बला विवाह ककय कनियाँकेँ अननहिये छल। एकटा विशाल ट्रक रिक्शाकेँ धक्का मारि देलकैक। ठामहि मरि जाय गेलाह। हमर कानब खतम भय गेल। ई जे आफत आयल छैक से आइ ककरो अनका घर, ओना ओजे मृत भेल छल हमर संग डेढ़ सालसँ स्कूल जा रहल छल प्रतिदिन प्रातः। सभ दिन प्रातः सीढ़ी पर कॉलबेल बजबैत छलहुँ आसीढ़ीसँ उतरैत छल, संगे हम सभ स्कूल जाइत छलहुँ। मोन पड़ल जे काल्हि सेहो सभ दिन जेकाँ हम कॉलबेल बजेने छलहुँ,तँ ओकर बहिन जे चश्मा लगबैत छलि, झनकाहि छलीह, से ऊपरसँ तमसाकेँ कहलक जे कतेक जोरसँ आदेरी तक कॉलबेल बजबैत छी, सेहो जे बेर-बेर किएक बजबैत छी, आबि रहल अछि। काल्हितँ ओआयल मुदा हम तखनहि कहि देलियैक जे काल्हिसँ हम कॉलबेल नहि बजायब, अहाँकेँ हमरा संगे जयबाक होय तँ नीच उतरि कय आयब आसंग चलब। ओनहि आयल तँ हम किएक कॉलबेल बजबितहुँ। डेढ़ सालमे पहिल बेर भेल छल जे हम कॉलबेल नहि बजेने छलहुँ आडेढ़ सालमे पहिल बेर स्कूल नागा कएने छल। आब हमरा मोनमे हेबय लागल जे कतहु ओबाजि तँ नहि देने होयत जे हम काल्हिसँ कॉलबेल नहि बजायब। मुदा किंसाइत ओकर कोनो आनो कार्यक्रम होयतैक। किएकतँ चोट भाय आपिताक संग रिक्शासँ कतहु जारहल छल। अस्तु हम चिंतित छलहुँ मुदा दुःखी नहि, मुदा मोनक गप कियो बुझय नहि तेँ मुँह लटकेने ठाढ़ रही।हमतँ मात्र सोचने रही जे काल्हिसँ एकरा संगे स्कूल नहि जायब, जायत ई असगरे। मुदा ओतँ असगरे नहि जायत से सत्य कय देखा देलक। हमर मायक आँखिमे नोर छलन्हि, मुदा हमर भीतर प्रसन्नता,किएकतँ हमर पिताजीक मृत्यु जे रुकि गेल छल।

 

भारत रत्न

भारत रत्न

अपन मित्रकेँ हॉस्टलक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। मुदा हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला ओ भाव-विह्वल भय गेलाह आ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।

 

   

    भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे हमर मित्र अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह, जे हुनका एहि बजारसँ सस्त आ नीक चीज किनबाक लूरि नहि छन्हि। हुनकर ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे हुनकर आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते निपत्ता भय गेल। मित्र महानुभावक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि आऽ बड्ड मुश्किलसँ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएल जे ओऽ की नुका रहल अछि।

 

ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि । चोर बजारक चोर महाराज बजलाह।

    अहाँ कहूतँ ठीक जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि

    झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।

    हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।

हमर मित्रक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल। विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने स्टुडेंटक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर मुताबिक मूरे-मूर छल, अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।

आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।

से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखीतँ पैरके सरा देल आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन सीढ़ीसँ उतरैत रही, पूरा सोल करेज जेकाँ, बाहर आँखिक सोझाँ आबि गेल। मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ उपर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायकेँ बुद्धिमे गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभतँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे।

फेर बजैत रहल्लाह- आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम एहि घटनाक मोनतँ अहाँ नहि पारू यौ भजार

 

आब हमरातँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल आऽ प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ अगिला रविकेँ चोर बजार आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

गंगा-ब्रिज

गंगा-ब्रिज   

                       

1995मे नवम्बरक महीना।

केश कटायल मुँहेँ दरिभङ्गासँ पटनाक बस पर चढ़लहुँ।किछु किताब बेचिनहार अयलाह, तुक मिलेने सभ किताबक विशेषता कहि सुनओलन्हि।k खिस्सा-पिहानी,उपचार,फूलन-देवी सँ लय मनोहर पोथी तक सभ यात्रीगणकेँ एक-एक टा परसैत गेलाग।ओहिमे सँ किछु मोल-मोलाइ कएलाक उत्तर बिकयबो कएलन्हि सभटा वापस लय जाइत गेलाह,बससँ उतरैत कालकंडक्टरसँ वाद-विवाद सेहो भेलन्हि। फेर नेबोक रस निकालबाक यंत्रक आविष्कारक चढ़लाह,रस निकालि देखओलन्हि,खलासीसँ वाद-विवादक उपरांत ओहो उतरि गेलाह।फेर ककबा बला,पेन बला आ पेचकश बला सभ चढ़ि कय उतरैत गेलाह। पुछलाक उपरांत पता चलल जे गाड़ी साढ़े दस बजे खुजत ई गप्प बस बला झुट्ठे बाजल छल। पछुलका बसक सवारीकेँ सीट नहि भेटल छलन्हि, से बेशी अबेरो नहि होयत आऽ सीटो भेटि जायत,एहि तर्कक संग मार्केटिंगक उपकरणक रूपमे ई शस्त्र चलल छल।गाड़ी खुजबाक समय छल 11 बजे मुदा 11 बाजि कय पाँच मिनट धरि बहस होइत रहल जे घड़ीमे 11 बाजल अछि कि नहि।पाँछा एगारह बाजि कय दस मिनट पर जखन बादमे जायबला बसक कंडक्टर अशोक मिश्रा आऽ शाहीक बसक बीचक भिड़ंतक बात कय झगड़ा बजारि देलक-जे एको सेकेंड जौँ लेट होयत तँजे बुझु से भय जायत- तखन ड्राइवर अकस्माते हॉर्न बजाबय लागल।हमरा बगलक सीट पर बैसलि एकटा बूढ़ि बेटाकेँ जोरसँ बजाबय लगलीह,पाँच मिनट गरदमगोल होइत रहल।सभ यात्री चढ़ि गेलाह, आऽ दू-चारिटा यात्री जे अखने रिक्शासँ उतड़ल छलाह, जोर-जोरसँ बाजय लगलाह।पछुलका बस बला हुनकर मोटा-चोटा उठा कय अपना बसमे लऽ जाय चाहैत छलन्हि,मुदा ओऽ लोकनि पढ़ल लिखल छलाह आऽ हमरे सभक बससँ जाय चाहैत छलाह। ओऽ लोकनि दू-चारिटा चौधरी-कुँअरक नाम-गाम गनओलन्हि, तखन ओहि बस बलाकेँ बुझओलैक जे ई सभ फसादी लोक सभ अछि-से कहलक जे टू बाइ टूक बदला ओहि टू बाइ थ्री धक्कागाड़ीमे

ठाढ़े जयबाके जौँ इच्छा अछि तँ हम की करू-किरायो ओऽ एको पाइ कम नहि लेत। से दू-चारि गोट बेशी यात्री लेबाक मनसूबा पूरा भेलाक बाद ड्राइवर गाड़ी हाँकि देलक। ओहि रिक्शा-सभ परसँ एक गोट अधवयसू व्यक्ति चढ़ल छलाह आऽ संयोग ई भेल, जे हमर दोसर बगलमे बैसलव्यक्ति गुनधुन करैत छलाह जे फलनाँ बड़ा बूड़ि अछि,एखन धरि नहि आयल।गाड़ी खुजलाक बाद अगिला चौक पर असकसा कय ओऽ उतरि गेलाह,आऽ तकर बाद ओहि टू बाइ थ्री ग़ाड़ीक तीन सीट बला हीसमे हमरा बगलमे ओहि सज्जनकेँ जगह भेटि गेलन्हि।

     हमर मोन स्थिर छल आऽ बेशी बजबाक इच्छा नहि छल। मुदा बगलगीर पहिने अप्पन भाग्यकेँ धन्यवाद देलन्हि,जकर प्रतापे हुनका सीट भेटलन्हि। पटनामे आवश्यक कार्य छलन्हि, तेँ लेट जायबला बससँ गेला उत्तर काजमे भाङठ पड़ितन्हि। फेर अप्पन परिचय असिस्टेंट डायरेक्टरक रूपमे देलाक उपरांत ई सूचना देलन्हि जे दरिभङ्गाक संग पटनोमे हुनकर मकान छन्हि। दुनू घर अप्पन पुरुषार्थसँ बनयबाक गप्पक संग,दुनू घरक दुमहला आऽ मारबल आऽ ग्रेनाइटसँ युक्त होयबाक बातो कहलन्हि। बजबैका लोक केँ सुनिनिहार लोक बड्ड पसिन्न पड़ैत छन्हि,से ओऽ हमरा पसिन्न करय लगलाह। तेँ पुछलन्हि-पटनामे अपनेक मकान कोन महल्लामे अछि।

     हम कहलियन्हि-अप्पन मकान नहि अछि,किराया पर छी। पिताक मृत्युक उपरांत माँ केर मोन ओहि घरमे नहि लगतन्हि, ताहि हेतु ओऽ गामेमे रहि गेल छथि। आब पटना पहुँचि कय दोसर डेरा ताकब।

     हठात् एहि बातकेँ सुनि ओऽ हमर माथक केश दिशि ताकि कहलन्हि जे -ओऽ, आब बुझल।काटल केश देखि कय हमरा पहिनहिये जिज्ञासा करबाक चाही छल। पिताक क्रियाकर्मक हेतु गाम गेल छलहुँ।

     किछु कालक शांतिक पश्चात ओऽ सज्जन पनबट्टीसँ पान बहार

 

कय हमरासँ पुछलन्हि जे पान खाइत छी। हमर नहि- एहि उत्तरक पश्चात अप्पन विशेषज्ञता देखबैत कहलन्हि, जे हमतँ  अहाँक दाँते देखि कय

बुझि गेल छलहुँ।पान खेलाक बाद अप्पन बेटी सभक सासुरक चर्चा कएलन्हि। बेटाक आइ.ए.एस. केर तैयारी करबाक गप्प कएलन्हि आऽ कोनो ग्रुपक चर्चा सेहो कएलन्हि जे विद्यार्थी लोकनिक बीच एहि तैयारीक हेतु तैयार भेल छल,आऽ ओहि ग्रुपमे प्रवेश मात्र प्रतिभावान लोकनिक हेतु सीमित छल। फेर आखिरीमे ईहो पता चलल जे ओहि प्रतिभावान ग्रुपक सदस्यता हुनकर पुत्रकेँ सेहो प्राप्त छन्हि।

     आँगा बढ़ैत-बढ़ैत गाड़ी एकटा लाइन होटल पर ठाढ़ भेल। किछु यात्री एकर विरोध कएलन्हि। एक गोटे कहलन्हि जे ई ड्राइवर-कंडक्टर खेनाइ खएबाक द्वारे एहि ग़टिया लाइन होटलमे गाड़ी रोकैत अछि। एकर सभक खेनाइ एतय मुफ्तिया छैक आऽ संगहि सूचना भेटल जे मुफ्तिया की रहतैक ओकर सभक बिल यात्रीगणसँ परोक्ष रूपमे लेल जाइत छैक आऽ बुझु जे एकर सभक बिल हमही सभ भरैत छी। हुनकर ईहो अपील छलन्हि जे क्यो गोटे नहि उतरय आऽ हारि कय बसकेँ स्टार्ट करय पड़तैक।किछु कालक उपरांत एकाएकी सभ गोटे उतरैत गेलाह आऽ ओऽ सज्जन सेहो खिसियायल उतरि प्राक भऽ ठाढ़ भय मिथिलांचलक दुर्दशाक कारणक व्याख्यामे हुनकर गप्प नहि मानबाक मनोवृत्तिकेँ सेहो दोषी करारि देलथिन्ह।

     गाड़ी फेर खुजल आऽ किछु दूर आगू जा कय धक्काक संग ठाढ़ भय गेल। कंडक्टर कहलक जे सभ उतरैत जाऊ।गाड़ी पंक्चर भय गेल।लाइन होटल पर गाड़ी नहि रोकबाक अपील केनहार सज्जनक मत छलन्हि, जे लाइन होटल परजे गाड़ी ठाढ़ भेल, तखनेसँ जतरा खराब भए गेल अछि।आब आगू देखू की-की होइत अछि।नीचाँ उतरलाक बाद चारि-चारि,पाँच-पाँच गोटेक गोला बनि गेल।ई जगह प्रायः वैशालीक आसपास छल। एक गोटे खेतक विस्तारक दिशि ध्यान देलन्हि।घर सभक ऐल-फैल होयबाक सेहो चर्चा भेल।संगहि अपना सभक गाम दिशि घर पर घर आऽ

चाड़ पर चाड़ चढ़ल रहैत अछि-आऽ से झगड़ाक कारण अछि अहू पर चर्चा भेल। हमर बगलमे बैसल अधवयसू व्यक्ति किछु औंघायल सन छलाह, मुदा एहि व्यवधानसँ हुनकर भक्क टूटि गेलन्हि। हुनकर बकार

लाइन होटल पर आकि नीचाँ ठाढ़ भेला पर मन्द भय जाइत छलन्हि से हम अनुभव कएलहुँ। फेर बस चलि पड़ल आ ऽ ओऽ सज्जन पुनः शुरू भय गेलाह। हाजीपुर शहर अएला पर तँ हुनक स्मृति आर तीक्ष्ण भय गेलन्हि।किछु काल बस चललतँ एकटा कॉलोनीक दिशि इशारा कय ओऽ कहलन्हि- ई छी गंगा ब्रिज कॉलोनी,की छल आऽ आब की भय गेल अछि। एक भागमे रहबाक हेतु क्वॉर्टर आऽ दोसर भागमे गिट्टी-छड़-सीमेंट सभ भड़ल रहैत छल। आबतँ कॉलोनीक मेंटेनेंसो नहि भय रहल अछि।

हम चौँकि गेलहुँ। कहलियन्हि, एतय एकटा स्कूलोतँ छल। ओ ऽ सोझाँ एशारा दैत देखेलन्हि- देखू, ओतय नामो लिखल अछि। बरखा बुन्नीमे नाम अदहा-छिदहा मेटा गेल अछि। फेर ओ ऽ चौँकि कय पुछलन्हि-अहाँकेँ कोना बुझल अछि।

     -हम एहि स्कूलमे पढ़ने छी।

     -मुदा एहि कॉलोनीमे तँ गंगा पुल निर्माणक अभियंता लोकनि मात्र रहैत छलाह आऽ स्कूलमे हुनके बच्चा सभकेँ पढ़बाक हेतु एहि स्कूलक निर्माण भेल छल।

     -हम सभ अही कॉलोनीमे रहैत छलहुँ।

     -अहाँक पिताक नाम की छी।

     -श्री कृपानन्द ठाकुर।

     पिताक मृत्यु पंद्रह दिन पहिनहि भेल रहन्हि से स्वर्गीय कहबाक हिस्सक नहि पड़ल छल।

     -अहाँ ठाकुरजीक पुत्र छी।

     ई कहि हमरा दिशि ओ ऽ अपनत्वसँ बेशी ममत्वक दृष्टि देलन्हि।

     -अहाँक नाम की छी।

    

 

-आइ.ए.आजम।ओ ऽ कहलन्हि।

     तखन हम हुनका सभटा बच्चाक नाम गना देलियन्हि। हुनकर एकटा बेटा नेहाल आजम हमर क्लासमे पढ़ैत छल। आब हुनकर स्वर

बदलि गेलन्हि।

     -कॉलोनीमे दू गोटे खूब पूजा करैत छलाह।एकटा पाण्डे जी आऽ दोसर अहाँक पिताजी। पाण्डेजीतँ पूजाक संग पाइयो कमाइत छलाह।मुदा अहाँक पिताजी छलाह पूर्ण ईमानदार आ ऽ दयालु।चंदा कय होम्योपैथिक दवाई कानपुरसँ अनैत छलाह, आ ऽ मुफ्त इलाज कॉलोनीबलाकेँ दैत छलाह। हमर बेटीकेँ माथमे बड़का गूर भय गेल छलैक।कोनो एलोपैथिक बलासँ ठीक नहि भेल छलैक। अहींक पिताजी ओकरा ठीक केने छलखिन्ह। इंजीनियर रहितहुँ होम्योपैथीक डिग्री हुनका रहन्हि।

     ड्राइंग रूममे होम्योपैथीक छोट-पैघ, सादा-रंगीन शीशी सभ हमरा आँखिक सोझाँ आबि गेल।

     -आइ काल्हि कतय पोस्टेड छथि।बहुत दिनसँ सम्पर्के टूटि गेल।एतुक्का बाद कतहु संगे पोस्टिंग सेहो नहि रहल।बुझू भेँट भेना पन्द्रह सालसँ ऊपर भय गेल अछि।

     -पन्द्रह दिन पहिने हुनकर मृत्यु भय गेलन्हि।

     हमर कटायल केश दिशि देखि ओ ऽ कहलन्हि-हमरे सँ गल्ती भेल। केश कटेने देखियो कय नहि पुछलहुँ। तेँ अहाँ भरि रस्ता गुम्म छलहुँ।

     फेर कहय लगलाह- मजदूरक प्रति बड्ड चिंता रहैत छलन्हि।तावत बस गंगा पुल पर आबि गेल छल।आगाँ फाटक पर बसकेँ टिकट कटेबाक हेतु ठाढ़ कय देल गेलैक। क्यो गोटे संवादो देलक जे आगू वन-वे जेकाँ अछि। एक कातमे रिपेयरिंग चलि रहल अछि।हमर आगाँ दृश्य घूमि गेल।एहि पुलक निर्माणकालक पाया सभ।कॉलोनीक टूटल देबालक पजेबा सभ।ओऽ देबाल सभ साल टूटैत छल।पिताजी कहैत छलाह जे एंजीनियर आऽ ठेकेदार सभ मिलल अछि। फेर मोन पड़ल सूटकेस भरल रुपैय्या। हमर पिताजी एक लात मारने छलाह आऽ सूटकेस दूर फेका गेल। एक

 

गोट पितयौत भाय रहैत छलाह-से सभटा रुपैय्या ओहि सूटकेसमे राखि ओहि ठिकेदारकेँ देलन्हि। माँ हमरा सभकेँ भितरिया कोठली दिशि लय गेलीह। एक बेर पिताजी पुलक पाया सभक लग स्टीमरसँ लय गेल छलाह आ ऽ कहलन्हि जे देखू।एहि पायाक निर्माणमे कतेक गोट मजदूर ऊपरसँ

घिरनी जेकाँ नाचि कय गंगामे खसि पड़ल। सयसँ ऊपर।कतेक हमरा आँखिक सोझाँ। ओहिमेसँ मात्र किछुए परिवारकेँ कंपेनसेशन देल गेलैक। आन सभक ने लिस्टमे नाम छैक, ने क्यो पता लगेलकैक।तैयो सभ अभियंता लोकनि ठिकेदारसँ मिलल अछि।

     भक्क टूटल।बससँ उतरि ओहि पुलक निर्माणमे शहीद मजदूरक लिस्ट देखलहुँ।बहुत कम लोकक नाम छल-प्रायः बिन कंपेंनसेशन बलाक नाम नहि रहैक।

बस शुरू होयबाक सूरसार कएलक तँ हम आ ऽ आजम साहब बस पर धड़फड़ा कय चढ़लहुँ।

     ओ ऽ पुनः बाजय लगलाह।-अहाँ कहलहुँ जे किराये पर रहैत छी। बुझू। तीस बरख पी.डबल्यु.डी. मे ईमानदारीसँ कार्य कएलाक उत्तर एकटा घरो नहि बना सकलाह। लोक की-की नहि कए गेल।हमहुँ 1981 क बाद अहींक पिताजीक लाइन पर चलय लगलहुँ।दू टा घरो जे बनयने छी से नामे-मात्रक दू-महला।अधखिज्जू-ऊपरमे एक-एकटा कोठली अछि। अहाँक पिताकेँ की देलकन्हि सरकार। आ ऽ की भेटलन्हि।रिटायरमेण्टक पहिनहि मृत्यु। ने कोनो सम्मान।पुलक उद्घाटन पर दू-दू हजार सभ अभियंताकेँ सरकार देलक। ओ ऽ तँ भगवानक रूप छलाह।सम्मानक लालसाक हेतु काज नहि कएलन्हि।सभ वर्क्स डिवीजनमे जयबाक हेतु पैरवी करय आ ऽ ई  नन-वर्क्समे जयबाक हेतु पैरवी करथि। फेर ओ ऽ हमरासँ पुछलन्हि जे अहाँ की करैत छी।आ ऽ ई जनला पर जे दरिभङ्गामे हम नोकरी करैत छी आ ऽ पिता,माय आ ऽ भाय पटनामे रहैत छलाह, हमरासँ कहलन्हि।-दरभंगोमे आऽ पटनो मे आउ। मायोकेँ अनियन्हु।हमर पत्नीकेँ बड्ड नीक लगतन्हि। नेहालतँ पटनेमे अछि। फेर अपन पटना आ ऽ दरभंगा दुनू

 

ठामक पता अपन स्नेहिल हाथसँ पड़बैत पटनाक हार्डिंग पार्क बस स्टैण्ड पर उतरलाह।

     बाहरसँ पटना अयला पर होर्डिंगकेँ देखि हम प्रसन्न भय जाइत छलहुँ।मुदा पिताक छयाक दूर भेलाक बाद आब एहि नगरसँ लगाव नहि प्रतियोगिता करय पड़त हमरा।

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शनैः-शनैः

शनैः-शनैः

 

 

परम शांति आऽ कि घोर कोलाहल। आरुणि ठाकुर किछु अस्वस्थ छथि आऽ कलकत्तामे वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अध्यावसनमे लीन अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत छथि। अशांतिक क्षण हुनका रहि-रहि कय अनायासहि यादि आबि रहल छन्हि। जखन ओऽ अपन समस्या सभ अपन हित-संबंधी सभकेँ सुना कय अपन मोनक भार कम करैत रहथि। शनैः-शनैः समस्या सभ बढ़ैते चल गेल एतेक तक कि आब दोसरकेँ सुनेलापरांत मोन आर उचटि जाइत छलन्हि। ताहि द्वारे आब ओ अपने तक सीमित रहय लगलाह। हित संबंधी सभ बुझय लगलाह जे आरुणि समस्यासँ रहित भय गेल छथि।

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     बच्चेसँ सपनामे भयावह चीज सभ देखाइ पड़ैत छलन्हि आरुणिकेँ। अखन धरि हुनका यादि छन्हि कोना आध-आध पहर रातिमे ओऽ घामे-पसीने भय जाइत रहथि आऽ हुनकर माता-पिता चिंतित भय बीयनि होकैत रहथि छलखिन्ह। पिताक-पिता आ तकर जन्मदाता के ? भगवान जौँ सभक पूर्वज तखन हुनकर पूर्वजके ? लोकसभ एहि प्रश्न सभकेँ हँसीमे उड़ा दैत छलाह, परंतु बादमे जखन आरुणि दर्शनशास्त्र पढ़लन्हि तखन हुनका पता चललन्हि जे एकर उत्तरक हेतु कतेक ऋषि-मुनि सेहो अप्पन जीवन समर्पित कय चुकल छथि मुदा ई प्रशन एखनो अनुत्तरिते अछि।

     कख्ननोकेँ निन्दमे हुनका लागन्हि जे ओऽ घरक छत पर छथि आऽ नहि चाहितो शनैः-शनैः छतक बिना घेरल भाग दिशि गेल जा रहल छथि। गुरुत्वक कोनो शक्ति हुनका खीचि रहल छन्हि तावत धरि जावत ओऽ नीचाँ नहि खसि पड़ैत छथि। की ई छल कोनो प्रारब्धक दिशानिर्देश आऽकि कोनो भविष्यक दुर्घटनासँ बचबाक संदेश।

 

 किछु दिन तकतँ आरुणि सुतबाक सही समयक पता लगबैत रहलाह परंतु शनैः-शनैः हुनका ई पता लागि गेलैन्ह जे स्वप्न आऽ निन्न एहि जीवनक दूटा एहन रहस्य अछि जे नियम विरुद्ध अछि आऽ अनुत्तरित अछि।

आऽ आरुणि पैघ भेलथि, फेर हुनकर पढ़ाइ शुरु कएल गेल-  अगस्त्यक स्तोत्र- सरस्वति नमस्तुभ्यम वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भम् करिष्यामि सिद्धिर्भवतुमे सदा।

 श्रीगणेषजीक अंकुश  क संग गौरिशंकरक अभ्यर्थना सिद्धिस्तु।

          साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वसिनी

          उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः

          सिद्धिःसाध्ये सतामस्तु प्रसदांतस्य धूर्जटेः

          जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला।

 

एहि श्लोककेँ बजैत काल प्रायः आरुणि पशुपतिःपतिःक सामवेदीय तारतम्यक बाद अनायासहि हाऽ हाऽ कऽकय जोरसँ हँसय लगैत छलाह आऽ बीचहि मे रुकि जाइत छलाह। पिता सोचलखिन्ह जे कम वयसमे पढ़ाई शुरु केलासँ आरुणिक कुर्सी पर बैसि कय माथपर हाथ राखि कय बैसबाक आदतितँ खतम होयतन्हि।सय तकक खाँत ओऽ एके बेर मे सीखि गेलाह जखन ओऽ देखलन्हि जे बीसक बाद गणनामे पशुपतिःपतिःक जेकाँ लयबद्धता छैक।

मायक एकटा गप्प हुनका पसिन्न नहीं छलन्हि। ओऽ बिचमे गप्प करैत-करैत आरुणिक बातकेँ अनठिया दैत छलथिन्ह। एकबेर मायक क्यो संगी आयल छलीह। आरुणिक कोनो बातपर माय ध्यान नहीं दय रहल छलीह। आरुणिक हाथमे भरिघरक चाभीक झाबा छलन्हि तेँ ओऽ कहखिन्ह जे जौँ हुनकर बात नहीं सुनल जयतन्हि तँ ओऽ झाबाकेँ सोझाँअक डबरामे फेंकि देताह। माय सोचलखिन्ह जे हाँ-हाँ केलापर झाबा फेकियेटा देताह तैँ आर अनठिया देलखिन्ह। परिणाम दुनु तरहेँ एके हेबाक छल। चाभी बहुत खोज केलो पर नहि भेटल। एखनो घरक सभ अलमीरा आदिक चाभी डुप्लीकेट अछि। एतेक दिनक बाद ई सभ सोचि आरुणिक मुँहपर अनायासहि मुस्की आबि गेलन्हि।

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सिद्धांतवादी पिताकेँ नोकरीमे किछु ने किछु दिक्कत होइते रहैत छलन्हि ताहि द्वारे ओऽ आरुणि जल्दी सँ जल्दी पैघ देखय चाहैत छलाह। तेसर सँ सोझे पाँचम वर्गमे फनबा देल गेलन्हि।फेर भेल ई जे होलीक छुट्टीमे नियमानुसार सभ गोटे गाम गेल छलाह। नियम ई छल जे होली आऽ दुर्गापूजामे सभ बेर गाम जयबाक नियम जेकाँ छलैक। पिताजी सभकेँ छोड़ि कय वापिस भय गेलाह। फेर दरमाहा बन्द भय गेल छलन्हि प्राय़ःसे गाम चिट्ठी आयल जे आब सभकेँ गामहि मे रहय पड़तन्हि। मायतँ कानय लगलीह मुदा आरुणि खूब प्रसन्न भेलाह। मुदा सरकारी  स्कूलमे ओहि समय वर्गक आगाँमे (नवीन) लगाकय एक वर्ग कममे लिखबाक गलत परम्परा नवीन शिक्षा नीतिक आलोकमे लेल गेल छलैक कारण नवीन नीतिमे आर किछुओ नवीन नहि छल। पिताजीकेँ जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओऽ तमसायलो छलाह आऽ एकर प्रतिकार स्वरूप पाँचम क्लासक बाद जखन ओऽ सभ शहर वापस अयलाह तँ आरुणिकेँ फेर एक वर्ग तरपाकय सोझे छठम वर्गक बदलामे सातम वर्गमे नाम लिखवा देलन्हि। छठम वर्गक विज्ञान आऽ गणितक पढ़ाइ पाँचमे वर्गमे कय लेबाक पिताक निर्देशक उद्देश्यक जानकारी आरिणिकेँ तखन जाकय भेलन्हि जखन प्रवेश-परीक्षामे यैह दुनु विषय पूछल गेल आऽ आरुणि छठा आऽ सातम दुनु वर्गक प्रवेश परीक्षामे बैसलाह आऽ सफल भेलाह। बहुत दिन बाद तक जखन क्यो आनो संदर्भमे छठम वर्गक चर्चा करैत छल तँ आरुणिकेँ किछु अनभिज्ञताक बोध होइत छलन्हि।

 

गामक प्रवासमे एकबेर आरुणि पिताकेँ चिट्ठी लिखने छलाह कारण हुनकर जुत्ता शहरेमे छूटि गेल छलन्हि। जुत्तातँ आबिये गेलन्हि संगहि चिट्ठीक तीन टा शाब्दिक गल्तीक विवरण सेहो आयल आऽ ईहो मोन पाड़ल गेल जे एकबेर दौरिकय गणितक प्रश्न हल करबाक प्रतियोगितामे तीनक बदला हड़बड़ीमे दुइयेटा प्रश्नकेँ हल कऽकय ओऽ कोना कॉपी जमा कय देने छलाह।

हुनकर स्वभावमे क्रोधक प्रवेश कखन भेलन्हि से तँ हुनको नहि बुझबामे अयलन्हि मुदा पिताजी हुनका क्रोधक समान कोनो दोसर रिपु नहि एहि संस्कृत श्लोकक दस बेर पाठ करबाक निर्देश देने छलखिन्ह- से धरि मोन छन्हि। एकटा घटना सेहो भेल छल जाहिमे स्कूलमे एकटा बच्चा झगड़ाक मध्य सिलेटसँ हुनकर माथ फोड़ि देने छलन्हि। आरुणि सेहो सिलेट उठेलथि मुदा ई सोचि जे ओकर माथ फूटि जयतैक हाथ रोकि लेने छलाह। एकर परिणामस्वरूप हुनकर पिता दू गोट काज केलन्हि। एकतँ हुनकर सिलेटकेँ बदलि कय लोहाक बदला लकड़ीक कोरबला सिलेट देलखिन्ह जकर कोनो ने कोनो भागक लकड़ी खुजि जाइत छलैक आऽ दोसर जे कॉलोनीमे समकक्ष अधिकारीक बैठक बजाकय कॉलोनीअहिमे स्कूल खोलि देल गेल जतय आरुणि पढ़य लगलाह। बादमे क्यो पंडित जखन वाल्मीकि रामायणक सुन्दरकाण्डक पाठ तँ क्यो ज्योतिष कँगुरिया आँगुरमे मोती आऽ कि मूनस्टोन पहिरबाक सलाह अही उद्देश्यक हेतु देबय लगैत छलाहतँ ओऽ संस्कृत श्लोक हुनका मोन पड़ि जाइत छलन्हि।

 

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     बाल संस्कारक अंतर्गत सहायता माँगयमे आऽ समझौता करयमे अखनो हुनका असहजता अनुभव होइत छन्हि। मुदा हारि आऽ जीत दुनुकेँ बराबड़ बूझि युद्ध करबाक विश्वास हुनकामे नहीं रहलन्हि विशेषकरिके पिताक मृत्युक बाद। आऽ विजय हुनकर लक्ष्य बनैत गेलन्हि शनैः-शनैः। जकर ओऽ जी-जानसँ मदति कएलन्हि सेहो समयपर हुनकर संग देलकन्हि। समय-समय पर केल गेल समझौता सभ हुनकर संघर्षकेँ कम केलकन्हि। जतेकसँ दोस्तियारी छलैन्ह तकरे निभेनाइ मुश्किल भय रहल छलैन्ह। फेरतँ नव शहरमेँ नव संगीक हेतु स्थान नहि बचल।

 

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     महत्वाकांक्षाक अंत नहि आऽ जीवन जीबाक कला सभक अद्वितीय अछि। आरुणि ई नाम आब कखनो-कखनो घरमे सुनाइ पड़ैत छल। कलकत्ता शहर प्रतिभाक पूजा करैत अछि। मुदा व्यवसायी होयबामे एकटा बाधा छल-अंग्रेजीक संग बाङलाक ज्ञान जे ओऽ बाट चलैत सीखि गेलाह।व्यस्त जीवनमे बीमारीक स्थितिअहिमे हुनका आराम भेटैत छलैन्ह। बीमारियेमे सोचबाक आदति मोन पड़ैत छलैन्ह। आऽ ई फ्लैट किनलाक बाद मायकेँ सेहो बजा लेलखिन्ह। ओना हुनका बुझल छलन्हि जे माय एहि सभसँ प्रभावित नहि होयतीह। कारण ओऽ अधिकारी प्त्नी छलीह आऽ पुत्रकेँसेहो ओहि रूपमे देखबाक कामना छलन्हि। ई नव शहर हुनक पुत्रक व्यक्तित्वमे सैद्धांतिकताक स्थानपर प्रायोगिकताक प्रतिशतता बढ़ा देने छलन्हि। आब समयाभावक कारण स्वास्थ्य खराब भेलेपरांत सोचबोक समय पुत्रकेँ भेटैत छलन्हि।

     व्यसायमे सफलता प्राप्तिक पूर्व आरुणि एकटा कागज प्रिंटिंग प्रेसमे काज केनाइ शुरु केलन्हि। अपन मित्रवत प्रिंटिंग प्रेस मालिकसँ दरमाहाक बदला पर्सेंटेज पर काज करबाक आग्रह केलन्हि। ऑर्डर आनि बाइंडिंग आऽ प्रिंटिंग करबाबथि आऽ आस्ते-आस्ते अपन एकटा प्रिंटिंग प्रेस लगओलथि। किछु गोटे हिनका अहिठामसँ छपाइ करबाकय ग्राहककेँ बेचथि। हुनका जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओऽ एकटा चलाकी केलथि जे सभ बंडलमे अपन प्रेसक कैलेंडर धऽ देलखिन्ह। जखन अंतिम उपभोक्ताकेँ पता चललैक जे ओ सभ अनावश्यके दलालक माध्यमसँ समान कीनि रहल छलाह तँ ओऽ सभ सोझे  आरुणि प्रिंटिंग प्रेस केँ ऑर्डर देबय लागल। आरुणिकेँ घरमे अपन नाम कखनहुँ काले सुनि पड़ैन्ह। किताबक ऊपर छपल हुनकर नाम तँ कोनो कंपनीक छलैक- आऽ ओऽ ओकरासँ निकटता अनुभव नहि कऽ पाबि सकैत छलाह। संसारक कुचालि हुनकर पिताक अंत केने छलन्हि मुदा आरुणि व्यावसायिक युद्ध मस्तिष्कसँ लड़ैत आऽ जितैत गेलाह।

     मायक एलाक बाद आरुणि ई नाम बीसो बेर दिन भरिमे सुनाइ पड़य लागल। ओकर संगी लोकनि उपरोक्त घटना सभकेँ जखन आरुणिक मायकेँ सुनबैत रहैत छलाह ई सोचि जे ओऽ अपन मित्रक बड़ाइ कय रहल छलाह तँ आरुणि असहजताक अनुभव करय लगैत छलाह आऽ गप्पकेँ दोसर दिशि मोड़ि दैत छलाह।

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     हुनकर मायतँ जेना हुनक विवाहक हेतु आयल छलीह। माय जखन जिद्द ठानलन्हि तँ हुनका आश्चर्य भेलन्हि कारण घरमे जिद्दक एकाधिकारतँ हुनकेटा छलन्हि। मुदा माय बूझि गेल छलीहजे हुनकर बेटा प्रक्टिकल भय गेल छन्हि आऽ जिद्द केनाइ बिसरि गेल छन्हि। आरुणि सोचलन्हि जे छोटमे बड्ड जिद्द पूरा करबओने छथि तेँ आब पूरा कर्बाक समय आयल अछि। विवाह फेर बच्चा। माय अपन नैतमे पतिक रूप देखलैन्ह। पतिक मृत्यु बेटाकेँ प्रैक्टिकल बना देने छल मुदा आब ई नहीं होयत। कजे बेटा नहि कय सकल से आब नैत करत। नैतक नाममे बेटा आऽ पति दुहुक नामक समावेश केलन्हि-जयकलित आरुणि। फेर पढ़ाइ शुरु- सिद्धरस्तु-श्री गणेशजीक अंकुश आऽ वैह उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः। हुनकर बेटाकेँ पेशंट पढ़ेलखिन्ह ओऽ तँ घर सम्हारैत छलीह। आब पुतोहु घर सम्हारलैन्ह, बेटाकेँ तँ फुरसतिये नहि। आब बाऽ पढेतीह नैतकेँ।

     उतपत्स्येत हिमम कोऽपि समानधर्मा कालोह्यम निरवधिर्विपुला च पृथ्वी।

पृथ्वी विशाल अछि आऽ काल निस्सीम,अनंत, एहि हेतु विश्वास अछि जे आइ नहीं तँ काल्हि क्यो ने क्यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनायत।

 

आरुणि अपनाकेँ अपन मायसँ दूर अनुभव केलन्हि, किछु अस्वस्थ सेहो छथि आऽ वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अध्यावसनमे लीन अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत छथि।

 

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गजेन्द्र ठाकुर समग्र

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