भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Sunday, July 05, 2009
उपन्यास-सहस्रबाढ़नि - गजेन्द्र ठाकुर
उपन्यास
सहस्रबाढ़नि
सहस्रबाढ़नि २.१–२.६६
“एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा रहल छथि । आँगनसँ बाहर भेला पर जतए आँकर-पाथर देखलन्हि ततए ठेहुन उठा कऽ, मात्र हाथ आ पएरपर आगू बढए लगलाह”, पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि।
“एक दिन हम देखलहुँ जे ओ देबालकेँ पकड़ि कऽ खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि । हमरो की फूरल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह । दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह । हाथ पहुँचबे नहि करन्हि । फेर तेसर बेर जेना फाँगि गेलाह आ हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ एकदम्मे ठाढ़ भऽ गेलाह”, झिंगुर बाबूकेँ एकाएकी मोन पड़लन्हि।
“एक दिन हम एक-दू बाजि कऽ हिसाब कऽ रहल छलहुँ । हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ । फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ । तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि”।
“एक दिन खेत परसँ अएलहुँ आ नहा-सोना भोजन कऽ खखसि रहल छलहुँ। अहाहाऽ केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहाऽ केलथि । घुरि कऽ देखलहुँ तँ ओ बैसि कऽ गेंदसँ खेला रहल छलाह । दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह । हम कहलहुँ जे आर किछु नहि, ई हमर नकल कऽ रहल छथि । दलान पर सभ क्यो हँसऽ लागल । फेर तँ जे आबए कहए- कलित ऊहुहूँ , तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ कहथि, एकटा दोसरे तरीकासँ।”।
जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू पहिल-पहिल अन्यमनस्क पड़ल आ मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह से तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कऽ रहल छन्हि । हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ ओ बेंग जकाँ पाछूसँ सोझे आगू फाँगि जाइत छल । पूरा बेंग जकाँ- अनायासहि ओ हँसि उठलाह ।
पत्नी पूछि देलखिन्ह –“कोन बात पर मुस्की देलहुँ ?”, तँ पहिने तँ ओ ना-नुकुर केलन्हि, फेर सभटा मोनमे सोचल-घुरमल गप कहि देलखिन्ह आ सुनि लेलन्हि । आब तकरा बाद गपसँ गप निकलऽ लागल।
सन् १८८५ ई.। झिंगुर ठाकुरक घरमे एकटा बालकक जन्म भेल रहए ।
ई वर्ष कांग्रेस पार्टीक स्थापनाक कारण बादक समयमे एकटा महत्त्वपूर्ण घटनाक रूपमे वर्णित होमएबला छल । अंग्रेजी राज अपनाकेँ पूर्णरूपसँ स्थापित कऽ चुकल रहए । राजा-रजवाड़ासभ अपनाकेँ अंग्रेजक मित्र बुझवामे गौरवक अनुभव करैत छलाह । शैक्षिक जगतमे कांग्रेस शीघ्रहि उपद्रवी तत्वक रूपमे प्रचारित भए गेल रहए । संस्क़ृतक रटन्त विद्याक स्वरूप खतम होअएबला
छल । सरकारी पद बिना आङ्ल सिखने भेटब असंभव छल । सरकारी पदक तात्पर्य राजा-रजवाड़ाक वसूली कार्यसँ संबंधित आ ओतबहि धरि सीमित छल ।
तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल । परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ ताहि कारणसँ परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल रहए । मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक लेल एकटा कलकतियाबाबू मास्टरकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएलन्हि । तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा दोसर बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह । बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भऽ गेलाह।
“हम जे सुनेलहुँ तखन हिनकर वयस होएतन्हि, छह आकि सात मास”।
“हम जे सुनेलहुँ तखन उमरि कतेक हेतन्हि, बड़ बेसी तँ नौ आकि दस मासक”।
पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे -‘गप सुनलहुँ’ आकि ई करू वा ओ करू बजैत छलीह । मुदा सासु-ससुरक सोझाँ बजैत रहथि- सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक । आ फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक दर्शन- काजक लेल काजक अनुकरणमे उत्तर देथि । मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक ।
पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझथु जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक नहि छथिन ।
पत्नी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल । मुदा एहि बेर झिंगुर बाबू कन्नी काटि गेलाह । मुस्की दैत दलान दिस बहरा गेलाह, ओतए किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात कऽ रहल छलाह । भोरहा कातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल । भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान -सभ पहुँचि जाइत छल । एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कऽ कोरि आ चूड़ि कऽ बनाएल । बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतए पहुँचैत छल । झिंगुर बाबूकेँ एहि गपपर कचोट होइन्हि तँ आन लोक सभ कहथिन्ह, जे से की कहैत छी । अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति लेल अपनासँ दूर रखने छी तँ एहिमे कचोट कथीक । एकौरसँ ठाकुर परिवारक मात्र एक घर मेंहथ आएल आ आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भऽ गेल अछि । डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेटि गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ लऽ कऽ आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे । अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता दऽ देल गेल छैक ।
तखने एकौरसँ एकटा समादी अएलाह आ भोजपत्रपर तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह । झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ पत्र पढ़ए लगलाह । प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि ।
‘परतापुरक सभागाछी देखि कऽ जाएब, ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह । एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि । फेर आँगनमे पत्र पढ़ब प्रारंभ कएलन्हि।
॥श्रीः॥
स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु । शतं कुशलम् । आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी । अहाँक प्रपितामह आ हमर प्रपितामह संगहि पढ़लन्हि । अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह । हर्षक वा शोकक कोनो घटनाक सूचना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अएने आ विशेष कऽ अशोचक विचार नहि कएने भविष्यमे अनिष्टक डर अछि । संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी । अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी । परतापुरक सभागाछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लेल लालायित सेहो छथि । अगला महिनाक प्रथम सोमकेँ ज्योँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत । बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक कार्य सभ शुरु भऽ जएत। इति शुभम् ।
बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ तकर नीचाँ सभागाछी । बलानक धार खूब गहींर आ पूर्ण शांत । ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ पिपराघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भऽ धारकेँ रोकि देलक आ एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल । बलान झंझारपुर दिस आ कमला- मेंहथ, गढ़िया आ नरुआर दिस । बलान गहींर आ शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी । बाढ़िक संग रेत कमला आनए लगलीह । ग्रीष्म ऋतुमे बलान अपन पूर्व रूप धेने रहैत छथि, बिना नाहक पार केनाइ कठिन । किंतु एहि मासमे कमलामहारानीकेँ पएरे लोक पार करैत छथि । सभागाछीक सभटा चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल । चारू दिस रेत । आ सभागाछी उपटि गेल । चलि गेल सभटा वैभव सौराठ । झिंगुर बाबूक कालमे परतोपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल ।
कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जएताह, तखन हुनका लऽ कऽ एकौर
जाएब । बेचारे बहुत दिन तपस्या कएलन्हि । एहि बेर मामा गाम, दीदी गाम सभ ठाम घुमा देबन्हि । सभकेँ मोन लागल छैक।
पिता-पुत्र एकौर पहुँचलाह । ई गाम कोनो तरहेँ आन जकाँ नहि लगलन्हि । जेना जमघट लगला पर शास्त्रार्थक परम्परा रहल अछि, तहिना विद्वतमण्डलीमे विभिन्न विषय पर चर्चा हुअए लागल । चर्चामे अंग्रेजी शासन आ भारतवासीक सैन्य अभियान सेहो रहल । मँगरूबाबू लाल कोट पहिरि कए कतेक लड़ाइ लड़ल छलाह । १८६७-६८ क अबीसीनिया युद्धमे सर चार्ल्स नेपियरक संग कोनाकेँ अभियानमे ओ गेल छलाह, तकर वर्णन विस्तृत रूपमे देबए लगलाह मँगरूबाबू । द्वितीय अफगान-युद्धमे कोना समयक अभावमे सेनाकेँ लालक बदला मलिछह वर्दी लगबए पड़्लैक तकर वर्णन सेहो देलन्हि । यैह वर्दी बादमे खाकी रंगक रूपमे प्रसिद्ध भऽ गेल । एनफील्ड रायफलक खिस्सा जे १८५७ क स्वतंत्रता संग्राममे परिणत भेल, केर बदलामे बेश नमगर स्नाइडर रायफल जे १८८७ मे देल गेल । मँगरू बाबू कांग्रेसक चर्चा सेहो केलन्हि ।ओम्हर झिंगुर बाबू भोज-भातक फेहरिस्ट आ एस्टीमेट बनबए लगलाह । कलित सेहो अपन तुरियाक विद्यार्थी सभक संग मगन भऽ गेलाह । ओहि भीड़मे राजे गामक फन्नू बाबू सेहो आएल छलाह । एकौरमे हुनकर बहिन-बहिनोइ रहैत छलखिन्ह । ताहि द्वारे एतए एनाइ-गेनाइ ओ किछु बेशी करैत छलाह । कलितकेँ एहिसँ पहिने ओ नहि देखने रहथि । एकाएक उत्सुकता भेलन्हि आ कलितक विषयमे पूछपाछ केलन्हि । ई जानि जे कलित झिंगुरबाबूक सुपुत्र छथि, क्षणहिमे झिंगुरबाबू लग घुसकि कऽ चलि अएलाह । वार्त्तालापक क्रममे झिंगुर बाबू सँ ईहो पता लगलन्हि जे जमीन्दारीक पर्मानेन्ट सेटलमेन्टक बाद दरिभङ्गा राजकेँ वसूलीक लेल परगनाक आधारपर मिथिला क्षेत्रसँ कर वसूलीक अधिकार प्राप्त भेल आ पढ़ाइक बाद कलित कटिहारमे कर वसूलीक कार्यक हेतु जएताह । एम्हर अंग्रेजीक शिक्षा कलित पूर्ण कऽ लेने छलाह । पता लागल जे फन्नू बाबू अपन बचियाक हेतु योग्य वरक ताकिमे छथि । तखन विचार भेल जे परतापुरक सभागाछीमे अगिला महिनामे फन्नू बाबू आबथि आ झिंगुर बाबूकें आतिथ्यक अवसर भेटन्हि । मुदा बीचहिमे दियाद सभ झिंगुर बाबूकँ तेना ने घेरलकन्हि जे कलितक विवाह फन्नू बाबूक बचियासँ ठीक करैत आ भराममे सिद्धांत करेनहि ओ गाम पहुँचलाह । डरो होइन्हि जे कनियाँ ने कतहु रपटा दऽ देथि । मुदा विवाहक बात सुनितहि कनियाँ खुशीसँ बताहि जकाँ भऽ गेलीह । पछिला चारि दिनसँ जतेक गुनधुनी लागल रहन्हि सभटा खतम भऽ गेलन्हि।
पाँव-पैदल किंवा कटही गाड़ी यैह छल यातायातक साधन । महफा सेहो सबारी छल सेहो बेश नक्काशीवला आ भरिगर । वर महफा पर आ बरियातीमे जे युवा रहथि से पएरे । आ जे कनेक उमरिगर रहथि से कटही गाड़ीपर विदा भेलाह । दरबज्जापर स्वागत भेलन्हि । सुगन्धि, फूल, जलपान । ई सभ बरियातीमे किछु गोटेकेँ अनसोहाँत लगलन्हि । बरियाती लोकनिक गप्प सरक्का चलैत रहल । शास्त्रार्थ आ चुटुक्का । अँगनामे परिछनि आ विधि-व्यवहार तँ दलान पर गप्पक फूहारि । बीच-बीचमे क्यो आबि कऽ किछु ताकथि-बाजथि आ फेर कतहु जाथि । गहना कतए छैक । घोघट के देथिन्ह । घोघटाही नूआ नहि भेटि रहल अछि । एहिसँ विवाहक क्रम आ प्रगतिक विषयमे बरियाती लोकनिकेँ सेहो पता चलैत रहैत छलन्हि। एवम् प्रकारे आँगन आ दरबज्जा दुनू ठाम विवाहक कार्यक्रम भोरक पाँच बजे धरि चलैत रहल । वर आ कनियाँक हाथमे ब्रह्मचारी डोरी बान्हि देल गेल, जे चारि दिन धरि रहत । तकर बाद विवाह पूर्ण भेल ।
विदाइक दिन तका कए झिंगुर बाबू पठेलखिन्ह आ कलित अपन गाम आबि गेलाह । आब हुनकर कटिहार जएबाक तैयारी कएल गेलन्हि । अश्रुपूरित नेत्रसँ माए आ ग्रामीणसँ विदा लेलाक बाद कलित अपन रोजगार पर गेलाह।
कोशीक विभीषिकासँ त्रस्त क्षेत्र होइत कटिहार पहुँचि कऽ कलित अपन काजमे शीघ्रहि पारंगत भऽ गेलाह । काजक अधिकता भेलापर अपन पितियौत भाए आ भातिजकेँ सेहो बजा लेलन्हि। एहि क्षेत्रक लोकक बीचमे थोड़बेक दिनमे अपन प्रतिष्ठा बढ़ा लेलथि कलित । एतए जमीन्दारीक परमानेंट सेटलमेन्टक विषयमे पुरान अनुभव बड़ खराप छल । वसूली पदाधिकारीक भ्रष्ट तरीका सभकेँ कलित बदलि देलखिन्ह । मुदा कालक लग किछु आरे लिखल रहए । कलितक द्विरागमनक पहिनहि हुनकर माए गुजरि गेलखिन्ह । बड्ड रास सौख-मनोरथ लेने चलि गेलीह माए । कखनो कलितकेँ कहैत छलखिन्ह जे तोरा कनियाँसँ खूब झगड़ा करबौक तखन देखबौक जे तूँ हमर पक्ष लैत छँह आकि कनियाँक। आब झिंगुर बाबू सेहो अन्यमनस्क रहए लगलाह । कलित कहबो केलखिन्ह जे सँगहि चलू, मुदा भरि जन्म जतए रहलाह ओहि ठामकेँ छोड़थु कोना ?
तेसर साल कलितक द्विरागमन भेलन्हि आ तकरा बादे झिंगुर बाबू निश्चिंत भऽ सकलाह । जाइत-जाइत कलितकेँ कहैत गेलखिन्ह जे तोँ तँ बेशीकाल गामसँ बाहरे रहलह । हमरा सबहक सेवा तँ ई बुचिया केलक । अपन बहिनक भार आब तोहीँ उठाबह । हम सोचने छलहुँ जे एकर विवाह दान करबाइए कऽ निश्चिंत हएब । मुदा तोहर माए हमरा तोड़ि देलन्हि । आब तूँ अपना जोगर भइए गेल छह । पाँच बरखक बेटा रहैत छैक तखनो लोक केँ लोक कहैत छैक जे अहाँ केँ कोन बातक चिंता अछि, पाँच बरखक बेटा अछि । तूँ तँ आब पढ़ि लिखि कऽ अपन जीवन यापन करैत छह । फेर पुतोहुकेँ बुचियाक हाथ पकड़ा कऽ एहि लोकसँ छुट्टी लेलन्हि झिँगुर बाबू । कलित हुनका एतेक हरबड़ीमे कहियो नहि देखने छलखिन्ह । स्थिर, शांतचित्त आ फलक चिंता केनिहार किसान सेहो अपन जीवन-संगीक संग छुटलाक बाद अधीर भऽ गेल छल ।
कलितकेँ कटिहार घुरलाक बादो एकेटा चिन्ता लागल रहैत छलन्हि । से छल बुचियाक विवाहक । पिताक रहैत ओ कोनो परेशानीसँ चिन्तित नहि होइत छलाह । मुदा हुनका गेलाक बाद आब लोकोकेँ देखेबाक छलन्हि जे क्यो ई नहि कहए जे बापक गेलाक बाद बहिन पर ध्यान नहि देलन्हि कलित । पिताक बरखी धरि विवाहक प्रश्न उठेबो कोना करितथि । मुदा समय बितबामे कतेक देरी लगैत छैक । पूरा गामक भोज कऽ कलित बुचियाक विवाहक लेल वर ताकएमे लागि गेलाह । परतापुरक सभागाछीमे गेलाह मुदा कोनो वर पसिन्न नहि पड़लन्हि जे बुचियाक हेतु सुयोग्य होअए । पन्द्रह दिनक छुट्टी बेकार गेलन्हि । पुनः कटिहार पहुँचि गेलाह । कार्यक क्रममे गिद्धौर, बाढ़ इत्यादि गंगाक दक्षिण दिसक परिवार सभसँ सेहो परिचय भेलन्हि । ओहिसँ हुनका बाढ़ नगरक लगक गामक एकटा लड़काक विषयमे पता चललन्हि जे गिद्धौर स्टेटमे कार्य कऽ रहल
छलाह । चोट्टहि ओ लड़कासँ भेँट करबाक लेल गिद्धौर पहुँचि गेलाह । बालक अत्यंत दिव्य छलाह । पता लऽ बाढ़ पहुँचि कऽ बालकक पितासँ गप केलन्हि । पंचकोशीक कथा कतबा दिनक बाद बाढ़ नगरक लगक एहि क्षेत्रमे आएल छल से एहि कथाकेँ काटब कठिन रहए । सभटा गपशप कऽ पुनः भराममे सिद्धांत करेने मेंहथ पहुँचलाह । बूढ़- पुरान जे क्यो सुनलन्हि से आश्चर्यचकित रहि गेलाह । बढ़ए पूत पिताक धरमे- झिंगुर बाबू जेना कलितक सिद्धांत करेनहि पहुँचल छलाह तहिना कलित केलन्हि, वाह…। कथा ओनातँ दूरगर भेलन्हि, मुदा कलित स्वयम् नेनेसँ दूरदेशक बासी छलाह, ताहि द्वारे हुनका सभ चीजक अनुभव छलन्हि, यैह सोचि सभ संतोष कएलक । पूरा टोल विवाहक तैयारीमे लागि गेल । बुचियाकेँ कोनो दिक्कत नहि होएतैक । सर्वगुण संपन्न अछि बुचिया । गीत-नाद लिअ आकि सराय-कटोरा, दसो हजार महादेव सुगढ़ पातर-पातर छनहिमे बना दैत अछि । जाहि घरमे जएत तकरा चमका देत ।
विवाह विधि-विधानसँ संपन्न भऽ गेल । वरपक्ष संगहि द्विरागमनक प्रस्ताव राखलन्हि, मुदा कलित तैयार नहि भेलाह, तखन बुचियाक हाथक छाप लऽ कऽ वरपक्षकेँ जाए पड़लन्हि ।
कलितक पत्नी छलीह पूर्ण शुद्धा । बुचियासँ बहिनापा छलन्हि । बुचियो भौजी-भौजी कहैत नहि थकैत छलीह । तेसर साल द्विरागमनक दिन भेलैक । बुचियाक संग जे खबासनी गेल छलीह से आबि कऽ गंगा आ गंगा पारक दृश्यक वर्णन करए लगलीह तँ भाउजक आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि । कलितसँ कतेक बेर पुछलथिन्ह जे ई बाढ़ छैक कतए । समयक संग सभ किछु सामान्य भऽ जाइत अछि । बुचिया जखन एक-दू बेर अएलथि-गेलथि तखन भाउज आरो निश्चिन्त भऽ गेलीह । एवम् क्रमे कलित पुनः एकाकी भऽ गेलाह । फेर आएल भूकम्प । सन् चौंतीसक भूकम्पमे महादेव पोखरिपर पत्नी आ दुहु पुत्री आ एकटा पुत्रक संग बिताओल रातिक बाद परिवार सहित किछु दिनुका लेल कटिहार गेलाह । कारण छल महिना भरि चलल छोट-छोट भूकंपक तरंग । मुदा पत्नीकेँ घरक पीड़ा सतबए लगलन्हि । घर तँ भूकम्पमे ढहि गेल छलन्हि, से कलित भूमिक ओहि टुकड़ाकेँ छोड़ि गामक फुलवारीक कातमे नव घरक निर्माण केलन्हि । अपन पुरान डीह अपन दियादकेँ दऽ एहि नबका डीहपर घरहट कएलन्हि । तकरा बाद एकटा पुत्र एवम् एकटा पुत्रीक प्राप्ति आओर भेलन्हि । पुनः एकटा पारिवारिक चक्रक प्रारंभ भऽ गेल ।
अपन बचिया सभ सेहो आब विवाह योग्य लागए लगलन्हि । अपन बच्चा तँ सदिखन बच्चे लगैत छैक मुदा तेँ की । पहिल बचियाक विवाह कछबी आ दोसरक खररख करेलखिन्ह । कछबीक परिवार सेहो राज-दरबारक कर्मचारी छलाह । घोड़ा, महफा, चास-बास….। मुदा बच्चा होएबाक क्रममे कलितक प्रथम पुत्रीक देहांत भऽ गेलन्हि मुदा ओकर ननकिरबी बचि गेल आ ओ मातृके मे रहए लागल । मुदा ओहो पाँचे वर्षक होएत आकि एक दिन पेटमे दर्दक शिकाइत भेलैक आ ओहो भगवानक घर माएक सेवामे चलि गेल । कलित जीवन आ मृत्युक एहि संग्रामकेँ देखैत रहलाह । कहियो गाममे हैजाक प्रकोप पड़ए लागल छल तँ कहियो प्लेग आ की की ? एक गोटाकेँ लोक जरा कऽ आबए तँ दोसर गोटाक मृत्युक समाचार भेटए । मुदा कलितक परिवार अक्षुण्ण रहलन्हि।
कलितक कटिहारमे पदोन्नत्ति आ प्रतिष्ठा बढ़ैत रहलन्हि । भातिज सभ पूर्व रूपेण ओतए रहैत छलन्हि । दुहू पुत्र केजरीवाल हाई स्कूल, झंझारपुरमे पढ़ए लागल छलथिन्ह । कालक मंथर गतिमे कखनो काल गति आबि जाइत अछि । अपन तेसर पुत्रीक विवाह तमुरिया लग आमारूपी गाममे करबा कए कलित जेना निश्चिंत भऽ गेलाह । अपन पैघ पुत्रक विवाह करेलन्हि आ छोट पुत्रक अकादमिक प्रतिभाक प्रति निश्चिन्त भेलाह । मुदा छोट पुत्रक अंधविश्वासी होएबामे सेहो हुनका कोनो संदेह नहि छलन्हि । आ एकर कारण छल जे एक दिन हल्ला उठलैक, जे घनगर चन्ना-गाछीमे, जतए दिनोमे अन्हार रहैत छैक, कोनो गाछक नीचाँ चाटी उठैत छैक । तखन हुनकर ई पुत्र चाटी उठाबए ओतए पहुँचि गेल छलन्हि । से जखन आठम वर्गमे विज्ञान वा कला चुनबाक बेर अएलैक, तखन पुत्रक विज्ञान विषय लेबाक निर्णयमे हाँ मे हाँ मिला देलखिन्ह कलित बाबू । कतेक गोटे कहलखिन्ह जे सत्यनारायण बाबू आ के-के साइंस लऽ फैल कऽ गेलाह, बादमे पुनः आर्ट्स विषय लेबए पड़लन्हि । मुदा नन्द नहि मानलथि । साइंसोमे गणित लेलन्हि । कलित सोचलथि जे विज्ञान विषय पढ़ि अदृश्यक प्रति स्नेहमे नन्दक रुचि कम हेतन्हि । पता नहि किएक एकर बाद कलित निश्चिंत जकाँ भऽ गेलाह । कटिहारसँ एक बेर गाम आएले रहथि । भोरमे नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ कलित हाथ मटियाबए लेल चिकनी माटिक ढ़ेर दिशि बढ़ि रहल छलाह आकि पता नहि की भेलन्हि, हाथक लोटा दूर फेका गेलन्हि । ओ नीचाँ खसि पड़लाह । कनियाँ दौगल अएलीह । मुदा जीवनक खेल एक बेर भेटैछ आ एक्के बेर चलियो जाइछ । नन्द पिताक मृत्युक साक्षी छलाह । मृत्युक ई प्रकार हुनका लेल सर्वथा नवीन आ सर्वथा रहस्यमयी छल । अदृश्यक शक्ति विज्ञानक सर्वोच्चताकेँ नन्दक जीवनमे दबाबए लागल।
वृत्तक गोलाकार आकृति केंद्रक परिधिमे घुमैत एकटा चक्र पूरा केलक । अदृश्य केंद्रक फाँसमे फँसल । नन्द अपन यशोदा माएक छत्रछायामे बढ़ए लगलाह, उमरियोमे आ पढ़ाइयोमे । अपन शिक्षक लोकनिक प्रिय पात्र भऽ गेलाह नन्द । हुनकर प्रैक्टिकलक कॉपीक साफ-सुथरा रूपक चर्चा सर्वत्र शिकक्षहु वर्गमे होमए लागल । फूल-सन अक्षर हुनकर शारीरिक सौन्दर्यसँ मेल खाइत
छल ।
एहि बीच एकटा आर घटना घटित भेल । यशोदा माएक दुहु पुत्र भगवत्ती घरक सोझाँमे नीचाँमे सुतल छलाह । भोरमे माए देखलन्हि जे गहुमन साँप चारि टुकड़ा भेल पड़ल अछि आ बिज्जी बच्चा सभक माथ लग ठाढ़ पहरा दऽ रहल अछि । प्रायः बिज्जीक मारि पड़लैक गहुमनकेँ आ दुहु पुत्र सुरक्षित रहलन्हि यशोदा माएक । नन्द एहि घटनाक स्मृतिक संग आगू बढ़ए लगलाह । बीचमे बँटवारा भेल । घरारी सभ, निकहा खेत सभ सभटा दू-दू टुकड़ा होमए
लागल । बाहरी लोक सभ कहैत छल जे दुनू भाएक संग अन्याय भऽ रहल अछि । स्कॉलरशिप प्राप्त कऽ नन्द आर.के.कॉलेज मधुबनीमे अंतर-स्नातक विज्ञानक गणित शाखामे नामांकन लेलन्हि। शुरूमे गणित बुझबामे दिक्कत भेलन्हि तँ रटए लगलाह । गणितकेँ रटबाक बुद्धि ई सोचिकेँ लगेलथि जे बादमे लोक ई नहि कहए, जे की सोचि कऽ विज्ञानक चयन कएलक । मुदा किछु दिनका बाद रटैत क्रममे बुझबामे सेहो आबए लगलन्हि। गामक फुटबॉल मैदानक स्मृतिए शेष रहलन्हि, खेलेबाक अवसरे नहि भेटन्हि । गणितक शिक्षक तीन सए प्रश्नक सेट परीक्षाक पहिने दैत छलखिन्ह आ कहैत छलखिन्ह जे, जे क्यो साठि प्रतिशत प्रश्नक सही-सही उत्तर बना लेताह ओ प्रथम श्रेणीमे निश्चित रूपसँ उत्तीर्ण
होएताह । नन्द सत्तरि प्रतिशत प्रश्नक उत्तर तैयार कऽ शिक्षककेँ देखा
देलखिन्ह । आशानुरूप बादमे परीक्षाक परिणाम अएलापर प्रथम श्रेणी भेटलन्हि । १९५९ मे इंजीनियरिंगमे नामांकनक हेतु आवेदन दऽ देलखिन्ह । अंकक आधार पर सर्वोच्च अंक अएला उत्तर मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे नामांकन लऽ लेलथि । ओहि समय मात्र सिविल इंजीनियरिंग शाखाक पढ़ाई ओहि संस्थानमे होइत छलैक, से ओहि शाखामे नामांकन लऽ धोती-कुर्त्ता पहिरि कऽ ओतए पहुँचि गेलाह । प्रोफेसर दीक्षित साहेब वर्कशॉपक मशीन देखा कहलखिन्ह जे एहिमे धोती फँसि जएत । से फुलपैंट आ शर्ट पहिरि कऽ आऊ । दू टा फुलपैन्ट आ शर्ट कीनए पड़लन्हि नन्दकेँ । कपड़ा कीनि सिएबितथि तँ ढ़ेर दिन लागि जएतन्हि से रेडीमेड कीनए पड़लन्हि । मुदा गाम जाथि तँ गामसँ दूर बिदेसरे स्थानमे फुलपैन्ट-शर्ट बदलि कऽ धोती कुर्त्ता पहिरि लैत छलाह । कहियो गाम फुलपैंट पहिरि कऽ नहि गेल छलाह । सन् १९५९ सँ १९६३ धरि इंजीनियरिंगक पढ़ाइ चललन्हि आ तखन बिहार सरकारमे इंजीनियरिंग असिसटेंन्ट आ एक सालक बाद १९६४ सँ सहायक अभियन्ताक रूपमे बहाली भेलन्हि । इंजीनियरिंग पढ़ाइ विशेष खर्च बला छल से एहि शर्त्तनामाक संग विवाह भेलन्हि जे पढ़ाइक खर्चा ससुर उठेथिन्ह । मुदा गर्मी तातिलमे एक मास आ दुर्गापूजामे पंद्रह दिनक छुट्टी कॉलेजमे रहैत छलैक से एतेक दिनुका पाइ ससुर काटि लैत छलथिन्ह आ सालमे बारह मासक बदला मात्र साढ़े दस महिनाक खर्चा दैत रहथिन्ह । बादमे ज्योँ सासुरक लोक कहियो ई उपराग दैत छलन्हि जे हमही सभ इंजीनियरिंग करबेलहुँ अछि तँ नन्द सेहो हँसि कऽ उपर्युक्त बातक खुलासा कऽ दैत छलखिन्ह । वृत्तक परिधि जेना पैघ भेल जा रहल छल । कालक परिधि पहिने पूर्ण चक्र पूरा कएलक आ आब परिधिक विस्तार शुरु भऽ गेल । दुःख-सुख आ उत्थान-पतनक खिस्सा ।
स्वतंत्रता दिवसक दिनक उमंग, झंडा लऽ कऽ स्कूलक बच्चाक संग १५ अगस्त १९४७ केँ घुमैत छलाह । कांग्रेसक भक्ति संगमे रहलन्हि । मुदा १९६२ क चीनी आक्रमणक बाद भारतीय सेनाक पाछू हटबाक दुःस्वप्न । वायुसेनाक उपयोग नहि करबाक भारतक आश्चर्यजनक निर्णयक बादक मनःस्थिति छल पलायनक आ हारिक । ऑल इंडिया रेडियोक घोषणा जे हमर सेना गर्वसँ पाछू हटि रहल अछि - सुनि नन्दक हृदय रुकि सन जाइन्हि । से जखन १९६५ क युद्धक बेर इंजीनियरक भर्त्ती सेनामे कैप्टनक रूपमे शुरु भेल तखन नन्द आ साहा साहेब आवेदन दऽ देलखिन्ह । साहा साहेबक कनियाँ तँ कानए लगलीह आ साहा साहेबकेँ रुकि जाए पड़लन्हि । नन्दक पत्नी एको बेर प्रतिरोध नहि कएलन्हि । मुदा ओजनमे बेशी भेलासँ छँटा गेलाह नन्द । मसोसि कऽ रहि गेलाह । तकर बाद जे शरीर घटेबाक सूर चढ़लन्हि, से बढ़िते गेलन्हि । एकेटा सपना छलन्हि - गाममे कोठाक घर । से सभटा सर्वे सभक नक्शा ऊपर कऽ घरक कुर्सी देलन्हि जे सड़कमे घरक कोनो भाग नहि जाए । मकानक डिजाइनक मात्र आधे भाग पूरा भऽ सकलन्हि । जतए-जतए ट्रांसफर होइन्हि एकटा नव अनुभव भेटन्हि । ओहि समय कनियाँकेँ तृतीय पुरुषक रूपमे संबोधित करबाक प्रचलन छलैक, मुदा नन्द द्वितीय पुरुषमे संबोधन शुरु केलन्हि । एकर आलोचना होएबाक बदला गाममे आनो लोक सभ ई संबोधन अपना घरमे शुरु करैत जाइत गेलाह । स्थानान्तरणक क्रममे डेहरी-ऑन-सोनमे विकास कार्यमे ग्रामीण आदिवासीक पूर्ण सहयोग भेटलन्हि । कहियो पाइ देखि कऽ अंतरात्मा नहि डिगलन्हि । जी-जानसँ जीप उठा कऽ अपन कार्यकेँ पूर्ण करथि । कखनो जीप तेज होइन्हि तँ मोन पड़न्हि जे कोनो बच्चा ने पिचा जाए । मुदा कहियो कोनो दुर्घटना नहि भेलन्हि । गामक सभ जातिक लोककेँ कतहु ने कतहु मस्टरे रॉल पर नोकरी देलन्हि । स्थानीय लोककेँ सेहो नोकरी करबाक हेतु प्रोत्साहित करैत छलाह । स्थानीय गरीब आदिवासी नन्दकेँ देवता बुझैत छलाह । एतहि दमाक पहिल बेर अटैक भेलन्हि नन्द पर । स्थानीय वैद्य दिन-राति एक कऽ जंगलसँ बीट आनि कऽ देलकन्हि । दमाक इलाज एलोपैथीमे नहि अछि मुदा एहि बूटीक एकमात्र खोराकी सँ अगिला कतेक साल धरि नन्द दमासँ दूर रहलाह । सँगी सभ भोलेनाथ नाम राखि देलथिन्ह । कतेक कमाइ-धमाइक तरीका सभ सिखेबाक प्रयास सेहो केलखिन्ह । मुदा ग्रामीण जनक लाचारीकेँ ततेक लगसँ देखने छलाह नन्द जे एहि सभ गप दिस ध्यानो नहि जाइत छलन्हि । ताहुमे गरीबीक बादो जे आपकता स्थानीय जनसँ भेटैत छलन्हि, तकरा बाद ? एहि बीच एक पुत्रीक प्राप्ति सेहो भेलन्हि । दोसर बेर पुत्रक प्राप्ति भेलन्हि । पुत्री मामा गाममे जन्म लेलथिन्ह आ पुत्र अपन गाममे । बच्चा सभक स्थितप्रज्ञ भाव, फेर हँसब फेर ठेहुनिया...... बच्चाक बढ़बाक प्रक्रियाक दर्शन ओहिना अछि जेना विश्वक निर्माण ओ ओकर चेतनाक विकास । हुनकर एकटा भातिजक देहांत नेनेमे भऽ गेल रहन्हि आ तकर बाद एहि दुनू बच्चाक प्रति स्थितप्रज्ञताक भाव, सुखमे सुखी नहि आ दु:खमे दुखी नहि क अवतरण भेल नन्दमे । नन्द दिल्ली कोनो ट्रेनिंगमे गेल छलाह । एक राति सपना देखलन्हि जे हुनकर भातिज नवीन गाममे फूसक घरक ओसारा पर बैसल छथि । ओ नेना जकरासँ नन्दकेँ बड्ड आपकता छलन्हि, उठि कए खेलाइ लेल जाइत अछि । कनेक कालक बाद पेटमे दर्दक शिकाइत करैत अछि । सभ क्यो जमा भऽ जाइत छथि । बूढ़-पुरान अपन-अपन नुस्खा देबए लगैत छथि । मुदा कनिए कालक बाद बच्चाक मृत्यु भऽ जाइत अछि । नन्दक आँखि खुजि गेलन्हि । हुनका अपन बड़की बहिनक बचिया मोन पड़लन्हि । एहने घटना छल ओहो । बचियाकेँ क्यो बूढ़ी पेट पर हाथ दऽ देने छल आ ओ कनेक कालक बाद संयोगवश पेट दर्दसँ काल कवलित भऽ गेल छलीह । नन्दकेँ अदृश्य, भूत-प्रेत, राकश आ डाइन जोगिन एहि सभपर असीम विश्वास छलन्हि । ई सभ सोचिते ओ जोर-जोरसँ कानए लगलाह । संगी सभ हड़बड़ा कऽ उठैत जाइत गेलाह । जखन सभ समाचार ज्ञात होइत गेलन्हि तँ किछु गोटे कहलखिन्ह जे भातिजक अउरदा बढ़ि गेल । नन्दक मुँह लटकल देखि कऽ क्यो-क्यो हुनक अभियंताक वैज्ञानिक दृष्टिकोणकेँ मोन पाड़ए
कहलखिन्ह । मुदा नन्दकेँ बोल-भरोस क्यो नहि दऽ सकलाह । नन्द ट्रेनिंग छोड़ि कऽ सपनेक गपपर गाम बिदा भऽ गेलाह । तेसर दिन गाम पहुँचलाह तँ भैयाकेँ केश कटेने देखि कऽ सशंकित भऽ गेलाह । गामक सीमांतेसँ जे क्यो भेटन्हि से कनेक दु:खी स्वरमे गप करन्हि । आँगन पहुँचलाह तँ माय जोर-जोरसँ कानए लगलीह । सपनाक सभटा गप सत्य बुझेलन्हि, अक्षरशः सत्य । भातिज हुनका केश कटाबए लेल सही समय पर बजा लेलखिन्ह । नवीनक फोटोक पाछाँमे अंग्रेजीमे ओकर जन्मक आ मृत्युक तिथिक संग ओकर तोतरायल बोलीमे काका-कका कहबाक बात फाउंटेन पेनक सियाहीसँ नन्द लिखलन्हि । कोठाक घर बनबाक पहिनहि ओ चल गेलाह, गेलाक बादो मुदा स्वप्नमे काकाकेँ नहकेशक दिन बजा कए ।
पुत्रीक जन्मक बाद कोठाक घरो बननाए शुरु भऽ गेलन्हि । पुत्री जखन पैघ भेलन्हि तँ मोन पाड़बाक क्रममे कहैत छलीह जे घरक कुर्सी पड़बाक लेल जे खधाइ खुनल गेल छल से बड्ड गँहीर छल । मुदा पिता मोन पाड़थिन्ह जे काका अहाँकेँ हाथसँ पकड़ि कऽ खधाइमे पात सभ साफ करबाक लेल नीचाँ कऽ दैत छलाह, तखन खधाइ बहुत गँहीर कोना भेल । पुत्री बा केर कोरामे एकर समाधानक हेतु पहुँचि जाइत छलीह जे खधाइ तँ बहुत गँहीर बुझाइत छल, तखन ईहो बात सही जे काका हाथेसँ खधाइमे उतारि दैत छलाह । नन्दक माए बच्चा सभक बा भऽ गेलीह । नन्दक पुत्रकेँ बा नन्दक नन्द कहैत छलीह । कखनो गोपाल तँ कखनो राजकुमार कहैत छलीह, ओकर हँसी, औँठिया कारी घनगर केश । बा क कोठाक घर बनि गेलन्हि तँ पेटक दर्द शुरु भेलन्हि । मुदा नन्द एहि बेर अपन घरक पेटक दर्दक दू टा मृत्युकेँ अदृश्यक निर्देशपर होइत देखलाक उत्तर माएकेँ इलाजक हेतु कैक ठाम, एलोपैथिक डाक्टरक लग पैघ-पैघ नगरमे, लऽ गेलाह । डायगनोस भेलन्हि कैंसर नामक दु:खदायी रोग । एहि बीमारीक इलाज रोगोसँ बेशी दुःखदायी छल । रेडियमसँ ट्यूमरकेँ
जरेनाइ । बा टूटि गेलीह । पटनेमे मृत्यु भऽ गेलन्हि । ओतहि दाह संस्कार गंगा-तट पर भेलन्हि कारण ओतए मान्यता छल जे गंगा तटपर गाएक बोली जतेक दूर धरि सुनाइ पड़ैत अछि ततेक दूर मगहक क्षेत्र नहि मानल जाइत अछि । तदंतर श्राद्ध कर्म गाममे भेल । बा चलि गेलीह, नन्दक द्वितीय पुत्रक जन्मक पहिनहि । मुदा बा क चरचा घरमे होइते रहल । बा केर फोटो बा केर नाति सभक प्रेरणा श्रोत बनल रहल । जे सपेताक गाछ बा केर श्राद्धमे उसरगल गेल छल तकर आम हुनकर नाति-नातिन नहि खाइत छलन्हि । जे आम खसैत छल से बाबाक सारा पर राखि देल जाइत छल । गोदान आ वैतरणी पार करेबाक विधिमे जे गाएकेँ दागल गेलैक तकरा देखि बा केर दुहु पुत्र प्रण लेलन्हि जे आब ई काज भविष्यमे कहियो नहि कएल जएत । अपन धैर्यसँ मृत्युसँ पहिने बा अपन परिवारकेँ पुनः अपन पूर्व प्रतिष्ठा आ सरस्वतीक भक्तक रूपमे प्रतिष्ठित करबामे सक्षम भेलीह ।
मृत्युसँ पहिने बुचिया सेहो बाढ़सँ अपन भौजीकेँ भेंट करए लेल पटना अएलीह । दुनू ननदि आ भौजी पुरान-पुरान गपशपमे अपना- अपनाकेँ बिसरबैत गेलीह । भौजी भऽ गेल छलीह बच्चा सभक बा आ ननदि भऽ गेल छलीह बच्चा सभक बुढ़िया दीदी । बुढिया दीदीक खिस्सा बच्चा सभक मध्य बड्ड लोकप्रिय भऽ गेल छल । बृहत्कथाक खिस्सा सन नमगर-कैक रातिमे खतम होअएबला । खिस्सा सुनबाक क्रममे एक बच्चा सुति जाइत छल, फेर ओहिसँ पैघ बच्चा सुतैत रहए आ सभसँ पाछाँ सभसँ पैघ बच्चा सुतैत छल । अगिला राति मारि शुरु, सभसँ पैघ बच्चा कहन्हि जे जतए सँ खतम केलहुँ ततए सँ शुरु करू । ई सभ पहिने सुति गेलथि तँ ई सभ अपन बुझथु । मुदा बुढ़ियो दीदी कम नहि छलीह । अपन खिस्सा कनेक आओर आगूसँ शुरू करैत छलीह । जखन सभसँ पैघ बच्चा कहए जे एकर पहिनेक खिस्सा हम कहाँ सुनलहुँ, तँ बुढ़िया दीदी कहथिन्ह जे हम बताहि जकाँ खिस्सा कहिते रहि गेलहुँ आ अहूँ सुति गेल
छलहुँ । तखन हम खिस्सा कहब बन्द कए देलहुँ । तखन निर्णय भेल जे जतएसँ सभसँ छोट बच्चा चाहैत अछि, ततहिसँ खिस्सा शुरु कएल जाए ।
बड़का कोला बला खेतमे नन्द बोरिंग गरबेलन्हि जाहिसँ पानिक लेल ललाएल ई बाध सिंचित भऽ जाए । मुदा कतेको दिनुका जोन मजदूर- मिस्त्री-कारीगर सभक परिश्रमक बाद ई पता लागल जे नीचाँमे पानिक अभाव रहए । लेएर नहि भेटबाक कारणसँ पाइप खेतेमे लागल रहल आ सुखाएल बिन पानिक ओतहि गाड़ल रहल । बच्चा सभक लेल ई खेत बोरिंग बला खेतक नामसँ प्रसिद्ध
भेल । बादमे ओहि गाममे सरकारी बोरिंग गाममे लगबाक घोषना भेल । मुदा नन्दक भैयाकेँ पता लगलन्हि जे ई बोरिंग ओहि पानि विहीन बाधमे नहि गड़ाएत वरन् ओहि बाधमे गड़ाएत जाहिमे बारहोमास पानि लागल रहैत अछि । ओ किछु गोटेकेँ लऽ कऽ पटना पहुँचि मुख्यमंत्रीकेँ आवेदन देलन्हि । तखन जा कऽ ओहि सुखाएल बाधक जीर्णोद्धार भेल । सात हाथक उज्जर अंग्रेज इंजीनियर कोन-कोन मशीन लऽ कऽ आएल आ दुइये दिनमे बोरिंग गारि कऽ चलि गेल । मुदा बादमे क्यो कहलन्हि जे ओ अमेरिकन छल आ कारण सेहो देलन्हि जे सभटा उज्जर लोक अंग्रेज होअए से जरूरी नहि । फेर कमला बलानक दुनु कात छहरक निर्माण भेल । किछु दिन धरि ठीक रहल मुदा किछु दिनुका बाद स्थिति ई भेल जे दुनु छहरक बीचमे बालु भरैत गेल आ जतेक छहरकेँ ऊँच करू ततेक कम । झंझारपुर पुलक नीचाँ धरि बालु भरि गेल । कनियो पानि आबए तँ पानि खतराक चेन्हसँ पार भऽ जाइत रहए आ फाटकसँ बाहा बाटे पानि पोखरि-खेतकेँ डुमा दैत छल । जे खेत बहुत ऊँच आ दू पाइ मोलक छल से नीक भऽ गेल आ निकहा खेतमे खेती बन्द भऽ गेल । दुनू छहरक बीचक बलुआही जमीनमे तीन-तीन बेर रोपनी करए पड़ैत छल । लोककेँ आब परोर आ अल्हुआक खेती एहि बलुआही जमीनमे शुरू करए पड़ल । डकही पोखरिक चारू कातक बढ़मोतरमे छिटुआ धानक खेती करए पड़ल कारण रोपनी उपजक हिसाबसँ महग भऽ गेल । पूर्णाहा बाध पानिसँ भरल रहैत छल । कोठिया-मेहथक बीचमे एकटा भोरहा छल-गँहीर पट्टी- प्रायः कोशीक कोनो पुरनका छिटकल धार । मुदा अखुनका कोशीक भौगोलिक दूरीक कारण एहि पर संदेह कएनिहारक संख्या सेहो बेश । एहि भोरहा कातमे मेहथक आ कोठियाक बीच भेल पुरान संघर्षक खिस्सा….पछिमा-भुमिहार टोलक एकटा आन्हर बूढ़क
करतब । बूढ़केँ सभ बान्हि कऽ रखलकन्हि जे ओ मारि करए नहि पहुँचि जाथि । मुदा केबाड़ी तोड़ि आ बड़का बाँसमे फरसा-भाला लगा कऽ ओ पहुँचि गेलाह लड़बाक लेल । सवा मोन चूड़ी कोठियामे फूटल ओहि मारिमे । आ मारि कोन गप पर..सूगरक सीराक लेल ।……एकटा आर कथा - बूढ़ा काकाक झठहाक कथा, सभटा बानर सभ डरक लेल कलम-गाछी छोड़ि पड़ा गेल छल । आइ काल्हिक छौरा सभकेँ देखियौक, झठहा कियो मारि कऽ देखाबय जे जोमक फुनगीकेँ छूबि लए । सभटा अखराहा लोक सभ जोति लेलक, तखन शरीर कोना बनैत जएतन्हि ।
नन्दक डेरा पर बुढ़िया दीदी एक बेर बाढ़सँ अपन बेटाकेँ लऽ कऽ अएलीह, बेटाक नोकरीक लेल । बाढ़क लाइ केर स्वाद बच्चा सभ बुढ़िया दीदीक पटना आकि गाम अएले पर चिखैत जाइत छल । जमीन्दारी प्रथाक समाप्तिक बाद नौकरीक चलती भऽ गेल छल आ दिक्कत सेहो । ताहिमे सरकारी नोकरीक । जयराम नौआ तखन ने कहैत छथि जे नन्द सभ जातिकेँ सरकारी नोकरी देलखिन्ह मुदा नौआ-ठाकुर टा बचि गेल । से नन्द नहि तँ हुनकर बेटेसँ अपन बेटाक लेल नोकरी माँगताह । सभकेँ नोकरी भेटलैक मुदा बुढ़िया दीदीक बेटाकेँ नोकरी नहि भेटलन्हि । किछु समय-साल सेहो बदलल, नहि तँ पहिने तँ लोक नोकरी करैयो नहि चाहैत छल । पुबाइ टोलक गुलाब झा कहैत छलाह जे नोकरीक माने भेल नहि करी आ करी तँ की पाबी-वेतन माने बिना तन आ तनखा माने तनकेँ खा । बुढ़िया दीदीक आनल बाढ़क लाइ आ कतेक राति धरि चलए बला खिस्सा । गाम घरमे कखनो काल शुरु भऽ गेल आन आन प्रकारांतरक खिस्सा, इनार, पोखरि,करीन,बाहा,खत्ता,गाछी-पोखरिक बीच आ एहि सभक लेल होबएबला छोट-मोट झगरा-झाँटी आकि रमण-चमनक मध्य नन्दक नन्द सभ बढ़ए लगलाह । नन्द अपन बच्चा सभकेँ गामसँ दूर नहि कएलन्हि। गर्मी तातिल, होली आ दुर्गापूजा, तीन बेर कमसँ कम साल भरिमे समस्त परिवार जएबेटा करैत छल । बच्चा सभ आम खएबाक हेतु दीदीक गाम जाइत छल । पएरे-पएर दूर-दूर धरि, कहियो कमलाक रेतक बीच तँ कहियो आमक गाछीक मध्य चलैत चलबाक अनुभवे किछु भिन्न छल । आमक मासमे आमक कलममे रात्रिक माछ-भातक बनभोज, खुरचनसँ आमक खोइचा हटएबाक अनुभव, ती-ती, ‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ सतघरिया खेलेबाक अनुभव, संठीमे आगि लगा कए धुँआ निकालबाक अनुभव आकि काँच आममे चून लगाकए खएबाक उपरांत ओकर मीठ भऽ जएबाक अनुभव, ई सभ अनुभव आइ काल्हिक बच्चाकेँ कोना भेटतैक यावत ओकरा सभकेँ गाम एनाइ जेनाइ नहि कराएब । नन्द तँ एकबेर अपन जमायकेँ कहनहियो रहथि जे आगाँक सात जन्म शहर दिशि घुरि कय नहि
आएब । सन् १९७५ क पटनाक बाढ़िक समय नन्द गंगाक उत्तर गंगा पुल परियोजनामे आबि गेल छलाह। नन्द दुइ पुत्र आ एक पुत्रीक संग अपन परिवार चला रहल छलाह । तीनू बच्चा स्कूलमे पढ़ाइ-लिखाइ करैत जाइत छलाह । तखन ककरा बुझल छलैक जे ई बरख नन्द आ हुनकर बच्चा सभक जीवनक एकटा विभाजन रेखा बनत आ जीवनक धारकेँ बदलि देत।
आरुणिक वृत्तांतक सारांश यैह अछि जे हुनक जन्मक समय हुनकर पिताकेँ क्यो कहि देलकन्हि जे बचिया भेल अछि । दू-तीन दिन धरि हुनका दिमागमे छलन्हि जे बेटिये भेल अछि । छठिहारिक एक दिन पहिने हुनका पता चललन्हि जे बेटा भेल छन्हि । एहि अनिश्चितताक उपरांत यैह सिद्ध भेल जे यावत सत्यक जे रूप बूझल अछि सैह तावत धरि सत्य रहत । सत्यक विभिन्न रूप, जे असत्य तँ नहि अछि, तकरे प्रतिकीर्तिक रूपमे आरुणिक व्यक्तित्वक प्रादुर्भाव भेलैक। जन्मेसँ एहि आभाषित सत्यक विभिन्न रूपक साक्षी रहलाह आरुणि । आरुणिक जन्मक पहिनहि बा केर देहांत भऽ गेलन्हि। बादो मे जखन-जखन बा केर चर्चा अबैत छल, आरुणि ध्यानसँ सुनैत छलाह आ अपन जिज्ञासा बढबैत छलाह। एवम क्रमे बा हुनकर जीवनक अंग भऽ गेलीह । बा हुनकर जन्मक पहिनहि सँ शरीररूपे नहि छलीह, मुदा हुनकर अवस्थिति एहि घरमे सदिखन छलन्हि । आरुणिक कथा आ नन्दक कथाक बीचक तारतम्य पहिने तँ नहि बुझि पड़ि रहल छल । मुदा प्रकृतिक संगहि आरुणि सेहो अपन प्रतिभा देखाबए लगलाह । मनुष्यक प्रवृत्तिये होइछ समानता आ तुलना करबाक, साम्य आ वैषम्यक समालोचना आ विवेचनमे कतेक गोटे अपन जिनगी बिता दैत छथि । आरुणि आ नन्दक बीच सेहो अनायासहि साम्य देखल जा सकैत अछि । दुहु गोटेक ऊपरी प्रतिभा आ तथाकथित वैचारिक मतभेदक रहितहु जे मूल व्यक्तित्वक साम्य होइत छैक, से दुनू गोटेमे वर्त्तमान अछि । एहन सन बुझना जाइत छल । मध्य वर्गक बच्चाक लालन-पालन आ पोषण जाहि आशा ओ आकांक्षासँ होइत अछि, तकर अपवाद आरुणि नहि छलाह । जेना सभ माता-पिता अपन नेनाक छोटो छोट बातमे प्रतिभाक छाप देखैत छथि तहिना आरुणिक माता-पिता विशेष कए पिता नन्द, आरुणिक व्यक्तित्वमे विशेष प्रतिभा देखए लगलाह । आरुणि केँ खूब स्वप्नसभ अबैत छलन्हि । तहिना दाँत सेहो सूतलमे कटकटाइत छलन्हि । सपनामे नीक आ अधलाह दुनू प्रकारक तत्व रहैत छलन्हि मुदा डराओन तत्व विशेष रहैत छलन्हि । बहुत दिन धरि आरुणि एहि प्रयासमे रहथि जे कोना कए सपना आकि दुःस्वप्न अएनाइ बन्द भए जएत । बीच रातिमे ओ घामे-पसीने भए जाइत रहथि आ जखन निन्न खुजनि तऽ देखथि जे माता-पिता पंखा होँकि रहल छथिन्ह । सभसँ पहिने ककर जन्म भेल आ तकर पहिने ककर, आ सभकेँ भगवान बनओलन्हि तँ भगवानकेँ के बनोलकन्हि । ई सभ सोचि-सोचि कए आरुणि चिंतित भए जाइत छलाह। रातिमे स्वप्नमे हुनका होइत छलन्हि जे इनाररूपी प्रकृतिमे ओ गामक छातपर घूमि रहल छथि । फेर ओ छतक कातमे जाए लगैत छथि । फेर जेना पोखरिक कछेर अछि, तहिना छतक काते कात बिन इच्छेक जाइत रहैत छथि, फेर चाहैत छथि, जे कातसँ हटि कए बीच छतपर आबि जाइ । किंतु इनार रूपी प्रकृतिक गुरुत्वमे ओ खिचाइत चलि जाइत छथि । आ खसि जाइत छथि । अनायासहि निन्न खुजैत छन्हि तँ खुशी आ दुःख दुनू प्रकारक भावना मोनमे अबैत छन्हि । खुशी एहि बातक जे स्वप्ने छल ई, यथार्थ नहि । दुःख एहि बातक जे फेर ने कतहु एहि प्रकारक दुःस्वप्न फेर आबए । पितासँ पूछथि जे अहाँ सेहो एहन सपना सुनैत छी, नहि नहि देखैत छी तँ ओ कहथि जे नहि आब नहि। हँ जखन ओ बच्चा रहथि तँ सपना देखथि, बड़का झोटाबला सहस्रबाढ़निक । आगि बोकरैत तमसाएल, जेना पृथ्वीकेँ गीरि लेत । सपना तँ सपने छी जे अहाँ सोचब से रातिमे अएत। नहि जानि के बूढ़-पुरान सहस्रबाढ़निक खिस्सा हमरा सुना देलन्हि। की सभ कहि देलन्हि जे सहस्रबाढ़निक आगमन अनिष्टक संकेत अछि जे ई जाहि बरख आएल ताहि बरखसँ कैक साल धरि बीमारी अकाल पड़िते रहल। यैह सभ हमर सपनामे अबैत छल। मुदा से बच्चामे आब तँ निन्ने कम अबैत अछि तँ सपना कतएसँ अएत। आ आरुणि सोचथि जे कतेक नीक होइत जे हुनको निन्न कम्म अबितन्हि। एहि बीच आरुणि कखन निन्न अबैत अछि आ कखन स्वप्न एहि सभ पर जेना शोध करए लगलाह। फेर अगिला दिन मोन पाड़थि, जे नौ बजे धरि जागल छलहुँ, दसो बजे यावत जागले छलहुँ, तखन कखन सुतलहुँ । फेर किछुए दिनमे ओ अपना मोनके बहटारि लेलन्हि, जे ज्योँ हुनका ई मोन पड़ि जाइन्हि जे निन्न कखन आएल तखन तँ ओ जागले रहि जएताह । हुनकर नाम कतेक बेर बदलल गेल । पुरातन ग्रंथ सभक अध्ययन नंद एहि हेतु कएलन्हि । फेर हुनक पढ़ाइ-लिखाइक कार्य शुरु भेलन्हि। श्री गणेशजीक अंकुश छह ढ़ंगसँ लिखनाइ सिखाओल गेलन्हि आरुणिकेँ आ एहि आकृतिक संग गौरीशंकरक अभ्यर्थना-सिद्धिरस्तु।
साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादांतस्य धूर्जटेः
जाह्णवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला ॥
पशुपतिः पतिः कहि आरुणि खूब हँसथि । एहिसँ हुनकर तोतरेनाइ सेहो समाप्त भए गेलन्हि । एक सँ सए धरिक पाठमे आरुणिकेँ पशुपतिःपतिः बला तारतम्य मोन पड़ैत छलन्हि । दस सँ उन्नैस आ फेर बीस सँ उनतीस । नन्दक छोट पुत्र आरुणि शुरुअहिसँ नन्दक आशा आ आकांक्षाक प्रतीक बनए लागल छलाह । एकर किछु कारण सेहो छलैक । एकसँ सए धरि लिखब नन्द हुनका सिखा रहल छलाह । नन्द हुनका एकसँ दस धरि लिखनाइ आ बजनाइ सिखेलखिन्ह आ एगारहसँ आगाँ सेहो सिखाबए लागलखिन्ह । पुनः ई सोचि कए जे बालक पर एतेक बोझ लदनाइ ठीक नहि अछि ओ रुकि गेलाह । परंतु बालककेँ एगारहसँ बीस, फेर एक्कैससँ तीस जएबा धरि एहि बातक पता भऽ गेलन्हि जे ई तँ एक सँ दस तकक पुनरावृत्ति मात्र छैक । ओ एकर औचित्यक अपन पितासँ चर्चा केलन्हि तँ पिता हुनका एकसँ सए धरि लिखबाक चुनौती दऽ देलखिन्ह । बालक से लिखि कए जखन देखा देलखिन्ह तकरा बाद प्रत्येक शब्दकेँ कोन नाम देल जाए तकर समस्या आएल । नन्द एगारह, एक्कैस, उन्नासी आ नबासीक विशेष रूपसँ चर्चा केलन्हि । माँ जखन आधा घंटाक प्रगतिक समीक्षाक हेतु अएलीह तखन हुनका पता लगलन्हि जे पाठ्यक्रम तँ पिता-पुत्रक बीच पूर्ण भऽ चुकल अछि । पिता गदगद भए गेलाह आ माँ एहि घटनाक चर्चा बहुत कम गोटेसँ केलन्हि जे कतहु ककरो नजरि नहि लागि जाए । एहने-एहन ढेर रास उदाहरण पिताक हृदयमे पुत्रक कोनो गलती नहि केनिहारक छवि अंकित करबामे सक्षम भऽ गेल।
आरुणिकेँ अप्पन पुरना बात सभकेँ मोन रखबाक धुनि जेकाँ छलन्हि । कोन ईस्वी मे की भेल, कोन ईस्वी सँ की-की भेल से कोना यादि होएत । हम बच्चामे की सभ कएलहुँ –अप्पन पिता-माता आकि आनो बूढ़-पुरान सभक जीवनक घटनाक्रमक सभ गप बुझबाक लालसा हुनकामे छलन्हि। कखनोकालकेँ हुनका एहि गपक छगुंता होइत रहन्हि जे बिना हुनकर देखनो, एहि विश्वमे सभ गोटे सभ काज कोना कए रहल अछि । माने ई जे जखन आरुणि सुतल छथि तखनो विश्व चलि कोना रहल अछि । हुनका बच्चाक दुइ-चारिटा घटना मात्र मोन रहन्हि । जेना कि सिनेमा हॉलमे बॉबी सिनेमाक स्मरण, स्टुडियोमे माता-पिताक संग मुंडनक पहिने केशबला फोटो खिचेबाक स्मृति । फेर कोनो गप पर माँ द्वारा ध्यान नहि देलाक उपरांत भरि घरक चाभीक झाबाकेँ सोँझाक डबरामे फेंकि देबाक स्मृति । गाममे कोनो काज-उद्यमक भीड़क दृश्य । फेर आरुणि एहि सभपर सोचलाक बाद यैह निष्कर्ष निकाललन्हि जे १९७६ ई.सँ हुनका सभ किछु मोन छन्हि, कारण तखन ओ ५-६ बरखक होएताह आ एहि वर्षसँ माँ हुनका अखबार पढ़बाक हिस्सक धरा देने छलखिन्ह । बहुत दिनुका बाद एक दिन नन्दकेँ आरुणिक डायरी हाथ लागि गेलन्हि जाहिमे आरुणि अपन स्मृतिक घटनाक्रमक इतिहासकार जेकाँ वर्णन देने रहथि।
हम, आरुणि, सन् १९७६ ई.केँ अपन जीवनक विभाजन रेखा मानैत छी । कारण एहिसँ पहिने हमरा अपन जीवनक घटनाक्रम किछु टूटल कड़ीक रूपमे बिना तारतम्यक बुझना जाइत अछि । कखनोकेँ हमरा ईहो होइत अछि जे एहि मे सँ किछु पूर्व जन्मक कोनो घटनाक्रम तँ नहि अछि ? सन् १९७६ ई.। हम गंगाब्रिज प्रोजेक्टक गंगाक उतरबारी कातमे हाजीपुरमे बनाएल कॉलोनीमे अपन माता-पिता आ पैघ भाए-बहिनक संग रहि रहल छी । पिताजी व्यवसायसँ सरकारी अभियंता छथि मुदा होम्योपैथिक चिकित्सामे सेहो एम.डी.(गोल्ड मेडेलिस्ट) छथि आ हुनकर ई एक तरह सँ हॉबी छन्हि । भरि कॉलोनीक लोक चंदा एकत्र कए होम्योपैथिक दबाइ कानपुरसँ मँगबैत छथि । बाबूजीक संग एकाध गोटे कानपुर जा कए दवाइ सभ लेने अबैत छथि । हमरा सभक सरकारी क्वार्टरक ड्रॉइंग रूममे एकटा अलमीरा, दू टा कुर्सी आ एकटा टेबुल चिकित्सकीय कार्यक हेतु समर्पित अछि । हमर एकटा छोटका टेबुल सेहो एहि रूममे रहैत अछि, जाहिमे तीस पाइक आर्यावर्त्त अखबार हम अप्पन माँकेँ पढ़ि कए सुनबैत छियन्हि । जतए धरि हमरा मोन अछि, एहि कॉलोनीक दूटा भाग छल । चारू दिशि चहरदिवारी छल, एहि कॉलोनीक बीचमे सेहो एकटा दिबारि छल जे एहि कॉलोनीकेँ ‘रहएबला’ आ ‘गोदामबला’ एहि दू हीसमे बँटैत छल । गोदामबला इलाकामे मारि रास लोहाक छड़, जोखय बला मशीन आ ट्रक सभक संग एकटा कदम्बक गाछक स्मृति हमरा अछि । जोखय बला एकटा मशीन ततेक पैघ छल जाहि पर हम जखन ठाढ़ होइत छलहुँ तँ ओकर काँटा हिलबो धरि नहि करैत छल । हमरा बताओल गेल छल जे एहि पर भरिगर चीज सभ मात्र जोखल जा सकैत
अछि । पन्द्रह-सत्रह किलोक पाँच सात बर्षक बच्चाक भार एकरा हेतु नोँसिक समान अछि । एहि गङ्गा-ब्रिज कॉलोनीक रहएबला क्षेत्रमे एकटा पैघ आ एकटा छोट मैदान छल । दुनूक बीच एकटा पैघ पानिक टंकी आ पम्प हाउस छल । पम्प हाउसमे पानि जाहि बाटे अबैत छलैक से बेस मोटगर पाइप छलैक आ हमरा अखनो मोन अछि जे ओ ओहिना खुजल रहैत छलैक । हम ओहिमे आँखि दए कऽ तकनहियो रही मुदा दोसर बेर डरसँ पाछू हँटि गेलहुँ, जे कतहु खसि पड़लहुँ तखन की होएत । ओ पाइप एकटा बोरासँ झाँपल रहैत छल । पैघ क्रीडांगणक उतरबारी कातमे एकटा कोटाबला दोकान रहैक । ओहिसँ पछबारी कातमे एकटा हनुमानजीक मूर्त्ति आ मंदिर बनि रहल छल जे बहुत पहिनहि बनि गेल रहैत मुदा कारीगर हनुमानजीक नाक ठीकसँ नहि लगा पाबि रहल छल । हनुमानजीक नाक चाहे तँ सामग्रीक समुचित मत्राक अनुपात नहि रहलाक कारण वा ककरो बदमाशीक कारण टूटि जाइत रहए किंतु किछु दिनुका बाद हनुमानजीक मूर्त्ति बनि कए तैयार भऽ गेल रहए । मंगल दिनकेँ आरती होमए लागल छल, पूरा कॉलोनी जेना भक्ति-भावसँ भरि उठल रहए । किछु दिनुका बाद सभक उत्साहमे कनेक कमी आबए लागल, जेना आन संस्थाक संग होइत अछि, प्रारम्भिक उत्साह क्रमशः कम होइत गेल आ मंदिरक संग जुटल सभटा सामाजिक कार्यक्रमक योजना योजने रहि गेल । हम कॉलोनीसँ दूर एकटा स्कूलमे पढ़बाक हेतु जाए लागल छलहुँ । हमर पैघ भाइ आ बहिन सेहो ओहि स्कूलमे पढ़ैत रहथि । एक दिनका गप्प अछि जे स्कूलमे हमरा कोनो दोसर बच्चाक संग झगड़ा भए गेल । दुनु गोटेक संग स्लेट रहए । हम आ ओ दोसर बच्चा एकरा हथियारक रूपमे प्रयोग करए लागलहुँ । हम सोचए लगलहुँ जे ज्योँ स्लेटकेँ दोसर बच्चाक माथ पर मारबैक तँ शोनित निकलए लगतैक । ताहि द्वारे हम स्लेटकेँ रक्षात्मक रूपेँ प्रयोग केलहुँ । मुदा ओ दोसर बच्चा मचंड छल… ….खच्च….हमर माथसँ शोनितक धार निकलए लागल । टीचर सभ हमरा प्रिंसपलक रूममे लए गेलथि । रुइयामे सेवलोन वा डिटॉल नहि किछु दोसरे छल, ओकर रंग आ सुगंध हमरा अखन धरि मोन अछि, फर्स्ट-एडक बाद साँझ होएबाक आ छुट्टीक बेर नहि ताकल गेल । स्कूलक रिक्शा जाहि पर “सावधान बच्चे” लिखल छल केर बाट नहि जोहि एकटा दोसर रिक्शामे हमरा दीदीक (बहिनक) संग घर पठा देल गेल । हम दीदीकेँ पुछलियैक, जे “सावधान बच्चे” केर अर्थ की भेल । हमरा लगैत छल जे एकर अर्थ छल जे सभटा बच्चा जे ओहि रिक्शामे बैसल अछि, से सभ सावधान अछि, आ एहि बातसँ ओ दोसर छौड़ा असहमति देखा रहल छल आ ताहि गप्प पर झगड़ा बजरि गेल छल । दीदीक उत्तर रहए जे ई लिखबाक उद्देश्य चेतावनी छैक, जे कोनो दोसर गाड़ी पाछू सँ ठोकर नहि मारि दैक आ सम्हरि कए चलए ।
“मुदा किएक”- हम संतुष्ट नहि होइत पुछलियन्हि । एहने प्रश्न आ उत्तरक संग हम बढ़ए लागल छलहुँ । आ बढ़ैत- बढ़ैत कहियो काल खिसियेला पर माँ कहथि, जे सोचैत रही जे कहिया पैघ होएत आ पैघ भेल तँ नाकमे दम कए देने अछि।
कॉलोनीक बाहरक क्रिश्चियन संतक नाम पर बनल स्कूलमे हम सभ भाइ-बहिन जाइत रही । स्लेटसँ कपार फोड़बएलाक बाद बाबूजी कॉलोनीमे ऑफिसर सभक मीटिंग करबओलन्हि । फैसला भेल जे खेलाक मैदान आ उत्तरबरिया सीमंतक देबालसँ सटल कोटाक दोकान (सार्वजनिक वितरण प्रणालीक दोकानकेँ कोटाक दोकान कहल जाइत छल) अपन आवश्यकतासँ बेशी पैघ घरमे छल । ओहि कोटाबलाक लाइसेंस सेहो कोनो कारणसँ समाप्त भए गेल छलैक, से ओहि एसबेस्टस बला ३-४ कोठलीक घरकेँ प्राथमिक विद्यालय बनएबाक निर्णय लेल गेल आ दू-चारिटा शिक्षकक बहाली कए, दू चारिटा लोकक कमेटी बनाए स्कूल शुरु कए देल गेल । पड़ोसक गंडक कॉलोनीकेँ सेहो छह महीना बाद नोत देल गेल जे अहूँ अप्पन कॉलोनीक बच्चा सभकेँ एतए पढ़ा सकैत छी । उत्तरबरिया देबाल पर बाहर दिशिसँ स्कूलक नाम लिखल गेल जे किछु दिनक बाद मलिछोँह होइत गेल । मुदा स्कूलक प्रतिष्ठा बढ़ैत गेल । क्यो गोटे ज्योँ अप्पन बच्चाक नाम लिखाबए अबैत छलाह तँ हुनकर बच्चाकेँ एक किंवा कखनो कालकेँ दुइ वर्ग नीचाँ नामांकन लेल जएबाक गप्प शिक्षकगण करैत छलाह । अप्पन स्कूलक स्तर कनेक ऊँच होएबाक गप्प करैत छलाह । बेशी जिद्द केला पर हमरा बजा कए टेस्ट लैत छलाह आ जाहि प्रश्नक उत्तर तेसर वर्गक नामांकनक अभिलाषी नहि दए पाओल छलाह से प्रश्न हमरा सँ पुछैत छलाह आ हम्मर सही उत्तर पर ओ कुटिल मुस्कान दैत नामांकनक हेतु आएल बालकक अभिभावक दिशि मुँह करैत छलाह । मोटा-मोटी बुझु जे ओहि स्कूलक हम सभसँ उज्जवल विद्यार्थी छलहुँ-जकर सोझाँमे, ओहि गामसँ आएल विद्यार्थीक अएलाक पहिने, क्यो ठाढ़ नहि भए सकल छल । पढ़ाइक प्रति एकटा विशिष्ट लगाव छल हमरामे, जे बादमे क्रमशः उदासीनतामे बदलए लागल । से एक बेर जखन बोखारसँ बड़बड़ाइत छलहुँ तहिया परीक्षाक दिन रहैक । बड़बड़ा रहल छलहुँ जे परीक्षा ने छूटि
जाए । घरपर प्रश्न आ कॉपी आएल आ तखन अप्पन परीक्षा दऽ सकलहुँ हम । स्कूल छल छोट-छीन मुदा ओकर सभ गतिविधिमे कॉलोनीक निवासीगण सोत्साह भाग लैत छलाह । क्रीडाक्रिया होअए आकि सांस्कृतिक । क्रीड़ामे दू विद्यार्थी एक-एक पएर डोरीसँ बान्हि कए तीन टाँग बनाए दौगैत छलाह । दौगि कए मैदानक दोसर छोड़पर राखल ब्लैक बोर्डपर लिखल हिसाबकेँ बनाए दौगि कए आपस अएबाक खेलमे शारीरिक आ मानसिक दुहुक परीक्षा होइत छल जाहिमे हम अग्रणी अबैत छलहुँ । हमरा दू गोट घटना आर मोन पड़ि रहल अछि । पहिल घटना एक गोट बच्चाक गामसँ आएब । ओ हमरा हेतु किछु दिन पढ़ाईमे चुनौतीक रूपमे रहल कारण ओकर गाम बला किताबमे किछु नवीन जानकारी रहैक मुदा तकर कोटा पूरा भेलाक बाद हम ओकर चुनौतीकेँ खतम कए
देलहुँ । दोसर घटना छल एक गोट बच्चाक एक्सीडेंट जकर बाद हम सभ खेलाइ कालमे टाइम निकालि ओकरा खिड़कीसँ देखि अबैत रहियैक । बादमे कहियो काल ओकर रूम मे जा कए ओकर डायरी सेहो देखि अबैत रही । ओकर किछु अंश हमरा मोन अछि से एना अछि ।
“अप्पन सभक गप्प करबा लेल हमरा लगमे समयक अभाब रहए लागल । किछु तँ एकर कारण रहल हम्मर अप्पन आदति आ किछु एकर कारण रहल ह्म्मर एक्सीडेंट, जकर कारण हम्मर जीवनक डेढ साल बुझा पड़ल जेना डेढ दिन जेकाँ बीति गेल । किछु एहि बातक दिस सेहो हमर ध्यान गेल जे डेढ सालमे जतेक समयक नुकसान भेल तकर क्षतिपूर्ति कोना कए होएत । किछु तँ भोरमे उठि कए समय बचेबाक विचार आएल मुदा आँखिक निन्न ताहि मे बाधक बनि गेल । तखन सामजिक संबंधकेँ सीमित करबाक विचार आएल । एहिमे हमरा बिन प्रयासक सफलता भेटि गेल छल । एकर कारण छल हमर नहि खतम प्रतीत होमएबला बीमारी । एहिमे विभिन्न डॉक्टरक ओपिनियन, किछु गलत ऑपरेशन आ एकर सम्मिलित इम्प्रेसन ई जे आब हमरा अपाहिजक जीवन जीबए पड़त । आनक बात तँ छोडू हमरा अपनो मोनमे ई बात आबए लागल छल । लगैत छल जे डॉक्टर सभ फूसियाहिँक आश्वासन दए रहल अछि । एहि क्रममे फोन सँ लऽ कए हाल समाचार पुछनहारक संख्या सेहो घटि गेल छल । से जखन अचानके बैशाखी आ फेर छड़ीपर अएलाक बाद हम कार चलाबए लगलहुँ तँ बहुत गोटेकेँ फेर सँ हमरा संग सामान्य संबंध बनाबएमे असुविधा होमए लगलन्हि । जे हमरासँ दूर नहि गेल रहथि तनिकासँ तँ हम जबर्दस्तीयो संबंध रखलहुँ मुदा दोसर दिशि गेल लोकसँ हमर व्यवहार निरपेक्ष रहैत छल से पुनःसंबंध बनेबासँ लोक हतोत्साहित रहए लगलाह । दुर्दिनमे जे हमरापर हँसथि तनिकर प्रति ई व्यवहार सहानभूतिप्रदहि मानल जएत । एहिसँ समयधरि खूब बचए लागल। शुरुमे तँ लागल जेना ऑफिसमे क्यो चिन्हत आकि नहि । मुदा जखन हम ऑफिस पहुँचलहुँ तँ लागल जेना हीरो जेकाँ स्वागत भेल होअए । मुदा एहिमे ई बात संगी-साथी सभ नुका लेलक जे हमर छड़ीसँ चलनाइ हुनका सभक भीतर हाहाकार मचा रहल छलन्हि । सभ मात्र हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहैत छलाह । जखन हम छड़ी छोड़ि कए चलए लगलहुँ आ जीन्स शर्ट-पैंट पहिरि कए अएलहुँ तखन एक गोटे संगी कहलक जे आब अहाँ पुरनका रूपमे घुरि रहल छी । एहि बातकेँ हम घरपर आबि कऽ सोचए लगलहुँ । अपन चलए कालक फोटोकेँ पत्नीक मदति सँ हैण्डीकैम द्वारा वीयोडीग्राफी करबएलहुँ । एकबेर तँ सन्न रहि गेलहुँ । चलबाक तरीका आबो नेँगड़ा कए दौगबा सन लागल छल । पहिने तँ आर बेशी होएत मुदा संगी सभ एको रत्ती पता धरि नहि चलए देलक । बादमे घरक लोक कहलक जे ई तँ बड्ड कम अछि, पहिने तँ आर बेसी छल । तखन हमरा बुझबामे आएल जे संगीसभ आ ओ सभ जे हमरासँ लगाव अनुभव करैत छलाह, तनिका कतेक खराब लगैत होएतन्हि । तकरा बाद हमरा हुनकर सभक प्रोत्साहन आ हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहबाक रहस्यक पता चलल । अपन प्रारम्भिक जीवनक एकाकीपन आ नौकरी-चाकरी पकड़लाक बाद सार्वजनिक जीवनमे अलग-थलग पड़ि जएबाक संदेह, आशा, अपेक्षा किंवा अहसास-फीलिंगक बाद जे एहि तरहक अनुभव भेल से हमर व्यक्तित्वक भिन्न विकासकेँ आर दृढ़ता प्रदान केलक”।
ओ तँ छल हमरे संगी मुदा कल्पना कऽ रहल छल जेना कोनो पैघ वियाहल व्यक्ति होअए आ काल्पनिक रूपसँ ठीक भेलाक बादक वर्णन अपन डायरीमे कएने छल । मजदूरक टोल आ साँझमे ठेलागाड़ी पर हुनका लोकनि द्वारा अपन कपड़ा सुखाएब, एहि सभकेँ देखि कऽ हम विचलित भऽ जाइत छलहुँ । ई देखलाक बादो जे हुनका लोकनिक मुँहपर हँसी छन्हि, बिन घर रहलो उत्तर । छोट-छोट बच्चा सभकेँ भीख मँगैत देखब, हम सभ जखन खेलाइत रही तँ ओकरा सभक हमरा सभक दिशि कातर दृष्टिए देखब । लोक सभक दुत्कार, कहियो हमरो पर ई विपत्ति आबि जाए तखन ? फेर दोसर क्यो हुनका लोकनिक दिशि तकबो नहि करन्हि, तँ की हमही टा आन बच्चासँ भिन्न छी आ ई सभ सोचनी लागल रहैत छल । हम ई सोचैत रही जे जखन हम कोनो स्थान पर नहि रहैत छी तखनो तँ सभ कार्य गतिसँ चलैत अछि । किताबमे हम पढ़ने रही जे किछु जीव जंतु मात्र दू डाइमेंसनमे देखैत अछि । हमरा सभ तीन डाइमेंसनमे जिबैत छी, तँ ई जे भूकंपक आ आन-आन विपत्ति सभ अबैत अछि से कोनो चारि डाइमेंसनमे कार्य करए बलातँ नहि कऽ रहल अछि जे कल्पनातीत अछि ।
पाँच पाइमे लालछड़ी बलाकेँ देखा कऽ बाबूजी कहैत रहथि जे देखू ईहो लोकनि अपन परिवारक गुजर पाँच-पाँच पाइक ई लालछड़ी बेचि कए कऽ रहल छथि । पाइक महत्व आ ओकर आवश्यकता जतेक बढ़ाऊ ततेक बढ़त । अपन-अपन वातावरणक आ जीवनक बादक जीवनक - एहि सभक संग जीनाइ, रातिमे बड़बड़ेनाइ ई सभ गोट कार्यक संग पढ़ाइ आ पिताक नौकरीक परेशानी सभ चलैत रहल । हमरा मोन पड़ैत अछि जे एक दिन भोरे-भोर एक गोट ठीकेदारक सूटकेशपर हमर बाबूजी जोरसँ लात मारने छलाह । सूटकेश जा कऽ दूर खसल आ ओहिमे राखल रुपैय्या सौँसे छिड़िया गेल । हमर एक गोट पितियौत भाइ छलाह जे सभटा पाइकेँ उठा सूटकेशमे राखि वापस ठीकेदारकेँ दऽ वापस कए देलखिन्ह आ ईहो कहलखिन्ह जे जल्दीसँ भागि जाऊ नहि तँ पुलिसकेँ पकड़बा देताह । माँ हमरा भीतरका कोठली लऽ गेलीह । हम बच्चा छलहुँ मुदा हमरा बुझबामे आबि गेल छल जे ई पाइ हमरा बाबूजीकेँ गंगा-ब्रिजक ठीकेदारक दिशिसँ अपन इंजीनियरिंग छोड़ि कऽ बिना कोनो भाङठक कार्य होमए देबा लऽ देल जएबाक प्रयास छल । बाबूजी बहुत काल धरि बड़बड़ाइत रहलाह । कखनो दालिमे नून कम रहला उत्तर आकि आन कोनो कारणसँ बर्त्तनकेँ फेंकबाक स्वरसँ देह सिहरि जाइत छल । फेर किछु क्षणक चुप्पीक बाद सभ बच्चाकेँ बजाओल जाइत छल आ दुलार मलार होइत छल । हम वर्गमे प्रथम अबैत छलहुँ आ परिणाम निकलबाक दिन एकटा कॉलोनीक सिन्हा चाची सभ बेर लट्ठा खोआबैत रहथि । प्रायः गुर आ आटासँ बनल एहि लट्ठाक स्वाद हम बिसरि नहि सकल छी । ओहि चाचीक एकटा अर्द्ध-पागल दिअर छलन्हि जे सितार बजबैत रहैत छल । एक बेर गंगामे स्टीमरसँ हमरा सभ ओहि पार जाए रहल छलहुँ तँ ओ ओहि स्टीमर परसँ अपन भाएकेँ फेंकबा लेल ओ उद्यत भऽ गेल छल । ओहि चाचीकेँ एकटा बेटी रहन्हि रजनी । पता नहि कोन बिमारी भेलैक, बेचारी एलोपैथिक दवाइक फेरमे ओछाओन धऽ लेलक । हम सभ कताक बेर हुनका देखबा लेल जाइत रही । हमरा दोसराक अहिठाम जाएमे धाख होइत रहए मुदा ओतए ककरो संगे पहुँचि जाइत रही । हुनका सभ क्यो दीदी कहैत रहियन्हि । हमरा सभसँ बड्ड पैघ रहथि । मुदा किछु दिनक बाद हुनकर मृत्यु भऽ
गेलन्हि । मृत्युसँ हमर मानसिक द्वंद, एहि घटनाक बाद आब आर लग बुझाए लागल । हुनकर मृत्युक बादो ओ चाची अपन बेटा सभकेँ अगिला दिन स्कूलक हेतु तैयार कए पठेलन्हि जे कॉलोनीक एकगोट दोसर दबंग चाचीकेँ पसिन्न नहि पड़लन्हि आ एकर चर्चा बहुत दिन धरि कॉलोनीमे होइत रहल । चाचीक भाइ मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे व्याख्याता रहथि। एहि कॉलेजसँ हमर बाबूजी सेहो इंजीनियरिंग पास कएने रहथि । ओ हाजीपुरमे गंगा-ब्रिज कॉलोनी स्थित हमर सभक घर पर आएल रहथि आ अपन बहनोइकेँ बड्ड फझ्झति कएने रहथिन्ह । पटना जा कए नीक इलाज करेबामे असफल रहबाक कारण पाइकेँ बतेने रहथिन्ह । हमरा मोनमे ई विचार आएल रहए जे पटनामे पैघ डॉक्टर रहैत अछि जे मृत्युकेँ जीति सकैत अछि । मुदा एक दिन हमरा सभक संग रहएबला गामक पितियौत भाए जखन परमाणु युद्धक चर्चा कए रहल छलाह आ ईहो जे ओहि समयमे पृथ्वी पर एतेक परमाणु अस्त्र-शस्त्र विद्यमान रहए जाहिसँ पृथ्वीकँह कताक बेर नष्ट कएल जा सकैत अछि, तखन हमर ईहो रक्षा कवच टूटि गेल छल ।
हमर पुरान जीवनक ई एकटा नीक अनुभव छल। बादमे दुर्घटना तँ हँसी-खेल भऽ गेल । नहि तँ एकरासँ कोनो दुःख होइत छल नहिये कोनो लक्ष्यक प्रति तेना भऽ कए पड़ैत छलहुँ । खेल सेहो वैह नीक लागए जाहिमे टीम नहि वरन व्यक्तिगत स्पर्धा रहैत छल कारण टीममे दोसराक प्रदर्शन हारिक स्थितिमे बहन्ना बनि जाइत अछि । एकर कारण सेहो छल, किएक तँ एहिमे टीमक प्रदर्शन पर व्यक्तिगत प्रदर्शन निर्भर नहि करैत छल आ जे बड़ाइ आकि बुराइ भेटैत छल से व्यक्तियेकेँ भेटैत छल । अहाँ ई नहि कहि सकैत छी जे ओकरा कारण हम हारलहुँ, हम तँ नीक प्रदर्शन कएने रही । स्कूल आ पढ़ाइक अतिरिक्त ओना क्रीड़ाक स्थान न्यूने छल । लक्ष्यक प्रति जे निरपेक्षता बादमे हमरामे आएल छल से ओहि समयमे नहि छल । ओहि समयमे तँ जगतकेँ जितबाक धुनि छल । द्वितीय स्थानक तँ कोनो प्रश्ने नहि छल । द्वितीय स्थानक माने छल अनुत्तीर्ण भेनाइ । खेलोमे, पढ़ाइयोमे, मारि-पीटमे सेहो । गाम आन-जान खूब होइत रहए । गाम जाइत रही तँ महादेव पोखरि परका स्कूलमे काका शिक्षककेँ कहि अबैत छलाह आ हम छुट्टीयो मे स्कूल जाइत रही । कबड्डी, सतघरिया, लाल-छड़ी ई सभ खेलक नामो तँ शहरक बच्चाकेँ बूझल नहि
होएतैक । अस्तु ओतुक्का पढ़ाइक सभ प्रणाली अलग छल । प्रतिदिन करची कलमसँ लिखना लिखएमे देह सिहरि जाइत छल आ रोजनामचा सेहो एहि प्रकारे लिखैत रही-भोरे-सकाले उठलहुँ नित्य कार्यक उपरांत जलखइ कऽ पढबाक लेल बैसलहुँ, फेर स्कूल गेलहुँ, ओतए सँ एलहुँ, पुनः खेनाइ खेलहुँ । फेर स्कूल गेलहुँ, फेर गाम पर एलहुँ आ फेर जलखै कएलहुँ । फेर खेलाइ लेल गेलहुँ । फेर आबि कऽ लालटेनक शीशाकेँ साफ केलहुँ, फेर पढ़लहुँ आ फेर भगवानक नाम लऽ सूति गेलहुँ । रवि दिनक छुट्टीक बदला सोम दिन दू दिनक रोजनामचा लिखि कए लऽ जाए पड़ैत छल । ओतए १५ अगस्तक उत्साह सेहो दोसरे तरहक छल । साँझ-आ भोरमे १५ अगस्त- स्वतंत्रता दिवस, भारत माताक जय केर संग सभ महापुरुष लोकनिक जय करैत जाइत छलहुँ । मुदा मास्टर साहेबक ई गप नहि बुझना गेल छल जे मारि-पीट नहि करैत जइहऽ । मुदा जखन भोरमे जयक नाद गामक सीमान पर सँ जाए काल सुनलहुँ तखन पता चलल जे ई गप मास्टर साहब किएक कहने छलाह । महिनाथपुरक स्कूलक बच्चा सभ जखने ओम्हरसँ अबैत रहए आकि तखने मारि बजरि गेल । कोनहुना झोप-ताप कएल गेल । फेर गामपर जे अएलहुँ तखन पुरनका बैचक विद्यार्थी सभ अपन खिस्सा शुरू कएलक जे कोना पोखरिमे पैसा-पैसाकेँ केराक थम पानिमे दऽ कए स्वतंत्रता दिवस दिन मारने रहए गेल छलथिन्ह अनगौआँ केँ । फेर ओहो सभ दोसर साल बदला लेबाक ताकिमे छल मुदा ताहू बेर…। दोसर साल फेर वैह मीटिंग, दुनू गामक स्कूलक मध्य मुदा एहि बेर दोसर गाम बला टीम रस्ता बदलि लेलक ।
मारि बझब गाममे एकटा पर्व जेकाँ छल । दुर्गास्थानमे चॉकलेटक बुइयामक फूटब आ कोनो कटघरा किंवा टाटक खुट्टा उखाड़ि कए मारि-पीट शुरू करब । आ बादक जे गप्प होइत छल से मनोरंजक । एक बेर एकटा अधवयसू एक गोट नव-नौतारकेँ दू-चारि चमेटा मारि देलन्हि । बादक घटनाक हेतु हम कान पथने रही तँ हमर पितियौत ओहि गौआँकेँ पुछलखिन्ह जे वैह बात रहए ने । सभ क्यो एकमत रहथि जे वैह बात रहए । एहि बेर हम हारि कऽ पुछलियन्हि जे वैह कोन बात अछि जे सभकेँ बूझल अछि मुदा हमरा नहि बूझल अछि । ओ कहलन्हि जे एहि युवापर अपन बचियाक घटकैतीक हेतु ओ अधवयसू गेल रहथि मुदा कथा नहि सुतरलन्हि । ओहि युवकक विवाह दोसर ठाम भए गेलन्हि, से तकरे कैन लऽ कए कोनो फुसियाहीक लाथ लऽ आइ ओकरा कुटलन्हि
अछि । हम पुछलियन्हि जे ज्योँ विवाह भऽ जाइत तँ ससुर जमाएक संबंध
रहैत । तखन एहि फुसियाही गप पर मारि बजरैत ? सभ कहथि जे अहाँ तँ तेसरे गप पर चलि गेलहुँ । रातिमे नाटक देखैत अकासमे डंडी-तराजू देखब, खाली डंडी छैक तँ तराजू कियैक कहैत छियैक? फेर ओहि नाटकोमे अनगौँआ सँ मारि बझेबाक हमर संगीक एकटा चालि । भेल ई जे नाटक देखए काल ओ एकटा अनगौँआकेँ खौँझा रहल छलाह । मारि अंट-शंट बकैत छलाह । आ ओ किछु बाजए तँ कहैत छलाह जे अखने नरेण भैयाकेँ बजाएब । ताहिपर ओ कहलन्हि जे जाऊ अहाँक नरेण भैयाक डर हमरा नहि अछि । आब आगू
सुनू । हमर मित्र अनायासहि जोरसँ कानए लगलाह, दहो-बहो नोर खसए लगलन्हि । भोकारि पाड़ैत नरेण लग पहुँचलाह जे एकटा अनगौँआ मारलक अछि आ कहैत अछि जे के नरेण ओकर हमरा कोनो डर नहि अछि, आरो अण्ट-
शण्ट । आब नरेण भैया पहुँचलाह जे बता तँ ओ के छी ? जखने टॉर्च ओहि व्यक्तिपर देलन्हि, बजलाह, भजार यौ । अहाँ छी । जरूर अही छौड़ाक गल्ती छी । अनका विषयमे कहैत तँ पतिया जइतहुँ । मुदा अहाँक विषयमे । आ ईहो नहि कहलक ई छौड़ा जे अहाँ तमसेलियैक वरन् ई जे मारलन्हि अछि । आ नेप की चुआ रहल छल जेना कतेक मारि पड़ल होअए । हमरा सँ नरेण पुछलन्हि जे भाए किछु एकरा कहबो कएलन्हि तँ हम कहलियन्हि जे नहि । एहि पर हमर मित्रक नोर जतएसँ आएल छलन्हि, ततहि चलि गेलन्हि । फज्झति मूड़ी झुका कए सुनलन्हि आ नरेण भाइक गेला पर सभकेँ कहलन्हि, जे ई नरेण काकाक संगी छथिन्ह, क्यो हिनका किछु कहबहुन्ह तँ बेजाए भऽ जाइत जएतहु । आ आस्तेसँ कहलथि जे बचि गेल आइ ई ।
गामक प्राइमरी स्कूलमे सभ कलाक परीक्षा होइत छल । संगीत, चित्र, नाटक । गाममे हारमोनियम, ढ़ोलक बजेनहार खूब रहथि । पहिने दुर्गा पूजाटा मे नाटक होइत छल मुदा पछाति जा कऽ कृष्णाष्टमी, काली पूजा इत्यादिमे सेहो नाटक खेलेनाइ शुरू भऽ गेल । हरखा रामलीला पार्टी सेहो एक महिना खेला कऽ गेल छल । अहूमे दू चारि दिनपर रामलीलाक बीचमे नाटक होइत छल । खेल शुरू भेल रामलीला पार्टीक बिना बजेनहि । मुदा दू चारि दिन धरि माला क्यो ने क्यो उठबैत गेलाह । रामलीला पार्टीक सभ कलाकारक एक दिनक खेनाइक खरचाकेँ माला उठेनाइ कहल जाइत छल । दू-चारि दिन तँ माइक पर क्यो न क्यो जोशमे जा कऽ हम माला उठाएब तँ हम उठाएब कहैत गेलाह मुदा दू चारि दिनुका बाद रामलीला पार्टीक आर्द्र अनुरोधकेँ देखैत गौँआ सभ टोलक अनुसार माला उठेबाक एकटा क्रम बना देलखिन्ह । ओहि समयमे अभिनय देखनाइ एकटा चमत्कार सन बुझाइत छल आ हम अपन कैरियर बादमे अभिनेताक रूपमे बनेबाक मोने-मोन इच्छा रखैत छलहुँ । ओहि समय एक शनि स्कूलमे नाटक खेलेबाक प्लान शिक्षकगणक स्वीकृतिसँ बनल । नाटकक किताब कतएसँ अएत ताहि द्वारे हम एकटा नाटक दानवीर दधीची लिखलहुँ । स्कूलक कलाकार सभकेँ एकत्र कएलहुँ । आब कलाकार सभक नाम तँ सुनू । पोटहा, लुल्हा, नेँगड़ा, पोटसुड़का, लेलहा, ढ़हीबला, कनहा, अन्हरा, तोतराहा, बौका, बहिरा ई सभ हमर बाल कलाकार रहथि । कारण जे अपनाकेँ शुभ्र-शाभ्र बुझथि से किएक नाटक खेलेताह । दहीकेँ तोतराकेँ कहियो क्यो ढ़ही बाजल तँ ओकर नाम ढ़हीबला भऽ गेलैक। सर्दीमे कहियो पोटा चुबैत रहि गेलैक तँ पोटहा भऽ गेल आ दोसर एहन भेल तँ दुनूमे अन्तर कोना करी । से ओ जे पोटा खसैत काल सुरकितो अछि से तकर नाम भऽ गेल पोटसुरका । आगाँ आऊ । ककरो अन्हरिया रातिमे ठेस लागि गेलैक तँ कोन अतत्तः भेलैक ? हँ ओकर नाम अन्हरा भऽ गेलैक । बच्चामे देरीसँ बजनाइ शुरू कएने छलहुँ तँ अहाँ भऽ गेलहुँ बौका । सोझगर छी तँ लेलहा । गपकेँ अनठबैत छी तँ भेलहुँ बहिरा । नव घड़ी पहिरलाक बाद (घड़ी पाबनि दिन वनस्पतिक घड़ी) हाथ कनेक सोझ राखि लेलहुँ तँ भेलहुँ लुल्हा । तोतराइत तँ सभ अछि मुदा कबियाठी टोलक छी तँ लोक नाम राखि देलक तोतराहा । कनेक डेढ़ भऽ ताकि देलहुँ आकि पिपनीकेँ उनटा कऽ ककरो डरेलहुँ तँ भेलहुँ कनहा । ठेस लगलाक बाद कनेक झखा कऽ चललहुँ तँ भेलहुँ नेंगड़ा । आ ज्योँ कनेक पाइ बलाक बेटा छी आकि माए कनेक दबंग छथि तँ कनाह रहलो उत्तर क्यो कनहा कहि कऽ देखओ !
अस्तु एहि बाल कलाकार सभक संग शनि दिन होएत हमर नाटक दानवीर दधीची।
आ नियत तिथिकेँ शुरू भेल दानवीर दधीची नाटक । स्कूल खुजबासँ किछु काल पहिनहि हम सभ पहुँचि गेलहुँ स्कूल । बरण्डाक एक कोनमे गाम परसँ आनल चद्दरिक पर्दा बनल । रस्सी ठीकसँ नहि लागि सकल से ईएह निर्णय भेल जे चद्दरिकेँ ऊपर उठा-खसा कए काज निकालल जएत । तकरा बाद कलाकार सभ अपन-अपन ड्रेस पहिरए लगलाह । ड्रेस की छल मात्र पाउडर लगा कए आ गमछा-धोती पहिरि कए, सभ सभ तरहक ड्रेस पहिरि लेलक । जाहि मास्टरसाहेबक ड्यूटी लागल छल नाटकक संचालनक हेतु, हुनका कोनो आवश्यक कार्य मोन पड़ि गेलन्हि से ओ ओहि दिन छुट्टी मारि देलन्हि । गामक पैघ तुरियाकेँ तावत बुझबामे आबि गेलैक जे प्राइमरी स्कूलक छौड़ा सभ नाटक कऽ रहल अछि । से तुरत्तेमे दस टा पैघ बच्चा सभ जूटि गेल आ पिहकारी देनाइ शुरू कऽ देलक । हम सभ कलाकारकेँ कहलियन्हि जे ई सभ उत्तेजित कऽ कए हमर सभक नाटककेँ दूरि करत । मुदा छोटे भाइ भीड़ि गेलाह ।कहए लगलाह जे हे बौआ सभ, हम नाटकक ड्रेसमे छी तेँ ई नहि बुझू जे मारि नहि करब। एखने ड्रेस फेकि-फाइक कऽ हम सभ कर्म कऽ दइ जाएब अहाँ सभक। मुदा पिहकी पाड़नहारक संख्यामे घटती नहि भेल । आ छोटे भाइ बाजि उठलाह जे छोड़ू आइ एहि नाटककेँ । हिनका सभक बदमस्ती हम एखने ठीक करैत छी। आ खुट्टा उखाड़ि कऽ दौगलाह । तावत थाम्ह-थोम्ह करए बलाक जुमान भऽ गेलैक आ तकरा संगहि नाटक दानवीर दधीची जे हमर लिखल छल आ जकर मंचनक निर्देशन हम करए बला छलहुँ, बीचहिमे खतम भऽ गेल । किछु दिन धरि छोटे भाइसँ मूहा-फुल्ली रहल । ओ आबथि आ कहथि जे की करू, तामस उठि गेल छल । ओहो सभ अतत्तह कऽ देने छल । फेर किछु दिनुका बाद सभटा सामान्य भऽ गेल । रामलीलाक आ नाटकक भूत सेहो एहि घटनाक बाद हमरा परसँ उतरि गेल ।
गणित आ विज्ञानक अतिरिक्त्त कोनो आन विषयकेँ नहि तँ हम एक बेरसँ दोसर बेर पढ़ैत छलहुँ आ नहिये एहि हेतु मास्टर साहेबे कहैत छलाह । कोनो विद्यार्थीकेँ मास्टर साहेब इतिहास आ नागरिक शास्त्रक किताबकेँ एकसँ दोसर-तेसर बेर पढ़ैत देखि जाइत छलाह तखन तँ ओहि विद्यार्थीक नामे ओहि विषयसँ पड़ि जाइत छल । आब ओ गणितो पढ़त तँ ओकरा सुनए पड़तैक जे बाबू ई इतिहास नहि छियैक जे कंठस्थ कए रहल छी । सैया-निनानबे अनठानबे- सन्तानबे-छियानबे-पनचानबे कहैत-कहैत आ बोराक आसनीकेँ बरखाक समयमे छत्ता बनओने पाँच-चारि-तीन-दू-एक-एक-एक करैत भागैत विद्यार्थी सभ । कहियो छुट्टीक दिन ज्योँ कबड्डी खेलाइ काल मास्टर साहेब साइकिल पर चढ़ल देखा पड़थि तँ कबड्डी-कबड्डी, मास्टर साहेब प्रणाम, कबड्डी-कबड्डी कहैत भागैत रहथि विद्यार्थी । आ एहने एकटा घटनामे हम मास्टर साहेबकेँ ठाढ़ भऽ कए साँस तोड़ि कए प्रणाम कएने रहियन्हि आ एहि क्रममे विपक्षी पार्टी द्वारा लोकि लेल गेल छलहुँ तँ एहि पर कोइलख बला मास्टर साहेब प्रसन्न भेल रहथि आ तकर चर्चा स्कूलमे सभक समक्ष कएने रहथि । बुझु जे गामक प्रवास, बादक समयमे एकटा पैघ संबल सिद्ध भेल छल । खड़ाम पहिरि कए गतिसँ दौगैत रही फेर बर्षामे आरि पर पिच्छड़ पर खड़ाम पहिरि कए दौगैत रही । पिच्छड़ पर खड़ाम नहि पिछड़ैत छल । बादमे हवाइ चप्पलक आगमन भेलाक बाद कतेक गोटे खसि-खसि कए डाँरपर गरम पानिक भाप लैत छलाह । अगिलही, किरासन तेलक लाइन, रोशनाइक गोटी, लबनचूस, रबड़क बॉल, ओधिक गेंद, पसीधक रसक विषसँ पोखरिमे माछ मरलाक बाद भेल दू टोलक बीचमे बाझल मारि, बाढ़िक दृश्य देखबाक लेल जुटल भीड़, छोट-छोट गप पर होइत पंचैती, आमक मासमे आमक जाबीसँ बहराइत गछपक्कू आमक छटा, ई सभ टा अलोपित तँ नहि भऽ जएत ।
“काका यौ, हम नहि लगेलिअन्हि कबकबाउछ”। ई गप कहैत हमर आँखिमे नोर आबि गेल छल । बनाइकेँ किछु गोटे छौड़ा सभ दलान पर सुतलमे कबकबाउछ लगा देने छलन्हि । कलम दिशिसँ खेला-कुदा कए सभ आबि रहल छल । महारक कातमे कबकबाउछक पात तोड़लक आ एकर पातकेँ चमड़ा पर रगड़लासँ होअएबला परिणामपर चर्चा होमए लागल । क्यो अपन चमड़ा पर लगेबाक हेतु तैयार नहि छल से दलान पर बनाइकेँ सुतल देखि हुनके देह पर पात रगड़ि देलकन्हि । पाछाँसँ हम अबैत छलहुँ आ सभ छौड़ा तँ निपत्ता भए गेल, बनाइक नजरि हमरा पर पड़लन्हि । से ओ काकाकेँ कहि देलखिन्ह । काका हमर कोनो गप नहि सुनलन्हि आ दस बेर कान पकड़ि कए उट्ठा-बैसी करबाक सजा भेटल । संगहि साँझमे संगी सभक संग खेलेबाक बदला काका आ हुनक भजार सभक संग खेत पथारक दिशि घूमबाक निर्णय भेल जाहिसँ हमर बदमस्ती कम होअए । बाढ़िक समय छल, नाओपर बाढिक दृश्य आ सिल्लीक शिकार । बादमे तँ एकर शिकारपर सरकार प्रतिबंध लगा देलक । मुदा मोन हमर टाँगल रहल गाम परक कल्पित खेल सभक दिस, जे हमर सभक संगी सभ खेलाइत होएताह । ई छल पहिल दिन । दोसर दिन बेरू पहर धरि हम एहि प्रत्याशामे छलहुँ, जे आइ फेरसँ काकाक संग जाए पड़त । ओना संगी सभकेँ हम ई भास नहि होमए देलियैक जे हम एको रत्ती चिन्तित छी आ ओ सभ नाओ आ सिल्लीक खिस्सा तन्मयतासँ सुनैत रहलाह । मुदा हमर मुखाकृति देखि कए काका पुछलन्हि, जे आइ हमरा सभक संग जएबाक मोन नहि अछि ? तँ हम नञि नहि कहि सकलियन्हि । मुदा फेर अपनाकेँ सम्हारैत कहलियन्हि जे मोन तँ गामे पर लगैत अछि । तखन काकाकेँ दया लागि गेलन्हि आ एहि प्रतिबन्धक संग जे हम आब गामपर बदमस्ती नहि करब हमरा गाम पर रहबाक छूटि भेटि गेल ।
गाममे डेढ़ साल धरि रहलहुँ आ जखन बाबूजीक ट्रांसफर पटना भऽ गेलन्हि, तखन बड़का भैयाक संगे पहलेजाघाट आ महेन्द्रूघाट दऽ कए पटना आबि गेलहुँ। ओतए स्कूल सभमे प्रवेश परीक्षा होइत छल आ बाबूजी भाएकेँ छठासँ सतमाक हेतु आ हमरा पचमासँ छठा आ सतमा दुनू वर्गक हेतु प्रवेश परीक्षामे बैसओलन्हि। आ तकर बाद हमरा ई बुझबामे आएल जे किएक हमरा बाबूजी पचमेमे छठाक विज्ञान आ गणित पढ़ि लेबाक हेतु कहने छलाह । प्रवेश परीक्षामे ईएह दुनू विषय पूछल जाइत छल । अस्तु हमर छठा आ सतमा दुनू वर्गक लेल आ भाएकेँ सतमाक लेल चयन जिला स्कूलमे भए गेल । फेर शहरक सरकारीयो स्कूलमे ड्रेस छलैक, से आश्चर्य । से दुनू गोटे बाबूजीक संग दोकान गेलहुँ आ ड्रेस सियाओल गेल, दू-दू टा हाफ पैंट आ एक-एकटा अंगा । स्कूलक पहिलुके दिन मारि होइत-होइत बचल । एकटा छौड़ा हमरा देहाती कहलक तँ से तँ हमरा कोनो खराप नहि लागल । ओहि उमरिमे देहाती शब्द हमरा नीके लगैत छल, मुदा आइ सोचैत छी तँ लगैत अछि जे ओ ई शब्द व्यंग्यात्मक रूपेँ कहने छल। फेर जखन ओ देखलक जे ई तँ नहि खौँझाएल तखन बंगाली-बंगाली कहनाइ शुरू कएलक । हम दुनू भाइ पातर दुबर आ शुभ्र-शाभ्र चिक्कन-चुनमुन लगैत छलहुँ, ताहि द्वारे ओ हमरा सभकेँ बंगाली बुझि रहल छल। हम ई व्यंग्य नहि सहि सकलहुँ आ ओकरा दिशि मारि-मारि कए छुटलहुँ । भाए बीच-बचाओ कएलक । आब ओ छौड़ा कानय-खीजय लागल आ पैघ वर्गक कोनो बदमाश विद्यार्थीकेँ बजाबए लेल गेल । फेर घुरि कए जे आयल तँ ओकर कानब-खीजब बन्न भए गेल छलैक, हमरा कहलक जे हमर भाग्य नीक अछि जे जकरा ओ बजाबए गेल छल से आइ स्कूल नहि आएल अछि । दू तीन दिन धरि हम ई गुन-धुन करैत रहलहुँ जे ओ ओहि बदमाशकेँ बजा कए नहि आनि लिअए । ओहिना किछु दिनुका बाद ओकरा फेर कोनो दोसर छौड़ासँ झगड़ा भेलैक आ ओहि दिन ओ हीरो छौड़ा स्कूल आएल छल । हमरे सोझाँमे ओ हमर कक्षामे आएल आ दोसर विद्यार्थीकेँ एक फैट पेटमे मारलकैक । क्यो बचबए लेल तँ नहि गेलैक मुदा बादमे जखन एकटा क्लासमे शिक्षक नहि अएलाह आ विद्यार्थी सभ खाली गप-शप कए रहल छल तखन एहि बातक निर्णय भेल जे आब ओहि विद्यार्थीसँ क्यो गप नहि करत आ क्लास टीचरसँ एहि गपक शिकाइत कएल जएत जाहिसँ ओ ओहि बदमाश विद्यार्थीक क्लास टीचरकेँ एहि घटनाक विषयमे बताबथि । आब ओ पिनकाह विद्यार्थी शुक-पाक करए लागल । फेर ओ ओहि विद्यार्थीक लग गेल, ओकरा कान भरि आएल जे सभ ओकरा विरुद्धमे चालि चलि रहल अछि । ओ बदमाश आबि कए सभकेँ उठबाक लेल कहलक मुदा क्यो नहि उठल । तकन ओ हमरा कहलक जे उठू । हम उठि गेलहुँ आ तखन ओहिना एक-एक कऽ कए तीन चारि गोटेकेँ उठेलक आ फेर सभकेँ उठबाक लेल कहलक । सभ उठि गेल । तखन सभकेँ धमकी देमए लागल । मुदा एहि बेर हमर सभक क्लास मोनीटर किछु हिम्मतसँ काज लेलक आ ओकरा ओहि छौड़ाक विषयमे कहए लागल । हमरा देखा कए कहलक जे एकरा देखैत छी? कनियो बदमाश लगैत अछि, एकरो अहाँक नाम लऽ कए दबाड़ि रहल छल । ओ छौड़ा तँ हुण्ड छल से ओकर पारा चढ़ि गेलैक आ हमर वर्गक पिनकाहा छौड़ाकेँ चेतौनी देलकैक जे आइ दिनसँ कनैत-खिजैत ओकरा लग नहि आओत आ ओकर नाम लऽ कए ककरोसँ झगड़ा नहि करत । एहिना स्कूल चलि रहल छल आकि एक दिन एकटा छौड़ा वर्गमे पिहकी मारि देलकैक । ओ छौड़ा बीचहिमे बम्बई भागि गेल छल बाल कलाकार बनबाक लेल । घुरि कए आएल तँ वर्ग शिक्षक पुछलन्हि जे किएक घुरि अएलहुँ । तँ ओ हुनका कहलकन्हि जे सभ ओतए कहलक जे एतए तँ सभ बी.ए., एम.ए. अछि, अहाँ कमसँ कम मैट्रिको कए लिअह । आब पिहकीक बाद वर्ग शिक्षक पढ़ाइ छोड़ि कए ओकर अन्वेषणमे लागि गेल । पिहकी कोन दिशिसँ आएल । बहुमतक आधार पर एक कातकेँ छाँटि देल गेल । आब आगूसँ आएल आकि पाछूसँ । ताहि आधार पर सेहो एकटा बेंच निर्धारण भए गेल । ओहि बेंच पर छह गोटे छलाह । आब ई निर्धारण होमए लागल जे बाम कातसँ आयल आकि दहिनसँ । फेर छहमे सँ दू गोटेक निर्धारण बहुमतक आधार पर कएल गेल । ओहिमेसँ एकटा हमरा लोकनिक बम्बइया हीरो छलाह, जनिकर बम्बइक खिस्सा टिफिनसँ लऽ कए लेजर क्लास धरि चलैत रहैत छल । मुदा एहि दुनू गोटेमे १:१ केर टाइ भए गेल कारण क्यो मानए हेतु तैयार नहि जे पिहकी के मारलक” ।
एकर बाद डायरी खाली छल । नन्द बेटाकेँ बजा कए डायरी दए देलन्हि आ मात्र ई कहलन्हि जे पढ़ाई पर ध्यान दिअ । एहि बात पर लज्जित होएबाक कोनो बात नहि छल मुदा आरुणिकेँ हुनकर भाए बहिन एहि गपक लेल बहुत दिन धरि किचकिचाबैत रहलखिन्ह । अस्तु एक दिन ओ डायरीकेँ फाड़ि देलन्हि आ ई आत्मकथात्मक उपन्यास पूर्ण होएबासँ पहिनहि खतम भए गेल ।
नन्दक अव्यव्स्थाक विरुद्ध शुरू कएल गेल संघर्ष किछु दिनका विराम लेने छल । गाममे बच्चा सभ डेढ़ साल रहल छलन्हि, दरमाहा बहुत दिन धरि बन्द छलन्हि । गाममे पैघ भाए एकटा भावी राजनीतिज्ञकेँ कहि कए नन्दक पदस्थापन क्षेत्रीय काजसँ हटा कए ऑफिसमे चित्र परियोजना आकि डिजाइनमे करबाए देने छलखिन्ह । संगे ईहो कहने छलखिन्ह जे अपन ऑफिस जाऊ आऊ आ बच्चा सभ पर ध्यान दिअ । सभसँ मिलि जुलि कए रहू । नन्द पटना आबि कए भाएक सभ गप पर ध्यान देने छलाह । पटनामे बेटीक कॉलेजमे नामांकन करबाए महाविद्यालयक पार्श्वमे किरायापर घर ताकलन्हि । दुनू बेटाक नामांकनक हेतु प्रवेश परीक्षा केर फॉर्म सभ भरबाए सभकेँ पटना बजा लेलन्हि । भातिजकेँ कहलखिन्ह जे सभकेँ लए कए आबि जाऊ आ पहलेजाघाटमे बच्चा बाबू बला नहि वरन बिहार सरकारक स्टीमर पकड़बाक आदेश देलखिन्ह । कारण एकटा निजी स्टीमर बच्चा बाबूक सेहो चलैत छल मुदा ओ बेशी पसेन्जर लए कऽ चलैत छल, संगहि सरकारी स्टीमर अपन समयसँ चलैत छल, ओहिमे पैसेंजर रहए वा नहि । सरकारी स्टीमरमे यात्रीक संख्या सीमित छल ताहि हेतु टिकट केर नियमित हिसाब छल आ सभ यात्रीक बीमा होइत छल, ई बात निजी स्टीमरमे नहि छल। भातिजक संग पत्नी आ पुत्र-पुत्री सभ आबि गेलखिन्ह । गंगा ब्रिज कॉलोनीमे नन्द एकाकी रहैत छलाह । परिवारक लोककेँ सेहो आसपड़ोससँ बेशी मेल-जोल करबाक अनुमति नहि देने छलाह । मुदा पटनामे सभटा उनटि गेल छल । पड़ोसमे एकटा रिटायर्ड फौजी छलाह, एकटा बिहार सरकारक पुलिस छलाह आ एकटा बिहार सचिवालयक कर्मचारी । नन्द दुनू बेटाकेँ लए अगिला दिन तीनू गोटेक घर गेलाह आ सभसँ नमस्कार-पाती करबओलखिन्ह । बेटा-बेटी सभ स्कूल जाए लागल छलन्हि । नन्द पाँच किलोमीटर ऑफिस पएरे जाथि आ घुरती काल घरक काज-उद्यम सेहो करैत आबथि । जेना बृहस्पतिकेँ हाट लगैत छल तँ ओतएसँ हरियर तरकारी, चाउर दालि इत्यादि आनब, ई सभ । हाट रविक छुट्टीक दिन सेहो लगैत छल आ ओहू दिन अपने जा कए सभटा घरक काज करैत छलाह । बच्चा सभक काज मात्र पढ़बा धरि सीमित छल । दूध पैकेट बला अबैत छलन्हि कारण उठाना दुहबा कए अनबामे बच्चा सभक पढ़ाइमे भाँगठ पड़ैत । बड़का बेटा जे गंगा ब्रिज कॉलोनीमे कहियो ककरो फूल उखाड़ि लैत छल आ कहियो ककरो खिड़की पर गिट्टी फेंकि दैत छल, डेढ़ सालक ग्राम प्रवासक बाद शान्त भए गेल छलन्हि । नन्दकेँ मोन छन्हि जे कॉलोनीमे एक बेर बेटाकेँ लए पड़ोसीक ओहिठाम गेल छलाह आ पड़ोसीक पत्नीसँ बेटा क्षमा याचना कएने छलखिन्ह । कारण कार्यालयसँ अएला उत्तर ज्ञात भेल छलन्हि जे बेटा हुनका पर गिट्टी फेँकने छलखिन्ह, जखन ओ बेचारी खिड़की लग ठाढ़ि बाहर दिशि किछु देखि रहल छलीह । आ छोट बेटा एक बेर कोनो पैघ बच्चाकेँ पाथर फेंकि कए मारने छलखिन्ह, जखन ओ बच्चा साइकिल पर चढ़ल छल । भेल ई छल जे ओ पैघ बच्चा कॉलोनीक एक चक्कर काटि कए साइकिल लौटेबाक अपन वचनक पालन नहि कएने छल आ घुरलाक बाद -दोसर चक्कर लगा कए अबैत छी- ई बजैत-बजैत साइकिल लए आगू बढ़ि रहल छल । छोटका बेटा क्षमा याचना करबासँ सेहो मना कए देने छलखिन्ह कारण ओ सोचैत छलाह जे हुनकर कोनो गलती नहि छलन्हि । बेश तखन एहि बेर बच्चा सभकेँ जखन नन्द पड़ोसी सभसँ भेँट करबाबए लेल गेल छलाह तावत धरि बड़का बेटा तँ पूर्णतया अपन चञ्चल स्वभावक विपरीत स्वभावक भए गेल छलाह मुदा छोट बेटा अपन स्वभावपर दुराग्रह करैत स्थिर छलाह । नन्दक दुनू बेटा वर्गमे प्रथम अबैत छलन्हि । किछु दिन धरि सभटा ठीक-ठाक चलैत रहल । पुरनका सभटा चिन्ता-फिकिर लगैत छल जेना खतम भए गेल होअए । गामक एक दू गोटे सेहो पटनामे रहैत छलाह । महिनामे एकटा रवि निश्चित छल, जाहि दिन सभ गोटे कतहु घुमए लेल जाइत छलाह । एक रवि कोनो गौँआक अहिठाम तँ कोनो आन बेर चिड़ियाखानाक यात्रा । एक बेर चिड़ियाखाना गेल रहथि सभ गोटे तँ आरुणि नन्दकेँ पुछलखिन्ह-
“हमरा सभ आएल छी चिड़ियाखाना, बाहरमे बोर्ड लागल अछि बोटेनिकल गार्डेनक आ गेटक ऊपरमे लिखल अछि बायोलोजिकल गार्डेन”।
“पहिने सोनपुरमेला सभमे अस्थायी चिड़ै सभक प्रदर्शन होइत छल आ लोकक जीह पर ओकरा लेल चिड़ियाखाना शब्द आबि गेल । मुदा एतए तँ कताक बीघामे वृक्ष सभ लागल अछि, प्रत्येक वृक्ष पर ओकर नाम आ वनस्पतिशास्त्रीय विवरण सेहो लिखल अछि आ ताहि द्वारे एकर नाम अंग्रेजीमे वनस्पति उद्यानक लेल बोटेनिकल गार्डन पड़ि गेल । मुदा बादमे अनुभव कएल गेल जे जन्तु आ वनस्पतिक रूपमे दू तरहक जीवविज्ञान अछि । एहि उद्यानमे वनस्पति, चिड़ै आ बाघ-सिंह इत्यादि सेहो प्रदर्शित अछि । ताहि द्वारे एकर नाम बायोलोजिकल गार्डन वा जैविक उद्यान दए देल गेल । पुरनका बोर्ड जतए-ततए रहिये गेल”।
एक बेर सभ गोटे गेल रहथि एकटा गौँआक अहिठाम । ओतए चर्चा चलए लागल जे गंगा पुल केर उद्घाटन दू तीन सालसँ एहि साल होएत- अगिला साल होएत एहि तरहक चरचा अछि । नन्दसँ ओ लोकनि पुछलखिन्ह-
“अहाँक बुझने कहिया धरि एहि पुलक उद्घाटन भए जएतैक । मुख्यमन्त्री तँ कहने छथि जे एहि साल एकर उद्घाटन भए जएतैक”।
“कहियो नहि होएतैक । दू-तीन सालसँ तँ सुनि रहल छियैक। यावत एकटा पाया बनैत छैक तँ ओहिमे ततेक ने बालु देने रहैत छैक जे किछु दिनमे दरारि पड़ि जाइत छैक । फेर राता-राती ओकरा तोड़ि कए फेरसँ नव पाया बनेनाइ शुरू करैत जाइत अछि”।
गंगा पुलक चरचा सुनि नन्दक सोझाँ पाया परसँ गंगाजीमे खसैत जोन-मजदूर सभक चित्र नाचि जाइत छलन्हि । नन्दक विवाद ठिकेदार आ संगी अभियन्ता सभसँ काजक संबंधमे होइत रहैत छलन्हि । एकटा पायाक कार्यक संबंधमे नन्द अपन विरोध प्रकट कएने छलाह, किछु दिनुका बाद ओ पाया फाटि गेल, एकटा पैघ दरारि पड़ि गेल छल बीचो-बीच । राता-राती ठिकेदार-अभियन्ता लोकनि ओकरा तोड़बेलन्हि । राति भरिमे कतहुसँ ओतेक विशाल पाया कोना टूटि सकैत छल, कैक दिन लगैत? से अगिला दिन दरारिक स्थान पर तिरपाल बिछाओल गेल, जे ककरो नजरि नहि पड़ि जाइ । एहि घटनाक चरचा बहुत दिन धरि होइत रहल । नन्दक आदर अपन नीचाँक कर्मचारीक बीच एहि घटनासँ बढ़ि गेल छलन्हि मुदा आब ठिकेदार आ अभियन्ता लोकनिक बीच नन्द रावण बनि गेल छलाह । सभ टा काज ठीक-ठाक चलि रहल छल । नन्दक बच्चा सभ गणित आ विज्ञानक अंकगणितीय प्रश्न सभ जनबरीसँ मार्च धरि बना लैत छलन्हि । मुदा घरक सभ काज किएक तँ नन्द स्वयं कए लैत छलाह, नन्दक बच्चा सभ स्कूल गेनाइ आ घर अएनाइक अतिरिक्त्त बाहरी दुनियासँ अनभिज्ञ छलाह । कतओ घुमए जाथि तँ नन्दक संगे, एक तरहेँ बुझू जे नन्दक बच्चा सभक व्यक्त्तित्व एकटा अलगे रीतिसँ निर्मित भए रहल छलन्हि । नन्द सामान्य जीवन व्यतीत कए रहल छलाह मुदा गंगा पुलक कोनो चरचा हुनकर अन्तरमनमे हुलिमालि शुरू कए दैत छलन्हि । आ ताहि द्वारे शनैः-शनैः गौँआ-घरुआक आ दोस्त-महीम लग जएबाक क्रम कम होमए लागल । फेर नञि तँ कोनो दोस्त-महीम, नञि तँ कोनो दोस्तक घर अएनाइ-गेनाइ ।
ओहि समयमे मीडिअम वेभक एकटा जापानी ट्रांजिस्टर नन्दक घरमे छलन्हि, वैह मनोरंजनक एकमात्र साधन छल । हुनकर बच्चा सभ एकरा रेडियो कहैत जाइ छलाह, आ नन्द बुझबैत छलखिन्ह जे रेडियो बड्ड पैघ होइत अछि, ट्रांजिस्टर आकारमे छोट होइत अछि । नन्द जखन नोकरी शुरू कएने रहथि तँ बुश कम्पनीक एकटा रेडियो गाम लए गेल छलाह । सौँसे टोलबैय्याक भीड़ जुमि गेल छल रेडियो सुनबाक लेल । मुदा ई जापानी मीडिअम वेभ रेडियो मझोला आकारक बैटरीसँ चलैत छल आ खूब बैटरी खाइत छल, माने ई ट्रांजिस्टर । बैटरी प्रायशः महिनाक दस तिथि धरि चलैत छल । बैटरी एक महिनामे एक बेर अबैत छल, महिनबारी किरानाक वस्तुजातक संग । से नन्दक बच्चा लोकनिक मनोरंजनक ओ साधन महिनामे बीस दिन काज नहि करैत छल । आ ताहि द्वारे बच्चा सभ पलंगक दुनू कात दू टा गोल पोस्ट बनबैत छलाह। ई गोल पोस्ट प्लास्टिकक एक-दोसरामे जुड़य बला खेल सामग्रीसँ बनैत छल, ई खेल सामग्री पता नहि कतेक दिनसँ घरमे पड़ल छल, प्रायः गंगा ब्रिज कॉलोनीमे कोनो संगी देने छलखिन्ह । नन्दक दुनू बेटा दुनू दिशि ककबाक स्टिकसँ खेलाइत छलाह। ए बी सी डी क कचकाराक खेल-सामग्री बॉल बनैत छल । खेलक निअम सेहो भिन्न छल। मात्र एक शॉटमे एक गोल पोस्टसँ दोसर गोल पोस्टमे गोल करए पड़ैत छल । एहि तरहक कैकटा नूतन क्रीड़ाक जनक छलाह नन्दक दुनू पुत्र। एहि तरहेँ समय बितैत गेल । बाहर एनाइ-गेनाइ किछु कम भैये गेल छल । तकर बाद दूटा घटना भेल । एक तँ छल गङ्गा पुलक उद्घाटन । आ दोसर छमाही परीक्षामे नन्दक दुनू बेटा पहिल बेर प्रथम स्थान प्राप्त नञि कए सकल छलाह । एकर बाद नन्द असहज होमए लगलाह । ओना एहि दुनू घटनामे कोनो आपसी सम्बन्ध नहि छल मुदा नन्दक अन्तर्मनक जे हुलिमालि छलन्हि से बढ़ए लगलन्हि । आब ओ किएक तँ सरकारी तन्त्रसँ न्याय नञि पाबि सकल छलाह आ पुत्र लोकनि सेहो पढ़ाइमे पिछड़ि गेल छलन्हि, से अदृश्य शक्तिक प्रति हुनक आसक्ति फेरसँ बढ़ए लगलन्हि । सभ परिणामक कारण होइत छैक आ कारणक निदान जखन दृश्य तन्त्र द्वारा नञि होइत अछि, तखन अदृश्यक प्रति लोकक आकर्षण बढ़ि जाइत अछि । आ नन्द तँ अदृश्यक प्रति पहिनहिसँ, बाल्यकालेसँ आकर्षित छलाह ।
“नन्द छथि”?
एक गोट अधवयसू, मुँहक दाँत पान निरन्तर खएलासँ कारी रंगक भेल, पातर दुबर पिण्डश्याम रंगक, नन्दक घरक ग्रील खटखटा कए पुछलन्हि ।
“नहि । ऑफिससँ नहि आएल छथि मुदा आबैये बला छथि । भीतर आउ, बैसू”- नन्दक बालक कहलखिन्ह ।
“हम आबि रहल छी कनेक कालक बाद”।
किछु कालक बाद नन्द सुरसुरायल अपन धुनमे, जेना ओ अबैत छलाह, बिना वाम-दहिन देखने, घर पहुँचलाह । पाछाँ लागल ओहो महाशय घर पहुँचलाह। नन्द हुनका देखि बाजि उठलाह-
“शोभा बाबू। कतेक दिनुका बाद”।
“चिन्हि गेलहुँ”- शोभा बाबू बजलाह ।
आ एकर उत्तरमे नन्द बैसि गेलाह आ हुनकर आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि ।
“एह बताह, अखनो धरि बतहपनी गेल नञि अछि”। शोभाबाबूक अन्तर्मन एहि तरहक आदर पाबि गदगद भए रहल छल।
शोभाबाबू छलाह कछबी गामक । नन्दक सभसँ पैघ बहिनक दिअर । बहिन बेचारी तँ मरिए गेल छलीह, भगिनी मामागाममे - नन्दक गाम मेहथमे- पेट दुखएलासँ अकस्माते काल-कवलित भए गेल छलीह । नन्दक बहिनौउ बढ़िया चास-बास बला घोड़ापर चढ़ि लगान वसूली लए निकलैत छलाह । मुदा भगिनीक मुइलाक बाद बहिनौउसँ सम्बन्ध कम होइत गेल छलन्हि । कोनो जानि बुझि कए नहि वरन् अनायासहि । आ आइ पचीस सालक बाद शोभाबाबूसँ पटनामे भेँट भेल छलन्हि ।
“ओझाजी कोना छथि। हमरासभ बहुत कहलिअन्हि जे दोसर विवाह कए लिअ मुदा नहि मानलन्हि”।
“आब ओ पुरान चास-बास खतम भए गेल । जमीन्दारी खतम आ चास-बास सेहो । मुदा खरचा वैह पुरनके । से खेत बेचि-बेचि कतेक दिन काज चलितए। सभ बाहर दिस भागए लागल । मुदा हम कहलिअन्हि जे अहाँ हमरा सभसँ बहुत पैघ छी, बहुत सुख देखने छी, से अहाँ बाहर जाए कोनो छोट काज करब से हमरा सभकेँ नीक नहि लागत”।
शोभा बाबू कंठमे पानक पात आबि जएबाक बहन्ना कए चुप भए गेलाह, मुदा सत्य ई छल जे हुनकर आँखि आ कंठ दुनू भावातिरेकमे अवरुद्ध भए गेल छलन्हि। किछु काल चुप रहि फेर आगाँ बाजए लगलाह-
“से कहि बिना हुनकर औपचारिक अनुमति लेने घरसँ चूड़ा-गूड़ लए निकलि गेलहुँ । रने-बने सिमरिया स्नान कए नाओसँ गंगापार कएलहुँ आ सोहमे पटना पहुँचि गेलहुँ । पहिने एकटा चाहक दोकानपर किछु दिन काज कएलहुँ । ओहि दिनमे पटनामे अपन सभ दिसका लोक ओतेक मात्रामे नहि रहथि । अवस्थो कम छल । फेर कैक साल ओतए रहलहुँ, बादमे पता चलल जे एहि बीच गाममे तरह-तरहक गप उड़ल । जे मरा गेल आकि साधु बनि गेल शोभा । फेर जखन अपन चाहक दोकान खोललहुँ तखन जा कए गाम एकटा पोस्टकार्ड पठेलियैक । आब तँ बीस सालसँ बी.एन.कॉलेजिएट स्कूल लग चाहक दोकान चला रहल छी । ओतहि पानक स्टॉल सेहो लगा देने छियैक”।
“सभटा दाँत टूटि गेल शोभा बाबू”।
“चाहक दोकानमे रहैत-रहैत चाह पीबाक हिस्सक भए गेल । मुदा ताहिसँ कोनो दिक्कत नहि भेल । मुदा जखन पानक दोकान आबि गेल तखन गरम चाह पिबियैक आ ताहिपरसँ ठंढ़ा पान दाँत तरमे धए दियैक से ताहिसँ गरम-सर्द भेलासँ सभटा दाँत टूटि गेल”।
एहि गपपर नन्द आ शोभा बाबू दुनू गोटे हँसि पड़लाह ।
फेर गप-शप चलए लागल । शोभाक भौजी तँ मरि गेल छलीह मुदा ज्योँ भतीजी जिबैत रहितथि तँ मेंहथ कछबीक बीच संबंध जीवित रहैत, मुदा बिपति जे आएल तँ सभटा एके बेर । नन्दकेँ मोन पड़लन्हि जे भगिनी खेलाइत छलीह पड़ोसमे आ आबि कए नन्दक माएकेँ कहलन्हि, जे फलना-अँगनाक फलना गोटे पेटपर हाथ राखि देलकन्हि आ तखने तेहन पेट-दर्द शुरू भेलन्हि जे कतबो ससारल गेलन्हि तैओ नहि ठीक भेलन्हि आ नन्दक आँखिक सोझाँमे बचियाक रहस्यमय मृत्यु भए गेलैक ।
शोभाबाबू कहलन्हि- “ओ बचियो टा जे जीबति रहितए तँ सम्बन्ध जुड़ल रहितए”।
मुदा नन्द जेना कतहु दोसर ठाम चलि गेल छलाह । अपन ओहि विषयपर जे हुनका प्रितगर छलन्हि, बच्चेसँ । ई जे पारिवारिक जंजाल, हाटसँ तरकारी आनब, बच्चाक परीक्षाक परिणामक चिन्ता करब, ई सभ अपन अग्रजक कहलासँ कुमोनसँ कए रहल रहथि ।
गंगा ब्रिजक उद्घाटन भए गेल आ दुनू पुत्र वर्गमे प्रथम नहि केलकन्हि । फेर पुत्री सेहो विज्ञान लेने छलीह, अन्तर स्नातकमे, ताहूमे जीवविज्ञान । मुदा शनैः-शनैः छमाही आएल, वार्षिक परीक्षा आएल मुदा सभकेँ अंक तँ नीक आबन्हि, मुदा प्रथम स्थान नहि प्राप्त होइत छलन्हि । गंगा-ब्रिज आ परीक्षाक अंकमे तँ कोनो परस्पर संबंध नहि छल । मुदा नन्दक विश्वास माता-पिताक कर्मसँ पुत्र-पुत्रीक आगाँ बढ़बापर छल । गंगा-पुल निर्माणमे जे भ्रष्टाचार छल ओकर विरुद्ध अभियानमे हुनकर विफलता आ अग्रजक कहलापर पारिवारिक उत्तरादायित्व पूरा करबाक प्रयास एकर कारण छल । एहि बीच एक बेर बच्चा सभक काका आ नन्दक अग्रज पटना डेरापर अएलाह। नन्द गोर लागि कए कहलन्हि-
“गंगा पुल देने आएल छी आकि स्टीमरसँ”।
“आएल तँ छी स्टीमरसँ, बुझले नहि छलए जे गंगा पुलक उद्घाटन भए गेल छैक । से घुरब तँ पुलक रस्ते जाएब । सुनैत छियैक जे नबका-नबका डीलक्स कोच सभ ढेरक-ढेर खुजल छैक”।
“नहि कोनो जरूरी नहि अछि पुलसँ जएबाक । बड्ड गड़बरी भेल छैक एकर निर्माणमे । कहियो धसि जएतैक”।
अग्रजकेँ किछु बुझि नहि पड़लन्हि जे की भेल अछि नन्दकेँ ।
“मोन ठीक रहैत छह ने । दमा बेशी तंग तँ नहि कए रहल छह”- दुनू भाँए दमाक रोगी छलाह।
“नञि से सभ ठीक अछि । मुदा अहाँक कहलासँ सभटा पुरान गप बिसरबाक चेष्टा कएलहुँ । ओहि पुल निर्माणमे जे सभ भेल, मजदूर सभक पायापर सँ घुरछाही खा कए खसब देखैत रहलहुँ, सैकड़ामे मजदूरसभ मरि गेल। आ भ्रष्टाचारसँ अपन घर भरलन्हि अभियन्ता लोकनि । आब जखन पुलक उद्घाटन भेल तखन मात्र ३० टा मजदूरक नाम शिलापर लिखि कए टाँगि देलन्हि आ सभ अभियन्ताकेँ पुरस्कारक घोषणा भए गेल । कहिया ई पुल टूटि कए खसि पड़त तकर कोनो ठेकान नहि । हम संघर्ष शुरू कएलहुँ तँ दरमाहा बन्द करा दइ गेल । सभ स्थानांतरणक बाद दरमाहा बन्द भए जाइत अछि आ परिवारकेँ गाममे छोड़ए पड़ैत अछि । अहाँक कहलासँ संघर्षकेँ छोड़ि एहि स्थानांतरणमे अएलहुँ । बिसरए चाहलहुँ सभटा । खसैत लहास, कनैत हुनकर सभक परिवार । सपनामे अबैत रहल ई सभ सहस्रबाढ़निक रूप बनि कए । हमरे सन कोनो शापित आत्मा अछि ओ सहस्रबाढ़नि जे अपन संघर्ष अधखिज्जू छोड़ि मरि गेल होएत आ आब ब्रह्माण्डमे घुरिआ रहल अछि । आब देखू तीनू बच्चाक परीक्षा परिणाम, सभदिन प्रथम करैत अबैत रहथि, आब की भए गेलन्हि। हम जे संघर्ष बीचेमे छोड़लहुँ तकर छी ई परिणाम”। नन्द हबोढ़कार भए कानए लगलाह ।
“धुर बताह । जे भ्रष्टाचार कएलन्हि से ने जानताह । जे मजदूर लोकनिक अधिकार मारलन्हि तिनका ने फल भेटतन्हि । अहाँ तँ अपना भरिसक संघर्ष करबे कएलहुँ । आ अपन पारिवारिक जीवन के नञि चलबैत अछि । दोसराक गलतीक द्वारे अपन बच्चासभकेँ बिलटऽ देबैक । एहिमे एकर सभक कोन कसूर छैक?”
फेर दुनू भाएँक गाम-घरक गप-शप शुरू भेलन्हि । नन्द बजैत-बजैत कतहु बीचमे गुम भए जाइत छलाह । अग्रजकेँ बुझल छलन्हि जे ई बिहारि आब नहि थम्हत । बोल-भरोस दैत रहलाह मुदा बच्चेसँ देखने छथि नन्दक जिदपना, नहि जानि आब की करत । भाबहुसँ सोझाँ-सोँझी गप नहि होइत छलन्हि । मुदा अपरोक्ष सम्बोधन कए कहलन्हि-
“कनियाँ आब अहींपर अछि । बच्चा सभपर ध्यान राखब”।
नन्द अग्रजकेँ संग लऽ जा कए महेन्द्रूघाटमे स्टीमरपर छोड़ि अएलाह, कारण हुनका डर छलन्हि जे कतहु ई बीचेमे बससँ पुलक रस्ते नहि बिदा भए जाथि आ पुल तँ आइ नहि तँ काल्हि धसबे करत ।
तकर बाद ज्योतिष कुण्डली इत्यादिक खोज-बीन प्रारम्भ केलन्हि नन्द । भिन्न-भिन्न तरहक पाथर सभ, रत्न सभ बच्चा सभक हाथमे देलन्हि आ अपन आँगुरमे पहिरए लगलाह । एक बेर हनुमान चलीसा कीनि कए अनलन्हि तँ जतेक गोटे घरमे छल सभक लेल एक-एकटा आनि लेलन्हि । पाँच-दस टा फाजिले घरमे रहैत छल, लोक सभक लेल । जे बाहरसँ आबथि हुनका एक-एक टा हनुमान चलीसा पकड़ा देल जाइत छलन्हि । एहि धोखा-धोखीमे एक दिन नन्दकेँ एकटा ठक तान्त्रिकसँ भेँट भए गेलन्हि । नन्दक मनोविज्ञानकेँ ओ तेनाकेँ पकड़लक जे नन्द हुनका भगवानक दूत बुझए लगलाह । ओ तांत्रिक अपना लग सभ वस्तुक समाधान रखने छल, भ्रष्टाचारीकेँ दण्ड दिआ सकबाक, बच्चा सभक रिजल्ट नीक करेबाक, सभकेँ स्वस्थ रखबाक आ आर आर तरहक समस्या सभक । ई सभटा समस्याक समाधानक आधार छल तंत्र विज्ञान, जकर विश्वसनीयतापर कोनो प्रकारक अविश्वास नन्दकेँ कहियो नहि छलन्हि । ओ तान्त्रिक नन्दसँ गुप्त पूजा-पाठ लेल पाइ-कौड़ीक माँग करए लागल । ओ तान्त्रिक कहियो कहन्हि जे माता सपना देलन्हि अछि जे आब दुष्टक नाश होएत। आबए दिऔक आसिन, शारदीय नवरात्रमे सम्पूर्ण सिद्धि भए जएत । फेर मारि रास पूजा पाठक विधि, शवासन-योग आदि बता देलकन्हि नन्दकेँ आ नन्द ओहि सभ विधिक अनुसरण ओहिना करए लगलाह जेना एकटा विद्यार्थी अपन गुरुक पाठक अभ्यास निअमक अनुरूप करैत अछि । आसिन भरि सभ काज छोड़ि नन्द एहि सभमे लागल रहलाह मुदा आसिन आएल आ चलिओ गेल मुदा नञि किछु हेबाक छल आ ने किछु भेल । आसिनमे कहल गेल जे आब भ्रष्ट अभियन्ता सभकेँ सजा भेटबे करतैक, आबए दिऔक बरखा । एहिना साल बीति गेल मुदा सजा दिअएबाक जे समय सीमा छल से आगाँ बढ़ैत रहल । पंडितजीकेँ किछु आर्थिक समस्या सेहो अएलन्हि आ नन्दकेँ तकर भार वहन करए पड़लन्हि । घर-द्वारपर पंडितजीक बच्चा सभ सेहो तांत्रिक विद्या शुरू कए देलक। पलंगक नीचाँ भगवती- ई शब्द पंडितजी वा तांत्रिकजीक बच्चा बाजथि आ नन्द पलंगक नीचाँ भगवतीकेँ ताकए लागथि । फेर पंडितजी विवाह-दानक प्रस्ताव अपन पुत्र-पुत्रीक राखए लगलाह, नन्दक इंजीनियर भातिजसँ अपन पुत्रीक आ अपन पुत्रसँ नन्दक पुत्रीक । आब नन्दक मोन उचटि गेलन्हि, यावत अपना धरि गप सीमित छलन्हि तावत धरि स्वीकार छलन्हि मुदा बाल-बच्चाक अहित हुनका कहियो स्वीकार नहि भेलन्हि । एम्हर गामक एक-दू गोट नन्दक भातिज आ नन्दक भैया सेहो तांत्रिककेँ घरपर जाए रबाड़ि देलखिन्ह, से ओहो अन्तमे स्वीकार कए लेलक जे ओकरा कोनो तंत्र-मंत्र नहि अबैत छैक आ नहिये ओ एहि विधिसँ ककरो सजा दिआ सकैत अछि । नन्दसँ लेल पाइ ओ घुरा देत ओ ई गप सेहो कहलक, मुदा कहियो पाइ घुरा नहि सकल । नन्दक लेल ई एकटा पैघ आघात छलन्हि। भक्षी गामक ओहि तांत्रिकक घरक बगलसँ जाथि मुदा नहि तँ वैह टोकैत छलन्हि आ नहिये नन्द ओकरा टोकैत छलखिन्ह । एम्हर नन्दक पुत्रीक विवाह भए गेलन्हि आ नन्द जेना सभ दिससँ आसरा छोड़ि बिना लक्ष्यक जिनगीक पथपर आगाँ बढ़ए लगलाह ।
पएरे ऑफिस गेनाइ-एनाइ, साँझमे सोचैत रहनाइ । किछु ग्रंथ सभक जे पठन होइत छलन्हि सेहो बन्न भए गेल छलन्हि । बच्चा सभक संग बैसि कए जे पढ़ैत छलाह सेहो आब कहाँ भऽ पबैत छलन्हि । फगुआ आ दुर्गापूजामे गाम जेबाक जे क्रम छलन्हि सेहो आब टूटि रहल छलन्हि । पूरा परिवार आब मात्र दुर्गापूजामे गाम जाइत रहथि । मुदा नन्द फगुआमे असगरे गाम जेनाइ नञि बिसरैत छलाह । एहिना गाम जाइ आबएमे नन्द गाममे एकटा दूरक पीसाक एहिठाम जाए आबए लगलाह । पीसा कालीक भक्त रहथि । हुनकर गाम नन्दक गामक बगलमे छलन्हि । बेचारे नीक लोक । नन्द हुनका लग जाथि आ प्रवचन सुनथि । फेर हुनकासँ दीक्षा सेहो लेलन्हि । काली-सहस्रणामक पाठक अतिरिक्त आर किछु नञि, नन्द भरि दिन ओही पाठमे लागल रहथि । नन्दक मोनमे डाइन-जोगिन सभक विचार अबैत रहैत छलन्हि । आस-पड़ोसक लोककेँ शंकाक दृष्टिएँ देखैत रहैत छलाह । बच्चा-सभक संग परीक्षा दिआबय जाइत छलाह, शंकित मोने जे हुनकर कोनो शत्रु हुनकर बच्चा सभकेँ हानि नञि पहुँचाबए । मुदा पीसाजीसँ दीक्षा लेलाक बाद हुनकामे विरक्तिजनित आत्मविश्वास आएल छलन्हि । फेर सभटा काज मन्थर गतिसँ होमए लागल । बच्चा सभक पढ़ाइ-लिखाइ, ओकर सभक नोकरी-चाकरी । वैह मध्यम वर्गक जोड़ल पाइ, वैह मध्यमवर्गीय आकांक्षा । बिआह-दानक झमेला । घरक आ बाहरक छोट-मोट वाद-विवाद । बच्चा सभक विश्वसँ प्रतियोगिता करबाक साहस देखि नन्द जेना आर आश्वस्त भऽ गेल छलाह । कारण घरसँ बाहर कहियो हुनकर बच्चा सभ निकलैत नहि रहए । घर अएलाक बाद दोस-महीम सभ सेहो नहि । बाहरक दुनियाँसँ तैयो प्रतियोगिता कए रहल छल । प्रतियोगिता परीक्षाक लिखित परीक्षामे उत्तीर्ण भऽ जाइत छलाह मुदा साक्षात्कारमे भाषा आ प्रान्तक गप आबि जाइत छलन्हि । नन्द बच्चा सभक कहियो ओहि तरहक वातावरणमे पालन नञि कएने छलाह से बच्चो सभ आश्चर्यचकित भऽ जाइत छलाह जे ई कोन नव परिवेश अछि । मुदा फेर नन्दक दुनू पुत्र नोकरीमे लागि गेलाह । आरुणिसँ नन्दकेँ जतेक पैघ पदक आशा छलन्हि से तँ ओ नञि पाबि सकल रहथि मुदा भारत सरकारक बी ग्रुपक नोकरी भेटि गेल छलन्हि हुनका । जमाय सेहो अभियन्ता छलखिन्ह ओ सेहो सरकारी सेवामे लागि गेलाह । दोसर बेटा सेहो बैंकमे अधिकारी बनि गेलन्हि । सिनेमा हॉलमे १० बरखसँ सिनेमा नहि देखने रहथि नन्दक बच्चा सभ । पटनाक पूजाक मेला, पटनदेवी, गोलघर किछु नहि देखने छलाह नन्दक बच्चा सभ । एहि विषयपर पहिने तँ लोक हँसी करन्हि मुदा बादमे सभकेँ लागए जे ईएह तँ नन्दक परिवारक विशिष्टता तँ नहि बनि गेल अछि ? नन्दक घरमे टेलीविजन सेहो नहि छलन्हि ई सेहो लोक सभक लेल आश्चर्यक विषय छल । नन्द आ हुनकर सम्पूर्ण परिवार भारतीय टेलीविजनपर प्रसारित भेल रामायण धारावाहिकक एकोटा एपीसोड नहि देखने छलाह । कारण नन्दक घरमे टेलीविजन छलन्हि नहि आ क्यो गोटे दोसराक घर ओहुना नहि जाइत रहथि, टी.वी. देखए लेल जएबाक तँ प्रश्ने नहि छलए । नोकरी पकड़लाक बाद आरुणि घरमे एकटा टेलीविजन अनलन्हि । ओतए महाभारतक प्रचार देखि नन्द एक दिन पत्नीकेँ कहलखिन्ह-
“अपन टी.वी.मे महाभारत किएक नहि दैत अछि ?”
“अपना टी.वी.मे खाली डी.डी.१ अछि । ऊपरमे एक गोटे रहैत छथि से कहैत रहथि जे हुनका घरमे बेटा एकटा ३०० टाकामे मशीन अनलन्हि-ए । ओकरा टी.वी.मे लगा देलासँ डी.डी.मेट्रो अबैत छैक । ओहीमे महाभारत अबैत छैक । बेटा तीन हजारमे टी.वी.कीनि देलन्हि । आब तीन सए टाका अहाँ लगा कए ओ मशीन अगिला मासक दरमाहासँ आनि लेब”।
“जिनकर टी.वी.छन्हि सैह तकर मशीनो अनताह”।
आरुणिकेँ एहि गपक जखन पता लागलन्हि तँ हुनका हँसी लागि गेलन्हि । अगिले दिन ओहि मशीनकेँ लगबेलन्हि । अगिला रवि पिताजी जखन महाभारत देखलन्हि तँ सभ गोटे बड्ड प्रसन्न भेलाह । ओही मासमे आरुणि आर्म्स आकि हथियारक ट्रेनिंग लेल पटनासँ बाहर गेलाह । एहि एक मासक ट्रेनिंगक बीचमे दुर्गा पूजा पड़ैत रहए । पिताजी पहिल बेर दुर्गापूजामे गाम नहि गेल रहथि। आरुणि सेहो बीचमे शुक्र-शनि-रविक दुर्गापूजाक छुट्टी देखि पटना आबि गेलाह । रवि दिन रहए । महाभारत चलि रहल रहए । आरुणिक एकेटा संगी रहन्हि । ओकरा संगे आरुणि बिन खेने-पीने कोनो काजसँ बाहर गेल छलाह । संगीक संगे घरपर अएलाह। माँ दुनू गोटे लेल खेनाइ अनलखिन्ह ।
“बाबूजी खा लेलथि”।
“हँ तऽ । तीन बजैत अछि । महाभारत देखलाक बाद खा कए सूतल छथि । अहाँ सभ खाऊ, तावत हम हुनका चाह बना कऽ दैत छियन्हि, तखने निन्न टुटतन्हि”।
आरुणि दू-तीन कौर खा कऽ उठि गेलाह । हुनकर संगी कारण पुछलखिन्ह-
“की भेल”?
“पता नञि। घबराहटि भऽ रहल अछि”।
“काल्हि ट्रेनिंगपर जएबाक अछि ने । ताहि द्वारे”।
“पता नञि”।
तावत भीतरसँ अबाज आएल । सभ क्यो दौगलाह।
“की भेल माँ”।
“देखू ने । चाह आनि कऽ देलियन्हि-हँ, मुदा आँखि खोलि कऽ देखिये नञि रहल छथि । आन दिन तँ चाहक नाम सुनिते देरी उठि कए बैसि जाइत छलाह”।
नन्दक शरीर अकड़ि गेल छलन्हि । कन्ना-रोहट सुनि ऊपरमे रहनिहार एकटा डॉक्टर आला लऽ आएल छलाह आ नन्दक मृत्युक घोषणा कए देने रहथि। आरुणि अवाक गुम्म भेल ठाढ़ भऽ गेल रहथि । हुनकर संगी नञि जानि कोन बाटे अपन संगी सभकेँ बजा कऽ लऽ अनने छलाह । सभक ड्यूटी लगा देलन्हि । ककरो गेटपर तँ ककरो ड्रॉइंग रूममे । लोकक भीड़ लागए लागल छल । हुनकर संगी सभ समान बिछाओनमे समेटि बिछौना मोड़ि आरुणि लग अएलाह ।
“क्रिया-कर्मक तैयारी करए पड़त आरुणि । बाँसघाट धरि लऽ जएबाक व्यवस्था करए पड़त । हम जाइ छी गाड़ीक व्यवस्था करए”।
“बाबूजीकेँ गामसँ बड्ड लगाव रहन्हि। कहैत रहथि जे अगिला सात जन्म धरि नगर घुमि कए नहि आएब । ओना बा केर दाह संस्कार बाबूजी पटनेमे कएने रहथि । मुदा ओहि समयमे पटनाक ई गंगा-ब्रिज नहि रहए । आब तँ गाड़ीसँ हिनका लऽ गेल जा सकैत अछि, तखन दाह-संस्कार भोरमे गामेमे भऽ जएत”।
“हम व्यवस्था करैत छी”।
आरुणिक ओ संगी हनुमाने छल । कनी कालमे गाड़ी आबि गेल । रस्तामे पुलिस लाश देखि रोकत से समस्या आएल।
“अहाँ लग वर्दी बला परिचय-पत्र तँ हएत ने”।
“हँ, अछि”।
“ओना दिक्कत अएबाक तँ नहि चाही मुदा ज्योँ रस्तामे पुलिस टोकए तँ देखा देबए”।
घर खाली भऽ गेल । ताला लागि गेल । दुनू भाए आ माए मृत पिताक संग शुक्लपक्षक ओहि रातिमे पटना नगरसँ निकलि गेलाह । गंगा-ब्रिजपर गाड़ी ठाढ़ भेल । मृत व्यक्तिक एकटा सूची टाँगल छल, जोन-मजदूरक । ई सभ पुल बनेबामे खसि कऽ मरि गेल छलाह । आरुणि गाड़ीसँ उतरि सूची देखैत छथि ।
उराँव, झा आ आर मारते रास मजदूर। एकटा “झा” उपाधिक मजदूर, बेशी आदिवासी उपाधिक! बहुत रास मूइल छलाह, कताक सैकड़ामे मुदा राता-राति पुलिसक मदतिसँ अभियन्ता-ठिकेदारसभ लहास भसिया दैत छलाह। ३० गोटेक नाम मुदा छल एतए ।
“पायाक ऊपरसँ घुरिया-घुरिया कऽ खसैत मजदूर, कतेक ठाम हम सूचना देने रही, कोनो सुनबाहि नञि भेल । ओकरा सभकेँ न्याय नञि दिआ सकलहुँ तँ लगैत अछि जे दोषी हमहू छी”। नन्दक डायरीक ई अंश एक बेर आरुणि पढ़ने छलाह । ओ सोचलन्हि जे चलू घुरि कऽ आएब तखन बाबूजीक डायरी ताकब, कतए छन्हि।
फेर गाड़ी आगाँ बढ़ल । गंगा ब्रिज पाछाँ छुटि गेल । आगाँ गंगा-ब्रिज कॉलोनी आएल । आरुणिक बालकथाक साक्षी । स्कूल, घर आ खेलेबाक मैदान। सटले गंगा ब्रिजक गोडॉन । कताक बेर चोरिक समान ट्रकसँ एतएसँ निकलैत छल, एकाध बेर धरायल छल । बड़का धराएल ट्रक, कतेक चक्का बला, लोक गुमटीलग मेला जेना देखए पहुँचैत छलए । बच्चा-सभ ट्रकक चक्का गनैत छलाह, १४ चक्का बला अछि वा १६ चक्का बला।
जीवनक प्रतियोगितामे सभटा जेना बिसरि गेल छलाह आरुणि । भ्रष्टाचार, जोन-बोनिहारक मृत्यु, पिताक संघर्ष सभटा सोझाँ आबि रहल अछि मुदा आब।
“फेरसँ सोझाँ आएल ई सभटा, पिताक स्मृति बनि कऽ मुदा पिताक हारि बनि कए तँ नञि । ई नाम आरुणि किएक हमरा लेल चुनने छलाह बाबूजी”।
“की बजलहुँ बेटा”- माँ पुछलखिन्ह।
“नहि । ई कॉलोनी देखि कऽ किछु मोन पड़ि गेल”।
“नहि देखू ई पपियाहा कॉलोनीकेँ”।
गंगा-ब्रिजक चरचा घरमे टैबू बनि गेल रहए । आरुणिकेँ बुझल छन्हि ई । मुदा एकटा आर प्रारम्भ तँ नञि भऽ जएत । आरुणिक प्रश्नसँ माँ भीतरसँ घबरा गेल छलीह ।
आब जे चुप्पी पसरल से गामेमे जा कए खतम भेल । रस्तामे एकटा प्रकाश खण्ड टूटि कए खसल सहस्रबाढ़नि नहि ओकर न्यून रूप, छाड़नि ।
अग्रज मृत भाएक मुँह पकड़ि कानए लगलाह ।
“एहन भैयारी ककर हेतए । धुर बताह, पैघ भायकेँ क्यो छोड़ि कऽ पहिने चलि जाइत अछि । कहियो नहि कनेने छलह तँ आइ किए कनबा रहल छह”। सौँसे टोल जुटि आएल छल । समाचार सुनलाक बाद ककरो घरमे खेनाइ नहि बनल छलैक । पता नञि के ककरा टेलीफोन कऽ देने रहैक जे समाचार एतए पहुँचि गेल रहए ।
“कलममे बाबूक सारा लग दाह हेतन्हि”, अग्रजक एहि इच्छाक बाद लहास ओतए गेल । कान्हपर उठा कए सभ पहुँचलाह कलम-गाछी ।
“देखियौ, केना मूँहपर हँसी छैक, एको रत्ती मूइल लगैत अछि”- नन्दक अग्रज बजलाह।
आरुणिक पैघ भाए जखने अपन आगि लेल हाथ पिताक दिस बढ़ेलन्हि आकि ओ विचलित सन भऽ गेलाह । काका भरोस देलखिन्ह । आगिमे मिलैत गेल ओ मृत शरीर, पुनः घुरि अएबाक कोनो सम्भावनाकेँ खतम करैत ।
सभटा विध-व्यवहार, लगैत रहए जेना ककरो मृत्युक नहि वरन् कोनो पाबनिक इन्तजाम-बात भऽ रहल अछि, धूम-धामसँ । महापात्र आकि कंटाहा ब्राह्मणक निर्देशानुसार होइत श्राद्धकर्म आ साँझक पाठ गरुड़-पुराणक अविश्वसनीय विवरणक । सभ सम्पन्न भऽ गेल ।
परम शांति आ कि घोर कोलाहल । अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत रहबाक घटनाक्रम हुनका मोन पड़ि जाइत छन्हि ।
आरुणि ठाकुर किछु अस्वस्थ रहथि आ कलकत्तामे वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अस्वस्थ स्थितिमे अध्यावसनमे लीन । अशांतिक क्षण हुनका रहि-रहि कए अनायासहि मोन पड़ि रहल छन्हि । जखन ओ अपन समस्या सभ अपन हित-संबंधी सभकेँ सुना कए अपन मोनक भार कम करैत रहथि । शनैः-शनैः समस्या सभ बढ़ैते चल गेल एतेक धरि जे आब दोसरकेँ सुनेलापरांत मोन आर उचटि जाइत छलन्हि । ताहि द्वारे आब ओ अपने धरि सीमित रहए लगलाह । हित संबंधी सभ बुझय लगलाह जे आरुणि समस्यासँ रहित भए गेल छथि । बच्चेसँ सपनामे भयावह चीज सभ देखाइ पड़ैत छलन्हि आरुणिकेँ । अखन धरि हुनका मोन छन्हि कोना आध-आध पहर रातिमे ओ घामे-पसीने भऽ जाइत रहथि आ हुनकर माता-पिता चिंतित भऽ बीयनि होकैत रहैत छलखिन्ह । पिताक-पिता आ तकर जन्मदाता के? भगवान ज्योँ सभक पूर्वज तखन हुनकर पूर्वजके ? लोकसभ एहि प्रश्न सभकेँ हँसीमे उड़ा दैत छलाह, किन्तु बादमे जखन आरुणि दर्शनशास्त्र पढ़लन्हि तखन हुनका पता चललन्हि जे एकर उत्तरक हेतु कतेक ऋषि-मुनि सेहो अपन जीवन समर्पित कए चुकल छथि, मुदा ई प्रश्न एखनो अनुत्तरिते अछि । अस्वस्थताक स्थितिमे फेरसँ ई सभ अनुत्तरित प्रश्न हुनका समक्ष स्वप्न बनि आबि गेल छन्हि । कखनोकेँ निन्दमे हुनका लगन्हि जे ओ घरक छत पर छथि आ नहि चाहितो शनैः-शनैः छतक बिन घेरल भाग दिशि गेल जा रहल छथि । गुरुत्वक कोनो शक्ति हुनका खीचि रहल छन्हि सहस्रबाढ़नि सन बड़का झोँटाबलाक देहक गुरुत्व शक्ति । तावत धरि जावत ओ नीचाँ नहि खसि पड़ैत छथि । की ई छल कोनो प्रारब्धक दिशानिर्देश आकि कोनो भविष्यक दुर्घटनासँ बचबाक संदेश ? किछु दिन धरि तँ आरुणि सुतबाक सही समयक पता लगबैत रहलाह परंतु शनैः-शनैः हुनका ई पता लागि गेलन्हि जे स्वप्न आ निन्न एहि जीवनक दूटा एहन रहस्य अछि जे नियम विरुद्ध अछि आ अनुत्तरित अछि । आ आरुणि पैघ भेलथि, फेर हुनकर पढ़ाइ शुरु कएल गेल- अगस्त्यक स्तोत्र- सरस्वति नमस्तुभ्यम वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भम् करिष्यामि सिद्धिर्भवतुमे सदा । श्रीगणेषजीक अंकुशक संग गौरिशंकरक अभ्यर्थना सिद्धिरस्तु । साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वसिनी, उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः,सिद्धिःसाध्ये सतामस्तु प्रसदांतस्य धूर्जटेः, जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला । एहि श्लोककेँ बजैत काल प्रायः आरुणि पशुपतिःपतिःक सामवेदीय तारतम्यक बाद अनायासहि हा हा कऽ कए जोरसँ हँसए लगैत छलाह आ बीचहि मे रुकि जाइत छलाह । पिता सोचलन्हि जे कम वयसमे पढ़ाइ शुरु केलासँ आरुणिक कुर्सी पर बैसि कऽ माथपर हाथ राखि कऽ बैसबाक आदति तँ खतम होएतन्हि । माएक एकटा गप्प हुनका पसिन्न नहि छलन्हि। ओ बिच्चमे गप्प करैत-करैत आरुणिक बातकेँ अनठिया दैत छलथिन्ह। एकबेर माएक कोनो संगी आएल छलीह। आरुणिक कोनो बातपर माए ध्यान नहि दऽ रहल छलीह। आरुणिक हाथमे भरि घरक चाभीक झाबा छलन्हि तेँ ओ कहलखिन्ह जे ज्योँ हुनकर बात नहि सुनल जएतन्हि तँ ओ झाबाकेँ सोझाँक डबरामे फेकि देताह। माए सोचलन्हि जे हाँ-हाँ केलापर झाबा फेकियेटा देताह तैँ आर अनठिया देलखिन्ह। परिणाम दुनु तरहेँ एके हेबाक छल। चाभी बहुत खोज केलो पर नहि भेटल। एखनो घरक सभ अलमीरा आदिक चाभी डुप्लीकेट अछि। एतेक दिनक बाद ई सभ सोचि आरुणिक मुँहपर अनायासहि मुस्की आबि गेलन्हि।सिद्धांतवादी पिताकेँ नोकरीमे किछु ने किछु दिक्कत होइते रहैत छलन्हि ताहि द्वारे ओ आरुणिकेँ जल्दी सँ जल्दी पैघ देखए चाहैत छलाह। तेसर सँ सोझे पाँचम वर्गमे फनबा देल गेलन्हि।फेर भेल ई जे होलीक छुट्टीमे निअमानुसार सभ गोटे गाम गेल छलाह। होली आ दुर्गापूजामे सभ बेर गाम जएबाक नियम जेकाँ छलैक। पिताजी सभकेँ छोड़ि कए वापिस भए गेलाह। फेर दरमाहा बन्द भऽ गेल छलन्हि प्राय़ः यैह चिट्ठी गाम आएल छल जे आब सभकेँ गामहि मे रहए पड़तन्हि। माए तँ कानए लगलीह मुदा आरुणि खूब प्रसन्न भेलाह। मुदा सरकारी स्कूलमे ओहि समय वर्गक आगाँमे नवीन- ई लगा कए एक वर्ग कममे लिखबाक गलत परम्परा नवीन शिक्षा नीतिक आलोकमे लेल गेल छलैक कारण नवीन नीतिमे आर किछुओ नवीन नहि छल। पिताजीकेँ जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओ तमसायलो छलाह आ एकर प्रतिकार स्वरूप पाँचम क्लासक बाद जखन ओ सभ शहर वापस अएलाह तँ आरुणिकेँ फेर एक वर्ग तरपा कए सोझे छठम वर्गक बदलामे सातम वर्गमे नाम लिखवा देलन्हि। छठम वर्गक विज्ञान आ गणितक पढ़ाइ पाँचमे वर्गमे कए लेबाक पिताक निर्देशक उद्देश्यक जानकारी आरुणिकेँ तखन जा कए भेलन्हि जखन प्रवेश-परीक्षामे यैह दुनु विषय पूछल गेल आ आरुणि छट्ठा आ सतमा दुनु वर्गक प्रवेश परीक्षामे बैसलाह आ सफल भेलाह। बहुत दिन बाद धरि जखन क्यो आनो संदर्भमे छठम वर्गक चर्चा करैत छल तँ आरुणिकेँ किछु अनभिज्ञताक बोध होइत छलन्हि।गामक प्रवासमे एकबेर आरुणि पिताकेँ चिट्ठी लिखने छलाह कारण हुनकर जुत्ता शहरेमे छूटि गेल छलन्हि। जुत्तातँ आबिये गेलन्हि संगहि चिट्ठीमे आरुणिक लिखल तीन टा शाब्दिक गलतीक विवरण सेहो आएल आ ईहो मोन पाड़ल गेल जे एकबेर दौगि कए गणितक प्रश्न हल करबाक प्रतियोगितामे तीनक बदला हरबड़ीमे दुइयेटा प्रश्नकेँ हल कऽ कए आरुणि कोना अपन कॉपी जमा कए देने छलाह। हुनकर स्वभावमे क्रोधक प्रवेश कखन भेलन्हि से तँ हुनको नहि बुझबामे अएलन्हि मुदा पिताजी हुनका “क्रोधक समान कोनो दोसर रिपु नहि” एहि संस्कृत श्लोकक दस बेर पाठ करबाक निर्देश देने छलखिन्ह- से धरि मोन छन्हि। एकटा घटना सेहो भेल छल जाहिमे स्कूलमे एकटा बच्चा झगड़ाक मध्य सिलेटसँ हुनकर माथ फोड़ि देने छलन्हि। आरुणि सेहो सिलेट उठेलथि मुदा ई सोचि जे ओकर माथ फूटि जएतैक हाथ रोकि लेने छलाह। एकर परिणामस्वरूप हुनकर पिता दू गोट काज केलन्हि। एक तँ हुनकर सिलेटकेँ बदलि कए लोहाक बदला लकड़ीक कोरबला सिलेट देलखिन्ह जकर कोनो ने कोनो भागक लकड़ी खुजि जाइत छलैक आ दोसर जे कॉलोनीमे समकक्ष अधिकारीक बैठक बजा कए कॉलोनी-अहिमे स्कूल खोलि देल गेल जतए आरुणि पढ़ए लगलाह। बादमे क्यो पंडित जखन वाल्मीकि रामायणक सुन्दरकाण्डक पाठ तँ क्यो ज्योतिष कँगुरिया आँगुरमे मोती आ कि मूनस्टोन पहिरबाक सलाह क्रोध कम करबाक लेल देबए लगैत छलाह तँ ओ संस्कृत श्लोक हुनका मोन पड़ि जाइत छलन्हि। बाल संस्कारक अंतर्गत सहायता माँगबामे आ समझौता करबामे अखनो हुनका असहजता अनुभव होइत छन्हि। मुदा हारि आ जीत दुनुकेँ बराबर बूझि युद्ध करबाक विश्वास हुनकामे नहि रहलन्हि। आ विजय हुनकर लक्ष्य बनैत गेलन्हि शनैः-शनैः। जकर ओ जी-जानसँ मदति कएलन्हि सेहो समयपर हुनकर संग देलकन्हि। समय-समय पर कएल गेल समझौता सभ हुनकर संघर्षकेँ कम केलकन्हि। जतेकसँ दोस्तियारी छलन्हि तकरे निभेनाइ मुश्किल भए रहल छलन्हि। फेर तँ नव शहरमे नव संगीक हेतु स्थान नहि बचल। महत्वाकांक्षाक अंत नहि आ जीवन जीबाक कला सभक अद्वितीय अछि। आरुणि ई नाम आब कखनो-कखनो घरमे सुनाइ पड़ैत छल। कलकत्ता शहर प्रतिभाक पूजा करैत अछि। मुदा व्यवसायी होएबामे एकटा बाधा छल - अंग्रेजीक संग बाङलाक ज्ञान जे ओ बाट चलैत सीखि गेलाह। व्यस्त जीवनमे बीमारीक स्थिति-अहिमे हुनका आराम भेटैत छलन्हि। बीमारियेमे सोचबाक आदति मोन पड़ैत छलन्हि। आ ई फ्लैट किनलाक बाद माएकेँ सेहो बजा लेलखिन्ह। ओना हुनका बुझल छलन्हि जे माए एहि सभसँ प्रभावित नहि होएतीह। कारण ओ अधिकारी पत्नी छलीह आ पुत्रकेँ सेहो ओहि रूपमे देखबाक कामना छलन्हि। ई नव शहर हुनक पुत्रक व्यक्तित्वमे सैद्धांतिकताक स्थानपर प्रायोगिकताक प्रतिशतता बढ़ा देने छलन्हि। आब समयाभावक कारण स्वास्थ्य खराब भेलेपरांत सोचबोक समय पुत्रकेँ भेटैत छलन्हि।व्यवसायमे सफलता प्राप्तिक पूर्व आरुणि एकटा कागजक प्रिंटिंग प्रेसमे काज केनाइ शुरु केलन्हि। अपन मित्रवत प्रिंटिंग प्रेस मालिकसँ दरमाहाक बदला पर्सेंटेज पर काज करबाक आग्रह केलन्हि। ऑर्डर आनि बाइंडिंग आ प्रिंटिंग करबाबथि आ आस्ते-आस्ते अपन एकटा प्रिंटिंग प्रेस लगओलथि। किछु गोटे हिनका अहिठामसँ छपाइ करबा कए ग्राहककेँ बेचथि। हुनका जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओ एकटा चलाकी केलथि जे सभ बंडलमे अपन प्रेसक कैलेंडर धऽ देलखिन्ह। जखन अंतिम उपभोक्ताकेँ पता चललैक जे ओ सभ अनावश्यके दलालक माध्यमसँ समान कीनि रहल छलाह तँ ओ सभ सोझे आरुणि प्रिंटिंग प्रेसकेँ ऑर्डर देबए लागल। आरुणिकेँ घरमे अपन नाम कखनहुँ काले सुनि पड़न्हि। किताबक ऊपर छपल हुनकर नाम तँ कोनो कंपनीक छलैक- आ ओ ओकरासँ निकटता अनुभव नहि कऽ पाबि सकैत छलाह। संसारक कुचालि हुनकर पिताक संघर्षक अंत केने छलन्हि मुदा आरुणि व्यावसायिक युद्ध मस्तिष्कसँ लड़ैत आ जितैत गेलाह।माएक अएलाक बाद आरुणि ई नाम बीसो बेर दिन भरिमे सुनाइ पड़ए लागल। ओकर संगी लोकनि उपरोक्त व्यावसायिक सफलताक घटना सभकेँ जखन आरुणिक माएकेँ सुनबैत रहैत छलाह, ई सोचि जे ओ अपन मित्रक बड़ाइ कऽ रहल छलाह तँ आरुणि असहजताक अनुभव करए लगैत छलाह आ गप्पकेँ दोसर दिशि मोड़ि दैत छलाह। हुनकर माए तँ जेना हुनक विवाहक हेतु आएल छलीह। माय जखन जिद्द ठानलन्हि तँ हुनका आश्चर्य भेलन्हि कारण घरमे जिद्दक एकाधिकार तँ हुनकेटा छलन्हि। मुदा माए बूझि गेल छलीह जे हुनकर बेटा प्रैक्टिकल भए गेल छन्हि आ जिद्द केनाइ बिसरि गेल छन्हि। आरुणि सोचलन्हि जे छोटमे बड्ड जिद्द पूरा करबओने छथि तेँ आब हिनकर जिद्द पूरा करबाक समय आएल अछि। विवाह फेर बच्चा। माए अपन नातिमे पतिक रूप देखलन्हि। पतिक मृत्युक पहिनहि बेटा प्रैक्टिकल बनि गेल छलन्हि। मुदा आब ई नहि होएत। जे काज बेटा नहि कए सकल से आब नैत करत। नातिक नाममे बेटा आ पति दुहुक नामक समावेश केलन्हि- आरुणि नन्द। फेर पढ़ाइ शुरु- सिद्धरस्तु-श्री गणेशजीक अंकुश आ वैह उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः। हुनकर बेटाकेँ पति पढ़ेलखिन्ह ओ तँ घर सम्हारैत छलीह। आब पुतोहु घर सम्हारलन्हि, बेटाकेँ तँ फुरसतिये नहि। आब बा पढेतीह नातिकेँ।
उतपत्स्येत हिमम कोऽपि समानधर्मा कालोह्यम निरवधिर्विपुला च पृथ्वी।
पृथ्वी विशाल अछि आ काल निस्सीम,अनंत, एहि हेतु विश्वास अछि जे आइ नहि तँ काल्हि क्यो ने क्यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनाएत। आरुणि अपनाकेँ अपन माएसँ दूर अनुभव केलन्हि, किछु अस्वस्थ सेहो छथि आ वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अध्यावसनमे लीन अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत छथि। प्रतियोगिता परीक्षा सभक उमरि बाकी छलन्हिये से दू चारिटा परीक्षामे बैसि गेलाह आ केन्द्र सरकारक ई ग्रुप बी वर्दीबला अधिकारी बनि गेलाह। माँकेँ कनेक संतोख भेलन्हि जे क्लास वन नहि मुदा सरकारी नोकरी तँ केलक, ई बिजनेस-तिजनेस तँ छोड़लक।
“चलह कनेक खा लैह, एना केने काज नहि चलतह”। आरुणिक छोटका मामा प्रेमपूर्वक दबाड़ि कए कहलन्हि। क्रिया-कर्म खतम भऽ गेल छल आब घुरबाक बेर आबि गेल छल, नोकरीक संग पिताक मार्गपर घुरबाक सेहो।
१९९५ क नवम्बरक मास।
केश कटायल मुँहेँ गामसँ दरिभङ्गा आ ओतएसँ पटनाक बस पर चढ़लाह आरुणि। किछु किताब बेचिनहार अएलाह, तुक मिलेने सभ किताबक विशेषता कहि सुनओलन्हि।खिस्सा-पिहानी, उपचार, फूलन-देवी सँ लए मनोहर पोथी धरि सभ यात्रीगणकेँ एक-एक टा पड़सैत गेलाह।ओहिमे सँ किछु मोल-मोलाइ कएलाक उत्तर बिकएबो कएलन्हि आ सभटा वापस लए जाइत गेलाह। बससँ उतरैत काल कंडक्टरसँ वाद-विवाद सेहो भेलन्हि। फेर नेबोक रस निकालबाक यंत्रक आविष्कारक चढ़लाह, रस निकालि देखओलन्हि, खलासीसँ वाद-विवादक उपरांत ओहो उतरि गेलाह।फेर ककबा बला, पेन बला आ पेचकश बला सभ चढ़ि कए उतरैत गेलाह। पुछलाक उपरांत पता लागलन्हि जे गाड़ी साढ़े दस बजे खुजत, ई गप्प बस बला झुट्ठे बाजल छल। पछुलका बसक सवारीकेँ सीट नहि भेटल छलन्हि, से बेशी अबेरो नहि होएत आ सीटो भेटि जएत, एहि तर्कक संग मार्केटिंगक उपकरणक रूपमे ई शस्त्र छोड़ल गेल छल। गाड़ी खुजबाक समय छल ११ बजे मुदा ११ बाजि कए पाँच मिनट धरि बहस होइत रहल जे घड़ीमे ११ बाजल अछि आकि नहि। पाछाँ एगारह बाजि कए दस मिनट पर जखन बादमे जाएबला बसक कंडक्टर, अशोक मिश्रा आ शाहीक बसक बीचक भिड़ंतक बात कए झगड़ा बजारि देलक -जे एको सेकेंड ज्योँ लेट होएत तँ जे बुझु से भए जएत- तखन ड्राइवर अकस्माते हॉर्न बजाबए लागल। आरुणिक बगलक सीट पर बैसलि एकटा बूढ़ि बेटाकेँ जोरसँ बजाबए लगलीह, पाँच मिनट गरदम गोल होइत रहल। सभ यात्री चढ़ि गेलाह आ दू-चारिटा यात्री जे अखने रिक्शासँ उतरल छलाह, जोर-जोरसँ बाजए लगलाह। पछुलका बस बला हुनकर मोटा-चोटा उठा कए अपना बसमे लऽ जाए चाहैत छलन्हि मुदा ओ लोकनि पढ़ल लिखल छलाह आ अगुलके बससँ जाए चाहैत छलाह। ओ लोकनि दू-चारिटा चौधरी-कुँअरक नाम-गाम गनओलन्हि, तखन ओहि बस बलाकेँ बुझओलैक जे ई सभ फसादी लोक सभ अछि- से कहलक जे टू बाइ टूक बदला ओहि टू बाइ थ्री धक्कागाड़ीमे ठाढ़े जएबाके ज्योँ इच्छा अछि तँ हम की करू- किरायो ओ एको पाइ कम नहि लेत। से दू-चारि गोट बेशी यात्री लेबाक मनसूबा पूरा भेलाक बाद ड्राइवर गाड़ी हाँकि देलक। ओहि रिक्शा-सभ परसँ एक गोट अधवयसू व्यक्ति चढ़ल छलाह ।संयोग ई भेल जे आरुणिक दोसर बगलमे बैसल व्यक्ति गुनधुन करैत छलाह जे फलनाँ बड़ा बूड़ि अछि, एखन धरि नहि आएल। गाड़ी खुजलाक बाद अगिला चौक पर असकसा कए ओ उतरि गेलाह आ तकर बाद ओहि टू बाइ थ्री ग़ाड़ीक तीन सीट बला हीसमे आरुणिक बगलमे ओहि सज्जनकेँ जगह भेटि गेलन्हि।
आरुणिक मोन स्थिर छलन्हि आ बेशी बजबाक इच्छा नहि छलन्हि। मुदा बगलगीर पहिने अप्पन भाग्यकेँ धन्यवाद देलन्हि जकर प्रतापे हुनका सीट भेटलन्हि। पटनामे आवश्यक कार्य छलन्हि तेँ लेट जाएबला बससँ गेला उत्तर काजमे भाङठ पड़ितन्हि। फेर अप्पन परिचय असिस्टेंट डायरेक्टरक रूपमे देलाक उपरांत ई सूचना देलन्हि जे दरिभङ्गाक संग पटनोमे हुनकर मकान छन्हि। दुनू घर अप्पन पुरुषार्थसँ बनएबाक गप्पक संग, दुनू घरक दुमहला आ मारबल आ ग्रेनाइटसँ युक्त होएबाक बातो कहलन्हि। बजबैका लोक केँ सुनिनिहार लोक बड्ड पसिन्न पड़ैत अछि से ओ आरुणिकेँ पसिन्न करए लगलाह। आ तेँ पुछलन्हि-
“पटनामे अपनेक मकान कोन महल्लामे अछि”।
आरुणि कहलखिन्ह- “अप्पन मकान नहि अछि,किराया पर छी”।
किछु कालक शांतिक पश्चात ओ सज्जन पनबट्टीसँ पान बहार कए आरुणिसँ पुछलन्हि जे-
“पान खाइत छी”।
“नहि”।
एहि उत्तरक पश्चात अप्पन विशेषज्ञता देखबैत ओ कहलन्हि, जे-
“हम तँ अहाँक दाँते देखि कए बुझि गेल छलहुँ”।
पान खेलाक बाद अप्पन बेटी सभक सासुरक चर्चा कएलन्हि। बेटाक आइ.ए.एस. केर तैयारी करबाक गप्प कएलन्हि आ कोनो ग्रुपक चर्चा सेहो कएलन्हि जे विद्यार्थी लोकनिक बीच एहि तैयारीक हेतु तैयार भेल छल आ ओहि ग्रुपमे प्रवेश मात्र प्रतिभावान लोकनिक हेतु सीमित छल। फेर आखिरीमे ईहो कहलन्हि जे ओहि प्रतिभावान ग्रुपक सदस्यता हुनकर पुत्रकेँ सेहो प्राप्त छन्हि। आगाँ बढ़ैत-बढ़ैत गाड़ी एकटा लाइन होटल पर ठाढ़ भेल। किछु यात्री एकर विरोध कएलन्हि। एक गोटे कहलन्हि जे ई ड्राइवर-कंडक्टर खेनाइ खएबाक द्वारे एहि घटिया लाइन होटलमे गाड़ी रोकैत अछि। एकर सभक खेनाइ एतए मुफ्तिया छैक आ संगहि सूचना भेटल जे मुफ्तिया की रहतैक ओकर सभक बिल यात्रीगणसँ परोक्ष रूपमे लेल जाइत छैक आ बुझु जे एकर सभक बिल यात्री सभ भरैत छथि। हुनकर ईहो अपील छलन्हि जे क्यो गोटे नहि उतरए आ हारि कऽ बसकेँ स्टार्ट करए पड़तैक। किछु कालक उपरांत एकाएकी सभ गोटे उतरैत गेलाह आ ओ सज्जन सेहो खिसियाएल उतरि फराक भऽ ठाढ़ भए मिथिलांचलक दुर्दशाक कारणक व्याख्यामे हुनकर गप्प नहि मानबाक मनोवृत्तिकेँ सेहो दोषी करारि देलथिन्ह। गाड़ी फेर खुजल आ किछु दूर आगू जा कए धक्काक संग ठाढ़ भए गेल। कंडक्टर कहलक जे सभ उतरैत जाऊ। गाड़ी पंक्चर भए गेल। लाइन होटल पर गाड़ी नहि रोकबाक अपील केनिहार सज्जनक मत छलन्हि जे लाइन होटलपर जे गाड़ी ठाढ़ भेल, तखनेसँ जतरा खराब भए गेल अछि। आब आगू देखू की-की होइत अछि। नीचाँ उतरलाक बाद चारि-चारि, पाँच-पाँच गोटेक गोला बनि गेल। ई जगह प्रायः वैशालीक आसपास छल। एक गोटे खेतक विस्तारक दिशि ध्यान देलन्हि। घर सभक ऐल-फैल होएबाक सेहो चर्चा भेल। संगहि हुनकर सभक गाम दिशि घर पर घर आ चार पर चार चढ़ल रहैत अछि आ से झगड़ाक कारण अछि, अहू पर चर्चा भेल।
आरुणिक बगलमे जे अधवयसू व्यक्ति रहथि से किछु औंघायल सन छलाह किएक तँ एहि व्यवधानसँ हुनका जे कनी-मनी भक्क लागल छलन्हि से टूटि गेल छलन्हि। हुनकर बकार लाइन होटल पर आकि नीचाँ ठाढ़ भेलापर मन्द भऽ गेल छलन्हि, से आरुणि अनुभव कएलन्हि। फेर बस चलि पड़ल आ ओ सज्जन पुनः शुरू भए गेलाह। हाजीपुर शहर अएलापर तँ हुनक स्मृति आर तीक्ष्ण भऽ गेलन्हि।
किछु काल बस चलल तँ एकटा कॉलोनीक दिशि इशारा कए ओ कहलन्हि-
“ई छी गंगा ब्रिज कॉलोनी, की छल आ आब की भऽ गेल अछि। एक भागमे रहबाक हेतु क्वॉर्टर आ दोसर भागमे गिट्टी-छड़-सीमेंट सभ भरल रहैत छल। आब तँ कॉलोनीक मेंटेनेंसो नहि भए रहल अछि”।
आरुणि चौँकि गेलाह। कहलन्हि-
“एतय एकटा स्कूलो तँ छल”।
ओ सोझाँ इशारा दैत देखेलन्हि-
“देखू, ओतए नामो लिखल अछि। बरखा बुन्नीमे नाम अदहा-छिदहा मेटा गेल अछि”- फेर ओ चौँकि कए पुछलन्हि-
“अहाँकेँ कोना बुझल अछि”।
-हम एहि स्कूलमे पढ़ने छी।
-मुदा एहि कॉलोनीमे तँ गंगा पुल निर्माणक अभियंता लोकनि मात्र रहैत छलाह आ स्कूलमे हुनके बच्चा सभकेँ पढ़बाक हेतु एहि स्कूलक निर्माण भेल छल।
-हम सभ अही कॉलोनीमे रहैत छलहुँ।
-अहाँक पिताक नाम की छी।
-श्री नन्द ठाकुर।
पिताक मृत्यु पंद्रह दिन पहिनहि भेल रहन्हि से स्वर्गीय कहबाक हिस्सक नहि पड़ल छलन्हि।
-अहाँ ठाकुरजीक पुत्र छी।
ई कहि आरुणि दिशि ओ अपनत्वसँ बेशी ममत्वक दृष्टि देलन्हि।
“अहाँक नाम की छी”। आरुणि पुछलखिन्ह।
“आइ.ए.आजम” - ओ उत्तर देलन्हि।
तखन आरुणि हुनकर सभटा बच्चाक नाम गना देलखिन्ह। हुनकर एकटा बेटा नेहाल आजम आरुणिक क्लासमे पढ़ैत छल। आब हुनकर स्वर बदलि गेलन्हि।
-कॉलोनीमे दू गोटे खूब पूजा करैत छलाह। एकटा पाण्डे जी आ दोसर अहाँक पिताजी। पाण्डेजी तँ पूजाक संग पाइयो कमाइत छलाह। मुदा अहाँक पिताजी छलाह पूर्ण ईमानदार आ दयालु। चंदा कए होम्योपैथिक दवाइ कानपुरसँ अनैत छलाह, आ मुफ्त इलाज कॉलोनी बलाकेँ दैत छलाह। हमर बेटीक माथमे बड़का गूर भए गेल छलैक। कोनो एलोपैथिक बलासँ ठीक नहि भेल छलैक। अहींक पिताजी ओकरा ठीक केने छलखिन्ह। इंजीनियर रहितहुँ होम्योपैथीक डिग्री हुनका रहन्हि।
ड्राइंग रूममे होम्योपैथीक छोट-पैघ, सादा-रंगीन शीशी सभ आरुणिक आँखिक सोझाँ आबि गेल।
-आइ काल्हि कतए पोस्टेड छथि। बहुत दिनसँ सम्पर्के टूटि गेल। एतुक्का बाद कतहु संगे पोस्टिंग सेहो नहि रहल। बुझू भेँट भेना पन्द्रह सालसँ ऊपर भए गेल अछि।
-पन्द्रह दिन पहिने हुनकर मृत्यु भए गेलन्हि।
आरुणिक कटायल केश दिशि देखि ओ कहलन्हि-
-हमरे सँ गल्ती भेल। केश कटेने देखियो कऽ नहि पुछलहुँ। तेँ अहाँ भरि रस्ता गुम्म छलहुँ।
फेर कहए लगलाह-
-मजदूरक प्रति बड्ड चिंता रहैत छलन्हि।
तावत बस गंगा पुल पर आबि गेल छल। आगाँ फाटक पर बसकेँ टिकट कटेबाक हेतु ठाढ़ कऽ देल गेलैक। क्यो गोटे संवादो देलक जे आगू वन-वे जेकाँ अछि। एक कातमे रिपेयरिंग चलि रहल अछि। आरुणिक आगाँ दृश्य घूमि गेलन्हि। एहि पुलक निर्माणकालक पाया सभक। कॉलोनीक टूटल देबालक पजेबा सभ। ओ देबाल सभ साल टूटैत छल। पिताजी कहैत छलखिन्ह जे इंजीनियर आ ठेकेदार सभ मिलल अछि। फेर मोन पड़लन्हि सूटकेस भरल रुपैय्या। आरुणिक पिताजी एक लात मारने छलाह आ सूटकेस दूर फेका गेल रहए। एक गोट पितयौत भाए रहैत छलखिन्ह घरमे, से सभटा रुपैय्या ओहि सूटकेसमे राखि ओहि ठिकेदारकेँ देलन्हि। माँ सभकेँ भितरिया कोठली दिशि लऽ गेलीह। एक बेर नन्द पुलक पाया सभक लग आरुणिकेँ स्टीमरसँ लऽ गेल छलखिन्ह आ कहने रहथिन्ह-
-देखू। एहि पायाक निर्माणमे कतेक गोट मजदूर ऊपरसँ घिरनी जेकाँ नाचि कऽ गंगामे खसि पड़ल। सएसँ ऊपर। कतेक हमरा आँखिक सोझाँ। ओहिमेसँ मात्र किछुए परिवारकेँ कंपेनशेसन देल गेलैक। आन सभक ने लिस्टमे नाम छैक, ने क्यो पता लगेलकैक। तैयो सभ अभियंता लोकनि ठिकेदारसँ मिलल अछि।
भक्क टूटलन्हि आरुणिक। बससँ उतरि ओहि पुलक निर्माणमे शहीद मजदूरक लिस्ट फेर देखलन्हि। बहुत कम लोकक नाम छल-प्रायः बिन कंपेंनसेशन बलाक नाम नहि रहैक। बस शुरू होएबाक सूरसार कएलक तँ आरुणि आ आजम साहब बस पर धड़फड़ा कऽ चढ़लाह।
ओ पुनः बाजए लगलाह।
-पटनामे अहाँ कहलहुँ जे किरायाक मकानमे रहए जाइत छी।
-हँ। पिताक क्रियाकर्मक हेतु गाम गेल छलहुँ, पिताक मृत्युक उपरांत माँ केर मोन ओहि घरमे नहि लगतन्हि, ताहि हेतु ओ गामेमे रहि गेल छथि। आब पटना पहुँचि कऽ दोसर डेरा ताकब। ओना हम तँ कलकत्तामे नोकरी करैत छी।
-बुझू। तीस बरख पी.डबल्यु.डी. मे ईमानदारीसँ कार्य कएलाक उत्तर एकटा घरो नहि बना सकलाह। लोक की-की नहि कए गेल। हमहुँ १९८१ क बाद अहींक पिताजीक लाइन पर चलए लगलहुँ। दू टा घरो जे बनेने छी से नामे-मात्रक दू-महला। अधखिज्जू, ऊपरमे एक-एकटा कोठली अछि। अहाँक पिताकेँ की देलकन्हि सरकार ? आ की भेटलन्हि। रिटायरमेण्टक पहिनहि मृत्यु। ने कोनो सम्मान। पुलक उद्घाटन पर दू-दू हजार सभ अभियंताकेँ सरकार देलक। ओ तँ अल्ला-भगवानक रूप छलाह। सम्मानक लालसाक हेतु काज नहि कएलन्हि। सभ वर्क्स डिवीजनमे जएबाक हेतु पैरवी करए आ ई नन-वर्क्समे जएबाक हेतु पैरवी करथि।
फेर ओ आरुणिसँ पुछलन्हि जे-
-अहाँ की करैत छी।
-पिता,माए आ भाए पटनामे रहैत छलाह, हम कलकत्तामे इंटेलीजेन्स विभागमे छी, कहियो वरदी रहैत अछि कहियो मनाही रहैत अछि।
-दरभंगोमे आ पटनो मे आउ। मायोकेँ अनियन्हु। हमर पत्नीकेँ बड्ड नीक लगतन्हि। नेहाल तँ पटनेमे अछि।
फेर अपन पटना आ दरभंगा दुनू ठामक पता अपन स्नेहिल हाथसँ पकड़बैत पटनाक हार्डिंग पार्क बस स्टैण्ड पर उतरलाह।
बाहरसँ पटना अएलापर होर्डिंगकेँ देखि आरुणि प्रसन्न भए जाइत छलाह। मुदा पिताक छायाक दूर भेलाक बाद आब एहि नगरसँ लगाव नहि प्रतियोगिता करए पड़तन्हि हुनका। ई कोन संयोगपर संयोग भऽ रहल छल। आजम साहेब आइये कोना भेटि गेलाह। पन्द्रह सालसँ किएक क्यो नहि भेटल रहथि आ अकस्मात् नियति की चाहए छन्हि हुनकासँ।
रिक्शा पकड़ि घरक लेल निकललाह। फेर सोचनी लागि गेलन्हि।
एक बेर बाबूजीकेँ कटहरक कोआ खेलाक बाद पेट फूलि गेलन्हि, दू बजे रातिमे। ईहो नहि फुराइत छलन्हि, जे बगलमे श्रवनजीक बाबूकेँ बजा लियन्हि जे कोनो डॉक्टरकेँ बजा देताह। फुरायल तँ छलन्हि मुदा कहियो गप नहि छलन्हि तँ आइ काज पड़ला पर कहितथिन्ह से हियाऊ नहि भेलन्हि। माए केबाड़ पीटि कए पड़ोसीकेँ उठेलन्हि, कनैत खिजैत रहलीह। पड़ोसी डॉक्टरकेँ बजओलक, तखन जा कए बाबूजीक जान बाँचलन्हि। माय श्राप सेहो दैत रहलखिन्ह आ ईहो कहैत रहलखिन्ह जे पाँच वर्षक बेटा रहैत छैक तँ सभ भरोस दैत छैक जे कनैत किएक छी, अहाँकेँ तँ पाँच वर्षक बेटा अछि। आ ई सभ .....जाह, अपने भोगबह हम तँ दुनियासँ चलि जाएब। बहिन कॉलेजमे पढ़ैत छलखिन्ह। कॉलेजक रस्ता पएरे जाए पड़ैत छलन्हि। आ कॉलेजसँ आगाँ स्कूल छलन्हि आरुणि दुनू भाँएक। बहिन कहलखिन्ह जे अहूँ सभ हमर संगे चलू। एक दिन दुनू भाँय संग गेबो कएल रहथि। मुदा गप बिनु केने दुनू भाँय आगू-आगू झटकैत चल गेलाह। मोनमे ईहो भय छलन्हि जे छौड़ा सभ चीन्हि नहि जाए जे हमरा सभक ई बहिन छथि। आब ई सोचैत छथि जे चिन्हिये जाइत तँ की होइत। अपन व्यक्तित्त्वक विकासमे कमी छलन्हि ई ? बादमे पैघ भेलाह तँ माँ-बापकेँ उकटैत छथि जे घरघुस्सू आ मुँहचुरूक संज्ञा जे देलहुँ अहाँ सभ, कहियो ई सोचलहुँ, जे कोनो पड़ोसीसँ गप्प नहि करबाक, संगी-साथी नहि बनएबाक, घूमब-फिरब नहि करबाक उपदेशक पाछू -जे अहाँ सभ उपदेश देलहुँ- ओकर पाछाँ इच्छा समाजक बुराइसँ दूर करबाक छल, परंतु यैह तँ बनेलक मुँहचुरू आ घरघुस्सू सभकेँ।रातिमे माए-बापक झगड़ाक सीन सपनामे देखैत छलाह आ डरा कए उठि जाइत छलाह। पैघ भाए बहिनसँ अरुणिकेँ खूब झगड़ा होइत छलन्हि मुदा एक बेर माए-बापक झगड़ाक बाद, खूब कानल छलाह, खूब बाजल छलाह। ओहि घटनाक पहिने किछु दिनसँ भाए-बहिनसँ झगड़ाक बाद टोका-टोकी बन्द छलन्हि। सभ बेर वैह लोकनि आगाँ भऽ टोकैत छलाह। मुदा एहि बेर आरुणि कानैत-कानैत बहिनकेँ टोकलन्हि आ फेर कहियो बहिनसँ झगड़ा नहि भेलन्हि। भाए पिठिया छलन्हि, संगे पढ़ैत छलखिन्ह, ताहि हेतु ओकरासँ तँ झगड़ा होइते रहलन्हि, मुदा कम-सम।एहि सभ गपक हेतु माँ पिताजीकेँ दोषी कहथि। माँ सभसँ- पड़ोसी-संबंधी, जान-पहचानसँ गप करबासँ कहियो नहि रोकलन्हि आ कहथिन्ह जे सभटा दोष पिताक छलन्हि।एक बेर ग्लोब किनबाक जिद्द कएलन्हि आरुणि। कएक बेर समय देल गेलन्हि जे आइ अएत- काल्हि अएत। आरुणि पढ़ब छोड़ि देलन्हि। आ तखन जा कए ग्लोब अएलन्हि। बहिन अखनो कहैत छथिन्ह जे ग्लोब अनबाक जिद्दक पूरा भेलाक बाद अरुणिक पढ़ाइक लय टूटि गेलन्हि। वर्गमे स्थान प्रथमसँ नीचाँ आबि गेलन्हि आ पिताजी एकर कारण तंत्र-मंत्रमे ताकए लगलाह। एकटा तांत्रिकसँ भेँट भऽ गेलन्हि।कतेक दिन सभ गाममे रहैत जाइत गेलाह। गंगा ब्रिज कॉलोनीमे एकटा एकाउन्टेंट बाबू छलाह। ओ बाबूजीकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ तँ घूस नहि लैत छी मुदा अहाँक पत्नी अहाँक नाम पर घूस लैत छथि। तकर बाद सभ गाम पहुँचा देल गेलाह। सभ ट्रांसफरक बाद बिहार सरकारक नौकरीमे दरमाहा बंद भऽ जाइत छैक। आ ताहि द्वारे सभ ट्रांसफरक बाद नन्द सभकेँ गाम पठा दैत छलाह। एहि क्रममे एक बेर सभ गाममे छलाह। नन्दक चिट्ठी माँक नामसँ गाम आएल छलन्हि। आरुणि पढ़ने रहथि। नन्द आरुणिक माएकेँ लिखने छलाह जे ज्योँ अहाँ घूसक पाइ लेने छी तँ लौटा दियौक। हम विजीलेंसकेँ लिखने छी, छापा पड़त, तखन पाइ निकलत तँ बड्ड बदनामी होएत।
एहि सभ परिस्थितिमे स्कूलमे आरुणि घरक परिस्थितिकेँ बिसरि जएबाक प्रयास करए लगलाह। झुट्ठेकँ हँसए लगलाह। ई आदति पकड़ि लेलन्हि। घरक बड़ाइ करए लगलाह। लोक सभ नन्दक ईमानदारीक तँ चर्चा करिते रहए। आरुणि घरक कलहक विषय घरक बाहर अनबासँ परहेज करए लगलाह, लोक बुझत तँ हँसत। आ बुझू जे ईमानदारीक ग्लैमरकेँ जिबैत जाइत गेलाह। सोचबाक आ गुनधुनीक आदति एहन पड़लन्हि जे सुतैत सपनामे आ जगैत लिखबा-पढ़बा काल धरि ई सहस्रबाढ़नि जेकाँ पाछाँ नहि छोड़लकन्हि। दसमामे छमाही परीक्षा किछु दिन पहिने देने रहथि। कॉमर्सक परीक्षामे एकटा प्रश्न बनेलन्हि। मुदा ओ गलत बनि गेलन्हि, फेर दोसर आ तेसर बेर प्रयास केलन्हि। सभटा प्रश्नक उत्तर अबैत छलन्हि मुदा पहिले प्रश्नक उत्तर पूरा नहि भऽ रहल छलन्हि। कॉपीकेँ अंगाक नीचाँमे नुका लेलन्हि। आ पानि पीबाक बहन्ने जे बहरेलाह तँ घर पहुँचि गेलाह। पढ़ैत-पढ़ैत सोचए लगैत छलाह। एक्के पन्ना उनटेने घंटा बीति जाइत छलन्हि। चिड़ियाखाना गेल रहथि एक बेर। किछु गोटे हुनकर सभक सर-संबंधी लोकनि ओतए हुनका सभकेँ भेटि गेलखिन्ह। बड्ड हाइ-फाइ सभ। ओना तँ कहलखिन्ह किछु नहि मुदा हुनकर सभक बगेबानी देखि कए आरुणिमे हीन भावना अएलन्हि। चुप्पे भीड़मे निकलि घरक लेल पहुँचि गेलाह। जेबीमे पाइ नहि रहन्हि से पएरे निकलि गेलाह। ओतए चिड़ियाखानामे सभ डराइत रहल जे कतए हरा गेल। सभ घर पहुँचल तँ सभकेँ फुसियेँ कहलन्हि जे सत्ते भोथला गेल रहथि। सत्त बात ककरो नहि बतेलन्हि।सभ लोक जे भेटथिन्ह यैह कहथिन्ह जे अहाँ फलनाक बेटा छी। बेचारे भगवाने छथि। ऑफिसमे पिताक दरमाहाक लेल पे-स्लिप बनबाबए पड़ैत रहन्हि। एक बेर आरुणि पे-स्लिप बनबए गेल छलाह। किरानी बाबू बाजल- हिनकर पिताक पे-स्लिप बिना पाइ लेने बना दियन्हु। पिताजीसँ नहि तँ सहकर्मी खुश छलन्हि नहिये ठीकेदार सभ। सहकर्मी एहि लऽ कए जे नहि स्वयं कमाइत अछि, नहिये दोसराकेँ कमाय दैत अछि। पैघभायक गिनती बच्चामे बदमाशमे होइत छलन्हि। एक बेर ट्रांसफरक बाद जखन सभ गाम गेलाह, तँ पैघ भाय जे सभक फुलवाड़ीसँ नीक-नीक गाछ उखाड़ि कय अपना घरक आगाँ लगा लैत छलाह, से आब एकहि सालमे दब्बू, सभसँ पाछू बैसनिहार विद्यार्थीक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि बेर ट्रांसफरक बादक गाममे निवास किछु बेशी नमगर भऽ गेल छलन्हि। फेर मुख्यमंत्री पदक दावेदार एकटा नेताजी जखन गाममे वोट मँगबाक लेल अएलाह तखन काका हुनकासँ भेँट कएलन्हि आ कहलखिन्ह जे हमर भाएकेँ वर्क्ससँ नन-वर्क्स मे ट्रांसफर कए दियौक, बच्चा सभ पोसा जएतैक।नेताजी कहलन्हि जे ज्योँ हम जीति गेलहुँ तँ ई काज तँ हम जरूर करब। वर्क्समे जएबाक पैरवी तँ बहुत आएल मुदा नन-वर्क्समे जएबाक हेतु ई पहिले पैरवी छी।संयोग एहन भेल जे ओ नेताजी जीति गेलाह आ मुख्यमंत्री सेहो बनि गेलाह। ओ शपथ ग्रहण केलाक बाद ई काज धरि केलन्हि जे पिताजीक ट्रांसफर कए देलखिन्ह। आ नन्दक परिवार पुनः शहर आबि गेल रहन्हि । गाममे रहथि तँ एक गोटे जे आरुणिक भाएक संगी छलाह, ककरो अनका प्रसंगमे कहने छलाह।हुनकर अनुसार- संगीक माएक स्वभाव तीव्र छलन्हि आ ओ खेनाइ खाइते काल झगड़ा करए लगैत छलीह। मुदा ओहि दिन ककरो अनका ओ आर तीव्र स्वभावक देखने छलाह।खराब आर्थिक स्थितिक उपरांत होअएबला कलहक परिणाम आरुणि देखि रहल छलाह। दू टा घटना हुनका विचलित कए दैत छलन्हि। एकटा तँ इनकम टैक्स कटौतीक मास- मार्च मास। ई घटना तँ सभ साले होइत छल, मुदा कटौती बढ़ैत-बढ़ैत एक साल आबि कए पूरा मार्च मासक दरमाहा काटि लेलक। माँ कहैत छलखिन्ह जे आब भोजन कोना चलए जयतौह। आब भीख माँगए जइहँ गऽ सभ गोटे। मुदा नन्द एकटा गामक भातिजकेँ पोस्टकार्ड पठेलन्हि आ ओ आठ सय टाका आनि कय दऽ गेलखिन्ह तखन जा कए असुरक्षाक भावना खत्म भेल छल। भीख मँगैत अखनो आरुणि ज्योँ ककरो देखैत छथि तँ मोन कलपय लगैत छन्हि। दोसर घटना छल जखन हुनकर घरक आँगा एकटा एक्सीडेंट भेल छल आ ओकरा बाद हुनकर भाइ खेनाइ छोड़ि देने छलाह आ कानि-कानि कए आँखि लाल कए लेने छलाह। नन्द जखन बुझबए लगलाह तँ ओ जवाब देलन्हि-
-अहाँकेँ ज्योँ किछु भऽ जएत तखन हमरा सभक की होएत।
पिताजी इंश्योरेंस बेनीफिट, जी.पी.एफ., ग्रेच्युटी आदिक हिसाब लगाय पुत्रकेँ बुझेलन्हि जे ९९००० रुपय्या तँ तुरत भेटत आ फेर महिने-महिने पेंशनो भेटत। लगभग एक घंटा तक बाबूजी पैघ पुत्रकेँ बुझबैत रहलाह। एक बेर आरुणिक ओहिठाम एक गोट पीसा आयल छलाह। आइयो घरमे क्यो अबैत छथि तँ सभ सुरक्षित अनुभव करैत छथि। नन्द पीसाक सार भेलखिन्ह से एहि ओहदासँ हँसी सेहो चलि रहल छल।ओ कहलन्हि जे नन्दे जेकाँ ईमानदार एकटा बी.डी.ओ. साहेब झंझारपुरमे छलाह। पिताजी हुनकर मलाह छलखिन्ह, कष्ट काटि अफसर भेलाह। मुदा नन्दक जेँका हुनको घरमे खाटे टा छलन्हि। पीसा हुनका कहलखिन्ह जे कथी ले अफसर भेलहुँ, गाममे रहितहुँ आ मचान पर बैसि माछ भात खएतहुँ। माछक कारबारमे फायदा होइत।
आरुणिक बहिनक विवाहक बाद घरमे कखनो काल बहिनोइ अबैत छलखिन्ह। जमायक अबिते देरी आरुणिक माँक झगड़ा पिताजी सँ शुरू भऽ जाइत छलन्हि, किएकतँ घरमे इंतजाम तँ किछुओ रहिते नहि छल। ट्रांसफरक बाद पिताजीक अभियान घूसखोरकेँ सजा देबय पर चलल। आ जखन सरकारी तंत्र परसँ विश्वास खतम भए गेलन्हि तखन ओहि तांत्रिकक फेरमे पड़ि गेलाह। घरमे माता-पिताक बीच कलह बढ़ि गेल। एक दिन पिताजीसँ आरुणिक बहसा-बहसी भए गेलन्हि आ तीनू भाय बहिन गरा लागि कऽ कानय लगलाह। तकरा बादसँ अरुणिक भाय-बहिन सभसँ झगड़ा होयब समाप्त भऽ गेलन्हि।
आरुणि अनेर गुनधुन करैत घरपर पहुँचलथि।
दू-तीन धरि दोसर किरायाक मकान ताकए लेल निकलल करथि आ साँझमे वैह गुनधुनी।
एक बेर घर आबि रहल छलाह स्कूलसँ।
घर अबैत काल मोन कोना दनि कऽ रहल छलन्हि। स्कूलसँ घर आबि रहल छलाह। रस्तामे सभ क्यो एक दोसरा सँ किछु असंभव घटित होएबाक गप कऽ रहल छलाह। आरुणि दुनू भाए सातम कक्षामे पढ़ैत रहथि, संगहि-संग। मुदा आइ पैघ भाएक पेटमे दर्द छलन्हि से ओ टिफीनक बाद छुट्टी लऽ घर चलि गेल छलाह। स्कूलमे सभकेँ हँसैत देखैत रहथि, तँ अपन घरक स्थिति मोन पड़ि जाइत छलन्हि। ईर्ष्य़ा सेहो होइत छलन्हि आन बच्चाक भाग्य पर। फेर मोनमे ईहो होइत छलन्हि जे हुनके सभ जेकाँ परिस्थिति होएतैक एकरो सभक। मुदा झुट्ठे प्रसन्नताक नाटक करैत जाइत अछि। घरमे माए-बापक कलहक बीच डरायल सन रहैत रहथि। लगैत रहैत छलन्हि जे ई सभ परिस्थिति कहियो खत्म नहि होएतैक। नहि तँ दोसरसँ गप्प कए सकैत छथि, नहिये ककरो अपन मोनक गप्पे कहि सकैत छथि। बेर-बखत कहियो अपन सहायताक हेतु सेहो सोर नहि कऽ सकैत छथि। माय ठीके घरघुसका, मुँहदुब्बर आदि विशेषणसँ विभूषित करैत छलखिन्ह। साँझमे घुमनाइ आकि दुर्गापूजाक मेला गेनाइ ई सभ बात हुनका सभक जीवनसँ दूर छलन्हि। एक बेर भूकम्प जेकाँ आयल छल, सभ क्यो ग्रील तोड़ि कय बहरायल, मुदा आरुणि खाट पर पड़ले रहि गेलाह। किछु तँ अकर्मण्यतावश आ किछु ई सोचि कय, जे की होयत घर टूटि देह पर खसत तँ, समस्यासँ मुक्तियो तँ भेटत। ओहि दिन स्कूलसँ घुरैत काल घरक लगमे पहुँचलाह तँ भीड़ देखि मोन हदसि गेलन्हि जे बाबूजीकेँ तँ किछु नहि भऽ गेलन्हि। घरमे पहुँचलाह तँ माँ-बहिनसँ पूछय लगलाह, जे की भेल? सभ बोल भरोस देबए लगलथिन्ह तँ आरो तामस उठए लागलन्हि।जोरसँ कानि कय बाजय लगलाह-
-बाबूजी मरि गेलाह की? कतए छन्हि हुनकर मृत शरीर।
ताहि पर बहिन कहलखिन्ह-
-नहि, हुनका किछु नहि भेलन्हि। अहाँक संगी जे मकान मालिकक बेटा अछि से ओ ओकर छोट भाए, ओकर पिता आ रिक्शाबला, चारू गोटे रिक्शापर जाइत छलाह। बेचारा रिक्शा बला विवाह कऽ कए कनियाँकेँ अननहिये छल। एकटा विशाल ट्रक रिक्शाकेँ धक्का मारि देलकैक। ठामहि मरि जाए गेलाह।
आरुणिक कानब खतम भए गेलन्हि। ई जे आफत आएल छलैक से आइ ककरो अनका घरमे । ओना ओ जे मृत भेल छल प्रतिदिन प्रातः आरुणिक संग डेढ़ सालसँ स्कूल जा रहल छल । सभ दिन प्रातः सीढ़ीपर ओ कॉलबेल बजबैत छलाह आ ओ सीढ़ीसँ उतरैत छल आ संगे सभ स्कूल जाइत छलाह। मोन पड़लन्हि जे काल्हि सेहो सभ दिन जेकाँ ओ कॉलबेल बजेने छलाह तँ ओकर बहिन जे चश्मा लगबैत छलि आ झनकाहि छलीह, से ऊपरसँ तमसाकेँ कहलकन्हि जे कतेक जोरसँ आ देरी धरि कॉलबेल बजबैत छी, आ सेहो जे बेर-बेर किएक बजबैत छी, आबि रहल अछि। काल्हि तँ ओ आएल मुदा आरुणि तखनहि कहि देलखिन्ह जे काल्हिसँ हम कॉलबेल नहि बजायब, अहाँकेँ हमरा संगे जयबाक होअए तँ नीचाँ उतरि कऽ आऊ आ संग चलू। ओ नहि आएल तँ आरुणि किएक कॉलबेल बजबितथि। डेढ़ सालमे पहिल बेर भेल छल जे आरुणि कॉलबेल नहि बजेने छलाह आ ओ डेढ़ सालमे पहिल बेर स्कूल नागा कएने छल। आब आरुणिक मोनमे होमए लगलन्हि जे कतहु ओ बाजि तँ नहि देने होएत जे आरुणि काल्हिसँ कॉलबेल नहि बजओताह। मुदा किंसाइत ओकर कोनो आनो कार्यक्रम होएतैक। किएक तँ छोट भाए आ पिताक संग रिक्शासँ कतहु जा रहल छल। अस्तु आरुणि चिंतित छलाह मुदा दुःखी नहि। मोनक गप कियो बुझए नहि तेँ मुँह लटकेने ठाढ़ रहथि। ओ तँ मात्र सोचने रहथि जे काल्हिसँ एकरा संगे स्कूल नहि जएताह, जएत ई असगरे। मुदा ओ तँ असगरे नहि जएत से सत्य कए देखा देलक। अरुणिक माएक आँखिमे नोर छलन्हि मुदा अरुणिक भीतर प्रसन्नता, किएक तँ हुनकर पिताजीक मृत्यु जे टरि गेल छलन्हि।
दोसर किरायाक घर तकलाक बाद दुनू भाँए सभटा समान नवका घरमे राखि माँकेँ गामसँ आनि लेलन्हि।
आरुणि अपन नोकरी पर चलि गेलाह।
“नहि एहन कोनो बात नहि अछि”, ई तँ हमर सभक कार्यक अंतर्गत करइए पड़ैत छैक”।
“मुदा अहाँकेँ ई नहि बुझि पड़ैत अछि जे एहि बेर किछु बेशी क्रूर भऽ गेलहुँ अहाँ सभ?”
“क्रूरताक तँ कोनो बात नहि अछि। हमरा सभ तँ कोनो विशेष सूचनाक आधार पर कार्य करैत छी”।
“मानि लिअ जे हमरा ककरोसँ दुश्मनी अछि आ ओहि आधार पर विभागकेँ ओ अपन व्यक्त्तिगत स्वार्थ आ झगड़ाक हेतु प्रयोग कए सकैत अछि”।
“अहाँकेँ ककरोपर शंका अछि?”
“नहि हम तँ उदाहरण दए रहल छलहुँ”।
“नहि हमरा सभ कोनो सूचनाक आधार पर सोझे बिदा नहि होइत छी। पहिने ओकर गंवेषणा करैत छी आ तकरे बाद एतेक ठाम सर्च करबाक अनुमति भेटैत अछि”।
“मुदा आब अहाँ ई कहियो देब जे अहाँक कोनो गलती नहि अछि तँ की हमर इज्जत लौटि कए अएत”।
“एना तँ हमरा सभकेँ हाथ-पर हाथ दए बैसि जाए पड़त। मुदा अहूँक गप ठीक अछि। अहाँक प्रति ज्योँ द्वेषवश क्यो कार्य कएने होएत तँ ओकरा पर कार्यवाही कएल जएत।”
“की कार्यवाही होएत। हमरा पर तँ कार्यवाही भऽ गेल। हमर सभटा बायर टूटि जएत। हम सभ एतेक पुरान छी, तीन पुस्तसँ एहि कार्यमे लागल छी। करबो करब तँ क्लेंडेस्टाइन रिमूवल करब ? सभ बायरपर तँ रेड भऽ गेल, किछु कतहु नहि भेटल से के पतियायत ?”
ओकर बातो ठीक छलैक। ई प्लाइवुडक व्यापारी एक नंबरक काजक हेतु जानल जाइत छल मुदा आरुणिकेँ जे सूचना प्राप्त भेल छलन्हि से ओकर विपरीत छल। मुदा ई रेड तँ खाली गेल। फैक्टरी, घर, डीलर सभ ठामसँ टीम खाली हाथ आएल। मुदा आब ऑफिसरकेँ की जवाब देताह। नामी कंपनी छल, अधिकारीगण डरा कऽ रेडक अनुमति आरुणिक व्यक्त्तिगत प्रतिष्ठाकेँ देखैत देने छलाह। हेडक्वार्टरसँ फोनपर फोन आरुणिकेँ आबि रहल छलन्हि, भोर तँ रेडमे भइये गेल छल, दस बजे ऑफिसमे रिपोर्ट देबाक हेतु कहल गेल छलन्हि। फैक्टरीक मालिक सेहो एम्हर-ओम्हरक बात लऽ कऽ दस बात सुना देलकन्हि। स्वर्णप्लाइ नाम्ना ई कंपनीक दिल्ली धरि पहुँचि छलैक। अकच्छ भऽ कऽ आरुणि भोरमे डेरा पहुँचि मोबाइल ऑफ कऽ कए ९ बजेक अलार्म लगा कऽ सुतबाक प्रयास करए लगलाह। काल्हि भोरेसँ रेड चलि रहल छल, ई कोना भेल, कोनो क्लेंडेस्टाइन रिमूवलक कच्चा पर्ची किएक नहि भेटल। केस लीक तँ नहि भऽ गेल। मुदा केसक विषयमे आरुणिकक अतिरिक्त्त डायरेक्टर विजीलेंसकेँ मात्र बुझल छलन्हि। ई सभ बिछौन पर सोचिते रहथि, तावत निन्द तँ नहि लगलन्हि मुदा ९ बजेक अलार्म बाजि उठल।
ऑफिसमे सभ क्यो जेना हिनके बाट ताकि रहल छलाह। कतेक गोटे ईहो सुना देलकन्हि, जे एहि केसक इंटेलिजेंस हुनको सभक लग छलन्हि मुदा एहि तरहक केसमे क्लेंडेसटाइन रिमूवलकेँ सिद्ध केनाइ मुश्किल होइत छैक, ताहि हेतु ओ लोकनि एहिमे हाथ नहि देलन्हि। कानाफूसी होमए लागल जे बड्ड हीरो बनैत छलाह आब ट्रांसफर ऑर्डर लऽ कए निकलताह डायरेक्टरक ऑफिससँ।
आरुणि डायरेक्टरक ऑफिसमे गेलाह आ सोझे किछु दिनक समय माँगि लेलन्हि। की प्लान छन्हि, एहि विषयमे गप-शप घुमा देलथि। एहि बेर कोनो प्रकारक कोनो भ्रम नहि राखए चाहैत छलाह।
आब आरुणि स्वर्ण प्लाइक फैक्टरीसँ आ ओकर डीलरसँ हटि कऽ कार्य करए लगलाह। सभटा दस्तावेजकेँ घोखि गेलाह। किछु जानकारी कागज पर सेहो लिखए लगलाह। फेर अपन प्लानक हिसाबसँ कलकत्तासँ पटना आ ओतएसँ अररियाक हेतु बिदा भऽ गेलाह।
पान तँ खाइत नहि रहथि आ चाह सेहो घरे टा मे पिबैत रहथि। मुदा लोकसँ किछु जनबाक हो तँ बिना चाह आ पानक दोकान गेने कोना काज चलत। से ओ चाह पान शुरू कएलन्हि। बाबुल दादाक गुलकन्द बला पान नीको बड्ड लागन्हि। तकरा बाद बाबुल दादा अररियाक लग पासक सभटा प्लाइवुडक फैक्टरीक लिस्ट दऽ देलकन्हि। मुदा फैक्ट्री सभक पहुँचबाक रोड सभक भगवाने मालिक रहथि। धूल-धक्करमे कहुना जा कए एकटा फैक्टरीक पता चललन्हि जे स्वर्णप्लाइकेँ सप्लाइ दैत छल, ओतुक्का दरबान आरुणिकेँ कहलकन्हि जे मालिक दोसर फैक्टरीमे बैसैत छथि, से दू टा फैक्ट्रीक पता चलि गेलन्हि आरुणिकेँ।
आरुणि थाकल-हारल ओहि फैक्टरीमे पहुँचलाह। एक गोट मारवाड़ी सज्जन बैसल रहथि।
“कतएसँ आएल छी”।
“आएल तँ पटनासँ छी मुदा घुरब कोना से नहि बुझि पड़ैत अछि”।
“हँ, एक गोट नेताक जेलसँ बाहर गोली मारि कए हत्या कऽ देल गेल अछि। नेताजी रहथि तँ जेलमे मुदा घुमए फिरए पूर्णियाँ जेलसँ बाहर बिना निअमक निकलल रहथि। जेलर की करताह। पिछला मास एक गोट कैदीकेँ पुरनका जेलर घुमए हेतु नहि देने छलथिन्ह तँ भट्टा बजारमे गोली मारि देलकन्हि। एहि बेर जे घुमए देलखिन्ह तँ सरकार सस्पेन्ड कऽ देलकन्हि नवका जेलरकेँ। ताहि हत्याक बाद बन्दक आह्वान अछि। हमरा संगे रहू। एतए हमहू अपन गेस्ट हाउसमे रहैत छी। परिवार सिलीगुड़ीमे रहैत अछि। विवाह नहि भेल अछि। भोरमे हमरा कलकत्ता जएबाक अछि। पहिने सिलिगुड़ी अपन गाड़ीसँ जाएब तँ रूट बदलि कऽ पूर्णियाँ बस स्टैण्डमे अहाँकेँ छोड़ैत जाएब”।
युवा बजक्कर रहथि से आरुणिकेँ नीक लगलन्हि। रातिमे गेस्ट हाउसमे बहुत गप्प भेलन्हि। नेताक रंगदारीक, चन्दा बला सभ जबर्दस्ती रसीद काटि जाइत छलन्हि।
“एनामे तँ बिना क्लेनडेस्टाइन कएने घाटा भऽ जएत, हँ मजबूरी छैक। आ तकर दोषी तँ ई नेता सभ छथि। व्यापारी की करओ”।
आब मारवाड़ी युवा जकर नाम नवल छल कनेक कनछिया कऽ आरुणि दिशि देखलक। आरुणिकेँ भेलन्हि जे ओकरा कोनो शंका तँ नहि भेलैक।
“नहि क्लेंडेस्टाइन नहि करबाक तँ सिद्धांत अछि हमरा सभक। हँ किछु एडजेस्टमेंट करए पड़ैत अछि”।
आरुणिकेँ मोन पडलन्हि जे कोना स्वर्ण प्लाइक मालिको बजैत-बजैत बाजि देने छल जे करबो करब तँ क्लेनडेस्टाइन रिमूवल करब।
तखन करैत की जाइत अछि ई सभ। ओना अररियाक ई फैक्टरी स्वर्ण प्लाइक हेतु जॉब वर्क करैत छल, आ ताहि हेतु सरकारी ड्यूटीक सभ भार स्वर्ण प्लाइ पर रहैक। ई क्लेनडेस्टाइन करियो कऽ की करत। टैक्स तँ दोसराकेँ देबाक छैक।
तखने एकटा फोन अएलैक। रिंग नमगर रहैक से आरुणिकेँ बुझबामे भांगठ नहि भेलन्हि जे ई बाहरक एस.टी.डी.कॉल अछि। ओहि कॉलक बाद एकाएक ओ युवा आरुणि दिशि ताकि कए चुप्पी लगा गेल।
भनसिया जकरा नवलजी झा कहि संबोधित कऽ रहल छलाह, खेनाइ बनि जेबाक सूचना देलकन्हि। आरुणि आ नवलक बीच मात्र औपचारिक गप भेल। फेर दुनू गोटे सूति गेलाह। भोरमे अपन वचनक अनुसार ओ युवा आरुणिकेँ पूर्णियाँ बस स्टैण्ड छोड़ि देलकन्हि। उतरबासँ पहिने आरुणि नवलसँ पुछलन्हि।
“कलकत्तामे स्वर्ण प्लाइक ऑफिस छैक। ओतहि जा रहल छी की ?”
ओ युवा हँसल।
“अहाँ विजिलेंससँ छी। हमरा काल्हि जे एस.टी.डी. आएल छल से स्वर्ण-प्लाइक कलकत्ता ऑफिससँ आएल छल। अहाँक विभागेक क्यो गोटे हुनका सभकेँ अहाँक अररिया यात्राक विषयमे सूचना देलखिन्ह। देखू हम कहने छी जे हम मात्र एडजेस्टमेंट करैत छी। आ ताहिसँ हमरा कोन फाएदा होइत अछि? टैक्स तँ हमरा लगैत नहि अछि। हँ, ताहिसँ हमरा काज भेटैत अछि। आ बाहरी छोट-मोट खर्चा, विभागक, पुलिसक, नेताक निकलि जाइत अछि। तखन बेश”।
ई कहि ओ सज्जन आरुणिकेँ हतप्रभ करैत चलि गेलाह।
आब कलकत्ता पहुँचि कए आरुणि जखन ऑफिस पहुँचलाह तँ सभकेँ बुझल रहैक जे आरुणि ताहि फैक्ट्रीक विजिट सरकारी खर्चा पर कएलन्हि अछि जकरा पर सरकार टैक्सक माफी देने छैक।
डायरेक्टरसँ भेँट कएलाक बाद आरुणि पहुँचि गेलाह पटना आ फेरसँ कलकत्ता। पुलिस थानामे घुमैत रहलाह आ पता करैत रहलाह जे स्वर्ण-प्लाइ आकि ओकर कोनो कर्मचारीक विरुद्ध कोनो केस छैक तँ नहि। मुदा ओतए तँ स्वर्ण प्लाइ बड्ड नीक छवि शुरुएसँ बनेने छल। आब आरुणि सोचमे पड़ि गेलाह। इनपुट-आउटपुट केर अनुपातसँ ई कंपनी करोड़ो रुपयाक टैक्सक चोरि कए रहल अछि। मुदा प्रमाण कोनो नहि।
आरुणि थाना सभमे अपन पता आ फोन नंबर छोड़ि देलन्हि जे ज्योँ कोनो केस एहि कंपनी किंवा एकर कर्मचारीक संबंधमे होअए तँ तकर सूचना हुनका देल जाइन्ह।अपन डायरेक्टरसँ कहलखिन्ह जे क्लोजर रिपोर्ट अखन नहि देब। देखैत छी किछु जानकारी कतहुसँ भेटैत अछि आकि नहि।
छह मासक बाद।
भोरमे रिंग भेल।
“हम कलकत्ता, साल्ट लेक थानासँ बाजि रहल छी। एक गोटे एकटा कमप्लेन लिखेने छथि जे स्वर्ण-प्लाइ ऑफिससँ पेमेन्ट लऽ कऽ घुरैत काल हुनकर सूटकेस ऑटो बला छीनि लेलकन्हि जाहिमे किछु कैश आ चेक छलन्हि”।
“कतेक कैस आ कतेक चेक”।
“१.७९ लाख कैस आ १.८३ लाखक चेक, प्रायः कैसक कोनो इनस्योरेंस रहन्हि, ताहि द्वारे एफ.आइ.आर. करओलन्हि अछि। चेकक तँ पेमेंट स्टॉप भऽ जएत”।
आरुणि टीमक संग ओहि गोटेक घर पर छापा मारलन्हि जकर पाइ आ कैस ऑटो बला छीनि लेने छल।
छापाक बीचमे आरुणिकेँ एकटा डायरी भेटलन्हि। तकरा बाद पटना फोन कऽ अररियाक फैक्टरीसँ नवीनतम रिमूवलक रिटर्न मँगा लेलथि। फेर ओ सज्जन जिनका घरपर छापा पड़ल छल, केँ ऑफिस अनलन्हि। रस्तामे पता चलल जे ओ सज्जन नवलक बहनोइ छलाह आ अररियाक फैक्टरीक एकाउन्टेन्ट होएबाक संगहि स्वर्ण-प्लाइमे लाइजन अधिकारी सेहो छलाह।
आब सभ तथ्य सोँझा छल। जे डायरी भेटल छल ताहिमे कैस आ चेकक कॉलम बनल छल। तिथि सहित विवरण छल। चेकक भुगतानक कॉलम अररिया फैक्टरीक क्लियरेंससँ मिलि गेल छल आ ईहो सिद्ध भऽ गेल जे सभ ट्रांजेक्सनमे लगभग अदहाक पेमेंट स्वर्ण-प्लाइ द्वारा कैसमे देल जाइत छल। आ तकर विवरण नहि तँ स्वर्ण-प्लाइक खातामे रहैत छल आ नहिये अररियाक फैक्टरीमे। स्वर्णप्लाइ टैक्स सेहो मात्र चेक (पकिया) द्वारा गेल अदहा रिमूवलक पेमेंट पर दैत छल। आरुणि ई रिपोर्ट डायरेक्टर केँ दऽ देलन्हि।
एकाउन्टेन्टक अपराध बेलेबल छलैक। कोर्ट ओकरा बेलपर छोड़ि देलकैक।
“नवलक समाचार कहू। बड्ड नीक लोक अछि। मुदा किछु बतेलक नहि”।
“ओकर काल्हि अररियासँ सिल्लीगुड़ी जाइत काल सड़क दुर्घटनामे मृत्यु भऽ गेलैक किंवा करा देल गेलैक। जमाय बाबूक संग एतएसँ सोझे हमरा सभ ओतहि जाएब”। एक गोट उत्तेजित स्वर बला व्यक्ति जे एकाउन्टेन्ट बाबूकेँ लेबाक हेतु आएल छल बाजि उठल ।
“मुदा ई बूझि लिअ जे अहाँक ई सफलता हमर बुरबकीसँ भेटल अछि। ज्योँ हम कैसक इनस्योरेंस क्लेमक लालचमे नहि पड़ितहुँ तँ ई सभ नहि होइत”- जमाय बाबू बाजि उठलाह।
डायरेक्टर स्वर्णप्लाइक विरुद्ध कार्यवाहीक लेल ऑर्डर देलन्हि। स्वर्ण प्लाइक विरुद्ध करोड़ोक रुपैयाक टैक्स घोटालाक शो-कॉज नोटिस सेहो पठा देल गेल। आरुणि चिंतामग्न छलाह।
“ठीके तँ कहलक नवल। एडजेस्टमेंटे तँ कऽ रहल छल। चोरि तँ क्यो आन कऽ रहल छल। ओ तँ मात्र माध्यम छल। हमहू तँ कतहु नहि बनि गेल छी माध्यम, नवलक मृत्युक ?”
आरुणिक व्यवसायिक सफलताक बाद नोकरी मध्य सेहो सफलताक शुरुआत भऽ गेल। माध्यम बनथि वा नहि मुदा पिता जेकाँ हारताह नहि। मोन पड़ैत रहन्हि हुनका सभटा गप बीच-बीचमे ।
“कहलहुँ सुनैत छियैक। बेटी पैघ भऽ रहल अछि। बेटा सभक लेल किछु नहि कएलहुँ। अपन घरो नहि बनल। रिटायर भेलाक बाद कतए रहब ?”
“बेटीक चिन्ता नहि करू। बेटा बला अपने चलि कए अएत। हमरा सभकेँ जतेक सुविधा भेटल छल, ताहिसँ बेशी सुविधा हिनका सभकेँ भेटि रहल छन्हि। तखन पढ़्थु वा नहि से ई सभ जानथि। रिटायरमेन्टक बाद गाम जा कए रहब। सात जन्म शहर दिशि घुमि कए नहि आएब”।
“क्यो सर-कुटुम अबैत छथि तँ हुनका सत्कार करबा लेल घरमे इंतजामो नहि रहैत अछि”।
“इंतजाम करबाक की जरूरति अछि। एक पैली बेशी लगा दियौक अदहनमे”।
आरुणि माए-बापक एहि तरहक वार्त्तालाप सुनि पैघ भेलथि। एक बेर हॉस्पीटलमे पिताजीकेँ देखए लेल एक गोट कुटुम्ब आएल रहथि। हुनकर गप सेहो किछु एहने बुझा पड़लन्हि।
“की कऽ लेलहुँ शरीरकेँ। ई बच्चा सभकेँ देखि कए मोहो नहि भेल। कतए पढ़ैत जाइत ई सभ। आ कोनो टा सुविधा, नहिये कोनो टा चिन्ते छल अहाँकेँ। अपनो आ एकरो सभक जिनगी बर्बाद कएलहुँ।”
तखने व्यवधान भेल। पत्नी कहलखिन्ह जे एकटा फोन होल्ड अछि-
“आरुणि। एकटा पैघ राजनीति चलि रहल अछि ऑफिसमे। अहाँक विरुद्ध षड्यंत्र चलि रहल अछि। अहाँकेँ चेतेनाइ हमर काज छल। मुदा अहाँ तँ कोनो तरहक प्रतिक्रिया दैते नहि छी”- फोन पर हुनकर वैह एकमात्र संगी रामभक्त-हनुमानक अबाज सुनि रहल छलाह आरुणि।
“आरुणि। की भऽ गेल। बाबूजी जेकाँ डराएल रहब। किछु दिनुका बाद हारि मानि ऋषि भऽ जाएब। आकि दुष्टक संहार करब। एहि दुनूमे की चुनब अहाँ”।
“चिन्ता नहि करू”- हँसैत बजलाह आरुणि फोन पर आ फोन राखि देलन्हि।
ऑफिसक एकटा लॉबी आरुणिक पाछाँ पड़ि गेल छल। ट्रांसफर-पोस्टिंग केर बाद आरुणिक ऊपर दवाब आबि गेल छल। किछु गोटे हुनकर विरुद्ध बिना-कोनो आधारक किछु कम्प्लेन कए देने छलन्हि। एकटा ऑफिसर शशांक केर हाथ छलैक एहिमे। ओकर खास-खास आदमीक पोस्टिंग मोन-मुताबिक नहि भेल रहए आ ओ प्रोमोशनमे आरुणिकेँ पाछाँ करए चाहैत छल। एहि बीचमे आरुणिक फोन किछु दिन डेड छलन्हि। तकरा बाद हुनकर फोनसँ अबुधाबी आ दुबइ फोन कएल गेल छल। मुदा ओहि समयमे सरकारी फोनमे आइ.एस.डी. केर सुविधाक हेतु टेलीफोन विभागकेँ सूचित करए पड़ैत छल। हुनकर ऑफिसक एकटा प्रशासनिक अधिकारी टेलीफोन विभागकेँ चिट्ठी लिखि कए ई सुविधा आरुणिक जानकारीक बिना करबाए देने छल। विजीलेंसक जाँचमे ओ बयान देने छल जे आरुणि एहि ऑफिसक मुख्य छथि आ हुनकर मौखिक आदेशोक पालन करए पड़ैत छन्हि हुनका। से आइ.एस.डी. केर सुविधाक लेल टेलीफोन विभागकेँ ओ आरुणिक मौखिक आदेश पर चिट्ठी लिखने छलाह। माफिया ओकरा तोड़ि लेने छल आ ओहिमे ओ प्रशासनिक अधिकारी अपनाकेँ सेहो फँसा लेने छल।
सोम दिन फैक्स आएल आ आरुणिक ट्रांसफर भऽ गेल।
“रिप्रेजेंट करू एहि आदेशक विरुद्ध”- वैह चिरपरिचित स्वर, मणीन्द्रक।
“अहूँ कोन झमेलामे पड़ल छी। सभ ठीक भऽ जएत”- बजलाह आरुणि फोन पर।
शशांकक घरपर पार्टी भेल।
“मिस्टर आरुणि रिप्रेसेन्ट तक नहि कएलन्हि। रिलीव भऽ कए चलि गेलाह। बुझू सरेन्डर कए देलन्हि अपनाकेँ ”।
“प्रोमोशन बुझू जे दस साल धरि रुकल रहतन्हि। सीनियरिटी मारल जएतन्हि। बदनामी भेलन्हि से अलग। सुनैत छी जे फोनपर दुबइक स्मगलर सभसँ गप करैत छलाह”।
ओम्हर आरुणिकेँ अपन बाबूजीक ट्रांसफर, ईमानदारीक लेल कएल संघर्ष, संघर्षक विफलता आ तकर बाद हुनकर तंत्र-विद्या आ पूजा-पाठक दिशि अपनाकेँ ओझराएब आ घर-द्वार, ऑफिस आ सांसारिकतासँ विरक्त्ति मोन पड़ि गेलन्हि। एहि सभ घटनाक्रमक बाद हुनकर मुँहपर एकटा चिन्ताक रेखा आएल छलन्हि। मुदा से बेशी दिन धरि नहि रहलन्हि आरुणिक मोन पर। हारिकेँ जीतमे कतोक बेर बदलने छलाह ओ। नोकरीयोमे आ ओहिसँ पहिने व्यवसायमे सेहो।
“की यौ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि। हमर ट्रांसफर भऽ गेल तँ अहाँ सभ तँ बिसरिये गेलहुँ”।
“हम की, सभ क्यो बिसरि गेल अहाँकेँ एतए”।
“अहाँ की बुझलहुँ। जे हम सेहो बिसरि गेल छी। अहाँकेँ मोन अछि। हम जखन इंटरक बाद बाबूजीक इच्छाक विरुद्ध विज्ञान छोड़ि कए कला विषय लेने छलहुँ। विज्ञानक सभटा किताब ११ बजे रातिमे पोखरिमे फेंकि देने छलियैक। कोनोटा अवशेषो नहि छोड़ने छलहुँ ओहि विषयक अपन घरमे। आ जखन कला विषयमे प्रथम श्रेणी आएल छल तखन गेल छलहुँ गाम। तकरा पहिने कतेक बरियाती छोड़ने छलहुँ, कतेक जन्म-मृत्यु। मुदा गाम नहि गेल छलहुँ”।
“एह भाई। अहाँकेँ तँ सभटा मोन अछि। हमरा तँ भेल जे अहूँ काका जेकाँ भऽ गेलहुँ। ई सभ क्षमाक योग्य नहि अछि। कनेक देखा दियौक। आब हमरा विश्वास भऽ गेल जे किछु होएत”।
“फेर वैह गप। जखन अहाँ नहि बदललहुँ तखन हम कोना बदलब। छोड़ने छलहुँ किछु दिन अपनाकेँ। आब सुनू। जे कहैत छी से टा करू। बेशी बाजब जुनि। जाहि समयक कॉल हमर टेलीफोनसँ बाहरी देश कएल गेल छल ओहि समयमे तँ हमर टेलीफोन खराब छल, ई तँ अहाँकेँ बुझले अछि। घरसँ टेलीफोन विभागकेँ कम्प्लेन सेहो लिखबाओल गेल छल। मुदा से टेलीफोने पर लिखबाओल गेल छल। कोनो लिखित पत्र आ ओकर प्राप्ति रशीद तँ अछि नहि। मुदा ई पता करू जे एहि तरहक कम्प्लेनक कोनो रेकार्ड टेलीफोन विभागक लग रहैत छैक आकि नहि”।
किछु दिनुका बाद मणीन्द्रक फोन आएल जे फोन विभाग एक महीनाक बाद कम्प्लेन नंबर फेरसँ शुरुसँ देब शुरू कए दैत छैक। से ई काज नहि भेल।
“बेश तखन ई पता करू जे हमर नंबरसँ ककरा-ककरा कोन-कोन नंबर पर विदेश फोन कएल गेल छल। आ ओहि विदेशीक फोन कोन-कोन नंबर पर आएल अछि”।
“हँ। एहि गपक तँ हमरा सुरते नहि रहल”।
आब मणीन्द्र जे टेलीफोन नंबरक सूची अनलन्हि, से सभटा टेलीफोन बूथ सभक छल। मुदा कोनो टा कॉल आरुणिक नंबर पर नहि आएल छल।
विजीलेंसक सुनबाहीमे ई सभ वर्णन जखन आरुणि कएलन्हि तखन शशांक हतप्रभ रहि गेल। ई तँ नीक भेल जे शशांकक आदमी सभ बूथ बलासँ संपर्क रखने छल, नहि तँ ओहो सभ फँसैत आ संगहि शशांकोक नाम अबैत एहि सभमे। अस्तु आरुणि जाँचसँ बाहर निकलि गेलाह।
“भाइ। हम मणीन्द्र। ओकरा सभकेँ तँ किछु नहि भेलैक।“
“हमर ट्रांसफर दिल्ली भेल अछि। देखैत छी। अहाँ निश्चिंत रहू”।
“हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भऽ गेलहुँ जहिया अहाँ पुरनका गप सभ सुनेलहुँ। काकाक अपमानक बदला अहाँकेँ लेबाक अछि। मात्र व्यक्त्ति सभ बदलल अछि। चरित्र सभ वैह अछि”।
दिल्लीमे आरुणि विजीलेंस विभागक सूचना-प्रौद्योगिकी शाखामे पदस्थापित भेलाह। एहि विभागकेँ शंटिंग पोस्टिंग मानल जाइत छल। विजीलेंसक एनक्वायरीसँ बाहर निकललाक बादो आरुणि एहि पोस्टिंगके चुनलन्हि से एहिसँ तँ ईएह सिद्ध होइत अछि जे आरुणि थाकि गेलाह। पाँच साल कोनमे बैसल रहताह। शशांकक ग्रुप प्रफुल्ल छल।
एम्हर आरुणि अपन विज्ञानक छोड़ल पाठ फेरसँ शुरू कएलन्हि। भरि दिन कम्प्युटर आ ओकर तकनीकी विशेषज्ञ सभसँ भिड़ल रहथि। ओहो लोकनि बहुत दिनक बाद एहन अधिकारी देखने छलाह जे भिड़ल अछि, काजसँ। दोसर लोकनि तँ कोहुना टर्म पूर्ण कए भागैत छथि।
ओना देखल जाए तँ ई विभाग बड्ड संवेदनशील छल। आब आरुणिक अपन विभागक सभ कर्मचारीसँ बेश निकटता भऽ गेल छलन्हि। सभक आवेदन समयसँ आगू बढ़ैत छल। सभटा ऑफिसक इक्विपमेंट नव आबए लागल। पहिलुका ऑफिसर सभ तँ समय काटि भागए केर फेरमे रहैत छल आ ऑफिसक आवश्यक आवश्यकता सेहो पूर्ण नहि करैत जाइ छल।
ऑफिसमे एकटा इक्विपमेन्ट आएल छल, करप्शन रोकए लेल। एहिमे स्मगलर सभक फोन टेप करबाक सुविधा छल।
किछु दिन समय व्यतीत होइत रहल।
“मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”।
“हम तँ आब निश्चिन्त छी भाइ”।
“हँ समय आबि गेल अछि। एकटा काज करू, स्मग्लरक संग शशांकक संबंधक संबंधमे एकटा न्यूज निकलबा दियौक अखबारमे। आगाँ सभ चीज तैयार अछि”।
ओम्हर अखबारमे खबरि निकलल आ मंत्रीक जन संपर्क पदाधिकारी जकर काज विभागक खबरिकेँ अखबारसँ काटि कए मंत्री धरि पहुँचायब छल ओहि क्लिपिंगकेँ मंत्रीजी लग पहुँचाए देलन्हि। समय समीचीन छल कारण विभागीय मंत्रीजीपर ढेर आरोप ओहि समय आएल छलन्हि, संसदक सत्र चलि रहल छल से ओ कोनो तरहक रिस्क नहि लेलन्हि। इंक्वायरीक ऑर्डर दए देलन्हि।
विजिलेंस विभागमे केश आएल। ओकर आंतरिक बैठकी होइत छल जाहिमे सूचना-प्रौद्योगिकी विभागकेँ सेहो बजाओल जाइत छल। सभ केशमे मोटा-मोटी प्रौद्योगिकी विभाग अनाधिकार प्रमाण पत्र दए दैत छल। आ केश इंक्वायरीक बाद समाप्त भऽ जाइत छल।
मीटिंगक तिथि तय भेल। मीटिंगमे आरुणि विजिलेंस कमेटीक सदस्यक रूपमे शामिल भेलाह।
“शशांक पर कोनो तरहक कोनो आरोप सिद्ध नहि होइत छन्हि। आरुणि अहाँक विभागकेँ टेलीफोन टैपिंगक उपकरण उपलब्ध करबाओल गेल छल। मुदा अपन ऑफिसमे तँ फैक्स मशीनो ६ मास किनाकए राखल रहलाक बाद लगाओल जाइत अछि, तखन ई मशीन एखनो राखले होएत आकि किछु कंवर्शेशन रेकार्डो भेल अछि”।
“श्रीमान। ई मशीन एहि मासक पहिल तिथिकेँ आएल आ ओहि तिथिसँ एकर उपयोग शुरू भऽ गेल। एहि केशमे जाहि स्मगलरक नाम आएल अछि ओकर नाम ओहि सूचीमे अछि जकर कॉल रेकॉर्ड करबाक आदेश हमरा भेटल छल। शशांकक कंवर्शेशन एहि व्यक्त्तिसँ नहि केर बराबर अछि। आध-आध मिनटक दू टा कंवर्शेशन। दोसर कंवर्शेशन नौ बजे रातिक छी आ एहि कंवर्शेशनक बाद ओहि स्मगलरक फोन अपन कर्मचारीकेँ जाइत छैक आ ताहूमे मात्र आध मिनट ओ लगबैत अछि”।
“ई कोन तारीखक अछि”।
“पाँच तारीखक”।
“छह तारीखक भोरमे एहि स्मगलरक ओहिठाम रेड भेल छल आ किछु नहि भेटल छल। ई सभ फोनक डिटेल दिअ आरुणि”।
“पहिल कॉलमे शशांक कहैत छथि जे साढ़े आठ बजे घर पर आबि कए भेंट करू। बड्ड जरूरी गप अछि। ओ नौ बजे दोसर कंवर्शेशनमे तमसाइत कहैत छथि जे नौ बाजि गेल आ अहाँ एखन धरि नहि अएलहुँ। एहिमे उत्तर सेहो भेटैत अछि जे ओ स्मगलर शशांकक गेट पर ठाढ़ अछि”।
“तेसर फोनमे की वार्त्तालाप अछि”।
“तेसर फोन ओ स्मगलर अपन ऑफिस स्टाफकेँ साढ़े नौ बजे करैत अछि। ओ कर्मचारीकेँ आदेश दैत अछि जे तुरत ऑफिस आऊ, हमहुँ पहुँचैत छी। बस एकर अतिरिक्त किछु नहि। कोनो एवीडेंस नहि भेटि सकल एहि केसमे। कहू तँ हम नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दए दिअ”।
“आरुणि। की कहैत छी अहाँ। अहाँक विभाग तँ आइ धरि कोनो काज नहि कएने छल मुदा आइ तँ सभटा कड़ी जोड़ि देलहुँ अहाँ। शशांक फोन कएलक जे भेंट करू। दोसर फोन पर ओ व्यक्त्ति ओकर गेट पर ठाढ़ छल। तेसर फोनमे ओकर कर्मचारी ऑफिस ओतेक रातिमे की करए जाइत अछि। रेडक खबरि शशांक लीक कएलन्हि। ओ कर्मचारी सभटा कागज हटा देलक आ हमर विभागक ऑफिसर भोरमे छुच्छ हाथ घुरि कए आबि गेलाह। आब एकटा फोन आर करू। शशांकक नंबर टेप तँ नहि भऽ सकल छल मुदा प्रक्रियाक अनुसार ओकर आवाजक सैंपल मैच करबाक चाही। ओ फोन उठायत तँ गलत नंबर कहि काटि दियौक”।
“सैह होएत”।
तखने ई प्रक्रिया कएल गेल।
“ई तँ ओपन आ शट केस अछि”- विजीलेंस कमेटीक अध्यक्ष महानिदेशककेँ बतओलन्हि। महानिदेशक शशांककेँ बजबओलन्हि आ ओकरा दू टा विकल्प देलन्हि।
“शशांक, एहि सभ घटनाक बाद अहाँ लग दू टा विकल्प अछि। विभागसँ कंपलसरी सेवा निवृत्ति लेबए पडत अहाँकेँ। नहि तँ इंक्वायरी आगाँ बढ़त”।
शशांक कंपलसरी सेवानिवृत्ति लए लेलन्हि। विभाग छोड़ि कए चलि गेलाह।
“भाइ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”।
“भजार। हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भऽ गेल छलहुँ जाहि दिन हमरा बुझबामे आओल जे अहाँकेँ बच्चाबला सभटा गप मोन अछि। काका आ अहाँमे कोनो अंतर नहि। मार्ग मात्र दू तरहक रहल। एहि विजयक मार्ग पर अहाँ चली ताहि हेतु कतेक कहैत छलहुँ अहाँकेँ, से मोन अछि ने। मुदा ओहि दिन जखन हमरा अहाँ बच्चाक गप सभ कहए लगलहुँ तहिये निश्चिन्त भऽ गेल छलहुँ हम”।
आरुणिक पढ़ाइक ग्राफ पिताक मोनक संग बनैत-बिगड़ैत रहैत छलन्हि। मुदा घुरि कए पुनः लक्ष्य प्राप्त करैत छलाह। नोकरीमे रहितहु ई घटना एक बेर फेर भेल छल।
आ फेर एकटा सरकारी यात्राक बाद आरुणिक भेल एक्सीडेन्ट । १५ दिन धरि वेंटीलेटर पर फेर एक साल धरि बैशाखी पर रहलाक बाद पुनः अपन पैर पर ठाढ़ भऽ गेलाह आरुणि । ओ बच्चा जे डायरी लिखैत छल कतए होएत । ओ काल्पनिक कथाकार सभटा सत्ते लिखने छल, आरुणिक भविष्यक वक्तव्य कऽ रहल छल ओ । आरुणिक डायरीमे सेहो यैह अंकित भेल-
“अप्पन माने हमर –-आरुणिक- विषयमे गप्प करबा लेल हमरा लगमे समयक अभाब रहय लागल । किछु तँ एकर कारण रहल हम्मर अप्पन आदति आ किछु एकर कारण रहल ह्म्मर एक्सीडेंट, जकर कारणवस हम्मर जीवनक डेढ साल बुझा पड़ल जेना डेढ़ दिन जेकाँ बीति गेल । किछु एहि बातक दिस सेहो हमर ध्यान गेल जे डेढ सालमे जतेक समयक नुकसान भेल तकर क्षतिपूर्ति कोना कए होएत । तखन सामजिक संबंधकेँ सीमित करबाक विचार आएल । एहिमे हमरा बिन प्रयासक सफलता भेटि गेल छल । एकर कारण छल हमर नहि खतम प्रतीत होमएबला बीमारी । एहिमे विभिन्न डॉक्टरक ओपिनियन, किछु गलत ऑपरेशन आ एकर सम्मिलित इम्प्रेसन ई, जे आब हमरा अपाहिजक जीवन जीबए पड़त । आनक बात तँ छोडू हमरा अपनो मोनमे ई बात आबए लागल छल । लगैत छल जे डॉक्टर सभ फूसियाहिँक आश्वासन दए रहल अछि । एहि क्रममे फोनसँ लऽ कए हाल समाचार पुछनिहार धरिक संख्या सेहो घटि गेल छल । से जखन अनचोक्के बैशाखी, फेर छड़ीपर अएलाक बाद हम कार चलाबए लगलहुँ तँ बहुत गोटेकेँ फेर सँ हमरा संग सामान्य संबंध बनाबएमे असुविधा होमए लगलन्हि। जे हमरासँ दूर नहि गेल रहथि तनिकासँ तँ हम जबर्दस्तीयो संबंध रखलहुँ मुदा दोसर दिशि गेल लोकसँ हमर व्यवहार निरपेक्ष रहैत छल, से पुनःसंबंध बनेबासँ लोक हतोत्साहित रहए लगलाह । दुर्दिनमे जे हमरापर हँसथि तनिकर प्रति ई व्यवहार सहानभूतिप्रदहि मानल जएत । एहिसँ समयधरि खूब बचए लागल। शुरुमे तँ लागल जेना ऑफिसमे क्यो चिन्हत आकि नहि । मुदा जखन हम ऑफिस पहुँचलहुँ तँ लागल जेना हीरो जेकाँ स्वागत भेल होअए । मुदा एहिमे ई बात संगी-साथी सभ नुका लेलक जे हमर छड़ी सँ चलनाइ हुनका सभक भीतर हाहाकार मचा रहल छलन्हि । सभ मात्र हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहैत छलाह । जखन हम छड़ी छोड़ि कए चलए लगलहुँ तखन एक गोटे संगी कहलक जे आब अहाँ पुरनका रूपमे घुरि रहल छी । एहि बातकेँ हम घरपर आबि कऽ सोचए लगलहुँ । अपन चलए केर फोटोकेँ पत्नीक मदति सँ हैण्डीकैम द्वारा वीयोडीग्राफी करबएलहुँ । एकबेर तँ सन्न रहि गेलहुँ । चलबाक तरीका आबो नेँगड़ा कए दौगब सन लागल छल । पहिने तँ आर बेशी होएत मुदा संगी सभ एको रत्ती पता धरि नहि चलए देलक । बादमे घरक लोक कहलक जे ई तँ बड्ड कम अछि, पहिने तँ आर बेसी छल । तखन हमरा बुझबामे आएल जे संगीसभ आ ओ सभ जे हमरासँ लगाव अनुभव करैत छलाह, तनिका कतेक खराब लगैत होएतन्हि । तकरा बाद हमरा हुनकर सभक प्रोत्साहन आ हमर हिम्मतिक प्रशंसा करैत रहबाक रहस्यक पता चलल । अपन प्रारम्भिक जीवनक एकाकीपन आ नौकरी-चाकरी पकड़लाक बाद सार्वजनिक जीवनमे अलग-थलग पड़ि जएबाक संदेह, आशा, अपेक्षा किंवा अनुभवक बाद जे एहि तरहक अनुभव भेल से हमर व्यक्तित्वक भिन्न विकासकेँ आर दृढ़ता प्रदान केलक”।
कैकटा ऑपेरेशन भेलन्हि आ अनेस्थिशियासँ बाहर अबैत काल आरुणिकेँ लागन्हि जे ओ झोँटा बला सहस्रबाढ़नि झमारि कए एहि विश्वमे फेंकि दैत छन्हि हुनका ।मृत्यु पर विजय कएलन्हि आरुणि। मुदा डेढ़ बरख बाद जखन ऑफिस अएलाह तखन लोककेँ विश्वासे नहि भेलैक। मुख पर वैह चिरपरिचित हँसी। लोक सभ तँ ईहो कहैत छल जे ई एक्सीडेंट भेल नहि छल वरन् करबाओल गेल छल। कारण नवलक एक्सीडेंट जेकाँ छल ई एक्सीडेंट।
महाकाव्य-त्वञ्चाहञ्च - गजेन्द्र ठाकुर
ई भारत ग्रंथ जयक जाहिमे गान
तखन कहियासँ भेलाह एतुक्का लोक, कर्महीन, संकीर्ण, कोना हारैत गेलाह सैन्यबलसँ आ दर्शनहुसँ, के घोसियाबैत गेल असमानताक पाठ एकर बिच।
के केलन्हि शुरू ई त्वञ्चाहञ्च।
गांधर्व, एकलव्यक वीरतासँ भरल, घृणा-प्रेम, सत्य-असत्यक धरातल,
आह पाराशर पुत्र भगवान व्यास, नमन-नमन शत नमन।
प्रसन्नवदनकेँ लिखबाक कहि बात, वाणी नहि रुकत अहाँक गणेशक शर्त, कविक कल्पनाक ई उत्कर्ष, मुदा बनाओल किएक अहाँ होअए जेना धर्मग्रंथ।
व्यास लेखक होइतहुँ छथि एहिमे एकटा पात्र, केहन नव रस, नव छल वाद !
गणेशक गति अति तीव्र, देखि व्यास कएल श्लोक जटिल। श्लोकक भाष्य बूझि शीघ्र, विघ्नकर्ता लिखताह ई।
श्लोकक जटिलताक लेल ई तर्क !
पुत्र शुकदेव नारदमुनि देवगण गंधर्व राक्षस यक्ष
व्यास शिष्य वैशंपायन आ परीक्षित पुत्र जनमेजयक निस्तार।
पौराणिक सूतजी रहथि, तत मध्य। करि ऋषिसभा नैमिषारण्यमे,महर्षि शौनक अध्यक्ष।
सूतजी कएल शुरु,संहिता सतसहस्त्र।
आइ ई मन कहए अछि, ई सत्य देखी, कविक कल्पना मध्य छल की सीखि परखी। अर्थ केर अनर्थ क्षेपक सभ केलक जे, हर्ष आ श्रमसँ कनेक देखाबी देखी ।
हस्तिनापुर सम्राट शांतुनु, गंग तट भ्रमण करि रहल। युवती बनि देवि गंगा,तट जकर छलि ठाढ़ निश्चल !
तेँ पड़ल होअए नाम हुनकर,
धार गंगाजीक नामपर भए अभिभूत कहल हे सुन्दरि,
करु प्रेम स्वीकार हमर। पत्नी बनि करु राज,
राज्य-धन-प्राण पर।
अछि समर्पण सभ अहाँ पर,
किंतु अछि किछु बंधन हमर। क्यो पूछय नहि परिचय हमर,
नहि करय रोक-टोक हमर कार्य पर।
प्रेम-विह्वल शांतुनु,
करि स्वीकार बंधन सकल। आनल महल मानव-गंगाकेँ,
समय बितल बितिते रहल। भेल बात विचित्र ई जे,
सात पुत्र शांतुनुकेँ भेल। युवती फेकल सभकेँ गंगधारमे,
राजाने किछु पुछि सकल।
कविक छल ई कल्पना ई युवती के अछि,
बुझि परैछ क्षण कोमल, क्षण क्रूर-क्रूरतम जे, अबोध बालक केर प्राणक हेतु विकल !
पूछल राजा शांतनु,
आठम बेर अपनाकेँ नहि रोकि सकल। देलक युवती परिचय सकल,
हम गंग आ ई आठ वसु छल। देलन्हि महर्षि वशिष्ठ शाप तनिका,
मर्त्यलोकक जन्म लेबाक। आठम पुत्रकेँ राखब हम किछु दिन, देवव्रत देब स्वरूप सेवक।
महर्षि वशिष्ठक नन्दिनीकेँ, देखि पत्नी वसु प्रभासक,
मर्त्यलोकक सखी हेतु, प्रयास नन्दिनीक हरणक ।
ऋषि ताकल गौ-देविकेँ, ज्ञान-चक्षुसँ। देलक शाप वसुगणकेँ भय-क्रोधित, कएल प्रार्थना वसु सभ शापित। हमर शाप नहि घूरि सकत परञ्च, सात वसु भय जायत मुक्त तुरत।
प्रभासकेँ रहय परत ततय, किछु दिन धरि मर्त्यलोकक शरण
होयत यशस्वी ई बहुत, घुरि आयल वसुगण गंग लग। हे देवि बनू माता हमरा सभक, दिअ’ मुक्ति तखन आस अहींक।
कवि-कल्प्नाक डोरी देखल,
मानव-गंग केर औचित्य लेल!
शांतुनु भए गेल विरक्त,
छूटि गेल गंगक सानिध्य। समय बीतल तँ गेल ओ एक दिन, तट, धारक समक्ष।
दिव्य बालककेँ ओतए देखल, करि रहल केलि ओतए। रोकि रहल वाणक धारसँ, गंगधारकेँ जतए।
प्रस्तुत भेलीह गंग तखन, सौंपि देल देवव्रतकेँ कहल। महर्षि वशिष्ठ सँ लए शिक्षा, वेद-वेदांगक निखिल। शास्त्र-ज्ञान शुक्राचार्य जेकाँ, शस्त्रमे परशुराम सन।
भेटि गेलन्हि पुत्र तेजस्वी घुरि अएलाह शान्तनु, देवव्रतकेँ बनाएल राजकुमार,
आइ अछि ई सम्भव,
अपन दोसर ठाम पोसलाहा पुत्रकेँ,
करत ई संकीर्ण समाज!
किएक नहि होए देवव्रत सन यशस्वी तखनहु?
कैक वर्ष बीतल एना, पुनि एक दिन आएल,
शान्तनु देखलन्हि यमुना तट तर अद्भुत सुवास,
आबि रहल तरुणी सत्यवती मलाहक बेटी,
आइ जखन गोत्र-मूल, पाइ-कौड़ीक बान्ह,
तहिया राजासँ विवाहक लेल सेहो,
राखल शर्त्त मल्लाहक सरदार।
बनत हमर नातियेटा, हस्तिनापुरक राजा,
तखने होएत ई विवाह।
शान्तनु ई वचन दितथि कोना, से घुरि अयलाह नगर अपन । चिन्ता घून बनि काटए लागल शरीरक कान्तिकेँ।
देवव्रत पूछलन्हि पितासँ, की भेल पिताश्री,
हे पुत्र की कहू, अछि एकटा चिन्ता, की होएत राज्यक
जे होएत होएत युद्धमे किछु अहाँकेँ,
ककर आश,
के बढ़ाओत,
वंश हस्तिनापुरक ।
कुशाग्र बुद्धिक देवव्रत
बुझलन्हि जे बात किछु आर अछि,
पूछलन्हि सारथीसँ सभ गप, गेलथि केवटराज लग,
आ राजपाट त्यागि अएलाह।
केवटराज परञ्च राखल एकटा शंका, की होएत जे अहाँक, पुत्र अहाँक जे छीनि लए, हमर नातिसँ राज्य।
अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर,
सेहो अप्रत्याशित ।
इतिहास बनत, ई प्रतिज्ञा। नहि करब हम विवाह आजन्म, गार्हस्थ्य आश्रम छोड़ब,
रहब आजन्म ब्रह्मचारी, छोड़ब वानप्रस्थ आश्रम, हस्तिनापुर सिंहासनक मात्र रक्षा, करब हम आजन्म।
संन्यास आश्रम सेहो छोड़ब, संतान बूझब हस्तिनापुर सिंहासनकेँ। क्यो नहि छूबि सकत तकरा, हमरा जिबैत-जीबैत।
धन्य-धन्य दिगान्त बाजल, पुष्प वर्षा कएलन्हि देवतागण,
मंचसज्जाक लेल उपयुक्त कवि ब्यासक कथन बुझु एतए।
भीष्म-भीष्म धन्य-धन्य, बाजि उठल लोक सभ।
केवटराज केलन्हि विदा, सत्यवतीकेँ सानन्द। कालांतरमे पुत्र दू, पाओल विचित्रवीर्य आ चित्रांगद ।
बालक दुनू छोटे छल, शांतनुक प्रयाण भेल। चित्रांगदक भीष्म, तखन राज्याभिषेक कएल।
घमंडी से छल एहन की देव की दानव बुझय, की गंधर्व की मानव ककरो नहि टेर करय। आ देह छोड़ल, युद्ध संग गंधर्वक कए|
विचित्रवीर्यक आएल राज्य,
भीष्मकेँ पड़ल सम्हारए, सभटा भार कारण विचित्रवीर्य रहथि छोट।
फेर जखन ओ भेलाह विवाह योग्य,
काशीराजक कन्या सभक स्वयंबरमे,
भीष्म विदा भेलाह काशी, जतए पहुँचल छलाह राजा शल्व, काशीराजक ज्येष्ठ पुत्री, अम्बा छलीह हुनकापर अनुरक्त । अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका, दृष्टि फेरल भीष्म दिशि। बढि गेलीह आगू तखन, भीष्म क्रोधित भए दहोदिश, ललकारिकेँ कहलन्हि तखन ओ समस्त राजा सुनि लिअह ई, जे पराजित कए सकी तँ, स्वयंबरक भागी बनू फेर।
सभकेँ हराकए भीष्म जखन, चललाह काशीराजक कन्या समेत। शल्व रथक पाछू पड़ल आ, ललकारल युद्धक लेल।
धनुष-विद्या धनी भीष्मसँ, काशीराजक कन्यासभ कएल प्रार्थना, भीष्म छोड़ल प्राण शल्वक, मुदा अम्बा कहलन्हि भीष्मसँ एकांतीमे, हे गंगेय धर्मज्ञ, हमरा मोनमे अछि एक गोट शंका, मानि लेल सौभ देश राजाकेँ, पति हम अपना हृदय-बिच, धर्मात्मा, महात्मा,भीष्मक निर्णय,
जाथु अम्बा शल्व लग।
कराओल विवाह विचित्रवीर्यक, अम्बा-अम्बालिकाक संग।
शाल्व छलाह वीर,
भीष्म हराओल लोक सभक बिच, जीति लए गेल अहाँकेँ,
एहि अपमानक बाद की ई, बात हमरा स्वीकार हो?
विचित्रवीर्य कहल सेहो अम्बासँ विवाह अक्षत्रियोचित,
अम्बा कहलन्हि भीष्मकेँ
विवाह करू अहाँ हमरासँ।
हरि अनलहुँ, बीतल छह वर्ष हस्तिनापुर-सौभक बीच, भीष्मक प्रतिज्ञा
मुदा बीचमे ठाढ़,
गेलीह युद्धदेव कार्तिकेय लग।
अम्बा भरि उठलीह प्रतिशोधसँ ।
देलन्हि ओ नहि मौलायबला कमलक माला,
हे अम्बे! लिअ ई शस्त्र, जकर गार पहिरायब सैह करत भीष्मकेँ नष्ट। भीष्मक भय परञ्च छल ततेक, नहि तैयार भेल पहिरय ई माला क्यो एक। सुनलन्हि छथि द्रुपद वीर पांचाल, सेहो तैयार नहि भेलाह पहिरए ई माल। घुरलीह अम्बा अंतमे हारि, निराश हताश लटकेलन्हि द्रुपदक महलक द्वारि।
गेलीह ओ तपस्वीक शरण। सभ तपस्वी कए विचार कहलन्हि, जाऊ अहाँ परुशरामक आश्रम।
क्षत्रिय-दमन छथि ओ देथिन्ह दण्ड भीष्मकेँ, जे कष्ट देलन्हि अकारण।
परशुराम लग पहुँचि केलन्हि प्रार्थना, सुना कए अपन अभ्यर्थना। परशुराम कहल शल्व अछि प्रिय हमर,
बात नहि काटत विवाह शल्वसँ करक लेल छी तैयार अहाँ ? अम्बा कहल हम आब विवाह नहि करए चाहैत छी।
अछि हमर आब ई इच्छा मात्र, करू भीष्मसँ युद्ध अहाँ।
परशुराम कए स्वीकार ई प्रार्थना, देलन्हि भीष्मकेँ ललकारा, जितेन्द्रीय,ब्रह्मचारी छलाह दुनू, धनुर्धारी-योद्धा मध्य युद्धघोष बरु।
हारि-जीतक प्रश्न नहि छल ज्योँ, अनिर्णायक युद्ध बनल,
अम्बा हारि कैलाशक दिशि प्रयाण कएल, गेलीह शम्भूक शरणमे।
पाबि वर पुनर्जन्मक बाद, भीष्मक मृत्यु मे होएत अहींक हाथ।
अम्बाक संयमक सेहो छल सीमा, कूदि चितामे पुनर्जन्मक लौलसामे। मृत्यु पाबि जन्म लेल तखन, कन्या बनि द्रुपदक महलमे।
खेल-खेलमे माला पहिरल अपन टाँगल, द्रुपद सोचल होएत एकटा फेर, वैर भीष्मक अएत गऽ झमेल।
निकालि राजमहलसँ कन्याकेँ, जंगल दिशि ओ गेलि तपस्या कएल,
पाओल पुरुष रूप धरल शिखण्डी नाम, ओकरा छल सभटा मोन।
विचित्रवीर्यक राज सेहो चलल बड्ड थोड़ दिन। क्षयक बीमारी छल अल्पायु मे मृत्युक अदिन। धृतराष्ट्रक आ पांडुक जन्मो नहि भेल।
अंबिकाक पुत्र धृतराष्ट्र,अंबालिका पुत्र पाण्डु छल।
विधिक विधान छल, ज्येष्ठ पुत्र अंध भेल, अम्बिका सँ पुत्र धृतराष्ट्र, काल छिनलक आँखि, आ काल बनओलक कहबीक पाँति
अम्बालिका पुत्र पाण्डु, पौण्ड्र रोग ग्रसित तेँ ब्यास देल नाम ई,
आकि हुनकेँ सँ रोगक पड़ल नाम ई।
पौण्ड्र ग्रस्त पाण्डुकेँ राज्य-काज गेल देल ।
अंबिकाक दासीसँ विदुरक भेल जन्म छल। शिक्षा होमय लागल सभक भीष्मक संरक्षणमे, भीष्मकेँ चिंता भेल विवाह कोना होयत गए, धृतराष्ट्रक हेतु ताकल एक कन्याकेँ। शिवक वरदान छल गांधारीके सए पुत्रक, बढ़त वंश शोचल ई प्रयत्न से प्रारम्भ कएल।
गांधार नरेश सुबल भेलाह कथा लेल तैयार जखन, विवाह धृतराष्ट्रक भेल छलीह ओ शकुनिक बहिन।
सुनि पतिक अंधताक गप्प पट्टी बान्हल, आँखि रहितहु नेत्रहीनक जिनगी गुजारल।
सय पुत्रक माता छल दुःशला एक पुत्री, सिंधु नरेश जयद्रथ भेल जिनकर पति।
कृष्णक पिता वासुदेवक बहिन छलि पृथा, शूरसेनक पुत्री छलीह रहलीह जाए मुदा, पिताक पिसियौत कुंतीभोज छल संतानहीन, हुनके स्नेह भेटल पृथा भेलि कुंती पुनि।
कृष्ण-सुदर्शन, बलरामक दीदी भेलीह, सत्कार विप्रवरक करैत छलीह। एहिना एक बेर दुर्वासा देल मंत्र एकटा, पढ़ब मोनसँ देव अएत बजेबनि जिनका।
ब्यासक ई कवित्व मोनक बात कहलक,
वर-मंत्र-पुनर्जन्म सबहक तत्त्व तकलक।
नेनमति बुद्धि छल कुन्तीक, सूर्यकेँ बजाओल,
पुत्र-प्राप्ति भेल से बाधक छल लोकलाज, बहा देल बच्चाकेँ बिच गंगधार।
कौरवक सारथी अधीरथकेँ भेटल ओ, कर्ण राधेय माए राधा पोषित सूतपुत्र पराक्रमी, शरीर कवचयुक्त कान कुंडलसँ शोभित।
पाण्डुक फेर कुंतीसँ विवाह भेल,
मद्रनरेशक पुत्री माद्री दोसर पत्नी भेलि।
पाण्डु युद्ध-कार्य मात्र कएल जीति राज, दूर रहि राज-काज भोगल सुख मात्र !
कुंती-माद्रीक संग वन-विचरण मे रत।
शिकार खेलाइत वनमे,
एक मुनि श्राप देल संतानविहीनताक।
पाण्डुक संतान प्राप्तिक इच्छा देखि कुंती, खोललन्हि दुर्वासाक देल मंत्रक भेद। यमसँ धर्मराज,भीमसेन वायुसँ,
इंद्रसँ अर्जुन कुंतीक पुत्र तीन भेल।
कुंतीक मंत्रसँ माद्रीकेँ भेल पुत्रक आश।
अश्विनद्वय सँ भेल नकुल-सहदेव प्राप्त।
पाण्डुक मृत्यु पंचपाण्डव जन्मक बाद, भेलीह सती पतिक संग माद्री वनहिमे।
पाण्डव ओ कुंतीकेँ बोनसँ हस्तिनापुर,
अनलन्हि नगरमे सभ वनक मुनिवर सभ। पंच पाण्डवक संग आयलि कुंती नगर।
जुमि गेल सभ नर नारी ठाम-ठामे। ऋषि-मुनि वन प्राणीक संगतिमे शील। मुग्धित सुशील पाण्डवकेँ मोन भरि देखि-गुणि।
कृपाचार्यक आचार्यत्वमे शिक्षा, पाबि रहल दुर्योधन कौरव, पाबि सकए छथि हुनके लग रहि, पाण्डव जन सभ शिक्षा ई सभ ।
धृतराष्ट्र सोचि ई तखन कएल, ताहि तरहक व्यवस्था, दुर्योधन-कौरवक संग रहताह
पंच पाण्डव भ्राता।
भीम छलाह बलशाली सभमे, दुर्योधनमे छल इरखा बड़। करए लागल दुर्योधन भीमक, मृत्यु योजना गंगे तट !
जल क्रीड़ाक हेतु गेल लए, तट दुर्योधन पाण्डवकेँ। खाद्य मध्य मिलाओल विष, खोआओल भोजन भीमहिकेँ।
सभ गेल नहाबए गंगमध्य, नशा भीमकेँ आयल,
कात अबैत खसलाह ओतए भीम अड़रा कय ।
दुर्योधन बान्हल लताकुञ्ज सँ । फेकल धारमे ओकरा निश्चिंत, त्रास मुक्त कौरवघुरि आयल। गंग मध्य डँसलक एक नाग, विष कटलक विषकेँ !
से देखू काटत के पाण्डवक भाग।
विषक प्रभाव भेल दूर, भीम चललाह घरकेँ, उठलाह झुमैत होइत मदमस्त, कथा सुनाबए भ्राताकेँ।
युधिष्ठिर घरमे सोचथि, भीम पहुँचि गेल होएताह। नहि देखल घर भीम, माथ पर बल अएलन्हि कनेटा।
तावत भीम झूमि अएलाह, षडयंत्रक कथा सुनाओल । कुंती चिंतित भेलि विदुरसँ, पूछल भेल ई उचित !
विदुर बुझाओल पाण्डव छथि बलशाली किञ्चित। हुनकर दुर्योधन करि पाओत, नहि कोनो अहित।
भीमकेँ जिबैत देखि दुर्योधन-भ्राता, मोन मसोसि रहि गेल ओ दुष्ट दुरात्मा।
कौरव पाण्डव लीन कंदुक खेलि रहल। कंदुक खसल इनारमे नहि निकलि रहल। सोझहि छल एक शिअक बाटे आबि रहल, तेज जकर ओकर महिमा छल गाबि रहल।
बाणक वार पुनि पुनि कएल फेर ऊपरसँ, खेंचि कय निकालल गेंद धनुर्विद्याकौशलसँ।
भीष्मकेँ सुनाएल बालवृन्द कलाकारी ओकर, द्रोण नाम्ना कृपाचार्यक छल जे बहिनि वर।
अश्वत्थामा पुत्र जनिक सहपाठी द्रुपद छल। द्रुपद देल एकवचन राज देब आध हम। देल वचन बिसरलसे राजा बनला उत्तर। अपमानित कएल से फूटि, राजा ओ दंभी। प्रतिशोधक बाट ताकि रहल द्रोण बनि प्रतिद्वन्दी।
निर्धनताक जिनगी जिबैत छलाह घूमि रहल। अश्वत्थामाक संग आजीविकाक ताकिमे पड़ल। हस्तिनापुरक आग्रह छलाह नहि टारि सकल। कृतज्ञताक भारसँ अश्वत्थामा-द्रोण हस्तिनापुरक।
धनुर्विद्याक पाठ शुरु कएल कौरवक आ पाण्डवक। पाठक उपरांत समय आएल छल लक्ष्य भेदक।
परीक्षाक चातुर्यक संगहि कुशलताक रण-कौशलक। लक्ष्य बनल एकटा गोट-बेश ऊँच वृक्ष पर, राखल काठक चिड़ै आँखि जकर लक्ष्य छल।
सभकेँ पूछल द्रोण बाजू की छी देखि रहल? सभ क्यो गाछ वृक्ष पक्षिक संग देखि रहल।
पार्थकेँ पूछल अहाँ छी कथी देखि रहल सकल। माथ पक्षिक अतिरिक्त नहि किछु छी देखल। अर्जुनक बाण पक्षिक शिरोच्छेदन कएलक।
अर्जुन भेलाह प्रिय-स्नेहिल द्रोणक हृदयक।
बीतल समय शस्त्र-प्रदर्शनक छल आएल।
समय बीतल प्रदर्शन-शस्त्रक छल आयल।
भीष्म पूछल द्रोणसँ की-की सिखाओल, युद्ध-कौशल,व्यूह रचना आ शस्त्रकौशल।
प्रदर्शनक व्यवस्था भेल जनक बीचहि,
एकाएकी सभ भेलाह परीक्षित संगहि।
भेल भीम-दुर्योधनक गदा-युद्धक प्रदर्शन। भीष्म-धृतराष्ट्रक हृदय-बिच वातसल्यक, जखन छल द्वंदकबीच अर्जुक बेर आयल। एकानेक बाण-विद्यासँ रंगस्थली गुंजित, घोष अर्जुनक भेल बीचहि कर्ण आएल।
परशुराम शिष्य कर्ण कएलक विनय, कए छी सकैत हम प्रदर्शन सभक जे, विद्या जनैत छथि अर्जुन सकल सभ,
पाबि सह दुर्योधनक, ललकारा देलक, अर्जुन द्वंद हमरासँ लड़ू से प्रथमतः।
कृपाचार्य कहल सारथीपुत्र छी अहाँ, राजकुमारसँ द्वंदक अधिकारी कहाँ?
द्वंदता नहि अहाँसँ फेर बात द्वंदक, द्वंद-युद्धक गप आएल ओना-कोना?
हा ! हा! हा! चित्कार हृदयक,
कर्णक हृदयक चित्कार दुर्योधनेटा सुनलक।
ई सुनि दुर्योधन केलक ई घोषणा, बात ई अछि तँ सभ सुनैत जाऊ, अंग-देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी, योद्धाक परीक्षण करैत अछि बाहु,
ई बाहु ! पकड़ि कर्णक बाहु कहलक ।
अंग देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी।
कहि ई अभिषेक कएल सभागारेमे,
अंकमे लेल कर्ण भेल कृतज्ञ ओकर।
उठि अर्जुन तखन ई बात बाजल, हे कर्ण अहाँ जे क्यो छी, सुनू ई, हम द्रोण शिष्य अर्जुन ई कहए छी, बुझू नहि जे ई वीरताक वरदान टा, नहि भेटल अछि से अहीँक सभटा।
गुरु नहि सिखओलन्हि हारि मानब,
प्रतिद्वंदीसँ द्वंद करब जखन चाहब।
करतल ध्वनिसँ सभागार भेल फेर गुंजित, भीष्म उठि कएल संध्याक आगमन सूचित।
अर्जुनक गर्वोक्ति सुनि कर्णक हृदय छल, मोन मसोसि नृप अंगक गामपर पहुँचल।
शिष्टताक हेतु पाण्डव भेलाह प्रशंसित। भेल एहिसँ दुर्योधनक मोन शंकित। शकुनि दुःशासन छल ओकर भक्त, कर्णसँ भेँट उत्तर ओ भेल आश्वस्त, धृतराष्ट्रकेँ सभक कनफुसकीसँ कए त्रस्त।
पिता छलहुँ अहाँ सिंहासनक अधिकारी, जन्म-अंधताक रोकल राजसँ अहाँकेँ, हमरा तँ नहि अछि एहन लाचारी।
युधिष्ठिरकेँ सभ मानय लागल, सिंहासनक अधिकारी किएक ? अहँक सेहंता की भए पाएल, फलाभूत कोना अहुना ईएह।
युधिष्ठिर ज्येष्ठ हमरासँ अछि, परंतु अछि अहाँक अनुजक पुत्र सएह।
कएल आग्रह जएबाक मेला वारणावतक,
पाण्डवसँक करू। ता सुधारब व्यवस्था सभ, कल्याणकारी कार्य सभसँ, बिसरि जएत पुत्र कुंतीक, जन सकल हस्तिनापुरक।
धृतराष्ट्र मानल सभटा बात, आदेश देल वारणावत जाथु, कुंति देखि मेला-ठेला आउ।
विदुर भेल साकंक्ष भेद ई की, सचर रहब युधिष्ठिर, कहल ई।
विदुरक नीति कएल साकंक्ष, दुर्योधनक काटल सदि प्रपंच।
मंत्री पुरोचनसँ मिलि दुर्योधन, लाखक महल बनबओने छल, विदुर लगेलन्हि एकर पता, संवाद सेहो पठओने छल।
वाहक संदेशक छल कारीगर, निर्माण सुरँगक कएल। लाखक महलक भीतर छल, निर्माण से क्षणहिमे भएल।
पाण्डवकेँ निर्देश भेल छल, खोह सुरँगहिमे सूतइ जाउ,
आगिक पूर्ण शंका से छल, लगिते भीतरसँ बाहर अबै जाउ।
कृष्ण चतुर्दशीक छल ओ दिन, पुरोचन भेल से अतिशय चंचल,
आगि लगाएत आइ ओ छल सँ, युधिष्ठिर छल ई सभ बूझि रहल।
कए सचेत अपन माता-भ्राताकेँ, यज्ञ कएलन्हि ओहि दिन से,
भात-भोज देलन्हि नगरवासीकेँ, पंचपुत्र छलि भीलनी सेहो एक।
आह बेचारी ! कालक मारल वा मारल,
दू गोट द्वन्दतामे तेसर?
कालक सोझाँ ककर चलल जे, सूतलि राति ओतहि सभ तेँ।
पुरोचन सेहो सुतल ओतहि, बाहर दिश छल कोठली एक, आगि लगाओल भीम तखन, बीच रातिमे मौका केँ देखि।
लाक्षागृह छल बन से ओतए, अग्नि देवता अहि केर लेल।
घरक सुड्डाह होइमे लागत, से एकहु क्षण किएक?
नहि बिलमि माता- भ्राता, प्रणामअग्निदेवकेँकए।
निकलि कुंति कालक गालसँ, बचलि दुर्योधनक कुचालिसँ।
पुरोचन अग्नि मध्य से उचिते भेल, किन्तु भीलनि जरलि बेचारी,
पुत्र सहित से सूतल, ककरो बुझना छल नहि गेल ई छल।
नगरवासी बुझलन्हि जे जरलि, कुंती पाँचो पुत्र सभहिक संगे।
नगर शोकसँ भेल शोकाकुल, खबरि हस्तिनापुर ज्योँ गेलेँ।
दुर्योधन छल अति प्रसन्ना आ, धृतराष्ट्र प्रसन्न छल मोने-मोने।
परंतु विदुर सभसँ बेशी प्रसन्न, किएक तँ सत्य बूझि छल गेले।
से ओ कहल भीष्मकेँ सभटा, बात रहस्यक जा कए ओतए।
भीष्मक चिंता दूर कएलन्हि,
ई सभ गप जाय बुझा कए ।
अकाबोन पहुँचैत गेलाह गए, पाण्डव-जन कष्ट उठा कए। नाविक नावक संग प्रतीक्षा, करि छल रहय विकल भए।
कहलन्हि विदुर पठेलन्हि हमरा, आज्ञा दी गंगतट सेवा करबाक।
गंगा पार भेलथि पाण्डव जन, पाछू छूटल कतेक भभटपन।
धृत्राष्ट्रक,दुर्योधन आ शकुनीक, आ दुःशासन कर्ण सबहीक। संग मुदा लागल प्रतिशोध, हस्तिनापुरक छल ई दुर्योग।
नहि जानि जएत कई पथ ई, पथ न जतए छल ओहि वनमे, डेग दक्षिण दिशा दिश दी, गंतव्यक छल नहि ज्ञान कोनो जे !
दैत डेग बढ़ैत आगू, भूखल-पियासल थाकल ठेहिआयल, आह दुर्दशा देखू !
कुंतीक ई दशा देखि, भीमसँ नहि छल गेल रहल, वट-वृक्षक नीचाँ बैसा कए, चढल देखल सजग भऽ।
पक्षी किछु दूर छल ओतए, भीम जाए पहुँचल जलाशय, पानि पीब आनि पियाओल, सुतल सभ कुम्हलाय ओतए।
भीमकेँ नहि गेल देखल, करथि की हूसि मोन होअय, पोखरिक गाछक ऊपर छल राक्षस नाम हिडिंब जेकर।
हिडिंबा बहिनक संग छल, ताकि रहल अपन भोजन। मनुक्ख-गंध सूंघि कए, चलल नर-मांस ताकिमे ओ, हिडिंबे जो मौस-मनुक्खक, आन जल्दी ओतए जाकए। देखि कुंती-पुत्र संग सूतल, दुःखित हिडिंबा छल ताकैत, भीमक हृष्ट-पुष्ट शरीर देखि, ठाढ नेत्रे रहलि ताकए।
धरि धारण रूप सुन्दरीक, कहल भीम जाऊ उठाऊ, अपन माता बन्धुकेँ, दूर सुरक्षित हिनका पहुँचाएब।
मोहित छी हम अहाँ पर, चाह हमरा अछि विवाहक,
मायासँ हम बचाएब, बलवान क्रूर हिडिम्बक मारिक।
भीम कहल हम किए उठाएब, बंधु केँ सुतल अपन, बलवान अछि हिडिंब एहन, बल देखए हमरो तखन।
हिडिम्ब पहुँचल ओतए, हिडिम्बा छलि सुन्दरीक रूप बनओने, भीमसँ करि रहलि छलि गप, क्रोधसँ क्रोधित हिडिम्बकेँ कएने।
ओ दौड़ल हिडिम्बा पर मारक हेतु, भीम पकड़ल बिच्चहिमे, मल्लयुद्ध पसरल ओतए से, विकट द्वंदक हुँकार छल गूँजैत।
वन्यप्राणी भागए लागल आ उठलि कुंती-पांडव ओतए, पहुँचैत गेल दौगैत ओतए, रणभूमि साजल छल जतए। मारि देलक भीम तावत, भेल हिडिम्ब शवरूप यावत।
भीमक वीरतासँ हिडिम्बा भेलि छलि आनंदित, वाकचातुर्यसँ कएने छलि कुंतिकेँ प्रसन्न किंचित्।
युधिष्ठिर सेहो देल स्वीकृति माता कुंतीक विचार जानि, विवाह करि कए रहए लागल, भीम हिडिम्बाकेँ आनि। घटोत्कच उत्पन्न भेल, पिता तुल्य पराक्रम जकर छल।
दिन बीतल पाण्डव वन छोड़ि कए आगाँ जाए लागल, जाएब हिमालय दिशि पुत्रक संग ई हिडिम्बा बाजलि।
घटोत्कच कहल पितु माताक हम सदिकाल संगे रहब, होएत कोनो कार्य अहाँक, बजाबएमे नहि संकोच करब।
जाइत काल ब्यास भेटलाह कुंती कानलि हाक्रोस भए,
भारतक लेखक आएल बनि काव्यक पात्र भए !! ब्यास कहल नहि कानू दिन छोट पैघ होएबे करय। दुःख आकि सुखमे अपना पर नहि छोड़ए अछि नियंत्रण, धर्मपथ पर जे चलए,तकरे कहए छी मनुष्य तखन।
गर्वित सुखे नहि होए, दुःखमे धैर्यक न अवलंब छोड़ए, कुंती आ अहँक पुत्र छथि, तेहन जेहन ई मनुष्य होमए।
ब्यास काव्यक पात्रकेँ देखाए रस्ता सोझ किन्तु,
पात्रक चरित्रमे नहि अड़ाओल अपन आकांक्षा एको रति ।
धन्य तेँ ओ कवि आ ओकर कृति !!
पाण्डवजन पाबि ई संबल, पहिरल मृगचर्म वल्कल, ब्रह्मचारी केर भेष बनाओल, एकचक्री नगर पहुँचल।
रहल बनि अतिथि ओतए, आतिथ्य ब्राह्मणक पाओल, भाइ सभ जाथि आनथि सभ राखथि माताक समक्ष।
कुंती देथि आध-भीमकेँ आधमे शेष सभ मिलि खाथि, भीमक तैयो भूख मेटाइन्हि नहि भुखले ओ रहि जाथि।
भुखले छलाह भीम एक दिन गेलाह नहि भिक्षाटनमे, सुनल घोर कन्नारोहट घरमे, पूछल कारण जानल से।
बकासुर राक्षस ओतए छल नगर बाहर निवास जकर, राजा असमर्थ छल, राक्षस करए अत्याचार बड़-बड़।
छल निकालल समाधान जे सभ परिवारसँ प्रतिदिन एक, कटही गाड़ी भरि अन्न मदिरा मौस, जाथि बहलमान।
बक खाइत छल सभटा भोजन संग बहलमानहुकेँ से, कन्नारोहट मचल छल घर ब्राह्मण परिवारक मध्ये।
पार छल परिवारक आइ सभ परिवार दुःखित छल,
कुंती कहल पाँच पुत्र अछि, भीमक बल सुनाएल। भीमक बलक चर्च सुनि-सुनि कए ब्राह्मण मानल, कृतज्ञ भेल भीमकेँ ओ गाड़ीक संग खोह पठाओल।
खोह राक्षसक ताकि भीम खेलक, छल ओ भुखाएल, तृप्त स्वयं भीम छल देरी सँ अतृप्त बकासुर आएल।
तामसे आक्रमण कएलक किंतु लात-मुक्का मारि कए,
भीम प्राण लेलक ओकरा खींचि नगर द्वार आनि कए।
भेल प्रसन्न सभ जन मनओलक पूजा-पर्व ओतए, कुंती चललीह आर किछु दिन ओहि नगर रहि कए।
सुनल पांचालक स्वयंबरक, कथा पांचालीक द्रुपदक,
एकचक्रा नगरीसँ ढेरक-ढेर ब्राह्मण पहुँचैत ओतए।
पाण्डवजन लए रहल आज्ञा मातृ कुंतीसँ रहथि,
ब्यास पहुँचि कहल जाउ स्वयंबर ओतए देखए !
मार्गमे ऋषि धौम्य भेटलाह छलाह पंडित ज्ञानी, बढ़ल आगू तखन मिलि संकल्पित भऽ सभ प्राणी।
सुनि कथा प्रशंसा यज्ञसँ निकललि याज्ञसेनीक, मत्स्यभेद करताह जे क्यो द्रौपदी वरण करतीह।
स्वयंबरक स्थानक रस्ता तकलन्हि पांचालमे जा कए,
कुम्भकारक घर डेरा देलन्हि विचार कुंतीक मानि कए।
कर्ण आएल छल दुःशासन, दुर्योधनक संग सज्जित, देश-देशक राजा आएल छल रंगभूमि वीरसँ खचित।
तखन आयलि द्रौपदी भाइ धृष्टद्युम्नक संग सुसज्जित, पुष्पमाल लेने आयलि केलनि सभक नजरि आकृष्ट।
बीच स्वयंबरक भूमिक ऊपर मत्स्य एकटा लटकल, ओकर नीचाँ चक्र एकटा तीव्र गतिये छल घूमि रहल।
नीचाँ पानिमे छाह देखि जे चक्रमध्य पातर भुरकी तर, दागि सकत मत्स्य आँखिकेँ पुष्पमाल पड़त तकरे गर।
सभटा राजा हारि थाकि कए भेल विखिन्न थाकल छल, कर्ण देखि जन बाजि उठल सूत पुत्र किए आएल छल?
द्रौपदी बाजलि गाँथियो देत ज्योँ कर्ण मत्स्य-लोचनकेँ, नहि पहिराएब वरमाला नहि करब वरण ओकराकेँ।
विवश कर्णकेँ बैसल देखि ऋषिवेश अर्जुन आएल छल, एकहि शर-संधानसँ बेधल मत्स्य सुयश पाओल छल।
ब्राह्मण-मंडली कएने छल बुझि ओकरा ब्राह्मण जय-जयकार ओतए, क्षत्रिय राजा सभ कएल विरोध, तैयार अर्जुन पुनि संधान कए।
बिद्ध मत्स्य भू खसल भूमि बलराम कृष्ण आगाँ आओल, सभ राजाकेँ बुझाए सुझाए छल सहटाय ओतएसँ हटाओल।
कृष्ण एकांती कहल दाऊ सुनू ई, सुनल छल एक उरन्ती, वारणावत आगि बिच बचल पांडव, बचल छलि कुंती दीदी।
भीम तखने उखाड़ि वृक्ष छल भेल ठाढ़ सहटि अर्जुन कए, कृष्ण कहल हे दाऊ कालचक्र अनलक एतए भीम अर्जुनकेँ।
देखि पराक्रम हतोत्साहित भेल राजा सभ प्रयाण कएने छल, पांडव लए चललाह द्रौपदीकेँ व्यग्र एहि सभसँ ओ भेलि छलि।
अर्जुन खोलि अपन रहस्य, खिस्सासँ द्रौपदीकेँ कएल विह्वल,
धृष्टद्युम्न चुपचाप सुनए छल, घुरि पिताकेँ कथा ई कहलक।
कुम्भकारक घर पहुँचि पांडव कहल देखू की हम सभ आनल, कुंती कहल आनल अछि जे सभ तकरा बाँटू पाँचू पाण्डव !!
कहल अर्जुन हे माता होएत नहि व्यर्थ अहाँक ई बात, संग द्रौपदीक होएत विवाह पाँचू-पाण्डवक संग- साथ।
द्रुपद पठेलन्हि पुरहितकेँ धृष्टद्युम्नक संग ओतए, कुंतीकेँ नोतल आ सभकेँ लए गेल संग अपन । द्रुपद सुनल जे पाँचू-पाण्डव करताह विवाह द्रौपदीसँ, तखनहि ई कथा अछि पूर्वजन्महिक ब्यास आबि सुनाओल!!
भेटल छलन्हि वरदान शिवसँ जे पाँच पति अहाँ पाएब, सुनि सभ द्रौपदी विवाह द्रुपद रीति वैदिक सँ कराओल।
सभ किछु दिन रहल ओतए कुशलसँ द्रुपद केर महलमे, पसरल ई चर्चा सगरो धरि गेल गप हस्तिनापुर महलमे।
लोकलाजसँ बाह्य प्रसन्नता धृतराष्ट्र छल ओतए देखओने, मानि भीष्म-द्रोणक विचार पठाओल समाद अगुतओने।
आनी अनुज पत्नी पुतोहु ओ अनुज पुत्र सभकेँ आदरसँ, दुर्योधनक कर्णक विरोध पर कएल विचार विदुरकेँ बजाकय, शास्त्रानुसार विचार देलन्हि आधा राज्य देबाक ओ जाकए।
विदुरहिकेँ पठाओल धृतराष्ट्र आनए राजमहलसँ द्रुपदक, सभकेँ लए आनल पहुँचल ओ जन ठाढ़ करए स्वागत। धृतराष्ट्र कहल हे युधिष्ठिर गृह कलहसँ ई नीक होयत, जाए खाण्डवप्रस्थ बसाउ नव नगर आध राज लऽ कए।
खाण्डवप्रस्थ अछि बोन एखन पहिने छल राजाक नगरी, मानि युधिष्ठिर गेल ओतए बनाय नव घर द्वार सज्जित।
इन्द्रप्रस्थ छल पड़ल नाम आ तेरह वर्ष धरि केलन्हि राज, यश छल सुशासनसँ आ छल जन-जीवन अति संपन्न।
छल अहिना दिन बीति रहल अएलाह नारद एकदिन जखन, स्वागत भेलन्हि खूब हुनकर ओहो रहथि आनंदित तखन।
देखल शील-गुण पांडवक मुदा कहल द्रौपदीसँ सुनू बात ई, छी पत्नी पांडवक मुदा निवासक निअम किए नहि बनेने छी ?
नारदक बात समीचीन छल से निअम बनेलथि पाँचो गोटे, एक-एक मास रहथु सभ लग द्रौपदी निअम नहि भंग हो !
बारह वर्ष पर्यंत छोड़ए पड़त गृह त्रुटि भेल ज्योँ, पालन निअमक होमए लागल किछु काल धरि ई । कनैत अएलाह विप्र एक अर्जुन पुछलन्हि बात की ?
चोर छल चोरेने गौकेँ हाक्रोस विप्र छल करि रहल, शस्त्र छल गृहमे द्रौपदी संग युधिष्ठिर जे रहि रहल।
विप्रक शापसँ नीक सोचि मूरी झुकेने गेल अर्जुन, शस्त्र आनि छोड़ायल गौकेँ घुरि आएल गृह तखन।
माँगल आज्ञा युधिष्ठिरसँ दिअ गृहत्यागक आज्ञा, निअम भंगक कएल हम अपराध, की बाजल अहाँ ?
अर्जुन ई अपराध लागत जखन पैघक द्वारा होएत, छोट भाए कखनो अछि आबि सकैत बड़ भाय घर।
मुदा निकलि गेलाह अर्जुन आज्ञा लए माता भाएसँ, भ्रमण देश-कोसक करैत पहुँचल हरिद्वार गंग तट, स्नान करैत काल, नजरि छल नाग कान्याक ज्योँ, कोना बचि सकैत पहुँचि गेलाह पातालक निकट।
विवाह प्रार्थना स्वीकारल अर्जुन ई छल वरदान भेटल, जलमे रस्ता बनत चलि सकब अहाँ व्यवधान बिन।
मणिपुर पहुँचि जतए चित्रांगदा राजकन्या छलि रूपवती, विवाहक प्रस्ताव अर्जुनक स्वीकारल मानल राजा सशर्त, दौहित्र होएत हमर वंशज भेल ई विवाह तखन जा कए।
चित्रांगदाक पुत्र भेल बभ्रुवाहन नाम राखल गेल जकर ई, परम प्रतापी पराक्रमी योद्धा बनल बालक पाछू सुनए छी।
फेर ओतएसँ निकलि अर्जुन पहुँचल प्रभास तीर्थ द्वारका निकट,
शस्त्र-प्रदर्शनक आयोजन केलन्हि कृष्ण निकट पर्वत रैवतक।
प्रेम देखि सुभद्रासँ कृष्ण छलाह सुझओने नव उपाय ई, अपहरण करब जीतब युद्ध यादवसँ बनत तखने बात ई।
बनलि सारथी वीर सुभद्रा संग्राम छल बजरल जखन, बुझा-सुझा मेल छल करओने कृष्ण जा कए तखन।
विवाह भेल तदंतर अर्जुन संग सुभद्रा गएलाह पुष्कर, पुरल जखन ई वनवास कृष्णक संग पहुँचल इंद्रप्रस्थ।
देखि नववधू प्रसन्न कुंती आनंद नहि समटा रहल, द्रौपदीसँ पाँच पुत्र, आ अभिमन्यु सुभद्रासँ भेल छल।
बीति छल रहल दिन जखन अएलाह जीर्ण शरीर अग्नि, रोगक निदान छल खांडव वन रहए छल ओ सर्प तक्षक।
इंद्रक अछि मित्र ओ जखन करैत छी जरेबाक हम सूरसार, नहि जरबए दैत छथि इंद्र, करू कृपा अहाँ हे इंद्र अवतार ।
छी प्रस्तुत मुदा अस्त्र अछि नहि हमरा लग ओतेक, इंद्र युद्धक हेतु चाही योग्य शस्त्रक मात्रा जरूरी जतेक।
देल गांडीव धनुष तूणीर अक्षय वरुणक रथ नंदिघोष, चलल डाहबाक हेतु अग्नि पेलाक बाद अर्जुनक तोष।
इंद्र मेघकेँ पठओलन्हि कृष्ण कएल सचेत जे, वायव्यक प्रयोग कएल अर्जुन मेघ बिलाएल से।
तक्षकक मृत्योपरान्त इंद्र भेलाह प्रकट ओतए, माँगल अर्जुन दिव्यास्त्र हुनकासँ मौका देखि कए।
जाऊ शिवक उपासना करू दए सकैत छथि वरदान ओ, छल मय आयल अग्निक कोपसँ बचि लग अर्जुनक ओ।
सेवा करबाक बात छल मोनमे लेने कृतज्ञ छल ओ, बनाऊ सभा भवन अनुपम नहि बनल जे कतहु होऽ।
मय दानव छल कए रहल नव निर्माण, सभा भवनक दिन-राति लागि उत्थान।
स्फटिकसँ युक्त शीसमहल सन कौशल, युधिष्ठिर ओतहि तखन सिंहासन बैसल।
ऋषि नारदक आगमन भेल ओतए जाए, देलन्हि करबाक यज्ञ जे राजसूय कहाय।
बजाओल द्वारकासँ कृष्णकेँ समाद पठाय, कृष्ण कहलन्हि सभा भवनमे आबि कए, जरासंध मगधक नरेश रहत गए यावत,
राजसूय सफल नहि होमय देत तावत।
बंदी बनेलक राजा लोकनिकेँ ओ हराय, आक्रमण ओकर भेल मथुरा पर बड्ड, हारि द्वारका राजधानी बनाओल हम जाए ।
युधिष्ठिर बात सुनैत भेलथि हतास सन, भीम अर्जुन आशा बन्हेलन्हि भ्राता सुन।
क्षत्रिय-धर्म अछि शत्रुकेँ वशमे करए, कृष्ण,अर्जुन-भीम संग राजगृह चलल।
ऋषि वेशधारी राजगीरक प्राचीर लाँघि, पहुँचल सभ सोझे सभा-भवन जी-जाँति।
सत्कार करए चाहलक जरासंध बुझि विप्र, ललकारा देलक किंतु भीम द्वंद-युद्धक शीघ।
दिन बीतल खत्मक नाम नहि लैछ ई युद्ध, कृष्णक संकेत पाबि चीरल ओ शरीर संधिसँ,
भीम तोड़ल शरीर जरासंधक उनटि फूर्त्तिसँ, शरीर फेंकल दुहू दिशि उनटि एम्हर-ओम्हर, मुक्त कएल कारागारसँ बंदी गण राजा सभकेँ।
जरासंध-पुत्र सहदेवकेँ दए मगध राजक गद्दी, आपस भेलाह इंद्रप्रस्थ घुरलाह तीनू व्यक्त्ति।
पूर्व दिशि भीम उत्तर अर्जुन नकुल दक्षिण, सहदेव पश्चिम दिशा दिशि दिग्विजय खातिर।
विजय रथ नहि क्यो रोकि सकल हुनकर, धन-धान्यसँ परिपूर्ण सभ आबि कएल तैयारी, राजसूय यज्ञक भेल राजा सभक इन्द्रप्रस्थमे बजाही।
राजा लोकनि केँ दय समुचित कार्यक भार, भीष्म-द्रोणकेँ यज्ञ-निरीक्षणक देल प्रभार।
कृष्ण विप्र चरण-धोबाक लेलन्हि काज । हस्तिनापुरसँ भीष्म, द्रोणक संग भेल आगमन, धृतराष्ट्र विदुर कृप अश्वत्थामा दुर्योधन दुःशासन।
बीच यज्ञमे उठल छल प्रश्न अग्र-पूजाक, भीष्मक सम्मति युधिष्ठिर पुछलन्हि जाए, भीष्म कहल छथि श्रेष्ठ कृष्ण नृप बीच, सहदेव सुनि वचन चरण पखारय लाग।
चेदिराज शिशुपालसँ सहल नहि भेल, अपशब्द कृष्ण-भीष्मकेँ देबए लागल, दुर्योधन-भ्राता प्रसन्न छल भेल, भीमक क्रोध बढ़ल छल ओ झपटल,
भीष्म रोकि शांत छल ओकरा कएल।
शिशुपालक गारि सुनियो छल कृष्ण प्रशांत, छलाह किएक तँ ओ पिसियौत कृष्णक, दिन बीतल कृष्ण देलथि वचन दीदीकेँ एक, सए अपराध क्षमा हम करब ओकर।
सए गारि सुनलाक उपरांत चलल सुदर्शन, चक्र कएलक चेदिराजक शिरोच्छेद तखन, सभा मध्य शांति – पसरल छल जाए, शिशुपाल पुत्रकेँ चेदिक गद्दी पर बैसाय।
यज्ञक क्रिया निर्विघ्न संपन्न छल भेल, सभ राजाकेँ ससम्मान विदा कएल गेल।
सभा भवनक चामत्कृत्य भेल चर्चित, दुर्योधन-शकुनि भवनकेँ देखल चकित। नीचाँ देखि मृग-मरीचिका बान्हल फाँढ़, पानि नहि छल हसलि द्रौपदी ई जानि, अएना सोँझा पारदरर्शी नहि ई देखल,
ओ चोटिल भीमक अट्टहाससँ विकल।
आँगा स्फटिक फर्श छल जकरा बुझल, पानि भरल भीजल छल सभ हँसल।
अपमानित छल लए युधिष्ठिरसँ आज्ञा, चलल हस्तिनापुर शीघ्रहि सभ भ्राता। क्रोधित हृदय ईर्ष्याक वशमे छल दुर्योधन, शकुनि संग मंत्रणा कए कऽएकटा विचारल, सोझे युद्धमे पांडवकेँ हरेनाइ अछि मोश्किल, सोचि ई दोसर व्यूह रचलन्हि दुष्ट शकुनि।
भव्य सभा भवन एकटा हम सभ बनाएब,
पाण्डव-जनकेँ देखबा लेल सेहो बजाएब, द्यूत खेलक छी महारथी हम गांधारवासी, धृतराष्ट्रकेँ कहि आमंत्रित कराऊ बजाऊ। भवन बनि कए तैयार भेल एके निसासी।
द्यूत खेलक आमंत्रणक हेतु धृतराष्ट्र विचारल। विदुर कहल राजन् खेल करत विनाश सभकेँ,
दुर्योधनक अंधप्रेममे धृतराष्ट्र मुदा नहि मानल।
स्वयं विदुर गेलाह देबए निमंत्रण इंद्रप्रस्थ, पाण्डव जनकेँ अएला पर भेल प्रेम-मिलन। मुदा हृदयक विष बहराइत जल्दी कोना कए, दुर्योधन लए गेलाह युधिष्ठिरकेँ सभा भवनमे।
द्यूतक चर्च सगरय होमए लगल छल ओतए, शकुनि माटि फेंकि कहल युधिष्ठिर भऽ जाए, सकुचाइत छी क्षत्रिय भऽ करए छी अनुचित। युधिष्ठिर तैयार जखने भेलाह, दुःशासन कहल, ई खेल होएत यधिष्ठिर आ दुर्योधनक बिच, मामा शकुनि पास फेंकताह दुर्योधनक दिशिसँ, हुनक हारि जीत मानल जईत दुर्योधनक से, दोसर दिन खेल भेल सभा भवनमे भारतक हे!! सभा भवन दर्शकसँ छल भरल,छल ओतए,
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर, धृतराष्ट्र उपस्थित।
पहिने रत्नक बाजी फेर चानी-सोनक लागल, फेर छल सभक अश्व-रथ लागल जुआ पर ।
मुदा जखन तीनू टा बाजी युधिष्ठिर हारल, सौँसे सेना लगाओल दाँव पर ओ अभागल। फेर बेर आएल राज्यक फेर चारू भाँय केर, युधिष्ठिर बाजल नहि बचल लग हमरा लेल।
शकुनि कहल छथि द्रौपदी अहाँक बिचमे। एहि बेर ज्योँ जीतब अहाँ, दए देब हम सभ, भाइ,राज्यसेना,अश्व-रथ,रत्न चानी सोन सभ।
युधिष्ठिर सुनि ई भऽ गेल छल तैयार जखने, हा। धिक्। पापकर्म की भए रहल अछि ई। सभा बिच उठि पड़ल सभक नाद ई सभ। युधिष्ठिर सेहो कहल हम कएलहुँ की ई ?
आनन्द मग्न कौरव छल, मुदा संतप्त एकेटा, दुर्योधन-भ्राता युयुत्सु छल शोकाकुल सएह टा, शकुनि आब एहि सभक बीच, फेकलक पासा, ई बाजी हमर, हुंकारलक शकुनि हारल युधिष्ठिर !!
द्रौपदीकेँ हारि ठकाएल ठाढ़ छल सभा बिच।
भय मदान्ध दुर्योधन कहल हे विदुर,
जाऊ समाचार ई द्रौपदीकेँ जाए सुनाऊ।
छथि ओ हमर दासी झाड़ू-बहारू करथि,
महलमे आबि हमर ई आदेश सुनाऊ।
विदुर कहल औ दुर्योधन घमण्ड छोड़ू,
स्त्रीक जुआरी अहाँ हमरा नहि बुझु।
देखि विदुरक ई रूप पठाओल विकर्णकेँ,
जाऊ दासी द्रौपदीकेँ जाए आनू गए,
विकर्ण ई द्रौपदी लग कहि सुनाओल।
चकित द्रौपदी कहल स्वयंकेँ जे हारल,
युधिष्ठिर कोनाकेँ अधिकार ई पाओल,
अपन हारिक बाद होएत क्यो सक्षम,
दोसरकेँ हेतु जुआमे लगाबए केहन।
ई प्रश्न जखन राखल विकर्ण सभा बीच आबि,
दुर्योधन कहल दुःशासन जाऊ पकड़िकेँ लाऊ।
बुझाओल द्रौपदी दुःशासनकेँ, जखन ने मानल,
भागलि गांधारीक भवन दिशि, दौगल दुःशासन,
खूजल केशकेँ पकड़ि घिसिअओने छल आनल।
हा! भारत ! ब्यास मुदा नहि अहाँ कोनो तथ्य नुकाओल ।
सम्बल उदार भावनाक देल, तुष्टि पाओल!!
सभा भवन महापुरुष नहि थोड़ जतए छल।
भीष्म, विदुर, द्रोण, कृपा लाजक लेल गोँतने,
गारि माथ देखि रहल द्रौपदीक अश्रुपात।
सिंहनादमे भीम तखन ई बाजल,
सूर्य देवतागण रहब साक्षी अहाँ सभ,
हाथसँ दुःशासन केश द्रौपदीकेँ धएने,
उखाड़ि फेंकब हाथ ओकर ओ दूनू।
कौरव भए सँ भीत भेलाह नादसँ भीमक,
दुर्योधन देखल मुदा देखि ई छल बाजल,
जाँघ पर दैत थोपड़ी करैत घृणित इशारा,
द्रौपदीकेँ बैसबा लए ओतए कहैत छल।
गरजि कहल भीम अधम दुर्योधनसँ,
तोहर जाँघकेँ तोडब प्रचण्ड गदासँ।
खिसियाकेँ दुर्योधन देलक ई आज्ञा पुनः ई,
चीर-हरण करू दुःशासन द्रौपदी दासी छी।
द्रौपदी कएलन्हि नेहोरा श्रेष्ठ लोकनिसँ
विनय ई अछि लाज बचाऊ करैत छी विनती।
सभ क्यो झुका माथ अपन ओहि सभामे,
कृष्णा छोड़ल सभ आश सभ दिशासँ,
भक्त्त वत्सल अहाँसँ टा अछि ई आशा,
कोहुना राखू हमर ई लाज अछि प्रत्याशा।
आर्द्र-स्वरसँ छलि रहलि पुकारि द्रौपदी,
गोहाड़ि खसलि सभा-बिच, मूर्च्छित ।
लागल खीचय द्रौपदीक वस्त्र दुःशासन,
सभासद देखल चमत्कार ई प्रतिपल,
यावत रहल खिंचैत वस्त्रकेँ दुःशासन,
बढ़ैत रहल वस्त्र द्रौपदीक तावत तखन।
थाकि-हाँफि बैसल जखन दुःशासन,
कहल भीम सुनू सभ एहि भवनमे,
यावत फाड़ि छाती दुःशासनक ऊष्म रुधिरकेँ,
पीयब, नहि पियास मेटत मृत्यु भेटत नहि।
सुनि प्रतिज्ञा ई सभ भयसँ थड़थड़ाए लागल छल।
धृतराष्ट्र देखि दुर्घटना द्रौपदीकेँ लगमे बजाओल,
सांत्वना दए शांत कएल युधिष्ठिरसँ छल बाजल,
बिसरि जाऊ इन्द्रप्रस्थ सुख-शांतिसँ रहए जाउ,
जे हाड़लहुँ, से बुझू देल हम ठामहि लौटाएल ।
संतोष भेलन्हि पाण्डव-जनकेँ ई सुनि,
कथा धृतराष्ट्रक घुरलाह इन्द्रप्रस्थ पुनि।
दुर्योधन दुःखित मंत्रणा कएल शकुनिसँ,
संग दुःशासन कर्णक मंत्रणा फेर जुआक,
विनाशक हस्तिनापुरक छल बेर खराप।
एहि बेरक निअम राखल हारत जे से करत,
बारह वर्षक वनवास आ एक वर्ष अज्ञातवास।
धृतराष्ट्र दूत पठाओल हस्तिनापुर फेर।
युधिष्ठिर घुरलाह भाएक संग बेर-अबेर,
सुनाओल गेल शर्त्त सभ रोकल एक बेर।
मुदा भाग्यराजक आगाँ ककर अछि चलल,
नहि मानल कएल युधिष्ठिर भाग्यक खेल!
चलि फेर पासा दुर्योधनक, वैह खेरहा,
फेंकि गोटी जिताओल शकुनि ओकरा।
हारि हारल राज्य, पाओल छल बनबास,
युधिष्ठिरक भाग्य चालि कुचालिक जीत,
राज्यक निर्णय जुआक गोटीक संगीत,
की होएत से नञि जानि सुन्न अकास।
धर्मराज सभ हारि,
चलल फेर वैह पथ,
धर्मक आ शान्तिक,
छोड़ि सभ बिसारि।
माता कुन्ती छलि वृद्धा भेलि कहल,
कहल धर्मराज नञि जा सकब अहाँ,
विदुर काक केर घर जा रहब,
जाएब कर्म भोगए हम सभ।
द्रौपदीक पाँचू पुत्र आ पुत्र अभिमन्युक,
सुभद्रा जएतीह अपन नैहर द्वारकापुर।
धौम्य पुरहित संग द्रौपदी आ चारू भाए,
काटब हम संग तेरह वर्षक वनवास जाए।
नगरवासी सुनि गमनक ई समाचार,
कएलन्हि दुर्-दुर दुर्योधनक अत्याचार।
जाएब हमहुँ सभ संग, धर्मराज आइ,
धर्मराज घुराओल सभकेँ बुझाए जाए।
सभ घुरि गेल मुदा, नहि घुरल विप्र जन,
पुरहित कएलन्हि उपासना सूर्यक एहि क्षण।
वैह दैत छथि अन्न-फल समग्र आर्य,
उपासनाक उपरान्त प्रगट भेलाह सूर्य।
देलन्हि अक्षय पात्र नहि कम होएत अन्न,
द्रौपदी सभ विप्रकेँ आ पाण्डवकेँ खोआबथि,
फेर खाथि, सभ अघाथि, नञि होए खतम,
जखन नञि होए खतम पात्रसँ खाद्यान्न।
युधिष्ठिर पहुँचि सरस्वती धारक कात,
काम्यक वनमे कएलन्हि निवास।
एहि बीच सुनैत पाण्डव-प्रशंसा मुँहसँ विदुरक,
धृतराष्ट्र निकालि हटाओल विदुरकेँ दरबार-मध्य।
ओहो आबि लगलाह रहए काम्यकवनमे,
पुनि पठाओल धृतराष्ट्र ओतए संजयकेँ।
पाण्डव-जनक बुझओला उत्तर विदुर,
धृतराष्ट्र सँग गेलाह पुनि दरबार घुरि।
ऋषि-मुनिक सत्संगसँ लैत शिक्षा आ दीक्षा,
अगस्त्यक, ऋषि श्रृंग, अष्टावक्रक, लोपामुद्राक,
सुनैत छलाह कथा सरिता नल दमयन्तीक ।
कृष्ण आबि बुझाओल ब्यास अएलाह !!
ब्यास कहल युद्धक हेतु करू तैय्यारी,
बिनु इन्द्रक अमोघ शिवक पाशुपत्याह,
कोना लड़ब संग भीष्म द्रोण महारथी ?
पाबि युधिष्ठिरक आज्ञा चललाह अर्जुन,
पर्वत कैलास पर पार कए कऽ गंधमदन।
तूणीर आ धनुष हुनकर संगमे छल,
साधु जटाधारी तपस्वी अर्जुनसँ पुछल।
ई छी तपोभूमि शस्त्रक काज नहि कोनो,
अर्जुन कहल हम क्षात्र धर्म कहाँ छोड़ल।
तावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि,
प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।
माँगू वत्स वर हमरासँ प्रसन्न छी हम,
शिक्षाक संग दिव्यास्त्र भेटए एहि क्षण।
अर्जुन अहाँक ई लालसा पूर्ण होएत मुदा,
जाऊ शिवकेँ प्रसन्न कए पाशुपत पाऊ।
फेर देवगण देताह दिव्यास्त्र अहाँकेँ,
ई शस्त्र सभ मानव पर चलाएब अछि वर्जित,
कहू अहाँ पाबि करब की दिव्यास्त्र सभ ई।
शक्त्ति-संचय अछि हमर उद्देश्य मात्र देव,
कौरव छीनल अछि राज्य छलसँ परञ्च,
नहि करब एकर कोनो कुप्रयोग नहि हम।
इन्द्रक अन्तर्धान भेलाक उत्तर अर्जुनक,
शिव तपस्या कठोर छल होमए लागल।
तखन पार्वती संग शिव चललाह तपोभूमि,
अर्जुन पुष्प बीछि रहल छलाह अबैत क्षण,
वाराह वनसँ निकलि कए सम्मुख आएल।
जखनहिँ तूणीर धनुष राखि संधान कएलक,
किरात वराहकेँ लक्ष्य कएने दृष्टि आएल।
दुनू गोटे चलाओल वाण वाराह मारल,
एहि बात पर दुहू गोटे झगड़ा बजारल।
अर्जुनक गप पर जखन ठठाइत किरात,
अर्जुन ओकरा पर तखन वाण चलाओल,
परञ्च देखि नहि घाव कोनो प्रकारक,
अर्जुन किरात पर छल तलवार भाँजल।
मुदा किरातक देहसँ टकाराइत देरी,
भेल अर्जुनक खड्गक टुकड़ी छुबैत देरी।
मल्ल युद्ध शुरू भेल भेल अचेत अर्जुन,
उठल जखन शुरू कएल पूजन कुलदेवक ओ,
पुष्प पहिराए शिवकेँ उठल गर छल ओ माला,
किरातक गरदनि मध्य, देखि साष्टांग कएल तहिखन।
किरात वेशधारी शिव कहल वर माँग अर्जुन,
पाशुपत अस्त्र माँगल, छोड़ब रोकब एकरा सीखल पुनि।
शिव कहल बुझू मुदा ई तथ्य अछि जे,
मनुष्यक ऊपर एकर प्रयोग कखनहु करब नञि।
तखन अर्जुन निकलि गेल इन्द्रलोक दिशामे,
पाबि दिव्य अस्त्रक शिक्षा मारल असुर ओहिसँ।
एक दिनुक गप उर्वशा आयलि करैत याचना प्रेमक,
अर्जुन कहल अहाँ तँ छी अप्सरा गुरु इन्द्रक।
माता तुल्य भेलहुँ ओहि संबंधसँ अहाँ हमर,
आएल छी हम एतए शिक्षा प्राप्तिक लेल शस्त्रक,
तपस्या नृत्यक आ संगीतक करए भोग नहि,
ताहि दृष्टिये अहाँ भेलहुँ हमर माता गुरु दुनु।
उर्वशी तखन देलक ओकरा शाप ई टा,
कामिनीक अहाँ शाप सुनू निर्वीर्य रहब अहाँ ।
वर्ष भरि मुदा किएक तँ कहल माता,
शाप ई पुनि बनत वरदान नुकाए सकब अहाँ।
पाण्डव जन सेहो पाबि रहल ऋषि मुनिसँ शिक्षा,
समाचार देलन्हि नारद अर्जुनक कहल अएत,
लोमश ऋषि आबि समाचार अर्जुनक सुनाएत।
किछु दिनमे लोमश ऋषि अएलाह ओतए,
कहल प्राप्त कए पाशुपत शिवसँ कैलासमे,
अर्जुन देवलोकमे प्राप्त दिव्याशस्त्र कएल,
नृत्य संगीतक शिक्षा अप्सरा गंधर्वगणसँ
लए रहल शिक्षा अर्जुन देवलोकमे सनजम सँ।
तखन ऋषि तीर्थाटन कराऊ हमरा लोकनिकेँ,
लोमश तखन गेलाह नैमिषारण्य पाण्डव संग।
प्रयाग गया गंगासागर पुनि टपि कलिंग पहुँचल,
पच्छिम दिशि प्रभासतीर्थ यादवगण जतए छल।
स्वागत भेल ओतए सुभद्रा मिललि द्रौपदीसँ,
बलराम कृष्णक सांत्वना पाबि बढ़ल आगाँ,
सरस्वती पार कए कश्मीर आ गंधमादन पर्वत,
पार कए चढ़ल पर्वत वर्षा आ शिलापतन बिच।
पहुँचि गेलाह बदरिकाश्रम विश्राम कएल ठहरि।
ओतहि दुःशला पति जयद्रथ काम्यक वनसँ,
छल जा रहल देखल द्रौपदीकेँ असगर ओतए,
पाण्डवगण गेल छल शिकारक लेल तखन।
बैसल कुटीमे विवाह प्रस्ताव देल द्रौपदीकेँ,
नीचता देखि द्रौपदी कठोर वचन जखन कहल,
रथमे लए भागल अपहरण कए दुष्ट जयद्रथ।
आश्रम आबि पाबि समाचार भीम ओकरा पर छुटल,
तखनहि अर्जुन सेहो आएल पाछू जयद्रथक गेल,
युधिष्ठिर कहल प्राणदान देब पति दुःशलाक छी ओ,
जयद्रथ देखल अबैत दुनू भाएकेँ द्रौपदीकेँ छोड़ि भागल,
भीम पटकि बान्हि आनल ओकरा द्रौपदीक सोझाँ,
द्रौपदी अपमानित कए छोड़बाओल ओकरा।
शिवक तपस्या कएल जयद्रथ वरदान माँगल,
जितबाक पाँचू पाण्डवसँ कहल शिव ई,
नहि हारब अहाँ कोनो भाएसँ अर्जुनकेँ छोड़ि।
ब्यास परिश्रमकेँ तपस्याक नाम देल,
आँखि मूनि मुदा ई पश्चात् मञ्चित भेल !!
कर्ण छल तपस्या कए रहल अर्जुनकँ हरएबा लेल,
इन्द्र सोचल शरीरक कवच कुण्डल अछैत ओ,
हारत नहि ककरहुसँ दानवीर पराक्रमी ओ छल।
सोचि ओकरासँ हम माँगब कवच कुण्डल,
देखि ई सूर्य कएलन्हि होऊ सचेत कर्ण,
आबि रहल इन्द्र छद्म वेषमे याचना करत ई,
कवच कुण्डल छोड़ि किछु माँगत नहि ओ।
कहल कर्ण याचककेँ हम नहि नञि कहब प्रण,
प्रण हमर नहि टूटत चाहे जे परिणाम होमए।
तखनहि विप्र वेशमे इन्द्र आबि दुहु वस्तु माँगल,
ठोढ़ पर मर्मक मुस्की कर्णक हाथ शस्त्र आएल,
काटि देहसँ कवच कुण्डल समर्पित कएल तखनहि,
इन्द्र देल वर माँगू छोड़ि ई वज्र हमर आर किछुओ,
अमोघ शक्त्ति माँगल कर्ण इन्द्र देलन्हि कहि कए,
मारत जकरा पर चलत पुनि घुरत लग हमर अएत।
शनैः-शनैः छल बीति रहल बारह वर्ष एहिना,
एक वर्षक अज्ञातवासक विषयमे विचारि रहल,
विचारि युधिष्ठिर रहल भाए आ द्रौपदीक संग,
तखने कनैत खिजैत एकटा विप्र आएल ।
कहल अरणीक लकुड़ी छल कुटीक बाहर टाँगल,
हरिण एक आबि कुरयाबए लागल ओहिसँ,
जाए काल सिंहमे ओझरायल अरिणी ओकर,
विस्मित भागल ओ लए हमर लकुड़ी,
कोना कए होमक अग्नि आनब चिन्तित छी।
विप्रक संग पाँचो भाँए हरिणकेँ खेहारल,
मुदा छल ओ चपल भए गेल ओझल।
वरक गाछक नीचाँ ओ सभ लज्जित पिआसल,
ठेहिआएल बैसल नकुल गेल सरोवर पानि आनए।
एकटा ध्वनि आएल ई चभच्चा हमर छी,
उत्तर हमर प्रश्नक बिनु देने पानि नञि भेटत ई।
नहि कान देल ओहि गप पर हकासल पिआसल,
पानि जखने पिएल अरड़ा कए मृत ओ खसल।
सहदेवक संग सेहो एहने घटना घटल छल,
अर्जुन जखन आएल फेर वैह ध्वनि सुनल ।
शब्दभेदी बाण छोड़ल मुदा नहि कोनो प्रतिफल,
पानि पीबैत देरी ओहो मृत भए खसल छल।
युधिष्ठिर भए चिन्तित भीमकेँ पठाओल ताकए,
पानि पीबि मृत भए नहि घुरल ओतए।
युधिष्ठिर जखन वन बीच सरोवर पहुँचल,
मृत भाए सभकेँ देखि व्याकुल पानिमे उतरल।
वैह ध्वनि आएल उत्तरक बिना प्यासल रहब,
होएत एहि तरहक परिणाम ज्योँ धृष्टता करब।
ई अछि कोनो यक्ष सोचि युधिष्ठिर बाजल,
पुछू प्रश्न उत्तर सम्यक देब शुरू भेल यक्ष।
मनुष्यक संग के अछि दैत? प्रथमतः ई बाजू,
धैर्य टा दैछ संग मनुक्खक सदिखन सोकाजू।
यशलाभक अछि कोन उपाय एकटा?
दान बिनु यश नहि भेटैछ कोनोटा।
वायुसँ त्वरित अछि कोन वस्तु?
मनक आगाँ वायुक गति नहि कतहु ।
प्रवासीक संगी अछि के एकेटा ?
विद्याक इतर नहि संगी एकोटा।
ककरा त्यजि कए मनुक्खकेँ भेटैछ मुक्त्ति?
अहं छोड़ल तखन भेटत विमुक्त्ति।
कोन वस्तुक हराएलासँ नहि होइछ मन दुःखित?
क्रोधक हरएलासँ किए होअय क्यो शोकित।
कोन वस्तुक चोरिसँ होइछ मनुक्ख धनिक?
लोभक क्षति बनबैछ पुष्ट सबहिँ।
ब्राह्मण जन्म, विद्या, शील कोन गप पर अवलम्बित?
शील स्वभाव बिनु ब्राह्मण रहत नहि किछु।
धर्मसँ बढ़ि अछि की जगतमे?
उदार मनसि उच्च पदस्थ सभसँ।
कोन मित्र नहि होइत अछि पुरान?
सज्जनसँ कएल गेल मित्राताक कोना अवसान।
सभसँ पैघ अद्भुत की अछि एहि जगमे?
मृत्यु सभ दिनु देखनहु अछैतो जीवन लालसा,
एहिसँ बढ़ि अद्भुत आश्चर्य अछि की?
प्रसन्नचित्त भए यक्ष कहल युधिष्ठिर कहू,
कोनो एक भाएकेँ हम जीवित कए सकब।
तखन नकुलकेँ कए दिअ जीवित,
सुनि यक्ष पूछल कहब तँ भीम अर्जुन कोनोकेँ,
जीवित करब जकर रण कौशल करत रक्षा।
धर्मराज कहल धर्मक बिना नहि होइछ रक्षा,
कुन्ती पुत्र हम युधिष्ठिर जिबैत छी,
माद्री मातुक पुत्र जिबथु नकुल सैह उचित।
सुनि कहल हिरण वेशधारी यमराज हे पुत्र,
पक्षपात रहित छी अहाँ तेँ सभ भाए जीबथु।
पुत्रकेँ देखि मोन तृप्त भेलन्हि यमक,
पाण्डव गण तखन घुरि द्रौपदीक लग गेलाह।
पूर्ण भेल वनवासक वर्ष बारह अतीत,
एक वर्षक छल अज्ञातवास बड़ कठिन,
दुर्योधनकेँ यदि हुनक संकेतक चलए पता,
पुनि द्वादश वर्षक वनवासक छल प्रथा।
प्रातःकाल सभ विदा भेलाह विराट नगर दिशि,
धर्मराज कंक नाम्ना ब्राह्मण वेश धारित मिलि।
कौड़ी आ चतुरंग गोटीसँ विराटराजक मोन लगाएब,
भीम बनि पाचक नाम वल्लभक पाकशाला सम्हारथि।
विराटक पुत्रीकेँ संगीत नृत्य अर्जुन,
नारी वृहन्नला बनि सिखाबथु,
ग्रंथिक नामसँ नकुल अश्वक करए रखबारि,
सहदेवक नाम तंत्रपाल भेल करथि चरबाहि।
रानीकेँ सजाबथि द्रौपदी नाम धरि सैरन्ध्रीक।
सभ ई सोचि नुकाओल अस्त्र-शस्त्र,
शाखा बिच शमी-वृक्ष एकटा विशाल मध्य।
जखन वेश धरि पहुँचलाह विराट राजा लग,
स्वीकारलन्हि ओ सभटा प्रार्थना स्वतः।
दिन छल बीति रहल मुदा रानी सुदेष्णाक,
भाए छल कीचक दुष्ट देखि सैरन्ध्रीक भेल मुग्ध।
बहिनसँ पूछल कोन देशक राजकुमारी छथि,
कहल बहिन नहि छी निकृष्ट दासी ई।
मुदा कीचक पहुँचि द्रौपदी लग बाजल,
सुन्दरी दास बनाऊ हम मुग्ध पागल।
सैरन्ध्री कहलन्हि, हम विवाहिता एक दासी,
अहाँक पालिता छी नहि पुनि गप ई बाजी।
मुदा कीचक बहिनिसँ पुनि अनुरोध कएलक।
पर्व दिन सुदेष्णा किछु वस्तु अनबा हेतु कहलक,
सैरन्ध्रीकेँ कीचक लग जाए तकरा आनए पठेलक।
मुदा ओतए देखि वासनाक आँखि भागलि,
भीमसँ जाए बाजलि धिक कहलि पाण्डवकेँ ।
भीम बाजल आब जे ओ भेँट होअए,
नाट्यशालामे बजाऊ आध राति सोचब फेर ई,
हमरा की करबाक अछि ओहि दुष्टकेँ ओतए।
कीचक विराटक सेनाक प्रमुख सेहो छल,
सैरन्ध्रीक आमंत्रणकेँ नहि बूझि पहुँचल अभागल।
स्त्री वेष धरने भीम ओतए प्रतीक्षित,
केश पकड़ि पटकल, लात-हाथ मारल कीचककेँ ओतहि।
भोर होइत ई गप पसरि गेल चारू दिशि,
कीचककेँ मारल गंधर्वपति सैरंध्रीक।
सैरन्ध्रीक प्रति भय-श्रद्धा दुनू पसरल,
दुर्योधन छल बुझल अज्ञातवासक कथा,
छल ताकिमे तकबाक पाण्डवक पता,
छी ई द्रौपदी सैरन्ध्रीक भेषमे अभरल।
पाण्डव छद्म-भेष बनओने छथि गांधर्वक,
कीचकसँ अपमानित राजा त्रिगर्त देशक,
मिलि दुर्योधनसँ कए गौ-हरणक विचार
विराट राजसँ ओ लेत बदला आब।
दुर्योधन लए संग भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण,
आक्रमण विराट पर लए अश्वत्थामा संग।
त्रिगर्त राज सुशर्मा घेरि गौ-विराटराजक,
बान्हि विराटकेँ जखन ओ सोझाँ आएल।
ललकारि कएल भीमकेँ सोर युधिष्ठिर-कंक,
वल्लभ-भीम ग्रंथिक-नकुल तंत्रिपाल-सहदेव।
खोलि बन्धन विराटक बान्हि देल सुशर्मन्,
वृहन्नला बनि सारथी पुत्र विराटराज उत्तमक।
रथ आनल रणक्षेत्र उत्तमकुमार भेल घबराएल,
गेल अर्जुन शमी गाछ लग उतारि शस्त्र आएल,
गाण्डीव अक्षय तुणीर आनि परिचय सुनाओल।
उत्तमकुमार बनल सारथी वृहन्नला-अर्जुनक संग,
वेगशाली रथ देखि दुर्योधन पुछल हे भीष्म।
अज्ञातवासक काल भेल पूर्ण वा न वा कहू,
भीष्म कहल पूर्ण तेरह वर्षक अवधि भेल औ।
अर्जुन उतारल अपन रोष कर्ण पुत्र विकर्ण पर,
मारि ओकरा बढ़ल आगाँ कर्णकेँ बेधल सेहो।
द्रोण-भीष्मक धनुष काटल मूर्च्छित कएल सेना सकल,
द्रोण-कृप-कर्ण-अश्वत्थामा-दुर्योधनक मुकुट वस्त्र सभ,
उत्तमकुमार उतारल सभटा गौ लए नगर तखन घुरल।
मूर्च्छा टूटल सभक जखन कहल करब युद्ध पुनः,
भीष्म नहि मनलाह दुर्योधन घुरु बहु भेल आब अः।
उत्तमकुमार नहि करब प्रगट भेद हमर अर्जुन कहल,
विराट भेल प्रसन्न वीरता सुनि उत्तमक आबि घर।
पञ्च पाण्डव द्रौपदीक तखन परिचय हुनका भेटल,
प्रस्ताव कएल पुत्री उत्तराक विवाह अर्जुनसँ करब।
अर्जुन कहल पढ़ेने छी हमर शिष्या अछि ओ रहलि,
पुत्र अभिमन्युसँ होएत विवाहित उत्तरा ई प्रस्ताव छल।
वाह ब्यास वाह, बाल-अमेल विवाह विरोध, की चतुरता कौशल कवित्वक कएल औ।
कृष्ण-बलराम द्वारकासँ बरियाती अभिमन्युक लए अएलाह,
उत्तराक विवाह अभिमन्युक संग भेल बड़ टोप-टहंकारसँ।
छलाह आएल राजा वृन्द अभिमन्युक विवाह पर,
भेल राजाक सभा जतए कृष्ण कएल विनती ओतए।
द्यूत खेल शकुनीक, अपमान द्रौपदीक कएल जे,
दुर्योधन छीनल राज्य युधिष्ठिरक अधर्मसँ से।
बाजू प्रयत्न राज्य-प्राप्तिक कोना होएत वा,
दुर्योधनक अत्याचार सहैत रहथु पाण्डव सतत।
द्रुपद उठि कहल दुराचारी कौरवकेँ सभ जनए छथि,
कर्तव्य हमरा सभक थिक सहाय बनी पाण्डव जनक।
करए लगलाह पांडव युद्धक तैयारी विराट द्रुपदक संग पाबि
लगाए कुरुक्षेत्र लग पांडव रुकलाह शिविर पसारि।
दुर्योधनकेँ जखन लागल खबरि ओहो कएलक तैयारी,
संदेश पठाओल राजा सभकेँ कौरव पांडव तखन,
अपन पक्षमे करबा लेल युद्ध शुरु होएत जखन।
कुरुक्षेत्रक स्थलीमे सभटा जुटान लागल होए शुरू,
यादव गणकेँ पक्ष करबा लए दुर्योधन द्वारका गेल स्वयं।
पहुँचि दुर्योधन गेल देखल कॄष्ण छलाह सुतल ओतए,
अर्जुन सेहो पहुँचल पैर दिशि बैसि गेल ओ ओतए।
कृष्ण जखन उठि देखल अर्जुन छल ओतए,
कहू वत्स की चाही अहाँ आएल छी एतए।
युद्धमे संग अहाँक हमरा चाही हे नारायण,
अर्जुनकेँ बजिते दुर्योधन टोकल अएलहुँ पहिने एतए।
कृष्ण कहल हम शस्त्र नहि उठाएब युद्धमे,
नारायणी सेना चाही वा हमरा करब अहँ पक्षमे।
दुर्योधन नारायणी सेना चुनि भेल संतुष्ट आ,
अर्जुनकेँ नारायण भेटल छल प्रफुल्लित सेहो।
पांडव मामा छलाह शल्य माद्रीक भाए जे,
आबि रहल युद्धक लेल दुर्योधन सुनि गेल ओतए।
रस्तामे व्यवस्था-बात कएल तेहन छल,
शल्य कहल अछि मोन पुरस्कृत करी काज जकर।
दुर्योधन भेख बना जाए रहल छल ओतए,
प्रकट भए माँगल युद्धमे होऊ साहाय्य हमर,
एहि सभ व्यवस्थाक छी हमही निर्माण कएल।
शल्य दए स्वस्ति पहुँचलाह जखन कुरुक्षेत्र,
युधिष्ठिर सुनू छल भेल हमरा संग अतए।
कौरवक पक्षमे युद्ध करबा लए वचन बद्ध,
कहू कोन विध होए साहाय्य अहाँक वत्स।
युधिष्ठिर कहल बनू सारथी कर्णक आ करू,
हतोत्साहित कर्णकेँ गुणगान गाबि पांडवक।
शल्य कौरवक शिविर दिशि चललाह तखन,
युद्ध सन्निकट अछि कृष्ण अएलाह जानि सेहो,
एतए सुनल द्रुपदक पुरहित गेल छल धृतराष्ट्र लग।
संधिक प्रस्ताव पर देलक क्यो नहि टेर ओतए,
दुर्योधन कहल राज्य छोड़ू सुइयाक नोक देखने छी?
नहि भेटत पृथ्वी ओतबो राज्यक तँ छोड़ू बात ई।
ई सुइयाक नोँक भरि पृथ्वीक नहि देबाक बिम्ब छल, दुर्योधनक हठक ई आ धृतराष्ट्रक आकांक्षाक प्रतीक छल।
युधिष्ठिर कहल श्रीकृष्णकेँ आध राज्य छोड़ैत छी,
जाऊ कृष्ण पाँच गाम दुर्योधन देत ज्योँ राखू प्रस्ताव ई,
ओतबहिमे करब हम सभ भाँए माएक संग निर्वाह।
सात्यकीक संग कृष्ण हस्तिनापुरक लेल चलला जखन,
द्रौपदी कहलन्हि देखू केश फुजले अछि ओहिना धरि एखन,
कानि कहल संधि होएत युद्ध बिन खुजले रहत वेणी तखन।
कविक बिम्ब सुइया बराबड़ि जे नहि छोड़त हठ अपन, पाँच गामकेँ तँ बुझत ब्रह्माण्ड ओ हठी सदिखन।
कृष्ण कहल मानत नहि संधिक गप कखनहुँ दुर्योधन,
युद्ध अछि अनिवार्य मनोरथ पूर्ण होएत द्रौपदी अहँक।
कृष्ण जखन गेलाह हस्तिनापुर सभ प्रसन्न छल,
धृतराष्ट्र, दुःशासन-दुर्योधनक संग स्वागत कएल।
मुदा कृष्ण ओतए नहि ठहरि दीदी कुन्तीक लग गेलाह,
विदुरक गृहमे छलीह ओतए गप विस्तृत भेल आब।
कहल कुन्ती दीदी अहाँ जा कए कर्णकेँ परिचए दिअ,
आबि जएत भ्रातृ-पाण्डव लग सत्य ओ जानि कए।
दोसर दिन सभामे पहुँचलाह कृष्ण, छल छल ओतए मुदा,
दुर्योधन विचारल बान्हि राखब कृष्णकेँ अएताह ज्योँ।
भीष्म धृतराष्ट द्रोण कृप कर्ण शकुनि दुःशासन ओतए,
कृष्ण कहल शकुनिक चौपड़ दुर्योधनक दिशिसँ फेकब,
अन्यायपूर्ण छल ओहिना द्रौपदीक अपमान छल करब।
विराट पर आक्रमण पाण्डवकेँ सतेबाक उपक्रम बनल,
आध राज्य ज्योँ दए दी तखनो शान्तिसँ रहि सकैछ सभ।
सभ कएल स्वागत एकर दुर्योधन मुदा क्रोधित बनल,
कृष्णकेँ बन्हबाक आज्ञा देलक भीष्म तमसयलाह बड़।
तेज कृष्णक मुखक देखि कौरव भयसँ छल सिहरल।
दुर्योधन कहल पिता ज्येष्ठ हमर अंध छलाह से राज्य नहि भेटलन्हि,
हुनक पुत्र ज्येष्ठ हम से अधिकार हस्तिनापुर पर अछि सुनलहुँ।
पाण्डव अन्यायसँ लए राज्य करए छथि करैत तैय्यारी युद्धक,
कृष्ण अछि पाछाँ ओकर हम तँ रक्षा राज्यक करए छी।
कृष्ण कहलन्हि तखन पाँच गाम दिअ करबा लए निर्वाह,
मुदा दुर्योधन कहल राज्यक भाग नहि होएत गए आब।
कृष्ण बाजि जे हे दुर्योधन मदान्ध छी बनल अहाँ,
पाण्डवक शक्त्तिक सोझाँ नाश होएत निश्चित बुझू अहाँक।
कुन्ती बादमे गेलीह कर्णकेँ कहल दुर्वासाक मंत्र भेटल,
पढ़ल सूर्यकेँ स्मरण कए पुत्र हमर भेलहुँ अहाँ तखन।
प्रणाम कएल माताकेँ कर्ण तखन बजलीह सुनू ई,
ज्येष्ठ पाण्डव छी अहाँ, राज्य युधिष्ठिर देत अहीकेँ।
जखन नहि मानल कर्ण कुन्ती पुछल मातृऋणसँ,
उबरब कोना, कर्ण बाजल हे माता तखन सुनू ई।
अर्जुनकेँ छोड़ि चारू पाण्डवसँ नहि लड़ब पूर्ण शक्त्तियेँ,
अर्जुनकेँ मारब तखन बनब पुत्र अहीकेँ।
वा मरब हम पुत्र तैयो पाँच टा रहबे करत,
ई प्रतिज्ञा हम करए छी माता कुन्ती अएलीह घुरि।
कृष्ण आबि घुरि पहुँचि शिविर पाण्डवक जखन,
पाण्डव युद्धक कएल प्रक्रिया शुरू ओतए तखन।
सात अक्षौहिणी सेना घोड़ा, रथ, हाथी, सैनिकक,
अर्जुन भीम सात्यिकि धृष्टद्युम्न द्रुपद विराट लग।
कौरव सेहो एगारह अक्षौहिणी सेना कृपाचार्य शल्य भूरिश्रवा,
भीष्म द्रोण कर्ण अश्वत्थामा जयद्रथ कृतवर्मा भगदत्त छल।
धृष्टद्युम्न सेनापति पाण्डवक भीष्म कौरवक बनल,
कर्ण शस्त्र नहि उठेबाक कएल प्रतिज्ञा
भीष्म यावत युद्धक्षेत्रमे रहताह गए।
भीष्म कहल मारब नहि पाण्डवकेँ एकोटा,
सेनाक संहार करब यथा संभव होएत।
ब्यास धृतराष्ट्रक लग गेलाह कहल ब्यासजी सुनू,
अंधत्व भेल वर हमर कुल संहार देखब नहि किएक।
मुदा वीरक गाथा सुनबाक अछि इच्छा बहुत,
ब्यास देल योगसँ दिव्यदृष्टि संजयकेँ कहल,
बैसले-बैसल देखि संजय वर्णन करताह युद्धक,
बाजि ई ब्यास बिदा भए गेलाह ओतएसँ।
भेल भोर रणभूमिमे कौरव-पाण्डव जुटल सेना सहित
आगाँ भीष्म कौरवक आ पाण्डवक अर्जुन-कृष्ण रहथि।
भीष्मक रथक दुहुओर दुःशासन दुर्योधन छलाह,
पार्श्वमे अश्वत्थामा गुरु द्रोणक संग भाग्य आह।
युद्ध कए राज्य पाएब मारि भ्राता प्रियजनकेँ,
सोचि विह्वल भेल अर्जुन गांडीव खसत कृष्ण हमर।
कर्मयोग उपदेश देल कृष्ण दूर करू मोह-भ्रम,
स्वजन प्रति मोह करि क्षात्रधर्मसँ विमुख न होऊ।
अधर्मसँ कौरवक अछि नाश भेल देखू ई दृश्य।
विराटरूप देखि अर्जुन विशाल अग्नि ज्वालमे,
जीव-जन्तु आबि खसथि भस्म होथि क्षणहि,
कौरवगण सेहो भस्म भए रहल छलाह,
चेतना जागल अर्जुनक स्तुति कएल सद्यः।
फलक चिन्ता छोड़ि कर्म करबाक ज्ञानसँ,
आत्मा अमर अछि शोक एकर लेल करब नहि उचित।
युधिष्ठिर उतरि रथसँ भीष्मक रथक दिस गेल,
गुरुजनक आशीर्वाद लए धर्मपालन मोन राखल।
भीष्म द्रोण कृपाचार्य पुलकित विजयक आशीष देल,
धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु देखि रहल छल धर्मनीति
छोड़ि कौरव मिलल पाण्डव पक्षमे तत्काल,
युषिष्ठिर मिलाओल गर ओकरसँ भेल शंखनाद।
अर्जुन शंख देवदत्त फूकि कएल युद्धक घोषणा,
आक्रमण कौरवपर कए रथ हस्ति घोटक पैदल,
युद्धमे पहिल दिन मुइल उत्तर विराटक पुत्र छल।
भीष्म कएल भीषण क्षति साँझमे अर्जुनक शंख,
बाजि कएल युद्धक समाप्ति भीष्म सेहो बजाओल अपन।
पहिल दिनक युद्धसँ पाण्डव शोकित दुर्योधन हर्षित।
दोसर दिनक युद्ध जखन शुरू भीष्म आनल प्रलय।
कृष्ण एना भए हमर सेना मरत चलू भीष्म लग,
हँ धनञ्जय रथ लए जाइत छी भीष्मक समक्ष।
दुहुक बीच जे युद्ध भेल विकराल छल थरथराएल सकल।
भीम सेहो संहारक बनल भीष्म छोड़ि अर्जुनकेँ ओम्हर दौगल,
सात्यिकीक वाणसँ भीष्मक सहीसक अपघात भेल,
खसल भूमि तखन ओ भीष्मक घोड़ा भागल वेगमान भए,
साँझ भेल शंख बाजल युद्ध दू दिनक समाप्त भेल।
तेसर दिन सात्यिकी अभिमन्यु कौरवपर छूटल,
द्रोणपर सहदेव-नकुल युधिष्ठिर आक्रमण कएल,
दुर्योधनपर टूटल भीम वाण मारि अचेत कएल,
ओकर सहीस दुर्योधनकेँ लए चलल रणक्षेत्रसँ,
कौरव सेना बुझल भागल छल ओ युद्ध छोड़ि कए।
भागि रहल सेनापर भीम कएलन्हि आक्रमण,
साँझ बनि रक्षक आएल दुर्योधन कुपित भएल।
भीष्मकेँ रात्रिमे कहल अहाँक हृदय अछि पक्षमे पांडवक,
भीष्म कहल छथि ओ अजेय परञ्च युद्ध भरि सक करब।
सक भरि युद्ध करबाक बात कहल भीष्म दुर्योधनकेँ,
चारिम दिन कएल आक्रमण प्रबल वेगेँ,
अर्जुन कएल प्रयत्न रोकबाक हुनका व्यर्थ,
पाँचम छठम आ सातम दिन एहिना सेहो बीतल।
आठम दिनक युद्ध भेल घनघोर,
अर्जुनक दोसर पत्नी उलूपीक पुत्र इरावान,
युध्य मध्य मरल अर्जुन भेल अधैर्य।
कएल युद्ध भयंकर भीष्मकेँ नहि टेरल,
दुर्योधन छल चिन्तित कर्णक ठाम गेल,
घुरि भीष्मकेँ कहल अहाँ छी अन्हेर कएल।
एहन रहत तखन बनाएब कर्णकेँ सेनाध्यक्ष,
भीष्म कहल बताह छी अहाँ भेल,
कर्णक वीरता विराटयुद्धमे नहि देखल?
नवम दिनक युद्ध छल भयङ्कर,
अर्जुनक रथकेँ भीष्म वाणसँ तोपल,
कृष्ण-अर्जुन अपघात रथ क्षतिग्रस्त,
घोटक रुकल अर्जुन शिथिल पस्त।
कौरवक उत्साह छल देखबा जोगर,
कृष्ण क्रोधित रथक पहिया लए छूटल,
मारब भीष्म खतम करब ई युद्ध।
अर्जुन पैर पकड़ि कए कहल हे कृष्ण
शस्त्र नहि उठएबाक कएने प्रतिज्ञा छी
लज्जित रथसँ कूदि छी हम आएल,
भीष्म सेहो देखल भए भाव-विह्वल।
रूप तेजमय शस्त्र लेने कृष्ण।
कृष्णक क्रोध भेल जा कए शान्त,
साँझक शंख कएल दिनक युद्धांत।
रातिमे युधिष्ठिर पुछलन्हि हे नन्दक नन्द,
भीष्मक पराजयक अछि की रहस्य,
भीम कहल अर्जुन नहि जानि किएक,
नहि प्रयोग कए रहल दिव्यास्त्र भीष्मपर।
कृष्ण कहलन्हि चलू पाँचू भाँए,
पूछि आबी हुनकहिसँ हुनक उपाय।
सभ पहुँचि पूछल बताऊ हे भीष्म,
अहाँक रहैत नहि हारत कौरव कथमपि।
सत्य धर्म दुहु भए जएत अलोपित,
भीष्म कहल छी देखि रहल भए त्रस्त,
अर्जुन नहि करि रहल प्रयोग दिव्यास्त्र,
मुदा हस्तिनापुरक सिंहासनसँ कटिबद्ध,
हा दुर्भाग्य! असत्यक मर्यादाक रक्षार्थ !
अछि शिखण्डी द्रुपदक पुत्र अहाँक पक्ष,
पूर्वजन्मक स्त्री अछि शिवक कएल व्रत,
हमर वधक लेल अछि सतत प्रतिपल।
द्रुपदक घरमे स्त्रीक रूप जन्म छल लेल,
दानवक वरसँ पुरुष रूप बनि गेल।
गुण स्त्रीत्वक अछि ओकरामे पार्थ,
स्त्रीगण हमर वाणक नहि छथि पात्र।
शिखण्डीकेँ सोझाँ कए जे वाण अहाँ चलाएब,
पूर्ण विवश तखने हम पार्थ भए जाएब।
भए आस्वस्त प्रणाम कए भीष्म पांडवगण,
घुरल दसम दिनुका युद्धक छल आयोजन।
आइ सेहो भीष्मक वाणक भेल बरखा,
मुदा शिखण्डी आएल सोझाँ हुनकर।
राखल अस्त्र भीष्म चलाओल वाण शिखण्डी,
मुदा कोनो नहि जोड़ ओकर वाणक छल किन्तु,
कृष्ण कहल लए अढ़ शिखण्डीक अर्जुन,
भीष्मक देहकेँ गाँथू करू नहि चिन्तन।
अर्जुनक शंका सुनि कहल तखन कृष्ण,
अस्त्र-शस्त्र संग जीतत क्यो नहि भीष्म,
अपनहि छथि ओ उपाय एहन बताओल,
बिनु विलम्ब कए वाण अहाँ चलाऊ।
अर्जुनक वाणक शुरू भेल बरखा,
खसल भीष्म पृथ्वी शय्या छल वाणक,
शरशय्यापर खसैत भीष्मक देरी छल,
युद्ध खतम भेल ओहि दिनक तत्काल।
कौरव पाण्डव जुमि अएलाह समक्ष,
भीष्म कहल दिअ गेरुआ माथतर। अह।
महग गेरुआ लए प्रस्तुत दुर्योधन छल,
ताकल भीष्म अर्जुन दिस अर्जुन भए साकांक्ष,
तीन वाण चलाओल आधार माथक भेल ।
प्यासल भीष्म जलक लेल कहल पुनः ई,
दुर्योधन स्वर्ण-पात्रमे जल अनबाओल,
ताकल भीष्म अर्जुन दिस फेर पार्थ चलाओल,
वाणसँ सोत निकलल जलक ऊपर दिस,
पानि खसल मुख भीष्म भेलाह फेर तिरपित।
सूर्य छथि अखन दक्षिणायणमे जाऊ सभ क्यो,
प्राण त्यागब हम उत्तरायणमे पहुँचल कर्ण सेहो।
करबद्ध प्रणाम कए लए आशीर्वाद ठाढ़ ओतए,
भीष्म कहल हे कर्ण युद्धकेँ रोकू कुन्तीपुत्र अहाँ छी,
अर्जुनकेँ नहि हरा सकब अहँक तुच्छ इच्छा ई।
कोन युद्धमे अर्जुनसँ छी बलशाली देलहुँ प्रमाण?
अहाँ बुझाएब दुर्योधन मानत छी हम जानि।
कर्ण कहल हम सारथीपुत्र दुर्योधनक पाओल सम्मान,
राजा भेलहुँ दुर्योधनक ऊँच उठाओल हमरा,
पाण्डव पौत्र अहाँक रहथि शस्त्र उठाओल किएक?
कौरवगणकेँ अहाँ किएक नहि बुझाओल,
युद्ध बढ़ल अछि आगाँ, कोना हम छोड़ब दुर्योधन मजधार।
दस दिनक युद्ध भेल बाद,
द्रोण बनलाह सेनापति आब।
दुर्योधन कहल करू एक काज,
युधिष्ठिरकेँ पकड़ि करू युद्ध समाप्त।
मुदा अर्जुन अछि ओतए सतत,
दूर हटएबाक करू कोनो अर्थ,
दुर्योधन बजाओल राजा देश त्रिगर्त,
राज सुशर्मा संस्पतक संग चलत,
लए अर्जुनकेँ दूर युधिष्ठिरक।
ओम्हर पाण्डव कएल युधिष्ठिरक रक्ष उपाय,
रक्षक रहत अर्जुन-भीम दुहु ओर दुहु भाए।
होएत किं कारणसँ कनिको दूर ज्योँ क्यो,
नकुल सहदेव सात्यिकी लेत स्थान रिक्त ओ।
द्रोणक संग छल कर्ण अशवत्थामा,
जयद्रथ कृप,कृतवर्मा, कलिंग नरेश।
त्रिगर्तराज सुशर्मा देलक ललकारा,
अर्जुन देखि सतर्क कएल सात्यिकी केँ।
गुरुशिष्य बिच आब शुरु होएत युद्ध,
तीर दुइ टा छोड़ि अर्जुन कएल आरम्भ,
खसल पदपर द्रोणक अर्जुनक ई दुहु वाण।
आह ब्यास प्रणाम !!
कए प्रणाम लए आशीष गुरुक आइ अर्जुन,
भिन्न रीतिक प्रेम नहि छल नुकाएल कहाँ।
कएल आक्रमण पाण्डवपर सोझाँसँ द्रोण पार्श्वसँ कर्ण,
सुशर्माक पाछाँ अर्जुन शल्य आबि गेल लड़बा लए भीमसँ,
कर्ण कएल आक्रमण सात्यिकी छल त्वरित ओतए।
सहदेवसँ भिड़ल शकुनि नकुल टा बाँचल ओतए,
द्रोण बढ़ल सोर भेल पकड़ल द्रोण युधिष्ठिरकेँ,
अर्जुन छोड़ि त्रिगर्त नरेश घुरि आएल जे,
द्रोण छोड़ल आशा पकड़बाक युधिष्ठिर,
साँझ भेल युद्ध बन्दीक शंखनादक बिच।
बारहम दिन सेहो त्रिगर्त सभ देल ललकारा,
मुदा वेगसँ आक्रमण कए अर्जुन कएल संहार,
घुरि बढ़ल देखल भगदत्त छल हाथीपर सवार,
हाथीक-अंकुश फेंकि कएल ओ अर्जुनपर प्रहार,
कृष्ण रोकल अंकुश, अर्जुन लेलक ओकर प्राण, अर्धचन्द्र वाणसँ।
द्रोण बढ़ल युधिष्ठिर दिस सत्यजित रक्षक छल आइ,
मारि अश्वकेँ द्रोणक सत्यजित रथक पहिआ देल काटि।
द्रोणक अर्धचन्द्रवाणसँ सत्यजितक गरदनि खसल अरड़ाए।
युधिष्ठिर मरितहि देखि सत्यजितकेँ घुरल रणसँ अविलम्ब,
अर्जुन नहि पाबि युधिष्ठिर भेल बताह मारल जन अथाह,
द्रोण देखि अर्जुनक ई रूप भेलाह हताश संध्याक शंखक आश।
दिन बितल दुर्योधन कहल हे गुरु द्रोण,
स्नेह अछि अहाँक पाण्डवक प्रति तेँ ई दोष,
द्रोण भेल क्षोभित कहल बनाएब चक्रव्यूह जकर तोड़,
अर्जुनक अतिरिक्त युधिष्ठिरक लग अछि नहि व्योँत।
फेर तेरहम दिनक युद्ध भेल शुरु जखन,
संसप्तक आ त्रिगर्तकेँ पछुआबैत गेल अर्जुन।
तखनहि युधिष्ठिरकेँ पता चल चक्रव्यूहक,
अभिमन्यु देखि चिन्तित काकाकेँ कहल,
गर्भमे सुनल पिता माताकेँ वर्णन सुनबैत छल,
च्क्रव्यूहक छह द्वारकेँ तोड़बाक सभटा,
स्मरण युद्धक वर्णनक विधि बचल नहि कोनोटा।
मुदा सातम द्वारक युद्धक वर्णन सुनल नहि,
माता सुतलि तखने बचल एकेटा द्वार सैह।
कवि ब्यासक पेटमे सीखि अएबाक बिम्ब, शब्दार्थ नहि वीरक अछि ई प्रतीक ।
सोझाँ तखन बढ़ल अभिमन्यु ककरो नहि बुझाएल,
कतए अछि द्वार कतए प्रवेश जयद्रथ रक्षक जतए,
आउ भीम काक ई अछि प्रवेश द्वार पैसब एतहि।
अभिमन्यु कए प्रहार जयद्रथपर वाणसँ गेल भीतर,
भीम दोसर सेनानीकेँ रोकि जयद्रथ ठाढ़ ओतहि।
दोसर द्वारपर द्रोण ठाढ़ जखने वाण चलाबथि,
काटल धनुष द्रोणक व्यूह भेदि बढ़लाह आगू।
तेसर द्वारपर चकित कर्णपर कए वाण बरखा,
बढ़ल चारिम द्वारपर अश्वत्थामा जतए छल,
युद्ध भेल घनघोर एतए मुदा रोकि सकल नहि,
अभिमन्युक रथ बढ़ल दुर्योधन भेल चिन्तित,
कर्ण आब करब की बाजू पराजय बुजाइछ निश्चित।
कर्ण बाजल सभ मिलि सातो महारथी हम सभ,
रोकि सकब एहि बालककेँ नहि क्यो सकत असगर।
सभ रथी आ पुत्र दुर्योधनक नाम लक्ष्मण जेकर,
पहुँचि गेल सातम द्वार पहुँचल अभिमन्यु तावत।
अभिमन्युक सारथी देखि ई दृश्य ओतए कहल,
ई सभ अधर्मी अछि जुटल, कहू तँ रथ घुराएब,
अर्जुन पुत्र हम नहि छोड़ब युद्ध हम एना देखू,
पार्थ-पुत्रक शौर्य रथ घुमाऊ चक्राकार कए अहँ।
तखन लक्ष्मण आएल सोझाँ अभिमन्युक ओतए,
वाणसँ काटल मस्तक लक्ष्मणक, द्रोण कहल, अजेय ई अछि अभेद्य एकर कवच करू प्रहार सिरसि आ
तखनहि सारथि अभिमन्युक खसल टूटि गेल रथ ।
नीचाँ आबि तरुआरि चक्र गदा लए ओतए ओ चलल,
दुःशासनक पुत्रसँ गदा युद्ध भेल दुनू ओतहि खसल ।
पहिने उठि दुःशासनक पुत्र प्रहार कएलक मस्तकपर,
सप्तरथीक बीच खसि पड़ल सुभद्रापुत्र पति उत्तराक।
सुभद्रा उत्तरा पहुँचि गेलीह सातम द्वार विलखैत,
उत्तरा कहलन्हि माता मृत्युक आज्ञा दिअ एतहि।
मुदा गर्भ छल उत्तराक पेटमे सुभद्रा बुझओलन्हि,
ओम्हर त्रिगर्त संसप्तककेँ करि पूर्णरूपेँ संहार,
अर्जुन घुरल सोचैत युधिष्ठिर होथि सुरक्षित ।
सुनि मृत्युक समचार विचल कृष्ण कहल अर्जुन,
कारण मृत्युक अछि मात्र बहनोइ-जयद्रथ,
कए शिवक तपस्या भेटल वर ओकरा ई,
अर्जुन छोड़ि आन पाण्डव नहि जीतताह ओकरा।
प्रथम द्वारपर ठाढ़ ओ रोकल चारू भाँएके ओतहि।
सुनतहि ई अर्जुन कएल वध करब काल्हि सूर्यास्तक पहिने,
जयद्रथक वध करब नहि तँ करब अग्निकेँ समर्पित ठामहि।
चौदहम दिनक युद्ध भेल प्रारम्भ,
शकट-व्यूह द्रोणक झाँपल जयद्रथ ।
द्वारपर व्यूहक प्रहरी द्रोण छलाह ठाढ़,
विकट युद्ध कृष्ण लेल रथ कनछियाह ।
द्रोण ललकारि कहल अर्जुन युद्धसँ रहल छी भागि,
मुदा अर्जुनकेँ आइ छल दोसर धुनि सबारि ।
कृष्ण रथ लए भीतर व्यूहमे पैसलाह,
बेरू पहर चिन्तित युधिष्ठिर पठाओल सात्यिकी भीम,
जाऊ अर्जुनक सहायार्थ कहि दुनू बढल आगाँ ।
भूरिश्रवा कएलक आक्रमण सात्यिकीपर तखन,
वाण अर्जुनक बढ़ल ओकर दिस दुहु हाथ कटल ओकर ।
की कएल अर्जुन अहाँ हम लड़ि रहल छलहुँ सात्यिकीसँ,
हमर हाथ काटल अहाँ अछि कोन न्याय बताऊ फरिछाकेँ।
अर्जुन कहलन्हि अभिमन्युक वध कएल अहाँ सभ कोना,
न्यायक बात करए छी, रक्षा कएल हम सत्यिकीक जेहाँ।
भूरिश्रवा खसल अचेत सात्यिकी काटल मूड़ी भूरिश्रवाक ।
अर्जुन देखि भीम सात्यिकीकेँ भेल चिन्तित घुरल,
युधिष्ठिरक मोन छलन्हि हुनका पड़ल ।
तखने सूर्यास्त भेल अर्जुन उतारि देल गाण्डीव,
चिता छल सोझाँ आगि धहधह,
करैत पाण्डवक आँखि झिलमिल।
बढ़ल अर्जुन बिना शस्त्र-अस्त्र चिता दिस,
बाजल कृष्ण क्षत्रिय अर्जुन लए अस्त्र जाऊ चितामे,
अक्षय तूणीर गाण्डीव नहि त्यागी मृत्यु संग जएत।
मुदा जखने अस्त्र लेलन्हि अर्जुन सूर्य निकलल घटासँ,
सोझाँ छल जयद्रथ अपटी खेतमे मरल ओतहि अर्जुनक हाथेँ।
मुदा कृष्ण कहलन्हि आब दुर्योधन करबाओत कर्णक अमोघ अस्त्रक प्रयोग,
भीमपुत्र घटोत्कचकेँ बजाऊ राक्षसी युद्ध रातिक करत ओ भयङ्कर,
आएल रातिमे घटोत्कच कए बरखा पानि आँकड़-पाथरक तत्क्षण ।
दुर्योधन देखि रूप ई विकराल भागैत कौरव सेनाकेँ देखल,
कर्ण मारू एकरा नहि तँ युद्ध निकलल जाइत अछि सकल।
विवश भए कर्ण छोड़ल अमोघ मरल घटोत्कच तखन,
पाण्डव दुखित भएल छल कर्ण सेहो चिन्तित।
रातिक भेल आक्रमणसँ क्षुब्ध क्रुद्ध कौरव आ द्रोण अएलाह,
युधिष्ठिरक रक्षार्थ एक दिस द्रुपद छल दोसर दिस विराट तकरा।
देखितहि द्रुपदकेँ द्रोणक खून छल खौलि गेल दिव्यास्त्रसँ लेल प्राण,
द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न पांचाल सेनाक संग आएल बिच बरखाक वाण।
प्रचंड रूप देखि द्रोणक कृष्ण कहल हे युधिष्ठिर अवन्तिराजक हस्ति,
नाम अछि अश्वत्थामा ओकरा मारल अछि भीम सद्यः।
पूछथि द्रोण जे अश्वत्थामा अछि मरि गेल तखन अहँ,
कहू हँ, मरि गेल अछि भीम मारल एखन तुरत।
तखनहि सोर भेल मरबाक अश्वत्थामाक सौँसे,
द्रोण अधीर रथ अगुआए पूछल युधिष्ठिर,
की अछि बात सत्य मरल अश्वत्थामा रणक बिच?
कहल युधिष्ठिर हँ मरल अछि ओ नर नहि, छल ओ कुञ्जर,
मुदा नर युधिष्ठरक कहितहि बजल छल शंख कृष्णक।
शोक-विह्वल द्रोण फेकि शस्त्रार्थ ध्यानमग्न बैसलाह रथपर,
धृष्टद्युम्न काटल हुनक मस्तक खड्गसँ अश्वत्थामा भेल व्याकुल।
छोड़ए लागल दिव्यास्त्र पाण्डवपर अर्जुनकेँ छोड़ि नहि छल क्यो सक्षम,
साँझ धरि अर्जुन-अश्वत्थामा दुहु मध्य होइत रहल ई युद्ध निरन्तर।
रात्रिमे दुर्योधन कएलक प्रण
अर्जुनक मृत्युक भेल आवाहन,
कर्णकेँ सेनापति बनाए कएलन्हि
कौरवक गण सोलहम दिनक युद्धक प्रारम्भ।
कर्णक शंखध्वनिसँ भेल युद्ध शुरू,
कर्णक तापसँ युद्धभूमि स्तब्ध,
नकुल सोझाँ पाबि अपघात कए छोड़ल प्राण
कुन्तीक देल कर्णक वर प्राणदान।
कृष्णक आवाहन अर्जुन अहाँकेँ छोड़ि,
क्यो नञि कए सकत विजय कर्णक ऊपरि,
वेगसँ जे बढ़ल अर्जुन आगाँ भेल शुरु बरखा,
बरखा वाणक कौरवगणक अर्जुनक समक्ष,
मुदा अर्जुनक सोझाँ सभ भेलाह पस्त,
मुदा तखने भेल सोलहम दिनक सूर्यास्त।
रात्रिमे कर्ण कहलन्हि हे मित्र दुर्योधन,
अर्जुनक रथमे होइछ ढेर-रास शस्त्रक अटावेश,
गाण्डीव आ अक्षय तूणीरक नहि कोनो जोड़,
हुनकर अश्वक गति नहि कोनो थोड़, कृष्ण सन सारथी।
शल्य बनथि हमर सारथी यदि, होएताह ओ कृष्णक तोड़,
मुदा शल्य कहलन्हि अछि हमर मुँहपर नहि जोड़,
कर्णकेँ से होए स्वीकार तँ हमरा कोनो हर्ज नहि।
सत्रहम दिनुका युद्ध भेल शुरू कर्णक आक्रमण शुरू,
अर्जुन बढ़ल आगू शल्य कहल भिरू महाप्राक्रमी अर्जुनसँ,
कर्ण देखलन्हि भीमकेँ करैत संहार चलू शल्य ओहि पार,
भीमक रूप आइ प्रचण्ड छोड़ल वाण चीड़ि कवच कर्णक गाँथल देह,
अचेत कर्णकेँ लए भगलाह शल्य रणभूमिक कात-करोट।
देखि ई दृश्य भीम भेलाह आर तीव्र,
दुर्योधन हुनकर सोझाँ पठाओल दुःशासन वीर।
गदा युद्ध दुहुक मध्य छल भेल भयङ्कर,
भीमक मस्तक प्रहार खसल मूर्छित दुःशासन।
भीम हाथ उखाड़ि पीबए लागल छातीक रक्त,
भागल कौरवसेना देखि दृश्य एहि तरहक।
आब सोझाँ-सोझी अर्जुन कर्णक युद्ध आइ शुरू,
कर्ण काटल गांडीवक प्रत्यंचा यावत दोसर चढ़ाबथि,
कएल वाणसँ आक्रमण अर्जुन कोहुना कए प्रत्यंचा चढ़ाए,
वाण-वर्षा अर्जुनका जखन भेल शुरू, कर्ण शल्य भेलाह चोटिल,
कर्णक सहायक सेना भेल नष्ट कर्ण अति व्याकुल।
छोड़ल कर्ण वाण दिव्य अर्जुनपर कृष्ण कएलन्हि अश्वकेँ ठेहुनपर ठाढ़,
अर्जुनक मुकुटकेँ छुबैत ओ अर्जुनक प्राणक संकट भेल पार।
तखनहि कर्णक रथक पहिया धँसल युद्ध मध्य,
कर्णक पुकार कनेक काल वाण नहि चलएबाक धर्मक ई युद्ध,
विराटक गौअक चोरि अर्जुन कहलन्हि आ अभिमन्युकेँ मारैत काल,
धर्म आ धर्मयुद्धक बिसरल छलहुँ अहाँ पाठ ।
प्राणक भिक्षा मँगैत लगितहुँ अछि नहि लाज।
कर्ण उतरि लगलाह रथक पहिया निकालए,
अर्जुनक वाण काटल मस्तक कौरवमे हाहाकार भारी।
दुर्योधनक सभ भाँयकेँ मारने छालाह भीम तावत,
एगारह अक्षौहिणीमे सँ बड़ थोड़ कौरव छल बाँचल,
कृपाचार्य बुझओलन्हि दुर्योधन आबो करू सन्धि,
मुदा ओ कहल हम अहाँ कृतवर्मा अश्वत्थाम आ शल्य अछैत,
सन्धिक गप छी अहाँ करैत।
शल्य बनथि सेनापति युद्ध अठारहम दिन रहत जारी।
शल्यक भेल उद्घोष ओकर बढ़ल पग युधिष्ठिर छल रोकल।
शल्य जखनहि काटल हुनकर एक धनुष,
युधिष्ठिर उठाए दोसर धनुष मारल शल्यक अश्व आ सहीस ।
भेल तखन घमासान युधिष्ठिर लेलन्हि शल्यक प्राण,
सहदेव छुटलाह शकुनि आ ओकर पुत्र उलूकपर,
लेलन्हि बाप-बेटाक प्राण जुआरीक प्राणान्त।
गदा लए दुर्योधन निकलि गेलाह छोड़ि रण,
एकटा सरोवर मध्य छल स्तंभ, नुकाएल ओतए दुर्योधन,
देखलन्हि जाइत हुनका किछु ग्रामीण।
ग्रामीणक चर्च ब्यास केलहुँ कृतार्थ ।
पाण्डवक संग कृष्ण पहुँचलाह ओतए,
किछु ग्रामीण जे देलन्हि पता ओतएक।
भीम देलक ललकारा दुर्योधन निकलि आएल,
तीर्थसँ घुरैत बलराम सेहो पहुँचलाह ओतए।
शिष्य दुर्योधनकेँ दए आशीर्वाद कएल गदा युद्धक शुरुआत,
भीम दुर्योधनक बीच बाझल युद्ध घनघोर,
कृष्ण देल जाँघपर थपकी मोन पाड़ल भीमकेँ ओकर प्रतिज्ञाक,
तोडि जाँघक हड्डी कए मस्तकपर दुर्योधनक गदा-पएरसँ प्रहार ।
भीमक ई कृत्य छुटलाह बलराम ओकरा पर मार-मार,
कृष्ण रोकि दाऊकेँ मोन पाड़ल द्रौपदीक अपमान,
भीमक प्रण।
छोड़ि दुर्योधनकेँ असहाय,
गेलाह सभ पाण्डव भाए।
संध्या समय कृतवर्मा कृपाचार्य आ अश्वत्थामा
पहुँचि देखल दुर्योधनक दुर्दशा आ प्रलाप ।
भीमक पादसँ दुर्योधनक मस्तकपर प्रहार,
सुनि ई कथ्य अश्वत्थामा लेल पाण्डवक वधक व्रत । दुर्योधन कएल अश्वत्थामाक सेनापति रूपमे अभिषेक,
कृतवर्मा कृपाचार्य आ अश्वत्थामा बढ़लाह पाण्डव-शिविर समक्ष।
कृष्ण लए पांचो पांडवकेँ गेलाह कतहु अन्यत्र।
पाण्डव-शिविरक समक्ष एकटा वृक्ष, नीचाँ सुतलाह कृपा आ कृत ।
अश्वत्थामाक आँखिमे निन्नक नञि लेष, देखल एकटा पक्षी अबैत,
ओहि वृक्षपर कौआसभ सुतल मारि रास, केलक ओ पक्षी सभक ग्रास।
देखि ई दृश्य अश्वत्थामा उठाओल कृपाचार्य ओ कृत,
भोरक बाट ताकब नहि सुबुद्धि, ई अधर्म कहल कृप ।
मुदा अश्वत्थाम चलि पड़ल शिविर दिश,
हारि पहुंचल पाछाँ-पाछाँ कृत-कृप,
हम पैसैत छी भीतर शिविर ।
बाहर होइत सभकेँ प्राण लिअ अहाँ दुनू गोटे,
एतए ठाढ़ लग द्वार।
सभ पांचाल धृष्टद्युम्न शिखण्डी समेत,
द्रौपदीक पाँचू पुत्रकेँ बुझि पाण्डव देल मारि,
अश्वत्थामा देल शिविरकेँ आगिसँ जराए।
फेर पहुँचि लए द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ,
दुर्योधन देखि माँगल भीमक मस्तक,
ओकर मुष्टिकाक प्रहारसँ मस्तक भेल फाँक,
नहि ई नहि भीमक माथ ।
भोरमे देखल द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ,
कानैत हाक्रोश करैत भेल दुर्योधनक प्राणान्त।
भोरमे कॄष्ण पहुँचलाह पाण्डव-द्रौपदीक संग,
देखि विनाश भीम चलल अश्वत्थामाक ताकिमे,
छल ओ गंग तटपर ब्यासक समक्ष ।
युधिष्ठिर-अर्जुन संग कृष्ण पहुँचल जाए,
पाण्डवक नाशक संकल्प संग अश्वत्थामा छोड़ल ब्रह्मशिरा अस्त्र,
अर्जुनक छोड़ल पाशुपत महास्त्र अग्नि वृष्टि सँ सृष्टिक विनाश,
बीचमे अस्त्र केर अएलाह नारद आ ब्यास ।
वाह ब्यास । महाभारतक लिखनिहार ।
आग्रह करैत जे दुनू गोटे लिअ अपन-अपन अस्त्र सम्हारि,
अर्जुन लेलन्हि अपन अस्त्र सम्हारि मुदा,
अश्वत्थामा कहल नहि घुरि सकत हमर अस्त्र आइ ।
ऋषिक प्रतिकार ब्रह्मशिरासँ होएत उत्तराक गर्भक नाश,
मुदा अश्वत्थामकेँ देमए पड़त मस्तकक मणि,
भेल ओ निर्बल तपस्वी, ब्यासक आश्रममे बिताओल जीवन सकल।
दुर्योधनक पत्नी भानुमति छलि अचेत, गांधारी करथि विलाप,
धृतराष्ट्र मूर्छित विदुरक हाक्रोश, पाण्डव घुरल अश्वत्थामाक मणि संग ।
कृष्ण लेलन्हि लौहक भीमक स्वांग धृतराष्ट्र पहुँचल कुरुक्षेत्र वधू सभक संग।
भीमकेँ गर लगाए कएल ओकरा चूर्ण फेर भीम-भीम कहैत प्रलाप,
कृष्ण कहल नहि कानू हे धृतराष्ट्र, छल ई लौहक भीम मात्र ।
गांधारी देल कॄष्णकेँ शाप,
जेना कएल अहाँ हमर वंशक नाश,
होएत अहूँक कुल नष्ट।
मृतकक दाह संस्कारक संग एक पक्ष समाप्त।
युधिष्ठिरक मोन विखिन्न, छोड़ल राज-पाटक विचार,
ब्यास आबि देलन्हि उपदेश, पलायन नहि अहाँक मार्ग।
धौम्य कए वेद मंत्रक गाण राजतिलक युधिष्ठिरकेँ लगाओल।
फेर पहुँचि भीष्मक समक्ष लेल अनुशासनक शिक्षा,
राजधर्म,लोकधर्म मोक्षधर्मक ज्ञान, प्रजापालन,
उठि प्रदेश जातिक विचारसँ ऊपर, राजाक व्रतक करू परिपालन।
आएल ओ काल जखन सूर्य भेलाह उत्तरायण,
पहुँचलाह युधिष्ठिर संग माता-गांधारी-कुन्ती, धृतराष्ट्र भ्राता मिलि,
अट्ठावन दिनक शर-शय्याक अन्तिम उपदेश आ महाप्रयाण,
चाननक चितापर भीष्मकेँ युधिष्ठिर देल आगि सभ आक्रान्त।
हस्तिनापुरक राज्यमे आएल सुख समृद्धि,
युधिष्ठिरक कौशल कएल आशाक वृद्धि,
उत्तराकेँ तखने भेल मृत-पुत्रक प्राप्ति,
सुभद्रा खसलि कृष्ण लग जाए।
कृष्ण उठाए बालकेँ कहल हम नहि कएल पलायन,
सत्यसँ सम्बन्ध रहल बनल, पराजित शत्रु कए नहि भेलहुँ हिंसक,
यदि ई सत्य तँ बालक जीबि उठथि।
ई सुनितहि शिशु भेल जीवित नाम पड़ल परीक्षित।
फेर कएल युधिष्ठिर यज्ञ अश्वमेध,
सिलेबी अश्वक गरमे स्वर्णपत्र,
जिनका युधिष्ठिरक राज्यसँ परहेज,
से पकड़ि घोटक करथि एकर विरोध।
मुदा घुरि आएल अश्व निष्कंटक,
यज्ञ भेल समाप्त निर्विघ्न।
बरख पन्द्रह बीतल तखन अएलाह ब्यास,
देल उपदेश धॄतराष्ट्र लेल वानप्रस्थ धर्मक ज्ञान,
गांधारी, कुन्ती, विदुर, संजयक संग हिमालय प्रयाण,
विदुर लेलनि वनहिमे समाधि,
दावाग्नि लेलक शेष सभक प्राण।
कृष्ण युद्धक बाद गेलाह द्वारका,
छलथि प्राप्त कएने सम्मान,
मुदा यादव राजकुमार,
करथि विद्वानक अपमान ।
मारि-काटि करथि आपसमे खत्म,
देखि दुखित बलराम प्रभासतीर्थ जाए,
ओतहि लेल दाऊ समाधि,
कृष्ण पहुँचि देखि हुनकर प्राणान्त,
गाछ पकड़ि रहथि ठेहिआए ।
ब्याध जकर छल जरा नाम,
हरिण बुझि पैरक तलवामे मारल वाण,
भेल कृष्णक प्राणान्त ।
सुनि ई समाचार मृत्युक वसुदेवक,
पिता वासुदेव सेहो कएल जीवनक अन्त।
कृष्णक मृत्युक समाचार,
पाण्डवराज युधिष्ठिर देल परीक्षितकेँ राज,
सुभद्रा केँ दए उपदेश,
संग द्रौपदी पहुँचल द्वारका पाँचू भाए।
ओतए डूबल समुद्रमे छल ओ नगरी,
घुमैत फिरैत चललाह हिमालय सभ गोटे।
एक कुकुड़ छल संग चलैत ओतए,
हिमालय वृहदाकार हिमपातक मारि,
द्रौपदी खसलि मरलि, फेर सहदेव,
नकुल अर्जुन भीम खसि मरल फेर-फेर।
आगाँ देवलोकक रथ छल ठाढ़,
इन्द्र कहल चलू असगर सशरीर युधिष्ठिर,
ई कुकुड़ नहि रहए साथ।
युधिष्ठिर नहि मानल घुरि जाऊ इन्द्र,
बिन एकर नहि जाएब ओतए होए स्वर्ग अहि।
छल ओ कुकुड़ यमराज स्वयं,
प्रकट भए देल ओ आशीर्वाद ओतए।
पहुँचि स्वर्ग देखल कौरव गण सभ ओतए,
इन्द्र हमर भ्राता छथि कतए।
तखन एकटा दूत लए गेल हुनका नर्कक द्वारिपर,
द्रौपदी संग पाँचू भाए छलाह ओतए।
कहल युधिष्ठिर हम रहब एतहि हे दूत,
छोड़ि हिनका जाएब नहि कतहु।
इन्द्र यम पहुँचि गेलाह ओतए।
यम कहल यक्ष कुकुड़ बनि हम अहाँ परीक्षा लेल,
आइ एहि तेसर परीक्षामे सेहो अहाँकेँ उत्तीर्ण कएल।
ई अछि देवलोक मुदा सदेह राजाकेँ,
एतुक्का कष्ट देखक लेबाक चाही शिक्षा तेँ,
किछु कालक कष्ट हम अहाँकेँ देल।
छोड़ू ई शरीर लिअ दैवी रूप आब,
कहैत यमक भेल ई परिवर्तन,
कर्ण सेहो ओतए बारह आदित्यक संग,
रत्नजटित सिंहासनपर छल विराजमान,
भारतक युद्धक काव्यक समापन।
त्वञ्चाहञ्च सभ आपसक लड़ाई,
अछि एखनो पसरल ई महामारि।
जाति-धर्म परिवार पुत्र केर मोह,
यावत रहत प्रतिभा पिचाएत आह।
त्वञ्चाहञ्च मचत धृतराष्ट्र जतए करत अराड़ि,
दुर्योधन करत प्रारम्भ युधिष्ठिरक दोष की थोड़?
Saturday, July 04, 2009
Friday, July 03, 2009
कखन होएत भोर-सुस्मिता पाठक
आइ काल्हिक राति
बहुत नमहर होब’ लागल अछि
दिनक अपन रातिमे पूछैत अछि
परिचय
हवा आतंकित
अन्धकार स्तब्ध
चुप्पीकें चीरैत
सर्द घामसँ जागल चेहराकें
भिजा दैत अछि
हल्लुक सन आहटि
आ कोनो छोटो सन ठक-ठक
एक क्षणक मृत्युक अनुभव
आँचरमे सटि जाइत अछि
घड़ी भ’ गेल अछि बन्न
अथवा ई राति बितबे नहि करत
नहि जानि कखन चिड़ै अनघोल करत
कखन बाजत घण्टी
भोर कखन होएत
कखन होएत भोर
जे कखन फूल फुलएबाक
बचा लेबाक लेल लहलहाइत फसिल
कखन, कोन राति क्यो गढ़त हथियार
सर्द चुप भेल मृत राति
आ सन्देहास्पद आहटि
ठक-ठक केर विरुद्ध
कि भोर कखन होएत
कखन होएत भोर
11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)
11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS ( VOLUME I TO XXII )
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...
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जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन...
