भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, May 14, 2010

'विदेह' ५७ म अंक ०१ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५७)- PART IV


३. पद्य




३.५.गजेन्द्र ठाकुर-गीत-बँसकरमक विश्वकर्मा
स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 0 मे भेलनि  पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |

!!
मातृगीत - 1 !!

सेवा करियौ ने मुंजूर, अचलहुॅ बुलिते बहुतो दूर ।
ऑजुर भरल अढ़ूलक फूल एड़ी गरल बबूरक शूल ।।

हमहूॅ पूत अहींक एक मॉ अपने तॅं जगतक अम्बा छी,
उघ पड़त भार हमरो मॉ अपने सवहक अवलंबा छी,
हे पाथरक मूरूत मोम भपिघलपड़त जरूर ।
सेवा............................................ ।।

भुवनेश्वरि मणिद्विपक रानी, वेटा भुखल मॉटि लोटैए,
मॉ अपने लग सुधा सरोवर प्यासल पूत नोर घोंटैए,
अहॅक हाथ नवरचना हम्मर जीवन चकनाचूर ।
सेवा............................................ ।।

ब्रहमरमणि थाकलि ठेहियायलि पकड़व जखन अपन जप आसन,
ठाढ़ रहव श्रद्धा सुरसरि लराखव भगति भोग केर वासन,
चमकाबू चानक टिकूली मॉ उषा किरण सिनूर
सेवा............................................ ।।



!!
मातृगीत - 2 !!

सिन्धु शैल - भूमि सुते सीते,
पुत्र हम मलीन मॉ पुनीते ।
ऑचर सॅ झाड़ि दिय ।
कर सॅ पुचुकारि दिय,
अधर पर उतारि अमर प्रीते ।
पूत हम मलीन मॉ पुनीते ।।
सुःखक थपथपी दैत,
शांतिक निनियॉ गवैत,
सुना दिय अपन मधुर गीते ।
पूत हम मलीन मॉ पुनीते ।।
पसरल विपत्ति घटा,
छिटकाबू त्राण छटा,
कहिया धरि रहवै भयभीते ।
पूत हम मलीन मॉ पुनीते ।




!!
काटरक महिमा !!

महिमा ई काटर प्रथाक वड़ भारी ।।
बाबा दलाल बाप वरदक व्यापारी,
बेटा बछौड़ बीकि गेलै हजारी ।
शील सौन्दर्यक नहि कोनो सुमारी,
हंसक घर एलै वगुलवा कुमारी ।
मरूआक रोटी पर तरूआ तरकारी,
रेशमक सिक्का पर कनफुट्टा टारी ।
वलकुचही गोरा पर भरल वखारी,
हुवघट्टू ड्राइवर लग मरसल्ली गाड़ी ।
ऑटी भरि धोती तर वोझ वनल साड़ी,
दुव्वर कुमार मुदा दोवरि कुमारी ।
उल्लू लग मयना हरिण लग पारी,
बनराक हाथ पर पद्मिनिया नारी ।
लकलक चतरिया तर चतरल खेसारी,
वाउ सुलहनामा तदाइ फौजदारी ।
आंगनक वाटे नहि कट्ठा भरि वारी,
ऊॅचे जोतॉस मुदा लेया घरारी ।
वऽर प्राइवेटे छथि कनियॉ सरकारी,
वाऊ ब्रहमपुत्र दाई वंगोप खाड़ी ।
एक लोकमाया तएक ब्रहमचारी,
भौजी छतौनी तभैया खरारी ।
ज्योति सुनीत चौधरी
प्रवासी पक्षी

प्रवासी पक्षी अफ्रीकासँ
आयल कएक मील उड़ि कऽ
गर्मीमे जीवनयापन लेल
नम्हर दिवस पाबि कऽ
भोजन ताकत बेसी समए
भोजनो बेसी उपलब्ध रहए
भागल अपन देश छोड़ि
भीषण गर्मीसँ निदान भेटय
अपन जन्मस्थानसँ भिन्न
ककरो लागल दुइ तीन दिन
थम्हि थम्हि कऽ आबैमे
कियो लेलक महिना दिन
रंग बिरंगक आकार प्रकार
प्रकृतिक अतिथि ग्रीष्मकाल
साल भरिसँ प्रतीक्षा कएल
भीड़ लगेने सभ देखनिहार       

 

नन्‍द वि‍लास राय
ग्राम,पोस्‍ट- भपटि‍याही, टोला- सखुआ, वाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी, ि‍बहार।

सभसँ पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ
जाहि‍ ठाम बहै कोशी, कमला और वागमती बलान यौ,
पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ,
ि‍मथि‍लासन नहि‍ आन यौ।
जहि‍ठाम सीतासन भेलीह नारी,
राजा जनक सन सदाचारी,
मानव सेवा करब वड़का काम यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
छथि‍न्‍ह सखड़ामे माए सखेश्‍वरी,
और ठाढ़ीमे माए परमेश्‍वरी,
जहि‍ठाम बरहम बाबा गामेगाम यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
जहि‍ठाम आद्रा, चौथचन्‍द्र, जि‍ति‍या
भाए-बहि‍नि‍क स्‍नेह पावनि‍ अछि‍ भातृ-द्वि‍तीया।
जहि‍ठाम कोजगराकेँ बड़ नाम यौ,
वॉंटथि‍ पान-मखान यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
जहि‍ठाम क्‍यो ने भेटत लफंगा,
सभसँ नीक शहर दरभंगा।
ओहि‍ठाम पैघ-पैघ दोकान यौ,
भेटत सभ समान यौ,
मि‍थि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
नेहरा, सरि‍सव ओ पोखरौनी,
कोयलख, पि‍लखवाड़, मंगरौनी।
आेहि‍ठाम पैघ-पैघ भेल वि‍द्वान यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
जहि‍ठाम नामी माछ-मखान,
आओर अछि‍ फलक राजा आम।
जहि‍ठाम जमाए छथि‍न्‍ह भगवान यौ,
आओर पहुनाकेँ भेटए सम्‍मान यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
भेलाह ललि‍त बावूसन नेता,
ि‍मथि‍लाकेँ सच्‍चा बेटा।
ि‍वकासक खाति‍र देलथि‍न्‍ह अपन प्राण यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
ि‍मथि‍ला वि‍भूति‍ सूरजबावू सन पैघ-पैघ भेल नेता,
आजादीकेँ लड़ाइ लड़बामे रसि‍क, अनन्‍त, गुरमैता,
देशकेँ अजाद करबामे एहि‍ घरतीकेँ बड्ड योगदान यौ,
पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
ि‍मथि‍ला पेन्‍टींग मधुबनीकेँ दुनि‍यॉंमे बड्ड नाम छै,
खादी भंडार मधुबनीकेँ भॉंति‍-भॉंति‍क काम छै,
जहि‍ठाम सुग्‍गा बजैत सीताराम यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
ि‍मथि‍लाक कला, ि‍मथि‍लाक साहि‍त्‍य, ि‍मथि‍लाकेँ संस्‍कृति‍ नीक,
फूसि‍ नै बाजब दान करब ई मैथि‍लकेँ प्रवृति‍ छी।
अन्‍न-वस्‍त्र, वर्तनक संगहि‍ करैए लाेक गोदान यौ,
पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ,
ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
बड्ड मधुर अछि‍, सुनब-बाजवमे ि‍मथि‍लाक मैथि‍ली-भाषा,
ि‍मथि‍लाकेँ वि‍कास हुअए खूब, हमरो अछि‍ अभि‍लाषा।
ि‍मथि‍लाक वि‍कासक खाति‍र हमहूँ देव योगदान यौ,
पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नहि‍ आन यौ।
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न

 
!! अभिनव मिथिला धाम !!

‘‘
मॉ मिथिले अभिनव मिथिला धाम ।।
अहॅक कोर केॅ छोड़ि आव हम,
नहि जएव दोसर ठााम ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

वौरयलहुॅ सगरो आर्य भुवन मे,
कतहु न भेटल चैन ।
अकवक विकल दिवस दुःख भोगलहुॅ,
तमस कटै छल रैन ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

नवटोल नववोल देखलहुॅ नवल चालि,
भाउज भावहुक नहि भान ।
तात पूत एक्के संग वैसल,
करथि सुरारस पान ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

मैथिल दीन जनेर फॅकै छथि,
मुदा देव पितरक मान ।
छोट पैघ वीचि लक्षिमन रेखा,
नहि ककरो अपमान ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

उदयन सॅ दर्शन सीखि वॉटव,
अयाची सॅ, आत्म सम्मान ।
भारती मंडन सॅ ब्रहम ज्ञान लेव,
आरसी यात्री सॅ स्वाभिमान ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

उर्मि धिआक त्याग देखिक,
कण-कण भाव विभोर,
वैदेहीक सती धर्म सॅ उमड़ल,
कमला मे हिलकोर ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

गोविन्द मधुपक सुनव पराती,
खोलि क दुनू कान ।
शिव शक्ति केॅ श्रद्धा सॅ पूजव,
सुनवैत विद्यापति गान ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

खोरा चाउर संग भाटा अदौरी,
वथुआ तिलकोर मखान ।
आचमनि श्वेत वलानक जल सॅ,
गलौंठी पतैलीक पान ।
मॉ मिथिले ................................ ।।

आन धाम सॅ रास सोहनगर,
कुलदेवी क गहवर ।
पच्छिमक त्वरित गीत सॅ रूचिगर
अपन वैन सोहर ।
मॉ मिथिले ................................ ।।
गजेन्द्र ठाकुर
बँसकरमक विश्वकर्मा
भीखूक फारब आ
ओदारि कऽ निकालब
उजरा औषधि वंशलोचन
कोनिञा सूप हकरा पथिया
मुदा खजुरिया बान्हमे बान्हल
हमर आ ओकर वर्तमान आ भविष्य

बकछुछरु खेलाइत हम आ भीखू
डोमासीक कातबला पोखरिक महारपर
थुथुन घोसियेने माँटिमे सुगरक झुण्ड
भीखूक भाए छथि आब सरकारी अधिकारी
दोसर भाए हॉस्पीटलक वार्डबॉय
आ भीखू एखनो डोमासीमे
जिबैत वर्तमानक संग भविष्यक ताकिमे

स्थिर ओहिठाम ठाढ़,
मुन्हारि साँझमे लीलीडाली हाथमे लेने
बजैत जे भाए बनल अछि अधिकारी
मुदा गाम छुटले छै बुझू
बियाहो पैघ घरमे ओकर भेल छै
दोसर भाए तँ गाम अबिते अछि
ओढ़ना पहिरना नीक मुदा काज वएह
हमरे नहि फुराइए करू की?
भविष्य तँ वएह बुझाइत अछि।

आगाँ अहाँ अएलहुँ, कोन काज कहू ?
मुँह झलकि गेलै भीखूक
ओहि मुन्हारि साँझमे

हम चुप्पे रही तावत्
ओहि झण्डी ठाढ़ गाछ लग
ठाढ़ गाछ कुकाठ लग

बाजि उठल भीखू मुदा काज तँ
काज तँ हमर ओ हाकिम भाए नहिए करत
मुदा अहाँले कहबै धरि अबस्से।

आ हम कहैत छी, नहि भीखू
हाकिम तँ काज कइये देत
मुदा काज अछि हॉस्पीटलक
पिता छथि भरती जतए भाए अहाँक छथि काज करैत।

कताक दिन भेलन्हि भरती भेना
मुदा नहि आइ काल्हि होइत
ऑपरेशनक तिथि अछि बढ़ेने जाइत
आ भीखूक मुँह झलकि उठल
मुन्हारि साँझमे।

हँ कहबामे जे होइत छै संतुष्टि
मदति देबामे जे होइत छै आत्मतृप्ति
ताहिसँ।
बँसकरमक विश्वकर्मा भीखूक वंशलोचनसँ
तृप्त होइत हम सेहो।  

 काली नाथ ठाकुर ग्राम सर्वसीमा द्वारा सन १९६८ मे रचित दहेज़ विरोधी रचना
पण्डितजी दण्डित भेलाह  जखनहि कन्या पाँच
पूर्व जन्म के कर्म फल, वा विधिक कोनो ई जाँच।

विधिक कोनो ई जाच, यैह चर्चा भरि गामक
लाबथु नोट निकालि जत्ते सम्पत्ति छन्हि मामक।
पनही गेलन्हि खियाय, कतौ नहि बसिलनि गोरा
धन्यवाद क पात्र छथि कलियुगके घोडा।

सत, रज, तम, सभ व्यर्थ थीक शिक्षा शील स्वभाव
गुण एकहि अछि अर्थ गुण अवगुण अर्थाभाव
अवगुण अर्थाभाव भाव नहि अछि गुण रूपक
कन्या कारी , गोर , मूर्ख वा दिव्यस्वरूपक।
मायक दूध क दाम जोडि गनबओता टाका
पुत्र हुनक गामक गौरब से कहलथि काका

बीतल शुद्ध आषाढ के अगहन वैशाख।
पहिल कुलच्छन बुझलनि, जखनहि घुरि अयला सौराठ॥
घुरि अयला सौराठ हाट करथु बेचारे
विधिक लिखल के मेटल आब रहि जेता कुमारे॥
छोरलनि बीस हजार , लोभ मे तीस हजारक।
कए रहला गणना जोतखी, एहि साल बजारक

सुनलनि जखनि सुषेण सँ , दहेज निरोधी न्यूज
तखनहि जेना दिमाग केर ढिबरी भय गेल फ्यूज
ढिबरी भय गेल फ्यूज बराति कन्यागत दुनू
घटकैती के करत घटक केर हाल न सूनू
बर क हाथ कनिया बरियातीक हाथ हथकड,
सरियाी सभ करथु दौडबडहा कचहरी।

लूटन झा त लुटि गेला कए दूई कन्या दान
मोछ पिजौनहि रहि गेलाह करता की बरदान?
करता की बरदान चोट छन्हि नगदी नोटक
उजरल बरदक हाट प्रथम ई बात कचोटक
घटक राज केर संग करथु बरु तीर्थयात्रा
करथु मन्त्रणा गुप्त मुक्त भय सफल सुयात्रा

जाति जनौ बाँचत कोना? कुल मर्यादा मान
अन्तर्जाति ववाह में घोषित नकद ईनाम
घोषित नकद ईनाम संग सर्विस सरकारी
कहय शास्त्र ओ वेद मात्र द्विज छथि अधिकारी
करथु ग्रहण ककरो कन्या हो डोम चमारक
मन डोललनि पण्डित जी के जे उच्च विचारक

भेल मनन मन्थन बहुत, ई समाज केर पाप!!
की दहेज बन्ले रहत समाजक अभिशाप!!
समाजक अभिशाप ब्याज ई पूँजीवादक।
बेचि आत्मसम्मान स्वांग धरि कुल मर्यादक
सिद्धान्त नहि व्यवहारहु केर करू प्रदर्शन
तखनहि त भय सकत रोग उन्मूलन॥
.-राजदेव मंडल-
राजदेव मंडल
1)   ि‍हत-अहि‍त

गप्‍प एकटा गूढ़
कहने रहथि‍ गामक बूढ़
  ‘‘अपन धीया-पुत्ता जानि‍
लि‍अ हमर बात मानि‍,
सॉंपक मन्‍तर आ खाटक बानि‍
अनकर जीवन अपन हानि‍’’
  ‘‘सुनू यौ बाबा
हमरो अछि‍ दावा
अनकर हि‍त तँ अपनो हि‍त
दोसराक करब अहि‍त
अपनहुँ भऽ जाएब कहि‍यो चि‍त
पड़ोसि‍या घरमे जँ लागि‍ जाए आि‍ग
तँ ि‍क हम ओहि‍ठामसँ जाएब भागि‍
लगत पसाही उड़त कुकवाहा
हमरो घर भऽ जाएत स्‍वाहा’’
उनटा घुमए लागल माथक चाक
भऽ गेलाह ओ अवाक्।

2)   प्रयास

बॉंि‍हक लगौने चुट्टा
उखाड़ि‍ रहल छी खुट्टा
ि‍कन्‍तु नहि‍ अछि‍ ई खुट्टा
भऽ रहल भान
ई अछि‍ बरि‍सों पुरान
सुखाएल गाछ रोपल
बाउल माटि‍सँ धोपल
केहेन जाल ि‍खरा देने छी
रोपल गाछमे भि‍ड़ा देने छी
जे अहॉं बूते नहि‍ होएत गारल
से हमरा बूते कोना हएत उखारल
तद्यपि‍
लगा रहल छी जोरपर जोर
ि‍हलबे करते थोड़बो-थोड़
कतेको जोड़ी ऑंखि‍ हँसैत अछि‍
हँसले घर कते बेर बसैत अछि‍।

3)   ऑफि‍सक भूत

सभ कुरसीपर भूत नाचैत अछि‍
ऑंखि‍ आ अँगुरीसँ दाम बॉंचैत अछि‍
कुरसी अछि‍ वएह
बदलैत अछि‍ ओकर मुख
ि‍कन्‍तु नहि‍ बदलैत अछि‍
हमर दुख
सभ मुखपर अछि‍ ओकरहि‍ं राज
मुँह नहि‍ खुलत तँ होएत कोना काज
कुरसी हो पैघ आि‍क छोट
कऽ रहल चोट कऽ रहल-चोट
ओ नचबैत अछि‍ ओकरा मनकेँ
शोणि‍त पि‍बैत अछि‍ साधारण जनकेँ
हेओ समाज
कोना होएत
हमर अटकल काज
अछि‍ वि‍श्‍वास
लगौने छी आस
आएत कोनो गुणी आर सच्‍चा दूत
जेकरा देखतहि‍ं भागत भूत
वएह करत सबहक उपकार
भऽ जाएत हमरो उद्धार।

हे प्रकाश, जुनि‍ खसाउ नोर
आि‍ब रहल अछि‍ नूतन भोर।

बालानां कृते
गजेन्द्र ठाकुर
नाटक
किछु दिअ

सूत्रधार: आइ एकटा संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध कथापर आधारित नाटक देखा रहल छी। चोटगर कथा अछि। बच्चा आ पैघ सभक लेल। देखू ई भिखमंगा कतऽ सँ आबि रहल अछि।

दृश्य १
(गाममे घुमैत)
भिखमंगा: गरीबकेँ किछु दिअ। पुरान कपड़ा, रुपैआ, पैसा। किछुओ दिअ।
बूढ़ी: लिअ ई कपड़ा। पुरान छै मुदा जाड़मे बड्ड गरम रहै छै। ई अन्न सेहो।
नबका कमौआ: लिअ ई पैसा। किछु कीनि लेब।
(भिखमंगा सूत्रधारक बगलसँ होइत कपड़ाक धोधरिमे अन्न रखैत अछि। पाइ गनैत अछि। फेर दोसर दिस अपन घरक खाटपर बैसैत अछि। एकटा चुकड़ीमे पाइ रखैत अछि, फेर गनैत अछि।)
भिखमंगा: (मोने-मोन) आब तँ ढेर रास पाइ भऽ गेल। मोन अछि जे कमलाक भगता बनि जनकपुर जाइ। भगवान से दिन देखेलन्हि।

दृश्य २

भिखमंगा: (बोगलीमे पाइक चुकड़ी लेने आगाँ जाइत- भोरुका समए)

      चलू चलू यौ
जनकपुरमे कमलाक भगता
करू करू यै
कमला माइ करू हमर उद्धार
चलू चलू यौ जनकपुर
भगता बनि कमलाक

(सोझाँ बालुसँभरल कमलाक तट। भिखमंगा सोचैत अछि।)
-अहा। की विस्तार अछि कमलाक। मुदा एतेक भोरमे कियो एतए नहि अछि। चलू पाइक चुकड़ी कातमे राखि डूम दऽ आबी।
(पाइक चुकड़ी नीचाँ रखैत अछि आ नहाइ लेल बिदा होइत अछि।)
(मोने-मोन सोचैत)- मुदा कियो जे देखि जाएत आ ई पाइ लऽ लेत तखन? एकरा बालुमे नुका दैत छिऐक।
(बालु कोड़ि कऽ चुकड़ी नुकबैत अछि।)
(फेर मोने-मोन सोचैत) मुदा जे कियो ई देखि जाएत तखन? मुदा देखत कोना आब। तेना कऽ नुका देने छिऐक जे आब हमरो नै भेटत।

(फेर सोचैत घुरि अबैत अछि।)
मुदा हम जे नहा कऽ आएब तँ कतऽ ई पाइ गाड़ल अछि से हमरो कोना बूझऽ मे आएत। ठीक छै।
(कोड़लाहा स्थानपर अबैत अछि।)
एतऽ शिवलिंग बना दै छिऐ। ( कोड़लाहा स्थलपर पएर रखैत अछि आ पएरक चारू कात बालु राखए लगैत अछि। चारू कातसँ बालु भरि गेलाक बाद आस्तेसँ पएर हटा लैत अछि आ नीक-नहाँति शिवलिंग बना दैत अछि। फेर निश्चिन्त मोनसँ कमला-स्नानक लेल बिदा भऽ जाइत अछि। एम्हर ओ धार दिस बिदा होइत छथि आ ओम्हर दूरसँ किछु आर स्नानार्थी, पुरुष हाथमे धोती आ महिला हाथमे नुआ लेने, अबैत दृष्टिगोचर होइत छथि।)
(मोने-मोन सोचैत) नीके भेल जे फुरा गेल। कएक सालक कमाइक छी ई पैसा। ई लोक सभ आब स्नान करबा लेल आबि रहल अछि। ने जानि ककर मोनमे खोट हेतै आ ककर मोनमे नै।

(नहाइ लेल मंचसँ नीचाँ धारमे फाँगि जाइत अछि।)
पुरुष स्नानार्थी - (अपन कपड़ा लत्ता राखै अए) चली कमलामे डूम दऽ आबी।
स्त्री स्नानार्थी- (भिखमंगा द्वारा बनाओल शिवलिंग दिस इशारा करैत) हे देखियौ ओ शिवलिंग। लागैए एतऽ स्नान करबाक पहिने शिवलिंग बनेबाक विधान छै।
पुरुष स्नानार्थी- अपना सभ दिस, गंगा कातमे तँ एहेन कोनो परम्परा नै छै।
स्त्री स्नानार्थी- एत्तऽ मुदा छै। आ भोलाबाबाक स्थापना कऽ डूम लै मे हर्जे की।
पुरुष स्नानार्थी- हँ से तँ ठीके।
( दुनू गोटे एक-एकटा शिवलिंगक स्थापनामे लागि जाइत छथि। पएरक चारूकात बालु चढ़बऽ लगै छथि। तावत् आनो लोक सभ आबि कऽ किछु पूछऽ लगै छथि आ अच्छा-अच्छा कहि ओहो सभ एक-एकटा शिव लिंगक स्थापनामे अपन-अपन पएरक चारू कात बालु चढ़बए लगै छथि। कनिये कालमे मंचपर शिवलिंगे-शिवलिंगे भरि जाइत अछि। मंचपर हर-हर महादेवक स्वरसँ अनघोल भऽ जाइए। )
भिखमंगा: (नहा कऽ निकलैत) देखू, जखन आएल रही तँ एकोटा लोक नहि छल आ आब देखू कतेक भीड़ भऽ गेल। हमरा की। जोगी छी, बहैत पानि सन। ई अंगवस्त्र रस्तेमे सुखा जाएत। जए माँ कमलेश्वरी। कमलाक भगता बनि चली आब जनकपुर। मुदा ओ चुकड़ी तँ लऽ ली।
(अपन बनाओल शिवलिंग ताकऽ लगैत अछि। मुदा चारू कात शिवलिंगे-शिवलिंग। एक दूटा शिवलिंगकेँ भखराबैत अछि मुदा ओहि नीचाँसँ किछु नहि बहराइत अछि।)
(भिखमंगा माथपर हाथ राखि मंचपर बैसि जाइत अछि आ आस्ते-आस्ते मंचपरसँ प्रकाश विलीन भऽ जाइत अछि।)
(पटाक्षेप)

 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
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1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेबबला, हेमबला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक
2. आ
/आऽ
3. क
लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल/लऽ/लय/लए
4. भ
गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर
गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय
,दिय,लिअ,दिय/
7. कर
बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/कबला / करए बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह
, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ
/ओऽ(सर्वनाम)
20. ओ (संयोजक) ओ
/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे
/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा
रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल
/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत
/ओत/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे
/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस

34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की
/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए
/कऽ/लए कए
47. ल
/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा
/करबाय/करबाए
60. त
/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै / माए
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द
/द ऽ/दए
67. (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका
कए तकाय तकाए
69. पैरे (
on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे


71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय/बननाइ
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि
  गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे

81. से/ के से
/के
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा

94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह / इएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(
in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (
play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (
different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (
understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग
 
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (
to test)चिखइत
126. करइयो(
willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा
/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग

141. खेलाइ (
for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो / केओ
145. केश (
hair)
146. केस (
court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल

155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना
/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो
रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के

169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा
(आगि लगा)
193. से से

194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(
spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा

201. देखाय देखा

202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/
216.जाऽ/जा
217.आऽ/
218.भऽ/भ
( फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (
come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (
conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)- (conjunction-and)/
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/होन्हि
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौँ/ ज्योँ
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कुनो/ कोनो
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि
२५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक
२६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित

२६५.केर/-/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जै
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जै/ जए
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट
२९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना)
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य
२९६.बेसी/ बेशी
२९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला)
२९८.बाली/ (बदलएबाली)
२९९.वार्त्ता/ वार्ता
300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय
३०१. लेमए/ लेबए
३०२.लमछुरका, नमछुरका
३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै)
३०३.लागल/ लगल
३०४.हबा/ हवा
३०५.राखलक/ रखलक
३०६.आ (come)/ आ (and)
३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप
३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि।
३०९.कहैत/ कहै
३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different)
३११.तागति/ ताकति
३१२.खराप/ खराब
३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि
३१४.जाठि/ जाइठ
३१५.कागज/ कागच
३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए)
३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय

उच्चारण निर्देश:
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोगगड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ  ऐछ
छथि- छ इ थ  – छैथ
पहुँचि- प हुँ इ च
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना
से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा।
पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- संजोगने
केँ- के / कऽ
केर- क (केर क प्रयोग नहि करू )
क (जेना रामक) रामक आ संगे राम के/  राम कऽ
सँ- सऽ
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ  रामकेँ- राम कऽ राम के

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन)
पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि)
ओइ/ ओहि
ओहिले/ ओहि लेल
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ/ जेकाँ
तँइ/ तैँ
होएत/ हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ
सौँसे
बड़/ बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि)
मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ।
एकटा दूटा (मुदा कैक टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ त नहि)
सँ ( सऽ स नहि)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)

३.नेपाल भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली


1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ,,, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक
धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि
, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर
,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन
,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा
,ठिना,ठमा
जेकर
, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ
, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल
, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। करगेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक
न्हध्वनिक स्थानमे लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4.
तथा ततय लिखल जाय जतस्पष्टतः अइतथा अउसदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह
,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे
के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व
वा प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ वा लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे
ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव
लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ
, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। मेमे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। क वैकल्पिक रूप केरराखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद
कयवा कएअव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग
, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध
ओ अर्द्ध क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ’ , ‘’, तथा क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय
, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क
लिखल जाय, हटा कनहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क
लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा कनहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा
' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

'विदेह' ५७ म अंक ०१ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५७)- PART III



जगदीश प्रसाद मंडल
जीवन संर्घष-  3

नीन टुटि‍तहि‍ ओछाइनेपर दुखनीक मनमे उपकल आइये दीयोबाती छी आ काली-पूजाक मेलो गाममे हएत। ऐना कऽ बेटी श्‍यामाकेँ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍नहि‍ धीया-पूताकेँ नेने अवि‍हेँ, से कहॉं आइलि‍। ओहो बेचारी की करत? अन्‍न-पानि‍ घरमे हेतै मुदा, तीनू तूर जे मेला देखत तइ लए तँ दसो-बीच रूपैया खर्च हेबे करतै। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे नइ होइ तेकरो इन्‍जाम ने करए पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरि‍यान नइ भेल होय। हँ, हँ, भरि‍सक सएह भेल हेतै। ओना आइ भरि‍ अबैक समए छै, बेरो धरि‍ ऐवे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैया नेने औत मुदा, जरना तँ नै आनत। अखन धरि‍ हमहूँ तँ जरनाक कोनो ओरि‍यान नहि‍ये केलौंहेँ। आब कहि‍या करब? भने मन पड़ि‍ गेल। सोचने छेलौं जे श्‍याम आउत तँ घर-अंगनाक काज सम्‍हारि‍ देत सेहो नहि‍ये भेल। भरि‍ये ि‍दनमे की सभ करब। घरो छछाड़ै लए अछि‍, ओलति‍यो ओहि‍ना पड़ल अछि‍। कन्‍ना असकरे एते काज सम्‍हरत? ओलतीमे माटि‍ भरब, ि‍क घर छछाड़ब आि‍क जरना आनव। काज देखि‍ अबूह लगि‍ गेलइ। असकताइत मने वि‍छानसँ उठि‍ ओलती देखलक। मुदा रौदि‍याह समए रहने माटि‍ देव जरूरी नहि‍ वुझि‍ पड़लै। काज हल्‍लुक होइत देखि‍ मनमे खुशी एलै। ओलति‍येमे ठाढ़ भऽ ओसार ि‍हयासलक। कतौ चुबाट नहि‍ देखि‍ सोचलक जे छछाड़वो जरूरी नहि‍ये अछि‍। बाढ़नि‍सँ झोल-झाड़ झाड़ि‍ देवै। आरो मन हल्‍लुक भेलै। मन हल्‍लुक होइते बाढ़नि‍ लऽ घरो-ओसारक झोल-झार झाड़ि‍, अंगनो बहारलक। बाढ़नि‍ रखि‍ घैला नेने कलपर गेल। छउरेसँ मुँह धाेइ-कुड़ड़्ा कऽ घैल भरने आंगन आइलि‍। पानि‍ पीबि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ सोचलक जे एक जूम खाइयो लेब आ दू जूम बान्‍हि‍ कऽ बाधो नेने जाएव। सएह केलक।
     ओनो दुखनी पहि‍ने तमाकुल नहि‍ खाति‍ छलि‍, हुक्‍का पीबैत छलि‍। मुदा जहि‍यासँ लबहदक ि‍मल बन्‍न भेल तहि‍यासँ छुआ भेटवे बन्‍न भऽ गेल। जहि‍सँ पीनी महग भऽ गेल। घर बन्‍न कऽ कान्‍हपर लग्‍गी नेने मारन बाध वि‍दा भेलि‍। बाधक अधा भाग नि‍च्‍चॉं दि‍स खेती होइत बाँकी उपर दि‍स गाछि‍ये कलम अछि‍। बड़बढ़ि‍या आमक गाछक नि‍च्‍चॉंमे ठाढ़ि‍ भऽ सुखल ठौहरी सभ ि‍हयासए लागलि‍। रौदि‍याह समए रहने मनसम्‍फे जारन देखलक। जारन देखि‍ मन चपचपा गेलइ। आँचरक खूँट खोलि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ एक चुटकी मुँहमे लेलक आ फेरि‍ बान्‍हि‍ लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते मन पड़लै जे उक बनबै लए खढ़ कहॉं अछि‍। आन साल लोक आसीन-काति‍कमे खढ़होरि‍ कटबै छलए ओइमे सँ दू मुठ्ठी रखि‍ लइ छेलौं। जइसँ सालो भरि‍ बाढ़नि‍यो भऽ जाइ छलए आ उको बना लेइ छेलौं। मुदा जेहन बाढ़नि‍ चड़ि‍काटूक होइए तेहन राड़ीक थोड़े होइए। हारल नटुआ की करत? तते ने लोक बकरी पोसि‍ नेने अछि‍ जे कतौ एकोटा चड़ि‍कॉंटू रहए दैत अछि‍। तहूमे तेहन रौदि‍याह समए भेल जे घसवाह सभ चोरा-चोरा घासेमे काटि‍ खरहोरि‍यो उपटा देलक। कथीक उको बनाएव? उक नै हएत तँ पावनि‍ कोना हएत। गाम ि‍क कोनो शहर-बजार छि‍यै जे ने लोक घरमे सीर-पाट रखैए आ ने उक फेड़ैए। सोझे छुड़छुड़ी-फटक्‍कासँ पावनि‍ करैए। नजरि‍ खि‍रा खढ़ भजि‍अवए लागलि‍। भजि‍अवैत गंगवापर नजरि‍ गेलइ। बुदवुदाइल- ‘‘त: अनेने एते मन औनाइ छलए। घरे लग पोखरि‍क महारपर खढ़क जाक लगौने अछि‍। ओहीमे सँ लऽ आनब। मुँहमे खैनी घुलि‍तहि‍ थूक फेकलक। खढ़क ओरि‍यान देखि‍ मन सनठीपर गेलइ। ि‍बना सनठि‍ये उक कन्‍ना बनाएव? मनमे खौंझ उठलै। खौंझा कऽ बाजए लागलि‍- ‘‘सभ खेतबला पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। आब अपनो उक बना लि‍अ। हमसब तँ सहजे गरीब छी अपना खेत-पथार नै अछि‍। मुदा खेतोबला उक फेड़ि‍ लि‍अ। माल-जालकेँ ठेका-गरदामी बना लि‍अ। आनह आब बजारसँ कीनि‍ कऽ प्‍लास्‍टि‍कक डोरी। अपने मालकेँ डोरीक रगड़ा लगतै, चमड़ी उड़तै माछी असाइ देतै, घा हेतै, मरतै। तखन बुझत जे पटुआ नै उपजेने केहन भेल।’’ बजैत-बजैत दुखनीक तामस कमल। ि‍बनु सनठि‍ये जँ उक बनाइयो लेब तँ भोरमे सूप कथी लऽ कऽ बजाएव। लछमी ि‍दन छी जँ सूप बजा दरि‍दराकेँ नै भगाएव तँ ओ ि‍कन्‍नहुँ भागत। अपने गप-सप्‍प करै लागलि‍- ‘‘कोनो की हमरेटा सेठी नै हएत ि‍क गामेमे ककरो नै हेतै?’’
  ‘‘अनका भेने हमरा की? ि‍कयो अपन दरि‍दरा भगौत आि‍क दोसराक?’’
  ‘‘जँ कोनो जोगार कऽ सभ संठीक ओरि‍यान कऽ लेत आ हमरा नै हएत तखन तँ सबहक भागि‍ जेतै आ हमरे रहि‍ जाएत।’’
     दुनू हाथ माथपर लऽ संठीक चि‍न्‍तामे दुखनी डूबि‍ गेल। रसे-रसे हूब टूटए लगलै। मन औनाए लगलै। जहि‍ना कोनो भारी चीज अांगुरपर पड़ि‍ गेलासँ छटपटाइत तहि‍ना संठीक सोगसँ मन छटपटाए लगलै। तरे-तर नजरि‍ गाममे टहलबए लागलि‍। एक बेरि‍ टहला कऽ देखलक तँ कतौ नहि‍ संठी अभरलै। फेरि‍ दोहरा कऽ टहलबए लागलि‍। फेरि‍ नहि‍ कतौ अभरलै। मन कहै जे ि‍बनु संठि‍ये उक अशुद्ध हएत। अशुद्ध उक गोसॉंइक आगूमे कन्‍ना फेड़ब। ओहो की बुझताह। फेरि‍ मनमे भेलै गरीब लोककेँ एहि‍ना सभ चीजक खगता रहै छै मुदा, कहुना तँ जीवि‍ये लइए। देवतो-पि‍तरकेँ बुत्ता नै छनि‍ जे अपनो पावनि‍-ति‍हारक ओि‍रयान करताह। संठी ताकब छोड़ि‍ डि‍हवार स्‍थानक भागवत मन पड़लै। भागवत मनमे अवि‍तहि‍ महाभारतक कृष्‍णकेँ कुरूक्षेत्रमे शंख फूकैत देखलक। मुदा जखन व्‍यासजी अर्थ बुझवए लगलथि‍न ि‍क तहि‍ काल खैनी खाइक मन भेलइ। ऑंचरक खूँटसँ खैनी नि‍काि‍ल चुनवए लागलि‍। अर्थ सुनबे ने केलक। भागवतक कम्‍मे बात रहै मनसँ नि‍कलि‍ गेलै। फेरि‍ संठि‍येपर मन आि‍ब गेलइ। पटुआक संठीक बदला चन्‍नी आ सनैपर नजरि‍ पहुँचलै। सनै आ चन्‍नीपर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मने-मन अपसोच करै लगल जे अनेरे ि‍गरहत सभकेँ दुसलि‍यै। पटुआक खेती तँ बेपारी सबहक दुआरे छोड़लक। मेहनतो आ लगतो लगा उपजबैत छलै आ बेपारी सभ गरदनि‍ कट्टी कऽ लैत छलै। नीक केलक जे पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। अपना जते डोरी-पगहाक काज होइ छै अो तँ सनइयो आ चन्‍नि‍योसँ कइये लैत अछि‍। मुदा बेपारि‍यो सभकेँ भाभन्‍स कहॉं भेलै। जहि‍ना ि‍गरहतक गरदनि‍ काटि‍ धन ढेरि‍औलक तहि‍ना प्‍लास्‍टि‍क आि‍ब सभटा खा गेलइ। बड़का-बड़का करखन्‍ना सभ ओहि‍ना ढ़न-ढ़न करै छै। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ दुखनीक मनमे खुशी उपकल। खूँटसँ तमाकुल नि‍कालि‍-मुँहमे लेलक। पटुओ संठीसँ मोट-मोट संठी चन्‍नीक होइ छै। सूपो बजबैमे नीक हएत। खूब जोरसँ बजाएव जे दोसरे ि‍दन दि‍रदरा पड़ा जाएत। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ घुरनापर नजरि‍ गेलइ। बान्‍हे कात खेतमे ओकरा खूब चन्‍नी भेलि‍ छलै। सोनो सुन्‍दर मुदा, पटुआक सोन जेकॉं सक्‍कत नइ होइ छै। खैर जे हौ काज तँ सम्‍हैर जाइ छै। घुरनाक घरवाली अछि‍यो बड़ आवेशी। जखने कहवै तखने बेसि‍ये कए कऽ देत। जेललबा बौहू धौंछ थोड़े अछि‍ जे सोझोक वस्‍तु लाथ कऽ लेत। अनकर चीज लइ बेरि‍मे धौंछीक मुँह केहेन मीठ भऽ जाइ छै जना मुँहसँ मौध चुवैत होय। भगवान करौ जे सभ चीज बि‍ला जाइ। तामसपर दुखनी सरापि‍ तँ देलक मुदा, लगले अफसोच करए लागलि‍ जे अनेरे ि‍कअए सरापि‍ देलि‍यै। कहुना भेलौं तँ माइये-पि‍ति‍आइन भेलौं ि‍क ने? माइये-बापक सराप ने धीया-पूताकेँ पड़ै छै। जेहेन चालि‍ रहतै तेहेन फल अपने हेतै। बीस बर्खसँ कहि‍यो थूको फेकए गेलि‍यै। अपना आि‍गये-पानि‍ये नि‍महै छी। आगि‍-पानि‍पर नजरि‍ अबि‍तहि‍ बेटी श्‍यामा मन पड़लै। ऐना कऽ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍ने चलि‍ अबि‍हें। अनका जेकॉं ि‍क तूँ असकरे छेँ। हाथी सनक सासु छेथुन तखन तोरा घरक कोन चि‍न्‍ता छौ। फेरि‍ मनमे उठलै लछमी पावनि‍ छी की ने। सभ ने अपना-अपना घरमे पूजा करत। भरि‍सक तही दुआरे नइ आइलि‍। तमाकुल खाइक मन भेलै। अँचराक खूँट खोलि‍ तमाकुल देखलक तँ एक्‍के जूम बुझि‍ पड़ल। एक्‍के जूम देखि‍ सोचलक जे एकरे दू जूम बना लेब। मुदा टूटल दॉंतक गहमे तँ हराइले रहत। एक्‍के जूम बना मुँहमे लेलक। तमाकुल लइते बेटपर मन गेलै। बेटा मन पड़ते दुखनी सोचए लगलि‍ जे सालो भरि‍ परदेशमे नइ रहत तँ कमाएत कतए? अंदाजे मनमे एलै जे चारि‍-पॉंच मास गेना भेल हेतै। मुदा चारि‍-पॉंच मास झुझुआन बुझि‍ पड़लै। फेरि‍ मन पाड़ि‍ ि‍हसाव जोड़ए लागलि‍। ठेकना कऽ मन पाड़लक जे आसीनमे गेल रहै। हँ, हँ आसि‍ने रहै। खानि‍-पीनि‍ चलैत रहै। हमहूँ पोखरि‍मे तेल-खैर चढ़ा कऽ आइल रही। अखैन काति‍क छी। ऐँ, तब तँ बरखोसँ बेसी भऽ गेलै। ओह नै, पैछला आसीन नै छी ि‍कऐक तँ ओकरा गेलापर नाइतक जनम भेल। ओहो छौँड़ा दौड़ैए। कहुना-कहुना दू बर्ख भेल हेतै। आंगुरपर ि‍हसाब जोड़ै लगल। दू बर्ख आ एक बर्ख तीन बर्ख ने भेल। तीन बर्ख मनमे अबि‍ते चौंि‍क गेल। ने एकोटा पाइ पठौलक आ ने एको बेर आएल। मनमे खुशी उपकलै। छौँड़ा फुटि‍ कऽ जुआन भऽ गेल हएत। कोनो ि‍क खाइ-पीबैक दुख हेतइ। आब तँ चि‍न्‍हलो ने जाएत। दाढ़ी-मोछ सेहो भऽ गेल हेतै। आओत तँ ि‍बआहो कइये देवइ। असकरे नीक नइ लगैए। ि‍बनु धि‍या-पूताक अंगना कोनो अंगना छी। लोके ने लछमी छी। मगन भऽ दुखनी ऑंखि‍ बन्‍न कऽ फड़ल-फुलाएल परि‍वार देखए लगलीह। जहि‍ना पोखरि‍मे नावपर चढ़ि‍ झि‍लहोि‍र खेला उतड़ि‍ कऽ महारपर अबैत तहि‍ना दुखनि‍योकेँ भेलि‍। तकि‍तहि‍ वि‍चार बदलि‍ गेलनि‍। मनमे उठलै जे जँ कहीं छौँड़ा ओनै वि‍याह-ति‍याह कऽ नेने हुअए आ गाम नै आबै तखन की करब। गामोमे तँ कते गोरेकेँ देखबे केलि‍यैहेँ। अखन धरि‍क खुशीक मनमे एकाएक पानि‍ पड़ि‍ गेलै। ि‍नराश मने सोचए लगलि‍ जे जुगे-जमाना तेहेन भऽ गेल जे केकरा के की कहतै। आब ककरो बेटा-बेटी थोड़े पॉंजमे रहै छै। जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। छौँड़ा सभ जहॉं बौहू देखलक ि‍क माए-बाप ि‍बसरि‍ जाइए। मने उनटि‍ जाइ छै। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलै। ऑंचरसँ नोर पाछलक। नोर पोछि‍तहि‍ मनमे उठलै जाबे पैरूख अछि‍ ताबे तक ने ककरो पमौजी केलि‍यै आ ने करबै। जइ दि‍न पैरूख घटि‍ जाएत तइ दि‍न बुझल जेतइ। जि‍नगि‍यो तँ तहि‍ना अछि‍। कोनो ि‍क ठीक अछि‍ जे पैरूख घटलेपर मरब। पहि‍नहुँ मरि‍ सकै छी तइले सोगे की करब। बेटा जँ उड़हड़ि‍ये जाएत तँ उड़हरि‍ जौ। बेटापर सँ नजरि‍ हटि‍ बेटीपर गेलै। बेटीपर नजरि‍ परि‍तहि‍ मनमे आशाक उदय भेलै। आशा जगि‍तहि‍ मुँहमे हँसी एलै। सात घर दुश्‍मनोकेँ भगवान हमरा सन बेटी देथुन। साक्षात् लछमी छी। अपने फेरल नुआ ि‍कअए ने दि‍अए मुदा, कहि‍यो ओढ़ैसँ पहि‍रए धरि‍ वस्‍त्रक दुख अखैन तक भेलि‍हेँ। ओकरे परसादे तीनटा कम्‍मल घरोमे अछि‍। जमाइयो तेहने छथि‍ जे अपने माथपर उठाकेँ अन्‍नो-पानि‍ दइये जाइत छथि‍। आशा जगि‍तहि‍ दुखनी जारन तोड़ए उठल।
     ऑंखि‍ उठा गाछमे सुखल ठौहरी हि‍यासए लगलीह। रौदि‍याह समए भेने मनसम्‍फे सुखल ठौहरी गाछमे। जारन देि‍ख मन खुशीसँ नाचि‍ उठलै। मनमे गामक सुख नचए लगलै। अखनो गाम गामे छी। शहर बजारमे तँ लोक जरना कीनैत-कीनैत तबाह रहैए। मन पड़लै सि‍ंहेश्‍वर स्‍थानक मेला। एक्‍के सॉंझ भानस केलहुँ तहि‍मे दस रूपैया जरनेमे लगि‍ गेल। ई तँ गुन रहए जे सात-आठ गोरे रही जे सवे रूपैया ि‍हस्‍सा लागल। नइ तँ सवा रूपैयाक जरना चुल्‍हि‍ये पजारैमे लगि‍ जाइत। एक सूरे दुखनी दूटा गाछमे लग्‍गीसँ ठौहरी तोड़लक। जारन देखि‍ अबूह लगि‍ गेलै जे कहुना-कहुना तँ पॉंच बोझसँ बेसि‍ये भऽ जाएत। उगहौ पड़त ने। घरो ि‍क कोनो लगमे अछि‍। पॉंच बेरि‍ उघैत-उघैत दुपहर भऽ जाएत। मुदा भीड़ो हएत तँ कहुना-कहुना पनरह दि‍न नि‍चेनो रहब। फेरि‍ मनमे उठलै जे जँ कीहीं अइ बीचमे श्‍यामा आि‍ब गेल हएत तँ अंगने-अंगने खोज-पुछाड़ि‍ करैत बौआइत हएत। मुदा छोड़ि‍यो कऽ कन्‍ना जाएव। सभटा लोक लइये जाएत। से नइ तँ सभटाकेँ बोझ बान्‍हि‍ लइ छी आ एकटा लऽ कऽ जाएव। देखि‍यो सुनि‍ लेबइ। जँ नइ आइलि‍ हएत तँ सभटा उघि‍ये लेब। ओना जँ आइलि‍ हएत तँ ि‍क ओहो मानत। दुनू माए-बेटी दुइये बेरि‍मे उघि‍ लेब। मन असथि‍र होइतहि‍ तमाकुल खाइक मन भेलै। ऑंचरक खूँटपर नजरि‍ पड़तहि‍ मन पड़लै जे तमाकुल तँ तखने सठि‍ गेल। मुदा पथार लागल जारन देखि‍ मनमे एलै जे पावनि‍क दि‍न छी। वेसी अंहोस-मंहोस करब तँ सभ काज दुरि‍ भऽ जाएत। अंगनोमे मारि‍ते रास काज अछि‍। जारन बि‍छैले उठल। गाछक चारू भाग नजरि‍ देलक तँ बीचमे एकटा घोरनक छत्ता सेहो खसल देखलक। छत्तासँ नि‍कलि‍-नि‍कलि‍ घोरन पसरि‍ गेल। पॉंखि‍बला धोरन देखि‍ दुखनी डरा गेल। बापरे ई तँ डकूबा घोरन छी दुइयेटा काटत तँ पराने लऽ लेत। मुदा छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। से नइ तँ लग्‍गि‍येपर उठा कातमे फेि‍क जारन बीछब। मुदा छोटका सभ तँ सौँसे पसरि‍ गेल अछि‍। छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। जीबठ बान्‍हि‍ छत्ताकेँ कातमे फेि‍क जारन बीछए लगलि‍। फेरि‍ मनमे एलै जे ठौहरि‍यो तँ दू रंगक अछि‍। मोटको अछि‍ आ पतरको अछि‍। से नइ तँ दुनूकेँ फुटा-फुटा रखि‍ बोझ बान्‍हब। सएह करए लगल। ठौहरी बीछि‍ते रहै ि‍क मन पड़लै, हाय रे बा बान्‍हब कथीपर। जुना तँ अछि‍ये नहि‍। अगदि‍गमे पड़ि‍ गेल। पहि‍ने जे से मन पड़ैत तँ अंगनेसँ जुन्‍नो नेने अबि‍तौं मुदा, सेहो ने मन रहल। छोड़ि‍ देबइ तँ सभटा आने लऽ जाएत। एते बेरि‍ उठि‍ गेल ि‍कछु खेनौ ने छी। मुदा जारन देखि‍ मनमे खुशी होय जे कहुना-कहुना एक पनरहि‍या तँ चलबे करत। जँ दू-चारि‍ दि‍न आरो तोड़ि‍ लेब तँ भरि‍ जाड़क ओरि‍यान भऽ जाएत। ऑंखि‍ उठा घसबाहि‍नी सभ दि‍स तकलक जे कि‍यो भेटत तँ ओकरे हॉंसू लऽ कड़चि‍ये नइ तँ राड़ि‍ये काटि‍ जुन्‍ना बना लेब। मुदा सेहो नै ककरो देखै छि‍यै। ि‍हया-हि‍या करजान दि‍स ि‍वदा भेल। मुदा ओहो केराक सुखल डपोर तँ ि‍बना हँसुए काटल नहि‍ हएत। करजान पहुँचते देखलक जे करजानबला केरा घौड़ काटि‍ भालरि‍ आ थम्‍होकेँ काटि‍ छोड़ि‍ देने अछि‍। जुन्‍ना देखि‍ मनमे खुशी भेलइ। पान-सातटा जुन्‍ना लऽ आबि‍ बोझ बन्‍हलक। पॉंच बोझ। चारू बोझ गाछे लग छोड़ि‍ एकटा नेने आंगन आइलि‍।
     आंगन आबि‍ सोचए लगलि‍ जे ि‍कछु बना कऽ खा लइ छी। फेरि‍ मनमे भेले जे जखने आंगनक काजमे ओझड़ाएव तखने जारन बाधेमे रहि‍ जाएत। तत्-मत् करैत पानि‍ पीलक। घरसँ तमाकुल नि‍कालि‍ चुनबैत ि‍वदा भेल। पॉंचो बोझ उघि‍ लेलक। काठी जेकॉं डॉंड़ो आ गरदनि‍यो तानि‍ देलकै। देहो-हाथमे दर्द हुअए लगलै। हाथो-पएर नहि‍ धोय ओसारेपर भुँइयेमे ओंघरा गेलि‍। थाकल-ठहि‍आइल देह ओंघराइत नि‍न्‍न पड़ि‍ गेल।
     बेरि‍ टगि‍ गेल। घरक छाहरि‍ अंगनामे दू हाथ ससरि‍ गेल। डेड़ि‍यापर सँ जोगि‍नदर सोर पाड़ए लगल- ‘‘काकी, काकी।’’
  दुखनीक नि‍न्‍न टुटल। डेढ़ि‍यापर सँ ससरि‍ जोगि‍नदर आंगन गेल तँ देखलक जे भुँइयेमे नि‍न्‍न भेरि‍ सुतल अछि‍। फेरि‍ बाजल- ‘‘काकी, काकी।’’
  ठाढ़ भेलि‍ जोगि‍नदरक मनमे उठल जे हमहूँ तँ पाइयेबला अइठीन रहलौं मुदा, सभ सुख-सुवि‍धा रहि‍तो ओकरा सभकेँ ऐहन नि‍न्‍न कहॉं होइ छै। देखै छी जे पेट खपटा जेकॉं खलपट छै, भरि‍सक खेवो केने अछि‍ ि‍क नहि‍। तहूमे पाएरो धुराइले देखै छि‍यै भरि‍सक कतौसँ काज कए कऽ आइलि‍ अछि‍। अखन जे घरक सभ कुछ उठा ि‍कयो लऽ जाय तँ बुझवो ने करत। एकरा सबहक कोन दुनि‍यॉं छै। जहि‍ना चीनीक कीड़ाकेँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाए तँ ओ मरि‍ जाएत। जे स्‍वभावि‍के छैक। मुदा ि‍क मि‍रचाइक कीड़ा चीनीमे जीबि‍ सकत। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍ति‍ जोगि‍नदरक मनमे उठि‍ गेल। मुदा काजक धुमसाही, वि‍चारक दुनि‍यॉंसँ खींचि‍, ओकरा हड़वड़ा देलक। फेरि‍ काकी, काकीक आवाज देलक। मुदा नि‍न्‍न नहि‍ टुटल देखि‍ कपड़ाकेँ ओसारेपर रखि‍ दुखनीक घुट्ठी दाबए लगल। घुट्ठी दबि‍तहि‍ दुखनीक नि‍न्‍न टूटल। ऑंखि‍ मुननहि‍ बाजलि‍- ‘‘अयँ गे सामा (श्‍यामा) काल्‍हि‍ ि‍कअए ने ऐलै?’’
     दुखनीक अवाज सुि‍न जोगि‍नदरक मनमे भेल जे भरि‍सक काकी सपनाइए। घुट्ठीकेँ ि‍हलबैत बाजल- ‘‘काकी, काकी....।’’
  ऑंखि‍ खोलि‍ दुखनी उठि‍ कऽ बैसि‍ गेल। हाफी कऽ जोगि‍नदर ि‍दस तकलक। मुदा ि‍कछु बाजलि‍ नहि‍। मोटरी खोलि‍ जोगि‍नदर जोड़ भरि‍ साड़ी, साया, एकटा आंगीक संग दसटा दसटकही आगूमे रखि‍ बाजल- ‘‘अखैन धरि‍ काकी अहॉं नहेबो ने केलहुँहेँ।’’
  जहि‍ना आम बीछि‍नि‍हार गाछक नि‍च्‍चॉंमे खसल आम देखि‍ उजगुजा जाइत तहि‍ना दुखनी उजगुजा गेलि‍। बाजलि‍- ‘‘बौआ, जारनि‍ नइ छलै वएह तोड़ए भि‍नसरे चलि‍ गेलौं। ओकरे सम्‍हारैत-सम्‍हारैत दुपहर भऽ गेल। ि‍कछु खेबो ने केने छी। अराम करए लगलौं ि‍क ऑंख लगि‍ गेल।’’
  दुखनीक बात सुि‍न जोगेनदर बाजल- ‘‘काकी, अखैन अगुताइल छी तेँ नै अँटकब। पूजा उसरला बाद नि‍चेनसँ आि‍ब आरो गप्‍पो करब आ कोनो कारोबार करैले मदति‍ सेहो कऽ देब। अखैन मेला देखैले कपड़ो आ रूपैइयो देलौंहेँ। जाइ छी।’’
     जोगि‍नदर उठि‍ कऽ ि‍वदा भऽ गेल। मने-मन दुखनी ि‍हसाब जोड़ए लागलि‍ जे अधा रूपैया कऽ चाउर कीनि‍ लेब आ अधा हाथ-मुट्ठीमे रखि‍ लेब। मेला-ढेलाक समए छी कखैन कोना भूर फूटि‍ जाइत। फेरि‍ मनमे एलै जे श्‍यामो तँ अबि‍ते हएत। ओहो चाउर अनबे करत। जखन अनदि‍नो नेने अबैए, अखन तँ सहजे पाबैनि‍ये छी। दुनू नाइत-नाति‍न सेहो ऐबे करत। ओकरो हाथकेँ दू-चारि‍ रूपैया नइ देवइ से केहन हएत। हम कतबो गरीब ि‍कअए ने छी मुदा, नानी तँ छि‍यै। साड़ी खोलि‍ दुखनी देखए लागलि। साड़ी देखि‍ बुदबुदाइल- ‘‘ऐहेन साड़ीक कोन काज अछि‍। कोनो ि‍क नव-नौतारि‍ छी जे ऐहेन छपुआ पहि‍रब। अइसँ नीक तँ तीन काजू मरकीन दैत जे कतबो मारि‍-धुसि‍ कऽ पहि‍रतौं तइओ साल भरि‍ चलबे करैत। सायाक कोन अछि‍। सायाक कोन काज अछि‍। आब तँ सहजहि‍ बुढ़ि‍ भेलौं। जहि‍या जुआन छलौं तहि‍यो तँ डेढ़ि‍ये पहि‍रैत छलौं। कोनो ि‍क मंगै लए गेल छेेलि‍यै, मुदा जखैन घर पैसि‍ दऽ गेल तखैन तँ जे देलक सएह नीक। बेटी ऐबे करत अोकरे पुरना लऽ लेब आ ई दऽ देबै।’’
  साड़ी-साया, आंगी समेटि‍ कऽ रखि‍ दुखनी रूपैया गनए लागलि‍। फेर बुदबुदाइल- ‘‘सभटा दस टकहि‍ये छी। दसटा अछि‍। दसटा दसटकही काए बीस भेल। दू-दू टा कऽ फुटा-फुटा रखि‍ गनलक। पॉंच बीस भेल। मनमे खुशी एलै। फेर लगले मनमे एलै जे आइ पावनि‍क दि‍न छी अखन धरि‍ खेलौंहेँ कहॉं। सभ दि‍न खैहह पाबनि‍ दि‍न ललैहह। मुदा भि‍नसरसँ तँ गाछि‍ये-ि‍बरछीमे रहलहुँ। सारा-गाड़ा नंघलौं। ि‍बना नहेने कोना भानस करब? सूर्य दि‍स तकलक। माथसँ ि‍नच्‍चॉं देखि‍ सोचलक आइ उपासे कऽ लेब। जाबे नहा कऽ भानस करए लगब ताबे तँ साँझे पड़ि‍ जाएत। सॉंझमे लछमी पूजा करब ि‍क अपने खाए-पीबए लगब। तहूमे अखन धरि‍ ने खढ़ अनलौं आ ने संठी। जाबे से नहि‍ आनब ताबे उक कन्‍ना बनाएव। ि‍दआरि‍यो बनबए पड़त। करू तेलो आनए पड़त। घरमे जे तेल अछि‍ ओ अँइठ भऽ गेल अछि‍ कन्‍ना ि‍दयारीमे देवइ। काज देखि‍ दुखनीकेँ अबूह लागि‍ गेल। पावनि‍क सभ ि‍कछु ि‍बसरि‍ गेल। नजरि‍ बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजरि‍ पहुँचते मनमे खौंझ उठले। बाजलि‍- ‘‘ऐना कऽ समाद पठौलि‍यै से ि‍कअए ने आइलि‍।’’
  असमंजसमे पड़ि‍ गेल।
  तहि‍ बीच नवानीवाली बान्‍हेपर सँ सोर पाड़ि‍ बाजलि‍- ‘‘काकी, काकी, दैया आगू अबैले कहलकनि‍हेँ। उत्तरवरि‍या पोखरि‍पर दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍यो लऽ बैसल छन्‍हि‍।’’
  दैयाक नाओ माने श्‍यामा दऽ सुनि धड़फड़ा कऽ उठि‍ घरमे कपड़ा रखि‍ ऑंचरमे रूपैया बान्‍हि‍ ि‍वदा भेलि‍। तीनि‍-चारि‍टा धि‍या-पूता सेहो संग लगि‍ गेलनि‍। बेटी लग पहुँचते श्‍यामा उठि‍ कऽ गोड़ लगलक। गोड़ लगि‍तहि‍ तरंगि‍ कऽ दुखनी बाजलि‍- ‘‘अँइ गे, तोरा जानक काज नइ छौ जे एते लदने ऐलेहेँ।’’
     माइक बातकेँ अनसून करैत श्‍यामा दुनू बच्‍चाकेँ कहलक- ‘‘नानीकेँ गोड़ लाग।’’
  बच्‍चाकेँ देखि‍ दुखनी हरा गेलि‍। सभ बात वि‍सरि‍ गेलि‍। ऑंचरक रूपैया नि‍कालि‍ एक-एक टा दस टकही दुनू बच्‍चाकेँ हाथमे दऽ बॉंि‍क अस्‍सि‍यो रूपैया श्‍यामा दि‍शि‍ बढ़ौलक। रूपैया देखि‍ श्‍यामाक मनमे उठल। भरि‍सक बौआ पठौलकेहेँ। मुस्‍की दैत माएकेँ पुछलक- ‘‘की सभ बौआ पठौलकौहेँ?’’
  बौआक नाओ सुि‍न दुखनीक मन फेरि‍ औनाए गेल। नजरि‍ बेटापर गेलइ। बेटापर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मनमे तामस उठलै। बाजलि‍- ‘‘कतए छौड़ा हराएल-ढराएल अछि‍ तेकर कोन ठेकान अछि‍। अखन धरि‍ ने कहि‍यो चि‍ट्ठी-पुरजी पठौलक आ ने एक्कोटा छि‍द्दी। ओम्‍हरे कतौ कोनो मौगी सने उढ़ढ़ि‍ गेल ि‍क की। से ि‍क कोनो पता अछि‍।’’
  माइक बात रोकैत श्‍यामा बाजलि‍- ‘‘ऐना ि‍कअए बजै छेँ। माए छीही कनी ठर-ठेकानसँ बजमे से नै।’’
     बेटीक बात सुि‍न माएक बेटासँ हटि‍ बेटीपर पुन: आबि‍ गेल। बाजलि‍- ‘‘दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍योकेँ कन्‍ना आनल भेलौ?’’
  मुस्‍कुराइत श्‍यामा बाजलि‍- ‘‘अपने एतऽ तक पहुँुचा गेलखि‍न।’’
  जमाए दऽ सुि‍न दुखनी बाजलि‍- ‘‘एक डेग आगू घर नै देखल छलनि‍ जे जइतथि‍।’’
  ‘‘गाममे मेलो होइ छै आ पावनि‍यो छि‍यै तेँ कहलखि‍न जे घरपर गेने ओझरा जाएब। चारि‍ थान माल अएकरे माए बुते सम्‍हारल नै ने हेतै। परसू ऐथुन।’’
     परसू सुि‍न दुखनीक मन थीर भेल। छोटका बच्‍चाकेँ केरामे लऽ जेठकीकेँ आगू कऽ ि‍वदा भेलि‍। घरसँ कने पाछुऐ रहै ि‍क दछि‍नसँ एक गोटेकेँ हाथमे बैग, फुलपेंट-शर्ट पहीरि‍ने अवैत दुनू गोटे देखलक। मुदा ि‍कयो चि‍न्‍हलक नहि‍। बदलल चेहरा भुखनाक। भुखनो अंगने दि‍शि‍सँ अबैत आ दुनू गोटे दुखनि‍यो अंगने दि‍स बढ़ैत। घर लग आबि‍ भुखना दुखनीकेँ कहलक- ‘‘माए।’’
  भुखनाक माए कहब दुखनी सुनलक मुदा, अनठि‍या बुझि‍ अनठा देलक। ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। मुदा श्‍यामा चीन्‍हि‍ गेली। बाजलि‍- ‘‘बौआ हौ।’’
  बौआ सुि‍न दुखनि‍यो चौंकलीह। ताधरि‍ भुखना लग आबि‍ माएकेँ पएर छुबि‍ गोड़ लगलक। दुखनी अवाक् भऽ गेलि‍। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलनि‍। ि‍नच्‍चॉंसँ उपर धरि‍ भुखनाकेँ नि‍ग्‍हारए लगलीह।
करेज दहलि‍ गेलनि‍।‍ वामा बॉंहि‍सँ नाति‍केँ दवने आ दहि‍ना तरहत्‍थीसँ ऑंखि‍ पोछि‍ ि‍वह्वल होइत बजलीह- ऑंइ रौ बौआ तूँ तँ समरथ भऽ गेलेँ। चि‍न्‍हवे ने केलि‍यौ। आंङै-समांगे नीक रहै छलेँ की ने। एते दि‍नपर ि‍कअए एलेँ। ि‍क बुझि‍ पड़ै छेलौ जे घरमे ि‍कयो ने अछि‍। कोनो ि‍क हम मरि‍ गेलि‍यौ। रूपैया नै कमेलेँ तँ नै कमेलेँ मुदा, छुछो देहे तँ अबि‍तेँ। अखैन तँ हम अपने थेहगर छी।
  श्‍यामक माथ परक मोटरी पकड़ैत भुखना बाजल- दाय, तोहर माथ अगि‍या गेल हेतौ।
  नै-नै कथी लए तूँ लेबह। आब ि‍क अंगना कोनो बड़ दूर अछि‍। मुदा बलजोरी भुखना श्‍यामक माथपर सँ मोटरी उताड़ि‍ अपना माथपर लेलक। आद्र स्‍वरे दुखनी बाजलि‍- बौआ, रस्‍ता तँ भुखले आएल हेबह।
  नइ गै। खाइत-पीबैत एलौं ि‍क।
  बौआ, अंगनो गेल छेलहक ि‍क रस्‍तेसँ रस्‍ता छह?”
  अंगनामे बेग रखि‍ देलि‍यै। घर बोन दे देखलि‍यै तँ तमोरि‍यावाली भौजीकेँ पुछलि‍यै। वएह कहलनि‍ जे दायकेँ आनै काकी आगू गेल छथि‍।
     भुखनाक बात सुनि‍ दुखनीकेँ तामस उठल। बाजलि‍- ऑंइ रौ छौँड़ा, अंगना गेलेँ तँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलेँ की नै?”
  घर बोन देखलि‍यै तँ बेगकेँ अोसरेपर राखि‍ तोरा तकैले ि‍वदा भेलौं।
  हम कोनो ि‍बलेँत गेल छेलौं। ताबे तूँ हाथ-पाएर धो कऽ अंगनेसँ गोसॉंइकेँ गोड़ लागि‍ लइतेँ से तोरा बुते नै होइतौ। जाबे हमरा तकै लए गेलेँ ताबे जे कोइ बेग चोरा लेतौ, तब की करबीही।
  हमरा देखि‍ते मारे धि‍यो-पूतो आ जनि‍जाति‍यो सभ आबि‍ गेल। ओते लोकमे के बेग चोराओत।
  फुसफुसा कऽ माए बेटीकेँ पूछलक- दाय, कि‍छु खाइयोबला सनेस छौ। देखै छीही छौँडाक मुँह केहन सुखाइल छै।
  हँ। असकरे दुआरे कते अनि‍ति‍यौ। पॉंच गो दलि‍पूड़ी अछि‍।
  अच्‍छा, वड़बढ़ि‍यॉं। हम तँ अखैन धरि‍ नहेबो ने केलौंहेँ।
  ि‍कअए? पावनि‍क दि‍न छि‍यै तइयो ने नहेलेँ।
  छुट्टि‍यो ने भेल। भि‍नसरेसँ जारनि‍क अोरि‍यानमे लागल छलौं। बोझ उघैत-उघैत मन ठहि‍या गेल। असकता गेलौं। ने भानसे केलौं आ ने नहेबो केलौंहेँ। ओहि‍ना ओसारपर ओघड़ेलौं ि‍क नीन आि‍ब गेल। जोगि‍नदरा आि‍ब कऽ उठौलक। नइ तँ सुतले रहि‍तौं। देखही जे सॉंझ लगि‍चाइल जाइ छै ने अखैन तक उकक ओरि‍यान भेलहेँ आ ने सॉंझ-बतीक।
     आंगन अबि‍ते दुखनी-भुखनाकेँ कहलक- बौआ, पहि‍न पएर-हाथ धो कऽ सि‍रा आगूमे गोड़ लागह। तखन ि‍कछु करि‍हह।
  भुखना सएह केलक। श्‍यामा सेहो घैलची लग जा घैला झुका एक चुरूक पानि‍ नि‍च्‍चॉं खसा ओहि‍मे दुनू पाएरक तरबा भीजा ओसारेपर सँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलक। सौँसे अंगना धि‍यो-पूतो आ जनि‍जाति‍यो सभ कच-बच करैत। छोटका बच्‍चा सभ फुटे कॉंइ-ि‍कचीड़ करैत रहै। तहि‍ बीच जुगेसराक बेटा रवि‍याक बेटाकेँ पाछुसँ पोनमे ि‍बठुआ काटि‍ दोगे-दोग घुसुि‍क गेल। छि‍लमि‍ला कऽ रवि‍याक बेटा पाछु तकलक तँ शि‍बुआक बेटीकेँ देखलक। ओहि‍ छौँड़ाकेँ भेले जे यएह छौँड़ी ि‍बठुआ कटलक। हॉंइ-हॉंइ कऽ दू मुक्‍का लगा देलक। मुक्‍का लगि‍ते शि‍वुआक बेटी चि‍चि‍आ कऽ कानए लागलि‍। शि‍वुआक घरवाली सेहो पछवारि‍ कात ठाढ़ छलि‍। बेटीकेँ कनैत देखि‍ कोरामे उठबैत पुछलक। ओ छौँड़ी रवि‍याक बेटा नाओ कहलक। ओकरो हड़लै ने फुड़लै ओहि‍ छौँड़ाकेँ कान ऐँठि‍ एक थापर लगा देलक। तहि‍ समए रवि‍याक घरवाली सेहो अबैत छलि‍। बेटाकेँ देखि‍ पुछलक। ओंगरीक इशारासँ छौँड़ा शि‍वुआक घरवालीकेँ देखा देलक। शि‍वुआक घरवालीकेँ देखवि‍तहि‍ रवि‍याक घरवाली लगमे जा झोंट पकड़ि‍ मुँहपर थूक फेि‍क देलक। सौँसे आंगन हड़-वि‍रड़ो मचि‍ गेल। छोटका धि‍या-पूता डरे पड़ाए लगल। तँ दोसर ि‍दस हल्‍ला सुनि‍ आन-आन अबौ लगल। दुखनीक बकारे बन्‍न। जहि‍ना-जहि‍ना शि‍वुआक घरवाली गारि‍ पढ़ै तहि‍ना-तहि‍ना रवि‍याक घरवाली उनटबैत जाए। ि‍कएक तँ स्‍त्रीगणक झगड़ाक वि‍शेषता होइत जे जे पाछु धरि‍ गरि‍आओत ओकर जीत होइत। अंगनाक दृश्‍य देखि‍ भुखनो आ श्‍यामो दुनूक बॉंहि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ ठेल-ठालि‍ कऽ अपना-अपना अंगना दऽ आइल। भगलाहा धि‍या-पूता सभ पुन: आबए लगल। जनि‍जाति‍यो आ धि‍यो-पूतोमे पाटी बनि‍ गेल। ि‍कछु गोटे ि‍शवुआक घरवालीक पक्ष लऽ आ ि‍कछु गोटे रवि‍याक घरवालीक पक्ष लऽ झगड़ाकेँ पुन: ठाढ़ केलक। एक दोसराक दोख लगवैत अपना पक्षकेँ नि‍र्दोष साबि‍त करए लगल। मुदा जहि‍ना पोखरि‍मे गोला फेकलापर पानि‍मे हि‍लकोर उठैत जे धीरे-धीरे शान्‍त भऽ जाइत तहि‍ना शान्‍त भऽ गेल।
     तत्-खनात तँ दुखनीक आंगन शान्‍त भऽ गेल। अंगनासँ बाहर रस्‍तो आ आनो-आनो जगहपर गुद-गुद-फुस-फुस होइते रहल। जहि‍ना कोनो गाम वा घरमे आगि‍ लगलापर पानि‍ देने मि‍झा जाइत मुदा आगि‍क गरमी रहबे करैत तहि‍ना भेल। आन सभ तँ आंगनसँ ि‍नकलि‍ गेल मुदा, दुखनीक मनक आगि‍ पजरि‍ गेल। बेटी श्‍यामा दि‍स देख जोर-जोरसँ बजए लागलि‍- हम ककरो बजबैले गेल छेलि‍यै जे आबि‍ पावनि‍क दि‍न अंगनामे झगड़ा केलक। पावनि‍ ि‍क कोनो एक दि‍नक होइत अछि‍ आि‍क सालो भरि‍ले होइए। सालो भरि‍ अंगनामे झगड़ा होइते रहत ि‍क ने। तहूमे जे ि‍कयो डोरी बॉंटि‍ घरक पछुऐत बान्‍हि‍ देत तखन तँ आरो सालो भरि‍ झगड़ा होइते रहत कि‍ ने?”
  माइयक बोली बन्‍न करै दुआरे थोम-थाम लगबैत श्‍यामा कहलक- अनेरे तूँ ि‍कअए आफन तोड़ै छेँ। तोरा अंगनामे छेबे के करौ जे साल भरि‍ झगड़ा हेतौ।
     बेटीक बात सुि‍न दुखनी दम कसलक। मुदा तइओ मनमे आगि‍ लगले रहै। घरसँ वि‍छान नि‍कालि‍ श्‍यामा अंगनामे ि‍वछौलक। बि‍छा अपन मोटरी खोललक। एक धारा चाउर, सेर तीनि‍ऐक खेसारीक दालि‍, पॉंचटा दलि‍पूड़ी आ अपनो आ बच्‍चो सभक कपड़ा नि‍कालि‍ रखलक। पॉंचो पूड़ीमे सँ दूटा भुखनाकेँ एकटा कऽ सरस-नि‍रस तोड़ि‍ दुनू बच्‍चाक हाथमे देलक। एकटा अपना लेल आ एकटा माए लेल फुटा कऽ रखलक। बैग खोलि‍ भुखना रूपैयाक गड्डी नि‍कालि‍ माएकेँ कहलक- माए, यएह कमा कऽ अनलि‍यौ।
  रूपैया देखि‍ माइयो आ बहीनो बाजलि‍- झॉंपह, झब दऽ झॉंपह नै तँ लोक देखि‍ लेतह।
  रूपैया झाँपि‍ भुखना दू जोड़ साड़ी आंङी आ सायाक कपड़ाक संग दुनू बच्‍चा लेल शर्ट-पेन्‍ट नि‍कालि‍ आगूमे रखलक। कपड़ा देखि‍ दुखनी ि‍वस्‍मि‍त भऽ गेलि‍। मने-मन सोचए लगलि‍। जे ढहलेलो अछि‍ तइओ तँ बेटे धन छी। मन पड़लै पति‍। भगवान ककरो अधला करै छथि‍न। मन-मन गोड़ लगलकनि‍। अही दुनू बेटा-बेटीक आशापर ने अपन वएस गमा कऽ रहलौं। संतोखे गाछमे ने मेवा फड़ै छै। माएकेँ वि‍स्‍मि‍त देखि‍ भुखना वि‍स्‍कुटक ि‍डब्‍बा नि‍कालि‍ माएक हाथमे दैत कहलक- माए, ई मक्‍खनबला ि‍वस्‍कुट छी तोड़े लए अनलि‍यौहेँ।
  हाथमे वि‍स्‍कुटक डब्‍बा लऽ उनटा-पुनटा कऽ देखए लगली। दुनू बच्‍चो आ श्‍यामोक नजरि‍ डि‍ब्‍बापर अँटकि‍ गेल। तहि‍ बीच देहमे लगबैबला दूटा गमकौआ साबुन, दूटा कपड़ाक साबुन पौवाही नारि‍यल तेलक डि‍ब्‍बा, नि‍कालि‍ दुखनीक आगूमे रखलक। चीज बौस देखि‍ दुखनी मन उधि‍या गेलै। मनमे हुअए लगलै जे अकासमे उड़ि‍ गेलहुँ आि‍क नरकसँ सरग (स्‍वर्ग) चलि‍ गेलहुँ आि‍क सपना देखै छी। अपनाकेँ संयत करैत बाजलि‍- पावनि‍क दि‍न छी, पहि‍ने सभ ि‍कयो खा लइ जाइ जाह। हम अखैन नै खाएव। दि‍नो खटि‍आइये गेल अछि‍ कनी कालमे सॉंझ-बॉंती दइये कऽ खाएव।
  फेर मनमे एलै जे गोसॉंइ डूबैपर अछि‍ अखन धरि‍ पावनि‍क तँ कोनो ओरि‍यान भेवे ने कएल अछि‍। ने उक बनबै लए खढ़-संठी अनलौं आने दि‍आरी बनेलौंहेँ। ने दि‍यारीक टेमी बनवै लए साफ सुती कपड़ा तकलौंहेँ आ ने दोकानसँ तेले अनलौंहेँ। तहूमे दुनू भाए-बहीन आइल अछि‍ दुइओटा तीन-तरकारी नहि‍ करब से केहन हएत। एक तँ लछमी पावनि‍ तहूमे एते दि‍नपर छौँड़ा आएल अछि‍।
     पूड़ी खा पानि‍ पीबि‍ श्‍यामा माएकेँ कहलक- चि‍कनी माटि‍ सानि‍ कऽ दि‍आरी बना लइ छी। तूँ दोकानक काज झब दऽ केने आ नै तँ ि‍करि‍ण डूबलापर दोकानोक काज नइ हेतौ। ओहो पूजा-पाठमे लगि‍ जाएत।
  बेटीक बात सुि‍न दुखनी बाजलि‍- ऑंइ गै दैया दोकान-दौड़ीक काजमे ओझरा जाएव तँ खढ़-संठी कखैन आनि‍ उक बनाएव?”
  काजक भरमार देखि‍ भुखना माएकेँ कहलक- तोँ दोसरे काज कर हम दाेकानक काज कऽ लैत छी।
  बेटाक बात सुि‍न दुखनी कहलक- अनठि‍या बुझि‍ दोकानबला ठकि‍ लेतौ।
  माइक बात सुि‍न भुखनाकेँ हँसी लागल। मने-मन सोचए लगल जे शहर-बजार घुमै छी हम आ गामक बनि‍यॉं ठकि‍ लेत हमरे। मुदा ि‍कछु बाजल नहि‍। माएकेँ रोकैत श्‍यामा कहलक- आब जे ककरो अइठीन खढ़-संठी मांगए जेबही से देतौ। लछमी पूजाक बेरि‍ भऽ गेलै। काल्‍हि‍ये ि‍कअए ने मांगि‍ अनलेँ। नइ तँ आइये दुपहर से पहि‍ने मांगि‍ अनि‍ते। आब लेाक अपन-अपन चीज-बौस समेटि‍ घर आनत आि‍क तोरा खढ़-संठी देतौ।
  बेटीक बात सुि‍न दुखनी नि‍राश भऽ गेलि‍। उकक आशा टुटि‍ गेलइ। बाजलि‍- हम तँ बूढ़ि‍ भेलौं। आब ि‍क कोनो पावनि‍-ति‍हारक ठेकान रहैए।
  माइक टूटल आशा देखि‍ श्‍यामा सम्‍हारैत बाजलि‍- खढ़-संठी छोड़ि‍ देही। उक नै हएत तँ ि‍क हेतै। गोसॉंइ बाबाकेँ कहि‍ देबनि‍ जे एते ति‍रोट भऽ गेल। नै पान तँ पानक डंटि‍ये सँ तँ पूजा करबे केलौं।
  सामंजस्‍य करैत दुखनी- अच्‍छा हो-अ। खढ़-संठी छोड़ि‍ दइ छि‍यै। तूँ चि‍कनी माटि‍क दि‍आरी बनाले। कनी रूखे कऽ माटि‍ सनि‍हेँ। नइ तँ आब नै सुखतौ। दि‍नो खटि‍आइये गेल। रौदो ठंढ़ा गेल। दोकानेक काज केने अबै छी।
  तहि‍ बीच भुखना कहलक- तूँ अंगनेक काज सम्‍हार। दोकानक काज केने अबै छी।
  बेटाक बात सुि‍न दुखनी कहलक- ऑंइ रौ, शुभ-शुभ कऽ तूँ गाम एलेहेँ, तोरा कन्‍ना दोकान जाए ि‍दऔ। लोक की कहत?”
  लोक की कहतौ?”
  एतबो ने बुझै छीही जे सभ खि‍धांस करए लगत जे फलनीक खापड़ि‍ केहेन तबधल छै जे अखने बेटा परदेशसँ एलै आ बेसाह अनैले दोकान पठौलक।
  कोइ ने ि‍कछु बाजत। कोनो अनकर काज छि‍यै जे ि‍कयो ि‍कछु बाजत। बाज कथी सबहक काज छौ?”
  एक रूपैया कऽ नून, दू गो तीमनो-तरकारी करब तेँ पॉंच रूपैयाक करू तेल सेहो लऽ लि‍हेँ। आठ अन्‍नाक जीर-मरीच, आठ अन्‍नाक हरदी आ आठ आनाक मि‍रचाइ सेहो लऽ लि‍हेँ। अल्‍लुओ घरमे नहि‍ये अछि‍। तरैबला अल्‍लू सेहो लऽ लि‍हेँ। दूटा पापड़ो लऽ लि‍हेँ। आइ लछमी पूजा सेहो छी तेँ आठ अन्‍नाक मखान आ आठ अन्‍नाक चि‍न्‍नि‍यो लइये लि‍हेँ। भरि‍ राति‍ डि‍बि‍या जरत तइले मट्टि‍यो तेल कनी बेसि‍ये कऽ लऽ लि‍हेँ।
  आउरो ि‍कछु?”
  मन पाड़ दुखनी बाजल- आब तँ लोक धुमनक धूपो देनाइ छोड़ि‍ये देलक तेँ एकटा अगरवत्तीक डि‍ब्‍बा सेहो लइये लि‍हेँ।
     श्‍यामा ि‍दआरी बनवै लए ि‍चक्‍कनि‍ माटि लोढ़ीसँ फोड़ए लगलीह। भुखना दोकान वि‍दा भेल। दुखनीक मन असथि‍र भेल। मन असथि‍र होइते बेटीकेँ कहलक- बुच्‍ची, हम नहाइ लए जाइ छी। ि‍करि‍णो लुकझुकाइये गेल।
  श्‍यामा- बौआ जे साड़ी अनलकौ सएह लऽ ले।
     बेटीक बात सुि‍न दुखनी हरा गेलि‍। मनमे नचए लगलै बेटाक कीनल पहि‍ल साड़ी। जहि‍यासँ अपने मुइलाह तहि‍यासँ कहि‍यो नव साड़ीक नसीव नहि‍ भेलि‍। ओना बेटी अपन पहि‍रल साड़ी साले-साल दइते रहल तेँ कहि‍यो कपड़ाक दुख नहि‍ये भेलि‍। रोडे ि‍कनछरि‍मे गारल सरकारी कलपर दुखनी पहुँचल। कलपर पहुँचते मन पड़लै। साड़ी-लोटा कलेपर रखि‍ चोट्टे घुि‍र कऽ आंगन आबि‍ बेटीकेँ कहलक- दाय, एकटा बात मन पड़ि‍ गेल। ि‍बसरि‍ जाइतौं तेँ कहै लए एलि‍यौ।
  अकचकाइत श्‍यामा पुछलक- कोन बात मन पड़लौ?”
  दुखनी- बच्‍चा जे दोकानसँ औत तँ कहि‍ दि‍हैन जे अगि‍ला चौमास बि‍करी अछि‍। दुइये कट्ठा छइहो। से कीनि‍ लेत। हमरा ने एक्कोटा घरसँ काज चलैत अछि‍ मुदा, नइ अइ साल तँ अगि‍लाे साल ि‍वआह कइये देवइ। बाल-बच्‍चा हेतै। लघि‍यो करै लऽ कतऽ जतै। लोक बढ़ने मालो-जाल पोसबे करत। से कतऽ बान्‍हत।
  श्‍यामा- अच्‍छा जो, पहि‍ने नहाले। बौआ दोकानसँ औत तँ मन पाड़ि‍ देबौ।        
गजेन्द्र ठाकुर-
कथा-
संघर्ष

फाइलक गेँट
, गरदासँ सनल। ओहिमे सँ एक-एकटा कागत निकालि मुँहपर रुमाल राखि झारि रहल छी। ओहिमे सँ किछु काजक वस्तु निकलैत अछि, किछु बेकाजक। विधवा सोहागोक केस-मुकदमाक फाइल। मान-अपमानक खाता-खेसरा। आरोप-प्रत्यारोपक प्रकरणक क्रम। बूढ़ महिलाक युवावस्थाक खिस्सा, किछु सत्य, किछु मिथ्यारोप। पति आ पुत्रक जीवन। बेनग्न होइत हमर सभक सभ्यताक छाप। किएक चानन घसने रहैत अछि ई बूढ़ी। भगवान पर एतेक भरोस? एहि उमरिमे बेटाक स्मारक बनेबाक जिद्द? हारि आ जीतक तारतम्यक बीच, एखन फेर एकटा दोसरे पेटीशन? जितबाक कोन अद्भुत लगन लागल छैक ओकरा। हारिते रहल अछि भरि जिनगी, तैयो!
पहिने तँ कुमोनसँ मंडल सरक कहलापर ई काज हाथमे लेने रही। मुदा आब हमरो इच्छा भऽ गेल अछि
, इच्छा ओकर पेटीशनकेँ यथाशीघ्र दाखिल करबाक। इच्छा ओकरा जितेबाक। ई फाइलक गरदा, गरदासँ सानल कागत-पत्तर सभ। डस्टसँ एलर्जी अछैत हम एहिमे घोसिया गेल छी। एहि बुढ़ियाक हारिक नमगर फेहरिस्ट, तकर सोझाँ हमर अपन हारि सभक कोनो लेखा नहि। एकरा जितएबाक जिद्दक आगाँ अपन अप्रत्यक्ष विजय लखैत अछि। सोझाँ-सोझी विजय नहि तँ एहि बुढ़ियाक माध्यमसँ सम्भावित विजयक पेटीशन। हारत तँ ई बुढ़िया आ जे ई बुढ़िया जीतत तँ जीतब हम। ई बुढ़िया धरि अछि अगरजित। ऑफिसमे सभसँ झगड़ा केने अछि। कार्यालयक क्यो गोटे एकर पेटीशन आगाँ बढ़ेबाक लेल तैयार नहि। मंडल सर मुदा एकर सभटा नखड़ा बरदास्त करैत छथि। एकर बेटा हुनकर बैचमेट छलन्हि। नीक लोक छथि, सज्जन। कार्यालयक कनीय सदस्य सभसँ हमरा कहियो कोनो प्रतियोगिता नहि होइत अछि। मुदा उच्च पदाधिकारी सभसँ फाइलोपर आ ओहिनो किछु ने किछु होइते रहैत अछि। मुदा मंडल सर नीक लोक। सज्जन। आ एहि पेटीशनकेँ देबाक भार ओ हमरेपर छोड़ने छथि। बुझल छन्हि जे अधिकारी सभ ओहि पेटीशनमे नेङरी मारत। आ तखन दोसर सभ बीचेमे पेटीशन छोड़ि भागि जएत। मुदा हम तँ से भेलापर पाछू पड़ि जाएब आ तखन पेटीशन दाखिल भऽ सकत हमरे बुते। ई विश्वास छन्हि मंडल सरकेँ।
अहाँपर सँ हमर विश्वास उठि गेल अछि । एक महिनासँ झुट्ठे घुमा रहल छी। एखन धरि पेटीशन नहि भेल दाखिल कएल”- बुढ़िया आइ लगा कऽ तेसर बेर ई सभ गप सुनेलक अछि आ चलि गेल अछि। पहिल बेर तँ हम मंडल सरकेँ कहबो केलियन्हि जे कोन फेरमे हमरा सभ पड़ल छी। एहि बुढ़िया लेल जान-प्राण लगेने छी। मुदा देखू, दस टा गप सुना कऽ चलि गेल। मुदा मंडल सर कहलन्हि जे- नञि यौ। समएक मारल अछि ई । जेहन लोक सभसँ आइ धरि एकरा भेँट छै, तेहने ने बुझत ई अपना सभकेँ। ई गरदा सानल फाइल सभकेँ मुदा आब घोंटि गेल छी हम, बुझू सोंखि गेल छी। आइ फेर बुढ़िया ई सभ गप कहि बहार भऽ गेल। हम आ मंडल सर एक दोसराकेँ देखि रहल छी। बिनु हँसने। पराजयक छाह दुनू गोटेक मुँहपर अछि।
भऽ गेल अछि सर। एहि शुक्र धरि पेटीशन दाखिल भऽ जाएत
मुदा अहाँक स्थानान्तरण भऽ गेल अछि, शुक्र दिन धरि अहाँकेँ जएबाक अछि
कहलहुँ ने हम। भऽ जाएत शुक्र दिन धरि। जएबासँ पहिने दाखिल कइये कऽ जाएब। परिणाम तँ बादमे पता लागिये जाएत
बिनु हँसने
, बिनु तमसाएल मुखाकृति लेने बहराइत छी। कऽ दैत छिऐक दाखिल एकर पेटीशन। हारत तँ ई हारत। जीतत जे ई, तँ जीतब हम।
 
 

सोहागो। गढ़ बलिराजपुरक बसिन्दा एकर परिवार। खेती-बाड़ी नीक
, तरकारी बेचि नीक जमीन-जत्था बनेने। छह भाँएपर भेल छलीह सोहागो।
पिताक दुलारि। माताक दुलारि। सभ भाएँक दुलारि। मुदा मात्र दस बरख। फेर विवाह भऽ गेलन्हि। पतिसँ प्रेम छलन्हि वा नहि छलन्हि
, ई गप गरदा लागल कोर्ट फाइलमे नहि लिखल अछि।
हुनकर नैहरक चर्च मात्र एक पैराग्राफमे खतम अछि। मात्र ई विवरण अछि जे पतिक मृत्यु भऽ गेलन्हि जखन हिनकर उमरि अठारह बरखक छलन्हि।
मुदा एकटा बेटा भगवानक कृपासँ मृत्युक पूर्व पति हुनका दऽ गेल छलखिन्ह। अठारह बरखक उमरि। एकटा बच्चा।
मुदा गरदाबला फाइलमे नहिये सासुरक कोनो लोकक आ नहिये नैहरक कोनो भाए-बन्धुक कोनो गबाही वा किछुओ भेटल। ताहिसँ ई लागल जे भाए सभ अपन-अपन परिवारमे व्यस्त भऽ जाइ गेल होएताह। तखन सोहागोक ई बयान जे ओ नैहरक दुलारि छलीह! माए-बापक आ छह भाँएक। माए-बाप तँ चलू बूढ़ भऽ मरि गेल होएताह
, मुदा भाए सभ?
कष्ट काटि अफेलकेँ पढ़ेलन्हि-लिखेलन्हि सोहागो। बीस बरखक बेटा भेलन्हि तँ ओहो मृत्युकेँ प्राप्त कएलक। नीक सरकारी नोकरी भेटले छलैक। घटक सभ घुरियाइये रहल छलैक। आठ बरखक वैवाहिक जीवनक बाद बीस बर्खक वैधव्य। आब पुतोहु अबितैक आ नैत-नातिन संगे ओ खेलाइतए। मुदा तखने ई वज्रपात। मुदा हमर तँ तहिया जन्मो नहि भेल छल होएत। नञि
, सत्ते। बुझू जाहि बरख एहि बुढ़ियाक बेटाक मृत्यु भेल छलै, ताहि बरख हमर जन्म भेल रहए। आ तकरो बाइस बरख बीति गेल। बूढ़ी आब हमरा समक्ष अछि। ओकर बेटाक बैचमेट हमर मंडल सर। आ हम ओही पदपर छी जाहि पदपर ओकर बेटा आइसँ बाइस बर्ख पहिने नोकरी शुरूह कएने रहए। छह मास मात्र नोकरी कएने रहए आकि...। शुक्र दिन धरि समय बाँचल अछि हमरा लग। की करू? ई बुढ़िया हहाएल-फुफुआएल अबैत अछि। सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक आग्रह लोक सभसँ करैए, कैक बरखसँ। मुदा एकर झनकाहि बला स्वभावसँ, व्यवहारसँ लोक एकरापर तमसा उठैत अछि। एकरा अर्द्ध-बताह घोषित कऽ देल गेल अछि। मुदा एहि बेर तँ एकर काज किछु दोसरे तरहक छैक। अही सप्ताह किछु करए पड़त। देखै छी।

 अफेलकेँ मरबाक रहितै तँ अहाँक रिवाल्वरसँ अपन माथपर किऐ मारितए। ओकरा लग तँ अपन सर्विस रिवाल्वर रहए
श्रीमान्। हमर बेटाक हत्या कएने अछि जटाशंकर। हमर जीवन नर्क बना देलक। बीस सालक हमर तपस्या समाप्त कऽ देलक। एकरा सजाए देल जाए
मुदा जज साहेब। जटाशंकर आ अफेलक अलाबे ओहि घरमे क्यो नहि छल। हमर कानून कहैए जे दस दोषी बहरा जाए मुदा एकटा निर्दोषकेँ सजा नहि भेटए। के गबाही देत जखन तेसर क्यो रहबे नहि करए”?
मुदा जज साहेब अपने कहि रहल छथि जे अफेल दोसराक रिवाल्वरसँ अपनापर गोली किएक चलाओत। आ अपनापर गोली चलेबाक अर्थ भेल आत्महत्या। हमर बेटा हमरा असगर छोड़ि आत्महत्या कऽ लेत? किएक करत ओ आत्महत्या”?
जटाशंकरकेँ हिरासतमे लेल जाए...अगिला सुनवाई....
फाइल पढ़िते रही आकि बूढ़ी बिहाड़ि जेकाँ आएलि।
अहाँक चेलाक तँ ट्रांसफर भऽ गेल मंडल सर! सभ एक्के रंगक छी। हमर बेटाक मूर्ति कॉलोनीक गेटपर लागि जाइत तँ कोन अनर्थ भऽ जइतैक। मुदा सभ अपन-अपन घर परिवारमे लागल अछि! जे गेल से गेल। अनका की कहू, हमर भाइये सभकेँ देखू। कहै लेल तँ छह टा....। हनहन-पटपट करैत ओ बहार भऽ गेलि। मंडल सर ओकरा-सुनू। हिनकर ट्रांसफर भेल छन्हि मुदा एखन शुक्र दिन धरि रहताह”- ई सभ कहिये रहल छलाह मुदा ओ भङ्गतराहि नहि सुनलक। किएक सुनत?
की भेल? जाए दियौक। शुक्र दिन पेटीशन फाइल भऽ जएतैक तँ ओकर गोस्सा अपने ठंढ़ा भऽ जएतैक

कहू जटाशंकर। हमरा तँ अफेलक आत्महत्याक कोनो कारण नहि बुझना जाइत अछि। ई सत्य जे ओहि मृत्युक गबाह नहि अछि। मुदा ओहि कोठलीमे मात्र दू गोटे रहथि। अफेल आ जटाशंकर। आ अहाँक रिवाल्वरक गोली अफेलक माथमे गेलैक।
मुदा जज साहेब। हमरा किछु सूचना भेटल अछि जाहिसँ हमर दिमाग घूमि गेल अछि। ओना हम ई सूचना सार्वजनिक करबाक पक्षमे नहि छलहुँ कारण एहिसँ एकटा भूचाल आओत। मुदा जखन हमर क्लाइन्टपर फाँसीक सजाक खतरा घुरमि रहल अछि, हमरा लग एकरा सार्वजनिक करबाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नहि अछि।
ई कारी कोट पहीर फेर कोनो बहन्ना अनने अछि। हम गरीब लोक छी सरकार। हमरा कोर्टक तारीखपर आबएमे ढेर खरचा उठबए पड़ैत अछि। एकरा सजा देनेसँ हमर बेटा घुरि कऽ तँ नहि आओत मुदा ई फेर एहन काज नहि करए से टा हम चाहै छी।
मुदा सोहागो देवीजी। ई केस कतेक माससँ चलि रहल अछि मुदा नहिये अहाँक परिवारक आ नहिये अहाँक सासुरक क्यो गोटे आएल
आगाँक आरोप प्रत्यारोपमे सोहागोपर चरित्रहीनताक आरोप लगाओल गेल रहै आ सिद्ध करबाक प्रयास कएल गेल रहै जे हुनकर पुत्र अपन माएक प्रेमी सभसँ आजिज आबि कऽ आत्महत्या कएने छल। जटाशंकर बचि गेल रहए। आब तँ ओ रिटायर भऽ सरकारी पेंशन उठा रहल अछि।

बिहारशरीफ घुरि हम बूढ़ीक पेटीशन दाखिल कऽ दै छी। पतिक मृत्युक बाद ऑफिस बला सभ सर्टिफिकेटक अभावमे ओकर जन्म तिथिपाँच साल घटा देने रहै
, कोनो जानि बूझि कऽ से नहि। मुदा बुढ़िया तै जमानामे मैट्रिक छल। मैट्रिकक सर्टिफिकेटक जन्म तिथिक हिसाबसँ पाँच साल आर नोकरी छै। चलू, जे भेलै एकरा संग, देखी आब। अगिला साल रिटायरमेन्ट छै, जे पाँच साल बढ़ि जएतैक तँ आर नीक। हमर ट्रांसफर तँ भइये गेल रहए से हम अपन झोर-झपटा आ समान चीज-बौस्तु लऽ कऽ अपन नव गन्तव्य स्थलपर बिदा भऽ जाइत छी। कार्यालयसँ जाइत काल बुढ़िया भेटैत अछि, कल जोड़ने ठाढ़, जेना कहि रहल होए- धन्यवाद। हम ओहि काल्पनिक धन्यवादक उत्तर दै छी- काज भऽ जाए तखन ने।

कएक साल बीति गेल। किछु व्यस्तताक कारणसँ आ किछु पेटीशन अस्वीकृत भऽ जएबाक सम्भावित सम्भावनासँ परिणामक प्रति उत्सुक नञि रहै छी। मुदा मंडल सर एक दिन भेटि जाइ छथि।
ओकर पेटीशन स्वीकृत कऽ लेलकै विभाग। रिटायरमेंटक दिनसँ पहिनहिये आदेश आबि गेल रहै। आब ओ पाँच साल आर संघर्ष करत, सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक लेल वा आन कोनो संघर्ष।

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