भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Sunday, June 07, 2009
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी ( एग्यारहम कड़ी )
Saturday, June 06, 2009
Monday, June 01, 2009
कथा- नबी बकस- गजेन्द्र ठाकुर
नबी बकस
“एकटा प्लम्बर, एकटा पेन्टर आ तीन टा जोन लागत। सात दिनमे घर चमका देब। अहाँक काजमे कमाइ नहि करबाक अछि हमरा। अहाँक अहिठाम एतेक रास लोक अबैत छथि, लोक देखत तँ पूछत ई काज के कएने अछि। तहीसँ हमरा चारि ठाम काज भेटि जाएत तेँ। अपन एरियाक लोक दिल्लीमे कतए पाबी”। नबी बकस नाम रहए ओकर।
“अपन एरियाक लोक छी, कतए घर अछि”?
“कटिहार। हम तँ कहब जे बाथरूम आ किचनक काज सेहो करबाइए लिअ”।
“अहाँ तँ पोचारा आ पेन्ट करैत छी, संगमे राजमिस्त्रीक काज सेहो करैत छी की”?
“हम नहि करैत छी मुदा हमर गौआँ ई काज करैत अछि। ओ कहैत रहए जे साहबसँ पुछू काजक लेल। ओना ओकर काज बड्ड ठोस होइत छैक। हम बजबैत छी, मात्र भेँट कऽ लियौक। नहि तँ हमरा कहत जे तूँ साहबसँ पुछनहिये नहि हेबहुन्ह”।
ओ मोबाइलपर फोन मिलेलक आ कोनो सर्फुद्दीनकेँ बजेलक।
सर्फुद्दीन किचेन बाथरूम सभक मुआएना केलक आ करणीसँ देबालपर मारलक तँ प्लास्टर झहरि कऽ खसि पड़लैक। नलक टोटीकेँ घुमेलक तँ ओ टूटि कऽ खसि पड़लैक। फेर ओ बाजल-
“सरकारी काज छियैक। नीव तँ मजगूत होइत छैक मुदा फिनिसिंग नहि होइत छैक। आ भइयो गेलए २० साल पुरान ई सभ। देखू एहि देबाल सभक हाल। सभटा अन्डरग्राउन्ड पाइप सभ सरि-गलि गेल अछि। तकरे लीकेजसँ देबाल सभक ई हाल अछि। सभटा पाइप बदलए पड़त से सीमेन्ट तँ झाड़इये पड़त। ओना सीमेन्टमे कोनो जान बाँचलो नहि छैक। तखन देबालमे पाथर सेहो लगबाइये लिअ। ई बम्बइया-मिस्त्री गणेशीसँ जे अहाँ बरन्डा रिपेयर करेने छलहुँ तकर बालु देखियौक कोना झड़ि रहल अछि। टेस्ट करए लेल एहि सीमेन्टकेँ हम झाड़ि कऽ नव सीमेन्ट लगबैत छी, पाथर नहि बनि जाए तँ कहब। तखन मोन हुअए तँ काज देब आ नहि तँ नहि देब”। से कहि ओ बरन्डाक किछु हिस्साक सीमेन्ट झाड़ि कऽ करिया सीमेन्ट लगा देलक आ चलि गेल।
“ई नबी बकसक छोट भाए छियैक। बड्ड काजुल। दिन भरि लागले रहैत अछि, नाम छियैक ओकील। नबी बकस तँ आब ठिकेदार भऽ गेल अछि, करणीकेँ हाथो कहाँ लगबैए। ओकील बुझु मजदूरी करैए अपन भाए लग। आ ठीकेदारक भाएक ओहदासँ आन मजदूर सभपर नजरि सेहो रखैए”।
फेर कनेक काल धर, ई जे प्लम्बर मिस्त्री रहए, खलील जकर नाम रहैक, से चुप रहल। ई हरियाणाक रहए आ बुझू जे नबी बकसकेँ हमरासँ भेँट करेनिहार ईएह रहए। एकटा छोट भङ्गठी करेबाक रहए ताहि द्वारे एकरा बजेने रही।
“दुनू गोटे नबी बकस आ सर्फुद्दीन संगे राज-मिस्त्री रहए। मुदा नबी-बकस लाइन बदलि लेलक। आ आब एक-दोसराकेँ काज दिअबैत रहैत अछि”।
फेर खलील हमरा दिस ताकि बाजल-
“अहाँ दिसका लोक सभमे बड्ड एकता होइत छैक”।
ओकील आ खलीलमे काजक बिचमे गप-शप होइत रहैत छलैक।
“हमरा सभक पुरखा मुसलमान बनबासँ पूर्व राजपूत रहथि मुदा ई सभ राजमिस्त्री रहए-धीमान, एखनो हरियाणामे होइत अछि”। खलील इशारासँ ओकील दिस देखैत हमरा सुना कए कहलक।
“हम सभ तँ धीमान छलहुँ मुदा तोरा सभ के छलँह से तोरा एतेक फरिछा कए कोना बुझल छौक”। बहुत कालसँ ओकील बिन बजने काज कए रहल छल। मुदा पहिल बेर ओकरा उत्तर दैत सुनलियैक। ओकर सभक बीच गप आ हँसी ठट्ठा चलैत रहैत छल।
हमर घरमे बरंडाक एकटा कोनक मरम्मतिसँ काज शुरु भेल रहए। खलीलकेँ कहलियैक तँ ओ एकटा गणेशी मिस्त्री, जकरा सभ बम्बइया कहैत रहए, केँ बजा कए काज करा देलक। फेर पोचारा बला आकि पेंटबला नबी बकसकेँ ई बजेलक। आब ई पोचारा-पेन्टबला नबी बकस ओहि सर्फुद्दीन राज-मिस्त्रीकेँ बजा लेने अछि। सर्फुद्दीन पाइप सभक काज खलील प्लम्बरकेँ दिआ देलक से खलीलकेँ बिन मँगने काज भेटि गेलैक। आ एक दोसराकेँ परिचय करबैत आब तँ लकड़ी बला आ बिजली मिस्त्री सेहो घरमे पैसि गेल चल।
एक दिन सर्फुद्दीन मुँह लटकेने आएल। कहलक जे गणेशीसँ झगड़ा भए गेल।
“से कोना”?
“कहैए जे तोँ साहेबक घरक काज हमरासँ छीनि लेलँह, इलाकाक लोकक नाम पर। बुझू अहाँ हमर काज देखि कऽ ने हमरा काज देने छलहुँ। आ ई तँ छोड़ू, ईहो कहैत रहए जे...”।
“की? कहू ने”।
“कहैत रहए जे मुसलमानपर कहियो विश्वास नहि करबाक चाही”।
हमर तँ तामसे देह लहरि गेल। कहलियैक जे तुरत ओकरा बजा कए आनू गऽ। मुदा ओ थोम्ह-थाम्ह लगा देलक। फेर बादमे एक दिन गणेशीकेँ बजा कए हम बुझा देलियैक।
“एहि महानगरमे हम आ सर्फुद्दीन एके भाषा बजैत छी, ई मात्र एकटा संजोग अछि। एकर काज देखियौक आ अपन काज देखू फेर अहाँकेँ बुझा पड़त जे सर्फुद्दीनसँ अहाँ किएक पाछाँ रहि जाइत छी”।
ओम्हर एक गोटे वूडेन फ्लोरिंग केर विचार देलक ताहिपर सर्फुद्दीन ओकरासँ झगड़ि गेल जे नीचाँ मे पाथरे नीक होएत, बाथरूम आ किचनमे पाथर अछि तँ सभ ठाम ईएह रहबाक चाही। रूममे किएक वूडेन फ्लोरिंग होएत? मुदा वूडेन फ्लोरिंग बला कहलक जे एक दिनमे लगा देब आ पाइयो सस्त कहलक से हम ओकरे हँ कहि देलियैक।
भरि दिन अनघोल होइत रहैत छल। नीचाँ फ्लोर बलाक बेटाक बारहम कक्षाक परीक्षा रहए से ओ जे राजमिस्त्री सभक आबाजाही देखलक तँ कहए लागल जे रूम सभमे तँ पाथर नहि लागत? हम कहलियन्हि जे नहि वूडेन फ्लोरिंग काल्हि कए जाएत तँ हुनका साँसमे साँस अएलन्हि।
”पाथर लगाबएमे तँ माससँ ऊपर ई सभ लगबितए, हमर बेटाक परीक्षा अछि, से हम तँ पाथर सभ पसरल देखि कए चिन्तित भए गेल रही”।
“नहि मात्र बाथरूम आ किचेन लेल ई पाथर सभ अछि”।
सर्फुद्दीन, खलील आ नबी बकससँ अबैत जाइत काजक अतिरिक्त घर-द्वारक गप सेहो होमए लागल। नबी बकस कटिहारसँ दिल्ली आएल , छह भैयारीमे सभसँ पैघ, एकटा बहिन सेहो रहैक। अपन हमशीरा(बहिन)क वर आ ओकर सासुरक विषयमे नबी बकस प्रेमपूर्वक सुनबैत रहैत छल। सर्फुद्दीनक शागिर्दीमे राज मिस्त्रीक काज सिखलक। आस्ते-आस्ते सभ भाँएकेँ दिल्ली बजा लेलक। ओकील तँ ओकरे संग रहैत छैक, आन भाए सभ बियाह करैत गेल आ अलग होइत गेल। मुदा ओहो सभ आसे-पासमे रहए जाइए। बियाह तँ ओकीलोक भेल छैक मुदा अछि ओ सुधंग। से आन भाए सभ कहैत-कहैत रहि गेलैक जे नबी बकस मँगनीमे खटबैत रहैत छौक, अलग भए जो गऽ मुदा ओ तँ भाएक भक्त अछि। भाएक सोझाँमे एको शब्द की बाजल होइत छैक?
एक दिन ओकीलकेँ बोखार भेल रहए आ दोसर भाए सभ ओकरा काजपर अएबासँ मना कएने रहैक। मुदा ओ नहि मानलक। ओकर सुधंगपना देखि हमर माँ, पत्नी, बच्चा सभ ओकरा खूब मानए लागल रहथि। ओहि दिन काजक बीचमे ओ खएबा लेल माँगलक आ बालकोनीमे सूति रहल। फेर बेरिया पहरसँ काज शुरू कएलक। साँझमे घर जएबाक बेरमे जखन हम कहलियैक जे डेरा जएबाक बेर भए गेल तँ कहलक जे नहि, आइ काज लेटसँ शुरू कएने रही से खतम कइये कऽ जाएब। आ आस्तेसँ बड़बड़ाइत बाजल जे देखैत छियैक जे आइ क्यो बजबए लेल आबैए आकि नहि।
आठ बजे करीब मोटरसाइकिलपर दू गोटे आएल। ओकील कहलक जे ई दुनू ओकर छोटका भाए सभ छैक। दुनू गोटे तेसर तल्ला स्थित हमर फ्लैटपर आएल आ ओकीलकें गप करबा लेल बजेलक। ओकर सभक गपमे आपकता मिश्रित क्रोध रहैक। ओकील ओकरा सभकेँ कहैत रहए जे ओहेन कोनो गप नहि छैक, आइ आधा दिन सुतल रहए तेँ सोचलक जे काज पूरा कइए कए जाइ। तावत नबी बकस सेहो ओतए पहुँचि गेल आ ओकीलकेँ लए गेल।
दोसर दिन नबी बकस भोरे-भोर आएल।
“देखियौक ई भाए सभ।...
“बेटा जेकाँ बुझलियैक एकरा सभकेँ आ हमरापर आरोप लगबैत अछि जे तूँ दू रंग करैत छह। तीनू भाँए काल्हि हमरासँ खूब झगड़ा करए गेल जे तोँ ओकीलकेँ नोकर जेकाँ रखैत छहक। बुझू! ई ओकील अछि सुधंग। कतबो कहैत छियैक जे नीकसँ कपड़ा लत्ता पहिर तँ ओहो झोलंगे जेकाँ रहैत अछि।
- काल्हि हमरा तँ ओकीलसँ भेँटो नहि अछि। सर्फुक काज दोसर साइटपर चलि रहल छैक, ओतहि गेल छलहुँ जे कोनो स्कीमसँ काज भेटि जइतए तँ अहाँक एहिठाम काज खतम भेलापर ओतहि लागि जएतहुँ। बिल्डर अंसल बलाक ऑफर आएल रहए जे हमरा एहिठाम आबि जाऊ मुदा भाए सभक द्वारे हम मना कए देलियैक। आ ई सभ.. ओना ई सभटा हमर पटना बला भाए मंडलक करतूत छी”।
“मंडल!!”, हमरा किछु पुरान गप मोन पड़ल।
- अहाँक गाममे एकटा जयशंकर सेहो छथि की”?
“हँ! हँ! अहाँ कोना चिन्हैत छियन्हि हिनका सभकेँ। ओना असली नाम तँ हमर भाएक सलीम छियैक। ऑफिसक नाम मंडल। घरक सलीम। सरकारी ड्राइवर अछि। घरमे सलीम कहने ओकर अहलिया (कनियाँ) घबड़ाइ छैक”।
“सभटा बुझल अछि हमरा”।
अपन विद्यार्थी जीवनक एकटा घटना मोन पड़ि गेल हमरा।
पटनामे पढ़ैत रही। पड़ोसमे एक गोटे जयशंकर रहैत छलाह। भाइ-भाइ कहैत छलियन्हि। दू बियाह। पहिल बियाहक हुनकर बेटा भागि गेल छलन्हि। ओना दोसर बियाह पहिल पत्नीक मुइलाक अनंतर भेल छलन्हि। किछु दिन दिल्ली-बम्बइ घुमि पहिल बियाहक ओ बेटा आपस अएलन्हि। सभ ओकरा पुछलकै जे की करमे? ओ कहलक जे सभ काज हमरासँ होएत मुदा पढ़ाइ छोड़ि कए। फेर सभ मिलि कए ओकरा ड्राइवरीक लाइनमे जएबाक लेल कहलक। ओकरो मोन रहैक ड्राइवरी सिखबाक। भोरे-भोर एक दिन जयशंकर कहलन्हि जे आइ एक ठाम चलबाक अछि।
“बेटा कहैत अछि जे ड्राइवरी सीखब। ड्राइविंग स्कूल बड्ड महग। एक गोटे गौआँ सलीम अछि ड्राइवर, सरकारी ऑफिसमे। गाममे एहि बेर छुट्टीमे भेटल रहए। ओकरो सभक ईद पाबनि छलए, से आएल रहए गाम। कहलक जे रवि दिन कऽ ओकरा छुट्टी होइत छैक ऑफिसमे आ आन दिन पाँच बजे भोरेसँ सिखा सकैत अछि। दू सए टाकामे एकटा सेकेंड हैंड साइकिल बेटाकेँ कीनि देने छियैक। ओकर डेरा ऑफिसे लग छैक। ऑफिस बजेने अछि, ओतहिसँ घर देखाओत”।
“ऑफिस देखल अछि?”
“हँ, कताक बेर गेल छी”।
ऑफिसक बेरमे हम सभ गाँधी मैदानक बगलक कचहरी सन ऑफिस पहुँचैत गेलहुँ।
“मंडलजी ड्राइवर साहेब छथि?” जयशंकर एक गोट हाकिमक ऑफिसक बाहर ठाढ़ चपरासीसँ पुछलन्हि।
“हँ , ओम्हर छथि”।
हम जयशंकरकेँ पुछलियन्हि जे हमरा सभ तँ सलीमसँ भेँट करबा लेल आएल छी, ई मंडल के छथि?
ओ इशारामे हमरा चुप रहए लेल कहलन्हि आ ईहो मुखर रूपमे कहलन्हि जे एहिमे कोनो बात छैक, बादमे कहताह।
आब जे मंडलजीसँ हुनका गप होमए लगलन्हि तँ बीच-बीचमे ओ सलीम भाइ, सलीम भाइ कहि हुनका सम्बोधन करैत रहलाह। फेर हुनका संगे हम सभ हुनकर डेरा पहुँचलहुँ। फेर बिदा होइत काल सलीम भाइ जयशंकरकेँ हमरा दिश इशारा करैत कहलन्हि जे हिनका कहि देलियन्हि ने। जयशंकर कहलखिन्ह जे कहि देबन्हि।
ओतए सँ निकललाक बाद जयशंकर कहलन्हि जे कटिहार लग जयशंकरक गाम छन्हि। मारते रास भाइ बहिन छैक सलीमक। सलीम हुनकर लंगोटिया यार, संगे पढ़लन्हि। फेर रोजगारक क्रममे दुनू गोटे दूर चलि गेलाह। सलीम कोनो हाकिमक घरपर काज करए लागल। ड्राइवरी कहिया कतए सँ ओ सीखि लेने छल, से हुनरबलाकेँ नोकरीक तँ ओहुना दिक्कत नहि होइत छैक। बादमे एकर स्वभाव देखि कए ओ हाकिम एकरा कोनो दोसर आदमी जकर नाम मंडल रहए, आ कतहु मरि-खपि गेल रहए, केर नामपर टेम्परोरी राखि लेलकैक। फेर किछु दिनमे ओ पर्मानेन्ट भए गेल।
जयशंकर हमरासँ कहलन्हि- एकर ऑफिसमे वा एकर संगी साथी लग- ओना अहाँसँ फेर कहिया एकर भेँट हेतए- एहि गपक धोखोसँ चरचा नहि करब। ओना पर्मानेन्ट भए गेल छैक मुदा लोक सभ केहन होइ छैक से नहि देखइ छियैक। क्यो किछु लिखि पढ़ि देतैक तँ मंगनीमे बेचारकेँ फेरा लागि जएतैक।
मोनमे घुमरल एहि गपकेँ नबी बकसकेँ हमारा कहलियैक। ताहिपर ओ बाजल-
“ओहो स्कीम धरेनिहार हमहीं छी। एकटा कम्प्लेन कऽ देबैक तँ जाहि नोकरीपर एतेक फुरफुरी छैक से घोसरि जएतैक। मुदा सोचैत छी जे ओकर नोकरी जएतैक ते हमरे माथपर आबि खसत। तेँ अल्ला पर सभटा छोड़ि देने छियैक”।
नबी बकस ओना तँ बड्ड व्यस्त रहैत छल मुदा ओहि दिन लागैए हमरे सँ गप करबा लेल समय निकालि कए आएल रहए। जखन लोक मानसिक फिरेशानीमे रहैत अछि तँ अपन दुखनामा दोसराकेँ सुनबए चाहैत अछि। मुदा तकर श्रोता भेटब मोश्किल। मुदा हम अपन मानवविज्ञानक कॉलेजिया पढ़ाइक प्रभावक कारण सभ काज छोड़ि अनायास श्रोता बनि जाइत छी से नबीकेँ बुझल रहैक। भदबरिया लधने छल से हमहूँ कतहु बाहर जएबाक हरबड़ीमे नहि छलहुँ। से ओ अपन खिस्सा ओ शुरु कएलक।
“कतेक कष्ट कटने छी से की बयान करू। आ मदति के सभ कएलक ? एकटा खालू-खाला (मौसा-मौसी) आ खलेरा भाए आ खलेरी बहिन मोन पड़ैए आर क्यो नहि। अब्बूक मरलाक बाद बड़ा अब्बू (बड़का काका), छोटा अब्बू (छोटका काका) सभ पराया भए गेल। शौहरक मरलाक बाद अम्मीक हालत की रहैक से ई सभ की बुझत-गमत?
-खाला दिल्लीमे रहैत रहथि। अम्मीक मृत्युक बाद हमर पढ़ाइ छुटि गेल। कटिहारमे पढ़ैत रहितहुँ, फूफीजाद भाए (पिसियौत) कहनहियो रहए जे तोरा जतेक पढ़बाक छौक पढ़, मुदा ई सभ तखन गाममे ईँटा उठबितए से हमरा देखल होइतए? आ ई गप एकरा सभकेँ हम बुझैयो नहि देने छियैक।
-आ ई सभ की कहैये जे हम अपन अहलिया (स्त्री) आ सारि-हमजुल्फ(सारि-साढ़ू)क पाछाँ एकरा सभपर ध्यान नहि दऽ रहल छियैक? दू रंग करैत छियैक?
-दिल्लीमे आएल रही गाम छोड़ि कए तँ पहिने नोएडामे पितरिया बर्त्तनक दोकानमे ब्रासोसँ बर्तन साफ करैत रही। अल्लाहक करमसँ सर्फू भेटि गेल। खालाजाद भाए (मौसेरा भाए) केर संगी रहए सर्फू। ओकरेसँ सभ ईलम सिखलहुँ। मुदा ई कहि दिअए जे हम कहियो ओकरा दगा देने होइयैक। सर्फूक स्वभाव तँ अहाँकेँ बुझले अछि। कनियो अन्याय आ बेइमानी ओकरा पसन्द नहि छैक, सभसँ बतकही भेल छैक, मुदा हमरासँ आइ धरि कोनो मोन मुटव्वल नहि भेल छैक। हमर से नीयत रहितए तँ ओकरो संग ने हमर संबंध टुटितए। आ एहि शहरमे ओ आन भए हमरा अप्पन बुझलक आ ई सभ। ओ तँ गौआँ छी, मुदा खलील? ओकरोसँ पुछियौक।
-माएक मोन पड़ि जाइए जहिया ई भदवरिया लाधैए। मोन नहि पाड़ए चाहैत छी, आ ताहि लेल व्यस्त रहैत छी। मुदा आइ माएक ओ मृत्यु रहि-रहि कोढ़ तोड़ि रहल अछि।
नबी बकसक कंठ कहैत-कहैत भरिया गेलैक। मुदा कनेक पानि पीबि फेर ओ माएक स्मरण करए लागल।
“नबी साहेबजादे, कनेक ओहि कठौतकेँ खुट्टाक लग कए दिऔक। बड्ड पानि चूबि रहल छैक ओतए। ई बादरकाल सभ साल दुःख दैत अछि। सोचिते रहि गेलहुँ जे घर छड़ायब। मुदा नहि भए सकल। घरोक कनी मरोमति कराएब आवश्यक छल, मुदा सेहो नहि भए सकल। ठाम-ठाम सोंगर लागल अछि। फूसोक घर कोनो घर होइत छैक? ठाम-ठाम चुबि रहल अछि, ओतेक कठौतो नहि अछि घरमे। खेनाइ कोना बनत से नहि जानि। ओसारापरक चूल्हिपर तँ पानिक मोट टघार खसि रहल अछि। एकटा आर अखड़ा चूल्हि अछि मुदा जे ओ टूटि जाएत, तखन तँ चूड़ा-गुड़ फाँकि कए काज चलबए पड़त। समय-साल एहेन छैक जे चूल्हि बनाएब तँ सुखेबे नहि करत। जाड़नि सेहो सभटा भीजि गेल अछि। भुस्सीपर खेनाइ बनाबए पड़त”।
पइढ़िया उजरा नुआक आँचर ओढ़ने, थरथराइत करीमा बेगम चौदह बरखक अपन बेटाक संग, कखनो सोंगरकेँ सोझ करथि तँ कखनो कठौतकेँ एतएसँ ओतए घुसकाबथि। जतए टघार कम लागन्हि ओतएसँ घुसकाकए, जतए बेशी लागन्हि ओतए दए दैत छलीह। सौँसे घर-पिच्छर भए गेल छल। कोनटा लग एक ठाम पानि नञि चूबि रहल छल। ततए जाए ठाढ़ भए गेलीह।
“कतेक रास खढ़ चरमे अनेर पड़ल छल। पढ़ुआ काकाकेँ कहलियन्हि नहि। घर छड़बा लेने रहितहुँ”।
“यौ बाबू। घर छड़एबाक लेल पुआर तँ भेटनिहार नहि। आ गरीब-मसोमातक घर खढ़सँ के छड़ाबए देत”।
हमरा खढ़सँ आ पुआरसँ घर छड़बयबामे होमयबला खरचाक अन्तर तहिया नहि बुझल छल।
“से तँ अम्मी, खढ़सँ छड़ाएल घरक शान तँ देखबा जोग होइत छैक। पढ़ुआ काकाक घर देखैत छियन्हि। देखएमे कतेक सुन्दर लगैत अछि आ केहनो बरखा होअए, एको ठोप पानि नहि चुबैत अछि”।
“से तँ सभसँ नीक घर होइत अछि कोठाबला”।
“एह, की कहैत छी? गिलेबासँ आ सुरखीसँ ईँटा जोड़ेने कोठाक घर भए जाइत अछि? आ नेङराक घर तँ सीमेन्टसँ जोड़ल छैक, मुदा परुकाँ ततेक चुबैत छल से पूछू नहि”।
“से?”
“हँ यै अम्मी। सभ बरख जौँ छड़बा दी, तँ ओहिसँ नीक कोनो घर होइत छैक?”
“चारिम बरख जे छड़बेने छलहुँ तकर बादो पहिल बरखामे खूब चुअल छल”।
“पहिलुके बरखामे चुअल छल ने आ फेर सभ तह अपन जगह धऽ लेने होएत। तखन नहि चुअल ने बादमे”।
“हँ, से तँ तकरा बाद तीन साल धरि नहि चुअल”।
तखने काकी बजैत अएलीह-
“जनमि कए ठाढ़ भेल अछि आ की सभ अहाँकेँ सिखा रहल अछि। कनेक उबेड़ जेकाँ भेलैक तँ सोचलहुँ जे बहिन-दाइक खोज पुछाड़ि कए आबी”।
बुन्नी रुकि गेल छल। नबी, काकाक घर दिस गेलाह आ दुनू दियादनीमे गप-शप शुरू भए गेल।
साँझक झलफली शुरू भेल, भदबरिया अन्हारक तँ काकी बहराइत कहैत गेलीह-
“बहिन दाइ, आगिक जरूरी पड़य तँ हमर घरसँ लए जाएब”।
“नञि बहिनदाइ। सलाइमे दू-तीन टा काठी छैक। मुदा मसुआ गेल छैक। हे, ई डिब्बी दैत छियन्हि, कनेककाल अपन चुल्हा लग राखि देथिन्ह तँ काजक जोगर भए जाएत। नबी दिआ पठा दिहथि”।
“देखिहथि। उपास नञि कऽ लिहथि से कहि दैत छियन्हि, बच्चा सभ तँ हमरा एहिठाम खा लेत”-दियादिनी कहैत बिदा भेलीह।
करीमा बेगम माने हमर माए ओसारापर खुट्टा भरे पीठ सटा बैसि गेलीह। तावत हमहूँ पहुँचलहुँ।
“की सोचि रहल छी अम्मी। कहू ने”।
“यैह फुसियाही गप सभ, अहाँक अब्बूक पहलमानीक। काका हुनका कहैत रहथिन्ह सैह।
-“खुट्टा पहलमान छथि ई”।
-“से नहि कहू काका। जबरदस्तीक मारि-पीटि हम नहि करैत छी, ताहि द्वारे ने अहाँ ई गप कहि रहल छी”।
-रहमान काका आ हुमायूँ भातिज। पित्ती-भातिजमे ओहिना गप होइत छलन्हि, जेना दोस्तियारीमे गप होइत छैक। अखराहामे जखन हुमायूँ सभकेँ बजाड़ि देथि तखन अन्तिममे रहमान हुनकासँ लड़य आबथि। काका कहियो हुनका नहि जीतए देलखिन्ह।
हुमायूँक कनियाँ माने हम नवे-नव घरमे आएल छलहुँ। कोहबर लहठी सभ होइत छलैक ओहि समयमे। आब ने जानि मुल्ला सभ किएक एकर विरोधी भए गेल अछि, तैयो लोक करिते अछि की। मुल्ला सभक गप जे मानए लागी सभ ठाम तखन तँ भेल!
आ एहि तरहक वातावरण घरमे देखलहुँ तँ मोन प्रसन्न भऽ गेल। घरक दुलारि छलहुँ आ सासुरो तेहने भेटि गेल। समय बीतए लागल। मुदा हुमायूँक विधवा एतेक जल्दी कहाय लागब से नहि बुझल छल तहिया। आब तँ सभ प्रकारक विशेषणक अभ्यास भऽ गेल अछि। झगड़ा-झाँटिक बीच क्यो ईहो कहि दैत अछि- वरखौकी, वरकेँ मारि डाइन सिखने अछि !
-हुमायूँक जिवैत जे सभक दुलारि छलहुँ तकर बाद सभक आँखिक काँट भए गेलहुँ। इद्दतक बाद नैहरसँ दोसर बियाह करएबा लेल सेहो भाए सभ आएल मुदा अहाँ सभक मुँह देखैत रहबाक इच्छा मात्र रहल।
नबी बकस बाजल-“उजरा नूआ, बिन चूड़ी-सिन्दूरक माएक वैधव्य बला चेहरा एखनो हमरा मोने अछि। फेर ओहि भदबरिया रातिमे माए आगाँ कहए लगलीह।
-“रहमान काका हमर पक्ष लए किछु बाजि देलखिन्ह एक बेर, तँ हमर सासु-ससुर कहए लगलखिन्ह जे हमर पुतोहुकेँ दूरि कए रहल छी। आ ईहो जे मुद्दीबा सभक अपना घरमे घटना हेतैक, तखन ने बुझए जाएत।
-“आब तँ ने रहमाने चाचू छथि आ ने सासु ससुर से मरल आदमीक की खिधांश करू। मुदा एकोट झूठ गप ई सभ नहि अछि।
-“लोक कहैत छैक जे सुखक दिन जल्दी बीति जाइत अछि, मुदा हमर दुखक दिन जल्दी बीतैत गेल, सुखक दिन तँ एखनो एक-संझू उपासमे खुजल आँखिसँ हम देखैत रहैत छी, खतमे नहि होइत अछि।
-“विधवा भेलाक अतिरिक्त आन घटनाक्रम अपन नियत समयसँ होइत रहल। हमर अब्बू-अम्मीक मृत्यु भेल, सास-ससुर आ पितिया ससुर रहमान कका तँ पहिनहिये गुजरि गेल छलाह।
-“घरमे जखन बँटबारा होमय लागल तखन सम्पत्तिक आ खेत-पथारक बखरा, चारि भैयारीमे मात्र तीन ठाम होमय लागल। हुमायूँक हिस्सा तीनू गोटे (जिबैत भैयारी सभ) बाँटि लेलन्हि। हम किछु कहलियन्हि जे हमर गुजर कोना होएत, छह टा बेटा आ एक टा बेटी अछि तँ हुमायूँक मृत्युक दोष हमरा माथपर दए हमर मुँह बन्न कए देल गेल।
-“ तीनू भाँएक मुँह हुमायूँक समक्ष खुजैत नहि छलन्हि मुदा हुनकर मृत्युक बाद हुनकर विधवाकेँ हिस्सा नहि देबऽ लेल तीनू भाँय सभ तरहक उपाय केलन्हि। हम नैहर जा कए अपन भायकेँ बजा कए अनलहुँ। पंचैती भेल आ फेर अँगनाक कातमे एकटा खोपड़ी अलगसँ तीनू भाँय बान्हि देलन्हि,
हमरा आ हमर बच्चा सभक लेल। धान, फसिल सभ सेहो जीवन निर्वाहक लेल देबाक निर्णय भेल। हम चरखा काटए लगलहुँ। से कपड़ा-लत्ता ओतएसँ तेना निकलि जाए।
“लिअ सलाइ”। दियादिनी आबि कहलन्हि।
“हँ”। भक टुटलन्हि करीमा बेगमक। दियादिनी सलाइ पकड़ाए चलि गेलीह।
“-एहि बेर बाढिक समाचार रहि रहि कए आबि रहल अछि। बाट घाट सभ जतए ततए डूमि रहल छलए, खेत सभ तँ पहिनहि डूमि गेल छलए। अहाँक पढ़ुआ काकी पहिनहिये सुना देने छथि जे एहि बेर वार्षिक खर्चामे कटौती होएत। काल्हि कहैत रहथि जे कनियाँ सभटा फसिल डूमि गेल, एहि बेर वार्षिक खरचामे कटौती हेतन्हि। हम कहलियन्हि जे एँ यै । जहिया फसिल नीक होइए तँ हमर खरचामे कहाँ कहियो बेशी धान दैत छलहुँ? ई गप अहाँक पढ़ुआ काका सुनि रहल छलाह। बजलाह-राँड़ तँ साँढ़ भए गेल। अहाँक पढ़ुआ काकीक इशारा केलापर ओ ससरि कए दलान दिशि बहरा गेलाह आ हम नोर सोंखि गेलहुँ। आइ गप निकलल तँ.......
माएक खिस्सा कहैत-कहैत नबी फेर रुकि गेल। आँखि आ कंठ दुनू संग छोड़ि रहल छलैक ओकर। किछु काल चुप रहि बाजल।
“ई खिस्सा भाए सभकेँ हम कहबो नहि कएने छियैक। सोचलहुँ जे कहबैक तँ मँगनीमे प्रतिशोध जगतैक। जे काज करबाक से नहि कएल होएतैक। आ सुनलियैक अछि जे हमर ओ मंडलबा भाए ओहि पढ़ुआ काकाक कहलमे आबि गेल अछि”।
नबी बकस फेर चुप रहल। भाए सभक प्रति ओकर प्रेम ओकरा सभक विषयमे बेशी बजबासँ ओकरा रोकैत छलैक। फेर ओ माएक खिस्सा शुरू कएलक।
“माए आगाँ बजैत रहलीह।
-“धुत्त दिनमे तँ खेनहिये छलहुँ, एहि अकल-बेरमे केना खेनाइ बनाएब। कनियाँ-मनियाँ छलहुँ तखने विधवा भऽ गेलहुँ आ अहू वयसमे तैँ सभ कनियाँ-काकी कहैत अछि। हुमायूँ कतेक मानैत छल अपन भाए सभकेँ। अपन पेट काटि भागलपुरमे राखि पढ़ओलन्हि छोटका भाइकेँ आ आब ओ पढ़ुआ बौआ एहेन गप कहैत छथि।
-“ सोचिते-सोचिते नोर भरि गेलन्हि माएक आँखिमे।
हमरा संग एकबेर हज करए लेल गेल रहथि। धन्य भारत सरकार जे हमरा सनक गरीब-गुरबाक माए सेहो हज कए आएल। आ अपन बड़की दियादिनीकेँ सुनबैत रहथि खिस्सा जे बहिनदाइ, ततेक भीड़ छलए ट्रेनमे, गुमार ततबे। गाड़ीमे बेशी मसोमाते सभ छलीह। एक गोटे कहैत छलीह जे जतेक कष्ट आइ भेल ततेक तँ जहिया राँड़ भेल छलहुँ तहियो नञि भेल छलए। हवाइ जहाजकेँ अम्मी गाड़ी कहैत छलीह।
-“फेर ओहि भदबरियाक रातिमे हमर अम्मी करीमा बेगमक मुँहपर बाड़ीक हहाइत पानि आ चारसँ टपटप चुबैत पानिक ठोपक आ घटाटोप अन्हारक बीच कनेक मुस्की आबि गेलन्हि। हमरा काकाक दलानपर जाए लेल कहलन्हि जतए आर भाए बहिन सभ छल।
-“ सोचिते-सोचिते खाटपर टघरि गेलीह करीमा बेगम, भोर होइत-होइत बारीक पानि बान्हपरसँ अँगना दिस आबि गेल।तीनू भैयारी अपन-अपन हिस्साक आंगन भरा लेने छलाह से सभटा पानि सहटि कऽ हमर सभक धसल आँगनसँ खोपड़ी दिस बढ़ि गेल। घरमे चारि आँगुर पानि भरि गेल। भोरमे किछु अबाज भेल आ जे उठैत छी तँ खाटक नीचाँ पानि भरल छल, एक-कोठी दोसर कोठीपर अपन अन्न-पानिक संग टूटि कऽ खसल छल। आब की हो, बड़की दियादनीक बेटा सभसँ पहिने आबि कऽ खोज पुछाड़ि केलकन्हि, अबाज दूर धरि गेल छलए। सभटा अन्न-पानि नाश भऽ गेलन्हि। अन्न पानि छलैन्हे कोन? दू-टा छोट-छोट कोठी, ओकरे खखरी-माटि मिलाऽ कऽ दढ़ करैत रहैत छलीह हमर आम्मी।
-“ मुदा भोर धरि ओ हहा कऽ खसल आ मसोमातक जे बरख भरिक बाँचल मासक खोरिस छल तकरा राइ-छित्ती कऽ देलक। करीमा बेगम सूप लऽ कऽ अन्नकेँ समटए लेल बढ़लीह, हमर आँखिक देखल अछि।
-“ मुदा बाढ़िक पानिक संग पाँकक एक तह आबि गेल छल घरमे। सौँसे टोल हल्ला भऽ गेल जे देखिऔ केहन भैंसुर दिअर सभ छै, अपना-अपनीकेँ अपन-अपन अँगना भरि लए गेल अछि। मसोमातक अँगना तँ अदहासँ बेशी धकिआ लऽ गेल छलैहे, जे बेचारीक बचल अँगना अछि से खधाई बनि गेल अछि। बड़की दियादिनी सहटि कऽ अएलीह कारण दिआद टोलक लोक सभ आबए लागल रहथि। करीमा बेगमक सोंगरपर ठाढ़ घरक दुर्दशा देखि सभ काना-फूसी करए लागल रहए। अँगनाक एक कोनसँ दोसर कोन, अपन घरसँ दोसराक घर!
-“पानि पैसबाक देरी रहैक आ आस्ते-आस्ते हमर घरक एक कातक भीतक देबाल ढहि गेल। टोलबैया सभ हल्ला करए लागल जे करीमा बेगम भितरे तँ नञि रहि गेलथि। बड़की दिआदिनी खसल घर देखि हदसि गेलीह। बजलीह जे अल्ला रक्ष रखलन्हि जे सुरता भेल आ नबीक भाइ-बहिनकेँ घर लए अनलियैक नहि तँ दियादी डाह नहि बुझल अछि। सभ कलंक लगबितए अखने।
-“मुदा दियादिनी!
-“दियाद सभ सभ गप बूझि अपन-अपन घर जाए गेलाह। हम अम्मी लग अएलहुँ। मार्क्सवादी विचारक रही, कटिहारमे पढ़ैत छलहुँ। विधवा-विवाह, जाति-प्रथा सभ बिन्दुपर पढ़ुआ काकासँ भिन्न विचार रखैत छलहुँ। घरक नाम नबी छल मुदा स्कूल कॉलेजक नाम नबी बकस। मुदा घरमे कोनो मोजर नहि छल, कहल जाइत रहए जे पहिने पढ़ि-लिखि कऽ किछु करू।
-“ अम्मीसँ कतेक गमछा-झोड़ा भेटैत छल, चरखाक सूतक कमाइक। जय गाँधी बाबा, विधवा लोकनि लेल ई काज धरि कऽ गेलाह।
-“गाममे भोजमे खढ़िहानक पाँति आ बान्हपरक पाँति देखि विचलित होइत छलहुँ। जोन-बोनिहारकेँ बान्हपर बैसा कऽ खुआबैत देखैत छलहुँ आ बाबू-भैयाकेँ खढ़िहानमे। खढ़िहानमे बारिक लोकनि द्वारा खाजा-लड्डू कैक बेर आनल जाइत छल । बान्हपरक पाँतीमे एक बेर आ नहियो।
-“मुदा हमर अम्मी। की भेलन्हि हुनका। भाए बहिन सभ तँ ओम्हर अछि!”
-“अम्मी!!!!!!!!!!!!!!
-“हमर चित्कारसँ सौँसे टोलमे थरथरी पैसि गेल रहए। नहि नबी कानए नहि अछि कानल अछि तँ कोनो गप छैक।
-“नञि अम्मी। ई कोनो गप नहि भेल। किए हमरापर अहाँ भरोस छोड़ि देलहुँ। नबी बकस नाम छी हमर। पाँचो भाए आ छोटकी बहिनक भाए नहि बाप छियैक हम। मुदा अहाँ हमरापर भरोस छोड़ि चलि गेलहुँ। या अल्ला!!!!!!!!!!!”
-“टोल जुटि गेल मैयतक चारू दिश। के की सभ कएलक से नहि बुझलहुँ। अम्मीकेँ गुसुल (नहाओल) कराओल गेल। कफन पहिराओल गेल। जनाजाक खाट आएल। ताहिपरसँ माएक गाँधी चरखासँ बनाओल चादरि ओढ़ाओल गेल। तीनू काका आ हम जनाजाक खाअकेँ कान्ह देलहुँ। कब्रिस्तान लग ठाढ़ भए जनाजाक नमाज पढ़लहुँ आ अम्मीकेँ दफन कएलहुँ।
नबी बकस फेर चुप भए गेल। हम ओकरा टोकए नहि चाहैत छलहुँ। दस मिनट धरि ओ चुप्पे रहल आ हम बैसल रहलहुँ। फेर ओ बाजल।
-“अम्मीक मृत्युक चालीस दिन धरि शोक मनओलहुँ। आ वैह चालीस दिनक आराम हमरा एहो जोग बनेलक जे फेर पएरमे घिरणी लागि गेल। अम्मीक मृत्युक बाद पढ़ाइकेँ नमस्कार कए खाला लग आबि गेलहुँ, दिल्ली नगरियामे ।
नबी बकस अपन आँखि पोछि रहल छल। फेर दस मिनट ओ चुप रहल।
“नबी बकसकेँ अम्मीक इन्तकालक दिन लोक पहिल आ अन्तिम बेर कनैत देखने रहए। मुदा ई सभ आइ फेर हमरा आँखिसँ नोर चुआ देलक। ओकीलक तँ बियाहो नहि होइत रहए। सभ कहैत छल जे बुरबक छैक। मुदा जेना भीष्म पितामह धृतराष्ट्रक बियाह करेलन्हि तहिना हम एकर बियाह करबओलहुँ आ ई सभ कहैत अछि जे हम ओकरा नोकर जेकाँ रखैत छियैक”।
तावत कॉलबेलक घंटी बाजल रहए। ओकील नबी बकसक सोझाँमे आबि ठाढ़ भऽ गेल।
“भैया, सभ कहैत अछि जे हम बुरबक छी। काल्हि अहलिया (कनियोँ) केँ ई सभ यैह गप कहि देलकैक। ओ कहलक जे तोहर चिन्ता ककरो नहि रहए छैक, मुदा हम नहि मानलहुँ। से काल्हि हम कनेक लेट भए गेलहुँ। सरकेँ कहबो केलियन्हि जे देखैत छी जे ओ सभ आबैए आकि नहि। कनियो तँ सुधंगे ने अछि। आइ ओहो दियादिनीक गड़ा पकड़ि कऽ खूब कानल अछि। बुधियार सभ ने अहाँकेँ छोड़ि चलि गेल, मुदा ई बुरबकहा अहाँकेँ छोड़ि कहियो नहि जाएत भाए।
Saturday, May 30, 2009
Friday, May 29, 2009
गजल-आशीष अनचिन्हार
गजल
एना हमरा दिस किएक देखैत छी अहाँ
लाल टरेस आखिँए किएक गुम्हरैत छी अहाँ
कोन खराप जँ अहाकँ करेज पर लिखा गेल हमर नाम
जँ मेटा सकी तँ मेटा सकैत छी अहाँ
पीअर रौद मे नाचि रहल उज्जर बसात अनवरत
उदास सन गाम मे केकरा तकैत छी अहाँ
पानि जेना बचए तेना बचाउ एखन ,हरदम
जल-संकटक समय मे किएक कनैत छी अहाँ
धेआन सँ परिवर्तन देखू चोरबा बदलि लेलक समय
राति भरि जागि कए दिन मे सुतैत छी अहाँ
ऐना कियै छैक
ओ तैयार भेलाह.
दुपहरिया भेल,
ओ बिदा भेलाह.
सांझ भेल,
ओ पहुँच गेलाह.
राति भेल,
वो भेंट भेलाह.
भोर भेल,
ओ हेरा गेलाह.
सुनालियैक,
हमर बियाह भय गेल.
हमारा देखलक.
हमहूँ देखलियैक
अस्त-व्यस्त घर,
आओर ऐँठल लोक.
जेना तेना,
सामंजस भेल.
साउस रुस्लीह,
खिसिया गेलाह.
माये मुईल,
डपटि देलाह.
बेटा भेल
मुस्का देलाह.
बेटी भेल
खिसिया गेलाह.
नौकरी भेलन्हि,
हुनकर भाग.
गाय मुईल
हमर अभाग.
नहि बूझि सकल
की चाही हुनका.
हम चाहियन्हि
हमर बेटी नहि.
भोजन चाहियन्हि
बनौनिहार नहि.
सफाई चाहियन्हि
कयनिहार नहि.
घर चाहियन्हि
बसौनिहार नहि.
माए रहितैक
तऽ पूछितियैक.
की ओकरो
लागैत छलैक,
जीवन चाहियैक
मुदा एहन नहि?
सोचैत छी,
ओ रहिबो करितैक
तऽ की कहितैक
ओहो कहाँ भिन्न छल
हमर साउस सँ.
Sunday, May 24, 2009
ताजमहल-कांचीनाथ झा ‘किरण’
भारतवर्षक महाराज
विश्वविख्यात बल-बिक्रम धन-धर्म
पाण्डव लोकनिक इन्द्रप्रस्थसँ पूर्ब
जै कृष्णक ज्ञान कीर्तिकें देखि
अइ देशक विशाल जनसमुदाय
हुनका मानि लेलक
योगिराज, परमेश्वरक पूर्णावतार
तनिकर मथरहुसँ आगू बढ़ि
आर्यावर्तक हियप्रदेशमे,
जै जमुनाक तीरके देखितहि
मन पड़ि अबैत छै
भगवत गीता केर प्रणयिता कृष्णक बाल विलास
गोप-गोपिका केर संगमे निश्छल खेल विलास
तही जमुना तीरक करेज पर ठाढ़
रे ताजमहल तो की थिके
जकर कोखि
हँटा हिन्दू ललना योधाबाइक शोषित केर प्रभाव
जनमौलक बाप भाइ केर घातक
अगणित मन्दिर-मूर्ति विध्वंसक
भारतभूमिक औरस पुत्रा हिन्दू जातिक द्वेषी
औरंगजेबके
तै मुमताजक गोरिक ऊपर ठाढ़
माथ उठौने सीना तनने खलखल हँसैत
रे ताजमहल तो की थिके?
दूधक समान उज्जर दप-दप
एत्तेक रास शंखमरमर पाथर
ताकि ताकि अनबामे
कते ने नरनारी
बौआइत अपसियाँत होइत
भूख-पियासेॅं व्याकुल तनमन
मरि गेल हएत सोनित बोकरि
कत्ते ने मोती डाहल गेल हएत!
देसक धन-जन मेहनति केर मेघसँ
बनल कलेवर
रे ताजमहल तोॅं की थिकेॅं?
की मुमताजक प्रबल प्रेमवस
साहजहाँ
बताह छल भ’ गेल?
नहि नहि
प्रेम बना दैत अछि मानव मनके
कोमल मधुमय
तैं ने, अनको नेनाकेर
हँसैत मुँहमे दनुफ फूल सन दुद्धा दाँत
देखि, फलकि उठै छै सन्ततिबानक हिरदय?
बताह थिक ओ, जे कहैत अछि तोरा
साहजहाँ केर मुमताजक प्रति दिव्य प्रेम साकार
जँ साहजहाँके मुमताजक
अतिसय पे्रम छलैक
तँ कोना क’ सहलक ओकर मरण आघात?
की देखैक निमित्त बूढ़ रहितहुँ
काराघरमे बन्द
बेटा सबहक मरण देखैत-सुनैत
रहल ओ जीबैत?
निश्चय ओकर हृदयक भीतर
नुकाएल, कोनो अभिलाषा
छल पूर्ण होइत औरंगजेब केर हाथेॅं।
तोहर छलसँ साहजहाँ
अपन जातिकें देने छल उपदेश जे
हिन्दू सभके नहि छै पौरुख ओ अभिमान
राजनीति केर ज्ञान
दै अछि बेटी-बहिन बिआहि मुसलमान केर संग।
किन्तु अपने हिन्दूए अछि बनल रहैत
मोगल समराटक सार ससुर बनि
निसकंटक निश्चिन्त मने अछि राज कैत।
हमर पितामह अकबर छला परम बुधिआर
तहिया हिन्दू केर सहयोग बिना
टिकि न सकै छल साम्राज्य हुनक
ते हिन्दूक बेटीक संग कएल विवाह
मुदा ते छोड़ल की अप्पन मुसलिम धर्म?
हिन्दू मुसलिम केर एकता
हुनकर जँ रहितए लक्ष्य हृदयसँ
तँ स्वयं हिन्दूए बनि जैतथि!
अथवा
भारत भू पर के छल एहन मुसलमान सरगना
जे करितनि विद्रोह?
विद्रोह केनहि की होइतैक?
किऐ न रखलनि नाम
अप्पन बेटा केर
विश्वनाथ?
जगदीश?
हिन्दूके परतारैक लेल
चलौलनि-दीनइलाही नामक
अभिनव धर्म।
पहिरैत छला हिन्दू केर पोशाक
हुनक नीति केर
आब न रहल प्रयोजन।
तैं जोधाबाइक सन्तति रहितहुँ
हम बिआहल मुमताजहिकेॅं।
तीर्थों सभसँ बढ़ि तीर्थ
कृष्णक प्रिय जमुना तट पर
क’ तोहर निर्माण
साहजहाँ अपन पुत्राकेॅं देलक
मन्दिर पर मसजिद बनबैक इसारा
मानव-हृदयक परिचय
ओकर बेटाक काजसँ पाबैक थिक
ई अनुभव अछि बहुत पुरान
औरंगजेबक छल साहजहाँ केर
मनोभाव साकार।
के कहि सकैत अछि
कोन देशमे कहिया
जनमि सकै अछि लोक केहन?
भारत भूमिक मूल निवासी केर सन्ततिमे
आबि सकै छै पौरुख ओ अभिमान
अप्पन पुरुखा केर पराभव झाँपै खातिर
तोड़ि सकै अछि विजेताक स्मारक गढ़, भवन, महल
तैं रे ताजमहल
तोरा बनौलक एत्ते सुन्दर
सम्भव थिक जे तोहर सुनरता देखि
वीर केर हाथ ढील भ’ जाइक
देखि तोहर रूप
भ’ उठए मुग्ध।
मनमे आबि जाइक कलाकार केर हस्त-चातुरी
साहजहाँ केर मुमताजक प्रति प्रेम
मुमताजक सुन्दर सुकुमार शरीर
तँ हाथक तरुआरि
चल जाएत अपनहि मियानमे।
सुन्दरतामे लुबुधुल मानब होइत अछि मौगियाह
तैं रे ताजमहल
तों थिके
मुगल विदेशी बादसाह साहजहाँ केर
प्रभुता-वैभव-नीति निपुणता
हिन्दू जातिक पौरुख ओ अभिमानहीनता
नीतिशून्यता, बुद्धि विकलता
परिभवमय इतिहासपूर्णता केर साक्षी साकार।
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (दसम कड़ी)
हम माँ के सँग आय अरुणाचल जा रहल छी। माँ आयल तs रहथि हमर द्विरागमन करबाक लेल मुदा हमर सास ससुर नहि मानलथि। काका के बदली राँची सs कहियो भs सकैत छलैन्ह। इ सोचि हिनकर इच्छा आ जोर छलैन्ह जे द्विरागमन भs जायत तs हमरो नाम मुजफ्फरपुर में लिखवा दितथि आ हम ओहि ठाम पढितहुं। माँ सब के सेहो चिंता नहि रहितियैन्ह आ हिनको नीक रहितियैन्ह। बाबुजी के चिट्ठी लिखि कs एहि लेल इ मना लेने रहथि। जहिया सs हमर मोन ख़राब भेल छल तहिया सs इ लगभग सब मास एक बेर राँची आबि जायत छलाह। मुदा हमर सास एकही बेर कहि देलथिन "आय धरि हमरा सब ओहिठाम पहिल साल में द्विरागमन नहि भेल अछि, आ नहि धारति अछि"। अंत मे जखैन्ह हमर सास ससुर तैयार नहि भेलथि तs माँ हमरा कहलथि "चलु अहाँ अरुणाचल गेलो नहि छी, घूमि कs चलि आयब। जओं एहि बीच मे काका के बदली भs गेलैन्ह तs फेर सोचल जायत जे की कायल जाय"। हमर कॉलेज गरमी के छुट्टी लेल बंद छलैक।
दू दिन पहिनहि हमर विवाहक पहिल वर्षगाँठ छलs आ आय हम अरुणाचल जा रहल छी। हमर मोन इ सोचि कs उदास छलs कि ओतेक दूर जा रहल छी। फेर कतेक दिन पर हिनका सs भेंट होयत से नहि जानि। हमरा एको रत्ती माँ के सँग जयबाक खुशी नहि छलs। हमर चेहरा देखि कs कियो कहि सकैत छलथि जे हमर मोन बहुत दुखी अछि। हिनको मोन उदास छलैन्ह आ चुप चाप हमरे लग ठाढ़ छलथि। हम हिनक मोनक गप्प सेहो बुझि रहल छलियैन्ह मुदा की करी से नहि बुझय में आबि रहल छलs। हम सब वेटिंग रूम मे ट्रेनक प्रतीक्षा मे छलहुँ जाहि केर अयबा मे अखैन्ह बहुत देरी छलैक। हम बेर बेर देखाबय चाहि रहल छलियैक जे हमर आंखि मे किछु परि गेल अछि आ हम अपन रुमाल सs निकालय के प्रयास कs रहल छी, मुदा सत्यता किछु आओर छलैक। इ हमर मोनक गप्प बुझि गेलाह आ माँ के कहलथि "अखैन्ह तs ट्रेन आबय मे देरी छैक हम सब चाह पीबि कs थोरेक काल में अबैत छी"। इ कहि आ बौआ के बुझा हमरा चलय लेल कहलथि। जहिना हम सब बिदा भेलहुँ कि हिनकर मित्र धनेश जी, चलि आबैत छलाह। हुनका देखि हम सब रुकि गेलहुँ। जखैन्ह ओ माँ कs गोर लागि लेलथि तs हुनको सँग लs आगू बढ़ि गेलहुँ।
माँ के लेल चाय इ वेटिंग रूम में पठा देलथि। हम दुनु गोटे आ धनेश जी रेलवे केर जलपानगृह में बैसि कs चाय पिबय लगलहुं। धनेश जी हिनकर अभिन्न मित्र छलथि आ दुनु गोटे एकहि कॉलेज मे सेहो पढैत छलाह। विवाहक बाद ओ पहिल बेर हमरा सs भेंट करय के लेल आयल छलाह। हम ओहिना बेसी नहि बजैत छलहुँ दोसर आय होयत छल जे बाजब तs पता नहि कना नहि जाय। इ हमर मोनक गप्प बुझि गेलाह आ हुनक बेसी प्रश्नक जवाब दs रहल छलथि। किछु किछु तs ओहि मे हमरा हंसेबाक लेल आ ध्यान दोसर दिस करबाक लेल सेहो छलैक।
धनेश जी आ इ गप्प कs रहल छलथि, हम बीच बीच मे माथ तs डोला रहल छलहुँ मुदा हमर ध्यान कतहु आओर छल। हमर मोन एकदम बेचैन लागि रहल छल आ बेर बेर हम घड़ी देखि रहल छलहुँ। राँची में रहैत छलहुँ तs कम सs कम मास में एक बेर इ आबि जायत छलाह। चिट्ठी से सब दिन अबैत छलs । अरुणाचल जा तs रहल छलहुँ इ सोचि कs जे घूमि कs चलि आयब मुदा काका के बदली लs कs चिंता होयत छलs । राँची में रही तs जखैन्ह मोन होयत छलैन्ह आबि जायत छलाह अरुणाचल एक तs दूर छलैक दोसर ओहि ठाम जेबाक लेल परमिट बनाबय परैत छैक। हमर की किस्मत अछि नहि जानि जहिया हमरा माँ सँग रहबाक मोन होयत छलs, हम माँ सs अलग रहलहुं। आब हिनका सँग रहबा मे नीक लागैत छलs आ रहबाक मोन होयत छलs तs आब हिनको सs एतेक दूर जा रहल छलहुँ, इ सोचि कs हमर मोन दुखी छलs । तथापि धनेश जी सोझा मे छलथि तs मुँह पर हँसी अनबाक प्रयास करैत छलहुँ। अचानक हिनकर बोली कान मे आयल "आब समय भs गेल छैक चलु माँ के चिंता होयत हेतैन्ह", इ सुनतहि हम सब उठि कs चलि देलहुं।
हम सब जखैन्ह पहुँलहुं तs माँ के ठीके हमरा सब कs आबे मे देरी देखि चिंता होयत छलैन्ह। देखैत देरी बजलीह "अखैन्ह तक कुली सब नहि आयल अछि, आब ट्रेन आबय वाला छैक"। एतबा माँ कहिते छलिह की दुनु कुली आबि गेलैक।
हम सब ट्रेन में बैसि गेलहुँ, सामान सब जगह पर रखवेलाक बाद इहो हमरा सब लग बैसि गेलाह। सोनी बिन्नी दुनु गोटे एक एक टा खिड़की वाला सीट लs कs बैसि गेलीह, बेचारी अन्नू आ छोटू के कात में बैसा देने रहथि। माँ आ बौआ अपना हिसाबे सामान सब ठीक करबा में लागल छलथि। इ एक टक हमरे दिस देखैत छलाह। बुझि परैत छ्लैन्ह जेना आब कहताह अहाँ नहि जाऊ। हम अहाँक बिना नहि रहि सकैत छी। हम लाचार दृष्टि सs हुनका दिस देखि रहल छलहुँ आ मोने मोन भs रहल छलs कियो हमरा कहि दितैथ अहाँ के आब नहि जयबाक अछि। मुदा से नहि भेलैक आ अचानक धनेश जी खिड़की लग आबि कs कहलाह "यौ आब नीचा आबि जाऊ गाड़ी के सिग्नल भs गेल छैक"। एतबा सुनतहि इ हरबरा क उठि गेलाह आ कहलाह "पहुँचैत देरी चिट्ठी अवश्य लिखि देब।" इ कही माँ के गोर लागि उतरि गेलाह। हम घुसकि कs बिन्नी लग बैसि गेलहुँ आ फेर हिनका दिस लाचार भs देखय लागलियैन्ह। अचानक बुझायल जेना हमर किछु एहि ठाम छुटि रहल अछि ।
ट्रेन धीरे धीरे स्टेशन सs आगू बढ़ि रहल छलैक, मुदा हमर दुनु गोटे के नजरि एक दोसर पर छलs । हम सब एक दोसराके देखि रहल छलहुँ। धीरे धीरे दूरी बढ़ल जा रहल छलs, जखैन्ह आँखि सs ओझल भs गेलाह तs हम फेर अपन जगह पर आबि कs बैसि गेलहुँ। बौआ, सोनी बिन्नी अन्नू आ छोटू सब खुश छलथि। माँ अपन खाना वाला पेटार खोलि सब के ओहि में सs निकालि कs खेबाक वस्तु सब के देबय लागलीह।
गाड़ी सिलिगुरी पहुँचि गेल तs माँ हमरा आ बौआ के स्टेशन दिस देखा कs कहलिह "अहाँ सब के तs याद नहि होयत, एहि ठाम तक हम सब ट्रेन सs आबि, ओकर बाद गाड़ी सs सिक्किम जायत छलहुँ"। बाबुजी सिक्किम में सेहो तीन बरख रहल छलथि।
करीब चौबीस घंटा सs हमर सबहक ट्रेन न्यू बोगाई गाँव स्टेशन सs आगू आबि, एकटा छोट सन स्टेशन पर रुकि गेलैक। एतेक छोट स्टेशन की एहि ठाम किछु खेबा पिबाक सेहो नहि भेटैत छलैक। आगू कोनो ट्रेनक दुर्घटना भs गेल छलैक जाहि चलते सब ट्रेन एहि ठाम आबि कs रुकल रहैक। ओहि ठाम तेहेन स्थिति भs गेलैक जे बाद मे स्टेशन पर पानि सेहो खतम भs गेलैक। माँ के आदति छलैन्ह दूरक यात्रा करबाक आ ओ अपना सँग खेबा पिबाक ततेक नहि सामन रखने रहथि जे हमरा सब के ओहि में कष्ट नहि भेल, मुदा सब गोटे परेशान भs गेलहुँ। एक तs एहिना अरुणाचल जेबा में तीन दिन लागैत छलैक, ताहि पर चौबीस घंटा एक ठाम रुकलाक चलते आओर सब परेशान भs जाय गेलौन्ह।
ट्रेन चारद्वार जहिना पहुचलैक हमरा सब केर जान में जान आयल। बाबुजी स्टेशन पर ठाढ़ छलथि। करीब तीस घंटा देरी सs हमर सबहक ट्रेन पहुँचल छलैक। स्टेशन सs सीधा हम सब गेस्ट हाउस पहुँच गेलहुँ, ओहि ठाम हमरा सब के राति भरि रहबाक छल।
हम सब तैयार भs आ जलखई करला कs बाद बोमडिला (अरुणाचल) के लेल सरकारी जीप सs बिदा भs गेलहुँ। बाबुजी हमरा बतेलाह अरुणाचल में भारत केर १/३ सेना रहैत छैक। बॉर्डर पर परमिट देखाबय परलैक आ परमिट देखेलाक बाद बाबुजी कहलथि "अहाँ पहिल बेर आयल छी, बौआ तs एक बेर आयल छलथि। अहाँ जीप में हमरा सँग आगू बैसि जाऊ, देखय में बड नीक लागत। हम बाबुजी सँग आगू बैसि गेलहुँ।
ओना तs आसाम सेहो नीक लागल, मुदा अरुणाचल में प्रवेशक सँग बुझायल जेना प्रकृति एकरे कहैत छैक। कश्मीर तs हम नही देखने छलियैक जाहि केर तुलना लोग स्वर्ग सs करैत छैक।अरुणाचल मे प्रवेश करैत घाटिक घुमावदार सड़क आ चढाई आरम्भ भs गेलैक। सड़क सब नीक मुदा पातर देखय मे आयल। कहुना दू गाड़ी जएबाक जगह छलैक। बाबुजी बतेलाह जे सब सड़क सेना के छलैक।
जीप जहिना जहिना आगू बढैत गेलैक,चढाई तहिना तहिना बढ़ल जा रहल छलैक। सोनी बिन्नी सब तs ओहि ठाम माँ बाबुजी लग रहैत छलथि आ कैयेक बेर आयल गेल रहैथ सब गोटे गप्प मे व्यस्त छलिह। हमर ध्यान मात्र प्राकृतिक सुन्दरता देखय मे छल। पहाडी नदी के विषय मे सुनने आ कविता मे पढ़ने रही। मुदा आय साक्षात देखि रहल छलहुँ।जतेक सुनने रही ताहू सs सुंदर छल इ पहाडी नदी। झरना देखय लेल दूर दूर जायत छलहुँ, आ अहि ठाम तs रास्ता मे कैयेक टा झरना भेट रहल छलs।
बाबुजी हमरा सब ठामक नाम आ ओहि जगहक महत्व बताबैत जा रहल छलाह। बाबुजी कहलाह "आब इ जगह ठीक सs देखू, इ छैक तवांग वैली (Tawang Valley)। चीन सँग सन ६२ केर लड़ाई में एकर बड महत्व छैक"। एहि ठाम सs बोमडिला बड लग छैक। ६२ में सब सs बेसी लड़ाई बोमडिला में भेल छलैक। बाम दिस जओं हमर नजरि गेल तs नीचा में नदी बहैत छलैक, ओ देखा कs कहलाह " इ नदी देखैत छी, पहाडी नदी रहितो लड़ाई समय में इ पूरा खून सs लाल भs जाइत छलैक। एहि ठामक लोग सब कहैत छैक जे लड़ाई केर बाद इ नदी सs कतेको लाश निकलल छलैक।
बाबुजी जहिना कहने रहथि बोमडिला लग छैक तहिना किछुयैक दूरी गेलाक बाद घर सब नजरि आबय लागल। एकटा झरना आयल आ बाबुजी कहलाह लिय बोमडिला पहुँचि गेलहुँ। जीप झरना सs किछुए आगू आबि कs रूकि गेलैक।
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