भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Sunday, June 14, 2009

विदेह'३५ म अंक ०१ जून २००९(वर्ष २ मास १८ अंक३५)- part ii

३. पद्य
३.१. आशीष अनचिन्हार

३.२. डॉ.शंभु कुमार सिंह-दू टा कविता
३.३.बड़का सड़क छह लेन बला-गजेन्द्र ठाकुर
३.४. विवेकानंद झा-तीन टा टटका पद्य
३.५. सतीश चन्द्र झा-सिंगरहारक फूल

३.६. जीवन यात्रा- सुबोध ठाकुर
३.७.हमर मीत- सन्तोाष कुमार मिश्र
३.८. ज्योति-टाइम मशीन





आशीष अनचिन्हार

गजल १
रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल
जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल

हम मुक्त छी राग-विराग प्रेम-घृणा सँ
रचना कतेक टका लगतै भावना किनबाक लेल

सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए
रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल

पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल

गजल २

सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक
बाजए जँ केओ प्यार सँ त बुझिऔ होली छैक

बेसी टोइया-टापर देब नीक नहि भाइ सदिखन अनवरत
निकलि जाइ जँ अन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक

केहन- केहन गर्मी मगज मे रहै छैक बंधु
मनुख बचि जाए जँ गुमार सँ त बुझिऔ होली छैक

की दुख होइत छैक चतुर्थीक राति मे नहि बुझि सकबै
हँसी जँ आबए कहार सँ त बुझिऔ होली छैक

जहाँ कनही गाएक भिन्न बथान तहाँ सुन्न- मसान
होइ कोनो काज सभहँक विचार सँ त बुझिऔ होली छैक

गजल ३

यथा एन्नी तथा ओन्नी एन्नी-ओन्नी तथैव च
यथा माए तथा बाप मुन्ना-मुन्नी तथैव च

बलू हमर करेज जरैए अहाँ गीत लिखै छी
यथा भँइ तथा अच्छर पन्ना-पन्नी तथैव च

देखहक हो भाइ बोंगहक पोता कोना करै हइ
यथा मुल्ला तथा पंडित सुन्ना-सुन्नी तथैव च

देवतो जड़ि पकड़ै हइ मुहेँ देखि कए बचले रहू
यथा मौगी तथा भूत ओझा-गुन्नी तथैव च

बान्हि क भँइ दूरा पर मगबै ढ़ौआ पर ढ़ौआ
यथा समधी तथा समधीनी बन्ना-बन्नी तथैव च

की करबहक हो भगवान एमरी सभ के
यथा मरनाइ तथा जिनाइ रौदी-बुन्नी तथैव च

बचले रहिअह अनचिन्हार एहि गाम मे सदिखन
यथा साँप तथा मनुख जहर चिन्नी तथैव च



गजल ४
मोन पडै़ए केओ अनचिनहार सन
साइत कहीं इहए ने हो प्यार सन

जे नहि कमा सकए टका बेसी सँ बेसी
लोक ओकरे बुझैत छैक बेकार सन

समय कहाँ कहिओ खराप भेलैए
कमजोर आँखि के लगिते छैक अन्हार सन

किछु देखलिअइ चोके अनचोके मे
चोरक मुँह लगैए पहरेदार सन
(अगिला अंकमे जारी)
1

रघुबीर मंडल said...
पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल
dhanya chhi aashish ji,
patrakarita ke dekhar karbak lel dhanyavad
Reply06/08/2009 at 09:50 AM
2

Usha Yadav said...
आशीषजीक किछु दिनमे मारते रास फैन बनएबला छन्हि।
Reply06/07/2009 at 12:23 PM
3

मनोज.सदाय said...
jhuma delahu bhay
Reply06/06/2009 at 11:25 PM
4

vivekanand jha said...
भाई !
सॊझे-सॊझ कहू ?
मजा आबि गेल
आ जखन सॊझे-सॊझ मजा आबि जाय त बुझिऔ हॊली छै
Reply


डॉ.शंभु कुमार सिंह
जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।

१.अतीत
अतीत छल, थिक वर्तमान
आब ओ सम्हार’
चाहै छी जे काल्हि थिक
अतीतक पन्ना पढ़िकए बुझाइत अछि
ओ नीक-बेजाए, अल्हड़, बीहड़
जे किछु छल
अपना समय केर साक्षी
आ आब’ वला काल्हि केर लेल
ज्ञान केर सागर छल
अतीत जे लेलक
ओ स्मृति थिक
जे देलक
ओ स्थिति थिक
ई वर्तमान केर बात थिक
जँ स्मृति आ स्थितिक मंथन करी
तँ काल्हुक भविष्य....
भ’ सकैछ नीक।

२.आस

कटि जाएत राति
फेर आओत दिवस
ल’ संग रितु पावन पावस
छी एखन विवश !
छी तम मे समय विषम मे,
झंझावात भरल अछि हमरा जीवन मे
भ’ मुखरित एहि असार संसार मे
नित नव भाव-उल्लास
संजोगने मोन मे आस
छी आस मे आब’ वला काल्हि केर
सत्य, स्वच्छन्द, कर्मफलदायी
समय चपल केर!
1

रघुबीर मंडल said...
फेर आओत दिवस
ल’ संग रितु पावन पावस
छी एखन विवश !
shambhu jik kavita khoob-khoob nik klagal
Reply06/08/2009 at 09:40 AM
2

Usha Yadav said...
शम्भुजीक कवितामे बनवीनता अछि।
Reply06/07/2009 at 12:23 PM
3

Usha Yadav said...
SHAMBHU SINGH JIK DUNOO KAVITA BAD NIK LAGAL
Reply06/06/2009 at 11:50 PM
4

मनोज.सदाय said...
shambhu ji bad nik lagal ahank kavita atit
अतीतक पन्ना पढ़िकए बुझाइत अछि
ओ नीक-बेजाए, अल्हड़, बीहड़
जे किछु छल
अपना समय केर साक्षी
आ आब’ वला काल्हि केर लेल
ज्ञान केर सागर छल
अतीत जे लेलक
ओ स्मृति थिक
जे देलक
aa dosar kavita aas seho
कटि जाएत राति
फेर आओत दिवस
ल’ संग रितु पावन पावस
छी एखन विवश !
Reply06/06/2009 at 11:27 PM

गजेन्द्र ठाकुर,जन्म ३० मार्च १९७१ ई.,गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी,“विदेह” ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ ,क सम्पादक जे आब प्रिंटमे सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि।१.छिड़िआयल निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, २.उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) ,३. पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), ४.कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ),५.नाटक(संकर्षण), ६.महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन)
आ ७.बाल-किशोर साहित्य (बाल मंडली/ किशोर जगत ) कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक (खण्ड १ सँ ७ ) नामसँ। हिनकर कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे आ उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ) आ संस्कृतमे कएल गेल अछि। मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आ पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण। अंतर्जाल लेल तिरहुता यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास।मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएकटा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएकटा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com

बड़का सड़क छह लेन बला-गजेन्द्र ठाकुर

माए!
माए धानक खेत लग,
जे बड़का सड़क बनल अछि,
छह लेनक,
तीन टा आबएबला आ तीनटा जाइबला।

ओतए आइ,
कतेक नीक लाल रंगक कार,
सीसा खुजल नहि रहए जकर, रहए बन्न,
देखलहुँ आइ,
जखन बेचैत रही हम चिड़ै।

एकटा बच्चा जिदिया गेल,
खोलबेलक कारक शीसा आ
कीनि लेलक हमर सभटा चिड़ै,
पानि रहए ओहि बच्चाक मूहपर,
सीसा खुजिते बहार भेल ठंढ़ा हबा,
कार ए.सी.बलासँ जे रहए लाल रंगक।

माए !
माए ई जे धानक खेत लग,
जे बड़का सड़क बनल अछि,
छह लेनक, रंग-बिरंगक गाड़ी सभक लेल,
तीनटा अबैबला आ तीनटा जाइबला ओतहि।

माए !
ई तँ अपने गामक सड़क भेल ने,
मुदा अपन गामक तँ सभ गोटे गेलाह,
जाइ गेलाह कमएबाक लेल, दिल्ली आ पैंजाब।

गाममे माटिक घर,
फूस आ खपड़ाक चार।

मुदा धानक खेत लग,
जे बड़का सड़क बनल अछि,
पक्काक,
चिक्कन आ घरोसँ बेशी सुन्नर ई सड़क,
ओतहि देखलहुँ ई आइ।

माए !
सुनै छियै बनल अछि कोनो,
वर्ल्ड बैंकक फंडसँ,
पकिया, चिक्कन-चुनमुन ई सड़क,
छह टा लेनबला,
सीसा सन अछि ई चमकैत !

माए !
जे परुकाँ साल काकाक,
घर जे काकाक बनल रहए पक्काक,
गिलेबा बला,
जे कनिये दिनमे खसि गेल रहए,
ओहो कोनो सरकारी फन्डसँ बनल रहए !

कहाँ छल चमकैत ओ शीसा सन ,
ओहिमे रहितो लोक छल डराइत,
भने खसि पड़ल।

मुदा होएत ओ कोनो नकली फन्डसँ बनल ,
आइ तँ ओहि कारक शान देखलहुँ,
वर्ल्ड बैंकक फन्डसँ बनल,
अप्पन गामक एहि छह लेनबला सड़कपर !!

माए !
ई वर्ल्ड बैंक बला फन्ड कोनो नीक फन्ड अछि !
एहि निकहा फन्डसँ घर नहि बनैत छैक की ?

खेनाइ भोजन आ रोजगार जे दैतैक ई निकहा फन्ड तँ ,
तँ किएक लोक पड़ाइत दिल्ली आ पैंजाब ,
किएक सुनितए राज ठाकरेक गारि,
किएक जाइत गए खुनाहनि होइ लेल असाम,
सुनै छियैक पढ़ै जाइ छै बिहारी कहि गारि।

माए !
एहि वर्ल्ड बैंक बला निकहा फन्डसँ,
जे बनि जइतैक अपन गामक घर आँगन,
तँ ओ थोरबेक रहितैक गिलेबा बला पक्काक कोठा सन !

ओ तँ रहितैक ओहने सुन्नर सीसा सन चिक्कन,
छह लेनक धानक खेतक कात बला एहि सड़क सन ।

आ जे रोजगारो ओहि फन्ड सँ भेटितैक,
तँ लोको सभ रहितैक घरमे,
घर एखन जेकाँ भकोभन्न थोरबे रहितैक,
चुहचुही रहितैक अपनो गाममे ।

आ तखन जे देखबा जोग रहितैक शान अपन गामक !

आ देखबा जोग रहितैक शान एहि छह लेन बला सड़कक सेहो !

हमरो सभक अंगपर रहितए जे वस्त्र,
ओहने वस्त्र,
जेहन ओहि लाल कारमे बैसल बच्चाक रहए !

माए!
हमरा तँ लगैत रहैए जे,
हमर गामक ओ सड़क
ओहि लाल परदेशीक ओहि लाल कारसँ बेशी अछि लग ।

दुनू टा लगैए बिदेशी सन ।

लागल आइ जे ,
जे ओहि लाल कारक हबा सेहो अपन हबा नहि,
लागल जेना ओ हबा आ ओ कार हमरासँ छुता गेल होअए,
छुता गेल होअए हमर स्पर्शसँ।

अपन गाम अछि मयूर,
आ ओ छह लेन बला सड़क अछि एकर पाँखि,
आ हमरा सभ छी पएर ओहि मयूरक,
ई सड़क अप्पन गामक रहितो लागैए फॉरेनर।

माए !

सभ दिन बकड़ी चरबैत,

देखैत रहैत छी हम शान अप्पन गामक ओहि सड़कक,
जे अछि छह लेन बला !



1

रघुबीर मंडल said...
barka lane bala sarak sabh rojgarak samasya door kay paaot, pata nahi
Reply06/08/2009 at 09:39 AM
2

Usha Yadav said...
सामयिक कविता, धरगर, बहुत रास छद्न धारणाकेँ तोरैत।
Reply06/07/2009 at 12:24 PM
3

मनोज.सदाय said...
chhah len bala sarak dekhar kay delak development ke
Reply06/06/2009 at 11:29 PM
4

सुशांत झा said...
ई कविता एके संगे अपन समय के एकटा पैघ आख्यान थीक...आ वर्तमान विकास नीति पड़ एकटा पैघ व्यंग्य सेहो। बढ़िया, बहुत बढ़िया।
Reply06/01/2009 at 12:55 PM

विवेकानंद झा,वरिष्ठ उप-संपादक छथि नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेडमे।
तीन टा पद्य

१.एहि संजॊग सँऽ हम करैत छी प्रेम


एकटा एहेन समय मे
जखन स्वयं ई समय
सबसे पैघ चिन्ता हॊ सबहिक
हम अपन भाषाक मादे
अपस्यांत छी

फिकिर करैत छी
अपना पर खसैत
प्रश्नक ओहि फुहारक
जे केओ आखिर
किएक लिखैत छै
कविता ओहि भाषा मे
जेकर पाठकक संख्या
विश्व में शायत
सबसे कम छैक ?

आ हम एहि प्रश्नक उत्तर
नहि देबा लेल
कृतसंकल्प छी हुनका
जनिक तर्कसंपन्न विभ्रमित दिमाग मे
ई प्रश्न लहराइत छैन
कॊनॊ विजयपताका-सदृश

मुदा मऽन में जवाब तऽ
उठिते छैक

समयिक धकिआयल
हऽम
सौभाग्यवश सटल छी
प्रेमक गिलेबा सँऽ चुनायल
विश्वास-विचारक मजगूत
देबार सँऽ
हमरा भेटल अछि सहारा
आ जे की हमरा हाथ मे
नहि छल
आ ने हमरा माइक हाथ मे
आ नहिए हमर नानी आ
नानीक नानी केँ हाथ मे
जे ओ चुनि सकितै
अपन मातृभाषा
आ विद्यापति केँ अपन कविश्रेष्ठ
ई एकटा संजॊग छल
आ एहि संजॊग सँऽ
हम करैत छी प्रेम
आ लॊक ईष्या

कॊनॊ भाषा नहि चुनैत छै
अपन कवि आ अपन भाषा-भाषी
आ कॊनॊ भाषाक क्षमता
तय नहि करैत छै समय

ओ तऽ कविक कान्ह पर पड़ल छै
ठॊस जिम्मेदारी बनिके
एहि अतिसुंदर संजॊगक
की हम मैथिल छी

आ जाहि पहिचानक बिना
काज तऽ चलै छै
मुदा तहिना जेना
एहि देशक सत्तैर प्रतिशत
जनताक काज चलैत छै
20 टका रॊज कमा क‍ऽ



२.कहियॊ गलती सँऽ



कहियॊ गलती सँऽ
सौभाग्य की दुर्भाग्य सँऽ
देख लैत छी साँझ
शहर मे
तऽ नहि रहल हॊइत अछि
शहर मे

मऽन पड़ैत अछि
गामक मुनहारि साँझ
आ भगवती घर से
बहराइत काकी
आँचरक ओट में लेने दीप
आ नहुँए-नहुँए आङनक दॊसर कॊन धरि
जाइत तुलसी चौरा लग
ठॊढ़ पटपटबैत
आ जे की बाद मे बुझलिअय
करैत छल हमरे सबहिक उन्नतिक कामना

तहिना कहियॊ गलती सँऽ
सौभाग्य की दुर्भाग्य सँऽ
देख लैत छी भॊर
शहर मे
तऽ नहि रहल हॊइत अछि
शहर मे

मऽन पड़ैत अछि्
गामक साकांक्ष भॊर
चापाकऽल पर घऽरक समस्त
बरतन-बासन मांजैत माइ
कऽल चलबैत काकी
अंङना नीपैत बड़की बहीन
तत्परता सँऽ
चूल्हा पजारैत छॊटकी
आ जे की बाद मे बुझलिअय
करैत छल हमरे जलखइक तैयारी
ओकरा सबकेँ नहि छलैक अपन कॊनॊ फिकिर
आ एम्हर
जखन हम शहर मे रहैत छी
देवलॊक सँऽ हमर माइ आ काकी
तऽ कॊनॊ-कॊनॊ गामक संघर्षलॊक सँऽ
हमर बहीन सब
सतत करैत रहैत अछि हमर कुशलक कामना
बूझल अछि हमरा

फेर कहियॊ गलती सँऽ
सौभाग्य की दुर्भाग्य सँऽ
देख लैत छी दुपहरिया
शहर मे
तऽ नहि रहल हॊइत अछि
शहर मे

मऽन पड़ैत अछि्
गामक प्रचंड रौद आ अटट्ट दुपहरिया
ओहि काल कतहु सँऽ
हहायल-फुहायल घुरैत बाबाक
मुँह सँऽ झहरैत चन्दा झा केर
पाँति - अरे बाबा दावानल सदृश लंका जड़ैये
आ हम बहीन आ माइक आँखि बचा के
निकलि जाइत रही लंका मिझबऽ लेल
आ उमकी धार मे ताधरि
जाधरि आँखि
लाल नहि भऽ जाइत छल
अरहुल फूल सन
तखन
मन पड़ैत छल माइ
जे करैत हॊयत चिन्ता
जॊहैत हॊयत गाम पर बाट
आ जखन
हम जायब अंङना
तऽ ओ तमसा कऽ खसि पड़त पैर पर हमर
आ जे की बाद मे बुझलिअय
ओकर एहन उनटल प्रतिक्रिया
हमर जीवैत रहबाक कामना छल

आ राति तऽ
सब दिन देखते छी शहर मे
वस्तुतः शहरक मतलब
रातिए हॊइत अछि
शायद
एहन राति
जाहि मे
तरेगन नहि हॊइत छैक
स्याह आकाश सेहॊ नहि

कहियॊ शहरक रातिक आकाश
भरि पॊख देखू त‍ऽ सही
बुझायत शहर माने
की हॊइत छैक

तखन मऽन पड़त
अहूँ केँ अपन गाम
फूल-पात, खेत-खरिहान,
मऽन पड़त अपन बाध-बऽन
आ ओहि मे
तीन तनुक बाती पर टांङल
खढ़क खॊपड़ि
ओकर मुँह पर भुकभुक जड़ैत-मिझाइत डिबिया
आ ओकर महत्व



३.मऽन मे सदिखन रहैत छी अहां



मऽन मे सदिखन
रहैत छी अहां
हे कविता

जेना जीवनक लौलसा हॊ
मृत्युशय्या पर पड़ल
कॊनॊ व्यक्तिक करेज मे

जेना मुक्तिक उजास
अनुकूल समयिक फिराक बनि
नुकायल हॊ कॊनॊ कैदीक अन्हार मे

मुदा हम की करी
जे एकटा एहन समय मे
जखन टूटि कऽ खसि रहल छै
एक-एक टा पात विवेक-विचारक
टूटि-भाङि रहल छै एक-एकटा डाढ़ि
परंपरा-विश्वासक एहि पतझड़ि मे
बसात बड़ तेज बहैत छै
तखन
हम रहै नहि पबैत छी
समयिक वर्तमान प्रवाह मे
डूमैत-उपराइत
आ नहिए रहि पबैत छी
ओहि मे हाथ धॊबा लेबा लेल तत्पर
आ चलि अबैत छी
बहुत पाछू
ओहि समय मे
जकरा बादहिँ सँऽ
सबकिछु बहुत तेजी सँऽ
लगलै बदलऽ
संघनक केर युक्तिक लय-ताल पर नचैत
हम देखलिए
जे जखन सौंसे दुनिया के
लागल रहै
एकमात्र चिन्ता
जे कॊना रमौने रहतै कंप्यूटर
अपन असंख्य अधुनातन प्रशंसक केँ
अपन वर्चुअल दुनिया में
के-2 केर मध्यरात्रिक पश्चात
की तखन हमर माय
संघर्ष करैत छलीह
भरि पॊख सांस भरि
लेबा लेल अपन छाती मे

आ जखन 2000 केर
31 दिसंबरक
अंतिम मिनट खत्म हॊइत-हॊइत
भरि पॊख सांस भरि देलकै
सौँसे दुनियाक कंप्यूटरप्रेमी लॊकनिक
छाती मे गौरवक
की हम हैंग भऽ गेल रही

हमर माइ असमर्थ भऽ गेल छल
अपन बीमार फेफड़ा सँऽ
खींच सकबा में,
आ ओहिमे भरि सकबा में
ओकर एक कॊन भरि सांस
एकटा एहन समय मे
जखन गणितक
असंख्य जॊड़-घटावक बल पर
लॊक कऽ सकैत अछि किछुओ
बना सकैत अछि
रॊबॊट केँ द्रॊणाचार्य
आ जे की तय छै
आब आवश्यकता नहि पड़तै
बालकक उपनयन केर
नहि रहतै गरु-शिष्य परंपरा
छौ ताग-तीन प्रवर
नहि जुटतै भौजी-काकी-मैयां
गाबऽ लेल शुभै हे शुभै
आ केओ नहि जेतीह
ब्रह्मक थान
आ बूढ़-पुरानक आंचर मे
नहि खसतै-समटेतै केश मुंडन केर
सुदीर्घ लॊक-परंपराक
नेटवर्क भाङि जेतै
अकस्मात सब लेल
बेसी महत्वपूर्ण भऽ जेतै
समुद्रक अतल गहराई मे लटकल
ऑप्टिकल फाइबरक मॊटका तार

लसकल रहतै सदिखन
हमर चिन्ता मे एकटा फांक बनिकऽ

आब आतंकवादी ओकरा नष्ट करबाक
करतै ओरियान
आ कंप्यूटर केर उपयॊग-उपभोग मे
इतराइत हम
बिन प्रयासहिँ नष्ट कऽ देबै
अपन असंख्य स्मृति-अपन असंख्य आख्यान

मुदा ईहॊ तय
जे कॊनॊ द्रॊणाचार्य
नहि काटि सकतै
कॊनॊ एकलव्यक औँठा

तेँ हम विरॊधी
नहि बनि सकबै
नव गति-नव संचारक

बस अफसॊस रहतै
एतबे
जे कहिया
एतेक कऽ लैबे प्रगति हमसब
जे कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीटक बटन के
बेर-बेर हौले-हौले दाबि
कऽ लेबै
अपन जिनगी केँ
रीस्टार्ट
जखन जरूरति पड़तै
बेर-बेखत
जखन केओ
तॊड़ि देतैय हृदय
आ हैंग भऽ जेतै जिनगी
तऽ बेर-बेर हौले-हौले दाबि उठबै
की पैडक कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीट बटन केँ हमसब
आ रीस्टार्ट कऽ लेबै
अपन ठमकल समय-ठमकल जिनगी
बेर-बेर रीफ्रेश करैत रहबै
माउस के राइट क्लिक करैत

मुदा तखनॊ
जेहन हॊ
हमर-अहांक दुनिया
हम हंसबै तऽ कविता बनतै
हम कनबै तऽ कविता बनतै
सतत करैत रहबै
प्रेम कविता सँऽ
आ सबहिक प्रेम
बनल रहतै
कविता सँऽ

एम्हर
एतबा धरि
अवश्य अछि विश्वास
जे ओकरा नहि पड़तै आवश्यकता
कॊनॊ कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीटक बटन केर
बेर-बेखत हौले-हौले
फूल सन कॊमल स्पर्शक
औनाइत, की प्रफुल्लित
मऽन मे
ओ बनैत रहतै
नव अवसर-नव विधानक
रूप-रेखा खींचैत


1

रघुबीर मंडल said...
बेर-बेखत
जखन केओ
तॊड़ि देतैय हृदय
आ हैंग भऽ जेतै जिनगी
तऽ बेर-बेर हौले-हौले दाबि उठबै
की पैडक कंट्रॊल-ऑल्ट-डीलीट बटन केँ हमसब
आ रीस्टार्ट कऽ लेबै
अपन ठमकल समय-ठमकल जिनगी
bah bhai vivekanand ji
Reply06/08/2009 at 09:43 AM
2

Usha Yadav said...
विवेकानन्द जी। अहाँक कविताक नहीं तँ प्रवाह रुकत आ नहिये पाठक कमी प्रतीत होएत, बस आगाँक रस्ता निकालैत रहू जाहिसँ ओहिपर अहाँक संग दोसरो बढि सकथि।
Reply06/07/2009 at 12:26 PM
3

Usha Yadav said...
VIVEKANAND JI, EHINA NAV NAV CONCEPT LAY LIKHAIT RAHOO
Reply06/06/2009 at 11:50 PM
4

मनोज.सदाय said...
bhajar ahan kavita sabh me jan rahai chhai
हम हंसबै तऽ कविता बनतै
हम कनबै तऽ कविता बनतै
सतत करैत रहबै
प्रेम कविता सँऽ
आ सबहिक प्रेम
बनल रहतै
कविता सँऽ
Reply06/06/2009 at 11:28 PM




सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।
सिंगरहारक फूल

सिंगरहार के फूल गाछ सँ
छै छीटल सगरो झड़ि झड़ि क’।
बीछि रहल अछि अपन खोंछि मे
के युवती आँजुर भरि भरि क’।

अनचिन्हार अछि कोना रोकि क’
नाम पता ओकरा सँ पुछियौ।
तोड़ि लेत किछु आन आबि क’
कोना फूल ओकरे लय धरियौ।

चढ़ा रहल छल फूल कतय ओ
कहाँ पुछलियै कहियो ओकरा।
छलथि देवता अथवा दोसर
पूज्य कियो छल आरो ओकरा।

उज्जर दप - दप देह चान सन
वएस काँच यौवन नव उतरल।
सुन्दरता के देखि मुग्ध भ’
भोरक किरिण आबि छल ठहरल।

मह मह गंध देह सँ ओकरे
आबि रहल अछि किछु रहि रहि क’।
बेकल भेल अछि कोइली तरू पर
कू कू स्वर मे किछु कहि कहि क’।



स्नेहक छै किछु बात होइत छल
की की बाजू कोना मोन मे।
बीतत साँझ फेर ओ आयत
देख लेब भरि आँखि भोर मे

समय बदललैै देखलहुँ भोरे
सुन्न भेल छल गाछ झहड़ि क’।
ताकि रहल छी बाट आइ हम
आयत कहिया फूल उतरि क’।

चंचल मोनक मधुर कल्पना
जगा रहल अछि किछु कहि कहि क’।
सुना रहल अछि गीत कान मे
शीतल पवन मंद बहि बहि क’।
.....................................

1

रघुबीर मंडल said...

स्नेहक छै किछु बात होइत छल
की की बाजू कोना मोन मे।
बीतत साँझ फेर ओ आयत
देख लेब भरि आँखि भोर मे
bah bhai satish ji
Reply06/08/2009 at 09:44 AM
2

Usha Yadav said...
सतीशजी। अहाँक कविता अहाँक ट्रेडमार्क बनत। कवितामे एहिना वैविध्य आनैत रहू।
Reply06/07/2009 at 12:27 PM
3

मनोज.सदाय said...
चंचल मोनक मधुर कल्पना
जगा रहल अछि किछु कहि कहि क’।
सुना रहल अछि गीत कान मे
शीतल पवन मंद बहि बहि क’।
bah bhai, hilkor uthbait rahay chhi ahan
Reply06/06/2009 at 11:30 PM
4

satish said...
अपन गाम अछि मयूर,
आ ओ छह लेन बला सड़क अछि एकर पाँखि,
आ हमरा सभ छी पएर ओहि मयूरक,
ई सड़क अप्पन गामक रहितो लागैए फॉरेनर।
gajendra jeek kavita bahut nik lagal.
bahut ber padhalahu.
Reply06/02/2009 at 08:34 AM

सुबोध ठाकुर, गाम-हैंठी बाली, जिला-मधुबनीक मूल निवासी छथि आ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट प्रैक्टिशनर छथि।
जीवन यात्रा

थाकल पएर झमाड़ल देहसँ,
भारी मन मुदा आशा आओर नेहसँ,
चलय केर प्रयत्न कय रहल छल बटोही

गुज-गुज अन्हार छल,
मनमे डरक विकार छल,
तैयो ठहियाइत बाट जोहैत चलि रहल छल बटोही।


अन्तिम पड़ावपर छल यात्रा,
सोनितक संचारक चाल कम मात्र ,
तैयो उल्लास भरि चलि रहल छल बटोही।

बटखर्चाक सभ दिन अभाबे रहल,
मन माफिक मंजिलक सभ दिन अभाबे रहल,
तैयो प्रयासरत रहैत सदिखन चलैत रहल बटोही।


थाकल पएर झमाड़ल देहसँ,
भारी मन मुदा आशा आओर नेहसँ,
चलय केर प्रयत्न कय रहल छल बटोही

कखनो पुस्तकक बोझ लए कए,
कखनो नोकरीक खोज लए कए,
सरपट भागए के कोशिस कएलक बटोही।


आयल बाटमे उपवनो कखनो,
फुलाएल रहए रंग-बिरंग फूलो सगरो,
मुदा चलबाक धुनमे सुगंध नहि लए पओलक बटोही।


चढ़बाक हिमगिरीपर छल,
इजोरिया राति सेहो सुन्दर तखने छल,
परञ्च वीर रससँ ओतप्रोत श्रृंगार रस छोड़ि चलल बटोही।


मन कतेक बेर कहलक, कनी बिलमि ली,
यात्राक कनी आनन्द लए ली,
मुदा आगाँ बढ़ए के होरमे,
चलैत रहल बटोही।


सदिखन संघर्षरत रहैत,
मंजिलकेँ पाबए लेल प्रयास करैत,
नहि सफले नहि असफले,
बीचक प्रतियोगी छल बटोही।


जीवन एक गोट यात्रा छी,
मंजिल नहि से नहि बुझि सकल बटोही।

थाकल पएर झमाड़ल देहसँ,
भारी मन मुदा आशा आओर नेहसँ,
चलय केर प्रयत्न कय रहल छल बटोही।



1

रघुबीर मंडल said...
बटखर्चाक सभ दिन अभाबे रहल,
मन माफिक मंजिलक सभ दिन अभाबे रहल,
तैयो प्रयासरत रहैत सदिखन चलैत रहल बटोही।
bah
Reply06/08/2009 at 09:52 AM
2

Usha Yadav said...
जीवन यात्रा नीक लागल। सामयिक विषयपर अहाँक लेखनी चलए ताहि प्रतीक्षामे।
Reply06/07/2009 at 12:27 PM
3

Usha Yadav said...
JIVAN YATRA YAIH ACHHI
Reply06/06/2009 at 11:49 PM
सन्तो ष कुमार मिश्र
हमर मीत

रे ! हमर मीत सुगा तहूँ
असगरे उड़िगेले
भोरमे पराती
आ, संझामे साँझ
गाबिकऽ सुनऽबैछले
भोरमे उठऽबैछले,
कहिकऽ सुनऽबैछले
ॅपटटु ! सीताराम कहो ।’
फुलल छली संगहि
तो असगरे मौरगेले ।

दूर जुनि जो हमरा तो छोड़िकऽ
क्षण भरि लेल आबिजो
हमरा अप्प न बुझिकऽ ।
किछुए देर नाचब
किछुए देर गाएब
हमहूँ तोरे संग कहब
ॅपटटु ! सीताराम कहो ।’

हमहूँ आएब तोरे लग
मुदा किछु क्षणबाद
किछुए देरक ई कष्टब थिक
भोगहे पड़त ।

एकदिन हावासँ तिब्र भऽ
हमहूँ तोरे लग आएब
तोरे संग नाचब
तोरे गीत गाएब

मुदा आबहे परत
हम अएबे करब
फेर तोरे संग कहब
ॅपटटु ! सीताराम कहो ।’

1

रघुबीर मंडल said...
एकदिन हावासँ तिब्र भऽ
हमहूँ तोरे लग आएब
तोरे संग नाचब
तोरे गीत गाएब
sundar
Reply06/08/2009 at 09:52 AM
2

Usha Yadav said...
संतोष जी। अहाँक ठेंठ कविता हृदयकेँ समीप।
Reply06/07/2009 at 12:28 PM
3

Usha Yadav said...
SANTOSH JI EHINA LIKHAIT RAHOO
Reply06/06/2009 at 11:49 PM




ज्योति
टाइम मशीन
भविष्यके दर्शन कऽ ली अखने
वैज्ञानिक भीड़ल छैथ ताहि जोगारमे
हम सवार भऽ टाइम – मशीनमे
कएक वर्ष केलहुं पार एकहि दिनमे
ओहि पार उन्नति अखन बच्चे अछि
अहि कात अछि अपन चरम ऊॅंचाइर्मे
ओहि ठाम उद्देश्यहीन भटकैत मोन
अहि ठाम सब निर्देशित अपन लक्ष्यमे
औद्योगिक क्रान्तिक भेदपूर्ण दृष्टि
पश्चिमी देश बढ़िगेल आगां जाहिमे
अन्यथा भारत तऽ सर्वथा अग्रणी छल
संस्कृत़ि संस्काऱ आध्यात्मी वा विज्ञानमे
अपने मे मरैत-कटैत देशवासी
देश बॅंटल छोटछोट राज्यमे
कखनो आपसी अनबन तऽ कखनो
अपर्नअपन राज्यक सीमा बढ़ाबऽमे
ताहु सऽ दुःखद तऽ ई बात छल
हमसब रहलहुं विलासिता के निद्रामे
अवसरवादी विदेशी फलान्वित भेल
हमसब बन्धलहुं पराधीनताक बन्धनमे
सब विकासक द्वार बन्द भेल अपन
लागल रहलहुं आनक सेवामे
शाेषणक अन्त करक मोन बनल जखन
सदी लागल लोकतंत्र पाबऽमे
आगां समय लगाबैत रहलहुं
विशालतम लोकतंत्र बचाबऽमे
भारत सर्वगुण सम्पन्न कहायत
जहिया विकास पहुंचत पश्चिमक बराबरीमे
1

Palan Jha said...
vishay nik, muda shilp me kanek aar sudharak aavashyakta
Reply06/09/2009 at 09:28 AM
2

Anand Priyadarshi said...
nik lagait achhi ahan ke padhait
Reply06/09/2009 at 09:27 AM
3

Rahul Madhesi said...
bad nik
Reply06/09/2009 at 09:25 AM
4

Ajay Karna said...
nik vishaya
Reply06/09/2009 at 09:23 AM
5

Krishna Yadav said...
भविष्यके दर्शन कऽ ली अखने
वैज्ञानिक भीड़ल छैथ ताहि जोगारमे
हम सवार भऽ टाइम – मशीनमे
कएक वर्ष केलहुं पार एकहि दिनमे
ओहि पार उन्नति अखन बच्चे अछि
अहि कात अछि अपन चरम ऊॅंचाइर्मे
ओहि ठाम उद्देश्यहीन भटकैत मोन
अहि ठाम सब निर्देशित अपन लक्ष्यमे
ati sundar
Reply06/09/2009 at 09:22 AM
6

Keshav Mahto said...
nik lagal,
kavita me kane aar lyrics dela par aar nik hoyat
Reply06/09/2009 at 09:21 AM
7

Manoj Sada said...
jyoti ji,
ahank vishayak vividhta nik achhi,
kanek aar vistar aa deep thought diyauk te ar nik kavita hoyat
Reply06/09/2009 at 09:19 AM
8

Raghuvir Mandal said...
time machine par aa vistrit kavita likhoo, aan vigyan vishay par seho
Reply06/09/2009 at 09:17 AM
9

VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
भविष्यके दर्शन कऽ ली अखने
वैज्ञानिक भीड़ल छैथ ताहि जोगारमे
हम सवार भऽ टाइम – मशीनमे
कएक वर्ष केलहुं पार एकहि दिनमे
bad nik
Reply06/09/2009 at 09:15 AM
10

Vidyanand Jha said...
nik kavitaa
Reply06/09/2009 at 09:14 AM
11

Usha Yadav said in reply to Jyoti...
ज्योतिजी अहाँ
http://www.google.com/transliterate/indic/
एहि लि‍ंपर सेहो यूनीकोडमे देवनागरी टाइप कऽ सकैत छी।
Reply06/09/2009 at 08:45 AM
12

VIDEHA GAJENDRA THAKUR said in reply to Jyoti...
jyotiji
http://kaulonline.com/uninagari/default/
ehi link para online devnagari me likhoo aa otay se copy kay
etay paste karoo.
Reply06/09/2009 at 08:19 AM
13

Jyoti said in reply to Usha Yadav...
Hum devnagari ataya kona upayog karu se nahin bujhal achhi, ahank prashansha sa ham bahut protsahit chhi.
Dhanyawaad Ushaji
Reply06/09/2009 at 02:56 AM
14

रघुबीर मंडल said...
हमसब रहलहुं विलासिता के निद्रामे
अवसरवादी विदेशी फलान्वित भेल
हमसब बन्धलहुं पराधीनताक बन्धनमे
सब विकासक द्वार बन्द भेल अपन
nik
Reply06/08/2009 at 09:53 AM
15

Usha Yadav said...
अहाँक कविता नीक लागल ज्योतिजी।
Reply06/07/2009 at 12:29 PM
16

Usha Yadav said...
BAD NIK
Reply06/06/2009 at 11:48 PM
17

Usha Yadav said...
BAD JYOTI JI
Reply06/06/2009 at 11:48 PM

प्रिय पाहुन - जितेन्द्र झा, जनकपुर

पारम्परिक मैथिली विवाह गीत समेटल एक गोट मैथिली क्यासेट आएल अछि प्रिय पाहुन । एहि क्यासेटमे मैथिलीक विवाहक परिछनसं विदाई धरिक गीत सभ संग्रहित अछि । अंशुमालाक एकल प्रस्तुति रहल इ क्यासेट मैथिली विवाह परम्पराक किछु खास वस्तुपर केन्द्रित अछि । एहिके विशेषता जयमाल गीत जे कि मिथिलाक मौलिक गीत अछि रहल गायिका अंशुमाला कहैत छैथ । जीमनार(वरियाती खएबाक काल गाआàल जाएबला गीत) आब बहुतोक ठोरपर नर्इं छढैत छन्हि, एहि क्यासेटमे एकरा महत्व देल गेल अछि । प्रिय पाहुन क्यासेट नव पुरान दुनू पीढीक लोक पसन्द क'रहल अंशुक कहब छन्हि । कन्या लगन गीत, परिछन गीत,देखु रसे रसे दुलहा, चाल कटाक्ष, देहरि छेकाओन, सिन्दुरदान आ समदाओनक गीत एहि क्यासेटमे संकलित अछि । एहि क्यासेटमे सीमाक भितर कएल जाएबल हंसी मजाक आ ताहिभितर नुकाएल प्रेमके देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि । गंगा क्यासेटक प्रस्तुति रहल इ क्यासेट एखन मात्र अडियोक रुपमे अछि । क्यासेटमे गीत संकलन ह्मदय नारायण झा आ शशि किरण झा, संगीत कमल मोहन चुन्नुक छन्हि । गायिका अंशुमालाके एहि क्यासेटसं बहुत बेशी आशा छन्हि । एना आधुनिक गीतक बजारमे ई विवाह गीत अलग स्थान बनाओत से आशा कएल जा सकैया ।
1

रघुबीर मंडल said...
anshu ji ke badhai
Reply06/08/2009 at 09:44 AM
2

Usha Yadav said...
अंशुमालाजीकेँ हमरो दिशसँ एहि अवसरपर शुभकामना।
Reply06/07/2009 at 12:30 PM
3

Usha Yadav said...
PRIYE PAHUN CASETTE LEL ANSHUMALA JI KE BADHAI
Reply06/06/2009 at 11:48 PM
मूल गुजराती पद्य आ तकर अंग्रेजी अनुवाद- हेमांग आश्विनकुमार देसाइ
मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर

समीकरण

दू टा अर्धवृत्त जन्मैत समानान्तर,
समानान्तर रेलगाड़ीक पटरी।
हाथ भरि नमगर लिबल घास,
झुकैत भीतर,
बिना डोरीक धनुष सन।
सुनबैत खिस्सा भरिगर हबाक,
रातिभरि जन्मैत अस्पष्ट पीठ वेताल सन,
जे उड़ि जाइत अछि बोर भेने।

आ एतबे
आकि कनेक बेशी
झुकल बुढ़िया
जे अहाँकेँ मोन पाड़त हाँसू।

झुकल निश्चल प्रथम श्रेणीक कम्पार्टमेन्टमे,
कातमे ठाढ़ कएल गेल ट्रेन
अहाँक अपन आँखिसँ कएल प्रतीक्षा बिन कात भेल।
एकटा छोटो आहटि
एकटा त्वरित चमक कमसँ कम
आब, हँ आब
ई हमर अधिकार अछि, सत्ते
हैए जाइत अछि।

दूटा उर्ध्वाधर पटरी टेढ़ कएल बीचमे
दू टा तोरण जमल मृत्यु
एकटा तीक्ष्ण गुमारबला दुपहरिया
आ अहाँ
बनबैत छी एकटा अद्भुत समीकरण।
आश्चर्यिय छी अहाँ कष्ट उठबैत छी सोझ बैसबा लेल
आ जे हाँसू गीरि गेलहुँ कताक समय पहिने
तोऐत अहाँकेँ खण्डमे
1

रघुबीर मंडल said...
hemang desai ke kavita me nav bimb achhi,
maithili sahitya ehi tarahak anuvad se samridh hoyat
Reply06/08/2009 at 09:49 AM
2

Usha Yadav said...
हेमांग देसाइक कविताक प्रस्तुति लेल धन्यवाद।
Reply06/07/2009 at 12:30 PM
3

Usha Yadav said...
HEMANG DESAIK KAVITA BA NIK LAGAL
Reply06/06/2009 at 11:47 PM
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ 2. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी

1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)

देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्र्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा: मैथिलीक पहिल-चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
नीचाँक दुनू कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा सात

नताशा आठ




2.
मध्य प्रदेश यात्रा- ज्योति
एगारहम दिन
2 जनवरी 1992 वृहस्पतिदिन
उज्जैन सऽ हमसब सबसऽ पहिने काँचक जैन मन्दिर गेलियै। ओतयके अनुपम कारीगरी स आकर्षित भेल बिना नहिं रहल जा सकैत छै।चारू कातक देवारमे शीशा के एना सजायल गेल छलै जे प्रकाशक एक किरण पूरा मंदिर के जगमगाबैलेल काफी छलै।मंदिरके बीचमे चारिटा जैन तीर्थकर के मूर्त्ति विराजित छल ।
जैन मंदिर स कनिक दूर पर धर्मावलम्बी के आकर्षणक मुख्या केन्द्र ‘श्री महाकालेश्वर’ जी के मंदिर छल।ओतऽ ज्योर्तिलिंग के दर्शन हेतु बड्ड भीड़ देखायत छल।अहि मंदिर के नजदिक मे राममंदिर आ’ संतोषी मंदिरमे एक धार्मिक फिल्म‘जय संतोषी माताक’ शूटिंग भेल छलै।
अकर बाद हमसब क्षिप्रातट पहुँचलहुँ। अतय क्षिप्रा नदीक स्वच्छता आहिके प्रदूषण स भरल वातावरणमे सच्चे चमत्काँरी छै।अतऊ धुआंधार जलप्रपातक जकाँ किछु तैराकी बच्चा सब लोकक पाछु भागैत रहै। लोकसब द्वारा पाई फेकलाक बाद ओ नदीमे गोता लगाबैत रहै आर नीचा मे भेटल पाई ओकर भऽ जायत छल।उज्जैन सऽ कनिके दूरी पर भतृर्हरि गुफा छै।अहि गुफामे भगवान गोरखनाथक प्रतिमा छैन।ई प्राचीन गुफा भूमिगत छै आर रस्ता बहुत पातर छै आ बहुत सीढ़ी सब सेहो छै।अन्दर धुआं तऽ नहिं छलै मुदा धुआं जकाँ गंध जरूर छलै। कनि हवाक कमी सेहो बुझायत छलै।अहिसऽ बाहर एलाक बाद हमसब एकटा पंडित के देखलहुँ जे अपन कानक बाहरी पातर किनारा छोड़िकऽ पूरा कटवा लेने रहथि।आ ओहि बड़का छेदमे एकटा बड़का टा बाला सदृश कुण्डल पहिनने रहथि।एहेन आश्चर्यजनक शौक़ सऽ हमसब विस्मित छलहुँ।अतय सऽ हमसब अपन लॉज लौटि गेलहुँ।
तकर बाद अपन समूहक शिक्षिका संगे सब लड़की सब घूमय गेलहुँ आ खूब मिठाई सब खेलहुँ।उज्जैनमे रबड़ी आ कलाकन्द बहुत नीक भेटै छल। हम अपन पड़ोसी जे हमर संगे ओहि यात्रापर गेल छल तकरा लेल सेहो रबड़ी अनलहुँ।काल्हि जे हमसब नववर्षक कार्यक्रम स्थगित केने रहूं से आहि पूरा भेल।

देवीजी : ज्योति

देवीजी : गरमीमे स्वास्थ्य के ध्यान

गामक गर्मी तऽ अपन क्रूरता लेल प्रचलित अछिये।अहू बेरका गरमीमे किछु बेसी अन्तर नहिं छल।एकदिन देवीजी कतौजाइत छली की रस्ताक कात एकटा वृद्ध मूर्छित भऽ खसल छल। देवीजीके बेसी देर नहिं लगलैन इ ज्ञात करैत जे ओ व्यक्तिम के इ हालत गर्मी के कारण भेल छल। ओ आन लोक सबके जमा केली। तुरन्त ओकर प्राथमिक उपचार जेना कि ठण्ढा पानि छींटनाइ पंखा डोलेनाइ सब कैल गेल।तकर बाद चिकित्सा लय लऽ जा हुन्का पाइन चढ़ायल गेल। आ ओ जल्दिये ठीक भऽ गेला।
देवीजी बहुत चिन्तित छली जे जॅं ओकर उपचारमे विलम्ब होएतै तऽ की होयतै।फेर की छल देवीजी भीरेली अपन विद्यार्थी सबके एक सभा जुटाबैमे जाहिमे ओ गौँवा सबके गर्मीमे अपन स्वास्थ्यक ध्यान राखैके जानकारी देलखिन।देवीजी सबके बतेलखिन जे गर्मीमे पाइने जीवनरक्षक होएत छै।दिन भरि कनी कनी पाइन पीबैत रही आ कतौविदा हुअकाल एक बोतल मे पाइन जरूर लऽ ली। देवीजी निम्नलिखित सलाह देलखिनः
1) गर्मीमे कतौविदा हुअ काल अपन संगे पीबैलेल पाइन वा शर्बत रौद सऽ बचैलेल छत्ता वा टोपी रौद सऽ बचाबै वला चश्मा इत्याहदि जरूर लऽ ली।त्वइचाके रक्षाके लेल सन्सक्रीम लोशन लगाऊ।बच्चा सबके रौद मे बाहर निकलऽ काल अहिके विशेष ध्यान रखबाक चाही।सूर्यके खतरनाक पराबैंगनी किरण स बचैके लेल अनेको सामान आबैत छै तकर उपयोग करैके चाही।
2) कर्नीकनी देरमे पानि पीबैत रहू।अहि मौसममे रंग बिरंगक शर्बत बनाक पीबू। बजारमे अनेको प्रकारक शर्बत भेटै छै। तकर अतिरिक्त ताजा फलक शर्बत बनाकऽ पीबू। जेनाकि कच्चा आमके उबालिकऽ ओकर शर्बत़ बेलक शर्बत़ तरबूजक रस़ नेबो के शर्बत़ गुलाबक पंखुड़ीके रसक शर्बत़ पुदीनाक शर्बत़ खीरा के रस़ लस्सी़ घोऱ नारियरक पानि इत्याडदि शरीरके ठंढ़क पहुँचाबै छै।
3) गर्मीमे ओना तऽ हरियर ताजा साग सब्जी कम उगै छै मुदा बजारमे फ्रीजक सुविधाक कारण बहुत किछु उपलब्ध रहैत छै।पूरा पौष्टिक भोजन करू।बासि भोजन नहिं करू।खीरा़ ककरी आदिक सलाद खायल करू।
4) दिनमे दू वा बेसी बेर नहायल करू।एहेन समयमे तैराकी के प्रतियोगिता केनाइ बहुत नीक रहै छै।
5) साफ जलक सेवन करू।
6) बिढ़नी़ मधुमाछी़ बीछ़ साँप आदिक काटैके डर एहेन समयमे बढ़ि जाएत छै तैं सावधान रहू।आ प्राथमिक उपचारक ज्ञान एवम् व्यवस्था घरमे राखल करू।ककरो आवश्यकता होए तऽ जरूर सहायता करियौ। साँपके कटला पर साँपक प्रकार बूझल रहला पर इर्लाज आसान होएत छै।कनिको असमन्जसता होय तऽ खाय वला दवाइर्के प्रयोग बिना चिकित्स क के सहायताके नहिं करू।
7) सूती कपड़ा पहिनू।बाजार मे सूर्यक पराबैगनी किरण सऽ बचैवला कपड़ा सेहो भेटैत छै तकर प्रयोग करू।
8) मालजालके भोजन आऽ पानिके पूरा सुविधा देबाक चाही।गर्मीमे ओकरा सऽ बेसी काज नहिं कराऊ आ पानिक व्यवस्था भरपूर दियौ।
9) जरूरत पड़ला पर चिकित्सेकके मददि लियऽ।
देवीजीक इ परामर्श सबके लेल बहुत हितकारी साबित भेल।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
1

रघुबीर मंडल said...
35m ankak natasha aa deviji bad nik
Reply06/08/2009 at 09:44 AM
2

Usha Yadav said...
नताशा देवी जी दुनू बड्ड नीक। देवांशु जी आ ज्योतिजी , अहाँ दुनु गोटेक प्रशंसामे शब्द भेटि नहीं रह्ल अछि।
Reply06/07/2009 at 12:31 PM
3

Usha Yadav said...
BACHCHA SABHAK LEL VIVIDH PRASTUTI, DEVANSHU VATS AA JYOTI JI DHANYAVADAJK PATRA CHHATHI
Reply06/06/2009 at 11:47 PM

भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली


1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
Reply05/15/2009 at 11:01 PM
2


8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original poem in Maithili by Ramlochan Thakur Translated into English by Gajendra Thakur
8.2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti.
Original poem in Maithili by Ramlochan Thakur
Translated into English by Gajendra Thakur

Letter to the Sister

Sister!
I had received your letter
But there was delay in reply.
Why should I lie that
I was busy.

What to write and why to write,
That I could not decide,
Therefore this delay!

Sister !
I know that this year too
You might have made Sama-Chakeba.
And might have waited for me.
After Vrindaban set on fire.
Then not finding me
might have become sad.
Incessant tear might have flown from your eyes.

But Sister !
You believe it or not
It is true that
Any forest fire could not be controlled by
A water-filled jug and
That you have written,
True, I am changed, a lot.
I know that Vrindaban is
Not the same Vrindaban now,
Now not one,
But in numbers,
The slanderers have taken birth
And it is this Vrindaban,
The permanent abode of those.

The old hollowed trees have
Given shelter to the terrible poisonous snakes.

Today
there,
Even air is poisonous,
To inhale that air is also not advisable.

Therefore
In my opinion
It would be better if it is destroyed in fire,
trying to subdue the fire is not desirable,
Is misuse of strength,
That strength is to be preserved
For future.
When we would plant
Certainly would plant
A new Vrindaban
Would water it not from a reservoir
But with our sweat/ and would blossom
Flowers of many colours/ in consonance of our desire
Would give a new colour to our dreams.

Sister!
I believe/ and you’d believe too
That today/ in our own village we are all unknown-unknown
Having no identity,
Certainly the pain of it is unbearable,
But/ for that
It would not be appropriate to cry
But to recognize our own power,
And to overhear outside voice too and
To resolve
Then tomorrow – tomorrow
We would have an identity,
We the Vrindaban,
Our Vrindaban.
1

रघुबीर मंडल said...
great ramlochan thakur ji, and gajendra ji,
ramlochan thakur ji is really a revolutionary poet
Reply06/08/2009 at 09:48 AM
2

Usha Yadav said...
excellent poem by ramlochan thakur
Reply06/06/2009 at 11:44 PM
3

jyotijhachaudhary@gmail.com said...
Simply fabulous, I always love those poems that spread our tradition and customs, Here 'sama chakeba'; amazing !
Reply06/03/2009 at 03:54 AM


English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed athttp://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title“KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

The Comet



English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary

Mother started crying but Aaruni was very happy. The only difference brought by the new education system was that pupils were getting admission in junior classes by adding the name Naveen in their classes.
Father was not happy with that and when he moved to city Aaruni got admission in class seven after passing class five in the village skipping the class six. Father’s instruction to complete maths and science of class six when Aaruni was in class five came to be fruitful here because he was only asked maths and science in entrance exam. He sat for class six and seven and selected for both. Aaruni could not be very confident whenever someone was talking about class six.
While living in the village Aaruni once wrote letter to his dad because his shoes were left in the town. Shoes arrived with criticism of three mistakes done in writing letter and reminding him that he had solved only two questions in place of three in a race competition. He didn’t remember when the evil of aggression was born in him but he remembered that his father has given him a tip of meditation by reciting a shlok ten times. Once he fought with a classmate and his classmate hurted his head with the slate board. He also raised his hand to hit him but he stopped considering that it would hurt his friend. The consequence of that incident made two changes. First was that his slate board with iron border was replaced by a slate board with wooden border. The second and very important change was that a new school in the colony was inaugurated by his father. Later on, whenever some priest started giving him advice of wearing pearl rind on small finger or reading Sunderkand he used to recall the tip of reciting those Sanskrit Shloks.
His childish attitude of feeling humiliated in asking for help and compromising was still present in him. But he lost the spirit to fight by neglecting the difference between victory and defeat was not present in him especially after the death of his father. Gradually, he started believing in achievements and victory. He got help from all those people whom he had helped at the time of need. The compromise done by him time to time eased his struggles. His friend circle was big enough to be managed by him. Then he didn’t had any need to have more friends in new place.
The ambition was endless. And the art of living life of each individual was different too. Aaruni- that name was not commonly heard at home. The city of Kolkata respects talent. But to qualify in entering business world there needed to know Benguli which he learnt while walking in the streets of Kolkata. In his busy life he used to take rest only when he was ill. Whenever he was ill and sitting idle he used to recall his habit of thinking. And he called his mother to stay with him when he bought a flat. However he was very sure that those things would not impress his mother because she was wife of an officer so she wanted her son to be so. That city had increased the portion of completion in respect of principle in the life style of her son. It was the impact of busy life that her son was getting any time to think only when he was on bed.
(continued)
1

रघुबीर मंडल said...
excellent transllation by jyotiji, it looks like original
Reply06/08/2009 at 09:47 AM
2

Usha Yadav said...
excellent translation, the linguists should note the grace of english that is encompassing and not compromising the originality
Reply06/06/2009 at 11:45 PM



महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट संस्करणक विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे।
महत्त्वपूर्ण सूचना (२): 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. प्रकाशित कएल जा रहल अछि: लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website:http://www.shruti-publication.com

महत्त्वपूर्ण सूचना:(३). पञ्जी-प्रबन्ध विदेह डाटाबेस मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण- श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। पञ्जी-प्रबन्ध (शोध-सम्पादन, डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- तीनू पोथीक शोध-संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा Combined ISBN No.978-81-907729-6-9

महत्त्वपूर्ण सूचना:(४) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गिच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे।कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)-लेखक गजेन्द्र ठाकुर Combined ISBN No.978-81-907729-7-6

महत्त्वपूर्ण सूचना (५): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे।

महत्त्वपूर्ण सूचना (६):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।



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विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : देवनागरी
"विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:1)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुर (1971- ) छिड़िआयल निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गिच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक (खण्ड 1 सँ 7 ) नामसँ। हिनकर कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे आ उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद संस्कृत आ अंग्रेजी(द कॉमेट नामसँ)मे कएल गेल अछि। मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली शब्दकोश आ पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन-आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण। अंतर्जाललेल तिरहुता यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com

सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा (1962- ), पिता श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, पति श्री दीपक कुमार। श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा इतिहास आ राजनीतिशास्त्रमे स्नातकोत्तर उपाधिक संग नालन्दा आ बौधधर्मपर पी.एच.डी.प्राप्त कएने छथि आ लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर आलेख-प्रबन्ध सेहो लिखने छथि।सम्प्रति “विदेह” ई-पत्रिका(http://www.videha.co.in/ ) क सहायक सम्पादक छथि।
मुख्य पृष्ठ डिजाइन: विदेह:सदेह:1 ज्योति झा चौधरी
ज्योति (1978- ) जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।ज्योतिकेँ www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि।
विदेह ई-पत्रिकाक साइटक डिजाइन मधूलिका चौधरी (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस), रश्मि प्रिया (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस) आ प्रीति झा ठाकुर द्वारा।
(विदेह ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि आ एकर सभटा पुरान अंक मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल वर्सनमे साइटक आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध रहैत अछि। विदेह ई-पत्रिका सदेह:1 अंक ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह:सदेह:2 जनवरी 2010 मे आएत ई-पत्रिकाक 26 सँ 50म अंकक चुनल रचनाक संग।)

Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)
विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)
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आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
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भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00


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जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00
कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00
लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00
फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00
दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00
कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
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दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00
पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/-से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10%की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी ।
अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन :0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
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बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन


अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
9891245023
ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in,
antika.prakashan@antika-prakashan.com
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-)
९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर१.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा ।
१२.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा"
१३. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संचस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1:तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु.100/-
श्रुति प्रकाशन, DISTRIBUTORS: AJAI ARTS, 4393/4A, Ist Floor,AnsariRoad,DARYAGANJ. Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107.Website: http://www.shruti-publication.com
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VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
मैथिली आ मिथिलासँ संबंधित कोनो सूचना एतए देबाक लेल ggajendra@videha.com किंवा ggajendra@yahoo.co.in केँ ई मेलसँ सूचित करी।
Reply05/12/2009 at 01:37 AM

संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।
विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
(c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

'विदेह'३५ म अंक ०१ जून २००९(वर्ष २ मास १८ अंक३५)- part i

'विदेह'३५ म अंक ०१ जून २००९(वर्ष २ मास १८ अंक३५)


वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश
२. गद्य

२.१. चेतना समिति ओ नाट्यमंच प्रेमशंकर सिंह

२.२. कथा- सुभाषचन्द्र यादव-परलय
२.३. प्रत्यावर्तन - पाँचम खेप- कुसुम ठाकुर

२.४ स्वर्गारोहण अर्थात लोकतंत्रीय मुक्ति -श्यामल सुमन
२.५ विकासक पक्षमे आयल जनादेश: बाहुबल आ परिवारवादपर जनता कयलक चोट २.माध्यमिक परीक्षा परिणाम २००९-सोझाँ आयल ग्रामीण प्रतिभा- नवेन्दु कुमार झा
२.६. कथा-दृष्टिकोण कुमार मनोज कश्यप

२.७.सगर राति दीप जरए: ६६म आयोजन :३० मई,२००९: मधुबनी- मिथिलेश कुमार झा

२.८.लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति- गजेन्द्र ठाकुर
३. पद्य
३.१. आशीष अनचिन्हार

३.२. डॉ.शंभु कुमार सिंह-दू टा कविता
३.३.बड़का सड़क छह लेन बला-गजेन्द्र ठाकुर
३.४. विवेकानंद झा-तीन टा टटका पद्य
३.५. सतीश चन्द्र झा-सिंगरहारक फूल

३.६. जीवन यात्रा- सुबोध ठाकुर
३.७.हमर मीत- सन्तोकष कुमार मिश्र
३.८. ज्योति-टाइम मशीन

४. मिथिला कला-संगीत-प्रिय पाहुन - जितेन्द्र झा, जनकपुर

५. गद्य-पद्य भारती -मूल गुजराती पद्य आ तकर अंग्रेजी अनुवाद- हेमांग आश्विनकुमार देसाइ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर

६. बालानां कृते-१. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ२. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी



7. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)
7.1.Original poem in Maithili by Ramlochan Thakur Translated into English by Gajendra Thakur

7.2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili NovelSahasrabadhani translated by Jyoti.



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
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१. संपादकीय
मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नहि भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भए अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताकेँ भरिया रहल छथिआ मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कए कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि आ स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि; स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल अछि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्म आ मिथिला राज्य आ संघक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिज्म, महिला विरोधी मार्क्सिज्म आ एहि तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि।
क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक तँ क्यो सुमनजीक। आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि।
यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नहि कएल गेल अछि- एहि तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो राजकमलक विवादास्पद कथाक सम्पादन कए स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि तँ क्यो - ई के नव आबि गेल लेखनमे (!) से प्रश्न उठा रहल अछि।
मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जाहि कवि-कथाकारकेँ विचलित कए रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे अएबाक बाद जाहि गतिसँ ओ ई सभ करतब कए रहल छथि तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जएतन्हि से नहि जानि? सेमीनारमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एहन जुझारू कथाकार, सम्पादक आ समालोचक सभकेँ अपन पुत्र-पुत्री-पत्नीक संग मैथिलीमे नहि वरन् हिन्दी मे (अंग्रेजी प्रायः सामर्थ्यसँ बाहर छन्हि तेँ) गप करैत देखि हतप्रभ रहि जाइत छी। मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल होएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कए हम कहि सकैत छी। ताहि स्थिति मे- ई विवाद रहए एहि कवितामे आ एहि कथामे-एहि तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दए अपन लेखनी चमकाएब? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा एहि सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित कए सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भए रहल अछि? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा कए तकर समीक्षा करबा कए सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा कए तकर फोटोस्टेट कॉपी घरमे राखि फोल्डर बना कऽ पुरस्कार लेल राखि रहल छथि। सिलेबसमे अपन किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जाए स्थिर भए गेल अछि।
“विदेह” ई-पत्रिका अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट कथा-कविता सभकेँ भेटलैक जाहिमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल।
मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ पाठक बनि रहिये नहि सकैत छथि, शीघ्र यात्रीक बादक एकमात्र जन उपन्यासकार आ कुलानन्द मिश्रक बादक एकमात्र सही अर्थमे कवि (!) क उपाधि लेल लालायित भए जाइत छथि। अपनाकेँ घोड़ा आ बाघ आ दोसरकेँ गधा आ बकरी कहबा काल ओ मूल दिशा आ समस्यासँ अपनाकेँ फराक करैत छथि। अपन कथा-कवितापर आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आएल अछि। एहिएकमात्र शब्दसँ जे हमरा वितृष्णा होइत अछि तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक प्रति “विदेह” ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी।
एतए साल भरिमे सएसँ बेशी लेखक जुड़लाह तँ पाठकक संख्या लाख टपि गेल। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर एहि गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि। ई भाषा जे मरि जाएत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की होएतन्हि।सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ एहि रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। ने पाठकक कमी आ ने समीक्षाक कमी रहल एहि बेर आ ई घटना सभ दिन आ सभ प़क्षमे मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि।मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नहि।जे अपन घर-परिवार नहि सम्हारि सकलाह से कोन-कोन भाषायी पुरस्कार प्राप्त कएने छथि, पता नहि मिथिला राज्य कोना सम्हारि सकताह आ ओकर विधान सभामे कोन भाषामे बजताह, जखन हुनका ओतए सम्मानित कएल जएतन्हि। जे घरमे मैथिली नहि बजैत छथि से लेखक आ कवि बनल छथि (हिन्दी-मैथिलीमे समान अधिकारसँ) हिन्दी अनुवाद मैथिली कथा-कविताक करैत छथि!!मराठी, उर्दू, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि। वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नहि अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नहि, मराठीमे कोनो बच्चा धरिसँ गप करबाक सामर्थ्य नहि छन्हि।
आ मैथिलीमे ई कुकृत्य केलाक बादो हुनकर माथ फुटबासँ एहि द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कए समीक्षा करबैत छथि से पाठक तँ छन्हिये नहि। पाठक नहि रहएमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि।
क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल अछि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल अछि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल अछि। कथा-कविता संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन कथाकार-कविक संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि भने हुनकर कोनो संग्रह नहि आएल होइन्हि वा कथा-कविताक संख्या दहाइमे नहि पहुँचल छन्हि। पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि।
ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जाहि भाषामे लिखल जाइत होअए ओतए एहि तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि। मार्क्स आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करथि आ अपन स्तरक न्यूनताक एहि तरहेँ पूर्ति करब सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही, धंधा तँ सुमन, राजकमल, यात्री, मणिपद्म......सभक शुरू भेल अछि।
सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा , स्त्री आ जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार होएबे टा करत। “विदेह” ई-पत्रिका कैक टा मठकेँ तोड़ि देलक अछि आ सर्वग्राह्या आ सभसँ लोकप्रिय मैथिली साहित्य आन्दोलनक रूपमे एहि अभियानक सभ रोड़ाकेँ खतम करबा लेल हजार लेखक आ दस लाख पाठक तैयार करत माने एखनसँ दस गुणा- आ से अगिला आबएबला दस साल सिद्ध करत।

विदेह:सदेह:1 (विदेह वर्ष 2: मास:13 :अंक:25) छपि कए आबि गेल मिथिलाक्षर आ देवनागरी दुनू वर्सनमे- विदेह ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग। विशेष जानकारी प्रिंट फॉर्मक स्पॉनसर प्रकाशक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर उपलब्ध अछि। संगहि आर्काइवमे विदेह:सदेह:1 केर दुनू वर्सन डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ब्रेल स्वरूप सेहो (पचीस अंकक आ बादक सभ अंकक सेहो) देवनागरी आ मिथिलाक्षर वर्सनक संग आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:सदेह:2 जनबरी 2010 मे ई-पत्रिकाक 26-50 अंकक चुनल रचनाक संग प्रिंट फॉर्ममे छपत।

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० मई २००९) ७९ देशक ८१० ठामसँ २२,८९५ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ १,७७,४०० बेर देखल गेल अछि
(गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।




गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in

1

Usha Yadav said...
nirbhik aa tathyapoorna sampadakiya , maithili ker vikas ahi sabh san lok se sambhav chhaik, jativadi manasiktak lok sabh ekar bad ahit kay chukal chhathi
Reply06/07/2009 at 12:14 PM
2

Keshav Mahto said...
bahut nik class lelahu paakhandi sabhak bhai ji
Reply06/06/2009 at 11:11 PM
3

Manoj Sada said...
35m ankak sampadakiya hriday ke sparsh kaylak, mathadhish sabh aab kat karot dhartah aa maithili aaga rahat, videhak dekhayal bat se lok shiksha lethu nahi te bat dharathu

२. गद्य

२.१. चेतना समिति ओ नाट्यमंच प्रेमशंकर सिंह

२.२. कथा- सुभाषचन्द्र यादव-परलय
२.३. प्रत्यावर्तन - पाँचम खेप- कुसुम ठाकुर

२.४ स्वर्गारोहण अर्थात लोकतंत्रीय मुक्ति -श्यामल सुमन
२.५ विकासक पक्षमे आयल जनादेश: बाहुबल आ परिवारवादपर जनता कयलक चोट २.माध्यमिक परीक्षा परिणाम २००९-सोझाँ आयल ग्रामीण प्रतिभा- नवेन्दु कुमार झा
२.६. कथा-दृष्टिकोण कुमार मनोज कश्यप

२.७.सगर राति दीप जरए: ६६म आयोजन :३० मई,२००९: मधुबनी- मिथिलेश कुमार झा

२.८.लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति- गजेन्द्र ठाकुर


डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक,मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण,मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि,स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।

कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन-
गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका,महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल,कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन,भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
चेतना समिति ओ नाट्यमंच
प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह
सांस्कृरतिक, साहित्यिक आ कलाक मुख्या केन्द्रय रहल अछि बिहारक प्रशासनिक राजधानी परना। जीवकोपार्जनार्थ मिथिलांचलवासी प्रचुर परिमाण में एहि महानगर में निवास करैत छथि। मैथिली भाषा-भाषीक एतेक विशाल जनसंख्याव वाला महानगरक मातृभाषानुरागी लोकतिक सत्प्रियाससँ अपन भाषा आ साहित्यतओ रंगमंचक विकास में महत्वापूर्ण भूमिका निर्वाह कयलक अछि। मैथिली रंगमंचक विकास में एहि महानगरक चेतना समिति (1952) एक द्येसराक समानार्थी अछि, कारण् एहि क्षेत्र में जे किछु अवदान अछि ओ पटना आ वेतना समितिक योगदान एकहि बात थिक। आब ई प्रयोजनीय भ’ गेल अछि जे जनमानस ओहि अवदान केँ जानय आ जँ महत्वकपूर्ण अछि तॅा ओकर मुक्त’ कण्ठे् प्रशंसा क’ कए ओकरा स्वीसकार करय। रंगमंचक क्षेत्रमें चेतना समितिक नाट्यमंचक अवदानक पूर्ण मिथिलाव्च्ल एवं मिथिलेकार क्षेत्र क अवदान सँ परिचित होयबाक हेतु प्रेमशंकर सिंह (1942) एवं नाट्यसान्वाएचय (2002) क अवलोकन कयल जा सकैछ।
ई निर्विवाद सत्य थिक जे मिथिलाव्चेल आ मिथिलेतर क्षेत्र में मैथिली रंगमंचक शौकिया रंगमंख्क संख्या0 अतयन्ता सीमित अछि। यद्दपि बीसम शताब्दीचक तृतीय,चतुर्थ आ वंचम दशक में समग्र भारतीय स्व्तंत्रता-संग्राम में संलिप्त रहला, जाहि कारणेँ नाटक सदृश्यश समवेदक कलात्म क सृजन विकसित नहि भ’ पौलक, तथापि पत्र-तंत्र पौराणिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक नाटकक मंचन होइत रहल। एहन प्रस्तु2तिक मूल उद्देश्या छलैक राष्ट्रत आ समाजक समक्ष एक उच्चत कोटिक आदर्श प्रस्तुहत करब। एहन शौकिया रंगमंच अत्यमन्त् संख्याा में समाजक संग जुडल आ एहि सँ आगॉं बढि क’ ओ बे तँ जीवनक अभिन्न अंगे बनि सकल आ ने सांस्कृंतिक, साहित्यिक एवं कलात्मसक विकासक साघ्यद में।स्वुतंत्रात्मनक पश्चानत् व्यनक्ति-व्याक्तिक दृष्टिकोण में परिवर्तन भेलैक आसमाज में सांस्कृँतिक. साहित्यिक एवं कलात्म क विकासक अवस्द्धक द्वार खुजि गेलैक। स्वा्धीनोतर युग में सांस्कृ तिक एवं कलात्मकक विकासक अवस्द्ध द्वार खुजि गेलैका। स्वाुधीनोत्तार युग में सांस्कृमतिक, साहित्यिक एवं कलात्मकक स्थितिक यथार्थ चित्रण जानबाक, बुझबाक आवश्यनकता महसूस भेलैक समाज एवं जनमानस केँ। सामान्य जनमानसक सुख-दुख, आशा-निराशा, कुष्ठाज संत्रास, असन्तोयष, क्षोभ, क्रोध एवं जीजीविषा केॅा वाणी देवाक हेतु नाटक कारक अन्तखर उद्रेलित भेलनि आ एहि दिशा में सोझे-सोझ स्थितिक वर्णन करबाक हेतु नाटकक आश्रय लेलनि शनै:-शनै: रंगमंच सामाजिक जीवनक सन्निकट अबैतगेल आ वर्तमान स्थिति में तँ ओ एक अभिकाव्यै अंग बनि गेल अछि। एकर परिणाम एतबे नहि भेलैकते शौकियाक संगहि-संग अर्द्ध व्याैवसायिक वा व्यालवसायिक स्तबर पर जनमानस रंगमंचक महत्व केँ स्वीयरकारलक। एहि में सबसँ क्रा‍न्ति परिवर्तन भेल जे महिला समुदाय एकहि में अपन सहभागिता देव प्रारम्भ‍ कयलनि। हुनका सभक सक्रिय सहभागिताक फलस्वररूप शनै:-शनै: ई मरलव जीवनक अविभाज्य‍ अंग बनाय लागला किन्तुि अत्य न्तव दुर्भाग्यक पूर्ण स्थिति थिक जे मिथिलाव्च्ल वा मिथिलेतर क्षेत्र में अद्यापि व्या वसायिक रंगमंचक प्रादुर्भावे नहि भेलैक।
पटना सदृश महानगर में चेतना समितिक तत्वािवधान में नाट्यभिनयक यात्राक शुभारम्भय भेलैक तकरे फलस्वसरूप नाट्यांचनक परम्प राक सूत्रपात भेलैक जाहि में गृहिणी महिला वर्ग क सहभागिताऍं एकर प्राण में नव स्प न्दपन भरलक जे अनुर्वर छल। चेतना समितिक स्थाापनोपरान्त सांस्कृितिक गतिविधिक संगहि-संग रंगमंचक क्षेत्र में नवजागरणक संचार भेलैक सन् 1954 ई. सँ। किन्तुत आरम्भिक काल में अनभूत एंकाकींक मंचन होइंत ाकर विवरण्एाज आगॉं प्रज्ञतुत कयल जायत, मुदा सन् 1973 ई. सँ अद्यपर्यन्ती एंकाकी बा नाटकक मंचन होइत अ‍ाबि रहल अछि। भारतीय गणतंन्त्रि से एहन कोनो महानगर, नगर का कस्बा नहि अछि जनय नियमित रूप से नाट्य-प्रस्तु्ति नहि होइत अछि, किन्तुग नाट्यमंच अपन प्रतुन ति सँ एकरा मूर्त रूप प्रदान करबा में सक्षम सिद्ध भेज अछि।
चेतना समितिक तत्वानवधान में आयोजित विद्यापति पर्वक प्रति शनै:-शनै:जनमानस में एक प्रबल ज्वातरक उद्भावना होइेत देखि एकर कार्यकारिणी समितिक अघ्यवक्ष दिवाकर झा (19141996) एवं सचिव फटाशंकर दास (19232006) अनुभ्व कयलनि जे ई संस्था मात्र साहित्यिक गतिविधि पर केन्द्रिंत नहि रहय, प्रत्यु6त एकरा में अत्य धिक गतिशीलता अनबाक हेतु आ ओइन जनमानसक संग
जोडबाक प्रयोजन बुझलान जकरा हेतु मनोरंजनक किछु एहन कार्यक्रम सुनिश्चि त कयल जाय जे अधिकाधिक संख्याब से जन्मा नस एहि आयोजन में सहभागी बनि सकथि तथा एकर क्रिया-कलाप में अपन उपस्थिति दर्ज करा एकथि। एहि सोच केँ क्रिया रूप देबाक निमित कार्यकारिणी समिति एक उपसमित्यिक गठन कयलक जाहि से बाबू लक्ष्मीसपति सिंह (1907-1979), आनन्दम मिश्र (1क924-2006), गोपाल जी झा गोपेश (1क931) एवं कामेश्वमर झा केँ ईभार देल गेलनि जे एकरा कोना क्रिययान्वित कयल जाय ताहि प्रसंग में अपन ठोस विचार कार्यकारिणी समितिक समक्ष प्रस्तुरत करथि। उपसमितिक सदस्यय लोकति एक स्वेरेँ अपन विचार कार्यकारिणीक समक्ष प्रज्ञतुत कायलनि जे मिथिलांचलक गौरव-गीमाक पुनर्राख्यारन आ नाट्यसाहित्यिक पुरातन परम्पुराकेँ पुनरूजीवित करबाक हेतु एहि मंच सँ नाट्यभिनयक परम्पाराक शुभारम्भा काय जाय। उपसमितिक विचार सँ सहसत भ’ कार्यकारिणी समिति जनमानसक हृदय में मातृभाषानुराग केँ जागृत करबाक निमित नाट्ययोजनक प्रयोजनीयताक आवश्यजकता अनुभव कयलक तथा एकरा क्रियान्न्पिन करबाक दिशा में प्रयासरत भेल।
समिति अपन प्रयोगवस्थाअ में नाट्ययोजनक शुभारम्भक नाटकाऍं नहि क’ कए एकांकी सँ करबाक निश्चजय कयलक, कारण ओहि समय मैथिली में अभिनयोपयोगी नाटकक सर्वथा अभाव छलैक आ एकहि नाटक केँ बारम्बायर अभिनीतकरण समुचित नहि बुझलका उपसमितिक ादज्ञस लोकति अभिनयोपयोगी एंकाकीक अन्वे ष्सतण करब प्रारम्भ कयलनि। अभिनयोपयोगी एंकाकीक हेतु मैथिलीक वरेण्यप साहित्यन-मनीषी लोकतिक संग सम्प्र्क साधल गेल। एहि दिशा में उपसमिति केँ सफलता भेंटलैक जे समकालीन मैथिली साहित्ये पर अपन अमिट छाप छोड निहार बहुविधावादी रचनाकार हरिमोहन झा (1908-1989) सँ सम्पिर्क साधल गेल आ हुनकाऍं अनुरोध कयल गेल जे एक एहन एकांकी अभिनेयार्थ समिति केँ उपलबध कराबथि जाहिमे मिथिलाक विद्या-वदायन्तााक गौरव-गाथाक उल्लेीख् हो। ओ समितिक एहि आग्रह केँ स्वीमकार क’ मण्डान मिश्र (1958) एकांकीक रचना क’ कए ओकर पाण्डुनलिपि समितिक तत्कागनीन पदाधिकारी लोकनिके उपलब्धग करौलथिन जे मिथिबाक अतीत केँ उद्भाषित करैछ जाहिसँ जनमासपरिचित भ’ सकथि।
अभिनयोपयुक्तह एकांकीक पाण्डु’लिपि उपलब्धप भेलाक पश्चा त् समितिक पदाधिकारी लोकति अत्याचधिक उत्सादहित भ’ निर्णय लेलनि जे अद्यपि मैथिली रंगमंच पर महिला अभिनेत्रीक भूमिका में मिथिलाव्चकल वा मिथिलेतर क्षेत्र में पुरूष अभिनेतहि द्वारा अभिनेत्रीक भूमिकाक निष्पालदन कराओल जाइत छल, ताहि परम्पथराक खण्डित करबाक दिशा में समिति सोचब प्रारम्भी कयलका ई अनुभ्वप कयल जाय लागलजँ महिला कलाकार उपलब्ध् भ’ जाथि तँ नाट्य मंचन विशेष स्वा भाविक भ’ जाघत। मुदा ई एक जटिल समस्याय छल। महिला कलाकार औतीह कतयऍं ? कोनो मैथिलानी मंच पर आबि अभिनय करथि से सोचनाइयो साहसक काज छल, तखन प्रस्तािव राखब आ मना क’ हुनका मंच पर उतारब आओर कठिन छल। समिति मैथिली रंगमंच पर एक क्रान्ति अनबाक दिशा में प्रयासरत भेज, कारण समितिक सतत प्रयास रहल अछि ले एहि मंच सँ एहन अभिनव कार्य कयलजाय जकर सुपरिणाम हैत जे जनमानसक हृदय में रंगमंचक प्रति आकर्षण भावनाक उदय होय तैक तथा नाट्य भिनय में स्वानभाविकता आओता कोनो मैथिलानी रंगमंचार आबि अभिनय करथि ई सोच बो निराधार छल। ई अत्यनन्तव साहसक काज छल, तखन किनको समक्ष एहन प्रस्ताीच रखाब आ हुनका मनाक’ मंच पर उतारब ओहूसँ कठिन छल। समिति सोचलक जे ओही मैथिलीनीक समक्ष प्रस्तामव राखल जाय जनिका हृदय में मैथिल संस्कृसतिक उत्कीर्षमय परम्पपरा में आयोजित होहत सांस्कृबतिक अनुष्ग’नवा कार्यक्रमक प्रति आकर्षण आ आगाध श्रद्धा होइत। समिति एहि विषस सँ पूर्ण परिचित छल जे हरिमोहन झा उदारवादी प्रगतिशील विचार-धाराक साहित्य -मनीषी छथितेँ समितिक पदाधिकारी लोकति हुनक आश्रय में उपस्थित भ’ अपन मलोभावना केँ रूपाचित करबाक निमित हुनका सविनय साग्रह अनुरोध कयलक जे एहि योजना केँ क्रियान्वित करबाक निमित कृपया अपन धर्म-पत्नीर सुभद्रा झा (1911-1982) केँ अपन एकांकी में भारतीक भूमिका में अभिनय करबाक अनुमति प्रदान कयल जाय। किछु क्षण में ओ इनस्तीत: क स्थिति में आबि गोलाह जे की कयल जाय ? ओ अपन रचनादि में मिथिलाव्च ल नारी जागरणक खंखनाद करैम रहथि तेँ ओ अपन उदारवादी दृष्टिकोणक परिचय दैत सहर्ण सांस्कृचतिक चेतना सम्पनन्नह, मैथिल समाजक समक्ष एहि चुनौती केँ स्वीाकार क’ कए युग-युग सँ आबि रहल बन्धकन केँ तोडि मंच पर अयलीह आ सुभद्रा केँ मण्डमन मिश्रक पत्नीु भारतीक भूमिका में रंगमंच पर उपस्थित हैबाक अनुमति देलथिन जे सर्वप्रथम मैथिलानी रंगकर्मीक रूप में मैथिली रंगमंच पर अवतारित भ’ एहि अवस्द्धन धाराक द्वार केँ भविष्याक हेतु खोलि देलनि जकरा एक ऐति‍हासिक घटना कहब समुचिंत हैत आ मैथिल समाजक हेतु प्रकाश स्तेम्भ‍ बनि गेलीह।
मैथिली रंगमंच पर सुभद्रा झा पदार्पण महिला रंगकर्मी में एक क्रान्ति आनि देलका चेतना समिति एवं रंगमंच हेतु ई एक ऐतिहासिक घटना भेलैक आ मैथिली रंगमंचक इतिहास में एक नव अघ्या य क शुभारम्भ भेलैक। हुनका सँ अनुप्राणित भ’ पटना विश्व विद्यालक स्नाततकोत्तयर विभागक एक छात्रा पनिभरनीक भूमिका में रंगमंच पर उपस्थिति दर्ज करौलनि ओ छलीह अहिल्याट चौधरी। एहि एकांकी अभिनय भेल छल लेडी स्टीगफेन्सत सहाल में। मण्डहन मिश्रक भूमिका में उतरस रहथि आयविर्तक उपसम्पा दक यदुनन्दटन शर्मा आ हुनक पत्नीण भारतीक भूमिका में सुभद्रा झा। पनिभरनीक भूमिका कथने रहथि अहिल्याप चौधरी आ ठिठराक भूमिकाक निर्वाह कथने रहथि इण्डियन नेशनक इन्द्र कान्तल झा।
बिगत शताब्दीलक षष्ठ दशकक उतरार्द्ध अर्थात् सन् ई. में चेतना समिझतिक रंगमंच पर एहि एकांकीक सफलतापूर्वक मंचस्थदकयलगेल तथा महिला रंगकर्मी अपन सहभागिता सँ एकरा अधिक प्राणवन्तय बनोलनि। सुभद्रा झा एवं अहिल्याल चौधरी क मैथ्रिली रंगमंच पर उपस्थिति आ हुनका सभक अभिनय कौशल एतेक बेसी प्रभावोत्पालदक भेल जे महिला वर्ग एहि कलाक प्रदर्शन में अपन कुशल कलाकारिताक परिचय देलनि जाहि सँ प्रोत्सालहित भ’ अधुनातन रंगमंच एतेक विकसित भ’ सकल अछि तकर श्रेय आ प्रेय हुनके लोकति केँ छनि। समाजक प्रति सोच, अपन उतरदरयित्वाक प्रति प्रतिवद्धता, त्यालग, सेवा-भावना आ कर्म निष्ठा क परिणाम थिकजे महिला रंगकर्मी सचेष्टिता, तत्पयरता आ अपन अभिनय-कौशलक परिचय द’ रहल छथि। मैथिली रंगमंचक इतिहास में एकर ऐतिहासिक महत्वर छैक।
समि‍ति द्वारा प्रस्तुात एंकाकीक मंचन अनेक दिन धरि पटनाक अतिरिक्ति अन्योि स्था न पर चर्चित-अर्चित होइत रहल, जाहिसँ अनुप्राणित भ’ समिति क पदाधिकारी लोकतिक विचार भेलनि जे प्रतिवर्ष विद्यापति सहित पर्पोत्सदव पर कोना-ने-कोनो एउकांकीक मंचन अवश्या कयल जाय, कारण जनमानसक अभिरूचि नाट्यमंचन दिस विशेष जागृत भेल आ अधिकाधिक संख्यान में जनमानसक सहभागिनी होमचलागल।
पुन: ऐतिहासिक पृष्ठकभूमि पर अधृत गोविन्दा झा लडडाक एकांकी वीर कीर्ति सिंहक मंयब कयल गेल जाहि में कीर्ति सिंहक अग्रज वीर सिंह क राजतिलक कराय हुनके हाथे कीर्ति सिहं केँ सिंहासनारूढ करसबाक जटिल समस्यां छल जे मौलिक एवं मातृस्ने ह क विलक्षण आदर्श केँ रंगमंच पर प्रस्तुकत करब कठिन समस्या् छल। एहू एकांकीक मंचन स्था नीय लेडी स्टीिफेन्स स हालक प्रागंन में भेल छल। समितिक तत्वसकालीन सचिव स्पकनारासण ठाकुर केँ आशंका छलनि जे ऐतिहासिकताक पृष्ठसभूमि में लिखित एकांकीक मंचन कठिन होइछ, तेँ बारम्बाुर ओकर असफलताक आशंका व्याक्त‍ करैत रहथि, किन्तुए संयोग सँ एकट प्रस्तुकति अत्यान्तब सफल भेलन दर्शकक मानस पहल पर एकर स्व स्थछ प्राव पडलैक। यद्यपि गणपति ठाकुरक महेँ असलान सँ दान रूप में प्राप्तब राज्ये स्वी कार करयबासँ हुनक उज्व्। यल वरित्र धूमिल भ’ जाइछ तथापि निर्देशक हुनक चारित्रिक उत्कार्ष केँ एकशन सँ प्रस्तुपत कयलनि।
सा‍माजिक पृष्ठ भूमि पर आधारित एकांकी गोविन्द झा क मोछसंहार (1965) फतोक घटना एहि रूपेँ विन्य।स्त‍ अछि जकरा मंच पर प्रस्तुआत करब ओहि समय में मंचीय-कौ-राजक अभाव रहित हुँ अत्यवन्तक सफलता पूर्वक ओकर मंचन भेला। एहि एकांकी में महिला अभिनेत्रीक अभाव छल तेँ एकर प्रस्तुमति में कोनो प्रकारक कठिनताक अनुभव निर्देशक केँ नहि भेजनि। एकर निर्देशन कथने रहथि गोपाल जी झा गोपेश (1931) मिथिलाक प्रतिनिधि (1963) एकांकीक मंचन से हो चेतनाक मंच पर भेल अछि जकर लेखक आ निर्देशन गोविन्दन झा स्वियं कयलनि। एहि में दू महिला अभिनेत्रीक छैक जकर अभिनय में महिला अभिनेत्रीक भूमिका में पुन: प्राचीन परम्पिरा केँ स्थाेवित कयल गेल जे पुरूषों द्वारा महिला अभिनेत्री भूमिकाक निर्वाह काओल गेल।
सन् 1962 ई. में चीनी आक्रमणक पृष्ठरभूमि में गोपालजी झा गोपेश लिखित गुडक चोट धोकड जानय तथा भारत-पाक युद्धक समय विनुविवाहे द्विरागत क मंख्नम चेतनाक तत्वालवधान में विद्यापति स्मृ ति पर्वोत्सुव पर मंचित भेल छल लेटी स्टी्फेन्सकस हालक प्रंत्गवन में। एहि प्रस्तुूति में भारती ब्लापक वर्क्सथक प्रोफाइटर मर्जुन ठाकुरक संगहि-संग नगीना कुमर एवं निरंजन झा महिला अभिनेत्रीक रूव में मंच पर उपस्थित भेल रहथि, पुरूष पात्र केँ महिलाक भूमिका में देखिक’ जनमानसॅ केँ कोनो आश्चनर्य नहि होइत छलैक एवं नायक-नायिकाक क्रिया-‍कलाप में मर्यादाक वचन पर कोनो आश्चॅर्य वा व्यमवधान नहि होइत छलैक। एहि अभिनय में भाग लेनिहार अन्या कलाकार में इण्डियन नेशानक बेचन झा. प्रियनारायण झा आ राजेन्द्रे झा प्रभूति अपन-अपन भूमिकाक निर्वाह सफलता पूर्वक कयलनि। उक्तय दुनू एकांकी में गीतगाइनिक भूमिका में कमला देवी एवं हुनक सरबी लोकतिक सहयोग चेतनाक मंच केँ उपलब्धी भेल छपैक।
चेतना द्वारा नियमित मंचक स्थािपनाक पूर्व विद्यापति पर्वोत्सिव पर जे एकांकी मंचित भेल ओ निम्न्स्थु अछि:
वर्ष एकांकी एकांकीकार
1958 मण्डकनमिश्र हरिमोहन झा
1959 मोछ सहांर गोविन्दं झा
1960 मिथिलाक प्रतिनिधि गोविन्दा झा
1961 धेराक सनेस गोविन्दं नारायण झा
1962 गूडक चोट धाकडे जानय गोपाल जी झा गोपेश
1965 वीर कीर्ति सिंह गोविन्द झा
1966 बिनु वि‍नोद द्विरागमन गोपाल जी झा गोपेश
उपर्युक्त परम्पुराक जे शुभारम्भन भेल छलैक ताहि में कतिपय अपरिहार्य कारणेँ व्ययतिक्रम भ’ गेलैक तथा समिति द्वारा रंगमंचक दिशा में जे प्रयास भेल छल ओ किछु अन्तभरालक पश्चा त् अवस्द्ध भ’ गेलैक।
किन्तुद ताराकान्ता झा (1927) जरक्त समितिक सचिवाचक पद भारग्रहण कयलनि तखन ओ एकर क्रियाकलाप केँ व्याकपक फलक पर अनबाक प्रयास कयलनि। हुनक सोच छलनि समितिक विविध आयोनादि एकहि स्थायन पर केन्द्रित नहि रहय: प्रत्युसत प्रचार-प्रसार क दृष्टिऍं पटनास्थय विभिन्नअ मुहल्लाल सभते एकर आयोजन केँ मूर्भ रूप प्रदान कयल जाया ओ अपन एहि योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक निमित अमरनाथ झा जयन्ती्क आयोजन कंकडबाग क लोहिया नगर में आयोजित करबाक निर्णय कयलनि जाहि में समिति केँ गजेन्द्रय नारायण चौधरी, वासुकि नाथ झा, गणेशशंकर खर्गा सदृश्या कर्मठ कार्यकर्ता उपलबध भेलैक
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नाट्यमंच
शनै:-शनै: चेतना समितिक अपन उतरोत्तिर विकास-यात्राक उत्थाणन वा उत्क्र्ष में पहुँचि विविध रूपैँ मिथिलाक सांस्कृधतिक एवं साहित्यिक विधा केँ सम्पो्षित करबाक दिशा में प्रयासरत भेल । ई अपन गौरवमय परम्प्राक अनुरूप विद्यापति स्मृेति तत्काषलीन अघ्येक्ष कुमार तारानन्द सिंह (1920-) एवं सचिव ताराकान्तृ झा सोचलनि जे समितिक गतिविधि अत्यािधिक प्राणवन्तं बनाओल जाय, कारण ओ लोकति यदूरदर्शी व्यलक्ति रहथि जनिका कार्यकाल में समिति कतिपय नव-नव योजना केँ क्रियान्वित करबाक प्रयास कयलक। मैथिली नाटक ओ रंगमंच केँ विस्तृकत एवं व्यायपक रूप देबाक निमित कार्यकारिणी समिति एक अनौपचारिक समितिक गठन कयलक जकर थींक टैंकक सदस्य‍ रहथि गजेन्द्र नारायण चौधरी, वासुकिनाथ झा (1940), छात्रानन्दर सिहं झा (1946) एवं गोलकनाथ मिश्र केँ अधिकृत कयल गेलनि आ एहि योजना केँ कोना मूर्त रूप देल जाय ताहि हेतु प्रस्तााव देबाक भार देल गेलनि जकयर सुपरिणाम भेल जे नाटक ओ रंगमंचक विकासार्थ रंगकर्मीक नाट्यमंच (1972) नामक एक प्रभावी प्रभाग क स्थाणपना कयलक जकर उद्देश्या भेलैक नवीन टेकनिक नाटकक अन्वे2षण ओकर मंचन तथा प्रकाशन। नाट्यायोजन केँ मूर्त रूप प्रदान करबाक उत्तर्दायित्वट देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छात्रानन्दय सिंह झा केँ मूर्त रूप प्रदान करबाक उत्तररदायित्व देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छात्रानन्दर सिंह झा केँ जे रेडियो सँ सम्बदद्ध रहथि आ नाट्यमंचक नकनिकक सैद्धान्तिक एवं व्यमवहारिक पक्षक अधिकारिक जानकारी छलनि। अत्याबधुनिक नाटक आ आ रंगमंच के दिशा में समिति क्रान्तिकारी डेग उठौलक जकर प्रयाससँ रंगमंच केँ नव-दिशा भेटलैक तथा नाट्यमंचनक परम्प राक शुभारम्भौ भेलैक समिति द्वारा।
नाट्यमंचक स्थाापनाक पश्चाभत् मौलिक नाट्य स्पयना हेतु प्राचीन एवं अर्वाचीन नाटककारक आहृन क’ कए नव-नव नाटकक अन्वे षणक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। एहि प्रकारेँ रंगमंचक एक सुदृढ परम्प राक स्थावपना भेल जे विद्यापति स्मृ्ति पर्व समारोहक अवसर पर वा समिति द्वारा आयोजित कोनो महत्वमपूर्ण अवसर पर नाट्यमंचनक एक सशक्तद माघ्यरम स्थाहपित भेल। समिति नाट्यमंच एक सार्थक भूमिकाक निर्वहण कयलक जकर लाभ नाटक कारक संगहि-संग रंगमंचकेँ निम्नवस्थम लाभ भेटलैक:
1. आधुनिक परिप्रेक्ष्यम में नवीन नाट्य-साहित्येक विकास यात्राक शुभारम्‍ीा।
1.2. आधुनिक तकनिकक रंगमंचक स्थाुपना।
1.3. राष्ट्री य एवं अन्तुर्राष्ट्रीमय स्त र पर मैथिली नाटक आ रंगमंच केँ स्थासपित करबाक प्रयत्न ।
1.4. अभिनेता-अभिनेत्रीक संगहि-संग कुशल निर्देशकक अन्वे षण।
1.5. नाटय-लेखनक दिशा में प्रतिभान नाटककार केँ प्रोत्सारहन।
1.6. अमंचित एवं अप्रकाशित नाटकक पाण्डुालिपि केँ आमंत्रितक’ कए विशेषश्रक अनुशंसा पर मंचना।
1.7. मंचनोपरान्तअ नाटकक प्रकाशन।
1.श्रीसम शताब्दीरक सप्तपदशकोत्तपर कालावधि में समिति क नाट्यमंच प्रभाग नाटक लेखक लोकनिसँ नव-नव प्रवृत्ति आ नव-शिल्पशक नाट्य रचनाक अनुरोध करब प्रारम्भ कयलक तथा मंचोपरान्तल ओकर प्रकाशनक भार वहन करबाक दायित्वक स्वीनकारलक। नाट्यमंच प्रभाग द्वारा विद्यापति स्मृ ति पर्वोत्स व बा अन्याशय कोनो आयोजनोत्सकव पर मौलिक, अनूदित वा उपन्या स वा कथाक नाट्य-रूप प्रस्तुकत करबाक परम्पशराक शुभारम्भन कयलकज नाट्यलेखन आ मंचनक दिशा में ऐतिहासिक घटना थिक ले नव-लव प्रतिभाशाली नाट्य-लेखक लोकत्ति केँ प्रोतसाहन भेटलनि तथा प्राचीन आ अर्वाचीन अभिनेता, अभिनेत्री आ निर्देशक लोकत्ति एकर प्रस्तुकति में सहभागी बनलाह। अभिनयोपयोगी आ मंचोपयोगी नाटकक जे अभाव साहित्याकन्तरर्गत छस तकर पूत्य र्थ समितिक नाट्य प्रभागक ई निर्णय निश्चित रूपेण नाट्य-लेखन ओंकर मंचन तथा ओंकर प्रकाशत्न‍ में नव-दिशाक संकेत कयलक।
1.चेतना अपन कार्यक्रम केँ व्यानपक बनयबाक हेतु पूर्व निर्णयापनुरूप सन् 1973 ई. में अमरनाथ झा जयन्तीं क आयोजन कंकडबाग कॉलनीक लोहियानगर में इैबाक निर्णय भेलैक तथा इहो निर्णय भेलैक जे एहि अवसर पर एक नाट्यभिनयक आयोजन कयल जाय जाहिये सहयोगी भेलाह वासुकिनाथ झा, गणेशशंकर सर्गा, अमरनाथ झा एवं छात्रानन्दयसिंह झा। जखन ई प्रचार भेलैक जेएहि कौलनी में अमरनाथ झा जयन्तीकक अवसर पर नाट्यभिनयक सेहो योजना छैक तखत कौलनीवासी सभक सहयोग पर्याप्तामा =11 से भेंटय लागलनि। ओहि अवसर पर जनमानसक मनोरंजनाथ हवेली रानी नाटकक मंचन भेल छल, जाहिमे रोहिणी रमण झा जे आब मैथिलीक नाटककार आ अभिनेताक रूप में चर्चित छथि अभिनेत्री रूप से रंगमंच पर उतरल रहथि। एहि नाट्य योजना में कतिपय सहयोगीक बल भेटल जाहि में उल्लेरखनीय छथि इण्डियन नेशनक इन्द्र कान्ति झा. मिथिलेन्दु एवं वेदानन्द झा जनसम्पेर्क विभाग का एहि आयोजनक ऐतिहासिक महत्वड छैक जे विहारक तत्कानलीन मुख्य मंत्री केदार पाण्डेेय एही मंच सँ विहार पब्लिक सर्भिस कमीशन में मैथिलीक स्वीवकृति आ मिथिला विश्वलविद्यालयक स्था पनाक उद्घोषणा कराने रहथि। प्रारम्भिकावस्थाम में अभिनयोपयुक्तआ नाटक अभाव रहलैक ओकरा संगहि-संग रंगमंच केँ नवरूप देबाक प्रयास कोलैक। समयाभावक कारणेँ समितिक नाट्यमंच प्रभाग द्वारा एकर प्रयोग प्रारम्भप में लैक दिगम्बार झा लिखित एकांकी हुरैत लोकऍं। पुन: समितिकेँ महिला अभिनेत्रीक अन्वेगषणक प्रक्रिया प्रारम्भग कयलक जाहि में ओंकरा कठिनताक सामना करय पडलैक, किन्तुह संयोग सँ रेडियोक अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम कुमारी भारती मिश्र तथा अभिनेकताक रूप से छात्रानन्दय सिंहझा, जगन्नाकथ झा, नरसिंह प्रसाद आ वेदानन्द झा क अविस्मररणीय सहयोगक फलस्वसरूप ई प्रदर्शन अत्यन्त न सफल भेल जाहिऍ आयोजक संगहि-संगसंयोगकक सेहो उत्सानहवर्द्धन भेलनि। एहि एकांकीक निर्देशन कराने रहपथि गणेश प्रसाद सिन्हाो तथा बिहार आर्ट थियेटर क संस्था पक अनिल कुमार मुखर्णीक अपरिमित तकनिक सहयोग भेटलनि। एहि एकांकीक मंचनक संगप्रथ में प्रथम आधुनिक रंगसंचक अवधारणाक एकरा बानगी प्रस्तु तभेल।
1.नाट्य संचक विधिवत स्थािपानोपरान्तग जनमानसक मनोवृति में नाटक आ रंगमंचक प्रति प्रतिवर्द्धताक संगहि संग नाट्यमंचनक हेतु प्रतीक्षानुसार रहब एक औत्सु कयक भावनाक उदय होइनहि समितिक पदाधिकारी लोकति एकरा प्रति अपन सचेष्टसता आ तत्पाेरता देखायब प्रारम्भह कयलनि तकरे परिणाम थिक जे नाट्य मंच मौलिक आ ानव तकनिकक नाट्यक हेतु अन्वेपषण करब प्रारम्भभ कयलका नाट्यमंचक संयोगक छात्रा नन्द सिंह झा केँ ई गुरूतर भाद देल गेलनि जे अग्रिम वर्ष चेतनाक नाट्यमंचक तत्वाकवधान से समसामचिक समस्या सँ सम्‍‍बन्धित एहन मौलिक नाट्य लेखक सँ सम्प र्क क’ कए नव तकनिक क नाटकक हेतु प्रयास करथि। एहि हेतु ओ हिन्दीगक वरिष्ठा नाटक कार आ मिथिला मिरिरक तत्काकलीन सम्पाुदक सुधाशु शेखू चौधरी (192क0-1990) सँ सम्प्र्क साधि हुनका सँ एक एहन नाटकक अनुरोध कयलनि जे जनमानसक हृदय केँ स्पशर्श कयनिहार हो। एहि प्रसंग में नाटककारक कथन छनि, आकाशवाणी पटनाक बटुकभाइक आ चेतना समितिक वर्तमान सचिव गजेन्द्र नारायण चौधरी ठोंठ मोकि हमरासँ भफाइत चाहक जिनगी जिचाा लेलनि आ हम मैथिली नाटककारक रूप में चीन्हचल आ जानल जा सफलहुँ। भफाइत चाहक जिनगीक आत्मन-कश्यर) ओ इनक अनुरोधमानि मैथिली में प्रथमे-प्रथस काल खण्डीा नाटक लिखलनि मफाइत चाहक जिनगी जकरा नाट्यमंचक तत्वांवधान में सन् 1974 ई. में शहीद स्मागरकक प्रांगण में प्रस्तु त कयल गेल जाहि में प्राय: पैंतीस हंजार सँ बेसी मैथिल समाजक छॉंटल-वीछल लोक दस साधि नाटककक एक-एक शब्दे पीबैत रहल, एक-एक दृश्यिकेँ अपलक देखैत रहल। एहि प्रदशनिक सफलता क प्रमुखकरण छलैक जे एहि प्रकारक नाट्यायोजन चेतना समिति द्वारा पूर्व में नहि भेल छल तेँ दर्शकेँ ई सर्वथा नवीनताक आभास भेंटलैक। नाटकक सफलता एहि में रहलैक ले अपेक्षित घ्वननि प्रकाशरस उपयुक्तथ यप्रेक्षागृहक अभावों में नाट्यमंच चुनल बीछल कलाकारक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूनप एकरा रूपाचित कयल जा सकल। अग्रिम वर्ष ओंकर प्रकाशनक व्य वस्थाि कयलगेलैक जकर परिणाम भेलैक जे जनमानसक जन-मन-रंजनक साधनक संगहि समकालीन समाज में व्याेप्तर बेरोजगारीक समस्यासक हृदयस्पतर्शी कथानक जनमानसक आकर्षणक केन्द्र बिन्दुल बनि गेलैक।
1.एहि प्रस्तुणति में सहभागी रहथि छायानन्दु सिंह झा, हृदयनाथ झा, वेदानन्दसझा, अशर्फी पासवान आजनवी, बन्धु , फल्लातझा, परमानन्दह झा, चन्द्र्प्रकाश झा, मोदनाथ झा, मनमोहन चौधरी, शम्भुोदेव झा, रामनरेश चौधरी, प्रेमलता मिश्र प्रेम, कुमारी रमाचन्द्र कान्ति, सुरजीत कुमार एवं सुनील कुमार अपार जन समुदायक उपस्थिति में ई नाठक प्रशंसिते नहि; प्रत्युनत बहुतो दिन धरि चर्चाक विषय बनस रहस। नाटकक सफलता में नाटक में कलाकार लोकतिक ओ अदस्य् उत्सानहक संग-संग बिहार आर्ट थियेटर बिहार. जन सम्पलर्क विभाग आ भारत सरकारक संगीत एवं नाटक विभागक कलाकार लोकतिक सहयोग केँ अस्वीाकारल नहि जा सकैछ।
1.वस्तुकत: एहि प्रस्तुैतिक सफलताऍं समितिक पदाधिकारी लोकति पुन: हुनका सँ एक नव नाटकक रचनाक अनुरोध कयलक। आधुनिकताक सन्दकर्भ में एक सेटक नाटक में सुधांशु शेखर चौधरी क कथा-वस्तु। मूल प्रवाह संग-संग एक वा एकसँ अधिक अन्तुर प्रवाहक प्रयोग रहल अछि। ओ नाट्य मंचक संयोजक छात्रानन्दन सिंह झा क प्रस्तुंति सँ एतेक प्रभावित भेलाह जे अपन दोसर नाटक दहैत देवाल। लेटाइत ऑचरक रचना क’ कए हुनका देलथिन प्रस्तु ति करवाक हेतु। पुन: एहू काल-खण्डी् नाटकक प्रदर्शन एतेक प्रभावकारी भेल आ जनमानस नव नाट्य प्रस्तु‍तिक हेतु वर्णभार प्रतीक्षातुर रहय लागल। एहि प्रकारेँ नाट्यमंच नाटक आ रंगमंच क दिशा में अपन डेग आगू बढबैत गेल। नाट्य-प्रदशनिक सफलताक पाछॉं नाट्याभिनय अपार जनमानसक समक्ष भेल। एहि नाटक में प्रतिभगी कलाकार लोकति में हृदयनाथ झा, मोहनाथ झा, अशर्फी पासवान अजनबी, शंभुदेव झा, रामनरेश चौधरी, सत्ययनारायण राडत, वीरेन्द्रश कुमारझा, फन्नदत झा, बलाशंकर चौधरी, सुनीलकुमार झा, वीरेन्द्र कुमारझा, फन्न,तझा, रामनरेश चौधरी, सत्यदनारायण राडत, वीरेन्द्र कुमारझा, फन्ननतझा, बलाशंकर चौधरी, सुनील कुमार झा, कल्पनाकदास एवं प्रेमलता मिश्र प्रेम। एहि नाट्ययोजनक सब श्रेय कलाकार लोकतिक परिश्रमिक संगहि-संग बिहार आर्ट थियेटर एवं जन सम्पंर्क विभागक कलाकारकेँ रहलनि।
1.चेतना समितिक ई अभिनव प्रयास भेलैक जे मिथिलाव्चएलक पुरातन सांस्कृितिक विरासत तथा नाट्य साहित्यपक अविच्छिन्नप स्मृजद्धिशाली आ गौरवशाली परम्प्रा में एक नव प्राणक स्पबन्दरन भरबाक निमित नियमित रूपेँ प्राचीन एवं अर्वाचीन प्रतिभाशाली नाट्य-लेखकक आहवानक कए नाट्य –लेखनक दिशा में प्रोत्सा हन, मंचोपरान्तन ओंकर प्रकाशनक व्यकवस्थित परम्पेराक व्यसवस्था् कयलक सन् 1973 ई. सँ जे जनमानसक मनोरंजनक संगहि-संग नाट्य-साहित्यिक साबर्द्धनक दिशा में गतिशील भेल जे विद्यापति स्मृनति पर्वोत्सअव पर संगहि-संग अमरनाथ झा, हरिमोहन झा, ललितनारायण मिश्र एवं जयनाथ मिश्र जयन्तीकक अवसरपर मौलिक, अन्यय भारतीय भाषाएं अनूदित वा मैथिलीक प्रसिद्ध उपन्यालस वा कथाक नाट्य रूपान्तीरणक परम्पचराक शुभारम्भय कयलक जे अद्यपर्यन्ति अव्याउहत रूपेँ चलि आबि रहल अछि। एकर सुपरिणाम एलबा अवश्यक भेलैक जे अद्यापि निरस्थत नाटकक मंचन समितिक तत्वा धान में भेल अछि जकरा ऐतिहासिक घटना कहब विशेष समुचित हैत, कारण भंगिमा (1984) केँ छोडि क’ मिथिला अचल बा मिथिलेतर क्षेत्रक कोनो नाट्य संस्थास अर्द्भाव एतेक परिभाषा में नाट्यायोजन नहि क’ सकल अछि। एकरा द्वारा रचित नाटककेँ विविध काल-खंड में सुविधानुसार विभन्ना दशक में प्रदर्शित नाटकक तिथिक अनुसारेँ कयल जा रहल अछि।
1.अमरनाथ झा जयन्तीुक आयोजन पर महेन्द्रा सलंगिया (1946) क ओकरा आडन्निक बारहमासा, गुणनाथ झाक पाथेय, गंगेश गुंजन (1941) क चौबरियापर। बुधिबधिया एवं रोहिणी रमण झा क अन्तिम गहना, हरिमोहन झा जयन्ती पर हुनकहि द्वारा लिखित एकांकी अयाची मिश्र (1956), हुनक प्रसिद्ध कथा पॉंच पत्रक एकल अभ्निय एवं छात्रानन्दी सिंह झा क आदर्श कुटुम्बि कनाट्य रूपान्तहरण, ललित नारायण मिश्र जयन्तीए पर तन्त्र नाथ झा (1क909-1974) क उपनयताक भोज (1949) एवं अरविन्दर अक्कूी गुलाब घडी तथा जयनाथ मिश्रक जयन्ती( पर हरिमोहन झा क प्रसिद्ध कथा कन्या क जीवन क नाट्य रूपान्त्रण विभूति आनन्द द्वारा तितिर दाइ कँव मंचस्थम कयल गेल जकर विवरण निम्ना स्थन अछि:
1.
विपरीत शताब्दीसक अष्टिम दशक में मंचित एकांकी/नाटक:
तिथि नाटक नाटककार अभिनीत स्थामन अवसर निर्देशक
10 नवम्बनर 1973 ढठैत लोक दिगाम्ब र झा शहीद स्माारक विद्यापतिपर्ण गणेशप्रसाद सिन्हाँ
10 नवम्बनर 1974 मफाइत चाह जिनगी सुधांशु शेखर चौधरी शही स्माारक विद्यापतिपर्ण गणेशप्रसाद सिन्हान
18 नवम्बनर 1975 ढहैत देवाल/लेटाइत ऑंचर सुधोंशु शेखर चौधरी शहीद स्मािरक विद्यापतिपर्व गणेशप्रसाद सिन्हार
6 नवम्बणर 1976 पसिझैत पाथर रामदेव झा शहीद स्माधरक विद्यापतिपर्व नवीनचन्द्रासमिश्र
6 नवम्बणर 1976 एक दिन एकराति सीतासमझा श्याीम शहीद स्मावरक विद्यापति पर्व रवीन्द्र नाथ ठाकुर
23 नवम्ब्र 1977 एकरा अन्तरर्यात्रा जर्नादन राय शहीद स्मासरक विद्यापति पर्व जनार्दन राय
25 नवम्ब्र1977 इन्टतरव्यू जनार्दन राय शहीद स्मायरक विद्यापति पर्व जनार्दन राय
25 नवम्ब्र 1977 सिहर्सल रवीन्द्र नाथ ठाकुर शहीद स्मासरक विद्यापतिपर्व रवीन्द्र नाथ ठाकुर
25 नवम्ब्र 1977 ओझाजी दमन कान्त झा शहीद स्माहरक विद्यापती पर्व रवीन्द्र नाथ ठाकुर
14 नवम्ब्र 1978 पाहि सॉंझ सुधॉंशु शेखर चौधरी शहीद स्माहरक विद्यापतिपर्व अखिलेखकर
14 नवम्ब्र 1978 हॉस्टसल गेस्ट सच्चिदानन्दो चौधरी शहीद स्मािरक विद्यापति पर्व सच्चिदानन्दन चौधरी
25 फरवरी 1979 ओंकरा आडव्नंक बारहमासा महेन्द्र मलंगिया आइ. एम. ए. हॉल अमरनाथ झा जयन्तीव अरिवलेरवर
4 नवम्बरर 1979 ओंकरा आडव्त क बारहमासा महेन्द्र मंलगिया शहीद स्मािरक विद्यापतिपर्व अखिलेखर
4 नवम्बरर 1979 चानोदाइ उषाकिरण खाँ शहीद स्माहरक विद्यापति पर्व अखिलेखर
22 नवम्बीर1980 एक कमल नोइ में महेन्द्र मजंगिया शहीद स्माखरक विद्यापति पर्व अखिलेखर
एहि दशक कालावधि में कुल पन्द्र7ह एकांकी/नाटकक प्रस्तुकति कयल गेल जाहि में पॉंच नाटक आ शेष दस एकांकी अवधि। एहि दशाब्द्क अन्तहर्गत ख्याटति अर्जित कयलक भफाइत चाहकजिनगी, ढहैत देवाल। लेटाइत ऑचर पहिल सॉंझ एवं ओंकरा आडव्नरक बारहमासा कारण नाटककार सामाजिक परिप्रेक्ष्यतकेँ घ्यारन से राखि क’ एकर कथानक संयोजन कयलनि जे जनमानस पर अपन अमिट छाप छोडवसि सहायक सिद्ध भेल। उपर्युक्त नाटकादिक कथानक दुतगासिता, घटना-उपघटनादिक विस्ता रक संग समन्वित क’ कए नाटककार नाटककार नाट्यसाहित्यालन्तार्गत तेहन मानदण्डे स्थाीपित क’ देलनि जे में अन्यकतम भ’ गेलाह। एहि संस्था् द्वारा जखन जखन नाट्यायोजन कयल गेल तखन-तखन दर्शकक रूप में सम्पू र्ण मैथिल समाज उनहि आयल जे एकर लोक प्रियताक प्रतिमान थिक।


Reply06/08/2009 at 09:50 AM
2

Usha Yadav said...
chetna samitik nik karya sabhak varnan adbhut, sabh te okara aai kalhi apshabda kahaba me lagal chhathi
Reply06/07/2009 at 12:15 PM
3

मनोज.सदाय said...
chetna samitik natmanchak nik shodhpoorna jankari

कथा-नदी

सुभाषचन्द्र यादव-

चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द

सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।

परलय
बुझाइत रहै जेना सतहिया लाधि देलकै । धाप परक पटियापर बैसल बौकू कखनसँ ने पानिक टिपकब देखि रहल छल । बैसल-बैसल ओकर डाँड़ दुखा गेलै । ओ नूआंक गेरूआकेँ सरिऔलक आ आँखि मूनि पड़ि रहल।
माल-जाल भूखे डिरिया रहल छलै । बुनछेक होइतैक तऽ कने टहला-बुला अबितिऐक । माल-जाल थाकि-हारि कऽ निंघेसमे मुँह मारि रहल छलै आ बीच-बीचमे एकाध टा घास टोंगैत रहै । काल्हि दुपहरेसँ पानि पड़ि रहल छलै । बेरूपहर घास नहि आनि भेलै, ने माल खोलि भेलै । दुनू बड़द आ गाय आफन तोड़ि रहल छलै आ खुराठि कऽ कादो कऽ देलकै ।
थकनी आ चिंतामे डूबल-डूबल अचानक बौकूक भक टुटलै तऽ लागलै जेना बोह आबि गेलै । बोह एहने समयमे उठै छलै । साओन-भादोक एहने झाँटमे पानि बढ़य लगै आ जलामय कऽ दैक ।
ओ हाक पाड़ि पड़ोसिया सँ पुछलकै जे पानि तऽ ने बढ़ि रहल छैक । 'धार उछाल भऽ गेलैक ’-पड़ोसिया कहलकै । ओकर मन आशंकित भऽ गेलै । धार उछाल भऽ गेलै, एकर मतलब जे आब पानि पलड़तै । बाध-वन, खेत-पथार, घर-दुआर सभ किछु डूबि जेतै । माल-जाल भासि जेतै । लोक-बेद मरतै । समय तेहन विकराल छैक जे लोककेँ प्राण बचायब कठिन भऽ जेतै । भोरे सँ कार कौवा टाँसि रहल छैक । पता नहि की हेतै ।
'बाबू हौ, माय कोना-कोना ने करै छैक ।'-बौकूक बेटी पलसिया घबरायल आ व्याकुल स्वरमे ओकरा हाक देलकै । बौकूक कलेजा धकसिन उठलै । भेलवावाली केँ भोर सँ रद्द्-दस्त भऽ रहल छलै । बौकू धड़फड़ायल पानिमे तितैत आँगन गेल । भेलवा वालीक पेटमे आब किछु नहि छलैकजे मुँहसँ बाहर अबितिऐक । लेकिन जी फरिया रहल छलै आ ओ-ओ करैत कालबुझाइ जेना पेटक सभटा अँतड़ी बहरा जेतै । औक बन्न भेलापर ओ कहरय लगै । ओकर टाँग-हाथ सर्द भऽ गेल छलै ।
'हाथ-गोरमे तेल औंस दही आ सलगी ओढ़ाय दही ।’- भेलवा वालीक नाड़ी टेबैत बौकू पलसियाकेँ कहलकै । पलसिया मायक पैर ससारय लगलै आ बौकू चिंताक अथाह समुद्रमे डूबल बैसल रहलै । बौकूकेँ बुझेलै जेना ओकर घर आ बाहर दुनू छिड़िया गेलै आ ओकरा बूते आब कोनो चीज समटब पार नहि लगतै ।
भेलवा वाली सूति रहलै । नट्टा आ ललबा भूखसँ लटुआ गेलै। तीतल धुँआइत जारनिसँ पलसिया मकइक फुटहा भूजऽ बैसलै । दुनू छौड़ा चूल्हि लग बैसल खापड़ि दिस ताकि रहल छलै आ नीचामे खसैत लावा बीछि-बीछि खाय लगलै । 'उतरबरियाबाधमे पानि भरि गेलै ।'- बाध सँ घूरल देबुआ हल्ला कऽ रहल छलै ।
सभ चीज नाश भऽ जेतै । बौकूकेँ एहि बेरूका लच्छन नीक नहि बुझाइत रहै । पछिया परक झाँट आ कोसीक बाढ़ि सभकेँ लऽ कऽ डूबि जेतै । एहि टोल कि पूरा गामेमे ककरो नाह नहि रहै \ माल-जाल, धीयापूता आ बिमरियाहि घरनीकेँ लऽ कऽ एहन विकराल समयमे ओ कतऽ जेतै ? बौकूकेँ किछु नहि फुराइ जेना ओकर अकिल हेरा गेल होइ ।
माल-जाल डिकरैत रहै । बौकू गठुल्लामे ढुकलै आ किछु फुफड़ी पड़ल मटिआइन ठठेर बीछि कऽ ओगारि देलकै । तीनू टा माल कतहु-कतहु सँ पात नोचऽ लेल मूड़ी मारऽ लगलै आ डाँटकेँ खुरदानि देलकै ।
पानि बढ़िते गेलै । बीच-बीचमे लोक सभ पानि बढ़बाक हल्ला करै । नाहक इंतजाम करबा लेल रामचन सभकेँ कहने फिरि रहल छलै । घरसँ निकलै वला समय नहि रहै । एहन समयमे के आ कतऽ नाहक इंतजाम करतै ? कखनो काल बौकूकेँ लगै जे रामचन बलौं लोककेँ चरिया रहल छैक । किछु नहि हेतै । धार खाली फूलि गेल छैक। थोड़ेक पानि अऔतै आ सटकि जेतै । रामचनक घरमे अनाज-पानि कनेक बेसी छैक तेँ ओकरा नाहक एतेक फिकिर छैक । लेकिन के कहलक-ए ! ओकर विश्वास कपूर जकाँ तुरन्ते उड़ि गेलै ।
मेघ पतरेलै आ कने कालक लेल बुनछेक भऽ गेलै । बच्चासँ लऽ कऽ बूढ़ धरि गामक समस्त लोक पानि देखबा लेल घरसँ बाहर आबि गेलै । उत्तरभर सगरे पानिए-पानि देखाइत रहै । बस्ती दिस जे पानि दौड़ल आबि रहल छलै, तकरा धीयापूता सभ हाथ आ बाँहि सँ रोकैत रहै । पानिक धार कने काल धरि बिलमिकेँ जमा होइत रहै आ तकर बाद हाथ आ बाँहिकेँ टपैत आगू बढ़ि जाइक । छौंड़ा सब आगू जा कऽ फेर पानिकेँ घेरै । बान्ह-छेककेँ टपैत पानि फेर आगू बढ़ि जाइक । पानिक ताकतक सोझाँ छौंड़ा सभ हारि नहि मानय चाहैत रहय । पानि खरहू सभक लेल कौतुक आ खेलक वस्तु बनि गेल छलै, लेकिन सियानकेँ आतंकित कऽ रहल छलै ।
'बाप रे ! वेग देखै छिही ? ई पानि जुलूम करतै ।’- करमान लागल लोक दिस तकैत भल्लू बुढ़बा बजलै । कोसीक उग्र रूपकेँ लोक सभ अनिष्टक आशंका आ आश्चर्यक भाव सँ देखि रहल छल आ अपना-अपना हिसाबेँ टिप्पणी कऽ रहल छल ।
बैकू माल खोलि दछिनबरिया बाध लऽ गेलै । थोड़बे कालमे बहुत चरबाह जुटि गेलै । बाढ़ि आबि गेलापर माल-जालक लेल कोन स्थान सुरक्षित हेतै, ओ सभ ताहि दिआ गप्प कऽ रहल छल । मुदा सभक नजरि उत्तर दिस जमल रहै, जेम्हबरसँ पानि आबि रहल छलै । बरखा फेर हुअय लगलै। आब बाढ़ि आबि कऽ रहतै । ओ सभ दुश्चिन्ताक बोझ तर दबल आ बरखामे तितैत चरबाहि करैत रहल । गामपर हल्ला होमय लगलै । एकर मतलब जे घर-आँगनमे पानि ढ़ुकि रहल छलै । ओ सभ मालकेँ गाम दिस रोमलक । आगू बढ़ला पर देखलक पानि बहुत वेगसँ दौड़ल अबैत रहए आ जल्दिए दछिनबरियो बाधकेँ पाटि देतै ।
बौकू गाम पहुँचल तऽ देखलक दुआरि-अँगनामे भरि घुट्टी पानि लागि गेल छैक । छपछपाइत गोहालीमे मालकेँ जोड़ि ओ भेलवा वालीकेँ देखय आँगन गेल । साँझ पड़ि रहल छलै । झाँटमे अतिकाल रहलाक कारणे ओकर सौंसे देह भुटकल आ थरथराइत रहै । ओ धोती फेरलक आ चद्दरि ओढ़ि चूल्हि लग बैसि गेल। चूल्हि पर पलसिया मकइक खिचड़ी टभकाबैत रहै । घरमे धुइयाँ औनाइत रहै आ बाहर निकलऽ लेल अहुँछिया काटि रहल छलै । बौकूकेँ बुझेलै जेना कोसी तर मे रहनिहारो धुइयाँ छिऐ जे बाढ़िसँ घेरायल चकभाउर दैत रहैत छैक आ रस्ता नहि भेटला पर पानिमे बिला जाइत छैक । चूल्हि फुकैत-फुकैत पलसिया बेदम भऽ गेल छलै ।
'आब की हेतै ?' भेलवा वाली पुछलकै । रद्द-दस्त बंद भऽ गेला सँ ओकर मन नीक भऽ गेल रहै । मगर कमजोरीक कारणे पड़लि छलि ।
'आब की हेतै ?' कोनो जवाब नहि भेटला पर ओ फेर पुछलकै ।
'जे सबहक हेतै, सैह हेतै, और की हेतै ? अखनि घर छोड़क कोनो बेगरता नहि छैक ।’ पलसिया बाप दिस एकटक तकैत सुनि रहल छलै ।
'सतबा सब परानीकेँ गोढ़ियारी लऽ गेलै ।' भेलवा वालीक स्वरमे उलहन छलै ।
'गोढ़िआरिए कोन ऊँच पर छैक ।' बौकू खौंझाय गेलै ।
'ओतय कटनियाँक डर तऽ नहि ने छैक ।' भेलवा वाली फरिछाबैत कहलकै ।
'भोर देखल जेतै ।' चिंता करैत-करैत बौकूमे चिंतनीय निरपेक्षता आबि गेल छलै ।
'पानि बढ़िए रहल छैक ।' भेलवा वाली जेना अपनेसँ गप्प करैत बजलै ।
आँगनमे आब भरि ठेहुन पानि भऽ गेलै । धीयापूता मचान पर सूति रहलै । तीतयवला सब वस्तुकेँ पलसिया सीक आ मचानपर राखि देलकै । माल-जाल पानि मे ठाढ़ भेल डिरिया रहल छलै । साँप-कीड़ाक बहुत डर रहै ।
धार हहाइत रहै । निसबद रातिमे कोसीक गरजब विकराल आ डराओन लागि रहल छलै । ओकर एकपरतार हहासमे एकटा दोसरे सुर-ताल छलै । कखनो धैर्य आ कखनो बेचैनी संगे बौकू ई संगीत सुनि रहल छल । ओ तबाही आ मृत्युक संगीत रहै । ओकर निन्न उड़ि गेल रहै । ओ कखनो बढ़ैत पानिक अंदाज करैत रहय; कखनो आँखि निरारि माल-जालकेँ देखैत रहय । कखनो कान पाथि विनाशकारी हहाससुनैत रहय । ओकरा होइक जेना घर लऽ दऽ कऽ कखनो बैसि जेतै । ओ चेहाय कऽ उठय आ आँखि फाड़ि-फाड़िघरकेँ देखय ।
'भागह हौ, बौकू भैया । घर कटि रहल छैक, भागह हौ ।' कमल चिकरैत रहै ।
बौकूकेँ हूक पैसि गेलै आ समूचा देह थरथराय लगलै । आब ओ कोना की करतै ? कोना सभक जान बचेतै ?
कमलक चिकरब सुनि भेलवा वाली हाकरोस कऽ उठलै—'हौ बाप ! ई घरेमे घेरिकऽ सभक जान मारि देतै । हे भगवान, रच्छा करह । हे कोसी माय, जान बचाबह । तोरा जीवक बदला जीव देबह । हे कोसी महरानी, बचाय लैह ।’
बौकूकेँ भेलवा वालीक अगुताइ पर पित्त उठलै । लेकिन लगले भेलवा वाली आ धीयापूताक लेल ओकरा अफसोच आ दुख भेलै । भेलै जेना सभकेँ कन्हा पर लऽ कऽ उड़ि जाइ, ऊपर, बहुत ऊपर आकाशमे ठेकि जाइ आ धार आ समुद्र केँ ठिठुआ देखबैत रही । लेकिन ओकर देह सिहरि उठलैक । भेलै जेना खसि पड़ब।
कटनियाँ अखन ओकरा घरसँ दूर रहै; लेकिन पानि घर ढुकि गेलै । कच्छाछोप पानि भऽ गेलै । पानिमे बहुत वेग रहै । अखन जँ ओ सभकेँ लऽ कऽ निकलै तऽ एहि रेत आ अन्हारमे सभ दहाय-भसिया कऽ मरि जेतै । आब भोरसँ पहिने किछु नहि भऽ सकतै ।
बौकूकेँ एको पलक लेल निन्न नहि भेलै । ओ दुनू ठेंगहुन केँ पजियाठने ओहि पर माथ टेकने बैसल रहय । उकस-पाकस आ कनेको हिलडोल करबाक कोनो इच्छा नहि भेलै । सभतरि मृत्यु आ विनाशक हाहाकार पसरल छलै । धीरे-धीरे ओकर आत्मामे विषण्ण शून्यता भरैत गेलै । मन पर उद्वेगरहित संवेदनशून्य शांति पसरि गेलै । आब ओकरा कोनो चीजक चिंता नहि रहलै \ भेलवा वाली, धीयापूता, मालजाल, कोसीक विध्वंस सभटा अर्थहीन भऽ गेलै । ओकर मोह टूटि गेल रहै । ओ कठोर पत्थर जकाँ अचल बैसल रहय ।
बरखा रूकि गेलै । आसमान साफ भऽ गेलै । किरिन फुटलै । ओकर फुटैत लाली देखि भेलवा वालीकेँ बुझेलै जेना कोसी महारानी ओकर गोहारि सुनि लेलकइ । ओ आशा आ उत्साहसँ भरि गेलि । ओ बौकू केँ हाक पाड़लक । बौकू कोनो उत्तर नहि देलकै जेना ओ अगम—अथाह पानिमे डूबल हो आ हाक सुनि ऊपर हेबाक जतन कऽ रहल हो । भेलवा वालीक दोसर हाक सँ बौकूमे स्पन्दन भेलै । ओ अकचकाइत मूड़ी उठौलक आ भकुआयल सन सभ चीजकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयास करय लागल।

1

रघुबीर मंडल said...
badhik vibhishikak varnan sajiv roop me paralay dvara
Reply06/08/2009 at 09:40 AM
2

Usha Yadav said...
परलय मे कोशीक परलय बड्ड नीक दर्शित भेल।
Reply06/07/2009 at 12:16 PM
3

मनोज.सदाय said...
koshi badhi par aadharit ehi kathak kono javab nahi
Reply06/06/2009 at 11:14 PM


उपन्यास
-कुसुम ठाकुर

प्रत्यावर्तन - (पाँचम खेप)
११

बोमडिला आबय समय हम सोचनहुँ नहि रहिये जे एतेक जल्दी हिनका सs भेंट होयत। हिनका देखि हमरा अत्यन्त प्रसन्नता भेल मुदा व्यक्त करय मे संकोच होयत छलs। इहो हमरा देखि कम खुश नहि छलथि आ नहि हिनका अपन प्रसन्नता व्यक्त करय मे देरी लागलैन्ह। बौआ के जायत देरी अपन खुशी व्यक्त कs देलाह।

हम हिनका सs गप्प करैत छलियैन्ह आ हिनक कॉलेजक विषय मे पुछति छलियैन्ह कि अचानक इ कहि उठलाह " हम सोचि लेने छी, सब मास अहाँ लग आबय के लेल छुट्टी लेब, ताहि सs नीक जे अहाँक नाम हम मुजफ्फरपुर मे लिखवा दी। प्रकाश(बौआ के नाम) एहि बेर सs बाबा लग रही कs पढिये रहल छथि। हम अहाँ कs बाबुजी सs गप्प करैत छियैन्ह। ओनाहुँ अहाँक काका कs बदली राँची सs भsरहल छैन्ह आ निर्मला कॉलेज मे अहाँ के हॉस्टल मे नहि लेत, कियाक तs ओ सब बियाहल के हॉस्टल मे नहि लैत छैक। द्विरागमन होयबा मे एखैन्ह कम सs कम डेढ़ साल छैक, अहाँक बाबुजी के कतय बदली होयतैन्ह नहि जानि। हम आब बेसी दिन अहाँ सs अलग नहि रहि सकैत छी। मुजफ्फरपुर मे भेंट तs होयत, आ बदली के चक्कर से नय रहत"। हम चुप चाप सुनि लेलियैन्ह, सोचलहुँ कॉलेज तs मुजफ्फरपुर मे राँची सs नीक नहि होयत मुदा हिनकर छुट्टी आ ऐबा जयबा वाला चक्कर समाप्त भs जयतैन्ह।

भोर मे बौआ के देखलियैन्ह जल्दी जल्दी तैयार भs गेलाह आ हिनकर खुशामद करय छलाह। हमरा मना कs देने छलथि हिनका सs सीढी के विषय मे गप्प करबाक लेल वा बतेबाक लेल जे कतेक सीढी छैक। जलखई के बाद हम, बौआ आ इ तीनू गोटे घुमय लेल निकलहुँ।जाड़ छलैक हम सब अपन अपन गरम कपडा पहिर लेने रही। सबस पहिने बाबूजी के ऑफिस पहुँचलहुँ ओ देखलाक बाद बौआ कहलाह चलु हम सब आओर नीचा चलैत छी। हम सब नीचा चलैत गेलहुँ, नीचा जाय मे तs बड नीक लागल। एक तs सीढ़ी नीक छलैक दोसर ढलांग पर उतरय मे ओनाहु नीक लागैत छैक। उतरय समय मे हम सब बुझबे नहि केलियैक जे कतेक नीचा जा रहल छी। हम सब मौसम आ प्रकृति केर आनंद लैत कखनहु कs बाजी लगा कs दौड़ति आ कखनहु कूदति नीचा उतरति गेलहुँ। अचानक इ कहलाह आब आगू नहि , आब एतय सsआपिस चलु। सड़क नजरि आबय लागल छलैक हम सब विचारि केलहुँ सड़क सsआपिस भेल जाय आ हम सब पहिने सड़क सs आ बीच बीच मे सीढी सs चढैत ऊपर जाय लगलहुँ।

ऊपर चढय समय सेहो शुरू मे तs नीक लागल मुदा जलदिये थाकि गेलहुँ। ततेक गरमी लागल जे एक एक कs अपन अपन स्वेटर उतारय परि गेल। ओकर बाद हम सब रुकि रुकि कs चलय लागलहुँ। घर पहुँचति पहुँचति हम सब ततेक थाकि गेल रही जे घर पहुँचति देरी इ तs सीधे बिछौन पर परि रहलाह। किछु समय बाद जखैंह इ भोजन करय लेल उठलाह तs बौआ हँसैत पुछलथिन "केहेन लागल बोमडिला "। सुनतहि हँसय लगलाह आ कहलाह "अरे अहाँ तs हमरा मारि देलहुँ आ पुछति छी केहेन लागल बोमडिला, हम आब किनहु अहाँ दुनु भाई बहिन संग पैरे घुमय नहि जायब "।

बाहर वाला घर मे बैसला सs गेट ओहिना नजरि आबैत छलैक आ गेट लग सीढ़ी छलैक जाहि सs ऊपर चढि आ फेर नीचा उतरि कs झरना लग जाय परैत छलैक ।झरना के बाद दाहिना दिस सीढ़ी छलैक जाहि सs नीचा उतरि बाबुजी केर ऑफिस जाय परैत छलैक । बाबुजी सब दिन भोर मे जायत समय आ खेनाई खाय लेल जखैंह आबैत छलाह तखैन्ह दुनु बेर ऑफिस पैरे जायत छलाह आ आपिस आबैत छलाह। इ सब दिन बाबुजी के ऑफिस जाय समय बाहर वाला घर मे जा कs बैसि रहैत छलाह। जाय समय बाबुजी हमरा कहैत गेलाह जे हम सब तैयार रही ओ ऑफिस जाय कsजीप पठा देताह आ हम सब सलारी जे कि बहुत नीक जगह छलैक ताहि ठाम सsआजु घुमि आबि। बाबुजी केर ऑफिस जाय समय हम जखैन्ह बाहर वाला घर मे गेलहुँ तs इ आ बौआ पहिनहि सs ओहि घर मे छलाह। जहिना हम पहुँचलहुँ बाबुजी गेट लग पहुँचि गेल छलाह, ओ जहिना गेट सs ऊपर गेलाह इ तुंरत कहि उठलथि ,देखू आब बाबुजी घुरताह, हम मजाक बुझि हँसय लगलहुँ मुदा सच मे बाबुजी किछुए आगू जा फेर आपस घर आबि गेलाह आ अपन कोठरी मे जा फेर ऑफिस गेलाह। हम पुछलियैन्ह अहाँ कोना बुझलियय जे बाबुजी आपस अओताह, तs हमरा कहलाह ओ तs सब दिन एक बेर ऑफिस जाय समय मे आपिस आबि कs जाय छथि। हम जहिया सs अयलहुं अछि हम देखि रहल छियैन्ह। बाबुजी के किछु नय किछु सब दिन छुटैत छैन्ह आ ओ आपिस आबि कs लs जायत छथि। हमरा हँसी लागि गेल आ कहलियैन्ह अहाँ के अहि ठाम कोनो काज नहि अछि तs यैह सब देखति रहैत छियैक।

आजु बाबुजी ऑफिस सs अयलाह तs आबिते सुनेलाह जे हुनक बदली के आदेश आबि गेल छैन्ह आ आब जलदिये हुनका जमशेदपुर जा कs ओहि ठामक कार्य भार सम्भारय परतैन्ह । इ सुनि हमरा बड खुशी भेल, संगहि देखलियैक बिन्नी सोनी बौआ सब खुश छलथि आ सब सs बेसी माँ खुश छलीह।

जहिया सs बाबुजी कहलथि जे हुनक बदली केर आदेश आबि गेल छैन्ह ओहि दिन के बाद सs बौआ हम आ इ सब दिन घुमय निकली, बीच बीच मे कोनो कोनो दिन सोनी बिन्नी सब सेहो सँग जायत छलिह। बोमडिला मे घुमय लेल एक सs एक जगह छलैक मुदा प्रदूषण नामक कोनो वस्तु नहि। दूर वाला जगह सब तs जीप सs जाइत छलहुँ मुदा लग वाला सब पैरे जाइत रही। एकटा बातक ध्यान इ सदिखन राखथि जे चलैत चलैत बेसी दूर नहि जाई।

हमरा लोकनि कs बोमडिला मे एक डेढ़ मास घुमति फिरति कोना बीति गेल से बुझय मे नहि आयल। जएबाक दिन लग आबि गेल छलैक, बाबुजी कहलथि जे सब गोटे एकहि सँग चारद्वार तक जायब। ओहिठाम सs ठाकुर जी आ बौआ मुजफ्फरपुर चलि जयताह आ बाकी हम सभ जमशेदपुर चलि जायब।

चारद्वार गेस्ट हाउस तक सब गोटे सँग अयलहुँ आ ओहि ठाम आबि एक बेर फेर बिछरय के आभास भेल मुदा एहि बेर दोसर तरहक छलs। मोन मे भेल आब तsकिछुए दिनक गप्प छैक तकर बाद तs सब ठीक भs जायत। हमर पढ़ाई आ हिनका अयबा जयबा मे सेहो कोनो तरहक दिक्कति नहि होयत। हिनकर ट्रेन पहिने छलैन्ह,जाय समय मे हमरा उदास देखि इ कहलाह " आब तs अहाँ जमशेदपुर मे रहब ओहि ठाम जाय मे हमरा कोनो दिक्कत नहि होयत। किछु दिन बाद हमर पढ़ाई सेहो खतम भs रहल अछि"।

जमशेदपुर पहुँचि बाबुजी के रहय लेल एकटा खूब पैघ सरकारी बंगला भेट गेल छलैन्ह जे कि किछु दिन सs खाली छलैक। जतबा पैघ घर छलैक ततबे पैघ ओहि मे बगीचा मुदा खाली कियाक छलैक से तs बाबुजी के नहि बुझय मे अयलैन्ह, मुदा माँ के ओहि घर मे रहय मे डर होयत छलैन्ह आ कहलथि "एहि घर मे बेसी दिन नहि रहल जा सकैत अछि। जाबैत कोनो दोसर नीक घर नहि भेटय छैक ताबैत एहि बँगला मे रहल जाय"। माँ सब के कहि देने रहथि जरूरी सामान मात्र खोलबाक अछि। ओहि बंगला मे कम सs कम छौ सात टा कोठरी छलैक जाहि मे सs दू टा कात वाला कोठरी आ भनसा घर खोलि हम सब रहय लगलहुँ। बाकी सब कोठरी बंद रहैत छलैक।

हम सब जमशेदपुर अयलहुँ ओकर दू तीन दिन बाद काका भेंट करय लेल अयलाह,हुनका देखि हम तs आश्चर्यचकित रहि गेलहुँ। एतबहि दिन मे ततेक कमजोर लागैत छलाह जे देखतहि माँ पुछलथिन "अहाँ के किछु होयत अछि की फूल बाबू"। काका कहलथि कोनो ख़ास नहि, बीच बीच मे पेट मे गैस भs जायत अछि जाहि के चलते दर्द होयत रहैत अछि।काका जाय लगलाह तs माँ काका के कहलथिन जे राँची जा कsसबस पहिने नीक सs डॉक्टर से देखाऊ, बराबरि दर्द भेनाई ठीक नहि छैक ।

हम सब ठीक दुर्गा पूजा सs पहिने जमशेदपुर पहुँचल रही । एक तs नब जगह ताहि पर तेहेन घर छलैक जे कतहु घुमय जाय मे से डर होयत छलैक, मुदा हम सब जमशेदपुरक पूजा देखलहुँ। दिवाली सs एक दू दिन पहिने इ पहुँचलाह। हिनका देखि कs सब भाई बहिन सब खुश भs जाय गेलथि आ इहो सब संग मिली कs दिवाली के पटखा कs तैयारी करय मे लागि गेलाह ।

दिवाली दिन साँझ मे पूजाक बाद सभ गोटे बाहर मे बैसि कs प्रसाद खाइत छलहुँ प्रसाद खेलाक बाद इ उठि कs पाछू गेलाह आ सँग सँग चारू भाई बहिन सेहो हिनके पाछू चलि गेलथि। माँ भानस मे लागल छलिह बाहर मे मात्र हम आ बाबुजी बचि गेलहुँ। अचानक पाछू वाला घर मे बुझायल जेना बम फुटैत छैक। बाबुजी आ हम दूनू गोटे दौरि कs भीतर गेलहुँ। माँ से भनसा घर स दौरि क अयलीह। जाहि दिस सsआवाज अबैत छलैक ओहि दिस घरक भीतरे सs हम सब गेलहुँ। बाबुजी घर सब खोलैत जओं बीच वाला हॉल लग पहुँचलाह तs सामने मे इ ठाढ़, संग मे बिन्नी, सोनी, अन्नू आ छोटू सब पटाखा छोरि थपरी पारि खुश होयत छलथि। असल मे इ, सब बच्चा के लs कs बीच वाला हॉल मे पटखा छोरैत छलाह। बीच वाला हॉल ततेक टा छलैक आ ताहि पर खाली जे छोटका पटाखा सेहो बुझाइत छलैक जे बम फुटल छैक। हिनका देखि बाबूजी किछु नहि बजलाह आ हँसैत आपिस भs गेलाह।
ओना तs जहिया सs हम सब जमशेदपुर अयलहुँ आ बाबुजी के बुझल भेलैंह जे काका के मोन ख़राब रहैत छैन्ह बराबरि राँची जायत छलाह आ काका के डॉक्टर लग अपनहि लs कs जायत छलाह, मुदा एहि बेरक गप्प किछु आओर छैक। पिछला बेर डॉक्टर एन.के. झा एक मास बाद आबय लेल कहने छलथिन आ कहने छलथिन जओं एक मास मे ओ दवाई काज नहि केलकैन्ह तs काका के जमशेदपुर वा बम्बई लs जाय परतैन्ह। काका के कोन बिमारी छैन्ह से राँची के डॉक्टर के पता नहि चलैत छलैक। एहि बेर बाबुजी सोचि के जायत छलाह जे जओं डॉक्टर साहेब कहलथि तs काका के जमशेदपुर लs अनताह। जमशेदपुर मे बाबुजी के एतबहि दिन मे डॉक्टर सब सs जान पहचान भs गेल छलैन्ह आ काका के विषय मे डॉक्टर सब सs गप्प सेहो कयने रहथिन।

बाबुजी राँची सs लौट कs अयलाह तs हमर हिम्मत हुनका लग जयबाक नहि होयत छल। बाबुजी सs की पुछियैन्ह, की कहताह इ सोचि रहल छलहुँ कि माँ अयलीह आ अपनहि कहलीह जे काका सब दू तीन दिन बाद आबि रहल छथि, आब एहि ठाम हुनकर इलाज होयतैन्ह। राँची मे डॉक्टर सब के नहि बुझा रहल छैक जे हुनका कोन बिमारी छैन्ह। इ सुनतहि हमरा मोन मे तरह तरह के आशंका होमय लागल।

काका, मौसी, मधु, पपू, निक्की आ सोनू सभ गोटे आबि गेलथि। काका के देखि हम हुनका देखितहि रहि गेलहुँ। पहिल दिन जमशेदपुर हमरा सब सs भेंट करय लेल आयल छलथि ताहु सs बेसी कमजोर लागैत छलाह। हमरा किछु नहि फुराइत छलs जे हम की बाजियैन्ह। काका हमर मोनक गप्प अपनहि बुझि गेलाह आ कहलाह "पेट मे बड दर्द होयत अछि आब एहि ठाम भैया लग आबि गेलहुँ आब ठीक भs जायब"।

भोरे बाबुजी काका के लs कs टाटा मेन हॉस्पिटल गेलाह। करीब १२ बजे बाबुजी असगरे अयलाह आ माँ सs कहलथिन जे" जयनंदन के check-up करय के लेल भर्ती कs लेलकैन्ह अछि। बेर बेर अनाइ गेनाइ मे दिक्कत होइतैक ताहि चलते भरती करा देलियैन्ह। सब जाँचक बादे डॉक्टर बतायत जे हुनका की छैन्ह आ कोन दबाई चलतैन्ह"। साँझ मे माँ आ मौसी सेहो बाबुजी के सँग काका सs भेट करय लेल गेलिह। मधु पप्पु सब घर पर हमरा सब सँग छलथि।

काका के एक सप्ताह सs बेसी भs गेल छैन्ह हॉस्पिटल मे मुदा अखैन्ह धरि जाँच चलिए रहल छैन्ह। बिमारी कोन छैन्ह सेहो नहि बुझल छैक। बाबुजी के आजु एक गोटे सs कहैत सुनलियैन्ह जे आब एहि सप्ताह मे सब टा जाँच खतम भs जयतैक, तकर बाद हुनकर इलाज आरम्भ होयतैन्ह।

मौसी सब दिन अपना सँग सोनू के लs जायत छलिह। आय माँ आ मौसी सँग मधु पप्पु सेहो काका सs भेंट करय लेल गेल छथि। हमर मोन सेहो छलs जेबाक मुदा एक संगे बेसी लोग गेनाइ ठीक नहि, हम सोचलहुँ दोसर दिन जायब। सब चलि गेलथि तs मोन से नहि लागति छलs। रहि रहि कs बाहर जायत छलहुँ देखय लेल जे माँ सब अयलीह कि नहि।

माँ सब हॉस्पिटल सs लौट कs अयलीह तs माँ भनसा घर दिस चलि गेलिह, मौसी अपन बच्चा सब मे लागि गेलिह मुदा बाबुजी एकदम उदास बुझेलाह। हम चाय लs कs बाबुजी लग गेलहुँ आ हुनका चाय दs धीरे सs पुछलियैन्ह "काका के मोन केहेन छैन्ह"। किछु समय तक तs बाबुजी किछु नहि बजलाह मुदा फेर कहलाह "मोन ठीक नहि छैन्ह, आब सब रिपोर्ट आबि गेलैक अछि । जयनन्दन के कैंसर छैन्ह, सेहो अन्तिम स्टेज मे। अहाँ के मौसी के नहि बुझल छैन्ह आ नहि हुनका किछु कहबैन्ह । आय सs दवाई सेहो शुरू भs गेल छैक"। बाबुजी के हम किछु जवाब नहि दs सकलियैन्ह आ ओहि ठाम सs चलि गेलहुँ।

माँ सs हम पहिनहि कहि देने रहियैन्ह जे आजु हम काका के देखय लेल अवश्य जायब। हॉस्पिटल पहुँचि काका लग गेलहुँ तs देखि बुझायल जेना काका आओर कमजोर भs गेल छथि। अस्पताल सs अयलाक बाद हमरा किछु नहि फुराइत छल जे की करी। राति मे हमरा किछु नहि फुरायल तs हिनका चिट्ठी लिखय लेल बैसि गेलहुँ आ काका के स्वास्थ्य केर विषय मे सबटा लिखि देलियैन्ह।

आय इहो पहुँचि गेलाह। बाबा के नहि कहल गेल छैन्ह , दादी के किछु आओर कही बजा लेल गेल छैन्ह। काका, काकी, पीसा, पीसी सब तs पहिनहि सs आबि गेल छथि। काका के मोन दिन दिन ख़राब भेल जा रहल छैन्ह इ देखि परिवारक सभ गोटे चिंतित छथि। अस्पताल सs अयलाक बाद मौसी आ दादी मन्दिर गेल छथि। बाबुजी आ बाकी परिवारक सभ गोटे बैसि कs गप्प क रहल छथि। हम बाहर मे बैसल छी कि अचानक बाबुजी के कहैत सुनलियैन्ह "टिस्को (TISCO) के प्रबंध निर्देशक केर पत्नी के सेहो जयनन्दन वाला बिमारी छैन्ह आ ओ अमेरिका सs इलाज करा कs आयल छथि। हुनको अमेरिका के डॉक्टर जवाब दs देने छैन्ह, आब ओहो एहि ठाम अस्पताल मे छथि आ एके डॉक्टर दुनु गोटे के इलाज कs रहल छैन्ह। दवाई सेहो एके परि रहल छैन्ह। आब तs मात्र भगवान पर भरोसा अछि"। इ सुनलाक बाद मोन आओर छोट भs गेल सोचय लगलहुँ पता नहि आब काका ठीक होयताह की नहि।

परिवारक सभ कियो जमशेदपुर मे छथि मुदा बाबा आ बौआ के किछु नहि बुझल छैन्ह। बौआ के मेट्रिक परीक्षा छैन्ह इ सोचि हुनका किछु नहि बतायल गेल छैन्ह। बिचार भेलैक जे इ मुजफ्फरपुर जयबे करताह परीक्षा समय मे बौआ लग चलि जयताह।

भोर मे मामा सभ अयलाह आ इ मुजफ्फरपुर चलि गेलाह। हमरा कहैत गेलाह जे मेट्रिक के परीक्षा तक ओम्हरे रहताह कारण सभ गोटे जमशेदपुर मे छथिन्ह जओं बौआ के किछु काज भेलैंह तs एको गोटे के लग मे रहबाक चाहि।
(अगिला अंकमे)
1

रघुबीर मंडल said...
bad nik lagal pratyavartanak ee khep
Reply06/08/2009 at 09:41 AM
2

Usha Yadav said...
मैथिली साहित्यमे प्रत्यावर्तन अपन एकटा फराक शान राखत से आशा अछि।
Reply06/07/2009 at 12:16 PM
3

मनोज.सदाय said...
cancer ke bimari te bujhu shodhi lait chhaik, pancham khep bad nik lagal
Reply06/06/2009 at 11:16 PM
4
अर्थात लोकतंत्रीय मुक्ति -श्यामल सुमन
तीन दिन पूर्व अपन निकटतम मित्र घनश्याम बाबू केर दुर्घटना मे मृत्यु भेलाक पश्चातआय गजानन बाबू चौपाल मे बैसल उदास रहथि। योग्य रहलाक बादो एक प्राइवेट स्कूल मेकम वेतन पर नौकरी करब घनश्याम बाबूक विवशता छल कियैक तऽ घर मे वृद्ध माता,पत्नी, विवाहक योग्य पुत्रीक अतिरिक्त शिक्षारत पुत्रक भरण पोषणक भार हुनके कमायपर। आय पूरा परिवारे बेसहारा भऽ गेल। एहेन घटना तऽ ककरो वास्ते दुखद होइते छैकलेकिन गजानन बाबूक दुख ताहि सँ बेसी बुझना जाइत अछि। जखन चौपालक लोक सबआग्रह करैत खोदि खोदि पुछलखिन्ह, तकर बाद पता चलल हुनक दुखक असली कारण।

दुर्घटनाक बाद घायल घनश्याम बाबू केँ अस्पताल आनल गेल आ डाक्टर देखतहिं मृतघोषित कऽ देलक। पुत्रक बाहर रहबाक कारणें अंतिम संस्कार तत्काल सम्भव नहि छल।गजानन बाबू आर लोक सब सँ विचार कय लाश केँ शीत गृह मे रखबाक प्रबंध करयलगलाह। लेकिन सरकारी अस्पताल - सीधा सीधी बिना घूसक एको डेग चलब मुश्किल।शीत-गृहक कर्मचारी बाजल - "जगह नहीं है"। गजानन बाबू स्थिति सँ उत्पन्न सम्वेदनादेखबैत, अपन सब ज्ञान, अनुभव लगाकऽ थाकि गेलाह किन्तु शीत-गृह कर्मी अपन रागबजबैत रहल जे - "जगह नहीं है"। गजानन बाबू परेशन छलाह। ताबत सरकारी तंत्रकमौन संकेत बुझनिहार एक नवयुवक आबि कर्मचारीक हाथ मे एकटा नमरी थमाबैतकहलखिन्ह - "अब तो जगह है न"? तत्काले जगह भेट गेल। लाश राखल गेल। काजभेलाक पश्चातो गजानन बाबू दुखी छलाह।

अगिला दिन पुत्रक आगमनक बाद पोस्टमार्टमक तैयारी होमय लागल। अस्पताल मेएम्बुलेन्सक सुविधा सेहो छल। जहिना आजुक समय मे सरकारी गाड़ी सँ सरकारक काजछोड़ि शेष सब काज होइत अछि तहिना अस्पताल केर प्रबंधकक घर मे प्रबंध करवाक हेतुएम्बुलेन्सक सार्थक उपयोग भऽ रहल छल। प्रबंधकक नाम पर अपन घरक प्रबंध करवा मेड्रावर साहेब सेहो संकोच नहि करथि। एम्बुलेन्सक कारणे देरी होमय लाग। एम्बुलेन्सआयल आओर ड्राइवर साहेब आबतहिं बजलाह - " अभी हम तुरत आये हैं, एक घण्टे केबाद दूसरे शिफ्ट का आदमी जायगा"। एतबा सुनतहि फेर शीत-गृह मे काज आयल वोयोग्य आधुनिक युवक अपन चमत्कार देखौलन्हि। पचास टाकाक एकटा नोट ड्राइवर साहेबकें दैत बजलाह -"अब चलिए"। ड्राइवर तत्काल तैयार भऽ गेल।

गजानन बाबू मित्रक विछोह, मित्रक परिवारक भबिष्यक चिन्ता सँ तऽ चिन्तिते छलाह,ऊपर सँ ई सब देख भीतरे भीतर छटपटावैत रहलाह जे नैतिकता, ईमानदारी कतऽ चलिगेल। पोस्टमार्टम हाऊस मे सेहो भीड़ छल। बेसी आत्महत्या आओर बेसी दुर्घटना हमरालोकतंत्रक बिशिष्ट बिशेषता अछि। किनारा जाऽ कऽ जखन सरकारी करमचारी सँजानकारी लेबाक कोशिश भेल तऽ वो असंवेदनशील प्राणी बाजल - "ये भीड़ तो आप देखही रहे हैं। सब इसी काम के लिए आया है। कोई राशन या वोट की लाइन तो है नहीं। औरमेरे दो ही हाथ हैं। आपका नम्बर जब आयगा तब देखेंगे"। लोक सब अनुमान करयलगलाह तऽ चारि घण्टासँ कम केर मामला नहि छल। ताबत धरि तऽ राति भ् जायत।सबकेँ चिन्तित देख पुनः वो योग्य युवकक योग्यताक काज उपस्थित भेल।येन-केन-प्रकारेण पाँच टा नमरी पर बात फरियायल आओर मरलाक बादो लाइन तोड़ि कऽघनश्याम बाबूक लाश केँ पोस्टमार्टम हाऊस सँ मुक्त कराओल गेल। गजानन बाबूक नैतिकशिक्षा, ज्ञान, अनुभव सबटा राखले रहि गेल। ककरा चिन्ता अछि जे मृतकक परिवार परकतेक संकट आयल अछि। अपन वेतनक अतिरिक्त बेसी सँ बेसी आमदनी करब सरकारीसेवकक युगधर्म अछि। एहि युगधर्मक पालन सरकारी सेवकगण अबाध गति सँ सम्पूर्णदेश मे कऽ रहल छथि। एहि क्रम मे पुलिस केँ सेहो यथायोग्य दक्षिणा देबय पड़ल।

थाकल हारल मृतकक स्वजन परिजन समेत गजानन बाबू श्मशान घाट एलाह। सब जगहसँ बेसी भयावह दृश्य छल। ओहनहियो श्मशान तऽ भयावह होइते छैक। किन्तु जेभयावहता लोक सब कें देखऽ पड़लन्हि वो आओर भयावह छल। जगहक वास्तें, लकड़ीकवास्तें, अस्थि कलश रखबाक हेतु एतय तक कि मृतकक मृत्यु प्रमाण पत्रक वास्तें सेहो,सब जगह नियुक्त कर्मचारीक नियमित काजक बदला मे अनियमित रूप सँ यथायोग्य टाका खर्च करय पड़लन्हि। एवम प्रकारें घनश्याम बाबू वर्तमान लोकतंत्रीय पद्धतिक जालसँ मुक्त भऽ स्वर्गारोहण केलाह। गजानन बाबू सोचि सोचि भावुक एवं चिन्तित छलाहसंगहि एक यक्ष प्रश्न सेहो ठाढ़ छल जे घनश्याम बाबू तऽ कहुना लोकतंत्रीय मुक्ति पाबिस्वर्गारोहण केलाह किन्तु हमर मुक्ति केर कोन रास्ता निकलत? हमर स्वर्गारोहण भऽसकत कीनहि?

गामक चौपाल सँ


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रघुबीर मंडल said...
shyamal suman ji se ehene lekha sabhak aaga seho aas rahat
Reply06/08/2009 at 09:41 AM
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Usha Yadav said...
श्यामल सुमन जीक लेखनमे धार आ नवीनता अछि।
Reply06/07/2009 at 12:17 PM
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मनोज.सदाय said...
gajanan babuk varnanak lathe bahut kichhu kahi gelahu shyamal ji, nik prastutui
Reply

१.विकासक पक्षमे आयल जनादेश: बाहुबल आ परिवारवादपर जनता कयलक चोट२.माध्यमिक परीक्षा परिणाम २००९-सोझाँ आयल ग्रामीण प्रतिभा
. नवेन्दु कुमार झा

पन्द्रहम लोक सभाक छठम चरण मतगणनामे इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनक सील खुजैत बिहारक जनताक जनादेश सोझाँ आयल। जनता अपन जनादेशक माध्यमसँ कतेको राजनीतिक महारथीकेँ चित्त कऽ एहि बातक सकेत देलक जे ओ आब जागरूक भऽ गेल अछि आ राजनीतिक दल द्वारा देल जा रहल धोखा आ झांसामे नहि आबयबाला अछि। देशमे कांग्रेस गठबंधनक पक्षमे आयल जनादेशक उनटा प्रदेशक जनता बिहारमे सत्तारुढ़ भाजपा जदयूक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनकेँ अपन समर्थन दऽ ई स्पष्ट कऽ देलक अछि जे विकासक प्रति नकारात्मक सोच राखयबाला केँ आब ओ बर्दास्त करबाक मूडमे नहि अछि। जातिवादक पर्याय बनि चुकल बिहारमे एहि बेर जातिक बंधन टूटल तऽ लालू प्रसाद आ राम विलास पासवान सन राजनीतिक महारथी धराशायी भऽ गेलाह। राजदकेँ कन्हा देबाक लेल जनता चारि टा सदस्य दऽ देलक मुदा प्रदेशसँ लोजपाक बंगला उजड़ि गेल। कांग्रेस अपन पुरान जनाधार दिस लौटल तँ भाजपा-जद यू अपन किलाकेँ आर मजगूत कयलक अछि।
सम्पन्न चुनावमे जनता अपन जनादेशक माध्यमसँ कतेको दिग्गज राजनीतिज्ञ आ बाहुबलीकेँ एहि बेर जवाब देलक अछि। जीतक रेकार्ड बनबऽ बाला लोजपा अध्यक्ष राम विलास पासवानक लेल एहि बेर संसदक दरबज्जा बन्द भऽ गेल। प्रदेशकेँ अपन आंगुरपर नचबऽ बला राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद अपन गढ़ पाटलिपुत्रामे परास्त भऽ गेलाह। फिल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा आ छोट पर्दाक सुपर स्टार कहल जाय बला शेखर सुमन जनताक विश्वास जीतयमे असफल रहलाह। अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर मजदूर नेताक रूपमे ख्याति प्राप्त समाजवादी नेता जार्ज फर्नान्डीसकेँ जनता जमीन धरा देलक।
एहि बेरक चुनावमे जनता बाहुबल आ परिवारवादपर जोरक झटका देलक। दबंग छविक सहारा लऽ अपन परिजनकेँ मैदानमे उतारि अपरोक्ष रूपसँ सांसदी करबाक मंसूबा राखय बाला नेतापर सेहो जनता चोट कयलक अछि। बाहुबली पप्पू यादवक माय शान्ति प्रिया आ कनियाँ रंजीता रंजन, आनन्द मोहनक कनियाँ लवली आनन्द, सूरजभान सिंहक कनियाँ वीणा देवी, शहाबुद्दीनक कनियाँ हेना शहाब, बाहुबली मानय जायबला प्रभुनाथ सिंह, मुन्ना शुक्ला, रामा सिंह, रामलखन सिंह, साधु यादव आ बिहारक सत्ताक चाभी लऽ कऽ घुमयबला राम विलास पासवानक भाइ रामचन्द्र पासवान आदिक बाहुबल आ परिवारवादपर जनताक जनादेश भारी पड़ल। हालाकि अपन दबंग छविक लेल जानल जाय बाला पूर्व मंत्री स्व. बृज बिहारी सिंहक कनियाँ रामा देवी चुनाव जीतयमे सफल रहलीह।
प्रदेशमे नीतीश कुमारक नेतृत्वमे सत्तारुढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार पछिला तीन वर्षमे न्यायक संग विकासक जे काज कयलक आ जाहि तरह प्रदेशक ध्वस्त भेल कानून व्यवस्थाकेँ पटरीपर अनबाक प्रयास कयलक अछि ओकर व्यापक असरि जनतापर भेल अछि आ एकर सुखद परिणाम भाजपा-जद यू केँ भेटल अछि। सरकार द्वारा कयल गेल प्रयासक परिणामस्वरूप आयल एहि जनादेशक बाद आन दलकेँ सेहो अपन सोच बदलबाक चेतौनी अछि। हालाकि प्रदेशक जनादेश देशक आन क्षेत्रक जनादेशक उनटा अछि। देशक आन प्रदेशमे गोटेक सभ ठाम जनता केन्द्रमे शासनक लेल कांग्रेसक नेतृत्व बला गठबंधनक पक्षमे जनादेश देलक अछि मुदा बिहारमे कांग्रेस आ ओकर पुरान सहयोगी राजद-लोजपाक हाल बेहाल अछि। प्रदेशमे कांग्रेस विरोधी गठबंधनकेँ बढ़त भेटलासँ एहिमे केन्द्रमे बिहारक वर्चस्व समाप्त भऽ गेल अछि। प्रदेश विकासक रस्तापर आगाँ बढ़ि रहल अछि आ एखन केन्द्रक मदतिक आवश्यकता अछि। प्रदेशमे मात्र अपन उपस्थिति दर्ज करा सकल कांग्रेसक नेतृत्व बला सरकारपर जनताक नजरि रहत जे ओ प्रदेशमे सत्तारुढ़ विरोधी दलक सरकारकेँ प्रदेशक विकासक लेल कोन तरहेँ आ कतबा मदति कऽ रहल अछि। प्रदेशक मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ सेहो आब चुनावी राजनीतिकेँ बिसरि केन्द्रसँ मदतिक लेल सकारात्मक पहल करय पड़त जाहिसँ विकासक काज तेजीसँ भऽ सकय आ देशक मानचित्र पर एकटा नब बिहार नजरि आबय।
प्रदेशक चुनाव परिणाम:
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन: जद यू:२०, भाजपा:१२
राजद-लोजपा गठबंधन: राजद:०४, लोजपा:००
कांग्रेस:०२
निर्दलीय:०२

मतदानक प्रतिशत:
पहिल चरण:४२.७३%
दोसर चरण:४४.२%
तेसर चरण:५२.८१%
चारिम चरण:३७.१४%

भोटक दलगत प्रतिशत:
राजद-१९.३०%
लोजपा-६.५५%
कांग्रेस-१०.२६%
जद यू-२४.०४%
भाजपा-१३.९९%
बसपा-४.४२%
भाकपा-१.४०%
माकपा-०.५१%
राकापा-१.२२%
आन दल/ निर्दलीय-१७.३४%
झा.मु.मो.-०.४५%
शिव सेना-०.४१%
जद एस.-०.०६%
आर.एस.पी.०.०४%
ए.आइ.एफ.बी.-०.०३%
एम.यू.एल.-०.०१%
भाकपा माले-१.८०%
दलगत जातीय स्थिति
जाति भाजपा जद यू राजद कांग्रेस निर्दलीय
राजपूत ०१ ०२ ०३ ०० ०१
यादव ०१ ०४ ०१ ०० ०१
भूमिहार ०२ ०२ ०० ०० ००
कुशवाहा ०० ०३ ०० ०० ००
मुसलमान ०१ ०१ ०० ०१ ००
वैश्य ०२ ०० ०० ०० ००
ब्राह्मण ०१ ०० ०० ०० ००
ब्राह्मण ०१ ०० ०० ०० ००
दलित ०१ ०४ ०० ०१ ००
कुर्मी ०० ०१ ०० ०० ००
कायस्थ ०१ ०० ०० ०० ००
अति पिछड़ल ०१ ०३ ०० ०० ००
महिला ०१ ०२ ०० ०१ ००


२.माध्यमिक परीक्षा परिणाम २००९
सोझाँ आयल ग्रामीण प्रतिभा

वर्ष २००९ क माध्यमिक परीक्षामे ग्रामीण प्रतिभा सोझाँ आयल। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा वर्ष २००९क परीक्षाक घोषित परिणाममे प्रदेशक सर्वोच्च अंक प्राप्त करय बाला बाइस परीक्षार्थीमे सँ एकैस टा छात्र राजधानी पटनासँ बाहरक छथि जाहिमेसँ बेसी ग्रामीण क्षेत्रक छथि। एहि वर्ष कुल ६८.२८ % परीक्षार्थीकेँ सफलता भेटल अछि। कुल ८८०७०६ परीक्षार्थी मे सँ ६०१३०५ परीक्षार्थी उत्तेर्ण भेलाह अछि जाहिमे ११७४६५ परीक्षार्थी प्रथम श्रेणीसँ २.८० लाख द्वितीय श्रेणीसँ आ १.८३ लाख तृतीय श्रेणीसँ सफल भेलाह अछि। सबसँ बेसी ८७.८१० प्रतिशत परिणाम नवादा जिलामे रहल तँ ८२.३०६ प्रतिशत परिणामक संग छपरा दोसर स्थानपर रहल। तेसर स्थानपर रहल जमूई जिलामे जतय ८१.३२८ प्रतिशत परीक्षार्थीकेँ सफलता भेटल। राजधानी पटनामे ६७.७०३ % परीक्षार्थी उत्तेर्ण भेलाह अछि। एहि वर्ष सारण प्रमंडल पहिल स्थानपर रहल जतय ७५.४२% परीक्षार्थी उत्तेर्ण भेलाह जखन कि सबसँ कम परीक्षार्थी ५९.०६ प्रतिशत कोसी प्रमंडलमे उत्तेर्ण भऽ सकलाह।
एहि वर्षक परिणाम ग्रामीण क्षेत्रक लेल उत्साह बाला रहय। सुविधा सम्पन्न शहरी क्षेत्रक विद्यालयक मोकाबला ग्रामीण क्षेत्रक परीक्षार्थी सफलताक परचम लहरौलनि। समिति द्वारा घोषित सर्वोच्च अंक आनय बालाक प्रतिभा सूची (मेरिट लिस्ट)मे ग्रामीण क्षेत्रक एकाधिकार रहल। समितिक १ सँ १० अंकक सूचीमे सम्मिलित बाईस परीक्षार्थीमे नौ टा छात्रा अपन उपस्थिति दर्ज करा छात्रेकेँ चुनौती देलनि अछि। सबसँ बेशी अंक आनि एहि वर्ष सर्वोच्च स्थान प्राप्त करय बाला आलोक कुमार (४४५ अंक) पटना जिलाक ग्रामीण क्षेरक हाई स्कूल पालीगंजक छात्र छथि। तेसर स्थानपर रहल बी आर् बी हाई स्कूलक छात्रा शुभांगी कुमारी (४३९ अंक) छात्रा वर्गमे सर्वोच्च स्थान प्राप्त कयलनि अछि। राजधानी पटनाक राजकीय बालक उच्च विद्यालय शास्त्रीनगरक छात्र धनंजय भारती (४३५ अंक) सातम स्थानपर कब्जा जमा राजधानीक प्रतिष्ठा बचौलनि अछि। बोर्डक टापर्सक सूचीमे गोटेक सभ छात्र ग्रामीण क्षेत्रक छथि जे ई साबित कऽ रहल अछि जे प्रतिभा ककरो मोहताज नहि अछि आ इमानदारीसँ प्रयास तथा लगनसँ मेहनति कऽ शहरी क्षेत्रक सुविधा सम्पन्न छात्रकेँ चुनौती देल जा सकैत अछि।
माध्यमिक परीक्षा २००९ परिणाम: एक नजरि

कुल परीक्षार्थी-८८०७०६
छात्रा-३५४५३९
सफल परीक्षार्थी-६०१३०५ (६८.२८%_
असफल परीक्षार्थी-२७५२९१ (३१.७२%)
प्रथम श्रेणी-११७४६५
द्वितीय श्रेणी-२.८० लाख
तृतीय श्रेणी-१.८३ लाख
सबसँ बेसी सफल-सारण (७५.४२%)
सबसँ कम सफल-कोसी (५९.०६%)
प्रमंडलक परीक्षार्थीक प्रदर्शन:
कोसी-५९.०६%
तिरहुत-६८.४६%
दरभंगा-६२.४४%
पटना-६७.६९%
भागलपुर-७३.९९%
सारण-७५.४२%
मगध-७५.६२%
पूर्णिया-६०.४९%
मुँगेर-७३.०५%




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रघुबीर मंडल said...
navendu ji majal patrakar chhathi, nik vishleshan
Reply06/08/2009 at 09:42 AM
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Usha Yadav said...
नवेन्दु जी बड्ड नीक लिखैत छथि, फरिछा कए
Reply06/07/2009 at 12:18 PM
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मनोज.सदाय said...
navendu jik chunavi vishleshan aa pariksha par aalekh dunu bad nik
Reply
कथा-
दृष्टिकोण

कुमार मनोज कश्यप
जन्‌म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

दृष्टिकोण

राजपत्रित पदाधिकारी के पद पर चयनक जे खुशी रजत के भेल छलैक से क्रमशहे एकटा अनजान भय मे परिणत होईत चलि गेलैक । मोन मे धुकधुकि पैसऽ लगलैक, कारण --- सरकारी कार्यालयक कार्य-प्रणाली आ कार्य-संस्कृति दुहू सँ अनभिग़्यता । जखन सँ श्यामबाबू अपन आंखिक देखल घटना सुनेलखिन ओकरा जे कोना एकटा किरानी धोखा सँ आधकारी सँ फाईल पर दस्तखत करा लेलकै आ बेचारा निर्दोष आधकारी फसि गेलैक ; तखन सँ रजत आर बेसी विचलित भऽ गेल आछ। दोसरो घटना ओहने सुनेने छलखिन ओ जे एकटा कर्मचारी घूस खा कऽ कोर्ट-केसक फाईल दबा देलकै आ एकपक्षिय फैसला सरकार के खिलाफ भऽ गेलैक आ कोना बेचारा आधकारी के परिणामस्वरुप सस्पेंड कऽ देल गेलैक। ई सभ सुनि रजत के लगलैक जे ओ कांटक ताज पहिरऽ जा रहल आछ़, अबूह लागऽ लगलै ओकरा। सोचैत-सोचैत डरे पसेना-पसेना भऽ गेल रजत, क़ंठ सुखाय लगलैक ओकर।

आईये योगदान करबाक छैक ओकरा। जँ-जँ समय लगीच आयल जा रहल छैक, तँ-तँ ओकर बेचैनी बढले जा रहल छैक। भीतर सँ सद्यः डेरायलो रहैत बाहर सँ कुबा देखेलक ओ। कँपैत डेगें तैयार भऽ ओ बाबूजीक पायर छुबि आशिर्वाद लेबऽ गेल। बाबूजीक पारखी आँखि सँ रजतक मनोदशा नुकायल नहि रहि सकलैक। माय-बाप आ संतान बीच सत्ये कोनो टेलिपैथी काज करैत छैक जे बिना मुंह खोलनहु सम्वेदनाक आदान-प्रदान करैत छैक। बगलक कुर्सी पर बैसबाक ईशारा करैत रजत के बुझाबऽ लगलाह - ''बाऊ! घबराईत कियैक छी? ई खुशी आ संगहि गर्वक बात आछ जे आहाँ भारत सरकारक एकटा उच्च पद पर आसीन होमय जा रहल छी। आहाँक योग्यताक पूर्ण परीक्षा कईयेकऽ आहाँ के ई जिम्मेदारीक पद सौंपल गेल आछ ।'' फेर पानक खिल्ली पनबट्टी सँ निकालि मुंह मे लैत आगू बजलाह- ''के पहिने सँ ऑफिसक काज सँ भिज्ञरहैत आछ? समय सभ कें सभ ज्ञान करा दैत छैक। अहाँ एतबा धरि करब जे आँखि आ कान दुहु खोलने रहब सदिखन। जतऽ कोनो प्रकारक परेशानी बुझाय तऽ सलाह लेबा मे कोनो टा संकोच नहि करब - चाहे ओ अहाँक मातहते कियैक ने हो!''

बाबूजीक बात सँ रजत के जेना कोनो दिव्य दृष्टि भेट गेलैक। लगलैक जेना मृग जकाँ कस्तुरी ओकरा संगे मे छैक आ ओ नाहक लोकक बात सुनि-सुनि चिंता मे पड़ल छल। एकटा मुस्की पसरि गेलै ओकर ठोर पर।

ऑफिस मे कार्य-भार सम्हारिते दर्शन भेलै फाईलक अम्बार सँ। उपर सँ एकटा फाईल उठा पढिकऽ बुझबाक प्रयास करऽ लागल; मुदा निष्फल। कतबो अपना भरि प्रयास केलक रजत मुदा नहि बुझबा मे एलई ओकर विषय-वस्तु आ ने आगूक प्रक्रिया । फेर खखसिकऽ उच्च स्वरे बाजल-''किनकर फाईल आछ ई? ई आँक़डा आहाँ कतऽ सँ लेलंहु?''

सुनितहि किरानी अपन कुर्सी सँ उठि कऽ दौड़ल आयल जेना ओकरा सँ कोनो गलती भऽ गेल हो। फेर विस्तार सँ सभ बात बुझा देलकै। रजत ओकरा सभ के फाईल पर फरिछायल नोटिंग करबाक हिदायत दैत ओकरा अपन सीट पर जेबाक ईशारा केलकफेर विजयी भावें आँखि उठा कऽ तकलक। विजयी एहि दुआरे जे आधनस्थ कर्मचारी पर धाख जमाकऽ ओकरा सभक नजरि मे नवसिखुआक आभास नहि होमय देलकै संगहि कार्यक आरम्भ सेहो शुभ रहलै। शुरु भला तऽ अंतो भला। टेबुल पर राखल पानिक गिलास के एके छाक मे खाली क लेने छल रजत।

ओम्हर आधनस्थ कर्मचारी सभक बीच मे यैह चर्चा होमऽ लगलै जे साहेब बड़ क़डा मिजाज के छथि।


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रघुबीर मंडल said...
nik lagal
Reply06/08/2009 at 09:51 AM
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Usha Yadav said...
निक लघु कथा काश्यप जी।
Reply06/07/2009 at 12:18 PM

सगर राति दीप जरए: ६६म आयोजन :३० मई,२००९: मधुबनी
- मिथिलेश कुमार झा
सगर राति दीप जरए नामे आयोजित होमएबला कथा गोष्ठीक ६६म आयोजन तीस मई शनि दिन मधुबनीमे आयोजित भेल। मिथिला साहित्यिक एवम् सांस्कृतिक परिषद, मधुबनीक तत्वाधानमे श्री दिलीप कुमार झाक संयोजनमे आयोजित ई कथा गोष्ठी कथा-उत्सवक नामसँ माध्यमिक शिक्षक संघ भवन, मधुबनीक सभा भवनमे संध्या ६ बजी सँ आयोजित कयल गेल। एहि कथागोष्ठीक उद्घाटन दीप जरा कए कयलनि डॉ. देवकान्त झा। मिथिलाक परम्परानुसार गोसाउनिक गीत गयलनि श्री प्रवीण कुमार मिश्र। एहि कथागोष्ठीक अध्यक्ष प्रस्तावित कयल गेलाह प्रसिद्ध कथाकार श्री हीरेन्द्र कुमार झा। अतिथि लोकनिक स्वागतमे स्वागत गान गओलन्हि श्री प्रवीण कुमार मिश्र। एहि आयोजनक प्रति दुइ शब्दक संगहि स्वागत भाषण देलनि संयोजक श्री दिलीप कुमार झा।
एहि कथा-उत्सवमे श्री शैलेन्द्र आनन्दक कथा संग्रह “घरमुहा”क लोकार्पण डॉ.रमानन्द झा “रमण”क हाथे भेल। ॠषि वसिष्ठक लिखल मैथिली बाल कथाक एकटा पोथी“झुठपकड़ा मशीन” केर लोकार्पण सेहो डॉ. रमानन्द झा “रमण” कयलनि। एहि उद्घाटन सत्रक संचालन कयलनि श्री दमन कुमार झा।
एहि कथागोष्ठीमे स्थानीय आ बाहरी कथाकार सभक लगभग ४२ गोट कथा पढ़ल गेल। कथाकार लोकनि छलाह:
१.जगदीश कुमार भारती- बिन टिकटक यात्रा
२.श्रीमती रानी झा- परिवर्तन
३.योगानन्द सुधीर- पाठकक गाछ
४.अजित कुमार आजाद- रोग
५.जगदीश कुमार मंडल- बिसंध
६.शैलेन्द्र आनन्द- सरहुलक सुगन्ध
७.कामेन्द्रनाथ झा “अमल”- गामक मोह
८.मिथिलेश कुमार झा -ब्रह्मसत्य, टीस
९.अमलेन्दु शेखर पाठक- विद्रोह, प्रहरी, चानसागर
१०.उमेश मंडल- बाइस भोजन, कर्तव्यनिष्ठ
११.नारायण यादव- अंधविश्वास, सुविधाक टैक्स
१२.अनमोल झा- रिलेशन १, रिलेशन २
१३.रघुनाथ मुखिया- बुद्ध, अजगरवृत्ति, धर्मनिष्ठ
१४.मनोजराम आजाद- बड़की बहुरिया
१५.चन्डेश्वर खान- सुशासन
१६.दुर्गानन्द मंडल- अपराजित
१७.उमाकान्त- अन्हार घरक साँप
१८.फूलचन्द्र झा “प्रवीण”- परिवर्तित स्वर
१९.उग्रनारायण मिश्र “कनक”- साय सुतारि
२०.दीनबन्धु- गाँधीक सात रंग
२१.रमाकान्त राय “रमा”- अप्पन हारल बहुक मारल
३०.डॉ.कमल कान्त झा- एखन छुट्टी नहि अछि
३१.ऋषि वशिष्ठ- ओ नाबालिक
३२.सुभाष चन्द्र झा “स्नेही”- अन्हार
३३.देवकान्त मिश्र- अपनत्व
३४.अशोक अविचल- गाम हमरो छी
३५.महेन्द्र पाठक “अमर”- परिवर्तनक संकल्प
३६. डॉ.हेमचन्द्र झा- निष्ठावान व्यक्तिक कन्यादानक अनुभव
३७.महाकान्त ठाकुर- अनुभूति
३८.विनय विश्वबन्धु- रहीम काका
३९.डॉ. सुरेन्द्र लाल दास- घण्टी घनघनाए उठल
४०.उमेश नारायण कर्ण- विधानक लेख
४१.शत्रुघ्न पासवान- सहयात्री
४२.अनिल ठाकुर- दुःख
भोर भय जएबाक कारणेँ चन्द्रपति लाल, भोगेन्द्र मिश्र “रमण”, विजेन्द्र कुमार मिश्र, पं.यन्त्रनाथ मिश्र आदि कैक गोट कथाकार अपन-अओपन कथा पढ़ि नहि सकलाह।
कथा सत्रक संचालन सम्मिलित रूपेँ अशोक कुमार मेहता आओर अजित कुमार आजाद कयलनि। पठित कथा सभ पर तत्काल आलोचना कयल गेल। प्रमुख आलोचक छलाह डॉ. महेन्द्र नारायण राम, फूलचन्द्र झा “प्रवीण”, डॉ. श्रीमती रंजना झा, कमल मोहन चुन्नू, डॉ. देवकान्त झा, उदयचन्द्र झा “विनोद”, डॉ. कमलानन्द झा, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र“रमण”, नित्यानन्द गोकुल, शैलेन्द्र आनन्द, अशोक अविचल आदि।
गोष्ठीक अन्तमे हीरेन्द्र कुमार झा अपन अध्यक्षीय वक्तव्यमे पठित समस्त कथापर अपन समवेत दृष्टिकोण रखलनि।
सगर राति दीप जरए केर अगिला आयोजन रमाकान्त रॉय रमाक आयोजनमे मन राइ टोल (सिंघिया घाट, समस्तीपुर) मे हेबाक निर्णय सर्वसम्मतिसँ लेल गेल तथा गोष्ठीक दीप रमाकान्त बाबूकेँ अर्पित कय देल गेल। एहि संग एक बेर फेर नव साहियारक संग उपस्थित होयबाक उल्लासक संग कथाकार लोकनि प्रस्थान कयलनि। (३१.०५.२००९)।


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Dr. Ajit Mishra said...
"Sagar rati ker dip jaral
chahu dis san nav mit jural.
man maithilik din ghooral
sabhak aash man bhari pooral.
Reply06/13/2009 at 05:03 PM
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रघुबीर मंडल said...
mithilesh ji, sagar ratik report lel dhanyavad,
ahank katha kahiya dhari etay padhbak lel bhetat?
Reply06/08/2009 at 09:51 AM
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Usha Yadav said...
सगर राति दीप एहिना जरैत रहए से शुभकामना। मिथिलेशजीकेँ रिपोर्टक त्वरित प्रेषण लेल धन्यवाद।
Reply06/07/2009 at 12:19 PM
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मनोज.सदाय said...
sagar rati deep jaray ker report bad nik
Reply06/06/2009 at 11:25 PM

लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति-गजेन्द्र ठाकुर

लोरिक गाथामे नहि तँ कोनो इतिहास प्रसिद्ध राजाक नाम आ नहिये लोरिकक जन्म आकि विवाहक तिथिक चरचा अछि। भाशाक स्वरूप मौखिक रहबाक कारणसँ गतिशील अछि। काल निर्धारण सेहो अनुमानपर आधारित अछि। लोरिकक जन्म-स्थान गौरा गाम अछि आ कार्य-कर्म क्षेत्र पंजाबसँ नेपाल आ बंगाल धरि अछि। सासुर अगोरी गाम अछि जे सोन धारक कातमे बताओल गेल अछि।
लोरिकक विवाह- पहिल विवाह अगोरी गामक मंजरीसँ दोसर बियाह चनमासँ जकरासँ चनरैता नाम्ना पुत्र।
तेसर बियाह हरदीगढ़क जादूगरनी जमुनी बनियाइनसँ जाहिसँ बोसारख नाम्ना पुत्र।
वीर लोरिकक पैघ भाए सँवरू सेहो वीर। ओ कोल राजा देवसिया द्वारा मारल गेलाह। बादमे लोरिक सेहो युद्ध करैत घायल भऽ जाइत छथि आ बोहा बथानपर लोरिकक बेटा भोरिक देवसियाकेँ पराजित करैत अछि। लोरिक बूढ़ भेलापर अग्नि समाधि लैत छथि।
लोरिकक कथा- साबौरक जन्म आ लोरिक वतार, सँवरूक विवाह, माँजैरक जन्म, लोरिक-माँजैर विवाह आ राजा मौलागत आ निरमलियासँ युद्ध, सँवरू आ सतियाक विवाह, झिमली-लोरिक युद्ध, चनैनिया-शिवहर विवाह आ लोरिक-बेंठा चमारक युद्ध। एहि गाथामे लोरिक-चनमा प्रेम आ हरदीगढ़ प्रस्थान आ राजा रणपाल आ महिपतसँ लोरिकक युद्ध। लोरिक आ चनमाक हरदीगढ़मे निवास, लोरिक गजभिमला युद्ध, नेऊरपुरक चढ़ाइ आ लोरिक-हरेबा-बरेबा युद्ध, संवरू आ कोल युद्धमे सँवरूक मृत्यु, लोरिकक बोहा बथान आगमन, पीपरीगढ़क चढ़ाई आ लोरिक आ देवसिया युद्ध, लोरिकक देहत्याग आ भोरिकक नेतृत्व। पिपरीक पहिल लड़ाइ सँवरूक संग, पिपरीक दोसर लड़ाइ लोरिकक संग भेल। फेर लोरिकक काशीवास आ मृत्यु होइत छन्हि।

लोरिकक असली हरदीगढ़ आ प्रसिद्ध कर्मक्षेत्र सहरसा जिलाक हरदीस्थान अछि कारण सुपौलक पूब स्थित हरदीक संग दुर्गास्थान शब्द सम्मिलित अछि। एहि हरदीक संग महीचन्द्र साहू, राजा महबैर, नेऊरपुर (नौहट्टा), गंजेरीपुर (गौरीपुर), खेरदहा (खैरा धार), रहुआ-चन्द्रायन-मैना-गाम, बैराघाट, तिलाबे धार, बैरा गाछी आ महबैरिया गामक चरचा अछि। लोरिक गाथा स्थल बैराघाटसँ प्राप्त पजेबा आ हरदी हाइस्कूलसँ सटल पश्चिम खुदाइमे प्राप्त पजेबामे पाओल समानता एकर व्याख्या करैत अछि।
सुपौल रेलवे स्टेशनपर रेलवे विभागक एकटा बोर्ड लागल अछि- एतएसँ पाँच किलोमीटर पूर्व हरदी दुर्गास्थानमे भगवती दुर्गा आ वीरपुरुष लोरिकक ऐतिहासिक स्थल दर्शनीय अछि।
नौहट्टा लग महर्षि आ ओतए पालीभाषाक शिलालेख- पालवंशीय- हरिद्रागढ़ चौदह कोसमे विस्तृत। तेरहम शताब्दीक ’वर्णरत्नाकर’मे लोरिकक चरचा अछि।
लोरिक मनुआर गाथाक धार्मिक सामाजिक आ राजनीतिक पक्ष। लोरिक अज्ञात नाम गोत्रसँ उत्पन्न। यादव जाति अपन पूज्य लोरिकक सम्मान छाँक पूजासँ करैत छथि आ लोकदेव, लोकनायक रूपेँ सम्मान दैत छथि।
लोरिकायनक मैथिली स्व्वरूप पुरातत्ववेता अलेक्जेन्डर कनिंघमक संकलनमे अछि। क्वार्टरली जर्नल ऑफ द मीथिक सोसाइटी (भाग-५ , पृ.१२२ सँ १३५) मे भागलपुरक लोरिकायनक चरचा।
आर्क्योलोजिकल दर्वे रिपोर्ट खण्ड 16 (1883 ई.) पृ.27-28 मे कनिँघमक यात्रा वृत्तानमे लोरिक आ सेउहर वा सरिकका नाम्ना दू टा पड़ोसी राजाकेँ गौरा गामक निवासी कहल गेल अछि।
भागलपुर गजेटियर (पृ.४८-५०) मे जॉन हन्टर लोरिक विषयक रिपोर्ट देने छथि।
लोरिक गाथा लोरिकायन, लोरिकी आ लोरिक मनिआर नामसँ प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे एकर प्रशस्ति लोरिक मनिआर नामसँ अछि।
लोरिकक नैतक (बेटाक बेटा) नाम इन्दल रहए। मैथिलीक लोरिक मनिआरमे लोरिकक विवाह प्रसंग आ लोरिकक कनियाँ तकबासँ लऽ राजा सहदेवसँ युद्ध केर विस्तृत चरचा अछि।
महुअरि खण्डमे गजभीमलक अखाड़ा जएबाक लेल घोड़ा चुनब आ गजभीमलकेँ पटकि-पटकि कऽ मारबाक वर्णन।
लोरिक द्वारा हरबा-बरबाक वध। गाथाक प्रारम्भमे सुमिरन आ बन्हन।
सुमिरन- इनती करै छी दुरुगा मिनती तोहार।
बन्हन- आ-दुरुगा गइ पुरुब खण्ड हे गइ
१.विवाह खण्ड,२.महुअरि खण्ड,३.युद्ध खण्ड

मणिपद्मजी- १.जन्म खण्ड२.सती माँजरि खण्ड,३.चनैन खण्ड,४.रणखण्ड,५.सावर खण्ड,६.बाजिल खण्ड,७.सझौती खण्ड आ ८.नेपालसँ प्राप्त भैरवी खण्ड।

-गौरा गामक बुढ़कूवा राउत- तारक गाछक झठहा बनबैत रहथि। ५-७ सय पहलमानकेँ पीठपर लादि चौदह कोस टहलि आबथि। मुदा घर-घरारी किछुओ नहि छलन्हि। दू टा पुत्र लोरिक मनिआर आ साओद सरदार छलन्हि।
-अगौरीक मुखिया सेवाचन राउत – अस्सी गजक धोती आ बावन गजक मुरेठा- तेतलिया घोड़ा छलन्हि। पुत्री छलखिन्ह माँजरि जे सात सय संगी संगे सुपती-मौनी खेलाइत रहथि।ओकर बियाह लेल सेवाचन बुढ़कूबाक ओतय लोरिकसँ अखड़हापर- छप्पन मोन माटिसँ तरहत्थी मलनिहार सेवाचनकेँ लोरिक टालि-गुल्ली जेकाँ ऊपर फेकि देलक आ गेन जेकाँ लोकि कए काँख तर दबा लेलक। बियाह दिन राजा उगरा पमार बूढ़कूबाकेँ पकड़बाक प्रयास मुदा बूढ़कूबा भकुला पहलमानक गरदनि काटि लेलक। विवाह सम्पन्न भेल। राजा उगरा पमार सनिका-मनिकाकेँ बजेलक- लोरिक सनिका-मनिकाक मूड़ी काटि लेलक। गौरा घुमैत काल हरदीक राजा सहदेवक आक्रमण, लोरिक सहदेवकेँ हरा कए ओकर पुत्री चनाइकेँ महीचनक आँगन लऽ जाए विवाह कएल। तखन राजा महुअरि महीचनकेँ कारामे दऽ देलक मुदा फेर लोरिकसँ डरा कए छोड़ि देलक। मुदा सिलहट अखड़हाक सरदार गजभीमलकेँ पठाओल। मुदा लोरिक ओकर मूड़ी काटि लेलक आ फेर राजासँ मित्रता भेल। दुनू मिलि राजा हरबा-बरबासँ युद्ध कएलक। हरबा-बरबा भागल मुदा धुथरा पहलमानकेँ पहाओल- लोरिक ओकर दहिना आँखि निकालिओकर जीह काइ लेलक। हरबा-बरबाक पुनः आक्रमण आ पलायन मुदा फेर भागिन कुमर अनार- लोरिक मूड़ी काटि हरबा-बरबाक रानी पद्मा लग ओकर मूड़ी फेकलक। फेर हरबा-बरबाक आक्रमण-डिहुलीक रणक्षेत्रमे हावीगढ़क राजा हरबा-बरबाक मूड़ी काटि राजप्रसादक अन्तःपुरमे फेकलक। लोरिक छत्तीस टा युद्ध कएलन्हि। लोरिक कृषिक विकासमे सजग छलाह। कारण दोसराक भूमिक अधिग्रहण कए बहुसंख्यक चिड़ँइ, जानवर आ कीट-पतंग उजड़ि गेल आ इन्द्र लग गेल। वर्णरत्नाकर- द्वितीय कल्लोलमे लोरिक नाचो- पहिने नाच छल आइ-काल्हि गाथा।

“मिथिलायदयश्च मध्यंते रिपवो इति मिथिला नगरी”।
-समाजक सीढ़ीक आइ-काल्हिक नीचाँक वर्ग आ नारी समाजक शक्तिक विस्तार, आध्यात्मिक आ लौकिक अर्थ दुनू तरहेँ।
- सामाजिक सीढ़ीक विभिन्न स्तरक जातिक अन्तर्विरोध, आइ-काल्हिक तथाकथित निम्न जातिक दुराचारी पात्रक विनाश लोरिक द्वारा। लोरिकक भगवतीपर भक्ति छल ओकर विजयक कारण।
मुदा लोरिकक शत्रुमे सामाजिक सीढ़ीपर ऊँच स्थान प्राप्त मोचनि आ गजभीमल छल तँ मित्रमे सेहो राजल सन सामाजिक सीढ़ीमे नीचाँ जातिक।
हरबा राजाक चपेटसँ दुहबी-सुहबी ब्राह्मणी आ गांगे क्षत्रीक मुक्ति।
उघरा पँवार, हरबा-बरबा, सोनिका, मनिका, बंठा, कोल्हमकड़ा, करना सभ जातीय सीढ़ीमे नीचाँक पात्र राजा छथि। मातृदेवीक उपासना, इन्द्रक पत्नीक दुर्गाक भेष बदलि आएब आ लोरिक द्वारा हुनका पत्नी बूझि छूबाक उपरान्त पीड़ा। लोरिक माँजरिक मिलन काशी-प्रयाण।

-गाथा मेला, हाट बजार, विशिष्ट लोकक घर, सार्वजनिक स्थलपर से यादव जातिक अतिरिक्त आनो श्रोता। सर्जक आ श्रोताक प्रत्यक्ष संबंध, श्रवणीय, कथाक अनायास अलंकरण, मुदा सभटा साहित्यिक लक्षण जेना सर्ग, छन्दबद्ध, नाट्य-संधि आ संध्यांगक योजना आ वस्तु निर्देशक अभाव। वस्तु संगठन सुगथित नहि। गारिक प्रयोग आ मद्यपानक यत्र-तत्र वर्णन, ग्रामीण व्यवस्थामे चोरक स्थान आ ओकर वर्णन, स्थानीय देवी-देवताक चरचा, जातीय अस्मिताक प्रतीक। कथा-गायक आशु कवि होइत छथि-एकटा अस्थिपञ्जर अवश्य रहैत अछि मुदा ताहिपर अपन हिसाबसँ ओ गबैत छथि। शब्दशः ओ कण्ठस्थ नहि करैत छथि। प्रारम्भमे ईश्वर, वन्दना आ बीच-बीचमे ईश्वरसँ क्षमायाचना, ई सभ गायन क्षमता स्थिर करबाक उद्देश्यसँ कएल जाइत अछि। घण्टासँ ऊपर गायन बीचमे हुक्का-चिलम, मद्यपान, परिवेशक वर्णन गायनमे। निरक्षर मुदा कोनो साक्षरसँ बेशी ज्ञान भण्डार। लोरिक मनुआरमे श्रोताक संख्या, तन्मयता आ एकिआग्रचित्तताक प्रभाव कथा-गायकक कथा वाचनपर पड़ैत अछि कारण ई श्रोताक सोझाँ कएल जाइत अछि। एहि अर्थेँ सल्हेस किअथावाचकसँ हिनकापर बेशी बाह्य प्रभाव पड़ैत छन्हि। सल्हेस गाथा श्रोताक समक्ष नहि वरन आराध्य देवक समक्ष वाचन कएल जाइत अछि।
गाथाक मूल कथा ओना तँ मोटा-मोटी समान रहैत अछि मुदा प्रस्तुतिकरण, विशिष्ट समाज, क्रियाकलाप आ सामाजिक मर्यादाक कारण विशिष्ट।
युद्ध,द्यूत,प्रेम आ विवाह-सांस्कृतिक तत्त्व सभ महाकाव्यमे, द्यूत –मानसिक युद्ध-द्यूतमे मनुक्खकेँ बाजी लगाएब, महाभारतमे आ लोरिकायनमे।
दुर्गा देवी द्वारा युद्धमे नायकक सहायता, चनैनक शिवधरकेँ छोड़ि लोरिक संग उढ़रि जाएब, दुसाध जातिक महपतियासँ लोरिकक जुआ खेलाएब आ लोरिक द्वारा चनैनकेँ जुआमे हारब-चनैन द्वारा प्रतिवाद-गहना गुरिया दाँवपर, चनैनक अश्लील हाव-भावसँ महपतियाक ध्यान बँटब आ लोरिकक जीतब। लोरिक द्वारा ओकर मूड़ी काअब। पति द्वारा अनुचित कएल जएबाक उपरान्तो पत्नी द्वारा बुझाएब।
लोरिकक अवतारवाद आ रहस्य
क्रोध-प्रेम दुनूमे गारि उन्मुक्त सांस्कृतिक काव्य चरित्र। प्रकृतिकेँ नुकाओल नहि गेल। नायक सेहो गारिक प्रयोग करैत अछि।
शिव-शक्तिक पूजा, महाकाव्यक पात्रक नाम आ आन तत्वक ग्रहण जे लोरिक मनुआर गायकक उदार आ सहिष्णु चरित्रकेँ देखबैत अछि। प्रस्तुति क्षमता आ ज्ञान क्षेत्र हिनका अनक्षर कहबासँ हमरा रोकैत अछि।
लोरिक मनुआरमे अलौकिक आ रहस्यमय घटना बेशी, वन्य जीवक (बोनमे)संख्या नहि केर बराबर, लोरिकक पात्र अवतारी मुदा विधिवत पूजा नहि।
धार्मिक विश्वास, नायकक चरित्र आ सामाजिक आचार। जीवन-संस्कृति दृढ़तापूर्वक, महाकाव्यक अधिकांश ल़क्षण जेना रस, छंद,गुण,अलंकार,सर्गक ध्यान,व्यवहृत धार्मिक मूल्य,संस्कृतिक सम्पूर्णता, सृजन-क्षमता(गायकक)।

लोकगाथा-नाचक फील्डवर्क-कथ्यमे बदलनाइ (जेना गारि), अपन संस्कृतिक नैतिक मानदण्डक आधारपर परिवर्तन अक्षम्य, अपनाकँ् ओहि समाजमे रखितहु उद्देश्यपर ध्यान, वाक्य शब्द रचनामे कोनो परिवर्तन नहि होएबाक चाही।
बाजिल कौआ अधजरुआ गोइठासँ कौल्हमकड़ाक गढ़केँ जरबैत अछि।
तिरिया, गामक रक्षा आ अनाचारीक विनाश-पशुपाल आ कृशिक समर्थन।

-उधरा-पँवारक हाथी-कज्जल गिरि
-लोरिकक कटरा घोड़ा
-सेनापति बरबाक घोड़ा बरछेबा
-बाजिल कौआ

मुदा लोरिक मनुआर महराइ मे ई सभ वन्य नहि वरल पोसुआ अछि।
लोरिकक मित्र बंठा चमार, वारू पहरेदार (पासवान), राजल धोबी, लोरिकक छोट भाइ साँवर।
सलहेसक कथा ताराइ क्षेत्रक। वन्य जीव आ वनक बेशी वर्णन, वन्यजीव द्वारा सलहेसक सहायता, आखेट आ बलि। सल्हेअक पूजा स्थलपर माटिक घोड़ा राखल जाइत अछि मुदा लोरिकायनमे नहि।
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रघुबीर मंडल said...
lorik gathak nik aa nootan vishleshan
Reply06/08/2009 at 09:42 AM
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Usha Yadav said...
नीक जेकाँ आ शोधपूर्ण लेख। लोरिक गाथाक लेखन लेल गजेन्द्रजी धन्यवाद।
Reply06/07/2009 at 12:20 PM
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राहुल मधेसी said...
subhash ji ke estimate nik kelahu,
gahir adhyayan ker parinam etek nik samiksha,
chhichla knowledge se te panipat aa babar madhya yudh machat matra
Reply05/15/2009 at 09:41 PM
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जितेन्द्र नागबंशी said...
bahut ras ideolism clear bhel,
subhash jik samiksha lel dhanyavad
Reply05/15/2009 at 09:39 PM

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