भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, October 14, 2011

'विदेह' ९१ म अंक ०१ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९१)- PART II



एकांकी

तामक तमघैल

जगदीश प्रसाद मण्‍डल


(पहि‍ल दृश्‍य)

            (जेठ मास। एगारह बजैत। जेठुआ दृश्‍य।)

पीपरावाली     : (माथपर छि‍ट्टामे पुरना पार्ट-पुर्जा साइकिलक नेने) लोहा-लक्कर बेचै जाइ- जाएब ई.. य..अ..अ..ऐ...?

            (रागि‍नी आ बलाटवाली घरक ओसारपर बैसल गप-सप करैत। कवाड़िनक अवाज सुनि‍..)

रागि‍नी        : कनी लोहा-लक्करवालीकेँ एम्‍हरे अबैले कहि‍यौ।

            (ओछाइनपर सँ उठि‍ बलाटवाली आगू बढ़ि‍..)

बलाटवाली     : हइ पीपरावाली, कनी एम्‍हरे आबह।

            (माथपर छि‍ट्टा नेने पच्‍चीस बर्खक पीपरावाली छपुआ साड़ी, पएरक चप्‍पल फटफटबैत अबैत..।)

पीपरावाली     : काकी, कनी पथि‍या टेक दौथ।

            (दुनू गोटे पथि‍या उताड़ि‍ नि‍च्‍चाँमे रखैत। माथ परक बीरबा नि‍च्‍चाँ राखि‍ आँचरसँ चानि‍पर चुबैत पसीना पोछैत। तइबीच रागि‍नी भीतरसँ -घरसँ- एकटा तमघैल आनि‍ आगूमे रखैत..)

रागि‍नी        : कनि‍याँ, हमरा ते बुझले ने छलए जे तहूँ लोहा-लक्करक कारोवार करै छह। नै ते....?

पीपरावाली     : दादी, अपने करै छी आकि‍ दीन करबैए?

रागि‍नी        : सासु-ससुर आ घरबला नै छह?

पीपरावाली     : सासु-ससुर तँ धि‍ना कऽ मुइल जे घरोबला तेहने अछि‍।

रागि‍नी        : से की?

पीपरावाली     : कि‍ कहबनि‍। पति‍क खि‍घांस केने ते पाप लागत। मुदा छि‍पौनौ तँ जि‍नगि‍ये जाएत।

            (गुन-धुनमे पीपरावाली पड़ि‍ जाइत..)

बलाटवाली     : दीदी, अही बेचारीक की सुनथि‍न। अपने सभक नै देखै छथि‍न। हि‍नके बेटा-पुतोहू छन्‍हि‍, दस-बारह बर्खसँ कम गाम एना भेल हेतनि‍।

रागि‍नी        : बाहरम बर्ख छी।

बलाटवाली     : हि‍नके कि‍ कहबनि‍, हमरे नै देखै छथि‍न जे जहि‍यासँ घरबला मुइल तहि‍यासँ दुनू बेटा-पुतोहू कोनो गरनामे रहए देने अछि‍। तखन ते अपना लुरि‍ये-बुद्धि‍ये जीबै छी।

            (रागि‍नी आ बलाटवालीक बात सुनि‍ पीपरावाली..)

पीपरावाली     : दादी, ई बड़का छथि‍। हम कहुना भेलौं ते हि‍नकर धि‍ये-पूते भेलि‍यनि‍। धि‍या-पूता जे माए-बाप लग झुठ बाजे सेहो नीक नै।

बलाटवाली     : माइये-बाप कि‍अए कहै छहक, लोककेँ झुठ बजबै नै करक चाही।

पीपरावाली     : काकी, कहलथि‍ ते बेस बात, मुदा हम सभ ते धंधा करै छी। झूठेक खेती छी। नि‍च्‍चाँ-ऊपर सगतरि‍ एक्के रंग।

रागि‍नी        : बलाटवाली जहि‍ना अहाँ भरि‍ दि‍न खुरपीसँ घास छि‍लै छी तहि‍ना जे गपोकेँ छि‍लबै तँ उ घास जकाँ उखड़त कि‍ आरो असुआएल लोक जकाँ छि‍ड़ि‍या कऽ पसरि‍ जाएत।

बलाटवाली     : हँ, ते आगू कि‍ कहए लगलहक हइ पीपरावाली?

पीपरावाली     : घरबला दे कहए लगलि‍यनि‍। कि‍ कहबनि‍ काकी, बजैत लाज होइए। जहि‍ना  बुढ़बा -ससुर- तड़ि‍पीबा रहए तहि‍ना बेटो छै? (कहि‍ चुप भऽ पुन: आँचरसँ चानि‍ पोछए लगैत..)

रागि‍नी        : कमाइ-खटाइ नै छह?

पीपरावाली     : से जे कमैते ते एहि‍ना रौदमे वौऐतौं। बापकेँ तँ खेत-पथार रहै बेचि‍-बि‍कीन के पीलक। आब तँ ने खेत पथार अछि‍ आ ने कमाइबला।

रागि‍नी        : बच्‍चा कएकटा छह?

पीपरावाली     : दू भाए-बहीन अछि‍। जेठका छह बर्खक आ छोटकी चारि‍ बर्खक।

रागि‍नी        : अपने जे भौरी करए चलि‍ जाइ छह ते बेटा-बेटीकेँ बाप देखै छै कि‍ने?

पीपरावाली     : कि‍ देखते जैन‍पीट्टा। भरि‍ दि‍न पी कऽ अड़-दड़ बजैत रहैए। जहाँ कि‍छ बाजब कि‍ सोहाइ लाठी लगा दइए।

बलाटवाली     : तोहूँ कि‍अए ने उनटा दइ छहक?

पीपरावाली     : धुर काकी, इहो सएह कहै छथि‍। कुल-खनदान कि‍ पुरखेटा बँचबैए आकि‍ जनि‍जाति‍यो। हमरा जे कतबो देह धुनत ते ओकरा दोख नै लगतै मुदा हम जे उनटा देबै तँ कुल-खनदानक नाक कटतै आकि‍ नै?

रागि‍नी        : भरि‍ दि‍नमे कत्ते कमा लइ छहक?

पीपरावाली     : दादी, कमाइयेपर ने ठाढ़ छी। दुनू बच्‍चोकेँ पोसै-पालै छी आ घरोबलाकेँ पाँच-दस रूपैया पीऐ लऽ देबे करै छि‍ऐ ने?

बलाटवाली     :  एहेन छुतहर घरबला छह ते कि‍अए ने छोड़ि‍ दइ छहक?

पीपरावाली     : काकी, मरलो-जड़ल अछि‍ तँ घरेबला छी। यएह कहथु जे जे सुख घरबलासँ होइ छै से दोसरसँ हएत।

रागि‍नी        : आब ते हुि‍स गेलह। नै जे पहि‍ने बूझल रहि‍तै जे गाममे तोहूँ लोहा-लक्करक कारवार करै छह ते तोरे दैति‍यह।

पीपरावाली     : ककरा हाथे बेचलखि‍न?

रागि‍नी        : झंझारपुरक एकटा बेपारी अबैए, ओकरे हाथे।

पीपरावाली     : झंझारपुरबला बेपारी ते गरदनि‍ कट सभ छी।

रागि‍नी        : से की?

पीपरावाली     : अनकर कि‍ कहबनि‍, अपने कहै छि‍यनि‍। आठ बर्ख पहि‍ने हमर बाप खुआ चानीक हँसुली दुरागमनमे देलक। ऐठाम दि‍न घटल। पाँच बर्खक पछाति‍ जखन वएह हँसुली ओही वनीमा ऐठाम बेचए गेलौं ते रूपाा कहि‍ अधि‍ये दाम देलक।

रागि‍नी        : छोड़ह दुनि‍याँ-जहानक गप। अपन बाल-बच्‍चा, घर-परि‍वारक गप करह, जे केना ठाढ़ रहत? ककरा कहब भल आ ककरा कहब कुभल। कोइ अपना ले करैए।

बलाटवाली     : कनि‍याँ, नैहरोमे यहए काज करै छेलह?

पीपरावाली     : (दुनू आँखि‍ मीड़ैत..) काकी, हि‍नकर पएर छुबि‍ कहै छि‍यनि‍, कहुना भेली तँ माइये-पि‍ति‍आइन भेली। गाम मन पड़ैए ते......?

बलाटवाली     : चुप कि‍अए भेलह? ऐठाम कि‍ कि‍यो पुरूख-पातर अछि‍ जे धखाइ छह। नैहरामे के ने खेलाइ-धुपाइए।

पीपरावाली     : धुर बुढ़ि‍या नहि‍तन। एको पाइ बजैमे संकोच नै होइ छन्हि‍।

रागि‍नी        : ओहि‍ना बलाटवाली चौल करै छह। बाजह...?

पीपरावाली     : दादी, नैहर मन पड़ैए ते सुमारक होइए। माए-बापक बड़ दुलारू छेलि‍ऐ। चारि‍ चारि‍ भाँइक बीच असकरे बहीन छि‍ऐ।

रागि‍नी        : वि‍याह करै काल बाप देखा-सुनी नै केने छेलखुन?

पीपरावाली     : अनकर दोख कि‍ देबै दादी। दोख अपन कपारक। जे कपारमे सटि‍ गेल सहए ने हएत।

रागि‍नी        : हँ, से ते सएह होइ छै। मुदा तैयो ते लोक लड़का-लड़कीक मि‍लान देख ने वि‍याह करैए।

पीपरावाली     : सोझमति‍या बाप ठकहरबा सबहक भाँजमे पड़ि‍ गेल।

रागि‍नी        : ऐठामसँ आरो आगू जेबहक कि‍ घुरि‍ जेबहक?

पीपरावाली     : भऽ गेल भरि‍ दि‍नक कमाइ। बालो-बच्‍चा देखना बड़ी खान भऽ गेल आ रौदो चंडाल अछि‍।

            (तमघैल उनटा-पुनटा कऽ देख बलाटवाली..)

बलाटवाली     : आब ऐ सबहक कोनो माेल रहल दीदी। घरमे अन्न रहत ते लोक माटि‍यो बरतनमे रान्हि‍-पका खा सकैए।

रागि‍नी        : बड़ी खान तोरो भऽ गेलह कनि‍याँ। एकेठाम बैसने काज नै चलतह। बाजह, कते दाम देबहक?

पीपरावाली     : दादी, हि‍नका लग झुठ नै बाजब। एक तँ कते दि‍नसँ कारेवार करै छी। तहूमे एहेन तमघैल आइ पहि‍ले दि‍न अभरलहेँ। आइ रखि‍ लथु। भाउ बुझि‍ कऽ दोसर दि‍न लऽ जाएब।

रागि‍नी        : एकरा नेने जाह। जतेमे बि‍केतह तइमे तूँ अपन बोनि‍ नि‍कालि‍ दऽ दि‍हह।

बलाटवाली     : बड़ नि‍म्‍मन चीज छन्हि‍।

रागि‍नी        : जहि‍ना सासु-ससुरक बीचक जि‍नगी, बेटा-पुतहूक बीच बदलि‍ जाइ छै तहि‍ना अहू तमघैलकेँ भेल।

पीपरावाली     : से की दादी, से की?

रागि‍नी        : (वि‍स्‍मि‍त होइत..) कि‍ कहबह! नैहरमे जहि‍या देलक आ ऐठाम आएल तहि‍या घरक गि‍रथानि‍ भऽ रूपैया-पैसा रखैक ति‍जोरी बनल रहए। मुदा जखन चोर-चहारक उपद्रव भल तखन बुढ़हा -ससुर- झँपना दऽ ओछाइनि‍क तरमे गाड़ि‍ कऽ रखै छलाह। आब तँ सहजहि‍ घरे ढनमना गेल ते एकरा के पूछत।

बलाटवाली     : कनि‍याँ, दीदीयोकेँ खगता छन्‍हि‍। ताबे नून-तेल करैले अधो-छि‍धो दऽ दहुन आ लऽ जाह।

पीपरावाली     : (पचास रूपैयाक नोट दैत..) दादी, ताबे एते रहए देथुन। एक खेप गामपर सँ रखने अबै छी। एक घोंट पानि‍यो पीब लेब।

बलाटवाली     : अखैन खाइ-पीबै बेर भऽ गेल। जँ अखन नहि‍यो आबि‍ हेतह ते ओही बेरमे, बेरू पहर लऽ जइहह।

पीपरावाली     : हँ सेहो हएत। जँ आइ नै आबि‍ हएत ते काल्हि‍यो लऽ जाएब।

रागि‍नी        : आब तोहर चीज भेलह। देखते छहक चोर-चहारक उपद्रव। तँए नीक हेतह जे साँझो पड़ैत आइयो लऽ जइहह।

पीपरावाली     : बड़बढ़ि‍या!

(())
                                      
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अतुलेश्वर
किछु विचार टिप्पणी
समयलाई सलाम आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अभिमत
नेपालीय मैथिली साहित्यक एकटा सशक्त कड़ीक नाम थिक धीरेन्द्र प्रेमर्षि। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक रचनाक विशेषता छनि मिथिलाक संग जीयब। मैथिलीमे धीरेन्द्र प्रेमर्षि ‘कोन सुर सजाबी’ लिखलन्हि , आ नेपालीमे समयलाई सलाम। दुनू ठाम मिथिला अछि। दुनू ठाम मिथिलाक चिन्ता अछि। हुनक गजल संग्रह ‘ समयलाई सलाम’ क परिपेक्ष्यमे नेपालक राष्ट्र कवि ‘ माधव धिमिरे ’ कहैत छथि जे ‘ प्रेमर्षिको मातृभाषा मैथिली हो। उनी मैथिलीमा गीत पनि लेख्छन् र मैथिलीमा सपना पनि देख्छनृ। नेपाली भाषामा सपना देख्छन्, उनै जानुन, तर गीत चाहिं नेपालीमा व्यड़्ग्य कविता लेखन र वाचनाबाट नेपाली पाठक सामु परिचित भएका धीरेन्द्र राम्रो उद्धोश गर्ने व्यंितव पनि हुन्।’’ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक भाषिक परिपेक्ष्यमे कहैत छथि- ‘‘ गजल सङ्ग्रहको महत्वपूर्ण पक्ष हो- भाषिक संयोजन, नेपाली र मैथिली भाषाका ठेट षब्दहरूको संयोजन अति राम्रोसंग अति राम्रोसंग भएको छ; जुन महत्वपूर्ण पक्ष हो
‘‘ माटोमा नै मन्दिर देख्ने ‘ चलित्तर ’ ले पनि अब
  बलि दिने ‘ गहबर’ मा रे , साढेसाती कटेपछि ’’
हमर प्रसंगक बीच धीरेन्द्र प्रेमर्षीक चर्च करबाक पाछू किछु अभिप्राय अछि जतऽ भारतीय युवा साहित्यकार (ओ लोकनि जे अपनाकें हिन्दीक साहित्यकार बुझैत छथि) लोकनि कतहु मैथिलीकें मान नै दऽ पबैत छथि, मात्र मैथिलीकेँ क्षीण करब हुनक मंशा रहैत अछि। पूछय चाहैत छी जे ई मानसिकता किएक? एक्के भाषाक लोक आ ई भिन्नता किएक? आ अन्तमे कवि धीरेन्द्र प्रेमर्षीक गजलक ई पाँति हमरा मोन पड़ैत अछि-
‘‘ जोर जुलुमसं जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ
   इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ’’

यात्रीक प्रसंग
ई साल यात्रीक जन्मशती वर्ष अछि मुदा मिथिला आ मैथिलीक कतेक लोक हुनका मोन पारि रहल छनि जे नै कहि। कारण यात्रीक जन्मदिन मनेबाक अर्थ ई नै अछि जे हमरा लोकनि हुनका नामपर समारोह केलहुँ कि नै ( ओना समारोहक आयोजन करब विशेषतः अपन स्वार्थ रहैत अछि)। यात्रीक विचार कतेक जीवित रखने छी हमरा लोकनि , कारण मैथिली साहित्यक स्थिति ई अछि जे बिसरब आ खिधांस करब मात्र हमरा लोकनिक कर्तव्य छी, तइपर विचारब आवश्यक। आशीष अनचिन्हार , जे हमरा जनैत यात्रीकें बुझबाक चेष्टा नै कएने हेताह यात्रीक ऊपर अंगुरी उठबए लगैत छथि। हमरा तँ आश्चर्य लगैत अछि जे हम सभ आखिर पुरखाकें सम्मान नै दऽ सकैत छियनि तँ कमसँ कम अपमान तँ नै करक चाही। यात्रीक साहित्य आ हुनक मैथिली सेवाक मूल्यांकन करबाक संग ,पहिनें ई सोचि ली जे यात्री मिथिला आ मैथिलक लेल की देलन्हि। विकृतिता आ संर्कीणतासँ भरल मिथिलामे सेहो यात्रीक जन्म भऽ सकैत छल। ऐ सौभाग्यपर सोचू। कारण यात्री सन व्यक्तिक जन्म बेर-बेर नै होइत अछि।
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हिन्दीक दृष्टि आ मैथिली भाषा
भारत आ नेपाल दुनू ठाम आइ काल्हि जनगणना भऽ रहल छैक जइ मध्य भाषाक सेहो गणना हएत । जइसँ ज्ञात हएत जे कोन भाषाक कतेक भाषा-भाषी अछि । आ ऐ समयमे हिन्दी भारतक राष्ट्रभाषा अछि ओना सत्य ई अछि जे ओ अखनि धरि अपन समांग बचेबाक लेल कुहि रहल अछि कारण भारतमे जे कोनो काज होइत अछि ओ अंग्रेजीमे। कारण सम्पूर्ण भारतक सम्पर्क भाषाक आधार हिन्दी नै अछि ओकर आधार अंग्रेजी अछि । भारतमे कहल जाइत छैक जे अंग्रेजीक प्रभुत्वक कारण हिन्दी पछुआएल अछि मुदा से सत्य नै थिक । हिन्दी भाषाक प्रति जे लोकक मानसिकता अछि ओ यदि हिन्दी स्वीकार करैत अछि तँ ओकर अपन मातृभाषाक अस्तित्व समाप्‍त भ सकैत अछि। कारण मैथिली भाषा ओकर प्रतिफल भोगि रहल अछि। हम कहि रहल छलहुँ जनगणनाक विषयमे। ऐ जनगणनामे हिन्दी पुनः मैथिलीक अस्तित्व समाप्‍त करबाक लेल अपन राजनीति खेल चलि रहल अछि जेकर प्रश्रय हमर सभक नेता लोकनि दऽ रहल छथि।
ऐठाम मैथिलीक प्रति हिन्दीक दृष्टिक मादे नेपालक पत्रकार आ साहित्यकार अभि सुवेदी अपन आलेख ‘ समय रेखाः विद्यापति , प्रेमर्षि र हुसैन’ मध्य लिखने छथि- मैथिली भाषाले मिथिलामा हिन्दी भाषाबाट खेप्नुपरेको यातनाको कथा लामो छ । जनमत भएको बेला अंग्रेज र पछि भारतको कंग्रेस सरकारले मैथिली भाषीलाई हिन्दीभाषी हुँ भनेर परिचय दिने प्रचार आदेश अनि अरू कथाहरू स्व. रिचर्ड बर्गार्ट भन्ने बि्रटिस र एक मित्रको गम्भीर अध्ययनमा हामी राम्ररी पढन पाउँछौँ । नेपाली भाषाको कारणले र अहिले आएर फेरि राजनीतिमा हिन्दी बोल्न नजाने पनि हिन्दीलाई राजनीतिक आधार मानेर प्रचार गरिहिँड्ने नेताहरूका आँखामा मैथिली भाषा ओझेलमा पर्ने डर सिर्जना भएको छ ।’
ऐ उक्ति सँ ई निश्चित भऽ जाइत अछि जे हिन्दीकेँ अपन अस्तित्व रक्षामे सभसँ बेशी डर मैथिलीसँ छैक तँए तँ ओकर भाषाशास्त्री आ साहित्यक आलोचक लोकनि मैथिलीकेँ अपन बोली कहि कहि मैथिलीकेँ दबएबाक चेष्टा करैत छथि । कारण हिन्दी अपन बोलीक संख्या बढा चढाकेँ प्रस्तुत कएने अछि जइसँ लगैत अछि जे हिन्दी कतेक कमजोर अछि। हम भारतक भाषा विषयक एकगोट संस्थामे काज करैत छी आ ओतहि ऐ मुद्दापर चर्चा होइत छैक जे हिन्दी केकर मातृभाषा छी , हिन्दी कतऽ मुख्यतया बाजल जाइत अछि। कियो उत्तर नै दऽ पबैत छथि कारण जे हिन्दी क्षेत्र कहि रहल छथि ओइठामक भाषा हिन्दी नै अछि। हुनक मातृभाषा दोसर थिक हँ हिन्दी भारतीय राजनीतिसँ जुड़ल होएबाक कारण सम्पर्क भाषा थिक । तखन तँ एकर अर्थ भेल जे हिन्दीक निज साहित्य जेकर बलेँ ओ अपनाकेँ प्राचीन कहेबाक चेष्टा करैत अछि ओ सत्य नै थिक । हिन्दी आइ अपन अस्तित्वक लेल जे साम्राज्यवादी मानसिकता पोसने अछि ओ ओकरा लेल नीक नै छैक । तँए हम मिथिलाक लोककेँ हिन्दीक पट्टीक लोक नै कही। ओइ लेल भारत आ नेपालक दुनू मिथिलाक लोककेँ एकटा भाषा आन्दोलनक आवश्यकता छैक किएक तँ जावत धरि हिन्दीक पाँजसँ हमर भाषा, हमर लोकवेद आ हमर साहित्यकार नै मुक्त हेताह तावत धरि हम एहिना हिन्दीक माँझमे दबाएल रहब ।


वैश्विक सोच ?

की, मैथिली साहित्यमे आइ काल्हि एकटा नव संस्कार वैश्विक सोच देखबामे आबि रहल अछि? प्रायः तकरहि सिद्ध करबाक लेल युवा रचनाकार धरि अपन भाषिक मर्यादाकें तोड़ि रहल छथि। सभसं बेसी दुखद पक्ष अछि जातिवादक नारा। हमरा सभकें ज्ञात अछि जे भारतीय राजनीतिमे एहन नारा राममनोहर लोहियाक देन थिक, खास कऽ उत्तर भारतमे। ठीक ओहने सन नारा मैथिली साहित्यमे तारानंद वियोगी लगाएब प्रारम्भ कएलनि अछि। एतय हुनक नाम उद्धृत करबाक प्रयोजन एहि कारणें भेल जे ओ अपनाकें ‘ नन मैथिल’ कहैत छथि। से कोन आधार पर? हमर एकटा मित्र छथि मणिपुरक, जे नेपाली भाषी छथि मुदा अपनाकें मणिपुरी कहाएब पसिन्न करैत छथि। ओ जखन वियोगीजीक उक्त अंश पढ़लनि तँ हमरासँ पूछि बैसलाह जे- अतुल यो लेखक मिथिलाको हो, हम कहलियनि- हो! ओ ई बुझि हँसय लगलाह। हमरा बड्ड खराब लागल। मुदा मोने मोन सोचलहुँ जे ई नव पंडित छथि, आधुनिक समयक नव वर्ग, नव सामंत। एहन वर्गमे अवसरवादिता चरम पर देखल जा सकैत अछि आ ओ सभ कखनो ओकर लाभ लेबासँ चुकए नै चाहैत छथि, ओइ लेल जतेक नीचाँ तक जाए पड़नि। तें एहन चरित्रबला साहित्यकार सभसँ मिथिलाक विषयमे एहिसँ नीक सोचब अकल्पनीय होएत, ठीक तहिना जेना एकटा अंग्रेज भारतक विषयमे सोचैछ। हमरा जनैत वियोगीजीकें ई बुझल छनि जे यदि ओ ई बात मैथिल समाजक विषयमे कहथि जे हम सभ मैथिल नहि छी ( जातिवादक सहारा बिना लेने ) तँ हमरा विश्वास अछि हुनका बड्ड फज्जति हेतनि। तें जातिवादक ढालपर अपनाकें मिथिलासँ दूर देखएबाक प्रयास करैत छथि। ठीक,एहिना मर्यादा तोड़ैत देखाइत छथि किछु नवतुरिया सेहो, जिनका नै तँ मैथिली साहित्यक गम्भीर अध्ययन छनि आ नहिये साहित्यिक मर्यादा बुझल छनि। कारण ई युवा लोकनि साहित्यिक आ मिथिलाक चिंतनसँ बेसी आरोप आ प्रत्यारोपमे समय आ शब्द बर्बाद करैत छथि। जेना आशीष अनचिन्हार अपन विकीलीक्सक खुलासामे शब्द सभक जे प्रयोग कएने छथि जे हुनक साहित्यिक अनुभवहीनताकें देखबैत अछि। हुनक आक्रोश सत्य ओ उचित भऽ सकैत अछि मुदा ओहनो स्थितिमे शब्दक प्रयोगक एकटा सीमा छैक, जकरा लांघब शिष्ट समाजक लेल उचित नै। बहुतो टिप्पणी पढ़बाक क्रममे सेहो  किछु टिप्पणी पढ़ल, लागल जेना ई लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक तथाकथित दुर्बल पक्ष पर टिप्पणी कऽ सकैत छथि, आर किछु नै। ओना हुनका लोकनिक टिप्पणीसँ मैथिली साहित्यकें कोनो प्रभाव नै पड़तैक से हुनका बुझक चाही। कारण किछु व्यक्तिक हो-हल्लासँ सार्थक काज रूकि नै सकैछ। ओ सभ एकटा वर्ग आ व्यक्ति धरि मैथिली साहित्यकें राखय चाहैत छथि, जे हुनक संर्कीणताक परिचय दैछ। यदि हुनका लोकनिसँ सार्थक काजक विषयमे पुछल जाएत तँ कहताह मैथिलीमे पाठक नै अछि। तँए ई रिस्क लेब निरर्थक। ओ लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक खिधांस करताह, मैथिली साहित्यक सेवा नै। से किएक?
ऐ बीच मैथिली साहित्यक लेल किछु सार्थक प्रसंग सेहो दृष्टिगोचर भेल अछि। से थिक विलक्षण दू टा पोथीक प्रकाशन। दुनू पोथी अपन बात रखबामे सफल भेल अछि। जीवकान्तक आत्मकथ्यात्मा पोथी नै मात्र गाम आ खेतीक महत्वकें जगजियार करैछ, अपितु अपन गाम आ धरतीक प्रति अनुराग सेहो उत्पन्न करैत अछि। जीवकान्तक लेखनीक अपन विशेषता छनि जइ कारणें हुनक लेखन सदैव एकटा नव भाव दैत आएल अछि। एहिना डॉ० वीणा ठाकुरक पहिल उपन्यास ‘ भारती’ मिथिलाक नारीक चेतनाक कथा तखन कहैत अछि जखन कि सम्पूर्ण भारतवर्षमे नारी चेतनाक विषयमे सोचलो नै जा रहल छल। ओइ समयमे ओ सम्पूर्ण भारत वर्षक विषयमे सोचि रहल छलीह। उपन्यासक कथा वस्तु नारी चेतना धरि सीमित नै रहि राष्ट्रीय जागरणसँ भरल अछि। अतिशयोक्ति नै हएत जे वर्तमान मिथिला आ भारत वर्षक परिस्थितिकें ई उपन्यास पूर्ण सार्थक आभास दैत अछि।
हमर एकटा नेपाली भाषी कवि मित्र, जे दार्जिलिंगक थिकाह, देश, भाषा, समाज आ साहित्यपर चर्चाक क्रममे बहुत दुखी होइत कहैत छथि जे आदमी-आदमीक बीच एक दोसराक प्रति घृणाक भावनाक जन्म किएक भऽ रहल अछि आ ओ ऐपर घंटो अपन अभिमत दैत रहैत छथि, आ हमहूँ सभ हुनक ऐ चिन्तापर सहमत होइत रहैत छी। ई उद्धरण देबाक पाछाँ हमर ई अभिप्राय अछि जे हमरा सभकें जतेक सभ्य होएबाक चाही ओइसँ बेशी हमरा लोकनि असभ्य भऽ रहल छी आखिर किएक? की, एकर पाछाँ विश्व-मंच प्राप्त करबाक सपना अछि? एहन सपना तँ सभकें होएबाक चाही, मुदा सभ्यता-संस्कृतिक बलपर कतेक धरि उचित? लिखबा-पढ़बाक क्रममे सभसँ आगाँ अपन सभ्यता-संस्कृतिकें राखब बड़ आवश्यक ओ उचित सेहो।

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(अतुलेश्वरजी, तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/  पर  वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोकओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ओ टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथिन्ह। एकर उत्तर पाठक सभ देने रहथिन्ह जे एतए नीचाँमे , हमर टिप्पणीक बाद) बिना काँट-छाँटक देल जा रहल अछि। ओही सम्पादकीयक रेस्पॉन्समे गंगेश गुंजन जी लिखने रहथि जे युवा सुभाष चन्द्रक ई गप जे "गंगेश गुंजन पाँच साल पहिने कमानी ऑडीटोरियममे कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कृत कऽ देलकन्हि" सत नै अछि, ओ कहलन्हि जे ओ ई नै बाजल छथि, सुभाष चन्द्र एकर उत्तर नै देलथि से गुंजन जीक गप मानल जाएत। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। मेलक अतिरिक्त हजारीबागक "सगर राति दीप जरय"मे ओ आ बहुतो गोटे कहैत सुनल गेलाह- एना नै लिखू, अशोक-श्रीनिवास आदि सन लिखू, पहिने पढ़ू तखन ओहने लिखू (ई मानि कऽ ओ सभ चलै छथि जे ओ सभ बिन पढ़ने लिखै छथि!)। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा",  बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथ,ि ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत।
१.जातिवादी मानसिकता माने जे केलक से हमर आनुवंशिक जाति केलक, से ककरोमे भऽ सकैए।
छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै।
असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/
- मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_13.htm भेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि।
राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस,  जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि।
२. धनाकर जीक एकटा विचार छलन्हि (विचार नै निर्णय छलन्हि) जे रामनाथोक बदला रामनाथहुँ हेबाक चाही!! उमेश मण्डल आ धनाकर ठाकुरक पूर्ण बहस विदेहक ८४म अंकक सम्पादकीयमे आएल अछि।

३.विदेहक नूतन अंकमे जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल   जाए:- “जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍।”
की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक?
४.किछु विचार टिप्पणी: मैथिली सम्बन्धी किछु समाचार / घटना/ प्रकाशन पर चारिटा विचार-टिप्पणी—ऐ सन्दर्भमे।
सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै।
- गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक)

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मैथिली मे जं फूइसक आंधी चलत, तं कोना बांचत हमर भाखा

by Avinash Das on Sunday, June 19, 2011 at 4:52pm

तारानंद वियोगी

मैथिलीक सुप्रसिद्ध लेखक डा० विभूति आनन्द आइ बहुत दुखी भ' क' हमरा फोन केलनि। भाव-विह्वल छला आ ताहि संगे आक्रोशित जकां सेहो। हम पुछलियनि - भाइ, की बात? ओ बेर-बेर कहथि - 'अहां कें एना नहि बजबाक-लिखबाक चाही।' हम चकित रही जे आखिर एहन कोन बात हम बजलहुं वा लिखलहुं जाहि सं हमर ई आदरणीय लेखक एहि तरहें दुखी छथि।

बात जे ओ कहलनि, ताहि सं हम बुझलहुं जे हुनकर क्यो अपेक्षित हुनका कहलकनि जे तारानन्द वियोगी 'विदेह' (मैथिली इन्टरनेट पत्रिका एवं फेसबुक-ग्रुप) मे कहलखिन जे विभूति आनन्द कें जे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि, से बेटाक मृत्युक सान्वना-स्वरूप। हमर देह सिहरि गेल जे हे भगवती, ई लीला। एहि बात सं तं हम निश्चिन्त रहबे करी जे एहि तरहक घटिया बात हम आइ तं की जे कहियो बाजिये नहि सकै छी। मोन मे यैह आएल जे गजेन्द्र ठाकुर हमरा सं दुश्मनी निमाहैत-निमाहैत की आब एते पतित भ' गेला? पछिला तीस बरस सं साहित्य मे हमर बहुत दुश्मन भ' चुकलाह अछि। हमरा खिलाफ मे जते लिखल गेल अछि, तकरा जं पुस्तकाकार छपाओल जाय तं पांच सौ पृष्ठक विशाल ग्रन्थ भ' जेतै। एकरा हम कहियो बेजाय नै मानलियै, उनटे अपन सौभाग्य मानलहुं जे जीबन्त-जागन्त लोक छी तं वैचारिक विरोध तं हेबे करत। तकरा सब कें पढबाको फुरसत हमरा नै रहैए। अपन काज करी कि घून-सून लेने घुरी? मुदा ओ कहलनि तं हम कने ताक-झांक केलहुं।

एतबा बात तं प्रायः सब गोटे कें बूझल हएत जे इन्टरनेट पर वा फेसबुक मे सैकडोक संख्या मे फरजी एकाउन्ट छै, जे साइबर-युद्ध मे नकली सेनाक काज करै छै। कतेक बेर तं ई डिसाइड करब कठिन भ' जाइ छै जे के असली आ के नकली। जे किछु। एहने एक कोनो बन्धु बहुत उद्दंड भाषा मे लिखलनि अछि जे ई बात हम तहिया कहने रही, जहिया विभूति जी कें अकादमी पुरस्कार भेटल रहनि आ साक्ष्य के तौर पर 'समय-साल' पत्रिका के उल्लेख कएल गेल छै। गजेन्द्र जी एहि कथन कें अपन स्वीकृति प्रदान केलनि अछि।

हम विभूति जी कें सब बात कहलियनि। पुछलियनि---'की अहां कें मोन पडैए जे हम तहिया ई बात कहने रहियै?' मुदा, हुनको ई बात अविश्वसनीय लगलनि। अन्त मे ओ 'समय-साल' निकाललनि। सरिया क' देखलनि। अन्त मे फेर वैह हमरा फोन क' क' सूचित केलनि जे अहांक ई बात कहबाक तं कतहु कोनो जिक्र नहि अछि। ओ हमरा पर दुखी भेल छला, ताहि लेल अपसोच प्रकट केलनि। फेर गप भेल जे हमरा एहि बातक खंडन प्रकाशित करबाक चाही।

हम भारी छगुन्ता मे छी जे की खंडन प्रकाशित करी? अनजान मे गलती हो तं आदमी सुधरि सकैए। एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।

खंडन केने सं की हएत? हम पहिनो खंडन क' चुकल छी। मुदा ओ सब अपन खुट्टा ठामे पर गाडने रहला। उनटे बकथोथनि करए लगलाह।

तैयो, विभूति जीक सम्मानार्थ हम इन्टरनेट सं जुडल मैथिलीक पाठक-लेखक-एक्टिविस्ट लोकनि कें सावधान करै छियनि जे 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै। ई छौडा-मारडि के खेती छिऐक, नै उपजल तं अथी सती.....। जं कोनो कारण सं विश्वास करब बहुत जरूरी हो तं साक्ष्य के परीक्षण स्वयं क' लेथि।
Samrendra Kumar Das kee leekh deliyai yau ?
June 19 at 9:08pm
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Ajit Azad oh...bashir badra ji ahan aai fer mon parlahun.......DUSHMANI JAM KE KARO, MAGAR ITNI GUNJAAISH RAHE...KI JAB KABHI HAM DOST BANE TO SHARMINDA NA HON.
June 19 at 10:01pm
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Prabhat Jha Kabe kis muh se jaaoge ghalib
Sharm tumko magar nahi aati
June 19 at 10:06pm
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Priyanka Jha
Ajay Karn
परम आदरनिये तारानंद जी,
अपनेक टिपण्णी फेश बुक पर अध्यन करबाक सुअवसर भेटल त हम अपनाके धन्य बुझलौं. एही टिपण्णी में अपने मुख्य रूप सं आदरनिये डा० विभूति आनन्द सं वार्तालाप करीत जाइन परेत छी मुदा छोट मुह आ पैघ बात ...किछु संदर्भित उल्लेख सं वक्तिगत रुपें हम असहमत छी .(1) अपनेक अनुसार "मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। " सब मैथिल अपनेक ई बात सं सहमत होयता मुदा प्रश्न जे ई "सुनियोजित अभियान" चला के रहल छथि? ..... हमर वक्तिगत विचार जे ई अभियान हम सब मैथिल बंधू समलित रूप सं संचालित क रहल छी. ( ख़राब नें मानब मुदा जखन अपनेक पुत्रक फेश बुक देखल तं भाषाक स्तम्भ में मैथालिक कोनो चर्चा नै छल) तै एकर सफाइ लेल मेहतरक फौजक नै अपन कर्तब्यक मांग थिक जाहि सं एकरा बजबूत आ समृद्ध कैल जाए.(2) भाषा कोनो उपजातिक ( अपने उध्ह्रित केने छी जे " पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी। ") संपत्ति व एकाधिकारक चीज कदापि नें भ सकित अछी आ मैथिलि त एकदमे नै | ई त कोनो बिसेष प्रान्त, स्थान व् देसक अलंकार थिक . अइयो ब्राह्मण या मेहतर सं कही बेसी आन उपजतिकलोकक भाषा मैथली थिक .(3) अपने कहलों जे " 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै" मुदा हम विदेहक नियमित पाठक छी आ लगभग विदेह में छपल सब बात हमरा त विश्वसनीय लागल.अंत में कहब जे छौडा-मारडि के खेती छिऐक तहिलेल विश्वसनीय छिऐक..!!!विदा लेबं सं पाहिले अपने सं निवेदन जे जं हमर उपुक्त कोनो बात सं ज अपनेक असुबिधा वा कष्ट पहुंचल होए त हम छमाप्रार्थी छी ...
June 20 at 8:03am
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Priyanka Jha
Aman Thakur baar nik vichhar apneke,aanhake vichhar saa aanha katek sresth log hoyab e baatak pata chaliye yeah... sresth log par katbo kiyo anguli utheta lekin sresthta ehen chij chai k oo apna adhigrahit vyaqti k saath kahiyo nai chorrai chhai !!! aahan apan kaaj nik dhang saa karu baki duniya k je kara k chhai se kara diyaw.. hum sab aanhke saath hamesha deba lel taayar chhi....
about an hour ago
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Dhirendra Kumar
लत्तड -फत्तड ककाका जे खिस्सा समय सालमे अबै छै ओइमे लिखल छलै (वियोगीजी-अहाँकेँ संकेत क') जे विभूतिजीक पुरस्कारकेँ अहाँ सांत्वना पुरस्कार लइखि क' पठेने रहियन्हि आलेखमे जे ओ नै छपलनि मुदा लत्तड -फत्तड ककाक खिस्सामे लिखि देलन्हि। आ जखन अहाँक ऐ आलेख (विदेह फेसबुक) पर एकटा पाठक ई प्रश्न उठेलन्हि तकर दू मासक बाद अहाँकेँ एकर जवाबक खगता की पड़ल:- ..
June 20 at 8:05am
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Priyanka Jha
Taranand Viyogi
मिथिला के कुछ लडके इनदिनों फेसबुक पर मैथिली लेखकों से लड रहे हैं। मुझे तो पता भी नहीं था, देवेश ने आग्रह किया तो लडाई देखने मैं भी उनके आंगन गया था। मजा नहीं आया। लडके इस तरह विवस्त्र होकर लड रहे थे कि शामिल होने का मन भी नहीं किया।

लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।

लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। न संवेदना के स्तर पर न ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।

सीनियर के तौर पर गलियाने के लिए मुझे भी चुना गया है। खुशी हुई कि चलो, इस लायक समझा गया, 'नन-मैथिल' होने के बावजूद। मगर, दुख भी हुआ कि ये लडके ब्रह्म-वाक्य भाखने का दम्भ तो रखते हैं पर वास्तविक तथ्यों के बारे में कितना कम और अधूरा जानते हैं।देखिए, मुझे गाली देने के लिए ये 'जमीन्दार' शब्द चुनते हैं।

मेरी पुरस्कृत किताब 'ई भेटल तं की भेटल' के बारे में बहुत अद्भुत जानकारी इसमें दी गई है। समझें, मेरा भी 'ज्ञान-वर्द्धन' हुआ, खुद अपने बारे में। लिखा है कि ये किताब मेरी हिन्दी किताब 'यह पाया तो क्या पाया' का मैथिली रूपान्तर है। अबे यार, पूछ तो लिया होता। 'यह पाया.....' १५० पृष्ठों का कहानी-संग्रह है जो २००५ में प्रेस गया पर प्रकाशक के महिमा-वश अब तक भी बाहर न आ सका। इसलिए लिखनेवाले ने इस किताब को कहीं देखा भी न होगा। पर, लिख दिया मजे से। और, इसी बिना पर मुझे गलियाये जा रहे हैं।

अरे पंडित, कुछ तो स्तर निभाना सीख। कुछ तो गहरा हो यार। कुछ तो खयाल कर कि 'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का?..
Shyam Shekhar Jha, Bhaskar Jha, Dinanand Mishra and 11 others like this.



Pradeep Chaudhary bilkul shaee kaha aap ne Taranand babu
April 14 at 12:05pm
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Avinash Das Great View! Congrats!! Salaam!!!
April 14 at 12:06pm
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Kumud Singh आरोप लगानेवालों की चुप्‍पी परेशान करनेवाली है, आखिर वो तेवर दिखानेवाले गायब कहां हो गए
April 15 at 10:50am
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Prakash Jha
मुझे अत्यंत ही आश्चर्य हुआ इस जानकारी से कि ये कौन लोग हैं । तारानन्द वियोगी जी द्वारा लिखित पुस्तक ई भेटल त' की भेटल मैलोरंग प्रकाशन से प्रकाशित है । और मुझे अपने पुस्तक के बारे में अच्छी जानकारी है । इस तरह के विवादों को उठाने वाले लोग सच...See More
April 15 at 10:56am
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Manoj Karn ai nab ukas pakasak darsnarth dhanyabad.-munnajee.
April 15 at 7:34pm via
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Vikash Jha taranand sire....main ek baat ye puchna chahta hun ki aapne apne aapko non-maithil kyun likha hai..ye baat mujhe pachi nahi...jara khulasa kijiyega...
April 15 at 7:41pm
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Shri Dharam
@Vikash ji maithilik tathakthit beta sab yatree je son la ka viyogi ji dhari jahi tarhen gariya rahal chathi tehna men keo ahi tarhen sochi sakait achi. jahi lekhak lokani ken gari del jarahal chani tinka jo maithili sn nikalidel jay t banchat kee ANNDA????
April 15 at 11:22pm
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Vikash Jha
Shri Dharam...tain ne kahlaun ..jakahn sir kahalkhin hum non maithil chi bada dukh lagal...kiyek t e sab jaun naie rahthin t kona kaaj chaltaie...e t uchit naie ne ki kakro saun 2 ta gaier sunla per ham apna aap ke oie community saun alag k li???
April 16 at 1:28pm
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Mihir Kirti
@ taranand--------------- vah main to kayal ho gaya aapki samvedna kaa jab hamre sahitykar vibhuti ji ko putrashok hua tha aur unnko akademi purskar mila tha to aapne samy -saal me main use santavna purskar kaha ----- us samay aapki samvedna ko kya lakva maar gaya thaa..........
April 16 at 1:48pm
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Mihir Kirti
@prakash---------- kaysthvad ke virodh me aapka jo bramhanvadi chehra saamne aane ke bad shayd is tarh ka comment aapki prakaskiya majboori ho sakati hain.
April 16 at 1:55pm
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Kumud Singh वाह, यह बहस बता रहा है कि मैथिली साहित्‍य का स्‍तर कितना उपर चला गया है, सभी से निवेदन है कि सभी गाली दे कर अपनी भडास निकाल लें, इससे आरोपी और आरोपित दोनों मैथिली के सेवक कहलाएंगे, शर्म किजिए यह सार्वजनिक मंच है
April 16 at 2:03pm
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Mihir Kirti
@kumud jI mafi chahi.
April 16 at 7:40pm
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Mihir Kirti
Vikash Jha---- neek masla uthebak lel dhnyvad. bhai jena kichu saal phine bhartak cricket team ke captain par match fixing ke aarop lagal rahaik aa pramanit seho bhelaik. takar baad o captain bayan delkai je ham alpsankhayk chii aa sampradayik tatav sabh hamra virudh me kahdyantra kelk achi. vartman ghatna ehne san achi.
April 16 at 7:45pm
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Sunil Kumar Mallick
Viyogi G
Pranam
Bahut dinak bad aahank kalam sa likhal Sabda sab bhetal khusi lagal. Sange
dukh seho je kichh nenpani dekhaba balak chalte aahan maithili pratik
aahank apan yogdan ke kyo bisair nai sakaiye. Dosar aahan apna ke Maithil
Nai kahai chhi ta apne ki chhi ? what's your identity? Tesar aahank Jawab
hindi me aayael kiye apan bhasa maithilike Kakro sa kam bujhai chhiyai? Abhivyaktik Madhyam ke roop me maithili ke lag sabda Bhandarak kami chhaik
ki? charim aa antim wakya je aahan likhne chhi je

'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का? ki Maa maithili aahank Nai ? Viyogi san sidhasta writer aa maithili Pratik Dharna katau ne katau Bad taklif
detai maithili me kaj kenihar lok sab ke.
Besi Bajal hoi ta chhama kayal jetai.
Sunil Mallick
President
Mithila Natyakala parishad, janakpurdham, Nepal
May 13 at 8:51pm via
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Bechan Thakur monak gap kahalau mallik ji..maithili par ehsan karaibalak kami nai chhai, kaj sutari gel aa maithili ke tata bye-bye kahai chhathi..hamahoo gair dvij chhi muda garv se kahai chhi je ham maithil chhi..muda tamase me te lokak asali vichardhara abaiye sonjha me..je karathu..
May 13 at 8:58pm
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Bechan Thakur
poora bahas etai achhi sunil kumar llikji http://www.facebook.com/notes/ashish-anchinhar/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A...See More
May 13 at 9:05pm
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Bechan Thakur blog par seho achhi http://www.ashantprashant.blogspot.com/ ee sampoorna bahas, otai javab delak baad ai maithilik group par hatasha vyakt karbak kono aavashyakta nai chhal..
May 13 at 9:07pm
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Sunil Kumar Mallick Bechan ji
hatas sa besi ee taklif dai chhai khas ka ka Viyogi ji san Majal maithili abhiyani sa.
Sunil Mallick
May 13 at 9:10pm via
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Bechan Thakur maajal lok sabh jan chhorthinh takhane asali groundwork lok sabh sojha ayatah aa maithili bachat..
May 13 at 9:11pm
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Sunil Kumar Mallick Etta chhorbak Baat kyo gote nai karu, sametbak baat karu. maithili ke aab bachaba ke jaruri nai chhai. bachayael ta ooi ke jai chhai je Rogiyah wa
mair rahal hoi. hamra janait Maithili samridhik dis ja Rahal aaichh aab
matra kukur kataunjh sa kanek bachbak jarurat chhai.
May 13 at 9:16pm via
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Bechan Thakur sahi kahalau, muda gulchharra urabaibala sabh se bachebako jaroori parite chhai, ek gaal me thapar kha ka dosar gaal sojha dai bala jamana gelai..
May 13 at 9:18pm
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Rajdeo Mandal samay aabi gel achhi je maithili aa hindi dunu me ekke rachna ke maulik kahay bala par aa false biodata denihar par lagam kasal jay, sametabak baat karait karai katek black-sheep maithili me ghusi gel achhi je hindi bala sabh maithili ke barbad karaile ghusene achhi..
May 13 at 9:29pm
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Dhirendra Kumar
14 april 2011 se 23 june bhay gel adhai maas me, type kayal, va hastlikhit va kono roop me 150 panna ye paya to kya paya nai aayal, prakashak je 6 saal se kitab nai chhaplani takro naam nai aayal, daso panna te day ditiyai viyogiji scan kay ke..
June 23 at 5:38pm
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Dhirendra Kumar Nitesh Jha ji ham galat chhalau, ee gari sabh ke ekatrit karoo te ek dedh nai doo-adhai say pannak pothi viyogi ji chhapba sakai chhathi..
June 23 at 5:39pm
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Priyanka Jha
Dhirendra Kumar विदेह सभ गपकेँ सोझाँ अनैत अछि, जे अहाँ सभ सन साहित्यकार गुपचुप कनफुसकी करैत रहैत छथि, ओतए मात्र सभ सम्वादक अभिलेखन कएल गेल छै जै सँ सभकेँ अपन करनीक जिम्मेवारी लेमए पड़तन्हि, गपाष्टकक गप खतमे बुझू..
20 minutes ago
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Vinit Utpal 'samay sal' me ' lattar kaka' ke ohi sal i gap chapa chal jahi sal hunka puraskar bhetal. hamun padhne rahi.sanket del gel chhal.
20 minutes ago
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Dhirendra Kumar http://ashantprashant.blogspot.com/
15 minutes ago
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Priyanka Jha
viyogiji , je charcha ahank videha par del gel aalekh me uthal chhal kee o charcha maithili sahityakar madhya nai chhal, sabh ek dosra ke kahait rahait chhathi je shardindu ke ahan ee patra va aalekh pathene rahiyanhi, je vinit ji likhne chhathi se sanket hamhoo samay saal me dekhne chhii, kono satya va jhooth je ek kaan se dosar kaan aa aab facebook par aabi gel takar javab te maangale jayat, videhak jatek dushman badhtai o tatek aagan badhat..gajendra thakur se ahan ke kon dushmani achhi? ee spasht nai kay saklau....
June 20 at 8:08am
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Avinash Das Priyanka Jha जी, केओ केकरो आलेख पठेलकय, नइं छपलइ, घुरा देल गेलय, ओइ आलेख मे एहन कोनो बात रहय, जो अशोभनीय छलइ - की ई सभ गप मैथिली साहित्‍य के उच्‍च विमर्शक कोनो माहौल बनबय छई? अफवाह आ कानाफूसी कि साहित्‍यक विमर्शक केंद्र मे हेबाक चाही? गजेंद्र ठाकुर नीक काज कए रहल छथि ... मुदा अपने काज मे अइ स्‍तरक बातचीत लाबि क ओ अपन सभटा उल्‍लेखनीय काज के मिटा देब' चाहैत छथि - तं दोसर की क' सकैत छैक!!!
June 20 at 8:14am
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Avinash Das खोजी पत्रकारिता उ हएत जखनि वियोगी जी के उक्‍त आलेख अहां सब प्रकाशित क' सकी।
June 20 at 8:16am
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Priyanka Jha अविनाशजी , अहाँकेँ कियो कहत जे कौआ कान ल' गेल तँ कौआ केँ खेहारब आकि कान ताकब..
June 20 at 8:21am
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Priyanka Jha जै सम्पादकीयक आधारपर तारानन्द जी गप उठेने छथि ओ देखू. http://www.videha.co.in/aboutme.htm
June 20 at 8:21am


Priyanka Jha विदेह फेसबुकमे हम पहिनहिये (अहाँक कहबासँ पहिने) ई आलेख कमेंटक संग पेस्ट क' देने छी,..
June 20 at 8:22am
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Priyanka Jha
ऐ सम्पादकीयमे वियोगीजीक कथनक विपरीत (जे सम्पादक अपन सहमति देखेने छथि) मात्र तथ्यक निरूपण कएल गेल छै..कानाफूसी बड्ड दिन भेलै आ तकर कोन ग्रुप जिम्मेवार अछि से अहाँकेँ बुझले हएत.. सम्पादकीयक अंश द' रहल छी.."तकर बाद तारानन्द वियोगी जीक हिन्दीमे रंग-तरंग आ अभद्र भाषा (रे-रे सम्बोधित कएल भाषा) मे पोस्ट दोसर ठाम आएल (विदेहक फेसबुक चौबटियापर) आ अपनाकेँ ओ गएर-मैथिल घोषित कएलन्हि आ सम्वेदनाक गप उठेलन्हि। ओइपर एकटा पाठक हुनका लेल मैथिलीक उपयोगिता पुरस्कार पएबा धरि सीमित बतेलन्हि तँ दोसर पाठक हुनकर सम्वेदनाक स्वरकेँ फूसि बतेलन्हि आ हुनका अपन “समय साल” मे पठाओल लेखक विषयमे मोन पाड़लन्हि जकर चर्चा बहुत दिन धरि मैथिली साहित्य मध्य चलैत रहल छल- ऐ लेखमे ओ विभूति आनन्दकेँ मैथिलीक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाकेँ सान्त्वना पुरस्कार बतेने रहथि कारण ओइ बर्ख हुनकर जवान बेटाक मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। ई पाठक वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे तखन की अहाँक सम्वेदनाकेँ लकवा मारि गेल छल। एकटा पाठक प्रश्नक जवाबमे श्रीधरम कहलन्हि जे जाइ तरहेँ मैथिलीक किछु बेटा सभ यात्रीसँ वियोगी धरिक लेखनीक मौलिकतापर प्रश्न उठेने छथि तँ ओइ स्थितिमे कियो अही तरहेँ सोचि सकैत अछि। ओ ईहो कहलन्हि जे जँ हिनका सभकेँ हटा देल जाए तँ मैथिली साहित्यमे की बचत अण्डा !! बहुत दिनक बाद सुनील कुमार मल्लिक सेहो ऐ पोस्टपर वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे अहाँ मैथिल नै छी तँ अहाँक आइडेन्टिटी की छी? "...
June 20 at 8:26am
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Priyanka Jha
वियोगी डिसकसन सुरू केलन्हि, ओइपर अविनाशजी अहूँक कमेंट छल wow great views क' कय, आ ओइ पाठकक जवाब वियोगी जी नै देलन्हि..किए.. आ आब दू मासक बाद फोन एलापर आलेख लिखलन्हि..किए? फेर समय-साल मे ओ आएख पठेलन्हि आ ओ नै छपलै वा जे भेलै..मुदा ओही पत्रिका मे चुटकुलानन्द जेकाँ कोनो लत्तर कॉलममे ई बात एलै.. तकर की जवाब अछि. कियो कहय कौआ कान ल' गेल तँ पहिने कान देखबाक चाही..विदेह फेसबुकपर ई आलेख हम छपि देने छी..मुदा wow.great क बाद अहाँ प्रयः ग्रुप छोड़ि देने ask to join group क्लिक करू..हम रिक्वेस्ट एक्सेप्ट क' लेब, तखन अहाँ ओ पढि सकब..
June 20 at 8:32am
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Avinash Das फुरसति मे आराम सं पढ़ब अहां सभके गप...
June 20 at 8:52am
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ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.नन्‍दवि‍लास राय-कथा-बाबाधाम २.बिपिन झा-जन्मदिनक बदलैत स्वरूप
१.
नन्‍दवि‍लास राय, जन्‍म- 02.01.1957ईं.मे, शि‍क्षा- बी.एस.सी. (गणि‍त), आइ.टी.आइ. (टर्नर)।गाम, पोस्‍ट- भपटि‍याही, टोला- सखुआ, वाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी, ि‍बहार।
कथा-
बाबाधाम

बोल-बम बोल-बम। बोलबम-बोलबम ई आवाज कमलीक कानमे पड़ल तँ ओ घास काटव छोड़ि‍ सड़क दि‍स‍ तकलक। एकटा बसमे पीयर-लाल कपड़ा पहि‍रि‍ने लोक सभकेँ देखलक। बसक भीतर आ छतपर लोक सभ बैस कऽ बोलबम-बोलबमक नारा लगवैत छल। बस तेजीसँ सड़कपर दौड़ रहल छल।
कमलीक खेत सड़कक कातेमे छल। ओ खेतक आरि‍पर घास काटि‍ रहल छलि‍। कमली सोचए लगली- कतेक लोक बाबा धाम जाइत अछि‍ मुदा हमर तँ भागे खराप अछि‍। कतेक दि‍नसँ वि‍कलाक बापकेँ कहैत छी मुदा ओ अछि‍ जे धि‍याने ने दैत अछि‍।

कमली आ लखन दू परानी। एकटा बेटा ि‍वकला। वि‍कला सातमे पढ़ैत। लखनक माए-बापक सत्तर अस्‍सी बर्खक बूढ़। लखनकेँ पाँच बि‍घा खेत। एक जोड़ा बड़द आ एकटा महीसो। लखनकेँ कतौ जइक लेल सोचए पड़ए। कि‍एक तँ सत्तर बर्खक बूढ़ माए आ अस्‍सी बर्खक अथवल बापकेँ छोड़ि‍ कतए जाएत। तइपर सँ एक जोड़ा बरद आ महीसोकेँ देख-रेख। पाँच बि‍घा खेतमे लागल फसलक ओगरवाही। असगरे कमलीसँ कोना पार लागत। तैं कमलीक बाबाधामबला बातपर लखन धि‍यान नै दैत छल। लखन सोचए कमलीकेँ गामक लाेक संगे बाबा धाम भेज देव तँ भानस के करत? धास के आनत। असगरे हम की सभ करब। बेटा वि‍कला पढ़ते अछि‍। ओकरा स्‍कूलसँ छुट्टी होइत अछि‍ तँ ओ टीशन पढ़ै लए चलि‍ जाइत अछि‍। बि‍ना टीशन पढ़ने कोना परीक्षा पास करत। सरकारी स्‍कूलमे की आब पढ़ाइ होइत अछि‍। मास्‍टर सभ बैस कऽ गप लड़बैत रहैत अछि‍। चटि‍या सभ कोठरीमे बैस कऽ गप करैए अथवा लड़ाइ-झगड़ा। मास्‍टर सबहक लेल धनि‍ सन। लखन अपन खेती गृहस्‍थीक संगे माए-बापकेँ सेवा नीकसँ करैत अछि‍। माए तँ थोड़े थेहगरो छथि‍न मुदा बापकेँ उठवो-बैसवोमे दि‍क्‍कते छन्‍हि। हुनका पैखाना-पैशाव लखनेकेँ कराबए पड़ैत अछि‍। पौरकाँसाल फगुनमे लखनक पि‍ताजीकेँ लकबा मारि‍ देलकनि‍। मश्रा पॉली क्‍लि‍नीक दरभंगामे इलाज करेलासँ जान तँ बचि‍ गेलनि‍ मुदा अथवल भऽ गेलाह। भगवान लखन जकाॅँ बेटा सभकेँ देथुन। ओ तन मन आ धनसँ माए-बापकेँ सेवा करैत अछि‍।

लखनक एकटा संगी अछि‍। नाम छी सुकन। सुकन लखनसँ वसी धनीक अछि‍। दूटा बेटा अछि‍ सुकनकेँ। दुनू बेटा सातवाँ तक पढ़ि‍ दि‍ल्लीमे नौकरी करैत अछि‍। मासे-मासे बेटा सबहक भेजलाहा ढौआ सुकनकेँ भेट जाइत अछि‍। सुकनोक माए-बाबू जीवते छथि‍न। सुकनक माए कम देखैत छथि‍न। हुनका राति‍केँ सुझवे नै करैत छन्‍हि। एक दि‍न सुकनक माए राति‍केँ ओसारपर सँ गि‍र गेलखि‍न हुनका पएरमे मोच पड़ि‍ गेलन्‍हि‍। लखनकेँ पता चलल ते ओ सुकनक माएक जि‍ज्ञासा करै लए गेल। सुकनक माए लखनकेँ अपने बेटा जाहि‍त मानैत छेलखि‍न।
लखन सुकनक माएसँ पुछलक- ‍माए कोना कऽ ओसारपर सँ गि‍र गेले।
सुकनक माए बाजलि‍- बौआ, आब हमरा सुझै नइ अछि‍। राति‍ कऽ तँ साफे नै देखैत छी। बेचू बाबूक छोटका कनटीरबा दरभंगामे डाकडरी पढ़ैत अछि‍ ओ फगुआमे गाम आएल छल हुनाक कहलि‍ऐ तँ ओ हमर दुनू आँखि‍ देखलक आ कहलक जे दुनू आँखि‍मे मोति‍यावि‍न भऽ गेलौहेँ। कहलक जे ऑपरेशन करेलासँ ठीक भऽ जाएत आ नीक जहाति‍ सुझए लगत।
हम सुकनकेँ कहलि‍ऐ तँ ओ कहलक जे एखन ढौआ नै अछि‍। ढौआ हएत तँ लहान लऽ जा कऽ ऑपरेशन करा अनबै। मुदा फागुनसँ भादो आबि‍ गेल, ऑपरेशन नै करा आनलक। सुनै छि‍ऐ चौठचन्‍द्रक परात दुनू परानी बाबाधाम जएत।
सुकनक बाबूजी सत्तरि‍ बर्खक छथि‍न। ओ नामी गि‍रहत छलाह। तरकारी उपजा कऽ बेचै छलाह। तरकारी बेचि‍ कऽ पाँच बि‍गहा खेत कीनलाह। आब उमर बेसी भेलासँ काज करै जोकर नै रहलाह। हुनका चाह पीबाक आदति‍ भऽ गेल छन्‍हि‍। भोर आ साँझ चाह हेबाके ताकी। एकटा आदति‍ आओर छन्‍हि‍, खैनी खाइक। सुकन अपनाबाबू जीकेँ चाह आ खैनी नै जुमाबैत अछि‍। केहैत छन्‍हि‍- कैंसर भऽ जेतह। मुदा अपना पान-पराग, सि‍गरेट, दारू सबहक सेवन करैत अछि‍।

एक दि‍न लखन सुकनक दलानक पाछाँसँ जाइत छल तँ सुकन जोर-जोरसँ बाजब सुनि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सुकनक दलानक पाछाँसँ सड़क गुरजै छै। सड़केपर सँ लखन सुनए लागल। सुकन बजै छल- हरदम चाह-चाह रटैत रहैत छहक। कि‍छु बुझबो करै छहक। चीनी चालीस टके कि‍लो भऽ गेल। चाहपत्ती जे बारह टाकामे भेटै छलै आब बीस टाकामे भेटै छै। पानि‍बला दुध पन्‍द्रह रूपैये गि‍लास। के जुमत चाहमे। आ तोरा भोर-साँझ चाह हेबाके चाही। हम न‍ सकब-तोरा चाहजुमबैमे।
बूढ़ा कि‍छु नै बजैत रहथि‍। लखनकेँ कोनो जरूरी काज रहै तँए ओ आगाँ बढ़ि‍ गेल।
सुकन अपना पड़ोसि‍या ओइठाम माए-बाबूक भोजनक जोगार लगा कऽ चौठचन्‍द्रक वि‍हाने दुनू परानी बाबाधाम वि‍दा भऽ गेल। सुलतानगंजमे गंगाजल भरि‍ कामौर लऽ बाबाधाम पहुँचल। एकादशीकेँ बाबाधकेँ जल चढ़ा वासकीनाथ, तरापीठ होइत ओतएसँ कलकत्ता चलि‍ गेल। एमहर एे बीच सुकनक बाबूजी बेमार पड़ि‍ गेलखि‍न। हुनका बोखर लाग गेलनि। लखनकेँ संमाद भेटल जे सुकनक बाबूजी दुखि‍त छथि‍न। लखन ओइठाम जा डाक्‍टरकेँ बजा कऽ अपना दि‍ससँ खर्च कऽ बूढ़ाक इलाज करौलक। जाबे धरि‍ सुकन दुनू परानी बाबाधमसँ आपस नै आएल ताबे धरि‍ लखन दि‍नमे एकबेर सुकनक माए-बाबूक भेँट करबाक लेल नि‍श्चि‍त जाए। दुनू गोटेक लेल अपना दि‍ससँ चाहरे आ खैनीयोक जोगार लखन कऽ देने छल।

सुकन जि‍ति‍या पावनि‍सँ तीन दि‍न पहि‍ने गाम आएल। सुकनकेँ बाबाधाम आ कलकत्तासँ आपस अएलाक दोसर दि‍न भि‍नसरे चौकपर चाहक दोकानपर लखनक भेँट सुकनसँ भऽ गेल। सुकन चाहक दोकानपर बैस कलकत्ताक वर्णन करैत छल। लखन सुकनसँ रास्‍ता-पेराक समाचार पुछलक। तँ सुकन कहलक- रौ दोस, बाबाक कृपासँ सभ कि‍छु नीके रहलौ। दुनू पानी कलकत्तो घुमि‍ये लेलि‍यो। तोँ खाली बैंकमे ढौआ राख ने। तोँ की बुझबेँ धरम-करम। तोरा जँ ढौआक आमदनी हेतौ तँ तोँ खेत भरना लेमे नै तँ बैंकमे रखमे। हम दुनू परानी दस बर्खसँ कामोर लऽ कऽ बाबाधाम जाइत छी।
सुकनक बात लखनकेँ नै सोहाएल। ओ सोचलक जे एखन एकरा जबाब देनाइ ठीक नै हएत। लखन- रौ दोस, से तँ ठीके कहै छी। हम धरम-करम की बूझब। मुदा हम अपन माए-बापक सेवा तन-मन-धनसँ करै छी। हमरा लेल तँ बाबाधाम हमर माइये-बाबू छथि‍। हमरा लेल तँ हमर बाबूजी साक्षात् महादेव आ माए पार्वती छथि‍। हुनके दुनू गोटेक सेवा करब बाबाधाम कामोर लऽ कऽ जाएबसँ बेसी नीक बुझै छी। ककरो अधलाहो नै सोचैत छी आ ने करै छी। तोँ कह जे माइक मोति‍यावि‍न्‍दक ऑपरेशनक लेल तोरा ढौआ नै छौ। बाबूजीक चाह पि‍याबैक लेल तोरा ढौआ नै छौ। मुदा बाबाधाम जेबाक लेल ढौआ छौ। कलकत्ता घुमैक लेल ढौआ छौ। दारू पीबैले ढौआ छौ। माएकेँ सुझै नै छौ। राति‍ कऽ ओसारापर खसलखि‍न तँ पैरमे मोच पड़ि‍ गेलनि‍। जँ तोँ अपन माइक मोि‍तयावि‍न्‍दक ऑरोशन करा आनने रहि‍तेँ तँ ओ ओसारापर सँ नै खसि‍तथि‍न। अपने दुनू परानी बाबाधाम गेलाह मुदा माए-बाबूक भोजनक जोगार पड़ाेसि‍या ओतए लगा कऽ गेलेँ। तोहर बाबूजी बेमार पड़ि‍ गेलखुन तँ डॉक्‍टर बजा हम इलाज करौलि‍यनि‍। तोँ बूढ़ माए-बाबूकेँ एकोटा टाका नै देने गेल रहेँ। अपना दुनू परानी बापक अरजलहा सम्‍पत्ति‍ आ बेटा सभक कमाइसँ एश-मौज करै छेँ। मुदा माए-बाप एक कप चाहक लेल काहि‍ कटै छौ। धुर बूरि‍ तोँ की बजमेँ।

लखनक बात सुनि‍ सुकन गुम्‍म पड़ि‍ गेल। ओकरा कोनो जबाबे नै फुराएल। ओरका भेल जेना बीच बाजारमे कि‍यो नंगट कऽ देलक।


बिपिन झा
जन्मदिनक बदलैत स्वरूप
[एकर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) क रहल छथि। ]

सालो बीत गेल ओहि गप्पक मुदा अखनहुँ ओहिना स्मरण अछि। जन्मदिन केर अवसर पर कदाचिते कोई एहेन होयत जेकरा आनन्द नहिं हो। मुदा पारम्परिक रूप सँ मनाओल जाई बला जन्मदिवसोत्सव आ आजुक समय मे मनाओल जाइ बला जन्मदिवसोत्सव केर स्वरूप में बहुत अन्तर् आबि गेल। एहि पत्रक में हम  उचित आ अनुचित केर गप्प नहिं कय रहल छी। पारम्परिक रूप सँऽ जन्मदिन तिथि केर् अनुरूप मनाओल जाइत छल। किन्तु आई काल्हि प्रचलित कैलेण्डर केर अनुसार मनाओल जाइत अछि। कारण स्पष्ट अछि। अपन समाज में जन्मक पंजीकरणस्वरूप भारतीय माह आतिथि छल जन्मक समयानुसार राशि आदि केर निर्धारण होइत छल। मुदा वर्तमान समाज में जन्मतिथिक मान्य प्रमाण पत्र आदि ग्रेगेरियन कैलेण्डर केर अनुसार होइत अछि। अस्तु जन्मदिन स्वाभाविक रूप सँऽ दिनांकानुरूप मनेबाक प्रथा चलल। ई द्वैधीभाव कखनहु के बहुत असुविधा दैत अछि।
यदि देखल जाय तऽ दिनांकानुरूप हो अथवा तिथिक अनुरूप कतहु समस्या नहिं अछि। समस्या त अछि जन्मदिवसोत्सव मनेबाक स्वरूप में।
 ओहि समय जन्मदिन उपलक्ष्य मॆं तिल लगायब छीटब आ संगहि मारकण्डेय पूजा आदि केर प्रावधान छल। मुदा आई केक काटब बाह्याडम्बर केर संग गिफ्ट केर आदान प्रदान, नाच-गान, मांस-मदिरा आदि केर कदाचित प्रावधान बनल जा रहल अछि।
आवश्यकता अछि जे आगू क पीढी कें एहि सन्दर्भ में नीक आ अधलाह क जानकारी देलजाय। जन्मदिन के मात्र एकटा पिकनिक केर दिन नहिं बनय देलजाय। अपितु आगू केर वर्ष में उत्कर्षदायक कार्य हेतु प्रोत्साहन हेबाक चाही। दीर्घायु हेबाक हेतु यथोचित आचरण निमित्त कार्य हेबाक चाही।


ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
               जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा।                                                                 
एक टा विहनि कथा
लहास
 सड़कक बीचो-बीच एकटा लहास राखल छै / ओ कोनो सुनसान बाट नै अछि , मोहल्लाक ओइ रोडपर कतेक रास दोकान आ घर अछि / किछु लोक ओइ लहासकेँ घेरने ठाढ़ अछि, आ बहुत लोक अगल-बगल ठाढ़ भऽ घटनाक अंदाज लगा रहल अछि / अंदाज  कि लगायत सच तँ सभकेँ बुझले छै /
मात्र एक घंटा पहिले ओकर हत्या रोडपर सभक सामने भेलै / चारि आदमी , कियो लाठी आ कियो रड सँ  मारि रहल छल / ओ बचावमे हाथ उठेलक, ओकर हाथ तोड़ि देल गेलै /ओ भागैक कोशिश केलक ओकर पएर तोड़ि देलक / ओ अपाहिज भऽ लोकसँ गुहार केलक मुदा कियो नैह आएल / सभ चारुकेँ चिन्हैत छल , ओ टुन्ना सिंहक आदमी छल आ ककरोमे ओकरासँ अराड़ि लेबाक हिम्मत नै छलै / ओ  रोडपर खसि पड़ल /चारु रडसँ मारि ओकर कपार फाड़ि देलक / ओ चित्कार कऽ उठल ,पूरा रोड  खुने-खुनामे भऽ गेल / गोटेक सय आदमी देखि रहल छल , चारि टा हत्यारा ओकरा मारि रहल छल  , मारने जा रह्ल छल आ ताबत धरि मारलक जाबत ओ मरि नै गेल आ  गोटाक सय आदमी लहास बनि देखि रहल छल /

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजेशकुमार कर्ण
चिरबिर–चिरबिर करैत उडि रहल चिडै



बुंद–बुंद टपकैत पानिसँ प्यासल पंक्षीकँे प्यास नहि बुझि सकैत अछि । हमरो तहिना भेल अछि । बहुत दिनसँ मैथिली किताब सभ पढबाक प्यास हमरा छल आ एखनो अछि मुदा बहुत कम किताब पढि पौने छी । ताहिसँ सुजीत कुमार झाक लिखित चिड़ै कथा संग्रहसँ मात्र सेहो हमर प्यास नहि बुझि सकैत अछि ।
मुदा पानिक ई ११ टा बुंद हमर करेजकेँ ठण्डक नहि द सकल लेकिन एकटा बात तऽ अवश्य भेल अछि कि एहि पानिक बुंदसँ हमर जीव आ कण्ठमे ठण्डक अवश्य प्राप्त भेल अछि । मैथिली साहित्यकँे कखरा तक नहि जानएवाला व्यक्ति ककरो कथा संग्रहक बारेमे किछु समीक्षा, समालोचना आ टिप्पणी कि करताह । मुदा सुजीत जी हमर मित्र भेलाक कारणे आ कथा संग्रह चिडै
Þ कँे बारेमे अपन विचार लिख देबाक लेल कहलाक कारणे अहि कथा संग्रहक बारेमे हम किछु प्रस्तुत करबाक चेष्टा कऽ रहल छी ।
मैथिली भाषामे सुजीतक ई प्रथम कृति चिड़ै कथा संग्रह हमरा बड निक लागल । एकर मुख्य पृष्ठ आर्कषक अछि आ किताबक बाहर आ भितरकँे प्रिन्ट सेहो स्पष्ट अछि । ७८ पृष्ठमे समेटल गेल ११ टा कथाकेँ संग्रह अलमी पाठक एकहि बैठानमे पढि सकैत अछि तऽ बेफुसर्दी लोकसभ सेहो ११ बैठानमे तऽ अवश्य पढि लेताह । ताहि दृष्टि सँ सेहो निकेँ कह पड़त नहि बेसी पैघ आ नहि छोट ।
सुजीतक कथा संग्रह चिडै
Þ कँे ११ टा कथामे सँ ९ टा कथाकँे प्रमुख पात्र महिला छथि । जाहिमे हमरा अहाँक समाजमे महिलाकँे विभिन्न चरित्र आ रुपकँे चर्चा कायल गेल अछि ।
महिलावादी
पहिल कथा “एकटा अधिकार”मे विमान दुर्घटना सँ सुरुवात कऽ एहिमे मृत भेल लोकसभकँे खोजबाक उपक्रमकेँ वर्णन करैत एकटा विवाहित महिला सँ एकटा नवयुवककेँ प्रेमक बारेमे जिज्ञासा आ उत्सुकता सँ भड़ल बातचीतकेँ प्रस्तुत कायल गेल अछि ।
जाहिमे महिलाक पतिसंग ओ अपरिचित युवक अपन प्रेमक बारेमे बखान करैत अछि आ ओकर प्रेमकँे देखि ओ महिलाक पति दुर्घटनामे मृत भेल अपन पत्नीकेँ दाहसंस्कारक जिम्मा ओहि नवयुवक प्रेमीकेँ दऽ दैत अछि ।
अहि कथामे महिलाक बारेमे मात्रे वार्तालाप भेलाक कारणे एकटा मृत महिला एकर प्रमुख भऽ गेली अछि । दोसर कथा “धधकैत आगि आ फुटैत कन्जोरि” मे सेहो एकटा नवयुवती बलत्कारक अनुभव पएबाक लेल कऽ रहल विभिन्न प्रयासक बारेमे लिखल गेल अछि तऽ तेसर कथा “भौजी”मे नन्द आ विधवा भौजीकेँ एकहिटा युवकसंगक प्रेम प्रसंगक बारेमे चर्चा कायल गेल अछि तऽ चारिम कथा “चिडै
Þ” मे दू टा महिला पत्नी आ प्रेमिकाक बारेमे केन्द्रित अछि । अपन पत्नीसँ असन्तुष्ट एकटा पुरुष कोना दोसर महिलाप्रति आर्कषित होइत अछि आ महिलाकेँ कोन रुपमे उपयोग करैत छथि ताहिकँे वर्णन अछि ।
पाँचम कथा “प्रियन्का” मे एकटा एहन बचियाकँे बारेमे चर्चा कायल गेल अछि जे जीवनमे किछु विशेष करबाक लेल गामसँ भागि शहर जाइत छथि ओतए ओ अपन उद्देश्य प्राप्त करितो सभक खेलौना भऽ कऽ रहि जाइत छथि । ताहि प्रकारे सातम कथा “वंश” मे सेहो एकटा एहन बचियाकँे चर्चा अछि जे डाक्टर बनि अपन माई बाबुकेँ नाम मात्रे नहि रोशन करैत छथि कि लडकीसभक बारेमे समाजमे व्याप्त गलत धारणाकँे सेहो तोड़ि दैत अछि ।
आठम कथा “बाबाजी” मे हमरा अहाँक समाजमे साउस ससुरके कोन प्रकारे पुतहुसभ दुख दैत अछि ताहिक वर्णन कायल गेल अछि । तहिना दशम कथा “ढोल” मे सेहो एकटा नवयुवतीकँे विवाहक बाद पुरुषकँे पत्नीक रुपमे नहि भऽ ढोलकँे रुपमे कोना भऽ जाइत अछि ताहि कँे देखाओल गेल अछि । तऽ अन्तिम कथा “शुन्यताक प्रवेश” मे सेहो एकटा महिला जे ककरो माइ छथि तऽ ककरो पत्नी ओकर पीडा देखाओल गेल अछि ।
एहि प्रकारे देखल जाइ तऽ ११ टा कथामे सँ ९ टा कथाक प्रमुख पात्र महिला छथि । ताहिसँ सुजीतक ई कथा संग्रह महिलावादी कथा संग्रहके रुपमे चित्रित कायल जा सकैत अछि ।
दोसर दिस सातम कथा वर्खीक भोजमे भिखमंगोसं बेसी दुर्दशा आ आर्थिक दरिद्रता मध्यम वर्गीय परिवारके व्यक्तिसभमे रहल बातके बहुत चतुराईपूर्ण ढंगसं प्रस्तुत कायल गेल अछि त ९ अम् कथा “बनैत बिगरैत” मे हमरा अहांक समाजमे भइयारीक अंश आ पुर्खाक सम्पति पर सन्तान सभक कुदृष्टिक बारेमे चर्चा अछि । ताहि सं महिलावादी कथा संग्रह भेलाक बावजूदो अहि कथामे समाजक जनजीवनके सूक्ष्म चर्चा सेहो अछि ।
जाहि कारणे समाजके दर्पणके रुपमे सेहो अहि कथा संग्रहके लेल जा सकैत अछि । त दोसर दिस कथा “धधकैत आगि आ फुटैत कनोजरि” मे एकटा एहन नवयुवती जे एकटा बलात्कारके अनभुव प्राप्त करबाक लेल स्वयंके बलात्कृत करबाक लेल सेहो तैयार छथि आ एहिके लेल बसक ड्राइभर खलासी, पुलिस आ विभिन्न युवकसभक बीचमे जाइ छथि ।
नव श्रृजना
परम्परागत कथासं हटि क ई एकटा अलग कथा अछि जाहिमे समाजक बहुत विषय वस्तुक बारेमे व्यक्तिक जिज्ञासा कोन प्रकारे उधेलित होइत अछि तकर वर्णन अछि । ताहिसं नवखोजी आ श्रृजक व्यक्तिके रुपमे सेहो लेखकके देखल जा सकैत अछि ।
एहि कथामे एतबहि मात्र नहि सपनाक बारेमे किछु दार्शनिक बातके चर्चा करबाक प्रयास सेहो कायल गेल अछि ताहिसं भविष्यमे जौं लेखक चिन्तन निरन्तर रखताह त ओ विशेष दर्शनयुक्त कथा सेहो लिखए सकैत अछि । ताहिके संकेत सेहो एहि कथा मादे प्रष्ट होइत अछि ।
विभेद पर प्रहार
तहिना भौजी कथामे प्रेमक द्वन्दबीच विधवा महिलाक प्रेम प्रस्तुतिसं लेखक समाजमे महिलाक अधिकारके लेल सेहो वकालत कयने अछि । जौ विदुर पुरुष दोसर विवाह कऽ सकैत अछि तऽ विधवा महिला किया नहि ?
तहिना प्रियन्कामे निक करबाक आ जीवनमे समाजक लेल किछु विशेष करबाक उत्साहसं आगू बढल बचियासभके कोन प्रकारे समाजक विकृतिके चक्र घेर लैत अछि ताहिके प्रस्तुत क हमरा आहांक समाज पर व्ययंग सेहो लेखक कथा मादे कयने छथि ।
बेटा मात्र नहि बेटियो मायबापके नामके रौशन कऽ सकैत अछि ताहि बातके वंश कथा मादे प्रस्तुत कऽ बेटा आ बेटी बीचक भेद हटेबाक लेल जोडदार ढंगसँ अपन बात के लेखक प्रस्तुत करबामे सक्षम भेल अछि ।
एहि प्रकारे देखल जाइ तऽ सुजीतक कथा संग्रह चिड़ै समाजक विभिन्न पक्षके वर्णन करएमे सर्मथ अछि आ ई चिड़ै समाजक विभिन्न पक्ष पर उड़ि रहल अछि ।
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
विनीत उत्पल
१.कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट (दोसर आ अंतिम भाग) २.आजुक कालमे बाबा

 
कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट 


(दोसर आ अंतिम भाग)

ओइ छौंड़ीक कतेक दोस्तसँ परेशान आत्माक सेहो दोस्ती छल। ओ सभ कहैत छल जे दिल्ली विश्वविद्यालयक साउथ कैंपसमे जखन ओ पढ़ैत छलि, तखन ओकर अफेयर प्रकाश झाजी सँ छल। एक बेर तँ प्रकाश झा सेहो हुनका ई गप कहलनि। फेर 'बाबा" बला 'सर" आ ओकरा, कतेक बेर संगे खाइ-पीबसँ लऽ कऽ घुमैत-फिरैत देखल गेल। ओम्हर, ऑफिस आ ओकरासँ फराक ठामपर सेहो गॉसिप होइत छल, लोक-बेद मिर्च-मसल्ला लगा कऽ गप करैत छल। आब तँ दैनिक भारतमे बॉससँ लऽ कऽ छोटो स्टॉफ सभ ओकरे दुनूक गप करैत छल।  फेर 'हाइली टेंपर"क नाम आ चेहरा-मोहरा कनीटा दैनिक भारतक संपादक सँ मिलैत छल तइसँ ओ ओकर फाएदा सेहो उठा लैत छल।

आखिरमे, 'हाइली टेंपर"क मेहनति रंग अनलक आ 'परेशान आत्माक" ट्रांसफर इलाहाबाद कऽ देल गेल। जकर कन्हापर सवार भऽ कऽ ओइ बीस मंजिल बला दफ्तरमे नोकरी पेने छल, ओकर पत्ता साफ करै मे ओ कोनो कसरि नै छोड़ने छल। आब तँ बॉस सेहो खुलि कऽ 'हाइली टेंपर" क संग दिअ लागल छल। ऑफिसक दाढ़ी बला बाबाक चमचासँ आब ओकर लटाढ़म शुरू भऽ गेल छलै। लड़कीकेँ लागै छलै जे आब  ओ हुनका पार लगाएत। परेशान आत्माकेँ जतेक तंग करैक छल ओ कोनो कसरि नै छोड़ने छल। जतेक बदनाम करबाक छलै, ओ कऽ देने छल। इलाहाबादसँ परेशान आत्माकेँ जे खबर अबैत छलै ओकरामे कतेक रास गलती निकालैक काज ओ शुरू कऽ देने छल आ बॉससँ सेहो फूइस शिकाइत करैत छल।
दोसर दिस ओ छौड़ा छल जे ओकर सभ गलतीकेँ माफ कऽ रहल छल। किछु दिन बाद बॉस बदलि गेल आ आब फेर पलटी मारैक बेर हाइली टेंपरक छल। नबका बॉसक कान पहिनेसँ भरल जा चुकल छल। एक दिन इलाहाबादसँ परेशान आत्मा केँ दिल्ली आबैक छलै। हुनका हाइली टेंपरक खेरहा नै बूझल छलै। ओ हाइली टेंपरक मोबाइलपर मैसेज पठेलक- 
 "केन यू मीट मी वन्स!'
गप तँ पांच शब्दक छल मुदा ओकर इलाहाबादसँ दिल्ली पहुंचैत-पहुंचैत ई आगि बनि गेल छल। कनॉट प्लेसक ओइ दफ्तरमे ओ सभसँ भेंट केलक, नबका बॉससँ सेहो। मुदा जखन ओ ट्रेन पकड़ि कऽ आपस आबि रहल छल, तखन ओकर मोबाइलपर घंटी बजलै। पॉकेटसँ मोबाइल निकालि कऽ देखलक तँ ओ नंबर दिल्ली ऑफिसक छल।
"हेलो'।
"हेलो...।' ओम्हर नबका बॉस छल।
"एहन अछि जे आजुक बाद अहाँ कहियो ओइ लड़कीकेँ फोन नै करब।'
जाधरि ओ किछु बुझिछि सकतिऐ ताधरि बॉस बाजल, "बिना हमर आज्ञाक अहाँ फेर कहियो ऑफिस एलौं तँ हम अहाँकेँ पांच दिनक भीतर निकालि देब।'

ताधरि परेशान आत्मा परेशान भऽ चुकल छल आ ओ रकम सँ कहलक, "सर, एहन कोनो गप आब नै हएत आ हम कतए जाएब आ कतए नै जाएब, तकर मालिक अहाँ नै छी। रहल नोकरीक गप आ अहाँ जे धमकी दऽ रहल छी जे पाँच दिनक अंदर निकालि देब तँ हमहीं आजुक पांच दिनक भीतर ई नौकरी छोड़ि रहल छी।'
ओ एक्के सांसमे सौंसे गप कहि कऽ फोन काटि देलक। मुँह लाल-लाल भऽ गेल छलै।

आगू वएह भेल जे परेशान आत्मा बाजल छल। पांच दिनक भीतर ओ दोसर अखबारमे सीधा स्ट्रींगर सँ सीनियर सब एडिटरक नोकरी करए लागल। दरमाहा सेहो तीन गुना बढि़ गेल छलै। कतेक जिम्मेदारी सेहो आबि गेल छलै। बियाह भऽ गेलै। बीबी-बच्चामे ओ रमि गेल छल। धीरे-धीरे बच्चा पैघ भऽ कऽ सेट्ल सेहो भऽ गेलै आ आब ओ परेशान आत्मा परेशानीसँ मुक्ति पाबि राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर अप्पन खेतमे काज करैत छल आ ओहनो उमेरमे देशक सभटा पत्र-पत्रिकामे लिखैत छल।

ओना ई गप अलग अछि जे हाइली टेंपरक पागल होएबाक खबर आ सड़कपर लावारिस हाललिमे भेटबाक जानकारी अखबारसँ पता चलल मुदा एकर बादक गप ओकरा नै बुझल हैतिऐ जँ ओकर दोस्त ओकरा मेलसँ चिट्ठी नै लिखतिऐ। ई मेल मोटामोटी एना अछि: 

"डियर फ्रेंड, 
हम दुनू गोटे कतेको बरखसँ दोस्त छी। ई आर गप अछि जे हम दिल्लीक चकाचौंधमे फंसि कऽ रहि गेलौं आ नेना-भुटका सभ बिगड़ि गेल मुदा अहाँ हरदम सही समयपर सही कदम उठेलौं। हम तँ अहाँकेँ मेल करैएबला रही मुदा अहाँक पुरान प्रेयसीक खबरि सुनि कऽ आइ मेल करबा लेल विवश भऽ गेलौं।
अहाँक दिल्लीक ओइ संस्थाकेँ छोड़ब करीब तीस साल भऽ गेल मुदा अहाँक प्रेयसीक खिस्सा सुनि कऽ नै अहाँ चकित हएब मुदा ई कहब जे भगवान दुश्मनक संग सेहो ई नै करथि।

अहाँ तँ दैनिक भारतक ओइ दाढ़ीबला बाबाकेँ तँ जानैत छलौं जे अहाँकेँ अजमेरसँ दिल्ली आबैक लेल मना केने छल। ओ ओकर चमचामे फँसि गेल छल। ओकरे संग घूमब, शॉपिंग करब ओकरा नीक लगैत छलै। ओ नशाक सेहो शिकार भऽ गेल छल। लोक तँ एते धरि कहैत छल जे मीडियाक गंदगी ओकरा लील लेलक। कतऽ ओ बरखा दत्त बनबाक स्वप्न लऽ कऽ दिल्ली आएल छलि आ अब कॉल गर्लमे बदलि गेल छलि। दाढ़ीबला बाबा ओइ दफ्तरमे बड़ पैघ पदपर छल आ अहाँक पुरान प्रेयसी करियरमे एकटा स्थान लेबऽ चाहै छलि। दोसराकेँ नीचाँ देखाबैक शौक तँ ओकरा शुरूहेसँ छलै, तइसँ ओ दाढ़ी बला बाबाक झांसामे आबि गेल।
 एतबे टा नै, किछु साल बाद ओ आफिस कहैक लेल टा आबए लागल छलि आ दारूक नशा ओकर आँखिसँ बाजैत छल, ठेग लटपटाइत छल। एनामे ओकरा जे कियो कोनो नीक सलाह दैत छल, ओकरा ओ खराप लागैत छल। अहाँकेँ बुझले हएत जे ओकरा बाजारमे ठेलापर बिकाइबला सस्ता साहित्य आ ३०-४० टाकाक ब्लू फिल्मक सी.डी .देखैमे कतेक नीक लागैत छलै। ऑफिसक स्टाफ कहैत छल जे एहने कियो हएत जकरासँ ओ सी.डी. नै मंगने हएत। चाहे ओ पालिका बाजारमे भेटैत होअए, सराय काले खां दिससँ निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन दिस जाइ बला रोडक कातक दोकान वा फेर लक्ष्मीनगरमे कैसेटक दोकानमे। लोक-बेद कहैत छल जे ओ जे पैघ नामक पाछू दौडि़ रहल छली, ओकर कारी चेहराकेँ ओ नै जानैत छलि।
डियर, अहाँ तँ जानिते होएब जे आइयो अप्पन गाम-घरक स्त्रीगन आ छौड़ी सभ कतबो एडवांस भऽ जाए मुदा जबर्दस्ती शीलभंग भेलापर ओकरापर की बितैत अछि, ई ओकरासँ बेसी नीकसँ कियो नै जानि सकैत अछि। अहाँक प्रेयसीक संग से भेल। हाइली टेंपरसँ हमदर्दी जताबैक संग करियरमे आगू बढ़ाबैक झांसा दऽ कऽ के-के लोक ओकर संग की-की केलक, एकरा भगवती टा जानैत हेती। अति सर्वत्र वर्जयेत। यएह तँ भेल ओकरा संग। फिल्म "टर्निंग-३०' अहाँ देखने हएब वा नै। वएह हालत भऽ गेल छल अहाँक अंतरंग मित्रक। घरक लोक बियाह करै लेल कहैत छल आ दोसर कात मीडिया आफिसक लोक ओकरा धोखा दऽ रहल छल। एनामे ओ अहाँक बड़ मोन पाड़ैत छल मुदा अहाँ तँ ओकर दुनियासँ बड़ दूर चलि गेल छलौं। एनामे ओ की करितए?

दाढ़ीबला बाबाक एकटा चमचा छल, अमित अमन। ओ ओकरासँ बियाह कऽ लेलक। ओ बाभने छल। लोक कहैत छल जे हाइली टेंपर ओकर तेसर कनिया अछि। पहिलुक भूकंपमे मरल, दोसरकेँ ओ तलाक दऽ देलक आ आब ई तेसर अछि। गोसाँइ जानै जे आब एकर की हएत। ई गप आर छल जे जखन-तखन ओ आब दलित आ स्त्रीवादी लेखिकाक तौरपर लेख लिखऽ लागल छलि जइमे दलित आ बाकी स्त्रीगणसँ बेसी ओकर दर्द आगू अबैत छल। मुदा, ई आरो गप छल जे कियो ओकरासँ ई गप नै पुछलक जे दलित आ स्त्रीगणक हमदर्द बनि कऽ घुरैवाली हाइली टेंपर कोनो दलित छौड़ासँ बियाह किए नै केलक। सभ कियो बौक भऽ गेल छल। मुदा लोक कहैत छल जे बियाहक बादो ओकर रामेंद्रसँ संबंध छल आ आफिसमे होइ बला गप आ गासिप्स ओकरा नै बुझल छलै। फेर एक दिन एहन भेल जे ओकर वर अमित अमन ओकरा रामेंद्रक संग आपत्तिजनक स्थितिमे पकड़ि लेलक। आ फेर की छल, दुनूक संबंधमे खटास आबऽ लगलै।


हम अहाँकेँ की बताबी। आब तँ जखन ओ आफिस आबैत छल तँ ओकर चेहरापर मारि-पीटक दाग होइत छलै। दोसर स्त्रीगणक दर्दकेँ लोकक आगू राखैवाली स्त्रीवादी अपने पुरुष प्रताड़नाक शिकार भऽ रहल छलि। जखन एक दिन धैर्य चुकि गेलै तँ अमित अमन ओकरा छोड़बाक निश्चिय कऽ लेलक। अहाँ तँ दिल्लीमे नै रहिऐ आ अहाँकेँ दूर-दूरसँ ओकरासँ कोनो मतलब नै छल। एनामे हुनका फेर रामेंद्रक मोन पड़लन्हि। ओ हुनका लग गेल छली, निहोरा सेहो केने छली मुदा रामेंद्र नै पिघलल। ओ सोझे कहि देलक जे अहाँ जेना अप्पन करियर लेल हमरा यूज केलहुँ तहिना हम अप्पन दैहिक भूख लेल अहाँक शरीरक यूज केलहुँ। अपना-दुनूक हिसाब-किताब बराबर।

आब अहाँक हाइली टेंपरक लग कोनो चारा नै छलै। घरक लोक सभ पहिनेसँ ओकरासँ दूर भऽ गेल छल। ओ अप्पन भाइ-बहीन लेल मरि गेल छली। बहिनोइ आ भाइ लग बिहारमे बड़ जमीन छलन्हि आ जातिक बाभन हेबाक कारण जमीन बचाबै लेल कम्युनिस्ट बनबाक अलाबे कोनो विकल्प नै छलन्हि। बाहरक दुनियामे ओकर परिवारक सभ गोटे दलितक मसीहा बनैत छल मुदा घरमे अप्पन जाति-बिरादरीमे बियाह करैसँ लऽ कऽ खेत बचेबाक हुलिमालि चलैत छल। मां-बाप आब ऐ दुनियामे नै छलन्हि। फरीदाबादमे जे ओ अप्पन घर लेने छलि ओइपर कहिया ने अमित अमन अप्पन कब्जा कऽ लेने छल आ फेर ओ तँ ओकरा पागल सेहो घोषित कऽ देने छल। लोक केँ अप्पन बेसिक इंस्टिंक्ट सँ सरोकार कहियो नै छुटैत छै।

आ अहाँकेँ एतेक पैघ मेल लिख कऽ अहाँकेँ पुरनका बात मोन पाड़ि देलौं। मुदा एक बेर जरूर सोचब ऐपर जे भारतक मीडियाक अंदरूनी हालत की अछि, जतऽ हम ठाढ़ छी। कोना छौड़ी सभकेँ प्रताड़ित कएल जाइत अछि। जाति पुछलाक बाद प्रेम कएल जाइत अछि। जाति पुछलाक बाद प्रमोशन भेटैत अछि। छौड़ा आ छौड़ी प्रभाष जोशी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष, राजदीप सरदेसाइ, दिलीप पडगांवकर, प्रणव राय आदि केँ देखि दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, कटिहार, पूर्णिया आदि ठामसँ दिल्ली तँ आबि जाइत अछि मुदा एतुक्का चमक ओकरा एहन दलदलमे ठाढ़ कऽ दैत अछि जतए नहिये ओकर अप्पन माटि रहि जाइत अछि आ नहिये एतुक्का माटिपर ठाढ़ रहबा योग्य ओ बनि सकैत अछि।
आशा अछि जे अहाँ अप्पन परिवारक संग निकेना हएब।
अहींक...।'
(हिन्दीसँ अनूदित)

आजुक कालमे बाबा 
 
आइ जखन देशमे भ्रष्टाचारक विरोधमे आवाज बुलंद भऽ रहल अछि तइसँ बाबा मने नागार्जुन केर कविताक मोन पड़ि रहल अछि। ओ जहिना अप्पन कालमे प्रासंगिक रहथि तहिना आइयो छथि। मैथिली साहित्य सँ लऽ कऽ भारतीय साहित्य, संस्कृति, राजनीतिक आ  सामाजिक परिदृश्य केँ देखैत ई कहैमे कोनो शंका नै अछि जे बाबा आधुनिक आ गहींर संवेदनासँ जुडल रहथि। ओ अप्पन कविता तखन लिखने रहथि जखन राजनीतिक- संवैधानिक हालातकेँ लऽ कऽ गम्भीर प्रश्न लागि रहल छल। जहिना ओ मैथिलीमे लिखने  छलाह तहिना हुनकर हिन्दी कविता सेहो एक अलग रंगमे रंगल अछि। एखन धरि मैथिली साहित्यमे हुनकर मैथिली कविताकेँ देखल गेल अछि आ हिन्दी साहित्यमे हिन्दी कविताकेँ। मुदा दुनू भाषामे लिखने तँ वएह रहथिन। एनामे ई आवश्यक अछि जे हुनकर हिन्दी कविता दिस ध्यान देल जाए, ओना ई अलग अध्ययनक गप अछि जे दुनू भाषामे लिखल कवितामे कतेक तारतम्य अछि। देशक  स्थितिकेँ लऽ कऽ हुनकर चिंता हिन्दीमे कोना छल, एकरे अध्ययन एतऽ हम कऽ रहल छी। 
जखन पूरा देश इमरजेंसीसँ त्रस्त छल, तइ कालमे ओ अप्पन प्रतिबद्धताक घोषणा करैत छथि - 

'प्रतिबद्ध हूं, जी हां, प्रतिबद्ध हूं-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-
संकुचित 'स्व' की आपाधापी के निषेधार्थ
अविवेकी भीड़ की 'भेड़िया-धसान' के खिलाफ
अंध-बधिर 'व्यक्तियों' को सही रास्ता बतलाने के लिए
अपने आपको भी 'व्यामोह' से बारम्बार उबारने की खातिर
प्रतिबद्ध हूं; जी हां, शतधा प्रतिबद्ध हूं!' 

जहिना लोकपालक नामपर अन्नाक आन्दोलनमे नवजुबक सभ आगू आएल, तखन ई लागैत अछि जे खाली ठाम बदलि गेल अछि। इमरजेंसी कालमे जगह पटनाक गाँधी मैदान छल आ आजुक मैदान दिल्ली केर राम लीला मैदान बनि गेल छल। ताहि सँ बाबा कहैत अछि-

'बार-बार खचाखच भरा गांधी मैदान
बार-बार प्रदर्शन में आए लाखों-लाख नौजवान
बार-बार वापस गए
हवा में भर उठी इंकलाब के कपूर की खुशबू
बार-बार गूंजा आसमान
बार-बार उमड़ आए नौजवान
बार-बार लौट आए नौजवान..।' 
ताहि सँ बाबा गर्जित अछि- 

'जनता तुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं
जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?' 

बिना लटपटाएल बाबा जे गप तहिया कहलखिन, की ओकरामे आइ कोनो अंतर भेलो अछि, ई सवाल अछि। ओ नीक जना नेता आ नौकरशाही पर चोट करै छथि,

‘आज की तारीख वाले पन्ने पर
मैं लिखूँगा एक कविता
कुछ इस तरह कि मैं पहुँच जाऊँगा
वहाँ
जहाँ
तुमने
एक कुर्सी के बराबर
जगह छोड़ रखी है।’

हुनका आगू कतेक रास प्रश्न अछि जे सैद्धांतिक आ व्यवहारिक रूपमे लोकक दिमागमे बड़कैत रहैत अछि आ ऐमे नागार्जुनक स्थिति स्पष्ट भऽ जाइत अछि। हुनकर एक-एक कविता आ एक-एक शब्द क्रांतिक अलख जगबैत अछि,

कामन वेल्थी दुनियां क्या है, बूचड़ का बाजार है,
प्रजातन्त्र पर्दा है लेकिन खूनी कारोबार है।
भुखमरी आ तंगहाली से परेशान भ के 1961 में जखन जमीनक बंटवाराक लेल किसानक अन्दोलन चलल, तखन नागार्जुन ‘करोड़ों हाथों’ के फेर सें ख्याल करलक,
नभ से संघ बद्ध जनता का गूँज उठा हुँकार।

बाबाक कवितामे यथार्थक वर्तमान रहल अछि आ गप-सपमे बड़का गप कहि दैत छथि। हुनकर हिन्दी कवितामे तात्कालिकता तँ अछि मुदा व्यंग्यक विदग्धता हुनकर शब्दकेँ कालजयी बना देने अछि। भूख, बेरोजगारी, अकाल सन विषयपर लिखल हुनकर कविता जते संवेदनासँ भरल अछि, ओतए नीतिक व्यंग्य कतेक रास मारक क्षमता राखैत अछि। आइ कतेक रास घोटालाक खबर आबि रहल अछि, लोक-वेद त्रस्त अछि, रामराज्यक परिकल्पना कतेक लोक कऽ रहल अछि, लोक पाइ आ सत्ताक पाछू भागि रहल अछि, एनामे नागार्जुनक ई गप याद अबैत अछि,
'रामराज्य में अब की रावण नंगा होकर नाचा है
सूरत शकल वही है भइया, बदला केवल ढांचा है
लाज- शर्म रह गई है बाकी, गांधीजी के चेलों में
फूल नहीं लाठियां बरसती रामराज्य के जेलों में।'

नागार्जुन हुअए वा हुनकर कविता, आम लोक सभ लेल ओ सहज अछि। राजनीतिक उत्थर स्वाद हुनकर कवितामे जइ तरहेँ भेटैत अछि, हिन्दी हुअए वा मैथिली, एहन स्वाद आन ठाम नै भेटैत अछि- नागार्जुन, 

'सियासत में
न अड़ाओं
अपनी ये कांपतीं टांगें
हां, महाराज
राजनीतिक फतवेबाजी से
अलग ही रक्खो अपने को
माला तो है ही तुम्हारे पास
नाम-वाम जपने का
भूख जाओ पुराने सपने को'. 

ओ एहन लोक अछि जे अप्पन तँ एहन-ओहेन करैत अछि, आगूसँ बैसल रहैत अछि, तकरो नै छोडैत अछि। 'जपाकर' कविता मे संविधानक सेहो एहन मजाक बनाबैत अछि, जे आइयो धरगर अछि-
  
'जपाकर दिन-रात
जै जै जै संविधान
मूं द ले आंख- कान
उनका ही दर ध्यान
मान ले अध्यादेश
मूंद ले आंख-कान
सफल होगी मेधा
खिचेंगे अनुदान
उनके माथे पर
छींटा कर दूब-धान
करता जा पूजा-पाठ
उनका ही धर ध्यान
जै जै जै छिन्नमस्ता
जै जै जै कृपाण
सध गया शवासन
मिलेगा सिंहासन।' 

एहन गप नै अछि जे नागार्जुनक सोचक सीमा एक्कै दिस अछि। हुनकासँ कियो नै छुटल अछि, वोटकेँ लऽ कऽ जे राजनीति भऽ रहल अछि, ओकर चिंता हुनका सेहो छल-

'बेच-बेचकर गांधीजी का नाम
बटोरो वोट
बैंक बैलेंस बढ़ाओ
राजघाट पर बापू की वेदी के आगे अश्रु बहाओ।' 

आइ जहिना सड़कपर उतरल लोक सत्ताक मदहोशमे डूबल लोकपर व्यंग कऽ रहल छै, कहियो एकरासँ नागार्जुन पाछुओ नै छल। नेताकेँ लऽ कऽ ओ कहै छथिन, 

'कुर्सी-कुर्सी गद्दी-गद्दे खेल रहे हैं
घटक तंत्र का भ्रूणपात ही खेल रहे हैं
जोड़-तोड़ के सौ-सौ पापड़ बेल रहे हैं
भारत माता को खादी में ठेल रहे हैं।' 

सत्तासँ डरब तँ ओ सिखने नै छथिन, तइ सँ इंदिरा गांधी केँ ओ सोझे कहि देलखिन, 

'इन्दुजी, इन्दुजी, क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में, भूल गई बाप को?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?' 
ऐना कहै बला आजुक काल मे कियो अछि, ई सोचबाक विषय अछि.

नागार्जुनक कविता आ हुनकर फक्कड़नुमा अंदाजकेँ आजुक जुगमे अलग नजरिमे देखबाक आवश्यकता अछि। ओ राजनीति संदर्भमे भऽ सकैत अछि, सामाजिक संदर्भमे भऽ सकैत अछि तँ आर्थिक संदर्भमे सेहो।  क्रांति आ एकर विचारधाराक गहींर प्रभाव बाबाक लेखनीमे छल। एकटा कविता नक्सल आन्दोलनक छाहमे ओ लिखने छल जे आजुक हालतपर सटीक अछि,
  
'बुद्ध का दिल तो कहता है
अबकी भारी गहन लगेगा
बुद्ध का दिल तो कहता है
अबके संसद भवन ढहेगा
बुद्ध का दिल तो कहता है
बच्चा-बच्चा अस्त्र गहेगा
बुद्ध का तो दिल कहता है
कोई अब न तटस्थ रहेगा।' 

बाबा नागार्जुन सामाजिक, राजनीतिक विद्रूपतापर वार करैत आगू निकलि जाइत अछि। ताहिसँ ओ कहैत अछि, 
'ऊपर-ऊपर मूक क्रांति, विचार क्रांति, संपूर्ण क्रांति
कंचन क्रांति, मंचन क्रांति, वंचन क्रांति, किंचन क्रांति
फल्गु सी प्रवाहित होगी, भीतर-भीतर तरल क्रांति.

एनामे जाहिर सन गप अछि जे बाबा नागार्जुन कहै लेल कवि टा नहि छल, हुनकर सोच आ शब्दमे एकटा धार अछि। हुनकर एक-एकटा शब्द एहन अछि जे सुतल मुर्दाकेँ जगाबैक क्षमता राखैत अछि। लोकतंत्र मे हुनकर सहमति अछि मुदा छल-प्रपंच आ आडम्बरसँ ओ दूर रहै बला लोक छला। 
  
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नवेंदु कुमार झा
१.भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश? २.लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा ३.बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग
भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश?

(पटना ब्यूरो) भाजपा सँ दोस्ती का मोदी सँ दूरी, ई अछि स
त्ताक लेल राजनीतिक मजबूरी देश मे विपक्षीक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड पर सटीक बैसि रहल अछि। भ्रष्टाचार आ महगीक विरूद्ध भाजपाक वरिष्ठ नेता पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणीक प्रारंभ होमए बाला रथ यात्रा के बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा विदा करबाक निर्णयक जदयूक घोषणा सँ भाजपा राहतक सांस लेलक अछि। हालांकि जदयूक एहि निर्णय सँ राजगक भीतर प्रधानमंत्री पदक लेल संशय बढ़ि गेल अछि। एक दिस उपासक बहन्ने गुजरातक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पदक मजगूत दाबेदारी प्रस्तुत कएलनि अछि। मुदा भाजपाक भीतर मोदी विरोधी खेमा एहि रथ यात्रा लेल जदयूक समर्थन लऽ प्रधानमंत्रीक रूप मे श्री आडवाणीक दावेदारी के मजगूत करैबा मे सफल भेलाह अछि।
रथ यात्राक लऽ कऽ भाजपा आ जदयू मे चलि रहल खीचतान के विराम दैत नीतीश कुमार एक बेर फेर अपना आप के कुशल राजनीतिक रंजिनियरक रूप मे सोझा अएलाह अछि। मोदीक संग पटना मे लागल पोस्टर पर नाराज होमय बाला श्री कुमारक आडवाणीक रथ पर सवार होएब दूरगामी राजनीतिक सोचक परिचायक अछि। नीतीश कुमार के एहि बादक अंदाज अछि जे केन्द्र के सत्ताक मे राजगक संभावना बनला पर प्रधानमंत्री पदक वास्ते भाजपा मे घमासान भऽ सकैत अछि आ एहि स्थिति मे आडवाणी खेमाक ओ पसिन्न बनि सकैत छथि। एखन राजग मे हुनक शासन व्यवस्था के लोहा मानल जा रहल अछि आ ओ एकर लाभ लेबाक सभ संभव प्रयास करताह। श्री कुमारक दूरगामी राजनीतिक कौशल विधान सभा चुनाव मे सेहो देखल गेल छला। विधानसभाक पहिल चरणक चुनाव अल्पसंख्यक बहुल क्षे मे छल आ जद यू साझा प्रचार अभियानक बादो पहिल चरणक चुनाव प्रचार मे लाल कृष्ण आडवाणी सँ दूरी बनौने छल।
ओना लोक सभा चुनाव मे एखन समय अछि मुदा महगी आ भ्रष्टाचारक मामिला पर लाचार कांग्रेसक नेतृत्व वाला डा0 मनमोहन सिंह सरकारक विरूद्ध बनल वातावरण के भजैबाक लेल एखनहि सँ कसरत कऽ रहल अछि। हालांकि भाजपा दिस सँ एखन धरि प्रधानमंत्रीक उम्मीदवारक नाम पर अंतिम सहमति नहिल बनल अछि मुदा जदयू राजगक प्रधानमंत्रीक उम्मीदवारक नामक घोषणा लेल अपना स्तर सँ दबाब बनाएब प्रारंभ कऽ देलक अछि। जदयूक नेता सभ एहि लेल नीतीश कुमारक नाम बेर-बेर उछालि रहल छथि हालांकि श्री कुमार बेर-बेर एहि पर सफाई दऽ अपन उम्मीदवारी के नकारि रहल छथि। तथापि आडवाणीक रथ यात्रा मे हुनक भागीदारीक घोषणा सँ प्रधानमंत्री पदक उम्मीदवारी राजगक लेल हॉट केक बनि गेल अछि।
आडवाणी भाजपाक रथ यात्राक कुशल सारथि छथि। राम मंदिर आंदोलनक रथ पर सवार भऽ ओ भाजपा केऽ सत्ताक प्रमुख दावेदारक रूप मे स्थापित कएलनि अछि। देशक वर्तमान राजनीति कांग्रेस आ भाजपा के नेतृत्व मे ध्रुवीकरण भऽ गेल अछि। भाजपा महारथी एखन धरि राम रथ यात्रा जनादेश रथ यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा भारत उदय रथ याथ आ भारत सुरक्षा रथ यात्राक सारथी बनि चूकल छथि मुदा राम रथ यात्राक बाद रथ या़ाक बढ़ैत संख्याक संगहि जन समर्थन कम होईत गेल आब 11 अक्टूबर सँ जय प्रकाश जन्म भूमि सिताब दियारा सँ प्रारंभ होमए बाला रथ यात्राक सभ पर नजरि अछि। ओना महगी आ भ्रष्टाचार विरूद्ध भाजपाक भेल शंखनाद सम्मेलन कतेको ठाम भेल छल जे फ्लॉप शो साबित भेल छला।

लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा

भारतीय जनता पार्टीक वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथ यात्रा 11 अक्टूबर के सम्पूर्ण क्रान्तिक प्रणेता जय प्रकाशक जन्म स्थली उत्तर प्रदेशक सिताब दियारा सँ प्रारंभ भऽ छपरा होइत ओहि दिन राजधानी पटना पहूचत। 11 अक्टूबर के रात्रि विश्रामक बाद ई यात्रा 12 अक्टूबर के गयाक लेल विदा भऽ जाएत आ ओहि रास्ता सँ साझ मे झारखंडक सीमा मे प्रवेश करता। 11 अक्टूबर के एहि यात्रा के बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार झण्डी देखा कऽ विदा करताह। एहि अवसर पर लोकसभा मे विपक्षक नेता सुषमा स्वराज आ राज्य सभा मे विपक्षक नेता अरूण जेटली सेहो उपस्थित रहताह। भाजपाक रथ यात्राक सारथी श्री आडवाणीक ई छठम रथ यात्रा होएत। एहि सँ पहिने ओ राम रथ यात्रा, जनादेश रथ यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, भारत उदय रथ यात्रा आ भारत सुरक्षा रथ यात्रा कऽ चूकल छथि मुदा राम रथ यागा सन जन समर्थन आर कोनो यात्रा के नहि भेटल छल।
 
३\
बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग
बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग लगैबाग नीतीश सरकार प्रयास लगातार चलि रहल अछि एहि कड़ी मे सरकार आब एफएमसीजी कम्पनी दिस ध्यान देलक अछि। आईटीसी, नस्ले आदि कम्पनी द्वारा प्रदेश मे निवेश करबाक योजनाक बाद आब डिटर्जेंट आ साबूनक क्षेत्र मे बहुराष्ट्रीय कम्पनी के टक्कर दऽ रहल घड़ी डिटर्जेंट आ साबून के इकाई प्रदेश मे लगैबाक योजना अछि। कानपुरक आरएसपीएलक ई उत्पाद बिहार मे बनैबाक लेल कम्पनी सरकारक संग गपसप कऽ रहल अछि। सरकारी सूत्रक अनुसार कम्पनी एहि योजनाक लऽकऽ गंभीर अछिआ गोटेक 100 करोड़ टाका निवेश करत। उद्योग विभाग प्रधान सचिव सी.के. मिश्रा जनतब देलनि अछि जे निवेशक के आकर्षित करबाक लेल सरकारक रणनीति सफल भऽ रहल अछि। पैघ कम्पनी दिस सेहो ध्यान देल जा रहल अछि।
घड़ी डिटर्जेन्ट बनबऽ बाला आरएसपीएल पटना सँ सटल फतुहा लऽग जमीन पसिन्न कएलक अछि। आशा अछि जे एहि मासक अंत धरि एहि पर अंतिम निर्णय भऽ जाएत आ विस्तृत प्रस्ताव सरकार धरि पठा देल जाएत। दोसर दिस आईटीसी सेहो अपन कारोबार बढ़ा रहल अछि। कम्पनी मूंगेर मे स्थापित अपन इकाईक लऽग-पास मे नव डेयरी इकाई खोलबाक निर्णय लेल अछि। एहि इकाई मे 100 सँ 200 करोड़ टाकाक मध्य निवेश करत। एहि मध्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी नेस्ले बिहार मे प्रस्तावित योजनाक संदर्भ मे तऽ किछु स्पष्ट नहि कएलक अछि मुदा सरकारी सूत्रक अनुसार कम्पनीक संग गप-सप चलि रहल अछि। कम्पनी के पटनाक लऽग-पास मे ऊंच जगह पर जमीनक खोज कएल जा रहल अछि। कम्पनीक एहि प्रस्तावित इकाई सँ चॉकलेट आ मैगी नूडल्सक उत्पादन होएत।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
 
किशन कारीगर

मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ?
                  एकटा हास्य कथा।

इंडिया टी वि मे एकटा संगी सँ भेंट केने फिल्म सिटी नोएडा स अबैत रही। समाचार बूलेटिन क समय भ गेल रहै तही दुआरे हरबड़ाएल आकाशवाणी अबैत रही। हम सेक्टर 16 मेटो स्टेशन लक आएले रही  की ओतए एकटा मित्र मदन भेंट भए गेलाह कुशल छेमक गप भेलाक बाद हम बजलहू भाए एखन हमरा जाए दियअ फेर कहियो गप नाद करब । ओ बजलाह यौ किशन अहू हरबड़ाएल नोएडा अबैत छी आ फूर सिन पड़ा जायत छी कहियो भेंटो घांट ने पहिन हमरा एकटा गप समझा दियअ तखन जाएब ।हम बजलहु  जल्दी कहू त ओ बजलाह ई कहू त मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ?
       हम किछु बजितहु कि ताबैत डमरू डूगडूग क अवाज सुनलियै ओतए मेटो सीढ़ि लक बाबा भेंट भए गेलाह हमरा देखैत मातर ओ बजलाह हौ कारीगर बच्चा तोरे तकैत तकैत अई ठाम अएलहू पहिने हमरा जल्दी स एकटा गप बुझहाए दैए। हम बजलहू कोन गप यौ बाबा की ओ बजलाह हौ बच्चा एकटा गप कहअ त मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ? हम बजलहु इ त हमरो नहि बुझहल अछि मुदा अहॉ कोन मुन्नी क गप कहि रहल छी। बाबा हॅसैत बजलाह हौ कारीगर तहू बड्ड अनठा अनठा क पुछैत छह कहअ त सौंसे दुनिया अनघोल भेल छै जे मुन्नी बदनाम भेलै शिला क जवानी तेरे हाथ न आनी। तई मे तोंही मीडियावला सभ और बेसी हल्ला केने छहक मुन्नी फिर से बदनाम हुई मुन्नी को देख डोला इमान। एतबाक नहि चैनलो मे बचिया सभ देहदेखौआ कपड़ा पहिर खालि एहने समाचार सभ पढ़ैत छैक देखू वालीवुड मसल्ला मुन्नी बदनाम भेलै देखैत छहक इ समाचार देख सुनि दोसरो मुन्नी सभ बदनाम होइ लेल एखने स आतुर भेल छै। तहि दुआरे त हम पुछलियअ जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ?
   बाबाक प्रशन सुनि त हम गुम भए गेलहु किछु ने फुरा रहल छहल आ हॅसी सेहो लागि रहल छह। बाबा फेर बजलाह हौ एतेक कथि सौचै मे लागल छह ज कहि दिमाग तिमाग भंगैठ जेतह त  कोन ठिक तहू बदनाम भ जहियअ। देखहक एकटा गप त हम बुझहलियै जे जेबी मे एक्को टा पाइ नहि रहतह आ थूथून निक नहि रहतह त कतबो नाक रगरब त बापो जिनगी मे शिला क जवानी हाथ न आनी मुदा ई दोसर गप हमरा दिमागे मे ने घूसी रहल अछि जे मुन्नी बदनाम हुई। तहि दुआरे तोरा पुछलियअ जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ?हम बजलहु अच्छा बाबा एकटा गप कहू त अहा केना बुझहलियै जे मुन्नी बदनाम भेलै। बाबा बजलाह कहअ त सौंसे दुनिया ई गप अनघोल भेल छै तहू मे त आब शहर बजार स ल क गाम घर तक ई मुन्नी बदनाम ने भेलै कि हमरा रहनाई मुशकिल भए गेल। आब त कान दै जोग नहि रहलै जतै देखहक ततै मुन्नी बदनाम।
    हम बजलहू अई यौ बाबा मुन्नी बदनाम भेलै त अहा किएक अकक्ष भेल छी। बाबा बजलाह हौ कारीगर अकक्ष की जान बचाएब मुशकिल भए गेल अछि देखैत छहक छौंडा मारेर सभ पूजा करैत काल मंदिरे मे गाबअ लगतह मुन्नी बदनाम भेलै हेतै  यै मुन्नी अहा क गली गली मे चर्चा किदैन कहा । ततबेक नहि यै छौंडी सभ मंदिरे मे सप्पत खा खा बदनाम होइए क फिराक मे लागल रहतह। कहतह हे भोला बाबा तोंही जान बचबिहअ तोरा दू लोटा बेसी क जल चढ़ेबह। मुदा गारजियन सभ हमरा आबि आबि पुछतह यौ बाबा एतए कोनो मुन्ना मुन्नी क देखलियैए। आब त हमरा डरो होइए जे कहिं बदनाम होइ क झोंक मे कोइ हमरो लेल ने बदनाम भए जाय। तहू मे नबका तूरक धिया पूताक कोनो भरोस नहि एकरा सभ क पढ़नाइ लिखनाई मे कम आ बदनाम होइ मे बेसी मोन लगैत छैक। औग ने पौछ देखतह आ खाली बदनाम होइए क फिराक मे लागल रहतह। हम बजलहू अई यौ बाबा अहा लेल के बदनाम होइए।
 बाबा बजलाह हौ बच्चा जूनि पूछह कि कहियअ पछिला कोजगरा मे हम अप्पन सासुर हरीपुर गेल रही कुशल छेमक गप भेलाक बाद हमर छोटकी सारि टुन्नी बजलीह यौ पाहुन एकटा गप कहू । हम कहलियैन कहू ने की एतबाक मे केम्हरो स हमर बीरपुर वाली सरहोइज चाह पान नेने दौगल अएलीह। हम एक घोंट चाह पीनैहे रही की बीरपुर वाली बजलीह पाहुन एकटा गप बुझहलियैए हम हुनका पुछलियैन कोन गप यै त ओ बाजल चुपू अनठिया कहि क बुरहारी मे खाली गप अनठा अनठा बजैत छी आ हमर सरहोइज सारि खूम जोर सॅ हा हा क हसैए लगलीह। फेर बीरपुर वाली खिखिआ क हसैत बजलीह टुन्नी बदनाम हेतै यै बुरहबा पाहुन अहि क लिए। टुन्नी ताली बजा बजा सुल मे ताल मिला गाबए लागल टुन्नी बदनाम हेतै यौ बुरहबा पाहुन अहि क लिए । हौ बच्चा टुन्नी क गप सुनी त कि कहियअ हम असमंजस मे परि गेलहु जे इ अपनो बदनाम होएत आ बुरहारी मे हमरा गंजन टा कराउत। डरे हम दोसर घोंट चाहो नहि पिलहु चाह सेरा क पानि भ गेल।
फेर कि भेल यौ हम उत्सुकतावस बाबा स पुछलियैन त ओ बजलाह हौ बच्चा सभटा गप तोरा कि कहियअ टुन्नी क हम कहलियै अई यै टुन्नी एतेक छौंडा मारेर सभ साइकिल ल क ओइ बाध स ओई बाध शहर स बजार मुन्नी क तकने फिरै छै तेकरा सभ लेल बदनाम हएब से नहि त फुसियाहि क हमरा पाछु लागल छी। टुन्नी बजलीह नहि यौ पाहुन हम त अहि लेल बदनाम होएब तब ने लोको हमरा चिनहत जे हमहू बदनाम होइ लेल आतुर भेल छी। भने मीडियावला सभ क एकटा खबर सेहो भेट जेतैए जे मुन्नी फिर बदनाम हुई आ हमरो कोनो धारावाहिक मे झगरलगौन माउगी वा कि कोनो फिल्म मे आइटम गर्ल क काज भेट जाएत। कि कहियअ टुन्नी क बदनाम हेबाक प्रबल इच्छा देखि हम फुर दिस अपना सासुर स बिदा भगलहु आ फेर कहियो हरीपुर नहि गेलहु। ओकर गप सुनि त डरे हमरा हुकहुकी धए लेलक जे कहि ठीके मे टुन्नी बदनाम भेलै आ कि एना केलकै त हमहू बदनाम भए जाएब। तहि दुआरे त कहलियअ  हौ बच्चा जे कहिं कोई हमरो लेल ने बदनाम भए जाए तहू मे आबक धिया पूता क कोनो ठेकान नहि बदनाम होइ दुआरे फिलमी फंडा अपनौतह। गारजिअन के इ कहतह जे हम टीशन पढ़ै लेल जाइत छी आ पढ़नाइ छोड़ि क पार्क कॉफि हाउस घूमै लेल चलि जेतह आ बदनाम होइ क फिराक मे लागल रहतह। जेना ओकरा सभ के और कोनो काजे नहि रहै तहिना।
   बाबा बजलाह हौ बच्चा तू ख़बर लेल हाट बजार स ल क शहर गाम सभ ठाम जाइत छह मुदा हमरा एकटा गप नहि बुझहा देलह। हम पुछलियैन कोन गप यौ बाबा की ओ बजलाह अईं हौ कारीगर तहू बड्ड अनठाह भ गेलह तोरा त ई गप बुझहले हेतह जे मुन्नी भेलै आ तहू मे मीडियावला सभ और बेसी हल्ला केने छहक। कतए कोन मुन्नी बदनाम भेलै सेहो ख़बर रखैत छह मुदा हमरा सिरिफ एक्के टा गप बुझहा दए ने जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ?

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