भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).

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(c) २००-२०२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.htmlhttp://www.geocities.com/ggajendra  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Tuesday, November 13, 2012

'विदेह' ११८ म अंक १५ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११८) - PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' ११८ म अंक १५ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११८)India Flag Nepal Flag

 

ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य









 

३. पद्य









३.७.रामवि‍लास साहु- बाल कवित

३.८.१.किशन कारीगर- घोटालाबला पाइ २.अजीत मिश्र-दीआबाती ३.श्याम दरिहरे- ओबामा ओबामा ओबामा
  

बालानां कृते-१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल-बाल गजल २.राजदेव मण्‍डल- बाल कवि‍ता


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ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली] लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ?

Thank you for voting!
श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक अर्चिस” (कविता संग्रह)  29.55%   
 
श्री विनीत उत्पलक हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  5.26%   
 
श्रीमती कामिनीक समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  4.05%   
 
श्री प्रवीण काश्यपक विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  2.83%   
 
श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  21.46%   
 
श्री अरुणाभ सौरभक एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  4.86%   
 
श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  5.26%   
 
श्री आदि यायावरक भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  4.05%   
 
श्री उमेश मण्डलक निश्तुकी” (कविता संग्रह)  21.05%   
 
Other:  1.62%   
 
 

ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली] लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि?

Thank you for voting!
श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  34.43%   
 
श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  11.48%   
 
श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  10.66%   
 
श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  20.49%   
 
श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  12.3%   
 
श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  9.84%   
 
Other:  1%   
 

फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली

Thank you for voting!
श्री राजनन्दन लाल दास  45.69%   
 
श्री डॉ. अमरेन्द्र  35.34%   
 
श्री चन्द्रभानु सिंह  17.24%   
 
Other:  1.72%   
 

 

 

1.संपादकीय

(समन्वय २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव, दिल्लीक बहसक आधारपर)
की मैथिली साहित्य अपन मूल स्वरमे ब्राह्मणवादी अछि?
हमर उत्तर दुनू अछि- हँ आ नै। जँ अहाँ मिथिला दर्शन, अंतिका, पागबला विद्यापति पर्व समारोह केनिहार चेतना समितिक घर-बाहर, झारखण्डक सनेस वा जखन-तखनक लेखकक जातिक प्रोफाइल देखि कऽ कहि रहल छी, जातिवादी रंगमंचक मात्र दू जातिक कट्टर दर्शकक अहंकेँ संतुष्ट करबा लेल प्रयुक्त कएल जा रहल आपत्तिजनक शब्दावलीक निर्लज्जतापूर्ण प्रयोगक आधारपर कहि रहल छी, साहित्य अकादेमीमे आइ धरि सभटा आठो समन्वयक जातिक प्रोफाइलक आधारपर कहि रहल छी, सी.आइ.आइ.एल, एन.बी.टी., बा साहित्य अकादेमीक दुब्बर-पीअर कपीश संकलन आ कार्यक आधारपर कहि रहल छी, आकाशवाणी दरभंगा वा हिन्दी अखबारक दरभंगा संस्करणक आधारपर कहि रहल छी तँ उत्तर हँ अछि।
मुदा जँ ज्योतिरीश्वर पूर्व/ श्रीधर दास पूर्व बिन पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापति, बा पिताक मृत्युक पाँच बर्ख बाद जन्म आ चर्मकारिणीसँ विवाह केनिहार तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश जिनकर प्रेमकविता विलुप्त कऽ देल गेल, भोरुकवा एफ.एम. चैनल, फुलप्रास लगक पकड़िया गाम (पोस्ट रतनसारा) क रामलखन साहुजी पुत्र स्व. खुशीलाल साहुजी जे २५ सालसँ नाच पार्टी कम्पनी खोलने छथि आ दसो बिगहा बोहा देलनि, बा ऐ बेर दुर्गापूजामे नै किछु तँ सए नाच पार्टी नाच केलक; ई सभ देखी तँ उत्तर नै अछि। आ जँ आकाशवाणी दरभंगा, दरभंगाक हिन्दी अखबार, आ मैथिलीक ऊपरवर्णित पत्रिका ओकरा समाचार नै बुझैए आ कोनो साधारण नाटककारक/ लेखकक सालाना उर्सक न्यूजक आधारपर मैथिली नाटककेँ मृत घोषित करैत साक्षात्कार छपैए तँ ई ओकर समस्या छै।
विद्यापतिक पदावलीक आधारपर भऽ रहल बिदापत, आ ओही पदावलीक पिआ-देशांतर (माइग्रेशन)क आधारपर भऽ रहल पिआ देशान्तरक पार्टी सभमे सेहो कमी आएल अछि, मुदा जँ अनुपात देखल जाए तँ मुख्य आ समानान्तरक बीच अखनो एक आ निनानबे केर छै तखन तँ ई गएर ब्राह्मणवादी ने भेल।
पर्वत ऊपर भमरा सूतल मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे
उठू-उठू मालिन बेटी गाँथू गिरमल हार हे।
जँ शब्द शास्त्रम केर ऐ गीतमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ सर्वहाराक गीत नै शास्त्रीय गीत देखबामे अबै छन्हि तँ ई गीत विदेह ऑडियोमे अपलोड छै, आ ओ ओही पात्रक टोल (चर्मकार टोल) सँ रेकॉर्ड कएल गेल छै जकर ई कथा छिऐ, आ यएह गएर-ब्राह्मणवादी परम्पराक जीत अछि।

विद्यापतिक कोन परंपरा- जतऽ ओ वर्णाश्रम व्यवस्थाक समर्थन करै छथि बा स्त्रीक दर्दकेँ भोगैत: कौन तप चकलहूँ भेलहूँ जननी गे बा गरीबक व्यथा -सुख सपनेहूँ नहिं भेल, गबै छथि

एतौ उत्तर वएह अछि। समानान्तर परम्परा मुख्यधारा लेल सर्वदा फैशनक रूपमे छै। ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति सेहो धूर्तसमागम आ गोरक्षविजय नाटकमे क्रमशः एकरा फैशनक रूपमे लेलन्हि। अवहट्ठ सेहो साहित्यिक भाषा रहै, आ समानान्तर परम्पराकेँ मुख्य धाराक प्रगतिशील लोक द्वारा फैशनक रूपमे प्रयोग कएल गेलै। जन कवि वा एक्टीविस्ट २--१०-२५-५० धरि पद्य लिखि कऽ संतुष्ट नै होइ छै, मुदा जँ ई फैशनक रूपमे प्रयुक्त हुअए तँ से ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक संग यात्री-नागार्जुनक फैशनपरस्त प्रगतिशील मैथिली कवितामे अबै छै। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्वक बिनु पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापतिक परम्परा तँ बिदापत, पिआ देशान्तर आ रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदारक झारू/ महाझारूमे देखा पड़त, हजारक हजार झारू लिखि कऽ बोहा देलनि, हमरा सन लोक जँ ओइमेसँ किछुओ लिखि कऽ टाइप कऽ लै छी तँ तकरो संख्या सए-दू सए ओहिना भऽ जाइ छै।
जँ तरौनीक लोकनाथ झाक घरपर बैसि वर्णाश्रम धर्म बला कविता पदावलीमे घोसिया दियौ, शिव सिंह, लखिमाक नाम घोसिया दियौ तँ ज्योतिरीश्वर पूर्व पदावलीक लय टूटि जाइए, आ बिदापत आ पिआ देशान्तर पार्टी ओकर मंचन गायन नै कऽ पबैए आ ई षडयंत्र बिनु परिश्रमेक खतम भऽ जाइए।
डायसपोरा कम्यूनिटी धरि पहुँचबाक उद्देश्यमे कनेक असहमति अछि, जे काज अखन हेबाक चाही से अछि नेटिव स्पीकर जतए रहि रहल छथि ओतुक्का दुष्प्रचारक लेल ई सूचना समाज आगाँ आबए। वंचित, महिला आ समानान्तर परम्पराक स्पोक्सपर्सनक रूपमे। जहाँ धरि मैथिली प्रिन्ट मीडियाक गप अछि, ओतौ समानान्तर लेखन क्वालिटी आ क्वान्टिटी दुनूमे ९०% स्थानपर अछि। इन्टरनेट तँ बोनस छिऐ, -५ सए मैथिली पोथी, दस हजार मैथिली ताल-पत्र पीडी.एफ. कैमरा रेडी कॉपीक रूपमे विदेह आर्काइवमे मुफ्त डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ओइमे देवनागरीक अतिरिक्त तिरहुता आ ब्रेलमे सेहो मैथिली अछि। गूगल आ विदेहक सौजन्यसँ चारि सएसँ ऊपर पोथी गूगल बुक्समे १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध छै; ऐमे सँ मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली डिक्शनरीक सात टा पोथी/ फाइल क्रिएटिव कॉमन्स (एट्रीब्यूशन-शेयर अलाइक)लाइसेन्सक अन्तर्गत १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि, माने कियो एकर उपयोग क्रेडिट दऽ कऽ (माने साभार लिखि कऽ) आ अही तरहेँ आगाँ लाइसेन्स वितरित करबाक शर्त स्वीकार कऽ कए कऽ सकै छथि, एकरामे वृद्धि कऽ एकर संवर्धन आ व्यावसायिक उपयोग कऽ सकै छथि। डायसपोरा कम्यूनिटीनेटिव कम्यूनिटीक प्रति अपन कर्ज उतारि रहल अछि। नेटिव स्पीकर बड्ड आगाँ बढ़ि गेल अछि, ओकर सोच आगाँ छै, ओ समानान्तर परम्पराक लेखनसँ अपनाकेँ आइडेन्टिफाइ कऽ रहल अछि, मुदा सुखाएल मुख्यधारा समाजसँ सकारात्मक दिशा आ समए क्षेत्रमे पाछाँ अछि।




(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११९ देशक १,६२६ ठामसँ ८५,६२२ गोटे द्वारा ४३,६३१ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,७४,६०६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।)

अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

२. गद्य









गजेन्द्र ठाकुर
 
जगदीश प्रसाद मण्डल: एकटा बायोग्राफी (आगाँ)

1978 ई.मे पंचायत चुनाव भेल। सीधा मुकाबला (दुइये उम्‍मीदवारक) भेल। बहुमत-अल्‍पमतक परि‍चय गामक सभ बुझैत छल। एकटा कनीटा उदाहरण- जखन वि‍रोधी नीक जकाँ ओझरा गेला, तइ बीच भोगेन्‍द्र जीक मध्‍यस्थतामे पनचैति‍यो मानि‍ लेल गेल। मुदा पंचेक बीच वि‍वाद फँसि‍ जाए। अंतमे ई भेल जे ने कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक बहरबैया पंच औता आ ने प्रमुखजी (वि‍न्‍ध्‍यनाथ ठाकुर) क बहरबैया पंच अबैले तैयार रहलखि‍न। मुदा पनचैती तँ पछुआएले अछि‍। जखन सभ छोड़ि‍ देलनि‍ तखन गामेक पंच बनथि‍। जइमे एकटा शर्त्त लागल जे दुनू पक्षक बीच जे नै सम्‍बन्‍धि‍त होथि‍ ओ पंच हेता। तकति‍यान भेल तँ एको गोटे शेष नै बँचलाह। ओहने शेष बँचला जे भीम जकाँ अभि‍मन्‍युक संग रहथि‍न।
     पंचायत चुनावसँ पूर्व 1977 ई.मे दि‍ल्‍लीयो सरकार आ पटनो सरकार बदलि‍ गेल। एक नव परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा लेलक। गामोक पार्टी (कम्‍युनिस्ट पार्टी) अनेको लड़ाइ लड़ि‍ चुकल छल। जइसँ गुण-अवगुण बूझि‍ चुकल छल। तँए चौगुणा उत्‍साह रहबे करै। टुटैत सामंती बेवस्‍थाक एकोटा घृणि‍त काज पंचायत चुनावमे शेष नै रहल। एकटा उदाहरण- बहुमत अल्‍पमतमे नामो बदलि‍ देल जाइत छल। जहि‍ना कतौ राक्षसक अर्थ रक्षा केनि‍हार छल, सुरक अर्थ सुरापान करैबला। काज करैमे फल्‍लाँ राक्षसे छी। असगरे लहासकेँ पीठपर लादि‍ असमसान लऽ गेल।
     चुनाव घोषणाक वि‍रोधमे मुखि‍यो आ सरपंचोक मामला कोर्ट पहुँचल। सरपंचक मामला निचले कोर्टसँ फड़ि‍या गेल। मुखि‍या चुनावक मामला हाइ-कोर्ट पहुँचल। चुनाव अवैध भेल। जहि‍ना ठाकुरक बरि‍आती ठाकुरे-ठाकुर तहि‍ना बि‍नु पंचायती‍क मुखि‍या बि‍ना सभ मुखि‍ये मुखि‍या। मुखि‍या-सरपंचक काजो तहि‍ना। मात्र गामक पनचैती। सरपंच भेने सेहो बदलि‍ गेल। ओना पार्टीक भीतर कि‍छु दरारि‍ बनि‍ गेल। दरारि‍ ई जे जि‍नका सरपंचक उम्‍मीदवार बनौल गेलनि‍ ओ‍करे खि‍लाफ दोसर नोमीनेशन कऽ देलनि‍। पार्टी अपन ि‍नर्णए आपस करैत चुनाव लड़ल।
     गामक वातावरणमे गुमराहट रहए। नीक-नीक अपराधीक गाओं बेरमा। एक ग्रुप छह-छह बर्ख जेल काटि‍ चुकल छलाह। ओहो सभ जीवि‍ते। जे चुनाव (पंचायत चुनाव) मे बूथपर लाठी हाथे कि‍छु गोटे बैसलो आ कि‍छु गामोमे घुमैत। कसमकस रहने चुनाव शान्तिसँ भेल। मुदा गि‍नती काल एक गोटे (प्रमुखक गि‍नती एजेंट) दस-बारहटा मोहर देल बाइलेट हाँइ-हाँइ कऽ खा गेल। तही बीच पार्टीक एजेंट देखलक कि‍ हाँइ-हाँइ कऽ पान-सात थापर मुँहमे लगा देलकनि‍। थापर लगि‍ते मुँहसँ उगललक।
     छह बर्ख जहल कटलाहा एक गोटे एकटा खस्‍सीक चोरि‍मे पकड़ा गेल। खस्‍सी शि‍वलाल महतोक। चोर-मोट पकड़ाएल। मारि‍-पीट शुरू भऽ गेल। आदति‍ छोड़बै जोकर मारि‍ लगलनि। संग-संग ईहो भेल जे पकड़ि‍ कऽ थाना पहुँचा देल गेल। तहि‍ना दोसराक संग (दोसर अपराधीक) सेहो भेल। ओना खुदरा-खुदरी झंझट होइते रहैत छल, मुदा से सभ कमल।
पंचायतक वि‍धि‍-वि‍धानक जे कि‍ताब छल सेहो तेहने छल। लोक-सभामे भोगेन्‍द्र जीक प्रस्‍तावकेँ स्‍वीकृति‍ भेटल। गाँधी जीक कल्‍पना आ मगध जनतंत्र वैचारि‍के दुनि‍याँमे छल बेवहारि‍क जमीनपर नै छल।
अही बीच (1977 ई.मे) एकटा मि‍त्र जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ भेटलन्हि। ओ रहथि‍ स्‍व. काली कान्‍त झा, आइ.पी.एस।
बेरमाक बगले पूब कछुबी गाम छै। काली बाबू कछुबीयेक। 1969 ई.क बैचक आइ.पी.एस। ओ गाम आएल रहथि‍। झंझारपुर बजारक कोनो काज रहनि‍। बेरमा कछुबीक बीच बाधक ‍अड़ि‍पेरि‍यासँ लऽ कऽ पक्की सड़क धरि‍ कतेको रास्‍ता अछि‍। अपना घरसँ सीधा पूब हुनकर घर छन्‍हि‍। असकरे पएरे झंझारपुर जाइत रहथि‍ तँए सोझ-साझ रस्‍ता हि‍या-हि‍या बढ़ैत रहथि‍। जखन बेरमा मुसहरी लग एला तँ रस्‍ता दू दि‍शि‍या बूझि‍ पड़लनि‍। दुनू घूमि‍ कऽ आगू मि‍लैत अछि‍ जइठाम सँ झंझारपुरक रास्‍ता सोझ भऽ जाइ छै। मुसहरी बगले गामक डि‍हवारक स्‍थान। स्‍थान रहने चारू दि‍ससँ लोकक आवाजाही तँए चारू कात रास्‍ता अछि‍। ओइठाम आबि‍ जखन आगू हि‍यौलनि‍ तँ सोझका पछि‍म मुँहेँ बूझि‍ पड़लनि‍। डि‍हवार स्‍थान घरक बगलेमे पूबारि‍ भाग अछि‍। ओही रस्‍तासँ आगू बढ़लाह। तँ दरबज्‍जेपर चलि‍ एला। ओना चेहरासँ जगदीश प्रसाद मण्डल ि‍चन्‍हैत रहथिन‍। मुदा एक स्‍कूलमे पढ़ैक कहि‍यो अवसर नै भेटलनि। तेकर कारण छल, शुरूमे ओ गाममे कि‍छु दि‍न पढ़ि‍ नवानी वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खाैलनि‍ आ जगदीश प्रसाद मण्डल गामक स्‍कूलसँ टपि‍ कछुवि‍ये अपन प्राइमरीमे नाओं लि‍खेलनि। अखन तँ मि‍ड्ल स्‍कूल धरि‍ मि‍लि‍ गेल अछि‍ मुदा ओइ समए मि‍ड्ल स्‍कूल अलग छल। सभ बेवस्‍था अलग छलै।
मध्‍यमा पास कऽ जखन धुड़झाड़ संस्‍कृत पढ़ए-लि‍खए आबि‍ गेलनि‍, पि‍ताकेँ संतोष भऽ गेलनि‍। तखन ओ (काली बाबू) तमुरि‍या हाइ स्‍कूलमे दसमामे नाओं लि‍खौलनि‍। ओइ समए बि‍नु सर्टि‍यो फि‍केटक दसमा धरि‍ एडमीशन होइ छल। दसमा-एगरहमाक मि‍श्रि‍त सि‍लेवस छल। साल भरि‍क पछाति‍ दसमाक परीक्षा होइत छल जे स्‍कूलेमे होइत छल। नहि‍ये जकाँ वि‍द्यार्थी फेल करैत छलाह। जेना आन-आन बहुत देशमे अखनो अछि‍। दसमा-एगरहमाक बीच एसेसमेंट प्रथा सेहो छल। दू सए नम्‍बरक होइत छल। जइसँ मैट्रि‍कक बोर्ड परीक्षामे अस्‍सि‍ये-अस्‍सि‍ये नम्‍बरक वि‍षय होइत छल। असि‍समेंटक नम्‍बर वि‍द्यालये (स्‍कूले) सँ पठाओल जाइ छलै जे बोर्डक (मैट्रि‍कक) रि‍जल्‍टमे जोड़ि‍ होइ छल। मुदा एकटा बात बीचमे जरूर छलै जे बाइस-बाइस नम्‍बर एलापर पास होइत छल। मुदा तहू भीतर एकटा आरो छलै जे समाज अध्‍ययन दसे नम्‍बरमे पास होइत छल। एकर माने ई नै जे दस नम्‍बर असान भेल। अधि‍कांश वि‍द्यार्थी बीस नम्‍बरक भीतरे रहैत छलाह, गोटि‍-पङरा आगू बढ़ैत छलाह। आर्ट वि‍षय (फैक्‍लटी) लऽ कऽ नाओं लि‍खौलनि‍। मुदा साले भरि‍क पछाति‍ (दसमाक परीक्षा) स्‍कूले नै आनो-आन स्‍कूलमे चर्चाक पात्र कालीबाबू बनि‍ गेला। कारण भेल जे अखन धरि‍ हाइ स्‍कूलमे अठमासँ लऽ कऽ बोर्ड धरि‍क परीक्षामे साइंसक वि‍द्याथीक रि‍जल्‍ट अगुआएल रहैत छल। दसमामे फस्‍ट (पहि‍ल स्‍थान) भेलनि‍। आर्ट वि‍षयमे एकटा धक्का लागल। धक्का ई लागल जे अखन धरि‍ परीक्षाक नम्‍बर दइक बेवहार छल ओ दोसर रंगक छल। घुसुकुनि‍याँ कटैत आर्टक नम्‍बर घुसुकैत छल, जखन कि‍ साइंसक वि‍षयमे सए-मे-सए छल। कनीटा उदारहण- जखन हाइ स्‍कूलक सम्‍बन्‍धमे चर्च भेल तखन ओ कहलनि‍- खा कऽ स्‍कूल वि‍दा होइ काल हाथक तरहत्‍थीपर पाँचटा अंग्रेजी शब्‍द वा एकटा प्रश्नक उत्तर लि‍खि‍ लइ छलौं आ स्‍कूल पहुँचैत-पहुँचैत रटि‍ लइ छलौं। जाइयो काल आ अबैयो काल करै छलौं। स्‍कूल पहुँचते पहि‍ने कलपर जा बढ़ि‍या जकाँ हाथ धोइ लइ छलौं, तखन बैसै छलौं। ओना शि‍क्षा पद्धति‍मे सेहो कि‍छु अन्‍तर अछि‍। रटैक चलनि‍ सभ रंग अछि‍।प्रथम श्रेणीसँ मैट्रीक पास केलनि‍। मुदा घरक स्‍थि‍ति‍ ओते नीक नै तँ खराबो नै। कारण जे ओ महापात्र परि‍वारक छलाह। से जमीनदारि‍ये जकाँ पसरल अछि‍। तहूमे महापात्रक कम जन-संख्‍या रहने अखनो धरि‍ अबादे छन्‍हि‍। ओइ समए सी.एम कओलेज बहुत नीक कओलेज बूझल जाइत छल। नीक वि‍द्यानीक एडमि‍शनो होइत छल। 1959 ई.मे चारि‍टा कओलेज खुजल जइमे जनता कओलेज झंझारपुरो आ सरि‍सो कओलेज सेहो खुजल। मैट्रीक केला पछाति‍ सी.एम. कओलेज नै जा, ओना आर.के. कओलेज सेहो नीक छल, मुदा दुनूक बेवहारि‍क पद्धति‍मे कि‍छु अन्‍तर छल। जइठाम आर. के. कओलेजमे सबहक गुनजाइश छल तइठाम सी.एम. कओलेजमे नै छल। दोसरो कारण छल सी.एम. कओलेज सरकारी बनि‍ चुकल छल। छात्र प्रवेशक सीमा ि‍नर्धारि‍त छल। सी.एम. कओलेजक इच्‍छा रहि‍तो काली बाबू सरि‍सो कओलेजमे नाओं लि‍खौलनि‍। कारण भेलनि‍ जे एकठाम दूटा वि‍द्यार्थी पढ़बैक बदलामे रहै-खाइक जोगार लगि‍ गेलनि‍। परि‍वारक आमदनी ओते खराब नै जइसँ सी.एम.कओलेज नै जा सकै छलाह मुदा सहयोगक अभाव रहलनि‍। लि‍टरेचर इंग्‍लीशक संग प्रथम श्रेणीमे आइ.ए. पास केलनि‍। दरभंगामे रहैक गर लागि‍ गेलनि‍। अंग्रेजी आनर्सक संग सी.एम. कओलेजमे नाओं लि‍खौलनि‍। आनर्स ग्रेजुएट भऽ नि‍कललाह। एकटा कनीटा बात- जगदीश प्रसाद मण्डल जइ समएमे जनता कओलेजमे पढ़ैत रहथि तइ समए आनर्सक पढ़ाइ नै होइत रहै। खाली मैथि‍लीमे तीन शि‍क्षक रहथि‍, जइसँ मैथि‍लीमे होइत रहै। जगदीश प्रसाद मण्डल हि‍न्‍दी, राजनीति‍ शास्‍त्रक वि‍द्यार्थी रहथि। प्राइवेटे सँ हि‍न्‍दी आनर्सक तैयारी केलनि। ओना दू गोटे (दूटा शि‍क्षक) कओलेजमे रहथि‍ मुदा पढ़ाइ नै होइत रहै। बी.ए.क फार्म धरि जनते कओलेजसँ भरलनि, परीक्षा सी.एम. कओलेजमे भेल।
जगदीश प्रसाद मण्डल डि‍हवार स्‍थानक पछवरि‍या रस्‍ता पकड़ने दरवज्‍जापर आबि‍ गेला। आइ.पी.एस. अफसरक आएब अपनाकेँ सौभाग्‍यशाली बुझलनि। पकड़ि‍ कऽ दरवज्‍जापर बैसौलनि‍। पुछलनि‍ तँ कहलनि‍ जे झंझारपुर जाइ छी, काज अछि‍। कहलखिनजे अहाँ असकरे छी, तहूमे पाएरे छी दि‍क्कत हएत। कहलनि‍ जे कोनो दि‍क्कत नै हएत। फेर कहलनि‍ जे हमहूँ संग भऽ जाइ छी। कि‍छु गप-सप करैक मौका सेहो भेटत। मुदा ओ पुलि‍स नजरि‍बला। कहलनि‍ जे साइकि‍ल दि‍अ घुमैकालमे दऽ देब।
साइकि‍लसँ झंझारपुर गेला। जि‍नगीक तेना कऽ पहि‍ल भेँट दुनू गोटेक बीच भेल छल। ओइ दि‍न ई अंदाजमे नै आएल छलनि जे सम्‍बन्‍ध एते गाढ़ आ जि‍नगी भरि‍ नि‍महतनि। अंदाजमे नै अबैक कारण छलनि जे कतेको पुरान हि‍त-अपेछि‍त टूटि‍ गेल छलनि। ओना नवको बढ़बो कएलनि। एकटा उदाहरण- एकटा गामेक संगी छलखिन, कओलेजमे संगे पढ़ने रहथि। मुदा जाइतक सीमा घेरने छलनि। स्‍टेट बैंकमे हुनका नोकरी भेलनि‍। नीक दरमाहा। अनधुन आमदनी। वि‍चार एते बदलि‍ गेलनि‍ जे गाम एलापर भेँट-घाँट नै होइ छलनि। कुसंयोग एहेन भेलनि जे दसे-बारह बर्ख पछाति‍ स्‍कूटर एक्‍सीडेंटमे जखमी भेला आ गाम आबि‍ कि‍छु दि‍नक पछाति‍ मरि‍ गेला। अखनो दुख होइ छनि जे मुइला पछाति‍ देखए (जि‍ज्ञासा) नै गेलखिन‍। मुदा वि‍चार एहेन बनि‍ गेल छलनि, जि‍नगीक अनुभवसँ, जे दोस्‍त-दुश्‍मनक बीचक दूरीक फलाफल कि‍ होइ छै से बूझि‍ गेल छला। कनीटा उदाहरण- एक गोटे नजदीकी रहथिन‍। हुनका ऐठाम बि‍आह रहनि। दि‍न-राति‍ रहला। मुदा हुनका (जि‍नकर काज रहनि) दोस्‍त-दुश्‍मनक बुझैक नै रहनि‍। सभ रंगक लोक काजमे लागल छल। एक गोटे जि‍नका बदनाम करैक वि‍चार मनमे रहनि‍, चाहे जे पछि‍ला कोनो कारण होउ, दालि‍मे दोहरा कऽ नून दऽ देलखि‍न। पछाति‍ जखन दालि‍ नुनगर भऽ गेलै तखन जगदीश प्रसाद मण्डलक नाओं लगा देलखिन‍। एहि‍ना दोसरठाम भेल। बि‍नु अदहन देने बरतनमे सुखले दाि‍ल दऽ नाओं लगा देलकनि‍। तहूसँ एकबेर भेल जे गामक दुर्गापूजामे कार्यकर्ता छला, नाचक भार भेटलनि जे नीक नाच हुअए। तइ समए गाम-घरमे नाटक-नौटंकी कम छल आ नाच बेसी अनेको तरहक छल। एक गोटे नाच अनैक भार लऽ लेलनि‍। बढ़ियाँ नाचक खूब प्रचार भेल। जखन नाच आएल तँ जेहने नीकक प्रचार भेल रहए तेहने हहासो भेल। मुदा जखने कि‍यो परि‍वारसँ नि‍कलि‍ समाजमे डेग उठबैए तँ ओ ई मानि‍ चलैए जे नमहर काजमे बेशि‍यो आ भारि‍यो, दुनू काज होइ छै अपना भरि‍ लोक परि‍यासे करैए, मुदा कि‍छु त्रुटि‍ रहि‍ जाइ छै, तखन कि‍ कएल जाएत। हँ एते जरूर जे अधि‍क-सँ-अधि‍क काजक सभ पहलूपर नजरि‍ राखक चाही। एहि‍ना कोनो घटनोक होइ छै। कि‍यो बेमार छथि‍ वा कोनो दोसरे कारण छन्‍हि‍, रंग-बि‍रंगक सुझाव लोक दैत अछि‍। नीको रहै छै अधलो रहै छै, तइठाम एहने समस्‍या उठबाक संभावना रहै छै।
स्‍वर्गीय काली बाबूक पहि‍ल बहाली डी.एस.पी.क रूपमे अगरतला (त्रि‍पुरा)मे भेल रहनि‍। चारि‍ सए रूपैया महीना दरमाहा। समैयो सस्‍त रहए। अन्‍त तक ई बात बजैत रहलाह जे सि‍गरेट आ दारू पीबैत छलौं। करीब पाँच बर्ख पीलौं। परि‍वारमे मतभेदक उभरि‍ गेल रहनि‍। उभरैक कारण स्‍पष्‍टे छल। एक साधारण थाना सि‍पाही दस बीघाक प्‍लॉट कीनि‍, तीनि‍ मंजि‍ला मकान बना, पाँच लाखक बेटि‍यो बि‍आह कऽ लइए तइ संग समांगो सभकेँ नोकरी लगा लइए तइठाम ई (काली बाबू) छुच्‍छे हाकि‍म छथि‍। मुदा ओ परि‍वारकेँ बुनि‍यादी ढंगसँ बदलए चाहै छला। अपन खनदानी वृत्ति‍केँ अधला वृत्ति‍ कहै छलाह। परि‍वार कर्जमे डुमल छल। दि‍यादीक झगड़ा कोर्टमे चलैत छलनि‍। ओइ वि‍वादकेँ जेना-तेना काली बाबू ि‍नपटौलनि‍। कर्जसँ परि‍वारकेँ मुक्‍त केलनि‍। पछाति‍ घर बनबैक वि‍चार केलनि‍। भट्ठा लगा बनौलनि‍। अपनासँ छोट भाए माझि‍ल भाएकेँ अगरतलेक हाइ-स्‍कूलमे काज धड़ौलनि‍।
सालमे एक बेर नि‍श्चि‍त रूपे अबि‍ते छलाह। मास दि‍न गाममे रहैत छलाह। तइ-बीच तीन-चारि‍ भेँट जगदीश प्रसाद मण्डलसँ भऽ जाइ छलनि। मुदा मात्र तीन-चारि‍ भेँटमे साल भरि‍क कि‍रि‍या-कलापक कि‍ हएत। हुनक अपन रूटि‍ंग छलनि‍। काजो-उदेम ठेकना कऽ अबैत छलाह। आठ दि‍न होइत-होइत काज नि‍बटबै छलाह। पछाति‍ कुटुमारे (सासुर-मात्रि‍क-बहि‍न इत्‍यादि‍) करै छलाह। मास दि‍न पुरैत-पुरैत काजो नि‍बटि‍ जाइ छलनि‍। आ छुट्टि‍यो बीत जाइ छलनि‍। काजक दौड़मे काजे गप-सप करैक मौको दैत छै। एकटा काजक भार अपनो ऊपर रखै छलाह आ समांगो सभकेँ लगबैत छलाह। सम्‍बन्‍ध बढ़लनि। एनाइ-गेनाइक संग खेनाइ-पीनाइ सेहो बढ़ि‍ गेलनि।
हाइ स्‍कूलमे फस्‍ट करैमे भूगोलक योगदान बेसी छलनि‍। एक दू नम्‍बर कम होइ छलनि‍। पूर्वाचलक ि‍त्रपुरा, मणीपुर, मि‍जोरम, अरूणाचल, नागोलैंड इत्‍यादि‍क नीक अध्‍ययन छलनि‍। ओना धार्मिक प्रवृत्ति‍ दि‍स बढ़लाह। पूजा-पाठ दि‍स बढ़ि‍ गेला। डी.एस.पी. सँ एस.पी. भेला पछाति‍ अपन बदली ट्रेंनि‍ग कओजेलमे करा लेलनि‍। ता एस.पी. ओहीमे रहलाह। तीन-चारि‍ साल पछाति‍ (अपेछा भेलापर) जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ त्रि‍पुरा अबैले कहए लगलाह। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ दोहरी ओझरी लागल रहनि। परि‍वारसँ लऽ कऽ मुकदमाक खर्च धरि‍क। ने कोट-कचहरी अबै-जाइसँ छुट्टी आ ने दोसर दि‍स जाइ-अबैक छुट्टी।
जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ १९९८ ई. धरि‍ अबैत-अबैत पूर्वांचल देखैक एते जि‍ज्ञासा बढ़ि‍ गेलन्हि जे अपनाकेँ ओ नै सम्‍हारि‍ पेलन्हि। ओना समैक पलखति‍ भेट गेलनि आ से भेटलनि दुर्गापूजाक जि‍म्‍मासँ अलग भेलापर। दोसर कारण ईहो भेलनि जे पचासो सँ ऊपर मुकदमा नि‍वटि‍ गेल छलनि जइसँ काेट-कचहरीक आवाजाही सेहो कमि‍ गेलनि। दूटा सेशन केश (३०७ आ ४३६ अर्थात् मृत्‍युक प्रयास आ अगि‍लग्‍गी।) मात्र बचि‍ गेल छलनि। तहूमे ४३६ (अगि‍लग्‍गी) केश हराइये गेलै। हरा ई गेलै जे झंझारपुर-मधुबनीक बीच जे कोर्टक बदला-बदली भेलै ओइमे ई केस हरा गेलै। ओना कते गोटे मुँहेँ सुनने रहथि जे कोटसँ केशक फाइलो गाइब होइ छै। आ ईहो सुनने रहथि जे केशो हरा जाइ छै। ओना दुवि‍धा रहबे करन्हि। जइसँ खुशि‍यो होइन्हि आ चि‍न्‍तो। दोसर ३०७ (एटेम्‍प टू मर्डर) रहन्हि ओइमे तँ सजा भऽ गेल रहनि मुदा खुशी ई रहन्हि जे जते सजाए कानूनी दौड़मे हेबाक चाही रहै से नै भेल रहै, तँए मजगूतो डोरी भत्ता तोड़ि‍-तोड़ि टूटि‍ जाइ छै, लाभ-हानि‍ मुकदमासँ (३०७सँ) जे भेल होइन्हि मुदा एकटा अनुभव जरूर भेलन्हि जे भ्रष्‍ट न्‍यायालयक कुरसी केना डोलैत रहै छै। ओना कोट-कचहरीसँ नि‍सचि‍नती जकाँ जरूर भेला। मुदा चि‍न्‍ता तँ रहबे करन्हि। हजार देवी-देवतासँ जहि‍ना एक जगदम्‍बा तगतगर, तहि‍ना दुनू केश रहन्हि। एक दि‍न जखन सभ केशकेँ मन पाड़ि‍ आइ.पी.सी.सँ मि‍लेलन्हि तँ बूझि‍ पड़लन्हि जे जँ शुरूहे सँ सजाए होइत अबैत रहितन्हि तँ भरि‍सक सभ दि‍न जहलेमे अगि‍ला केशक फैसला सुनि‍तथि। मुदा केहेनो फड़ल आमक गाछ कि‍अए ने हुअए मुदा पकलापर बा बि‍हाड़ि‍मे हहरि‍ एक्की-दुक्की गि‍नतीमे चलि‍ अबैए तहि‍ना भेल रहन्हि। भीम जखन अभि‍मन्‍युकेँ सातक फाटक तोड़ैक भार लऽ लेलनि‍ तेहने मनमे उठलनि। फेर ठमकल सभ केशक सजाए जोड़लन्हि तँ १०७ बर्ख पुरैत रहन्हि। जि‍नगी दि‍स तकलनि तँ बूझि‍ पड़लन्हि जे सए बर्खक काज तँ पुरि‍ये गेलन्हि। जँ नै केने रहि‍तथि तँ दोखी केना भेला? साउनक साँप जकाँ केचुआ छोड़ैक मौसम देखि‍ जि‍नगी बदलैक वि‍चार केलनि। पैछला जि‍नगी तँ अगि‍ला जि‍नगीक सोंगर बनि‍ गेल छलनि। साहि‍त्‍य-दि‍शामे बढ़ैक वि‍चार उठलनि। मुदा साहि‍त्‍यक वि‍द्यार्थी तँ रहि‍ चुकल छला, सूर-पता तँ बूि‍झ चुकल छला। टेबि‍या-टेबि‍या कि‍छु साहि‍त्‍यकारक साहि‍त्‍य पढ़ए लगला, मुदा मन फेर ठमकि‍ गेलनि। मन ठमकि‍ गेलनि ई जे कि‍ताब बात जँ आँखि‍क देखल हुअए ओ बेसी नीक होइए। कि‍ताब कि‍नैक खर्चक कटौती कऽ घूमैक वि‍चार केलनि। देशक केरल, कर्नाटक, कश्‍मीर छोड़ि‍ सभ राज्‍य देखलनि।  मुदा जून २०१२ ई.मे केरलक धरतीपर कोच्चिमे जखन गामक जिनकी लघुकथा संग्रह लेल टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कार प्राप्‍त भेलनि तँ केरल सेहो घुमि लेलनि। १९५७ ई.मे केरलमे वामपंथी सरकार बनल छल। देशक ओ राज्‍य जइठाम शत-प्रति‍शत पढ़ल-लि‍खल छथि‍। खुशी भेलनि।
अखन धरि‍ भूगोल एतबे बुझै छला जे देशक पूर्वी भाग असाम छी। आन-आन राज्‍य जे बनल ओ पछाति‍यो बनल आ चर्चो संक्षेपे छल। हायर सेकेण्‍ड्री धरि‍ भूगोल पढ़ने छला। पछाति‍ नहि‍ये पढ़लनि। तहूमे कि‍छु घटबि‍ये भऽ गेलनि, घटवि‍यो स्‍वाभावि‍के भेलनि। स्‍वाभावि‍क ई जे जहि‍ना एम.ए. पास, हाइ स्‍कूलक शि‍क्षक बनि‍, हाइ स्‍कूल पास मि‍ड्ल स्‍कूल भेलोपर बरदास कइये लइ छथि‍ तहि‍ना ईहो केलनि।
आसीन मास, दुर्गापूजाक समए। जगदीश प्रसाद मण्डल एटलस नि‍कालि‍ अजमबए लगला। घरसँ बि‍राटनगर पहुँचि जेता, बि‍राट नगरसँ सि‍लीगुड़ी। ओतौ रहैक ठौर छन्हि, ओतए सँ असाम आ गौहाटीसँ त्रि‍पुरा। मुदा दुनूमे बहुत अंतर भेल। गौहाटीसँ अगरतलाक बस चारि‍ बजे अपराहनमे जे खुजलनि ओ दोसर दि‍न डेढ़ बजे अगरतला पहुँचल। जहि‍ना भेड़ी जेरमे हूड़ार चलि‍ अबैए तहि‍ना बससँ उतरलापर बूझि‍ पड़लनि। भाषाक दूरी, जहि‍ना हि‍न्‍दी जननि‍हार तहि‍ना अंग्रेजी। बस धरि‍ तँ हि‍न्‍दीसँ काज चलि‍ चुकल छलनि, बससँ उतरि‍ते, भुखाएल रहबे करथि, पहि‍ने हाेटलमे जा खेलनि। मुदा एकटा स्‍पष्‍ट अंतर ई बूझि‍ पड़लनि जे जे सस्‍त खेनाइ सि‍लीगुड़ीमे भेटलनि ओ आगू कतौ ने भेटलनि। कनीटा उदाहरण- बरपेटा असाम राति‍क एक बजे बस एकटा होटलक आगूमे लागि‍ गेल, अकड़ल यात्री सभ उतरि‍ होटल पहुँचल। हॉल जकाँ होटल जइमे तीन बसक यात्रीक बेवस्‍था। चारि‍ रोटी-तरकारीक दाम बीस रूपैया लेलकनि। मुदा देखलनि जे एक प्‍लेट माछ वा मांसबला रहै तँ ओकरा सभसँ एक-एक सए रूपैया लेलकै जे सि‍लीगुड़ीमे दू रूपैया पचास पाइमे खुअबैत रहै। होटलसँ नि‍कलि‍ थानापर गेला। कि‍यो हि‍न्‍दी बुझनि‍हार नै। काली बाबूक नाआें कहि‍ते एकटा सि‍पाही डेरापर पहुँचा देलकनि।


जारी...
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
वि‍हनि‍ कथा-
 
छूटि‍ गेल

तृतीयाक साँझ भगवती स्‍थान दऽ सावि‍त्री बाबा लग आबि‍ फुदकैत बाजल-
बाबा, एकटा बात बुझलौं हेँ?”
मद भरल पोतीक बात सुनि‍ आगू सुनैक आशामे आस काशीनाथ ओइ संगीत प्रेमी जकाँ जे एकक पछाति‍ दोसरो सुनए चाहैत, मुँह बाबि‍ पोती दि‍स देखए लगलाह। मुँह रोकि‍ सावि‍त्री महराइक ओइ पलगाँ जकाँ प्रति‍क्षा करए लगली। काशीनाथक मन फड़फड़ेलनि‍ जे भरि‍सक चुप्‍पा-चुप, धुप्‍पा-धुप खेल ने भऽ गेल। हमरा उठलेसँ काज तँ हमरा बैसलेसँ काज।
सावि‍त्रीकेँ काशीनाथ पुछलखि‍न-
की सुनलौं?”
अबै छलौं ते अहाँ दे लोक सभ बजै छलाह जे ओ आब ककरो नै गरि‍अबै छथि‍न!”
गाइरि‍क नाओं सुनि‍ सावि‍त्रीकेँ अनुकूल बनबैत काशीनाथ बजलाह-
बुच्‍ची, कते के गरि‍आएब। अपने मुँह दुखा जाइए। छोड़ि‍ देलि‍ऐ तँए छूटि‍ गेल।

अकास दीप

दि‍वालीक एक दि‍न पहि‍ने गाममे रंग-बि‍रंगक अकासदीपक खूँटा गड़ल देखि‍ मनोहरोक मनमे उठल जे अपनो ऐठाम जराबी मुदा लगले मन घेड़ा गेलै जे पावनि‍-ति‍हार तँ परम्‍पराक हि‍साबे चलैत अछि‍, जँ से नै तँ एके समाज माने (एक जाति‍क) एकेटा पावनि‍ कि‍छु गोटेकेँ होइत छन्‍हि‍, कि‍छु गोटेकेँ नहि‍यो होइत छन्‍हि‍। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍ जे जाति‍ दि‍यादमे बँटल अछि‍। जँ ि‍दयादीक भीतर पावनि‍क दि‍न अशौच भऽ जाइत तखन टूटि‍ जाइत। कि‍छु गोटे खंडि‍त बूझि‍ जोड़ि‍ लैत छथि‍, कि‍छु गोटे छोड़ि‍ दैत छथि‍। तइ संग ईहो होइत रहै छै जे बहरवैया आमदनीपर जि‍नका नहि‍यो होइत छलनि‍ ओहो नव शि‍रासँ शुरूहो करैत छथि‍। ओझराइत मनोहर बाबासँ पुछैक वि‍चार केलक।
     मनोहर हाइ स्‍कूलमे पढ़ैत अछि‍। घरक कोनो काज करैसँ पहि‍ने बाबासँ पूछब जरूरी बुझलक।
     सात बजे साँझ। चाह पीब पान खाइते श्‍यामलाल गप करैक मूडमे एला। केकरो नै देखि‍ चौक दि‍स जाइक वि‍चार करि‍ते रहथि‍ आकि‍ मनोहर आबि‍ बाजल-
बाबा, एकटा वि‍चार मनमे भेल?”
श्‍यामलाल- की?”
ऐबेर अपना गाममे सइयोसँ बेशी अकास दीप दि‍वाली दि‍न बड़त!”
ई तँ नीक बात भेल।
श्‍यामलालकेँ अनुकूल होइत देखि‍ मनोहर बाजल-
बाबा, अपनो दरबज्‍जापर...?”
काँच कड़ची वा पघि‍लल काचकेँ जेहेन साँचामे देल जाइत तेहने ने वस्‍तुओ बनैत अछि‍। मनोहर बच्‍चा अछि‍ हलहोड़ि‍मे मन उड़ि‍ गेलै। श्‍यामलाल कहलखि‍न-
बौआ, जइ गाममे मटि‍या तेल, जेकर उपयोग गाममे खाली डि‍बि‍ये टामे होइ छै, तहूक हाहाकार मचल रहै छै। तइठाम तू भरि‍ राति‍ मासो दि‍न डि‍बि‍या बाड़वह से केहेन हएत?”


 
कनमन

साढ़े चारि‍ बजैत। हाइ स्‍कूलसँ अबि‍ते सुधीरक नजरि‍ दरबज्‍जापर बैसल बाबा श्‍याम सुन्‍दरपर पड़लनि‍। दरबज्‍जा-अंगनाक बीच मोड़पर सुधीर तेकठी जकाँ ठाढ़ भेल। केम्‍हर डेग बढ़ौत से फड़ि‍छेबे ने करैत। बाबाकेँ पुछि‍यनि‍ जे कि‍अए मन खसल अछि‍, आकि‍ कि‍ताब रखि‍ कपड़ा बदलि‍ आबी। रस्‍तेसँ भूखो-पि‍यास लगले अछि‍। नबे बजेक खेलहा छी।
     तेकठीक तीनू खूँटाक बीच अपनाकेँ सुधीर पौलक जे दूटाक कनोत तेकठी नाओं धड़बैत अछि‍ जखन कि‍ तेसरक नाआें गोरी भऽ जाइ छै, जेकरा ऊपर लाद लादि‍ लदाना दइ दइ छै। बाबाक बात बूझब सभसँ जरूरी अछि‍, मुदा बरदाएल हाथे कइये कि‍ सकबनि‍। कपड़ा बदलब ओते महत नै रखैत अछि‍ तँए एना करी जे बाबाकेँ कहि‍यनि‍ जे हमहूँ आबि‍ गेलौं जइसँ जाबे ओ अपन बात बजता ताबे कि‍ताव राखि‍ आएब। कनी डेगमे झाड़ अानए पड़त। सहए केलक। बाजल-
बाबा, कि‍अए मन खसल अछि‍?”
कहि‍ कि‍ताव राखए आंगन गेल। कि‍ताव राखि‍ श्‍याम सुन्‍दर लग आबि‍ सुधीर बाजल-
बाबा, मन खसैत कारण कि‍ अछि‍?”
     आस-नि‍आसक बीच श्‍याम सुन्‍दर ओझड़ाएल रहथि‍, तँए नजरि‍ खसल छलनि‍। पोताक जबाव भारी पबैत छलाह। चालीस बर्खक संगी हेरा-फेरीमे जहल चलि‍ गेल छलनि‍, तेकरे सोग। मुदा बाल-बोध लग बाजी वा नै बाजी। छि‍पाएब झूठ हएत नै छि‍पाएब सेाहे तँ नीक नहि‍ये हएत। नीकक चर्च हेबाक चाही, अधलाक तँ फलो अधले हएत। एहनो तँ भऽ सकैए जे छि‍पबैत-छि‍पबैत छि‍नारक छि‍नरपनि‍ये छीप जाए। मुदा एहनो तँ भऽ सकैए जे एक-दोसराक अधला छि‍पबैत-छि‍पबैत छि‍पारकेक समाज बनि‍ जाए। तत्-मत् करैत श्‍याम सुन्‍दर बाजल-
बौआ, अखने सुनलौं जे रूपलाल जहल चलि‍ गेल। मि‍रचाइक झाँझ जकाँ ओहए मनकेँ मलीन केने अछि‍।
     श्‍याम सुन्‍दर जे कहि‍ अपनाकेँ हटबए चाहै से लगले नै हटलनि‍। कारण भेलनि‍ जे जहलक नाओं सुनि‍ सुधीर दोहरा देलकनि‍-
कि‍अए रूपलाल बाबा जहल गेला?”
सुधीरक प्रश्न श्‍याम सुन्‍दरकेँ ज्‍वर आनि‍ देलकनि‍ मुदा ज्‍वार नै बनि‍ तुड़छैत ज्‍वारि‍ तँ आबि‍ये गेल रहनि‍। बुझबैत बजलाह-
एते पुरान रहि‍तो रूपाला समैकेँ ठेकानबे ने केलक। पुरना चालि‍सँ आब काज चलैबला छै! बुझथुन जे केहेन दादासँ पल्‍ला पड़ल।


 
खि‍लतोड़

आकाशवाणी केन्‍द्रक कार्यक्रमक कृषि‍ वि‍भागसँ दयाकान्‍त तीस बर्ख पछाति‍ सेवा-नि‍वृति‍ भेला। खेली-पथारीक कार्यक्रमक चि‍न्‍हार चेहरा बनौने रहला। नोकरी पाबि‍ जि‍नगीमे बहुत कि‍छु केलनि‍। तीनू बेटो आ दुनू बेटि‍योकेँ पढ़ा-ि‍लखा, नोकरी धड़ा नेने छथि‍। अपनो रहैक बेवस्‍था शहरेमे कऽ लेलनि‍। सेवा-नि‍वृत्ति‍क चारि‍ बर्ख पछाति‍ मन उवि‍एलनि‍ जे शहरमे नै रहब, बाप-दादाक बनाओल बामेमे रहब। मन उवि‍आइक कारण भेलनि‍ जे पुरना संगी सभमे कि‍छु गोटे आन शहर, तँ कि‍छु गोटे गाम आ कि‍छु गोटे मरि‍यो गेलाह। पछाति‍ जे संगी भेटलनि‍, हुनका सभसँ तेहेन सम्‍बन्‍ध नै बनि‍ सकलनि‍ जेहेन पहि‍लुका सबहक संग छलनि‍। दूर रहने परि‍वारोक (बेटा-बेटीक) सम्‍बन्‍ध पतराये गेल रहनि‍। पत्नि‍यो संगी नै बनि‍ सभ दि‍न भनसि‍ये रहि‍ गेलनि‍।
     खंडहर जकाँ घर-घराड़ी। गाम अबि‍ते पहि‍ने घर-अंगना, बीस बर्खसँ परता पड़ल चापाकल उड़ाहलनि‍। दरबज्‍जापर अबैत-अबैत मास दि‍न लगि‍ गेलनि‍। दरबज्‍जापर अबि‍ते देखलनि‍ जे अगि‍ला बाड़ी परती पड़ल अछि‍। जँ एकरा चौमास बना लेब तँ सालो भरि‍ परि‍वारक तीमन-तरकारी तँ चलबे करत जे कि‍छु बाँटि‍यो-खोंटि‍ लेब।
सहए केलनि‍। कहि‍या कतए सँ परता पड़ल खेतकेँ गहींरसँ ताम करबा दयाकान्‍त चौमास बनौलनि‍। अल्‍लूक खेतीक केलनि‍। अखन धरि‍ जे अल्‍लूक खेतीक सम्‍बन्‍धमे बुझै छलाह तही हि‍साबसँ तैयारो केलनि‍ आ खाद-कीटनाशक दऽ रोपबो केलनि‍।
     बीस दि‍न रोपला पछाति‍ खेतमे चारि‍ आना गाछ देखलनि‍। मुदा घबड़ला नै, सबूर केलनि‍ जे अखन जनमइयोक समए छै। तीस दि‍न पछाति‍ जखन ओहो चौअन्नी गाछमे सँ आधासँ बेसी जरि‍ये गेलनि‍ तखन माथ ठमकलनि‍। मुदा पुछबो कि‍नकासँ कएल जाए। तहूमे जि‍नगी भरि‍ अपने दोसरकेँ बुझेलौं। ओना ओझरी मनमे लगए लगलनि‍ मुदा चेत गेलाह। जे खेतीक मर्म बुझैत होथि‍ ति‍नकासँ बूझब नीके छी। बूझब, गहराइसँ बूझब आ मर्म बूझब भि‍न्न होइत अछि‍।
     ठेहि‍आएल दयाकान्‍त दीनानाथ ओइठाम पहुँचलाह। दयाकान्‍तकेँ देखि‍ते दीनानाथ बजला-
आऊ-आऊ, लाल भाय।
रेडि‍यो स्‍टेशनमे लाल भाइक नाओंसँ दयाकान्‍त छला तँए लाले भाइक नाओंसँ जनैत छन्‍हि‍।
चाह पीब दयाकान्‍त बजला-
दीना भाय, अल्‍लू रोपलौं से गाछे ने भेल?”
जहि‍ना सौरखीक पात देखि‍ डाँट पकड़ि‍ सौरखी उखाड़ल जाइत तहि‍ना दीनानाथ पकड़ि‍ पुछलखि‍न-
अल्‍लू खुनि‍ कऽ देखलि‍ऐ जे सड़ि‍ गेल आकि‍ जीवि‍ते अछि‍?”
हँ, सभ सड़ि‍ गेल।
खेतमे हाल केहेन अछि‍?”
से तँ बढ़ि‍या अछि‍। ओते नै अछि‍ जे अल्‍लू सड़ि‍ जाएत।
तखन?”
सएह नै बुझै छी।
बीआ काटि‍ कऽ रोपने छलौं कि‍ सौंसे?”
गोटगरहा सौंस रोपने छलौं। तइ संग खादो आ कीटनाशको भरपूर देने छलौं।
खादक मात्रा सुनि‍ दीनानाथ बजला-
देखि‍यौ कहि‍या कतए सँ जमीन पड़ता छल खि‍लतोड़ भेल। ओकरा अपनेमे ओते शक्‍ति‍ छै जे सुभर उपजा दऽ सकैए। तइमे तते खाद दऽ देलि‍ऐ जे बीये जरि‍ गेल।


 
मुँह-कान

काल्हि‍ये बैंकक मैनेजर आबि‍ सुनरलालक गाएकेँ सेहो देखि‍ गेल छलाह। एक्कैस हजारक गाए। गामक कि‍सानक बीच एकछाहा चर्च। कि‍यो सि‍लेब रंगक चर्च करैत तँ कियो सि‍ंह-सि‍ंगहौटीक। कि‍यो थुथुनक चर्च करैत तँ कि‍यो गरदनि‍क अगि‍लाक।
     जइठाम मनुष्‍योकेँ उचि‍त अन्न नै भेट रहल अछि‍ तइठाम मवेशी पालन धीया-पुताक खेल छि‍ऐ। कते दूधक जरूरत अछि‍, तइले कते मवेशीक जरूरत पड़त मूल प्रश्न भेल।
एक तँ एक्कैसक हजारक गाममे आएल अछि‍। अखन धरि‍ जे नै आएल छल। बैंकक लाभ जरूर भेल। मनधनो काका गाए देखए सुनरलालक ओइठाम एला।
     गाइक रंग-रूप देखि‍ मनधन काका चैन होइत तमाकू खाइले बैसलाह। खुशीसँ खुशि‍आएल भेल सुनरलाल बाजल-
काका, बहूदि‍नसँ हीक गड़ल छल जे एकटा नीक गाए खुँटापर बान्‍हब, से भगवान पूर केलनि‍।
भवधारमे बहैत सुनरलालकेँ देखि‍ मनधन काका कहलखि‍न-
बड़ सुनर गाय छह। मलकार की सभ कहलकह?”
काजक जड़ि‍ दि‍स बढ़ैत सुनरलाल बाजल-
चारि‍ मास पछाति‍ एक संझू भऽ जाएत आ छह मास लागत।
कते दूध होइ छह?”
दू कि‍लो भि‍नसर आ डेढ़ कि‍लो साँझमे।
दूधक नाओं सुनि‍ मनधन काका चौंक गेला जे बाप रे कतए सँ बैंकक कर्ज चुकाओत, कतए सँ गाइक खर्च जुटाओत आ कतए सँ अपने गुजल करत। बात आगू नै बढ़ा मनधन काका सुनरलालकेँ चरि‍अबैत कहलखि‍न-
छब दे तमाकुल खुआबह। एकटा काज मन पड़ि‍ गेल।
एना अगुताइ कि‍अए छह?”
मुदा मनधन काकाकेँ कोनो जबाब नै फुड़लनि‍। मनमे नचैत रहनि‍ युग तँ आर्थिक मोड़ लऽ रहल अछि‍। मुदा घि‍ड़नीक चालि‍ कि‍महर छै वस्‍तुक गुण दि‍स आकि‍ सुआद दि‍स?


 
बुधनी दादी

जहि‍ना कुमहारकेँ भादवक रौद बादलमे झपा गेने दुर्दिन आगूमे नाचए लगैत तहि‍ना बुधनी दादीकेँ साल भरि‍सँ भऽ रहल छन्‍हि‍। साल भरि‍ पहि‍ने तक, जाबे पति‍ जीवैत छलनि‍ ताबे दि‍ल्‍लीक कमाइसँ जे सुख केलनि‍, रहि‍तो आब नै भऽ पाबि‍ रहल छन्‍हि‍। सोलह कोठरीक हथि‍सार जकाँ मकानमे असकरे रहैत डर होइ छन्‍हि‍ जे कहीं सुतली राति‍मे भूमकम भेल आ घर खसल तँ महीनो दि‍नमे ऊपर हएब ि‍क नै। तरेमे सड़ि‍ कऽ महकि‍ जाएब।
     जहि‍यासँ बुधनी दादी नैहरसँ सासुर एली तहि‍येसँ कहू आकि‍ नैहरोमे तइसँ पहि‍नेसँ कहू, नहेला पछाति‍ हनुमान चलीसा पढ़ि‍ते छथि‍। कि‍ताब देखि‍ कऽ नै मुँह जुआनि‍ये। गामक तीन टोलक आबा-जाही बुधनी दादीक छन्‍हि‍। कोन-पावनि‍ कहि‍या हएत आ कोन उपास कहि‍या पड़त से हिसाव जोड़ए अबै छन्‍हि‍। तइ संग ईहो छन्‍हि‍ जे सामाक गीत टोलक कोन बात जे गामेमे सभसँ बेसी अबै छन्‍हि‍।
छठि‍क भि‍नसुरका अर्ध पड़ि‍ गेल आइसँ सामाक गीत हएत। दसमी श्रेणीक राधा बुधनी दादी लग पहुँचल। पहुँचि‍ते राधा बुधनी दादीकेँ गोड़ लागि‍ बाजल‍-
दादी, अपन मोबाइल नंबर दऽ दि‍अ। जखन अबैक छुट्टी हएत एबो करब नै तँ मोबाइलेपर लि‍खि‍ देब।
मोबाइलि‍क नाओं सुनि‍ते बुधनी दादीक मन गाछसँ खसल कटहर जकाँ आँठी उड़ि‍ कतौ, नेरहा उड़ि‍ कतौ, छहोछि‍त भऽ गेलनि‍। बजलीह-
बुच्‍ची, आब तोरा सबहक जुग-जमाना एलह। बेटा मोबाइल पठा देलक जइसँ कहि‍यो काल धीयो-पुतो आ बेटो-पुतेाहुसँ गप-सप होइ छलए। सेहो केदैन चोरा लेलक। मरि‍ दि‍न अंगनेमे बैसल रहब से पार लागत। मूस तते भऽ गेल अछि‍ जे ने नुआ-वि‍स्‍तक सेखी रहए दइए आ ने खाइ-पीबैक।
राधा- दादी, एहि‍ना जि‍नगी चलै छै।
बुधनी दादी- बुच्‍ची, जीवैक मन होइए मुदा तेहेन-तेहेन आपैत-वि‍पैत सभ अछि‍ जे हाेइए तइसँ नीक भरमे-सरमे मरि‍ जाइ।


 
अनदि‍ना

शि‍क्षक अमरनाथकेँ देखि‍ते रामकि‍सुन बाजल-
मास्‍सैव, अनदि‍ना गाममे देखै छी?”
रामकि‍सुनक प्रश्नसँ अमरनाथ अचंभि‍त भऽ गेला जे एहेन बात कि‍अए पुछलनि‍। मुदा बाजबो तँ उचि‍त नहि‍ये हएत। रंग-बि‍रंगक जहि‍ना शि‍क्षक छथि‍ तहि‍ना वि‍द्यार्थियो‍ अछि‍। जेहने चलबैबला अछि‍ तेहने चलौनि‍हारो अछि‍। कि‍ हमरा कहने झूठ भऽ जेतै जे शि‍क्षक सभ दरमहे टा उठबए वि‍द्यालय जाइ छथि‍, तँए कि‍ ईहो झूठ भऽ जाएत जे सरकारी दहि‍न गबैया जकाँ महि‍ने-महि‍ने दरमाहा देब छोड़ि‍ सालक-सालेक पाहि‍ लगबै छै। अमरनाथक मन ठमकलनि‍। अनदि‍ना गाममे देखै छी, अहाँ गामसँ हटि‍ नोकरी करै छी, बि‍नु छुट्टीक दि‍न गाममे छी कि‍ समाजक एतबे दायि‍त्‍व बनै छै जे फल्‍लाँ भाइक सातो बेटा गुरुजी बनि‍ गेलखि‍न। अधभर मुस्‍की दैत अमरनाथ कहलखि‍न-
भाय, की कहै छी, जुगेमे भूर भऽ गेलै। अमैया छुट्टीमे गाम एलौं हेन आ ऐठाम देखै छी जे फैजली सभ कोशेबो ने कएल हेन।
दि‍न ठेकनबैत रामकि‍सुन बाजल-
कते दि‍नक छुट्टी अछि‍ जे एना हदि‍या गेलौं।
आब कि‍ ओ जुग-जमाना रहल जे रोहनि‍यासँ फैजली तक खाइक छुट्टी होइ छै। आधासँ बेसी छुट्टी कटि‍यो गेल अछि‍। जब हमर स्‍कूल खुजल तेकर पछाति‍ आन-आन स्‍कूलमे छुट्टी हेतै।
रामकि‍सुन- ई तँ अजगुते भेल?”
दहि‍ना हाथसँ चानि‍ ठोकि‍ अमरनाथ बाजल-
अहाँ अजगुत कहै छि‍ऐ। एतबे अछि‍। पहि‍ने सरकारि‍यो ऑफि‍समे आ आनो-आनो ठाम कि‍रानी होइ छलै अखनो अछि‍। तहि‍ना स्‍कूलमे शि‍क्षक होइ छला अखनो छथि‍। मुदा आबक शि‍क्षक सालो भरि‍क नै छह मसि‍या बनि‍ गेलाह। छह मास धि‍या-पुताकेँ पढ़ाउ आ छह मास ऑफि‍सक काज कररू। जहि‍ना नाचमे लेबरा सभ नै लेबराइ करैए तहि‍ना ने हमहूँ सभ कखनो माल्‍थस रॉवि‍नसन करै छी तँ कखनो आबि‍ घरे-घर बकरी-छागरक गि‍नती करै छी।
अमरनाथक बात सुनि‍ रामकि‍सुन ओल जकाँ कबकवेला नै, मुस्‍की दैत बजलाह- होउ, अहीं सबहक जुग-जमाना छी, जे काटब से काटि‍ लि‍अ।
     रामकि‍सुनक काटब सुनि‍ अमरनाथ अह्लादि‍त होइत बजलाह-
ठीके ने अहाँ कहै छी। अपना सभकेँ जे सभसँ छोटका दि‍न होइए, ओइमे कथीक छुट्टी होइए से बूझल अछि‍?”
नै।
बड़ा दि‍नक!”


 
अपन काज

तेजीसँ समए अगुएने, वि‍कास भेन महगि‍योक वृद्धि‍ धकधका गेल। तहूमे तीमन-तरकारीक तेजी भेने, बाड़ी-झाड़ीसँ टपि‍ खेत-पथार दि‍स बढ़ल। जइ चौमासमे अंडी-बगहंडीसँ लऽ कऽ भाँग-धथुरक बि‍रदावन रहैत आएल छल ओ कटि‍-खोंटि‍ चौमासो दि‍स घुसकुनि‍याँ कटलक।
अखन धरि‍ कपलेसर परि‍वार धरि‍क तरकारी उपजबैत छल सेहो कोनचरमे सजमनि‍क गाछ, आ गौसारपर अल्‍लू-कोवी, मि‍रचाइ, भट्टा उपजबैत छल ओ चारि‍ कट्ठा कोवी खेती करत। ओना पाँच बीघा जोतक कि‍सान कपलेसर, मुदा खेतमे खादक हि‍साब धाने-गहुमक बुझैत अछि‍।
     मि‍रचाइ बाड़ीकेँ कड़चीसँ भोला बति‍अबैत रहथि‍ आकि‍ कपलेसर अबि‍ते पुछलकनि‍-
भैया, चारि‍ कट्ठा कोवी खेती करब, तइमे कते खाद लगतै?”
कपलेसरक प्रश्न सुनि‍ भोला तारतममे पड़ि‍ गेला। रंग-बि‍रंगक प्रश्न मनमे उठलनि‍। जइ खेतमे पहि‍ल बेर खेती हएत आ जइ खेतमे साले-साल होइ दै, उपजैक दृष्‍टि‍सँ दुनू एक केना भेल। कोवीक पछि‍ला फसि‍ल कि‍ छलै, सि‍रो तँ रंग-रंगक होइ छै। कोनो छह आंगुर ऊपरे धरि‍क तँ कोनो बीत भरि‍क, कोनो तोहूसँ गहींरक। जँ खेत खसले अछि‍ तँ कते दि‍नसँ खसल अछि‍ तही हि‍साबसँ ने रसेबो करत। तहूमे पृथ्‍वीक रस तँ आरो एकभग्गु छै। भोलाक मनमे लगले उठलनि‍ जे जखन बेचारा पूछए आएल सेहो ओहि‍ना नै देखबो करैए। तखन कि‍छु नै कहि‍ऐ से केहेन हएत। कि‍छु कहैले ठोर चटपटेलनि‍ मुदा मनमे उठि‍ गेलनि‍ जे कोन खादक नाओं कहबै। ओहोमे तँ करामति‍ये अछि‍। एक्के खादमे कथूक मात्रा बेसी रहै छै तँ कथूक कम। मन अकछए लगलनि‍। जे अनेरे अपनो काज बरदा मगजमारी कऽ रहल छी। मुदा धाँइ दऽ कि‍छु कहि‍यो देब केहेन हएत। मन घुमलनि‍ अपन जबाब अपने उठलनि‍ जे काज बरदाइए आ कि‍ दोसर काज ठाढ़ करैए। असथि‍र मन होइते पोखरि‍क पानि‍मे जहि‍ना हवा पाबि‍ हि‍लकोर लगैए तहि‍ना हि‍लकोर उठलनि‍। प्रकृति‍क हि‍सावसँ मौसम बनै-बदलैत अछि‍। फसि‍लक अपन गति‍ छै। तइठाम क्षेत्र-क्षेत्रक मि‍लान नै हएत तँ उपजाक कते भरोस कएल जाएत। दुनि‍याँ घर अंगना बनि‍ गेल अछि‍ दुरसक बात बेसी बूझै छी आ घरक बात बुझि‍ते ने छी। गहुमेक बाउगक समए इलाका-इलाकामे अलग-अलग ति‍थि‍सँ होइत अछि‍, तेकरा केना बूझब। अपन बात सहजे शीतगृहमे रखि‍ देने छी नइ तँ जयंती बाबड़ीमे थोड़े वनहाएत। मन थीर होइते भोला बाजल-
कपले, पढ़ल-लि‍खल जेहेन छी से तहूँ जनि‍ते छह, आब तोरो उमेर कम नहि‍ये भेलह। खेती करै छी पुछलह तँ कहै छि‍अह। चारि‍ कि‍लो डी.ए.पी. तीन कि‍लो पोटाश, कीटनाशक संग खेतमे मि‍ला दि‍हक। नवका किश्‍मक बीआ छेबे करह सवा-हाथ, डेढ़-हाथपर रोपि‍हह।


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