मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास न्याय दर्शन आ समकालीन अपराध-गाथा
मैथिली कादम्बरी
गोहि सभक बीच जलसमाधि
गजेन्द्र ठाकुर समर्पण
ओइ अनाम लोक सभकेँ, जिनकर नाम शिलापर नहि लिखायल, मुदा जिनकर स्वर पानि, पात आ कागचमे अखनो बहैत अछि।
ओइ सूचनादाता सभकेँ, जिनकर चेहरा कतहु दर्ज नहि, मुदा जिनकर सत्य पाथरो काटि बहराइत अछि।
जिनकर परिवार डेरायल रहल, जिनकर नोकरी आ जान दुनू गेल, जिनकर घर सुड्डाह भऽ गेल- तैयो जे बजला। तिनका सभकेँ समर्पित।
“सत्य एकटा बीज थीक- चाहे कतेको मोट पाथरक नीचाँ दबि जाय एक दिन फुटिते अछि।”- ऐ कादम्बरीक पात्रक डायरीसँ।
"जे सत्य देखैत अछि आ चुप रहैत अछि, ओकर मृत्यु दुइ बेर होइत अछि- एक बेर देहक, एक बेर आत्माक।"- गढ़ नारिकेलक एकटा पुरान कहबी। "जे गाम अपन इतिहास बिसरि जाइत अछि, ओतुक्का नारिकेल गाछ फल देब बन्द कऽ दैत अछि।"- गढ़ नारिकेलक एकटा आर पुरान कहबी। नारिकेल गाछक बजनाइ, मृतक दर्शन, छाहक अनुपस्थिति- ई मिथिलाक लोक-चेतनाक काव्यात्मक रूपक थीक।
जलसमाधि.. गोंहि.. बिज्जी.. गहुमन..
भूत होइए कारी, प्रेत उज्जर, राकश- लहाशक खोरनाठी जे गलतीसँ नै जड़ल, बच्चाकेँ गाड़ल जाइए आ ओ बनि जाइए लोथ। चन्ना गाछी। भूत आ प्रेतक बीच कबड्डी, राकश करैए इजोर आ लोथ अछि दर्शक।
पीपरक गाछपर ब्रह्मा।
पोखड़िमे पनिडुब्बी, बड़का केशबाली, अथाह पानिमे पएरमे ओझड़ा जाइए ओकर झोंटा, आ काहि काटि कऽ मरि जाइए लोक।
भूत, प्रेत, राकश, लोथ मृत्युक बाद, अकालमृत्युक बाद कहू। तहिना पीपरक गाछक ब्रह्मा, आ पानिमे पनिडुब्बीक झोंटामे ओझरायल लोकक आत्मा।
गढ़ नारिकेलमे बहुत रास अकाल मृत्यु भेल छै।
भूत प्रेतकेँ पएर रोपल नै होइ छै पृथ्वीपर। पएर पाछू मुँहे होइ छै? सभटा झूठ। एन-मेन लोके सन होइ छै, खाली लागत जे उपरे-ऊपर चलि रहल छै। बूझि गेलौं- मून वाक सन। नै मून वाक तँ लागत जेना ससरिकेँ चलि रहल अछि, साँप जकाँ, ई तँ चलबो करैए एन-मेन लोक सन, खाली कने जमीनकेँ छोड़ैत ऊपर।
हक्कल डाइन सभ सेहो, गाछपर चढ़ि छौंकी लऽ सवारी करैए, लऽ कऽ उड़ि जाइए। भोरमे ओत्तै छोड़ि चलि जाइए। ओकरा सभ लग बहुत रास आत्मा रहै छै। ओकरासँ खूब काज टहल करबैए, मुदा सुनै छिऐ जखन उमेर बढ़ै छै आ पाबर कम होइ छै तखन ओकरा सभकेँ खोराशि नै दऽ पाबैए तखन ओकरे खखोड़ि-खखोड़ि खाय लागै छै ई आत्मा सभ।
देखि रहल छी चारू कात पानि।
बनि रहल अछि एशियाक सभसँ पैघ सड़क पुल। लोहा-छड़, बड़का-बड़का पाया, आ ओइपर चढ़ल जोन-मजदूर, माथपर टोकड़ी लेने। सीमेण्ट, गिट्टी चारू कात…
आ एक गोटेक पएर हुसै छै..
आ खसैत अछि चकरघिन्नी खाइत…
गोंहि सभक बीच बनै छै जलसमाधि।
फेर किछु दिनमे दोसर, फेर तेसर…. कइएक सय जोन-मजदूरक जलसमाधि..
चलैत रहलै सभटा खेल संगे-संग।
किछुएकेँ मृत्युक रूपमे देखाओल गेलै, खाली तीसटा। आ बेसी गेलै जलसमाधिक खातामे,
आ कएक दशक बाद हमहूँ ओही खातामे छी।
कालक्रममे पएर हुसैत अछि, ओत्तै..
आ खसैत छी चकरघिन्नी खाइत…
गोंहि सभक बीच बनैत अछि हमर जलसमाधि।
गोहि सभ चिबा गेल हड्डी पर्यन्त।
से हम सभ गोटे समाधि प्राप्त केलौं।
बिज्जी पहरेदार छलै तँ गहुमन किछु नै बिगाड़ि सकलै।
मुदा एतुक्का पहरेदार छलै मनुक्ख।
आ इनारमे फेकल ढेपाक अबाज जकाँ कने थम्हि कऽ आबि रहल छै अबाज, छपाक।
इनार छथि गंगा धार, आ ढेपा बनि खसि रहल अछि सभ योगी, जेना जलसमाधि लेबा लेल आयल हुअए दूर बोन, पहाड़ आ बाढ़िक बाद बचल रेतक खेतसँ।
जेना जलसमाधि लेबाक धरफड़ी होइ ओकरा सभमे।
सन्न- सन्न कऽ रहल छै कान। चलै-चली गढ़ नारिकेलक लोक सभ लग। ओकरो सभक कान सन्न-सन्न कऽ रहल छै। बेरा-बेरी। एका-एकी। कहियो ककरो तँ कहियो ककरो।
जेना कोनो आत्मा मुक्ति पाबि जायत सुनि कऽ ई खिस्सा।
जेना गढ़ नारिकेलक लोक भऽ जायत हल्लुक सुना कऽ ई खिस्सा।
मुदा स्वर अस्पष्ट अछि।
जलसमाधि.. गोहि..
बिज्जी… गहुमन…
ई जोड़ा बना कऽ कोन खिस्सा सुनऽ-कहऽ चाहैए।
बिज्जी आ गहुमन तँ भेल गामक खिस्सा…
मुदा ई गंगाजी पर बनि रहल एशियाक सभसँ बड़का पुल?
गढ़ नारिकेलसँ तँ ई बड्ड दूर अछि, कोनो नवका खिस्सा बुझा रहल अछि।
तँ ई आत्मा कतेक दिनुका खिस्सा सुनाओत? कतेक सय सालक। सय सालक तँ अवश्ये। आ तखन तँ ई सय सालसँ मुक्तिक आसमे अछि। आकि बेसिये दिनसँ।
कोन खिस्सा कहऽ-सुनऽ चाहैए ई आत्मा।
जलसमाधि भेटि गेलै तँ मुक्त किए नै भेलौं।
बिज्जी जँ गहुमनसँ बचा लेलकै तँ तकर माने कोनो अदृश्य शक्ति संग देलकै। … मुदा वएह शक्ति ओकरा गोंहिक मध्य जलसमाधि कोना लेबऽ देलकै?
आकि ई एकटा नै दूटा खिस्सा अछि, आकि ओहूसँ बेशी, कएकटा खिस्सा..
देह सिम्मरक फूल सन हल्लुक भऽ गेल अछि। देह अछिये कहाँ, आ दू-तीन टा खिस्सा मिज्झर भऽ गेल अछि, दू-तीनटा कालखण्ड आ भूखण्डक संग।
देखू की सुनै छी आ की सुनबै छी.. फरिछाइए खिस्सा कालखण्ड आ भूखण्डक संग, आकि रहैए मिज्झर अन्त धरि। [ऐ कादम्बरीक अंश]


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