भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Thursday, July 24, 2008

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 5.पद्य (आँगा)

5.पद्य (आँगा)

नाम - ज्योति झा चौधरी ;जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८;जन्म स्थान -बेल्हवार मधुबनी ;शिक्षा - स्वामी विवेकानन्द मिडल स्कूल़,टिस्को साकची गर्ल्स हार्ई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी़ आइ.सी.डबल्यू.ए.( कॉस्ट एकाउण्टेन्सी) ;निवास स्थान – लन्दन,यू.के.;पिता -श्री शुभंकर झा,ज़मशेदपुर;माता -श्रीमती सुधा झा़ शिवीपट्टी ;''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी़ नानी़ भाई बहिन सबकेँ पत्र लिखबामे केने छी ।बचपन सँ मैथिली सँ लगाव रहल अछि|-ज्योति

हिमपात
बर्फ ओढ़ने वातावरण !
मानू आकाश टूटि क बिखरि गेल ,
अपने आप के छिरियाकऽ
सबके एक रंग में रंगि गेल ॥

थरथराबैत सरदी स भयभीत
सब जीव अपन जगह धेलक;
प्रकृति के इहो अवरोध मुदा,
मनुष्य के नहि बॉंधि सकल ॥

भॉंति प्रकारक साधन जोगारलक
विकट परिस्थिति पर विजय लेल;
अपन सर्वश्रेष्ठ बुद्धिबल स
मनुष्य अंतत: सफल भेल॥




गजेन्द्र ठाकुर

90.नव-घरारी

साँप काटल नन्दिनीकेँ,
नव घरारी लेलक खून।
टोलक घरारी छोड़ू जुनि।
ई विशाल जनसंख्या एतय,
छल बनल एकटा काल,
ई नव-घरारी लेलक प्राण,
टोलक घरारी साबिकक डीह,
परञ्च अछि छोट आब की।
खून लेलक आब ई बनि गेल अख्खज,
नव घरारी होयत छोट किछु काल अन्तर।


91. बुद्ध
हृदय लग अछि जेबी,
से जखन रहय खाली,
मोन कोना रहत प्रसन्न।
बुद्ध सेहो कहि गेल छलाह ई।
मुम्बइमे सूप मँगलहुँ,
पुछलक अहाँमे जैनी कैकटा छी।
देत लहसुन की नहि रहय तात्पर्य,
आपद्काले रहि गेल अछि आइ काल्हि सदिखन।
सेल टैक्समे करैत छी भरि दिन काज,
तैँ प्रोननशियेशन भेल अछि मराठी,
एक्साइज तँ अछि केन्द्रीय सरकार,
संपर्क बाहरीसँ बेशी।
छत्तीसगढ़क छत्तीस घंटाक यात्रा,
उत्तर-मध्य क्षेत्रक स्तूपकेँ देखल,
बंगाल घूमल पंजाब घूमल,
बंगाली कहलन्हि सुनि जे जौँ,
बंगाली जायत संग करत कानूनी बात\
सरदारजी कहलन्हि रोड पर,
रेड लाइट रहलो क्रॉस करू,
सोझाँसँ अबैत छल एकटा सरदार,
कहल करत आब ई झगड़ा।
सक्सेना कहलक एक मैथिलकेँ,
मैथिल अछि मैथिलक परम शत्रु।
हम कहल सक्सेनाकेँ,हे
जुनि करू हुनका दूरि।
काज सभटा झट कराऊ जुनि भड़काऊ।
बुद्धक भूमिसँ घुरि आयल छथि,
दिल्लीक सड़क पर एहि बेर।
पाटलिपुत्र रहय राजधानी,
हम छलहुँ ततय पुन फेर,
दिल्ली बनल राजधानी भारतक,
कोन जुलुम हम कएल।
कणाद कपिल गौतम जेमिनी देतथि
जौँ नहि काज,
कहलन्हि ई ठीके हृदय लग,
जेबी देने अछि सीबि।
हृदय कोना प्रसन्न रहत जखन,
पेट रहत गय खाली।
जेबीमे पाइ नहि रहत,
उपासे करब हम भाइ।
बुद्ध सेहो कहि गेलाह ई।

92. रिक्त पाँचम वर्गसँ सातम वर्गमे,
तड़पि गेल छलहुँ हम।
छट्ठा वर्गक अनुभव अछि रिक्त।
बा’ आ’ बाबा जन्मक पहिनहि,
प्राप्त कएलन्हि मृत्यु,
वात्स्ल्यक अनुभव भेल रिक्त।
माँ एके बहिनि छलि तेँ,
मौसी-मौसाक अनुभवो नहि,
ईहो रहल रिक्त।
क्यो कहैत अछि जे छठामे पढ़ैत छी,
बा’ आ’ बाबाक संग घुमैत छी,
मौसी-मौसाक काज उद्यममे जाइत छी,
तँ हम कहैत छी, जे ई कोन संबंध
, कोन वर्ग अछि,
छोड़ि सकैत छी।
उत्तर भेटैछ,
अहाँ नहि बुझब।
मुदा नव संबंध,
नब नगर,
नव भाषा,
नवीन पीढ़ीकेँ, कोना बुझायब,
ओ’ कोना बुझत।
ओ’ तँ नहि बूझि सकत काका-काकी,
नहि बूझत दीया-बाती,
खटैत दौड़ैत आ’ नहि घुरि आओत,
ककरा बुझायब आ’ के बूझत।

93. चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी,
हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ,
लागल मंझा बूकल शीसाक,
जेना प्रतियोगीक कागज-कलम।
कटल चित्रपतङ्ग,
देखबैत अछि वास्तविकताक धरा।
जतयसँ शुरू ओतहि खत्म,
मुदा बीच उड़ानक स्मृति,
उठैत काल स्वर्गक आ’,
खसैत काल नरकक अनुभूति।

94.प्रवासी
संगहि काटल घास,
महीस संगे चड़ेलहुँ,
पुछैत छी गहूम ई,
पाकत कहिया?
दू दिन दिल्ली गेलहुँ,
सभटा बिसरेलहुँ,
ईहो बिसरि गेलहुँ,
जे धान कटाइछ कहिया।


95. वेदपाठी
वेद वाक्य परम सत्य,
संस्कृत साहित्य अति उत्तम।
करैत छी अहाँ वक्त्तव्य,
मुदा अहाँ की अहाँक पुरखा,
मरि गेलाह बिन सुनने,वेद वाक्य,
बिन पढ़ने संस्कृत।
यौ अहाँ नहि पढ़लहुँ अहाँ,
अनका अनधिकार बनेबाक चेष्टा,
कएलहुँ अहाँ।
छी वेदक अप्रेमी,
नहि अछि क्षमता,
वेदक पक्ष की विपक्षमे बजबाक ।
वेद वाक्य सत्य एकरा बनेने छी,
अहाँ फकड़ा।

96. बिसरलहुँ फेर
खूब ठेकनेने जाइत,
जे नहि बिसरब आइ,
मुदा गप्प पर गप्प चलल,
कृत्रिमता गेल ढ़हाइत।
फेर काजक बेर मोन,
नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन,
कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप,
आ’ तकरा बाद मसोसि कय
रहि जाइत छी गुम्म।

97. तक्षशिला
तक्षशिला अछि पाकिस्तानमे,
इतिहासक उनटबैत पन्ना,
चक्र घूमल टूटल हमर देश,
अराड़ि ठाढ़ कएलक दियाद।
मुदा सोचैत छी।
जे भने दियाद अछि समीप,
आ’ कएने अछि अराड़ि,
ताहि बहन्ने छी हम सजग,
करैत रहैत छी तैयारी।
1962 धरि हिमालयकेँ बुझल बेढ़,
जेना 1498 धरि छल समुद्र,
द्वार खोलैत छल खैबर दर्रा।
प्ड़ोसीयो पर आक्रमण होइत छल,
दूर-दूरसँ अबैत छल अत्याचारी,
भने दियाद अछि कएने अराड़ि,
जे करैत रहैत छी तैयारी।

98. चोरि
गेलहुँ गाम आ’ एम्हर,
आयल फोन, समाचार चोरिक।
छुट्टी होयबला छल समाप्त,
मुदा चोरक गणना छल ठीक।
आबयसँ एक्के दिन पहिने,
लगेलन्हि घात।
तोड़ि कय केबाड़,
उधेसल घर-बार।
नहि पाबि कोनोटा चीज,
घुरल माथ पीटि।
भोरमे पड़ोसी कएलन्हि डायल सय,
पुलिस आयल हारि थाकि कय।
पड़ोसीसँ किनबाय दू टा अतिरिक्त ताल,
(पुलिस महराज अपन घरक हेतु),
चाभी लेलन्हि अपन काबिजमे।
चोर हड़बड़ीमे छल चलि गेल,
मुदा एहि महाशयक हाथ चाभी गेल,
आ’ शो-केशक चानीक नर्त्तकी गुम भेल।
चोरकेँ छल डर गेटक दरबानक,
से छलाह ओ’ गहनाक आ’ नकदीक ताकक।
मुदा पुलिस महाराज दय राब दौब दरबानहुँकेँ,
निकललाह चोरि कय बरजोड़ीसँ।

99. चोरकेँ सिखाबह
यौ काका छी अहाँ खाटकेँ,
धोकड़ी किएक बनओने,
खोलि नेवाड़ फेर घोरिकेँ,
बनाऊ खाट फेर नवीने।
कहलन्हि काका तखन जे हौ,
देखह आयत रातिमे जे चोर,
पटकत लाठी खाट पर आ’
चोट नहि लागत मोर।
परञ्च काका जौँ ओ’ चलबय,
लाठी नीचाँ बाटे,
वाह बेटा कहि दिहह चोरकेँ,
ई गप तोहीँ जा कय।


100. काल्हि
भोरे उठि ऑफिस जाइत छी,
आ’ साँझ घुरि खाय सुतैत छी।
कतेक रास काज अछि छुटैत,
अनठाबैत असकाइत मोन मसोसैत।
जखन जाइत छी चुट्टीमे गाम,
आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम।
पबैत छी ढ़ेर रास उपराग,
तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम।
कागजक पन्ना पर नव राग,
विलम्बक बादक हृदयक संग्राम।
चलैत छल बिना तारतम्यक,
उद्देश्यक-विधेयक।
कनेक सोचि लेल,
छुट्टीमे जाय गाम।
विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान,
फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ,
जे सोचल कएल, नित चलल,
जीवनक सुर भेटल आब जाय।

101. मोन पाड़ैत
मोन अछि नहि पड़ि रहल,
पाड़ि रहल छी मोन।
लिखना कड़ची कलमसँ लिखैत,
फेर फाउन्टेन पेनक निबमे बान्हि ताग,
छलहुँ लिखाइकेँ मोटबैत,
मास्टर साहब भ’ जाइथ कनफ्यूज।
केलहुँ अपने अपकार ठाढ़े-ठाढ़,
अक्षर अखनो हमर नहि सुगढ़।
फेर मोन पाड़ैत छी,
दिनमे बौआइत रही,
कलममे बाँझी तकैत,
दोसर ठाढ़ि तोड़ने पड़ैत छल,
बुरबक होयबाक संज्ञा,
ईहो छी नहि बुझैत,
मोजर होइत तँ खैतहुँ आम,
अगिला साल।
बाँझीमे नहि कोनो आस,
घूरमे होइछ मात्र काज।
फेर छे पाड़ैत, अंडीक बीया बीछब,
पेराइ कटबाय अनैत छलहुँ तेल,
ओहिमे छनल तिलकोड़क स्वाद,
राजधानीक शेफकेँ करैछ मात।
तेलक कमीसँ भभकैत कबइक स्वाद,
’की नीक बनल’ केर मिथ्यावाद।
महिनामे आध किलो करू तेलक खर्च,
भ’ जायत एक किलो, पाइक माश्चर्ज।
कंजूसी नहि, जबरदस्ती ठूसी।
मोन पाड़ैत छी धानक खेत,
झिल्ली कचौड़ी, लोढ़ैत
काटल धानक झट्ठा,
ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी।
‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ’ सतघरियाक खेल,
आमक जाबी,
बंशीसँ मारैत माछ,
खुरचनसँ सोहैत आम काँच।
चूनक संग काँच आमक मीठ स्वाद,
बडका दलान, दाउन,
बाढ़िक पानि सँ डूबल शीस होइत खखड़ी,
धानमे मिला देला पर पकड़ैत छल कुञ्जड़नी।
भैरव स्थानक काँच बैरक स्वाद,
बिदेसरक रवि दिनक बूझल,
फूल_लोटकीसँ बिदेसर पूजल।
चूड़ा लय जाइत रही गामसँ,
दही-जिलेबी कीनि घुरैत भोजन कय।
जमबोनीक बनसुपारीक स्वाद,
पुरनाहाक धातरीमक गाछ।
साहर दातमनिक सोझ नीक छड़,
जे अनैछ छी बुधियारी तकड़।
तित्ती खेलाइत बाल, गुल्ली डंटा,
गोलीक खेल, अखराहाक झमेल।
हुक्का लोलीक बाँसक कनसुपती,
फेर कपड़ाक गेनी मटियातेलमे डुबाय,
छलहुँ रहल जराय।
छठिक भोरमे फटक्का फोड़ल,
जूड़िशीतलक धुरखेल खेलेल।
आयल बाढ़ि दुर्भिक्ष,
छोड़ल गाम यौ मित्र।
मोन नहि पड़ैछ,छी पाड़ैत,
बैसि बैसि बैसि।

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)

6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
संस्कृत कथा
गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल।
कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।
सुभाषितम्
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।

पद्य ( गजेन्द्र ठाकुर)
चटका चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे। रचयति नीडं चटका वृक्षे आकाशे।
नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे। आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा, न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।
कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे, कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।

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नमोनमः। भवतां सर्वेषाम् अपि स्वागतम्।
जलम् आवश्यकम्।
काफी आवश्यकम्।
मास्तु।
चायम् आवश्यकम्।
मास्तु। मास्तु। पर्याप्तः।
किम् आवश्यकम्। जलम् आवश्यकम्।
किंचित् आवश्यकम्।
आम्।
पुनः किंचित् आवश्यकम्। धनम् आवश्यकम्। चाकलेहः आवश्यकः। मिष्टान्नम् मधुरम् आवश्यकम्। शिक्षणम् आवश्यकम्। मास्तु। संस्कृतम् आवश्यकं वा। आवश्यकम्। ताडनं मास्तु। वस्त्रं धनं आवश्यकम्। द्वेषः कोलाहलः मास्तु। अहं भवतः युतकं ददामि। सर्वे वदंतु। चतुर्वेदस्य युतकम्। भवान युतकम्। मम युतकम्। वदतु। भवतः युतकम्। भवतः नासिका। समीचीनम्। सुनीते। भवति आगच्छतु। अहं भवत्याः आभूषणं वदामि। भवति मम् आभूषणं वदतु। भवन्तः सुनीतायाः आभूषणम् इति वदन्तु। भवत्याः घटी। भवत्याः केशः। साधु-साधु। पुनः एकम् अभ्यासः कुर्मः। कः कस्य मित्रम्। अथवा का कस्याः सखी। इति भवन्तः। लता प्रियङ्कायाः सखी। वदन्तु। उदाहरणं वदामि। इदानीम भवन्तः वदन्तु। रोहितः अभिषेकस्य मित्रम्। उत्तमम्। इदानीं वयं बहुवचनस्य अभ्यासं कुर्मः। छात्रः- छात्राः। दंतकूर्चः-दंतकूर्चा।
उत्तमम्। चशकः- चशकाः। बालकः- बालकाः। सैनिकः- सैनिकाः। वृक्षः- वृक्षाः। शिक्तवर्तिका- शिक्तवर्तिकाः। पेटिका- पेटिकाः। उत्पीठिका- उत्पीठिकाः। लेखनी- लेखन्यः। अङ्कनी- अङ्कन्यः। घटी- घट्यः। कूपी- कूप्यः। पर्णम्- पर्णानि। पुस्तकम्- पुस्तकानि। कङ्कनम्- कङ्कणानि। फलम्- फलानि। सङ्गणकम्- सङ्गणकानि।
अहम् एकवचने वदामि। भवन्तः परिवर्त्तनं कुर्वन्।

छात्रः अस्ति- छात्राः सन्ति। छात्रा अस्ति।– छात्राः सन्ति। दंतकूर्चः अस्ति। - दंतकूर्चाः सन्ति। चमषः अस्ति।– चमषाः सन्ति।
अङ्कणी अस्ति। अङ्कन्यः संति।
पर्णम् अस्ति।पर्णानि सन्ति।
वृक्षः अस्ति।– वृक्षाः सन्ति। बालकः अस्ति।– बालकाः सन्ति। गायकः अस्ति।– गायकाः सन्ति।
लेखकः अस्ति।– लेखकाः सन्ति। बालिका अस्ति। बालिकाः सन्ति। पत्रिका अस्ति। पत्रिकाः सन्ति। पत्रम् अस्ति।पत्राणि सन्ति। पुष्पम् अस्ति।पुष्पाणि सन्ति। मन्दिरम् अस्ति।मन्दिराणि सन्ति। फलम् अस्ति। फलानि सन्ति। पर्णम् अस्ति। पर्णानि सन्ति।
अङ्कणि अस्ति। अङ्कण्यः सन्ति। लेखनी अस्ति। लेखन्य सन्ति।
इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः।
बालिकाः सन्ति। बालकाः सन्ति। बालकः एकवचनं वाक्यं वदति। बालिकाः बहुवचनं रूपं वदन्तु।तस्य वाक्यस्य बहुवचन रूपं वदति।
बालिकाः एकवचनं वाक्यं वदति। बालकाः परिवर्त्तनन्ति। अस्तु वा। अस्तु। पुस्तकम् अस्ति।पुस्तकानि सन्ति। लेखनी अस्ति। लेकण्याः सन्ति। घटी अस्ति। घट्याः सन्ति। सः छात्रः। ते छात्राः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। सः कः। सः पुरुषाः। ते के। ते पुरुषः। कः पुरुषः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। ते के। ते पुरुषाः। के पुरुषाः। ते पुरुषाः। हस्तं दर्शयन्तु। अक्षता उत्तिष्ठन्तु। ताः बालिकाः। सा बालिका। सा पेटिका। ताः पेटिकाः। सा का। ताः काः। का पेटिका। सा पेटिका।
काः पेटिका। ताः पेटिकाः। तत् चित्रम्। ताणि चित्राणि। तत् किम्। ताणि कानि। ते वृक्षाः। एते वृक्षाः। एते छात्राः। ताः घट्यः। ते के। एते के। एताः बालिकाः। एताः घट्यः। ताः बालिकाः। एताः काः। ताः घट्यः। काः घट्यः। तानि फलानि। एतानि फलानि। एतानि पुस्तकानि। तानि पुस्तकाणि। एतानि फलानि। एतानि कानि। तानि फलानि। भवान् बालकः। भवन्तः बालकाः। भवती बालिका। भवत्यः बालिकाः। अहं भारतीया। वयं के। वयं भारतीयाः। वयं भारतीयाः।
अहं देशभक्त्तः। वयं देशभक्ताः। भवन्तः बालकाः। भवन्तः के। वयं बालकाः। भवत्यः बालिकाः। भवत्यः काः। वयं बालिकाः। अहम् एकवचनं वदामि। भवन्तः बहुवचनं वदन्तु। एकम् अभ्यासः कूर्मः। अहं भारतीयः।अहं राष्ट्रभक्तः। अहं चतुरः। अहं मूर्खः। वयं मूर्खाः।
सिद्धिरस्तु।

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) मधुश्रावणी अरिपन

7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) मधुश्रावणी अरिपन
चित्रकार- उमेश कुमार महतो, गाम-बहादुरगंज(जिला किशनगंज,बिहार, भारत), उम्र-18 वर्ष, पिताक नाम- श्री केशव महतो।


श्रावन कृष्ण पंचमी (नाग पंचमीसँ) प्रारम्भ भ’ कय श्रावन शुक्ल तृतीया पर्यन्त नीचाँक अरिपन पर विभिन्न नागक पूजा कएल जाइत अछि, आ’ वृद्धा लोकनि एहि अवसर पर कथा सेहो कहैत छथि। नव वर-वधूकेँ संग बैसा कय पूजाक समापन होइत अछि। इइ अरिपन दूटा मेना-पात आ’ पूजा करयबालीक दुनू दिशि भूमि पर बनाओल जाइत अछि। वाम पात पर 101 सर्पिणी सिनूर आ’ काजरसँ आ’ दहिन कातक पात पर 101 सर्पिणी पिठारसँ बनाओल जाइत अछि। वाम कातक सर्पक मुखिया कुसुमावती आ’ दहिन कातक वौरस नागक पूजा होइत अछि। मेना पातमे सर्प वशीकरण शक्त्ति होइत अछि। संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि।

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 8. संगीत शिक्षा

8. संगीत शिक्षा

शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि।
जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ’ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।

शुद्ध आ’ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑।
एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ’ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल।
एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ’ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत।
आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। 37 टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ 12, 12, 12 केर तीन सेट आ, अंतिम 37म तीव्र सां केर हेतु।
सप्तक मे सातटा शुद्ध आ’ पाँचटा विकृत मिला कय 12 टा भेल!
वाम कातसँ 12 टा उजरा आ’ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला 12 टा की मध्य सप्तक आ, 25 सँ 36 धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।

आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ’ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक।
मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ’ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा-
स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी ‍ सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं
अवरोह- तारसँ मध्य आ’ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।

वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ’ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी।

(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 9. बालानां कृते राजा सलहेस

9. बालानां कृते
राजा सलहेस
राजा सलहेस सुन्दर आ’ वीर छलाह। मोरंग नेपालमे रहैत छलाह। ओ’ दुसाध जातिक छलाह आ’ दबना नामक मोरंग राजाक मालिन सलहेससँ प्रेम करैत छलि। राजक वैद्य ओकरासँ प्रेम करैत छलाह आ’ दबनाक अस्वीकृतिसँ ओ’ आत्महत्या कए लेलन्हि। सलहेस छलाह मोरंगक तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाक सिपाही। सलेहस छलाह मोनक राजा। सभकेँ विपत्तिमे सहायता दैत रहथि। ताहि द्वारे दबना दिशि हुनकर कोनो ध्यान नहीं छलन्हि। सभ हुनका राजा कहैत छलन्हि, से ओ’ तालुकदारकेँ पसिन्न नहीं पड़ल। एक दिन दरबारमे ओ’ सलहेसकेँ पुछलक- अहाँक नाम की? सलहेस कहलन्हि- हमर नाम छी राजा सलहेस। तखन थापा कहलकन्हि, जे अहाँ अपन नाममे राजा नहीं लगाऊ। सलहेस कहल्न्हि, जे ई पदवी छी, जन द्वारा देल पदवी। कोना छोड़ब एकरा। हमारा चोड़ियो देब लोक तँ कहबे करत।तखन थापा कहलकन्हि जे लोककेँ मना क’ दियौक। सलहेस कहलन्हि जे लोककेँ कोना मना करबैक। लोकक मोन जे ओ’ ककरा की बजाओत। निकलि गेलाह सलहेस ओतयसँ। आब नहि निमहत ई नोकरी। आइ कहैत अछि नाम छोड़य लेल, काल्हि किछु आर कहत। पितियौत बहिन रहैत छलन्हि मुंगेरमे। बहिनोइ राज दरभंगाक नोकरीमे छलाह। एम्हर कुसमी दबनाकेँ कहि देलक जे सलहेस जा’ रहल अछि मोरंग छोड़ि कय। दबना छलि कमरू-कमख्यासँ तंत्र-मंत्र सिखने। कहलक ओ’ सलहेसकेँ जे हम राजाक दरबारमे सात सय सिपाहीक सरदार चूहड़मलकेँ हटबा क’ अहाँकेँ सरदार बना देब। सैह भेल। बड़का जलसा देलक दबना, गेलक गीत- रौ सुरहा, बारह बरस तोरा लेल आँचर बन्हलौँ।
मुदा, केलक चोरि चूहड़मल, चोरेलक नौ लाखक रानीक हार आ’ नुका देलक सलहेसक ओछैनमे। राजाकेँ कहलक चूहड़मल जे सलहेसक घरक तलासी लेल जाय।सलहेसक गेरुआक खोलसँ खसल हार। दबना काली मन्दिरमे तंत्र साधना शुरू कएलक। भूत-प्रेतकेँ नोतलक। खून बोकरबेलक चूहड़मलसँ। चूहड़मल सभटा बकि देलक। सलहेसकेँ जेलसँ छोड़ि देल गेल आ’ ओकर ओहदा बढ़ा देल गेल। चूहड़मलकेँ भेलैक जेल। दबना आ’ सलहेस विवाह कए खुशीसँ रहय लगलाह।

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 10. पंजी प्रबंध

10. पंजी प्रबंध
श्री विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया


पुनश्च सप्तसिन्धु सँ प्राच्याभिमुखी यायावर ऋषि लोकनि गंगा ओ’ हिमालयक मध्यक सुभूमि मिथिलामे जाहि आर्यसंस्कृतिक बीज-वपन कएल, तकर मूल छल धर्म, धर्मक मूल थिक जाति, ई जाति होयत एहि जन्मक विशुद्धिसँ, जन्मसँ विशुद्ध संतान होइत अछि तखन जखन विवाहक अधिकार जाहि कन्यासँ हो तकरहिसँ विवाह कएला उत्तर प्राप्त संतान आर्य जातिक विवाहक नियम सभ सर्वप्रथम निबंधित भेल विभिन्न स्मृति सभमे। महान स्मृतिकार मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक अनुसार ओहि कन्यासँ विवाहक अधिकार हो जे- 1. समान गोत्रक नहि होथि, 2. समान प्रवरक नहि होथि, 3. माइक सपिण्ड नहि होथि,
4. पिताक सपिण्ड नहि होथि,
5. पिताम अथवा मातामहक संतान नहि होथि, 6. कठमामक संतान नहि होथि।
एहि वैवाहिक अधिकारक निष्पादनार्थ कमसँ कम मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक समयसँ त निश्चये लोक अपन ‘ यावतो परिचय’ स्वयं अपनहि रखैत आबि रहल छल, मुदा पश्चातक युगमे ई प्रवृत्ति समाप्तप्राय भ’ गेल। विवाहक हेतु वर ओ’ कन्याक सम्पूर्ण परिचय तँ आवश्यके छल, जे आनहु धार्मिक संस्कारक हेतु सपिण्डत्त्वक विचार विवाहक अतिरिक्त श्राद्ध ओ’ अशौच प्रभृतिअहुमे आवश्यक होइत छल, एहि कारणेँ प्रागैतिहासिक कालहिसँ लोक अपन सांगोपांग परिचय रखैत छल। ओ’ ओकरहि अनुसार अपन धार्मिक क्रियाक निष्पादन करैत रहए। ई नियम सभ हमरा लोकनिक प्राचीनतम धर्मग्रंथ सभमे उपलब्ध अछि। स्मृति सभमे कहल गेल अछि, जे जनिकासँ विवाहक अधिकार नहि हो से स्वजना भेलीह। स्वजनासँ विवाहोपरांत प्राप्त संतान चाण्डाल बूझल जाइत छल। ओ’ आर्यत्वक मर्यादासँ बहिष्कृत मानल जाइत छल।
(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 11. मिथिला आ’ संस्कृत

11. मिथिला आ’ संस्कृत

कामेश्वरसिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा त्रैमासिकी संस्कृत पत्रिका ‘ विश्वमनीषा’ निकलैत छल। 1975 ई. सँ 1994 ई. धरि ई पत्रिका प्रकाशित होइत रहल, मुदा 14 वर्षसँ एकर प्रकाशन बंद अछि। हिन्दीमे मिथिलाक इतिहासक अतिरिक्त सात खण्डमे मैथिलीक परम्परागत नाटकक ( 1300 ई. सँ 1900ई. धरिक 16 टा नाटक)प्रकाशन कएल गेल छल। मैथिलीमे पं गोविन्द झा लिखित वातावरण नाटकक संस्कृत अनुवाद श्री पं शशिनाथ झा कएलन्हि आ’ तकरा विश्वविद्यालय प्रकाशित कएलक। ‘ स्मृति-साहस्री’ जे 20म शताब्दीक विद्वान्-साधकक जीवन पर आधारित प्रथम मैथिली महाकाव्य अछि, आ’ जकर रचयिता श्री बुद्धिधारी सिंह’रमाकर’ छथि केर प्रकाशन सेहो विश्वविद्यालय कएने अछि। रूपक समुच्चयः नामक पुस्तकमे चारि गोट रूपक अछि। एहि मे चारिम संस्कृत रूपक म.म.अमरेश्वर कृत धूर्त्तविडम्बन प्रहसनम् मैथिली अनुवादक संदेल गेल अछि। म.म. भवनाथ उपाध्यायक राजनीतिसारः सेहो मैथिली अनुवादक संग देल गेल अछि।

संप्रति विश्वविद्यालयक कार्य सालमे एकबेर पंचाङ बनेबा धरि सीमित बुझाइत अछि।

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
देवनागरी लिखबामे बराह आइ.एम.ई. केर योगदान विशिष्ट अछि। एहिमे संस्कृतक उदात्त , अनुदात्त आ’ स्वरित केर संगे बिकारी, देवनागरी अंक आ’ संगीतक नोटेशन लिखबाक सुविधा अछि। विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभ बिना एकर सहयोगक संभव नहि छल। मंद्र सप्तक, तीव्र आ’ कोमल स्वरक नोटेशन एहिमे अछि। ऋ,ॠ आ’ ऌ,ॡ आ’ ऍ, ऎ अ, ~ हलन्तक बाद अअर जोड्बाक सुविधा एहिमे सुविधा छैक। अनुदात्त क॒ उदात्त क॑ आ’ स्वरित क॓ सेहो उपलब्ध अछि।
ई विस्टामे सेहो कार्य करैत अछि। आ’ यूनीकोड फॉंटमे रहबाक कारण इंटरनेट पर पठनीय अछि। विदेहक सम्मुख पृष्ठ पर देवनागरीसँ संबंधित तीनटा लिंक राखल गेल अछि। पहिल दू टा लिंक पर जानकारीक संग सॉफ्टवेयर डाउंलोडक लिंक अछि। तेसर लिंक पर ऑनलाइन ताइपिंगक सुविधा अछि, एतय टाइप क’ कय कॉपी कय वर्ड डोक्युमेंटमे पेस्ट कए सकैत छी किंवा ईमेलमे सोझे टाइप केलाक बदला एतयसँ कॉपी कय पेस्ट कए सकैत छी।
(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 13. रचना लिखबासँ पहिने...

13. रचना लिखबासँ पहिने...
मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य अग्राह्य
एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अएलाह वा अयलाह, जाए वा जाय इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, कौआ वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, किनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कय।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ड वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
( ह./ गोविन्द झा/11.08.76 श्रीकांत ठाकुर 11.08.76 सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ 11.08.76
(अनुवर्तते)

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 14. प्रवासी मैथिल English मे

14. प्रवासी मैथिल English मे
King Videha of Mithila had his counsellor Mahosadha.Mithila was invaded by Sudhanvan, king of Sankaiya, and much later by Chulani Brahmadatta and Kewatta, king of Kampila both were defeated by Siradhvaja and Videha, respectively. Jataka story of king Videha and Mahosadha,commander. Secret service reported daily ,employed a hundred and one soldiers in as many cities,employed parrots also, great rampart,watchtowers, and between the watctowers,three moats, water,mud and a dry moat. In city old houses were restored and large banks were dug made warter-reservoirs and grain store-houses. The siege of Mithila and the great tunnel have been described in the Jataka.The weapons included,red-hot missiles,javelins,arrows,spears and lances,and showers of mud and stone. The society consisted of Brahmanas, Kshatriyas, Vaisyas. Sirivaddha, father of Mahosadha was an important merchant of Mithila. The Chandala is also referred.A hawk carried off a piece of flesh from the slab of a slau¬ghter-house. A dog fed upon the bones, skins of the royal kitchen. There was a type of education and later Videha students went to Takshsila for education,e.g.Pintguttara. Kahoda Kaushitaki was married to the daughter of his teacher Uddalaka Aruni. Suka visited Mithila to acquire wisdom. Srutadeva was a great scholar of pre-Bharata era. Agriculture and Cattle-rearing was in vogue and Yajur-Veda mentions famous cows of Videha.King Vedeha gave a thousand cows and a bull to Mahasodha. There was a place where foreign merchants showed their goods. Goods from Magadha and Kasi were imported. The conches of Magadha,Kasi-robe and Sindh mares were famous.Krishna visited Mithila to see his devotees Srutadeva and Bahulashva.The Mahabharata says that shaligrama is another name of Vishnu, Shaligrama worship begun. Janakpur had four gates were four market towns distinguished as eastern, southern, western and northern. There was a revival of Mithila after Bharata war which lasted for more than two centuries and in this period the famous sages of the Brahmanas, the Aranyakas and the Upanishads flour¬ished. Vaishali lost its significance. After Bharata War period the Puranas furnish genealo¬gies of Pauravas(Hastinapura-Kosambi), the Ikshvakus (Kosala) and the Barhadrathas (Mag adha).The names of the kings of Videha ia available in the Jatakas.The Upanishads mention one ruler known as Janaka Videha.Videha has been omitted in the sixteen Mahajanapada available in the Buddhist work Aiguttara-Nikaya where we have Vajji.Karala Janaka perished along with his king-dom and relations. Kasi was conquered by Kosala and Anga by Magadha. The Vajji established their republic before the Kosala conquest of Kasi and the Magadh conquest of Anga.Mall, the penultimate sovereign of the Janaka dynasty of Videha, adopted the faith of the Jaina Parsva, the first historical Jaina 250 years before Mahavira(561BC-490BC).Between Bharat war circa.950 BC and Karala Janaka circa 725 B.c Videha monarchy flourished.
Suruchi group consisting of Suruchi I, Suruchi II Suruchi III and Mahapadmanada.
Janaka group consisting of Mahajanaka I, Arittha¬janaka, Polajahak, Mahajanaka II and Dighavu.Then a group of two kings Sadhina and Narada and then Nimi and Karala(father and son).Makhadeva is regarded as the founder of Mithila monarchy.
Angatis was righteous king,had a daughter named Raja. His ministers were Vijaya, Sunama and Alata. Narada set him to right path after the influence he got from the heretical teachings of a naked Guna Kassapa. Purana Kassapa and Maskari Gosala were the contemporaries of Buddha, thus, Guna Kassapa flourished round 6th century B.C. Chulani Brahmadatta of Kampilya conquered 101 princes of India and only Videha had been left. There is reference that Gandhara king and the Videha king met and mystic meditation was taught to Videha King by Gandhara king.There were land owners and Alaras is mentioned in this regard.The Vedic texts mention Uddalaka and Svetaketu as belonging to the age of Janaka of Videha. The Jatakas mention these two scholars connected with Banaras.For MahapanadaVisvakarman, engineer, constructed a palace seven storeys high with precious stones. Mahajanaka II was brought up by his mother in the house of a Brahmana teacher at Kalachampa and after finishing his education at16 sailed for Suvarnabhumi on a commercial enterprise, in order to get mone to recover the kingdom of Videha. The ship perished in the middle of the ocean. He managed to reach Mithila, where the throne had been lying vacant since the death of Polajanak, his uncle, who had left a marriageable daughter Sivalidevi and no son. Mahajanaka II was now married to this princess and raised to the throne. He later renounced the world. A remarkable feature of the character of Mahajanaka II was his spirit of renunciation. He gives utterance to a famous verse :¬ ‘We have nothing own may live without a care Mithila palaces may burn,nothing mine is burned . Mahajanaka-Jataka is sculptured on a railing of the Bharhut Stupa having inscription : The arrowmaker, King Janaka, Queen Sivali.Nimi and Kalara are men¬tioned in Buddhist,Brahmanical and Jaina literature. Ugrasena Janaka revived the greatness of Mithila. Ashtavakra sais as all other mountains are inferior to the Mainaka, as calves are inferior to the ox, so kings of the earth inferior to the king of Mithila (Ugrasena). He is called Janakana varishtha Samrat(Mahabharata),great performer of sacrifices and is compared with Yayati. In one such Yagya Ashtavakra, son of Kahoda and Sujata (daughter of Uddalaka), attended and Ashtavakra defeated Vandin, son of a charioteer and got released his son.Paurava prince, Satanika, the son of Janamejaya, was a Vaidehi. Sathnika married the daughter of Ugrasena Janaka who sought to enhance his influence by means of this matrimonial alliance. Devarata II was contemporary of Yajnavalkya, who took the management of the royal sacrifice where a quarrel arose between Yajnavalkya and his maternal uncle Vaisampayana as to who should be allowed to take the sacrificial fee and in presence of Devala, Devarata, Sumanta, Paila and Jaimini Yajnavalkya took half of that. Devarata I obtained the famous bow of Siva. The Vedic texts mention five Videha kings,Videgha Mathava, Janaka Vaideha, Janaki Ayasthuna, Nami Sepya and Para Ahlara. Janak Ayasthuna in the Brihadaranyaka Upanishad is said to be pupil of Chuda Bhagavitti and a teacher of Satyakama Jabala. Satyakama Jabala is contemporary of Janaka Vaideha and Yajnavalkya. Ayasthuna was a Grihapati of those whose Adhvaryu was Saulvayana and taught the latter the proper mode of using certain spoons. Sayana Ayasthuna is the name of a Rishi. Jatak mentions a city named Thuna between Mithila and the Himalayas, a favourite resort of Ayasthuna. Janakpur corres-ponds exactly with the position assigned by Hiuen Tsang the capital of Vaji. Janaka Vaideha is Kriti Janaka, son of Bahulasva and was contemporary of Janamejaya Parikshita and his son Satanika. Yajnavalkya and Kritis were the disciples of Hiranyanabha Kausalya. Uddalaka Aruni was approached by Janamejaya Parikshita to become his priest. Uttanka instigated Janamejaya to exter¬minate the non-Aryan Sarpas by burning them in a sacrifice.Uddalaka Aruni with his son Svetaketu attended the Sarpa satra of Janamejaya. Yajnavalkya taught the Vedas to Satanika, the son and successor of Janamejaya.Kriti, the disciple of Hiranyanabha, was the son of a king. Janaka Videha was a contemporary of Uddalaka Aruni,Yajna¬valkya, Ushasti Chakrayana. Janaka Vaideha brought centre of political and intellectual gravity from the Kuru country to Videha.The royal seat of the main branch of the Kuru or Bharata dynasty shifted to Kausambi. Aitareya Brahman says that all kings of the are called Samrat. Satapatha¬ Brahman says that the Samrat was a higher authority than a Rajan as by the Rajasuya he becomes Raja and by Vajapeya he becomes Samrat.
The Kuru ¬Panchalas were called Rajan. Janaka Vaideha’s was a master of Agnihotra sacrifice. Yajnavalkya learnt the Agnihotra from this king. Yajnavalkya Vajasaneya, who was a pupil of Uddalaka Aruni.


सिद्धिरस्तु
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Wednesday, July 23, 2008

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 14. प्रवासी मैथिल English मे

14. प्रवासी मैथिल English मे
Uposatha is the Buddhist fast day,Upagupta was a famous Buddhist saint. A Jataka mentions a king of Videha and calls him Vedeha . He is made a contemporary of Chidani Brahmadatta of Kampilya who conquered all except Videha in the course of a little over seven years but was defeated by Vedeha due to the superior wisdom of the Videhan minister, Mahosadha. A new era of close intellectual co-operation between Videha on one side and the Kuru-Panchala country on the other . Bahulaiva is represented as the king of Mithila in the Bhagavata. There lie is depicted as a contemporary and devotee of Krishna who paid a visit to Mithila to see his Brahmana friend Srutadeva, so Bahulaiva flourished slightly before the Bharata War.Two events given in Purana belong to the reign of Bahulaiva, the visit of Balarama and Krishna to Mithila in search of a jewel and Duryodhana's training there under Balarama and the visit of Krishna to Mithila to show favour to Srutadeva and Bahulaiva. Krishna, Bhima and Arjuna went to Girivraj to have a fight with Jarasandha of Magadha, this event occurred in the reign of Bahulaiva of Mithila through which territory the three passed in their journey from Indraprastha to Rajagriha.A king of Mithila, called Janaka, was the disciple of Vyasa Krishna Dvaipayan who used to officiate at the sacrifices. Vyasa had a high opinion of the learning of his disciple. He asked his son Suka to go to him to learn the science of libera¬tion. Janaka received and instructed his son who later reported this to his father. This Janaka was Bahulaiva. The Bhagavata says that Suka was also with the Rishis who accompanied Krishna to Mithila to see Bahulaiva and Srutadeva. There were Jankriti, the last of the Janaka dynasty, might flourish even after Yudhishthira.The Puranas conclude with the remark that with Kriti ends the race of the janakas.We Know from Arthashashtra that Karala Janaka brought the line of Vaideha to an end. Karala is represented as the son of Nimi, whereas Kriti was the son of Bahula.Karala Janaka, king of Mithila, is known to the Brahmanical literature. Kriti flou¬rished after Siradhvaja but not after Vedic Janaka. Karala is reported to be cruel and unscrupulous. The names of Bahulaiva ,one with many horses and. Kriti,performance.The list of Puranas appears to be continuous and there is no apparent break, it is presumed that other Janakas are to follow. So, Kriti is not the last Janaka,who is a distinct Karala Janaka. The Puranas are assumed to have been narrated in the reigns of the Paurava king Adhisimakrishna, the Aikshvaku. Bahulaiva, the king of Mithila is a contem-porary of Krishna in the Bhagavata, his son Kriti cannot be identified with Karala on any account.With Kriti the main regular line of the Janakas closed and after him came irregular lines of the Janakas as we know from the¬ Jatakas and the Mahabharata.One of the clans of the Vajjian Republic were the Kauravas. Pandu, the Kuru king, get strengthened by the treasure and army from Magadha, went to Mithila and defeated the Videhas in battle. Vaideha Kritakshana was one of the princes who waited upon Yudhishthira in his palace newly constructed by Maya. He was Kriti as a Yuvaraja or as a King. Krishna, Bhima and Arjun on their way from Kuru to Rajagir, for fighting Jarasandha, took circuitous route through Mithila to avoid detection.Videha was a friendly country. The Videhas were defeated by Bhima on his digvijaya in the east and was staying with Vaidehas and then he could defeat other powers with comparative ease. The rivalry between the sons of Pandu and Dhritarashtra had its effect on the Videhas and Karna defeated these people and caused them to pay tribute to Duryodhana.Vaidehas were vanquish¬ed by Arjuna on the battle of bharata.At one place in Mahabharata the Videhas along with others attacked Arjuna, at another place they are in the army of Yudhishthira and are slain by Kripa.Balarama who did not take part in the Bharata war took refuge during the period in Mithila thus it may be surmised that Videha kings remained neutral in Bharata war.Pandu had conquered Mithila, Bhima subdued the Rajas of Mithila and Nepal but Duryodhana came to Mithila to learn Gada Yudha from Balarama, when Krishna and Balarama were in Mithila in quest of Syamantakamani. Later Balarama went on a pilgrimage and visited the ashrama of Pulaba-Salagrama and the Gandaki. After the Bharata war the Puranas do not provide us with any genealogical list for Videha and for this information is available from the Mahabharata and the Jatakas. Videhan king was reputed for the welfare and all were versed in the discourses of atman the grace of the Lord of the Yogas they were all free from the conflicting passions such as pleasure and pain, though they were leading a domestic life. The Buddhist literature mentions Makhadeva of Mithila and all his 84000 successors and says that they adopted the lives of ascetics after ruling over the kingdom.The kings of Videha are known to be sacrificers. Nimi and Vasishtha had a quarrel and cursed each other to become bodiless,i.e.,Videha. Both then went to Brahma and he assigned Nimi to the eyes of the creatures to wink ,i.e., nimesha, and said Vasishtha should be son of Mitra and Varuna with the name Vashistha. This fable just supply a reason for the birth from Mitra and Varuna. It says that long sacrifices were performed by the Videhan kings. Other famous sacrificers were Devarata and Siradhvaja. Devarata obtained the bow of Shiva which centred the sacrifice of Siradhvaja. The Yajna¬vata of Siradhvaja correspond to the sacrificial areas with temporary residences of members of the kingship in the manner described in YajurVeda. The barber who found a grey hair in Makhadeva's head got grant of a village, equivalent to a hundred thousand pieces of money. The King Satadyumna , Siradhvaja's second successor , gave a house to the¬ Brahmana Maudgalya descendant of King Mudgala of North Panchala. Vedeha, king of Videha, gave Mahosadha a thousand cows, a bull and an elephant and ten chariots drawn and sixteen excellent villages and the revenue taken at the four gates, when he was pleased with an answer given by him. Before becoming king he lived as a prince and ruled as a viceroythe the maneer exactly in the case of Makhadeva. The eldest son succeeded the throne when the old king adopted the life of an ascetic. The king was assisted by his ministers and the priest played an important role and the sages instructed the king. King Vedeha of Mithila had four sages, Senaka, Pukkusa, Kavinda and Devinda , who instructed him in the law. Senaka was most important and Senaka and Pukkusa were counsellors

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 13. रचना लिखबासँ पहिने...

13. रचना लिखबासँ पहिने...
जेना मात्रिक छन्द वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि, तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- 1. उदात्त 2. उदात्ततर 3. अनुदात्त 4. अनुदात्ततर 5. स्वरित 6. अनुदात्तानुरक्तस्वरित
7. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि।)।
1. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। 2. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। 3. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। 4.अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। 5. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग आ’ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। 6. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ ,ई 3 प्रकारक होइछ। 7.प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि। (अनुवर्तते)

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
आब किछु बात यूनीकोड आ’ वेबसाइट केर संबंधमे।
कोनो फाइलकेँ पढ़बाक हेतु कंप्युटरमे आवश्यक फॉंट होयब जरूरी अछि, नहि तँ सभसँ सरल उपाय अछि, वर्ड डोक्युमेंटकेँ पी.डी.एफ. फाइलमे परिवर्त्तित करू। एहिमे नफा नुकसान दुनू अछि। नफा जे बिना कोनो फांटक झंझटिक पी.डी.एफ.फाइल जाइ लिपिमे लिखल गेल अछि, ताहिमे पढ़ल जा’ सकैत अछि। एकर नुकसान जे जखने फाइलमे जा’ कय सेव एज टेक्स्ट करब तँ अंग्रेजीतँ सेव भय जायत, मुदा देवनागरी तेहन सेव होयत जे पढ़ि नहि सकी। दोसर यूनीकोडक मंगलमे टाइप कएल डॉक्युमेंटकेँ एडोब अक्रोबेटसँ पी.डी.एफ.मे परिवर्त्तित करबामे दिक्कत होय तँ संपूर्ण फाइलकेँ खोलि कय सेलेक्ट करू यूनीवर्सल यूनीकोड एम.एस.फांट ड्रॉप डाउन मेनूसँ सेलेक्ट करू फेर प्रिंटमे जा कय प्रिंटर एडोब एक्रोबेट सेलेक्ट करू। आब ई फाइल परिवर्त्तित भय जायत पी. डी. एफ.मे। आब वेबसाइट बनेबाक पूर्व किछु मुख्य बातकेँ देखि लिय’। चारि तरहक इंटरनेट ब्राउजर अछि, शेष सभटा एकरा सभकेँ आधार बना कय रचित अछि। तखन सभसँ पहिने ई चारू अपना कंप्युटरमे इंस्टॉल करू. 1.ओपेरा 2.मोजिल्ला 3.माइक्रोसॉफ्टक इंटरनेट एक्सप्लोरर(ई तँ होयबे करत) आ’ चारिमक बीटा(प्रायोगिक) वर्सन आयल अछि, 4. एपलक,अखन तक मेकिनटोसक लेल छल ई, सफारी (विंडोजक हेतु)। आब जखन वेब पेज उपलोद करू वा पहिनहु तँ एहि चारू पर खोलि कय जरूर देखि लिय’।(अनुवर्तते)

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 11. मिथिला आ’ संस्कृत

11. मिथिला आ’ संस्कृत

कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयसँ प्रकाशित दोसर नाटक अछि- महाकवि विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक। एहिसँ पहिने कृष्ण पर आधारित नाटक प्रचल छल। एहि अर्थमे ई एकटा क्रांतिकरी नाटक कहल जायत।
नाथ संप्रदाय किंवा गोरक्ष संप्रदायक प्रवर्त्तक योगी गोरक्षनाथक कथा ल’ कय एहि नाटकक कथावस्तु संगठित भेल अछि।गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा 18 टा रानीक संग भए भोग कए रहल छथि। गोरक्ष आ’ काननीपादकेँ द्वारपाल रोकि दैत अछि।मंत्री ढोलहो पिटबा दैत अछि जे योगी सभक प्रवेश कतहु नहि हो आ’ रानी सभकेँ राजाक मोन मोहने रहबाक हेतु कहल जाइत अछि। गोरक्ष आ’ काननपाद नटुआक वेष धरैत छथि आ’ मोहक नृत्य राजाकेँ देखबैत छथि। एहि बीच राजाक एकमात्र पुत्र बौधनाथ खेलाइत-खेलाइत मरि जाइत अछि। राजाक शंका नट पर जाइत छैक तँ ओकरा मारबाक आदेश होइत छैक। नट बच्चाकेँ जिया दैत छैक। राजा हुनकर परिचय पुछैत छथि तखन ओ’ हुनका अपन पूर्व जन्मक सभटा गप बता दैत छन्हि, जे अहाँ तँ जोगी छी भोगी नहि।
एहि नातकक पात्रमे महामति(राजाक मंत्री) आ’ महादेवी- मत्स्येन्द्रनाथक ज्येष्ठ रानी सेहो छथि। मत्स्येन्द्रनाथ कदलीपुरक राजा आ’ पूर्व जन्मक योगी छथि। मत्स्येन्द्रनाथ अंतमे कहैत छथि जे गोरक्ष जेहन शिष्य हो आ’ महादेवी जेहन सभ नारी होथु। --------

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 10. पंजी प्रबंध लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार

10. पंजी प्रबंध
लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार
भारतीय इतिहासक वेत्ता ओ’ जातीय व्यवस्थाक मर्मज्ञ लोकनि जनैत छथि, जे भारतवर्षक ब्राह्मण लोकनि सर्वप्रथम वेदक आधार पर विभिन्न वर्गमे विभाजित रहथि। जेना- सामवेदी, यजुर्वेदी, आदि कहाबथि। मुदा समयक प्रभावमे भिन्न क्षेत्र-प्रक्षेत्रमे रहनिहार ब्राह्मण लोकनि भिन्न-भिन्न संस्कृतिसँ प्रभावित भए गेलाह। क्षेत्रीय संस्कृतिसँ प्रभावित होएबाक मुख्य कारण छल विशिष्ट क्षेत्रक विशिष्ट जलवायु, क्षेत्र विशेषक भाषा-विशेष, भिन्न-भिन्न क्षेत्रक भिन्न-भिन्न आहार एवम भेष-भूषा आ’ एक क्षेत्र सँ दोसर क्षेत्र जयबाक हेतु आवागमनक असुविधा आदि। फलतः क्षेत्र-विशेषक ब्राह्मण समुदाय, क्षेत्र विशेषक आचार-विचार, खान-पान,वेश-भूषा ,भाव-भाषा ओ’ सभ्यता संस्कृतिसँ प्रभवित भय गेलाह।
उपरोक्त कारणे पुरानक युग अबैत0-अबैत भारत वर्षक ब्राह्मण समाज भिन्न-भिन्न क्षेत्रक आधार पर विभिन्न वर्गमे विभाजित भए गेलाह। पुरानक सम्मतिये भारत-वर्षक समस्त ब्राह्मण समाजकेँ दस(10) वर्गमे विभाजित कएल गेल रहय। ब्राह्मणक ई दसो वर्ग थीक-उत्कल,कान्यकुब्ज,गौड़,मैथिल,सारस्वत, कार्णाट,गुर्जर, तैलंग,द्रविड़ ओ’ महाराष्ट्रीय। स्थूल रूपेँ पूर्वोक्त पाँच केँ पञ्च गौड़ आ’ अपर पाँचकेँ पञ्च द्रविड़ कहल जाइत अछि। एकर सीमांकन भेल विन्ध्याचल पर्वतक उत्तर पञ्च गौड़ ओ विन्ध्याचल पर्वतक दक्षिण पञ्च द्रविड़।
मैथिल ब्राह्मण
पञ्च गौड़ वर्गक मैथिल ब्राहमण लोकनि पुस्ति-दर-पुस्त सँ मिथिलामे रहबाक कारणेँ मिथिलाक विशिष्ट संस्कृतिसँ प्रभावित भए गेलाह, तँय अहि कारणेँ पुराणक युगमे मैथिल ब्राह्मण कहाए सुप्रसिद्ध भेलाह। मिथिला वस्तुतः प्राचीन राहवंशक राजधानी रहए। मुदा पश्चातक युगमे विदेह राजवंशक समस्त प्रशासित क्षेत्र अथवा जनपद मिथिला कहाए सुप्रसिद्ध भेल आ’ एहि जनपदक रहनिहार ब्राह्मण लोकनि मैथिल ब्राह्मण कओलन्हि। ई मिथिला आइ नेपाल ओ’ बंगलादेशक सीमा सँ सटैत अनुवर्त्तमान अछि, जे राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिसँ अपन एक विशिष्ट स्थान रखैत अछि।
मैथिल ब्राह्मण लोकनि मूलतः दुइए गोट वेदक अनुयायी थिकाह। एक वर्गक यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक अनुयायी थिकाह तँ दोसर सामवेदक कौथुम शाखाक अनुगमन करैत छथि। यजुर्वेदक माध्यन्दिन शाखाक अनुयायी”वाजसनेयी” कहबैत छथि, एहिना सामवेद्क कौथुम शाखाक अनुयायी छन्दोग कहबैत छथि।दुहुक संस्कारमे किछु स्थूलो अन्तर अछि। छन्दोग उपनयनमे चारि गोट संस्कार- नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन ओ समावर्त्तन मुदा वाजसनेयीक ई चारू संस्कार थिक, चूड़ाकरण, उपनयन, वेदारम्भ ओ समावर्त्तन। एहिना छन्दोग विवाह मुख्यतः दू खण्डमे सम्पन्न होइत अछि, पूर्व विवाह आओर उत्तर विवाह। उत्तर विवाह सूर्यास्तक बाद तारा देखि कए होइत अछि। मुदा वाजसनेयी विवाहमे एहन कोनो विभाजन नहि अछि। एकहि क्रममे दिन अथवा रातिमे कखनहुँ भए सकैत अछि। वाजसनेयी ओ’ छन्दोगक धार्मिक संस्कारमे तँ सूक्ष्म अंतर कतौक अछि।
(अनुवर्तते)

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 9. बालानां कृते बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल

9. बालानां कृते
बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल
एकटा छलि बहुरा गोढ़िन आ’ एकटा छलाह नटुआ दयाल। बहुरा गोढ़िन नर्त्तकी छलि आ’ ओकरा जादू अबैत छलैक। नटुआ दयाल बहुरा गोढ़िनक प्रशंसक छल किएक तँ ओ’ छल प्रेमी, बहुरा गोढ़िनक पुत्रीक। छल ओहो तांत्रिक।
कमला-बलानक कातक केवटी छलि बहुरा, बखरी, बेगूसरायक रहनिहारि। हकलि छलि ओ’ कमरू सँ सीखलक जादू। दुलरा दयाल छल मिथिला राज्यक भरौड़क राजकुमार, ओकरे नाम छल नटुआ दयाल। नृत्य जे ओ’ बहुरासँ सिखलक तँ सभ नामे राखि देलकैक ओकर नटुआ। नटुआ दयालक गुरू छलाह मंगल। सिद्ध पुरुष। अकाशमे बिन खुट्टीक धोती टँगैत छलाह, सुखला पर उतारैत छलाह। बहुरा गाछ हँकैत छलि, जकरासँ झगड़ा भेल ओकरा सुग्गा बना पोसि लैत छलीह। कमला कातमे रहैत छलाह आ’ भजैत छलाह,
कमलेक आसन,ओहीमे बास हे कमला मैय्या।
बहुरा वरकेँ मारि सीखने छल जादू। राजकुमारक विवाहक प्रस्तावकेँ नहि ठुकरा सकलि मुदा। बरियाती दरबज्जा लागल तँ भ’ गेलैक कह सुनी आ’ सभकेँ बना देलक ओ’ बत्तु। मंत्री मल्लक एक आँखिक रोश्नी खतम।आहि रे बा। व्यापारी जयसिंह छल मोहित महुराक बेटी पर,ओकरे खड्यंत्र।आहि रे बा। गुरू लग गेल राजकुमार आ’ आदेश भेलैक, जो कामाख्या, सीखय लेल षट् नृत्य, आ’ जादू। चण्डिका मंदिरमे योगिनीसँ षट्नृत्य सिखलक आ’ आदेश भेलैक संरया ग्रामक भुवन मोहिनीसँ षट् नृत्यक एक अंग सीखबाक। ओहि गामक सिद्ध देवी रहथि वागेश्वरी। नरबलि चढैत छल ओतय। दैत्य अबैत छल ओतय। सिखलक राजकुमार सिद्ध नृत्य अनहद आ’ आज्ञा चक्र। करिया जादूकेँ काटय बला मंत्रफुकलक राजकुमारक कानमे। कमला बलानमे आयल राजकुमार। बहुरा सुखेलक धारक पानि। राजा पता लगेलक जूकियासँ, अनलक बहुराकेँ, मुदा ओ’ तँ लगा देलक दोष राजकुमार पर। यज्ञ भेल तैयो कमलामे पानि नहि आयल, नटुआ पठेलक सभटा पानिकेँ पताल? नटुआकेँ पकड़ि कय आनल गेल। ओ’ अपन नृत्यसँ जलाजल केलक कमलाकेँ।मुदा कहलक बहुराकेँ माफी दियौक। बहुरा कहलक आब तोँ भेलह हमर बेटीक योग्य। आबह बरियाती ल’कय। नटुआ बरियाती ल’ क’ पहुँचल। तीटा पान अयलैक,एक कमलाक पानिक हेतु,दोसर बहुराकेँ माफ करबाक
हेतु। आ’ तेसर ओकर बेटीसँ व्याह करबाक हेतु। तीनूटा पान उठेलक नटुआ आ’ शुरू भेल गीत-नाद। पियास लगलैक नटुआकेँ शिष्य झिलमिलकेँ पठेलक इनार पर। डोरी छोट भय गेलैक। अपने गेल नटुआ डोरी पैघ भ’ गेलैक। फूलमती छलि ओतय,पतिक प्रतिभासँ प्रसन्न छलि ओ’। मल्लक आँखि ठीक कएलक बहुरा। कमला पहुँचल कनियाँक संग नटुआ, मुदा आहि रेबा।
नटुआकेँ चक्कू मारलक बहुरासँ दूर भेल ओकर शिष्य। मुदा नटुआ चढ़ेने छल पटोर कमला मैय्याकेँ। कमलाक धार खूने-खूनामे। मुदा कामाख्याक जदूगरनी अयलीह आ’ जीवति कएलन्हि नटुआकेँ। दुश्मनक बलि चढ़ेलक कमलाकेँ। ----

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 8. संगीत शिक्षा

8. संगीत शिक्षा

ई जे सातो स्वरक वर्णन पिछला अंकमे देल गेल छल ओकरासँ आगू आऊ। एहि सातू स्वरमे षडज आ’ पंचम मने सा आ’ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ होयबाक गुंजाइस नहि छैक। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ’ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर अछि से सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइस अछि एहिमे। सा आ’ प मात्र शुद्ध होइत अछि। आ’ आब विकृति भ’ सकैत अछि दू तरहेँ शुद्धसँ ऊपर स्वर जायत किंवा नीँचा। जदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ’ नीचाँ रहत तँ कोमल कहायत। म कँ छोड़ि कय सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग,ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ’ शुद्ध। ’म’ केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ’ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह ग दैत अछि शांति म सँ होइत अछि भय ध सँ दुःख
आ’ नि सँ आदेश। (अनुवर्तते)

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा)

7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा)
कुमरम मने विवाह आ’ उपनयनसँ एक दिन पहिने क्रमशः कनियाँ आ’ बरुआकेँ आङ उङारल जाइत अछि मने श्रेष्ठ स्त्रीगण यव आ’ आन पदार्थसँ बनल उबटन लगबैथ छथि। एतय मंडप पर सबरंग पटिया पर षट पाइस अरिपनक समक्ष मंडप पर ई कार्य संपादित होइत अछि। ई एकटा रक्षा कवच थिक।
विधि- तीनटा आयत बनाऊ एकक नीचाँ एक। पाँच खंड उर्ध्वाधर आ’ तीन क्षैतिज खंड करू। एहि 18 खंडमे फूल बनाऊ।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)

6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
वयम् इदानीम अति सरलां रम्यां कथां श्रुण्वः। एकाम् कथां वदामि। कश्चन् वृद्धः अस्ति। तस्य शक्तिः नास्ति। जीर्णम् शरीरम् अस्ति। चलितिम् शक्नुम न। सः बुभुक्षितः अस्ति। सः एकम् वनम् गच्छति। वने सर्वत्र भ्रमणम् करोति। खदितुम् किमपि लभ्यते वा इति सर्वत्र भ्रमणं करोति। सः एकंवृक्ष समीपम् गच्छति। वृक्षं पश्यति। उत्तमानि फलानि सन्ति। किंतु फलानि उपरि सन्ति। सः वृद्धः चिन्तयति। फलानि उपरि सन्ति। अहं निस्पृहः अस्मि, कथं प्राप्नोमि। किम् करोमि। इति चिन्तयति। वृक्षः उन्नतः अस्ति। अहं निष्यप्तः अस्मि। आरोहण कर्त्तुम् न शक्नोमि। किम् करोमि। कथं फलं प्राप्नोमि। इति चिन्तयति। वृक्षस्य उपरि वानराः सन्ति। वृद्धः एकः उपायः करोति। एकं शिलाखण्डं स्वीकरोति। शिलाखण्डं उपरि क्षिपति। वनराः कुपितः भवन्ति। फलानि अधः क्षिपन्ति। वृद्धः संतोषेण फलं सर्वम खादति। बहुसंतुष्टः भवति।कथायाः अर्थः ज्ञातवंतः। आम् ज्ञातवंतः। धन्यवादः। नमोनमः।

मम् नाम गजेन्द्रः। भवत्याः नाम् किम्? मम् नाम रमा। भवतः नाम किम्? समीचीनम्।
उत्तिष्ठतु।
आगच्छतु। गच्छतु। रोहित आगच्छतु। रोहितः किम् करोति?
रोहितः गच्छति। रोहितः आगच्छति। उपविशतु। अभिरामः उपविशति। उत्तिष्ठतु। अभिरामः उत्तिष्ठति। सुनीता पिबति। आस्था पिबति।
ओम गच्छति। खादतु।
सा खादति। आस्था खादति। श्रुतिः किम् करोति। श्रुतिः खादति। स्नेहा किम् करोति। स्नेहा पठति। लिखतु। आस्था लिखति। अश्वनी हसतु। आस्था हसतु। आस्था हसति। सुमन्तः हसति। पश्यतु। सुमन्तः पश्यति। प्रियङ्का वदतु। कृष्णफलकं तत्र अस्ति। प्रियङ्का वदति। आगच्छतु। क्रीडतु। आस्था आगच्छति।
क्रीडति।
गच्छति पठति लिखति सः एषः सा एषा भवान भवती
भवान उत्तिष्ठति। भवान उपविशति। भवती लिखति। भवती पठति। अहं गच्छामि। अहं आगच्छामि। अहं उपविशामि। अहं उत्तिष्ठामि। अहं पिबामि। अहं खादामि। अहं क्रीडामि। अहं हसामि। अहं पठामि। अहं लिखामि। अहं वदामि। भवान किम् करोति। अहं पश्यामि। भवान उत्तिष्ठतु। भवान उपविशतु। भवती पठति। भवती पठतु। भवती लिखति। भवती लिखतु। भवती पश्यति। भवती पश्यतु। भवती गच्छति। भवती आगच्छति। भवती उपविशति। उत्तिष्ठति। वदति। लिखति। अहं पठामि। अहं वदामि। अहं पश्यामि। ददातु। किम् करोति। आगच्छतु। आगच्छति। नयतु। मास्तु-मास्तु। ददातु। कृपया उत्तिष्ठतु। एकम् – एकादश
द्वे द्वादश त्रीणि
चत्वारि पञ्चः षट्
सप्त अष्ट नव दश एकादश द्वादश विंशतिः त्रिंशतः चत्वारिंशत्
पञ्चाशत्
षष्टिः सप्ततिः अशीतिः नवतिः शतम्

संस्कृतम् कथं समयः वक्त्तव्यः इति इदानीम् वयं जानीम। पंच वादनम्। कः समयः। षड् वादनम्। अष्ट वादनम्। समयम् अक्षरैः लिखतु। घट्यां समयं दर्शयतु। दश वादनम्। दशाधिक नव वादनम्। पञ्चन्यून दशवादनम्। एकादश वादनम्। सपाद एकादश वादनम्। सपाद पञ्चवादनम्। सपाद अष्टवादनम्। सार्ध सप्तवादनम्। पादोन एकादशवादनम्। एवमेव सार्द्ध दशवादनम्। एक
द्वि
त्रि चतुर्वादनम्
इदानीम् वयम् एकं सुभाषितम श्रुण्वः।
सुभाषितम्

प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्त्तव्यं वचने का दरिद्रता। वयम् इदानीम् यत् सुभाषितम् श्रुतवंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। यदि वाक्यं वदामः सर्वे जनाः अपि संतुष्टाः भवन्ति। न केवलं जनाः अपितु सर्वे प्राणिनाः अपि संतुष्टाः भवंति। अतः प्रियः वाक्यमेव वदामः। प्रिय वाक्यम् वक्तुम् धनं दातव्यं किमपि नास्ति। प्रिय वाक्य कथने दारिद्रयं कुतः।
सङ्कल्पगानम्

भवतु सफलार्थाः वयम्
भवतु सफलार्थाः वयम्
भवतु सफलार्थाः वयम् एक वासरे....
ओ हो हो, मनसि मे विश्वासः सम्यक्
विश्वासः मे मनसि विश्वासः वयम् एक वासरे....
भवतु शान्तिः सर्वत्र भवतु शान्तिः सर्वत्र
भवतु शान्तिः सर्वत्र
एक वासरे,ओ हो हो..। सन्ति एक-तया वयम्
सन्ति एक-तया वयम्
धृत्वा हस्त-हस्ततलं सन्ति एक-तया वयम्
एक वासरे,ओ हो हो .....
अद्य न अस्ति दरः कस्मात्

अद्य न अस्ति दरः कस्मात्
अद्य न अस्ति दरः कस्मात्
एक वासरे,ओ हो हो....
सिद्धिरस्तु।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 5.पद्य (आँगा)

5.पद्य (आँगा)

74. एस.एम.एस.
कहू एहिमे अहाँ छी,
सहमत आ’ की छी
अहाँ असहमत,
दुनू रूपमे दिय’ अहाँ,
अपन विचार कय
एस. एम.एस.।
आहि कमाऊ अहाँ रुपैय्या,
हम बूरि छी भाइ,
न्यु टेक्नोलोजी छी ई सभ,
बूरि क्यो नहि आइ।

75. अल्हुआ
खाइत भेलहुँ हम अकच्छ तखन,
ई अकाल छल भेल भारि।
वेदपाठक सुनि कय आग्रह,
अएलहुँ हरिद्वार भुखालि।
भरि दिन मंत्र भाखि सोचल,
खीर पूड़ी सभ खायब।
मुदा ओतुक्का पंडित सभ,
खा’ ई सभ छल अघायल।
कएलक मेनू परिवर्त्तन कहलक,
आइ अल्हुआ अहि लायब।
बूझल नहि छल हमरा ई,
हाथ धोने छलहुँ बैसल।
आयल अल्हुआ देखि कर जोड़ि,
विनती कए हम पूछल (अल्हुआसँ),
हमतँ छी ट्रेनसँ आयल,
अहाँ कथीसँ अयलहुँ।
हमरासँ पहिने अहाँ एतय,
कोन सवारी सँ पहुँचलहुँ।

76. दीया-बाती

आयल दीया बाती,
कतेक अमावस्या अछि बीतल,
जकर अन्हारमे लागल चोट,
कतेक जीव थकुचायल पैरहि,
अन्हारक छल थाती।
दीया बाती अनलक प्रकाश,
ज्ञान-ज्योतिक अकाश,
नमन करय छी हम एहि बातक,
अंधकार-तिमिर केर होबय नाश।

77. इटालियन सैलून
घर भेल समस्तीपुर,
दिल्लीमे छी आयल,
खोलि सैलून इटालियन,
अयलहुँ कमायले’।
पुलिसक रोक देखि कय
गेलहुँ गाम घुरि,
पुनः छी आयल,
सैलून कतय बानाओल?
ईटा पर जे छी अहाँ बैसल,
सैह कहबैछ, इटालियन,
रोक अहू पर अछि पुलिसक,
सेहो अखनो धरि नहि बूझल यौ अहाँ।

78. शव नहि उठत

गामक कनियाँ मूइलि शव
अँगनामे राखल,
सभ युवा कएने अछि
नगर दिशि पलायन,
जे क्यो रहथि से घुमैत
रहथि ब्लॉक दिशि,
साँझमे अयलाह देखल
कहल गेलथि मुइल।
गामपर क्यो नहि उठेलक
शवकेँ किएक,
हम कोना छुबितहुँ भाबहु
ओ’ होयतीह ।
मुइल पर भाबहु की
भैसुर केलहुँ अतत्तह,
समय बदलल नहि
बदलल ई गाम हमर।

79.खगता
गोर लागि मौसीकेँ निकलैत,
पूछथि अछि किछु खगता,
आइ नहि पूछल जखन,
बैसल फेर ओ’ तखन।
फेर उठल फेर नहि पुछलन्हि,
सोचि जे रहैत नहि
छन्हि काज।
जाइ कोना पाइक
बड्ड अभाव।
लोक कहैछ,
आयल छथि खगते,
ओना दर्शनहुँ दुर्लभ,
अहीँ कहू,
खगतामे अछि
पुछैत क्यो आगूसँ।

80. अतिचार
तीन साल छल अतिचार,
नहि होयत एहि कारण।
पंडितबे सभ बुझथुन्ह,
छन्हि पत्रा सभ बिकाइत,
पकड़त सभ बनारसी पत्राकेँ,
सेहो नहि बिकायत ,
समय अभावेँ होयत ई,
जौँ अतिशय भ’ जायत।

81. रबड़ खाऊ

रबड़ खाऊ आ’ वमन करू चट्टी,
अपचनीय तथ्य सभ देखल भ्रात,
बड़ छल बुधियार,केलक घटकैती,
शुरू जखन भेल सिद्धांत,
विवाद, विवाहठीक भेलाक
बादक दोसर सिद्धांत,
लड़का विवाह कालमे
बिसरलाह भाषण,
नव सिद्धांतक सृजन
कय केलन्हि सम्मार्जन।

82.मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाइ

मुँह चोकटल नाम
छन्हि हँसमुख भाइ,
बहुत दिनसँ छी
आयल करू कोनो उपाय,
मारि तरहक डॉक्युमेंट
देलन्हि देखाय, पु
नः-प्रात भ’ जायत देल
नीक जेकाँ बुझाय,
शॉर्ट-कट रस्ता सुझाय
देलन्हि मुस्काय,
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाय।

83. बाजा अहाँ बजाऊ
मेहनति अहाँ करू,
फल हमरा दिय।
चित्र अहाँ बनाऊ,
आवरण सजाऊ,
हमर किताबक।
नृत्य हम करू,
बाजा अहाँ बजाऊ।
कृति हमर रहत,
मेहनति करब अहाँ,
आइसँ नहि ई बात,
अछि जहियासँ शाहजहाँ।

84.पिण्डश्याम
दहेज विरोधी प्रोफेसर,
केर सुनू ई बात,
पुत्री विवाहमे कएल,
एकर ढेर प्रचार।
पुत्रक विवाहमे बदलि सिद्धांत,
वधू रहय श्याम मुदा,
मारुति भेटय श्वेत,
सिद्धांतक मूलमे,
छोड़ू विवेक।


85. राजा श्री अनुरन्वज सिंह
एक सुरमे बाजि देखाऊ,
नहि अरुनन्वन,
नहि सिंह,
पूरा एकहि बेर बताऊ,
राजा श्री अनुरन्वज सिंह।


86.पाँच पाइक लालछड़ी
परिवार छल चला रहल,
बेचि भरि दिन,
पाँच पाइक लालछड़ी,
दस पाइमे कनेक मोट लपेटन।
देखैत नहाइ साँझमे,
ठेला चला कय आयल,
बेटाकेँ पढ़ायल,
आइ.आइ.टी.मे पढ़ि,
निकलल कएलक विवाह,
जजक छलि ओ’ बेटी।
पिता कोन कष्टसँ पढाओल,
गेल बिसरि,
पिताक स्मृतिसँ दूर।
नशा-मदिरामे लीन,
कनियाँ परेशान,
लगेलन्हि आगि,
झड़कलि, ओकरा बचेबामे
ओहो गेला झड़कि।
कनियाँतँ गुजिरि गेलीह ठामे,
मुदा ओ’ तीन मास धरि,
कष्ट काटि पश्चात्ताप कए,
मुइलाह बेचारे ।

87. थल-थल
कतबो दिन बीतल,
गद्दा जेकाँ थलथल,
पट्टी टोलक ओ’ रस्ता,
भेल आइ निपत्ता।
मटि खसा कय लगा खरंजा,
पजेबाक दय पंक्ति,
नव-बच्चा सभ कोना झूलत,
ओहि गद्दा पर आबि।
थल-थल करैत ओ’ रस्ता,
लोकक शोकक कहाँ भेल बंद,
माँ सीते की अहाँ बिलेलहुँ,
ओहि दरारिमे अंत।


88. चोरुक्का विवाह
सिखायब हिस्सक छूटत,
नहीं आनब कनियाँकेँ,
भायक माथ टूटत।
भेल धमगिज्जर सालक
साल बीतत,
युवक-युवती दुनू भेल
चोर विवाहक कैदी,
नहीं छल कोनो हाथ परंच,
छल सजा पबैत।
भागल घरसँ युवक आब
पछतायल घरबारी,
मुदा की होयत आब,
ओ’ समाजक व्यभिचारी।
एलेक्शनक झगड़ामे
भाय-भायकेँ मारल,
चोरुक्का विवाहक
घटनामे ओकरा दोहरायल।

89. भ्रातृद्वितीया
कय ठाँऊ बैसलि,
आसमे छलि,
भाय आयत,
बीतल, साँझ आयल।
आँखि नोर छल सुखायल,
चण्डाल कनियाँक गप पर,
सालमे एक बेर छल अबैत,
सेहो क्रम ई टूटल।
कय ठाँऊ बैसलि,
धोखरि अरिपन विसर्जित,
छल साँझ आयल।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 4.कथा इमानदारीक ग्लैमर

4.कथा इमानदारीक ग्लैमर
घर अबैत काल मोन कोना दनि क’ रहल छल। सभ क्यो एक दोसरा सँ किछु असंभव घटित होयबाक गप क’ रहल छलाह। हम दुनू भाय सातम कक्षामे पढ़ैत छी, संगहि-संग। मुदा आइ पैघ भायक पेटमे दर्द छल से ओ’ टिफीनक बाद छुट्टी ल’ घर चलि गेल छलाह। स्कूलमे सभकेँ हँसैत देखैत छी, तँ अपन घरक स्थिति यादि पड़ि जाइत अछि।ईर्ष्य़ा सेहो होइत अछि आन बच्चाक भग्य पर। फेर मोनमे ईहो होइत अछि, जे हमरे सभ जेकाँ परिस्थिति होयत एकरो सभक। मुदा झुट्ठे प्रसन्नताक नाटक करैत जाइत अछि।घरमे माय बापक कलहक बीच डरायल सन रहैत छी। लगैत रहैत अछि जे ई सभ परिस्थिति कहियो खत्म नहि होयत। नहितँ दोसरसँ गप्प कय सकैत छी, नहिये ककरो अपन मोनक गप्पे कहि सकैत छी। बेर-बखत कहियो अपन सहायताक हेतु सेहो सोर नहि क’ सकैत छी। माय ठीके घरघुसका, मुँहदुब्बर आदि विशेषणसँ विभूषित करैत छलीह। साँझमे घुमनाइ आकि दुर्गापूजाक मेला गेनाइ, ई सभ बात हमरा सभक जीवनसँ दूर छल। एक बेर भूकम्प जेकाँ आयल छल, सभ क्यो ग्रील तोड़ि कय बहरायल, मुदा हम खाट पर पड़ले रहि गेलहुँ। किछुतँ अकर्मण्यतावश आ’ किछु ई सोचि कय , जे की होयत घर टूटि देह पर खसत तँ समस्यासँ मुक्तियोतँ भेटत। एक बेर बाबूजीकेँ कटहरक कोआ खेलाक बाद पेट फूलि गेलन्हि, दू बजे रातिमे। ईहो नहि फुराइत छल, जे बगलमे श्रवनजीक बाबूकेँ बजा लियन्हि, जे कोनो डॉक्टरकेँ बजा देताह। फुरायलतँ छल, मुदा कहियो ग्प नहि छल, तँ आइ काज पड़ला पर कहियन्हि, से हियाऊ नहि भेल। माय केबाड़ पीटि कय पड़ोसीकेँ उठेलन्हि, कनैत खिजैत रहलीह। पड़ोसी डॉक्टरकेँ बजओलक, तखन जा’ कय बाबूजीक जान बाँचल। माय श्राप सेहो दैत रहल आ’ ईहो कहैत रहल जे पाँच वर्षक बेटा रहैत छैक तँ सभ भरोस दैत छैक, जे कनैत किएक छी, अहाँकेँ तँ पाँच वर्षक बेटा अछि। आ’ ई सभ .....जाह, अपने भोगबह हमतँ दुनियासँ चलि जायब। बहिन कॉलेजमे पढ़ैत छलीह। कॉलेजक रस्ता पैरे जाय पड़ैत छल। आ’ कॉलेजसँ आँगा स्कूल छल। बहिन कहलन्हि, जे अहूँ सभ संगे हमरा सभक संगे चलू। एक दिन हमरा सभ गेलो रही। मुदा गप बिनु केने हम दुनू भाँय आगू-आगू झटकैत चल गेलहुँ। मोनमे ईहो भव छल, जे छौड़ा सभ चीन्हि नहि जाय जे हमरा सभक ई बहिन छथि। आब ई सोचैत छी जे चिन्हिये जाइत तँ की होइत। अपन व्यक्तित्त्वक विकासक कमी छल ई? बादमे पैघ भेल छी तँ माँ-बापकेँ उकटैत छियन्हि, जे घरघुस्सू आ’ मुँहचुरूक संज्ञा जे देलहुँ अहाँ सभ, कहियो ई सोचलहुँ, जे कोनो पड़ोसीसँ गप्प नहि करबाक, संगी-साथी नहि बनयबाक, घूमब-फिरब नहि करबाक उपदेशक पाछू, जे अहाँ सभ उपदेश देलहुँ, ओकर पाँछा इच्छा समाजक बुराइसँ दूर करबाक उद्द्य्श्य छल, परंतु यैह तँ बनेलक मुँहचुरू आ’ घरघुस्सू हमरा सभकेँ। रातिमे माय बापक झगड़ाक सीन सपनामे देखैत छलहुँ आ’ डरा कय उठि जाइत छलहुँ। पैघ भाय बहिनसँ हमरा खूब झगड़ा होइत छल, मुदा एक बेर माय-बापक झगड़ाक पछति, खूब कानल छलहुँ, खूब बाजल छलहुँ। किछु दिनसँ भाय-बहिनसँ झगड़ाक बाद टोका-टोकी बन्द छल। सभ बेर वैह लोकनि आगाँ भ’ टोकैत छलाह। मुदा एहि बेर हम कानैत-कानैत बहिनकेँ टोकलियैक आ’ फेर कहियो बहिनसँ झगड़ा नहि भेल। भाय पिठिया छल, संगे पढ़ैत छल ताहि हेतु ओकरासँ तँ झगड़ा होइते रहल, मुदा कम-सम। एहि सभ गपक हेतु माँ पिताजीकेँ जिम्मेदार ठहराबथि, जे सभसँ पड़ोसी-संबंधी, जान-पहचानसँ गप करबासँ ओ’ कहियो नहि रोकलन्हि आ’ सभटा दोष पिताक छलन्हि। एक बेर ग्लोब किनबाक जिद्दक बाद कएक बेर समय देल गेल, जे आइ आयत काल्हि आयत। हम पढ़ब छोड़ि देलहुँ। आ’ तखन जा’ कय ग्लोब आयल। बहिन अखनो कहैत छथि, जे ग्लोब अनबाक जिद्दक पूरा भेलाक बाद हमर पढ़ाइक लय टूटि गेल। वर्गमे स्थान प्रथमसँ नीचाँ आबि गेल आ’ पिताजी एकर कारण तंत्र-मंत्रमे ताकय लगलाह। एकटा तांत्रिकसँ भेँट भ’ गेलन्हि। कतेक दिन हमरा सभ गाममे रहैत जाइत गेलहुँ। कॉलोनीमे एकटा एकाउन्टेंट बाबू छलाह। ओ’ बाबूजीकेँ कहलखिन्ह, जे अहाँ तँ घूस नहि लैत छी, मुदा अहाँक पत्नी अहाँक नाम पर घूस लैत छथि। सभ ट्रांसफरक बाद बिहार सरकारक नौकरीमे दरमाहा बंद भ’ जाइत छैक।आ’ ताहि द्वारे सभ ट्रांसफरक बाद बाबूजी हमरा सभकेँ गाम पठा दैत छलाह। एहि क्रममे हमरा सभ गाममे छलहुँ। पिताजीक चिट्ठी माँक नामसँ गाम आयल छल। हमही पढ़ने रही। बाबूजी मायकेँ लिखने छलाह, जे जौँ अहाँ पाइ लेने छी तँ लौटा दियौक। हम विजीलेंसकेँ लिखने छी, छापा पड़त तखन पाइ निकलत तँ बड्ड बदनामी होयत। एहि सभ परिस्थितिमे स्कूलमे हम घरक परिस्थितिकेँ बिसरि जयबाक प्रयास करय लगलहुँ। झुट्ठेकँ हँसय लगलहुँ। ई आदति पकड़ने छी। घरक बड़ाई करय लगलहुँ। लोक सभ बाबूजीक ईमानदारीक तँ चर्चा करिते रहय। हम सभ घरक कलहक विषय घरक बाहर अनबासँ परहेज करय लगलहुँ, लोक बुझत तँ हँसत। आ’ बुझू जे ईमानदारीक ग्लैमरकेँ जिबैत जाइत गेलहुँ। सोचबाक आ’ गुनधुनीक आदति एहन पड़ल, जे सुतैत सपनामे आ’ जगैत लिखबा-पढ़बा काल धरि ई पाँचाँ नहि छोड़लक। दसमामे छमाही परीक्षा किछु दिन पहिने देने छी। कॉमर्सक परीक्षामे एकटा प्रश्न बनेलहुँ। मुदा ओ’ गलत बनि गेल, फेर दोसर अ’ तेसर बेर प्रयास केलहुँ। सभटा प्रश्नक उत्तर अबैत छल मुदा पहिलो प्रश्नक उत्तर पूरा नहि भ’ रहल छल।कॉपीकेँ अंगाक नीचाँमे नुका लेलहुँ। आ’ पानि पीबाक बहन्ने जे बहरेलहुँ, तँ घर पहुँचि गेलहुँ। पढ़ैत-पढ़ैत सोचय लगैत छी। एक्के पन्ना उनटेने घंटा बीति जाइत छल। चिड़ियाखाना गेल रही एक बेर। किछु गोटे,हमर सभक संबंधी लोकनि, ओतय हमरा सभकेँ भेटि गेलाह। बड्ड हाइ-फाइ सभ। ओनतँ कहलन्हि किछु नहि मुदा हुनकर सभक बगेबानी देखि कय, हमरामे हीन भावना आयल।चुप्पे भीड़मे निकलि घरक लेल निकलि गेलहुँ। जेबीमे पाइ नहि रहय से पैरे निकलि गेलहुँ। ओतय चिड़ियाखानामे सभ डराइत रहल जे कतय हरा गेल। सभकेँ कहलहुँ जे सत्ते भोथला गेल रही। सत्त बात ककरो नहि बतेलहुँ। सभ लोक जे भेटय यैह कहय जे अहा, फलनाक बेटा छथि। बेचारे भगवाने छथि। हिनकर पिताक पे-स्लिप बिना पाइयेक बना दियन्हु। पिताजीसँ नहितँ सहकर्मी खुश छलन्हि नहिये ठीकेदार सभ। सहकर्मी एहि ल’ कय जे नहि स्वयं कमाइत अछि, नहिये दोसराकेँ कमाय दैत अछि। पैघभायक गिनती बच्चामे बदमाशमे होइत छल। एक बेर ट्रांसफरक बाद जखन हमरा सभ गाम गेलहुँ, तँ पैघ भाय जे सभक फुलवाड़ीसँ नीक-नीक गाछ उखाड़ि कय अपना घरक आगाँ लगा’ लैत छल, से आब एकहि सालमे दब्बू,सभसँ पाचू बैसनिहार विद्यार्थीक रूपमे गिनतीमे आबि गेल।एहि बेर ट्रांसफरक बादक गाममे गामक निवास किछु बेशी नमगर भ’ गेल छल। फेर मुख्यमंत्री पदक दावेदार एकटा नेताजी जखन गाममे वोट मँगबाक लेल अयलाह, तखन काका हुनकासँ भेँट कएलन्हि, आ’ कहलखिन्ह जे हमर भायकेँ वर्क्ससँ नन-वर्क्स मे ट्रांसफर कए दियौक, बच्चा सभ पोसा जयतैक। नेताजी कहलन्हि जे जौँ हम जीति गेलहुँ तँ ई काज तँ हम जरूर करब। वर्क्समे जयबाक पैरवी तँ बहुत आयल मुदा नन-वर्क्समे जयबाक हेतु ई पहिले पैरवी छी। संयोग एहन भेल जे ओ’ नेताजी जीति गेलाह आ’ मुख्यमंत्री सेहो बनि गेलाह। ओ’ शपथ ग्रहण केलाक बाद ई काज धरि केलन्हि, जे पिताजीक ट्रांसफर कय देलखिन्ह। आ’ हमरा सभ पुनः शहर आबि गेल रही। गाममे रहीतँ एक गोटे जे हमर भायक संगी छलाह, केर गप यादि पड़ि जाइत अछि जे ओ’ ककरो अनका प्रसंगमे कहने छलाह। हुनकर अनुसार हुनकर मायक स्वभाव तीव्र छलन्हि, आ’ ओ’ खेनाइ खाइते काल झगड़ा करय लगैत छलीह। मुदा ओहि दिन ककरो अनका ओ’ आर तीव्र स्वभावक देखने छलाह। खराब आर्थिक स्थितिक उपरांत होयबला कलहक परिणाम हमरो सभ देखि रहल छलहुँ। दू टा घटना आइयो हमरा विचलित कए दैत अछि। एकटातँ इनकम टैक्स कटौतीक मास- मार्च मास। ई घटना तँ सभ साले होइत छल, मुदा कटौती बढ़ैत-बढ़ैत एहि साल धरि आबि कय पूरा मार्च मासक दरमाहा काटि लेलक। माँ कहैत छलीह जे आब भोजन कोना चलय जयतौह। आब भीख माँगय जइहँ ग’ सभ। मुदा बाबूजी एकटा गामक भातिजकेँ पोस्टकार्ड पठेलन्हि आ’ ओ’ आठ सय टाका आनि कय दय गेलखिन्ह, तखन जा’ कय असुरक्षाक भावना खत्म भेल छल। भीख मँगैत अखनो जौँ ककरो देखैत छी तँ मोन कलपय लगैत अछि। दोसर घटना अछि जखन हमरा घरक आँगा एकटा एक्सीडेंट भेल छल आ’ ओकरा बाद हमर भाइ खेनाइ छोड़ि देने छलाह आ’ कानि-कानि कय आँखि लाल कए लेने छलाह। पिताजी जखन बुझबय लगलाह तँ ओ’ जवाब देलन्हि, अहाँकेँ जौँ किछु भय जायत, तखन हमरा सभक की होयत। पिताजी इंश्योरेंस बेनीफिट, जी.पी.एफ., ग्रेच्युटी आदिक हिसाब लगाय भायकेँ बुझेलन्हि जे 99000 रुपय्यातँ तुरत भेटत आ’ फेर महिने-महिने पेंशनो भेटत। लगभग एक घंटा तक बाबूजी भायकेँ बुझबैत रहलाह।
हमरा सभक ओहिठाम एक गोट पीसा आयल छलाह। आइयो घर्मे क्यो अबैत छथि, तँ हम सुरक्षित अनुभव करैत छी। बाबूजीक हुनकर सार भेलखिन्ह से एहि ओहदासँ हँसी सेहो चलि रहल छल। ओ’ कहलन्हि जे हमरे पिताजी जेकाँ ईमानदार एकटा बी.डी.ओ. साहेब झंझारपुरमे छलाह। पिताजी हुनकर मलाह छलखिन्ह, कष्ट काटि अफसर भेलाह। मुदा हमरे सभक घर जेँका हुनको घरमे खाटे टा छलन्हि। पीसा कहलखिन्ह जे कथी ले अफसर भेलहुँ, गाममे रहितहुँ आ’ मचान पर बैसि माछ भात खएतहुँ। माछक कारबारमे फायदा होइत।
बहिनक विवाह बाद घरमे कखनो काल बहनोइ अबैत छलाह। जमायक अबिते देरी माँक झगड़ा पिताजी सँ शुरू भय जाइत छल, किएकतँ घर इंतजाम तँ किछुओ रहिते नहि छल।
ट्रांसफरक बाद पिताजीक अभियान घूसखोरकेँ सजा देबय पर चलल। आ’ जखन सरकारी तंत्र परसँ विश्वास खतम भए गेलन्हि, तखन एकटा तांत्रिकक फेरमे पड़ि गेलाह। घरमे माता-पिताक बीच कलह बढ़ि गेल। एक दिन पिताजीसँ हमरो बहसा-बहसी भए गेल आ’ तीनू भाय बहिन गरा लागि कय कानय लगलहुँ। तकरा बादसँ भाय-बहिन सभसँ झगड़ा होयब समाप्त भय गेल।
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अनेर गुनधुन करैत रही, घरक लगमे पहुँचलहुँ तँ भीड़ देखि मोन हदसि गेल, जे बाबूजीकेँ तँ किछु नहि भ’ गेलन्हि। घरमे पहुँचलहुँ तँ माँ-बहिन सँ पूछय लगलहुँ, जे की भेल? सभ बोल भरोस देबय लगलथि तँ आरो तामस उठय लागल। जोरसँ कानि कय बाजय लगलहुँ जे बाबूजी मरि गेलाह की? कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर। ताहि पर बहिन कहलन्हि जे नहि, हुनका किछु नहि भेलन्हि। अहाँक संगी जे मकान मालिकक बेटा अछि, से ओ’ ओकर चोट भाय , ओकर पिता आ’ रिक्शाबला, चारू रिक्शा पर जाइत छल। बेचारा रिक्शा बला विवाह क’ कय कनियाँकेँ अननहिये छल। एकटा विशाल ट्रक रिक्शाकेँ धक्का मारि देलकैक। ठामहि मरि जाय गेलाह। हमर कानब खतम भय गेल। ई जे आफत आयल छैक से आइ ककरो अनका घर, ओना ओ’ जे मृत भेल छल हमर संग डेढ़ सालसँ स्कूल जा रहल छल प्रतिदिन प्रातः। सभ दिन प्रातः सीढ़ी पर कॉलबेल बजबैत छलहुँ आ’ ओ’ सीढ़ीसँ उतरैत छल, आ’ संगे हम सभ स्कूल जाइत छलहुँ। मोन पड़ल जे काल्हि सेहो सभ दिन जेकाँ हम कॉलबेल बजेने छलहुँ,तँ ओकर बहिन जे चश्मा लगबैत छलि, आ’ झनकाहि छलीह, से ऊपरसँ तमसाकेँ कहलक जे कतेक जोरसँ आ’ देरी तक कॉलबेल बजबैत छी, आ’ सेहो जे बेर-बेर किएक बजबैत छी, आबि रहल अछि। काल्हितँ ओ’ आयल मुदा हम तखनहि कहि देलियैक जे काल्हिसँ हम कॉलबेल नहि बजायब, अहाँकेँ हमरा संगे जयबाक होय तँ नीच उतरि कय आयब आ’ संग चलब। ओ’ नहि आयल तँ हम किएक कॉलबेल बजबितहुँ। डेढ़ सालमे पहिल बेर भेल छल जे हम कॉलबेल नहि बजेने छलहुँ आ’ ओ’ डेढ़ सालमे पहिल बेर स्कूल नागा कएने छल। आब हमरा मोनमे हेबय लागल जे कतहु ओ’ बाजि तँ नहि देने होयत जे हम काल्हिसँ कॉलबेल नहि बजायब। मुदा किंसाइत ओकर कोनो आनो कार्यक्रम होयतैक। किएकतँ चोट भाय आ’ पिताक संग रिक्शासँ कतहु जा’ रहल छल। अस्तु हम चिंतित छलहुँ मुदा दुःखी नहि, मुदा मोनक गप कियो बुझय नहि तेँ मुँह लटकेने ठाढ़ रही।हमतँ मात्र सोचने रही जे काल्हिसँ एकरा संगे स्कूल नहि जायब, जायत ई असगरे। मुदा ओ’ तँ असगरे नहि जायत से सत्य कय देखा देलक। हमर मायक आँखिमे नोर छलन्हि, मुदा हमर भीतर प्रसन्नता,किएकतँ हमर पिताजीक मृत्यु जे रुकि गेल छल।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 3. महाकाव्यमहाभारत (आँगा)

3. महाकाव्य
महाभारत (आँगा) ------
यश छल सुशासनसँ आ’ छल
जन-जीवन अति संपन्न।
छल अहिना दिन बीति रहल
अयलाह नारद एकदिन जखन,
स्वागत भेलन्हि खूब हुनकर
ओहो रहथि आनंदित तखन।
देखल शील-गुण पांडवक
मुदा कहल द्रौपदीसँ सुनू बात ई,
छी पत्नी पांडवक मुदा निवासक
नियम किए नहि बनेने छी,
नारदक बात समीचीन छल
से नियम बनेलथि पाँचो गोटे,
एक-एक मास रहथु सभ लग
द्रौपदी नियम नहि भंग हो।
बारह वर्ष पर्यंत छोड़य पड़त
गृह त्रिटि भेल जौँ,
पालन नियमक होमय लागल
किछु काल धरि ई,
कनैत अएलाह विप्र
एक अर्जुन पुछलन्हि बात की।
चोर छल चोरेने गौकेँ हाक्रोस
विप्र छल करि रहल,
शस्त्र छल गृहमे द्रौपदी संग
युधिष्ठिर जे रहि रहल।
विप्रक शापसँ नीक सोचि
मूरी झुकेने गेल अर्जुन,
शस्त्र आनि छोड़ायल गौकेँ
घुरि आयल गृह तखन।
माँगल आज्ञा युधिष्ठिरसँ दिय’
गृहत्यागक आज्ञा,
नियम भंगक कएल हम अपराध,
की बाजल अहाँ।
अर्जुन ई अपराध लागत
जखन पैघक द्वारा होयत,
छोट भाय कखनो अछि
आबि सकैत बड़ भाय घर।

मुदा निकलि गेलाह अर्जुन
आज्ञा लय माता भायसँ,
भ्रमण देश-कोसक करैत
पहुँचल हरिद्वार गंग तट,
स्नान करैत कल नजरि
छल नागरा कान्याक जौँ,
कोना बचि सकैत पहुँचि
गेलाह पातालक निकट।
विवाह प्रार्थना स्वीकारल
अर्जुन ई छल वरदान भेटल,
जलमे रस्ता बनत चलि
सकब अहाँ व्यवधान बिन।

मणिपुर पहुँचि जतय चित्रांगदा
राजकन्या छलि रूपवती,
विवाहक प्रस्ताव अर्जुनक
स्वीकारल मानल राजा सशर्त,
दौहित्र होयत हमर वंशज
भेल ई विवाह तखन जा कय।

चित्रांगदाक पुत्र भेल बभ्रुवाहन
नाम राखल गेल जकर ई,
परम प्रतापी पराक्रमी योद्धा
बनल बालक पाछू सुनय छी।
फेर ओतयसँ निकलि अर्जुन
पहुँचल प्रभास तीर्थ द्वारका निकट,
शस्त्र-प्रदर्शनक आयोजन केलन्हि
कृष्ण निकट परवत रैवतक।
प्रेम देखि सुभद्रासँ कृष्ण छलाह
सुझओने नव उपाय ई,
अपहरण करब जीतब युद्ध
यादवसँ बनत तखने बात ई।

बनलि सारथी वीर सुभद्रा
संग्राम छल बजरल जखन,
बुझा-सुझा मेल छल करओने
कृष्ण जा कय तखन।
विवाह भेल तदंतर अर्जुन
संग सुभद्रा गएलाह पुष्कर,
पुरल जखन ई वनवास कृष्णक संग पहुँचल इंद्रप्रस्थ।
देखि नववधू प्रसन्न कुंती
आनंद नहि समटा रहल,
द्रौपदीसँ पाँच पुत्र, आ’
अभिमन्यु सुभद्रासँ भेल छल।
बीति छल रहल दिन जखन
अएलाह जीर्ण शरीर अग्नि,
रोगक निदान छल खांडव
वन रहय छल ओ’सर्प तक्षक।

इंद्रक अछि मित्र ओ’ जखन
करैत छी जरेबाक हम सूरसार,
नहि जरबय दैत छथि इंद्र,
करू कृपा अहाँ हे इंद्र अवतार ।
छी प्रस्तुत मुदा अस्त्र अछि
नहि हमरा लग ओतेक,
इंद्र युद्धक हेतु चाही योग्य
शस्त्रक मात्रा जरूरी जतेक।
देल गांडीव धनुष तूणीर
अक्षय वरुणक रथ नंदिघोष,
चलल डाहबाक हेतु अग्नि
पेलाक बाद अर्जुनक तोष।

इंद्र मेघकेँ पठओलन्हि कृष्ण
कएल सचेत जे, वायव्यक
प्रयोग कएल अर्जुन मेघ बिलायल से।

तक्षकक मृत्योपरान्त इज़ंद्र भेलाह
प्रकट ओतय,
माँगल अर्जुन दिव्यास्त्र हु
नकासँ मौका देखि कय।

जाऊ शिवक उपासना करू
दय सकैत छथि वरदान ओ’,
छल मय आयल अग्निक
कोपसँ बचि लग अर्जुनक ओ’।
सेवा करबाक बात छल मोनमे
लेने कृतज्ञ छल ओ’, बनाऊ
सभा भवन अनुपम नहि
बनल जे कतहु हो’।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 2.उपन्यास सहस्रबाढ़नि

2.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि


हमर पुरान जीवनक ई एकटा नीक अनुभव छल। बादमेतँ दुर्घटना तँ हँसी-खेल भ’ गेल, नहि एकरासँ कोनो दुःख होइत छल नहिये कोनो लक्ष्यक प्रति तेना भ’ कय पड़ैत छलहुँ। खेल सेहो वैह नीक लागय जाहिमे टीम नहि रहैत छल वरन व्यक्तिगत स्पर्धा बला क्रीडा नीक लगैत छल। एकर कारण सेहो छल, किएकतँ एहिमे टीमक प्रदर्शन पर व्यक्तिगत प्रदर्शन निर्भर नहि करैत छल आ’ जे बड़ाइ आकि बुराइ भेटैत छल से व्यक्तियेकेँ भेटैत छल। अहाँ ई नहि कहि सकैत छी, जे ओकरा कारण हम हारलहुँ, हमतँ नीक प्रदर्शन कएने रही। स्कूल आ’ पढ़ाइक अतिरिक्त ओना क्रीडाक स्थान न्यूने छल। लक्ष्यक प्रति जे निरपेक्षता बादमे हमरामे आयल छल, से ओहि समयमे नहि छल। ओहि समयमे तँ जगतकेँ जितबाक धुनि छल। द्वितीय स्थानक तँ कोनो प्रश्ने नहि छल। द्वितीय स्थानक माने छल अनुत्तीर्ण भेनाइ। खेलोमे,पढ़ाइयोमे, मारि-पीटमे सेहो।
गाम आन-जान खूब होइत छल। ओहि क्रममे गाम जाइत रही तँ महादेव पोखरि परक स्कूलमे काका शिक्षककेँ कहि अबैत छलाह, आ’ हम चुट्टीयो मे स्कूल जाइत रही। कबड्डी, सतघरिया, लाल-छड़ी ई सभ खेलक नामो तँ शहरक बच्चाकेँ बूझल नहि होयतैक। अस्तु ओतुक्का पढ़ाइक सभ प्रणाली अलग छला। प्रतिदिन करची कलमसँ लिखना लिखयमे देह सिहरि जाइत छल, आ’ रोजनामचा सेहो एहि प्रारे लिखैत रही-भोरे-सकाले उठलहुँ नित्य कार्यक उपरांत जलखइ क’ कय पढबाक हेतु बैसलहुँ, फेर स्कूल गेलहुँ, ओतय सँ एलहुँ, पुनः खेनाइ खेलहुँ। फेर स्कूल गेलहुँ, फेर गाम पर एलहुँ अ’ फेर जलखै कएलहुँ। फेर खेलाइ लेल गेलहुँ। फेर आबि कय लालटेनक शीशाकेँ साफ केलहुँ, फेर पढ़लहुँ आ’ फेर भगवनक नाम लय सूति गेलहुँ।रवि दिनक छुट्टीक बदला सोम दिन दू दिनक रोजनामचा लिखि कए ल’ जाय पड़ैत छल। 15 अगस्तक उत्साह सेहो दोसरे तरहक छल। साँझ-आ’ भोरमे 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस, भारत माताक जय केर संग सभ महापुरुष लोकनिक जय करैत जाइत छलहुँ। मुदा मास्टर साहबक ई गप नहि बुझना गेल छल जे मारि-पीट नहि करैत जइह’। मुदा जखन भोरमे जयक नाद गामक सीमान पर सँ जाय काल जखन भेल त्खन पता चलल जे ई गप मास्टर साहब किएक कहने छलाह। महिनाथपुरक स्कूलक बच्चा सभ जखने ओम्हरसँ अबैत रहय आकि मारि बजरि गेल। कोनहुना झोप ताप कएल गेल। फेर गाम पर जे अएलहुँ तखन पुरनका बैचक विद्यार्थी सभ अपन खिस्सा शुरू कएलक ज कोना पोखरिमे घुसा-घुसाकेँ केराक थम पानिमे द’ कय स्वतंत्रता दिवस दिन मार्ने रहथिन्ह अनगौआँ केँ, फेर ओहो सभ दोसर साल बदला लेबाक ताकिमे छल मुदा अहू बेर...।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)

1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
अग्ना-शैला सँ शुरू होइत अछि दोसर भाग। 10000 ई.पू.।भाषाक आरंभक प्रारंभ मायानन्द मिश्र एहिमे प्रकट कएने छथि।एहिमे बड्ड नीकजेकाँ संकेत भाषासँ ध्वनिक संबंध परिलक्षित कएल गेल अछि। चलंत सँ स्थिर जीवनक शुरुआत सेहो देखायल गेल अछि। तकर बाद शैला कराली अध्यायक प्रारंभ होइत अछि। 7500 वर्ष पूर्वसँ। गौ पालनक चर्चा होइत अछि, गायक संख्यामे पर्याप्त वृद्धि भेल छल। सभ रहथि चरबाक, चर्म वस्त्र्धारी आ’ कटिमे पाथरक हथियार। भेड़, बकरी आ’ सुग्गर छल किछु आन पोसिया जंतु जात। घासक रस्सी, त्रिशूल आ’ नागदेवक चर्चा होइत अछि। बाक नाम आब भ’ जाइत अछि, ओजा। दलाग्राक नाम पड़ैत अछि शैला कराली।पशुक संख्या बढ़ल तँ पशुक चोरि सेहो शुरू भ’ गेल।पीपरक गछक नीचाँ बैठकीक शुरुआत भेल। करालीकेँ अंबा नाम पड़ल।
कराली-महेष अध्यायमे 5000 ई.पू. मे कृषिक प्रारम्भ देखाओल गेल अछि। महेष बीया बागु कए रहल छथि। जवकेँ पका क’ खयबाक चर्चा होइत अछि। आब धारक नाम सेहो राखय जाय लागल।महेष कुल द्वारा पोस केर माँस खेनाइ तँ एकदम निषिद्ध भ’ गेल।ओजा लिंग स्थानमे बैसल रहैत छलाह।
तकर बाद महेष-पारवती अध्याय शुरु होइत अछि 4 सँ 5 हजार वर्ष पूर्व।धानक फसिलक प्रारंभ भेल।पारवती जहिया अयलीह तहिया लाल माटि माथमे ओतुक्का प्रथाक अनुसार लगा देल गेल। पुत्रक नाम गणेष पड़ल। एहिसँ पहिने संतानक परिचय नहि देल जाइत छल।

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 )

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008
संपादकीय
वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4
विदेहक एहि अंकमे सभ नियमित स्तंभ देल गेल अछि। आब ई पत्रिका चलि पड़ल अछि। पहिलुका अंक सभमे किछु टंकणक अशुद्धता दृष्टिगोचर भेल छल। एहि अंकमे ओकर विशेष ध्यान राखल गेल अछि, कारण साहित्यिक पत्रिकामे अशुद्धिक कोनो स्थान नहि छैक।
विश्वक कोन-कोनसँ ई-मेल प्राप्त भेल, आ’ हम आह्लादित भय गेल छी। ई पत्रिका बिना कोनो विलंबक सालक- साल चलैत रहत, से हम अपने लोकनिकेँ विश्वास दैत छी, आ’ ओ’ आबय बला काल सिद्ध करत।
विशेष की कहू। अगिला सप्ताह हम दरभंगा जायब, अपन भतीजीक विवाहमे। ओतय मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट आ’ संस्कृत विश्वविद्यालयक भ्रमण करब आ’ देखैत छी, जे कोन नव अलभ्य चीज लभ्य होइत अछि।
चित्रक पौतीकेँ दू भाग कए देल गेल अछि, मिथिलाक खोजमे चित्रकलाक संग पुरातत्त्वक वस्तु सभक आ’ दर्शनीय स्थान सभक संकलन अछि। मिथिला रत्नमे ऐतिहासिक आ’ वर्त्तमान महापुरुषक चित्रक प्रदर्शनी अछि।एहि संकलनकेँ एहिना सहयोग दय बढ़ाऊ। मैथिलीमे एनीमेशनक घोर अभाव अछि, आ’ जौँ कही जे अछिये नहि, तँ झूठ नहि होयत। संगीत आ’ संस्कृत शिक्षा सेहो ध्वन्यात्मक सामग्रीक बिना अपूर्ण लगैत अछि। अहू दुनू दिश हमर प्रयास शीघ्रे जायत, अपने लोकनिसँ तकनीकी सहयोगक आशा करैत छी। हमर इच्छा अछि, जे बालानां कृतेमे देल गेल खिस्साकेँ एनीमेट करी।
डा. धनकर ठाकुर हमरा एकटा ई-मेलमे हमर गामक (मेहथ, झंझारपुर) एकटा नाटककार आनंदक विषयमे पुछने छलाह, जे ओ’ आइ काल्हि कतय छथि। से ओ गामेमे रहैत छथि। संभव होयत तँ हुनकर कोनो कृति शीघ्रे ‘विदेह’मे ई-प्रकाशित होयत। हम 1993-94 मे राँचीमे नोकरी करैत छलहुँ। अपन एकटा परिचितक संग श्यामलीमे एक गोट डॉक्टर साहेबसँ भेँट भेल छल, ओ’ धनकरे जी छलाह । अस्तु धनकरजीक पिताजीकेँ भगवान उच्च भगवत पद देथुन्ह, से कामना करैत छी।
एनीमेशन आ’ माइक्रोसॉफ्ट एस. क्यु. एल. डाटाबेसमे ई लोकनि, आ’ ज्योति नारायण लालजी,ब्रज कर्ण, मणि ठाकुर आ’ आन पाठक हमरा तकनीकी मदति करताह से हम आशा करैत छी। श्री गंगेश गुंजनक ईमेल आ’ मार्ग निर्देशन प्राप्त भेल, ओ’ अपन रचना पठेबाक आश्वासन सेहो देलन्हि अछि। विद्यानंद जी पञ्जीकार जी अपन निबंध पठेने छथि, से आब बुझना जाइत अछि जे रचनाक भरमार लागय बला अछि। सभटा रचना उच्चस्तरीय रहत आ’ पत्रिका पाक्षिक आधार पर नियमित चलैथ रहत से आशा करैत छी।

साइटक खोज सर्च इंजन पर आसानीसँ होय ताहि हेतु किछु विशेष प्रयास कएल गेल अछि। एहि संबंधमे कोनो तकनीकी सुझाव जौँ अपनेक समक्ष होय, तँ से आमंत्रित अछि।


अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
नई दिल्ली 15/02/08 গজেন্দ্র ঠাকুব



विदेह 15 फरबरी 2008 वर्ष 1 मास 2 अंक 4
एहि अंकमे अछि:-
1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
3. महाकाव्य
महाभारत (आँगा)
4. कथा
5. पद्य (आँगा)
6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा)
8. संगीत शिक्षा
9. बालानां कृते
10. पंजी प्रबंध (आँगा) - लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार
11. मिथिला आ’ संस्कृत

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
13. रचना लिखबासँ पहिने... (आँगा)
14. प्रवासी मैथिल English मे

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 14.आऽ अंतमे प्रवासी मैथिलक हेतु अंग्रेजीमेVIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT(आगाँ)

14.आऽ अंतमे प्रवासी मैथिलक हेतु अंग्रेजीमे
VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT(आगाँ)


Siradhvaja is a famous king of Videha for several reasons. His adopted daughter, Sita, was married to Rama. Ramayana is devoted to this important event of the alliance between the Ikshvakus and the Videhas.The story is narrated by the Mahabharata also. The Great Epic does not call him Siradhvaja, but Videharaja and Janaka. His great fame and scholarship misled Bhavahhuti, the celebrated Sanskrit dramatist of a much later period, who confused him for the Vedic Janaka.Siradhvaja was also a good fighter.Thus he specialised in the arts of war as in those of peace.Siradhvaja had one son -Bhanumat- one adopted daughter, Sita, and one daughter Urmila. His brother Kushadhvaja had two daughters-Mandavi and Srutakirti. Siradhvaja ascended the throne after his father Hrasvaro-man left for the forest.He kept his younger brother under his special care.Once while Siradhvaja was ploughing the mead, there arose a damsel and as he obtained her while furrowing the field for sacrifice, she came to be known by the name of Sita, arising from the earth she grew as his daughter.The greater part of her education 'was post-marital, and most likely influenced by her husband and by the special environments of her long periods of exile from court. Yet the first nine or ten years of Sita's life were not left blank.She was certainly literate. The script she learnt was perhaps pictographic. She knew three languages, at least two of which were begun in her childhood. Besides studying many branches of learning, she had a lot of instruction from her mother and other relatives about wifely duties.A valuable and attractive possession of Siradhvaja was a bow of Siva which his ancestor Devarata had received as a trust from the gods. These two Sita and the bow became sources of his friction with contemporary kings. The Buddhist reference that makes Rama brother and husband of Sita is historically right, the origin of the modified version discloses itself in Sita's appellation janaka¬duhita .The proper name Janaka was a very easy one, and had the merit of supplying a plausible and honourable connection for the subsequently deified tribal hero, while removing the objectionable feature smoothly. Sh.S.C.sarkar opines that Siradhvaja may have been hit upon as a suitable Janaka for the Janaka-duhita, because of the connection between 'Sita' and 'Sira'. Another sug¬gestion made by the same scholar twenty years later is that Sita was Vedavati's illegitimate, abandoned child, found and adopted by her Vedavati's generous uncle, Siradhvaja. Siradhvaja vowed that he would give his daughter only to him who would be able to string the bow. The kings, who failed to do this laid siege to Mithila and oppressed the town. This went on for a year. Much of the wealth of Siradhvaja was uselessly spoiled. Later he made exertions, received a four-limbed army and defeated the kings who fled away with their ministers.But the troubles were not over with this episode. Sudhanvan, king of Sankisa invaded Mithila and demanded the bow of Siva as well as the beautiful Sita. He was resisted and ultimately defeated. Sudhanvan was killed in battle. Sankisa became an appendage to Videha. A branch dynasty was established there with his younger brother Kusadhvaja as the king of the territory.Siradhvaja then announced the performance of a ceremony regarding the bow. Visvamitra, who had brought two sons of king Dasaratha of Ayodhya to have his Ashrama area in South Bihar cleared of Rakshasas, heard of this and the party decided to see this ceremony for themselves.The Ramayana of Valmiki furnishes us with certain clues which enable us to trace the route of the party consisting of Vishwamitra, Rama and Lakshmana from Ayodhya to Siddhasrama,modern Sahasram, and from there to the capital of Videha.The marriage of Rama and Sita was performed on the twentyfifth day of the journey from Ayodhya. The fifth day of the bright fortnight of the month of MargaShirsha is univer¬sally regarded as the date of the marriage of Rama and Sita.The journey began on the eleventh day of the bright half of the month of Kartika. But it is stated that on the eleventh day of the journey the moon was visible after midnight.So it was probably the eighth day of a dark fort¬night. The two dates will disappear and two other dates will be repeated, one of the disappeared dates falling after the fifth day of the bright half of Margashirsha in which period we are not interested.Such a phenomenon is very common in the Hindu calendar in which two dates disappears and two other dates gets repeated.The party travelled for half a yojana from Ayodhya and in the night on the bank of the Sarayu. They reached the confluence of the Sarayu and the Ganges and spent the night there.They crossed the confluence and came to the southern shore of the Ganges. Taraka, the wife of Sunda, was killed.They reached the Siddhashrama which was near a hill, and preparations for the sacrifice began. The night was passed there guarding the Ashrama. The sacrifice lasted for six days. On the last day of the sacrifice the invading Rakshasas were killed, The night was passed there. Now that the sacrifice was over, they wanted to visit Mithila.The bow of Shiva was kept there. So they started from the Siddhashrama and travelled till the evening. They halted on the Sopa's distant shore. When the sage was telling tales to the princes it was past midnight and the moon was rising forth.So perhaps it was the eighth day of a dark fortnight. It was the eighth day of the dark fortnight of Margashirsha. Then they reached the southern shore of the Ganges where the night was passed. They crossed the Ganges and reached the northern shore. While sitting on the bank of the Ganges they saw a big city. Soon they went to Vaisali. They accepted the hospitality of king Somali of Vaisali and passed the night there,the party reached Vaisali on the tenth day of the dark fortnight of Margasirsha.They left Vaisali and proceeded towards Mithila..They halted at the ashrama of Gautama,where Ahalya was rescued. They then reached the place of sacrifice,which was at some distance from Mithila. Vardhamana Mahavira, the twenty fourth Tirthankara of the Jainas, left his home for asceticism on the tenth day of the dark fort¬night of Margasirsha. Thus Vardhamana's renunciation of the world on a date associated with the visit of Rama to Vaisali assumes double significance which has so far escaped notice.Then it was stated there by Janaka that now there were only twelve days to complete the sacrifice.The bow was shown and its history explained. It was broken by Rama. Messengers were sent immediately to Ayodhya on very swift conveyances.The messengers passed three nights on the way.The messengers reached Ayodhya and king Dasarathaa was informed. He decided to start next day. The night was. passed at Ayodhya.The party of Dasaratha started for Mithila.Four days were passed on the way.
The party arrived at Mithila where the night was passed.Kusadhvaja was brought from Sankasya. The marriages of the daughters of Siradhvaja and Kusadhvaja took place on the fifth day of the bright fortnight of Margasirsha.The party of Dasaratha went back to Ayodhya thus the matrimonial alliance bet¬ween the two most important houses of the Ikshvakus in North India was accomplished.The reign of Siradhvaja seems to have marked a further advance in the consolidation of the Videhan territory. Dhanusha, a place in Nepal, now overgrown into jungle, six miles away from Janakpur, is believed to be the place where the bow of Siva was broken by Rama. A bow is still shown there in mark the memory of that great event.Some parts of the Champaran District were brought under his control. Local tradition says that king Janak lived at Chankigarh, locally known as Jankigarh, eleven miles north of Lauriya Nandangarh. The name Janaki suggests that this Janaka may have been Janaki's father Siradhvaja, who otherwise too is known as a valiant prince. The Mahabharata speaks of a battle between king Janaka Maithila and king Pratardana. The Ramayana makes one Pratardana king of Kasi and a contemporary of Rama.A more famous Pratardana of Kasi flourished 24 steps earlier. Sankasya was a well defended city. Its ramparts were rang¬ed round with pointed weapons. It appears that the messengers of Siradhvaja Janaka went to Sankisa and brought Kusadhvaja to Mithila the same day,it was near Videha probably somewhat near its border.Sankisa was situated on the Ikshumati river. This river is known to the Puranas also, as on its bank was the hermitage of Kapila. It is also mentioned at another place in the Ramayana. The lkshu is the name of three rivers in the Puranas, while there are also rivers known as Ikshuda and Ikshula.Thus there might be another Ikshumati river at this place or it may simply mean a river in the sugarcane produc¬ing area.The Sankasya kingdom was near some moun¬tain or forest,as a later king of this place visited his cousin in the forest.There was no intervening territory between Videha and Sankisya otherwise the Sankasya king would have been prevented from carrying out a raid against Mithila.A quick messenger from Mithila went to Sankisya and came back the same day,the
distance was comparatively shorter.It was a well-defended city and a seat of government. One such place near the Gandak or the Kosi might be Sankasya.Jankigarh (also called Chankigarh) in Champaran district may be a probable site for this purpose.The genealogy of the Sankasya branch of the Janakas is given by three Puranas and is as follows Kusadhvaja,Dharmadhvaja and Mitadhvaja. Kusadhvaja was the younger brother of Siradhvaja.There was good relation between the two brothers.When Sudhanvan, the king of Sankasya, invaded Mithila and was slain in battle, Siradhvaja installed his younger brother on the throne of Sankasya. This event did not happen long before the marriage of Sita, because while invading Mithila Sudhanvan had demanded Shiva's bow and lotus eyed Sita. After the party of Dasaratha had arrived at Mithila, Janaka sent messengers to Kusadhvaja at Sankasya to bring him to the Videhan capital. Kusadhvaja came immediately and being incharge of the sacrifices took active part in the performance of the marriages. Sita and Urmila the daughters of Siradhvaja were married to Rama and Lakshmana respec¬tively. Mandavi and Srutakirti the two daughters of Kusa¬dhvaja were married to Bharata and Satrughna respectively. Thus the four daughters of Mithila were married to the four sons of Dasaratha amidst great festivities.The Ramayana knows of a girl named Vedavati daughter of Kusadhvaja who was molested by Ravana. Thereupon she mortified herself by cutting off her hair and immolated herself on a pyre. S. C. Sarkar regards this Vedavati as the daughter of Kusadhvaja, the younger brother of Siradhvaja of Mithila which is not tenable because Kushadhvaja Vedavati's father is never called a Maithila but had been called a Brahmarsi and a son of Brihaspati. Kushadhvaja, father of Vedavati was killed by Sambhu, king of the Daityas. Later Vedavati, having been molested by Ravana, burnt herself to be reborn as Sita.Thus Kushadhvaja was dead before the birth of Sita. How could then he be instal¬led on the throne of Sairkabya and take part in the marriage ceremony of Sita, Urmila and his two daughters? Vedavati is stated to have flourished in the Krita Yuga, while Kushadhvaja of Mithila flourished in the Treta age.Vedavati is said to have been reborn in the Maithila¬ kula now,hinting thereby that while Vedavati she belonged to some other family.Siradhvaja and Kushadhvaja never mention Vedavati’s name in any connection.The Brahmavaivarta Purana which gives in detail the story of Kusadhvaja’s daugh¬ter Vedavati being ravished by Ravana. There Kushadhvaja is not the younger brother of Siradhvaja, king of Mithila, but quite a different personality. It is stated there that in the Krita age there was Hamsadhvaja who had two sons Dharmadhvaja and Kushadhavja. The latter's wife was Malavati who gave birth to Vedavati. Vedavati in her youth was molested by Ravana.She was reborn as Sita. Bhanumat was the son of Siradhvaja and the brother of ¬Sita and Urmila. He is called a Maithila by puranas and did not belong to the Sankasya line but to the Mithila one.S. C. Sarkar makes an original suggestion with regard to Bhanumat. He says that Hanumant of later legends is an amalgam of two elements-Bhanu-mant, son and successor of Siradhvaja, at Mithila,prime assister in the rescue of Sita and Au-manti, a Dravidian deity.The name meaning the male monkey,vedic Vrisha Kapi. He is called Satadyumna by some Puranas and Pradyumna by some other Puranas. In two Mahabharata lists of royal munificence to Brahmanas it is said king Satadyumna gave a splendid furnished house to the Brahmana Maudgalya, descendant of king Mudgala of North Panchala. The only Satadyumna mentioned was a king of Videha, Siradhvaja's second successor. Hence although his territory is not indicated, this Satadyumna appears to be the same as Siradhwaja's second successor. The Bhagavata and the Vishnu, the Vayu, the Brahmanda and the Garuda parunas deals with Janaka dynasty all the pre¬ Bharata war dynasties.Arishtanemi is also called Adhinemika. The second part of his name,Nemi, i.e., Nimi dynasty to which he belonged.The MahaJanaka II of the Jataka and Nami of the Jaina Uttaradhyayana do not care for the burning of the palaces of Mithilathe mention of Nemi in juxtaposition with Arishta in the Vishnu Purana- Nami or Nemi with MahaJanaka II, whom the Jataka represents as the son of Arittha,ArishtaNemi Janaka of the Purana, MahaJanaka II-son of Arittha Janaka- of the Jataka and Nami of the Jaina Uttaradhyayana are identical. Maha Janaka II and Nami of the Utaradhyayana Sutra belong to the era posteri¬or to the Bharata War.MahaJanaka II, being son of Arittha was Arishta and not ArishtaNemi. One Kshemadarsin, a prince of Kosala, was advised by Kalakavrikshiya to take help from Janaka of Mithila for recovering his kingdom.The king of Videha, on the recom-mendation of the sage, accepted Kshemadarsin, honoured him and gave him his own daughter and various kinds of gems and jewels. Kshemadarsin recovered his kingdom and made Kalakavrikshiya his priest who performed many sacrifices for the king. Upagupta or Ugragupta was Ugrasena Janaka Aindradyumni of Videha at whose court Ashtavakra, son of Kahoda and Sujata,daughter of Uddalaka Aruni, defeated the Suta scholar Vandin and consequently relieved his father after twelve years of confinement.The probability is that Upagupta (or Ugragupta) and Ugrasena were one and the same person and that he was ruling at one of the two principalities into which Videha was divided between the two branch dynasties that issued from Kuni. In the same way, Sankasya was divided between Kesadhvaja and Khandikya. But Ugrasena Aindradyunini, a con-temporary of Ashtavakra, Uddalaka's daughter's son, flourished after the Bharata War, while Upagupta of the Puranas, far removed from Bahulasva, a contemporary of Krishna, flouri¬shed much before the War. The Mahavamshsa furnishes a list of twentyeight early kings and says that these twentyeight princes dwelt in Kusavati, Rajagriaha and Mithila.The Dipavamshsa also gives an identical list and says that these were twentyeight kings by number- in Kusavati, in Rajagriha and in Mithila. The rulers belonged to the pre Bharata Age.

(to be continued)

- সিদ্ধিবস্তু-

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 13.रचना लिखबा सँ पहिने...आगाँ)

13.रचना लिखबा सँ पहिने...आगाँ)

II.

पछिला बेर मात्रिक छंदक जानकारी लेने छलहुँ। आब वार्णिक छंद पर आबी।
पहिने छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ’ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्र आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ , वा ।

1. सभटा ह्रस्व स्वर आ’ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।
2. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ’ एकर संकेत अछि , ऊपरमे एकटा छोट -।
3. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।
4. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ’ स दुनू गुरु अछि।
5. (अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 12.भाषा आऽ प्रौद्योगिकी(कंप्युटर,छायांकन,कीबोर्ड/टंकणक तकनीक)

12.भाषा आऽ प्रौद्योगिकी(कंप्युटर,छायांकन,कीबोर्ड/टंकणक तकनीक)



देवनागरीमे टाइप करबाक हेतु पछिला अंकमे देल सॉफ्टवेयरक अतिरिक्त एकटा आर टूल अछि जे नम्नलिखित लिँक पर उपलब्ध अछि। एकर विशेषता अछि एकर संस्कृत की-बोर्ड जे आन कोनो सॉफ्टवेयर पर उपलब्ध नहि अछि। एहिमे उदात्त,अनुदात्त केर आ’ किछु आन संस्कृतक अक्षर उपलब्ध अछि। एकर बराह दाइरेक्ट आदि रूप सेहो अछि, मुदा जौँ कोनो विशेष प्रयोजन नहि हो तँ मात्र बाराह आइ.एम.ई केर प्रयोग मात्र करी।
स॑ , स॒ , स॓ , सऽ कें स लिखलाक बाद सिफ्ट ३,२,४ आऽ ७ दबेलासँ लिखि सकैत छी।
http://www.baraha.com/BarahaIME.htm

तिरहुता लिपि लिखबाक हेतु एहि लिंक पर जाऊ।
http://www.tirhutalipi.4t.com/

मुदा एकरा हेतु अही लिंक पर जे प्रीति फॉंन्ट छैक तकरा सेहो डाउनलोड करी आ’, दुनू केँ हार्डडिस्क ड्राइव C/windows/fonts मे पेस्ट कए दिय। एहिमे जे फॉन्ट अछि से Ascii मे अछि। क्रुतदेव , शुशा ई सभ फॉण्ट सेहो एहि तरहक अछि, पहिने उपयोगी छल मुदा आब सर्च इंजिनमे यूनिकोड-यू.टी.एफ.8 केर सर्च होइत छैक आ’ Ascii मे लिखल देवनागरीक सर्च नहि भय पबैत अछि। विन्डोजमे मंगल फॉन्ट अबैत छैक, आ’, एहिमे लिखल देवनागरी सर्च भय जाइत अछि। मिथिलाक्षरक यूनीकोड रूपक आवेदन (अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल गेल) लंबित अछि।

(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 11.मिथिला आऽ संस्कृत- दरिभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता(आगाँ)

11.मिथिला आऽ संस्कृत- दरिभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता(आगाँ)

मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।...जे जुआ खेलायब आ’ पांगना संगम ईएह दूटा केँ संसारक सार बुझैत छथि। असज्जति मिश्र पुछैत छथि जे के वादी आ’ के प्रतिवादी।स्नातक उत्तर दैत छथि-जे अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकहुँ आ’ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करैत छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि, जे ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ’ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ , जे ई तँ असले धूर्तसमागम भय गेल।

विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइत छथि।

एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मँगैछ। ओ’ हुनका असज्जातिमिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जातिमिश्रकेँ अनंसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लय असज्जति मिश्रकेँ गतानि कए बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ’ बेहोश भय जाइत छथि। ओ’ हुनका मुइल बुझि कय भागि जाइत अछि।
विदूषक अबैत अछि, आ’ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ’ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि, आ’ जे किछु आन प्रिय कार्य होय तँ से कहू। असज्जाति कहल जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलहुँ, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, एहिसँ प्रिय आब किछु नहि अछि। तथापि सर्वत्र सुखशांति हो तकर कामना करैत छी।

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मिथिलामे संस्कृतक स्थिति-
मिथिला क्षेत्रमे निम्न संस्थान कवि गुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय,रामटेकसँ मान्यताक आवेदन कएल अछि। जेना बिहार विद्यालय परीक्षा समितिक अस्तव्यस्तताक कारण केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्डक मान्यता प्राप्त स्कूलक संख्या बढ़ल तहिना दरभंगाक संस्कृत विश्वविद्यालयक अस्तव्यस्तताक कारण नीक संस्थान सभ मान्यताक लेल बाहरक दिशि देखलक अछि।
1.J.N.B. Sanskrit Vidyalaya Bihar Post Lagma (R.B.Pur) Via-Lohna Road, Dist. Darbhanga
2.Laxmiharikant Sanskrit Prathamik,Madhyamik Vidyalaya,Post. Jhanjharpur Bazar, Dist.Madhubani,
3.Ajitkumar Mehta Sanskrit Shikshan Sansthan Post Ladora, Dist. Samastipur.
4.Dr.Mandanmishra Sanskrit Mahavidyalaya,Post Sanjat, Dist.Begusarai
5.Saraswati Adarsha Sanskrit Mahavidyalaya,Begusarai
6.Dr.R.M.Adarsha Sanskrit Mahavidyalaya,P.O. Malighat, Mujaffarpur

एकर अतिरिक्त राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली निम्न विद्यालय सभकेँ ग्रांट दय जीवित रखने अछि।
1.J.N.B. Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya, PO. Lagma, Via - Lohna Road, Distt - Darbhanga.
2.Laxmi Devi Saraf Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya, Kali Rekha, Distt- Deoghar.
3.Rajkumari Ganesh Sharma Sanskrit Vidyapeetha, Kolahnta Patori,Distt - Darbhanga
4.Ramji Mehta Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya,Malighat, Muzaffarpur.

एहिमे लगमाक विद्यालय कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय सँ मान्यता मँगलक अछि, कियेकतँ दरभंगाक वि.वि. मे एहि तरहक कोनो परियोजनाक सर्वथा अभाव अछि।

तीस वर्ष पहिने हिन्दीमे डा. रामप्रकाश शर्म्मा लिखित मिथिलाक इतिहास सेहो प्रकाशित भेल रहय। आजुक दिन नहि तँ एकरा अपन वेबसाइट छैक नहिये दूर शिक्षाक कोनो परियोजना।

(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 10.पंजी-प्रबंध(आगाँ)

10.पंजी-प्रबंध(आगाँ)


19 गोट गोत्र आ’ 243 मूल ग्राममे मुख्य मूल 34 टा निर्धारित कएल गेल। एहि 243 ग्रामसँ सेहो ई सभ विभिन्न क्षेत्र आ’ ग्राममे पसरलाह।
19 गोट गोत्र निम्न प्रकारे अछि: 1. शाण्डिल्य 2. वत्स 3. सावर्ण
4. काश्यप 5. पराशर 6. भारद्वाज 7. कात्यायन 8. गर्ग 9. कौशिक 10. अलाम्बुकाक्ष 11. कृष्णात्रेय 12. गौतम 13. मौदगल्य 14. वशिष्ठ 15. कौण्डिन्य 16. उपमन्यु 17. कपिल 18. विष्णुवृद्धि 19. तण्डी
मुख्य 34 मूल सेहो तीन श्रेणीमे विभक्त अछि।
श्रेष्ठ-प्रथम श्रेणीमे 1. खड़ौरे, 2. खौआड़े, 3. बुधबाड़े, 4. मड़रे, 5. हरिहरे, 6. घसौते, 7. खिसौते, 8. कमहे, 9. नरौने, 10. वमनियामै, 11. हरिअम्मे, 12. सरिसवै, 13. सोदरपुरिये.
द्वितीय श्रेणीमे 1. गंगोलिवार, 2. पगौलिवार, 3. कजौलिवार, 4. अड़ेवार, 5. वहड़िखाल, 6. सकड़िखार, 7. पलिवार, 8. विसेवार, 9. फनेवार, 10. उचितवार, 11. पडुलवार, 12. कटैवार, 13. तिलैवार.
मध्यम मूल- 1. दिद्यवे, 2. बैलेचै, 3. एकहरे, 4. पंचोभे, 5. वलियासे, 6. जमजुआले, 7. टकवाले, 8. घड़ुए.

प्रवर
मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि।
एहि प्रकारेँ गोत्रानुसारे प्रवर निम्न प्रकार भेल:-
त्रिप्रवर- 1.शाण्डिल्य, 2.काश्यप,3. पराशर, 4. भारद्वाज, 5. कात्यायन, 6. कौशिक, 7. अलाम्बुकाक्ष, 8. कृष्णात्रेय, 9. गौतम, 10. मौदगल्य, 11. वशिष्ठ, 12. कौण्डिन्य, 13. उपमन्यु, 14. कपिल, 15.विष्णुवृद्धि,16. तण्डी।
पंचप्रवर- 1. वत्स, 2. सावर्ण, 3. गर्ग।
प्रवरक विस्तृत विवरण निम्न प्रकारेँ अछि- 1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स---] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन।
3. सावर्ण--] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन।
4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस.

एहिमे सावर्ण आ’ वत्सक पूर्वज एके छथि ताहि हेतु दू गोत्र र्हितो हिनका बीच विवाह नहि होइत छन्हि। छानदोग्य आ’ वाजसनेयक वैदिक युगीन उर्ध्वाधर विभाजन एकर संग रहबे कएल, आ’ यज्ञोपवीत मंत्र दुनूक भिन्न-भिन्न अछि। फेर यज्ञोपवीतमे तीन प्रवर आकि पाँच प्रवर देल जाय ताहि हेतु उपरका सूचीक प्रयोग कएल जाइछ।
(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 9.बालानांकृते-2. महुआ घटवारिन

9.बालानांकृते-



2. महुआ घटवारिन

महुआ घटवारिन परी जेकाँ सुन्दरि छलीह,जेना गूथल आँटामे एक चुटकी केसर, मुदा सतवंती छलीह। बाप गँजेरी शराबी आ’ माय सतमाय,मैभा महतारी, नजरि चोर। घरमे सतमायक राज छल। सोलह बरखक भय गेल रहथि मुदा हुनकर बियाहक चिंता ककरो नहि रहैक। परमान नदीक पुरनका घाटक मलाह प्र्रर्थना करैत छथि जे महुआक नावकेँ किनार लगा दियौक। साओन-भादवक, भरल धार, कम वयसक महुआ नहि जाऊ, एहि राति खेबय लेल नाव।

एहने साओन-भादवक रातिमे सतमाय घाट पर उतरल वणिक् केँ तेल लगेबाक हेतु महुआकेँ पठबय चाहैत अछि, आ’ ओ’ जाय नहि चाहैत अछि। अपन मायकेँ यादि करैत अछि,
नोन चटा केँ किए नहि मारलँह, पोसलँह एहि दिन खातिर।
मुदा सतमाय साओन-भादवक रातिमे पथिककेँ घाट पार करबाबय लेल महुआकेँ पठा देलक। महुआ बिदा भेलि आ’ बीच रस्तामे अपन सखी-बहिनपा फूलमतीसँ भरि राति गप करैत रहल। केहन माय अछि जे रातिमे घाट पार करेबाक लेल कहैत अछि। माय ईहो कहलक जे पथिक पाइबला होय आ’ बूढ़ होय तँ ओकरा तेल-मालिस करबामे कोनो हर्ज नहि। ओकर मोनमे जे होय भेल तँ ओ’ पिते समान, ओकरा जेबीसँ चारि पाइ निकालि लेल जाय, अहीमे बुधियारी अछि। फूलमती कहलक- घबरायब नहि। जरेने रहू प्रेमक आगि , ओकरा लेल जे मोरंगमे आँगुर पर दिन गानि रहल अछि।
मोरंगक नाम सुनि महुआ उदास भय गेलि। ओ’ फागुनमे आयत।
भोरहरबा ओ’ गामपर पहुँचल आ’ माय दस बात कहलकैक। बाप नशामे आयल तँ माय ओकरो लात मारि भगा देलकैक। तखने हरकारा आयल आ’ मायक कानमे संदेश देलक। महुआ मायकेँ कहलक जे अहाँ जे कहब से हम करब। वणिक् क आदमी आयल छल,ओकरा संग महुआ घाट पर पहुँचल। वणिक् दू सिपाहेक संग नावमे बैसल। महुआ नाव खेबय लागलि। मुदा ओकरा नहि बूझल रहय जे ओकरा बेचि देल गेल छैक। सिपाही ओकरासँ पतवारि छीनि लेलक। सौदागर ओकरा कोरामे बैसाबय चाहलक, तँ ओ’ छरपटाय लागलि। सिपाही कहलक जे सभटा पाइ चुका देल गेल अछि, अहाँकेँ कोनो मँगनीमे नहि लय जा रहल छथि। महुआ स्थिर भय गेलीह। ओ’ सभ बुझलक जे महुआ मानि गेल अछि। तखने महुआ धारमे कूदि पड़लि। उल्टा धारमे मोरंग दिशि निकलि जाय चाहलक महुआ, जतय ओकर प्रेमी अछि, ओकरा लेल सात पालक नाव लेने। सौदागरक छोटका सिपाही महुआकेँ प्रेम करय लागल छल, ओहो कूदि गेल कोशिकीक धारमे, दूनू डूबि गेल।

अखनो साओन-भादवक धारमे कोनो घटवारकेँ कखनो देखा पड़ैत छैक महुआ। कोनो खिस्सा वचनहारकेँ देखा जाइत अछि ओ’, आ’ शुरू भय जाइत अछि , एकटा छलीह महुआ घटवारिन..............................।

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विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 8.संगीत-शिक्षा

8.संगीत-शिक्षा

I.

पहिने कमसँ कम 37 ‘की’ बला कीबोर्ड लिय।
एहिमे 12-12 टाक तीन भाग करू। 13 आ’ 25 संख्या बला की सा,आ’ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ’ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम 12 मंद्र सप्तक, बादक 12 मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन 12 तार सप्तक कहबैछ। 1 सँ 36 धरि मार्करसँ लिखि लिय। 1 आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ’ दहिन हाथ चलत।

12 गोट ‘की’ केर सेटमे 5 टा कारी आ’ सात टा उज्जर ‘की’ अछि।
प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ’ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि।
वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ’ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ’ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ 12 केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ’ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ’ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर 12 केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा।
दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ’ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ’ अवरोह करू।

(अनुवर्तते)

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 7.मिथिलाकला-चित्रकला(आगाँ)

7.मिथिलाकला-चित्रकला(आगाँ)


मौहक केर अरिपन
महुअक मिथिलामे विवाहक बादक विधि छैक जे वर- वधूमे स्नेहक सृजन करबाक हेतु अछि। वर वधूकेँ दू आसन पर बैसा खीर आ’ दही-चूड़ाक परसल जाइत अछि। दुनू गोटे एकरा सानि आ’ कौर बना कय एक दोसर पर फेकैत छथि। पहिने फेंकय बला विजयी होइत अछि। तीन दिन कोहबर घरमे आ’ चतुर्थी दिन कुलदेवताक घरमे ई विधि संपादित होइत अछि। नीचाँ देल अरिपन दुनू थारीक नीचाँ बनाओल जाइत अछि।
चित्र निर्माण- छोट-पैघ चारि वृत्ताकार रेखा, सभसँ ऊपरका गोलाप चारू कात बिन्दु। दुनूकेँ कमल-नालसँ जोड़ल जाइत अछि।
चारू आश्रमक शिक्षा वर वधूकेँ प्रेम सूत्रसँ बान्हिकेँ संतान सृष्टिक ज्ञान करा कय एहि अरिपन द्वारा कएल जाइत अछि।

(अनुवर्तते)

गजेन्द्र ठाकुर समग्र

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