भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
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Sunday, October 11, 2009
पेटार ४०
फुदकैत फुलिया किताब-कापीक बस्ताप माटिक रैक पर राखि माय केँ ताकै लगलीह। माय आंगन मे नहि रहै। पछुआर मे गोरहा पाथैत रहै। ओना गोरहा पाथैक समय नहि छल तेँ फुलियाक मन मे गोरहा पाथैक बात ऐबे नहि कयल छल। मुदा तकबो करैत आ षोरो पाड़ैत रहथि। आंगन सँ निकलि जखने फुलिया डेढ़िया लग आइलि कि गोरहा मचान लग स' मायक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचते फुलिया देखलनि जे माय गोरहा पाथि रहली हेन। मन मे तामस उठै लगलनि जे एक त कातिक मास तहू मे सूर्यास्त क समय, इ कोन समय भेल। अनेरे ठंढ़ लगतनि। मन खराब हेतनि। मुदा किछु बाजलि नहि। अप्परन बात बाजलि- ‘‘माय, परसू मधुबनी जायब। लड़की(छात्रा) सबहक बीच ‘‘महिला सषक्तीजकरण'' बिपयक प्रतियोगिता छी। सैाँसे जिलाक छात्रा सभ रहत। हमहूँ जायब। तहि ले कम सँ कम पच्चीेस टा रुपैआक ओरियान कए दे।''
मधुबनीक नाम सुनि माय अपन सभ सुधि-बुद्धि बिसरि गेलीह। हाथ गोबर पर रहनि, आँखि बेटी बेटी आँखि पर आ मन अकास मे कटल धागाक गुड्डी जेँका उड़ै लगलनि। पँजरा मे बैसि फुलिया कहै लगलनि- ‘‘माय, हमरा जरुर इनाम भेटत।''
अकास स मायक मन धरती पर खसि सोचए लगलीह जे पच्चीयस रुपैआ कत' स' आनब? कहलखिन- ‘‘बुच्चीड, ताबे ककरो से पैंइच ल' लेह किएक त जुग-जमाना बदलि रहल अछि, बिनु पढ़ल-लिखल लोककेँ कोनो मोजर रहतै? तेँ कोनो धरानी रुपैआक ओरियान क' लेह। गाय बिआयत त' दूध बेचि क' द' देबैक।''
मायक बात सुनि फुलिया मुस्कुसराइत कहलकनि- ‘‘धुर बुढ़िया नहितन, तीनि रुपैये गोरहा बिकाइछै, दसे टा बेचि लेब तेहिमे त' तीस रुपैआ भ' जायत। तइ ले ककरो स' मुह छोहनि किएक करब। ई त' रुपैआक ढेरी छिअउ। जखैन जत्त्ो रुपैआक काज हेतउ, तखैन तते बेचि लिहें। तोरा कि कोनो हेलीकेप्टकर कीनैक छओ?''
ठेलावला
बारह बजेक घंटी, टाबरक घड़ी मे, बजितहि भोलाक निन्नआ टूटि गेलनि। ओछाइन पर स' उठि सड़क पर आबि हियासय लगल त देखलक जे डंडी-तराजू माथ स' कनिये पछिम झुकल अछि। मेघनक दुआरे सतभैया झँपायल। जिमहर साफ मेघ रहए ओम्हुतरका तरेगण हँसैत मुदा जेमहर मेघोन रहए ओम्हुारका मलिन। गाड़ी-सबारी स' सड़क सुुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्तीरक सिपाही टहलैत रहए। सड़क पर सँ भोला आबि ओछाइन पर पड़ि रहल। मुदा मन उचला-चाल करैत। सिनेमाक रील जेँका पैछला जिनगी मन मे नचैत रहए। जहिना चुल्हिच पर चढ़ल बरतनक पानि तर स उपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुषी हृदय सँ निकलि चिड़ै जेँका अकासमे उड़ैत अछि। किएक नहि खुषी अओतैक? हरायल वस्तुह जे भेटि गेलैक अछि। मन गेलनि परसुका पत्र पर। जे गाम सँ दुनू बेटा पठौने रहनि। असंभव काज बुझि विष्वािसे नहि होइत रहनि। पत्र त नहि पढ़ल होयत रहनि मुदा पढ़बैकाल जे पाँती सभ सुनने रहथि, ओहिना आँखिक आगू नचैत रहनि। पत्र उघारि आँखि गड़ा देखै लगलथि। ‘‘बाबू, पाँच तारीख केँ दुनू भाय ज्वााइन करै जायब। इच्छा। अछि जे घर स विदा हेबा काल, अहाँ केँ गोड़ लागि घर सँ निकली। तेँ पाँच तारीख क' दस बजे सँ पहिनहि अपने गाम पहुँच जाय।'' पत्रक बात मनमे अबितहि भोला गाम आ षहरक बीचक सीमा पर लसकि गेलाह। मनमे ऐलनि समाज सँ निकलि, छाती पर ठेला घीचि, दू टा षिक्षक समाजकेँ देलिऐक कि ओहि समाजक आरो ऋृण बाकी छैक? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगाओताह। जहि सँ मनमे खुषी उपकलनि जे जहिना गाम सँ धोती गोलगोला आ दू टाका लए क' निकलल छलहुँ तहिना देहक कपड़ा, सनेस, चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु नहि एहिठाम लए जायब। चिड़ै टाँहि देलकै फेरि ओछाइन पर स उठि निकललाह त देखलखिन जे बाँस भरि ऊपर भुरुकबा आवि गेल अछि। चोट्टे घुरि क' आबि भोला संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलखिन अपना ले सिर्फ टिकटक खर्च, सनेस आ पाँकेट खर्च मिला सय रुपैया राखि, कपड़ा पहीरि, धर्मषाला केँ गोड़ लागि हँसैत निकलि गेलाह।
जखन आठे बर्खक भोला रहथि तखनहि माय मरि गेलखिन॥ तीनिये मासक पछाति रघुनी(पिता) चुमाओन क' लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नीि सँ चारि सन्ताबन भेलि रहनि। मुदा सिर्फ भोले टा जीवित रहल। सत्माय केँ परिवार मे ऐने भोलाकेँ सुखे भेलनि। ओना गामक जनिजातियो आ पुरुखो केँ होयत जे सत्माँय भोला केँ अलबा-दोलबा क' घर स भगा देतैक नहि त परिवार मे भिनौज जरुर कराइये देतीह। मुदा सभहक अनुमान गलत भेलनि। भोला घर सँ सोलहन्नीम फ्री भ' गेलाह। फ्री सिर्फ काजे टा मे भेला, मान-दान बढ़िये गेलनि। दुनू साँझ भानस होइतहि माय फुटा क' भोला ले सीक पर थारी साँठि क' राखि दैत छलीह। भलेही भोला दिनुका खेनाइ साँझ मे आ रौतुका खेनाइ भोरमे किएक ने खाथि।
परोपट्टा मे जालिम सिंह आ उत्तम चन्दौक नाच जोर पकड़ने। सभ गाम मे तँ नाच पार्टी नहि मुदा एक गाम मे नाच भेने चारि कोसक लोक देखै अबैत।
विषौलक(भोलाक गामक) नाच पार्टी सबसँ सुन्दमर अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने बिपटा। जाहि स पार्टीक प्रतिष्ठाभ दिनानुदिन बढ़ितहि जायत। घर सँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखिनिहार भ' गेलाह। नाचो भरि रौतुका, नहि कि एक घंटा, दू घंटा, तीनि घंटाक। जेहने देखिनिहार जिद्दी तेहने नचिनिहारो। गामक बूढ़-बूढ़ानुस सँ ल' क' छौँड़ा-मारड़ि घरि भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ताे। ने नाच पार्टी केँ रुपैआ दिअए पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चौदह आना लोकक हालतो रद्दिये। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरुर नाच करबैत छलाह। ओ नटुआकेँ खाइयो ले दैत छलथि आ कोनो-कोनो समानो कीनि केँ दैत छलथिन। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल। डिग्री सेदैक जिम्माक भेटि गेलैक। डिग्रीसेदैक जिम्माा भेटितहि काजो बढ़ि गेलैक। घूरक लेल जारनोक ओरियान करै पड़ैत छलै। अपना काजमे भोला मस्ते रहै लगल। मुदा एतबे स ओकर मन ्यान्तक नहि भेलैक। काजक सृजन ओ अपनोहु करै लगल। स्टे जक आगू मे जे छोटका धिया-पूता बैसि पी-पाह करैत, ओकरो सभपर निगरानी करै लगल। आब ओ चुपचाप एकठाम नहि बैसैत। घूमि-घूमि क' महफिलोक निगरानी करै लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सभकेँ बीड़ी सेहो लगबै लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो बीड़ी पीबि सीखि लेलक। किछुऐ दिनक पछाति भोला बीड़ीक नमहर पियाक भ' गेल। किएक त एक्केी-दू दम जँ पीबए, तइयो भरि रातिमे तीसि-पेंइतीस दम भ' जायत छलैक। जहि स' भरि राति मूड बनल रहैत छलैक।
बीड़ीक कसगर चहटि भोला केँ लागि गेलै। रातिमे ते नटुऐ सभ सँ काज चलि जायत छलैक मुदा दिनमे जखन अमलक तलक जोर करैत त' मन छटपटाय लगैत छलैक। मूडे भंगठि जायत छलैक। मूड बनबैक दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबै लगल। जहिक चलैत सभ दिन किछु नहि किछु बापक हाथे मारि खायत। एक दिन एक्के-टा बीड़ी रघुनी केँ रहनि। भोला चोरा क' पीबि लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गाम पर अयलाह त बीड़ी पीबैक मन भेलनि। खोलिया पर स अनै गेलाह त बीड़ी नहि देखलनि। चोट पर भोला पकड़ा गेलै। सभ तामस रधुनी भोला पर उताड़ि देलखिन। मारि खाय भोला कनैत उत्तर मुहेक रास्तास पकड़लक। कनिये आगू बढ़ल कि करिया काकाक नजरि पड़लनि। भोलक कानब सुनि ओ बुझि गेलखिन जे भीतरिया मारि लागल छै। चुचुकारि केँ पुछलखिन- ‘‘की भेलौ रौ भोला?''
करिया काकाक बात सुनि भोला आरो हिचुकि-हिचुकि कनै लगल। हिचुकैत भोला कनिये जोर सँ काका केँ कहलकनि। जे कानबक अवाज मे हरा गेलैक। काका भोलाक बात नहि बुझलखिन। मुदा बिगड़लखिन नहि, दहिना डेन पकड़ि रघुनी केँ कहै बढ़लथि। काका केँ देखि रघुनियोक मन पघिल गेलैक। काका कहलखिन- ‘‘रघुनी, भोला बच्चाक अछि किऐक त विआह नइ भेलै अए। तेँ नीक हेतह जे विआह करा दहक। अपन भार उतड़ि जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोड्ढी हेबह। समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करैत छैक। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक, ओ कहतह जे ‘‘माय मुइने बाप पित्ती।''
करिया काकाक विचार रघुनीक करेज केँ छेदि देलक। आँखि मे नोर आबि गेलैक। अखन धरि जे आँखि रघुनीक करिया काका पर छलैक ओ भोलाक गाल पड़क सुखल नोरक टघार पर पहुँच अटकि गेलैक। मारिक चोट भोलक देह मे निजाइये गेलैक जे संग-संग विआहक बात सुनि मनमे खुषियो उपकलै। बुद्धिक हिसाब सँ भलेही भोला बुड़िवक अछि मुदा नाच मे मेल-फीमेल गीत त' गबितहि अछि।
पिताक हैसियत स रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- ‘‘काका, हम ते ओते छह-पाँच नहि बुझैत छियै, काल्हिखये चलह कतौ लड़की ठेमा क' विआह कइये देवइ।'' ‘‘बड़बढ़िया'' कहि करियाकाका रास्ता घेलनि।
भोलाक वियाह भेला आठे दिन भेल छलैक कि पाँच गोटेक संग ससुर आबि रघुनी केँ कहलकनि- ‘‘वियाह से पहिने हम सभ नहि बुझलियैक, परसू पता लागल जे लड़का नाच पार्टी मे रहै अए। नटुआ-फटुआ लड़काक संग अपन बेटीकेँ हम नहि जाय देब। तेँ, ई संबंध नहि रहत। अपना सभ मे ते खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ वियाहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीकेँ दोसर वियाह कए देब।'' कहि पाँचो गोटे चलि गेलाह।
ससुरक बात सुनि भोलाक बुद्धिये हरा गेलै। जहिना जोरगर बिरड़ो उठला पर सभ किछु अन्ह रा जायत छैक तहिना भोलोक मन अन्हररा गेल। दुनियाँ अन्हाीर लगै लगलैक। ओना तीनि मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छलैक। एकटा नटुआ एकटा लड़की ल' क' पड़ा गेल छलैक। जहि स गाम दू फाँक भ' गेलैक। दू ग्रुप मे गाम बँटा गेलैक। सैाँसे गाम मे सनासनी चलै लगलैक। ताहि पर सँ भोला आरो दू फाँक भ' गेल।
पाण्डुे रोगी जेँका भोलाक देहक खून तरे-तर सुखै लगलैक। मुदा की रकैत वेचारा? किछु फुड़बे नहि करैत छलैक। ग्ला नि सँ मन कसाइन होअए लगलैक। मने-मन अपनाकेँ धिक्काुरै लगल। कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्मा देलनि जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे एहि गाम सँ कतौ चलिये जायब नीक होयत।
घर स भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुँह सँ दिल्ली, कलकत्ता, बम्वईक विड्ढय मे सुननहि रहए। जाहि सँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहए। ने जेबी मे पाइ रहए, ने बटखरचा। सिर्फ दुइये टा टाका संग मे रहए। अबधारि कए कलकत्ताक गाड़ी पकड़ि लेलक।
हबड़ा स्टेेषन गाड़ी पहुँचते भोला उतड़ि विदा भेल। टिकट नहि रहनहुँ एक्कोे मिसिया डर मन मे नहि रहैक। निरमली-सकरीक बीच कहियो टिकट नहि कटबैत छल। एक बेरि पनरह अगस्तह केँ सिमरिया धरि बिना टिकटे घुरि आयल रहए। प्लेछटफार्मक गेट पर दू टा सिपाहीक संग टी. टी. टिकट ओसुलैत। भोलाककेँ देखि टी. टीक मन मे भेलइ जे दरभंगिया छी भीख मंगै आयल अछि। टिकट नहि मंगलकै। सिपाहियो केँ बुझि पड़लै जे जेबी मे किछु छैक नहि। टिकटेवला यात्री जेँका भोलो गेट पार भ' गेल।
सड़क पर आबि आँखि उठा क' तकलक त नमहर-नमहर कोठा चौड़गर सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ि भोला देखलक। मनमे भेलै जे भरिसक आँखि मे ने किछु भ' गेल अछि। जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्केै चान सात बुझि पड़ैत, तहिना। दुनू हाथे दुनू आखि मीड़ि फेरि देखलक त ओहिना। भीड़ि देखि मन मे एलै जे जखन एत्त्ो लोकक गुजर-बसर चलैत अछि त हमर किएक ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानै लगल। ते ककरो बाजब वुझबे नहि करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाय-महीसि सभठाम एक्केो रंग बजैत अछि तहिना ने मनुक्खोज बजैत होएत। मुदा से नहि देखि भेलैक जे भरिसक हम मनुक्खजक जोरि मे हरा ने ते गेलहुँ हेँ फेरि मन मे एलै जे लोक त संगीक बीच हरायत अछि असकर मे कोना हरायत। विचित्र स्थितति मे पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होयत आ ने ककरो से किछु पूछैक। हिया हारि उत्तर मुहे विदा भेल। सड़कक किनछरिये सभ मे खाय-पीबैक छोट-छोट दोकान पतिआनी लागल देखलक। भुख लगले रहै मुदा अपन पाइ आ बोली सुनि हिम्महते ने होयत। जेबी टोबलक ते दू टकही रहबे करै। मन पड़लैक मधुबनीक स्टे-षन कातक होटल। जहि मे पाँच रुपये प्लेकट दइत। इ त सहजहि कलकत्ता छी। एहिठाम त आरो बेसी महग हेबे करत। एकटा दोकानक आगू मे ठाढ़ भ' गर अँटबै लगल जे नहि भात-रोटी त एक गिलास सतुऐ पीबि लेब। बगए देखि दोकानदारे कहलक- ‘‘आबह, आबह बौआ। ठाढ़ किएक छह?''
अपन बोली सुनि भोला घुसुकि क' दोकान लग पहुँच पुछलक- ‘‘दादा, कोना खुआबै छहक?''
तीनि मास पहिने धरि आठे आना मे खुआबै छेलिऐक। अखन बारह आना मे खुआबै छिअए।''
भोलाक मनमे संतोड्ढ भेल। पाइयेवला गहिकी जेॅका बाजल- ‘‘कुड़ुड़ करै ले पानि लाबह।''
भरि पेट खा आगू बढ़ल। ओना त रंग-विरंगक बस्तुज देखैत मुदा भोलाक नजरि सिर्फ दुइये ठाम अँटकैत। देवाल सभ मे साटल सिनेमाक पोस्टरर पर आ सड़क पर चलैत ठेला पर। जाहि पोस्ट।र मे डान्सल करैत देखए ओहि ठाम अटकि सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी कि पुरुख। गाम-घर मे ते पुरुखे मौगी बनि डान्सि करैत अछि। फेरि मन पड़लै संगीक मुहे सुनल ओ बात जे कहने रहए सत्ये हरिष्च न्दस फिल्मि मे मर्दे मौगिओक रौल केने रहए। गुनधुन करैत बढ़ल ते अपने जेँका छौॅड़ा केॅ ठेला ठेलने जायत देखि सोचै लगल जे ई काज त हमरो बुते भ' सकैत अछि। गाड़ीक ड्राइवरी त करै नहि अबै अछि। बिना सीखिने रिक्षोह कोना चलाओल हएत? ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगले मे एकटा ठेलावला केँ चाह पीवैत देखलक। ओहिठाम जा क' ठाढ़ भ' गेल। चाह पीबि ठेलावला पुछलक- ‘‘कोन गाँ रहै छह?''
‘‘विषौल।''
‘‘हमहूँ ते सुखेते रहै छी। चलह हमरा संगे।''
गप-सप करैत दुनू गोटे धर्मतल्ला।क पुरना धर्मषाला लग पहुँचल ठेला केँ सड़के पर छोड़ि दीनमा भोला केँ धर्मषालाक भीतर ल' जा क' कहलक- ‘‘समांग असकरे कतौ जैहह नहि। हरा जेबह। हम एक ट्रीप मारने अबै छी।''
टंकी पर हाथ-पाएर धोए भोला दीनमा सँ बीड़ी मांगि पीबि, पीलर लगा ओँगठि क' बैसि गेल। आखि उठा क' तकलत त झड़ल-झुरल देवालक सिमटी, तै पर कतौ-कतौ बर-पीपरक गाछ जनमल देखलक। पैखाना कोठरीक आ पानिक टंकीक आगू मे ठेहुन भरि किचार सेहो देखलक मन पड़लैक गाम। नाच-पर्टी टूटि गेल, घरवाली छोड़ि देलक। दू पाटी गाम भ' गेल। सोचितहि-सोचितहि निन्न आबि गेलैक। बैसिले-बैसल सुति रहल।
गोँसाइ डूबितहि दोसर ठेलावला(बुचाइ) आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- ‘‘कोन गाम रहै छह?''
आषा भरल स्वतर मे भोला बाजल- ‘‘बिषौल।''
विषौलक नाओ सुनितहि मुस्की दइत बुचाइ पुछलक- ‘‘रुपनकेँ चीन्है छहक?''
‘‘उ ते हमरा कक्केक हैत।''
अपन भायक ससुर बुझि भोला सँ सार-बहिनोइक संबंध बनवैत कहलक- ‘‘चलह, पहिने चाह पीबी। तखन निचेन स' गप-सप करब।''
कहि टंकी पर जा बुचन देह-हाथ धोय, कपड़ा बदलि भोला केँ संग केने दोकन पर गेल। आखिक इषारा स दोकानदार केँ दू-दू टा पनितुआ, दू-दू टा समौसा दइ ले कहलक। दुनू गोटे खा चाह पीबि पानक दोकान पर पहुँच बुचइ पान मंगलक। पान सुनि भोेला बाजल- ‘‘पान छोड़ि दिऔ। बीड़िये कीनि लिअ।''
बीड़ी पीबैत दुनू गोटे धर्मषालाक भीतर पहुँचल। एका-एकी ठेलावला सभ अबै लगलैक। बिषौलक नाओ सुनितहि अपन-अपन संबंध सभ फरिअबै लगल। संबंध स्थाापित होइतहि चाहक आग्रह करैत। चाह पीबैत-पीबैत भोलाक पेट अगिया गेलै। अखन धरिक जिनगी ऐहन स्ने ह पहिल दिन भेटलै। ठेलावला परिवारक अंग भोला बनि गेल। भोलाक सब व्य वस्था ठेलावला सभ कए देलक। दोसर दिन स ठेला ठेलय लगल।
षानि दिन केँ सभ ठेलावला रौतुका षो(नाइट षो) सिनेमा देखै जायत। ओहि षो मे एक क्लानषक कन्ो्ा सन भेटैत अछि। भोलो सब षनि सिनेमा देखै लगल।
चौदह मास बीतलाक बाद भोला गाम आयल। नव चेहरा नव बिचार भोलाक। घरक सभ ले कपड़ा अनने अछि। धिया-पूता केँ दू-दू टा चौकलेट देलक। धिया-पूता केँ चौकलेट देखि एका-एकी जनिजातियो सभ अबै लगलीह। झबरी दादी आबि भोला केँ दखि बजै लगलीह- ‘‘कहू ते एहि स सुन्नेर पुरुख केहेन होइछै जे सौंथ जरौनिया छोड़ि देलकै।''
दादीक बात भोला केँ बेधि देलक। आखि नोरा लगलैक। रघुनीक मन सेहो कानै लगलै। दोसरे दिन रघुनी लड़की तकै घर स निकलल। ओना लड़कीक त कमी नहि, मुदा गाम-घर देखि क' कुटुमैती करैक विचार रघुनिक मन मे रहै। कड़कीक कमी त ओहि समाज मे अधिक अछि जहि मे भ्रुण-हत्यानक रोग धेने छैक। समयो बदलल अछि। गिरहस्त परिवार स अधिक पसन्दज लोक नोकरिया परिवार केँ करैत अछि। बगलेक गाम मे भोलाक वियाह भ' गेल।
वियाहक तीनिये दिन पछाति कनियाँक बिदागरियो भ' गेलैक आ पाँचमे दिन अपनो कलकत्ता चलि देलक।
सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाम मे गुजारै लगल। गाम अबैत त अपनो घरक काज सम्हाकरि अनको सम्हा रि दइत।
तेसर साल चढ़ितहि भेला केँ जैाँआ बेटा भेलै। नवम् मास चढ़ितहि ओ गाम आबि गेल छल। मन मे अषो बनले रहेक जे पाइ-कौड़ीक दिक्कमत त नहिये हैत। सभ ठेलावला अपन संस्था बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्धड अपने केने अछि। मुदा पहिल बेरि छी, कनियाँक देखभाल त कठिन अछिये। सरकारीक कोनो बेवस्थोक नहिये छैक। मुदा समाजो त समुद्र थिक। बिनु कहनहुँ सेवा भेटैत अछि। जाहि सँ भोलो केँ कोनो बेसी परेषानी नहिये भेलैक।
समय आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरितहि भोला दुनू बेटा केँ स्कूेल मे नाओ लिखौलक। षहरक वातावरण मे रहने भोलोक विचार धिया-पूताकेँ पढ़बै दिषि झुकि गेल रहैक। मन मे अरोपि लेलक जे भलेही खटनी दोबर किऐक ने बढ़ि जाय मुदा दुनू बेटाकेँ जरुर पढ़ाएब। अपन आमदनी देखि पत्नीख केँ अॉपरेषन करा देलक। जहि स परिवारो समटले रहलैक।
पढ़ै मे जेहने चन्सनगर रतन तेहने लाल। क्लादस मे रतन फस्टस करैत आ लाल सेकेण्ड । सातवाँ क्लानस धरि दुनू भाय फस्टे सेकेण्डर स्कूाल मे करैत रहल। मुदा हाई स्कूसल मे दुनू भाय आर्ट लए पढ़ै लगल जाहि सँ क्लादस मे कोनो पोजीषन त नहिये होइत मुदा नीक नम्ब र स पास करै लगल।
मैट्रिकक परीक्षा द' दुनू भाय कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेषी जेँका अपनो पिता केँ बुझैत छल। तेँ मन मे रंग-विरंगक इच्छा। संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा अपन पिताक मेहनत, छातीक बले ठेला घीचैत देखि पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाय कए लेलक। पितेक जोर पर तीनि दिन अँटकल। मुदा किछु कीनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देखि अपन इच्छा कें मने मे दुनू भाय दाबि लेलक। मुदा तइयो भोला दुनू बेटा केँ फुलपेंट, षर्ट, धड़ी, जुत्ता कीनि क' देलखिन।
तीनि मासक उपरान्तअ मैट्रिकक रिजल्ट निकललै। दुनू भाय-रतनो आ लालो- प्रथम श्रेणी सँ पास केलक। फस्टत डिवीजन भेलो पर आगू पढ़ैक विचार मन मे नहि अनलक। उपार्जनक लेल सोचै लगल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबै लगल। नोकरियोक तँ ओइह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काजक लेल हजार हाथ तैयार अछि। जाहि स समाजक मूल पूँजी(मानवीय) आगि मे जरैत सम्पथत्ति जेँका, नष्टा भ' रहल अछि।
समय मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवानक लेल नोकरीक छोट-छीन दरवज्जाप खुजल। गाम स्कू ल मे षिक्षा-मित्रक बहाली होअए लगलैक। जाहि सँ नव ज्योजतिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवान मे भेलैक। ओना समयक हिसाब सँ शिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि मुदा बेरोजगारीक हिसाब सँ त नीक अछिये। बगलेक गामक स्कूतल मे रतनो आ लालोक बहाली भए गेलैक। पाँच तारीक केँ दुनू भाय ज्वागइन करत।
आगू नहि पढ़ैक दुख जते दुनू भाइक मन मे नहि रहैक ताहि स बेसी खुषी नाकरी सँ भेलैक। कोपर बुद्धि मे कलुड्ढताक मिसियो भरि आगमन नहि भेलैक अछि। दुनू भाय वैसि क' अपन परिवारक संबंध मे विचारै लगल। रतन लाल कें कहलक- ‘‘बौआ, कोन धरानी बावू अपना दुनू भाय केँ पढ़ौलनि से त देखिले अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहुँच गेल छी। तेँ, अपनो सभक की दायित्वि बनैत अछि से त सोचै पड़तह?''
रतनक बात सुनि लाल बाजल- ‘‘भैया, अपना सभ ओहि धरतीक सन्ताीन छी जाहि धरती पर श्रवण कुमार सन बेटा भ' चुकल छथि। पाँच तारीक सँ पहिनहि बावू केँ कलकता सँ बजा लहुन। हमसभ ठेलावलाक बेटा छी, एहि मे कोनो लाज नहि अछि। मुदा लाजक बात तहन हैत जहन ओ ठेला घीचिताह आ अपना सभ कुरसी पर बैसि दोसर केँ उपदेष देबइ।''
मूड़ी डोला स्वी कार करैत रतना बाजल- ‘‘आइये बाबू केँ जानकारी दए दैत छिअनि जे जानकारी पबितहि गाड़ी पकड़ि घर चलि आउ। पाँच तारीख केँ दुनू भाय ज्वााइन करै जायब। दुनू भायक विचार अछि जे अहाँ केँ गोड़ लागि घर स डेग उठायब।''
दुनू भाइक विचार सुनितहि मायक मन सुख-दुखक सीमा पर लसकि गेलनि। जरल घरारी पर चमकैत कोठा देखै लगलीह। आखि मे नोर छलकि गेलनि। मुदा ओ दुखक नहि सुखक छलनि।
श्जकगदीश प्रसाद मण्डहल
ठेलाबला
बारह बजेक घंटी, टाबरक घड़ी, मे बजितहि भोलाक निन्नक टूटि गेलै। ओछाइन पर स' उठि सड़क पर आबि हियासय लागल त' देखलक जे डंडी-तराजू माथ स' कनिये पछिम झुकल अछि। मेघौन दुआरे सतभैया झँपायल। जिमहर साफ मेघ रहए ओम्हुमरका तरेगण हँसैत मुदा जेमहर मेघौन रहै ओम्हुयरका मलिन। गाड़ी-सबारी स' सड़क सुुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्ती क सिपाही टहलैत रहै। सड़क पर सँ भोला आबि ओछाइन पर पड़ि रहल। मुदा मन उचला-चाल करैत। सिनेमाक रील जेँका पैछला जिनगी मन मे नचैत रहै। जहिना चुल्हिन पर चढ़ल बरतनक पानि तर स उपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुषी हृदय सँ निकलि चिड़ै जेँका अकासमे उड़ैत रहै। किएक नहि खुषी अओतैक? हरायल वस्तुच जे भेटि गेलैक अछि। उड़ैत मन गेल परसुका चिट्ठी पर। जे गाम सँ दुनू बेटा पठौने रहनि। असंभव काज बुझि विष्वातसे नहि होइत रहै। अपना चिट्ठी त' नहि पढ़ल होयत छलै मुदा पढ़बैकाल जे पाँती सभ जे सुनलाहा रहै, ओ ओहिना आँखिक आगू नचैत रहै। चिट्ठी उघारि आँखि गड़ा देखै लागल। ‘‘बाबू, पाँच तारीख केँ दुनू भाय ज्वा।इन करै जायब। इच्छाे अछि जे घर स विदा हेबा काल, अहाँ केँ गोड़ लागि घर सँ निकली। तेँ पाँच तारीख क' दस बजे सँ पहिनहि अपने गाम पहुँच जाय।'' चिट्ठीक बात मनमे अबितहि भोला गाम आ षहरक बीचक सीमा पर लसकि गेल। मनमे ऐल समाज सँ निकलि, छाती पर ठेला घीचि, दू टा षिक्षक समाजकेँ देलिऐक कि ओहि समाजक आरो ऋृण बाकी छैक? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगाओताह। जहि सँ मनमे खुषी उपकल जे जहिना गाम सँ धोती गोलगोला आ दू टाका लए क' निकलल छलहुँ तहिना देहक कपड़ा, सनेस, चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु नहि एहिठाम लए जायब। चिड़ै टाँहि देलकै फेरि ओछाइन पर स उठि निकलल त' देखलक जे बाँस भरि ऊपर भुरुकबा आवि गेल अछि। चोट्टे घुरि क' आबि भोला संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलक। अपना ले मात्र टिकटक खर्च, सनेस आ पाँकेट खर्च मिला सय रुपैया राखि, कपड़ा पहीरि, धर्मषाला केँ गोड़ लागि हँसैत निकलि गेल।
जखन आठे बर्खक भोला छल तखनहि माय मरि गेलखिन। तीनिये मासक पछाति पिता रघुनी चुमाओन क' लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नीछ सँ चारि सन्तालन भेलि रहनि। मुदा सिर्फ भोले टा जीवित रहल। सत्माय केँ परिवार मे ऐने भोलाकेँ सुखे भेलै। गामक जनिजातियो आ पुरुखो केँ होयत जे सत्मामय भोलाकेँ अलबा-दोलबा क' घर स भगा देतै नहि त परिवार मे भिनौज जरुर कराइये देतीह। मुदा सभहक अनुमान गलत भेलनि। भोला घर सँ सोलहन्नी फ्री भ' गेल। फ्री मात्र काजे टा मे भेल, मान-दान बढ़िये गेलै। दुनू साँझ भानस होइतहि माय फुटा क' भोल ले सीक पर थारी साँठि क' राखि दैत छलीह। भलेही भोला दिनुका खेनाइ साँझ मे आ रौतुका खेनाइ भोरमे किएक ने खाय।
परोपट्टा मे जालिम सिंह आ उत्तम चन्द क नाच जोर पकड़ने। सभ गाम मे तँ नाच पार्टी नहि मुदा एक गाम मे भेने चारि कोसक लोक देखै अबैत।
विषौलक(भोलाक गामक) नाच पार्टी सबसँ सुन्द र अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने जोकर। जाहि स पार्टीक प्रतिष्ठा दिनानुदिन बढ़ले जायत। घर सँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखिनिहार भ' गेल। नाचो भरि रौतुका, नहि कि एक घंटा, दू घंटा, तीनि घंटाक। जेहने देखिनिहार जिद्दी तेहने नचिनिहारो। गामक बूढ़-वूढ़ानुस स' ल' क' छैाँड़ा मारड़ि घरि भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ताे। ने नाच पार्टी केँ रुपैआ दिअए पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चौदह आना लोकक हालतो रद्दिये। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरुर नाच करबैत छलाह। ओ नटुआकेँ खाइयो ले दैत छलथि आ कोनो-कोनो समानो कीनि केँ दैत छलथिन। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल। डिग्री सेदैक जिम्माक भेटि गेलैक। डिग्रीसेदैक जिम्माा भेटितहि काजो बढ़ि गेलैक। घूरक लेल जारनोक ओरियान करै पड़ैत छलै। अपना काजमे भोला मस्त रहै लागल। मुदा एतबे स ओकर मन ्यान्तय नहि भेलैक। काजक सृजन ओ अपनोहु करै लागल। स्टे जक आगू मे जे छोटका धिया-पूता बैसि पी-पाह करैत, ओकरो सभपर निगरानी करै लागल। आब ओ चुपचाप एकठाम नहि बैसैत। घूमि-घूमि क' महफिलोक निगरानी करै लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सभकेँ बीड़ी सोहो लगबै लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो बीड़ी पीबि सीखि लेलक। किछुऐ दिनक पछाति भोला बीड़ीक नमहर पियाक भ' गेल। किएक त एक्केी-दू दम जँ पीबए, तइयो भरि रातिमे तीसि-पेंइतीस दम भ' जायत छलैक। जहि स' भरि राति मूड बनल रहैत छलैक।
बीड़ीक कसगर चहटि भोला केँ लागि गेलै। रातिमे ते नटुऐ सभ सँ काज चलि जायत छलैक मुदा दिनमे जखन अमलक तलक जोर करैत त' मन छटपटाय लगैत छलैक। मूडे भंगठि जायत छलैक। मूड बनबैक दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबै लागल। जहिक चलैत सभ दिन किछु नहि किछु बापक हाथे मारि खायत। एक दिन एक्केाटा बीड़ी रघुनी केँ रहनि। भोला चोरा क' पीबि लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गाम पर अयलाह त बीड़ी पीबैक मन भेलनि। खोलिया पर स अनै गेलाह त' बीड़ी नहि देखलनि। चोट पर भोला पकड़ा गेलै। सभ तामस रधुनी भोला पर उताड़ि देलखिन। मारि खाय भोला कनैत उत्तर मुहेक रास्तास पकड़लक। कनिये आगू बढ़ल कि करिया काकाक नजरि पड़लनि। भोलक कानब सुनि ओ बुझि गेलखिन जे भीतरिया मारि लागलछै। चुचकारि केँ पुछलखिन- ‘‘की भेलौ रौ भोला?''
करिया काकाक बात सुनि भोला आरो हिचुकि-हिचुकि कनै लागल। हिचुकैत भोला कनिये जोर सँ काका केँ कहलकनि। जे कानबक अवाज मे हरा गेलैक। काका भोलाक बात नहि बुझलखिन। मुदा बिगड़लखिन नहि, दहिना डेन पकड़ि रघुनी केँ कहै बढ़लथि। काका केँ देखि रघुनियोक मन पघिल गेलैक। काका कहलखिन- ‘‘रघुनी, भोला बच्चा अछि किऐक त वियाह नइ भेलै अए। तेँ नीक हेतह जे वियाह करा दहक। अपन भार उतड़ि जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोड्ढी हेबह। समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करैछै। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक ओ कहतह जे ‘‘माय मुइने बाप पित्ती।''
करिया काकाक विचार रघुनीक करेज केँ छेदि देलकनि। आँखि सँ नोर आबि गेलनि। एखन धरि जे नजरि रघुनीक करिया काका पर छलैक ओ भोलाक गाल पड़क सुखल नोरक टघार पर पहुँच अटकि गेलनि। मारिक चोट भोलक देह मे निजाइये गेलैक जे संग-संग वियाहक बात सुनि मनमे खुषिये उपकलै। बुद्धिक हिसाब सँ भलेही भोला बुड़िवक अछि मुदा नाच मे मेल-फीमेल गीत त' गबितहि अछि।
पिताक हैसियत स' रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- ‘‘काका, हम ते ओते छह-पाँच नहि बुझैत छियै, काल्हिकये चलह कतौ लड़की ठेमा क' वियाह कइये देवइ।'' ‘‘बड़बढ़िया'' कहि करियाकाका रास्ताल घेलनि।
भोलाक वियाह भेला आठे दिन भेल छलैक कि पाँच गोटेक संग ससुर आबि रघुनी केँ कहलकनि- ‘‘वियाह से पहिने हम सभ नहि बुझलियैक, परसू पता लागल जे लड़का नाच पार्टी मे रहै अए। नटुआ-फटुआ लड़काक संग अपन बेटीकेँ हम नहि जाय देब। तेँ, ई संबंध नहि रहत। अपना सभ मे ते खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ वियाहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीकेँ दोसर वियाह कए देब।'' कहि पाँचो गोटे चलि गेलाह।
ससुरक बात सुनि भोलाक बुद्धिये हरा गेलै। जहिना जोरगर बिरड़ो उठला पर सभ किछु अन्ह रा जायत, तहिना भोलोक मन अन्हडरा गेल। दुनियाँ अन्हातर लाग' लगलै। ओना तीनि मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छलै। एकटा नटुआ एकटा लड़की ल' क' पड़ा गेल रहै। जहि स' गाम दू फाँक भ' गेल। दू ग्रुप मे गाम बँटा गेल। सैाँसे गाम मे सनासनी चलै लगलै। ताहि पर सँ भोला आरो दू फाँक भ' गेल।
पाण्डुत रोगी जेँका भोलाकेँ देहक खून तरे-तर सुखै लागल। मुदा की रकैत वेचारा? किछु फुड़बे नहि करैत छलैक। ग्लाेनि सँ मन कसाइन होअए लगलैक। मने-मन अपनाकेँ धिक्काुरै लागल। कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्मए देलनि जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे एहि गाम सँ कतौ चलिये जायब नीक होयत।
घर स भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुँह सँ दिल्ली , कलकत्ता, बम्वजईक विड्ढय मे सुननहि रहए। जाहि सँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहै। ने जेबी मे पाइ छलै, ने बटखरचा। मात्र दुइये टा टाका संग मे रहए। अबधारि कए कलकत्ताक गाड़ी पकड़ि लेलक।
हबड़ा स्टेाषन गाड़ी पहुँचते भोला उतड़ि विदा भेल। टिकट नहि रहनहुँ एक्कोे मिसिया डर मन मे नहि रहै। निरमली-सकरीक बीच कहियो टिकट नहि कटबैत छल। एक बेरि पनरह अगस्तह केँ सिमरिया धरि बिना टिकटे घुरि अयल रहए। प्लेरटफार्मक गेट पर दू टा सिपाहीक संग टी. टी. टिकट ओसुलैत रहथि। भोलाककेँ देखि टी. टीक मन मे भेलनि जे दरभंगिया छी भीख मंगै आयल अछि। टिकट नहि मंगलथिन। सिपाहियो केँ बुझि पड़लै जे जेबी मे किछु छैक नहि। टिकटेवला यात्री जेँका भोलो गेट पार भ' गेल।
सड़क पर आबि आँखि उठा क' तकलक त नमहर-नमहर कोठा चौड़गर सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ि भोला देखलक। मनमे भेलै जे भरिसक आँखि मे ने किछु भ' गेल अछि। जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्केै चान सात बुझि पड़ैत, तहिना। दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि फेरि देखलक त ओहिना। भीड़ि देखि मन मे एलै जे जखन एत्त्ो लोकक गुजर-बसर चलैत अछि त हमर किएक ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानलक ते ककरो बाजब वुझबे नहि करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाय-महीसि सभठाम एक्केक रंग बजैत अछि तहिना ने मनुक्खोत बजैत होएत। मुदा से नहि देखि भेलै जे भरिसक हम मनुक्खंक जेर मे हरा ने ते गेलहुँ हेन। फेरि मन मे एलै जे लोक त संगीक बीच हरायत अछि असकर मे कोना हरायत। विचित्र स्थिेति मे पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होयत आ ने ककरो से किछु पूछैक। हिया हारि उत्तर मुहे विदा भेल। सड़कक किनछरिये सभ मे छोट-छोट खाय-पीबैक दोकान पतिआनी लागल देखलक। भुख लगले रहै मुदा अपन पाइ आ बोली सुनि हिम्मटते ने होयत। जेबी टोबलक ते दू टकही रहबे करै। मन पड़लै मधुबनीक स्टेीषन कातक होटल। जहि मे पाँच रुपये प्ले ट दैत। इ त सहजहि कलकत्ता छी। एहिठाम त आरो बेसी महग हेबे करत एकटा दोकानक आगू मे ठाढ़ भ' गर अँटबै लागल जे नहि भात-रोटी त एक गिलास सतुऐ पीबि लेब। बगए देखि दोकानदारे कहलक- ‘‘आबह, आबह बौआ। ठाढ़ किएक छह?''
अपन बोली सुनि भोला घुसुकि क' दोकान लग पहुँच पुछलक- ‘‘दादा, कोना खुआबै छहक?''
तीनि मास पहिने धरि आठे आना मे खुआबै छेलिऐक। अखन बारह आना मे खुआबै छिअए।''
भोलाक मनमे संतोड्ढ भेल। पाइयेवला गहिकी जेॅका बाजल- ‘‘कुड़ुड़ करै ले पानि लाबह।''
भरि पेट खा आगू बढ़ल। ओना त' रंग-विरंगक बस्तुै देखै लागल मुदा भोलाक नजरि सिर्फ दुइये ठाम पड़ैत। देवाल सभ मे साटल सिनेमाक पोस्टजर पर आ सड़क पर चलैत ठेला पर। जाहि पोस्टपर मे डान्सन करैत देखए ओहि ठाम अटकि सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी कि पुरुख। गाम-घर मे ते पुरुखे मौगी बनि डान्स करैत अछि। फेरि मन पड़लै संगीक मुहे सुनल ओ बात जे कहने रहए सत्ये हरिष्च न्दस फिल्मि मे मर्दे मौगिओक रौल केने रहए। गुनधुन करैत बढ़ल ते अपने जेँका छौॅड़ा केॅ ठेला ठेलने जायत देखि सोचै लागल जे ई काज त हमरो बुते भ' सकैत अछि। गाड़ीक ड्राइवरी त' कयलै नहि होय अए। बिना सीखिने रिक्षोह कोना चलाओल हैत? ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगले मे एकटा ठेलावला केँ चाह पीवैत देखलक। ओहिठाम जा क' ठाढ़ भ' गेल। चाह पीबि ठेलावला पुछलक- ‘‘कोन गाँ रहै छह?''
‘‘बिषौल।''
‘‘हमहूँ ते सुखेते रहै छी। चलह हमरा संगे।''
गप-सप करैत दुनू गोटे धर्मतल्लााक पुरना धर्मषाला लग पहुँचल त' ठेला केँ सड़के पर छोड़ि दीनमा भोला केँ धर्मषालाक भीतर ल' जा क' कहलक- ‘‘समांग असकरे कतौ जैहह नहि। हरा जेबह। हम एक ट्रीप मारने अबै छी।''
टंकी पर हाथ-पाएर धोए भोला दीनमा सँ बीड़ी मांगि पीबि पीलर लगा ओँगठि क' बैसि गेल। आँखि उठा क' तकलत त झड़ल-झुरल देवालक सिमटी तै पर कतौ-कतौ बर-पीपरक गाछ जनल देखलक। पैखाना कोठरीक आ पानिक टंकीक आगू मे ठेहुन भरि किचार सेहो देखलक मन पड़लैक गाम। नाच-पार्टी टूटि गेल, घरवाली छोड़ि देलक। दू पाटी गाम भ' गेल। सोचितहि-सोचितहि निन्ना आबि गेलैक। बैसिले-बैसल सुति रहल।
गोँसाइ डूबितहि दोसर ठेलावला(बुचाइ) आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- ‘‘कोन गाम रहै छह?''
आषा भरल स्वतर मे भोला बाजल- ‘‘बिषौल।''
विषौलक नाओ सुनितहि मुस्की दइत बुचाइ पुछलक- ‘‘रुपनकेँ चीन्है छहक?''
‘‘उ ते हमरा कक्केक हैत।''
अपन भायक ससुर बुझि भोला सँ सार-बहिनोइक संबंध बनवैत कहलक- ‘‘चलह, पहिने चाह पीबी। तखन निचेन स' गप-सप करब।''
कहि टंकी पर जा बुचन देह-हाथ धोय, कपड़ा बदलि भोला केँ संग केने दोकन पर गेल। आखिक इषारा स दोकानदार केँ दू-दू टा पनितुआ, दू-दू टा समौसा दइ ले कहलक। दुनू गोटे खा चाह पीबि पानक दोकान पर पहुँच बुचइ पान मंगलक। पान सुनि भोेला बाजल- ‘‘पान छोड़ि दिऔ। बीड़िये कीनि लिअ।''
बीड़ी पीबैत दुनू गोटे धर्मषालाक भीतर पहुँचल। एका-एकी ठेलावला सभ अबै लागल। बिषौलक नाओ सुनितहि अपन-अपन संबंध सभ फरिअबै लागल। संबंध स्थावपित होइतहि चाहक आग्रह करैत। चाह पीबैत-पीबैत भोलाक पेट अगिया गेलै। अखन धरिक जिनगीमे ऐहन स्नेरह पहिल दिन भेटलै। ठेलावला परिवारक अंग भोला बनि गेल। भोलाक सब व्य वस्थाह ठेलावला सभ कए देलक। दोसर दिन स ठेला ठेलय लागल।
षानि दिन केँ सभ ठेलावला रौतुका षो(नाइट षो) सिनेमा देखै जायत। ओहि षो मे एक क्लानषक कन्ो्ा सन भेटैत अछि। भोलो सब षनि सिनेमा देखै लागल।
चौदह मास बीतलाक बाद भोला गाम आयल। नव चेहरा नव बिचार भोलाक। घरक सभ ले कपड़ा अनने अछि। धिया-पूता केँ दू-दू टा चौकलेट देलक। धिया-पूताकेँ चौकलेट देखि एका-एकी जनिजातियो सभ अबै लगलीह। झबरी दादी आबि भोलाकेँ देखि बजै लगलीह- ‘‘कहू ते एहि स सुन्न।र पुरुख केहेन होइछै जे सौंथ जरौनिया छोड़ि देलकै।''
दादीक बात भोलाकेँ बेधि देलक। आखि नोरा लगलैक। रघुनीक मन सेहो कानै लगलनि। दोसरे दिन रघुनी लड़की तकै घर सँ निकललथि। ओना लड़कीक त' कमी नहि, मुदा गाम-घर देखि क' कुटुमैती करैक विचार रघुनिक मनमे रहनि। कड़कीक कमी त' ओहि समाज मे अधिक अछि जाहि मे भ्रुण-हत्याकक रोग धेने छैक। समयो बदलल अछि। गिरहस्त' परिवार सँ अधिक पसन्दि लोक नोकरिया परिवारकेँ करैत अछि। बगलके गाममे भोलाकेँ वियाह भ' गेल।
वियाहक तीनिये दिन पछाति कनियाँक बिदागरियो भ' गेलैक आ पाँचमे दिन अपनो कलकत्ता चलि देलक।
सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाम मे गुजारै लागल। गाम अबैत त अपनो घरक काज सम्हाकरि अनको सम्हा रि दैत।
तेसर साल चढ़ितहि भेलाकेँ जैाँआ बेटा भेलै। नवम् मास चढ़ितहि ओ गाम आबि गेल छल। मनमे अषो बनले रहै जे पाइ-कौड़ीक दिक्क त त' नहिये हैत। सभ ठेलावला अपन संस्थाम बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्ध् अपने केने अछि। मुदा पहिल बेरि छी, कनियाँक देखभाल त' कठिन अछिये। सरकारी कोनो बेवस्थो नहिये छैक। मुदा समाजो त' समुद्र थिक। बिनु कहनहुँ सेवा भेटैत अछि। जाहि सँ भोलोकेँ कोनो बेसी परेषानी नहिये भेलैक।
समय आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरितहि भोला दुनू बेटा केँ स्कूील मे नाओ लिखौलक। षहरक वातावरण मे रहने भोलोक विचार धिया-पूताकेँ पढ़बै दिषि झुकि गेल रहै। मन मे अरोपि लेलक जे भलेही खटनी दोबर किऐक ने बढ़ि जाय मुदा दुनू बेटाकेँ जरुर पढ़ाएब। अपन आमदनी देखि पत्नीह केँ अॉपरेषन करा देलक। जहि स परिवारो समटले रहलैक।
पढ़ै मे जेहने चन्सनगर रतन तेहने लाल। क्लादस मे रतन फस्टस करैत आ लाल सेकेण्ड । सातवाँ क्लानस धरि दुनू भाय फस्टे सेकेण्डर करैत रहल। मुदा हाई स्कू।ल मे दुनू भाय आर्ट लए पढ़ै लागल जाहि सँ क्लानस मे कोनो पोजीषन त नहिये होइत मुदा नीक नम्ब र सँ पास करै लगल।
मैट्रिकक परीक्षा द' दुनू भाय कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेषी जेँका अपनो पिताकेँ बुझैत छल। तेँ मनमे रंग-विरंगक इच्छा। संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा अपन पिताक मेहनत, छातीक बले ठेला घीचैत देखि पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाय कए लेलक। पितेक आग्रह पर तीनि दिन अँटकल। मुदा किछु कीनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देखि अपन इच्छादकें मने मे दुनू भाय दाबि लेलक। मुदा तइयो भोला दुनू बेटाकेँ फुलपेंट, षर्ट, धड़ी, जुत्ता कीनि क' देलक।
तीनि मासक उपरान्तअ मैट्रिकक रिजल्ट निकललै। दुनू भाय-रतनो आ लालो- प्रथम श्रेणी सँ पास केलक। फस्टत डिवीजन भेलो पर आगू पढ़ैक विचार मनमे नहि अनलक। उपार्जनक लेल सोचै लागल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबै लागल। नोकरियोक तँ ओइह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काजक लेल हजार हाथ तैयार अछि। जाहि सँ समाजक मूल पूँजी(श्रम) आगि मे जरैत सम्पैत्ति जेँका, नष्टक भ' रहल अछि।
समय मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवानक लेल नोकरीक छोट-छीन दरवज्जाप खुजल। गामक स्कूपल मे षिक्षा-मित्रक बहाली होअए लगलैक। जाहि सँ नव ज्यो तिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवान मे भेलैक। ओना समयक हिसाब सँ शिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि मुदा बेरोजगारीक हिसाब सँ त' नीक अछिये। बगलेक गामक स्कूयल मे रतनो आ लालोक बहाली भए गेलैक। पाँच तारीक केँ दुनू भाय ज्वा।इन करत।
आगू नहि पढ़ैक दुख जते दुनू भाइक मनमे नहि रहै ताहि सँ बेसी खुषी नाकरी सँ भेलैक। कोपर बुद्धि मे कलुड्ढताक मिसियो भरि आगमन नहि भेल अछि। दुनू भाय वैसि क' अपन परिवारक संबंध मे विचारै लागल। रतन लालकें कहलक- ‘‘बौआ, कोन धरानी बावू अपना दुनू भाय केँ पढ़ौलनि से त' देखिलै अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहुँच गेल छी। तेँ, अपनो सभक की दायित्वत बनैत अछि से त' निर्णय करै पड़तह?''
रतनक बात सुनि लाल बाजल- ‘‘भैया, अपना सभ ओहि धरतीक सन्तापन छी जाहि धरती पर श्रवण कुमार सन बेटा भ' चुकल छथि। पाँच तारीक सँ पहिनहि बावूकेँ कलकता सँ बजा लहुन। हमसभ ठेलावलाक बेटा छी, एहि मे कोनो लाज नहि अछि। मुदा लाजक बात तहन हैत जहन ओ ठेला घीचिताह आ अपना सभ कुरसी पर बैसि दोसर केँ उपदेष देबइ।''
मूड़ी डोला स्वी कार करैत रतना बाजल- ‘‘आइये बाबूजी केँ जानकारी दए दैत छिअनि जे जानकारी पबितहि गाड़ी पकड़ि घर चलि आउ। पाँच तारीख केँ दुनू भाय ज्वा इन करै जायब। दुनू भायक विचार अछि जे अहाँकेँ गोड़ लागि घर स डेग उठायब।''
दुनू भाइक विचार सुनितहि मायक मन सुख-दुखक सीमा पर लसकि गेलनि। जरल घरारी पर चमकैत कोठा देखै लगलीह। आँखि मे नोर छलकि गेलनि। मुदा ओ दुखक नहि सुखक छलनि। घ्घ्क
जगदी प्रसाद मंडल
उमेश मण्डाल
ग्राम, पोस्ट्, ःबेरमा
भाया, ःतमुरिया
जिला, ःमधुबनी
मोबाइल ः9931654742
मउंपस. नउमेीउंदकंस/पदकपंजपउमेण्बगवउ
पेटार ३९
उपन्यांस
जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
जीवन संघर्ष ःः 1
कातिकक अन्ह रिया पख। रौदियाह समय भेने जेठक रौद जेँका रौद तीख। उम्म।स सेहो। दस बजेक उपरान्तर बाध-बोन मे रहब कठिन। तेँ सवेर-सकाल सब चलि अबैत, मुदा घरो पर चैन कहाँ। माथ परक पसीना नाक पर होइत टप-टप खसैत आ देहक पसीना स कपड़ा भीजैत। मन औल-बौल करैत। आठमे दिन दिवाली, तहू मे काली-पूजा करैक विचार सेहो सैाँसे गैाँवा मिलि के क लेलक। दुनू अमबसिये दिन। ओना दिवाली एक दिना पावनि होइत मुदा काली पूजा धूम-धाम से मनबैक विचार भेने, पाँचो दिन सब अपना-अपना ऐठाम दीप जरवैक विचार क लेलक। सब अप्पलन-अप्प न घर-आंगनक टाट-फड़क स ल' क' जते-जते गामक रस्तार-पेरा टूटल अछि ओकरो सरिअवै मे लागि गले। गाम मे पहिल बेरि काली-पूजा सेहो हैत तेँ सब वयस्त । सब मे तजगर उत्सासह। अप्प न-अप्पकन खेती-बाड़ी छोड़ि सब नीक जेँका ओहि काज मे भीड़ल। ओना खेत मे हालोक कमी किऐक त अधा भादो मे जे एकटा मझोलका अछार भेल तइ दिन से एक्कोो बुन बरखा नई भेल, खेत मे दरारि फाटि गेल। उपरका खेतक धान मरहन्ना भ' गेल। केकरो-केकरो गरमा धान जे अगता रोपने छल, ओकर कम दिनक धान रहने सोलहन्नी , मुदा जे वेसी दिनक गरमा धान अछि ओ अधा-छिधा। पूजाक पैघ आयोजन तेँ विष्ोष वयवस्थालक जरुरत। मुदा लोकक उत्सााहे तते जे कोढ़िला बोझ जेँका काज के बुझैत। अनठौला से हल्लु्को काज भारी भ जाइ छै, मुदा उत्सालहित भ केला से भारिओ काज हल्लुलके बनि जाइ छै।
आइ तक अइ गाम मे(बँसपुरा मे) ने कहियो कोनो यज्ञ-जाप भेल आ ने कोनो पूजा-पाठ। तेँ इलाकाक लोक वँसपुराके पपीयाहा गाम बुझैत। ओना गोटे-गोटे साल, महावीर जी स्था न मे, अष्टपयाम कीर्तन भ' जायत। ओहो नियमित नहि। जइ साल उपजा-बाड़ी नीक होइत ओइ साल उत्साेहित भ' सब कीर्तन क लैत, मुदा जइ साल रौदी वा दाही भ जाइत तइ साल अष्ट यामो या त रौदिया जाइत वा दहा जाइत। बेकता-बेकती कहियो काल भनडारा सेहो क लइत। अइ बेर काली पूजा करैक विचार सैाँसे गामक लोक मिलि क' केलक। मेलो धुमधाम से हैत। पाँच दिनक मेला। नाच-तमाषा स ल' क' दोकान-दौरीक नीक व्यइवस्थान हैत। गाम मे काली-पूजा हैत, तेँ लोक मे विष्ोष जिज्ञसो आ उत्सामहो। भिनसर से खाइ-पीवै राति धड़ि सब यैह चर्चा करैत। काली-पूजाक प्रति लोकक मन एते उड़ि गेल जे सब अप्प्न-अप्प न काज-राज छोड़ि, अही पाछू बेहाल। मालो-जालक आ खेतो-पथारक भार स्त्री गणे पर पड़ि गेल। मुदा ओहो सब खुषी। किअए खुषी? खुषी अइ दुआरे जे हम्मजर घरबला धरमक काज मे लागल छथि, जे हमरो हैत। ओना दिवाली, एक दिना पावनि अदौ स होइत आयल, भलेही दिवालीक प्रात गोधन पूजा, दोसर दिन भरदुतिया-चित्रगुप्त पूजा होइत, मुदा एक-दोसर स अलग-अलग होइत। दषमी(दुर्गापूजा) जेँका नहि जे सप्तामी क' भगवती केँ आखि(डिम्भात) पड़िते मेला शुरु भेल आ नेने-नेेने एक्केह बेर जतरा दिन उसरल। मुदा अइबेर बँसपुराक दिवाली के काली-पूजा रंग चढ़ा देलक। किऐक त सब अपना मे विचार क लेलक जे जाबे तक काली पूजाक मेला चलत ताबे तक सब अप्पेन-अप्पचन घर-आंगन, दुआर-दरवज्जाी स ल क' पोखरिक घाट, इनार चापाकल, माल-जालक खूँटा पर सेहो दीप जरौत।
गाम मे काली पूजा किअए हैत? तेकर कारण भेल। कारण इ भेल जे बँसपुरा से सटले(डेढ़ कोस पर) सिसौनी मे पच्चीकसो बर्ख से दुर्गा-पूजा होइत अबैत अछि। चरिकोसीक लोक(मरद-मौगी) दुर्गा-पूजा देखै सिसौनी अबैत। अप्पेन-अप्पोन कबुला-पाती सेहो चढ़वैत आ मेलो देखैत। साँझो दैत। बलि प्रदान सेहो करैत। बलि-प्रदान मे सिसौनीक दुर्गा नामी। किऐक त एते बलि प्रदान कतौ ने होइत। किलो भरि-भरि छागरक दाम पँच-पँच सौ भ जाइत। अइ बेरक पूजा मे एकटा घटना घटल। घटना इ जे बँसपुराक एकटा अठारह-बीस बर्खक लड़की के, पूजा कमिटीक तीन गोटे, बलजोरी पकड़ी क' भंडार घर ल जा भरि राति रखि लेलक। राति मे ते कियो ने बुझलक, मुदा भिनसर मे जखन ओइ लड़की के छोड़लकै आ लड़की कनैत-कनैत गाम पहुँचि सब के कहलकै तखन जना सबहक(जे सुनै) देह मे आगि लगैत गेलै। लड़कीक माए बताहि जेँका जोर-जोर से सरापबो करै, गारियो पढ़ै आ घर से फरुसा(फौरसा) निकालि सोझे सिसौनी दिसक रस्तोल पकड़लै। साड़ीक अँचरा क' उलटा पीठि पर बान्हिक, जना सन मे सिपाही जाइत, तहिना विदा भेलि। लड़कीक बापो तहिना मुरेठा बान्हि् हरोथिया लाठी ल अनधुन गरिअबैत, स्त्री क पाछु-पाछु विदा भेल। मुदा समाजक मरदो आ जनिजातियो दुनू केँ पकड़ि क' रोकलक। जेना-जेना समाचार पसरैत तेना-तेना गाम दलमलित हुअए लगल। रंग-बिरंगक गप-सप, गाम मे चलै लगलै। कियो बजैत जे चलै चलू सिसौनी मे आगि लगा सैाँसे गाम क' जरा देब। त कियो बजैत जे सैाँसे गाम के लुटि सबहक बहू-बेटी क' पकड़ि घिसिया क ल आनब। कियो कहैत जे ओइ सार(कमिटीक सदस्यब) के खून क देब। मुदा इ सब विचार खुदरा-खुदरी छल, सामूहिक नहि। गामक बुद्धियार लोक सब सबके शान्तिू करै मे लगल। एक्केद-दुइये, गामक सब(मरद-मौगी) सड़क पर आबि थहा-थही करै लगल। मेला जेँका लोक सड़क पर भ' गेल। ककरो-ककरो हाथ मे लाठी त ककरो-2 हाथमे भाला त ककरो-2 हाथ मे तीर-धनुष सेहो। गाम मे सबसे अधिक उमेरक मखन बाबा। नब्बेह बर्ख से उपरे उमेर। हाथ मे फराठी नेने, देह थरथराइत, टुघरल-टुघरल आबि आखि उठा के देखलनि ते बुझि पड़लनि जे आइ दुनू गामक बीच मारि हेबे करत। केमहर से के मरत, तकर ठेकान नहि। मन पड़लनि, जे एहिना एक बेरि जूरषीतल मे एकटा नढ़िया खातिर बेला आ मैनहीक बीच मारि भेल, जइ मे तीनि टा खूनो भेल आ कते गोरे के जे जाँघ टुटलै, से जिनगी भरि ठाढ़ नै भेल। हो न हो कहीं आइयो ओहिना ने हुअए। फेरि मन मे भेलनि जे सबके मनाही क' दियै। मुदा फेरि भेलनि जे हम्महर बात मानत के। विचित्र गुन-धून मे मखन बावा। थोड़े आगू बढ़ि मखन बाबा देखलनि जे जेस्त्री गण आ मरदो धाक करै अए ओहो सब सोझे मे निधोक अन्टन-सन्टे बाजि रहल अछि। लाज-धाकक कोनो बिचारे नै। मन मे एलनि जे जहिना आगि मे जरैत लकड़ी पर पाइन देला से आगि त मिझा जाइत मुदा आगिक ताव(गरमी) त रहवे करैत। तहिना त लोकोक बीच हैत। गुन-धुन करैत मखन बाबा फराठी बले बीच रास्ताे पर ठाढ़ भ, ने आगू बढ़ैत ने पाछु होइत। अपन दायित्वन बुझि आ(मखन बावा) एक हाथ से फराठी पकड़ने आ दोसर हाथ उठा, सबके शान्तै रहै ले कहथिन। मुदा हुनकर अवाजो आ हाथक इषारो भीड़ मे हरा जाइत। सब अपने सूरे। थोड़े आगू बढ़ि मखन बाबा पाछु घुरि तकलनि ते देखलखिन जे एते काल चेतने लोक सब के देखै छेलियै, आब ते जेरक-जेर धियो-पूतो सब आवि रहल अए। गामक जते कुत्ता अछि सेहो सब नाङरि डोला-डोला भुकै अए। एक त देहक अब्ब-ल दोसर मन मे चिन्ता्, बीचे रस्ताभ पर फराठी रखि मखन बावा वैसि, दुनू हाथ माथ पर ल सोचै लगलथि। मन एलनि जे घटना भेल अछि ओ त इज्जेत स जुड़ल अछि। तेँ जँ लोक जान द बँचवै चाहै अए ते नीके करै अए। मुदा गामक भीतर त ऐहेन-ऐहेन किरदानी सब दिन होइ अए। तखन कहाँ कोइ किछु बजै अए। तइ काल मे छौँड़ा-छौउड़ीक खेल भ जाइ अए। इ बात मन मे अबिते मखन बावाक मुह स हँसी निकलल। हँसैत मखनबावा सोचलनि जे एक्के तरहक काज ले सैाँसे गामक लोक मारै-मरै पर तैयार अछि आ दोसर ठाम छउरा-छउरीक खेल बना दैत अछि। अजीव अछि लोकोक बुद्धि आ विचार। जँ एकरा इज्जाति बुझै छै ते इज्जबत बना राखह, नै जे खेल बुझै अए ते खेल बुझह। मुस्कीछ दैत ओ सबसे आगू जा रास्ताइ पर पइर रहलाह। पड़ल-पड़ल कहै लगलखिन- ‘‘अगर तू सब अइ से(अपना के चेन्हप बना) आगू बढ़बह ते हम एतै परान गमा देब। नै ते अखैन शान्ते हुअअ बाद मे रस्ताद से जबाव देवइ।''
मखन बाबाक बात सब मानि गेल। सब शान्तन भ गेल। स्त्रीनगण सब घर दिसक रास्ता धेलक। धीरे-धीरे लोको पतड़ाए लगल। बाकी जे लोक रहल ओ हुनका(मखन बाबा) लग जा पूछलकनि- ‘‘बाबा, कोना जबाव देबइ?''
उत्सानहित भ मखन बाबा कहलखिन- ‘‘अखन ते नहाइ-खाइ बेर भेल जाइ अए, तेँ अखन नहि। चारि बजेे मे सब कियो एक ठाम बैइसू। जे करैक हैत से सब विचारि के क लेब।''
सैह भेल।
चारि बजे सब ब्रह्मस्थाोन मे बैसल। सबहक विचार एक दिषाहे। दू पार्टी(पक्ष-विपक्ष) रहला से बैसारक रुप अलग होइत, मुदा से त नहि अछि। अप्पदन-अप्पपन विचार के सब जोर-जोर से बाजि-बाजि रखै चाहैत। जइ से ककरो कियो बाते ने सुनैत। सब अपने सुरे अपन बात रखै मे बेहाल। बजैत-बजैत जब सबहक पेटक बात सबटा निकलि गेलै तब अपने सब चुप भ गेल। चुप भ सब सबहक मुह देखै लगल। होइत-हबाइत सब मखन बाबा केँ कहलक- ‘‘बाबा, अहाँ जे निर्णय करब, हम सब मानि लेब।''
सबहक विचार सुनि मखन बावाक मन मे संतोष भेल। ओ अपन विचार दइ ले ठाढ़ भेला। मुदा बुढ़ापाक चलैत दुनू जाँघ थरथर कपैत। थरथराइत जाँघ देखि सब कहलकनि- ‘‘बैसिये के कहिऔ बाबा।''
मुदा बैसि के कहला से सब सुनत की नहि, इ बात मन मे होइन। ठाढ़े-ठाढ़ अप्पैन दुनू जाँघ के असथिर करैत मखन बावा कहै लगलखिन- ‘‘दू गामक झंझट असान नै होइत। दू गोटेक बीचक झंझट नइ छी। जहिना तू सब कहै छहक तहिना ते ओहू गामक लोक सब कहतै। अखन ते एक्के गोरेक संग घटना घटल अछि मुदा झंझट बढ़ौला से ऐहेन-ऐहेन कते घटना घटत। मारि करै जेबहक ते तोँहू मारबहक तोरो मारतह। तोँहू कपार फोड़बहक तोरो फोड़तह। हाथ-पाएर तोँहू तोड़बहक तोरो तोड़तह। अखन ने बुझि पड़ै छअ जे सोलहन्नी़ हमही सब मारबै आ ओ सब माइर खायत। मुदा माइर मे से थोड़े होइ छै। दुनू दिसक लोक मारबो करै छै आ माइरियो खाइ अए।''
मखन बाबाक विचार सुनि सब मूड़ी डोला-डोला सोचै लगल। सब सब दिस तकैत। सबहक मन मे बिचारक गंभीरता अवै लगलै। मुदा तइओ मन मे सोलहन्नीस क्रोध नै मेटेलै। मुदा मनक विचार मे गजपट हुअए लगलै। कखनो शान्तीमक रास्तास मन मे जोर पकड़ै ते लगले मारि-दंगाक विचार। लगले मन मे खुषी अबै ते लगले तामस उठै। सबहक मुहक रुखि देखि मखन बावा आगू कहै लगलखिन- ‘‘गामे मे की देखै छहक? जे कने हुबगर अछि ओ गरीब-गुरबाक संग केहेन बेवहार करै अए। तहिना गामोक होइ छै। अप्पैन गाम(वँसपुरा) भीतर मे फोंक अछि। देखते छहक जे सब अपन-अपन नून-रोटी मे भरि दिन लगल रहै अए। ने अपना पेट से छुट्टी होइ छै आने अनकर आ कि समाजक कोनो चिन्ता रहै छै। तेही ले बेइमानी-सयतानी सेहो करै अए। सब मिलि के कोनो समाजिक काज करी, इ विचार ककरो मे मन छइहे नहि। ओना सिसौनीयो मे बेसी नहिये छै मुदा अपना गाम से थोड़े बेसी जरुर छै। किऐक त सब मिलि दुर्गा पूजा क लइ अए। जइ से साल-भरिक जे रुसा-फुल्लीा रहै छै, ओ कमि जाइ छै। तेँ समाज के आगू बढ़ैक लेल दसनामा(सर्वजनिक) काज जरुरी अछि। जाबे तक लोकक मन मे दसनामा काजक प्रति सिनेह नइ आओत(औत) ताबे तक समाज आगू मुहे कोना ससरत? अइ नजरि से देखला पर बुझि पड़तह जे अपना गाम(बँसपुरा) से सिसौनी थोड़े अगुआइल अछि। सिसौनियो से अगुआइल अछि बरहरबा। किऐक त ओइ गाम(बरहरबा) मे दुर्गो-पूजा होइ छै आ पढ़ै-लिखै ले हाइयो स्कूुल तक छै। बरहरबो से अगुआइल कटहरवा अछि। ऐखते छहक जे कटहरबा मे हाइयो स्कूहल छै, अस्पबतालो छै आ साल मे एक बेरि सब मिलि के चारि दिनक मेला सेहो काली-पूजा मे लगा लइ अए। यैह सब काज गामके आगू बढ़ैक रास्ता छी। जइ गाम मे जते बेसी दसनामा काज हैत ओइ गामक लोक मे ओते बेसी प्रेम बढ़त जखने लोकक बीच प्रेम बढ़त तखने छोट-छीन बात ले झगड़ा-झंझट कमत। झगड़ा-झंझट की होइछै? देखबे करै छहक जे सदिखन एक-दोसर मे गारि-गरौबलि, मारि-मरौबलि होइते रहैछै। जखने लोक झूठ-फूस मे ओझराइये तखने ओकर घरक काज(खेती-बाड़ी, माल-जालक सेवा) मारल जाइ छै। जखने आमदनीक काज मरल जेतइ तखने चारु कात से अभाव दौड़ल औतै। अभाव तेना भ क' पकैड़ लेतै जे ओ बेवस भ जायत। जखने बेवस हैत तखने दुनिया मे अन्हाीर छोड़ि इजोत देखबे ने करत। तेँ जरुरी अछि जे लोकक मन दसनामा काज दिस बढ़ै। जइ गाम मे जते दसनामा काज हैत ओ गाम ओते तेजी से आगू बढ़त।''
मखन बाबा बजिते छल कि सब अपना मे कन-फुसकी करै लगल। कन-फुसकी एते हुअए लगलै जे सबहक धियान मखन बाबाक विचार स हटि अपना दिस भ गेल। लोकक धियान हटैत देखि मखन बाबा ठाढ़े-ठाढ़ सोचै लगल जे भरिसक सबहक मन मे कोनो नव विचार उपकलै। बैसले-बैसल जोगिनदर जोर से बजै लगल- ‘‘दुर्गा-पूजा ते आब परुका(पौरकाँ) साल हैत, मुदा काली-पूजा त लगिचाइल अछि। तेँ हम सब आइये संकल्पओ ली जे हमहू सब काली-पूजा गाम मे करब।''
जोगिनदरक बात सुनि सब कसि क' थोंपड़ी बजा समर्थन देलक। अही प्रतिक्रियाक फल थिक गाम मे काली पूजा। ओना रौदीक चलैत गामक किसान आ बोनिहारक दषा दयनीय, मुदा सिसौनीक घटना लोकक उत्सा ह केँ एते ने बढ़ा देलक जे बोनिहारो सब एकावन-एकावन रुपैया चंदा अपने-अपने मुहे गछै लगल। बोनिहारक चंदा किसान के मुसकिल मे द देलक। मुदा एक त समाजक संग चलैक सवाल दोसर आइ धरिक परिवारक प्रतिष्ठा केँ बँचबैक, तेसर नव काज गाम मे भ रहल अछि, तइ मे पाछू हटब, उचित नहि। एक्केष-दुइये किसानो सब उत्सानहित भ गेल। एक स्वार से सब समर्थन द देलक। सबकेँ उत्साषहित देखि प्रेमलाल ठाढ़ भ बजै लगल- ‘‘भाइ लोकनि, अपना गामक बहू-बेटी आन गामक मेला मे जा बेइज्ज त होइ अए। एकर की करण छै? एक कारण अछि जे अपना गाम मे कोनो तेहेन काजे ने होइ अए। जखने अपनो गाम मे तेेहेन काज हुुअए लगत ते अनेरे ओहू सब गामबला के दहसति हेतइ जे जँ हमसब ओइ गाम(बँसपुरा) वला के किछु करबै ते ओहो सब ओहिना करत। जखने बराबरीक बिचार मन मे औते तखने चालि-ढालि बदलतै। जखने चालि ढालि बदलतै तखने सब बराबरीक रास्ता धरत। जँ से नइ करत ते हमहूँ सब ओहिना करबै जना ओ सब करत।'' कहि प्रेमलाल बैसि रहल।
प्रेमलाल के बैसिते फेरि सब कन-फुस्की शुरु केलक। कनफुसकी एते हुअए लगलै जे सौजनिया भोज जेँका हल्ला बुझि पड़ै। कनफुसकी देखि छीतनलाल उठि क' ठाढ़ भ खिसिया के बजै लगल- ‘‘देखू, गल्लख-गुल्ल केने किछु ने हैत। सिसौनीवला सबके एते गरमी किएअ चढ़ल रहै छै से बुझै छियै? ओ सब दस हजार रुपैआ खर्च क क' दुर्गा-पूजा क लइ अए, तेँ। ओकरा सब के बुझि पड़ै छै जे अइ परोपट्टा मे हमही सब टा पुरुख छी। हमरे सब टा के रुपैआ अछि आ आन-आन गाम वला मौगी छी, ओकरा सव के रुपैआ छइहे नै। तेँ पुरुख बनि ओकरा सबके जबाव दिअए पड़त। ओ सब दस हजार रुपैया दुर्गा-पूजा मे करै अए हम सब पचास हजार रुपैया खर्च क क' काली-पूजा करब। जँ सवैया-डयोढ़ा काज करब ते ओ सब मद्दिये ने देत। किऐक ते पच्ची'स बर्ख से ओकर मुह अगुआइल छै। एक बेरि समधानि के दबैक काज अछि। तेँ तेना के दाबैक कोषिष करु जे ओ सब बुझत हमरो दादा कियो अछि। एक बेरि हरदा बजबैक अछि। तेँ, भने अखन सब बैसिले छी, अखने पूजा कमिटी बना लिअ। पूजा कमिटी मे सब टोल आ सब जाइतिक सदस्य बना लिअ। जँ सब टोल आ सब जाइतिक सदस्यम नइ बनाएव ते अनेरे लोकक मन मे अनोन-विसनोन हुअए लगतै। ततबे नइ, सब जाइतिक सदस्य भेने काजो मे असान हैत किऐक त सब तरहक काज करैक लेल अनुभवी लोक भेटि जायत।''
छीतन लालक कारगर विचार के सब एक मुहरी समर्थन देलक। कमिटी बनै लगल। सब टोल आ सब जाति मिला क एक्केकस गोटेक कमिटी बनि गेल। एक्कैबसो सदस्य बैसार मे। सब नौजवान। एक्केा बेरि सब अपना-अपना जगह पर ठाढ़ भेल। सैाँसे गामक सब आखि उठा-उठा के बेरा-बेरी एक्कैकसो के देखलक। एक्कै।सोक मन मे खुषी जे हमसब परिवार स आगू बढ़ि समाज मे एलौ। तेँ सब मुस्कुेराइत। एक्कैकसो गोटे एक दिषि बैसल आ शेष समाजक दोसर दिस। किऐक त कमिटीक लेल अध्यकक्ष, उपाध्यएक्ष आ कोषाध्यमक्षक जरुरत होइत। अध्य क्ष के बने? अइ सवाल पर सब सबहक मुह देखै लगल। किऐक त गाम मे पहिले-पहिल कमिटियो बनि रहल अछि आ तेकर अध्यपक्षो बनत। तेँ जहिना अध्याक्ष बनैक इच्छा सबहक मन मे, तहिना अनभुआर काज बुझि डरो। गुनधुन करैत रघुनाथ अप्प्न पितिऔत भाइ, देवनाथक नामक प्रस्ताभव अध्योक्षक लेल केलक। देवनाथक परिवार गाम मे सबसे अगुआइल। अगुआयल अइ माने मे जे जाइतियो पैघ आ धनो बेसी। दोसर गोरेक नामक प्रस्ता व नइ देखि मंगल उठि क' ठाढ़ भ अप्पकन नाम अध्यनक्षक लेल रखलक। जखने दू गोरेक नाम एलै कि बैसार मे गुनगुनी शुरु भेल। जाइतिक मामला मे मंगल पछुआइल।
देवनाथ आ मंगल, गामक स्कू ल स ल क' काओलेज संगे-संग पढ़ने। ओना पढ़ै मे मंगल तेज मुदा रिजल्टत देवनाथक नीक होय, किऐक त देवनाथ धुड़फन्दाआ। जना-जना दौड़-बरहा क क' नीक रिजल्टद आनि लिअए। मंगलक नाम सुनि दुनू भाइ-देवनाथ आ रघुनाथ आखिक इषारा से गप-सप करै लगल। कनिये कालक बाद रघुनाथ, मंगल के पलौसी दैत कहलक- ‘‘भैया, हमरा लिये जेहने अहाँ तेहने देवनाथ भैया। अहूँ दुनू गोरे संगिये छी। संगे-संग पढ़नौ छी। तेँ हम कहब जे देवनाथ भैया के अध्ययक्ष आ अहाँ उपाध्यभक्ष बनि पूजा-कमिटी चलाउ।''
मंगलक मन मे सिर्फ कमिटिये चलवैक बात टा नहि, समाज के आगू मुहे बढ़वैक विचार सेहो। बच्चे से देवनाथक चरित्र के मंगल देखने। मुदा समाज त पोखरिक पाइनिक सदृष्यर होइत। जहिना पोखरि मे गोला फेकला से पाइन मे हिलकोर उठैत मुदा रसे-रसे असथिर होइत, पुनः पहिलुके रुप मे चलि अबैत। जे बात मंगल जनैत। मंगलक मन मे एकटा आरो बात घुरिआइत। ओ बात इ जे एक दिन(करीब तीनि साल पहिने) एकटा गामेक लड़की संग देवनाथ दुरबेवहार करैत रहए। ओहि समय मंगल हाट स अबैत छल। ओ लड़की मंगल के देखि कानि-कानि देवनाथक संबंध मे कहलकै। मंगलक तामस बेकावू भ गेलै। देवनाथ के बिना किछु पुछनहि चारि-पाँच थापर गाल मे लगा देलक। थापर लगौलाक उपरान्तन तामसो कमलै। डर से देवनाथ थर-थर कपैत। ओना मंगलो थरथराइत। मुदा तामसे। मंगल देवनाथ के कहलकै- ‘‘बच्चाै से अखन धरिक संगी छेँ छोड़ि दइ छियौ, नइ ते समाजक बेटी संग अतियाचार केनाइ केहेन होइ छै, से सिखा दैतियौ।''
दुनू हाथ जोड़ने देवनाथ आगू मे ठाढ़। जिनगी भरि(अखन धरिक जिनगी) जे देवनाथ हँसी-मजाक से ल क' सब रंगक बात मंगलक संग करैत आइल छल, ओइ देबनाथ के आइ मुह स बकार नै निकलि रहल छै। जहिना बोली थरथराइत तहिना करेज। जेना कोनो अपराधी न्याायालय मे न्या याधीषक आगू अपना के बुझैत तहिना मंगलक आगू मे देवनाथ। आखि से नोर बहबैत देवनाथ दुनू हाथ जोड़नहि बाजल- ‘‘भैया, हम जे केलौ से पौलौ। संगी होइक नाते एकटा बात कहै छिअह जे अइ घटना के तीनि आदमी छोड़ि चारिम नै बुझै।''
हँसैत मंगल कहलकै- ‘‘आइ कान पकड़ि ले जे ऐहेन काज समाजक बहीनि-बेटीक संग जिनगी मे कहियो ने करब। समाजक ककरो बहीनि वा बेटी समाजक होइ छै। जाबे तक ओकर विआह-दुरागमन नै भेल रहै छै ताबे तक ओ माए-बापक ऐठाम रहि समाजक बीच रहै अए, तकर बाद त ओ सदा-सदाक लेल समाज छोड़ि दोसर समाज मे मिलि जाइ अए।''
यैह बात मंगलक मन मे घुरिआइत।
रघुनाथक बात के जबाब दैत मंगल कहै लगलै- ‘‘बौआ रघु दसनामा काजक(सार्वजनिक काजक) शुरुआत गाम मे भ रहल अछि। मुदा समाज त टुकड़ी-टुकड़ी भ छिड़िआयल अछि। तेँ सबसे पहिने ओइ टुकड़ी सब केँ बीछि-बीछि समेटए पड़त। जँ से नै हैत त स्वअस्थस समाजक निरमान(निर्माण) कन्नाए हैत। अखन धड़िक जे समाजक ढाँचा रहल ओ बेढ़ंग अछि। ओहि बेढ़ंग के ढंगर बनबैक अछि। जाबे तक से नै हैत ताबे तक वेइमान, शैतान, गुण्डां, बदमाष समाज पर हावी रहत। जाबे धरि ओ तत्व हावी रहत ताबे तक समाजक असली करता लुटाइत रहत। कमाइत कोइ आ खाइत कोइ। जे होइ अए। तेँ दसनामा काज मे समाजक बच्चात-बच्चा के बराबरीक हिस्साध हेवाक चाहियै। मुइल-टूटल कियो किअए ने हुअए मुदा ओकरा मन से इ बात निकलि जेबाक चाही जे इ काज(दसनामा) हम्मबर नै फलनाक छियै। हम मात्र करैवला छी, करबैवला नहि। इ बात सत्य जे हमरा सबहक बाप-दादा हर जोतैत आयल जे हमहू सब करै छी। तहिना कियो मोटा उठबैत आयल, त कियो अप्प न श्रम के दोसराक हाथे बेचैत आयल। कियो पालकी उठबैत आयल ते कियो ढोल-पीपही बजवैत, नीच-स नीच काज हमरा सबहक बाप-दादा से समाजक किछु गोटे करवैत आयल, अखनो करबै अए। की हमरा शरीर मे ओ शक्ति नै अए जे ओकरा बदलि सकब। आजुक समयक इ मांग भ गेल अछि। तेँ नजरि स काज के आगू बढ़ौल जाय। अखन गामक सब बैसल छी तेँ आइये अइ बातक निरनय(निर्णय) भ जेवाक चाही। हम नइ चाहै छी गाम मे दसनामा काज नइ हुअए। मुदा जना आन-आन गाम मे देखै छी तना नै हुअए देब। जँ से हैत ते हमहू सब फुट भ दोसर जगह(ठाम) पूजा करब।''
मंगलक बात सुनि सब चुपचुप भ मने-मन सोचै लगल। सबहक मन मे सब बात अँटबो ने करै। किऐक त अखन धरि जइ काजक अभ्यमस्तम भ गेल अछि आ आखिक सोझहा मे आन-आन गाम मे देखै अए, वैह बात मन मे नचैत। मुदा मंगलक विचार नव मनुक्ख , नव समाजक लेल अछि।
सबकेँ चुप देखि मंगल दोहरा क' बाजल- ‘‘जहिना नव घर बनवै ले पुरान घर के उजाड़ै पड़ै छै। जँ से नै उजाड़त ते नवका घरक नीब(वुनियाद) कोना देत। अगर पुरने घरके नव ढंग से बनवै चाहत ते ओ नव घर नहि, पुरना घरक मरम्मात हैत। सब कियो देखै छियै जे जते-कतौ दुर्गा-पूजा वा काली पूजा होइ अए, ओइ ठाम मुरती कुम्हाैर बनवै अए। जे माइटिक काज छियै। मुरती बनबैक लेल चाल बढ़ही बनवै अए। घर गरीब-गुरबा बनवै अए। मुदा सब काज भेला ओ पूजाक हकदार कोन बात जे स्थारनक भीतरो जेवाक अधिकारी नइ रहै अए। इ विषमता अखन धरि समाज मे अछि। तेँ हम ताबे तक विरोध करैत रहब जाबे तक इ विषमता मेटा जायत। हमर अध्येक्ष बनैक लिलसा नइ अछि, मुदा विषम के सम बनवैक जरुर अछि। तेँ हम कहब जे जते गोटे जते टोल आ जाइतिक छी ओ सब अपना-अपना मे विचार क निर्णय करु।''
मंगलक बात सुनि सबहक मन मे द्वन्द्वग उत्प न्न हुअए लगल। किऐक त समाजक अधिकांष लोक परजीवी बनि गेल अछि। परजीवी अइ माने मे जे कियो दोसराक कमाइ लुटि वा ठकि के जीवैत अछि। ते कियो दोसराक बले(जना कोट-कचहरीक पैरवी, थाना-बहाना, खरीद-विक्री, डॉक्टनर-वैद्य। ...?) जीवैत अछि। तेँ एक-दोसर स टूटै नहि चाहैत अछि। जे समाजक विषमताक जड़ि छी। पैइच-उधार, लेन-देन, एकर मुख्या अंग छियै। बड़ी काल धरि बैसार मे गुन-गुन, फुस-फुस होइत रहल। परोछ मे त उचित बात बजनिहारक कमी नहि मुदा सोझा-सोझी कियो नहि। एकरो दू कारण छैक। पहिल बुधियार लोक अनका कन्हाह पर बन्दूडक रखि चलबै चाहैत आ बूड़िबक डरे नै बजैत।
गुन-गुन, फुस-फुस होइत देखि मंगल बुझि गेल। मन पड़लै बुद्धदेवक ओ बात- जे बीणाक तार के ओते नै कड़ा कड़ी जे टुटि जाय आ ने ओते ढील राखी जे अवाजे ने निकलै। तेँ किछु इम्हओरो आ कुछ ओम्हुरो से(अर्थात् मध्य। स) ल क' डेग उठेबाक चाही। उठि क' ठाढ़ भ बाजल- ‘‘हम अप्पटन नाम वापस लइ छी। देवनाथे अध्यनक्ष हेता। मुदा आइ स ल क' जावे धरि पूजाक प्रकरण समाप्तह नहि भ जायत ताबे तक सब काजक निर्णय कमिटीक बीच हैत। जँ कियो अपना विचारे बलधकेल कोनो काज क समाजक नोकसान करत त ओकर फैसला समाजक बीच हैत।''
कहि मंगल बैसि गेल। मंगल क' बैसिते देवनाथ उठि क' ठाढ़ भ बजै लगल- ‘‘जिनगी मे पहिले-पहील दिन समाजक काज(सार्वजनिक) करैक मौका भेटल, तेँ मन मे बहुत खुषी अछि। मुदा हमहू त अनाड़िये छी, तेँ भुलचुक हेबे करत। हम चाहब जे पूजा-प्रकरणक जे मुख्यम-मुख्यक कार्य अछि ओ समाजेक बीच तय-तसफिया भ जाय। जहि स समाजक नजरि मे सब बात रहत।''
बहुत बढ़िया! बहुत बढ़िया बात देवनाथ कहलक। आइये(अखने) पूजाक मुख्यज-मुख्यम काजक निर्णय हम सब मिलि के क ली। तर्क-वितर्क हुअए लगल। तर्क-वितर्क होइत-होइत निर्णय भेल-
1. गामेक कारीगर(कुम्हालर) मुरती बनवे। ओना एक पर एक कारीगर बाहर अछि, मुदा पूजा-आराधना मे कारीगरी(कला) नइ देखल जाइ छै। देखल जाइ छै ओहि देवी-देवताक स्वारुप। दोसर बात जे जँ हम अप्प न बनौल वस्तुा के अपने अधला मानव, ते हम आगू कोना बढ़व? तेँ गामक जे कला अछि ओ ऐहेन-ऐहेन अवसर पर आगू बढ़ैत अछि।
2. काली मंदिर,(मंडप) गामेक घरहटिया बनवे। जेकरा घर बनवैक लूरि रहतै ओ मंडप किएक ने बनौत। संगे इहो हैत जे अधिक से अधिक गामक लोकक भागीदारी हेतैक।
3. पूजाक लेल, परम्पेरा स अवैक पुरोहितक संग ओहू आदमी के अवसर भेटै जे पूजा स सिनेह रखै अए। चाहे ओ कोनो जाइतिक किअए ने हुअए। समाज समाजक निरमते नहि नियामक सेहो होइत अछि।
4. मनोरंजनक लेल, गामक कलाकार के सेहो अवसर देल जाय। संगे वाहरक ओहन-ओहन तमाषा आनल जाय, जेहेन अइ इलाका मे नइ आयल अछि। इ बात सत्यय जे पैघ कलाकारक कला अधिक लोक देखबो करैत आ प्रसंसो(परसनसो) करैत, मुदा पैघियो कलाकार मे इ गुण होइत जे छोटो कलाकारक कला देखि आगू बढ़बैक कोषिष करैत। तेँ दुनू-गामोक आ बाहरोक कलाकार केँ अप्पआन-अप्प न कला देखवैक अवसर भेटए।''
5. पूजा समितिक सदस्यक आ अतिरिक्त् काजकेनिहार से बेहरी नै लेल जाय किऐक त ओकर समय लागि चुकल रहै छै।
6. जइ परिवार से बेहरी लेब, अगर जँ ओहि परिवारक कियो दोकान-दौरी करत, ते ओकरा से बट्टी नइ लेल जाय।
7. गामक जते गोटे काज करत, ओइ मे नीक-नीक काज केनिहार केँ पुरस्कृीत कयल जाय। संगे अधला केनिहार के आगू करैक मौका नइ देल जाय।
सैाँसे गामक लोकक बीच सातो निर्णय भ गेल। सातो निर्णय के अध्य क्ष पढ़ि के सबके सुना देलक। बैसार उसरि गेल।
खा-पी के मंगल बिछान बिछबैत राइतिक साढ़े एगारह बजैत। मंगल से भेटि करै ले जोगिनदर आयल। सतरंजी बिछा मंगल दुनू हाथ से जाजीम के पकड़ि झाड़लक। झाड़ैक अवाज कनी जोर से भेलै। अवाज सुनि जोगिनदर दलानक दावा लग डरे बैसि रहल। मन मे भेलै जे कतौ थ्री-नट्टा चललै हेँ। कान ठाढ़ क अकानै लगल। मुदा ने गल-गुल सुनै आ ने ककरो देखलक। मन असथिर भेलै, तखन उठि क' ठाढ़ भेल। ठाढ़ भ मंगल के सोर पाड़लक। कोठरिये से मंगल अबाज दैत बहरायल। बाहर आबि ओसारक चौकी लग आबि जोगिनदर के कहलक- ‘‘आबह! आबह! भाइ, निच्चाक मे किअए ठाढ़ छह? दुनू गोरे चौकी पर बैसि गप-सप करै लगल। जोगिनदर मंगल के कहलकै- ‘‘भाइ, आइ तक तोरा, ऐना भ क' नै चिन्हकने छेलियह। मुदा तोहर औझुका विचार देखि, बारह हाथक छाती भ गेल। भाँई मे क्योि दादा हुअए।''
जोगिनदरक बात सुनि मंगल बाजल- ‘‘भाइ, राइत बहुत भ गेल। भोरे उठैक अछि। एते राइत मे किअए ऐलह, से कहअ?''
‘‘एती राइत मे अबैक खास कारण अछि। तेँ निचेन बुझि एलौ। तू ते देखते छहक जे अखन तक हम गाम मे दहलाइते छी। ने रहैक ठौर आ ने जीवैक आषा। मुदा......।
‘मुदा की?'
‘‘मुदा यैह जे हम करोड़पति छी। करोड़क लप-झप रुपैआ हमरा बैंक मे अछि।
करोड़क नाम सुनि मंगल चौंकि गेल। अकचकाइत पूछलक- ‘करोड़ कते होइ छै से बुझै छहक?'
‘‘हँ। एक सौ लाख एक करोड़ होइ छै। एक सौ हजार एक लाख होइ छै। आ दस सौ के हजार होइ छै।''
‘रुपिया रखने कत-अ छहक?'
‘‘अइ गप के छोड़ह। जहिया से दिल्लीए नोकरी करै गेलौ तहिये से रुपैआक ढेरी लग पहुँच गेलौ। शुरु मे जे रुपैआ देखियै ते हुअए जे छपुआ कागज छियै। मुदा किछु दिन रहला पर रुपैआ हथिअवैक लूरि भ गेल। (कमाइक नहि) अखन, दिन भरि मे लाख रुपैआ हसोथब कोनो भारी कहाँ बुझै छियै। मुदा आब ओइ से मन उचैट गेल। आब एक्के टा इच्छा अछि जे बाहरक खेल-तमाषा छोड़ि, मनुक्खल जेँका गामे मे रहब। आब जँ गामो मे रहब, ते ओते-पूँजी भ गेल जे नीक-जेँका जिनगी बीति जायत।''
‘हमरा की कह-अ चाहै छअ?''
‘‘अखैन ते सब पूजा मे ओझड़ायल छी। तेँ पूजाक पछाति तू हमरा मदति क दाय। अखैन हम एक लाख रुपैआ ल क' आयल छी। अप्पेन जे लोक सब छअ, जदि ओकरा रुपैआक जरुरी होय ते हम बिना सुदिये के सम्हाछरि देबै। मूड़क-मूड़ घुमा देत। संगे तोरो कहै छिअअ जे रुपैआ दुआरे पूजा मे कोनो अभाव ने होय।''
जोगिनदरक बात सुनि मंगलक मन मे द्वन्द्व शुरु भेल। एक मन कहै जे रुपैआ दुआरे बहुत काज छुटि जाइ अए, से आब सम्ह।रि जायत। त दोसर मन कहै की हम डकैतक भाँज मे ने पड़ल जाइ छी। एसमगलर छी की माफिया? किछु बुझिये ने पड़ि रहल अछि।
दोहरा के मंगल पूछलकै- ‘एते रुपैआ कन्ना भेलह?'
मंगलक प्रष्नल सुनि जोेगिनदर चौंकन्नाआ भ चारु दिषि तकै लगल। मुदा ककरो नहि देखि घुन-घुना के कहै लगलै- ‘‘भाइ, जकरा ऐठिन हम नोकरी करै छलौ ओ बड़ पैघ कारबाड़ी। हजारो नोकर, ढेरो कारबार। मुदा सबसे भीतरका कारोवार रहै विदेषी रुपैआ के भजौनाइ। कोन-कोन देषक लोक कोन-कोन रुपैआ ल क' अबै आ अपना रुपैआ से भजबै, से चिन्ह-बो ने करियै। मुदा हमरा पर सेठबा के बड़ विसबास होय। किअए ते हमही सदिखन लगो मे रहियै आ चाहो-पान आनि-आनि दियै। निसोदंड राइत मे एक आदमी गाड़ी पर अबै आ भरि दिन मे जते रुपैआ भेल रहै ओ सब द दइ। आ ओकरा पासवुक पर रुपैया चढ़ा दै। सेठवा के जखैन जते रुपैआक काज होय, हमही बैंक से आनि दिअए।''
मंगलक भक्के खुजल। पूछलकै- ‘‘दिल्लीि सनक शहर मे पुलिस आ सी.आइ.डी. किछु ने करै?''
हसैत जोगिनदर कहलकै- ‘‘सबके महीना बान्हल छै।''
प्रषासनक इ रुप देखि मंगल हतोत्सा ह(हतोतसाह) भ गेल। मन मे अबै लगलै जे तखन लाक जीति कइअ दिन? छाती थर-थर कपै लगलै। मुदा मन के असथिर करैत पूछलकै- ‘तू ओहि सेठक संगे रहै छह कि.....?'
जोगिनदर- ‘‘दस बर्ख ओइ सेठवा अइठिन रैह के ओकर सबटा तड़ी-घटी बुझि लेलियै। नोकरी नइ छोड़लियै। ओकर कहलियै जे हम गाम जायव। माए दुखित अछि। तेँ अगुरबार रुपैआ दिअ जे माइयक इलाज करैब। भरि दिन मे कते शराब पीबे तेकर कोनो ठेकान ने, मुदा तइयो कतौ काज मे नै हुसै। हम सोचलहु जे एकरा ऐहेन कड़गर शराब पीआबी जे बेहोष भ जाय। सैह केलहुँ। जखन शराब पीलक आ निसां जोर करै लगले तखन वाहवाही दैत कहलक- ‘‘नीक माल अछि।''
हमहू अनठा देलिऐ। मने-मन सोचलौ जे जँ कही किछु रुपैआ ल क' पार करबै ते कानून मे ओझड़ौत। तेँ की केलहुँ जे कहलियै मालिक, हम चारि बजे भोरे चलि जायब। किएक त गाड़ी सवा चारि बजे टीषन से खुजै छै। अखने सब समान जोड़िया लेब। ओकरा निसां चढ़ैत जाय। जखैन बुझि पड़ल जे आब बेमत भ गेल, तखैन कहलियै- ‘‘मालिक रुपैया-पैसा अखैनिये द दिअ।'' पड़ल-पड़ल ओ कुन्जीक द देलक। कोठरी खोललौ ते रुपैआ देखि के मने उनटि गेल। जहिना अपना सब अन्नप भरल बोरा थकिऔल। एकटा वोरा निकालि, कोठरी बन्न क, चाभी पलंग पर रखि, अपना वैग मे रखि लेलौ। समानो सब सरिया लेलौ। सेठानी लग जा क' कहलियै- ‘‘मलिकाइन, हम भोरे गाम चलि जायब।'' ओकरा लग से निकलि दोस-महिम से भेटि-घाट करैत थाना पर गेलौ। सब चिन्हगरबे। कहलियै जे भोरे हम गाम चलि जायव तेँ अखन भेटि करै एलौ। सबसे भेटि-घाट करैत अपना डेरा ऐलौ। राति मे सुतलौ नै। दू बजे राति मे निकलि दोसक ऐठाम चलि गेलौ। सब बात दोसो के कहलियै। बीस लाख से उपर रुपैया रहै। ओकरे पूँजी बना हमहूँ वैह करोबार(विदेषी रुपैआ के भजौनाइ) शुरु केलौ। सबसे चिन्हाल-परिचय रहबे करै तेँ कतौ दिक्कभत हेबे ने करै। वैह हमर कमाइ अछि। मुदा आब ओइ काज से मन उचटि गेल। तेँ, आब गामे मे रहब।''
मंगल- ‘अप्पमन की योजना(जोजना) छह?'
जोगिनदर- ‘‘अप्पन मन अछि जे दस कट्ठा घरारी जोकर जमीन भ जाय आ पाँच बीघा धनहर। दस कट्ठा घरारी अइ दुआरे चाहै छी जे दसो कट्ठा के चारु भर से भरि मरद ऊँच छहर-देवाली द देबै। ओइ बीच मे डेढ़ कट्ठा मे चौघारा घर बना लेब। माछ पोसै ले दू कट्ठा खुनि लेब। वैह(ओही) माइट से सैाँसे भरा सेहो देवै। दू कट्ठा मे फल सब लगा लेब। दू कट्ठा तीमन-तरकारी ले राखब आ बाँकी अढ़ाइ कट्ठा ओहिना खसा के राखब। किऐक ते अन्नटक मास मे खरिहानक जरुरी होइत। ओहुना कते काज परिवार मे होइत रहै छै।''
मन पाड़ैत मंगल कहलकै- ‘देखते छहक जे बथनाहा(बगलवला गाम) मे अवधिया सब अछि। ओकरा सबहक खेत अपनो गाम मे अछि। ओइ मे से एक गोरे बैंक मे नोकरी करै अए। समांगोक पातर अछि। असकरे अछि। आन-आन गोरे ते अपने खेती करै अए, मुदा ओकर खेत बटाई लागल छै। ओ अपना गामक(बथनाहा छोड़ि) जमीन वेचै चाहै अए। करीब दस बीघा जमीन अपना गाम मे छै। अगर चाह-अ ते दसो बीघा भ जेतह। ओहो पाँच बीघा से कम नै बेचै चाहै अए। अगर खुदरा-खाइन बेचते ते बिका गेल रहितै। मुदा ने एक ठाम पाँच बीघा कीनैक ककरो ओकाइत छै आ ने ओ खुदरा बेचत। मुदा एकटा बात पूछै छिअ? अखन धरिक जे तोहर जिनगी छअ ओ हमरा विचारक विपरीत छअ। तेँ हमरा तोरा बीच कते दिन अपेछा चलत, तइ पर शंका अछि। इ कोना मेटाइत?'
मंगलक बात के सुनि जोगिनदर गंभीर भ सोचै लगल। थोड़े काल सोचि जोगिनदर जबाव देलक- ‘‘मंगल भाइ, तोहर शंका सोलहन्नी सही छह। मुदा हमरो मन अप्पमन काज से उचैत गेल। सदिखन, चोरक मन जेँका हमरो मन डराइले रहै अए। हरदम होइत रहै अए जे कखन सड़क पर घूमै छी आ कखन जेल मे रहब, तेकर कोनो ठीक नहि। ओना रोडक सिपाही से ल क' नीक-नीक पाइवला सलामी दइ अए। मुदा हम इहो बुझै छियै जे जोगिनदर के नहि, जोगिनदरक धंधा आ पाइ के सलामी दइ छै। कहियो काल जे राइत मे सपनाई छी ते ओहिना देखै छियै। जे आगू-आगू सी.पी.आइ. गरिअवैत आ पाछु-पाछु सिपाही थोपड़बैत रास्ताद पर नेने जाइ अए। मन मे कखनो आन विचार नइ अबै अए। सदिखन देषी-विदेषी पाइयेक रहै अए। तेँ कखनो मन मे होइ अए जे आगू मुहे सरसराइल जा रहल छी त लगले होइ अए जे अइ दुनियाँ से पड़ाएल जा रहल छी। हमरा ले अइ दुनिया मे पाइ छोड़ि की अछि?'' एते-बजैत-बजैत जोगिनदरक दुनू आखि से दहो-बहो नोर खसै लगलै। दुनियाक प्रति आकर्षण देखि मंगलोक हृदय दल-दल भ अपना मे जोगिनदर के साटै चाहैत। मुदा तरल वस्तुण रहनहुँ करुतेल आ मटिया तेल कोना मिलत? जँ घोड़ाइयो जायत ते दुनू दुनूक गुण के समाप्त क' देतए। मुदा मनुक्ख क जे बदलैक क्रिया अछि ओ एते प्रबल(परबल) अछि जे शायद अनुपमेय अछि। तेँ कोनो मनुक्ख क संबंध मे निसचित(निष्चि त) बात कहि देब असंभव बात थिक। हँ जिनगीक दषा देखि कहलो जा सकै अए। मुदा तइओ मंगलक मन मे एकटा नमहर खाइध बुझि पड़ै। ओ इ जे अखन धरि हम तपबे केलौ मुदा इ ते तपक उनटे चलल। उम्र मे अधिक अन्त़र भले ही नइ हुअए मुदा जिनगी त दू दिषा से बढ़ि रहल अछि। मने-मन सोचै लगल। एकटा बात मन पड़लै। ओ(मंगल) मात्रिक(मातरिक) गेल रहै। कोषिकन्हा मे मात्रिक। कोषी स(पूव मे कोसी आ पछिम मे कमलाक बीच जते धार-धुर छै) ल क' कमला धरिक पाइन(बाढ़ि) ओहि गाम होइत दछिन मुहे जाइत। एकटा बाँसक बीट रहै। ओहि मे चालीस-चालीस हाथक बाँस रहै। अगते बाढ़ि(वैषाखे मे) आबि गेलै। गामक लोक गाम छोड़ि, माल-जालक संग सब अप्पढन-अप्प)न कुटुमक ऐठाम चलि गेल। ऐहेन परिस्थि ति मे जन्मम भूमि स्वंर्ग कोना भ सकै अए? पनरह हाथ पाइन ओइ बाँस मे लगि गेल। खाइधनुमा बाध। अधिक दिन धरि बाढ़ि रहलै। ओइ बाँस मे पनरह हाथ उपरक गिरह पर से बाँसक कोपड़ रहलै। ओइ बाँस मे पनरह हाथ उपरक गिरह पर से वाँसक कोपड़ द देलकै। जखन पाइन सुखलै ते आमेक गाछ जेँका बाँसक बीट बुिण् पड़ै। सोचैत-विचारैत मंगलक मन मे एलै जे एकटा(षर्त्त) बान्हि स बान्हिस दोसती क लेब। मुस्कुमराइत मंगल कहलक- ‘‘
भाइ, जहिना तू दरबज्जाष पर ऐलह तहिना तोहर सुआगत करब हमरो काज भ जाइ अए। मुदा हम आइ धरि झूठ नै बजलौ, से हमरा कोना निमहत?
मंगलक बात मंगलक पिता गणेष सेहो सुनलक। ओ पेषाब करै ले निकलल छल। हाँई-हाँई के पेषाब क गणेष दुनू गोटेक बीच पहुँच गेल। जोगिनदर चीन्हि गेल। बाजल- ‘‘आबह-आबह कक्काण! तोहूँ एतै बैसह।''
गणेष कहलक- ‘‘बौआ हम बैसिवह नहि। ठाढ़े-ठाढ़ अप्प'न एकटा खिस्सा। सुना दइ छियह। करीब चालीस साल पहिलुका बात छी हम जुआन होइते रही। मोछ-दाढ़ीक पम्ह् अविते रहै। माए-बाबू जीविते रहथि। हम एक्कोह धुर जमीन बढ़ेलहुँ नहि, जते एखनो अछि ओते ओहू दिन मे रहै। एहिना कातिकक मास रहै। तीन बजे करीब(बेरु पहर) एकटा मोटरी नेने, नाना पहुँच गेलाह। अबिते माए के कहलखिन- ‘‘दाय, हम गंगा नहाइ ले जाइ छी। गामक बड़ लोक जाइ अए। हम ओकरा सब के कहि देने छियै जे टीषने पर भेंट हेबह। तेँ ताबे हमहू सुसता लइ छी आ तोहू तैयार हुअअ। खेवा-खरचा हमरा अछिये तेँ कोनो चीज लइ-दइ के नै छअ।'' नानाक बात सुनि माए गुम्म- भ गेलि किअए त एक दिन पहिने गाय विआइल छलै। अइ सब मे माए बड़ सुतिहार रहै। पहिने गाय विआइल छलै। अइ सब मे माए बड़ सुतिहार रहै। माइयक मन मे दू टा बात टकराइ। एकटा इ जे हम ओमहर(गंगा नहाइ ले) जाइ आ इमहर गाय के किछु भ जाय, तखन ते दस मासक मेहनतक मेहनहताना चलि जाइत। आ दोसर बात इ होय जे गौँवा छोड़ि के हमरा संग करै आयल, हम नइ जेवइ आ ओमहर गौँओ छुटि जाय, तखन की हेतइ? तेँ गुम्म । ताबे बवुओ मालक घर से निकलि के आयल। हम ते रहबे करी, मुदा हमर मोजरे कोन। बावू आबि के गोड़ लागि आगू मे ठाढ़ भ गेलखिन। ने माए किछु बजैत आ ने बावू। नाना अप्प न बात बाजि चुकल रहथि तेँ ने किछु बजैत। पानि आनि के हम पहिनहि राखि देने रहियै। तीनू गोटे के चुप देखि हमही कहलिअनि- ‘‘नन्ना पैर धुअ-अ ने।''
एतबे बजैत देरी कि नन्नाे बजै लगलखिन- ‘‘नै-नै, पैर-तैर नै धुअब। टेनक टेम भेल जाइ छै।''
सामंजस्य' करैत माए बाजलि- ‘‘बच्चाम, छोड़ैवला कोनो ने छह। नाना संगे तोँही जा...।''
मन अपनो रहै, मुदा किछुु बाजी नहि। किऐक त एक दिन एकटा खिस्सा सुनने रहियै जे गंगा तेहेन भारी(नमहर) धार अछि जइ मे सैाँसे दुनिया क मनुक्ख् स ल क' चुट्टी-पीपरी धरि अटि जायत। तइओ पेट(गंगाक पेट) खालिये रहत। तेँ देखैक जिज्ञासा रहै। नाना संगे विदा भेलौ। जखन गंगा मे पैसि(दुनू गोटे) नहाइ लगलौ कि नाना कहलनि- ‘‘नाइत, मने-मन गंगा के कहि दहुन जे आइ से झूठ नै बाजब, आ डूम ल लाय।'' सैह केलौ। दू सालक बाद बाबू मरि गेल। घरक भार पड़ि गेल। मुदा काज करैक लूरि त सबटा रहबे करै। कहियो कोनो भार बुझिये ने पड़ै। झूठ बजैक जरुरते ने हुअए। किऐक ते भरि दिन अपना काज मे लागल रही। दछिनबारि टोल मे सरुप रहै। दस बीघा खेतो रहै। मुदा फुर्र-फाँइ वला आदमी। ललबवुआ। ने खेती-पथारी नीक जेँका करै आ बड़द खूँटा पर रखने रहै। भरि दिन ऐमहर से ओमहर केने घुरै। कनफुसकी क-क क' लोक सब के खूब झगड़ा लगबै। रहवो करै बड़ डाहि। अनके हर-बड़द से खेतियो करै आ जइ जन के खटबे ओकरा बोइनो ने दइ। तेँ कि होय जे दस बीधा खेत रहनौ दुइओ मासक बुतात नै होय। जेकरा से जे चीज लइ ओकरा फेरि घुमा के नइ दइ। एक दिन अपना ऐठाम आबि कहलक- ‘‘गणेष, सुनै छी तू चाउर बेचै छह?''
हम कहलियै- ‘हँ।'
‘‘हमरा एक मन चाउरक काज अछि।''
‘‘भऽ जायत। ककरो पठा देवइ, नइ जे अपने नेने जायब ते ल लिअ।'' ओ चाउर तौला के छोड़ि देलक कहलक जे तोरा तगेदा करैक काज नहि। जखने हाथ मे रुपैआ औत तखने तोरा द देवह। हम कहि देलियै- ‘‘बड़बढ़ियाँ।'' छह मास बीति गल। जखन जुआन से कहि देने रहियै जे तगेदा नइ करब तखन तगेदा कन्ना करितियै। साल बीत गेल। दोसर साल फेरि ओहिना केलक। तेसरो साल केलक। ओ चाउरक दाम दिअए नै आ हम तीनि खेप चाउर द देलियै। पाइयक दुआरे अपन काज बिथुत भ जाय। तब मन मे आयल जे कमाइ हम खाय दोसर, इ त सोझा-सोझी गरदनि कट्टी भ रहल अछि। ओह, से नइ ते आब चाउर गछबे ने करबै। कहबै जे नइ अछि। मुदा फेरि मन आयल जे झुठ कोना बाजब। विचित्र स्थि ति भ गेल। हारि के झूठ बजै लगलौ। तेँ बौआ, तू दुनू गोरे जवन जहान छह, कहि दइ छिअ-अ जे नीक-अधलाक विचार करैत आगू मुहे पाएर उठविहह।''
जीवन संघर्ष ःः 2
अमावासिया दिन। आइये दिवालियो होएत आ कालियो पूजा।
Saturday, October 03, 2009
पेटार ३८
उपन्यानस
जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
उत्था न-पतन ःः 1
गामे-गाम, कतौ अष्ट1याम कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ त' कतौ सहस्र चण्डी यज्ञ होइत। किऐक तँ एगारह टा ग्रह एकत्रित भ' गेल अछि। की हैत की नै हैत कहब कठिन। एकटा बाल ग्रह बच्चा केँ भेने त' सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह टा ग्रह एकत्रित अछि तइ ठाम त' अनुमानो कम्मेर हैत। परोपट्टा भगवान नाम सँ गदमिसान होइत। जओ तील, घीउक गंध सँ हवा सुगन्धि त। सभक हृदय मे भगवान क स्वँरुप बिराजैत। सभ व्यठस्त । सभ हलचल। खरचाक कोनो इत्ता नहि। जना निसाँ लगला सँ बेेहोशी होइत, तहिना। जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग, मंडप मे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्ति भ' रहैत। मुदा घर पर अबितहि केयो भूखल गाय-महीसिक डिरिऐनाई सुनि, चिन्तिोत होइत तँ क्योर बच्चा केँ बाइस-बेरहट ले बच्चाईक ठुनुकनाइ सुनि। दुखि भ' आँखि मे नोर भरैत। चारि सालक रौदीक चलैत पोखरिक पानि सूखि गेल। नमहर-नमहर दरारि खेत सँ ल' क' पोखरि धरि फाँटि गेल। इनारक मटिआइल पानि भरि-भरि सभ घैल मे राखैत, जखन फड़िछाइत तखन गिलास, लोटा मे ल' ल' पीबैत। लोक की करत? कत्त' जायत? मृत्युखक मुह छोड़ि दोसर रस्तेल की? आजुक कोलकत्ता ओ कोलकत्ता नहि जहिठाम अकाल आ समुद्री तूफान सँ ढ़ेरो लोक मरैत छल। जकरा आइ अपन दोसर घर बुझि लोक जीवन-यापन करै जाइत अछि। आजुक पंजाब ओ पंजाब नहि जहिठाम आन-आन राजक लोक जा खेत-खरिहान सँ कारखाना धरि खटि क परिवारक भरण-पोषन करैत अछि। पंजाबक ओ दशा छल, जहिठाम कल-कारखानाक कोन गप्पर जे खेतक माटि गेउर रंगक कंकड़ मिलल, बरखा सँ भेटि नहि होइत छलै। साइते-संयोग साल मे कहिओ बरखा भ' जाइ छलै। ओतुक्काा लोक भागि-भागि आन-आन राज जा हड़तोड़ मेहनत क' जीविका चलबैत छल। मुम्बाई आजुक मुम्बेई नहि। ने सिनेमा उद्योग छल ने कलकारखाना आ ने अखुनका जेँका कारोबार।
गंगानन्दे केँ तीस बीघा जमीन। तीनि भाईक भैयारी आ सत्तरह गोटाक आश्रम। जइ साल नीक समय होइत ओइ साल आश्रम चला, मलगुजारी दइयो क' गंगानन्द केँ अन्नर उगड़ि जाइत जकरा दू-सलिया, तीनि सलिया पुरान बना खाइत। सबाइयो लगबैत। पहिल सालक रौदी गंगानन्दइ किऐक बुझताह। घर मे धान-चाउर, गाय-महीसिक लेल बड़का-बड़का दू टा नारक टाल। गंगानन्ददक मोन पहिलुके जेँका हरियर। दोसर साल भरल कोठी, ढ़क(ठेक) खलिआइल। रौद मे, जहिना गाछ सँ तोड़ल फूल मौलाई लगैत तहिना गंगानन्दीक मोन मन्हुलआई लगलनि। कुटुम्बोा-संबंधीक आवा जाही बढ़ि गेलनि। रीता गंगानन्दहक जेठ बेटी जे सासुर बसैत। चारि बेटी आ एकटा बेटा रीता केँ। जेठकी आ मझिली बेटी विआह करै जोकर भ' गेल। जहिया कहिओ कोनो काज मे रीता नैहर आबति, काजक पराते सासुर जाइ ले धूम मचावैत। कारण सासुरक सब भार रीते दुनू परानी पर। भैयारी मे जेठ रहने घर सँ बहार धरिक सब तरद्दूत करय पड़ैत।
रौदीक चलैत रीता धिया-पूता ल' छबो गोटे नैहर गेलि। मासो सँ उपरे भ' गेलैक मुदा सासुर जेवाक चर्चे ने करैत। बाप-माय बेटी केँ कोना मुँह फोड़ि जाइ ले कहत। भरिआयल खरचा सँ गंगानन्दे तेरे-तर कुहरैत। छाती दलकैत। साल खेपब कठिन। बरखाक कतौ पता नहि। सभ खेत परती भेल पड़ल। ने हर जोतय जोकर एकोटा आ ने पानिक कोनो दोसर उपाय। मने-मन रीता सोचए जे अगर सुमनक(जेठ बेटी) विआहक चर्चा माए करत तँ ओकरे माथ पर पटकि देव। अपना बूते तँ वियाह पार लागव कठिन अछि।
सभ दिन साझू पहर क' गंगानन्दन चूड़ाक भूजा फँकैत। बीस मनिया कोठी टा मे चाउर बचल। धान पहिनहि सठि गेल छल। धानक दुआरे चूड़ा कथीक कुटाओल जायत। पत्नीध(गंगानन्द क) पार्वती पतिक अभ्यातस बूझि चाउर भूजि छिपली मे नेने एलखिन। भूजल चाउर देखि गंगानन्दि मने-मन बुझि गेलखिन जे धान सठि गेल। पुरान चाउर रहने भूजा पथरा गेल, तेँइ सक्कनत। पहिलुक फक्काे मुँहमे लइते गंगानन्दहक दाँत सिहरि गेल। दाँत सिहरतहि गंगानन्द् लोटाक पानि मुँहमे ल' गुल-गुला केँ घोटलक। मुँहक चाउर घोटि छिपली आगू सँ घुसका देलखिन। मने-मन पार्वती अंदाजलनि जे सक्क्त दुआरे भूजा नहि खेलनि। मुदा उपाय की? गंगानन्दम केँ तामस नहि उठल। जँ घरमे धान रहैत तँ चूड़ा कुटाओल जायत। नै रहने कतए सँ आओत। जहिना लकड़ी जरि केँ राख भेला पर षक्तिघहीन भ' जायत तहिना गंगानन्दँक दषा भ' गेल। गिलासमे चाह नेने सुमन(नातिन) आइलि। दुनू परानीक नजरि सुमन पर पड़ल। चाह राखि सुमन आंगन चल गेलि। लग्गीा भरि हटि क' बैसलि पार्वतीकेँ हाथक इषारा सँ गंगानन्दु लग ऐवा ले कहलनि। पार्वती बैसले-बैसल घुसुकि क' लग आयलि। फुस-फुसा क' गंगानन्दक पत्नीबकेँ कहलखिन- ‘‘रीताक दुनू बेटी(जेठकी आ मझली), विआहए जोकर भ' गेल। जँ कहीं एहि साल एकोटा वियाह ठनलक तँ इज्जसत वाँचव मोसकिल भ' जायत। हमहू तँ नने छियैक।''
अखन धरि वार्वती अंगना सँ दलान धरि अवैत-जायत। एहि सँ अधिक ने देखैक समय भेटलनि आ ने घरक नीक अधला बुझल। नातिनक वियाह बुझि उद्गार सँ पार्वती कहलकनि- ‘‘यज्ञो ककरो बाकी रहैत छै। यैह तँ भगवानक लीला छन्हिक जे गरीब स' ल' क' अमीर धरि सभक काज होइते जायछै।''
चोटाइल साप जेँका गंगानन्दयक दषा। दिन ससरब कठिन। तई पर सँ पत्नीँक चढ़ल बात सुनि, केँचुआ छोड़ैत जना सापक साँस तेज भ' जाइत तहिना नमहर साँस छोड़ैत गंगानन्द, कहए लागलखिन- ‘‘ऐहन दुरकाल मे जीवि कठिन अछि तई पर वियाह सनक यज्ञ....। तहन तँ जकरा सिर पर जे काज अबैत छैक, कोनो ने कोनो तरहेँ करिते अछि। दू सालक रौदीक झमार। अखनो धरि पानिक कोनो आषा नहि, पहिले ओ पार करब अछि। वियाह तँ एक-आध साल आगूओ बढ़ाओल जा सकैत।''
ओलती लग ठाढ़ भ' रीता माय-बापक फुसुर-फुसुर सुनैत। जखन गप्प- मोड़ पर आयल कि रीता आगू बढ़ि मायक लग आबि ठाढ़ भ' गेलि। अपन बात क' छिपबैत गंगाननद कठहँसी हँसि पत्नी केँ कहए लगलनि- ‘‘रीतोक बेटी वियाह करए जोकर भेल जाइछै?''
मुँह निच्चाँ केने रीता बाजलि- ‘‘बावू, दुनू बहीन तरे-उपरे भ' गेलि अछि। मुदा घरक जे दषा अछि तहि मे अखन वियाह पार लागब कठिन अछि। जखन समय-साल सुधरतै तखन बुझल जेतै।''
मने-मन गंगाननद सोचति जे घरक भार पड़ला सँ सभ आगू-पाछू देखि किछु करैत। मूड़ी हिलबैत गंगानन्दग कहलखिन- ‘‘हँ, से तँ ठीके। अखन विवाह करबाक अनुकूल समयो ने अछि। सिर्फ हमरे टा नइ समाज मे बहुतोँ के बेटी विवाह करै जोकर छै। सभक पार तँ भगवाने लगौथिन।''
पिताक बात सुनि रीता क' मोनमे षान्तिक एलै। अपन परिवारक संबंध मे रीता पिताकेँ कहए लागलनि- ‘‘बावू घरक हालत बड़ खराव भ' गेल अछि। एक तँ दू-अढ़ाई बरखक रौदी दोसर सवांगो सभ उहिगर नहि नै क्योम कमाई-खटाई बला नहि। भरि दिन, कतौ बैसि, गप्प -षप्पर लड़वैत दिन बितवैत छथि। जेना कोनो धैन-फिकिर नहि। भैयारी मे जेठ रहने दुनू परानी काजक पाछु दिन-राति खटैत-खटैत अपस्याँ त रहैछी।''
मास पूरए(पूरै) मे दू दिन रहल। राजक सिपाही केँ पटवारी अंतिम सूचना मालगुजारीक लेल पठौलक। सिपाही आबि गंगानन्दर केँ कहलकनि- ‘‘परसू तक जँ मालगुजारी नै देवइ तँ जमीन निलाम भ' जायत। पटवारी अपन जाति-बेरादर बुझि चुपचाप पठौलनि।''
सिपाहीक समाचार सुनि गंगाननदकेँ हृदय मे ऐहन धक्का। लगल जना कोनो राजाकेँ दुष्मुन राज छीनि, भगा दैत। छाती धकधकाइत, कंठ सुखैत, गंगानन्दद सिपाहीकेँ कहलक- ‘‘अखन जे दषा अछि तइ मे मालगुजारी देव असंभव अछि। दोसर कोनो रास्तोख ने सुझैत अछि।''
गंगाननदक मजवूरी वुझति सिपाही कहलकनि- ‘‘एकटा उपाय अछि।''
‘‘की?''
‘‘पटवारी केँ वियाहै जोकर बच्चिाअया छन्हि्। अहाँ अपन बेटाकेँ बियाह क' लिअ। देबो-लेब नीक जेँका हैत। हुनके हाथक काज छन्हि जमीनक रसीद द' देताह। क्योक बुझवो ने करत काजो भ' जायत।''
बचनाक आवाज सुनि, फुलिया जाँत चलौनाई रोकि, एक हाथ सँ हथरा पकड़ने, तकलक। बचनाक मोन, जना धिया-पूताक हाथ सँ कौआ रोटी लपकि उड़ला पर होइत, तहिना सोगाइल मने बचना पत्नीह(फुलिया) केँ कहलक- ‘‘हम लक्ष्मीजपुर(फुलियाक नैहर, अपन सासुर) जाइ छी जँ कोनो गर रुपैआक लागि जायत तँ लगौने अवै छी।''
नैहरक नाम सुनि फुलियाक मनमे आनन्दोक अंकुर अंकुरित होअए लगल मुदा विपत्त्कि चादरि ओकरा झाँपि देलक। सोगाइल मने फुलिया बाजलि- ‘‘जाउ, कपार तँ फुटले अछि तइओ अपना भरि परियास करु। कपार तँ उनटवो-पुनटवो करैछै जँ नीके गड़े उनटि जाय। कनिये थमि जाउ। रोटी पका दइ छी। खा केँ जायव।''
मन्हु आइल बचना ठोर पटपटबैत बाजल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। ताबे हमहू दौड़ले दाढ़ी बनौने अवैछी। नहाइयो लेब।''
बचना दाढ़ी कटबै ले विदा भेल। फुलिया जाँत लगक चिक्क स मुजेलामे उठौलक। चुल्हिा लग मुजेला राखि कोठी परसँ चिक्साुही सूप अनलक। गठूलासँ जारन आनि चुल्हिा पजारलक।
नौवा गाममे नहि छल। मूड़नक पता देइ ले सुखेत गेल छल। बिना दाढ़ी कटौनहि बचना घुमि आवि, नहाए लगल। फुलिया रोटी पका, भाँटा क' सन्नान बनौलक। बचना हाँहि-हाँहि खा, धोति-अंगा पहिर छाता ल' लक्ष्मीछपुर विदा भेल। वचना रास्तोन चलै आ मने-मन महावीरजी कँ सुमरैत कहलकनि- ‘‘हे महावीरजी काज भ' जायत तँ अहाँ केँ एक रुपैया क' चिन्नीव चढ़ाएव।'' महावीरजी केँ कबूला करितहि जना बचनाक मोनमे विष्वा स भ' गेल जे काज हेबे करत। लक्ष्मीहपुर पहुँचते बचना सभक मन उदास देखलक। मने-मन वचना सोचए लगल की भ' गेल जे सभक मोन खसल छै! मुह सँ फुफरी उड़ै छै। करेज पर पाथर राखि बचना सरहोजि सँ पूछलक- ‘‘किऐक सभ अनोन-बिसनोन जेँका छथि।''
नोराइल आँखिये सरहोजि उत्तर देलकनि- ‘‘पाहुन की कहब, खेतक मलगुजारी दू सालक पछुआयल छै। तई दुआरे परसू सब खेत लिलाम भ' जेतै।''
सरहोजिक कलहंत बात सुनि बचना अवाक् भ' गेल। ककर दुख के हरत! पाएरो ने धोय चोट्टे बचना गाम घूमि गेल।
विसेसर घरक आगू मे रास्ताग पर लोक सभ ठाढ़। रौदाइल विसेसर। हर जोेति कँ अबिते छल। हाथ मे हरवाही पेना। माथ मे गमछाक मुरेठा बन्हसने। फरिक्केि सँ विसेसर सुनलक जे कचहरीक सिपाही बलजोरी बाड़ी जा कदीमा तोड़ि लेलक। मोहिनी(विसेसरक पत्नी ) कतबो मनाही केलकै सिपाही नहि मानलकै। मोहिनी आ सिपाहीक बीच रक्का -टोकी होइते छल, कदीमा सिपाहीक हाथे मे छलै। धाँय-धाँय विसेसर चारि-पाँच पेना सिपाहीके लगा, कदीमा छीन लेलक। गरिअबैत विसेसर कहलक- ‘‘बापक बाड़ी बुझि कदीमा तोड़ले। सिपाही तू मालिकक छीही की हमर?''
चारि-पाँच गोटे पकड़ि विसेसरकेँ बैसौलक। दू-दू गोटे दुनू डेन पकड़ने तइओ जोष मे बिसेसर उठि क' ठाढ़ भ' हुरुकि-हुरुकि सिपाहीके मारैक कोषिष करए। लोकक कहला सँ कनेक तामस विसेसरक कमल। गरिऔनाइ बन्नस केलक। मुदा तामसे ठोर पटपटैबिते। षान्तो भ' विसेसर बाजल- ‘‘अहाँ समाज मिलि पकड़लहुँ, मुदा पच्चीेस बेर सिपाहीकेँ कान पकड़ि उठाउ-बैसाउ। चाहे थुक फेकि चटबाउ जे फेरि ऐहन गल्तीो नै करै। ई चोर छी। लालीस क' जहल से बाहर नै हुअए देवइ। राँड़-मसोमात हमरा बुझलक।''
बिसेसर कँ मात्र दू कट्ठा घरारिये टा। सेहो बेलगान। दुइये गोटाक आश्रम। बेटा-पुतोहू भिन्नर। एकटा तेरह हाथक घर अपनो आ बेटो मिला केँ। बाकी डेढ़ कट्ठा बाड़ी बनौने। मोहिनी अपन बाड़ी मे सभ दिन राषि-राषि क' तरकारी उपजबैत। बिसेसर बोइन करए। दुनू परानीक मिलानक चर्चा गामो मे होइत अछि। दुनू गोटे अपन-अपन काज बँटने। भिनसुरका उखराहाक तीन सेर धान आ बेरका डेढ़ सेर दलिहन बोइन सभ दिन विसेसर कमाइत। दुनू साँझ भरि पेट खाय निचेन सँ रहैए। कोनो हरहर-खटखट जिनगी मे नहि। दू सेर चारि सेर घरो मे अन्नट रहैत। साठि बर्खक विसेसर जुआन जेँका तनदुरुस्त । ने एकोटा दाँत टूटल आ ने केष पाकल। जना दोसर-तेसर बोनिहार पचास वरख पुरैत-पुरैत झुन-कुट बूढ़ भ' जाइत तना विसेसर नहि। नियमित काज खायब आ सुतब विसेसरक खास गुण छलैक। तरकारीक गाछ रोपै स ल' क' पटौनी, कमौनी सभ मोहनिये करैत अछि।
मोहिनी डेढ़हो कट्ठा बाड़ी मे कोदारिक काज सँ ल' क' खुरपी हसुआँक सभ काज करैत अछि। लत्ती-फत्ती ले छोट-छोट मचानो अपने बना लैत। तरकारीक गाछ रोपब, पानि देब, कमौनी सँ ल' क' देखभाल तक करैत। अंगने जेँका चिक्कसन वाड़ियो बनौने। सभ दिन मोहिनी धान कूटए। गाछी-बिरछी से पात खछड़ि अनैत। दष हाथक एकटा लग्गीे बनौने जइ सँ गाछक सुखल ठहुरी तोड़ै। विसेसर तमाकुल खाइत मोहिनी हुक्काष पीबैत। अमलो आसान। कातिक मे सय गाछ तमाकुल बाड़ी मे मोहिनी रोपि लैत जे माघ मे जुअएला पर काटि लैत। उपरका मूड़ी, कनोजरि आ निचला पात डाँट के छाँटि पीनी कुटैत आ बीचला पात सुखा क' खेवा ले रखैत। एक्कोज पाई खरच नहि। बाध सँ मुइलहा डोका मोहिनी बीछि आनए। ओकरा डॉहि क' चून बना लिअए। एक सेर धान क' छुआ कीनि, डावा मे राखि, सालो भरि पीनी कूटए।
भोलिया विसेसरक बेटा। जाबत छोट छल मायक संग घर-आंगनाक काज करैत। गाछ पर चढ़ि सुखल जारनो तोड़ैत। जखन नमहर भेल वियाह भेले। विसेसर अपने संगे काज करै ले ल' जाय। बियाहक बाद साल भरि भोलिया बापक संग काज करैत रहल। मुदा छैाँड़ा-मारड़िक संगत मे पड़ि भोलिया भाँग पीबए लगल। बाड़ी-झाड़ी मे भाँगक गाछ। ओकर फूल झाड़ि-झाड़ि आ जट्टा वाला डाढ़ि काटि-काटि सुखा-सुखा रखैत। विसेसर केँ कोनो पता नहि। साल भरिक बाद जखन विसेसर काज करए विदा हुअए तखन भेलिया सुतले। मोहिनी(माय) उठवए जाय तँ गरजि केँ भोलिया कहैत- ‘‘मन खराव अछि, माथा दुखाइ अए।'' एक दिनक नहि भोलिया केँ आदत भ' गेलै। षुरु मे दू-चारि दिन विसेसर कहै- ‘‘छैाँड़ा, मौगियाह भ' गेल।'' कहि छोड़ि देलक। मुदा आदत देखि विसेसर भोलिया केँ कहलक- ‘‘तू बेटा छियैँ, एकर माने ई नहि जे तू मालिक भ' गेलै। दू परानी तोहूँ छेँ। दुनू गोटेक खाइ-पीवै ले कमाइये पड़तौ। भिन्नभ रह कि साझी, बिना कमेने तेँ नै हेतौ। जो आइ से फुटे भानस कर।'' भालियकेँ विसेसर भिन्नक क' देलक।
साझू पहर केँ सभ दिन विसेसर डेढ़िया पर बिछान बिछा, जावत भानस होइ, भजन-कीर्तन करैत। असकरे विसेसर खजुरी बजा भजन करैत। ने दोसर साज आ ने दोसर संगी। अपने गवैया अपने बजनिया अपने सुननिहार। पाँचे टा भजन विसेसर केँ अवैत। जे सभ दिन गावए। जखन भजन करए वइसे तखन पहिने ‘‘सत् नाम, सतनाम, सँ षुरु करए। एक सुर खूब झमका केँ सतनाम गावए। चुल्हिे लग मोहिनी भानसो करए आ घुन-घुना क' संग-संग सतनामो गावए। सतनामक बाद ‘‘साँझ भयो नहि आयो मुरारी'' अह्लाद सँ विसेसर गावए। अड़ोस पड़ोसक सभ पाँचो भजन सीख लेने। जहाँ विसेसर षुरु करए कि सभ अपना-अपना अंगना मे घुन-घुना- घुन-घुना गावए। ‘साँझ भयो' गोलाक बाद विसेसर विनती गवैत। विनती गेवा काल ततेक तन्मघय विसेसर भ' जाइत जना भगवान हृदय मे वैसि प्रेरित करति होथि। विनती समाप्तक हाइते विसेसर खुजुरी राखि तमाकुल चुना क' खाइत। मोहिनी चुल्हिाये लग बैसल-बैसल हुक्काा भरि क' पीवैत। तमाकुल थूकड़ि पानि सँ कुड़ुर क' विसेसर कृष्णतक रुप-वर्णन(नख-सिख वर्णन) षुरु करए। रुप-वर्णनक समय विसेसर कँ बुझि पड़ै जे अन्त र्ज्ञान सँ ब्रह्माण्डह केँ देखि-देखि गवैत छी। गबैत-गबैत विसेसर उठि के ठाढ़ भ' खजुरियो बजवैत आ ठुमकी चालि मे झूमि-झूमि नचबो करैत। असकर रहनहुँ विसेसर केँ बुझि पड़ैत जे हजारो-लाखो लोकक बीच नाचि-गावि रहल छी। कखनो हँसैत, त' कखनो मुस्कीक दैत। कखनो नोर बहबैत त' कखनो तौनी सँ मुह झपैत विलाप करैत, कखनो हाथ सँ तीर-धनुष छोड़ैत रुप, गदा भॅजैत त' कखनो पंडित जेँका प्रवचन करैत। रुप वर्णन समाप्त होइते तौनी सँ मुँ-हाथ पोछि सोहर गवैत। सोहर गवैत-गवैत विसेसर केँ भरि दिनक ठेही उतरल वुझि पड़ैत। अंत मे समदाउन गावि समाप्तग करैत।
स
जिनगीक जीत
उपन्या स
जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
जिनगीक जीत ःः 1
छोट-छीन गाम कल्यागणपुर। गाम क' देखनहि बुझि पड़ैत जे आदिम युगक मनुक्ख स ल' क' आइ धरिक मनुक्खम हँसी-खुशी स रहैत अछि। मनुखे टा नहि मालो-जाल तहिना। एक फुच्ची दूधवाली गाय स ल' क' बीस लीटर दूधवाली गाय धरि। बकरीओक सैह नस्ल-। ऐहनो बकरी अछि जकरा तीनि-चारि बच्चाम भेने, एक-दू टा दूधक दुआरे मरिये जाइत। आ एहनो अछि जकरा चारि लीटर दूध होइत। गाछियो-बिरछी तहिना। एहनो गाछी अछि जहि मे एकछाहा शीशोए टा अछि त दोसर बगुरेक। आमो गाछीक वैह हाल। कोनो एकछाहा सरहीक अछि त कोनो एकछाहा कलमीक। ततबे नहि, ओहन-ओहन गाछ अखनो अछि जे दू-दू कट्ठा खेत छपने अछि त ओहनो गाछी अछि जहि मे पनरह-पनरह टा आमक गाछ एक कट्ठा मे फइल स रहि मनसम्फे फड़बो करैत अछि।
ओझुका जेँका कल्या णपुर, चालीस बर्ख पहिने नहि छल। ने एकोटा चापाकल छलै आ ने बोरिंग। जेहने हर त्रेता युग मे राजा जनक जोतने रहथि तेहने हर स अखनो कल्यााण पुरक खेत जोतल जाइत अछि। ने अखुनका जेँका उपजा-बाड़ी होइत छल आ ने बर-बीमारीक उचित उपचार। सवारीक रुप मे सभकेँ दू-दू टा पाएर वा गोट-पङरा बड़द जोतल काठक पहियाक गाड़ी। अंग्रेजी शासन मेटा गेल मुदा गमैआ जिनगी मे मिसिओ भरि सुधार नहि भेल। जहिना जाँत मे दू चक्कीन होइत- तरौटा आ उपरौटा। तरौटा कील मे गाड़ल रहैत। तहिना शरही आ देहाती जिनगीक अछि। शहरी जिनगी त आगू मुहे घुसकल मुदा देहाती जिनगी तरौटा चक्कीत जेँका ओहिना गड़ाइल रहि गेल अछि। बान्ह -सड़क, घर-दुआर सब ओहिना अछि जहिना चालीस बर्ख पहिने छल। तेँ की कल्याछणपुरक लोक अंग्रेजी शासन तोड़ै मे, भाग नहि लेलक? जरुर लेलक। दिल खोलि साहस स लेलक। सगरे गाम क' गोरा-पल्ट न आगि लगा-लगा तीनि बेरि जरौलक। कत्त्ो गोटे बन्दू कक कुन्दा। से, त कत्त्ो गोटे मोटका चमड़ाक जूत्ता स थकुचल गेलाह। जहल जाइवलाक धरोहि लागि गेल रहय। कत्त्ो गोटे डरे जे गाम छोड़ि पड़ायल ओ अखनो धरि घुरि क' नहि आबि सकल। कत्त्ो गोटेक परिवार बिलटलै, तकर कोनो ठेकान, अखनो धरि नहि अछि।
कल्याैणपुरक एक परिवार अछेलालक। अगहन पूर्णिमाक तेसर दिन, बारह बजे राति मे घूर धधका दुनू परानी अछेलाल आगि तपैत रहय। पहिलुके साँझ मे स्त्रीे मखनी केँ पेट मे दर्द उपकलै। प्रशबक अंतिम मास रहने मखनी बुझलक जे प्रशवक पीड़ा छी। अछेलालो केँ सैह बुझि पड़लै। ओसरे पर चटकुन्नी बिछा मखनी पड़ि रहलि। चटकुन्नीकक बगले पे अछेलालो बैसि गेल। दरद असान होइतहि मखनी बाजलि- ‘‘दरद असान भेल जाइ अए।''
मुह पर हाथ नेने अछेलाल मने-मन सोचैत जे असकरुआ छी कोना पलहनिक ओहिठाम जायब? कोना अगियाशी जोड़ब? जाड़क समय छियै। परसौतीक लेल जाड़ ओहने दुश्ममन होइत अछि जेहने बकरीक लेल फौती। दर्द छुटितहि मखनी फुड़-फुड़ा क' उठि भानसक जोगार मे जुटि गेलि। पानि भरैक घैल लए जखने घैलची दिशि बढ़ै लागलि कि अछेलाल(पति) बाँहि पकड़ि रोकि, कहलक- ‘‘अहाँ उपर-निच्चाम नइ करु। हम पानि भरि अनै छी। अहाँ घर से बासन-कुसन निकालू। हम ओकरो धो क' आनि देब।''
मखनी चुल्हि पजारै लागलि आ अछेलाल लुरु-खुरु करै लगल। बरतन-बासन धोय ओहो चुल्हििऐक पाछु मे बैसि, आगियो तपै आ गप्पोन-सप्प शुरु केलक। मुस्कीरदैत अछेलाल बाजल- ‘‘एहिबेर भगवान बेटा देताह।''
बेटाक नाम सुनि मखनी सुखक समुद्र मे हेलए लागलि। मने-मन सुखक अनुभव करैत विचारै लागलि जे बच्चाम केँ दूध पियाइब। तेल-उबटन सँ जाँतव। आखि मे काजर लगा किसुन भगवान बना चुम्मा लेब। कोरा मे लए अनको आंगन घूमै जाएब। इस्कूिल मे नाओ लिखा पढ़बैक विचार एलै, कि जहिना गमकौआ चाउरक भात आ नेबो रस देल खेरही दालि मे सानल कौर मुह मे दइते, ओहन आँकर पड़ि जाइत जहि स जी(जीभ) कटि जाइत, तहिना भेलि। मनक सुख मनहि मे मखनी क' अटकि गेलि। पत्नीदक मलिन होइत मुह देखि पति बाजल- ‘‘गरीबक मनोरथर आ बरखाक बुलबुला एक्केप रंग होइ छै। जहिना पाइनिक बुलबुला सुन्दनर आकार आ रंग ल' बढ़ैत अछि कि फुॅटिये जाइत, तहिना।''
मखनीक मन मे दोसर विचार उठलै जे धन त बहुत रंगक होइ छै- खेत-पथार, गाय-महीसि, रुपैआ-पैसा मुदा एहि सब धन स पैघ बेटा धन होइत छैक। जे बूढ़ मे माय-बापक सवारी बनि सेवा करैत अछि। ततबे नहि, परिवारो खनदानो क' आगू बढ़बैत अछि। तोहूँ मे जँ कमासुत बेटा होइत त जीवितहि माय-बाप केँ स्व र्गक सुख दैत अछि ।
भानस भेलै। दुनू परानी खेलक। मोटगर पुआर पर चटकुन्नीव विछाओल, तहि पर जा मखनी सुति रहलीह। थारी-लोटा अखारि, चुल्हि -चिनमारक सभ सम्हापरि अछेलाल चुल्हिीये लग बैसि आगि तपै लगल। तमाकुल चूना मुह मे लेलक। चुल्हिचये लग बैसल-बैसल अछेलाल ओंघाइयो लगल। ओंघी तोड़ै ले उठि क' अंगना मे टहलै लगल। भक्क टुटिते फेर चुल्हिज लग आबि अछेलाल आगि तपै लागल। मखनी निन्नह पड़ि गेलि। मखनीक नाकक आबाज सुनि अछेलाल सोचै लगल जे जँ राति-बिराति दर्द उपकतै त महा-मोसकिल मे पड़ि जायब। अपने त किछु बुझैत नहि छी। दशमीक डगरक सिदहा द' नहि सकलिऐक तेँ पलहनियो आओत की नहि? चुल्हि क आगि मिझाइत देखि अछेलाल जारन आनै डेढ़िया पर गेल। ओस स जारनो सिमसल। लतामक गाछ पर स टप-टप ओसक बुन्नअ खसैत। अन्हाढरक तृतीया रहने, चान त भरि राति उगल रहत, मन मे अबितहि अछेलाल मेघ दिशि तकलक। चान त उगल देखैत मुदा ओसक दुआरे जमीन पर इजोत अबितहि नहि। पाँज मे जारन नेने अंगना आयल। ओसार पर चुल्हिे रहने सोचलक जे घरे मे घूर लगौनाइ बढ़ियाँ हैत किऐक त घरो गरमाइल रहत। अछेलालक पाएरक दमसि स मखनीक निन्न टुटि गेलै। धधकैत घूर देखि मखनियो केँ आगि तपैक मन भेलै। ओछाइन पर स उठि ओ घूर लग आबि बैसलि। बीच मे घूर धधकैत आ दुनू भाग दुनू परानी बैसल। जहिना देहक दुख स मखनी तहिना मोनक दुख स अछेलाल। बेबसीक स्व र मे अछेलाल बाजल- ‘‘अदहा राति त बीतिए गेल, अदहे बाकी अछि। जहिना अदहा बीतल तहिना बाँकियो बीतबे करत।''
अछेलालक बात सुनि मखनी पूछलक- ‘‘अखन धरि अहाँ जगले छी?''
‘हँ, की करब। जँ सुति रहितौ आ तइ बीच मे अहाँ केँ दरद उठैत त फटोफन मे पड़ि जइतहुँ। सैाँसे गामक लोक सुतल अछि। ककरा सोरो पारवैक। एक्केँ रातिक त बात अछि। कहुना-कहुना क' काटिये लेब। मन मे होइत छल जे बहिन केँ बिदागरी करा केँ ल' अनितहुँ मुदा ओहो त पेटबोनिये अछि। तहू मे चारि-पाँच टा लिधुरिया बच्चोक छै। जँ विदागरी करा क' आनव त पाँच गोटेक खरचो बढ़ि जाइत। घर मे त किछु अछि नहि। कमाई छी खाई छी।''
‘‘कहलिएै त ठीके। अपना घर मे लोक भुखलो-दुखलो रहि जाइत अछि। मुदा जकरा माथ चढ़ा क' अनितियै ओकरा कोना भूखल रखितियै?'' दिन-राति चिन्तार पैसल रहै अए जे पार-घाट कोना लागत। भगवानो सबटा दुख हमरे दुनू परानी केँ देने छथि। एक पसेरी चाउर घैल मे रखने छी कहुना-कहुना पान-सात दिन चलबे करत। तकर बाद बुझल जेतैक।''
पसेरी भरि चाउर सुनि अछेलालक मोन मे आशा जगल। मुह स हँसी निकलल। हँसैत बाजल- ‘‘जँ हमर बनि बच्चास जनम लेत त कतबो दुख हेतइ तइओ जीवे करत। नहि जँ कोनो जनमक करजा खेने हेबै त असुल क' चलि जायत।''
पतिक बात सुनितहि मखनी केँ पहिलुका दुनू बच्चा' मन पड़ल। मने-मन सोचै लागलि जे ओहो बच्चाख नहि मरिते। जँ नीक-नहाँति सेवा होइतइ ते। मुदा मनुखे की करत? जकरा भगवाने बेपाट भ' गेल छथिन। पैछला बात मन स हटबैत मखनी बाजलि- ‘‘समाज मे ओहनो बहुत लोक होइत जे बेर-बेगरता मे भगवान बनि ठाढ़ होइत।''
‘‘समाज दू रंगक होइछै। एकटा समाज ओहन होइ छैक जइ मे दोसराक मदति केँ धरम बुझल जाइ छै आ दोसर ओहन होइ छैक जहि मे सब सभक अधले करैत अछि। अपने गाम मे देखै छियै। अपन टोल तीस-पेंइतीस घरक अछि। चारि-पाँच रंगक जातियो अछि। एक जातिकेँ दोसर स' भैंसा भैंसीक कनारि अछि। अपन तीनि घरक दियादी अछि। तीनू घर मे सुकनाकेँ दु सेर दू टाका छैक। ओकरा देखै छियै। सदिखन झगड़े-झंझटक पाछू रहैअए। टोल मे सबसे बाड़ल अछि। ओकरा चलैत हमरो से सब मुह फुलौने रहै अए। ने ककरो से टोका-चाली अछि आ ने खेनाई-पीनाई, आ ने लेन-देन। भगवान रच्छर रखने छथि जे सब दिन बोइन करै छी मौज स खाई छी नइ त एक्कोे दिन अइ गाम मे बास होइत।''
अछेलालक बात सुनि मूड़ि डोलबैत मखनी बाजलि- ‘‘कहलौ त ठीके, मुदा जे भगवान दुख दइ छथिन ओइह ने पारो-घाट लगबै छथिन।''
मखनीक बात सुनि अछेलाल बाजल- ‘‘सगरे गाम मे नजरि उठा क' देखै छी त खाली बचेलालेक परिवार स थोड़-बहुत, मिलान अछि। साल मे दश-बीस दिन खेतिओ सम्हा रि दइ छियै आ घरो-घरहट। पेंइच-उधार त नहिये करै छी। हमर ब्रह्म कहै अए जे अगर बचेलालक माएकेँ कहबनि त ओ बेचारी जरुर सम्हाारि देती। कहुना राति बीतै भोर होय, तखन ने कहबनि। दुखक रातियो नमहर भ जाइ छै। एक्के निन्न। मे भेर भ जाइ छले, से बितबे ने करै अए।''
हाफी करैत मखनी बाजलि- ‘‘देहो गरमा गेलि आ डॉड़ो दुखा गेल। ओछाइने पर जाइ छी।''
मखनीक बात सुनि अछेलाल ठाढ़ भ' मखनीक बाँहि पकड़ि ओछाइन पर ल' गेल। मखनी पइर रहलि। पड़ले-पड़ल बाजलि- ‘‘मन हल्लुुक लगै अए। अहूँ सुति रहू।''
अछेलालक मन मे चैन आयल। मुदा तइयो सोचैत जे एहि देह आ समयक कोन ठेकान। कखन की भ' जयतैक। गुनधुन करैत बाहर निकलि चारु भर तकलक। झल-अन्हा।रक दुआरे साफ-साफ किछु देखवे ने करैत। मूड़ी उठा मेघ दिशि तकलक। मेघो मे छोटका तरेगण बुझिये ने पड़ै। गोटे-गोटे बड़का देखि पड़ै। अयना जेँका चानो बुझि पड़ै। डंडी-तराजू केँ ठेकना ताकै लगल। तकैत-तकैत पछबारि भाग मन्हु आइल देखलक। डंडी-तराजू देखि अछेलाल क' संतोष भेलै जे राति लगिचा गेल अछि। फेर घुमि क' आबि घूर लग बैसल। आलस अबै लगलै। तमाकुल चुना मुह मे लेलक। बाहर निकलि तमाकुल थूकड़ि क' फेकि पुनः घुरे लग आबि बोरा पसारि घोंकड़ी लगा, बाँहिएक सिरमा बना सुति रहल। निन्नड पड़ि गेल। निन्नल पड़ितहि सपनाइ लगल। सपना मे देखै लगल जे घरवाली दरद स कुहरैत अछि। चहा क' उठि पत्नीकेँ पूछलक- ‘‘बेसी दर्द होइ अए?''
मखनी निन्नन छलि। किछु नहि उत्तर नहि देलि। घूर क' फूँकि अछेलाल धधड़ाक इजोत मे मखनी लग जा निङहारि क' देखै लगल। मन मे भेलै जे कहीं बेहोश त ने भ' गेलि अछि, मुदा नाकक साँस असथिर रहै।
कौआ क' डकितहि अछेलाल उठि क' बचेलाल ऐठाम विदा भेल। दुनू गोटेक घर थोड़बे हटल, मुदा बीच मे डबरा रहने घुमाओन रास्ताल। बचेलालक माए क' अछेलाल भौजी कहैत। दियादी संबंध त दुनू परिवार मे नहि मुदा सामाजिक संबंधे भैयारी। बचेलालक पिता रघुनन्दसन छोटे गिरहस्तह, मुदा सामाजिक हृदय रहने सभ सँ समाज मे मिलल-जुलल रहैत। बचेलाल ऐठाम पहुँचते अछेलाल डेढ़िया पर ठाढ़ भ' बचेलालक माय सुमित्राकेँ सोर पाड़लक। आंगन बहारैत सुमित्रा बाढ़नि हाथ मे नेनहि घरक कोनचर लग स देखि, मुस्कुँराइत बाजलि- ‘‘अनठिया जेँका दुआर पर किऐक छी? आउ-आउ, अंगने आउ।''
अछेलालक मन्हुाआयल मुह देखि सुमित्रा पूछलक-‘‘राति मे किछु भेलि की? मन बड़ खसल देखै छी।''
कपैत हृदय स अछेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘नइ राति मे त किछु ने भेल मुदा भारी विपत्ति मे पड़ल छी। तेँ एलौ।''
‘‘केहन विपत्ति मे पड़ल छी?''
‘‘भनसियाकेँ संतान होनिहार अछि। पूर मास छियै। घर मे त दोसर-तेसर अछि नहि। जनिजातिक नीक-अधला ते अपने बुझै नइ छी। तेँ अहाँ क' कहै ले एलौ जे चलि क सम्हाछरि दिओ।''
कनेकाल गुम्मह भ' सुमित्रा बजलीह- ‘‘अखन त दरद नहि ने उपकलै हेन?''
‘‘नै, अखन चैन अछि। साझू पहर दरद उपकल छलै मुदा कनिये कालक बाद असान भ' गेलै।''
‘लोकेक काज लोक क' होइ छै। समाज मे सभक काज सभकेँ होइ छै। अगर हमरा गेला स अहाँक नीक हैत त किअए ने जायब।' कहि सुमित्रा फुसफुसा क पूछल- ‘‘परसौती खाइले चाउर अछि, की ने?''
अछेलालक मोन मे एलै जे झूठ नहि कहबनि। कने गुम्मम भ बाजल- ‘‘एक पसेरी चाउर घर मे अछि, भौजी।''
एक पसेरी चाउर सुनितहि सुमित्राकेँ हँसी लगलनि। मुदा हँसी क' दाबि, सोचलनि जे कम स कम एक मासक बुतात चाही। मास दिन सँ पहिने परसौतिक देह मे कोनो लज्ज-ति थोड़े रहै छै। तेँ एक मासक बुतातक जोगार सेहो क देबै। बेर पड़ला पर गरीब लोकक मन बौआ जाइ छै तेँ अछेलाल ऐना कहलक। पुरुख जाति थोड़े परसौतीक हाल बुझैत अछि। जखन हमरा बजबै ले आइल तखन बच्चाक क' एहि धरती पर ठाढ़ करब हमर धर्म भ जाइत अछि। सिर्फ बच्चाल जनमि गेला से त नहि होइत। दुनू गोटे गप-सप करिते छल कि बचेलाल सुति क उठल। केबाड़ बन्नेम छल कि दुनू गोटेक गप-सपक आवाज सुनलक। खिड़कीक एकटा पट्टा खोलि हुलकी देलक कि दुनू गोटे केँ गप-सप करैत देखलक। केबाड़ खोलि बचेलाल दुनू गोटे लग आबि चुपचाप ठाढ़ भ गेल। पुतोहूक दुआरे सुमित्राा बाजलि- ‘‘दरबज्जेा पर चलू।''
तीनू गोटे दरवज्जा़ पर आबि गप-सप करै लगल। अपन भार हटबैत सुमित्राा बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बच्चाु! अछेलालक कनिञाँ क' सन्ताेन होनिहारि छै। बेचारा, जेहने सवांगक पातर अछि तेहने चीजोक गरीब। आशा लगाा क अपना ऐठाम आयल। गाम मे त बहुतो लोक अछि मुदा अनका ऐठाम किऐक ने गेल। जेँ हमरा पर बिसवास भेलै तेँ ने आयल।''
मूड़ी निच्चाि केने बचेलाल चुपचाप सुनैत। माएक बात सुनि कहलक- ‘‘जखन तोरा बजबै ले एलखुन ते हम मनाही करबौ।''
‘‘सोझे गेला से त नइ हेतै। कम स कम एक मासक बुतातो चाही की ने?''
‘‘जखन तूँ घरक गारजने छेँ तखन हमरा से पूछैक कोन जरुरी? जे जरुरी बुझै छीही, से कर।''
अछेलालक हृदय मे आशा जगै लगल। मने-मन सोचै लगल जे अखन धरि बुझै छलौ जे गाम मे क्योे मदतिगार नहि अछि मुदा से नहि। भगवान केहेन मन बना देलनि जे ऐठाम एलौ। कुस्कुराइत अछेलाल सुमित्रा केँ कहलक- ‘‘बड़ी काल भ गेल भैजी, अंगना मे की भेल हेतै, सेहो देखैक अछि तेँ आव नइ अँटकब। चलू, अहूँ चलू।''
सुमित्राा- ‘‘बौआ! अहाँ आगू बढ़ू, हम पीठे पर अबै छी।''
अछेलाल आंगन बिदा भेल। सुमित्राा बचेलाल केँ कहै लागलि- ‘‘बच्चार! मनुखेक काज मनुख क' होइ छै। आइ जे सेवा करब ओ भगवानक घर मे जमा रहत। महीना दिन हम ओकर ताको-हेर करबै आ खरचो देबै। भगवान हमरा बहुत देने छथि। कोन चीजक कमी अछि।''
बचेलाल- ‘‘माए! तोरा जे नीक सोहाओ, से कर। जा क' देखही।''
दरबज्जात स उठि सुमित्रा अंगनाक काज सम्हाररै लागलि। सब काज सम्हाररि सुमित्रा अछेलाल ऐठाम विदा भेलि। मखनी ओसार पर, विछान बिछा, पड़लि। पहुँचते सुमित्रा मखनी केँ पूछलि- ‘‘कनिञाँ, दरदो होइ अए?''
कर घूमि मखनी बाजलि- ‘‘दीदी, अखन त दरद नइ उपकल हेन, मुदा आगम बुझि पडै़ अए।''
मखनी क' दू टा संतान भ चुकल छल तेँ आगम बुझैत। सुमित्रा अछेलाल केँ कहलक- ‘‘ऐठाम हम छी हे। अहाँ पलहनिक ऐठाम जा बजौने आउ?''
अछेलाल पलहनिक ऐठाम विदा भेल। मुदा पलहनि ऐठाम जेबा ले डेगे ने उठैत। मन मे होइ जे दशमी डगरक सिदहा नै द' सकलिऐक, तेँ ओ आओत की नहि? मुदा तइयो जी-जाँति क' विदा भेल। भरि रास्ताऐ विचित्र मे अछेलाल। एक दिशि सोचैत जे जँ पलहनि नहि आओत त बेकार गेनाइ हैत। दोसर दिशि होय जे जाबे हम इमहर एलौ ताबे घर पर की हैत की नहि। पलहनिक ऐठाम पहुँचते अछेेलाल देखलक जे पलहनि मालक थैरिक गोबर उठा, पथिया मे ल खेत विदा भेलि अछि। जहिना न्याकयालय मे अपराधी केँ होइत तहिना अछेलालो केँ बुझि पड़ैत। मुदा तइयो साहस क' पलहनि सँ कहलक- ‘‘कने हमरा ऐठाम चलू। भनसिया क' दरद होइ छै।''
‘‘माथ पर गोबरक छिट्टा नेने पलहनि उत्तर देलक- ‘‘हम नइ जेबनि। डगरक सिदहा हमर बाँकिये अछि। पेट-बान्हिा कतेक दिन काज करबनि।''
पलहनिक बात सुनि अछेलाल अपन भाग्यत क' कोसैत। भगवान केहेन बनौने छथि जे जकरा-तकरा स दू टा बात सुनै छी। मुह सिकुड़िअबति अछेलाल पुनः कहलक- ‘‘कनिञाँ, अइ साल सिदहा नइ द सकलिएनि, तेँ कि नहि देबनि। समय-साल नीक हैत त अगिला साल दोबर देबनि। समाज मे सभक उपकार सभकेँ होइत छैक। चलू, चलू....।
खिसिया क पलहनि डेग बढ़बति बाजलि- ‘‘किन्न हु नहि जेवनि।''
एक टक स अछेलाल पलहनि क' देखैत रहल। देह मे जना एको मिसिया तागते ने बुझि पड़ै। हताश भ, दुनू हाथ माथ पर ल अछेलाल बैसि सोचै लगल जे आब की करब? आशा तोड़ि घर दिशि विदा भेल। आगू मुहे डेगे ने उठै, पाएर पताइत। जना बुझि पड़ै जे आखि स लुत्ती उड़ै अए। कहुना-कहुना क' अछेलाल घर पर आयल।
तेसर सन्ताैन भेने मखनी क' दरदो कम भेलै आ असानी स बच्चाबक जन्म भेलै। अपना जनैत सुमित्रा सेवो मे कोनो कसरि बाकी नहि रखलखिन। डेढ़िया पर अबितहि अछेलाल केँ बुकौर लगि गेलै। दुनू आँखि स दहो-बहो नोर खसै लगल। अंगना आवि मुस्कु राइत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, ककरो अहाँ अधला केने छी जे अधला हैत। भगवान बेटा देलनि। गोल-मोल मुह, मोटगर-मोटगर दुनू हाथ-पाएर छैक।''
आशा-निराशाक बीच अछेलालक मन उगै-डूबै लगल। हँसी होइत सुख निकलै चाहैत जबकि आखिक नोर होइत
दुख। बेटा जनमितहि सुमित्राक अंगनाक टाट पर बैसल कौवा दू बेरि मधुर स्वसर मे बाजल कौवाक बोली सुनि बचेलालक मुह स अनायास निकलल- ‘‘अछेलाल काका क' बेटा भेल।''
मुह स निकलितहि बचेलारल आखि उठा-उठा चारु कात देखै लगल जे क्योल कहलक नहिये तखन मुह स किऐक निकलल? आंगन स निकलि बचेलाल टहलैत डबराक कोन लग आयल। कोन पर ठाढ़ भ' हियासै लगल जे बच्चा क जन्मक भेलि आ कि दरदे होइत छै। सुमित्रा ओछाइन साफ करैत। अगियासी जोड़ै ले अछेलाल डेढ़िया पर जारन आनै गेल कि बचेलाल पर नजरि पड़ल। नजरि पड़ितहि अछेलाल, थोडे़ आगू बढ़ि, बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बौआ, छैाँड़ा जनमल।''
लड़काक नाम सुनितहि बचेलालक मोन मे आयल जे जा क' देखिऐेक। मुदा सोचलक जे अखन जा क' देखब उचित नहि। चोट्टे घुमि आंगन आवि पत्नीे क' कहलक- ‘‘अछेलाल काका क' बेटा भेल।''
बेटाक नाम सुनितहि मने-मन असिरवाद दैत रुमा बाजलि- ‘‘भगवान जिनगी देथुन।''
बच्चाकक छठियार भ' गेल। सुमित्रा अपन अंगनाक काज सम्हा रि अछेलालक आंगन पहुँचली। गोसाई लुक-झुक करैत। पतिआनी लगा बगुला पछिम स पूब मुहे उड़ैत अपना मे हँसी मजाक करैत जाइत। कौआ सब धिया-पूता हाथक रोटी छीनै ले पछुअबैत। जेरक-जेर टिकुली गोलिया-गोलिया उपर मे नचैत। सुरुज अराम करैक ओरिआन मे लगल। अछेेलालक बीच आंगन मे बोरा बिछा सुमित्रा बच्चा क' दुनू जाँघ पर सुता जतबो करति आ घुनघुना क गेबो करथि-
गरजह हे मेघ गरजि सुनाबह रे
ऊसर खेत पटाबह, सारि उपजावह रे
जनमह आरे बाबू जनमह, जनमि जुड़ाबह रे
बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुश रे
हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे
मैलहि बसन सुतायत, छैाँड़ा कहि बजायत रे
जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे
पीयर बसन सुताबह बाबू कहि बजावह रे
झुमि-झमि सुमित्रा गबितो आ बच्चाि क' जँतबो करति। आखि स आखि मिला स्नेकहक बरखा बरिसबैत। बच्चाि क' कोनो तरहक तकलीफ नहि होइ तेइ ले मुह दिशि देखैत। टाटक अढ़ मे बैसि अछेलाल सुमित्रा क' स्ने ह देखि, दुनिया क' बिसरि आनन्द् लोक मे बिचरैत। घ्
जिनगीक जीत ःः 2
रवि दिन रहने बचेलाल अबेर क' उठल। मन मे यैह सोचि विछान पर पड़ल, जे आइ स्कूील नहिये जाएब। घर पर कोनो अधिक काजो नहिये अछि। मात्र एक जोड़ धोती, एक जोड़ कुरता आ एक जोड़ गंजिये टा खिंचैक अछि। दुपहर तक त काजो एतवे अछि। बेरु पहर हाट जा घरक झूठ-फूस समान कीनि आनब। हाटो दूर नहि, गामक सटले अछि। सुति उठि बचेलाल नित्यू-कर्म स निवृत भ' दलानक चौकी पर आबि बैसल। रुमा चाह द' गेलनि। दू घोंट चाह पीबितहि बचेलाल केँ पिता मन पड़ि गेलखिन। पिता मन पड़ितहि बचेलाल अपन तुलना हुनका(पिता) स करै लगला। मने-मने सोेचै लगल जे पिता साधारण किसान छलाह। पढ़ल-लिखल ओतबे जे नाम-गाम टो-टा क' लिखि लथि। काजो ओतबे रहनि जे कहियो-काल रजिष्ट्री अॉफिस जा सनाक बनथि। भरि दिन खेती स ल क' माल-जालक सेबा मे व्यपस्त रहैत छलाह। मुदा एत्त्ो गुण अवश्यस छलनि जे गाम मे कतौ पनचैती होइत वा कतौ भोज-भात होइत वा समाजिक कोनो(दशनामा) काज होइत त हुनका जरुर बजौल जाइन। ततबे नहि, बूढ़-पुरान छोड़ि केयो नाम ल क' सोरो नहि पाड़ैत छलनि। अपन संगतुरिया भाय कहनि आ धिया-पूता स चेतन धरि गिरहत बाबा, गिरहत काका कहनि। परिवारे जेँका समाजो क' बुझैत छलथिन। मुदा हम शिक्षक छी। अपन काजक प्रति इमानदार छी। बिना छुट्टिये एक्को दिन ने स्कूकल मे अनुपस्थिइति होइ छी आ ने एको क्षण बिलम्बर स पहुँचै छी। जते काल स्कूलल मे रहै छी, बच्चाु सभकेँ पढ़विते छी। जना आन-आन स्कू्ल मे देखै छी जे शिक्षक सभ कखनो अबै छथि, कखनो जाइ छथि आ स्कूसलो मे ताशो भँजैत छथि। ओना हमहू ककरो उपकार त नहिये करै छी किऐक त दरमाहा ल काज करैत छी। आन शिझकक अपेक्षा इमानदारी स जीवितहुँ अपना पैघ कमी बुझि पड़ैत अछि। ओ कमी अछि समाज मे रहि समाज स कात रहब। स्कू लक समय छोड़ि दिन-राति त गामे मे रहै छी मुदा ने क्यो टोक-चाल करै अए आ ने क्यो़ दरवज्जात पर अबै अए। मन मे सदिखन रहे अए जे कमाई छी त दू-चारि गोटे केँ चाह-पान खुआबी-पीआबी। मुदा क्योर कनडेरियो आखिये नहि तकैत अछि। हमहू त ककरो ऐठाम नहिये जाइ छी। चेतन सभक कहब छनि जे दुआर-दरबज्जाूक इज्ज त छी चारिगोटेकेँ बैसब। मुदा से कहाँ होइ अए। गाम त शहर-बजार नइ छी जे एक्के मकान मे रहितहुँ, आन-आन क्षेत्रक रहने, लोक आन-आन भाषा बजैत, आन-आन चलि-ढ़ालि मे अपन जिनगी वितवैत, ककरो क्यो सुख-दुख मे संग नहि होइत! मुदा समाज त से नहि छी? बाप-दादाक बनाओल छी। एक ठाम सइयो-हजारो बर्ख स मिलि-जुलि क' रहैत अयलाह। रंग-विरंगक जातियो प्रेम स रहैत अछि। सभ सभकेँ सुख-दुख मे संग रहैत अछि। बच्चातक जन्म स ल क' मरण धरि संग पूरैत। ऐहन समाज मे, हमर दशा ऐहन किऐक अछि? जहिना पोखरिक पानिक हिलकोर मे खढ़-पात दहाइत-भसिआइत किनछरि लगि जाइत तहिना त हमरो भ' गेल अछि। की पाइनिऐक हिलकोर जेँका समाजो मे होइत छैक? जँ पाइनियेक हिलकोर जेँका होइत छैक त हम ओहि हिलकोर क' बुझैत किऐक ने छी? हमहू त पढ़ल-लिखल छी।
जत्त्ो समाजक संबंध मे बचेलाल सोचैत तत्त्ो मन मलिन होइत जाइत। मुदा बुझि नहि पबैत। अधा चाह पीलाक बाद जे गिलास मे रहल ओ सरा क' पानि भ' गेल। ने चाहक सुधि आ ने अपन सुधि, बचेलाल क'। जना बुझि पड़ैत जे हम ओहन बन मे बौआ गेलहुँ जत्त' एक्कोअ टा रस्ते ने देखैत छी। गंभीर भ' बचेलाल बड़बड़ेबो करैत आ अपने-आपमे गप्पोा करैत।
आंगन स सुमित्रा आबि बचेलाल केँ देखि पूछलखिन- ‘‘बच्चाल, कथीक सोग मे पड़ल छह? किछु भेलह हेन की?''
बचेलालक मुह सँ निकलल- ‘‘नहि माए! भेल त किछु नहि। मुदा गामक किछु बात मोन मे घुरिआइत अछि। जकर जबाब बुझिते ने छी।''
तारतम्य करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘गाम मे त बहुत लोक रहैत अछि मुदा सभ थोड़े गामक सब बात बुझैै छै। गाम मे तीनि तरहक रास्ताह छैक। पहिल ओ जहि स समाज चलैत अछि। दोसर स परिवार चलैत आ तेसर स मनुक्ख चलैत अछि। मनुक्खम अपन चलि परिवारक चालि मे मिला क' चलैत अछि। तहिना परिवार समाजक चालि स मिला क' चलैत अछि तेँ, तीनूक अलग-अलग चालि रहनहुँ ऐहन घुलल-मिलल अछि जे सभकेँ बुझवो मे नहि अबैत।'
मुह वाबि बचेलाल माएक बात सुनि, कहलकनि- ‘‘माए, तोरो बात हम नीक-नहाँति नहि बुझि सकलहुँ। मन मे यैह होइ अए जे किछु बुझिते ने छी। अन्हाुर मे जना लोक किछु ने देखैत, तहिना भ रहल अछि।'
मूड़ी डोलबैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘अपने घर मे देखहक- दू टा बच्चात अछि, ओकर त कोनो मोजरे नहि। तीनि गोटे चेतन छी। तोँ भरि दिन इस्कूेलेक चिन्ताद मे रहै छह। भोरे सुति उठि क' नओ बजे तक, अपन सब क्रिया-कर्म स निचेन भ खा के इस्कू ल जाइ छह। चारि बजे छुट्टी होइ छह। डेढ़ कोस पाएरे अबैत-अबैत साँझ पड़ि जाइ छह। घर पर अबैत-अबैत थाकियो जाइत हेबह। पर-पखाना स अबैत-अबैत दोसर साँझ भ' जाइ छह। दरबज्जा पर बैसि, कोनो दिन ‘रमायण' त कोनो दिन ‘महाभारत' पढै़ छह। भानस होइ छै खा क सुतै छह। फेरि दोसर दिन ओहिना करै छह। एहिना दिन बीतैत जाइत छह। दिने स मास आ मासे स साल बनैत छैक। कोल्हु क बड़द जेँका घर स इस्कूदल आ इस्कूसल स घर अबै-जाइत जिनगी बीति जेतह। मुदा जिनगी त से नहि थिक? जिनगी त ओ थिक- जना बसन्तढ ऋृतु अबिते गाछ-विरीछ नव कलश ल बढै़त अछि, तहिना। मनुक्खोतक गति अछि। जिनगीक गतिये मनुक्ख- केँ ब्रह्माण्ड क गति से मिला क' ल चलैत। अज्ञानक चलैत मनुक्खअ, एहि गति क' नहि बुझि, छुटि जाइत अछि। छुटैक कारण होइत व्यथक्ति गत, परिवारिक आ सामाजिक जिनगी। जे सदिखन आगूक गतिक पाछु महे धकेलति अछि। जहि स मनुख समयक संग नहि चलि पबैत। मुदा तइ स की? बाधा कतबो पैघ किऐक ने हुअए मुदा मनुखो केँ साहस कम नहि करक चाही। सदिखन सब अंग क' चौकन्नान क चलला से सब बाधा टपि सकैत अछि। पुतोहूए जनि केँ देखुन। भरि दिन भनसा आ धिये-पूतेक आय-पाय मे लगल रहैत छथुन। हमरो जे शक लगै अए से करिते छी। घर त कहुना चलिये जाइ छह। मुदा परिवार त समाजक एक अंग छी। परिवारेक समूह ने समाज छी। तेँ समाजक संग चलैक लेल परिवार क' समाजक रास्तास धड़ै पड़त। से नहि भ' रहल छह। जना देखैत छहक जे रेलगाड़ी मे ढेरो पहिया आ कोठरी होइ छै। जे आगू-पाछू जोड़ल रहै छै। मुदा चलै काल सब संगे चलै छै। तहिना मनुक्खोो छै।''
सुमित्राक बात सुनि बचेलाल जिज्ञासा स पूछल- ‘‘अपन परिवारक की गति अछि?''
मुस्कुरराइत सुमित्रा कहै लागलि- ‘‘अपन परिवार ठमकल अछि। ओना बुझि पड़ैत हेतह जे आगू मुहे जा रहल छी, मुदा नहि। तोरा बुझि पड़ैत हेतह जे शिझक छी, नीक नोकरी करै छी। नीक दरमहो पबै छी। हँ, ई बात जरुर अछि। मुदा अपनो सोचहक जे जखन हम पढ़ल छी, बुद्धियार छी। तखन हमरा बुद्धिक काज कैक गोटे क' होइ छै। जे क्यो नहिये पढ़ल अछि ओहो त अपन काज, अपन परिवार चलबिते अछि। कने नीक कि कने अधला सब त जीवे करैत अछि। आइ तोरा नोकरी भ गेलह, तेँ ने, जँ नोकरी नइ होइतह तखन त तोहू वहिना जीवितह जहिना बिन पढ़ल-लिखल जीवैत अछि। एहिना पुतोहू जनि केँ देखुन, जना घर स कोनो मतलबे नहि अछि। हमरो बिआह-दुरागमन भेल छल। हमहूँ कनियाँ छलौ मुदा आइ जे घर मे देखै छिअह तना त नहि छल। जखन हम नैहर स ऐठाम एलहुँ तखन भरल-पूरल घर छल। सासु-ससुर जीविते रहथि। जखन चारि दिनक बाद चुल्हिर छूलौ, तहिया स सासु कहियो चुल्हिछ दिशि नहि तकलनि। ने कोठी से चाउर निकालि क' देथि आ ने किछु कहथि। जेहने परिवार नैहरक छल तेहने एतुक्कोे छल। जे सब काज नैहर मे करै छलौ सैह सब काज अहूठाम छल। अपन घर बुझि एकटा अन्नु आ कि कोनो वस्तुक दुइर नहि हुअए दैत छलिऐक। अखन देखै छिअह जे पाँचे गोटेक परिवार रहनहु सभ सब स सटल नहि, हटल चलि रहलह हेन। सटि क' चलैक अर्थ होइत सभ सब काज मे जुटल रही। इ त नहि कि क्यो काजक पाछू तबाह छी आ क्योक बैसले छी। परिवारक सभकेँ अपन सीमा बुझ चलक चाही, से नहि छह। हम खेलहुँ कि नहि, तोँ खेलह कि नहि। भनसिया लेल धन्य सन। की खायव, कोन वस्तु। शरीरक लेल हितकर हैत कोन अहितकर, से सब बुझैक कोनो मतलवे नहि। जे खाई मे चसगर लागत, भले ही ओ अहितकरेे किऐक ने हुअए, वैह खायब। जहि स घर मे बीमारी लधले रहै छह। जहिना सुरुजक किरिण मे देखै छहक जे अनेको दिशा मे चलैत तहिना परिवारोक काज सब दिशा क' जोड़ैत अछि, से नहि भ' रहल छह।''
बिचहि मे बचेलाल माएकेँ पूछलक- ‘‘माए! नीक-नाहाँति तोहर बात नइ बुझि रहलौ हेन?''
बचेलालक बात क' तारतम्यक करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चाह, देखहक जहिना गाम मे किछु परिवार आगू मुहे ससरि रहल अछि त किछु परिवार पाछू मुहे। किछु परिवार ठमकल अछि। जहि स गाम आगूू मुहे नहि बढ़ि रहल अछि। तहिना परिवारो मे होइत। परिवारो मे किछु गोटे आगू बढ़ैक चेष्टाह करैत त किछु(आलस अज्ञान आदि क चलैत) पाछू मुहे ससरैत। किछु गोटे अदहा-छिदहा मे रहैत। तेँ परिवार केँ जहि गति मे चलक चाही, से नहि भ' रहल अछि। ततवे नहि इ रोग मनुक्ख क भीतरो मे अछि। किछु लोक अपनाकेँ समय स जोड़ि क' चलै चाहैत त किछु समयक गति नहि बुझि, पाछूऐ मुहे चलैत। इ बात जाबे नीक जेँका नहि बुझबहक ताबे ने मन मे चैन हेतह आ ने आगू मुहे परिवार बढ़तह।''
माइक बात स बचेलालक मन घोर-मट्ठा भ गेल। की नीक, की अधला से बुझबे ने करैत। माथ कुरिअबैत बचेलाल माए केँ कहलक- ‘‘माए! जखन मन असथिर हैत तखन बुझा-बुझा कहिऐं। एक बेरे नइ बुझब, दू बेरे बुझैक कोशिश करब। दू बेरे नइ बुझब तीन बेरे कोशिश करब। मुदा बिना बुझने त काज नहि चलत।''
बचेलालक बात सुनि मुस्कुकराइत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चाब जखन तोहर पिता जीविते रहथुन तखन घर मे पाथरक बटिखारा छल। ओहि स जोखै-तौलै छलहुँ। एक दिन अपने(पति) आबि कहलनि जे आब लोहाक पक्कीै सेर, अढ़ैया पसेरी सब आइल। हम पूछलिएनि जे पथरक जे सेर, अढ़ैया अछि तकरा फेकि देबै? ओ(पति) कहलनि-फेकबै किऐक? लोहा सेर क' पथरक सेर स भजारि लेब। बटिखारा कम-बेसी हैत, सैह ने हैत, ओकरा अपन बटिखारा हिसाब स मानि लेबै। अओर की हेतै। बौआ अखन तोरो मन खनहन नइ छह, जा तोहू अपन काज देखह। हमरो बहुत काज अछि। जखन मन खनहन हेतह तखन आरो गप्पख करब।''
अनोन-बिसनोन मने बचेलाल कपड़ा खींचै विदा भेल। आंगन जा बाल्टीह-लोटा, कपड़ा आ साबुन नेने कल पर पहुँचल। कपड़ा साबुन के कात मे रखि पहिने कलक चबूतरा साफ केलक। बाल्टी मे पानि भरि सब कपड़ा क' बोइर देलक। एकाएकी कपड़ा निकालि दुनू पीठ साबुन लगा-लगा, बगल मे रखैत। जखन सब कपड़ा मे साबुन लगाओल भे गेलै तखन पहिलुका सावुन लगौलहा कपड़ा निकालि खींचै लगल। सुमित्रा खन्तीे ल बाड़ी ओल उखाडै़ विदा भेलि। बाड़ी मे पतिआनी लगा ओल रोपने रहथि। तीन सलिया ओल। केंकटा गाछ फुला गेल। बाड़ी मे सुमित्रा हियासै लागलि जे कोन गाछ खुनब। सब गाछ डग-डग करैत। पतिआनीक बीच मे एकटा गाछक अदहा पत्ता पिरौंछ भ गेल। पात क' पीअर देखि सुमित्रा ओइह गाछ खुनैक विचार केलनि। ओल कटि नहि जाय तेँ फइल से खुनव शुरु केलनि। सात-आठ किलोक हैदरावादी ओल। टोंटी एकोटा नहि। टोंटी नहि देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे टोंटी रहैत त रोपियो दैतिऐक मुदा से नहि भेल। ओलक माटि झाड़ि गाछ के टुकड़ी-टुकड़ी काटि खधिये मे द उपर स माटि भरि देलखिन। सुमित्रा चाहथि जे ओलो आ खन्तिीओ ऐके बेर नेने जायब मुदा से गरे ने लगनि। दुनू हाथ स' ओल उठा एक हाथ के ल दोसर हाथ से खन्तीक लिअए लगथि कि ओल गुड़कि क' निच्चा मे गिर पड़नि। कैक बेर कोशिश केलनि मुदा नहिये भेलनि। तखन हारि क' पहिने दुनू हाथे ओल उठा कल लग राखि, खन्तीे आनै गेली। खन्ति़ओ मे माटि लगल आ ओलो मे। तेँ दुनू क' नीक-नाहाँति घुअए पड़त। माए क' ठाढ़ देखि बचेलाल हाँइ-हाँइ कपड़ा पखाड़ै लगल। कपड़ा ल बचेलाल चार पर पसरै गेल। सुमित्रा ओल के कलक निच्चाा मे रखि कल चलबै लगली। गर उनटा-उनटा दश-पनरह बेर कल चलौलनि। मुदा तइयो सिरक दोग-दाग मे माटि रहबे केलै। तखन ओल क घुसुका बाल्टीर मे पानि भरि लोटा स ओलो, खन्तिाओ आ अपनो हाथ-पाएर धोलनि। आंगन आबि सुमित्रा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘आइ रवियो छी, बच्चोथ गामे पर रहता तेँ ओलक बड़ी बनाउ। बड़ निम्मतन ओल अछि तेँ दू चक्का तड़ियो लेब।''
सुमित्राक बात सुनि मुह-हाथ चमकबैत पुुतोहू उत्तर देलखिन- ‘‘हिनका हाथ मे सरर पड़ल छनि तेँ कब-कब नइ लगै छनि। हमरा त ओल देखिये के देह-हाथ चुलचुला लगै अए। अपने जे मन फुड़ैन से बनबथु। हम चुल्हिि पजारि ताबे भात रन्हैय छी। सभकेँ नवका चीज नीक लगै छै हिनका पुरने नीक लगै छनि।''
पुतोहूक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे जाबाव दिअनि आ कि नहि? समय पर जँ जबाव नहि देब त दबब हैत। मगर जबाव देनहु त झगड़े हैत। अपना जे इच्छाअ अछि वैह करब मुदा बाता-बाती से त काजे रुकत। जत्त्ो बनबै मे देरी हैत तते भानसो मे अबेर हैत। मुदा सुमित्राक मन जबाव देइ ले तन-फन करैत। ओल क' बीचो-बीच काटि, चारि फाँक करै लगली ओलक सुगंध आ रंग देखि सुमित्रा जबाव देलखिन- ‘‘कनियाँ, जे चीज सब दिन नीक लागल ओ आइ अधला कोना भ' जायत? जाबे जीबै छी ताबे त खेबे करब। तेाँ जकरा अधला बुझै छहक ओ अधला नहि छी। दुनू गोटेक नजरि मे अन्त र छह। जे अन्तरर नी-अधला मे बदलि गेल छह। दुनू गोटेक नजरि, एहि दुआरे दू रंग भ गेल छह जे दुनू गोटेक जिनगी दू रंग बीतल। तेाँ नोकरिहाराक परिवारक छह हम गिरहत परिवारक। तोहर बाप नगद-नरायण कमाई छथुन जहि स हाट-बजार से समान कीनि आनि खइ छेलह। हम त सामान उपजवै वला परिवार मे रहलहुँ। कोन वस्तुर कोना रोपल जाइ छै, कोना ओकर सेवा करै पड़ैत छै, से सब वुझै छियै। तेँ हमर नीक आ तोहर नीक मे यैह अन्तहर छह।''
दुनू सासु-पुतोहूक गप-सप बचेलालो दरवज्जा पर स सुनैत। बीच आंगन मे बैसि सुमित्रा ओल बनवति रहथि। घर मे पुतोहू भन-भना क' बजैत रहति, जे सुमित्रा नीक जेँका सुनवो ने करैत। बच्चा नेने मखनी सेहो आइलि। मखनी के कोरा मे बच्चा देखि सुमित्रा दबारैत कहलखिन- ‘‘मासे दिनक बच्चा के अंगना से किऐक निकाललह? जँ रस्ताक-पेड़ा मे हबा-बसात लागि जइतै तब?''
हँसैत मखनी उत्तर देलकनि- ‘‘दीदी! अइ आंगन के अनकर आंगैन कहै छथिन। हमर नइ छी? अपनो अंगना अवै मे संकोच हैत।''
मखनीक बात सुनि सुमित्रा मने-मन अपसोच करैत कहलखिन- ‘‘अनकर अंगना बुझि नइ करलियह। अखन बच्चाम छोट छह तेँ बचा केँ राखै पड़तह। बेटा धन छी। घर से त निकलबे करत। पुतोहू केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘पहिले-पहिल दिन बच्चान अंगना आयल। तेल-उबटन दहक। अगर उबटन घर मे नइ हुअअ ते तेले टा नेने आवह। ताबे चुल्हि- मिझा दहक। पहिने बच्चाअ के जाँति-पीचि दहक।''
घर स रुमा तेल आ विछान नेने आबि अंगने मे विछौलक। तेलक माली लग मे रखि बच्चार केँ कोरा मे लेलक। दुनू पाएर पसारि बच्चाल केँ जाँध पर सुतौलक। बच्चा क मुह देखि रुमा मने-मन बाजलि- ‘‘मखनी केहेन भाग्यचशाली अछि जे भगवान ऐहन सुन्नचर बच्चाउ देलखिन।'' उनटा-पुनटा क' बच्चाग देखलक। रुमाक मन मे ऐलै जे कोना लोक बजै अए जे फल्लाँ।क कपार खराब छैक आ फल्लांाक नीक? जँ कपार अधला रहितैक त बेटी होइतै। जकर कपार नीक रहै छै, ओकरा खाली बेटे होइतै। भगवानक नजरि मे सब बराबरि अछि। सभ त हुनके सनतान छी। कोन पापी बाप ऐहेन हैत जे अपना सन्ताोन केँ दूजा-भाव करत? अनेरे लोक, कपार गढ़ि, भगवान केँ दोख लगबै छनि।
सुमित्रा हाथ स ओलो आ कत्तो ल मखनी ओल बनबै लगलीह। ओल देखि मखनी सुमित्रा केँ कहलखिन- ‘‘ओल अंडाइल रोहू(माछ) जेँका बुझि पड़ैत अछि। दीदी ‘हाथ धो लथु, हम बना लै छी।''
सुमित्रा हाथ धोय दुनू हाथ मे करु तेल लगा अपना पाएर मे हसोथि लेलनि। हाथक कबकबी मेटा गेलनि।ं विछान पर जा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘कनि०ााँ, बच्चा़ लाउ। हम जाँति दइ छियै। अहाँ चुल्हिप लग जाउ।' सुमित्रा कोरा मे बच्चाँ के द' रुमा चुल्हिज पजारै गेलि। सुमित्रा बच्च केँ जाँध पर सुतवैत मखनी केँ कहलक- ‘‘कनियाँ, बीचला चक्काा ओरिया क' काटब। ओ तड़ब। कतका सब उसनि क' बरी बनाएब।''
मुस्कीओ दैत मखनी कहलकनि- ‘‘तेहेन सुन्नार ओल छनि दीदी जे चुल्हि पर चढ़िते गल-बला जेतनि। खेबो मे तेहने सुअदगर लगतनि। अइ आगू मे दुदहो-दहीक कोनो मोल नहि।''
सुमित्रा बच्चा केँ जतबो करैत आ घुनघुना क' गेबो करैत-
‘कौने बाबा हरबा जोताओल,
मेथिया उपजाओल हे।
कौने बाबी पीसल कसाय
ओ जे बच्चाप केँ उङारब हे।
बड़का बाबा हरबा जोताओल
ओ जे सरसो उपजाओल हे।
ऐहब बाबी तेल पेरौलीह
बच्चाा केँ उङारथि हे।
जाबे मखनी ओल बनौलक ताबे सुमित्रो बच्चा क' जाँति-पीचि चानि मे काजरक टिक्काल लगा निचेन भेलीह। मखनीक कोरा मे बच्चा द सुमित्रा एक-डेढ़ सेर चाउर आ तीमन जोकर ओल द देलखिन।
स
जिनगीक जीत ःः 3
मौलाइल गाछक फूल
उपन्या स
जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
मौलाइल गाछक फूल ःः 1
दू साल रौदीक उपरान्त क अखाढ़। गरमी स जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौंकि-हौंकि लोक बितबैत। सुतली राति मे उठि-उठि पाइन पीबै पड़ैत। भोर होइते पसीना अपन उग्र रुप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारै ले लग पहुँच जाइत तहिना सुरुजो लग आबि गेलाह। रास्तात-पेराक माटि सिमेंट जेँका सक्कात भ गेल अछि। चलबा काल पाएर पिछरैत अछि। इनार-पोखरिक पानि, अपन अस्मि ता बँचवैक लेल पातालक रास्ताा पकड़ि लेलक। दू साल सँ एक्कोत बुन्न- पानि धरती पर नहि पड़ने धरतीक सुन्दपरता धीरे-धीरे नष्टि हुअए लगल। पियासे दूबि सभ पाण्डु रोगी जेँका पीअर भ'-भ' परान तियागि रहल अछि। गाछ-पात बेदरंग भ' गेल अछि। लताम, दारीम, नारिकेल इत्या दि अनेको तरहक फलक गाछ सूखि गेल। आम, जामुन, गमहाइर, शीषोक गाछक निच्चाे पातक पथार लगि गेल। दसे बजे सँ बाध मे लू चलै लगैत अछि। नमहर-नमहर दरारि फाटि धरतीक रुपे बिगाड़ि देने अछि। की खायब? कोना जीबि? अपना मे सभ एक-दोसरा सँ बतिआइत अछि। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल सूखिकेँ संठी जेँका भ' गेल अछि। अनधुन मरबो कयल। अनुकूल समय पाबि रोगो-बियाधि बुतगर भ गेल। माल-जाल स' ल' क' लोको सभहक जान अबग्रह मे पड़ि गेल अछि। खेती-बाड़ी चौपट्ट होइत देखि, थारी-लोटा बन्हलकी लगा-लगा लोक मोरंग, दिनाजपुर, ढाका भगै लगल। जैह दषा किसानक ओइह दषा बोनिहारोक। कहिया इन्द्र भगवानक दया हेतनि, एहि आषा मे अनधुन कबूला-पाती लोक करै लगल।
तीनि दिन स अनुपक घर चुल्हि नहि पजड़ल। नल-दमयन्तील जेँका दुनू परानी अनुप दुखक पहाड़क तर मे पड़ल-पड़ल एक-दोसराक मुह देखैत। ककरो किछु बजैक साहसे नहि होइत। बारह बरखक बेटा वौएलाल, बोरा पर पड़ल माय केँ कहलक- ‘‘माए, भूखे परान निकलल जाइ अए। पेट मे बगहा लगै अए। आब नइ जीबौ!''
वौएलालक बात सुनि दुनू परानी अनुप केँ आखि स नोर आवि गेलै। मुहक बोल बुताय लगलै। लग मे बैसल रधिया उठि क' डोल-लोटा ल', इनार दिषि विदा भेलि। इनारोक पानि निच्चाल ससरि गेल अछि, जहि स डोलक उगहनियो छोट भ' गेल। कतवो निहुड़ि-निहुड़ि रधिया पानि पबै चाहैत, तइयो डोल पानि स उपरे रहैत। रधियाक मन मे एलै जखन अधला होइवला होइ छै तखन एहिना कुसंयोग होइ छैक। वौएलाल नइ बँचत। एक त पाँच टा संतान मे एकटा पिहुआ बँचल सेहो आइ जाइ अए। हे भगवान कोन जनमक पापक बदला लइ छह। इनार स डोल निकालि, लहरे पर डोल-लोटा छोड़ि रधिया उगहनि जोड़ै ले डोरी अनै आंगन आइलि। रधियाक निराष मन देखि अनुप पूछलक- ‘‘की भेल?''
टूटल मने रधिया उत्तर देलक- ‘‘की हैत, जखन दैवेक(दइबैक) डाँग लागल अछि तखन की हैत। उगहनि छोट भ गेल तेँ जोड़ै वला डोरी ले एलौ।''
रधियाक बात सुनि अनुप घरेक(ओसारेक) बनहन खोलि रधिया केँ देलक। खड़ौआ जौर ल रधिया इनार पर जा उगहनि जोरलक। उगहनि जोड़ि पानि भरलक। पाइन भरि लोटा मे लए' रधिया आंगन आबि बौएलाल केँ पीबै ले कहलक। पड़ल बौएलाल केँ उठिये ने होय। ओसार पर लोटा राखि रधिया वौएलालक बाँहि पकड़ि उठा केँ बैसौलक। अपने हाथे रधिया लोटा स चुरुक मे पानि ल' वौएलालक आखि-मुह पोछलक। वौएलालक देह थर-थर कपैत। थरथरी देखि रधियोकेँ थरथरी पैसि गेलनि। लोटा उठा रधिया बौएलालक मुह मे लगवै लागलि कि थरथराइत हाथ स लोटा छुटि गेलैनि जहि स पानि बोरा पर पसरि गेल। दुनू हाथे छाती पीटैत रधिया जोर स बजै लागलि- ‘‘आब बौएलाल नै जीति, जे घड़ी जे पहर अछि।''
रधियाक बोल सुनि अनुप जोर स कनै लगल। अनुपक कानब सुनि टोलक धियो-पूतो आ जनिजातियो एक्के -दुइये अबै लगल। सभहक मुह सुखाइले रहै। के ककरा बोल-भरोस देत। सभहक एक्केए गति। अनुपक कानब सुनि रुपनी अंगने से कनैत अबैत। रुपनी अनुपक ममिओत बहिन। अनुपक आंगन आबि रुपनी बौएलाल केँ देखि बाजलि- ‘‘भैया, बौआक परान छेबे करह। अखन मुइलह हेन नहि। किअए अनेने दुनू परानी कनै छह। जाबे शरीर मे साँस रहतै ताबे जीवैक आषा। चुप हुअअ।'' कहि रुपनी वौएलाल क' समेटि कोरा मे बैसौलक। तरहत्थीक स चाइन रगड़ै लागलि। वौएलाल आखि खोलि बाजल- ‘‘दीदी, भूख से पेट मे बगहा लगे अए।'' वौएलालक बात सुनि रुपनी बाजलि- ‘‘रोटी खेमे।''
‘‘हँ।''
वौएलालक बात सुनि रधिया घर मे धयल फुलक लोटा, जे रधिया के दुरागमन मे बाप देने रहथि, निकालि अनुप केँ देलनि। लोटा नेने अनुप दोकान दिषि दौड़ल। लोटा बेचि गहूम कीनने आयल। अंगना अबिते रधिया हबड़-हबड़ केँ चुल्हिु पजारि गहूम उलौलक। दुनू परानी रधिया जाँत मे गहूम पीसै लगल। एक रोटीक चिक्क़स होइतहि रधिया समेटि क रोटी पकबै आवि गेलीह। अनुप गहूम पीसै लगल। रोटी पका रधिया वौएलाल लग ल गेल। अपने सँ रोटी तोड़ि खेवाक साहसे वौएलाल केँ नहि होयत। छाती, दाबि- दाबि रधिया वौएलाल केँ रोटी खुआवै लगली। सैाँसे रोटी वौएलाल खा लेलक। रोटी खायत-खायत वौएलालो केँ हूबा एलैक। अपने हाथे लोटा उठा पानि पीलक। पानि पीवितहि हाफी होअए लगलैक। भुइँये मे ओंघरा गेल। जाँत लगक चिक्क।स समेटि रधिया चुल्हिल लग आनि सूप मे सानै लगलीह। जाँघ पर पड़ल चिक्कटस अनुप तौनी स झाड़ि, लोटा-डोल नेने इनार दिषि बढ़ल। हाथ-पाएर धोय, लोटा मे पानि लए आंगन आबि खाइ ले बैसल। छिपली मे रोटी आ नोन-मेरिचाइ नेेने रधिया अनुपक आगू मे देलक। भुखे अनुप केँ होय जे सैाँसे रोटी मोड़ि-सोड़ि क एक्केज बेरि मुह मे ल' ली, मुदा से नहि कए तोड़ि-तोड़ि खाय लगल। छिपलिक रोटी सठितहि अनुप रधिया दिषि देखै लगल, मुदा तीनिये टा रोटी पका रधिया चिक्कोसक पथिया कोठी पर रखि देने। रधिया क' देखि अनुप चुपचाप दू लोटा पानि पीवि उठि गेल।
दिन अछैते नथुआ, दौड़ल आबि, हँसैत अनुप केँ कहलक- ‘‘गिरहत कक्काे बड़की पोखरि उड़ाहथिन। काल्हिम से हाथ लगतै। तोहूँ दुनू गोरे काज करै चलिहह।''
नथुआक बात सुनितहि रधियाकेँ, जना अषर्फी भेटि गेल होय, तहिना भेलै। अनुपोक मुह सँ हँसी निकलल। अनुपक खुषी देखि नथुआ बाजल- ‘‘अपने मुसना कक्कात मेटगिरी करत। ओइह जन सबहक हाजरी बनौत।''
नथुआ, अनुप आ रधियाक बीच गप-सप होइतहि छल कि मुसनो धड़फड़ाइल आयल। मुसना दिषि देखि नथुआ बाजल- ‘‘मुसनो कक्काल ते आबिये गेला। आब सभ गप फरिछा केँ बुझबहक।''
मेटगिरी भेटला सँ मुसनाक मन तरे-तर गदगद होयत। ओना कहियो मुसना मेटगिरी केने नहि, मुदा गामक बान्ही-सड़क मे मेट सबहक आमदनी आ रोब देखने, तेँ खुषी। मने-मन सोचैत जे जकरा(जहि जन) मन हैत तकरा जन मे राखब आ जकरा मन हैत तकरा नै राखब। इ त हमरे जुइतिक काज रहत की ने। जकरा मन हैत ओकरा बेसिये क हाजिरी बना देबैक। पावर त पावर होयत। जँ पावर भेटै आ ओकर उपयोग फाजिल क' के नहि करी त ओहन पावरे ल क' की हेतइ। जँ से नहि करब ते मुसना आ मेट मे अनतरे की हैत। लोक की बुझत। मुस्कीि दैत मुसना अनुप केँ कहलक- ‘‘भैया, काल्हि से बड़की पोखरि मे काज चलतै, तोहू चलिहह। दू सेर धान आ एक सेर मड़ुआ, भरि दिनक बोइन हेतह। तत्त्ो टा पोखरि अछि जे कहुना-कहुना रौदी खेपिये जेबह। सुनै छी जे आनो गामक जन सभ अबै ले अछि मुदा ओकरा सभ केँ माटि नहि काटै देबै।''
मुसना बात सुनि वौएलाल फुड़फुड़ा क' उठि कहलक- ‘‘कक्का हमरो गिनती क' लिह'। हमहू माटि काटै जेबह।''
-‘‘बेस वौआ, तीनू गोरे चलिहह। हमरे हाथक काज रहत। दुपहर मे भानस करै ले भौजी क' पहिने छुट्टी द देवैइ।''
कहि मुसनो आ नथुओ चलि गेल।
दोसर दिन भोरे, पोखरि मे हाथ लगै से पहिनहि चौगामाक जन कोदारि-टाला वा पथिया-कोदारि ल' पोखरिक मोहार पर पहुँच थहाथहि करै लगल। मेला जेँका लोक। जते गामक जन तहि स कैक गुना बेसी आन गामक। जनक भीड़ देखि मुसनाक मन मे अहलदिल्लीह पैसि गेलइ। तामसो आ डरो से देह थर-थर कपै लगलैक। मुसनाक मन मे एलै हमर बात के सुनत। माथ पर दुनू हाथ ल' मुसना बैसि गेल। किछु फुरबे ने करैत। ठकमूरी लगि गेलैक। सैाँसे पोखरि, गैाँवा स अनगैाँआ धरि, जगह छेकि-छेकि कोदारि लगा टल्ला ठाढ़ केने। सोचैत-सोचैत मुसनाक मन मे एलै जे रमाकान्तर बावू(गिरहत कक्काि) केँ जा क सब बात कहिअनि। सैह केलक। उठि क' रमाकान्ता ऐठाम विदा भेलि।
तहि बीच गौँवा-अनगौँआ जन मे रक्का -टोकी शरु भेल। अनगौँवा सभ जोर-जोर से बजैत जे कोनो भीख मंगै ले एलहुँ। सुपत काज करब आ सुपत बोइन लेब। गौँवा जन सभ कहै जे हमरा गामक काज छी तेँ हम सभ अपने करब। सुखेतक भुटकुमरा आ गामक सिंहेसरा एक्केम ठाम पोखरि(माटि) दफानने। दुनूक बीच गारि-गरौबलि हुअए लगलै। सभ हल्लास करैत तेँ ककरो बात कियो सुनबे नहि करैत। सभ अपने बजै मे बेहाल। गारि-गरौबलि करिते-करिते भुटकुमरो सिंहेसर दिषि बढ़ल आ सिंहेसरो भुटकुमरा दिषि। दुनूक बीच मुह स गारियो-गरौबलि होइत आ हाथ स पकड़ो-पकड़ा भ' गेल। एक-दोसर केँ पटकि छाती पर बैससै चाहैत। दुनू बुतगर। पहिने त भुटकुमरे सिंहेसराकेँ पटकलक किऐक त सिंहेसराक पाएर घुच्ची। मे पड़ि गेलै, जहि स ओ धड़फड़ा क खसि पड़ल। मुदा सिंहेसरो हारि नहि मानलक। हिम्मत क उठि भुटकुमरा केँ, छिड़की लगा खसौलक।
दरबज्जाह पर बैसि रमाकान्तट बावू बखारीक धान, मड़ूआक हिसाव मिलबैत। हलचलाइत मुसनाकेँ देखि रमाकान्तत पुछलखिन। मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे नहि करैत। मुदा तइयो मुसना कहै लगलनि- ‘‘काका, तत्त्ो अनगौँआ जन सब आबि गेल अछि जे गौँवा केँ जगहे ने हैत। कतबो मनाही केलियै तइयो कोई मानै ले तैयारे ने भेल। अपने से चलि केँ देखियौक।''
कागज-कलम घर मे रखि रमाकान्तह विदा भेलाह। आगू-आगू रमाकान्तच आ पाछू-पाछू मुुसना। पोखरि सँ फड़िक्केा रमाकान्तभ रहथि कि पोखरि मे हल्लाा होइत सुनलखिन। मन चौंकि गेलनि। मन मे हुअए लगलनि जे अनगौँवा सभ बात मानत की नहि! अगर काज बन्नौ क' देब त गौँओ कामै(कामए) हैत। जँ काज बन्नब नहि करब ते अनगौँओ मानवे नहि करत। विचित्र स्थिुति मे रमाकान्तस। निअरलाहा गड़बड़ भ' जायत। पोखरिक महार पर रमाकान्तत केँ अबितहि चारु भर सेँ जन सभ घेरि लेलकनि। सभ हल्लाड करैत जे जँ काज चलत त हमहू सब खटब। ततमत् मे पड़ि रमाकान्तल अनगौँआ सभ केँ कहलखिन- ‘‘देखू रौदियाह समय अछि। सभ गाम मे काजो अछि अ करौनिहारो छथि। चलै चलू, अहाँ सभहक संगे हमहू चलै छी आ हुनको सभकेँ कहबनि जे अपना-अपना गामक बोनिहार केँ अपना-अपना गाम मे काज दिऔ।''
आन सभ गामक लोक कोदारि, छिट्टा, टल्लाग नेने विदा भेल। रमाकान्तोा संगे विदा भेलाह। किछु दूर गेला पर रमाकान्त मुसनाकेँ (इषारा मे) कहि देलखिन जे जखन आन गामक लोक निकलि जायत तखन गौँआ जन केँ काज मे लगा दिहक। तहि बीच क्योा जा क' सिंहेसरा घरवाली केँ कहि देलक जे पोखरि मे तोरा घरवला केँ ओंघरा-ओंघरा मारलकौ। घरवलाक मारिक नाम सुनितहि सिंहेसराक घरोवलाी आ धियो-पूतो गामे पर से गरिअबैत पोखरि लग आबि गेलि। मुदा तइसे पहिने अनगौँआ सभ चलि गेल छल।
पोखरिक काज शुरु भेल। तीनू गोटे अनुप एक्केे ठाम खताक चेन्हस देलक। कोदारि स माटि काटि-काटि अनुप पथिया भरैत, रधिया आ वौएलाल माथ पर ल' ल' महार पर फेकए लगल। बारहक अमल भ' गेल। रमाकान्त घुरि केँ आबि पोखरिक पछबरिया महार पर ठाढ़ भ' देखै लगलथि। मुसनाक नजरि पड़ितहि दौड़ि क रमाकान्तब लग पहुँचल। मुसनाकेँ पहुँचतहि रमाकान्तल, आंगुरक इषारा स वौएलालकेँ देखबैत, पूछलखिन- ‘‘ओ(वौएलाल) के छी। ओकरा साँझ मे कहिहक भेटि करै ले।'' कहि रमाकान्त घर दिसक रस्ताल पकड़लनि। बारह बर्खक वौएलालक माटि उघब देखि सभकेँ छगुन्ताह लगैत। जाबे दोसरो कियो एक बेरि माटि फेकैत ताबे वौएलाल तीनि बेरि फेकि दइत। वौएलालक काज देखि अनुप मने-मन सोचै लगल जे बोनिआती स नीक ठिक्का होइत। मुदा हमरे सोचला से की हेतैक। ताबे मुसनो रमाकान्तन केँ अरिआति घुरि क' अनुप लग आबि कहलक- ‘‘भैया, मालिक दुनू बापूत केँ साँझ मे भेंट करै ले कहलखुन हेँ।''
मालिकक भेटि करैक सुनि अनुपक हृदय मे खुषीक हिलकोर उठै लगल। मुदा अपना क' सम्हाकरि अनुप मुसना केँ कहलक- ‘‘जखन मालिक भेंट करै ले कहलनि ते जरुर जायब।''
सुरुज पछिम दिस एकोषिया भ' गेलाह। घुमैत-फिरैत मुसना अनुप लग आबि रधिया केँ कहलक- ‘‘भौजी, अहाँ जाउ। भरि दिनक हाजरी बना देने छी। भानसोक बेर उनहि जायत।''
रधिया आंगन विदा भेलि। अनुप आ वौएलाल काज करिते रहल। चारि बजे सभ काज छोड़ि देलक। गाम पर आबि अनुप दुनू बापूत नहा क' खेलक। कौल्हुेके गहूमक चिक्कोसक रोटी, आ अरिकंचन पात के पतौरा बना पकौने छलि, ओकर चटनी बनौने छलि। खा क' तीनू गोटे(अनुप, वौएलाल आ रधिया) ओसार पर बैसि गप-सप करै लगल। अनुप रधिया केँ कहलक- ‘‘भगवान बड़ी गो छेथिन। सब पर हुनकर नजरि रहै छनि। देखियौ ऐहेन कहात समय मे कोन चक्कोर लगा देलखिन।''
गप-सप करितहि गोसाई डूबि गेल। झलफल होइतहि अनुप दुनू बापूत रमाकान्तन ऐठाम विदा भेल। रस्तास मे दुनू बापुत केँ ढेरो तरहक विचार मन मे उठैत आ समाप्तम होयत। ओना दुनू बापुतक मन गदगद।
दरबज्जाम पर बैसि रमाकान्तत मुसना से जनक हिसाब करैत रहथि। मुसना जनक गिनतियो केने आ नामो लिखने। मुदा अपन नाम छुटल तेँ हिसाव मिलवे ने करैत। अही घो-घाँ मे दुनू गोटे। तहिबीच दुनू बापूत अनुप पहुँचल। फरिक्के स अनुप दुनू हाथ जोड़ि रमाकान्त- केँ गोड़ लागि बिछान पर बैसल। वौएलालो गोड़ लगलकनि। वौएलाल केँ देखि रमाकान्त- बिहुँसति अनुप केँ कहलखिन- ‘‘अनुप तोँ इ बेटा हमरा द' दाय?''
मने-मन अनुप सोचै लगल जे ई की कहलनि? कने काल गुम्मौ भ' अनुप उत्तर देलकनि- ‘‘मालिक, वौएलाल की हमरे टा बेटा छी, समाजक छियै। जखन अपने केँ जरुरत हैत तखन ल' लेब।''
अनुपक उत्तर सुनि सभ छगुन्ताल मे पड़ि गेलाह। मास्टगर साहेव अनुप केँ निङहारि-निङहारि देखै लगलथि। एकटा युवक, जे दू दिन पहिने भाग्यमक मारल आयल छल, ओहो आषा-निराषा मे डूबल। ओहि युवक केँ तीन बर्ख कृषि विज्ञानक पढ़ाई पूरा भेल छलैक, सिर्फ एक बर्ख बाकी छलैक। अपन सभ खेत बेचि पिताक बीमारीक इलाज करौलक, मुदा ठीक नहि भ' मरि गेलखिन। कर्जा ल पिताक श्राद्ध-कर्म केलकनि। खरचा दुआरे पढ़ाइयो छुटि गेलनि आ जीवैक कोनो उपायो ने रहलनि। जिनगीक कठिन मोड़ पर आबि ओ युवक निराष भ' गेल छलाह। साल भरि पहिने विआहो भ' गेल छलनि। एक दिस बूढ़ि माए आ स्त्रीभक भार दोसर दिस जीवैक कोनो रास्ताो नहि। सोग स माइयोक देह दिन व दिन निच्चेत मुहे हहड़ल जाइत। रमाकान्कर उदार विचार सुनि ओ युवक आयल छल।
सभ दिन रमाकान्त। चारि बजे पिसुआ भाँग पीबैत छथि। दोसरि-तेसरि साँझ होयत-होयत रमाकान्त् केँ भाँगक नसा(नषा) चढ़ि जाइत छनि। भाँगक आदत रमाकान्त केँ पिता स लागल छलनि। रमाकान्त क पिता न्या(य शास्त्रजक विद्वान्। ओना गाम मे कम्मे -काल रहैत छलाह, बेसी काल बाहरे-बाहर। हुनके प्रभाव रमाकान्तइक उपर। तेँ रमाकान्ता जेहने इमानदार तेहेन उदार विचारक। पोखरिक चर्चा करैत रमाकान्त मुसना केँ कहलखिन- ‘‘काल्हिग से वौएलाल केँ दोबर बोइन दिहक।''
दोबर बोइन सुनि, कने काल गुम्मा भ' मुसना कहलकनि- ‘‘मालिक, एक गोरे के बोइन बढ़ेबै ते दोसरो-तेसरो जन मांगत। हहि से झंझट शुरु भ' जायत। झंझट भेने काजो बन्न‘ भ जायत।''
काज बन्न' होइक सुनि रमाकान्तस उत्त्ोजित भ' कहलकखिन- ‘‘काज किअए बन्न' हैत। जे जतेक काज करत ओकरा ओते बोइन देबैक।''
रमाकान्तजक विचार केँ सभ मूड़ी डोला समर्थन क देलकनि। समर्थन देखि गद्गद होइत रमाकान्तक कहै लगलखिन- ‘‘अखन वौएलाल केँ बोइन बढ़ेलहुँ बाद मे दू बीघा खेतो देबैक। मास्टतर सहायव, अहाँ राति केँ वौएलाल केँ पढ़ा दिऔ। सिलेट-कितावक खरच हम देवै।''
खेतक चर्चा सुनि मुसना रमाकान्तड केँ कहलकनि- ‘‘विपन्ना(गरीब) त वौएलाले टा नहि अछि, गाम मे बहुतो अछि।''
मुसनाक प्रष्नन सुनि रमाकान्तनक हृदय मे सतयुगक हरिष्च‘न्द्रा पैसि गेलनि। उदार विचार, इमान मे गंभीरता, मनुक्खयक प्रति सिनेह हुनक विवेक केँ घेरि लेलकनि। अखन धरि ने सुदिखोर महाजनक चालि, आ ने धन जमा करै वला जेँका अमानवीय व्य वहार प्रवेष केने छलनि। नीक समाज मे जहिना धन केँ जिनगी नहि बुझि, जिनगीक साधन बुझि उपयोग होइछ, तहिना रमाकान्तोज परिवार मे रहलनि। जखन रमाकान्तबक पिता गाम मे रहैत छेलथिन आ कियो किछु मंगै अबैत त खाली हाथ घुरए नहि दइत। जे रमाकान्तोु देखथिन। सदिखन पिता कहथिन जे जँ किनको ऐठाम पाहुन-परक आवनि आ ओ किछु मांगै आवथि ते हुनका जरुर देबनि। किऐक त ओ गामक प्रतिष्ठा- बँचाएव होयत। गामक प्रतिष्ठाथ व्यहक्तिनगत नहि सामुहिक होइछ। तहिठाम जँ क्यो सोचैत जे गाम सभहक छियैक हमरा ओहि स कोन मतलब? गलती हेतैक। गाम मे अधिकतर लोक गरीब आ मुर्ख अछि, ओ एहि प्रतिष्ठाो केँ नहि बुझैत अछि। तेँ जे वुझिनिहार छथि हुनकर इ खास दायित्वम बनि जाइत छनि। एहि धरती पर जतेक जीव-जन्तु स ल क' मनुख धरि अछि सभकेँ जीबैक अधिकार छैक। तेँ, जे मनुख ककरो हक छिनै चाहै छैक ओ एहि भूमि पर सबसँ पैघ पापी छी। जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासी केँ जनकक कयल रास्ता केँ पकड़ि क' चलक चाही। जहि स ओ प्रतिष्ठाे सभदिन बरकरार रहतैक।
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मौलाइल गाछक फूल ःः 2
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