भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Saturday, January 30, 2010

'विदेह' ५० म अंक १५ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ५०)- Part_III

२.८. १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. ऋृषि वशिष्ठ- जुआनी जिन्दाबाद ३. शिवशंकर श्रीनिवास- पण्डित ओ हुनक पुत्र
डा.रमानन्द झा ‘रमण’

तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी
‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा
राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक
सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि।
सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’,
गणेश्वरझा ‘गणेश, जयनारायण झा‘विनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास ‘विशारद’,
दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास ‘विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, महावीर झा ‘वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’ आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि।
डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे ‘हम आगि आ हमरा
प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात।’ सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय
हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि।
तन्त्रानाथ झाक अवदान
तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन।
तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ’ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त
अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा ‘किरण’क नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ’ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ’ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ’ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि।
तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना
तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक
मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ ‘साहित्य पत्रा’क लेल माइकेल मधसूदन दत्तक ‘मेघनाद बध’क आदर्शपर ‘कीचक बध’क सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि ‘कीचक बध’ एवं ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि ‘मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या’ एवं ‘कीर्ण-विकीर्ण’। गद्यमे अछि ‘एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ ‘कीर्तिलता’ एवं ‘हितोपदेश’क किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं ‘हेमलेट,’ ‘मालती-माधव’ एवं ‘रत्नावली’क गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब-
1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि।
‘साहित्यपत्रा’मे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक ‘एकावली परिणय’ छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे ‘कीचकबध’ लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल ‘कीचक बध’क प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा ‘रेखाचित्र’मे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य।
2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प
व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि:
मेना-कोकिल, आ बगरामे जेना तेज अछि बाझ।
व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4
3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी
तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि -
‘अबला, भीरु,
की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म,
अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए,
अबला भीरु कहाए मरब’6।
एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -‘शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ आ तखन आत्मबलसँ
अभिभूत भए गुम्हरैत अछि -
अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म।
तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु ‘रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7
डा. सुुभद्र झा
सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित
साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि -
1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक
कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत?
एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम ‘आगि’ छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि।
2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान
छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा,
3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि।
एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि।
सुुभद्र झाक कृृति:
संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल
तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित ‘मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक ‘मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10
सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि
कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 आ The Songs of
Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना
विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। ‘विद्यापति-गीतसंग्रह’’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी ‘प्रवास जीवन’(1950) एवं ‘यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। ‘नातिक पत्राक उत्तर’ पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ’ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि
विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल।
सुुभद्र झाक महत्व:
1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह।
मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल।
2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम
अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल।
3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ’ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ।
4. ‘नातिक पत्रक उत्तर’मे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल
गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत।
5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन
‘प्रवास जीवन’ एवं ‘यात्राप्रकरण शतक’सँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15
6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक
प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि।
अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि
मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय
अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ’ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह।

1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84
2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’
3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When
our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies
made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we
turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of
Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2
.............................
४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५
5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5
6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68,
7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936
9. भारती,अप्रैल, 1937.
10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958
11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which
is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the
Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath
Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in
between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural
form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern
Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net
12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi

14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by
M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I
& II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha -
K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue
of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc.
@5

15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो
नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ’ मनकूर बैसि गेलहुँ।
हम मिरजइ आ’ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक
चर्चा हुनकासँ करए आ’ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम
ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ’ हमहुँ ककरो भान
नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी।
16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of
intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a
casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives,
a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm
and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000.


ऋृषि वशिष्ठ
प्रकाशित कृति- जे हारय से नाक कटाबय (बाल साहित्य), कोढ़ियाघर स्वाहा (बाल साहित्य), झुठपकड़ा मशीन (बाल साहित्य), मैथिली धारावाहिकक कथा, पटकथा आ संवाद लेखन। एकर अतिरिक्त कथा आ व्यंग्य पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। पता- तेजगंगाधाम, परिहारपुर, मधुबनी-847235
जुआनी जिन्दाबाद

सगरो टोलमे एक्कहि बातक चर्च-बर्च छलैक। बुढ़-बुढ़ानुस सभ साँझक चारि बजबाक बाट तकैत छलाह। सबहक मूँहे एक्के बात- ‘‘लाख छै तेँ कि, देखहक काली-बाबुक बेटाकेँ। एखनुको समएमे सरबन पूत होइ छै की !’’ कियो-कियो इहो कहैत छलै जे- ‘‘बाबू, काली बाबू बड्ड कष्टेँ बेटाकेँ इंजीनियर बनौने छथि।’’
-‘‘से तँ ठीके, मुदा आइ काल्हि ई कष्ट ककरो-ककरो सार्थक होइ छै ! आ से काली बाबूकेँ भेलनि।’’
यैह गर्मीक समए छिऐ। परुकाँ साल कालीबाबूकेँ दू-बेर मासे दिनपर हार्ट एटैक भऽ गेल छलनि। सगरो गामक लोक कहैत छलै जे आब हिनकर बाँचब मोस्किल छनि। आ स्थिति छलनिहों तेहने। दोसर बेरक हार्ट एटैकक खबरि जखने कालीबाबुक बेटा नबोनाथकेँ लगलनि तँ ओ तुरत अमेरिकासँ अपना गाम आपस आबि गेलाह। गाम आबि ओ कालीबाबुक हालत देखलनि। ओ अपना संग कालीबाबूकेँ अमेरिका लऽ जेबाक तैयारी कएलनि। पहिने तँ कालीबाबू तैयारे नहि होइत छलाह मुदा बुझा-सुझाकए नबो तैयार केलनि। नबो तँ चाहैत छलाह जे माइयो संग चलए। ओ मुदा एक्कहि ठाम कहि देलखिन जे- ‘‘हमरा लऽ जेबाक जिद्द करबह तँ हम माहुर खा लेब। हम बिलेँत जा कऽ एको दिन जीबि नहि सकै छी।’’
सभ कागज-पत्तर तैयार कऽ नबो अपन पिताक संग अमेरिका जेबाक तैयारीपर छलाह। टोल-पड़ोसक लोकक कहब छलै जे- ’’आब बेकारे बुढ़ाकेँ लऽ जेबहुन। आब अबस्थो भेलनि। साठि टपि गेलनि तँ आब की !’’
कालीबाबुक छोट भाए तँ रुष्ट भऽ कऽ एतेक तक कहि देने छलखिन जे- ‘‘अमेरिकासँ हमर भाए-साहेब घुमि कऽ औताह से उमेद त्यागिये कऽ लथु।’’
इंजीनियर नबोनाथ सभकेँ बुझेबाक प्रयास करैत छलाह। माइ पर्यन्त सदिखन कनैत रहैत छलीह। कालीबाबू चुप्पचाप सभटा तमाशा देखैत छलाह। नबोनाथक माइ ई कखनो नहि कहैत छलखिन जे बाबूकेँ नै लऽ जाहून। हुनका एहि बातक विश्वास छलनि जे कालीबाबू अमेरिका जा कऽ ठीक भऽ जेताह।
जेना-तेना इंजीनियर साहेब कालीबाबूकेँ लऽ कऽ अमेरिका चल गेलाह। साल भरि बीत गेल अछि। एहि बीचमे रंग-बिरंगक समाचार आएल गेल। आइ वर्ष दिनपर कालीबाबू आपस आबि रहल छथि। कालीबाबूकेँ नबका हार्ट लगाओल गेलनिहेँ, से सभकेँ बुझल छैक। सबहक मोनमे विभिन्न तरहक जिज्ञासा छैक। कियो कहै जे- ‘‘अमेरिका जए कऽ की भेलनि ! रोगीक रोगिये रहि गेलाह ! कहाँदन दोसराक हार्ट लगाओल गेलनिहेँ।’’
‘‘आब तँ आर अपस्थक भऽ गेल हेताह। अनेरे बुढ़ारीमे गंजन। कहू तँ बेकारे ने चीड़-फाड़ करौलनि।’’
समए बितैत कतेक देरी। चारि बाजि गेल। बारह बजे पटनामे हवाइ जहाज अएबाक समए छलै। पटनासँ अएबामे बेसीसँ बेसी चारि घंटा। आब जइ घड़ी जे क्षण ने अएलाह। सड़कपर अबैत सभ गाड़ीकेँ सभ ठिकियबैत छल।
‘‘यैह आबिये गेलाह।’’
....मुदा ओ गाड़ी सुर्र...र्र.............दऽ आगाँ बढ़ि गेल।
कालीबाबुक दलानसँ कनिके दूर चौराहा छलै। चौराहापर विशाल पिपरक गाछ आ सड़कक काते-कात चाह-पानक दोकान। गाछक छाँहमे बैसल बच्चा किशोर आ बुढ़-बुढ़ानुस तँ सहजहिँ। खास कऽ सभकेँ कालीबाबुक प्रति बेसिये जिज्ञासा छलनि।
‘‘केहेन भेल हेताह? साफे बदलि गेल हेताह कि ओहने हेताह! ककरो चिन्हबो करताह कि नै?’’
‘‘जे जत्तहि सुनलक आगवानीमे पहुँचि गेल। कालीबाबुक दरवज्जापर एखनो भम्ह पड़ैत छनि मुदा एतए भीड़ जूटल अछि। पुरुष-पातकेँ गामपर नै रहने यैह दशा होइत छैक। भरि ठेहुन कऽ घास जनमि गेल छनि। सभ अही बातक चर्च करैत छल। मोन मुदा सबहक टाँगल छलै पच्छिम भरसँ आबएबला चारिपहिया वाहनपर। कालीबाबु प्राथमिक विद्यालयमे शिक्षक पदसँ रिटायर भेल छलाह। ठेंठ देहाती लोक। कोनो आधुनिकताक हवा नहि लागल छलनि। ओ वर्ष दिन अमेरिकामे कोना रहल हेताह। सभ यैह बात सोचैत छल। नबोक माइ कोनटा परसँ हुल्की मारि जाइत छलीह।
......यैह, लालरंगक चारिपहिया वाहन आबि कऽ रुकल। पीपर तरक भीड़ कालीबाबुुक दरवज्जापर पहुँचल। कियो दौड़ैत, कियो झटकैत आ कियो घिसियाइत। गाड़ीक आगाँक गेट खुजल। इंजीनियर नबोनाथ उतरलाह। आँखि परक करिया चश्माकेँ माथपर चढ़बैत हाथ जोड़ि सभकेँ प्रणाम केलनि आ पछिला गेट खोललनि। भीड़मे जूटल वृद्ध सभकेँ जेना साँस रुकि गेल छलनि। गेट खूजल.....। ..........अचरज! भारी अचरज!! कालीबाबू सूट-बूट पहिरने छलाह। करिया जिन्स आ लाल रंगक फोटो बनल टी शर्ट। आँखिपर करिया चश्मा। बेस चिक्कन-चाक्कन मूँह-कान। खूब निरोग। हाथमे गिटार लेने उतरलाह। बुढ़ सभ देखि कऽ अचरजमे पड़ि गेलाह।
‘‘देखहक हौ, ई की छनि कालीबाबूकेँ?’’
‘‘सारंगी लेलनिहेँ।’’
‘‘गुदरिया भऽ गेलाह-ए की?’’
‘‘वाह रे वाह! यैह भेलै बुढ़ारीमे घी ढारी।’’
इंजीनियर साहेब टिका-टिप्पणी सुनलनि। ओ हँसैत बजलाह- ‘‘बाबू जीकेँ अस्पतालमे पड़ल-पड़ल अकच्छ लगैत छलनि। असलमे डाॅक्टर हिना पुछलखिन जे आहाँकेँ सभसँ बेसी रुचि कथीमे आछि? संगीत पढ़ाइमे आकि आन कोनो काजमे! बाबूजी कहलखिन- ‘‘रंगीतमे। सेहो संगीत गाबए आ बजाबएमे। गाएब तँ मना छनि मुदा बजेबाक लेल गिटार डाॅक्टर देबाक अनुमति देलनि।’’
एतबा कालमे तँ कालीबाबू एक हाथमे गिटार लेने आ दोसर हाथ माथमे सटबैत नमस्कार केलनि। किछु बुढ़ हँसि कऽ मूँह घुमा लेलनि आ हँसैत नजरिसँ नजरि मिलबैत रहलाह। कालीबाबू डेगाडेगी दैत नाचए लगलाह आ गिटारपर बेसुरा टुम टाम करए लगलाह।
राजधर बुढ़ाकेँ नै रहल गेलनि। ओ व्यंग्य करैत बजलाह- ‘‘ई तँ कीदन भऽ गेलाह हौ इंजीनियर। चौबे चलला छब्बे बनए आ दुब्बे बनल अएलाह। अँइ हौ, ई तँ काली बताह भऽ गेलह-ए?’’
इंजीनियर साहेब सहज भऽ बजलाह- ‘‘असलमे बाबा, ओतुक्का तँ एहने माहौल छै किने।’’
‘‘हैइ, किछु रहौ। ई तँ साफे पगलेठ जकाँ करै छै। जीवन भरि एतए रहलै तँ किछु नै आ एक बर्खमे ओतुक्का सबार भऽ जेतै?’’
गाड़ीबला सामान सभ उतारि कऽ विदा भऽ गेल। गाड़ी कनेक आगाँ बढ़ल। कालीबाबू मूँहकेँ गोल करैत सीटी बजबैत ड्राइवरकेँ बाॅइ.....बाॅइ केलनि। कोनटापर ठाढ़ भेल अपन पत्नीकेँ जखने देखलनि कि फेर मूँह चुकरियबैत सीटी बजौलनि.......‘हू......हूँ.......उ..... ’’ ’ओ बेचारी लजाइत कोनटापर सँ पड़ेेलीह। लोक सभ तमाशा देखि अपना घर दिस कऽ विदा होबए लागल। कालीबाबू फेर ओहिना सीटी बजबैत हाथ हिलबैत रहलाह।
भीड़ तँ उसरि गेल मुदा लोकक मोनमे चैन नहि भेलै। एतए ओतए सगरो कालियेबाबुक चर्च। कियो बताह कहए तँ कियो घताह। एक्के बरखमे लोक एना कऽ बदलतै। ओहिठाम तँ हुनकर बेटो छनि। ओ तँ दसो सालसँ अमेरिकामे रहए छै। कहाँ कोनो चालि-ढालि बदललैए ! राजधर बुढ़ा अपना मंडलमे घोषणा करैत बजलाह- ‘‘नबो इंजीनियरकेँ नीकक काज होइ तँ बापकेँ कोनो माथाबला डाॅक्टरसँ देखबौक।’’
रंग-विरंगक टिका-टिप्पणी होइत रहल। देखलाहा दृश्य राति भरि लोकक सोझाँ ओहिना नचैत रहलै। कथीलए ककरो निन्नो हेतइ।
कालीबाबुक रातिक निन्न तँ अमेरिकेमे छुटि गेलनि। ओ राति भरि कछमछ करैत आ गिटारकेँ टुनटुनबैत रहि गेलाह।
भोरे-भोरे कालीबाबुक दलानक सोझाँमे फेर भीड़ जुटि गेल। एहन अनर्गल काज काली बाबुक नै होइतनि जँ माथ ठीक रहितनि। ओ अपना कहलमे नै रहलाह। सबहक निष्कर्ष एक्कहिटा।
गर्मीक समए छलै। कालीबाबू भोरे-भोरे गंजी आ ठेहुन धरिक पैंट पहिरने, डाँड़ झुकलाहा सन अवस्थामे, माथक केश मेहदीसँ राँगल। ओ चौकीपर ठाढ़ गिटार बजेबामे अपसियाँत छलाह। मूँहक आकृति रंग-विरंगक भऽ रहल छलनि। गिटारक अवाज साफे बेसुरा। एहन उन्मत्त भऽ बजेनाइ नहि देखल-ए। देखलासँ कोनो प्रवीण गिटारवादक लगैत छलाह मुदा सुनलापर साफे अनारी। राजधर बुढ़ाकेँ कालीबाबुक बेस चिन्ता छलनि। ओ चिन्तित सन मुद्रामे बजलाह- ‘‘एहेन कोन पागलपन भेलै? कहह तँ जे काली कहियो नचारियो नहि गौलक तकरा ई बजेबाक कोन भूत सवार भऽ गेलइ।’’
नबोनाथ जेम्हरे निकलथि सभ बाबूक हालचाल पुछनि।
‘‘केहन छथि? आब नीक जकाँ रहए छथि कि ओहिना सारंगी लऽ कऽ नचै छथि?’’
कतेक कऽ की जबाब देथिन। सबहक कहब आ अपनो तँ देखिये रहल छलाह। नबो कालीबाबूकेँ मानसिक रोग विशेषज्ञसँ इलाज प्रारंभ केलनि। डाॅक्टर समूचा जाँच-पड़तालसँ मानसिक रोगक लक्षण नहि पौलनि। आब तँ मामला आरो ओझराएल जा रहल छल। इंजीनियर साहेब कऽ टपाक दऽ कहा गेलनि जे- ‘‘असलमे एहन सभ चालि-चलन आ व्यवहार हृदय प्रत्यारोपनक बाद भेलनिहेँ।’’
डाॅक्टर साहेब गंभीर अनुसंधानमे लगलाह। कालीबाबूकेँ जखन-तखन डाॅक्टर ओहिठाम बजाहटि होबए लागल।
समए बितैत गेल। साँझक समए रहए। डाॅक्टर नर्सिग होममे मानसिक रोगी सभ भरल छलइ। रंग-विरंगक उटपटाँग हरकैत सभ भऽ रहल छलै। डाॅक्टर साहेब गंभीर भेल कुर्सीपर बैसल छलाह आ टेबुलपर राखल कागज सभकेँ उनटबैत छलाह। सामनेक कुर्सीपर कालीबाबू उत्सुक सन मुद्रामे बैसल छलाह। आ बामा कात इंजीनियर नबोनाथ चौंकल सन मुद्रामे छलाह। डाॅक्टर की कहथिन की नइ!
डाॅक्टर साहेब सभ कागजकेँ पसारैत अपन लैप-टापकेँ आसस्तेसँ दबाबए लगलाह- ‘‘इंजीनियर साहेब, हम एहि केसक गंभीर अनुसंधान केलहुँ अछि संगहि सभटा सबूत जमा केलहुँ अछि।’’
इंजीनियर साहेब चौचंग भेलाह।
‘‘अहाँक पिताजीकेँ जे हृदय प्रत्यारोपित कैल गेल ओ वस्तुतः एकटा एक्कैस वर्षक मशहुर पाॅप गायकक हृदय छैक। ओ बेचारा एकटा दुर्घटनामे मारल गेल आ ओकर दान कएल हृदय आइ अहाँक पिताकेँ जीवन देने छनि।’’
‘‘मुदा’’- इंजीनियर साहेब उत्साहमे बजलाह।
- ‘‘हँ, इंजीनियर साहेब। कोशिकामे स्वभावक याददाश्त रहैत छैक।...... आ यैह कारण अछि जे ई रहि-रहि कऽ संगीतक पाछाँ बेहाल भऽ उठै छथि। एहि तथ्यकेँ युनिवर्सिटी आॅफ एरिजोना सेहो सिद्ध करैत अछि। ई युनिवर्सिटी अंग प्रत्यारोपनक कतेको मामिलापर शोध कऽ चुकल अछि।’’
डाॅक्टर साहेब आँगुरसँ लैपटाॅपक स्क्रीन दिस इशारा करैत बजलाह- ‘‘हे, देखियौ ने ! आब कोनो काज कठिन छैक? अहीठाम बैसले-बैसले सभटा शोधक जानकारी लऽ लिअ।’’
इंजीनियर साहेब झुकि कऽ लैपटाॅप दिशि तकैत बजलाह- ‘‘एकर मतलब आब बाबूजी अहिना रहि जेता?’’
डाॅक्टर हँमे मूड़ी डोलबैत बजलाह- ‘‘हूँ! कलाकारक जुआनी अवस्था छलैक ने! ओ तँ औनाहटि उचिते छैक।’’
कालीबाबू पीठपर टाँगल गिटार उतारलनि। खोलसँ बहार केलनि आ थैया-थैया...... दिग् दिग थैयाा करैत गिटार बजेबामे लीन भऽ गेलाह।





शिवशंकर श्रीनिवास
(मिथिलाक लोक-कथापर आधारित बाल कथा)
पण्डित ओ हुनक पुत्र

नैनापुर गाममे एकटा पण्डित रहथि। नाम रहनि- बौआ चौधरी। नैनापुर टोलक विद्यालयक ओ प्रधान गुरुजी रहथि। सभ हुनका बड़का गुरुजी कहनि। बड़का गुरुजीक पण्डिताइक सोरहा ओहि समयमे देश-विदेशमे छल। ओहि समएक प्रसिद्ध युवा विद्वान् मे बेसी गोटे हुनके शिष्य रहथि। देश-विदेशक लोक हुनका लग शास्त्रक गप्प बूझऽ अबैत छलाह। किन्तु बड़का गुरुजी रहथि बड़ क्रोधी, से सभ जनैत छल। क्रोध छोड़ि हुनकामे सभ टा गुणे रहनि। किन्तु हुनक क्रोधक चर्चा सभ करए।
बड़का गुरुजीक एक मात्र संतानमे बेटा, नाम रहै धनंजय।
धनंजय बड़ तेजस्वी रहय। लोक कहै धनंजय अयाची मिश्रक बेटा शंकरक दोसर अवतार छी। धनंजय बारहे-तेरह वर्षक उम्रमे बड़का विद्वान् भऽ गेल। इलाकाक लोक कहऽ लगलै- जेहने गुणमन्त बाप तेहने बेटा। किन्तु धनंजय उदास रहैत छल कारण जे बाप कहिओ नीक भाखा नहि कहथिन। ई कोनो विषयमे कतबो अंक आनय, परीक्षामे प्रथम घोषित होअए, कठिनसँ कठिन शास्त्रार्थ जीति कऽ आबय आ सोचय जे एहि बेर बाबू अवश्य प्रसन्न भऽ किछु कहता, किन्तु बाबू ओहिना धीर-गंभीर, किछु नहि कहलथिन। धनंजय अपन पिताक मुखसँ नीक गप्प सुनबाक लेल वा कोनो वाहवाहीक शब्द सुनबाक लेल ओहिना तरसय जेना उपासल पानि लेल तरसैत अछि। ओना बड़का-बड़का विद्वान् प्रशंसा करथिन, कतेको प्रसिद्ध विद्वान् हृदएसँ लगबथिन किन्तु पिताक मुँहसँ प्रशंसा सुनबाक हेतु मन रकटले रहै।
अठारह वर्षक उम्रमे धनंजय न्याय शास्त्रक एहन पोथी लिखलक जे सर्वत्र चर्चामे आबि गेल।
धनंजय अपन पोथी पढ़बाक लेल पिताकेँ देलक, किन्तु ओ पढ़ि घुमा देलथिन, किन्तु किछु कहलथिन नहि।
एक दिन धनंजय साहस कऽ केँ पिताकेँ पुछलक- “बाबू, पोथी पढ़ि अहाँ किछु सम्मति नहि देलहुँ।”
“थोड़े आर परिश्रम करू।” कहि पिता गंभीर भऽ गेलथिन।
धनंजयकेँ पिताक गप्प बहुत अधलाह लगलै, ततबे नहि, मनमे घोर प्रतिक्रिया भेलै। सोचलक- “ई हमर शत्रु छथि, जावत जीता तावत हमर यश-प्रतिष्ठासँ जरैत रहताह, कहिओ प्रशंसा नहि करताह।” से सोचैत-सोचैत बुझू बताह भऽ गेल। मनेमन निर्णय कएलक जे आइ रातिमे जखन ओ भोजन कऽ आङनसँ बहरेता तँ खर्गसँ गरदनि काटि पड़ा जाएब। अन्हरिया छैके केओ ने देखत।
दिन बीतल, साँझ भेलै आ तकर बाद राति। बड़का गुरुजी भोजन कऽ रहल छलाह, आगूमे पत्नी अंजनी बैसलि छलथिन। आ इम्हर धनंजय खर्ग लऽ कऽ ठाढ़ छल जे भोजन कऽ कोनटा लग औताह कि काटि कऽ पड़ा जाएब।
अंजनी कहलथिन- “धनंजयक पोथीक सुनै छी बड़ चर्चा छै।”
“हूँ”- पत्नीक गप्पपर बड़का गुरुजी बजलाह।
“एकटा बात कहू, तमसायब तँ नहि।” अंजनी अपन क्रोधी पति बड़का गुरुजीकेँ पुछलनि।
“कहू ने”- गुरुजी पुछलथिन।
“पहिने कहू जे तामस नहि करब।”
“अच्छा नहि करब, पूछू।”
“अहाँ धनंजयपर तमसाय किएक रहै छियनि? ”
“तमसाय किएक रहबनि? ”
“अहाँ आइ तक हुनकर प्रशंसा कयलियनि? ” पत्नी गप्पपर बड़का गुरुजी बहुत हँसलाह आ कहलथिन- “अहाँ नहि बुझै छिऐ।”
“हम बुझै छिऐ, ओ अहाँकेँ नहि सोहाइ छथि।”
“के एहन अभागल होएत जकरा बेटा नहि सोहेतै? बेटे एकटा एहन होइ छै, जकरा लोक अपनासँ पैघ देखऽ चाहैए।”- गुरुजी बजलाह।
ताहिपर पत्नी पुछलथिन- “कहू तँ अहाँक बेटा केहन पण्डित छथि? ”
“बहुत पैघ पण्डित छथि। हमरासँ बहुत आगू बढ़ि गेलाह।” गुरुजी बहुत आनन्दमे अंजनीकेँ कहलनि।
ओहिना आनन्दसँ आनन्द लैत अंजनी पुछलथिन- “ओ पोथी जे लिखलनि से केहन छै? ”
“बहुत उत्तम, हम कएटा बात ओहि पोथीसँ जनलहुँ अछि, बूझू गदगद छी। धनंजय पुत्रे नहि, पुत्र रत्न थिकाह।”
“तखन हुनकर प्रशंसा किएक ने करै छियनि?”
पुनः पत्नीक गप्पपर भभा कऽ हँसैत गुरुजी कहलथिन- “बुझलहुँ, हम हुनकर बाप छियनि, प्रशंसा करबनि तँ घमण्ड भऽ जयतनि आ तखन विकास रुकि जयतनि।”
“सुनू, हम अहाँक स्त्री छी। अहाँ जहिया हमर काजक प्रशंसा करै छी तहिया हम आरो नीकसँ काज करै छी। आ जहिया कोनोपर बिगड़ै छी तकर बाद आरो काज गड़बड़ा जाइए, ताहिपर अहाँ ध्यान देलिऐ? ”
“हूँ...।” कहि पत्नीक गप्पपर गुरुजी गंभीर होइत पुछलनि- “अहाँ आइ ई सभ किए पुछैत छी? ”
“अहाँ धनंजयकेँ पोथी दैत कहलियनि जे आर परिश्रम करू, से हुनका नीक नहि लगलनि।
“अहाँ कोना बुझलहुँ? ”
“हम माय छिऐ, हम ओतबो नहि बुझबै। तखनसँ हुनक माथ ठीक नहि बुझाइए।”
“ओ ज्ञानी छथि, हुनका हमर बातक कतहु क्रोध होइन? ”
“तखन अहाँकेँ क्रोध किए होइए? अहूँ तँ ज्ञानी छी।”
“हँ, से...।” पत्नी गप्पकेँ स्वीकारैत गुरुजी सोचैत भोजन करऽ लगलाह। मने-मन सोचलनि अंजनी ठीक कहैत छथिन।
ओम्हर कोनटाक अन्हारमे ठाढ़ गप्प सुनैत धनंजयक हालत विचित्र भऽ गेलै- “ओ एहन महान पिताक हत्याक लेल ठाढ़ अछि? ओ वस्तुतः पण्डित नहि मूर्ख अछि।” सोचैत धनंजय कानऽ लागल।
भोजन समाप्त कऽ गुरुजी ओसारापर सँ उतरि अङना अएलाह आकि धनंजय पएरपर खसि कनैत कहलक- बाबू हम बिना विचार कएने अहाँक हत्या कऽ दैतहुँ। हम बताह छी। हम मूर्ख छी। पातकी छी।”
“नहि धनंजय, अहाँ हमर हत्या करऽ लेल छलहुँ से बात नुका सकै छलहुँ, किन्तु अहाँ सत्यकेँ नुकेलहुँ नहि। अहाँ सत्यकेँ समक्ष अनबामे डरेलहुँ नहि। अहाँ वस्तुतः पण्डित छी।”
“नहि बाबू। हम क्रोधमे रही। अहाँक हत्या करब सोचलहुँ, तकर प्रायश्चित? ”
“प्रायश्चित् भऽ गेल।”
“से कोना? ”
“सत्यक खुलासासँ। आँखिक नोरसँ।”
“किन्तु बाबू? ”
“बेटा धनंजय, आइ अहाँक प्रसङसँ हमहूँ किछु सिखलहुँ।”
“बाबू!”
“जावत क्रोध रहत तावत ज्ञान हँटल रहत। हम सभ दिन विद्या सिखलहुँ आ सिखौलहुँ किन्तु हमरामे क्रोधक स्वभाव रहबे कएल आ...। ”
“आ की बाबू? ”
“सभकेँ, जे काज करए ओकरा प्रोत्साहन दीऐ। आ कोनो बात केओ कहए वा नहि कहए, दुनू स्थितिमे सोची, से नहि कएने अहाँ सन ज्ञानी बापकेँ मारब सोचैत अछि। ”
३. पद्य

३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ

३.२.१. श्री काली नाथ ठाकुर-सून मिथिलाञ्चल…..। २.एकइसम सदीक नाम-प्रेम विदेह ललन ३. विनीत ठाकुर- जाढ़

३.३.१.पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता २. सुदिप कुमार झा-दूटा रचना

३.४.१.एक भुम जोड़ एक सत्य् बराबर दू क्षण- अयोध्यामनाथ चौधरी २. हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा ३.नवका साल, पुरने हाल ! धीरेन्द्र प्रेमर्षि

३.५.१. सतीश चन्द्र झा २.मधेशक आवाज-वौएलाल साह ३.हिमांशु चौधरी -पाथर ४. -क्षणिका-प्रशांत मिश्र-हड़ाहि

३.६.१. अरविन्द ठाकुर-गजल २. महेन्द्र कुमार मिश्र-पद्य ३.इन्कपलाव सुरेन्द्रव लाभ
३.७. शिव कुमार झा-किछु पद्य
३.८.१. कुमार पवन-नहि बिसरैछ/ काल्हि तँ रवि छै २. रोशन जनकपुरी-चप्ा्ाथरल आ सड़क ३.ओम कुमार झा-थर-थर कापिँ रहल छौ तोहर पयर ४. राजदेव मंडल-कविता
स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |


!! शिव शक्ति पूजन !!

उमा संग शंकर केॅ पुजबनि पागल प्रेम मगनमा ।
गंगा जल भरि भार चढ़यबनि लेप देवेनि चंदनमा ।।

आक धतूर बेल पातक संग सजि - सजि सुभग सुमनमा,
दारूण दुर्दिन दीप जरा कऽ दुःखक धूप धुमनमा ।
उमा संग ................................................................... ।।

अक्षत छीटि दूभि सॅ झपवनि सुन्नर गोर बदनमा,
नीलकंठ केॅ भोग लगयबनि अमरित कनमा - कनमा ।
उमा संग ................................................................... ।।

श्रद्धा सागरक बीच विश्वासक राखब मेरू मथनमा,
केशर कुमकुम कस्तूरी सॅ गमका देबेनि भवनमा ।
उमा संग ................................................................... ।।

छम-छम नाचि नचारी सुनयबनि माॅ गौरी क अंगनमा,
आशुतोष तैयो नहि ढ़रता तऽ खसि पड़ब चरणनमा ।
उमा संग ................................................................... ।।



!! विरहिनी !!

रहि - रहि कऽ अहॅक लेल देह फेर धयलहुॅ अछि,
लागल अहींक एक ध्यान,
आऊ-आऊ रूसल हमर भगवान ।
सहलहुॅ कतेको हम जन्मक असहय ज्वाल,
कहुना वितयलहुॅ अछि मरणक बहु अंतराल,
मधुवन मे हे मोहन आइ हमर अवसर अछि,
राखि लियऽ राधिका केर मान ।
आऊ............................................................... ।।

वृन्दावन कुहरैछ यमुना कनैछ हाय,
गोदावरी आॅचर तर छाती हहरैछ आय ।
गोकुल मे लाख - लाख मोन बहटारल हम
तैयो वर व्याकुल परान ।
आऊ............................................................... ।।

अहॅक रूप राखि नैन युग - युग सॅ जागलि छी,
मुरली केर मधुर वैन गुनि - गुनि कऽ पागलि छी।
परकीया पतिता हम प्रेमक पुजारिन केॅ,
नहि - चाहि गीता केर ज्ञान ।
आऊ............................................................... ।।

जकरा छै लागल हा विरहक प्रचंड रोग,
तकरा की कऽ सकतै निष्कामी कर्मयोग।
हमरा लग अपने छी चीर नवनीत चोर
अंतः बनू बरू महान ।
आऊ............................................................... ।।

अहॅक लेल अपयश केॅ जीवन मे जोगि लेब,
पापो जौं लागत तऽ नरको केॅ भोगि लेब,
इच्छा नहि मृत्युक अपवर्गक आ स्वर्गक अछि,
अहॅक छाड़ि चाही ने आन,
आऊ............................................................. ।।



!! नचारी !!

दहिना कऽ अपन भाग्य वाम,
जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।
त्यागि भाई बन्धु घऽर गाम,
जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।

कामनाक कामरू केॅ गंगा मे बोरि - बोरि,
आयल छी अजगैबी नाथ शरण हाथ जोरि,
नाचि - नाचि गाबि ठाम - ठाम,
जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।

दुःखक अथाह धार भैरव जी पार करू,
बरका टा पापी हम हमरो उद्धार करू,
लैत रहब जीवन भरि नाम
जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।

चुट्टी केर धारी सन धामो मे भीड़ देखि,
छाती मे धकधकी सभ केॅ अधीर देखि,
कोना की करबै हे राम ?
जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।



!! गीत !!

राम मंत्रवत अहॅक नाम जपि - जपि दिवस बितावै छी ,
रातुक बीच चान पर तपि - तपि ध्यान लगावै छी ।

कहू अहाॅ की आन हमर छी,
देहक रूसल प्राण हमर छी
हे पाथरक देवता जागू
अहीं एक भगवान हमर छी
हम निर्दोष फूल तैयो निरमाल बनावै छी,
रातुक..................................................... ।।

जाहि बाट केॅ नित्य बहारी
हम तीतल आॅचर सॅ झारी,
जकरा अपना मे रखने अछि,
हमर आॅखि ई कारी-कारी
आई ताहि पर किएक अलसित गति सॅ आवै छी
रातुक..................................................... ।।

हमरा लेल राजपद त्यागू
भवन छोड़ि कानन केॅ भागू,
पाछूक सीता सन सुन्नरि
दौड़ि पड़ि औ आगू - आगू,
प्यासल प्रेमक जलद मर्यादा किएक जगावै छी
रातुक..................................................... ।।

आऊ - आऊ हे प्रिय अभ्यागत्
अछि पसरल हृदयासन स्वागत्
प्रियतम अहॅक पलकहुॅ लकि सॅ,
हमर जन्म जन्मान्तर जागत
लाऊ पखारि चरण नयन सॅ जल छलकाबै छी,
रातुक..................................................... ।।


!! गय नानी !!

गय नानी गय नानी बड़ बदमास भेलैं गय नानी ।
नाना संगे लड़ाई काल समाठ लेलैं गय नानी ।।
तोरे धरि नाना केर बातो,
तो उनटौले पिड़ही सातो,
तोरा डरे करथि ई थरथर
त्यागि देलेनि सौंसे आंगन घर,
नड़रौने तैयो हुनका खरिहान गेलैं गय नानी ।
गय नानी.............................................. ।।

नाना खतिर छिपली कारी
तोरा छौ स्टीलक थारी
नाना पावथि नोन सोहारी
अपना लय तरूआ तरकारी
अधजनमू दही केर मूड़ी काटि खेलै गय नानी,
गय नानी.............................................. ।।

रहलनि आब कतऽ की हुनका,
लागि गेल छनि तोहर ठुनका
मुॅह मे रखने टुटल दाॅत छथि,
खून देखि कऽ अपस्यांत छथि,
भनसा घर सॅ नाचि - नाचि बथान गेलैं गय नानी ।
गय नानी.............................................. ।।


!! नेना गीत !!
(हीरा - बेटी)

हीरा बेटी हमर बड़ दुलरैतिन ।
देखि कनियो कसरि चट् रूसि जयथिन ।।
भोरे उठिते निनायल माॅगथि बिस्कुट,
नहबऽ काल हेरथि नव बाबासूट,
बुच्ची हम्मर सरोवर केर छोटकी मीन ।
देखि ............................................... ।।

बाप गेलथिन बजार आनथिन केरा,
चाही नितः चैपाड़ि परक दू पेरा,
बिनु दूधक ई सहि जेती भरि दिन ।
देखि ............................................... ।।

चाह जेबऽ मे माॅ जौं करथि देरिये,
ई ताकथि बाबू केॅ कनडेरिये,
खाइते - खाइते आॅगन सॅ एक - दू - दिन ।
देखि ............................................... ।।

आइ भोरे सॅ खेलनि बऽत मुक्का,
मूॅहे भेलेनि जेना फूटल चुक्का ,
छथि हेहरि ई फेरो करथि बिनबिन ।
देखि ............................................... ।।


!! स्वागत गान !!

आऊ - आऊ - आऊ सभक स्वागत करै छी,
नैन मे समाउ हृदयासन धरै छी ।।
उल्लासक गीत कतऽ सगरो करूणा क्रन्दन,
उपटि रहल विपटि रहल मैथिलीक नन्दन वन,
भ्रमर झुण्ड प्यासल छथि विहग वृन्द बड़ भूखन,
मुरूझल छथि आम - मऽहु रऽसक सरिता सूखल,
बबुरे वन कवि कोकिल लाजे मरै छी ।
आऊ............................. ।।

विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि,
हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि,
मात्र ई समारोही गोष्ठी सॅ की हेतै ?
स्थिति जहिना तहिना संवत एतै जेतै
मुरदा जगाउ लाउ पैर पकड़ै छी,
आऊ............................. ।।

काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लियऽ लाठी,
एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी
पुरना किछु त्यागि - त्यागि पकड़ू किछु नऽव ढ़ंग
मोंछो पिजाउ बाउ श्रृंगारक संग - संग
अहाॅ गीत गाउ मुदा हऽम हहरै छी,
आऊ............................. ।।

अहॅक चपल चरण ऋृतुराजक सूचक अछि,
अपने आत्मस्वरूप आशय तऽ ‘बूचक’ अछि,
दीन हीन साधन सभ सॅ विहीन यद्यपि हम,
उद्वेलित श्रद्धा समुद्र नहि तरंगो कम ।
शर्वरीश स्पर्शक लेल हहरै छी ।
अभ्यागत आउ सभक स्वागत करै छी ।
आऊ............................. ।।


विशेष:- ई छल विद्यापति स्मृति पर्व समारोह 1984 ( आयोजन स्थल - ग्राम - बैद्यनाथपुर प्रखंड रोसड़ा, जिला - समस्तीपुर ) मे आगत अतिथिक स्वागत मे स्व0 कविक ओहि कालक मैथिलीक दशा पर पीड़ादायक प्रस्तुति ।




!! मातृ गीत !!

तोरे मुस्की मे अभिनव आनंदक अनुपम देश गय !
तोरे दयादृष्टि मे नव नव सौन्दर्यक परिवेश गय !!

चिता भस्म तन, कर कपाल छल,
रूप अशुभ गर मुंडमाल छल,
सर्पकंठ, विष असन दिगम्बर,
मरूघट वास कतऽ आंग़न घर ?
तोरे हाथ पकड़ि भिखमँगबा भोला भेला महेश गय ।
तोरे दयादृष्टि ..................................................................।।

माइक हाथ पकड़लनि बाबू,
ओहि हाथ पर हुनके काबू,
बेटो तऽ चरणक अधिकारी
उठलै तखन प्रश्न ई भारी,
तोहर हाथ पैर दु दुहू मे महिमा ककर विशेष गय ।
तोरे दयादृष्टि ..................................................................।।

शिशुक लेल आरामदेह
माइक शरीर मोमक चाही,
मक्खन सन कोमल करेज आ,
हास शरद सोमक चाही,
तखन किए पथरयलहुॅ धयलहुॅ अपन पाथरक भेष अय ।
तोरे दयादृष्टि ..................................................................।।


!! सोन दाइ !!

रहतौ ने हास, बहि जेतौ विलास गय,
दुई दिवसक जिनगी सॅ हेवेॅ निराश गय ।।

भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ,
मोहक उमंग बीच, प्राण किएक पागल छौ,
चलि जेतौ सुनेॅ कंठ लागल पियास गय ।
दुई............................................................... ।।

बाल वृन्द जा रहला, नव - नव युवको चलला,
बूढ़ - सूढ़ जरि - मरि कऽ माटि तऽर परि गलला,
तैयो छौ अपना पर व्यर्थ विश्वास गय ।
दुई............................................................... ।।

अपना केॅ चीन्हे तोॅ नाम तोहर ‘‘सोन दाइ’’
टलहा सॅ मेझर भऽ मूॅह छौ मलीन आइ
देश कोश विसरि - काटि रहलेॅ प्रवास गय ।
दुई............................................................... ।।

नेनपन चलि भागलि आब इतिवस्था एतौ,
कहेॅ कनेक गुनि धुनि कऽ तकर बाद की हेतौ,
कहिया धरि कऽ सकबेॅ पर घर मे वास गय ।
दुई............................................................... ।।



!! हील हाइ - हाइ !!

खुडियौलक कसि - कसि कऽ नीपल करेज केॅ,
धुरियौलक धीपल मनक हाइ वेज केॅ,
कहऽ पड़ल आइ -
नील - नील चप्पल केर हील हाइ - हाइ ।।

बेकसूर केश अधगेड़ेॅ सॅ काटल छै,
कोन घसबहबाक हाथेॅ छपाटल छै,
अथवा हय दाइ -
ठढ़िया गेन्हारी केॅ चरि गेलै गाइ ।।

पर्स लटकौने कमरच्छा सॅ आयलि छै,
नवसिक्खू डानि जकाॅ भूखलि पियासलि छै,
बचबऽ हौ भाइ -
हऽम एक दूइये ओ आखड़ अढ़ाइ ।।

एखनो धरि भौजी केॅ लजवन्ती जगिते छनि,
बूढ़ि भेली भैया लग लाज कते लगिते छनि,
सुनहक ढ़ोढ़ाई -
देखिये कऽ खा लै छी, घिबही मिठाइ ।।




!! मिथिला क बेटी !!

सीता केॅ सितिया बनौलक सौभाग्य हमर,
रघुपति केॅ महुअक करौलक अनुराग हमर,
मिथिला केर धरती अकाशे सॅ ऊॅच जतऽ
जगदम्बे दुलरैतिन दाइ,
जतऽ पुरूषोत्तम रामे जमाइ ।।

हमर उर्मिला सनि जनमलि कक्कर कन्या,
जकरा सॅ तिरहुत की ? अवधो भेलै धन्या,
कोन सतवंती सॅ संवल लऽ लखन लाल,
काले पर कयलनि चढ़ाई ।
इहो बात मने मोन पड़ल आइ ।।

सूर्यवंश वैभव लग तुच्छ इन्द्रआसन छल,
ताहि त्यागि योगासन पूर्ण अनुशासन छल,
भरत भक्ति दिव्य दीप जगमग जग कऽ उठलै,
माण्डवी केर सेवा सलाइ ।
वास लेला नंदिग्रामे जमाइ ।।

अखिल भुवन विजयी भऽ शंकर आदिगुरू बनलनि,
महिषी मे आवि मंडन केॅ मर्दित कयलनि
मुदापस्त भऽगेलनि मिथिलाक बेटी सॅ
शारदा बनलि भारती दाइ ।
गर्वित मिथिला भूमि आइ ।।


!! जेठी करेह !!

गय जेठी करेह तोॅ सवेरे उधिआइ छेॅ ।
वरखा तऽ हेठै भेलै अनेरे उपलाइ छेॅ ।।

तोरो वाटर वेज बनल छौ,
डेभलाॅप मेन्टक डेज बनल छौ,
बहुत ऊॅच खतराक विन्दु गय,
एना किए अकुलाइ छेॅ ?
गय ...................................................... ।।

ई इन्होर पानि चमकै छौ,
मोर - मोर पर भौरी दै छौ,
काटि - काटि डीहक करेज केॅ,
तऽरे तऽर समाइ छेॅ ।
गय ...................................................... ।।

बहकल तोहर रेतक धक्का,
चहकल हम्मर धैर्यक पक्का,
सत्यानाश सभक कऽ देवेॅ
आवै छेॅ आ जाइ छेॅ,
गय ...................................................... ।।

जत्र - तत्र भऽ जेतौ मौॅका,
इंजीनियर बनतौ बुरिबौका,
वान्हि तोड़ि कऽ प्रलय मचेवेॅ
एहने दाइ बुझाइ छेॅ
गय ...................................................... ।।




!! ऊँ नमः शिवाय !!

श्याम छटा पर राधा गंगा धार देखू बहिना,
वाम जटा तर वामा केर श्रृंगार देखू बहिना ।

वदन मनोहर कुंद ईन्दु सन
भुवन वृत्त केर मध्य विन्दु सन,
जड़ चेतन मोहक मृदु मुस्की
लऽ रहलाह विक्ख केर चुश्की,

लुटा रहल छथि अमृत केर भंडार देखू बहिना ।
श्याम छटा ............................................................ ।।

दीपित कुंडल लोल - लोल अछि,
प्रति विम्बित दुहू कपोल अछि,
सर्पराज केर छत्र मनोहर,
ममता मे विभोर डमरू धर,

कर त्रिशूल उर उरगक गिरिमल हार देखू बहिना ।
श्याम छटा ............................................................ ।।

केहरि छालक पट विभूषित तन,
चंद्रालं कृत शिव प्रमुदित मन,
वाम अंक गिरिराज कुमारी,
गर लटकल गणेश भयहारी

हिनके शरणागत सगरो संसार देखू वहिना ।
श्याम छटा ............................................................ ।।


!! मणिद्वीपक महरानी !!

अयली जगदम्बा दुर्गा देवी कल्याणी अय,
मणिद्वीपक महरानी अय !
नाऽ ऽ ऽ।।

सध्यः सुधा सिन्धु स्नात, मांजल गंगा जल सॅ गात,
सेवक खातिर तजलनि नवरतनक रजधानी अय,
मणिद्वीपक .............................................. ।।

टपि कऽ अट्ठारह प्राकार देवी भऽ गेली साकार
सभकेॅ सुना रहलि छथि अप्पन अभयावाणी अय,
मणिद्वीपक .............................................. ।।

हरि पीताम्बर सॅ पद झारथि,
विधि सुरसरि सॅ चरण पखारथि,
तरबा रगड़ि रहल छथि, रहि - रहि शंकर ज्ञानी अय,
मणिद्वीपक .............................................. ।।

महिषासुरक आव की डऽर, माता छाड़ू सिंहक भऽर,
लोके राच्छस भऽ कऽ कऽ रहलै मनमानी अय,
मणिद्वीपक .............................................. ।।
१. श्री काली नाथ ठाकुर-सून मिथिलाञ्चल…..। २.एकइसम सदीक नाम-प्रेम विदेह ललन ३. विनीत ठाकुर- जाढ़
श्री काली नाथ ठाकुर, आत्मज शिवनाथ ठाकुर प्रसिद्ध लोचन ठाकुर
ग्राम सर्वसीमा, मधुबनी, बिहार JK सिंथेटिक्स लि० कानपुर में १९७३ सँ १९९५ तक कार्य कयला कऽ उपरान्त स्वास्थ्यक प्रतिकूलता सँऽ स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लय सम्प्रति कानपूर सारस्वत साधना मे संलग्न।

सून मिथिलाञ्चल…..।
सून मिथिलाञ्चल,
जनु बूझि पडल
छथि रूसि रहल- धरती
सुखा कऽ भय गेल टाँट
पडती पराँट
फाटल दराडि-’
के देखि देखि
अछि
- कानि रहल
जन जीवन,
अन्नक क- अभाव
पेटक चिन्ता,
सर्वत्र व्याप्त
अछि- मँहगी सँ
जन जन तवाह
सभ जन कनैछ
छै धँसल आँखि ओ रुच्छ केश
भऽ गेल सुखा कऽ
काँट काँट
सटि पेट- पीठ में
एक भेल
तन पर माँसक
नहिं छैक लेश।
छ्थि पूँजीपति बाबू भैया
नेता मुखिया
कर्ता-धर्ता
पालनकर्ता
सौँसे गामक छथि
कर्णधार
के बाजि सकत?
कर तनि विरोध
देथिन उजाडि
दय दय
मुसकी
कसि व्यंगवाण,
अव्वल गरीब पर
चलनि रोऽऽब
बैसल दलान पर
रचल करै छथि षड्यन्त्र
सतत
निज घोघि बढेवाक हेतु
दू- चारि वा
दस बीस रुपैया कर्ज
देथि- आ’ सादा कागज
पर- औंठा निशान
लगवावथि बिहुंसैत
छथि रखैत
कजरौटी बगलहि मे
सदखनि
के कय सकैछ
दुनकर परतड
बुधियारी में
से बुझा दैत
छथि
अपनहि सभकें
हे भारत भूमिक पुत्र आवहु चेतह,
ई धर्मराज सभ
रक्त तोहर
रहतह चूसैइत सदा
यदि नहि होयबह
जागरूक
लडह अपन अधिकार हेतु
लोकतन्त्र केर रक्षा
भय सकैछ तोहरे बलपर
एवं लोक तन्त्र केर रक्षहि सँऽ
बचतह तोहरो प्राण-
इज्जति – मान॥

२.एकइसम सदीक नाम
— प्रेम विदेह ललन
अजगूत एकइसम सदी अछि क’ रहल
होएबाक ने चाही जे सएह अछि भ’ रहल

करैत छल धनिक यौ शोषण गरीबके
गरीबे गरीबपर जुलुम आइ क’ रहल

बदलि गेल अछि आब अपनक परिभाषा
अपन त’ अपनेके घेंट अछि काटि रहल

दहेजक बेपार अछि बनल विवाह
प्रेमक नाटक आइ फैसन अछि भ’ रहल

करैत रहू मंचपर जाति–पाति अंत
जातीय संगठन अछि दिन–दिन बढ़ि रहल

एखाने अछि अनपढ़मे भाइ इमानदारी
पढ़लहबा जिलास’ देशधरि लूीट रहल

चीउजे नै,मनुक्खोम आब भेटैए नकली
नाङट उघार ललन सदी अछि भ’ हल ।

३. विनीत ठाकुर- जाढ़
मिथिलेश्वर मौवाही – ६, धनुषा, नेपाल

जाढ़
गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ
राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ
दुःखक पथार आव पसरल एकचारी
थर–थर कापै बैसल बुधनी बेचारी

हाथ–हाथ नहि सुझे लागलछै बड़ धूनी
लाही लत्तिपर बरसै परै जेना फूँहीँ
सुनि नहि पराती शब्दै नहि चिड़ीया
कोक्रीया गेलै आइ की दादी बुढ़ीया
गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ
राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ

घूर की फूकब भटे नहि निङ्हाँस–पोरा
करेजामें साटगे बुधनी नेनाके लऽ कोरा
कोपित भऽ धर्ती–जलवायु उगलै छै जहर
ताँय नागिन फूफकार छोरै शितलहर
गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ
राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ
१.पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता २. सुदिप कुमार झा-दूटा रचना

पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता- करू की वृद्ध अथबल छी
पित्त तँ चढ़ैत अछि बहुतो
करू की वृद्ध अथबल छी
सुदमिया माय जे आयल छलि
नैहरसँ महफापर चढ़ि कऽ
तनिका साइकिलपर चढ़ि देखि
सड़कक कातमे दुबकल छी
करू की वृद्ध अथबल छी


नवका पैसा सन बुधियार बनि
चमकैत अछि छौंड़ा!
पियरक्का दुअन्नीसँ अकार्य भेल
बैसल छी-
करू की वृद्ध अथबल छी

मोकामा पुल बनि गेने
सिमरिया घाटक स्टीमर जेकाँ
अकार्य भेल बैसल छी
करू की वृद्ध अथबल छी
पित्त तँ चढ़ैत अछि बहुतो
करू की वृद्ध अथबल छी
(स्मृतिपर आधारित)

सुदिप कुमार झा
दूटा रचना ः—

गामक सिमानपर फाटल दरारि
चिबाब’ बबलगम लाब’ कोदारि

मनमे छा’ पोसने किए गनगुआरि
बांइट लेब मसुरी तोड़’ ई आरि

एक पत्र प्रेमके लिखक’ त’ भेज’
सांठब हम भार अपन आंचर पसारि

उठब’ मानवता, छोड़ि अड़ारि
तों हमरा दुवारि हम तोड़ा दुवारि

००
पहाड़क उचाइपरस’
एकटा गुम्बापक खिड़की दने
एकटा लड़की निचा देखैत छै
उपत्यलकामे
बहुत–रासे गुड्डीसब
आकाश्मे़ झुलुवा झूलि रहल छै
अस्तामइत सुरुजक कातमे
एकटा गुड्डी डुबकी मारैछ
धरतीके चुम्माु लैत उठैछ आकाश दिस
जखन घन्टीम बजै छैक
निस्तनब्धटतामे हेराइत
ओकर पपनी भीज जाइत छैक
नइ जानि किए
उपर आकाशक लेल
वा निचा संसारक लेल ।
१.एक भुम जोड़ एक सत्यम बराबर दू क्षण- अयोध्याीनाथ चौधरी २.२. हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा
३.नवका साल, पुरने हाल !- धीरेन्द्र प्रेमर्षि




एक भुम जोड़ एक सत्य बराबर दू क्षण अयोध्यारनाथ चौधरी

कौखन हमरा सभक मौन आक््रस�ामक बनि जाइछ
आ विवेक सहजहि कोनो खिड़कि द’ उड़िया गेल रहैछ तावतधरि
किछु निराश क्षणक प्रतीक्षा फेर ओकरा बजालैछ
आ तावते ओकर काया–कल्पे भ’ जाइछ
सब मनुपुत्र मोम भ’ जाइत छथि एक–दू क्षणक जिनगीमे ।

कहियो चौंकल अछि अहांक दुनू तरहथ्थीथ ?
आ तदुपरान्त किताब बनाक’ पढ़�हुं असछ ओकरा ः
तहिए गिरह बान्हि‍गेल हमर बातक
निर्जीब भेल आंखिके निहारैत रहि जायब अहां
पलक टो–टो क’ फुसियाही आवेश करैत ।
मोने–मोने गुनैत ।।

एक क्षण बाद
हाथ अपनाके समेटि क’ अहांक माथपर चढ़िक’ बाजत नियामकस’
चकित छी अहांक दुष्टन व्यहवहार पर’
आ’ ओ ओहि एक दिन सबसं बजै छथि
भ्रम आ प्रवंचनाक कथा सएह पुछलक अछि की ः?
केहन टांट सत्या राखि देलियह अछि सोझामे
एकोबेर चुमिलैह टांट भेल गर्दनि, आ माथ, आ मुंह
एहिना बुझबहक की
जीबैत मस्किकआइत गुलाबमे कांटने होइछ किदन ।

करन्द्वसमे गछारल अहांक हीरक, मुक्ता, रुपरानी वा जे किछु
ठीके बड़ कोमल आ सुन्दरर अइ
मुदा ततबे सत्यआ छैक विधान आ परम्पनरा
ततबे कटु आ अनिवार्य ।
उधियाइत विवेक कें गछारिक’
मुनुपुत्र सुखी भ’ पायब निर्बिवाद ।
दुष्टुता, भ्रम, प्रवंचना
आ’ एकरा सभक संज्ञामात्र
उधियाइत कोनो गैस थिक ।



एक परिवोधन आ शेष कविता



एक मुट्टी अखरा बालु फंकबाक वाध्यतता जतबे छोट भ’ सकैछ,
ततबे विरात आ डूबल अछि हमरा घरमे एक–एकटा सीताक आक्रोश,
आब बुझल जे सीता माने कोन दुःख ।

एकटा दृष्टासन्तक
आ और किछु नहि
मात्र एकटा निर्मम दृष्टा न्त
चाहिएक एहि लोकके, समाजके
ओहि एकटाक पाछां सहस्त्रो कत्लेिआम होइत रहैं निर्विध्न ....

जीह नहि टकसैंत छैक एखनि ।
एकटा दूरन्तै परम्पःरा किंबा रीति सहैत,
बकार बन्न् केनेछी हम–अहां आ सब
अयाची हड्डी लुटौलन्हिे, सेहो ठीक
एकाएकी घाब बनाओल जाइत अंग अंगके निनिर्मेष तकैत रहु

तखनि, सबटा ठीके–ठीके
समाज चाहैए जे ओकरामे रहनिहार लोथ भ’ जाए
ओकर एक एकटा प्राणी बीत राग बनल रहय आजीव,
आ संघर्ष करैत रहय अपना गराक घेघंस ।

अहां अपनाकें खुदे परिवोधि लिअ एहिना कतेक छोट–छीन जीवन सामान्य रुपे वितैत–बितैत
कौखन मनोरंजन हेतु आ’ कौखन अज्ञात, अनचेकामे
कतेक कीड़ा–फतिंगा पोसि वा पीचि देल जाइछ ।
सरिपहुं तनुक अइ ई जीब । छुइ मुइ ।

कोने ने,
ई सब कोनो बात छैक,

एतेक निश्चबय राखू जे परिबोधि नहि रहल छी हम अहांके,
किएक त अहां आरो भयाक्रान्त क’ देब
अहुं सएह कहैत छी कहि ।
एतबे बुझि राखु जहियांस अहां दृष्टाकन्त बनल छी
हमरा अहांस’ सहानुभुति अछि ।

मनुक्खहक पीड़ासं मनुक्खभके सहानुभुति होइ
ककरो दूटा आंखि पनिछा जाइ
एहि स’ पैघ जीवनक कोन उपलब्धिक भ’सकैछ ?

हम किछुटा नहि कहब ।
आत्मिहत्या। दूबेर प्रायः नहि भ’सकैछ ,
ई त, महज मामुली बोध थीक
ओना अहांक कोना बिकल्पा हमरा नीक लागत ।

जखन जीवन माने तनुक
त’ की हर्जनृ एकटा द्दृष्टानन्ति बनल रही ?
ओना हम पुछबाक व्याजज मात्र करैत छी ।
२. हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा

आय हम अपन मृत्यु देख्लों
लहास पडल छल
लोग फुटि फुटि कानि रहल छल
हमर जिनगी में ,हमर बाट पर
कांट बिछावे वाला
सव हिचुकी रहल छल जकरा
हमर जीवन से कोनो मतलब नहीं छल
सबहक मुंह से हमर प्रशंसा
निकलि रहल छल
(जेकरा लेल जीवन भरि हम
तरसैत रहलों )
घढ़ी घढ़ी क गप्प फुलझरी जकां
छुटि रहल छल .....
आह ?
भीतर से ओ कतेक खुश छलाह
असगर आकास में हम चान सन
चम्कब दम्कब
ई ते छल मोनक बात
आंखि सावन भादोक आकास
हमर बेटा सव स्तब्ध्ह
हुनक चीकरब भोकरब देखि अपन नोर
बिसरी गेल
अपन दुःख बिसरि गेल जिनका लेल माय
भरि जीवन तरसैत रहलीह की
वैह लोग छथि ई सभ ?चैन से माय के
एकोटा सांस नहीं लेबे देलान्ही
की वैह लोग छथि ई सभ ??आ
हुनक अंतरात्मा विद्रोह कै उठल
चुप भय जाओ अहाँ लोकनि
बंद करू तमाशा , ई कानब बाजब
जिनगी भरि हमर माय दीयाजकां
जरैत रहलीह
आय जखन ई चैन से सुति रहल ऐछ
गहीर निन्न में परल ऐछ
तखन अहाँ सब किएक हल्ला मचा रहल छि
किएक चिकरी रहल छि ???
सभ चुप भै गेल ..मायक मृत्यु से
बेटा पगलाय गेल ऐछ ..
आ दुनू बेटा झुकि के हमर माथ चुमलक
ईश्वर: हमर माय के चैन देब , अगलों जनम
हम एही माय के कोखि से जनम ली
आ अचक्के ओ चिकरी कनैत बेसुध भय गेलाह
"हमर माय "

३.नवका साल, पुरने हाल !
- धीरेन्द्र प्रेमर्षि

फेर आबि गेल नवका साल
हमर मुदा अछि पुरने हाल
बदलल पतड़ा बढ़ि गेल खतरा
एमकी कोना टहलतै काल!

पाप बढ़ए जनु कोपर बाँस
पुण्यक उखड़ि रहल छै साँस
लोकक मूहक मुस्की देखू
लगै जेना खरिदल मधुमास
बाटघाट बिछबैत भ्रमजाल
फेर आबि गेल नवका साल

भेल पात झड़ि नाङट गाछ
पोखरि छोड़ि पड़ाएल माछ
सुग्घड़ रस्ता चलनिहारसभ
लोथ भेल अछि लगने काछ
मानवताकेर झुकबैत भाल
फेर आबि गेल नवका साल

फूटैत बम्म आ छूटैत गोली
बन्द कऽ रहल न्यायक बोली
नव-नव सालमे नव-नव ढङ्गे
खेलल जाइ सोनितसँ होली
धरतीक आँचर बनबैत लाल
फेर आबि गेल नवका साल

मिझाइत कालक दीप बुझी
रातिक अन्त समीप बुझी
दर्द निकालैत सृष्टिक घाओ
बहा रहल अछि पीप बुझी
ठोकैत एक नव-युगलए ताल
फेर आबि गेल नवका साल

धीरेन्द्र प्रेमर्षि- गीतसङ्ग्रह कोन सुर सजाबी? सँ
१. सतीश चन्द्र झा २.मधेशक आवाज-वौएलाल साह ३.हिमांशु चौधरी -पाथर ४. -क्षणिका-प्रशांत मिश्र-हड़ाहि
सतीश चन्द्र झा-राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र

समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।
गरीबक स्विर्ग
खसलै कोना ठिठुरि क' दुखिया
माघक जाढ़ हार मे लगलै।
काठी देह बयस अस्सीग के
क्षण मे देहक प्राण निकललै।

छलै एकटा फाटल कंबल
पुत्रक माया ओकरे देलकैं।
अपने दुखिया आगि तापि क'
पिता धर्म के मान बढ़ेलकै।

भाग्यधहीन जीवन गरीब के
भूखल पेट बृद्ध के काया।
बिना स्वाबर्थ के दान कहाँ छै।
के बुझतै सरकारक माया।

मुक्तझ भेल कहुना झंझट सँ
माया मोह त्या गि क' भागल।
गाम टोल के लोक सहटि क'
सद्‌गुण ओकर बखान' लागल।

कते नीक छल दुखिया सभकें
दैत रहल ई संग गाम मे।
जायत स्वईर्ग भक्तक छल भारी
लीन रहै छल ‘राम नाम' मे।

लगलै हँसी जोर सँ सुनि क'
पड़ल देह दुखिया के तखने।
कते लोक अछि एखनो पागल
आइ बुझलियै हमहूँ मरने।

दुख अभाव पीड़ित जन जीवन
कोना स्वअर्ग केर सीढ़ी चढ़तै।
धर्म कर्म धन कें शोभा छै
निर्धन की ईश्वेर ल' करतै।

२.मधेशक आवाज- वौएलाल साह

मँा जानकी सँ कामना करैछी, शहीदक सवहक चिर शान्ति0क लेल
बढ़ु मधेशी आगा बढ़ु मधेशक अधिकार प्राप्ति लेल
युवा, विद्याथीिर् आंदोलन करु,मधेशक अधिकार प्राप्तिा लेल,
एही आंदोलनमे नै लड़लौ, त भाग्यत बुझु जे फुटीए गेल
व्याआपारी, कर्मचारी सेहो लरु, अपन भविष्य् वचाव लेल
काम,काज छोइर आँन्दो लन करु, हजुरी प्रथा छोरावैइ लेल
मधेशी शहीद पुकाइर रहलछै, मधेशक अधिकार प्राप्ति लेल
सहीदक सपना पुरा करु, मिटा दिअ शासक के खेल
इ नेपाल को छै वाटल, हिमाल, पहाड़, तराइ तै कैला
एही मधेशीके “मधेश‘ वाँटमे छै पुरे ऊरीए गेल
हिमाल, पहाड़,तराइ तँ’ कैला छुटियौलनि, कधेश शाषक के जेव मे गेल
जागु मधेशी जेवी फारु, अपन मधेश पावै के लेल,
मधेश,तराइ के वोट लकँ’ शाशक सव आगा वढ़ि गेल।
तराइन, मधेशी, लडि रहल अइ, देखु केहन शाशकके खेल
पानिस’ ठंढ़ा आगी स गरम, एही आब आंदोलनके गती छै भेल,
मधेशी आयोग कायम हो, एही शाशक वर्ग शवहक लेल

३. हिमांशु चौधरी

पाथर


पाथरकें आगां
दीप बारैत
किएक समयके
बरबाद कएने छी
ओकर आंखिमे
एतेक गर्दा पड़ल छैक
जे
फुल आ गाछ धरिकें
ने देखैत अछि
फुल आ गाछक जीवन
कलासन अछि
काव्य सन अछि

दृश्य आ द्रष्टागक
प्रतीकसन अछि
तें
किएक ने पंचम स्व रमे
फुल आ गाछक गान करब
विश्वागस अछि
एहि दुनूकें गानसं
पतझड़ सेहो मधुमास भ’ क’ आबि जाएत

ताहि कारणे
पाथरकें सुतए दियौ
किएक की
पाथर तं
निद्राक अन्तिदम अवस्थाक होइत अछि ।




कथा


शुन्य भाव
शुन्य काश होइतहुं
ने बिसरल छी व्यशथा
ने खतम होइबला अछि अनन्तंता
सुनल अछि

विश्वाछस आ प्रेमहिसं
संसार बनल अछि
शुन्य नकारने छैक

शुन्य तं
पुर्णक गर्भमे होइत अछि
शुन्यकसं सभ उठैत अछि

ओहीमे
सभ लीन होइत अछि

कतेक बड़का अछि पृथ्वीै
तरहथीके भीतर अछि एकर आयतनजे
कखनो सुटैक जाइत अछि
त क
कखनो फुलि जाइत अछि
तें

इतिहास आ वर्तमान बीचक अन्तेरकें
सड़क साक्षी रखैत
बिसङगतिक खाद्यि

आत्म कथाकें कथा बीच
बांचल छी
सर्व सत्येा प्रतिष्ठि‍तः ल’ क

चेतनाक संवाहक सभके
प्रतीक्षामे छी
जे
एकटा स्मृमतिक दोसर
ताजमहल बना देत
तत्वहमसि निर्मित मुल्यिके
प्रतिष्ठिात क’ देत ।



की भार सांठू

लाते–लातसं घाहिल
लाशे–लाशस’ गन्हाेएल
सङक्रान्तिठक पीड़ामे
की भार सांठू

थुराएल चानी
फुफुड़िआएल अहिबक फड़
शोकाएल चाउर पिपाएल आंजुर
दन्तएकथाक पात्रजकां
कचोट द’ रहल अछि
गत्र–गत्रमे बेधल भाला–गड़ांस
टीसे–टीस द’ रहल अछि
फाटल–चिटल कपड़ा–लत्ता
मूंह कतहु हाथ कतहुं
स्ट्रेतमे राखल सिगरेटक ठुट्ठीसन
लावारिश भ’ गेल
इतिहासमे बहल नोर
फेर एहिबेर सेहो बहि गेल
गन्हाहएल लाशक भार कोना क’ सांठू ?

अनिष्टिकारी अमरौती पीने अछि
ओकरा लेल
सत्य म, शिवम आ सुन्दठरमक सर्जक बाधकतत्वभ
बाधकतत्व‍ मरि जाए
माहुरे–माहुर भ’ जाए
अन्याेय अमरलती
द्रौपदीक चिरसन नमरैत चलि जाए

एहन सनकमे सनकैत ओकर अमरौती
कखनो बारुद फेकैए
कखनो धराप रखैए

बारुद आ धरापमे पोस्तामदाना कत’ ताकू
जे अनरसा बनाएब आ भार सांठब...

क्या नभासमे फाटल गाछदेखि
अन्ह ड़ि–बिहाड़ि अएबे करत
विश्वाससक जयन्तीट अङ्कुरित भेल अछि

परन्चा बहुतो धोएल सींथक सेनुरक
कारुणीकताक भार कोनाक सांठू ?....



गीत

उड़ैत धुआंमे करेज उड़ैत जा रहल अछि
जीवित इच्छाे सिसकी भरैत जा रहल अछि

पियाला भितर मदमस्त चेहरा देखैत छलहुं
ओहि चेहराकें रेखा कोरैत छलहुं हम
गरम बुन्नीेमे चेहरा पकैत जा रहल अछि

सिनेहक कसगर बन्हेनमे बान्ह ल छलहुं हम
ओहि बन्हननकें तोरण बनौने छलहुं हम
झहरैत नोरमे बन्हहन खुजैत जा रहल अछि

सोनित एके होइतो पेराएल हलहुं हम
बित–बितपर तिरस्काहरस पीड़ाएल छलहुं हम
सिलेटके आखरसन सभ मेटाइत जा रहल अछि


बाल गीत

कुत–कुतामे जितलहुं तं गोटरसमे ओसरा गेलहुं
गोटी देखि–देखि चकित छी, की करु चकरा गेलहुं

आस रखने छी जितैत जाइ झिझिरकोनामे घेरा जाइत छी
आस–पास कहैत–कहैत धप्पाज कहए ले बिसरा जाइत छी
कट्टी करु ककरांस’ झुला झुलैत ओझरा गेलहुं

एक सलाइ, दु सलाइ तेसर बेरमे चोन्हगरा जाइत छी
पानि–पानि कहैत–कहैत अंगनेमे ओंघरा जाइत छी
माछ–माछ बेंग कहए काल, अंगुरी मोड़एमे गड़बड़ा गेलहुं

कौड़ी तासमे पाइ हारने मन्हुलआ जाइछि
तीर–धनमी चलबैत काल सङीएके आखि फोङि देलहुं
४.
क्षणिका-प्रशांत मिश्र
हड़ाहि

एकटा हड़ाहि जे राति मे पटकलन्हि साँए के

तोड़लन्हि चौकी

भोरे-भोर पड़ोसनी के गरिअबैत कहलखिन्ह

हँ,चुप्प रह गे सत्तबरती

राँड़ी, छुच्छी, सँएखौकी
१. अरविन्द ठाकुर-गजल २. महेन्द्र कुमार मिश्र-पद्य ३.इन्क1लाव सुरेन्द्रर लाभ

अरविन्द ठाकुर
गजल
कोना अजुका दिन ससरतै, राति कटतै हओ भजार
एक–एकटा पल हमरा लेल सूनामी केर प्रहार
बिसरि गेलछि मोन पछिला बेर कहिया खुश भेलहुँ
डाकिया आइयोने आनलक अछि कोनो खुशखबरीक तार
ई महाजन, ऊ महाजन, नञि कतहु अछि रामाबाण
बाण बेगरताक अछि भोंकल करेजक आर–पार
यओ अन्हारक दास! आबहुँ संततिक हित कामनासँ
बजरगुम्मी तोड़ि, करू किछु आगि बारयकेँ जोगार
पीड़सँ लड़बाक लेल राखय पड़त निज पर भरोस
पीड़ हरय के लेल नित्तह नञि एताह कोनो औतार
आधा–छिछा रहि जाइछ ‘अरबिन’ जीवनक सभटा गजल
ओझरल रदीफो–काफिया आ माथ पर मिसरा सवार
गजल
कानिकए बड़ी काल नेना हारिकए चुप भए गेलै
लगैए एहि ठामकेँ सभकान दिल्ली भए गेलै
पागधारी मगन छथि अपनहि बनायल कूप मे
हाथ भरि नम्हर जखनकि टीक दिल्ली भए गेलै
पेट, बासन, मुँह, जेबी, लोक–वेदक सभ सिंगार
गाम, घर, सीमान सभ केँ छुछ दिल्ली कए गेलै
ठेठ दिल्ली सँ चलल अछि प्रगतिक दाबा सूनामी
अनघोल दिल्ली मे भेलै जे देश दिल्ली भए गेलै
जे भेला औतार, पैगम्बर, मसीहा सन कनेको
सभ केँ पोसुआ बना ‘अरबिन’ दिल्ली लए गेलै।
गजल
मोन केँ छः पाँच छोड़ू, गिरह राखब नीक नञि
हाथ मे साबून लए कए फागू खेलब नीक नञि
आदम जकाँ जन्नत के वर्जित फल पर नण्ज़ि हा लगाऊ
क्षण भरिक जे खेल, सदिखन सएह खेलब नीक नञि
शब्द के औजार सँ भड़कायब लोकक भाव केँ
खेल छै ई सहज किंतु ई खेल खेलब नीक नञि
’ढ़ाइ आखर प्रेम’ पढ़ि पंडित भेला फक्कर कबीर
अहाँ एकरा खेल बूझि एकरा सँ खेलब, नीक नञि
हे! मखौलक वस्तु नञि थिक एहि प्रकृतिक उपादान
माटि, पानि कि रौद, हवा स द्धुत खेलब नीक नञि
खन आजादी, खन किरांती, खन चुनाओक खेल–बेल
पहिर खद्धर खेलैत अयलहुँ, आर खेलब नीक नञि
मृत्यू केँ खेलौर बूझि खेललहुँ सगर जिनगीक खेल
आब लगैछ जिनगी सँ ‘अरबिन’ एना खेलब नीक नञि।
गजल
की कही एहि बाढ़ि मे डगरक कथा–खिस्सा खराब
समाधिआरय मे खराब, ससुरारि मे बेसी खराब
बाढ़ि मे छप्पर निपत्ता, भेटल तारपोलीन खराब
चाऊर खरबहे छलै आ दालि किछु बेसी खराब
बाढ़ि मे भेटत कतय किछु नीक बोली कि वचन
मुखियाक बोली ओलसन, बीडीओ के मुँह खराब
डाग्डरक त कथे नञि, एहि बाढ़ि मे औषधि खराब
एहि खरबहा हाल मे धीया–पूता के मोन खराब
चढ़ल बाढ़ि आ सूचना–सम्वाद के साधन खराब
हाकिम सभक वाहन खराब अछि, नाह के पेनी खराब
की धसय छी बाढ़ि पर ‘अरबिन’, अहाँक माथा खराब
मतला त बकबासे जकाँ, मकता कने बेसी खराब

२. महेन्द्र कुमार मिश्र,
पूर्व सांसद,

चेला चम्‍ाच आ दलाल राखू अपनेटा संग
सेबाके सुविधा मिलत जनतामे रहत रंग
जनतमे रहत रंग चम्चाम बहुत जरुरी
चम्चा जौं होय संग होएत सब आशा पुरी
चर्चा अछि ओहि महा पुरुषके जे रामके वरण करए
जनता सभहक वात नहि वुझे अपने खुट्टा धरए
अपने खुट्टा धरै विवेेकक रति नहि लेस
संवेदनाक स्वधर कतौ नहि,जड़ै रहए मधेश
जिरीजा माधव आ हो प्रचण्डत,किएक चाही लोकतन्त्रल
लोकततन्त्र आव लोप भेल भोग तन्त्रए ला’ लडू
जनता सभहक हकहीत की,अपन झोड़ा भरु
अपन भरु नहि त’ पछतावा हेायत
वैर विरोधक चिन्ता नहि अपन परार कतै जायत
जुरल रहु यहि जोगारमे अपन परिजन नहि छुटए
लुटव अछि संस्कागर हमर लुइट सकी से लुटए
गाथ कथमैप नहि छोडूु धयने रहू झोड़ा
पात्र अपने वायह लायेक छी जेना सल्हेतसक घोड़ा
मंत्री नहि महामंत्री एहि धरतीक द्वय पुत
शरमस’ं मिथिला कानि रहल, देख हिनक करतुत
देख हिनक करतुत जनता धिक्काारि रहल अछि
लोभ लालचमे फसल नेताक,े आव जनता झटकारि रहल अछि
संविधान सभा निर्वाचनमे देखल एहन ताल
जनतासभ आराम करैछ, नेता अछि वेहाल
पैसा सभहक लोभमे फसल, विकायल मधेशी नेता
टेण्डसर भरि भरि मधेशक टिकट एत’ देता
गुन्डाल बदमास आ उच्चकका पौलक मधेशक टिकट
जेकरा विरोधमे मरल पचासो वायह मांग सिटत
आवहु जागू, जागूु औ मधेशी भैया
जिनगी भरि पछतावि रहव, करव,हाय दैया

३.इन्कजलाव
सुरेन्द्रन लाभ

अन्ह र उठल, विहारि उठल अछि,
आगि उठल अछि, पानि उठल अछि,
हर दिलमे दावानल धधकए
गाम गाममे बाढ़ि उठल अछि

बच्चाा उठल, जवान उठल अछि,
जनी उठल अछि, जाति उठल अछि,
गली गल्लीछमे आगि पसरलै
आइ हमर श्मिशान उठल अछि

आइ राम उठल, रहमान उठल अछि,
कुरान उठल अछि,रामायण उठल अछि ।
शंख चक्रलए कृष्ण, सभामे
महाभारतमे अखनि तुफान उठल अछि ।

बन्दूरक उठल, गोला उठल अछि
बारुद उठल अछि, बुट उठल अछि
छैने ओतेक पेस्तो,लमे गोली
बच्चाओ बच्चा‍ जाति उठल अछि ।

भार उठल,साँझ उठल अछि,
बेर उठल अछि, राति उठल अछि
नसनसक खून अछि खौलि रहल
चुल्हीखक छाउरमे आगि उठल अछि ।

शोषित उठल,शासित उठल अछि
दबल उठल अछि, थकुचाएल उठल अछि
शाषक वर्गक नीन्न, उड़ल अछि
ओकर डरे थर–थर काँपि उठल अछि ।

नारा उठल , आकाश उठल अछि,
बस्तीउ उठल अछि, गाम उठल अछि,
घर–घरमे अन्घोाल उड़ैए
मुट्ठीमे इत्करलाब उठल अछि ।
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न


!! ऋतुराज मे विरहिनी !!

पिया कोना कऽ बिततै फागुन मास अपार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥

कोइली कुहकै ठाढ़ि पात
होईछ मन मे अघात
एकसरि डूबि रहल छी, अहीं बिनु हम मझधार औ
जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥

भ्रमरक गुंजन लागय तीत,
केहेन निष्ठु र भेलहुॅ मीत
कोना कऽ सूखि सकत ई फूटल अश्रुधार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥

सखी सभ सदिखन अछि कवदाबय,
बिछुरन रोदन लऽ कऽ आबय
बिहुंसल यौवन पसरल मेघ आ अभिसार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥

देखिते अबीर गुलालक रंग
विरह बनौलक कलुष उमंग
कहू कोना उठत ई मृत शय्‌या क कहार औ,
जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥
!! चश्मा़क बोखार !!

सोलहम मे कएल अंतःस्थम प्रवेश,
हुलसल मन गेलहुॅ नवल देश ।
हिय बसथि कला । धयलहुॅ विज्ञान,
राखल जननी ईच्छाधक मान ।
वैद्य अंगरेजिया वनि बचाबू दीनक परान,
अर्थहीन मिथिला मे बढ़त शान ।
धऽ ध्या न सुनल सृष्टि।क इच्छा ,
गॉठि बान्हिि लेलहुॅ लऽ गुरूदीक्षा ।
कॉलेज मे बीतल पहिल सत्र,
आओल तातक आदेश पत्र ।
पढ़िते आबू अहॉ अपन गाम,
हैत ज्येबष्ठमक विवाह विद्यापति धाम
तन झमकि गेल, मन गेल गुदकि
भौजी केॅ देखबनि हऽम हुलकि ।
आगत रवि पहुॅचल जनम ग्राम,
शत अभ्यापगत छथि ताम-झाम ।
चहुॅ - दिशि भऽ रहल चहल पहल,
चिन्ह् - अनचिन्हग सखा सॅ भरल महल ।
एक नव नौतारि बहुआयामी,
पूछल सॅ छथि छोटकी मामी ।
प्रथमहि हुनका सॅ भेंट भेल,
भेल दुनू गोटे मे क्षणहिं मेल ।
सॉझे औतीह दीदी अनिता,
आकुल मॉ केर एक मात्र वनिता ।
देखिते देखैत आबि गेल सॉझ,
मॉ तकिते बाट ओसार मॉझ ।
दीदी आंगन अयलि हॅसिते हॅसैत
मॉ गऽर लगौलनि ठोहि कनैत ।
दीदीक नयन हेरायल रिमलेस मे,
देखि मामी पड़लनि पेशोपेस मे ।
चश्माम मे सुन्नसर दाईक विभा,
बढ़ि रहल हिनक नयनक शोभा ।
मामी ! ई सऽख नहि अॉखिक इलाज,
मॉथ दर्द सॅ छल वाधित सभ काज ।
सुनि मामी मोन भऽ गेल अलसित,
हुनक वाम अॉखि मे पीड़ा अतुलित ।
नोचिते नोचैत भेल नयन लाल,
दर्द पसरि रहल सम्पूनर्ण भाल ।
आंगन दलान पीड़ा किल्लोाल,
अॉखि धोलनि लऽ जल डोले डोल ।
फूलि गेल नयन केर अधर पऽल,
हऽम सेकलहुॅ लऽ गुलाब जऽल ।
वैद्यो आयल नहि कोनो असरि,
कछमछ कऽ रहली - रहली कुहरि ।
माते कयलनि बाबूजीक ध्यािनाकर्षण,
अॉगन मे आबि ओ दऽ रहला भाषण ।
सभ दोष सारक नहि दैछ ध्याषन,
वयस तीस मुदा एखनहुॅ अज्ञान ।
रक्तत जमल विलोचन झिल्लीा मे,
सैनिक कंत पड़ल छथि दिल्लील मे ।
सरहोजि सॅ पुछलनि पीड़ाक काल,
पहिल बेरि भेल छल परूॅका साल ।
मॉ सऽ कहलनि लाउ नव अंगा,
हिनका लऽ जायब दड़िभंगा ।


तिरस्काऽर करब नहि हएत उचित,
कनिया दरद सॅ अति विहुंसित ।
काल्हिद अछि विवाह अहॉ जुनि जाऊ,
करैत छी उपाय नहि घबराऊ
भोरे ‘टिल्लूा' जेता हिनक संग,
नहि विवाह मे कऽ सकलनि हुड़दंग ।
भातृक सासुर जेता चतुर्थी मे,
मातृ आदेश लागल हम अर्थी मे ।
नहि बात काटल शांत छलहुॅ सुनैत,
राति बितल सुजनी मे कनिते कनैत ।
कोन बदला लेलक बापक सार,
अपन संकट बान्हबल हमरा कपार ।
मामी केॅ हम नहि चीन्हि सकल,
भीतर सॅ इन्होहर ऊपर शीतल ।
नहि जा सकलहुॅ हम वरियाती,
गाबै छी हुनक दुःखक पॉती,
भोरे उठि दड़िभंगा जा रहलहुॅ,
नैनक शोणित सॅ नहा रहलहुॅ ।
पहुॅचल डॉक्टॅर मिसिर केर क्लि निक,
चक्षुक चिकित्सनक सभ सॅ नीक
दुआरे पर कम्पानउन्डसर नाम पुछल,
मामी नुपूर कहनि ओ कुकुर लिखल ।
देखऽ मे भऽल पर वज्र बहीर,
उपरि मन हॅसल, भीतर अधीर ।
वैद्य मिसिर कहल नहि दृष्टित दोष
दुहू अॉखिये देखै छथि कोसे - कोस ।
नेत्रक आगॉ नहि अछि अन्हाेर
हिनका लागल चश्माछक बोखार ।
हम लिखि दैत छी शून्य‍ ग्ला।स,
बुझा दिऔन हिनक रिमलेशक प्या स ।
ताहू सॅ जौं नहि हेती नीक,
अॉखि सेकू बनि स्ने ही बनिक,
अधर पर मुस्की आगॉ अन्हाकर,
कानल मन सोचि विवाहक मल्हाॉर ।
डॉक्टमर बनऽ केर तृष्णा् मन सॅ भागल,
एहेन मरीज भेटत तऽ हएब पागल ।
धुरि गाम माता केर करब नमन,
तोड़ू जननी हमरा सॅ लेल वचन ।
चशमिश नैन मामी छथि अति गदरल,
हमर योजना हिनक भभटपन मे उड़ल ।

'विदेह' ५० म अंक १५ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ५०)- Part_II

२.४१.प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार २. सुशान्त झा-विकासक तेजीमे कहीं छुटि नै जाय मिथिला ३. नवेन्द्र कुमार झा-पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश/1993 मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण/ सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्यल ४. केदार कानन-जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टिा

मूर्खता पीबि कऽ विषवमन करैत अछि समीक्षक - जीवकान्त
प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार

विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कतए भेल आ दिन-वर्ष की छल? लालन-पालन कतए भेल?
जीवकांत : २७ जुलाई, १९३६ क मामाक गाम सुपौल जिलाक अभुआढ़ मे हमर जन्म भेल। किछु दिन तक तँ हमर लालन-पालन मामक गाममे भेल। तकर बाद अपन गाम मधुबन क डेओढ़मे भेल। हमर पिता चारि भाइ छलथि। संयुक्त परिवार छल आओर हम सभ १५-१६ बच्चाक लालन-पालन संगे भेल।

विनीत उत्पल : एखन अहाँक परिवारमे के सभ अछि आओर ओ सभ की करैत अछि?
जीवकांत : हम दू भाइ छी। जेठ हम छी आ नवकांत झा छोट अछि। नवकांत सेंट्रल बैंकक नौकरसँ अवकाश ग्रहण कए दरभंगामे रहैत अछि। एक बहिन आब नहि छथि। दोसर बहिन गोदावरी सुपौलमे ब्याहल गेल, जे सहरसामे रहैत अछि। तीन बच्चा अछि। पैघ बेटा अरुण चेन्नइमे बैंकमे कार्यरत अछि। छोट वरुण लखीसरायमे एलआईसीमे काज करैत अछि। बेटी प्रेम नेपालक राज विराजमे ब्याहल अछि।

विनीत उत्पल : घरमे आन लोक मैथिली पढ़ैत आ लिखैत अछि? कनियाक सहयोग लेखनमे कतेक भेटल?
जीवकांत : हमर घरमे भाइ हुअए आकि कोनो बच्चा, मैथिलीमे नहि लिखैत अछि। शुरूमे कनियाँ शुचि किछु नहि बुझैत छलीह। हुनका लगैत छल जे फालतूक काज कऽ रहल छी। हुनका अनिद्राक बीमारी छलन्हि ताहिसँ रातिमे लाइट मिझा दैत छलीह। मुदा, बादमे सहयोग करए लगलीह। धन्य ओ जे हम लिखैत छी। ओना ओ ज्योँ विरोध करतीह तँ हम किछु नहि लिखि सकैत छी। एकरा लेल हम कनियाँक आभारी छी।

विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोना आकृष्ट भेलहुँ? विस्तारसँ बताऊ?
जीवकांत : हम जाहि कालमे पैदा भेलहुँ, ताहि कालमे पढ़ैक महत्व नहि छल। हमरो पढ़ाइ देरीसँ शुरू भेल। स्कूलमे नाम लिखेबा लेल कियो नहि गेल छल। हम अपने गेल छलहुँ। ओहि कालमे हम सभ माटिपर लिखैत छलहुँ।
हमर गाममे तुलसीदासक रामायणक पाठ होइत छल। द्वारपर लोक ताश खेलाइत छल आ रामायणक श्लोकक दसटा अर्थ करैत जाइ छलाह। श्लोककेँ लऽ कऽ तर्क-विर्तक सेहो होइत छल। हमरो घरमे बेंकटेश्वर स्टीम प्रेससँ छपल मोटका रामाएण छल, जकरा पढ़ैत आ सुनैत छलहुँ। तखन धरि मैथिलीक कोनो गप नहि छल। नेना रही, सोचैत रही, जखन तुलसीदासक लिखलपर एतेक तर्क-विर्तक होइत अछि, तखन हमहूँ किएक नहि लिखै छी। शुरूमे कविता लिखलहुँ, जे आर्यावर्तमे छपल। आइ.एस.सी. कऽ कए साल भरि बाद १९६४ ई. मे प्राइवेटसँ बी.ए. कएलहुँ। छह मास धरि अहापोहमे रहलहुँ, जे हिंदीमे लिखी आकि मैथिलीमे।
ओहि काल मे मिथिला मिहिर पढ़ैत छलहुँ। ओहिसँ बेसी प्रभावित भेलहुँ। रवींद्रनाथ टैगोरक साहित्यसँ सेहो प्रभाविल भेलहुँ। हिंदीमे लिखी आओर मैथिलीमे सेहो। किछु काल बाद निर्णय लेलहुँ जे हम नित दिन लिखब। गृह जिला मधुबनीमे नौकरीक मादे खजौली, देहोल, पोखराम आदि गाममे रहलहुँ आ जीवनानुभवक व्यापक अनुभव लिखलहुँ।

विनीत उत्पल : अहाँक कालमे संस्कृतक विस्तार बेसी छल। तखन मैथिली दिश कोना प्रवृत भेलहुँ?
जीवकांत : स्वतंत्रता प्राप्तिक कालमे इंगलिश मीडियम स्कूल खुजल रहै। हिंदी स्कूलमे मैथिली पढ़ाओल जाइत छल। इंगलिश स्कूल खुजलासँ लोक संस्कृत बिसरि गेल। मुदा हम गामक लोक गामसँ प्रभावित। २४ जनवरी १९६५ मे मिथिला मिहिरमे पहिल कविता 'इजोरिया आ टिटही’ छपल। एकरासँ हमरा जोश भेटल।

विनीत उत्पल : अहाँ केकर लेखनीसँ प्रभावित छी?
जीवकांत : कविता हमर प्रिय अछि। लिखैमे आनंद अबैत अछि, ओकर गंधसँ प्रभावित होइत छी। मुदा गंधक प्रतीकमे तुलना साफ नहि होइए। कोनो गप कवितामे बेसी नीकसँ कहल जा सकैत अछि। आलोचक कहैत अछि जे अहाँ कथामे सब किछु अलग-अलग नहि करैत छी। पाठककेँ अपन दिशसँ सूत्र जोड़ए पड़ैत अछि। सबहक गंध अपन-अपन तरहक होइत छै। हमर लेखनक मूल कविता अछि, आओर अपन गप कविताक संग प्रेषित करैमे नीक लगैत अछि।

विनीत उत्पल : लेखनमे कोना प्रोत्साहित होइत छलहुँ?
जीवकांत : अहाँ सोमदेवक नाम सुनने होएब। हमर कविता पढि़ कऽ यात्री जी हुनका कहलथिन जे जीवकांतकेँ कहियौ ओ उपन्यास लिखताह। एकरा संगे मिथिला मिहिरसँ लिखबाक आमंत्रण आएल। एकरा एक तरहसँ हम चुनौतीक रूपमे लेलहुँ आ जे ओ लिखबैत रहल, फरमाइश करैत छल, से लिखैत रही। शिक्षक संघसँ सेहो जुड़ल रही ताहिसँ पटना जाइत रही। ओहि काल पटनामे लोकसँ भेट होइत रहए आओर प्रोत्साहन भेटैत रहए। तीनटा उपन्यास फरमाइशपर लिखलहुँ जे धारावाहिक रूपमे छपल।

विनीत उत्पल : अहाँकेँ ई नहि लगैत अछि जे साहित्य अकादमी देरीसँ अहाँक लेखन~पर विचार केलक?
जीवकांत : साहित्य अकादमीक पुरस्कारकेँ लोक संदेहक दृष्टिसँ देखैत छैक। ओतए जाएज लोककेँ किनारा कऽ दैत छै। हम साहित्य अकादमीक पॉलिटिक्स नहि जनैत छी। गाममे रहैत छी। कोनो दोस्त नहि बनेलहुँ। ओहिनो मिथिला समाज आ लोक अनौपचारिक अछि। भऽ सकैत अछि साहित्य पुरस्कार विलंबसँ भेटल। मुदा एहि सभमे हम नहि पड़ैत छी।

विनीत उत्पल : पैघ-पैघ पत्रिकामे कोना लिखए लगलहुं?
जीवकांत : एखनसँ तीस साल पहिने समकालीन भारतीय साहित्य शुरू भेल, तखन हम किछु अनुवाद कएलहुँ। मैथिलीमे पहिल कहानी हमरे आएल। पहिल बेर मैथिली विशेषांक आएल। एकटा अनुवाद केदार कानन केलथि। मैथिली कविता पठबैत रही। हिंदी संपादक आ हिंदी पत्रिका खूब आदरसँ हमर रचना छपैत रहए। समय अंतरालपर कोलकाता, मुंबइ, दिल्लीसँ प्रकाशित पत्रिका सेहो छपै लागल।

विनीत उत्पल : पहिल कविता संग्रह कोन छल आओर के छपलथि?
जीवकांत : 2003 मे 'तकैत अछि चिड़ै’ कविता संग्रह छपल, जेकरा ऊपर साहित्य अकादमी पुरस्कार देलक। ओकर हिंदी अनुवाद 'निशांतक चिडिय़ा’ छपल। एकरो साहित्य अकादमी छपलक। ढेरे विश्वविद्यालयमे शोध भऽ रहल अछि। प्रखर आलोचक सेहो लेखनक प्रशंसा कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहांक कविता 'रहस्य’ मे गूथल बुझाइत अछि?
जीवकांत : कविताक आरंभ कतहुसँ जे होइत अछि से तार्किक परिणति तक जरूर पहुँचैत अछि। लोक कहैत अछि जे हमर कविता आखिर मे 'टर्न’ लऽ लैत अछि। लोक काल आ पाठक हमर सामने नहि रहैत अछि, ताहिसँ अलग-अलग पाठक हमर कवितामे अलग-अलग गप देखैत अछि।

विनीत उत्पल : अहाँ तँ खूब समीक्षा केने छी?
जीवकांत : समीक्षक तौर पर हम ओते प्रोफेशनल नहि छी। बैसल रहैत रही तँ पढ़ैत रही। नव पोथी पढ़लाक बाद छोट-छोट टिप्पणी करैत छी। पूरे ४० साल मे ६०-७० टा पोथीपर छोट-छोट टिप्पणी केने छी। एकरा बाद मन बहलबैत छी, हास-परिहास आ चर्चा, बहुत रास गप करैत छी।

विनीत उत्पल : नव लेखक आ हुनकर रचनाकेँ कोना देखैत छी?
जीवकांत : एखन नवलेखक तेजीसँ आबि रहल अछि। देहातसँ सेहो लेखक आबि रहल अछि। बीच वाला पीढ़ी्मे अद्भुत लेखक भेल। महाप्रकाश आ सुभाषचंद्र यादव लोक विवशता, निर्धनताक विलक्षण चित्रण अपन रचनामे करैत छथि।
मैथिली कविता सेहो गंभीर भऽ रहल अछि। ओकर स्तर बढि़ गेल अछि, सोच काफी आगू तक अछि।

विनीत उत्पल : मैथिलीक साहित्यमे समीक्षकेँ अहाँ कोन दृष्टिसँ देखैत छी?
जीवकांत : समीक्षा यूरोपसँ आएल अछि। यूरोपमे अन्वेषणक संग समुचित परिप्रेक्ष्यमे समीक्षा होइत अछि। हिन्दुस्तान एहि विधामे पिछड़ल अछि। हिंदी भाषा्मे सेहो नीक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। लोक वेद कहैत अछि जे हिंदीक पैघ समीक्षक नामवर सिंह समीक्षा नहि कऽ भाषण दैत छथि। तटस्थ भऽ कऽ मूल्यांकन नहि भऽ रहल अछि। नीक लेखककेँ पएरसँ दबा देल गेल आओर जेकरा किछु नहि अबैत अछि ओकरा कन्हापर बैसा देल जाइत अछि। विद्यापतिपर आइ धरि कियो मैथलीमे नीक समीक्षा नहि केलक अछि। रामानाथ झाक समीक्षा जयकांत बाबूक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। अंग्रेजीमे नीक बुद्घि होइत अछि। अंग्रेजीसँ एम.ए. केलाक बाद लोकक नीक बुद्घि होइत अछि, मुदा मैथिलीसँ एम.ए. कोर्स करबाक बाद छात्र बरबाद होइत अछि। नाश कऽ दैत अछि ओकर भविष्य। जखन महीसे खराब होएत तखन कोनो नीक चीज आनि कऽ दियौ खेनाइ खरापे बनत। सोनारक काज लोहारक हथौड़ीसँ नहि भऽ सकैत अछि। समीक्षामे कोनो नीक काज नहि भऽ रहल अछि।
'अपन बट्टी भरि पनबट्टी’ सनक लोक अछि। जाइत-पाति बेसी अछि। लोक एक-दोसरकेँ छोट बुझैत अछि। रचना्क मूल भावनमे कमी आएल अछि। अपन रचना आ अपन लगुआ-भगुआमे लोक फंसल जाइत अछि। सब अपनाकेँ पैघ बुझैत अछि। सभटा लोक काजक क्रेडिट अपना लेल लेबाक लेल मारि कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : रचना्मे अनुभवक की भूमिका होइत अछि? मैथिलीक प्रचार-प्रसार लेल अहाँक विचार की अछि?
जीवकांत : सभ लोकक अपन अनुभव होइत अछि। ओकरे ठीक-ठाक कए लेखक शास्त्र बना दैत अछि। सभटा लेखक अपन अनुभवकेँ पुनर्जीवित करैत अछि। जहिना-जहिना शिक्षक स्तर बढ़त, तहिना-तहिना मैथिलीक प्रचार-प्रसार बढ़त। मिथिलामे शिक्षकक कमी अछि। स्त्री शिक्षा एखनो बेसी नहि अछि। साक्षरता जेना-जेना बढ़त आर्थिक स्थिति तेना-तेना नीक होएत। मैथिली बढ़त। इंटरनेटेपर मैथिली बढि़ रहल अछि। गौरीनाथ नीक काज कए रहल छथि। कोलकाताक स्वस्ति फाउंडेशन सेहो नीक काज कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहाँक रचना विद्रोही प्रवृतिक अछि, से किए?
जीवकांत : सरकार बनेने छी। जनताकेँ सुरक्षा चाही, सडक़ चाही। आजादी भेटल, त्रुटि सेहो भेटल। कमजोर लोकक संग दुर्व्यवहार भऽ रहल अछि। अन्यायक खिलाफ आवाज उठबैत हमर मनोदशा अछि। १९७० ई. मे कोलकातामे 'किरणजी’सँ भेट भेल छल। ओ कहलथि जे हमर स्टैंड तँ सत्ता विरोधी अछि। हुनकर गप ठीक छल।

विनीत उत्पल : मार्क्सवादकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी?
जीवकांत : मार्क्सवादक पहिने सेहो गरीबी छल। विद्यापति अपन कवितामे गरीबीक व्यापक वर्णन कएने छथि। 'कखन हरब दुख मोर’ गीतमे एक तरहेँ गरीबीक वर्णन कएल गेल अछि। 'नहि दरिद्र सब जुग माही’ आ संस्कृत श्लोक 'सर्वे गुणा कांचन भाजयंति’ मे सेहो दरिद्राक गप अछि। गरीबीक खिलाफ गरीबक पक्षमे सभ दिन लिखल जाइत रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहाँ आ अहाँक लेखन ककरासँ प्रभावित अछि?
जीवकांत : हम सेहो मार्क्सवादसँ प्रभावित छी। लोहियासँ सेहो प्रभावित छी। बराबरी आ समानताक विचारकेँ प्रमुखता दैत छी। मार्क्सक समर्थक रही। एकरा लेल दीक्षा नहि लेलहुँ, कियो ई गप पैदा नहि केलक, अपने पैदा भेल।

विनीत उत्पल : तखन अहाँ मार्क्सवादक विरोध किए कए रहल छी?
जीवकांत : मार्क्सवाद उत्तम विचार छी, मुदा हिंसाक पक्षमे बेसी अछि। भारतीय राजनीति आ संस्कृतिमे मार्क्सवादक संभावना कम अछि, ताहिसँ एतए समाजवाद प्रबल भेल। भारतीय संस्कृति 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित अछि। एतए गांधी प्रासंगिक छथि। मार्क्सवाद बारंबार अपन रास्तासँ भटकैत अछि। मार्क्सवादक नीतिकेँ जमीनपर उतारब कठिन अछि। रूसक जमीनपर उतरल मार्क्सवाद राष्ट्रवादक प्रबल समर्थक बनि गेल। तिब्बत, भूटान, नेपाल आ पाकिस्ताक बलधकेल जमीनमे चीनी झंडा फहराइत अछि।

विनीत उत्पल : 'सुमन’ जीक अहाँ हमेशा विरोध कएलहुँ, तखन अभिनंदन ग्रंथमे बड़ाइ करबाक की मतलब अछि?
जीवकांत : 'सुमन’ जीक बड़ाइ लिखलहुँ तँ हम अछूत(......)भऽ गेलहुँ। हुनकर अध्यात्मपर लिखल अद्भुत अछि। संस्कृतमे लिखलन्हि। ओ आगि लगबैक क्षमता रखैत छथि। ओ संस्कृति आ मूल्यक विषयक ध्वजवाहक छलाह। ओ मैथिली कविताकेँ उत्कृष्टता तक लऽ गेलथि। हम मार्क्सवादी भऽ जाइ तकर माने ई तँ नहि होएत जे हम वेद-पुराणकेँ बिसरि जाइ। अभिनंदन ग्रंथ लेल फरमाइशी लेख लिखाओल गेल छल। हम हुनकर काव्य आ आध्यात्मपर लिखलहुँ। सही काल छल, एकरा लेल हम खुश छी।

विनीत उत्पल : कवितामे विशेष परिवर्तन कतए तक जाएज अछि?
जीवकांत : हमरा संग ढेर लोक एलाह। सभ पछुआ गेल। पाँच साल बाद हम अपन विषय परिवर्तन केलहुं। हर क्षेत्र~मे अपनेकेँ परिवर्तन करबाक चाही। जे परिवर्तनक समर्थक होएत ओ कालजयी होएत। हमहुँ विषय बदलैत गेलहुँ ताहिसँ जीवित छी। असहमतिक कविता पंजाब आ बंगालसँ आएल। बंगालमे सुभाष मुखोपाध्याय भेलाह जे कहलथिन 'हे कृष्ण, कुरुक्षेत्र मे घोड़ाक रास छोडि़ कए फेरसँ वंशी बजाउ।’ कविताक विषय सभ दिन बदलैत रहैत अछि। विद्यापति शृंगार आ भक्तिकेँ लऽ कए लिखलथि। एखन शृंगारसँ लोककेँ वैर भऽ गेल अछि। देश प्रेमक कविता लिखल गेल। मुदा दोसर विश्वयुद्घमे देशप्रेमक गपमे देखल गेल जे ई मनुष्यकेँ बर्बाद कऽ रहल अछि। राजनीतिपर कविता लिखब बेवकूफी अछि। आदमी, मित्रता, सुख-दुख कविताक विषय रहैत अछि। जेना-जेना समय बदलत, तेना-तेना विषय सेहो बदलत। जहिना कविता बदलत तहिना एकर रूपो बदलत। एकरा एना देखी, बच्चाक छठियार करैत छी, ओकरा बाद बच्चा्मे कतेक परिवर्तन होइत अछि।

विनीत उत्पल : मैथिली समाजक स्थिति लेल की कहबाक अछि?
जीवकांत : पैरवी-पैगाम आ गुटबाजी होइत अछि। अपन गाम आ समाज सिद्घांतवादी नहि अछि। जवाहरवादी अछि ताहिसँ तुरंत झुकि जाइत अछि। क्वालिटीसँ समझौता भऽ जाइत अछि। नीक लोकक नाम लेबासँ लोक अपवित्र भऽ जाइत अछि।

विनीत उत्पल : अहाँपर लोक आरोप लगबैत अछि जे 'चेला’ बनाबैत छी जेना महाप्रकाशपर रेखाचित्रमे रमेशकेँ उद्घृत करैत सुषाष चन्द्र यादव लिखै छथि। ई गप कतेक सच अछि?
जीवकांत : हम गुरुजी रही। साइंस टीचर रही तँ शिष्य तँ बनबे करत। सभ आदमी अपन प्रभाव छोड़ैत अछि। कुणाल, प्रदीप बिहारी आदि ई नाम अछि। हालमे शिवशंकर कहलथिन जे अहाँक रचना हम पढ़ैत रही। तारानंद वियोगी कहलथिन अहाँक कविता मासमे दूटा पढ़ैत रही, मिथिला मिहिरमे, ताहिसँ प्रेरित भेलहुँ आ लेखनक मुख्य धारासँ जुड़लहुँ। हमहुँ कहैत छी, यात्रीजीक लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ। हमहुँ कहैत छी जे हम यात्रीजी आ विद्यापतिक चेला छी। हम कमांडो नहि बनेने छी। हम कोनो पुरस्कार लेल पैरवीकार नहि बनेने छी। हम दलाल नहि बनेने छी। हमर रचनासँ प्रभावित भऽ कऽ कियो रचना कर्ममे आएल, एहिमे हमर की गलती? हम अपन समर्थनमे भीड़ नहि जुटेलहुँ, वोट नहि मांगलहुँ, समीक्षाक लेल पैरवी नहि कएलहुँ। तखन जे कियो कहैत अछि जे हम हुनकर 'चेला’ छी तँ एहि~मे गलत की अछि ?

विनीत उत्पल : विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रहकेँ लऽ कऽ मोहन भारद्वाज जी समीक्षाक पर खूब विवाद भेल छल? ताहि लेल अहाँ की कहैत छी?
जीवकांत : मोहन भारद्वाज विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रह 'गामक कविता, कविताक गाम’ पर एकटा समीक्षा केने रहथिन। ओहिमे मोहन भारद्वाजजी लिखलथिन्ह जे हिनकर कविता सभटा समकालीन संभावनाकेँ खारिज करैत अछि। एहि संदर्भमे हम गौरीनाथकेँ एकटा पत्र पठेने छलहुँ। एतेक घटिया समीक्षा आ तुलनात्मक अध्ययन नहि भऽ सकैत अछि। संगे-संग पत्रक फोटोस्टेट कॉपी आओर लोककेँ पठेने छलहुँ। एकहि रचनासँ सभटा कविता खारिज भऽ जाए, एहन संभव नहि अछि। हमर विरोधक पत्र कोनो पत्रिकामे नहि आएल। मुदा गौरीनाथ एकरा मुद्दा बना देलक।
विनीत उत्पल: मोहन भारद्वाजक समीक्षाकेँ किछु गोटे गदगदी समीक्षा कहलन्हि मुदा ओ सभ बादमे अपने सेहो गदगदी समीक्षा कएलन्हि, मात्र किताब आ लेखक बदलि गेल!
जीवकांत: ई सभटा समीक्षक दारू पी कऽ, पैसा पी कऽ, मूर्खता पी कऽ विषवमन करैत अछि।

विनीत उत्पल : अपनेसँ अनुदित पुस्तक पर मूल पोथीक लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार लेखक सभ लेमए शुरू कए देलन्हि अछि। जेना अहाँ हालेमे अपन निबन्धमे मायानंद मिश्र द्वारा अपन लिखल हिन्दीक पोथीक स्वयं मैथिलीमे अनुदित पुस्तक 'मंत्रपुत्र’पर पुरस्कार लेबाक विषयमे लिखलहुँ?
जीवकांत : एहि मुद्दापर हमरा किछु नहि कहबाक अछि। मुदा मायानंद मित्र पुरस्कार लेलन्हि तँ किछु जरूर सोचने हेताह, सोचिए कऽ लेने हेताह। वैहि कहि सकैत छथि जे किए लेलन्हि।

विनीत उत्पल : साहित्य आ साहित्य लेखनमे इमानदारी आ नैतिकता कतेक आवश्यक अछि?
जीवकांत : लोककेँ सभ ठाम ईमानदार हेबाक चाही। 'पंजरि प्रेम प्रकासिया’मे हम खूब ईमानदारीसँ लिखने छी। मुदा, लोक गंगाजल लऽ कऽ अपन जीवनी लिखैत अछि। कविता, कहानी, नाटक तकमे लोक गंगाजल छींट कऽ लिखैत अछि। लेखनमे प्रेम, खून, हत्या, लार नहि अबैक चाही। हम सभ पाखंड करैत छी। मुदा जे लेखक जीवनक सत्य आ समाजक स्थिति लिखलक ओ अपन धरतीपर बदनाम भऽ गेल। राजकमल चौधरी साहित्यमे समाजक सत्य लिखलक, बदनाम भऽ गेल। ओ सत्य लिखलन्हि तँ हुनका 'अय्यास प्रेतक विद्रोह’ कहल गेल।

विनीत उत्पल : मिथिलाक केंद्र मानल जाएबला शहर 'मधुबनी’मे मैथिलीक पोथी नहि भेटैत अछि, एना किए?
जीवकांत : हम तँ देहातमे रहैबला लोक छी। बासन तँ दिल्ली, मुंबई, कोलकातामे बिकाइत अछि। मधुबनी, दरभंगा, घोघरडीहामे तँ घास छिलैबला लोक रहैत अछि। पढ़ै वाला लोक तँ बाहरे चलि जाइत अछि। मधुबनीमे पोथी नहि बिकाइत अछि, ओहिमे लेखकक कोन दोष? पब्लिशर्स आ सर्कुलेशनक मामला्मे समर्पित लोकक जरूरत अछि। गीता प्रेसक पोथी सभ ठाम बिकाइत अछि। हिंद पॉकेट बुक्सक पोथी ठामे-ठाम भेटैत अछि। हिंदीमे धर्मयुग, सारिका बंद भऽ गेल अछि। हमर सबहक पोथी दोकानमे नहि भेटि रहल अछि। लोक-वेद खैरातमे पोथी लएले चाहैत अछि।

विनीत उत्पल : प्रबोध सम्मान 2010 प्राप्त करबाक लेल बधाई।


२.
सुशान्त झा-ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक (इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी (भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा (2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आ न्यूज वेबसाईटमे काज, दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज।


विकास के तेजी मे कहीं छुटि नै जाय मिथिला….।

बिहार विकास के चर्चा जोरशोर सं आबि रहल अछि। जीडीपी विकास दर मे बिहार गुजरात सं कनिए पाछू आयल अछि-ओहो तखन जखन कि राज्य मे कोनो तरहक उद्योग धंधा या व्यवसाय के विकास नहि भेल अछि। साफ अछि जे ई विकास कृषि क्षेत्र आ सरकारी योजना सबके लगभग सही ढ़ंग सं लागू करैके बदौलत भेल अछि। एम्हर केंद्र सरकार के कतिपय योजना-जेना नेरेगा, मध्यान्ह भोजन, सर्वशिक्षा अभियान, राजीव गांधी विद्युतीकरण आ पंचायत पर बेसी ध्यान दै के कारणे सेहो ई विकास देखा रहल अछि। ओना नीतीश कुमार सरकार के तारीफ ई जे ओ अहि योजना सबके सही तरीका सं बिहार मे लागू कयलक।
अगर आंकड़ा पर गौर करु त पायब जे बिहार के अर्थव्यवस्था पिछला चारि साल मे लगभग 11 प्रतिशत के दर सं आगू बढ़ल। लेकिन, दोसर दिस अगर राजधानी पटना मे संपत्ति के मूल्य पर गौर करी त आंखि फाटि जायत। पटना मे पिछला 2-3 साल मे रीयल स्टेट के मूल्य मे लगभग 100 सं लय क 300 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी भेल अछि। जहि फ्लैट के दाम पटना मे 2 साल पहिने तक 12 लाख रुपया छल ओ आब 25 सं लय क 40 लाख तक भेटि रहल अछि। पटना देश के ओहि किछु गिनल चुनल शहर के श्रेणी मे पहुंचि गेल जतय हवाई यात्रा करैबला के संख्या मे सबसं बेसी बढ़ोत्तरी भेल अछि। साफ अछि जे पटना के विकास या पटना मे धन के उपलब्धता बिहार के आम लोग के आमदनी सं बहुत बेसी अछि। ई बात एकटा खतरनाक संकेत के दिस इशारा कय रहल अछि जे बिहार के तमाम विकास राजधानी मे सिमटि रहल अछि या फेर बिहार मे धन के संकेंद्रण राजधानी मे अश्लील रुप लय लेलक अछि। एकरा दोसर तरीका स एना बूझि सकैय छी जे बिहार मे धन के केंद्रीकरण किछ खास हाथ मे बेसी भेल आ ओ आम जनता के हाथ कम पहुंचल। प्रतिशत मे बृद्धि के दर कयकटा दोसर फैक्टर सं ध्यान हटा दैत अछि, ई विकास के पूरा तस्वीर नहि कहैत अछि। विकास त भेले लेकिन ओहि विकास मे सम्पूर्ण जनता के भागीदारी संदेह के घेरा मे अछि।

लेकिन चिंता के बात सिर्फ एतबे नहि। मुख्य बात ई जे बिहार के अपेक्षाकृत विकास त भेले आ यदि स्थिति ठीक-ठाक रहल त आबै बला दिन मे औरो तेजी सं विकास हेत-लेकिन विकास के चरित्र जे संकेत दय रहल अछि ओ मिथिला के लेल शुभ नहि बुझा रहल अछि।
बिहार के नक्शा के गौर सं देखू-अंदाज लागि जायत जे आबै बला बिहार- गंगा के उत्तर आ गंगा के दक्षिण- एकटा भयंकट आर्थिक विषमता के बाट जोहि रहल अछि। बिहार के उत्तरी भाग-खास कय मिथिला क्षेत्र ऐतिहासिक रुप सं बाढ़ग्रस्त अछि, आ एतय बहुत कम सरकारी निवेश भेल अछि। आधारभूत संरचना, प्रतिवर्ष बाढ़ि के भेंट चढ़ि जायत अछि। एहन मे गंगा के दक्षिण के इलाका के भौगोलिक बढ़ित हासिल अछि।
बिहार मे हुअय बला वर्तमान निवेश आ अबैबला निवेश के जिनका अंदाज छन्हि ओ जनैत छथि जे सबटा मोट निवेश गंगा सं दक्षिण खासकय मगध आ भोजपुर मे जा रहल अछि। चाहे नालंदा विश्वविद्यालय हुए या गया के निकट निजी क्षेत्र मे लागय बला बिजली घर। दोसर गप्प ई जे ई इलाका पहिने सं संपर्क मार्ग पर अछि-चाहे ओ जीटी रोड हुए या दिल्ली-कलक्तता रेल मार्ग। अहि इलाका मे बाढ़ि नहि अबैत छै आ पटना एहेन नगर अही इलाका मे छै। बिहार के आमदनी दै बला मुख्य पर्यटन क्षेत्र गया-राजगीर अही इलाका मे अछि। ई इलाका स्वाभाविक लाभ के स्थिति मे अछि।

लेकिन ओहू सं बेसी बिहार सरकारक मौजूदा चरित्र अहि हालत के और प्रोत्साहित कय रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजगीर, नालंदा आ गया के विकास के लेल बेसी उत्साहित छथि। नीतीश जहन, केंद्र मे मंत्री छलाह तखनो ओ बाढ़ मे एनटीपीसी आ नालंदा मे आयुध कारखाना(जार्ज के तत्कालीन संसदीय क्षेत्र आ नीतीश के प्रभावक्षेत्र) लगबौने छलाह। एमहर केंद्रीय योजना के बात चलल त बिहार के भेटय बला एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी चलि गेल-सिर्फ हाथ आयल किशनगंज या कटिहार मे प्रस्तावित अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कैम्पस।

मिथिला के जे मूल समस्या अछि ओहि दिस नीतीश सरकार के कम ध्यान अछि। मिथिलांचल, जकर आबादी बिहार मे कोनो दोसर क्षेत्र सं बेसी अछि ओतय के लेल बहुत कम पैघ सरकारी प्रोजेक्ट प्रस्तावित अछि। एकर मूल मे अछि एहि इलाका के बाढ़िग्रस्त भेनाई, तखन फेर नीतीश सरकार बाढ़ि के निदान के लेल किएक नहि उत्साहित अछि?

अहि इलाका मे साक्षरता के दर कम अछि, स्वास्थ्य के हालत ठीक नहि। तैयो सरकार के एजेंडा पर अहि इलाका मे एकोटा विश्विविद्यालय खोलनाई नहि छैक। नहिए, सरकार अहि इलाका मे एकोटा मेडिकल या इंजिनियरिंग कालेज खोलैके दिशा मे उत्साहित अछि।

ओनहियो, अगर ई मानि लेल जाई जे बाढ़ि के वजह सं अहि इलाका मे कोनो बड़का प्रोजेक्ट नहि लागि सकैये, आ एकर निदान केंद्र के हाथ मे छैक, तैयो की नितीश सरकार के ई दायित्व नहि जे ओ केंद्र पर दवाब डाले? पिछला साल कोसी के बाढ़ि के बादों हमसब एकर पूर्णकालिक निदान के कोनो संकेत नहि पाबि रहल छी।

हमरा सबके विकास के अहि रफ्तार सं चेति जाय के चाही। समय आबि गेल अछि जे हम सब अपन मांग जोरशोर सं उठाबी-नहि त अबैबला बिहार मे तमाम निवेश गंगा सं दक्षिण होयत आ मिथिला के लोग सिर्फ ओतय चाकरी करय ले जेता। हमर-अहांके हालत वैह भ सकैत अछि जेना पंजाब मे एखन बिहारी के छैक।

नवेन्द्र कुमार झा
नवेन्दुत कुमार झा
पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश
1993 मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण

आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार एकांश 28 दिसम्बबर 2009 के अपन स्था पनाक पचास वर्ष पूरा कएलक अछि। आकाशवाणीक पटना केन्द्रर सँ 28 दिसम्ब्र 1959 के जे प्रादेशिक समाचारक प्रसारणक प्रांरभ भेल ओ बिना कोनो बाधा के प्रसारित भऽ पाछा नहि देखालक आ समाचार पर अपन गहिर नजरि रखने समाचार के जनता धरि पहूचैबा मे कोनो कसरि नहि छोड़लक अछि। प्रारंभहि सँ एहि एकांश सँ जूड़ल समाचार संपादक आ हुनक सहयोगीक दल सीमित साधनक बावजूद एकरा मजभूत स्त्म्म क रूपमे ठाढ़ कएलनि। बिहारक जनता के समाचार जगत सँ जोड़बाक जे काज आकाशवाणीक प्रादेशिक समाचार एकांश कएलक से अनवरत चलि रहल अछि ।
आजादीक बाद देशभरि मे आकाशवणीक पाच टा केन्द्र छल। ओना आजादी सँ पहिने देश भरि मे आठरा केन्द्रए छल जाहिमे देशक बैटवाराक बाद तीनरा केन्द्रर पाकिस्ता न मे रहि गेल। स्वरतंत्रता प्राप्तिक बाद एहि संचार माध्यसमक विस्ताहर प्रारंभ भेल आ सौभागय सँ एकहि वर्षक भीतर 26 जनवरी 1949 के आकाशवाणीक पटना केन्द्रक सँ समाचार क प्रसारण पहिल बेर 1959 मे प्रारंभ भेल। समाचार एकांश दिल्लीणक तात्काकलिक सहायक समाचार संपादक गुरूदत्त विधालंकारक नेतृत्वा मे समाचारवाचक रामरेणु गुप्तर आ संवाददांता रवि रंजन सिन्हाकक दल काज करब प्रारंभ कएलक। हुनक आ संवाददाता रवि रंजन सिन्हाचक दल काज करब प्रारंभ कएलक। हुनक प्रयास सँ एकरा रोमांचक क्षण आएल आ 28 दिसम्बरर 1959 के सांस सात बाजिकऽ पाच मिनट मे प्रादेशिक समाचारक पाच मिनटक पहिल बुलेटि आकाशवाणी पटना सँ प्रसारित भेल।
देश-दूनिया सँ बिहारक जनता के जोड़बाक लेल प्रारंभ भेल ई प्रयास अपन गति पकड़लक आ एकर समय क संगहि समाचारक अवधि में परिर्वतन आएल। प्रादेशिक समाचारक बढ़ैत लोक प्रियता के देखि पाच मिनटक ई बेलेटिन दस मिनटक भऽ गेल सा सांझ मे सात बाजिक तीस मिनट पर प्रसारित होमए लागल आ आइयो शहर सँ लऽ भऽ सुदूर गाम-धरमें एहि बुलेटिनक सात बाजिक तीस मिनट पर लोक सभी प्रतिक्षा करैत रहैत छथि। देश आ प्रदेशक बदलैत चातुर्दिक परिस्थित के देखि प्रतिदिन मात्र एकटा बुलेटिन सँ काज नहि चलैत देखि 10 अप्रील 1978 के एकटा आर बुलेटिनक प्रसारण प्रारंभ भेला। ई बुलेटिन प्रतिदिन दुपहरण मे तीन बाजि कऽ दस मिनट पर प्रसारित होएब प्रारंभ भेला। पाँच मिनटक ई बु‍लेटिन सेहो बिना कोनो बाधा के प्रसारित भऽ रहल अछि। एकांश द्वारा दू टा बुलेटिनक सफलता पूर्वक प्रसारणन बाद तेसर बुलेटिन सेहो प्रसारित होएब प्रारंभ भेल जे प्रतिदिन प्रात: काल मे आठ बाजिक दस मिनट पर प्रसारित अछि जे दरस मिनट अछि।
प्रादेशिक समाचार एकांश द्वारा प्रदेशक उर्दू भाषी जनता क लेल उर्दू समाचारक प्रसारण सेहो कएल गेल। 16 अप्रील 1989 सँ एकांश द्वारा उर्दू बुलेटिन इलाकाई खबरें’ दूपहर तीन बजि कऽ दस मिनट पर प्रसारित कएल जा रहल अछि। पाँच मिनटक एहि बुलेटिनक माध्यरम सँ आकाशावणी पटना क समाचार एकांश अपना के उर्दू भाषी जनता सँ जोड़लक। अपन यात्राक अगिला कड़ी मे एकांश मैथिली भाषी जनता के जोड़बाक योजनाके मूर्त रूप देलका 2 अक्टूाबर 1993 सँ मैथिली भाषी जनताक लेल मै‍थिली समाचार बुलेटिन ‘ संवाद’ क प्रसारण प्रारंभ भेल। सांझ छह बाजिक पन्द्रथह मिनट पर प्रसारित होमए बाला पाच मिनटक बुलेटिन प्रारंभ मे सप्ताेह तीन दिन प्रसारित होइत छला संवादक बढ़ैत लोप्रियता के देखि पाच मिनटक ई बुलेटिन 16 अगस्ता 2003 दिन सँ सांझ मे छह बाजि कऽ पन्द्रेह मिनट पर प्रतिदिन प्रसारित भऽ रहल अछि। ‘ संवाद’ आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार एकांश द्वारा तैयार कएल जाइत अछि आ एकर प्रसारण प्रतिदिन आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्रा सँ होइत अछि। एकांश द्वारा समाचाराक अलाबा समकसामयिक विषय पर सभीक्षातमक वातीक कार्यक्रम ‘समसामयिक चर्चा’ 1992 सँ प्रारंभ भेला ई साप्तायहिक कार्यक्रम सभ शनि दिन प्रसारित होइत अछि। आकाशवाणीक समाचार एकांश अपन डेग आगा बढ़ौलक आ विधायिकाक नतिविधि सँ जनता के जोड़बाकक लेल विधान मंडल सभीक्ष कार्यक्रम प्रसारण प्रारंभ कएलका विधान सभा आ विधान परिषद्क सत्रक दरमियान एकांश द्वारा प्रतिदिन आठ बाजि कऽ बीस मिनट पर ‘ विधान मंडल समीक्षा’ प्रसारित करैत अछि।
देशमे आएल सूचना क्रान्तिक प्रभाव सेहो प्रादेशिक समाचार एकांश पर पड़ल। एकांश आधुनिक सूचना तंत्र सँ लैस भेल आ वर्ष 2003 मे रोमांचक क्षण आ एल। एहि वर्ष एकांशद्वारा ‘दूरभाष समाचार सेवा’ क प्रसारण प्रारंभ भेल। श्रोता अपन फोन पर समाचार सूनऽ लगलाह। एतबा नहि वर्ष 2005 मे एकांश आधुनिक मीडिया क साधनक उपयोग करैत डी टी एच पर सेहो अपन सेवा उपलब्धा करौलक आ प्रादेशिक समाचार डी टी एच पर सेहो उपलब्धै भऽ गेल। एफ एम चैनलक बढ़ैत लो‍कप्रियताक देखि वर्ष 2006 सँ प्रमुख समाचार तीन टा बुलेटिन 10.30, 11.30 आ सांझ 6.30 बजे एफ.एम चैनल पर सेहो प्रसारित भऽ रहल अछि। समाचार सेवा प्रभागक वेब साइड www. Newsonair.nic in आ www. newsonair. com पर सेहो वर्ष 2007 सप्राइज़ प्रादेशिक समाचार उपलब्धi होमए लागल अछि। दूनियाक कोनोमे बैसल व्य क्ति एहि वेव साइट के खोलि आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार के पढि़ आ सूनि सकैत अछि।
समाचार सेवा प्रभागक तर्ज पर प्रभागक रिदशा निर्देशक अनुसार प्रादेशिक समाचार मे संवाददाताक वाइस डिस्पै च, वाईस कास्टर आ साउट बाइटक कऽ प्रयोग कऽ समाचार के रोचक बनैबाक प्रयास प्रारंभ भेल। ई प्रयास अक्टू बर 2006 मे मूर्त रूप लेलक। संवाददाताक आबाजमे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि। वर्ष 2006 मे मूर्त रूप लेलक। संवाददाताक आबाज मे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि1 वर्ष 2006 मे मूर्त रूप लेलक । संवाददाताक आबाज मे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि। वर्ष 2006 मे समाचार सेवा प्रभागक पहल पर जिलाक गतिविधि पर आधारित कार्यक्रम ‘जिले की चिह्ठी’ क नाम बदलि कऽ ‘जिले की हलचल’ कऽ देल गेल ‘जिले की चिट्ठी मे प्रदेशक विभिन्नअ जिलाक अंशकालिक संवाद दाताक प्रेषित समाचारक आलेखक प्रसारण होईत छल मुदा एकर परिवर्तित रूप ‘जिले की हलचल’ मे जिलाक समाचार आधारित एहि कार्यक्रम के संवाददाताक आवाजमे प्रसारित कऽ एकरा आर जीवंत बनाओल गेल अछि। ई कार्यक्रम प्रतिदिन प्रादेशिक समाचारक बाद प्रसा‍रित होईत अछि।
प्रादेशिक समाचार एकांशक स्थारनाक संगहि जाहि इमानदारीक संग गुरूवारदत्त, रामेरणुगुप्तार आ रवि रंजन सिन्हाश आकाशवाणी समाचार सँ बिहारक जनता के जोड़बाक काज प्रांरभकएलनि ओकरा पूरा इमानदारीक संग हुनक बाषजूद प्रादेशिक समाचार एकांश जनता के त्वाेरित आ विश्वंसनीय समाचार देबाक लेल तत्प र अछि। अपन कर्तव्यरक निर्वाह एकांश देश-दूनियाक हलचल सुदूर गामधरि पहूचा रहल अछि।

सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्यश
‘पार्टी विथ डिफरेन्सद’ क दाबा करए बाला भारतीय जनता पार्टी आब अपन चालि आ चारित्र के आन दलक डांचा मे ढालि रहल अछि। राजनीतिक अपराधी करण आ भ्रष्टाचारक विरूद्ध संघर्षक शंखनाद करए बाला भाजपा आब अपराधी आ भ्रष्टाजचारीक आगां नतमस्त्क भऽ गेल अछि। ई स्वांभावि को अछि। राजनीति दलक एकमात्र उद्देश्य् सत्ताक प्राप्ति अछि आ एकर प्राप्तिक लेल सभ किछु जायज अछि। ज्योो ई नहि रहैत तऽ पार्टी विथ डिफरेन्सष बाला भाजपा जाहि शिक सोरेनक विरुद्ध संसद सँ लऽ कऽ सड़क धरि संधष्र कएलक दलक संग झारण्डस मे शासन करबा लेल बेचैन नहि रहैत।
देशक बहुचर्चित सांसद घुस काण्डस आ शशिनाथ झा हत्याेकांड क आरोपी झारखण्डाल मुक्ति मोर्चाक अध्य क्ष शिबू सोरेन के झारखण्डाक मुख्यण मंत्री बनैबाक लेल भाजपा अपन समर्थन दऽ अपराध आ भ्रष्टाोचारक एकरा नव परिभाषा लिखबाक प्रयास कऽ रहल अछि। झारखण्डय मे त्रिशंक विधान सभा बनलाक बाद सोरेन पहिने कांग्रेसक चिरौरी कएलनि ओ काँग्रेस आलाकमान द्वारा मुख्य मंत्री पद देबा सँ मना बएलाक बाद पाला बदलि राजग केँ खेमा मे गेलनि आ जेना भाजपाक नेता सत्ताक प्राप्तिक लेल बेचैन छलाह, शिबूक सभ कुकर्म के बिसारि हुनक आगां नतमस्तओक भऽ गेलाह। शिबूक संग भाजपा के प्रदेश मे स्थाचयी सरकारक एतबा चिन्ता छल तऽ एहि चुनावक आवश्यतकता नहि छल। मधु कोड़ाक मुख्यज मंत्री पद सँ विदाई समय भाजपा ओहि सभ सँ पैघ दल छल। सदनमे ओकर 30 रा सदस्यय छल आ झामुमो के सेहो 18 सदस्यभ छल। आ दूनू दल आरामदायक बहुमत प्राप्त कऽ झामुमोके सेहो 18 सदस्यम छल। आ दूनू दल आरामदायक बहुमत प्राप्तन कऽ सरकार चला सकैत छल। मुदा सरकार सजानाक जे बाबादी भेल एकरा लेल भाजपा जिम्मे।दार नहि अछि? मात्र काँग्रेसके सत्ता सँ बाहर रखबाक लेल भाजपाक ईनाटक पार्टीक बदलि रहल चालि चरित्र आ चेहरा कहल जा सकैत अछि।
राष्ट्री वादी विचारक पोषक आ अपन ईमानदार छवि क तगमा लेने धुमि रहल भाजपाक भ्रष्टाहचारक विरुद्ध संघर्ष नारा लोकक आखिमे झाउर झोकब बुझि पड़ैत अछि। ओना पार्टी अपन नीति आ सिद्धांत पर चारि डेग चलि दू डेग पांछा हटबामे कोनो परहेज नहि करैत अछि बशर्ते सत्ताक गांरटी हो। राम मंदिरक मामिला होकि धारा 310, अथवा समान अचार सँ हिताक मामिला पार्टी अपन एहि भूल सिद्धांत सँ समझौता कएलक आ केन्द्र से गांरटेड सत्ता हाथ लागल। एकर बाद तऽ जेना पाटी मनुकख खूनक स्वाकद लऽ चूकल शेर मऽ गेल आ सत्ताक ई स्वाटद लेलाक बाद बिनू सत्ता प्राप्ति रहब दुष्कखर भऽ गेल। झारखण्डल भूख के शांत करबाक प्रयास कहल जा सकैत अछि।
बदलैत राजनीतिक परिदृश्याकक मध्यद राष्ट्रतवादक झण्डाष दो रहल भाजपा आब अपराधी आ भ्रष्टघचारीक कन्हा पर चढि़ कोनो हाल मे सत्ता प्राप्तिक नीति पर चलि रहल अछि। पार्टीक बदलैत चाहि। चरित्र आ चेहरा ज्यो वर्ष 2010 मे बिहार मे होमए बाला विधान सभा चुनावक दरमियान सोझा आबि सकैत अछि। प्रदेशक बदलि रहल राजनीतिक बातावरणमे बिहार मे सेहो त्रिशंकू विधान सभाक संभावना बुझि पड़ैत अछि। ज्योंक ई मेल 13 सत्ताक कुसीक लेल भाजपा पशुपालन घोटालाक लेल चर्चित राजद अध्यझक्ष लालू प्रसादन आगां साष्टांमग दण्डरबत भऽ कोनो आश्च र्य नहि होएत।
ई सत्त अछि जे राजनीतिक दलक लेल सत्ताक प्राप्तिक एकमात्र लक्ष्य होईत अछि। चुनावक मैदान मे उतरबा सँ पहिने भने पैघ-पैघ दाबा कएल जाईत हो। जनताके दिन मे चाद आ तारा देखैबाक आश्वांसन देल जाईत हो मुदा मत गणनाक बाद बदलैत राजनीतिक परिदृश्य क अनुरूप नीति आ सिद्धांत बदलैत अछि। आ ई सभ झारखण्डद मै पान मे ताल ठोकड बाला दल प्राप्तिक लेल नव-नव सभीकरण बनबड लागल आ सफलता भाजपाके भेटला। सांसद घुस काण्डा मे संसदक कार्यवाही के पन्द्रडह दिन घरि ठप्पज कऽ जनताक टाका बर्बाद करए बाला आ शिबू सोरेन पाक साफ लगलेनि। राँची सँ लऽ कऽ दिल्ली धटि बैसल भाजपाई शिबू के क्लीकन चीर दैत रहलनि आ ओम्ह र शाशिनाथ झाक परिजन शिबू के मुख्य मंत्री नहि बनैबाक चिरौरी करैत रहलाह। सत्ता प्रप्तिक एहि जोशमे स्व oझा के न्या य दे एबाक बात दबि गेल अछि। भाजपाक नेतृत्वौ घृतराष्ट्रल जकां आखि पर पट्टी बान्हि न्यामय सँ आँखि चोरा रहल अछि।
मामिला स्पलष्टज अछि। ज्योन शिबू सोरेन एतबा पाक साफ छलाह तऽ फेर आखिर कोन कारण भाजपा शिबूक विरूद्ध संघर्ष करैत रहला ईहो सत अछि जे शिबूक विरूद्ध संघर्ष करैत रहल। ई हो सत अछि जे शिबूक विरूद्ध कानूनक अनुसार मामिला पर निर्णय होएत आ निर्णय भेलो अछि। ओ न्यारयालय द्वारा बरी कएल गेल छथि आ आब मामिला सर्वोच्चम न्या यालय मे अछि। न्याओयालय अपन धारा आ साक्ष्य क आधार पर निर्णय देत मुदा सच तऽ झारखण्ड्क एक जनता जनैत अछि। ज्यों। न्यालयालय द्वारा बरी कएलाक बाद दोस्तीर जायज अछि तऽ बिहार मे पशुपालन धोटालाक किछु मामिलामे राजद अध्यओक्ष लालू प्रसाद के सेहो राहत भेटल अछि तऽ भला हुनक विरूद्ध संघष्र जारी राखब बिहारक जनता के मुर्ख बनाएब नहि अछि।
वर्ष 2009 मे लगातार हारिक स्वारदाक बाद वर्षक अंतमे विजेता बनबाक अवसर हाथमे अबैत देखि भाजपा अपन नीति आ सिद्धांत के फिक्सल डिपाजिट कऽ देलक अछि। एक दिस भाजपा अपराध भ्रष्टाबचारक संरक्षण दऽ सत्ता चलाओत दोसर दिस ओकर नीति आ सिद्धांत बढ़ैत रहत। सताक सहयोगी बनलाक बाद भने भाजपाई मदहोश भेल होथि मुदा स्वतoशशि नाथ झा क आत्मा। भाजपाक एहि निर्णय पर जरूर आश्चाय्र चकित होएत शिबूक मुख्य मंत्री बनलाक बाद स्विoझाक परिजनके न्याएय भेरत एकरतऽ कल्पसना करब बेक्कूकफी अछि। झामुमो सुप्रीमो जतए स्वीo झाक हत्यााक मामिलामे अपना आप के पाक साफ करबाक सभ संभव प्रयास करताह ओतहि भाजपाई पूर्व मुख्यस मंत्री मधु कोड़ाक साम्राज्यअक अनुरूप एहि तरहक अपनो छोअ साम्राज्यत बनैबा मे कोनो कसरि नहि छोड़ता । किएक तऽ झारखण्ड क ई नियति बनि गेल अछि ।
४. केदार कानन-जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टिर

गंभीर साम्यावादी दृष्टिश, रचल पचल जीवानानुभव आ ताहि अनुभवक सहज मुदा परिपक्वक अभिव्यरक्तिू, अभिव्यसक्तिनमे कहबाक अपन ढ़ंग, मैथिल जीवन आ परम्‍पराक श्रेष्ठ अंकन-चित्रण कथाकार जगदीश प्रसाद मंडलक निजी पहचान थिक। एक बएसपर आबि गेलाक बाद ई लेखनक शुरुआत कएलनि अछि मुदा से हिनक कृतिक परायणसँ बुझाइत नहि अछि। तकर कारण ई रहल अछि जे हिनक मानसमे ई सभ वस्तुि कागतपर उतरबासँ पहिनहि रचित-खचित रहल अछि। जीवनक सघन-बीहड़ झंझावात सहि-अंगेजि लेखनक क्षेत्रमे उतरय बला जगदीश जी सनक श्रेष्ठत शिल्पीसक स्वा़गत करैत प्रसन्निता होइत अछि।
हिनक पछताबा कथा हमर टेबुलपर राखल अछि। सुपौलमे आयोजित कथा गोष्ठीामे ई कथा पढ़ल गेल छल। एकटा स्वकतंत्रता सेनानीक घरसँ बहराएल रघुनाथ अपन इंजीनियरिंगक पढ़ाइक पछाति नोकरी लेल पत्नीकक संग अमेरिका चलि जाइत अछि, अपन माता-पिता, परिवारक, सर-सम्बरन्धीी, समाज सभकेँ छोड़ि। ओहिठामक चाक-चिक्यक आ भोगवादी समाजमे रचल-पचल रधुनाथ लेल पाइ कमएबाक अतिरिक्तल कथूक चिन्ताक नहि छनि।
एम्हतर शिवनाथ आ हुनक पत्नीआ, रघुनाथक माता-पिता गामपर रहि जाइत अछि। थोड़ेक दिन पुत्रक वियोगमे मालिन रहि ई दुनू परानी ढ़ंगसँ अपन जीवन जीबैत छथि आ सुखसँ रहैत छथि। फ्लैनश बैंकमे ई कथा चलैत अछि आ अनेक-अनेक उपकथा कथा सभ उदघाटित होइत अछि।
अमेरिकाक जीवनसँ पहिने उबैत अछि रघुनाथक पत्नीघ। ने क्योथ संगी ने क्योा गप कएनिहार। एक दिन यैह पश्चाताप रघुनाथोकेँ होइत छनि। मगर ओ अपन ओछाइनपर छटपटाइत टा रहि जाइत अछि। गाम अएबाक कार्यरुप अथवा कोनो आन परिणति नहि देखाबऽ दैत अछि।
कथा मोनलग्गूा अछि। पढ़बामे क्रम भंग कतहु नहि होइत अछि। कथामे मैथिल अभिव्य क्तिचक निम्नांएकित रुप नीक लगैत अछि - जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछ पर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। दुनूक मन एहिरुपेँ चूर-चूर भऽ गेलनि, जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फूटल फुकना बैलूनक हवा जेकाँ वायु मंडलमे मिलि गेलनि। पाकल आमक आँठी जेकाँ करेज आरो सक्कलत भऽ गेलनि। अंडीक तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जेकाँ।
जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम व्यक्तिेगत रूपेँ बधाइ दैत छियनि आ आशा करैत छी जे ओ अपन अनुभवकेँ आरो व्यारपकता प्रदान करैत नव-नव कृतमे हमरा सभकेँ परिचित करौताह।
२.५. १. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सखी कुन्ती २. बिपिन झा-के करत मिथिलाक्षरक रक्षा ३. फूलचन्द्र झा प्रवीण- मैथिलीक बाल साहित्य


डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-जन्म(८ फरबरी १९६७-) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।

‘सखी कुन्ती’
हम करीब तेरह वर्षक भऽ गेल रही। रही बड्ड खुर्लच्ची आ अगाध बदमास। कहियो एहेन नहि होइत छल जहिया ककरोसँ झंझट नहि होइत हो। माय हम्मर लोकक उपरागसँ तंग आबि गेल छलीह। सब उपाय केलन्हि; डांटब, बुझाएब, मारब। मुदा बेकार हम अपन खुर्लुच्ची स्वभावकेँ नहि त्यागलहुँ।
एहनो बात नहि छल जे हमरा अपना मोनमे अपन कर्मक प्रति घमण्ड हो। प्रति दिन सूतबा काल ई निर्णय लैत रही जे आब लोक सभसँ झगड़ा–फसाद नहि करब। खूब मोन लगाकऽ पढ़ब। लोक आब माय लग ई कहय अयतन्हि जे आहाँक बेटा अपन कक्षाक सबसँ नीक विद्यार्थी अछि। लोक सभसँ आपसी प्रेम बना रखैत अछि। आदि–आदि। “मुदा ई सब किछु क्षणक निर्णय होइत छल। भोर होइतहि हम अपन बदमासीक प्रवृत्तिमे पुनः संलग्न भऽ जाइत रही।
माय सोचलन्हि; “आब ई बर्बाद भऽ जाएत”। तामससँ घोर होइत बाढ़नि उठा एक दिन कतेको बेर मारलन्हि। बीचमे हफैत रहली या कहैत रहलन्हि “राघव! तोरासँ नीक कुकुर! कमसँ कम अपन पोसनहारक बात तऽ मनैत अछि”। माएक हाथ चलैत रहलन्हि, आ हम मारि खाईत रहलहुँ। फेर ओ बजलीह; तूँ तँ बतहा कुकुर छै मारैत मारैत माए थाकि कऽ चूर भऽ गेलीह।
ओना तँ कतेको दिन माएसँ मारि खाईत छलहुँ मुदा ओहि दिनक बात जीवनपर्यंत याद रहत। शरीर बेदनासँ कराहए लागल। माए केँ सेहो बुझेलन्हि जे आई ओ किछु ज्यादे मारि देलन्हि। हम बिना किछु कहने मण्डिल (मन्दिर)केँ पाछा जाए कानए लगलहुँ।
आधा घंटाक बाद माए मालीमे करूक तेल लेने अयलन्हि। पाछासँ हमर झोटकेँ सहलाबए लगलन्हि। हमरा भेल फेर मारतीह। मुदा जखन हुनका दिस ध्यान गेल तऽ देखलहुँ आँखिसँ नोर चुबैत छलन्हि। कहए लगलन्हि; “चारिटा बाल बच्चा भगवान देलन्हि। तीनटासँ कहियो कुनो शिकायत नहि भेल। सबहक कसरि तो पूरा कऽ देलह राघव। माए कहैत रहलीह आ माथा सहलाबैत रहलीह। आब हमहुँ कानए लगलहुँ। कहलियिन्ह “माए! आब हम बदमासी नहि करब! हमरा आई आहाँ बड्ड मारलहुँ। पूरा शरीर गूड़ घाव जकाँ दर्द करैत अछि”। ई कहि हम माएकेँ पकड़ि हुनकर गरसँ लागि बड्ड जोरसँ कानए लगलहुँ। पूरा शरीरमे बाढ़निकेँ ओदरा परि गेल छल। माए ओकरा देखैत हमरे जकाँ जोरसँ कानए लगलीह। फेर तेल लगौलन्हि। स्नान केलहुँ आ भोजन केलहुँ। माए दिन भरि कनैत रहलीह। दिन भरि अन्न नहि खेलन्हि। लोक सब आग्रह केलकन्हि तँ कहलखिन्ह जे हम्मर प्रायश्चित यैह थीक जे हम 24 घंटा अन्न जल ग्रहण नहि करी”।
जखन हमरा पता चलल हम दीदीकेँ हाथसँ चाह लए माए लग गेलहुँ। हमरा बुझल छल जे माए अन्न बेतरे तँ रहि सकैत छथि मुदा चाहकेँ बिना नहि। हम कहलियन्हि माए! अहाँ चाह पी लिअ। आब हम कहियो गलती नहि करब। लोक कहत ‘राघव केहेन नीक लड़का छैक’। माए हमरा दिस देखलन्हि आ बजलीह; चुपचाप चाह लऽ कऽ घर चलि जो। जाई हम किछु नहि खैब! रातियोमे माए नहि खेलीह। भोरे भईया दरभंगासँ अयलाह। आबिते मातर माए हुनका कहलथिन्ह; “पवनजी, राघब हमर जीनाई दुर्लभ कऽ देने अछि। लोकक उपरागसँ तंग आबि गेल छी। काल्हि जानवर जकाँ मारिलियैक। कचोट बादमे बड्ड भेल। ई महामुर्ख निकलि गेल। तेँ एकरा पिताजी लग सिमडेगा भेज दहक। रामनगर वाली बहिन कहैत छलीह जे रोहित चारि पाँच दिनक भीतर राँची जाए बला छथि। हुनके संगे पठा दहक। बाबूजीकेँ एकटा चिट्ठी लिख दहुन”। हम्मर घरमे माएक राज चलैत छलन्हि। भैया हुनकर आज्ञाकेँ स्वीकार केलन्हि। साँझमे भैया रोहित भाईकेँ लऽ कऽ अयलाह रोहित भाई माएकेँ कहलथिन्ह; कुनो बात नहि कनिया काकी, हम राघबकेँ सिमडेगा बला बसपर बैसा देबैक। सिमडेगामे बसे स्टेंड लग खादी भण्डार छैक। बसक कण्डक्टर राघबकेँ ककाजी लग पहुँचा देतैक”।
माए हमर जएबाक तैयारी करए लगलीह। हमरा गामसँ सिमडेगा गेनाई नीक नहि लागि रहल छल, जे एकबेर जे कुनो बात माए मोनमे ठानि लेलन्हि तकरा दुनियाक कुनो ताकत नहि टारि सकैत अछि। ताहि बिना कुनो प्रतिकार केने हमहुँ सिमडेगा जेबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। अपन तीन चारिटा लंगौटिया यार सबकेँ कहि देलयैक; “हम आब सिमडेगा चललीयौक। तूँ सब रह अतय केर राजा”।
चारि दिनक बाद हम रोहित भाई संग सिमडेगा लेल प्रस्थान केलहुँ। आबए काल माए बड्ड कनलीह। बड़ हृदयसँ लगौलन्हि। पहिल बेर पता चलल जे माए हमरा कतेक मानैत छलीह। कहलीह; “बाबूजी लग, मनुक्ख जकाँ रहबाक प्रयत्न करिहैं राघब। तंग नहि करियेन्ह। माए एकटा चिट्ठी सेहो बाबूजी केँ लिखलथिन्ह। चिट्ठी अंतिम भागमे लिखल रहैक;
“राघब बड्ड बदमास अछि। प्रतिदिन लोकक उपरागसँ मोन आजिज भऽ गेल अछि। ताहिसँ एकरा अहाँ लग पठा रहल छी। शायद अहाँक डरसँ बदमासी कम करत। हम जनैत छी ई हमर कोर पछुआ अछि। तइयो एकर उत्तम भविष्य केर लेल अपन छातीपर पाथर राखि अहाँ लग दूर देशमे पठा रहल छी। एकरा डॉट फटकार अवश्य करबैक, मुदा अहाँकेँ हम्मर आ चारू धीया–पुताक सप्पत अछि, एकरा मारबै नहि”।
माएक चिट्ठी हम सिमडेगा अयलाक आठ दिनक बाद पढ़लहुँ। माएक यादमे चुपचाप बड्ड कनलहुँ। लागल केहेन महान चीजक नाम छैक ‘माए’। स्वयं तँ मारैत छलीह, मुदा जखन बाबूजी लग भेजलन्हि अछि तँ बाबूजीकेँ सब तरहे बुझा रहल छथिन्ह जे राघबपर हाथ नहि उठेबैक। बाह रे माएक ममता!
बाबूजी माएकेँ बड्ड मनैत छलथिन्ह। ओ हमरा बुझबैत छलाह; “राघब, अहाँ खूब मोनसँ पढ़ु। अहाँकेँ जे कुनो चीज चाही से लिअ जा पढ़ु। लोक सबसँ झगड़ा–दान नहि करू”।
अगल–बगल केर चारि–पाँच लड़का–लड़की सबसँ बाबूजी हमर परिचय करा देलन्हि। हम अपनामे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन अनलहुँ आ लोक सबसँ लड़ाई–झगड़ा त्यागि देलहुँ। बाबूजी प्रसन्न छलाह, जे चलू राघबमे एहेन परिवर्त्तन अयलन्हि।
हमरा लोकनिक घरक बगलमे एकटा तमाकुल बेचय बला बनिया छल। ओकर नाम रहैक सोहन साहु। सोहन साहु केर बेटी शीला छलैक। हलांकि शीला हमरासँ एक कक्षा जुनीयर छलि। शीलाक नाक नक्श बड़ सुन्दर, रंग कारी मुदा सोहनगर। शीला जवान भऽ रहलि छलि, से शरीरक अंगसँ स्पष्ट परिलक्षित होइत छलैक। पातर ठोर, डोका सनहक आँखि, मध्यम कद। कपड़ा–लत्ता सेहो ठीक पहिरैत छलि। शीलाक माए हमरा बड्ड मानैत छलीह। कहैत छलथिन्ह; “बेचारा राघब,! बिना माएकेँ सिमडेगामे रहैत अछि”। शीला सेहो हमरा बड्ड मानैत छलि।
पिताजी हमर नाम सिमडेगाक सरकारी स्कूलमे लिखा देलन्हि। हमर स्कूलकेँ ठीक पाछा शीला कन्या विद्यालयमे पढ़ैत छलि। हलांकि शीला बरसमे हमरासँ डेढ़ वर्षक पैघ छलि, परंतु कक्षामे हमरासँ एक कक्षा पाछा। स्कूलक समय दूनू स्कूल एकै रहैक। हम प्रतिदिन स्कूल शीलेक संग जाइत रही। शीलाक संग शीलाक एक सहछात्रा सेहो हमरा लोकनिकेँ संग विद्यालय जाइत छलि। ओहि छात्राक नाम रहैक कुंती। कुंती मध्यम कदकेँ करीब पन्द्रह वर्षक स्वस्थ आ गोर लड़की छलि। नमहर कारी–कारी केश, सुन्दर नाक, कान। कनीक वरससँ ज्यादे बुझना जाइत छलि कुंती। शनैः शनैः कुंतीसँ हमर नीक बातचीत होमए लागल।
पता नहि कियाएक कुंती हमरा शीलासँ ज्यादे नीक लगैत छलि। निश्छल, सहज आ सुन्दरि। ओकर आंखि दिस जखन–कखनो ध्यान जाइत छल तँ एना बुझाइत छल जेना ओ सहज भावसँ मोनक कुनो बात हमरासँ बांटए चाहैत अछि। बात क्रममे पता चलल जे कुंती मैथिल ब्राह्मणी थीकि। पूरा नाम रहैक कुंती झा। चुंकि हमरा लोकनि सभवयस्क आ संगीक रूपमे रहैत रही, आ उपर कुंती हमर सखी शीलाक अभिन्न संगी रहैक ताहिसँ हम सब ओकरासँ तूँ कहि कऽ बात करियैक। हलांकि एक दिन शीलाक माए हमरा कहलन्हि, राघव, अहाँ सब कुंतीकेँ तूँ नहि कहियौक”!
हम पुछलियन्हि, “कियाएक काकीजी? कुंती आ शीला दूनू हमर संगी जकाँ थीकि। हम शीलोकेँ तूँ कहिकऽ बजबैत छियैक मुदा अहाँ कहियो मना नहि केलहुँ, परंतु कुंतीक लेल ई बात कियाएक कहि रहल छी”?
शीलाक माए हमर प्रश्नक जवाब देमए लगलीह, यही बीचमे शीला आ शीलाक पिताजी हुनका रोकि देलथिन्ह। शीलाक पिताजी शीलाक माएसँ कहलथिन्ह; “अहाँ बच्चा सबकेँ बीचमे कियाएक टांग अरबै छी? “जखन कुंतीकेँ कुनो समस्या नहि छैक, तँ अहाँकेँ की समस्या अछि? राघबकेँ अनेरे अहाँ शिक्षा नहि दियौक”। शीला सेहो अपन माएकेँ भाषण देमए लागलि; “गे माए, ई तोहर बड़का समस्या छौक। अपना जे करक छौक से कर। जकरा जेना बजबै चाहैत छैं, बजा। हमरा सभहिक बीचमे नहि बाज। हम कुंती आ राघब ओहिना रहब जेना रहि रहल छी। हमरा सबकेँ व्यर्थमे नैतिकताक शिक्षा नहि दे माए”।
हमरा बूझ’मे नहि आयल जे एकाएक बाप–बेटी मिलकेर बेचारी शुद्ध महिलाकेँ कियाएक बजबासँ रोकि देलकैक। ओना शीलाक माएक बातपर हमरा किछु विस्मय जकाँ सेहो लगैत छल। शीला हमरा दिस देखैत बाजलि; “राघब,! तों जेना चाहैत छैं तहिना कुंतीकेँ सम्बोधित कऽ सकैत छैं। जेना कियाएक, ओहिना जेना हमरा कहैत छैं। तहिना कह” कुंती कहैत रहलि। समय चलैत रहल। हम अपन माएक देल वचन पर थोड़ेक प्रतिबद्ध रहलहुँ। खूब मोनसँ पढ़ी। लोक सनसँ झगड़ा–फसाद लगभग छोड़ि देलकै। स्कूलक शिक्षक सब सेहो हमर व्यवहार आ कुनो चीज अथवा ज्ञानकेँ सीखबाक उत्कंठा या जिज्ञासासँ प्रसन्न छलाह। बाबूजी हमर प्रशंसा सुनि गद्–गद् भऽ गेलाह। झट दनि माएकेँ चिट्ठी लीखि देलथिन्ह। चिट्ठीक मजबून ई रहैक।
राघबमे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन भेलैक अछि। गामसँ एकरा सिमडेगा ऐनाई करीब 7 मास भऽ गेलैक मुदा भाई धरि ककरो कुनो शिकायत राघबकेँ खिलाफ नहि भेटल अछि। शिक्षक सबसँ राघबकेँ सम्बन्धमे हमेशा जानकारी लैत रहैत छी। सब कियोक मुक्त कंठसँ राघव केर प्रशंसा करैत रहैत छथि। हमरा राघव कुनो तरहसँ परेशान नहि करैत अछि। राघब अतेक नीक भऽ जाएत तकर तँ हम कल्पनों नहि केने रही”।
पिताजीक पत्र पढ़ि माँ बड्ड प्रसन्न भेलीह। तुरत निर्णय लऽ लेलन्हि जे कमसँ कम दुइयो मासक लेल सिमडेगा अयतीह आ हमरा सब संगे रहतीह। माँ पिताजीकेँ पत्र द्वारा सूचना देलथिन्ह जे धनकटनीक पश्चात् ओ सिमडेगा आबि रहल छथि।
किछु दिनक बाद माए सिमडेगा आबि गेलीह। हम बड्ड प्रसन्न रही। माएक स्नेह, माए हाथक भोजन भेट रहल छल बाबूजी सेहो प्रसन्न छलाह। लगभग हमर झंझटसँ स्वतंत्र किछु दिन लेल भऽ गेल छलाह। माए अपन मिलनसार स्वभावक कारणे सिमडेगाक नीचे बजार मुहल्लामे प्रशंसाक पात्र भऽ गेलीह। स्त्रीगण सब अपन तमाम नीक कार्यमे हुनका बजबय लगलन्हि।
हमरा सिमडेगा आयलाह आब लगभग एक वर्ष भऽ गेल छल। एहि बीचमे किछु अप्रत्याशित घटना घटित भेलैक। कुंती लगातार चारि–पाँच दिनसँ नहि आबि रहलि छलि। शीलासँ ज्ञात भेल जे कुंतीक घरमे किछु झंझटि चलि रहल छैक, ताहि कारणे ओ नहि तँ स्कूले आबि रहल छलि आ ने हमरा सब लग।
लगभग दस दिनक बाद कुंती शीलाक घर आयलि। हम शीलेक घरमे रही। हमर माए सेहो ओतय छलीह। कुंतीक चेहरा उतरल रहैक। मुँह कारी स्याह। आँखिक उपर–नीचा फूलल। अहिसँ पहिने कि हम किछु ओकरासँ पुछितियैक, हमर माए आ शीलाक माए कुंतीकेँ आबितहि ओकरा भाषण देमय लगलन्हि। माए हमर बाजए लगलीह; “देखू कुंती! अहाँक ब्राह्मण कुलक स्त्रीमे जन्म भेल अछि। पति नीक, अधलाह जेहेन होइत छैक, स्त्रीगण हेतु भगवान होइत छैक। अहाँकेँ भोलाझा पति छथि। अहाँकेँ हुनकर आज्ञाकेँ अवश्य मानक चाही। बिना हुनकर आज्ञाकेँ कुनो कार्य केनाइ या कतहुँ जेनाइ उचित नहि। अहाँ अप्पन गलतीकेँ स्वीकार करू आ जीवनकेँ आनन्द पूर्वक जीबू”।
हम माएक बातकेँ सुनलहुँ तँ आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ। पहिल बेर इ ज्ञात भेल जे कुंती कुमारि नहि अपितु ब्याहित महिला थिक। आब बुझना गेल जे शीलाक माए हमरा कियाएक कहैत छलीह जे कुंतीकेँ तूँ कहिक नहि बजेबाक हेतु! चिंताक अथाह सागरमे डुबि गेलहुँ। कतए 17 वर्षक कुंती आ कतए 52 वर्षीय भोला झा। केहेन अनमोल विवाह!!! हे भगवान, ई केहेन जोड़ी बना देलयैक! लोहामे सोना सटि गेल। भरल दुपहरियामे अन्हार!! एक क्षण लेल एना बुझना गेल जे कुंतीक आत्मा हमर शरीरमे प्रवेश कऽ गेल! हम अपना –आपकेँ कुंती बुझि मोनहि मोन कानए लगलहुँ, काँपए लगलहुँ। अपन पितयौत बहिनक विवाहक कालक स्त्रीगण सब हारा गाएल गीतक एक पांति बेर–बेर मोनमे हुमरय लागल;
“लोहामे जड़ि गेल हम्मर सोना।
हम जीबै कौना”!!
मुदा कुंती पाथरक मूर्त्ति बनलि हम्मर माएक आ शीलाक माएक अनर्गल भाषण सुनैत रहलि। बिना कुनो उचाबच केने। कुंतीक माथ जमीन दिस रहैक। किछु कालक बाद देखलियैक जे धरतीपर नोरक बुन्द मारितै पड़ल छैक। मुदा ओ सब ठोप बेकार भऽ गेलैक। दकियानूशक परिवेशमे हमर माए ततेक रमलि छलीह जे हुनका कुंतीक नोर नहि देखेलन्हि। किछु कालक बाद कुंती मुँह ऊपर उठा अपन गालपर हाथक लाल निशान भोला झा चमेटाक निशान छलैक। माए अपन हाथसँ कुंतीक गालकेँ सहलाबए लगलथिन्ह। माएक ममत्वकेँ देखि कुंतीकेँ हृदय फारि गेलैक। कुहेस फारि कानए लागलि। हम्मर माए अपन छातीसँ लगा लेलथिन्ह। कहाथिन्ह; “अहाँ आब नीकसँ रहूँ। भोला झा गलत कार्य केलन्हि अछि। हम मैनेजर साहेब (हम्मर पिताजीकेँ बारेमे) कहबन्हि जे हुनका समझेथिन्ह। अहाँक जेठ बहिनसँ हुनकर छोट भाएकेँ बियाह भेल छन्हि आ अहाँक जेठकी भगिनी अहाँसँ एकै वर्षक छोट अछि। मुदा आगू नीकसँ रहूँ। केवल स्कूल जायकाल स्कर्ट आदि पहिरू। स्कूलसँ वापस अयलाक बाद सारी पहिरू, नीक जकाँ रहूँ। जतए–ततए नहि बौआऊ। छौरा सबसँ हसी–ठट्ठा नहि करू”।
आ लाचार कुंती हम्मर माएक बातकेँ सुनैत रहलि। एना बुझना जाइत छल जेना ई सब माए–बेटी हो। अही बीचमे शीलाक माए चूराक भूजा आ कचरी बनाए सबकेँ खाए लेल देलथिन्ह। कुंतीक नहि लैत छलि मुदा हम्मर माए एवं शीला ओकरा बड्ड आग्रह केलथिन्ह तँ कुंती खाए लागलि। नोर मुदा एखनहुँ खसि रहल छलैक।
ओहि दिन साँझमे शीला हमरा कुंतीक सम्बन्धमे तमाम जानकारी देलक। भेलैक ई जे कुंतीक जेठ बहिनक वियाह भोला झाक छोट भाएसँ भेल रहैक। कुंतीक बहिनकेँ दूइ लड़की आ दूइ लड़का छलैक। भोला झा समस्तीपुरक कुनो गामसँ कम्मे वरसमे सिमडेगा आबि गेल छलाह। अतय आबि गुजर–बसर करबाक लेल मुख्य सड़क केर कातमे एक लाइन होटल खोलि लेलन्हि। होटलकेँ बगलमे सिमडेगाक नामी पेट्रोल पंप रहैक। पेट्रोल पंपक अगल बगलमे गाड़ी–घोड़ा ठीक करबाक मारिते दुकान आ मेकेनिक सबहक भरमार। अहि सब कारणे पाँच–दस बस–ट्रक आ अन्य गाड़ी सदरिकाल ओतए लागल रहैत छलैक। आ गाड़ीक ड्राईवर, सहायक इत्यादि भोला झाक लाईन होटलमे सामान्यतया खाटपर बैसि भोजन करैत छलैक। लाईन होटल केर भोजन होइत छलैक अति स्वादिष्ट आ चहटगर। कहियो कालक हम्मर पिताजी ओहि होटलसँ तरकारी इत्यादि मंगबैत छलाह। तँ भेलैक ई जे भोला झा अपन परिवारकेँ ठीक करयमे लागल रहलाह। तीन कुमारि बहिनक विवाह, माए–बापक संस्कार, क्रिया कर्म, दूटा छोट भाएक रोजगारक तलाश आ वियाह दान करैत–करैत कहियो अपना बारेमे सोचबे नहि केलन्हि। अही बीच जखन कुंती करीब 14 वर्षक छलि तँ अपन जेठ–बहिन लग सिमडेगा आयलि। ओहि समयमे भोला झा 51 वर्षक छलाह। कुंतीक शरीर भरल रहैक। आ देखबामे 18–19 वर्षक लगैत छलि। भोला झाकेँ अचानक वियाह करबाक इच्छा भेलन्हि। अपन छोट भाए अर्थात् कुंतीक जेठ बहिनोईकेँ कहलथिन्ह जे ओ कुंतीसँ वियाह करैत छथि। तावेत धरि कुंतीक पिताक स्वर्गवाश भऽ गेल छलन्हि। विधवा माए ओहि जमानामे चारि हजार टकाक लोभसँ कुन्तीक वियाह भोला झासँ करा देलकैक। पहिने तँ कुंतीक नहि बुझि सकलि अहि सब चीजक परिणाम। मुदा नइ–नइ स्थिति स्पष्ट होमए लगलैक। हालहिमे भोला झा कुंतीकेँ रातिमे हवशकेँ शिकार बनबय चाहैत छलथिन्ह, जकर ओ प्रतिकार केलकन्हि तँ झोटा नोचि गालपर बड्डपर मारलखिन्ह। शीला ईहो कहलक जे भोला झा दिन भरि गाजा पीबैत रहैत छथि, राक्षस जकाँ मोछ रखैत छथि, मुँहसँ गंध अबैत रहैत छन्हि, ताहि सब कारणे कुंती हुनका लग जाएसँ बचय चाहैत अछि।
खैर! अहि घटनाक बाद आ कुंतीक अतीत जनबाक कारणे हम्मर व्यवहार ओकर प्रति बदलि गेल। कुंती आन ठाम जेनाई बन्द कऽ देलक परंतु शीला आ हमरा लग एनाई नहि रूकलैक। हम आब ओकरा किछु सम्मानसँ बचबय लगलियैक तँ बाजि उठलि; “नहि राघब, ई ठीक बात नहि। तो हमर परम मित्र छैह! हमरा पूर्वे जकाँ कुंती कहि सम्बोधन कर तँ नीक लागत। हम एकबेर पुनः कुंतीक संग वैह पुरनका व्यवहार करए लगलहुँ।
समयक चक्र चलैत रहलैक। एहि बीच हमरा लोकनि दसमी कक्षामे पहुँच गेलहुँ। हम्मर उम्र करीब सोलहकेँ भऽ गेल। कुंतीक लगभग अठारह वर्षक। एकाएक कुंतीक शरीरमे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन आबए लगलैक। ओकर वक्ष एकाएक बड्ड भारी भऽ गेलैक, गाल मोट भऽ गेलैक। शरीरक वजन बढ़ि गेलैक। आँखि छोट भऽ गेलैक। हलांकि एहि तमाम परिवर्त्तनकेँ बादो कुंतीक सौन्दर्यमे कुनो कमीनहि भेलैक। एखनो हमरा कुंती अजीब सुन्दरि लगैत छलि। करीब आठ मास पहिने एकबेर पता नहि कियाएक कुंती हमरा भरि पांज पकड़ि अपन हृदयसँ सटा लेलक आ हम्मर माथा चूमि लेलक। हम सन्न रहि गेलहुँ। लाजे किछु नहि कहलियैक। मुदा तहियासँ सदरिकाल मोनमे यैह सपना आबए लागल, जे किनसियायत कुंती हमर जीवन संगिनी बनि जाईत। हलांकि हमरा ई नीक जकाँ बुझल छल जे ई संभव नहि अछि। एक दिन हम कौतुहलमे पुछलियैक, “कुंती तोरामे अतेक परिवर्त्तन कियाएक भऽ रहल छौक। तौं कियाएक अचानक मोट भऽ रहल छै”?
हम्मर कौतुहल सुनि कुंती हँसय लागलि। केवल कहलक; “राघव, तौ नहि बुझबै!! से कहि कुंती चलि गेल।
एहि घटनाक लगभग एक मास बाद कुंती स्कूलो गेनाई बन्द कऽ देलक। कुंती हमरा ई कियाएक कहलक जे “राघव, तौं नहि बुझबै”!! हमरा किछु नहि फुराइत छल। अंततः एक दिन जखन स्कूलसँ डेरा आबैत रही तँ बाटमे जेल लग शीला भेट भऽ गेल। शीलासँ कुंतीकेँ बारेमे जानकारी लेबए लगलहुँ तँ पता चलल जे कुंती गर्भवती थीकि। आब बूझऽ मे आएल जे कुंती कियाएक हँसलि आ कहलक जे तौं नहि बुझबै”!!! हम शीलाकेँ पुछलियैक; “आब कुंतीकेँ पढ़ाईकेँ की हेतैक”? शीला कहलक; “किछु नहि भोला झा कहलकैक अछि पढ़ाई छोड़ि देबाक हेतु। आब डेढ़ मासमे कुंती अपन बच्चाकेँ जन्म देत आ बच्चाल लालन पालनमे। पढ़ाईक अंत भऽ गेलैक। खैर, छोड़ राघब! हमरो पिताजी आब हमरा लेल लड़का ताकि रहल छथि। हमरा माए लग तीन लड़का ताकि रहल छथि। हमरा माए लग तीन लडकाक फोटो छैक। हम तोरा देखा देबौक”।
मुदा हमरा कुनो लड़काक फोटोसँ कुन मतलब! खैर! करीब डेढ़ मासक बाद एक दिन शीलासँ ज्ञात भेल जे कुंती सरकारी अस्पतालमे एक लड़्काकेँ जन्म देलकैक अछि। दोसरे दिन भोला झा दू किलो मिठाई लऽ कऽ हमर पिताजीकेँ दऽ गेलथिन्ह। भोला झा खुशीसँ गद्–गद् छलाह।
अहि घटनाक किछु दिनक बाद पिताजी स्थानांतरण सिमडेगासँ गिरिडीह भऽ गेलन्हि। पिताजी संग हमहुँ गिरिडीह आबि गेलहुँ। करीब चारि वर्षक बाद सिमडेगा गेलहुँ तँ शीला नहि भेटलि। शीलाक माए कहलन्हि जे शीलाक वियाह राऊरकेला भऽ गेलैक। लड़का चाऊरक व्यवसायी छैक। शीलाकेँ एक सालक एकटा लड़की छैक। शीला अपन पति आ बच्चा संगे बड्ड प्रसन्न अछि। हलांकि कुंतीसँ भेट नहि भऽ सकल मुदा शीलाक माए बतौलन्हि जे कुंतीकेँ एकटा लड़की सेहो छैक। आब ओकर पति भोला झा अपन माएसँ भिन्न भऽ गेल छथि। कुंती पूर्णरूपेण एक सफल गृहणी, पत्नी आ माए बनि गेल अछि। सदरिकाल अपन परिवार, बेटा, बेटी आ पतिक सेवामे लागलि रहैत अछि। शीला नहि छलि तँ हमरा कुंतीसँ भलाकेँ मिला सकैत छल। इच्छा रहितहुँ हम कुंतीसँ नहि भेंट कय सकलहुँ।
इमहर करीब 20 वर्षक बाद कुनो प्रयोजने सिमडेगा गेल रही। राँचीसँ जखन सिमडेगा लेल बस पकड़लहुँ तँ कुनो विशेष परिवर्त्तन ओहि क्षेत्रमे नहि बुझना गेल। किछु मकान इत्यादि अवश्य बनि गेल रहैक। सिमडेगामे कुनो विकास नहि बुझना गेल। पिताजीक मित्र श्री देवचन्द्र मिश्रजीक ओतए हम ठहरलहुँ। पाँच दिन सिमडेगामे रहलहुँ। बहुत पुरान लोक सबसँ मुलाकात भेल। शीलाक छोट बहिनक विवाह सेहो भऽ गेल रहैक। ओकर माए एखनो ओहिना नीक स्वभावक स्वामिनी छलि। शीलाक छोटका भाई दीपू बड़ पैघ पीबाक भऽ गेल रहैक। हम्मर घरमे कार्य करए बला दाई असहाय जीवन जीबि रहल छलि। पति मरि गेलैक आ बेटा नालायक। चन्दन मिश्र वकील साहेबकेँ नक्शली सब हुनका बेटा संगे कुट्टी–कुट्टी काटि देलकन्हि।
आ अंततः जखन कुंतीक सम्बन्धमे जनबाक प्रयत्न केलहुँ तँ पता चलल जे जाहि छोट भाए लेल भोला झा अतेक त्याग केलन्हि, अपन जवानी बर्बाद केलन्हि, बुढ़ापामे ब्याह केलन्हि, सैह छोट भाई हुनका संगे बेइमानी केलकन्हि। लाईन होटलसँ बेदखल कऽ देलकन्हि। भोला झाकेँ दम्मा भऽ गेलन्हि। पैसाक तंगीमे ठीकसँ इलाज नहि भऽ सकलन्हि। कुंती आब सिलाईकेँ कार्य कऽ रहल अछि। आ अपन बच्चा सबहिक पोषण कऽ रहल अछि। बच्चा सब की, तँ बेटी 10वीमे पढ़ैत छैक, आ बेटा एक नम्बरकेँ नालायक। देवचन्द्र मिश्रक पत्नी कहलन्हि; “राघव, अगर अहाँ चाही तँ साँझमे हम सभ कुंतीक दुकान जाएब”। मुदा हम मना कऽ देलयन्हि। हम ओहि कुंतीकेँ नहि देखए चाहैत छी जकर चेहरा पर वैधव्य होइक, श्रीहीन हो, कष्टसँ कनैत हो। हम जीर्ण–शीर्ण कुंतीकेँ नहि देख सकैत छलहुँ। तैं हम पुरनके कुंतीक यादमे जीबए चाहैत छलहुँ।
पाँचम दिन दुपहरियामे सिमडेगासँ बसपर बैसि राँचीक हेतु प्रस्थान कैल। मोनमे एखनहुँ वैह हँसैत, खेलाईत, मचलैत कुंती आ अपन सखी कुंतीक यादमे मग्न। मुदा ईहो सोचैत रही जे आब कहियो सिमडेगा नहि आएब ।


२. बिपिन झा-
के करत मिथिलाक्षरक रक्षा!!
किछु दिन पूर्व एकटा ग्रन्थ पढने रही। ग्रन्थ केर नाम छल ’भुवमानीता भगवद्भाषा’। ई ग्रन्थ संस्कृत मे अछि आओर एहि ग्रन्थक उद्देश्य मानव मात्र में एहि विचार कें आनव अछि जे सदिखनि प्रयत्न कय अपन संस्कृति कें रक्षण करब संभव होइत छैक। एहि ग्रन्थ में यहूदी संस्कृति केर विवरण दैत एहि तथ्य के स्प्ष्ट कयल गेल अछि। एहि ठाम सहज रूपे ई प्रश्न उठत जे प्रकृत निबन्धलेखनक क्रम में संस्कृतिक चर्चा तर्कसंगत अछि वा नहि? अवश्य तर्कसंगत अछि कियाक तऽ कोनो संस्कृति केर रक्षा केर प्रथम चरण होइत अछि ओकर भाषा आओर लिपिक संरक्षण। यदि ई गप्प मिथिलाक परिप्रेक्ष्य में करी तऽ आओर स्पष्ट होयत| मैथिली बाषा तऽ निरन्तर उत्कर्ष दिस अछि मुदा ओतहि यदि एकर लिपि केर चर्चा करी तऽ देखैत छी जे ई सदिखनि उपेक्षिते भय रहल अछि। किछु वर्ष पूर्वतक ई परिपाटी छल जे पत्राचार मिथिलाक्षर (तिरहुता) मे हो आ एहि कारण ई प्रचलन मे छल मुदा आब तऽ ई कदाचित विलुप्त नहिं भय जाय ई आशंका केनाय कोनो अनुचित नहि।
एहि सम्बन्ध में विशेष ध्यान देवाक आवश्यकता अछि जे पुनर्जागरण हो आ सभ मैथिल मिथिलाक्षर सँ कम सऽ कम परिचित अवश्य होई। कियाक तऽ आजुक स्थिति एहेन भय गेल जे अधिकांश मैतिल तऽ मिथिला कें अपन लिपि सेहो छैक अहू सं अपरिचित छथि एहेन स्थिति में मिथिलाक्षर केर संरक्षण कतेक कठिन अछि सहजतया बुझल जा सकैत अछि।
एहि सन्दर्भ में श्री गजेन्द्र ठाकुर केर प्रयास सराहनीय छन्हि जे Learn International Phonetica Alphabet through Mithilakshara.++ नामक ग्रन्थ लिखि एहि दिस लोक केर ध्यन आक्र्षित कराओलथि। यद्यपि ई ग्रन्थ सीमित जानकारी प्रस्तुत करैत अछि मुदा प्रारम्भिकदृष्ट्या उत्तम अछि। ई ग्रन्थ Online pdf फार्मेट में सेहो उपलब्ध अछि।
पुनश्च ई निवेदन जे एहि ग्रन्थक विस्तृत रूप में परिवर्द्धन हो आ व्यवहार में मिथिला क आखर समस्त मैथिल केर हृदय में पुनः विराजमान हो एकर समुचित प्रयास कयल जाय।
++मिथिलाक्षरक विस्तृत जानकारी Learn MithilakShara by Gajendra Thakur आ Learn Braille through Mithilakshara by Gajendra Thakur मे उपलब्ध अछि, जे मैथिली पोथी डाउनलोड एहि लिंक पर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि।
३.बाल साहित्य-
फूल चन्द्र झा ‘प्रवीण’
जन्म तिथि: 10 अक्टूबर 1961
पिता: श्री श्याम सुन्दर झा
माता: श्रीमति चन्द्रकला देवी
सम्पर्क: ग्राम–तुमौल, पत्रालय–पुतइ, जिला–दरभंगा (बिहार)
व्यवसाय: अध्यापन
अभिरूचि: लेखन, चित्रकला, अभिनय, गीत–संगीत, सामाजिक कार्य।
रचना संसार
कविता–संग्रह
* आयल नवल प्रभात * वसंतक बजनिञा
* पाङल गाछक छाहरि
* हमरा मोनक खंजन चिड़ैया नाटक
* आन्दोलन*लुत्ती*सामाजिक न्याय
* गुरूआइनि*स्वागत हे गणतंत्र भारती
कथा–संग्रह
• भूत होइत भविष्य
निबंध–संग्रह
• हमरा जनैत
संकलन–सम्पादन
• बाबू भोलालाल दास रचनावली, पहिल खण्ड
• मधुपजी बीछल बेरायल कविता
•अनुवाद
• मल्लिनाथ (अंग्रेजीसँ)
•सम्मान
•साहित्यकार संसद द्वारा राष्ट्रीय शिखर सम्मान-* कविचूड़ामणि पं. काशीकांत मिश्र ‘मधुप’ (2006)*विद्यापति(2008)*सुमन स्मृति सम्मान (2009)।
एकर अतिरिक्त ‘जखन–तखन’ पत्रिकामे सम्पादन सहयोग,राष्ट्रीय–अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कविसम्मेलनमे सहभागिता, विभिन्न पत्र–पत्रिकामे गीत, कविता, कथा, लेख, निबंध आदिक रचनात्मक सहयोग।
मैथिलीमे बाल साहित्य
मैथिली शिशु साहित्य लोक
फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’

मैथिली लोक साहित्यमे शिशु लोक साहित्यक अम्बार लागल अछि। किछु लिपिबद्ध आ बेसी मौखिक। शिशु लोक साहित्य अज्ञात समयमे, अज्ञात लोक रचनाकारक द्वारा भेल होयत। जहियासँ एकर रचना भेल तहियासँ ई वेदक रचना जकाँ हजारो वर्ष धरि मौखिक परम्परामे जीबैत रहल। तकर बाद किचु तँ लिपिबद्ध कयल जयबाक प्रयास भेल आ बेसी एखनो धरि लोकक कंठमे अपन स्थान बना कऽ रखने अछि। प्रत्येक पीढ़ीक लोक अपन पछिला पीढ़ीक लोकसँ एकरा सुनैत आ सीखैत आबि रहल अछि। मौखिक परम्परामे जीबाक कारणेँ एकर मौलिकता दिनानुदिन नष्ट भेल जा रहल अछि। लोक–विशेष, वर्ग–विशेष आ क्षेत्र–विशेषक कारणेँ एकर शब्द आ उच्चारणमे अंतर पाओल जाइत अछि।
मैथिली शिशु लोक साहित्य प्रायः सब विधामे उपलब्ध अछि, मुदा एहि आलेखमे पद्य विधाकेँ केन्द्रमे राखि थोड़ बहुत आनो विधा सब पर विचार कयल गेल अछि।
एखनधरि जे मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ लिपिबद्ध रूपमे संकलित करबाक प्रयास भेल अछि ताहिमे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”क मैथिलीक नेना गीत डा. अणिमा सिंहक “शिशु गीत आ खेल” तथा एहि सम्पूर्ण बाल साहित्यकार डा. दमन कुमार झाक एकटा समालोचनात्मक ग्रंथ “मैथिली बाल साहित्य”क प्रकाशन बहुत हद धरि उपयोगी सिद्ध भेल अछि।
मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछिः-
1. लालन–पालनसँ सम्बद्ध।
2. खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध।
3. ज्ञानोपयोगी।
लालन–पालनसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्य
एहि प्रकारक लोक साहित्यक परिवेश पैघ नहि होइछ। ई घर–आँगनसँ दलान धरि सीमित रहैत अछि। नेनाकेँ जन्म लितहि ‘सोहर’ ओकरा कानमे पड़ैत छैक आ जेना–जेना नेनाक अवस्था बढ़ैत छैक, बदलैत छैक तेना–तेना शिशु लोक साहित्य परिवर्त्तित होइत जाइत अछि। जन्मक बाद ओकरा दिन–राति मिला कऽ कतेको बेर कड़ूतेलसँ जाँतल–पीचल जाइत छैक आ जतनिहारिक ठोर पर अनायास चल अबैत अछि–
चैं–चैं–चैं बौआ सूतभैं
बौआ मत्था पच्चनि तेल
मुद्दै मत्था फुट्टनि बेल।
चानि पर तेल पचाय, अपन दुनू टाँगपर नेनाकेँ पारि, देह उँगारैत कहैत छथि
बौआ ईलसन, कील सन
धोबियाक पाट सन
कुम्हराक पाठ सन
अद्दै–मुद्दैक छाती पर लात दिअऽ
पृथ्वी पर भऽर दिअऽ।
तकर बाद नेनाकेँ हाथसँ लोकैत छथि। नेना डरे कानए लगैत अछि। पुनः कहैत छथि–बौआ आम तोड़ू/बौआ जाम तोड़ू।
तकर बाद टाँग पकड़िकऽ, उनटाकऽ झुलबैत कहैत छथि–
बौआ मामा गाम देखू
बौआ नाना गाम देखू
बौआ अपन गाम देखू।
एहिमे एकटा बात देखयमे अबैत अछि–जँ नेना मामा गाममे रहल तँ ओकर दादा–दादीक, जँ अपन गाममे रहल तँ नाना–नानीक चौल कयल जाइत अछि।
पहिल साँझ दीप लेसलाक बाद छोट–छोट नेनाक रक्षार्थ संझा–मैयासँ प्रार्थना कयल जाइत अछि।
आको मैया चाको, संझा मैया राको
पहरा मैया हेरणी, सब दुःख फेरनी
जे बौआकेँ दिअय दृष्टि, तकरा बान्हू गोला विष्ठी
काल–भैरव रक्षा करय, सोनक दीप, पाटक बाती
बौआ सूतय सुखक राती
दुःख–दरिद्र पाछू जाउ, सुख–श्रृंगार आगू आउ।
तहिना बेसी देखनुहुक नेनाकेँ क्यौ नजरि–गुजरि ने लगा दिअय, एहि क्रममे ई पाँती द्रष्टव्य–
हँसनी–खिलनी गेल बजार/हँसनी चल आयल
खिजनी रहि गेल/जहिना हस्से राजा धनपाल
तहिना हस्से बालक/दोहाइ राजा धनपाल
दोहाइ मौरगनी माए।
दीपक इजोत पर नेना अपन दृष्टिकेँ केन्द्रित कऽ डिम्हा घुमबैत, आनन्द लैत रहैत अछि।
जनश्रुति अछि, प्राचीन कालमे छठिहारक रातिक दीप मिझाकऽ लोक राखि लैत छल तथा छः वर्ष धरि बेटाकेँ आ तीन वर्शन धरि बेटीकेँ एहि दीपसँ ई टोटमा करैत छल, मुदा वर्त्तमानमे एहन कम देखबामे अबैत अछि।
जखन नेना बैसऽ लगैत अछि, संकेत पर आँगुर पकड़ब सीखि लैत अछि तखन लोक कोनो बातक जिज्ञासाक क्रममे, बालबोध बुझि अपन बिचला दू गोट आँगूरकेँ नेनाक कपारपर घुमबैत कहैत छथि–आनी–मानी हम जानी/खारा रोटी खाए नहि जानी
आए–बापकेर ना नहि जानी/सत्त छोड़ि असत्त नहि बाजी।
तकर बाद नेनाकेँ आँगुर देखबैत पकड़बाक लेल कहल जाइत अछि। जँ नेना बिचला आँगुर पकड़ि लैत अछि तँ जिज्ञासा पूरा होयबाक सम्बावना प्रबल मानल जाइछ।
जखन नेना ठाढ़ होयब आरम्भ करैत अछि तखन बेर–बेर खसि पड़ैत अछि। घर–परिवारक लोक ओकरा बेर–बेर आँगुरक भऽर दैतठाढ़ होयबाक लेल आ डेग उठएबाक लेल प्रोत्साहित करैत कहैत छथि–
था.....था.....दिग्–दिग् था
था.....था.....थैया.....था
डेग बढ़ैया.....हम्मर बाबू.....हम्मर भैया।
एहि संग नेना डैग उठबैत अछि, बेर–बेर खसैत अछि आ ई सुनि–सुनि पुनः ठाढ़ होएबाक आ डेग उठएबाक प्रयास करैत अछि। एहि पदक माध्यमसँ नेनाकेँ बूलब सिखाएल जाइत अछि।
झौलाएत नेनाकेँ कोरामे लऽ घुमयबाक क्रममे कथा–गीतक परम्परा रहल अछि। एकर स्वरूप पैघ आ छोट दुनू प्रकारक देखबामे अबैत अछि। जेना चन्नामामाकेँ देखबैत नेनाकेँ कहल जाइत अछि–
चन्ना मामा आ रे आ, पारे आ/नदियाकेँ किनारे आ
सोनाकेँ कटोरामे/दुध–भात नेने आ/बौआक मुँअमे घुटुक सन।
दोसरः-
चन्नामामा आरे आ पारे आ/केराक भार ला
पूड़ी–पकमान ला/फोका मखान ला/बौआ मुँहमे ठुस।
एतेक कहैत अपन हाथसँ नेनाकेँ खोअएबाक अभिनय करैत छथि। तहिना तरेगण दिस तकबैत–
एक तारा दू तारा/तारा बेटी बड़ बुधियारि
गंगाकातसँ बालु अनलक/सेहो बालु कनुनियाँ लेलक
सेहो कनुनियाँ फुटहा देलक/सेहो फुटहा चरबहबा लेलक
सेहो चरबहबा घस्सा देलक/सेहो घस्सा गैया खेलक
सेहो गैया दूध देलक/सेहो दूध बिलैया पीलक
सेहो बिलैया मूसा देलक/सेहो मूसा चिलहोरबा खेलक
सेहो चिलहोरबा पंखा देलक/सेहो पंखा राजा लेलक
सेहो राजा हाथी देलक/सेहो हाथी मामा लेलक
सेहो मामा गिलास देलक
सुतयबाक काल नेनाकेँ जाँघपर लऽ, बेर–बेर ओकर कनपट्टी आ माथकेँ सोहरबैत, जाँघकेँ नीचा–उपर करैत, अपनो देहके डोलबैत, ई लोरीक परम्परा एखनो धरि मिथिलाक सब घरमे देखबा सुनबामे अबैत अछि–आगे निनियाँ आ आ/बौआ लए निन ला ला
निनियाँ एलै बिढ़िनियाँसँ/बौआ एलै मातृकसँ
बौआक मामा गामकी–की बिकाय।
अंगा बिकाय, टोपी बिकाय/सेहो अंगाकेँ पहिरय/बौआ पहिरय
एकरा कत्तौ–कत्तौ दोसर प्रकारेँ एना सुनबामे अबैत अछि–
निनियाँ अयलै बिरहिनियाँसँ/बौआ अयलै ममहरसँ
ममहरमे बौआ की–के खाए/आरब चाउरक भात
सोरहिया गायक दूध/हाली–हाली खो रे बौआ जयबेँ बड़ी दूर
हुअमाकेँ पियासल बौआ गेल पोखरि
पोखरिक टेंगस लेल टेंगराय
बोनक बगुला देल छोड़ाय/ऐहेँ रे बगुला खेत–खरिहान
एक सूप देबौ देसरिया धान/तेकरे कुटिहे नाम–नाम चूड़ा
बैसि जिमबिहेँ ब्राह्मण पूरा देल आसीस
जिबिहेँ सै बौआ लाख बरीस।
एहि लोरी सभक माध्यमसँ नेनाकेँ सुतयबाक संग–संग ओकर दीर्घायु होएबाक कामना सेहो कएल जाइछ। नेनाक सुति रहला पर माए, निश्चिंत भऽ अपन घरक काज–रोजगारमे लागि जाइत छथि।
नेनाक संग अपनो मनोरंजन करबाक क्रममे लोक अपने उतान भऽ पड़ि रहैत अछि आ नेनाकेँ पैरपर बैसाय, बेर–बेर पैर उपर–नीचा करैत एहि पालन गीतक आनन्द अपनो लैत छथि आ नेनोकेँ सेहो दैत छथिन। एकरा कत्तौ–कत्तौ “घुघुआ–मना” आ कत्तौ–कत्तौ “धुआँ–चुआँ” नामसँ सेहो जानल जाइत अछि।
घुआँ घूँ लल्ले छूँ लल्ले मनसा नाम की
सोनमन झा, टीक पकड़ि ला, पोखरि खुना
पोखरिक कात–कात चम्पा लगा/चम्पा फूल उधिआयल जाए
परती फुलायल जाए/सीकीक डगमग कोकाक फूल
चकमक देवता चल बड़ी दूर/कत्ते दूर/मधेपुर
मधेपुरमे की सब, तार छै बेतार छै
काजर–बीजर कएल छै/टीकुली बैसाएल छै
मामा गेलै पटना/मामी सुतलै अंगना
मामा घरमे चोर पैसल/दोड़ऽ हो भगिनमा
तकर बाद “नव घर उठे” कहि पैर उठाएल जाइत अछि आ “पुरान घर खसे” कहि पैर नीचाँ खसाएल जाइत अछि। ई खेल नेना सब बेर–बेर खेलएबाक लेल कहैत अछि आ आनन्द विभोर होइत रहैत अछि।
जावतकाल घरि नेना जागल रहैत अछि, ओकरा एक ने एकटा लोकक सानिध्य चाही, नहि तँ ओ कानय लगैत अछि। एहना स्थितिमे गायक अतिरिक्त नानी, दादी, दीदी आदि ओकर मोनकेँ बहटारबाक लेल रंग–बिरंगक पद्य, भास लगाकऽ गाबऽ लगैत छथि–
अलिया गै, मलिया गै/गोला बड़द खेत खाइ छौ गै
कत्तऽ गै, डीहपर गै/डीहपर रखबार के गै/बाबा गै
सासुकेँ नहि देतौ गै/सिरमातरमे रखतौ गै
अपने सबटा खयतौ गै।
दोसरः-
लाल गाछी गेली, लाला आम पेली
बाबाक देली, बाबा हौ/आब नहि जाएब मकैया खेत।
बाघ छै, बघिनियाँ छै, कोठीपर हरमुनियाँ छै
बाबा आँगनमे चूड़ा कुटाय/पड़बा बीछि–बीछि खाइ छै
कोन बेटखउकी नजरि लगौलक/पड़बा रूसल जाइ छै।
नेनाक लालन–पालनमे माए, दादी, नानीक संग–संग दीदी अर्थात पिउसिक सेहो बड़ महत्वपूर्ण योगदान रहलैक अछि। तेँ किछु दीदीपरक द्रष्टव्यः-
लाल दीदी गे/की दीदी गे/डलिया दे मिरचाइ तोड़ए लेल
ककरामे/पुलिसबामे/सबे पुलिसबा हुलिसन आएल
ककरा घर नुकाएब गे/बाबा घर नुकाएब गे
बीचे बाट पर खसली गे/सब बरियतिया हँसली गे
दोसरः-
लाल दीदी गे/की दीदी गे/बेटा कनै छी खोपड़ीमे
कानय दहिन पुतखौकाकेँ/नाचय दहिन पमरियाकेँ
खाइ लेल देलहुँ दालि भात/खाए लेलक सोहारी
सुतइ लेल देलहुँ अलंग–पलंग/सूति रहल गोरथारी
गेलहुँ मोँछ पकड़ि कऽ उठबए/फोलि देलक केबाड़ी।
तेसरः-
लाल दीदी गे/की दीदी गे/एक रत्ती छाल्ही चटलियौ गे
तै लेल बाबा मारलकौ गे/बाबा बड़ चण्डलबा गे।
अपना ओहिठामक बेटीकेँ जखन संतानक योग्यता होइत छनि तखन प्रायः नैहर आनि लेबाक परम्परा एखनो धरि बाँचल अछि। एहना स्थितिमे नेनाकेँ मामा, मामी, नाना, नानीक बेसी दुलार–मलार भेटैत रहलैक अछि, तेँ किछु मामा–मामीसँ जुड़ल पालन–पद्य द्रष्टव्य–
मामा हौ पोखरी भीड़पर जइहऽ
चिक्कन पड़बा मारिकऽ आनिहऽ
मामी हाथकेँ दीहऽ/तेल फोरन मिलाकऽ करिहऽ
अपने खइहऽ लाल–लाल कुटिया/हमरा दीहऽ झोर
ई सब देखिकऽ बहि रहलैए/हमरा आँखि सँ लोर।
दोसरः-
मामी यै भात उधिआए/मामी यै दालि उधिआए
कोठी पर सुग्गा स्नान करैए।
तेसरः-
आब नहि जएबै मामाक अँगना
अपने खाइ छै लाल–लाल कुटिया/हमरा दै छै झोर।
खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध शिशु–लोक साहित्य
एहिसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्यक परिवेश बेसी विस्तृत अछि। रस्ता–पेरा, परती–पराँत, विद्यालय–परिसर, खेलक मैदान आदि ठाम नेनाक झुण्ड भोर साँझ जमा होइत अछि आ रंग बिरंगक खेल खेलाइत अछि। छोट–छोट नेना, जे खेल, बेसीकाल खेलाइत अछि, ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य–
अटकन–मटकन दहिया चटकन/पूस महागर पुरनी पत्ता
हिल्लय–डोल्लय/माघ मास करैला फरए/तै करैलाक नाम की
आम गोटी, जाम गोटी, तेतरी सोहाग गोटी।
सिंगही लेबै की मुँगरी
जँ उत्तरमे नेना ‘सिंगही’ कहैत अछि तँ ओकरा बिट्ठू काटल जाइत अछि आ जँ ‘मुँगरी’ कहैत अछि तँ मुक्कासँ मारल जाइत अछि।
एकरा दोसर प्रकारेँ सेहो सुनबामे अबैत अछि–
अटकन मटकन दहिया चटकन/केरा कूस महागर जागर
पुरनिक पत्ता हिल्लै–डोल्लै/माघ मास करैला फूलै
आमुन गोटी, जामुन गोटी/तेतरी सोहाग गोटी
सिंगही लेबेँ की मुँगरी?
दोसरः-
गाछ करै ठाँए–ठाँए, नदी गौंगिआए
कमलक फूल दुनू अलगल जाए/सीकीक डाली चमेलीक फूल
चकमक देवता चलबड़ी दूर/हाथीपर हथबरबा भैया
घोड़ापर रजपूत
सब रजपूतनी खोपा गुहने/बंका छै मजबूर
बंका बिकाइए तीन–तीन बंका/बाजूकेँ गरदाग
रामजीकेर सुतल पुतहुआ/कूटैत रहए धान।
बाल मनोविज्ञानकेँ ध्यानमेँ राखि, नेनाक समुचित विकासक, उल्लासक लेल मैथिली शिशु लोक साहित्य थोड़ नहि प्रतीत होइछ। खेलसँ सम्बद्ध एकटा बाल–कथा काव्य द्रष्टव्य–
एकटा छलै फुद्दी, ओ बैसल कुसपर
कुस ओकर पेट चीरि देलक
ओहिसँ निकलल तीनटा धार
दूटा सुखले–सुखले छल, एकटामे पानिएँ नहि
जाहिमे पानिएँ नहि, ताहिमे पैसल तीनटा हेलबार
दूटा डुबिए–डुबिए गेल, एकटाक पते नहि
जकर पते नहि,से नोतलक तीनटा ब्राह्मण
दूटा भुखले–भुखले रहल, एकटा खएबे नहि कएलक
जे खएबे नहि कएलक, तकरा भेल तीन मुक्का दण्ड
दूटा हुसिए–हुसिए गेल, एकटा लगबे नहि कएल
एहि प्रकारक लोक साहित्य नेना सब बड़ मनोयोगसँ सुनैत अछि।
कखनोकाल नेना–भुटका झुण्ड एक–दोसरक डाँर पकड़िकऽ रेलगाड़ी बनबैत अछि। एहिमे एक गोटा इंजिन आर सब नेना डिब्बा बनैत अछि आ घुमि–घुमिकऽ कहैत अछि।
रेलगाड़ी झकमक/पहिया लोहारकेर, बेल सरकारकेर
कुँइआमे पानी, मकोलामे तेल/आ गेलि मइयाँ, पी गेलि तेल
भैया रे भैया, कुटुम्ब कहाँ गेल/एक सय हाथी बान्ह पर गेल।
मिथिलाक खेलमे कबड्डीक बड्ड पुरान परम्परा रहल अछि। एहिपर आधारित किछु पद्य देखल जाए–
कबड्डी–कबड्डीकार/मैना बच्चा अण्डापार
दोसरः-
चेत कबड्डी आबऽ दे/तबला बजाबऽ दे
तबलामे पइसा/बाग–बगइचा।
तेसरः-
कबड्डी खेलऽ गेलहुँ कपार फुटि गेल
रेशमकेर डोरामे हाथ कटि गेल
श्रवणकेम देखिकऽ पियास लागि गेल
हाथीक देखिकऽ हदास उड़ि गेल/आम चकलेट चीनी प्लेट
एकटा खेल अछि गिरगिटरानी ई खेल मिथिलाक कन्या लोकनिक मध्य खेलाएल जाइत रहल अछि। एहिमे एकटा कन्या गिरगिट बनैत अछि आ दूटा, ओकर दुनू जाँघ पकड़िकऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि आ एकटा कन्या ओकर दुनू पैर पकड़िकऽ, ओहि पर बैसि जाइत अछि आ कहैत अछि–
गिरगिटमाला–गिरगिटमाला/कहाँ–कहाँसँ आएल छी
बौआ लाला–बौआ लाला/देस–देससँ आएल छी।
की सब लाएल छी।
आम छोड़ि गुद्दा/ककरा देलहुँ
राजाक बेटीक हाथमे/राजाक बेटी कत्तऽ अछि
मजे कोठलिया/मजे कोठलिया की सब
साँप छै, बाघ छै।
एहि कथा–काव्यकेँ दोसर तरहेँ सेहो कहल जाइछ–
हे गिरगिटियाँ रानी! तोँ कतएसँ अएलह
हमरा लेल की–की अनलह
कान खोड़ि गुजुआ/सेहो गुजुआ ककरा लेल
राजा बेटी हाथक लेल/राजा बेटी की सब देल
हाथी छोड़ि घोड़ा देल/सेहो घोड़ा कहाँ गेल
विरदावनमे चरए गेल/विरदावनमे की–की देखल
साँप देखल, बाघ देखल/नाचे गिरगिटिया।
जे कन्या गिरगिट बनल रहैत अछि ओ अपन मूड़ी उठा आ हाथ पसारिकऽ उत्तर दैत रहैत अछि आ ओ तीनू सहयोगी कन्या ओकरा घुमबैत रहैत अछि।
एकटा खेल अछि–कटहरक गाछ बला एहिमे एकटा नेना ठाढ़ भऽ गाछक अभिनय करैत अछि तथा आओर नेना सब ओकर पैर पकड़ि, मूड़ी गोंतिकऽ, बैसि रहैत अछि आ कटहर फलक अभिनय करैत कहैत अछि–
हमरा बाड़ी–हमरा बाड़ीकेँ हुहुआए
राज कोतवाल/की–की मँगैए
आरब चौरा, नव ढ़कना
तकर बाद कोतवाल, फलक अभिनय करैत नेना सबकेँ, हाथसँ टेबैत अछि
तखन गाछ कहैत अछि–
काँच छै तऽ छोड़ि दू/पाकल छै तऽ लऽ लू।
एकटा खेल अछि– “झिझिर कोना”। ई खेल पाँचगोट नेना द्वारा कोनो खाली घरमे खेलाएल जाइत अछि, जाहिमे चारिटा कोन होइ। ई खेल बेसीकाल नेना खाली दलानक कोठली वा विद्यालयमे खेलाइत अछि। एहि खेलमे प्रयुक्त लोक साहित्यकेँ देखल जाए–
झिझिर कोना–झिझिर कोना कोन कोना जैब
एहि कोना जैब, ओहि कोना जैब।
एकटा खेल अछि– “साँप डिग–डिग”। ई एकटा सामुहिक खेल थिक, जाहिमे बहुत नेना एक संग हत्था – जोड़ि कऽ केँ सोझ पाँतीमे ठाढ़ होइत अछि। एकटा कहैत अछि –
की रे बकरिया
की रे छकरिया/बकरी कत्तऽ
खेतमे/धान किएक खेलकौ
खेत्तौ/रोज लेब्बौ
नहि देब्बौ।
तखन दू हाथक बीच दऽ नेनासब बन्हएबाक अभिनय करैत अछि आ बजैत अछि– साँप–डिगडिग/साँप–डिगडिग
जेना पशु–पक्षी सब अपन अबोध नेनाकेँ आत्मरक्षाक उपाय दौड़िकऽ बाजिकऽ, खेलाएकऽ सिखबैत रहैत अछि, तहिना शिशु लोक साहित्यमे सेहो आत्म–रक्षार्थ अनेक प्रकारक खिस्सा–पिहानी
गद्य आ पद्य दुनूमे पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध अछि। उदाहरणस्वरूप–बगिया गाछक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा एहिमे सबसँ बेसी लोकप्रियता पौलक अछि। ओना आरो कतेक अछि। जेना–ननदि–भाउजसँ जुरल आँझुलक खिस्सा ‘सातो भाइ परदेस गेल आँझुलकँ दुःख देने गेल’।
तहिना झाँझी कुकुरक सौतिनक खिस्सा–
मोर मन मोर मन नहि पतिआइ
सौतिनक टाँग दुनू झुलिते जाइ।
किछु एहेन लोक–साहित्य देखबामे अबैत अछि जाहिमे निरर्थक शब्द सभक प्रयोग बुझना जाइछ। जेना–
औका–बौका, तीन तरौका/लौआ–लाठी, चानन काठी
चाननकेँ बागमे इजय–विजय/गल–गल पुअबा–पचक।
दोसरः-
ईटा–माटी सोनेक टाट/आठम लड़की भागल जाइ
आलू बम बेटा बम/भौजी नाचए छमाछम।
ज्ञानोपयोगी शिशु लोक साहित्य
“परिवारकेँ सामाजिक जीवनक पहिल पाठशाला” कहल गेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यक माध्यमेँ नेनाकेँ अनेक प्रकारक शिक्षा देल जाइत रहल अछि। किछु उदाहरण द्रष्टव्य–
अंक ज्ञानक लेल एकटा खेल अछि– “अट्टा–पट्टा” एहिमे नेनाक दहिना हाथपर अपन दहिना हाथसँ थापर मारल जाइत अछि आ बेरा–बेरी आँगुर पकड़ि कहल जाइत अछि–
अट्टा–पट्टा बौआकेँ पाँचगो बेट्टा
एगो गेल गायमे, दोसर महींसमे
तेसर बड़दमे–चारिम गेल बकरीमे/पाँचम गेल छकरीमे।
तकर बाद तरहत्थीपर, अपन आँगुर रखैत–
एतऽ बुढ़िया स्नहलक, पकौलक, खएलक, पीलक ई कहैत अपन आँगुरकेँ डेगा–डेगी बढ़वैत ओकर हाथसँ काँख धरि लऽ जाएल जाइत अछि आ कहल जाइत अछि–
एतऽ सँ जे चलल बुढ़िया..../गुद्दू गैयाँ।
नेना गुदगुदी लगलापर जोर–जोरसँ हँसैत–हँसैत लोट–पोट भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारेँ नेनाकेँ एकसँ पाँच धरि अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
तहिना दोसर खेल अछि जाहिमे दू आ दूसँ अधिक नेना ठाढ़ भऽ आँगुरसँ संकेत करैत खेलाइत अछि–
दस, बीस तीस, चालीस, पचास/साठि, सत्तरि, अस्सी, नब्बे, सौ
सौमे लागल धागा, चोर निकलिकऽ भागा
रानी बेटी सोइती, फूलकेँ माला गोइती
मेम खाए बिस्कुट/साहेब बाजए भेरी गुड।
एहि खेलक माध्यम सँ नेनाकेँ दहाइ आ सैकड़ा धरिक अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
एकटा खेल अछि– “घो–घो रानी”। एहि खेलमे एकटा नेना बीचमे ठाढ़ होइत अछि आ चारूकात नेनासब हत्था जोड़ी कऽ केँ वृत्ताकार ठाढ़ होइत कहैत अछि–
घो–घो रानी कत्ते पानी–एड़ी धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–ठेहुन धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–जाँघ धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–डाँढ़ धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–ढ़ोढ़ी धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–पेट धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–छाती धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–गरदनि धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–मुँह धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–नाक धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–आँखि धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–माँथ धरि
अंतमे ‘चुभुक’ कहि सब नेना डूबिकऽ नहयबाक अभिनय करैत अछि। एहिमे माध्यमसँ नेना सबकेँ अंगक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
एकटा खेल नेना सब एहि प्रकारेँ खेलाइत अछि–एकटा नेना अपन दुनू हाथकेँ उठाकऽ पैघ आकार बनबैत अछि आ तकर बाद क्रमशः छोट करैत जाइत अछि आ कहैत अछि–
एतेक टा की–छिट्टा/एतेक टा की–पथिया
एतेक टा की–मउनी/एतेक टा की–चुक्का
चुक्कामे की–अण्डा/के फोरए–कउआ
के गीजए–हमसब।
ई कहि– ती–ती–ती–ती....कहैत सब नेना कूदऽ लगैत अछि। एहि लोक साहित्यक माध्यमसँ छिट्टा, पथिया, मउनी, चुक्का सभक आकारक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
तहिना एकटा खेल अछि जकरा माध्यमसँ किछु वस्तुक उपयोगक ज्ञान कराओल जाइत अछि–
खेलए–धूपए गेलिऐ/एगो लोहा पेलिऐ
सेहो लोहा कथी लेल/हाँसू गढ़ाबऽ लेल
सेहो हाँसू कथी लेल/खड़ही कटाबऽ लेल
सेहो खड़ही कथी लेल/बंगला छराबऽ लेल
सेहो बंगला कथी लेल/भैसी बन्हाबऽ लेल
सेहो भैसी कथी लेल/चोतबा पड़ाबऽ लेल
सेहो चोतबा कथी लेल/अंगना निपाबऽ लेल
सेहो अंगना कथी लेल/गहूँम सुखाबऽ लेल
सेहो गहूँम कथी लेल/आटा पिसाबऽ लेल
सेहो आटा कथी लेल/पूरी पकाबऽ लेल
सेहो पूरी कथी लेल/भौजीकेँ मँगाबऽ लेल
सेहो भौजी कथी लेल/बेटा जनमाबऽ लेल
सेहो बेटा कथी लेल/कोरामे खेलाबऽ लेल
अंतमे–टाइल–गुल्ली टूटि गेल/बौआ रूसि गेल।
उपरोक्त विवेचनसँ लगैत अछि जे मैथिली शिशु लोकसाहित्य नेनाक प्रत्येक पक्षसँ जुड़ल रहल अछि। लालन–पालन आ खेल मनोरंजनसँ सम्बद्ध लोक साहित्यक अधिकता पाओल गेल अछि। खेलक मध्यमसँ मनोरंजनक संग–संग नेना भुटकामे एकता, सहयोग, सहानुभूति आ प्रेमक भावना जगैत अछि। एकर अतिरिक्त अभिनय, नृत्य, गीत आदिक ज्ञान सेहो आरम्भहिसँ होमए लगैत अछि। एखन हमरा सबकेँ मैथिली शिशु लोक साहित्य सन अमूल्य धरोहरकेँ सहेजिकऽ समेटबाक प्रयोजन अछि कारण दिनानुदिन ई अपन मौलिकताकेँ त्यागि विकृत रूप अपनौने जा रहल अछि। जँ एहि दिशामे हमरा सभ सचेष्ट नहि होएब तँ एहि धरोहरक मूल्यवान वस्तु नष्ट भऽ जयबाक प्रबल सम्भावना लगैत अछि।
ओना हम आरम्भेमे कहि चुकल छी जे एहि विषयपर पहिनो बहुत गोटा काज कयलनि अछि आ प्रायः एखनो कऽ रहलाह अछि, मुदा एकर फलक ततेक विस्तृत अछि जे उपलब्ध संकलन यथेष्ट नहि मानल जा सकैत अछि। कारण संकलित शिशु लोक साहित्यसँ कैक बड़ बेसी लोक साहित्य एखनो धरि लोकक ठोरपर छिड़िआएल अछि।
वर्त्तमानमे जखन पाश्चात्य–सभ्यता मिथिलाकेँ चारूकातसँ गछारने जा रहल अछि। लोक “चन्न मामा आ रे आ”केँ त्यागि “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” दिस आँखि मुनिकऽ भागल जा रहल अछि आ अपन जे विशिष्ट–वस्तु तकरा त्यागने जा रहल अछि। एहना स्थितिमे हमरा सभक समक्ष यक्ष प्रश्न अछि जे मिथिलाक एहि अमूल्य–निधिकेँ, जे कि, एहिठामक संस्कृतिक, एकटा अपन विशिष्ट परिचिति दैत रहल अछि, तकरा कोनाकऽ अक्षुण्ण राखल जाए। आइ जखन हमसब इक्कीसम शताब्दीक देहतिकेँ पार कऽ रहल छी, विज्ञान अपन विस्तारकेँ सुदूर देहातधरि पसारि चुकल अछि, तेहना स्थितिमे नव–नव तकनीक द्वारा एहि असंकलित शिशु लोक साहित्यकेँ, चिरकाल धरि, संकलित कऽ जोगा कऽ राखल जा सकैत अछि, जन–जन धरि एकर प्रचार–प्रसार कराओल जा सकैत अछि, परंच एकरालेल जरूरी छै–एहि दिशामे एकटा समधानल डेग उठएबाक आ जोरगर प्रयास करबाक।
...
२.६. १. श्या मसुन्द,र शशि-नमन गुरुदेव- (साहित्य कार डा़. धीरेश्वगर झा धिरेन्द्रछक ६ अम वार्षिकीपर विशेष) २. सुजीत कुमार झा हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्री य अध्याक्ष



साहित्यआकार डा़. धीरेश्वतर झा धिरेन्द्राक ६ अम वार्षिकीपर विशेष
नमन गुरुदेव
श्या मसुन्द र शशि
जनकपुरधाम
नेपालीय मैथिली साहित्य क जनक एवं जनकपुरक चटिसारके अन्तिेम प्राचार्य गुरुदेव डा़धीरेश्ववर झा ‘धिरेन्द्रह’क छठम् स्मृैतिसभा पुस २७ गते सम्पटन्नि भेल अछि । हुनकर वरदहस्तध प्राप्तर क एखन धुरन्धदर खेलाडी बनल साहित्यमकारलोकनि हुनका स्मएरण कएलनि कि नहि से ओएह जानथि मुदा हुनके प्रेरणासँ जन्मवग्रहण कएने मिथिला नाट्यकला परिषदधरि हुनका अवश्यव स्मएरण कएने छल । एहि अवसरपर भाषण भुषण आ किछु घोषणा सेहो भेल । सभके बुझल अछि जे नेतासभक भाषण निष्प्र भावी भ रहल आजुक युगमे भाषणप्रतिक आमजनके विश्वालस घटि रहल छनि । ओना हुनका कोनो मन्चरपर चढिक स्मलरण करी वा मोने मोन, कोनो अन्तकर नहि छैक । कारण देवताक पूजा मोने मोन सेहो कएल जा सकैए । आ असली पूजा त देवताक देखाओल बाटपर चलब थिक । हुनकर आदर्शके पालना करब थिक । हँ जहाँधरि घोषणा करबाक गप्पद अछि त एतुका वहुत संस्थाह आ व्य क्तिब बहुत किछु घोषणा क चुकल छथि । आव देखवाक अछि जे ई घोषणासभ कार्यरुपमे आएल कि नहि ?

हम जहन गुरुदेवके जनकपुरक चटिसारके अन्तिलम प्राचार्य लिखए लागल छलहुँ त मोनमे नानाप्रकारक चिन्ताि व्याहप्तज छल । कारण जनकपुरमे सम्प्राति जे कलमजिवीसभ सकृय अछि ,ओहोसभ कोनो हिसावसँ कम नहि छथि । सभक संग नाम,दाम आ मुकाम छनि । एहना अवस्थाामे केओ कहि सकैत छथि जे ‘ओ अन्तिहम प्राचार्य कोना भ गेलाह ।’ मुदा एहि वास्तेथ हम मैथिली एमएक पहिल बैचक जमावडाक दृश्य उदघाटन करए चाहव । ओना उमेरक कारणे हमरा एहि भितरके तिरीभिटीक जानकारी नहि अछि मुदा हम जे देखल से कहए चाहव ।
गुरुदेवके भागिरथी प्रयाससँ राराव क्याेम्पजसमे मैथिलीमे एमएक पढाई सुरु भेल छल । मैथिलीक बादे राजनिती शास्त्रथ,अर्थशास्त्रभ किंवा अन्यै विषयमे स्नापतकोत्तरके पढाई सुरु भेल । सभके सुखद आश्चदर्य लागि सकैए जे मैथिलीक एमएक पहिल बैचक विद्यार्थीसभ छलाह सर्वश्री डा़राजेन्द्रवप्रसाद विमल,जानकी रमण लाल,रामभरोस कापडि‘भ्रमर’डा़पशुपतिनाथ झा,डा़रेवतीरमण लाल, रुद्रकान्तल झा ‘मडई’,प्रो़परमेश्वसर कापडि,नमोनाथ ठाकुर,नागेश्वथर सिंह आदि आदि । ताहु समयमे सभके सभ अपन अपन मुकामपर छलाह । चुकी अधिकांश विद्यार्थी नोकरियाहा छलाह ते कक्षा भोरमे संचालित होईक आ अधिकाश कक्षा गुरुदेवके घरेपर संचालित होईक । चाह पानक दौर चलैक आ पढाई लिखाई सेहो । हम,घुटुल आ पुटुल चाह पान लावएमे परेसान रही । हँसीक पमारा छुटैक ,विभिन्न विषयपर गंथन मंथन होईक आ गुरुदेव डिक्टेहशन लिखवथिन । हमरा मोन अछि भाषा विज्ञानके कापी तैयार करैत काल गुरुदेव जानकी बाबू आ विमलसरसँ बेर बेर राय सल्लाभह कएल करथि । यदि अधलाह नहि लागय त स्वीनकार करए पडत जे ओएह कापीक आधारपर एखनो मैथिलीक एमएक विद्यार्थीसभ परीक्षामे पास करैत छथि ।
एखनो जनकपुरमे मैथिली विद्वानक कमी नहि अछि । मैथिलीक प्राध्या पकके सख्यार सेहो पहिनेसँ बेसी अछि । कि एखन गुरुदेवद्वारा चलाओल गेल चटिसार चलैत अछि ?यदि नहि त हुनका जनकपुरक चटिसारक अन्तिएम प्राचार्य कहवामे कि हर्ज ?
गुरुदेवके स्मिरण करैत काल एकगोट आओर विषय मोन परैत अछि । ओ ई जे ओ मैथिली भाषाक साहित्यककारटा नहि छलाह । साहित्यरकार श्रृजना करएवला ब्रम्हाि सेहो छलाह । केओ मानथि वा नहि मानथु ओ महेन्द्रस मलंगियाके नाटक लिखवाक प्रेरणा आ सिख दुनू देलथिन । रेवती रमणलालके रिपोर्ताज लिखवाक आदेश देलथिन । रामभरोस कापडिके कविता आ गीत एवं भुवनेश्वखर पाथेयके कविता आ कथा लिखवाक जिम्मेेवारी देलथिन ।
प्रतिभा आ रुचिक अनुसार गुरुदेवद्वारा कएल गेल ई जिम्मे‍वारी विभाजनके पाछा बहुत पैघ उद्येश्यआ छल हेतनि । ओ चाहने हेताह जे नेपालीय मैथिलीमे सेहो सभ विधामे रचना हो । पाछा जा से भेवो कएल । भलेहि भारतीय हुनके किछु शिष्यमद्वारा षडयन्त्र कएल गेल हो मुदा ‘नेपालीय मैथिली साहित्यछ’क नामाकरण ओएह कएने छलाह ।
हे गुरुदेव । अहाँ प्रेरणा दियौ जे जनकपुरमे फेरसँ गुरुकुल परम्पररा चलि सकए । चुकी एखन साहित्यथ श्रृजनसँ बेसी मैथिलसभके अधिकारक आवश्यपकता छैक । मैथिलके अपन राजपाट होईक आ अपन भाषामे काज क सकए । ओना हमरा मोन अछि अपनेक ओ जीद्द
नोरक टघारेसँ जिनगी जँ निर्मित
आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे
कठिन युद्ध अछि ई त लडिए रहल छी
हारब ने किन्निहु ,हमर जीत निश्चितत ।।
अपनेक अनुचरलोकनि अपनेक ईक्षाके अवश्यज पूरा करत ।

२.सुजीत कुमार झा
हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीशय अध्यिक्ष


नेपालमे एकटा कहावत अछि नेपालक एकीकरणक समयमे पृथ्वीरनारायण शाह कतेको ठाम हारि गेल रहथि । निराश भऽ अपन घरमे अराम कऽ रहल रहथि की देखलखिन एकटा चुट्टी किछ पर चढयकेँ प्रयास करैत छल आ ओ बीचमे खसि परैत छल । चुट्टी के देखलखिन चारि पाँच वेरक प्रयासक वाद ओ चढि गेल । एकरवाद हुनका एकटा ज्ञान भेटलन्हिल आ पृथ्वीलनारायण शाह फेर सँ एकीकरण अभियानमे जुटि गेलाह , एखनकेँ नेपाल अछि तकर निर्माण भऽ सकल ।

करीब—करीब नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीणय अध्यनक्ष धर्मेन्द्र झा सँग एहने स्थिरति भेल अछि । ओ चुट्टी तऽ नहि देखलथि मुदा पत्रकारक नेतृत्व् करबाक अछि से अठोट हुनका केन्द्रीरय अध्य क्ष बना देलक ।
धर्मेन्द्रन २०५१ सालमे नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाक कोषाध्य्क्षमे हारल रहथि । फेर २०५४ सालमे केन्द्री य सदस्यद पदमे, २०५९ सालमे केन्द्रीधय सचिव पदमे , २०६२ सालमे महासचिव पदमे हारल रहथि । किछ गोटे तऽ हुनका हरुवा पुरुष तक कहय लागल छलनि । मुदा २०६५ सालमे नेपालक पत्रकार सभक सभसँ वडका पद महासंघक केन्द्रीहय अध्युक्ष भऽ गेलथि । नेपाल पत्रकार महासंघक पूर्व अध्ययक्ष तारानाथ दहाल कहैत छथि– ‘महासंघक नेतृत्वी करबाक अछि से अठोट आ पत्रकार सभ बीच सम्वापद कायम राखब धर्मेन्द्रछकेँ अहि स्थासन पर पठौलक ।’ धर्मेन्द्रप अहि बीचमे २०५६ सालमे केन्द्रीाय सदस्य मे मात्र जितल छलथि । ओ स्वंमय कहैत छथि — ‘केन्द्री य कमिटीक विभिन्नद पदमे हारलौ तहुँ सँ बेसी जनकपुरमे कोषाध्यओक्ष पदमे हारल छलौं तहिया बड दुःख भेल छल ।’ ३०/३५ गोटे सदस्यह रहल जिल्लाममे हारि गेलौं तकर बाद प्रण लेने रही जे केन्द्र क प्रमुख पदपर पहुँच सभकेँ देखा देबै ।

कहियो नेता बनयकेँ सपना देखने धर्मेन्द्रक रामस्वहरुप रामसागर बहुमखी क्या।म्पसस जनकपुर अन्तरर्गतक स्वयतन्त्रप विद्यार्थी युनियनक सदस्य् आ नेपाल विद्यार्थी संघ धनुषाक उपाध्यदक्ष सेहो भेल रहथि । मुदा स्वववियू कालमे २०४३ सालमे चहल पहल नामक भिते पत्रिका निकाललथि । आ सम्पावदक भेलाक बादक लोकप्रियता वा प्रभाव हिनका अहि दिस खिच लेलक । ओ अपन स्वावियूकालमे जागृति नामक पत्रिकाक सम्पारदक सेहो भेल रहथि ।
मैथिली आ राजनीति शास्त्र सँ एम.ए आ इन्डिलयन इन्टि ज च्यूिट अफ मास क्युह निकेशन दिल्लीी सँ डिप्लोलमा धरिकेँ पढाइ कएने धर्मेन्द्रह पत्रकारिता केँ पेशा बनौलथि । धर्मेन्द्रजक बाबु राजेन्द्रय झा कहैत छथि– ‘धर्मेन्द्रि लग क्यापम्पधसमे टिचिङ्ग करब, अन्यब सरकारी नोकरी दिस जाएब आ पत्रकारिता करब तिनटा विकल्प– छल । मुदा हम देखलियै धर्मेन्द्रमक इच्छार पत्रकारिता दिस वेसी अछि । पत्रकारितामे बहुत रास कठिनाइ छैक बुझलाक बादो हमसभ कोनो रुकाबट नहि कएलौ ।’
जाहि लगन सँ ओ काज करैत छलथि हमरा विश्वा्स छल ओ एक दिन बढिया करता राजेन्द्र आगा कहलन्हिन । २०२३ चैत ४ गते माता मनोरमा झा आ पिता राजेन्द्र झाक जेष्ठ पुत्रक रुपमे सिरहा जिल्लािक गोविन्दछपुर वस्तिरपुरमे जन्म४ लेनिहार धर्मेन्द्र जहिना पत्रकारक नेता छथि तहिना लेखन क्षेत्रमे सेहो चोटी पर छथि ।
काठमाण्डूथ सँ प्रकाशित अन्नरपूर्णापोष्टज दैनिकक समाचार संयोजक छथि । धर्मेन्द्रक हिमालय टाइम्सष दैनिककेँ कार्यकारी सम्पारदक सेहो रहि चुकल छथि । जनकपुरमे धर्मेन्द्र क सम्पाजदनमे प्रकाशित नवविचार साप्ताेहिक पत्रकारितामे एकटा अलग चिज देने छल । प्रत्येुक हप्ताा अन्तकरवार्ता, व्यंपङ्ग, समाचारमे विविधता ओहि पत्रिकाक विशेषता
छल । ओना व्य वसायिक पत्रकारिता माधव आचार्यक सम्पातदनमे जनकपुर सँ प्रकाशित जनआकांक्षा आ विएम खनालक सम्पायदनमे प्रकाशित विदेह साप्ताआहिक सँ शुरु कएने छथि ।
साहित्यममे सेहो धर्मेन्द्रेके प्रयोगवादी कविक रुपमे चिन्हिल जाइत अछि । धर्मेन्द्र क रस्तार तकैत जिनगी, एक श्रृष्टीय एक कविता , एक समयक वात, धुनियाएल आकृतिसभ सनक हिनक मैथिली संग्रह आएल अछि । तहिना नेपालीमे गोनु झाका कथाहरु , कौशलका परिहास सहित दर्जन सँ बेसी पुस्तिक प्रकाशित अछि ।
पुरस्का रक बात जँ कएल जाए तऽ २०५५ सालमे नेपाल विद्याभूषण ‘ख’, रिपोर्टस क्लिबद्वारा २०६० सालमे वेष्टा जर्नलिस्ट अवार्ड , २०६४ सालमे नागाअर्जुन वेष्टम पब्लि केशन पुरस्कारर , २०६५ सालमे राष्ट्रीतय प्रतिभा पुरस्काकर देल गेल अछि ।
भारत , अमेरिका , श्रीलंका, बंगला देश, कतार, नर्बे, फिन्लै ण्डा , डेनर्माक, स्वीटडेन आ जर्मनीके भ्रमण कऽ चुकल धर्मेन्द्रक के आगा बढाबयमे माता पिताक अतिरिक्त कनिया मुन्नीम झाक सेहो महत्वरपूर्ण योगदान रहल ओ प्रसंगक क्रममे वेर वेर कहलन्हि । देशक पत्रकारसभके श्रमजीवि ऐन अन्तनर्गत मिडियासभ तलब दौक, विना नियुक्ती पत्रके देशक कोनो पत्रकार के काज नहि करय परैक ताहि अभियानमे ओ आ हुनक नेपाल पत्रकार महासंघ अखन लागल अछि ओना मैथिलीक अभियानी लोक सेहेा छथि । मैथिली भाषा साहित्यग कला साँस्कृसतिकेँ कोना बढाओल जाय ताहिमे लागल रहैत छथि । फेर सफलताक शिखर पर चढलाक बादो धर्मेन्द्रअ अपन कैरियरकेँ प्रति ओतबे गम्भीतर छथि जतेक २०/२५ वर्षक युवा रहैत अछि ।
२.७. कुमार मनोज कश्यप-जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित।
अन्हेर

बड़ एकंात्मता बुझा रहल आछ हमरा स्वयं आ एहि ट्रेन मे---दुनू पड़ायल जाईत -- कंोनो-कंोनो स्टेशन पर बिलमैत -- नव-नव लोकं सँ परिचय आ पुरान सँ संग छुटब --तथापि ने मिलनकं खुशी ; ने वियोगकं दुःख----चरैवेति़ चरैवेति ।

टुगर हम क़ंक्कंा -कंाकंीकं कृपा पर जीबैत भैंस-बकंरी चरबैत । मोने आछ हमरा जे हम, जीबछा, मलहा सभ केयो टाईल-पुल्ली खेलबा मे एतेकं ने मस्त रही जे महींस के हाँकंबो बिसरि गेलहुँ । सभटा महींस भोकंनी साहुकं खेसारी खेत मे हुलि गेलै । एके-दू बेर तऽ मुँह मारने हेतै महींस सभ किं कंतऽ ने कंतऽ सँ दनदनाईत भोकंनी साहु जुमि गेलै़तामसे-पित्ते माहुर भेल़़बिखिन्न-बिखिन्न के गारि पढ़ैत । सभकं महींस तऽ हाँकिं कंऽ लईये गेलै ओ ; भोलबा सेहो पक़ंडा गेल । सभ छौंड़ा सभ जेम्हरे पओलकं तेम्हरे जान बचा कंऽ पड़ायल । डरे हमहुँ बेछोहे प़ड़ेलहुँ । डर भोकंनी बाबू सँ बेसी तऽ कंक्कंा आ कंाकंीकं छल़़दुनू बात-बात पर कंोना अधमौगति कंऽ मारैत आछ लाते-मुक्के, जे पओलकं ताहि लऽ कंऽमरबा-जीबाकं कंोनो ठेकंान ने ।

हम रेलवे कंाते-कंात पड़ायल जाईत रही किं लागल केयो पाछु सँ हमर आँगी पकंड़ि लेलकं डरे हमर होश गुम्म भऽ गेल अधमरू सन भऽ गेलहुँ । बफाड़ि कंटैत हम कंहुना एहि चाँगुर सँ अपना के छो़ड़ेबाकं अंतिम प््रायास कंरैत आगु दिस जोर लगबैत रहलहुँ । पेᆬर धम्म्‌ दऽ मुँहे भरे खसलहुँ । देह सँ माटि झाड़ैत हम पाछाँ तकंलहुँक़ेयो नहिं छल । जान मे जान आयल । हमर आँगी सिगनलकं तार मे ओझड़ा गेल छल । दूर तकं देखलहुँक़ेयो एम्हर नहिं आबि रहल छल । डर किंछु कंम भेल । ताबते कंोनो ट्रेन सिगनल पर आबि कंऽ ठाढ़ भेल । नुकंा कंऽ हम ओहि मे चढ़ि गेलहुँ डरे एकं कंोन मे दुबकंल ठाढ़ रही । एकंटा आदमी कंने कंात सहटि कंऽ हमरा बैस जेबाकं ईसारा केलकं । असोथकिंत तऽ भईये गेल रही ; बैसिते आँखि लागि गेल । आँखि खुजल तऽ सौंसे डिब्बा खाली छलैकं । धड़फ़डा कंऽ ट्रेन सँ नीचा उतरलहुँ । लोकंकं एहि अजश्र भीड़ मे एकंहुटा चेहरा चिन्हार नहिंज़गह अनचिन्हार; लोकं अनचिन्हार अनभुआर हम आब कंतऽ जायब ?क़ंी कंरब ?? बुकंौर लागऽ लागल हमरा डरे जाँघ थरथराय लागल - 'नहिं जानि कंोन दुरमतिया घेरने छल जे गाम सँ पड़ा गेलहुँग़ाम पर मारिये खैतौं ने ! पहिनहुँ किं कंोनो कंम्म मारि खेने छी ।क़ंी बिगड़ितै मारि खा कंऽ ? देह मे भूर तऽ नहिं ने भऽ जैतै ? मरि तऽ ने जैतौं ? एहि परदेश मे तऽ आब बिलटि कंऽ मुईनाईये लिखल आछ । बौड़ल लोकं अपन देश कंहाँ आपस जा पबैत आछ़़ओकंरा सभ के सुख-सराध लोकं ओहिना कंऽ दैत छै । ' डरे हदास उड़ऽ लागल जोर-जोर सँ हिचुकंऽ लागल रही ।

बुझायल जे केयो हमरा कंान्ह पर हाथ रखलकं चौंकिं कंऽ तकंलहुँ । एकंटा अधवयसु पुरूष हमर कंनबाकं कंारण जानऽ चाहि रहल छल । ओकंर स्नेह सँ हमर कंरेजा फाटि गेल मोन भेल भरि ईच्छा कंानी । हम किंछु ने बाजि सकंल रही । ओ हमरा स्टेशनकं खाली बेंच पर बैसा कंऽ मारते रास कंचड़ी-मुड़ही-घुघनी कंीनि कंऽ खेबा हेतु देलकं । भुख सँ तऽ अँतरी बैसल जाईत रहै़हम खाय लगलहुँ । कंने सुभ्यस्त भेलहुँ तऽ ओ पोल्हा कंऽ सभ बात पुछय लागल । पहिने तऽ हमरा किंछु नहिं बाजल भेल खाली हिचुकैत रहलहुँ । परदेश मे एकंटा अनचिन्हार द्वारा एहन स्नेह पओला सँ हम ओकंर कृतग्य भऽ गेल रही । हम ओकंरा सभ बात बता देलियै आ कंहलियै जे ओ हमरा गाम बला ट्रेन पर बैसा दिअय । ओ हमरा बड़ बोल-भरोस देलकं आ कंहलकं जे आब आई तऽ कंोनो ट्रेन नहिं छैकं ; कंाल्हि ट्रेन धड़ा देत । ता राति भरि लै अपना बासा पर लऽ गेल । मुदा ओ हमरा गामकं ट्रेन नहिं धड़ओलकं नित नव-नव बहाना । हमरे तुरिया ओकंरो बेटा रहै । खेलाईत-खाईत हमरो दिन बीतऽ लागल़़ग़ामकं सुरता धिरे-धिरे कंम होईत गेल ।

ओकंरा सभकं हमरा प््राति स्नेह व्रᆬमशहे कंम्म होईत गेलैकंआब हमरा उपर घरकं कंाजकं संगहिं माल-जाल , खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ी सभ टा जिम्मेदारी छल़़क़ंान वुᆬरियेबाकं तकं के पलखति नहिंताहि पर गारि-गंजन सेहो हुअय लागल । आजिर भऽ कंऽ एकं दिन सिन्हा साहेब सँगे ओहि ठाम सँ पड़ा गेलहुँ ।

सिन्हा साहेब हमरा भोरे-भोर सभ दिन भेंट भऽ जाथि ओ टहलय निकंलैत छलाह आ हम मलिकंाईनकं पूजा लेल पूᆬल तोड़य निकंलैत छलहुँ । आपस मे देखि कंऽ मुस्किंयेनाई , पेᆬर प््राणाम आ तकंरा बाद बढ़ैत गेल अपनत्व । सिन्हा साहेब कंोनो पैघ ऑफीसर रहथि । हमरा अपन माय-बाप के मुँह तकं मोन नहिं लोकं कंहई अलच्छा जनमिते माय-बाप के खा गेलई । मुदा सिन्हा साहेब मे हम अपन माय-बापकं छाँह साफ देखैत छलहुँ । हम हुनकंा अपन देवता समान बुझैत रहलहुँ आ ओ हमरा अपन संतान सँ बढि कंऽ मानैत छलाह । अपने जतऽ-जतऽ जाईत रहलाह हमरा संगे रखलनि । एकं दिन अनचोके मे हुनकंो साहचर्य हमरा सभ के छुटि गेल आब ओ एहि दुनियाँ मे नहिं रहलाह ।

हम आब हुनकंर बेटाकं कंारखाना मे कंाज कंरैत छी । कंारखाना के कंाज सँ जयनगर जा रहल छी । ट्रेनकं ख़िडकंी सँ पाछु पड़ायल जाईत खेत-पथार, कंलम-गाछी, बाध-बोन, ईनार-पोखरि अचानकं हमरा मोन मे हमर बाल्यकंाल एकंटा छाँह जकंाँ पसरि गेल आछ । ट्रेन एके बेर धक्कंा संग रूकिं जाईत आछ । यात्री सभ एम्हर-ओम्हर तकैत एकं दोसरा सँ ट्रेन रूकंबाकं कंारण पुछि रहल आछ । किंछु गोटे तऽ कंारणकं खोज मे ट्रेन सँ नीचा उतरि गेल आछ । हमरो मोन उबिया गेल वा ई कंहु जे रेलकं पटरी कंातकं मनभावन दृश्य हमरो ट्रेन सँ नीचा उतरबा लेल विवश कंऽ देलकं। लोकं बजैत छै जे माओवादी सभ ट्रेन के पटरी उड़ा देने छै़आब ट्रेन आगू नहिं जा पाओत । हम चारू कंात मुड़ी घुमा कं चर -चित लैत छी - सामने पुल पर बोर्ड लागल छैकं -- कंमला पुल सं० ७ । हमर दिमाग पर जोर पड़ल हमरो गामकं पुल के तऽ लोकं साते नम्बर पुल कंहै । ओहु ठाम एकंटा एहने झमटगर पीपड़ के गाछ छलै । हम तजबीज कंरैत छी । यादकं आर कंोनो चिन्ह नहिं बुझाईत आछ । मुदा ई कंमला नदी जकंरा लोकं मोईन कंहैत छलैकं आ एकंर भीड़ पड़हकं ई पीपड़कं गाछ !? हम ट्रेन सँ अपन बैग लऽ कंऽ नीचा उतरि जाईत छी ।

रस्ता कंात मे गुम-सुम ठाढ़ हम आखयास कंऽ रहल छी समय कंतेकं जल्दी बदलि जाईत छैकं मोईनकं कंात मे पीपड़कं गाछ तर बदरिया के चाहकं दोकंाऩ़ओकंर दस पैसी नागीन बिस्वुᆬट कंी सुअदगर ! साँझ-भिनसर भरि गामकं लोकं जुटै एहि दोकंान पऱ़ग़ाम-घर, देश-दुनियाँ, खेती-पथारी सभ टा गप्प होई एहि ठाम । हमरो कंक्कंा घर मे कंतबो चाह पीने होऊ जाबत भोर-साँझ एतुक्कंा चाह नहिं पिबैत छल ताबे चैने नहिं क़ंाकंी भने कंतबो अपन कंपाड़ नोचौ । हमरा मोने आछ जे एकं बेर धानकं सीस लोढ़ि कंऽ ओहि पाई सँ चाह पिबैत रही कंी कंतऽ ने कंतऽ सँ कंक्कंा आबि गेल रहै आ बिना किंछु पुछने तेहन घरमेच्चा मारने रहै जे गाल पर लिला-मशा पड़ि गेल रहै । गिलास तऽ दुर पेᆬकंा कंऽ चूड़-चूड़ भऽ गेल रहै । लोकं सभ कंते दुर्‌ छीः केने रहै कंक्कंा के । ई मोईनो कंतेकं चौड़गर रहै ताहि दिन । कंी मजा अबै पीपड़कं पुᆬनगी पर चढ़ि कंऽ पानि मे वुᆬदई मे । कंते-कंते कंाल हम डुब्बी मारने रहि जाई पानि मे एके सुरूकिंया मे आधा मोईन के पार कंऽ जाई । देखनाहर अचम्भित रहि जाई । मोईनकं ओहि कंछाड़ पर कंतेकं रास जामुनकं गाछ रहै़ख़ाईत-खाईत अघा जाई केयो रोकं-टोकं केनहार नहिं । खायल भऽ जाय तऽ जामुनकं डारि तोड़ि दातमनि कंरब़़ सभ चेन्ह मेटल । कंतेकं मजा अबैत छलै ! एखनो मोने आछ मोकंना जे महेशकं बाड़ि सँ केरा घौड़ चोरा कंऽ कंाटि अनने रहै आ सभ मिलि कंऽ नहरिकं कंछेड़ मे खाधि खुनि कंऽ ओकंरा गाड़ने रही । झलफल अन्हार होईते सभ ओहि ठाम जमा होई आ भरि ईच्छा केरा खाई ।

हम बान्ह दिस नजरि दौड़बैत छी । साँझकं मैलछौंह अऩहार पसरल जा रहल आछ । चरबाहा, घासबाली, गोबर-गोईठा बिछयबाली सभ अपन-अपन घर आपस भऽ रहल आछ । रस्ता कंात मे ठाढ़ हम बितल समय के अपन मुट्‌ठी मे बंद कंरबाकं अंतहीन प््रायास कंऽ रहल छी । बगल सँ एनहार - गेनहार किंछु अचम्भित सन हमर मुँह देखि आगू बढ़ि जाईत आछ ।

- 'बड़ी कंाल सँ आहाँ के एतऽ ठाढ़ देखि रहल छी। कंतऽ जेबई अपने? '

- ' एहि गाम मे कंतऽ जेबई से तऽ हमरा अपनो नहिं बुझल आछ । बस एतबे टा मोन आछ जे साईत हम कंहियो एहि गामकं वासी रही । बाबूकं नाम तऽ नहिं मोन आछ कंारण हम हुनकंर मुँहों नहिं देखने छलहुँ । हँ हमर कंक्कंा के नाम बुधन छल । '

- 'कंोन बुधन? '

- 'बुधन मंडल । '

- 'तोहर नाम मदना तऽ ने छह ? '
- 'हँ हमर नाम मदन आछ । '

सुनिते ओ आदमी हमरा भरि पाँज कंऽ पकंड़ि लेलकं - ' मदना रौ ! कंतऽ छलैहैं एतेकं बरख धरि ? हमरा सभ के तऽ भेल जे कंतौ मरि-खपि गेलैं । हमरा नहिं चिन्हलैं?हम जीबछा !तोहर लंगोटिया यार !! ' पेᆬर हमरा माथ सँ पैर तकं निघारैत बाजल- 'तों तऽ साहेब भऽ गेलैं हमरा आऊर तऽ गाम मे ओहिना के ओहिना---दुनियाँ-जहानकं फिरेसानी !!! खैर छोड़ ई बात सभ । ई कंह जे एतेकं दिन कंहाँ पतनुकंान लेने छलैहैं ? बुडिबकं कंहाँ के ! अहुना केयो गाम बिसरैत आछ ? ' पेᆬर ओहि ठाम एकंत्र लोकं सभ के हमर परिचय दैत कंहलकै - ' कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ! ई अपन मदना छी ! अरे ! दछिनबाड़ि टोल मे जे बुधन मंडल छल ओकंरे भातिज हम सभ तऽ संगे उठी -बैसी , खाई-खेलाई़़ । ' लोकंकं आन्भग्यता देखैत बाजल - 'अरे ! तों सभ कंी जानऽ गेलही एकंरा बुधन मंडल के मरलो तऽ जमना बीति गेलै़आ ईहो मदना तऽ गोड़ चालीस बरखकं बाद गाम आयल हैत । ' ओ हमरा जनाबऽ लागल- 'तोहर कंक्कंा-कंाकंी दुनू आन्हर भऽ कंऽ मुईलउ अंतकंाल मे केयो एकं घोंट पानि तकं ने देबऽ बला़। संतान तऽ भगवान देबे नहिं केलखिन । डीह पर ओहिना जंगल-झाड़ जनमल़़निपुत्रकं डीह पर केयो किंयैकं जायत ?'

लाठी टेकंने एकंटा वृद्ध भीड़ के चीड़ कंऽ बीच मे आयल । 'कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ?ई बुधन मंडलकं भातीज मदना थीकं जे अहींकं मारिकं डरे महींस छोड़ि कंऽ जे पड़ायल से आई एते बरिख के बाद उपर भेलै । ' जीबछा कंहने रहै ।

'अच्छा ई मदना छी ! एकंदमे बदलि गेल ! कंतऽ छलह हौ एतेकं दिन? कंोना मोन पड़लह गाम -घर एतेकं युगकं बाद? '
हम गुम्मे रहलहुँ ।

'कंक्कंा ई मदना नान्हि टा गलती केलकं जे एकंर महींस आहाँकं खेत चरि गेल ताहि लेल एकंरा चालीस बरखकं वनबास भोगय पड़लैकं आ ई नक्सलबादी अताई सभ जे एहन - एहन पैघ जुलुम कंरैत आछ तकंरा देखऽ बला केयो नहिं ! सत्ये अन्हेर भऽ रहल आछ एहि कंलयुग मे । ' कंहि कंऽ ओ आकंाश दिस तकंलकं । पेᆬर हमर बाँहि पकंड़ि कंऽ कंहलकं - 'चल यार घर पर बैसि कंऽ दुनू दोस्त भरि मन बतियायब । ' लोकंकं हुजूम हमरा पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छल ।

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