भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Wednesday, October 28, 2009
शब्द-विचार 4
पछार बजारब। हम चोरकेँ पकडि़ पछारलहुँ-बजारलहुँ ।
मछार मछारिसँ युक्त करब। खेत मछौरत अछि-मछारि (जलनिरोधमात्रार्थक कल्पित आरि) सँ युक्तल अछि।
गजार पानिमे तृण सड़बाक हेतु हलकर्षण। धानक खेत गजारल-पानिमे तृण सड़बाक हेतु जोतल।
बजार पटकब। जयदेव सत्तू पहलबानकेँ बजारलक-पटकलक।
भजार बटिखाराक ओ तामाकआदिक जाँच। ई सेर भजारल अछि- दोसर सेरसँ ओजनमे जाँचल अछि एहि पथिआक भजार कएल-जाँच कएल, आध मन अटल ।
निड़ार आँखिक अकृत्रिम आस्फा लन। कुकुर आँखिक निड़ारिकेँ-आस्फाधलित कएकेँ मुइल ।
गुड़ार आँखिक कृत्रिम आस्फाकलन। तामसेँ आँखि गुड़ारैत अछि-आस्फाधलित करैत अथ्छख।
बढ़ार संमार्जन। आँगन बढ़ारलक-बाढ़निसँ साफ कएलक।
उढ़ार स्वास्त्रीतक भावसँ परस्त्री केँ लए जाएब। नट मौगीकेँ अछि-अपन रंत्रीक भावेँ लए जाइत अछि।
ततार लस्साइ दए आगिसँ युक्त करब। बेमाए ततारैत अछि-लस्सा दए अग्निसंयुक्त करैत अछि।
सतार शीघ्रतासँ संपादन। हम कार्य सभ सतारल-शीघ्रता संपत्र कएल।
उतार उत्तारण (उपरसँ हेठ करब)। सीकसँ दही उतारलक-हेठ कएलक।
सुतार युक्यादह संपादन कएल लेब। हम अपन काज सुतारलहुँ-युक्याकए संपत्र कए लेल।
बिथार पसारब। नेना हाथ बिथारने अछि-पसारने अछि, मधुर दिऔक।
घेँथार धुसबाक हेतु अतिप्रश्न । अहाँ बड़े घेँ थारैत छिऐक-धुसबाक हेतु बहुत पुछैत छिऐक।
ओदार त्वरचाप्रभृति अत्यकन्ता संलग्नुकेँ खैँचि फराफ करब। घाओक खैँठी ओदारिकेँ-छोड़ाएकेँ-मलहम लगाबी।
सुधार उचित मार्गपर आरूढ़ कराएब। बिगड़ल नेनाकेँ सुधारब-उचित क्रियापर आरूढ़ कराएब असंभव।
उनार फान अधिक होएबाक हेतु आकर्षण। माठा उनारल जाएत-खैचिकेँ अधिक फानक कएल जाएत, तखन पहिरल जाएत।
झमार जोरसँ कम्पित करब। हमरा एक्काि बड़े झमारलक-जोरसँ डोलओलक, तेँ देह दुखाइत अछि। बोतलमे पानि दए झमारू तखन साफ होएत।
समार जोतलकेँ उनटा पुन: जोतब। हरबाक खेत समारैत अछि-जोतल खेतकेँ फेर उनटा जोतैत अछि।
पसार प्रसारण(विस्तृैत करब)। ओछाओन पैध अछि, पाएर पसारिकेँ-प्रसृत कएकेँ सुतू।
ससार बलात् घुसकाएब। वायु उखड़ल अछि, ससारि दिअ-घुसकाए दिअ, अर्थात् अपना जगह पर बैसाए दिअ। पेट ससारू एहिठाम पेट शब्दए उदस्थू वायुमे लाक्षणिकम जानब।
बिसार विस्मपरण कराएब। हमरा बुढ़ारी अवस्थाू बिसारलक-विस्मबरण करओलक।
उसार समाप्तु करब (उत्सारण)। हम नाच तमासा उसारल-समाप्तण कएल।
घोँसार बिसराएब (निन्दाणशब्दण)। हम अहाँकेँ सब बात घोँसारि देब-बिसराए देब (कोपोक्ति)।
निहार तत्पररतापूर्वक देखब। विवाहमे सभलोक कन्या्केँ निहारैत अछि-तत्प्रतासँ देखैत अछि।
खेहार विद्रावण। कुकुर गीदड़केँ खेहारैत अछि-नेँगारैत अछि।
सम्हार बाधासँ हटाए संपादन। हम सभ काज सम्हाारल-बाधासँ बचाओल। हम पिच्छाड़मे खसए लगलहुँ परन्तु सम्हारलहुँ-खसलहुँ नहि।
पहिर परिधान। हम धोती पहिरैत छी-परिहित करैत छी।
निघुर धर नम्र करब। देवदत्त निघुरल चलैत छथि-धर नमाए चलैत छथि।
ठिठुर शैत्य प्रयुक्त हस्तामदिक त्व्चासंकोचरूप विकारलाभ। हाथ ठिठुरि गेल-शीतसँ त्वाचा संकोच प्राप्तु कएलक।
निहुर धर नम्र करब। देवदत्त निहुरल चलैत छथि।–धर नम्र कएने चलैत छथि।
मचोर जोरसँ ऐँठब। हमर हाथ मचोरल गेल-ऐँठल गेल, दुखइत अछि।
हँथोर हँथोरिआ देव (अन्हाँरमे हाथसँ ताकब)। अन्हा र घरमे खाटतर हँथोरू-हँथोरिआ दिअ अर्थात् हाथसँ ताकू तखन लोटा भेटत।
ममोर ऐँचब। वायु पेट ममोरैत अछि-ऐँचैत अछि, अर्थात् व्योथा करबैत अछि।
झरखर सकल पत्रक त्यायग। वसन्तत समय गाछ झरखरैत अछि-सब पात छोड़ैत अछि।
सपहर मालक सापसँ दष्ट होएब। गाए सपहरल अछि-सापक काटल अछि, मतीकेँ अनाउ।
सहिआर 1. चेतब ।
2. ठीक करब। हम पहिनहि सहिआरल-चेतल वा ठीक कएल।
पचकार अधिक तैलादिलेपन। हूराहूरीक (गोक्रीड़ाक) दिन चरबाह देहमे तेल पचकारैत अछि-अधिक लगबैत अछि।
झटकार गमनमे शीघ्रता करब (झटझट डेग उठाएब)। अबेंर भेल अछि, झटकारू-झट-झट डेग उठाउ जे शीघ्र पहुँची।
फटकार लम्फरलम्फाच करब (वाह्मडम्बलर करब)। निन्दाम शब्दव। हुनका बड़ फटकार-अधिक बाह्माडम्बिर।
धिरकार धिक्का र कहि गञ्जन । ओकरा हम धिरकारलैक-धिक्का।रेँ गत्र्जि त कएलैक।
ललकार जोरसँ दबाड़ब। शत्रुकेँ ललकारल-जोरसँ दबाड़ल।
हलकार बहुत मालकेँ एकदिश लए जाएब। मालकेँ लहकारैत अछि-एकट्ठा कए एकदिश लए जाइत अछि।
चुचुकार चुचु शब्दजसँ विश्वोस्तए करब। बड़दकेँ चचुकारि-चुचु शब्दस विश्वरस्तक कए पकडू।
होहकार चोरआदिक उद्देशेँ घोल करब। लोकसब ककरा होहकारैत अछि-ककरा उद्देशेँ घोल करैत अछि ? होहकार भए रहल अछि।
बिहखार छिद्रसँ युक्त करब। तमासा देखबाक हेतु लोकसभ टाट बिहखारलक-छिद्रसँ कएलक।
परचार निरोधसूचना। हम तोहरा परचौरत छिऔक-निरोध करबाक सूचना दैत छिऔक, आब तोहर माल हमर उपद्रव नहि कराए।
बहटार आन दिश लए जाएब। हुनक मोन हम बहटारैत छी-नाना प्रकारक गप्पब कहि दोसरा दिश लए जाइत छी।
परतार प्रतारण। नेनाकेँ परतारब- प्रतारण करब कोनो कठिन नहि।
खटपार दु:खेँ खाटपर शरीरक स्थारपन। जयवीर शोकसँ खटपारने-खाटपर शरीरक स्थातपन कएने छथि।
हिलकोर तरङ्गसँ टारब। समुद्रक तटमे राखल वस्तुनजात हिरकोरल गेल-तरङ्गसँ टारल गेल।
टकटोर अन्धरकारमे पुन:पुन हाथ रोपब। अन्हारर घरमे टकटोरैत-वारंवार हाथ रोपैत बहरएलहुँ।
ढकढोर अनुचितरूपेँ वस्तुरसबक संचालन। ओ नेना वस्तुटजात ढकढोरैत अछि-अनुचित रूपेँ संचालित करैत अछि, ओकरा मना करू।
ल ग्रहण। देवनाथ पुस्त क छथि-ग्रहण करैत छथि। ई पुस्त क हम काशीमे मोल लेल-मूल्यलसँ गृहीत कएल। हम पुस्तछक बेचि लेल एहिठाम ल धातुक ग्रहण अर्थ नहि से अनुप्रयोगप्रकरणमे कहि आएल छी।
गल विलय। मेघसँ खसल पाथर लगेल गलैत अछि-विलीन भए जाइत अछि। जमल रौदमे वा आगिपर गलत-पघिलत।
चल चलन। अहाँ हमरा सङ्ग काशी चल धातु संस्कृमते स्वचस्रूृपेँ गृहीत अछि। एकरासँ तिङ् प्रत्यङय भूतमे अकर्मक धातुवत् अबैत अछि। ओ चललाह। कर्ममे प्रत्यछय होइतहि अछि, अपने गाम चलह जाए।
मल मर्दन। साफ करबाक हेतु नोकर वर्तन एलैत मलैत अछि-मर्दित करैत अछि।
घाल शस्त्रछसँ आहत करब। मारिमे देवसिंह घालि भेल-हाथआसँ आहत भेल।
चाल चालन (संशोधन)। आँटा चानिसँ चालैत अछि-संशोधित करैत अछि।
पाल पालन। माए नेना केँ बहुत कष्टेँ पालैत अछि।
साल काठक भीतर काठ पैसाएब। बरही चौकठि सालैत अछि-छेद कए चौकठिक पासि पैसबैत अछि।
छिल तक्षण (अस्त्र। खसाए काटब)। चरबाह खुरपीसँ घास छिलैत अछि।
मिल 1. आश्ले ष
2. सुश्लिष्टै होएब। भरत रामचन्द्रुसँ बनमे मिललाह-आश्लेाष कएलैन्हि। ‘’ भेटब ’’ अर्थमे मिल धातुक प्रयोग हिन्दीेमे होइत अछि, तेँ हमरा रुपैआ मिलओ ई प्रयोग अशुद्ध थीक। कागजसँ रुपैआ नहि मिलैत अछि-एकविध नहि होइत अछि।
हिल डोलब। भूकम्पलमे सभ हिलए लगैत अछि-डोलए लगैत अछि। बुढ़ारीमे दाँत हिलैत छैक।
खुल गुप्त विषयक प्रकाश। ओ विषय खुलि गेल-गुप्त छल किन्तु आब प्रकाश भए गेल।
पुल परिणामसँ गुलगुल होएब। ई आम धुलत-गुलगुल तखन खएबाक योगय होएत।
झुल आन्दोहलित होएब। गरम समय लोक मचकीपर झुलैत अछि-बसात लगबाक हेतु आन्दोयलित होइत अछि।
फुल विकारसँ मोट होएब। हुनक देह फुलि गेलैन्हि।
बुल टहलब। जयदेव फुल तोड़बाक हेतु भिनसरुक पहर बुलैत छथि-एमहर-ओमहर चलैत छथि।
हुल हठात् गमन। मन्दिरसँ हम बहराए लगलहुँ तावत दर्शकक झुण्डब हुलि देलक-प्रवेश करए लागल, हमरा बहराएब कठिन भए गेल।
ठेल हाथसँ धक्का देब। मेलामे सिड़हीपर यात्रीसभ हमरा ठेललक-हासथसँ धक्का देलक, तेँ खसलहुँ ।
हेल अवगाहन। गङगामे हेलने-अवगाहन कएने धर्म छैक। जलमे हाथसँ खेबि उपर-उपर चलब अवगाहन कहबैत अछि।
ओल हाथक सञ्चालनसँ धान्याञदिकेँ गर्दाक उपर आनब। धानमे गर्दा अधिक अछितेँ कुट्टी लेनिहारिसभ ओलैत अछि-हाथसँ संचालन कए धान गर्दाक उपर अनैत अछि।
खोल बन्धलमुक्त करब (मोचन)। केबाड़ बन्दक अछि, खोलू-उद्धाटन करू। घोड़ाकेँ खोलैत अछि जे चरए।
छोल फलकेँ त्वखचासँ वियुक्त करब। सितुआसँ सजमनि छोलैत अछि-खोँ इचासँ रहित करैत अछि। बिना छोलने सिद्ध नहि होइतैक।
झोल शुष्क चूर्णक वस्त्रोसँ संचालन द्वारा संशोधन। वैद्य औषधक चूण्र झोलैत छथि-वस्त्र सँ संशोधित करैत छथि ।
डोल आन्दोिलन (हिलब)। भूकम्पतमे सभ डोलए लगैत अछि-आन्दोपलित होअए लगैत अछि ।
फोल खोलब (बन्धतमुक्त करब)। घर बन्द अछि, फोलू-खोलू, अर्थात् कबाड़ खोलू।
तौल तराजूप्रभृतिसँ नाप। धान तौतैत अछि। निकतीसँ सोन तौलल, एक भरि भेल।
निकल बहिर्भाव। बतहा एहि ठामसँ निकलल-बहार गेल अर्थात् चल गेल।
बिचल शिराक विचलन (अन्यचथास्थिति)। मोर पड़बाक कारणोँ शिरा बिचलल-जेना रहबाक चाही ताहिसँ अन्यलथा भए गेल।
छछल चिक्कनमे स्खालन। कजरीबाला सिढ़ीपरसँ पाएर छछल-रखलित भेल।
उछल उच्छतलन (हठात् कित्र्चित् ऊर्ध्वभगमन)। वर्षा पड़ैत पोठी माछ पानिमे उछलैत अछि-उपर जाइत अछि।
बदल विनियम (वस्तुअक हेरीफेरी करब)। धानसँ गम्हतरी बदलैत अछि-धान दएकेँ गम्हँरी लैत अछि।
छहल छछलब। कजरीपर पाएर छहलत-छछलत।
टहल विहारर्थ मन्दह-मन्द- चलब। प्रात: काल हम नित्यद टहलैत छी-विहारार्थ मन्दल-मन्द- चलैत छी।
दहल धैर्यत्या ग। संकटमे सबक मन दहलैत अछि-धैर्यक त्यामग करैत अछि। भवदत्त कहुखन नहि दहलताह-अधीर नहि होएताह।
निकाल निष्कालसन। ओहि नोकरकेँ हम निकालल-निष्काकशित कएल।
उगिल उद्गिरण (मुहसँ फेँकब)। कुसिआरक रस खाए सिठ्ठी उगिलैत अछि-मुहसँ फेँकैत अछि।
पघिल घनीभावक त्यामग। घीउ जमल अछि, रौदमे पघिलत-द्रवीभूत होएत।
उझिल पात्रास्थित धान्याफदिक अध:पातन। बोरासँ धान उझिल-नीचाँ खसा1 पात्रकेँ उनटाए धान्याझदि खसाएब उझिलब थीक।
धकेल धक्का दए ठेलब। मेलामे लोक धकेलल जाइत अछि- धक्काेसँ ठेलल जाइत अछि।
कस 1. कसौटीमे जाचक हेतु घर्षण।
2. अश्लीथ बन्धरन ।
3. घोड़ाग्रभृतिक सज्जी करण। 1. सोन कसलासँ-कसौटीपर घर्षण कएलासँ जाचल जाइत।
2. बोरामे धान कसल अछि-अश्लणथ बद्ध अछि।
3. घोड़ा कसल अछि-सुसज्जित अछि।
खस स्खधलन (पतन)। घोड़ासँ सवार खसल। बिहारिमे घर खसल-पतित भेल।
गस सक्कत करब। मालामे फूल गसल अछि-निविड़ संबद्ध अछि।
घँस घर्षण। चानन घँसैत छी-रगड़ैत छी।
धस नीच होएब। नव भरल भूमि वर्षा भेलापर धसैत अछि-नीच भए जाइत अछि।
बस निवास। लोक उच्च भूमिपर बसैत अछि-निवास करैत अछि।
भस 1. जलमे पतित होएब।
2. तृणधिक्या दिसँ हीन होएब। निर्माल पानि भसल, हमहि जाए भसाओल।
हँस हास्य।। भवदेव हँसैत छथि-हास्यमयुक्तब होइत छथि।
पिस पेषण। सरबक हेतु धीन पिसैत अछि।
झुस भयोत्पातदनपूर्वक द्रव्यमग्रहण। अधर्मी अधिकृत लोकसँ रुपैआ-पैसा झुसैत अछि-भग्र उत्परत्र कराए डरेँ देल रुपैआ लैत अछि।
ठुस बलात् प्रवेश कराएब। मुसक बिहरिमे गोबरमाटि ठुसैत अछि-बलात् प्रविष्टो करैत अछि।
दुस निन्दाप। ओ हमरा दुसलैन्हि-हमर निन्दा् कएलैन्हि।
धुस गञ्जन। अटपटांग बजनिहार सभामे धुसल जाइत छथि-गत्र्जि त होइत छथि।
रुस रुष्टछ होएब। ओ नेना रुसल अछि-रुष्टि भेल अछि, मधुरसँ ओकरा बौँ सू ।
हुस 1. लक्ष्य मे असंबद्ध होएब। 2. अवसराभावसँ अलब्धअ होएब। 1. मधुकरबा पड़ाएल जाइत चोरकेँ झटहा मारलक परन्तुब झटहा हूसि गेलैक-चोरपर नहि गेलैक।
2.हम पछाति अएलहुँ तेँ भोज हुसल-अवसराभावसँ भोज अलब्धो भेल अर्थात् नहि खाए सकलहुँ।
ठेस चलबाक काल लोष्ठा दिमे पाएर आहत होएब। 1. पाएर पजेबामे ठेसल-आहत भेल।
2. हम ठेसलहुँ-हमर पाएर पजेबामे लगलासँ हम आहत भेलहुँ।
ढेँस मालक उकासी करब। बड़द ढेँसैत अछि-उकासी करैत अछि। यद्यपि उकासी करब मालमे नहि बाजल जाइत अछि तथापित मनुष्यलकेँ उकासीमे शब्द होइत छैक जाहि हेतुक ताही हेतुक मालहुँकेँ शब्दत होइत छैक से टैँसब कहबैत अछि।
नेस दीपक ज्वाकलन। दीप नेसैत अथ्छ -प्रज्वहलित करैत अछि।
पेस पैसाएब। बाती बतरखमे पेसैत अछि-पैसबैत अछि।
भेँस देहमे अस्त्र क भोँकब। भाला देहमे भेँ सलकैक-भोकलकैक।
रेस फुटल द्रव्यदक मरम्मपति करब। फुटल लोटा रेसलापर निचू होएत।
लेस दीपक ज्वा लन। दीप लेसैत अछि-नेसैत अछि।
पोस पोषण। गाए पोसबाक चाही, पक्षी नहि पोसी।
झौँस झरकाएब। तेलक अभावसँ आइ तरकारी झौँसेल अछि-झरकले अछि।
बौँस रुसलक आश्वा सन। नेना रुसल अछि, ओकरा मधुरसँ बौँसू-प्रसत्र करू।
बकस अभयदान। हम विशेष अपराधी छलहुँ परञ्च मालिक बकसि देलैन्हि-अभय देलैन्हि।
सकस अवकाशून्यि होएब। कोनो दिन रेलगाड़ीमे लोक सकसल रहैत अछि-अवकाशशून्यस भेल रहैत अछि।
उकस हटब। उकसिकेँ बैसू-कित्र्ति् घुसकि बैसू। उकस-पाकस करैत अछि।
हँपस अनुचित अधिक लेब। कनिएँ लेअए कहबैन्हि तँ हँप (फ) सताह-अधिक लए लेताह।
दमस मेघादिक ध्वकनि। मेध दमसैत अछि-शब्दह करैत अछि।
समस कित्र्ति् सार्द्र होएब। नुआ समसल अछि-कित्र्चित् आर्द्र अछि।
परस परिवेषण। न्योेतहारीलोकनि बैसलाह, आब परसू-परिवेषण करू।
निरस असाध्यणताग्रयुक्त त्यािग। ओहि रोगीकेँ वैद्य निरसलैन्हि-असाध्यगता बझि छोडि़ देलैन्हि।
जँघास अधिक काल जाएब-आएबसँ परिच्छित्र करब। ई रास्ताि हमरा जँघासल अछि-अधिक गतायातसँ अछि।
अख्यातस तर्क-स्मररण। हमरा अख्याछस नहि अछि-स्मअरण नहि अछि जे हम कतेक रुपैआ लेल।
बारेस वर्षण । मेघ बरिसैत अछि-वर्षा करैत अछि।
बिहुँस 1. ईषद्धास ।
2. विदीर्ण होएब। 1. ओ आनन्द सँ बिहुँसैत छथि-मन्दन-मन्द. हँसैत छथि ।
2. जगह बिहुँसि गेल अछि-कित्र्चित् विदीर्ण भए गेल अछि।
उधेस यथावत् राखलकेँ अयथावत् करब। नारक टाल झुकि गेल अछि, ओकरा उधेसिकेँ-उजारिकेँ ठीक करू। नेना वस्तुकजात उधेसलक-एमहर-ओमहर कएलक।
घटोस घटघट कए अधिक जल पीअब। अधिक पिआसल लोक पानि घटोसैत अछि-घट
2. कए पीबैत अछि। ई निन्दाह शब्दर थीक।
ढकोस ,, ,, ,, ,,
कह कथन। अहाँ की कहल ? हम कहलहुँ जे अहाँ जाउ।
ढह उञ्च दृढ़ वस्तुप (भित्त्यादि) क पतन। भीत ढहल-खसल। हुनक गौरव ढहलैन्हि इत्याुदि प्रयोग नाशदि अर्थमे लाक्षणिक जानब।
बह 1. बसातक चलब।
2. प्रवाह।
3. गाड़ी आदिमे वृषभादिक चलब। 1. बसात बहैत अछि, तेँ ठंढा समय अछि।
2. धारमे जल बहैत अछि। घाऔ बहल। पीजु बहैत अछि।
3. बड़द बहैत अछि।
मह मथन। दूध महैत अछि, जे नेनु बहार हो।
रह स्थिति। एहिठाम हम रहब-संस्कृ त स्था स्याजमि।
लह 1. एक दिस नीच होएब। 2. व्यािपारक साफल्य । 1. घर लहल अछि-यत्कित्र्चित् भागमे नीच भए गेल अछि।
2. ई उद्योग हमरा लहल-सफल भेल।
सह 1. भोलननिवृत्ति ।
2. सहन। 1. हम एकादशीकेँ सहैत छी-भोजन नहि करैत छी।
2. ई अपराध हम सहलहुँ-सह्म कएलहुँ।
चाह इच्छाँ। अहाँ की चाहैत छी-कोन वस्तुहक इच्छाक करैत छी ?
डाह जारब, भस्मीमकरण। मत्रूलालक घर चोर डाहलकैन्हि-भस्म कएलकैन्हि
ढाह उञ्चक क्रमिक भङ्ग करब। देबाल ढाहैत छी-तोड़ैत छी।
थाह तलक स्पार्श करब, अस्पृुश्यभ तलसँ । पोखरि थाहल, दश हाथ पानि भेल। ई पोखरि अथाह अछि-बिना डुबने अस्पृ श्य तक अछि।
बाह पशुस्त्री क पुंपशुसंबन्धि। पाड़ी बाहल-पाड़ासँ संगत भेल।
लाह लाहसँ जोड़ब। फुटल लहठी लाहैत अछि-आगि लगाए संयुक्तठ करैत अछि।
साह कित्र्चित् घुसकाएब। खाटकेँ उत्तर साहू, तखन दच्छिन दिस जगह फएल होएत।
बिह रोपल धानकेँ बीच-बीचमे फुटाएब। गृहस्थ। फुटबासँ पूर्वहिँ बिहैत अछि-फुटबैत अछि।
कुह क्लेैश देब। अहाँ लोककेँ बड़े कुहैत छिऐक-क्ले-श दैत छिऐक।
गुह सटाएब। मालाक फूल गुहैत छी-चुटकीसँ सटबैत छी।
दुह दोहन, चुअकीसँ खैँचि-खैँचि भीतरक वस्तुु बहार करब। गाए दुहैत अछि। पटिआक तानी दुहैत छी।
खेह जनौक सोटब। ई जनौ खेहल नहि अछि-सोटल नहि अछि।
जोह अन्वे षण। लोक अपन प्रियवस्तुआ जोहैत अछि-ओकर अन्वे्षण करैत अछि।
सोह फलकेँ त्व्चारहित करब। केरा सोहू-खोचासँ वियुक्ति करू।
चिन्हस चिन्हससँ जानब। हम रत्नह चिन्है त छी। हम गङ्गधर शास्त्री केँ चिन्हैुत छलिऐन्हि।
बिन्ह् कीटक दंशन। बिरनी बिन्हिलक-दंशन कएलक।
औन्ही अधोमुख करब। तसला औन्हिकेँ-अधोमुख राखू।
उगह उद्वहन। भरिआ भार उगहैत अछि-कान्हखपर राखि अन्यउत्र लए जाइत अछि। गदहा ऊस उगहैत अछि।
निबह निर्वाह। ततबा अत्र भेल जे भरिवर्ष निबहब-निर्वाह करब।
उड़ाह 1. नवीन मृद्धाण्डिकेँ कार्यमे लगाएब।
2. कूपादिक उद्धार। माटिक भाण्ड। तौला उड़ाहल-पाकमे लगाओल।
निबाह संपादन। हमर काज भगवान निबाहताह-संपादित करताह।
सराह उत्तहमतया निश्चित करब। हम कार्य करएबामे जयदेवकेँ सराहैत छी-योग्यजतया निश्चित करैत छी-योग्यरतया निश्चित करैत छी। ई धातु प्राय: हिन्दीिसँ आएल अछि।
ओराह अशुष्क सत्वएच अत्रक साक्षात् आगिमे पाक। बदाम ओराहू-काँच छिमडि़ लागल आगिमे पकाउ। ओरहा खएबामे नीक होइत अछि।
उसाह कनेक उपरकेँ साहब। चार उसाहू, तखन बरी पर चढ़त।
बेसाह नित्यस खाए अत्राक क्रयण। हमरा बेसाह लागल अछि-नित्य़ अत्रक कीनब चलैत अछि हम चाउर बेसाहैत छी1 अहाँ रोग बेसाहि आनल इत्याादि लाक्षणिक जानब।
परिह पहिरब (परिधान)। नव धोती परिहैत अछि-पहिरैत अछि।
सनोह मालकेँ कतबा दूध होइत अदि तकर जाँच । महीसिक दूध सनोहैत छी-कतबा दूध होइत छैक से नपैत छी, महीसि मोल लेबाक अछि।
सिसोह सुड़रब। नेना धान सिसोहैत अछि-सुड़रैत अछि।
तु 1. फलक रोगसँ खसब
2. नक्षत्रक प्रवेशदिन बुन्दअ-मात्रक पातन। 1. विपाकसँ आमक टकोरा तुऔत अछि-खसैत अछि।
2. हस्त नक्षत्र तुअल-प्रथम दिन बुन्द पात कएलक।
टो फलकेँ पक्वनतादिक जाँचक हेतु दबाएब। कटहर टोऐत छी-हाथसँ दबैत छी जे पाकल अछि की नहि।
धो प्रक्षालन (जलसँ साफ करब। धोती धोऐत अछि-जलसँ निर्मल करैत अछि।
बो बाओग करब। धान बोआल-बाओग कएल।
फो बन्धबमुक्त करब। ताला फोअल-बन्धरमुक्तै कएल।
हो उत्प त्ति। 1. व्यािपारसँ लोक शीघ्र धनी होइत अछि। 2. कार्य होइत अछि (कार्य प्रवर्तते)।
जक तराउपरी ढेरी करब। अहाँ मडुआ काटि जाकब-ढेरी करब। हम जाकल, जकलासँ गुमैत छैक तखन मिड़बामे सुकरता होइछ। लकड़ी सभ जाकल अछि-तराउपरी कए राखल अछि।
तक 1. निरीक्षण ।
2. अन्वे्षण। 1. हम अहाँक मुह तकैत छी।
2. वस्तुा हराएल अछि, ओकरा ताकू-अन्वे षण करू।
झँक भात सिद्ध भेलापर तत्काुल पात्रसँ नीचामे ढेरी करब। एक खखड़हरक भात झाँकल-पात्रसँ बहार कए नीचामे राखल। दोसराक आब झाँकब।
टँक दूर-दूर पर सीअब। दरजी पहिने अंगा टँकैत अछि-दूर
2. सीबैत अछि, पश्चाहत् कलसँ सिबैत अछि।
थक श्रान्ति होएब। चलैत 2. हम थकलहुँ-श्रान्तम भेलहुँ। अहाँकेँ थाकनि नहि होइत अछि।
पक 1. रोटीक सिद्ध होएब।
2. फलक साक्षात् अग्निमे पाक।
3. परिणत होएब।
4. शरीरावयक अग्नितापज विकार। 1. सोहारी पकैत अछि-अग्नितापसँ बनैत अछि।
2. सानाक हेतु भाँटा पकैत अछि।
3. आम पाकल-परिणात भेल।
4. हमर हाथ पाकल-अग्निसँ तप्त भेल।
फँक 1. सूँड़ाक खाएब।
2. भूजाप्रभृति मुहमे फेँकि-फेँकि खाएब। 1. सूड़ा चाउस फँकलक।
2. हम लाबा फाँकल।
हँक अश्वा दिक प्रेरण। बड़द हाँकि-प्रेरित कए लए जो। तोँ माल सभ हाँक।
चख चीखब (जाँचक हेतु खाएब)। मधुर चाखू जे केहन अछि।
मख लगबा योग्यज वस्तुखक संपर्क। ओमहर देने थाल माखब-थालसँ युक्ता होएब।
रख 1. स्थाथपन ।
2. रक्षण। 1. अहाँ पुरान धान रखैत छी-स्थापित करैत छी, आब हमहु राखब।
2. हमर गाछी देबना रखैत अछि-रक्षा करैत अछि। ओ सदाक हेतु हमर रखबार- रक्षक अछि।
जग जागरण। हम एक बजे रातिमे जगलहुँ, आन केओ जागल, नहि छल।
तग तुराइप्रभृतिक तूरक अविघटनार्थ सीअब। दरजी तुराइ तगैत अछि-दूर 2.केँ सीबैत अछि।
धँग पाएरसँ आक्रमण। पसरल नुआकेँ नेना धँगैत अछि-पाएरसँ आक्रान्ता करैत अछि, लए आउ।
धङ ,, ,, नीपल खरिहान मालसभ धङैत अछि।
पग सिरकासँ युक्त करब। मखान पगैत अछि-सिरकासँ युक्त करैत अछि।
पँग सभ ठारि काटब (ठारि टुटु करब)। सीसोक ठारि पँगैत अछि वा पङैत अछि-कटैत अछि। सीसोसभ पाँगल वा पाङल गेल-ठारि काटि ठुट्ठु कएल गेल।
पङ ,, ,,
लग 1. युक्त होएब।
2. निसा करब।
3. पन्हाकएब।
4. प्रवृत्ति।
5. जरब ।
6. व्य य।
7. सुश्लिष्ट। होएब। 8. उत्पलत्ति ।
9. अपेक्षित होएब।
10. इष्ट होएब, इत्या।दि अनेक अर्थ। 1. पाएरमे थाल लागल-संयुक्तर भेल एवं दाग लागल।
2. हमरा भाँग लागल अछि-निसा कएने अछि। हफीमक लागि-निसा।
3. गाए लगैत अछि-पन्हांइत अछि। आइ महीँसि नहि लागल।
4. हम काजमे लागल छी-प्रवृत्त छी।
5. पानि कम पड़बाक कारणेँ दालि लागि गेल-जरि गेल।
6. तीर्थयात्रामे हजार रुपैया लागल-खर्च भेल।
7. हमरा श्लोरकक अर्थ नहि लगैत अछि-सुश्लिष्टर नहि होएत।
8. हमरा भूख लागल अछि-उत्पित्र अछि। खएलाक उत्तर पिआस लागत-उत्प त्र होएत।
9. एहिमे बहुत यत्न् लागल-अपेक्षित भेल।
10. अहाँक आँखि लाल लगैत अछि-दृष्ट होइछ। ई धातु पदषविशेषसमभिव्याधहारवशात् ओ प्रकरणवशात् आनो अनेक अर्थक बोधक होइत अछि-शक्तिसँ वा लक्षणासँ। यथा, आँखि लागल-कित्र्चित् निद्रा भए गेल वा असंभाव्यँ अतिशय बुझल। हमरा किछु खेत हाथ लागल-प्राप्तम भेल। हमर लागल अछि-कार्यमे व्यापृत अछि। चक्कूल लागल-कटलक।
टँग निराधार राखब। सुखएबाक हेतु गाछमे धोती अछि। करीन टाडि़.केँ राखू।
टँङ ,,
धँग पाएरसँ आक्रमण। साग बाओग अछि, धाँगी जनु। नुआ सुखाइत पसरल अछि, ओकरा माल धाङए नहि।
धङ ,,
पँग 1. शाखाक छेदन।
2. छित्रशाखीकरण। सीसोक ठारि पाँगल वा पाङल-काटल। सीसोगाछ पाँगाल वा पाङल-छित्रशाख कएल।
पङ ,, ,,
भँग 1. खण्डा करब।
2. सीकक निर्माण। 1. सुपारी भँगैत अछि वा भङैत अछि-खण्डित करैत अछि।
2. सीक भँगैत अछि वा भङैत अछि-बनबैत अछि।
भङ ,,
मँग याचन। प्रजा सम्राटसँ स्वछराज्यछ मँगैत अछि वा मङैत अछि-स्व राज्याक याचना करैत अछि
मङ ,,
लँघ लङूघन। हनुमान् सम्रद्र लँघलैन्हि-समुद्रक लंघन कएलैन्हि।
अँच इन्धननयोग। तेहड़ामे जारन आँचू-युक्तम करू।
जच परीक्षण सोन कसौटीमे जाचल जाइत अछि-परीक्षित होइत अछि।
नच नर्तन। उत्सनबमे नटुआ नचैत अछि।
पच त्वसचाक भीतर सूचीसँ प्रवेशन। पचनिआ नेनाकेँ पचैत अछि।
कछ हाथक निचला भागसँ घृतादिक लेब। जमल घृत काछैत छथि-हाथक निचला भाग लगाए उद्धृत करैत छथि।
चँछ तीक्ष्णए वस्तुिक आघर्षणसँ त्व्चाक विघटन। काँटसँ देह चाँछल गेल, शोणितो बहल।
बछ अनेक प्रकारसँ एक प्रकारक वस्तु क पृथक्करण। बीआक हेतु बोझसँ मालभोग धान बाछू-पृथक् करू।
बज व्यूक्त वा अव्याक्त वचन। मनुष्ये अपना भाषामे बजैत अछि-व्यषक्तनवर्णक उच्चा रण करैत अछि। बाजा बजैत अछि-अव्यतक्त ध्व नि करैत अछि।
भज अनेक न्यू नमूल्यत ग्रहणपूर्वक देल जाएब। रुपैआ भजल वा भँजल-न्यू नमूल्यणक बहुद्रव्य ग्रहण-पूर्वक देल गेल।
भँज ,, ,,
मज संघर्षणसँ निर्मलीकरण। लोटा माजू जे साफ हो।
सज सुसज्जित करब। मन्दिर उत्सबवदिनमे सजल रहैत अछि-सुसज्जित रहैत अछि।
बझ मध्य्मे फँसब। जालमे पक्षी बझल-जालक मध्यछमे फँसल।
कट 1. छेदन ।
2. यापन। जारनक हेतु गाछ कटैत अछि-गाछक छेदन करैत अछि।
चट अवलेहन। कुकुर माँड़ चटैत अछि। बहार कए जीहसँ ग्रहण चाटब भेल।
छँट उखरिमे मुसरक चोटसँ साफ करब। अँकड़ा चाउर साफ करबाक हेतु छँटैत अछि-उखरिमे मुसरसँ आहत करैत अछि। छाँटल चाउर छँट्टा कहाओल जाइत अछि।
झँट 1. सीसमे लागल अत्रक उच्च. वस्तुापर आधातसँ पृथक्करण ।
2. बाढ़निआदिसँ आधात। 1. धान झँटैत अछि-आघातसँ पृथक् करैत अछि।
2. झट्टासँ घर छारल। बाढ़निसँ भेम्ह केँ झाँटू-आहत करू।
डँट क्रोधसँ उच्चह स्वररेँ मना करब। व्याचप्त होएब। नेनाकेँ डाँटू-उच्चव स्वमरेँ मना करू जे फेर एहन कार्य नहि करए।
हमर खेत पटैत अछि-जलसँ व्या प्तर होइत अछि, अहाँक पाटल।
फट विदीर्ण होएब। धोती बीचसँ फाडू-विदीर्ण करू। हमर अङ्ग फाटल।
फँट विभाग। चारि गोटाक बोनि एकट्ठा छैक तकरा फाँटि दिऔक-विभक्त कए दिऔक।
बँट 1. वितरण। 2. विभाग। 1. दीन दुखीकेँ अत्र बटबारा-वितरण करैतछथि ।
2. हमरा दुहू भाइक वस्तुाजात बाँटि दितहुँ-विभक्तभ कए दितहुँ से नीक होइत।
सट संयुक्त करब। स्त्रीतगण कपारमे टिकुली सटैत अछि। गोसउनिक कोठामे आरत साटू।
ठठ ठाठक निर्माण। हम चार ठाठल-निर्मित कएल।
सठ पात्रमे ओरिआएकेँ राखब। सनेस साँठू-ओरिआएकेँ पात्रमे राखू।
सँठ ,, ,, ,,
फँड़ नामानामी विभाग। आम फाँड़ल-दू खण्डआ बनाओल। एकर फाँडा अँचार बनाएब।
भँड़ रहस्य क प्रकाश कए देब। हुनका कहबैन्हि तँ सभ बात भाँडि़ देताह-प्रकाश कए देताह ।
जँत दाबब। थाकल छी, पाएर जाँतू-दबाउ।
दँत दाँतसँ युक्त होएब। ई बाछा दाँतल-दाँतसँ युक्तह भेल।
गथ ग्रन्थ न। भगवानक हेतु फुलक माला गथेत छी वा गँथैत छी। स्त्रीलगण हारी गाँथि पहिरैत अछि।
गँथ ,,
नथ बन्धैनार्थ नासिकाकेँ छिद्रयुक्त करब। ई बड़द नाथल अछि-नाकमे छिद्रसूं युक्तद अछि।
पथ 1. एकाग्र राखब।
2. चिपड़ीक निर्माण। 1. कान पाथि-एकाग्र कए सुनैत छी जे कोन शब्द अबैत अछि।
2. चिपड़ी पथैत अछि-बनबैत अछि।
पद पर्दन (गुदरव)। दुष्ट लोक नहि किछु कए सकए तेँ सिरामे पादिओ दिअए।
लद भरती करब। गाड़ी लादल अछि-भरती अछि। धान लदैत छी-भरती करैत छी।
लध बिनबाक वस्तु-क आरम्भर (तानी दुरुस्त करब)। पटिआ लधैत अछि-तानी दुरुस्त) करैत अछि, अर्थात् पटिआ आरम्भछ करैत अछि।
सध सोझ होएबाक हेतु दाबिकेँ राखब। टेढ़ बाँस सधैत अछि-दाबिकेँ रखैत अछि जे सोझ हो। ठेँगा साधि केँ सोझ कएल।
अन आनयन। भानसक हेतु जारन अनैत अछि-लबैत अछि। हम आगि आनल।
कन क्रन्दमन। खएबालए नेना कनैत अछि-क्रन्दैन करैत अछि।
छन 1. वस्त्रािदिसँ परिशोधन । 2. दुहू पाएर एकट्ठा कए बान्ह ब। गुरु बनाबी जानि पानि पीबी छानि-वस्त्रनसँ संशोधित कए।
जन बुझब। हम शास्त्र। जनैत छी-हमरा शास्त्र क ज्ञान अछि।
ठन प्रारम्भ करब। हम घरहठ ठानल-प्रारम्भ कएल।
तन आस्फाहलन। चनबा नमरल अछि,
ओकरा छी-आस्फानलित करैत छी।
फन लङूघन। हनुमान समुद्र फानि गेलाह-लडििघत कए गेलाह।
सन मेलन। भात दालिमे सानिकेँ खाउ-दालिमे मिलाए खाउ।
कप कम्पएन। अहाँक देह जाड़ेँ कपैत अछि-कम्पित होइत अछि।
छप 1. मुद्रित होएब।
2. मुद्रित करब। 1. छापाखानामे पुस्त क छपैत अछि-मुद्रित होइत अछि।
2. यन्त्रााधिकृत व्यकक्ति पुस्तकक छपैत अछि-मुद्रित करैत अछि।
झँप आवरण। कुलीना स्त्री देह झँपने रहैत अछि-आवृत कएने रहैत अछि। भदबारि मास सूर्य मेघसँ झाँ पल जाइत अछि।
तप आगिक सेवा। चैतमे आगि तापब गुणद थीक
थप 1. स्थापसकसँ युक्त करब। 2. भार देब। 1. नुआ थपैत अछि-स्था सक (थापा) सँ युक्त करैत अछि।
2. ई कार्य हम अहाँ पर थापल-एहि कार्यक भार अहाँकेँ देल।
नप प्रमाण। हाथसँ नुआ, नापल, दश हाथ भेल।
हँक मारबाक चेष्टा करब (मालक)। ई बड़द हँफैत अछि-मारकाब चेष्टममात्र करैत अछि, किन्तुर मारत नहि।
दब उपरसँ आक्रमण। हमर पाएर हाथसँ दबैत अछि-जँतैत अछि। अतेक दाबत ततेक निक।
लब आनब। वस्तुअ लबैत अछि-अनैत अछि।
तम कोदारिसँ उत्खुनन। खेत तमैत अछि-कोदारिसँ माटि ठीक करैत अछि।
चँस हरसँ क्षेत्रक प्रथम विदारण। खेत चाँसल-प्रथम कठा रोपित कएल।
डँस डाँस प्रभृतिक बीन्ह ब। डाँस डँसलक-कटलक।
फस पाशमे पड़ब। पक्षी व्या।धाक फाँसमे फसैत अछि वा फँसैत अछि-निर्गमनरहित होइत अछि।
फँस ,, ,, ,,
बस वासित करब। पान कर्पूरसँ बासल अछि-वासित अछि, अर्थात् कर्पूरक सौरभसँ सुगन्धित अछि।
बन्हा बन्हान। खेत पटबालए लोक सभ धार बन्है्त अछि-बद्ध करैत अछि। हम घर बान्ह ल इत्याटदि प्रयोग बनाएब अर्थमे लाक्षणिक जानब ।
रन्हष रन्धषन। भात रन्हैजतछी- सिद्ध करैत छी। तीमनो रान्हनब।
बिक बिक्री होएब। बजारमे वस्तुह बिकाइत अछि-बिक्री होइत अथ्छ्। बिकाएत, बिकाएल।
नुक प्रच्छथत्र होएब। देवतालोकनि महिषासुरक भयसँ नुकाएल छलाह-प्रच्छनत्र छलाह।
ओक हदमदाएब (वान्तिशङकाकुल होएब)। जी ओकाइत अछि-वमनशङ्कायुक्तत अछि।
चौँक अकस्माइद्धयसँ कम्पित होएब। नेना बालाग्रहमे चौँकैत अछि-अकस्माअत् भयसँ कम्पित होइत अछि।
मुसुक ईषद्धास। आनन्दासँ जयलाल मुसुकाइत छथि-अतिमन्द। हँसैत छथि।
अकचक विस्म्यसँ एमहर-ओमहर ताकब। चञ्चल लोक अकचकाइत अछि-विस्म यसँ एमहर-ओमहर तकैत अछि।
चकचक चाकचक्योसँ चमकब। हीरकमणि चकचकाइत अछि-2 करैत अछि, अर्थात् विकीर्णकिरणक होइतअछि।
छकछक देह कित्र्चित् उष्णथ होएब। हमरा ज्वररमे देह छकछकाइत अछि-कित्र्चित् उष्णउ होइत अछि।
झकझक स्वकच्छव देखि पड़ब। समुद्रक पानि झकझकाइत अछि-स्वदच्छक पड़ैत अछि।
टकटक अतिदौर्बल्यिप्राप्ति। ई नेना दु: खसँ टकटकाइत अछि-कार्श्यदभाक् अछि।
ठकठक शीतवेदनासँ दाँतेँ ठकठक शब्दे करब। माघ मास प्रात: स्नाान कएने कतेक लोक ठकठकाइत अछि-दाँतसँ ठकठक शब्दठ करैत अछि।
पकपक क्रोधसँ अस्फु टवचन होएब। जयदेव क्रोधेँ पकपकाइत छथि-अस्फु टवचन होइत छथि।
फकफक भूखसँ व्याधकुल होएब। बटोही भूखेँ फकफकाइत अछि-व्याुकुल होइत अछि।
भकभक कटुसंसर्गजन्यक पीड़ासँ युक्त होएब। आँखिमे मेरिचाइ लागल तेँ आँखि भककाइत अछि-कटु वस्तुभ संसर्ग जन्यह वेदनविशेषसँ युक्तग होइत अछि।
मकमक निवृत्ति। आब उत्सब मकमकाएल-किछु कम्प भेल।
लकलक अतिकृश होएब। दु:खवशात् अहाँक देह-अतिकृश भए गेल अछि।
सकसक समन्ताित् संयोगसँ जनवकाश होएब। मेलामे लोक सकसकाइत अछि-चारू दिशसँ उत्पीसड़नवशात् अनवकाश होइत अछि।
हकहक वुभुक्षाजन्य व्या कुलीभाव। देवदत्त दिनमे नहि खएलैन्हि तेँ हकहकाइत छथि-भुखेँ व्याककुल होइत छथि।
टिकटिक कित्र्चित् पूर्वावस्थाखप्राप्ति। ई दु:खसँ अतिकृश भए गेल छलाह, आब टिकटिकएलाह-कित्र्ति् पूर्वावस्धापपत्र भेलाह।
लुकझुक कित्र्चित् पूर्वावस्था प्राप्ति। आब सूर्य लुकझुकाइत छथि। बाढि़मे धान डूबि गेल, ओकर पात लुकझुक करैत अछि-यत्कित्र्चित् दृश्य होइत अछि।
धुकधुक 1. तेजक न्यू.नाधिकभावप्राप्ति ।
2. वायुसँ सतत शिरामे संचालन। शिराक वायुसँ छाती धुकधुकाइत रहैत अछि। आगि
हुकहुक प्राणवायुक अल्पत संबन्ध । आब ओ हुकहुकाइत अछि-प्राणवायुक अल्प संयोगवान् अछि।
ख 1. भक्षण ।
2. भाविसमभिव्यअहारमे प्राप्ति। फल खाइत अछि। खाएत। खएलक।
खख खखड़ीसँ युक्त होएब। रातिमे वर्षा होएबाक कारण धान खखाएल-खखड़ीसँ युक्त भेल।
धख सशडिल.कत होएब। ई अहाँकेँ कहबामे धखाइत छथि-सशङिक होइत छथि।
दुख व्यिथा। माथ दुखइत अछि-शुष्कि होइत अछि। देहो दुखाइत अछि।
सुख शुष्कीुभाव। रौदमे जारन सुखाइत अछि-शुष्क होइत अछि।
तराख कित्र्चित् शुष्की भाव। जारन तरखाएल अछि-कित्र्चित् सुखाएल अछि।
दगदग तारातम्य मे पड़ब। हम दश हाथ फनबामे दगमगाइत छी-तारतम्यामे पड़ैत छी। प्रौढ़ लोककेँ कोनो कार्यमे दगमगी-तारतम्ये नहि होइत छैक।
बगबग पीलूक संचलन। ई आक सडि़ गेल, एहिमे पीलु बगबगाइत अछि-संचलित होइत अछि।
डगमग नावक डोलब। एकठा नाओ डगमगाइत अछि-डोलमाल करैत अछि।
अघ मुहुर्भोजिनजन्यत वाञ्छानिवृत्ति । हम अघाएल छी-बहुत भोजन कएलासँ भोजनवाञ्छासँ रहित छी। अघाएल बककेँ पोठी तीत।
कचकच कुत्सित क्रोध करब। ई नेना टोकने कचकचाइत अछि-तमसाइत अछि।
पचपच मुहक आभ्य न्तयरविकारसम्बसन्धब। हमर मुह पचपचाइत अछि-आभ्यमन्तबर विकासँ युक्त होइत अछि।
लचलच लचकब। बाँसक फट्टाक बान्हअ लोक चलबाक काल लचल जाइत अथ्छह-लच 2 करैत अछि, अर्थात् डौलैत अछि। भार लचलचाइत जाइत अछि-लचकैत जाइत अछि।
किचकिच कचकचाएब। ई नेता किचकिचाएत-तमसाएत, तेँ किछु कहिऔक।
कुचकुच कुचकुची-वेदनाविशेषसँ युक्त होएब। कबाछु लगलसँ देह कुचकुचाइत अछि-विलक्षण वेदनासँ होइत अछि। हमरा कुचकुची लागल अछि, भूआ लगबाक कारणेँ वा आने कोनो कारणेँ ।
पनिछ खाद्यवस्तुआक दर्शनस्मँरणसँ जिह्राक पानिसँ युक्त होएब। जीह पनिछाइत अछि-चटनी अँचारक सुगन्धि लगलसँ जलयुक्तह होइत अछि।
कछमछ वेदनासँ उनटब-पलटब। हम ज्वँरसँ कछमछाइत छी-उनटैत-पनटैत छी।
ज गमन। हम गाम जाइत छी। गुरूजी गेलाह । यद्यपि ई धातु सकर्मक थीक तथातिप एकरासँ तिङ्प्रत्यु अकर्मकधातुविहिते अबैत अछि।
लज लज्जाअ। मिथिलाक कुलीन स्त्री पुरुषसँ लजाइत अछि-पुरुषकेँ देखि लाजसँ युक्तल होइत अछि।
निल व्य।थाक परिणाम। ई संम्प्रुति गाछसँ खसल अछि, एकरा चोट काल्हि निजएतैक-परिणत होएतैक।
खौँज कुडि़ऐनीसँ युक्त होएब। हमर देह खौँ जाइत अछि-कुडिऐनीसँ युक्ते होइत अछि।
दूरिज विनष्टह होएब। वस्तुटसभ दरिजाइत अछि-अकर्मक भेल जाइत अछि, ओरिएकेँ राखू।
बजबज साद्रीभाव। ईधर बजबजाइत अछि-बज करैत अछि, अर्थात् सार्द्रतासँ लसलसाइत अछि।
उजबिज। उद्वेग। मन उजबिजाइत अछि-उग्द्विग्नत होइत अछि जे व्यतक्ति सतत लोकसंघर्षमे रहैत अछि औकरा एकान्तिमे राखि देलासँ मन उजबिजाइत छैक।
झझ पसरिकेँ थोड़ पानि चलब। बाहामे कतहु-मतहु उच्चमता रहि जएबाक कारण तत्तत् स्थतलमे पानि झझाइत अछि-थोड़-थोड़ चलैत अछि।
पझ निर्वाण (तेजक शान्ति)। आगि पझाएल-मिझाएल ।
मिझ ,, दीप मिझाएल-बरैत नहि अछि।
खौँझ अधिक कुडि़ऐनीसँ होएब। देह खौँ झाइत अछि-अधिक कुडि़ऐनीसँ आकुल होइत अछि। हमर नीक देखि ओ खौँ झाइत छथि इत्याीदि लाक्षणिक जानब।
टट 1. कोमल वस्तु क तापसँ सक्त् झा होएब।
2. हाथपाएरक वेदनाविशेष। 1. सोहारी टटाएल-सक्कजत भेल।
2. पाएर टटाइत अछि-दुखाड़त अछि। अस्थिगत वेदना टटैनी थीक।
मेट विलुप्त होएब। अति प्राचीनतक कारण एहि पुस्त कमे कतहु 2 अक्षर मेटाएल अछि-विलुम अछि।
लेट गर्दामे ओङूघड़ाएब। बटेर गर्दामे लेटाइत अछि-ओङ्घड़ाइत अछि।
लोट अमनुष्य्क लेटाएब। घोड़ा माटिमे लोटाइत अछि-ओङ्घड़ाइत अछि।
खटखट खटखट शब्दि करब। ककरो खड़ाँम खटखटाइत अछि-खट 2 शब्द करैत अछि, जेना केओ खडाँम चढ़ल आबि रहल अछि। हुनका टोकबैन्हि तँ खटखटाए उठताह इत्याहदि लाक्षणिक जानब।
छटछट स्वाषचाक अभ्यतन्तरमे ग्रन्थिक स्पवर्शत: संचलन। गिलटी छटछटाइत अछि-छुइने सञ्चलित होइत अछि।
खटपट ऐकमत्या भाव। ओहि दुहू गोटामे खटपटाइत छैन्हि-वैमत्यह होइत छैन्हि।
लटपट अयभावद्धाव, यथोचित नहि होएब। आबल्यदसँ चलबाक काल पाएर लटपटाइत अछि-बजबो लटपटाइत अछि-यथोचित नहि होइत अछि।
सुटसुट अपराधसँ सशङ्किोत चेष्टा करब। आब ओ सुटपुटाइत छथि- सशङिकत चेष्टाु करैत छथि।
जड़ जाड़सँ युक्त होएब। जाड़मास विना नुएँ जड़ाइत अछि-जाड़सँ (शैत्यासँ) जड़ाइत अछि।
पड़ पलायन। जाग भेलासँ चोर पड़ाइत अछि-द्रुतगमन करैत अछि।
जुड़ ठंढा होएब। गर्मी मास स्नाअन कएलासँ देह जुड़ाइत अछि-ठण्ढा। होइत अछि। विष्णुतपति नाँगड़ छथि।
नँगड़ स्खलित गमन। रुद्रधरक एक पाएर टुटि गेलैन्हि, तेँ नँगड़इत छथि-गमनमे स्ख लित होइत छथि विष्णुरपति नाँगड़ छथि।
ओँधड़ उलटब-पलटब। शोकेँ माटिमे ओँ घड़ाइत छथि उलट-पलट करैत छथि।
नङड़ स्ख़लित गमन। भवदेव नङड़ाइत छथि-एक पाएरक कज्जी रहबाक कारण स्खटलित गमन करैत छथि।
धड़धड़ हृदयक कम्पान। ज्वयरमे छाती धड़धड़ाइत छैक-कम्पित होइत छैक।
गड़बड़ असंपत्ति। कार्य गड़बड़ाएल-संपत्र नहि भेल।
हड़बड़ 1. अगुताएब।
2. हड़बड़ शब्दड करब। 1. कोनो काजमे हड़बड़ाइ नहि-अगुताइ नहि।
2. घरमे वस्तु हड़बड़ाइत अछि-हड़बड़ शब्द. करैत अछि।
कुड़बुड़ मनहिमन तमसाएब। ओ हमरा पर कुड़बुड़ाइत छथि-मनहिमन तमसाइत छथि।
लेढ़ समस्तन शरीमे पङ्कदिसँ योजन। जेठ मास सुगर खत्तामे लेढ़ाइत अछि-समस्ता देहकेँ पाँकसँ लेभड़बैत अछि।
लोढ़ माटिमे एमहर-ओमहर उनटब-पुनटब। घोड़ा माटिमे लोढ़ाइत अछि-ओढ़नाइत अछि।
सुस्त विश्राम करब। चलैत 2 थकलहुँ तेँ सुस्ताढइत छी-विश्राम करैत छी।
अगुत शीघ्रता करब। ओ अगुताइत अछि-शीघ्रता करैत अछि जे शीघ्र कार्य हो।
ततमत तारम्य् करब। ओ जएबामे ततमताइत अछि-ततमत करैत अछि, अर्थात् जएबामे तारतम्यत करैत अछि।
सथ विश्राम करब। हम तावत् सथाइत छी-विश्राम करैत छी।
बरद बाधाक प्राप्ति। जनसब बराइत अछि-बाधाप्राप्ति करैत अछि, अर्थात् बेकार अछि, तेँ काजक आज्ञा देल जाइक।
गदगद आनन्द सँ गद्गदस्वबर होएब। आनन्द सँ गदगदाइत छथि-गद्गदस्वरक होइत छथि।
लदबद पशुक गर्भभारक्रान्तद होएब। गाए लदबदाएल अछि-गर्भभारक्रान्त् अछि, आब शीध्रे बिआएत।
हदमद ओकाएब (वान्तिपूर्वकरूपाक्रान्तक होएब)। जी हदमदइत अछि-वान्तिक पूर्वरूपसँ युक्तम होइत अछि।
अगध अतिपृप्ति। ओ खाए अगधाएल छथि अतितृप्त छथि।
बन फलपरिपाकक पूर्वावस्थाूप्रप्ति। ई आम बनाएल अछि-परिपाकक पूर्वावस्थाअ पओने अछि।
घिन घृणाविषय होएब। वर्षा भेलासँ कार्य घिनाए गेल-घृणास्पतद भेल । अओ, अहाँ सभ कार्यमे घिनबैत छी।
बोन फलक परिपाकपूर्वरूप प्राप्ति। ई आम बोनाएल अछि-पकबाक पूर्वास्थालपत्र अछि
औन अल्पव अवकाशप्रयुक्त मनक उद्विग्नताप्राप्ति। केबाड़ बन्द कएने हमर मन औनाइत अछि-व्याकुल होइछ।
ओढ़न ओँघड़ाएब। नेनाभूमि पर कनैत ओढ़नाइत अछि, एकरा उठाए लिऔक।
अफन व्या कुलीभाव। हमर मन अफनाइत अछि-व्या कुल होइत अछि।
फफन बाँतर खएबाक प्रयुक्त व्रणक वृद्धि। बाँतर वस्तु खाएब तँ घाओ फफनाएत-बढि़ जाएत
बिसन निद्रावस्था मे बाजब। केओ अधिक काल बिसनाइत अछि-निद्रामे बजैत अछि।
ढहन बिना हेतु एमहर-ओमहर जाएब। ई नेना ढहनाइत अछि-बिना काजेँ एमहर ओमहर करैत अछि।
कनकन 1. मारबाक चेष्टाि करब। 2. व्रणक दुखाएब। 1. बड़द कनकनाइत अछि-मारबाक चेष्टाद करैत अछि।
2. गूर कनकनाइत अछि-वेदनाविशेषसँ युक्त होइत अछि।
खनखन अतिबुभुक्षायुक्त होएब। राति नहि खाएल तेँ हम खनखनाइत छी-अतिबुभुक्षासँ युक्तज छी।
गनगन गनगन शब्दख करब। लोकक बजबासँ मन्दिर गननाइत अछि-गनगन एतादृश अव्यिक्ती शब्दक करैत अछि। ई बात गनगनाए गेल इत्याअदि लाक्षणिक जानब।
छनछन वेदनविशेषसँ युक्त होएब। नोन पड़लासँ घाओ छनछनाइत अछि-वेदनाविशेषसँ युक्तछ होइछ।
तनतन घाबक बहबासँ पूर्वकालिक वेदना। गूर पीजुसँ तनतनाइत अछि-वेदना विशेषसँ युक्तत होइत अछि
अनमन अन्यषमनरक होएब। (विमन होएब)। अहाँ अनमनाएल छी-विमनस्क्व छी।
कनमन क्रोधसँ मारबाक अभिलाषा। ई हमरा पर कनमनाइत अछि-मारबाक चेष्टा करैत अछि।
बिनबिन सहसहाएब। सड़ल आममे पिलुआ बिनबिनाइत अछि-बिनबिन (अनहर-ओमहर सञ्चाल) करैत अछि।
झुनझुन झुनझुनीसँ युक्त होएब। पाएमे एक गरेँ अधिक काल बैसबासँ झुनझुनी भरल अछि (वायुक गतिविशेष)।
बुनबुन भीतरसँ बुत्री (बुद्बुद) छोड़ब वा उपरसँ बिन्दु पात। पोखरिक पानि बुनबुनाइत अछि-बुत्री छोड़ैत अछि, प्राय : बड़का माछ आएल अछि। मेघ बुनबुनाइत अछि-कित्र्चित् 2 बुन्नीद खसबैत अछि।
दप दर्प करब। ई नेना हाथसँ पोथी छिनबालए दपाइत अछि-दर्प करैत अछि।
छपछप पानिक बराबरि होएब। बाढि़मे धान छपछपाएल अछि-पानिक बराबरि अछि।
सबसब त्वबचाक भीतरमे कुडि़ऐनी होएब। हाथ सबसबाइत अछि-भीतरमे कुडि़आइत अछि।
भभ भभ शब्दत करैत खसब। कोठीक मुह खुजि गेल अछि तेँ कोठी भभाइत अछि-भभ एतादृश अव्यीक्तभ शब्दत करैत अछि, चाउर खसि रहल अछि।
झम शोकसँ कारी होएब। अहाँ सभ दिन झमाइत छी-झामवत् होइत छी अर्थात् कारी होइत छी।
डर भययुक्त होएब। बाधकेँ देखि के नहि डराइत अछि-के नहि भयभीत होइत अछि ?
भर भारसँ युक्त होएब। नेना बड़ीकालसँ जाँधपर बैसल अछि, तेँ भराए गेल-भाराक्रान्त भेल।
थिर पशुक आर्तवधर्मलाभ। महीसि थिराएल अछि-ऋतुधर्म प्राप्तन कएने अछि।
सिर दाँत मूलमे मुइल शोणितमय सिरासँ युक्त होएब। हमर दाँत सिराएल अछि-मृतशोणितयुक्तए सिरासँ युक्ति अछि।
डेर निस्तािपीभाव। रातिकेँ अन्हा रभे नेना डेराइत अछि-भीत होइत अछि।
सेर निस्ताइपीभाव। गरम मास सेराएल-निस्तारप भेल भात खाइ।
हेर अदृश्यस होएब (नहि भेटब)। हमर छड़ी हेराएल-अदृश्यि भए गेल।
टर्र इतस्तडत: वृथा चलब। मन आनन्द रहलासँ नेना अछि-इतस्तनत घूमैत अछि।
अगर आनन्दनसँ नाना चेष्टाल करब। ई नेना अगराइत अछि-आनन्देसँ नाना चेष्टा करैत अछि।
ओझर दुरुद्धर होएब। गेठिअएबाक काल जनौ ओझराएल-दुरुद्धर भेल।
सोझार सूद्धर होएब। ई जनौ सोझराएल अछि-उद्धारमे सुकर अछि।
मड़र मण्डौलाकार आकाशमे घुमब। गिद्ध मर देखि मड़राइत अछि-मण्डधलाकार घुमैत अछि।
नितर अभिमान करब। ई नितराइत अछि-अभिमान करैत अछि। निन्दाछशब्दि।
कदर कातरवत् आचरण करब। जाड़क हेतु पानिमे पैसबामे नेना कदराइत अछि-कातरवत् आचरण करैत अछि।
फहर आकाशमे वस्त्रनक डोलब। उत्समवमे पताका फहराइत अछि-आकाशमे डोलैत अछि।
अन्हमर अन्धमकारावृत होएब। सन्याे ड भेल, समय अन्हतराएल-अन्धमकारवृत भेल। ई अएना अन्ह,राएल अछि-मलरूप अन्धलकारसँ आवृत अछि।
चोन्हेर आँखिक तेज: प्रतिबन्धकक विकारयोग। लिखैत 2 आँखि चोन्हाराएल-तेज: प्रतिबन्धलक विकारसँ युक्त भेल।
चरचर बहुत अश्रव्य बाजब। नेनासब ततेक चरचराइत छल-अश्रव्यए बहुत बजैत छल जे निद्रा नहि होअए पओलक।
थरथर कम्प।। अबलक देह चलबामे थरथराइत छैक-कम्पित होइत छैक। जाड़ेँ देह थरथराइत अछि-कपैत अछि।
बरबर अज्ञानसँ बाजब। ज्वञरक वेगमे बरबराइत अछि-दरी बजैत अछि।
लरबर लरबर करब (अदृढ़ रहब)। झाँझनक पूल लरबराइत अछि वा लरलराइत अछि-अस्थिर होइत अछि।
लरलर ,,
मिरमिर दुर्बलीभाव। मिरमिराएकेँ बजैत अछि। दीप मिरमिराइत अछि।
घुरघर दहपर कीड़ाक चलब। देहरप किछु घुरघुराइत अछि-कोनो कीड़ा चलैत अछि।
फुरफर इतस्त त: धावन। ई नेना फुरफुराएल भेल फिरैत अछि-इतस्तात: दौड़ल भेल फिरैत अछि।
सुरफुर लेबाक इच्छाुसँ एमहर-ओमहर करब। ई नेना सुरफुराइत अछि-लेबाक इच्छाासँ एमहर-ओमहर करैत अछि।
बिल विलीन होएब (ठामहि अदृश्यह होएब)। मेघ बिलाएल-विलीन भेल।
फुल 1. पुष्पबक विकसन।
2. फुलसँ युक्त होएब। 1. कमल सूर्य उगलसँ फुलाइत अदि-विकासित होइत अछि।
2. फूलक बहुत गाछ वसन्तामे फुलाइत अछि-फूलसँ युक्ता होइत अछि।
गोपल विनष्टत होएब। ओ वस्तुा गोपलाएल-नष्टइ भेल।
कलकल भोजनक अत्य न्तए इच्छाट (बुभुक्षासँ आतुर होएब)। ई नेना कलकलाएल अछि-भूखसँ आतुर अछि।
गलगल अस्प ष्टछ बाजब।
ई सुगा आब गलगलइत अछि-अस्पछष्टब बजैत अछि।
दलदल आधातसँ भूमिक डोलब। ई भूमि दलदलाइत अछि-पादाद्याघातसँ डोलैत अछि।
झलफल अस्पतष्ट सूझब। हमर आँखि झलफलाइत अछि-सुझबामे दोषविशेषसँ युक्त होइत अछि।
खलबल तापसँ जलक संचार। चूल्हिपर जल खलबलाइत अछि-तापसँ सशब्दि सञ्चालित होइत अछि।
छलबल संचाल करब। चल्हबा माछ वर्षा पड़ैत छलबलाइत अछि-उनटैत-पुनटैत अछि।
दलमल भूमिक डोलब। चलैत रेलगाड़ीक लग धरती दलमलाइत अछि-डोलैत अछि।
गुलगुल गुलगुल होएब (कोमलीभाव)। आम गुलगुलाएल-कोमल भेल।
बिस परिणाममे दु:ख देब। हम जे कुसंयम कएल से हमरा बिसाएल-विषवत् आचरण कएलक, अर्थात् परिणाममे दु:ख देलक।
अलस आलस्यतयुक्त होएब। हम जएबामे अलसाइत छी-आलस्यबयुक्ती होइत छी।
कसकस सक्क्ता होएब। तौलामे आँटा कसकसाएल अछि-सक्कमत भेल बैसल अछि।
बिसबिस दंशनादिन्या विषवेदना। साँप कटलक तेँ बिसबिसाइत अछि-वेदनाविशेष करैत अछि, तेँ मन्त्रुसँ झाडि़ दिअ।
लुसफुस लोभसँ लेबाक चेष्टाि करब। ई नेना मधुरक हेतु लुसफुसाइत अछि-मधुरक लोभेँ अछि।
दह जलक उपर भसिआएब। धारमे काठ दहाइत अछि-उपर-उपर भसिजआइत अछि।
नह स्नाआन। गङामे नहाउ-स्ना-न करू।
सिह दर्शनसँ तद्धिषयक स्पहा। अपने खाइत छी नेना सिहाइत अछि-देखलासँ खएबाक इच्छाायुक्तछ होइछ।
बोह प्रवाहमे विनष्टच होएब। जयलाल गङगमे बोहाए गेलाह-प्रवाहमे विनष्टग भेलाह।
सोह प्रिय लागब। ई हमरा नहि सोहाइत अछि-प्रिय नहि लगैत अछि। एहि धातुक प्रयोग प्राय: स्त्रीछगण करैत अछि।
पन्हर मालक थनमे दुग्धीपूर्ण होएब। हमर गाए पन्हा्इत अछि-थनमे दुग्धापूर्ण होइत अछि।
कुकुह कानक कुडि़ऐनी। कान कुकुहाइत अछि-कुडि़आइत अछि।
टहटह घाओक वेदनविशेष। गूर टहटहाइत अछि-वेदनाविशेष करैत अछि।
महमह सुगन्धट करब। बेली फूल महमहाइत अछि-अति सुगन्धू करैत अछि। घरमे गुलाबक जल छीटल गेल अछि तेँ घर महमहाइत अछि।
लहलह 1. ज्वा लाक आन्दो लन।
2. जिह्राव्याेपार। 1. आगि लहलहाइत अछि-ज्वा लायुक्त अछि।
2. कालिकाक जीह लहलहाइत छैन्हि-सव्या पार छैन्हि।
सहसह अनेक पीलुक संचाल। एहि सड़ल आममे पिलुआ सहसहाइत वेदना करेत अछि।
चुहचुह वेदनाविशेषयोग। देह चुहचुहाइत अछि-कुचकुचाएब सदृश वेदना करैत अछि।
बि प्रभव। हमर गाए बिआएल-गर्भमोचन कएलाक।
खि घर्षणसँ क्षीण होएब। चलैत-चलैत खणम खिआएल-क्षीण भए गेल।
खे ,, ,, घास छिलैत-छिलैत खुरपी खेआएल-क्षीण भेल।
जो परिपाकक पूर्वरूपप्राप्ति। गाछमे जोआएल-परिणामक पूर्वरूपापत्र बहुत अछि।
सो पाकसँ सक्कलत होएब। रन्हँबाक काल भाँटा सोआए गेल-सक्कँत भए गेल।
औ किंकर्तव्यलता-विभूढ होएब। अहाँ एना औआइत छी किएक-किंकर्त्तव्यतमूढ किएक होइत छी?
टौ अनाथ होएब। ई नेना माइक बिना टौआइत अछि-अनाथ भेल रहैत अछि।
बौ 1. व्यािमोहसँ अनभिप्रेत मागेँ गमन।
2. ज्वा रादिमे बिना ज्ञानेँ किछु-किछु बाजब। 1. हम बौअएलहुँ-व्याामोहसँ अनभिप्रेत मार्गें चललुँ।
2. हिनका ज्वुर बड़ तेज छैन्हि, बौआइत छथि-अज्ञानमे बजैत छथि।
ही अधिक कुडि़ऐनी। हमर देह कलकलिसँ हौआइत अछि-अधिक कुडि़आइत अछि।
नकि नाक देने बाजब। केओ 2 नकिआइत अछि-नाकक सम्बदन्धेँि बजैत अछि।
छिछि इतस्तेत: गमन। हओ, तोँ रौदमे किएक छिछिआइत छह-इतस्तोत: भेल फिरैत छह।
खटि कम होएब। हमरा गाममध्य मस बड छल, आब खटिआएल-कम भेल।
ढठि नीक ढाठीपर आएब। ई नेना आब ढठिआएल-नीक ढ़ाठी पर आएल।
गडि़ आँखि दुखाएब। आँखि उठल अछि तेँ गडि़आइत अछि-दुखाइत अछि।
जडि़ दृढ़मूल होएब। ई गाछ जडि़आएल-दृढ़मूल भेल। दु:ख जडि़आएल इत्यातदि लाक्षणिक जानब।
भिँडि़ भीँ डीरूपेँ अवस्थित होएब। सुतरी भिडि़आउ-भीँड़ी रूपेँ अवस्थित करू।
कुडि़ घर्षणनिवर्तनीय होएब। देह कुडि़आइत अछि-कण्डूथसँ युक्तभ होइत अछि।
सुँढि़ सिद्धूयुन्मु ख होएब। आब काज सुँढि़आएल-सिद्धयुन्मुडख भेल।
नेढि़ वृथा इतस्तढत: गमन। ई नेना नेढि़आइत अछि-इतस्तमत: चलैत रहैत अछि।
लेढि़ लेटब। सूगर खातमे लेढि़आइत अछि-लेढ़ैत अछि।
दँति दाँत निपोडि़ देब। दँतिअएलाह-दाँत निपोडि़ देलैन्हि तेँ हम छोडि़ देलिएेन्हि।
पति विश्वािस करब। हम अहाँक कथा नहि पति आएब-निश्वित नहि मानब। यद्यपि ई धातु सकर्मक थीक किन्तु बजादिवत् अकर्मकत्वकप्रयुक्तु एत्यरय अबैत अछि। महाराज बात पति अएलाह।
भोति गन्ताव्यए मार्गक त्यायग (संमोहसँ अगन्तलव्यर मार्गें चलब)। हम भोति अएलहुँ-भ्रममे पड़लहु। एकर मार्गभ्रममे मुख्यल प्रयोग।
हदि निभरोस होएब। हदिआउ नहि-निभरोस जनु होउ।
उ़धि पाकसँ ऊर्ध्व-गति। दूध उधिआइत अछि-आँच देने उपर बढ़ैत अछि।
पेनि पाछाँ-पाछाँ भेल फिरब। जयलाल पेनिआइत छथि-पाछाँ-पाछाँ भेल फिरैत छथि।
खपि खपब (क्षीण होएब)। ग्रहणमे सूर्यचन्द्रोमा खपिआइत छथि-खपैत छथि।
हफि हाफीसँ युक्त होएब। अहाँ हफिआइत छी-हाफीसँ युक्त होइत छी।
अरि अकच्छह होएब। हम अरिअएलहुँ-अकच्छाफ भेलहुँ।
फरि निर्विवाद होएब। हमरा जयसिंहसँ लेन-देन फरिआएल-साफ भेल।
छिरि विकीर्ण होएब। चाउर छिरिआएल अछि-विकीर्ण अछि।
घुरि पुनरागति। ई दु:खमे घुरिअएलाह-पुन:पुन पड़लाह।
ओरि ठीक होएब। वस्तुोसब ओरिआएल-ठीक भेल।
भसि प्रवाहमे तदनुकूल जाएब। रेतमे लोक भसिआइत अछि-भासैत अछि।
खिसि 1. क्रोध करब।
2. गञ्जन । 1. हमरापर जयलाल खिसिआएल छथि-क्रुद्ध छथि।
2. हमरा पर गुरूजी खिसिअएलाह-गञ्जन कएलैन्हि। इहो बजधातुवत् अकर्मकत्वैप्रयुक्तेव प्रत्य।य उत्प।त्र करैत अछि।
घोँसि थोड़ अवकाशमे पैसब। गीदड़ सोन्हिमे घोँ सिआएल-पैसल रहैत अछि।
ढेहि बिना हेतु इतस्तघत: गमन (निन्दाशब्दए)। ई नेना ढेहिआइत रहैछ-वृथा इतस्तहत: करैछ।
सन्हि सन्धिमे पैसब। साप बीहरिमे सन्हिआएल-पैसल।
बधु किंकर्तव्येवेमूढ़ होएब। अहाँकेँ की भेल अछि जे बधुआएल छी-किंकर्तव्यबविमूढ़ उदास छी ?
भकु भक (आँखिक झपनी) लागब। ई नेना भकुआएल अछि-औँघीसँ आँखिक झपनीसँ युक्तऔ अछि।
छुछु वथा इतस्तीत: जाएब। ई नेना छुछुआएल भेल फिरैछ-वृथा एमहर-ओमहर दौड़बड़हा करैत अछि।
झुझु कम देखि अपरितोष। ई भूखल अधिक छथि तेँ थारीमे थोड़ भात देखि झुझुअएलाह-अपरितोष प्राप्ति कएलैन्हि।
घटि क्रमश:देखि होएब। हुनका दिनानुदिन धन घटिजाइत छैन्हि-कम्पट होइत छैन्हि।
घटु उदास होएब। घटुआएल छी-उदास छी।
लटु लटब। नेना अतीसार रोगक कारणेँ लटुआएल लटल अछि।
बिधु मुहक दु:खचेष्टा । अहाँक मुह बिधुआएल किएक अछि-उदास किएक अछि ?
अरु सिद्धान्न क शुष्क होएब। भात बड़ी काल रान्हकल गेल, तेँ अरुआएल अछि-शुष्कलप्राय अछि।
भरु आतपजन्यअ पत्रादिक अयथावत् स्थिति। पात तीव्र रौदमे मरुआइत अछि-मूर्छित भए जाइत अछि।
मसु पाकसँ कठोरताप्राप्ति। भाँटा मसुआएल-पाकविरामप्रयुक्तम कठोरता पओलक।
कन्हुा पशुक क्रोधचेष्टा । बड़द कन्हुचआइत अछि-मारबाक पैश करैत अछि, तेँ हटिकेँ जाउ।
शब्द-विचार 3
ठक परतारब, वञ्चना। ठक बुड्बिककेँ ठकैतअछि- ओकर वस्तुड लए लेबाक हेतु भ्रम उत्प्त्र करबैत अछि।
डक अपन उत्क ट गन्ध क प्रसारण । हीँगु डकैत अछि-अपन तीव्र गन्क्ा प्रसार करैत अछि।
ढक मिथ्याड अपन अतिप्रशंसा करब। जयलाल ढकैत छथि-अपन मिथ्याग अति प्रशंसा बजैत छथि।
बक अश्रव्यश बहुत बाजब। जयलाल बकैत छथि- नहि सुनबाक योग्यक कथा बहुत बजैत छथि।
मक हर्षसँ मालक धावनक्रीड़ा। बाछा मकैत अछि, लीलसँ एमहर ओमहर दौडि़ रहल अछि।
सक क्षम होएब। भोलबा बजैत छथि।
छिक छिक्का अकृत्रिम नासिकाशब्दत। यात्राकाल केओ छीकए नहि, छिक्काि नहि करए- अर्थात् अकृत्रिम नासिका शब्दक नहि करए।
ठिक जोड़ब, संकलन। खर्च ठीकल- जोड़ल।
डिक अधिकक अँटकब। ई जगह गहीँड़ अछि तेँ एहिठाम पानि डिकल अछि-अधिक अँटकल अछि।
ढुक हठात् प्रवेश। सावधन रहू जे केओ मन्दिर नहि ढूकए- बलात् पैसए नहि। ठोकलासँ काठमे काँटी ढुकैत अछि।
फुक फूत्क रण, मुखोत्पाादित वायुसँ संयोजन। आगिकेँ फूकू-मुखसँ उत्पाोदित वायुसँ संयुक्त करू तखन पजरत, प्रज्व्ि लित होएत।
बुक मेही वूर्ण करब। मरीच बूकि- मेहीँ चूर्ण कए तीनमे दिऔक । हददिक बुकनी दालिमे दिऔक।
भुक कुकुर-गिदड़क बाजब। कुकुर रातिकेँ चोरकेँ देखि भुकैत अछि- गदिड़ रातिकेँ पहर 2 पर भुकैत अछि।
रुक निवृत्ति। लिखबाक काल स्मिरणप्रयुक्त कलम रुकल-लेखव्यारपारसँ निवृत्त भेल।
छेक अवरोधन, स्व्तन्त्र गमन प्रतिबन्धलक रोक। खेतक पानि बहैत अछि, ओकरा छेकू वा छेँकू गए, जे बहए नहि। गाए दुहबाक काल बाछाकेँ छेकैत अछि- बन्हैकत अछि जाहिसँ गाए लग नहि आबए।
छेँक ,, ,, ,,
टेक खसबासँ तात्काैलिक रोकब। टाटा टेकि दिओक-कोनहुना खुट्टामे बान्हि दिऔक जे खसए नहि, पश्र्चात् यशोचित बान्हज दैबैक।
ठेक संयुक्त होएब। छोट चौकठि माथमे ठेकैत अछि- लगैत अछि। अन्हा रमे चलबाक काल पाएरमे पजेबा ठेकल-संयुक्त भेल।
फेँक ,, कस्तमर बढ़ारिकेँ फेकल वा फेँकल-प्रक्षिप्तब कएल।
रेक मनुष्यिक बाजब।
हेक गदहाक बाजब। नेनासभ रेकैत अछि-खेलाएबमे एमहर-ओमहर दौड़ैत अछि।
हेँक ,, ,, ,,
घोक अतिसञ्चालनसँ मलिन करब। नेनासभ पोखरिक पानि घोकैत अछि-अतिसञ्चालनसँ मलिन अछि। भदबारिभे
घोँक ,, ,, ,,
छोँक ऊपरसँ फोड़न मिलाएब। दालिक झोर छोँकल- ऊपरसँ घ़तादिपक्वछ जीर, हीँगु प्रभृति फोड़नसँ युक्त कएल।
झोँक अतिप्रयोग। हमरा टोकू जनु-कतए जाइत छी इत्यारदि जनु पूछू।
झोक ,, ,,
टोक 1. बोधनपूर्वक प्रश्नप। 2. पक्व.तादिज्ञानार्थ आधात । कटहर टोकैत छी- आहत करैत छी जे पाकल अछि की नहि ।
ठोक ऊपरसँ आधात। खुट्टा ठोकैत अछि। चानी ठोकने- ऊपरसँ आघातयुक्त कएने पसरैत अछि।
भोक वेधन। चोरकेँ भालासँ भोकल वा भोँ कल- विद्ध कएल। सुइआ हाते भोँकल गेल।
भोँक वेधन
रोक अवरोधन। पञ्च भगड़ा रोकलैन्हि-निरुद्ध कएलैन्हि, होअए नहि देलैन्हि। ढाठमे मालसब रोकल अछि- अवरुद्ध अछि तेँ बहराए नहि सकैत अछि।
लोक आकाशसँ खसैतकेँ उपरहि पकडि़ लेब। हम गेन फेँकैत छी, अहाँ लोकू-उपरहि पकडू।
होँक उद्वीजनख् व्युजनादि द्वारा वायु लगाएब। भगवानकेँ चामरसँ होँकी-बसात लगाबी।
चौँक भयसँ डोलि जाएब। नेना बालाग्रहमे चौँकैत अछि-काँपि उठैत अछि।
छौँक ऊपरसँ फोड़न मिलाएब। तीमन होँकी- बसात लगाबी।
कचक शिराक वेदना। शिरा कचकैत अछि-दुखाइत अछि। पीठ कचकल-शिरामे दुखाएल।
पचक अवयव नीचता प्राप्ति। हाथसँ पाथरपर खसने लोटा पचकत- यत्कित्र्चिद्धगमे नम्रता पाओत।
लचक मध्यिमे वा अन्ते भागमे डोलब। चौपालाक बाँस लचकैत अछि-डोलैत अछि। भार लचकैत-डौलैत जाइत अछि।
हिचक अप्रव़त्ति। मतिवीर पाएरेँ जएबामे हिचकैत छथि- प्रवृत नहि होइत छथि।
उझक ऊपरसँ झुकब। भातक बरतन उझकि गेल-उपर भागसँ झुकि गेल- तेँ भात हेराए गेल।
अँटक स्थिर होएब। गहीँ ड़मे पानि अँटकल अछि-जमा अछि। यात्रीसभ एहिठाम रातिकेँ अँटकैत अछि- चलबसँ निवृत्त भए रहैत अछि।
खटक अनिष्टछसंभावनाविषयीभवन। हमरा मनमे राति खटकल-बुझना गेल जे चोरक आगमन भेल अछि।
चटक चटओदार लेब। अधिक ताओ देबैक तँ देबैक तँ कोहा चटकत-चटओदार लेत।
झटक 1. सवात वर्षा। 2. फटकबामे हाथसँ सूपक तरमे चोट देब। मेघ झटकैत अछि-बसातक सङ् बरिसैत अछि।
पटक बजारब। बाह, तोँ पहलमानकेँ पटकलेँ- बजारलेँ जोरसूँ माटिपर खसओलेँ।
फटक सूप आदिसँ साफ करब। चाउर फटकैत अछि-सूपसँ साफ करैत अछि।
भटक विमुख होएब। ओ जएबामे भटकलाह-विमुख भेलाह। हमर मन भटकाल-अप्रवृत्त भेल।
सटक संकुचित होएब। काछुक मुह-पाएर सटकल रहैत अछि-संकुचित रहैत छैक। ओ नेना डरेँ सटकल-संकुचित भेल।
छिटक फटिकेँ जाएब। धोती खिचबाक काल पानि छिटकैत अछि। बिजली छिटकैत अछि। लोकसभ छिटकल-फूटर भए चल गेल।
घुटक परबाक शब्दल। परबा घुटकैत अछि-बजैत अछि।
भुटक रोमाञ्चयुक्त होएब। देह भुटकैत अछि-रोमाञ्वसँ युक्तल होइत अछि।
सुटक घोसिआएकेँ नुकाएब। गिदड़ दिनकेँ सोन्हिमे सुटकल रहैत अछि-घोँ सिआए प्रच्छतत्र रहैत अछि।
कड़क क्रोधसँ उत्कघटक्रियेच्छा। डङ्का बजलासँ वीरक मन कड़कैत छैक- उत्तेजित होइत छैक।
खड़क किञ्जत् हटब। ई सील एक गोटासँ नहि खड़कल-कनिओ नहि घुसकत।
गड़क गोल वस्तुघक घुमैत जाएब। पहिआबाला सन्दु।क गड़कल-गोल गड़कैत आगाँ नहि खड़कल-कनिओ नहि घुसकत।
घड़क कित्र्चित् हटब। सन्दु्क अपना जगहसँ घड़कि गेल अछि-कित्र्चितद्य घुसुकि गेल अछि।
फड़क अङ्रस्फु रण। वामा आँखिक फड़कब-संचलन अधलाह थीक।
भड़क भयसँ मालक पड़ाएब। घोड़ा देखि हाथी भड़कैत अछि। ऊँट आएल तेँ माल सभ भड़कल-भयसँ पड़ाइल।
मड़क असंपत्ति। अन्ततमे वर्षाक अभावसँ धान मड़कल-संपत्र नहि भेल।
खदक ताओसँ खलबलाएब। अदहन खदकैत अछि-खलबल करैत अछि, चाउर लगाउ।
धधक प्रज्वैलन। आगि धधकल-पजरल ज्वाकलासवँ युक्त। भेल।
उधक किञ्चत् ऊर्ध्वअगति। दालिक कोहाक ढकना उधकैत अछि-दालिक उधिअएबाक कारण कनिएँ 2 ऊपर उठेत अछि।
लुधक एकमे बहुतक लागब। चीनीमे चुट्टी लुधकल अछि-बहुत चुट्टी लागल अछि।
चनक आगिमे फाटब। ई घैल चनकल अछि- आबाल ताओसँ फुटल अछि। आँच कम दिऔक जे कोहा चनकए नहि।
छनक सूपसँ विभक्त करब। छनकलासँ चाउरक खुद्दी बहराइत अछि। सूपसँ लोकि विभाग करब छनकब थीक।
झनक रोगेँ पाएर घँसैत चलब। ई बड़द झनकैत अछि-पाएर भूमिमे घसैत अछि। एकरा झनक रोग छैक।
टनक माथ कान आँखिक वेदना। माथ टनकैत अछि-दुखइत अछि। एवं कान वा आँखिप टनकैत अछि। टनक रोग थीक
ठनक गरजब। मेघ ठनकैत अछि-गज्जैं त अछि।
फनक मनसुबा करब। अहाँ की फनकैत छी-मनसुबा (अपन शक्तिक प्रकाश) की करैत छी, अहाँक बुतेँ किछु नहि हेएत। लफन्द रक प्रति निन्दोकक्ति।
भनक 1. मनक विकृत होएब। 2. कानाकानी खुलब। भातपर बड़ माछी तेँ हमर मन भनकैत अछि-अश्रद्धायुक्त होइत अछि।
सनक बतहपनी। ई सनकल छथि-उन्मा दयुक्त छथि।
भिनक खाद्यपर माछीक सञ्चार, माछीसँ युक्त होएब। भात भिनकैत अछि-माछीसँ संबद्ध कतहु छपकल अछि-प्रच्छछत्र अछि।
ठुनक सशब्दछ क्रन्दपनविशेष। नेना ठुनकैत अछि-हुँ हुँ शब्द करैत अछि
छपक नुकाएब। ओ डरेँ कतहु छपकल अछि-प्रच्छ्त्र अछि।
टपक पाकिकेँ गाछसँ खसब। आब आम टपकैत अछि-पाकिकेँ सशब्द खसैत अछि।
लपक शीघ्रतया लए लेब। चिलहोडि़ हाथसँ सोहारी लपकलक-झट दए लए लेलक।
डबल जलतैलादिक अधिक अँटकब। तेज ले हेराइल से गहीँ इमे डबकल अछि-अँटकल अछि।
ढबक पत्रपर मसीक अधिक स्थिति। कलमसॅा अधिक मसि खसि पड़ल तेँ कागज पर मसि ढबकल-अधिक अँटकल।
दबक नुकाएब, प्रच्छेत्र होएब। नेना डरेँ कतहु दबकल अछि-प्रच्छँत्र भेल अछि।
हबक दाँतसँ धरब। कुकुर जाँधमे हमरा हबकलक-दाँतेँ कटलक।
टभक पाकिकेँ सशब्दह खसब। पाकल आम टभकैत अछि-गाछसँ खसैत अछि।
भभक दुर्गन्ध प्रकाश करब। सड़ल मुर्दा भभकैत अछि-दुर्गन्धेकेँ प्रकाशित करैत अछि।
गमक सुगन्धि प्रकाश करब। बेली-चमेली इत्याबदि फूल गमकैत अछि-आमोद करैत अछि, उत्तम प्रकाशित करैत अछि।
चमक 1.चकचकाएब। 2. अस्थैतर्य। हीरा चमकैत अछि-चकचम करैत अछि।
जमक पूर्ण होएब। भोजमे मधुर जमकल-पूरिपूर्ण भेल।
झमक झमझम करब। ई स्त्री गहना पहिरि झमकैत-झमझम शब्द करैत, चलैत अछि।
ठमक रुकब। आब वर्षा ठमकल-रुकल।
दमक पृथ्वीषक कित्र्चित् डोलब। रेलगाड़ी चलबाक काल लगक धरती दमकए लगैत अछि-डोलए लगैत अछि।
धमक धमधम करब। रेलगाड़ीक धमकब-धमधम शब्दअ बहुत सुनल जाइत अछि। लोकक चललासँ कोठाक छत धमकैत अछि-धमधम शब्दक करैत अछि।
बमक गूढ़ वस्तुअक हठात् प्रकाश। कन्तोवड़मे हीगुँ राखल छल, कन्तोतड़ खोलला पर ओकर गन्धँ बमकल-हठात् प्रकाश भेल फ जयलाल बमकलाह- असल गूढ़ बात हठात् बजलाह।
रमक अतिमन्द़ बहब। बसात रमकैत अछि-अतिमन्दल बहैत अछि।
उमक औद्धत्य़-चेष्टाद। नेना सभ उमकैत अछि-ओद्धय-पूर्वक दौड़धूप करैत अछि। करैत ओकरा एखन समर्थाइक उमकी छैक-औद्धत्य्चेष्टाक छैक।
झरक आगिमे कित्र्चित् जरब। आगिमे झरकि-कित्र्चित् जारिकेँ मुइल।
ढरक टधड़ब। हेराएल तेल ढरकि-टधडि़ नीचमे जमा भेल ।
दरक फाटब। कोहा दरकल अछि- चिरक्कासँ युक्त अछि।
बरक ताओसँ खलबल करब। पानि बरकैत अछि- ताओसँ खलबलाइत अछि।
लरक 1. ऊँचसँ नीचाँ नमरब। 2. तिरने पैध होएब। धोती लरकल युक्त अछि-नरमल अछि, सम्भा रि लिअ। रबड़ लरकैत अछि-तिरने नमरैत अछि-पैध होइत अछि।
सरक पीबाक काल कुमार्गमे जलक प्रवेश। पानि सरकल-कण्ठपक विवरसँ आन दिश चल गेल तेँ उकासी उठल।
हरक छिटकल पशुसंघक एकदिश जाएब। हम मालसभकेँ हरकैत छी। मालसभ हरकैत अछि- एक दिश जाइत अछि।
सुरक वायुद्वारा ग्रहण। तेल सुरकू-नाक देने श्वाछससँ उपर लए जाउ, तखन कफ छुटत। नोसि सुरकैत छथि-चकचकाइत अछि।
झलक चकचकाएब। नव काशीबाल बरतन झलकैत अछि-चकवकाइत अछि।
दलक पृथिवीक कनिऍं डोलब। भीत खसलासँ धरती दलकैत अछि-कम्पित होइत अछि।
फलक विकसितत होएब। फूल फलकल-विकसित भेल। तूर धुनने फलकैत अछि।
ललक क्रोधपूर्वक जोरसँ बाजब। भीमसेन ललकैत छथि-क्रोधपूर्वक जोरसँ बजैतछथि। गुरुजनपर नहि ललकी-जोरसँ नहि बाजी।
हुलक 1. कुकुरक घरमे प्रेशव । 2. ककरहुपर लागब। सावधन रहू जे कुकुर हुलकए नहि-हठात् घर ने पैसए। कुकुरकेँ हम हुलकबैत छी-ओहे ओहे शब्दनसँ प्रेरित करैताछी, तखन हुलकत-शिकारपर लागत।
घसक चल जाएब (निन्दान)। अहाँ एहि ठामसँ घसकू-चल जाउ ई निन्दाहशब थीक।
चसक अकर्तव्य मे पुन:पुन: प्रवृत्ति। नेनाकेँ सम्हाारू नहि तँ चसकि जाइत-अकर्तव्यसमे लागी जाएत।
मसक तानी-भरनीक विचलनयोग। पुरान-भेल तेँ धोती मसकल-सूतक विचलन पओलक।
उसक टेमी आदिक आँगा घुसकब। दीपक टेमी उसकत-किछु आगाँ धुसकत, तखन प्रकाश होएत, तेँ ओकरा उसकाउ।
घुसक कित्र्चित् हटब। ई साल बड़ भारी अछि, एक गोटाक बुतेँ नहि घुसकत-कनिओ नहि सुसरत।
ठहक रक्षकक स्वघसूचक शब्दि। रातिकेँ चोरसँ रक्षाथ्र्ज्ञ कोतबाल ठहकैत अछि-शब्द्विशेकषसँ अपन सूचना करैत अछि।
बहक छिद्रमे पैसब। अहाँ बुतेँ सुइआमे ताग नहि बहकत-नहि पैसत। हाथ बहकाए-पैसाए कोठीसँ अन्नप बहार करू।
महक गन्धपक प्रकाश करब। मटिआ तेल महकैत अछि-अपन गन्ध प्रकाशित करैत अछि।
लहक गन्धाक प्रकाश करब। आब जारन लहकल-ज्वा लासँ युक्त भेल। आगि लहकैत अछि-ज्वालासँ युक्तआ भेल अर्थात् जरि गेल।
सिहक 1. अतिमन्दर बहब। 2. कित्र्चित् जाडय-प्राप्ति। 3. फाटब। एखन बसात सिहकैत अछि-मन्द।मन्द बहैत अछि। ज्वैरमे देह सिहकैत अछि-किंचित् जाड़सँ युक्ते होइत अछि। कोहा सिहकल-कित्र्चित् चिरक्काहसँ युक्तड भेल।
कुहक कोलिलक शब्दि। कोकिल वसन्तेक कुहकैत अछि-कुहूकुहू शब्दल करैत अछि वनमे पक्षीरम कुहकैत् अछि-शब्दक करैत अछि।
परिक प्रवृत्ति- साफल्येसँ तादृश प्रवृत्तिमे फलक विश्वाेस। ई नेना मधुरमे अहाँक ओहिठाम परिकल अछि-गेने मधुर होइत से मानने अछि कारण जे अहाँ अएबाक उत्तर मधुर सभ दिन दैत छिऐक।
बिजुक ठोरमुहक चेष्टाद, शोकादि सूचक व्याेपार। एहि नेनाकेँ अनभिप्रेत किछु कहिऔक तँ एकर ठोर बिजुकैत छैक-दु:खक सूचक चेष्टा - विशेषसँ युक्तख होइत छैक। अहाँक खिसिअएने नेनाक मुह बिजुकैत छैक-दु:खव्युञ्जक चेष्टाैसँ युक्तै होइत छैक। अहाँ कनिए देलैक तेँ ओ नेना मुह बिजुकओलक-असन्तोनष-सूचक मुह बनओलक।
सुरुक वायु द्वारा ग्रहण। नाक देने तेल सुरुकू-श्वा ससँ ग्रहण करू। नोसि सुरुकू, तखन कफ खसत।
कुहुक कोकिलादिक कुहूकुहू शब्दु करब। वसन्तामे कोकिल कुहुकैत अछि-कुहूकुहू शब्दत करैत अछि।
झख दीनता बाजब।
झँख ,, ,,
चिख जाचक हेतु खाएब। तीमन चीखू-जाचक हेतु कनिएँ खाउ जे कहेन भेल।
लिख अक्षरादिविन्या।स। महादेवक मूर्त्ति लिखलैन्हि, आओर चित्र लिखताह। भागवत लिखैत छथि। लिख धातुक अर्थ अभिव्य क्तिजनक मसीसंयोजन थीक, जकर अभिव्यसक्ति से कर्म। वर्णमाला लिखैत छथि-वर्णमालाक अभिव्याक्तिजनक मसीसंयोग करैतछथि।
सिख शिक्षा। नेना लिखम सिखैत अछि- लिखबाक अवगति उत्पसत्र अछि।
देख दर्शन। देवदत्त पुस्तैक देखैत छथि। कार्य देखलन्हि।
खोख उकासी करब। कफ भेलासँ खोखैत छथि वा खोँखैत छथि।
खोँख ,, ,,
घोख शब्द,क स्मिरणार्थक अभ्या स। जय-लाल श्लो क घोखैत छथि घोँखैत छथि-अभ्यशस्तल करैत छथि, स्मारण रहबाक हेतु वारंवार पढ़ैत छथि।
घोँख ,, ,, ,,
जोख तौलब। चाउर तराजूसँ जोखैत छथि-तौलैत छथि।
सोख पघिलल (द्रव) वस्तु क अभ्यलन्तदरीकरण। नव माटिक बासन तेल सोखैत अछि-अभ्यान्तलरमे लए लैत लैत अछि। चाम तेल सोखैत अछि। भिजाए गारल नुआ पानि सोखैत अछि।
बिसख पन्हासएबसँ निवृत्ति। हमर गाए बिसखल-पन्हााएब बन्दच कएलक। ककरहु मतेँ धातु-गाए बिसुखल।
खग अपेक्षित वस्तुेक असत्ता (अभाव)। हमारा किछु रुपैआ खगैत अछि-अपेक्षित अछि, किन्तु हाथमे नहि अछि। घर बन्हैपत छी ताहिमे खाम्हहक खगता अछि-अपेक्षित खाम्हिक अभाव अछि।
टग झुकब। जयलाल भूकम्प-मे टगलाह-झुकि गेलाह।
रँग रञ्जन। हम नूआ रँगेत छी वा रङैत छी-रङ्सँ युक्तआ करैत छी।
रङ ,, ,,
त्या,ग छोड़ब। हम मधुर खाएब त्या गल-छोड़ल।
उग उदय। 1. प्रथमदर्शनयोग्या स्था नपर सूर्यादिक आगमन। 2. भीतरसँ जलक उपर आगमन। सूर्य उगलाह-उदित भेलाह। ओ जलमे डूबि बड़ी काल पर उगलह-जलक उपर अएलाह।
रेँग एक पाएरेँ कूदि चलब। नेनासभ खेडि़मे रेँगैत अछि वा रेङैत अछि-एक पाएर उठाए दोसरा पाएरेँ कूदि कूदि चलैत अछि।
रेङ ,, ,,
टोँग खाखाछेदन। सुखाएल ठारिकेँ टोँगैत अछि वा टोङैत अछि-कटैत अछि।
टोङ ,,
ओठॅंग अवलम्ब नार्थ पीठ लगाएब। अहाँ मसलँदमे ओठँगिकेँ वा ओठङिटकेँ बैसू-पीठ लगाए बैसू
ओठङ ,, ,,
सुनग पजरब। आगि सुनगल-पजरल।
तरँग हालरहित हाएब। खेत तरँगल वा तरङल-हालहीन भेल, आब जोतल नहि होएत।
तरङ ,,
अलग 1. भीतर नहि रहब। 2. अत्रविकल ठाढ़ सीससँ युक्त होएब। 3. उपर उठब। पानिमे कुम्भी अलगल रहैत अछि-भीतर नहि रहैत अछि अर्थात् पानिक उपर रहैत अछि। फुलक समयमे रातिकेँ पानि होएबाक कारण धान अलगल.... अत्रराहित ठाढ़ सीससँ युक्ते रहल। बड़ेरीसँ चार अलगल अछि- अपर उठल अछि, ओकरा सटाउ।
पनुग पल्लवाङ्करसँ युक्त होएब। फुलक गाछ पनुगल-अङ्करसँ युक्तल भेल।
उघ 1. उठाएकेँ लए जायब। 2. लए आनब। धानक बोझ उघैत अछि-उठाए केँ लए जाइत अछि वा अनैत अछि। गदहा ऊस उधैत अछि।
सुँघ आघ्राण। नासिका समीप नयनपृथक क गन्ध ग्रहण, फुल सुँघैत छथि-नाकक लग अानि गन्धसग्रहण करैत छथि।
अर्घ ठोँठक नीचाँ अटकब। ई औषध नहि अर्घलैन्हि वा नहि अरघलैन्हि-ठोँठक नीचा नहि अँअकलैन्हि अर्थात् वमन भए गेलैन्हि।
अरघ ,,
कच लगलग छओसँ युक्त करब। खेत कोदारिसँ कचि-लग लग छओसँ युक्तो कए, धान रोपल। चोरकेँ गणाससँ कचल-लगलग अनेक छओसँ युक्तँ कएल।
खच जटित होएब। सोनाक औँ ठीमे हीरा खचल अछि-जड़ल अछि।
जच निक्षित होएब। ई बात हमरा मनमे जचल अछि-जटित अर्थात् निश्चित अछि।
पच ।. अन्त्र्गतक दोषजनक परिणाम। 2. तैलादिक भीतर प्रवेश। हमरा भातक पथ्य् पचल-दोषाजनक रूपेँ परिणत भेल। आब ज्वचर पचल-दोषाजनक परिणात भेल। अधिक मर्दनसँ माथमे तेल पचल-भीतर पैसत ।
बच अनिष्टँसँ निवृत्ति। साप चारसँ देह पर खसलैन्हत परन्तु- बचलाह वा बँचलाह-संर्पर्दशनरूप अनिष्टव नहि पओलैन्हि।
बँच ,, ,,
मच प्रवृत्ति। धूम मचल- धूमधाम प्रवृत्त भेल। मच धातुक क्व।चित्त प्रयोग होइत अछि से लोक-व्यहवहारसँ जानब।
रच बनाएब। फुलबाड़ी रचल जाइत अछि-बनाओल जाइत अछि से लोक-व्यावहारसँ जानब।
खिच 1. वस्त्रअप्रक्षालन, सार्द्र वस्त्रछक वारंवार आघात। 2. असकृत् संपर्क। धोती खिचैत छथि-जलसँ आघात-पूर्वक साफ करैत छथि।
खिँच आकर्षण, झीकब। हमरा उपरसँ हाथ पकडि़ खीँचू-खैचि लिअ।
घिच ,, डोल भरि घीवू वा घीँ चू-आकर्षण करू।
घिँच ,,
छिच सेचन। एहिठाम बढ़ारिकेँ छीचि दिऔक-पानिक छिटकासँ युक्तक करू जे गरदा नहि उड़ए। पानिक छिञ्चा पड़ल।
पिच दाबब (जाहिसँ अवयवमे अन्य थाभाव हो) जयदेव गाड़ीक तर पीचल गेलाह-दाबल गेलाह।
सिच सेचन एहि धातुक काव्य हिमे प्रयोग होइत अछि।
कुच थकुचब। दाँतर जजि कुचल गेल-कित्र्चित् गेल।
घुच पाछाँ रहि जाएब। ओ घुचि रहलाह-पाछाँ रहि गेलाह।
रुच खाद्यक नीक लागब। हमरा ज्वीरसँ अत्र नहि रुचैत अछि-नीक नहि लगैत अछि।
बेच विक्रय। बनिआ स्तुगसभ बेचैत अछि- विक्रय करैत अछि।
मेच मोचरब। हम घाड़ पकडि़ मेचि दैत छी-ऐँठि दैत छी तखन सिरसंकोच छूटि जाएत।
ऐँच टेढ़ होएब। गैँची माछ ऐँचैत अछि-वक्र भए जाइत अछि। सनकेँ ऐँचि रस्साज बनबैत अछि।
खैँच आकर्षण। इनारसँ पानि भरि डोल खैँ चैतछी-उपरकेँ आकृष्टर करैत छी। जयदेवकेँ हाथ पकडि़ खैंचने आउ।
गैँच टेढ़ होएब। गैँची माछ जेँ गैँचैत-टेढ़ होइत रहैत, अछि तेँ गैँची कहबैत अछि।
घैँच आकर्षण। गोहि पाएर धए घैंचिकेँ-आकृष्टढ कए, लए जाइत अछि।
पैँच सूपमे तण्डु।लादि-मिश्रित घान्यातदिकेँ नीचा आनब। स्त्रीतगण पैँचब-तण्डुिलादि धान्याएदिकेँ सूपसँ घुमाए उपर लाएब, जनैत अछि।
कोँच ठुसब। डाकू यात्रीकेँ पकडि़ मुहमे नूआ कोँचि दैत छैक जे बाजि नहि सकए।
छोँच गुद-शौचक्रिया। सर्वप्रथम नेनाकेँ अपना हाथेँ, छोँचबाक-शौच-क्रिया करबाक शिक्षा देबाक चाही।
नोच एकदेशक आकर्षण। काँट नूआकेँ नोचलक-वक्रताक कारणेँ नूआमे नूआकेँ खैँचलक, तेँ नूआ फाटल ।
सोच ।. विचार। 2. शोक। एहि विषयकेँ सोचू-बिचारू। सुरथ महाराज वन जाए शत्रुसँ आक्रान्त। अपन राज्य क सोच-शोक करए लगलाह।
दकच यत्रेकुत्र अनेकधा काटब। नेना कागतकेँ कैँ चीसँ दकचि देलक तैँ कागत दूरि गेल।
भकच पत्रकेँ यत्रकुत्र चिचाँढि़सँ युक्त करब। नेना कागत भकचि देलक-चिचाँढि़ (वृथा रेखा) सँ संयुक्तच कए देलक।
घोँकच संकुचित होएब। धोती कौँचि आएकेँ रखने घोँकचि जाएत तेँ चौपीतिकेँ राखू जे धोकचए नहि-संकुचित नहि हो।
दङच दकचब। कागज दङचलक-दकचलक
अणाच अणाचसँ गछारब, ठाठकेँ बरीमे बान्हबब। ठाठ अणाचैत अछि-अणाच (बन्धत-विशेष) सँ ठाठकेँ बरीमे बन्हैनत अछि।
पणाच आद्योपान्त सविस्तँर कहब। ओ पणाचि गेलाह-सविस्तबर कहि गेलाह।
थकुच आघात। दन्त।शून्यस व्यमक्ति थकुचल-चोटसँ आहत, पान खाइत छथि।
सकुच सङकचित होएब। बूढ़क देह सकुचि जाइत अछि-घोँकचि जाइत अछि।
पहुँच प्राप्ति होएब। चीठी पहुँचल-प्राप्तक भेल । ओ गाम पहुँचलाह-प्राप्ति भेलाह।
छ सत्ताल, रहब। छ धातुक केवल वर्तमान ओ भूतमे प्रयोग होइत अछि। संप्रति अधलाह समय अछि। पूर्व नीक छल। त्रेतामे राम छलाह। ई पुस्तकक थीक।
कछ अयथार्थावस्थाुक स्थिति देखाएब। जयलाल निन्दथ नहि छथि किन्तु निन्दँ कछने छथि-निद्रावस्थाथ, आँखि मुनब अादि, कृत्रिम कएने छथि।
गछ स्वीकार। अहाँकेँ पुस्तीक देब से ओ गछलैन्हि-स्वीककार कएलैन्हि ।
काछ हाथमे लगबाक योग्य वस्तु क उद्धार। बासनमे घृत जमल अछि, ओकरा हाथसँ काछू- उद्धृत करू।
बिछ पसरल लघु वस्तु क हाथसँ एकाएकी ग्रहण। भालसरीक फूल गाछतर बहुत खसल अछि ओकरा बीछि लाउ-एकाएकी हाथसँ उठाए लाउ ।
पुछ प्रश्नर। हमरा भवदेव पुछलैन्हि-प्रश्न। कएलैन्हि जे अहाँ कतए रहैत छी।
पोछ 1. लिप्तछ वस्तुशक अपाकरण। 2. तदूद्वारा साफ करब। नेनाकेँ देहमे गर्दा लागल छैक, पोछि दिऔक-संमार्जित कए दिऔक। शास्त्र क आज्ञा जे स्नांन कए देह नहि पोछी-संमार्जित नहि करी।
गीँछ पृथक्-पृथक् बान्ह लकेँ एकट्ठा कए बान्हकब। दुहू धानक बोझकेँ गौँछि- एकट्ठा बान्हि, लए जो
मुरछ धार ( अस्त्राजग्रभाग) क कुण्ठित होएब। बसिलाक धार काँटीमे लागल तेँ मुरछल-कुण्ठित भेल, टुटि वा लबि गेल।
लोहछ क्रोधाविवश उल्वीण पित्तसँ युक्त होएब। हरबाह हर जोतिकेँ अएला पर रौदेँ लोहछल रहैत अछि-उल्वेण-पित्तक रहैत अछि, तेँ ओकरा तामस अधिक होइत छैक।
परिछ प्रमाणत: योग्यक होएब। हमरा ई अङा् नहि परिछैत अछि-देहप्रमाणानुरूप नहि होइत अछि, तेँ नहि पहिरैत छी
निहुछ देवताकेँ चढ़एबाक उद्देर्शें राखब। ई छागर निहुछल अछि- देवताकेँ बलिप्रदानक उद्देशेँ राखल अछि।
गज आनन्दरसँ मनमे अभिमान मानब। अहाँ गजैत छी- मनमे अभिमान करैत छी जे धनजनसँ संपत्र छी। हमरा कोन चिन्ताध ?
छज योग्या होएब (नीक लागब)। हुनका अभिमान करब छजैत छैन्हि-योग्य छैन्हि। जकरा पाग पहिरबाक अभ्या स नहि तकरा पाग नहि छजैत छैक-नीक लगैत छैक।
भज खदरासँ बदलल जाएब। रुपैआ भजल वा भैजल-खुदरासँ बदलल गेल।
भँज ,,
सज दुरुस्तज करब। ठेँगा सजैत छी-छीलिकेँ दुरुस्ते करैत छी। बरिआम सजल अछि-यथावत् सत्रिवेशत अछि।
खिज धान्याेदि झरब। खेतमे धान खिजैत अछि-झरैत अछि, तेँ शीघ्र काटू।
गिज पुन:पुन: स्पतर्श। नेना थाल गिजैत अछि-वारंवार छुबैत अछि। पानि गिजेत अछि।
छिज धान्याादिक पाकिकेँ झरब। धान खेतमे आब छिजत-पाकिकेँ झरत, तेँ शीघ्र काटू।
भिज सार्द्र होएब, जलादियुक्त होएब। वर्षामे नूआ भिजल-तितल, सार्द्र भेल।
पुज पूजन, देवताक आराधन। भगवान पूजल गेलाह-अर्चित भेलाह।
भुज पात्रमे राखि बिनु जलादिक पाक। पनिपिआइक हेतु बदाम भुजल-भृष्टए भेल।
तेज त्यािगब। हम चिन्ताह तेजल-छाड़ल।
गोज डंटाकेँ जलक तरमे वारंवार भेँसब। इनारमे लग्गी लएकेँ गोजू-जलक तर थालमे भेँ सू, तखन खसल डोल ओहिमे अभरत।
गर्ज जोरसँ ध्वा।ने करब। मेघ गजैंत अछि-ध्वबनि करैत अछि। वनमे सिंह गर्जैत अछि-नाद करैत अछि।
बर्ज त्या गब। हम कुपथ्य बर्जल-त्या गल
उपज उत्पुत्ति (निर्जीब धान्याथदिक)। विना वर्षें धान नहि उपजत-उत्प त्र नहि होएत। हमरा उपजा कम भेल।
गरज सिंहादिक शब्दज। मेघ वा सिंह गरजैत अछि- जोरसँ शब्दव करैत अछि।
बरज त्यावग। अहाँ कुसंयम नहि बरजैत छी-नहि छोड़ैत छी, तखन दु:ख कोना छुटक ?
सिरज सृष्टि। विधाता संसारकेँ सिरजैत छथि। हमर जे विधाता सिरजलैन्हि-उत्पमत्र कएलैन्हि से किंनिमित्त ? एकर प्रयोग प्राय: विधिकृत निर्माणहिमे होइत अछि।
खराज यन्त्रह घुमाए छीलब। ई पौआ कारीगरक खराजल अछि-खराज नामक यन्त्र द्धारा छीलि बनाओल अछि।
अँगेज सह्म करब। हम आब एहि दु:खकेँ अँगेजल वा अङेजल-सह्म कएल।
अङेज ,,
बुझ जानब। अहाँक अभिप्राय हम बुझल-ज्ञात कएल।
रुझ रुष्ट होएब। देवदत्तकेँ भानसमे विलम्ब भेलैन्हि तेँ रुझलाह-रुष्टम भेलाह।
लुझ काककर्तृक हठात् ग्रहण। कौआ भात लुझलक-लए लेलक।
सुझ ।. दृष्टिगोचर होएब।
2. जानब। गिद्धकेँ सए कोस सुझैत छैक-दृष्टि जानि पड़ैत अछि जे आगाँ की भावी छैक।
बिरुझ विरुद्ध होएब जयलाल भवदेवसँ बिरुझल छथि-विरोध कएने छथि।
अँट मध्य मे समाविष्टी होएब। एहि लोटाक मुह सिकस्ति छैक, तेँ हाथ नहि अँटत-नहि पैसत। एहि बोरामे दू मन धान नहि अँटत-समाविष्टर नहि होएत।
कट 1. कालादिक यापित (व्यनतीत) होएब। 2. छित्र होएब। हमरा कोनहुना दिन कटैत अछि ओ कटल-वितल। धान कटल-छित्र भेल।
खट कार्यमे अनवरत लागब। हम खटैत छी-अनवरत कार्यमे प्रवृत्त रहैत छी।
घट कम होएब। एक मन धान, छल, सुखएलासँ एक पसेरी घटल-कम भेल।
डट संनद्ध होएब। मारि करबालए जयलाल डटल छथि-संत्रद्ध छथि।
पट 1. मेल खाएब। 2. व्या प्त होएब। हमरा यदुवीरसँ नहि पटैत अछि-मिलान नहि होइत अछि अर्थात् झगड़ा भए जाइत अछि।
लट बल-मांस-हीन होएब। देवनाथ दु:खसँ लटि गेल छथि-बलमांसहीन भए गेल छथि
सट संयुक्त होएब। अहाँ देहमे सटू जनु-संयुक्ता जनु होउ।
हट पृथक् होएब। एहि ठामसँ तोँ हट-फराक हो। हमरा घरसँ भवनाथक घर हटल छैन्हि-असंयुक्ता छैन्हि।
हँट दबाड़ब। अहाँ नेनाकेँ हँटू-दबाडू जे उपद्रव नहि करए।
छिट विकिरण। चाउर छिटत अछि-विकीर्ण करैत अछि।
पिट ताड़न। स्त्रीिगण शोकेँ माथ छाती पिटैत अछि-आहत करेत अछि। हम चोरकेँ पकडि पिटलहुँ-आहत कएलहुँ
सिट विन्युस्तआ करब। इसखी देहकेँ सिटने रहैत अछि-विन्याेसयुक्तै कएने रहैत अछि।
कुट कुट्टन, ऊपरसँ आघात। उखरिमे धान कुटैत अछि-मुसरसँ वारंवार आहत करैत अछि।
खुट खुट्टा गाडि़ नापब। हमर घर भवदेव खुटि देलैन्हि-नापिकेँ खुट्टा देलैन्हि।
छुट त्य्क्त होएब। हमर नोसिदानी बाटहि छुटल-त्यवक्त भए रहि गेल। हमरा दु:ख छुटल-त्यरक्त भेल।
जुट एकट्ठा होएब। सभामे लोकसभ जुटल अछि-एकट्ठा अछि।
झुट चारू दिशसँ लागब। लोकसभ चोरपर झुटल-चारू दिशसँ लागल।
टुट भग्न। होएब। रामहिँक बुतेँ महादेवक धनुष टुटल-भग्नि भेल। ई डोरी नहि टुटत-भग्न नहि होएत। एहि धातुसँ प्रेरणामे अब् नहि अबैत अछि, तेँ टुटबैत छी इत्याबदि प्रयोग नहि, ओहि अर्थमे तोड़ धातुक प्रयोग होइत अछि, यथा धनुष टुटल, ओकरा रामचन्द्रट तोड़ल।
फुट 1. एकदेशमे भग्नच होएब। 2. पृथक् होएब। फुटल-भग्न् थारीमे नहि खाइ। एहूसँ अब् नहि अबैत अछि। ओहि अर्थमे फोड़ धातु बाजल जाइछ। यथा, थारी फुटल, तकरा हम फोड़ल। गोनू भाएसँ फुटलाह-पृथक् भेलाह।
लुट लुण्ठहन। हुनक सर्वस्वठ डाकूसभ लूटि लेलकैन्हि-बलात् लए लेलकैन्हि। महाराज पुत्र जन्मो त्सिवमे रुपैआ लुटओलैन्हि।
गेँट तराउपरी कए एकट्ठा करब। लकड़ीसभ गेँटल अछि-तराउपरी एकट्ठा कएल अछि।
भेट पाएब। हेराएल वस्तुछ भेटल। दोशाला इनमा महाराजसँ भेटल-पाओल।
खोँट नहसँ काटब। खडि़का खेँटिकेँ-नहसँ काटिकेँ दिअ।
घोट आमर्दन करब। बसहा कगज मँडि़आए गेलहीसँ घोटैत छथि-घृष्टँ करैत छथि। कण्डीममे नोसि घोँटैत अछि-आमर्दन करैत अछि।
घोँट सार्द्रवस्तुघ कण्ठकसँ नीचाँ लए जाएब। पानि घोँ टबामे, कण्ठसँ नीचा लए जएबामे, कण्ठण दुखाइत अछि।
सोट 1. आघर्षणसँ चिक्क्न करब।
2. शीघ्र शोषण। डोरी सोटैत अछि-घर्षणासँ चिक्न्ि बनबैत अछि।
औँट 1. जलक ओ दूधक बरकब।
2. यन्त्रद द्वारा बङौरसँ बाङक पृथक्कार। दूध व पानि औँटैत अछि-बरकबैत अछि।
उकट 1. उदघाटन।
2. पुरुषाक कलङक कहब। नेनासभ माटि उकटलक-उखालक। जयलालक पुरुषाकेँ भवदेव उकटलैन्हि-कलङक कहलथीन्हक।
चोकट रसशुष्कलता हेतुक सकुचब। काँच आम गोरल से चोकटि गेल-सकुचि गेल
निघट नि:शेष होएब। जारन जे छल से निघटल-खर्च होइत निश्शेेष भेल, अवशिष्टस नहि रहल, तेँ भानस नहि भए सकल।
झपट पक्षीक जोरसँ आक्रमण। चिलहोरि सोहारीपर झपअल-आक्रमण कएलक। कौआ झपटि, जोरसँ आबि आक्रमण कए,नेनाक हाथासँ रोटी लए गेलैक।
दपट क्रोधेँ जोरसँ फजहति करब। देवदत्त भवत्तपर दपटलाह-जोरसँ भवदत्तक गञ्जन कएलैन्हि।
लपट 1. कुस्तीन सिखब।
2. ज्वातलाक दूरत: आक्रमण। 1. जयवीर खलीफासँ लपटैत छथि-मल्ल.युद्ध सिखैत छथि।
2.एक धरमे लागल आगि लपटिकेँ, दूर ज्वा.लासँ आक्रमण कए, दोसरहु धरमे लागल।
उपट 1. स्थालनान्त रमे बसबाक हेतु आवास-भूमिक त्यानग
2. त्याक्तमूल होएब। 1. देवदत्त विष्णु्पुरसँ उपटलाह-अन्यलत्र वासेच्छाससँ घर हटओलैन्हि।
2. हमरा फुलबाड़ी सँ बेली फूल उपटि गेल-त्याक्त मूल भेल।
समट विकीर्णं वस्तुयक एकट्ठा करब। चाउर छिरिआएल अछि,ओकरा समटू-एकट्ठा करू।
पलट पूर्वावस्थालक प्राप्ति। ज्व्र पलटि गेल-फेर पूर्ववत् भए गेल।
बिलट अरक्षाप्रयुक्त नष्ट होएब। बूडि़क धन बिलटैत अछि-अरक्षासँ नष्टव होइत अछि।
उलट परिवर्तन। समय उलटि गेल-बदलि गेल । ई लकड़ी हमरा बुतेँ उलटत-परिवृत होएत। उलटल पटिआपर नहि बैसी।
पहट कड़हारिक द्वारा त्यािज्यल भागक वियोजन। सोझ-साझ करबाक हेतु लकड़ी पहटू-त्या ज्यरभागकेँ कुड़हरिसँ हटाउ।
सहट 1. मन्दय मन्दँ हटब।
2. मन्दय मन्दँ घुसकब। एहि ठामसूं ओ सहटलाह-मन्दमन्दउ हटलाह। नाचक लग लोक सहटल जाइत अछि-कनिएँ 2. आगाँ घुसकल जाइत अछि।
बकुट बाकुटसँ धरब। अहाँ एहि नेनाकेँ किएक बकुटलैक-बाकुटसँ धएलैक, तहिँ कनैत अछि। वायु पेट बकुटने अछि इत्याहदि प्रयोग लाक्षणिक जानब।
समेट विकीर्ण वस्तु।क एकट्ठा करब। चाउर छिरिआएल, अहाँ ओकरा समेटू-एकट्ठा करू।
खरकट दृढ़ मैलसँ युक्त होएब। एहि लोटामे मैल खरकटल अछि-जामिकेँ बैसल अछि। लोटा खरकटल अछि इत्याैदि प्रयोग लाक्षणिक ।
हुरपेट बजारिकेँ सिंहक बीचसँ दाबब, मारब। मरखाहि गाए जयलालकेँ हुरपेटलक-बजारिकेँ सिंहक बीचसँ दबओललक।
नठ अपलाप, कएल क्रियाक निषेध कहब। हमरासँ जयलाल एक रुपैआ लेलैन्हि, आब ओकरा नठैत छथि-हम नहि लेल एहि शब्देँै अस्वीमकार करैत छथि।
सठ सधब, नि:शेष होएब। जारन जे छल से सठल-नि:शेष भेल।
उठ 1. उत्थािन।
2. प्रवृत्ति।
3. व्यवय ।
4. आँखिक रोग। जयलाल उठलाह-ठाढ़ भेलाह आदि।
ऐँठ घुमाएब। ई नेना उकैठ करैत अछि, एकर कान ऐँ ठह-हाथसँ पकडि़ घुमाबह।
सपठ बराबरि सङ्ग बहबाक हेतु आनक बड़दसँ जोड़ा लागब। हमरा एकेटा बड़द अछि, से नहि सपठैत अछि-नियमपूर्वक बराबरि सङ्ग बहबाक हेतु आनक बड़दसँ जोड़ा नहि लगैत अछि।
उमठ अतिभोगजन्यछ तृप्ति। जयलाल मधुरसँ उमठलाह-अधिक मधुर खएलासँ आब मधुर खएबाक इच्छा नहि होइत छैन्हि।
खुरेठ खुरसँ दाबब। हमर पाएर गाए खुरेठलक-खुरसँ दबओलक।
कन्हे।ठ कान्ह। पर लेब लकड़ी कन्हेएठिकेँ, कान्हठपर लएकेँ अनलक।
अड़ रुकब। बहुत घोड़ा चलबाक काल अड़ैत अछि-रुकैत अछि, चालि छोडि़ ठाढ़ भए जाइत अछि। पानि बिना धानक रोपनि अड़ल अछि। कार्य अड़ल अछि।
गड़ निखात होएब। पाएरमे काँट-भितर पैसल।
पड़ 1. प्रवृत्ति ।
2. प्राप्ति।
3. मनसँ पर स्म रण।
4. बुद्धिविषयीभवन ।
5. पतन। अहाँ एहिमे जनु पडू-प्रवृत्त जनु होउ। अकाल पड़ल प्रवृत्त भेल। रुपैआ हाथमे पड़ल-प्राप्तभ भेल। अहाँकेँ जाए पड़त-प्राप्त़ होएत। नुआमे दाग पड़ल, देहपर पानि पड़ल-प्राप्त भेल। मन शब्दजसँपर प्रयुक्तल पड़ धातु स्मदरण अर्थमे जानब। मन पड़ब-स्मडरण भेल। जानि पड़ल-ज्ञानविषय भेल। देखि पड़ल, सुनि पड़ल, बुझि पड़ल-तत्तज्ज्ञाडनगोचर भेल। पानि पडि़ रहल अछि-खसि रहल अछि।
लड़ युद्ध करब। रावण रामसँ लड़ल-युद्ध कएलक।
सड़ नि:सार होएब। खढ़ भिजलासँ सडि़ गेल-निस्सा।र भए गेल; सड़ल आमकेँ फेकू।
गाड़ निखनन। ई खाम्हल चारि हाथ गाड़ल अछि-माटिमे प्रवेशित अछि।
छाड़ छोड़ब (त्या ग)। धोती छाड़ैत छथि-देहसँ हटबैत छथि। ओ पढ़ब छाड़लक-छोड़लक।
डाँड़ दण्ड़न। जयलाल दस रुपैआ डाँड़ल गेलाह-हुनकासँ दस टाका दण्डल लेल गेल।
पाड़ 1. पातित करब ।
2. मनसँ पर स्म रण करब। हम अहाँकेँ खाटपर पाडि़ दैत छी-पातित कए दैत छी, सुताए दैत छी। अहाँ मन पाडूजे कुञ्जी कतए राखल ।
साड़ निस्सानर करब। पाकल आमकेँ अहाँ साड़ल-नि:सार कएल किन्तु खाएल नहि।
गिड़ निगलन। साप बेङकेँ किन्तुु गिडि़ जाउ।
मिड़ मर्दन। धान पाएरसँ मिड़ैत अछि-आमर्दित करैत अछि जे सीससँ झडि़जाए। आँखि मिड़ैत अछि-हाथसँ मलैत अछि।
उड़ 1. उड्डयन, आकाशमार्गें जाएब।
2. मेटाएब। विलुप्त होएब। पक्षी उड़ैत अछि- आकाशमे चलैत अछि। अत्यैधिक दिनक लिखल पोथीक अक्षर उडि़ जाइत छैक-विलुस भए जाइत छैक। हरदिक रङ्ग रौदमे उडि जाइत अछि-नष्ट भए जाइत अछि।
गुड़ आमर्दन, जाहिसँ पिण्डीजभूत विशकलीभूत हो। गुड़ ओ उत्तम थीक जे गुड़ने, आमर्दन कएने, बुकनी भए जाए।
जुड़ उपायसँ लभ्यम होएब। हमरा जे जुड़ल, उपायलभ्य भेल, से अहाँकेँ देल।
बुड़ नष्टक होएब। जयलाल धन बुड़लैन्हि-विनष्टा भेलैन्हि।
मुड़ 1. ठकब।
2. माथक केश अस्तुारासँ काटब।
देवदत्त बजारमे बनिआसँ मुड़ल गेलाह-ठकल गेलाह। माथ गेल-छित्रकेश भेल।
रेड़ जोरसँ टारब। मेलामे लोक रेड़ल जाइत अछि-जोरसँ ठेलल जाइत अछि।
कोड़ खनन। पोखरि कोड़ैत अछि-खुनैत अछि।
छोड़ त्यािग। अधलाह वृत्ति छोड़बाक चाही-तेजबाक चाही।
जोड़ 1. संकलन।
2. युक्त करब। रुपैआक खर्च जोड़ैत अछि-ठीकैत अछि। चूल्हिमे जारन जोड़ैत अछि। हथहरमे टोटी जोड़ल-युक्त। रहैत छैक।
तोड़ भञ्जन। रामचन्द्रह महादेवक धनषु तोड़लैन्हि-भग्नन कएलैन्हि।
फोड़ पक्कासँ वा खसलासँ भग्न। होएबाक योग्यस वस्तु क भञ्जन। अहाँ जल भरबाक काल घैल फोड़ल-भग्न कएल।
मोड़ वक्र करब (लाम वस्तु़क संकोचन)। जगह कम अछि तेँ पाएर मोडि़केँ-संकुचित कए सुतबाक होएत।
दौड़ धावन (अति वेगासँ गमन)। कुकुर दौडि़केँ-अतिबेगसँ जाए सिकारकेँ धरैत अछि। भोजनोत्तर दौड़ब-धावन दु:खप्रद थीक।
जकड़ 1. सञ्चारशून्य़ होएब ।
2. दृढ़तया पकड़ब। बातरससँ पाएर जकडि़ गेल अछि-संचारराहित भए गेल अछि। ज्विर हमरा जकड़मे अछि-दृढ़ भए धएने अछि।
भकड़ तण्डुजलादिक विकारसँ युक्त होएब। ई चाउर भकडि़ गेल-विकारसँ युक्तए भेल।
अखड़ सन्दिग्ध होएब। हुनक एक बात हमरा अखड़ल-तर्क-वितर्क उत्प ज्ञ कएलक।
निखड़ स्पडष्ट अङिकत होएब। अहाँ पोथी जे लिखल ताहिमे तकोक ठाम अक्षर निखड़ल नहि अछि-स्पेष्टभ अङित नहि अछि । थालमे पाएर निखड़ैत अछि।
उखड़ 1. उपड़ब, मूलसंयोग छोड़ब।
2. निखड़ब। बिना कोड़ने खुट्टा नहि उखड़त-उत्खाबत नहि होएत। अक्षर नहि उखड़ल-नहि निखड़ल। ओहि दरबारसँ जयलाल उखड़लाह इत्यारदि प्रयोग लाक्षणिक जानब।
खोखड़ अस्त्रा गग्रकर्षणसँ वियोजन। सुखदेबा माटि खोखड़ैत अछि-अस्त्राकग्र लगाए घैँचि घैँचि हटबैत अछि। दाउन करबाक काल माटिमे सटल धान खोखडि़केँ जमा करैत अछि।
झोखड़ वलीपलितक प्राप्ति। देवदत्त झोखड़लाह-चमड़ा संकुचित भेलैन्हि।
झगड़ कलह करब। झगड़ैत छथि-कलह करैत छथि।
रगड़ घर्षण। देवदत्त चानन रगड़ैत छथि-घँसैत छथि।
बिगड़ विकारक प्राप्ति। काष्ठौ षधि छओ मासक बाद बिगडि़ जाइत अछि-विकारयुक्तब भए जाइत अछि। घोड़ा बिगड़ल-विकारसँ बदमासी कएलक। देवदत्त बिगड़लाह-विकार पओलैन्हि, अर्थात् क्रुद्ध भेलाह ।
टघड़ स्व़त: नीच गमन। बट्टुक टघडि़केँ पानिमे चल गेल।
टुघड़ घुसुकि-घुसुकि आगाँ जाएब। ई नेना टुघड़ैत अछि-घुसुकि-घुसुकि आगाँ जाइत अछि।
पछड़ बजारल जाएब। देवदत्त पछड़लाह-बजारल गेलह।
पिछड़ स्खडलन, विचलन। देवदत्त पिछड़लाह-स्खरलित भेलाह, पाएर छछलि गेलैतिन्हु।
नोछड़ नखाघात। एकरा अहाँ किएक नोछड़लिऐक-नहसँ कटलैक ?
उपड़ उखड़ब, मूलवियोग। रोप होएबाक हेतु धानक बीआ उपड़ैत अछि-माटिसँ समूल उदधृत होइत अछि।
धफड़ धालिमे शीध्रता करब। अहाँ धफडि़केँ चलू-शीघ्रतासँ चलू।
फुफड़ उपर विकारसँ युक्त होएब। दही फुफड़ल-उपर विकासँ युक्तू भेल। फुफड़ी लागल।
उमड़ परिपूर्ति। पथिआ धानसँ उमड़ल अछि-परिपूर्ण अछि।
हुमड़ शब्द़ करब। बाघ हुमड़ैत अछि-गम्भीरर शब्दछ करैत अछि।
सुरड़ एकमे संबद्ध अनेक वस्तुरक हाथसँ आकर्षण। खेतमे पाकल धान नेना सभी सुरड़ैत अछि-हाथसँ आकृष्टस करैत अछि।
उखाड़ मूलरहित निखात वस्तुकक उपर करब। खाम्हर जे गाड़ल अछि तकरा उखाडै़त अछि-तरसँ उपर लबैत अछि।
टधाड़ रेखाकारेँ जलादिक बहाएब। पानि हेराएकेँ जनु टघाडू-बहाबी जनु; पटिआ जाएत।
पछाड़ पटकब। कुस्तीामे जयसिंह भवदेवकेँ पछाइलक-बजारलक।
उजाड़ सर्वावयव-वियोजन। एहि घरकेँ उजाडि़-वियोजित कए फेरिकेँ बान्हडब।
उपाड़ उत्पाेटन, समूल वस्तुफक घैचिकेँ वा कोडि़केँ भूल वियोजन। दूबि उपाड़ैत अछि-समूल वियुक्तत करैत अछि।
दबाड़ डाँटब। मालिक नोकरकेँ दबाड़ैत छथि-डैंटैत छथि।
नछोड़ नखसँ आघात। अहाँ एकरा किएक नछोड़लिऐक-नहसँ किएक आहत कएलिऐक ?
निपोड़ दैन्य़सूचक दाँतक प्रकाशन। जयलाल दाँत निपोड़लैन्हि-दीनतासँ दाँत देखओलैन्हि तेँ ओ दण्डित नहि भेलाह।
मसोड़ मचोड़ब। घाड़ मसोड़ैत छथि-मचोड़ैत छथि जे सिरसंकोच छूटाए
गुमसड़ गूमिकेँ सड़ब। ई धान विना सुखओने राखल तेँ गुमसड़ल-गूमिकेँ विकृत भेल।
घसमोड़ बेसिकेँ घाड़ मोडि़ दुहू हाथपर माथ राखब। देवदत्त घसमोड़ने छथि-बैसल घाड़ मोडि़ दुहू हाथ माथपर रखने छथि।
गढ़ रचना (आभूणक निर्माण)। सोनार गहना अछि-निर्मित करैत अछि। औँठी गढ़लक-बनओलक
चढ़ आरोहण (उञ्जपर जाएब)। कोठापर चढ़ैत अछि-आरोहण करैत अछि। गाछपर बानर चढ़ल अछि-आरूढ़ अछि।
पढ़ 1. पठन, पारायण ।
2. अध्य यन, गुरुसँ सार्थ अवगम। पुराण पढ़ैत छथि-पारायण करैत छथि। चीठी पढ़ैत छथि-बचैत छथि। व्यािकरण पढ़ैत छथि-गुरुसँ अर्थसहित बुझैत छथि।
बढ़ वृद्धि। वर्षा-समय धारमे पानि बढ़ैत अछि-उपचीयमान होअत अछि।
मढ़ संयोजन। लाठी तारसूं मढ़ैत अछि-युक्तच करैत अछि। झुट्टी मढ़ल-युक्त़ कएल
काढ़ 1. पात्रसँ उद्धरण।
2. नाओ चलबाक हेतु पानिक आघात। पाकपात्रसँ भात काढ़ैत छथि-उद्धृत करैत छथि।
बाढ़ संमार्जन ( भूमिक गर्दाप्रभृतिक अपाकरणसँ शोधन)। घर बाढ़निसँ बाढ़ैत अछि-संमार्जित करैत अछि।
बेढ़ वेष्टअन। माल नहि जाए एहि हेतु बाड़ीकेँ बेढ़ैत छथि-वेष्टित करैत छथि।
लेढ़ कर्दमसँ समन्ताषत् युक्त होएब। सूगर खत्तामे लेढ़ैत अछि-थाल लगबैत अ अछि।
ऐँढ़ ऐँठब। सुतरीकेँ ऐँढ़ैत अछि-ऐँठेत अछि। एकर रस्साक बनाओत।
ओढ़ देहपर वस्त्र क पसारिकेँ समान्तासत् लगाएब। जाड़-समय लोक तुराइ ओढ़ैत अछि-पसारिकेँ लगबैत अछि।
लोढ़ सीस बीछब खेतमे। धान कटलापर सीस लोढ़ैत अछि-बीछैत अछि।
औँढ़ आभ्यतन्त र ममोर। बुझि पड़ैत अछि पेटकेँ औँढ़ैत अछि-चालित करैत अछि।
ड्यौढ़ ड्योढ़ कए लगाएब। टाटकेँ डयौढि़ देलासँ-ड्योढ़ कए लगओलासँ परदा होएत।
अमेढ़ ऐँठब। खाम्हसकेँ अमेढि़-ऐँठिकेँ गर घुमाउ
चकोढ़ सञ्चार शून्यह करब। बातरस देहकेँ चकोढि़ लेलक अछि-राञ्चारशून्य कए देलक अछि।
ढकढोढ़ वस्तु़ हड़बड़बैत ताकब। अहाँ वस्तु्सभकेँ किएक ढकढोढ़ैत छी-हड़बड़बैत तकैत छी।
खत छेदनजात चिह्रसँ युक्त करब। ई बेलही नोसिदानी खतल अछि-कित्र्चित् 2. काटि चिन्हचसँ युक्त कएल अछि। केबाड़मे खतिकेँ-छेदनसँ युक्त कए नखासी कएल अछि।
मत मदसँ युक्त होएब (हाथीक)। हाथी मतल-मदसँ युक्तथ भेल।
जित 1. जय (उत्कर्षलाभ)।
2. अभिभव ।
3. काँति लेब। ई नेना खेडि़मे सभसँ जितैत अछि-सभसँ उत्कृिष्टस होइत अछि। शत्रु जीतल गेल-अभिभूत भेल अर्थात् हारल। हम जूआमे हजार रुपैआ जीतल-प्राप्त कएल।
तित आर्द्रीभाव (पानि सँ भिजब)। जयलाल वर्षामे तितलाह-भिजलाह। नुआ तितल अछि-पानिसँ भिजल अछि।
बित व्तीतितत होएब। अवसर बितल-व्यहतीत भेल।
रित अधिक सङ्ग मन मिलब। ई नेना हमरामे रितल अछि-मनसँ मिलल, अछि, कारण जे हम अधिक काल कोरकेँ लैत छिऐक।
कुत कन करब। खेतक धान कुतल-कन कएल, अन्दाधजसँ इयत्ता कएल।
छुत संपर्कदुष्टत होएब। भात छुतल-संपर्कदुष्टल भेल, हेतु जे कुकुर छूबि देलक।
मुत मूत्रत्याेग। नेना बिछाओनपर मुतलक-मूत्रत्या ग कएलक, तेँ बिछाओन धोएले गेल अछि।
सैँत ओरिआएकेँ राखब। नोकर वस्तुासभ सैंतैत अछि-ओरिआए रखैत अछि।
गोँत पशुक मूत्रत्यामग। माल प्रात: काल गाँतैत अछि-गोँत करैत अछि। जे मनुष्यभक मूत्र से मालक गोँत कहबैत अछि।
जोत 1. हरसँ विदारण ।
2. शकटमे वाहनक योजना। हरबाह खेत जोतैत अछि-हरसँ विदारित करैत अछि। गाड़ीमे बड़दकेँ बहल-मान जोतैत अछि-युक्तर करैत अछि।
न्योँित निमन्त्र ण। हम ब्राह्मणकेँ न्योैतल-निमन्त्रित कएल।
व्योँरत बिलोबन्द करब। हम कार्यसभ ब्योँ तल-बिलोबन्द् कएल।
चिन्तब गुरुसँ अधीतक अनकासँ बुझब। अहाँ हमरासँ पढि़ कोनो विद्यार्थीसँ चिन्तहल करू-बूझल करू।
बकत भूतक व्य क्त वचन। झोँका देने भूत बकतल-व्त् करू कथा बाजल।
चौपेत 1. तराउपर करब।
2. मोडि़माडि़ चौखूट करब। कपड़ासभ अहाँ चौपेतिकेँ-मोडि़ चौखूट कए राखू। लकड़ीसभ चौपेतल अछि-तराउपरी कए राखल अछि।
अरिआत अनुव्रजन। पाहुनकेँ अरिआतैत छथि-अनुव्रजन करैत छथि। सभापतिकेँ अरिआति सभामे अनिऔन्हि।
भथ भसाठसँ उच्चह होएब। बाढि़मे पाँक खसलासँ पोखरि भथल-उच्च़ भेल।
मथ मन्थ़न, दूध (जलादि) क घुमाए
2. आघात। दूध मथैत अछि-मन्थ न करैत अछि।
कुथ गुदमार्गद्वारा निस्सा्रसणक्लेश। नेना कुथैत अछि-अमांसएसँ गुदामार्गद्धारा जोर पड़लासँ क्ले श पबैत अछि।
गुथ सूत्रमे दृढ़ संबन्ध । फूलक मालकेँ गुथैत अछि-दृढ़ सम्बमद्ध करैत अछि। गथला पर फूल आदिमे परस्पअर किछु अन्तिर रहि जाइत छैक वा जोरसँ मिलल नहि रहैत अछि, तकरा ससारि
2. जोरसँ संबद्ध करब गुथब भेल।
हुथ अनुचित गञ्जन। देवदत्त नोकरकेँ हुथैत रहैत छथि-गञ्जन करैत रहैत छथि, जे गञ्जन उचित नहि।
हँसोथ शीघ्रतया हाथसँ एकत्रित करब। देवदत्त नोकरकेँ हुथैत रहैत छथि-गञ्जन करैत रहैत छथि, जे गञ्जन करैत रहैत छथि, जे गञ्जन जे गञ्जन उचित नहि।
द 1. दान ।
2. अनिरोध ।
3. लगाएब।
4. पढ़ब।
5. करब। 1. महाराज पण्डितकेँ हाथी देल।
2. हमरा जाए दिअ-जएबाक निरोध जनु करी।
3. मन दए सुनू। देहपर हाथ दिअ अर्थात् लगाउ।
4. गारि दैत अछि-गारि पढ़ैत अछि।
5. मना देलैन्हि-निषेध कएलैन्हि। आज्ञा देलैन्हि-आज्ञा कएलैन्हि ।
बद वरणा, स्वी-कार। जयलाल हमरादिश बदल छथि-स्वीरकृत छथि।
मद वरण, स्वीिकार। एकर मद्दी नहि-स्वीकार नहि।
कुद उल्लमङूघन, कूर्दन, फानब। हनुमान समुद्र कूदि गेलाह।
छेद भूर करब। नेनाक कान छेदल गेलैक
भेद ,, सुइआसँ हाथ भेदल गेल ।
सेद तप्तस करब। हाथ सेदैत अछि-तप्त करैत अछि।
गोद वारंवार किंचित् भोँकब। स्त्रीरगण खोदहाक हेतु देह गोदबैत अछि, खोदपारिनी गोदैत छैक।
बगद विरुद्ध होएब। हमरासँ ओ बगदल छथि-विरुद्ध भेल छथि।
सोआद आस्वाँदन, रसग्रहण। मधुरकेँ सोआदैत अछि-भक्षणसँ रसग्रहण करैत अछि।
सध निश्शेणष होएब, निघटब। चाउर सधल-अवशिष्टि रहल, अर्थात् सभटा खर्च भए भेल।
साध 1. सिद्ध करब।
2. सोझ करबाक हेतु भार देव। 1. कठिन कार्य हम साधल-सिद्ध कएल। 2. चौपालाक बाँसकेँ साधू-भारसँ आक्रान्ति करू जे सोझ होएत।
खोध उदघाटन। कान काठीसँ खेधैत अछि। कठखेधी पक्षी खोधिकेँ काठमे भूर करैत अछि।
सोध शुद्ध करब। पुस्त क सोधल-शुद्ध कएल।
लुबुध एकमे अनेक गुच्छसरूपेँ रहब। चीनीमे चुट्टी लुबधल अछि।
अरबध ज्ञान। ई कार्य ओ अरबधिकेँ करताह, जानिकेँ करताह।
गन गणन। रुपैआ गनैत अछि। मोटा दशटा गनल अछि।
बन 1. सिद्धि।
2. मिलान होएब। घर बनल-निर्मित भेल। हमरा हुनकासँ नहि बनैत अछि-मिलान नहि होइत अछि, अर्थात् नहि पटैत अछि।
मान 1. स्वीअकार ।
2. संमान करब।
3. बुझब। 1. हमर कथा अहाँ मानू-स्वी कार करू। 2. अहाँकेँ गुरूजी मानैत छथि-संमान करैत छथि।
3. हम मानने छलहुँ जे अहाँ नहि आएब।
किन क्रयण। चारि टाकामे भगवानक मुकुट कीनल।
छिन बलात् ग्रहण, अनका हाथसँ। हम चोरक हाथसँ मोटा छीनल।
बिन वस्त्रा द्यर्थ तन्तु प्रभृतिक योजना ( वस्त्राुदिनिर्माण)। हम नुआ बिनैत छी, पटिआ बीनि चुकलहुँ।
खुन 1. कोड़ब ।
2. पादसँ आक्रमण।
3. गुणन।
4. गुणपरीक्षण। 1. जन सभ इनार खुनैत अछि-कोड़ैत अछि।
2. वस्तु सभ परसल अछि, तकरा माल खुनए नहि।
गुन 1. गुणन।
2. गुणीपरीक्षण 1. खेत गुनल, एक बिगहा भेल।
2. वासडीह गुनैतछथि-गुणक परीक्षा करैत छथि।
खुन 1. कोड़ब ।
2. पादसँ आक्रमण।
3. गुणन।
4. गुणपरीक्षण। 1. जन सभ इनार खुनैत अछि-कोड़ैत अछि।
2. वस्तु सभ परसल अछि, तकरा माल खुनए नहि।
तुन तुरक धुटकीसँ विश्लइषण। तुर तुनैत अछि-चुटकीसँ विश्लेअषण करैत अछि।
बुन बाओग करब। खेतमे तीसी बुनल-बाओग कएल।
मुन छिद्र बन्द करब। तुरसँ कान मुनि लिअ जे बसाल नहि लागए ।
सुन श्रवण। हम सुनैत छी-श्रवण करैत छी।
टोन काष्ठन दूखण्डश कए काटब। डारि सभ टोनू-खण्ड
2. कए काटू।
अकान कान पाथि सुनब। दूरसँ कोनो शब्दक अबैत अछि तकरा हम अकानैत छी-कान पाथि सुनैत छी।
गतान घोर सक्त् छी करबसँ तानब। खाट गतानल जाइत् अछि-घोर सक्कतत कएलासँ तानल जाइत।
गुदान अपेक्षा (कथा मानब)। ओ हमरा गुदानैत छथि-अपेक्षित करैत छथि।
पलान अतियत्नग। ओ एहि कार्यमे पलानिकेँ लगलाह, अतियत्नापूर्वक प्रवृत्त भेलाह।
उसिन धान्यानदिकेँ केवल पानिमे आगिसँ सिद्ध करब। धान वा आलू उसिनैत छथि-पानिमे आगिक ताबेँ सिद्ध करैत छथि।
बिधुन उनटाए पनटाए देखब। नेना वस्तुएजात बिधुनैत अछि-उनटबैत-पनबैत अछि।
कप कम्पतन। जाड़ेँ देह कपैत अछि। अतिवार्धक्यिसँ हाथ कपैत छैक।
खप न्यूकन होएब। ग्रहणमे सूर्य्य-चन्द्र्मा छथि।
छप 1. तिरोधान ।
2. मुद्रण । भीतक आड़मे छपि गेलाह।
जप परश्रवणागोचर मन्त्रहजय। गायत्री जपैत छथि।
टप उल्लंघन। भीत टपि गेलाह।
छिप 1. प्रच्छरन्नय होएब।
2. प्रच्छरत्र करब।
3. जोरसँ खैँचब। 1. ओ छिपल छथि-प्रच्छहत्र छथि।
2. किछु मधुर छिपलक-प्रच्छ।त्र कएलक। प्रथम अर्थमे अकर्मक, द्वितीयमे सकर्मक। 3. बनसी छिपलक-जोरसँ खँचलक।
टिप क्रीड़ामे प्रधानकेँ चालि कहब। सतरञ्जमे टिपनिहार चाही।
धिप तबब (अग्नितापसँ युक्त होएब)। जल धिपल-उष्णस भेल।
निप भमिलिम्प न। आँगन निपैत अछि-पानिगेबरसँ उपलिप्त करैत अछि।
धुप धुआँसँ पकाएब। केरा धुपैत अछि-धूआँसँ पकबैत अछि।
खेप कालातिवाहन। ओ खेपैत अछि-कालक्षेपण करैत अछि।
लेप लिप्तै करब। गोबरमाटि लेपैत अछि। लिप्तष करैत अछि।
छोप उपरसँ काटब। अधिक बढ़ल धानकेँ खसि पड़बाक डरसँ गृहस्था छोपैत अछि-उपरसँ काटि दैत अछि।
तोप आच्छाछदित करब। घरमे लागल आगि छाउर-धूरासँ तोपलक-जँतलक।
थोप ,, आगि थोपलक-आच्छा।दित कएलक।
धोप आच्छाोदन। आगिकेँ धोपलक-आच्छाैदित कएलक।
रोप रोपण। खेतमे धान रोपैत अछि।
छरप लाँधब। खेडि़मे नेनासभ छरपैत अछि वा तरपैत अछि।
तरप ,,
अड़ोप आरोप। पएर अड़ोपलक-आरोपित कएलक।
हँफ मालक मारबाक चेष्टाै। ई बड़द हैफँत अछि-मारबाक चेष्टा मात्र करैत अछि।
अब 1. आगमन ।
2. ज्ञानविषय होएब। 1. देवदत्त काशीसँ गाम अबैत छथि-आगमन करैत छथि ।
2. हमरा शास्त्र अछि-ज्ञानविषय होइत अछि।
गब गान। गबैआलोकनि गीत गबैत छथि-गीतगान करैत छथि।
तब तापसँ युक्त होएब। लोहिआ तबल-तप्त भेल।
दब 1. नीच होएब।
2. नीच करब। 1. मल्लकयुद्धमे देवदत्त सँ जयलाल दबलाह।
2. जयलालकेँ देवदत्त दबलैन्हि। प्रथमे अकर्मक, द्वितीय अर्थमे सकर्मक।
धब कित्र्चित्प्रिकाश। चन्द्र माक किरण धबल-कित्र्चित्प्रकाश भेल। रोगसँ हिनका देह पर उजरी धबैत छनि।
पब प्राप्ति। जयलाल रुपैआ पओलैन्हि-प्राप्तै कएलैन्हि।
फब लहब। ई क्रिया हुनका फबैत छैन्हि-लहैत छैन्हि।
बब व्याहदान। पक्षी ताओसँ मुह बबैत अछि।
भब प्रिय लागब। हुनका भकुओ चाउरक भात भबैत छैन्हि-मन:पूत होइत छैन्हि, अर्थात् प्रिय लगैतछैन्हि।
लब 1. नम्र होएब।
2. आनब। 1. ठारि फलक भारसँ लबल अछि-नम्र अछि।
2. पानि लबैत छथि-अनैत छथि ।
जिब प्राणधारण। जयलाल जिबैत छथि।
पिब पान। पानि पिबैत छथि।
सिब सूचीद्धारा तागसँ दूक संयोगब। दरजी अङ्ग सिबैत अछि-सूचीसँ दुरुस्ति करैत अछि। सीलक सीअत।
चुब छिद्रद्वारा जलादिक निष्ठदकाशन। घैल चुबैत अछि-छिद्र देने पानि खसबैत अछि। घर नहि चुबत-छिद्र देने जल नहि खसाओत।
छुब स्पेर्श। नेना आगि छुबि लेत-र्स्पेश कए लेत, हटाउ।
डुब निमज्जन। माछ पानिमे डुबल रहैत अछि-निमग्न रहैत अछि। डेँगी नाओ उनटलहुपर नहि डुबैत अछि।
खेब नाबक चलाएब। मल्लाचह नाओ खेबैत अछि-लए जाइत अछि।
छेब उपयुक्त करबाक हेतु छीलब। धरनि छेबैत अछि-उपयुक्तल बनएबाक हेतु छीलैत अछि।
टेब उपयोगार्हत्वेिन निश्च्य। धरनि योग गाछ टेबू-पसिन्दत करू।
लेब सार्द्र मृत्तिकासँ संयोजन। टाट लेबैत अछि।
सेब उपचार (सेवा करब)। भगवानूकेँ सेबू जे दु:खजालसँ मुक्मू होएब।
गोब क्वबचित्क्व चित् मुइल धानक जगहपर पुन: धान रोपब। खेतमे धान गोबैत अछि-कतहु-कतहु विरल भागमात्रमे धान रोपैत अछि।
झकब फलक खसबाक हेतु गाछकेँ डोलाएब। आमक गाछ: झकबैत अछि-आम खसबाक हेतु डोलबैत अछि।
निकब माछप्रभृतिकेँ रन्हैबाक योग्यर बनाएब। माछ निकबैत अछि-रन्ह बाक योग्या बनबैत अछि।
जोगब कालान्तछरमे उपयोगार्थ जुगुताएकेँ राखब। घरमे वस्तु सभ जोगबैत अछि-उपयोगाथ्र जुगुताए केँ रखैत अछि।
अँचब 1. मुखप्रक्षालनगण्डूिषादि करब।
2. ओ कराएब। देवदत्त भोजन कए अँचबैत छथि-हाथ-मुह धोइम छथि। नोकर पाहुनकेँ अचबैत छैन्हि।
निछब तृणपुञ्ज्कह छोट तृणकेँ हटाए संशोधन। खड़ही वा खढ़ निछबैत अछि-संशोधन करैत अछि।
बिछब आस्त रण। पटिआ बिछबैत अछि आस्तृछत करैत अछि।
ओछब ,, पटिआ ओछबैत अछि-आस्तृृत करैत अछि।
बजब आह्रान। सभामे पण्डितलोकनिकेँ बजाउ-आहूत करू।
पिजब तीक्ष्णी करण। बसिला पाथपर पिजबैत अछि-तीक्षण करैत अछि।
सुञ्झब प्रत्यछर्पण। मंगनी जे वस्तु् आनल से सुञ्झाए दिऔक-आपस कए दिऔक।
अण्ठीब अन्यीथा करब। ओ कहलैन्हि जे पुस्त।क देब तकरा अण्ठलओलैन्हि-अन्येथा कएलैन्हि, अर्थात् नहि देलैन्हि।
नड़ब 1. हाथसँ भूमिपर राखब । 2. अस्थँसानपर छोड़ब । ओ नोसिदानी एहि ठाम नड़ाए चल गेलह।
अढ़ब कार्यमे प्रवृत्त कराएब। जनकेँ अढ़बैत अछि-प्रवृत्त करबैत अछि।
सतब दु:ख देव। ओ हमरा सतबैत छथि-दु:ख दैत छथि।
छिपब लए लेबाक हेतु प्रच्छएन्नख करब। किछु मधुर छिपओलक-प्रच्छ्त्र कएलक।
धबब प्रच्छधत्र भए आनक प्रतीक्षा करब। चोरकँ धबबैत छी-प्रच्छ्त्र रहि प्रतीक्षा करैत छी।
चिबब चर्वण। फुटहा चिबबितहुँ जँ दाँत सक्क्त रहैत।
गमब बिताएब। हम समय गमबैत छी-बितबैत छी।
जमब अपन प्राशस्लयसूचक क्रिया करब। ओ बड़े अमबैत अछि-अपन प्राशस्य्ैत बोधक क्रिया करैत अछि।
सरब अनवरत किंचित् घुबब। घैल सरबैत अछि-अनवरत चुबैत अछि।
बेरब 1. मालक निरोध।
2. पृथक्किरण। 1. माल बेरबैत अछि-निरोध करैत अछि। 2. गहूमसँ जओ बेरबैत छी-पृथक् छी।
उलब पानिसँ अमिश्रित काँच धानक भुजब। धान उलबैत अछि-बिना भीजल अशुष्कब धान भुजैत अछि।
बैलब निकालब। हम ओकरा बैलबितहुँ जँ नीक दोसर नोकर भेटैत तँ निकालितहुँ ।
पसब 1. माँड़क अत्रसँ पृथक्कार। 2. माँड़सँ वियोजन। 1. माँड़ पसबैत छी-भातसँ हटबैत छी।
2. भात पसबैत छी- माँड़सँ वियुक्त करैत छी।
ओसब सूर्पादिसँ वायुद्वारा अत्रक साफ करब। धान ओसबैत अछि-वायु द्वारा साफ करैत अछि।
कोँचिअब वस्त्रािदिकेँ सङकचित करब। धोती कोँचिअबैत अछि-संकुचित करैत अछि।
गेँठिअब ग्रन्थिसँ युक्त करब। माला गेँठिअबैत छथि-गेँठसँ युक्त करैत छथि।
झिलिअब काटल माटिकेँ कोदारिसँ सरि करब। माटि झिलिअबैत अछि-सरि करैत अछि।
घिसिअब माटिपर घर्षणपूर्वक लए जाएब। काँट घिसिआएकेँ आन-माटिमे घर्षणपूर्वक आन।
टरकब अण्ठापएब। काज टरकबैत अछि-अण्ठमबैत अछि।
बेकछब वचनसँ अति व्यिक्त करब। अहाँ बातकेँ बेकाछबैत छी-अति व्यतक्तै करैत छी।
नँगड़ब खेहरब। चोरकेँ पाँछसँ नँगड़बैत वा नङड़बैत अछि-खेहारैत अछि।
नङड़ब ,,
पछतब पश्चा त्ताप करब। हम आब पछतबैत छी-पश्चा़त्ताप करैत छी।
परतब ज्ञातक जाँच। परताओल परताबी बुद्धिक विनाश।
जुगुतब सुरक्षित करब। आश्रमे वस्तुरजात जुगुताबी-सुरक्षित करी।
अकनब कान पाथिकेँ सुनब। हम हुनक बाजब अकनबैत छी-कान पाथि सुनैत छी।
अजमब साध्यसताक जाँच। ई सील हमरा बुतेँ उठत वा नहि से अजमबैत छी-जाँच करैत छी।
अकरब अयशक प्राप्ति। ओ करओलैन्हि-अयश प्राइज़ कएलैन्हि।
तेहरब तृतीयावृत्त करब। धान तेहरबैत छी-तेसर बेर तोलैत छी।
दोहरब द्वितीय आवृत्त करब। बात दोहरबैत छी-दोसर बेर कहैत छी।
कुम्होरब थनकेँ बढ़ाएब। महीसि कुम्हबरबैत तोलैत छी।
दोहसब दोहराएकेँ टोकब। अहाँ दोहसबैत छी-दोहराए केँ टोकैत छी।
घोँकडि़अब दुहू ठेँ गहुनकेँ मोडि़ दाढ़ी लग राखब। जाड़ेँ घोकडि़अबैत छथि-ठेँ गहुन मोडि़ दाढ़ीमे लगबैत छथि।
महलिअब महाल-महाल फुटाएब। कागज महलिअबैत छथि-महल-महल फूट करैत छथि।
खोभ आबाद खेतक विपत्र स्था नमे धान रोपब। धान खोभैत अछि-विवत्र स्था नमे रोपैत अछि।
चोभ रसयुक्तक मुहमे लगाए रसक ग्रहण। आम चोभैत अछि-मुहमे लगाए रस खाइत अछि।
टोभ बाओग करबाक योग्य बीआकेँ एकाँएकी हाथसँ बैसाएब। धानमे बदिम टोभैत अछि-एकाएकी हाथसँ बैसबैत अछि।
सोभ सौन्द र्यक प्रकाश करब। पूर्ण चन्द्र मा सोभैत छथि-शोभायुक्तु होइत छथि।
कम घटब। दश सेर मधुर पठाओल ताहिते आध सेर कमल-घट्टी भेल।
गम जाँच करब। हमर गमल अछि-जाँच कएल अछि जे हम एक मन उठाए सकब।
जम 1. उत्कृ।ष्टअ होएब।
2. जमा होएब। 1. नाच खूब जमल-उत्कृ ष्टु भेल। (एवम् भोज जमल)।
2. सभामे लोक जमल अछि-जमा अछि। घाटपर कजरी जमैत अछि-जमा होइत अछि।
नम 1. उत्कृमष्टअ होएब।
2. मालक जलाशयमे पानि पीअब। 1. आब ओ नमलाह-वार्धक्य सँ लबि गेलाह ।
2. बड़द नमल-पानि पीलक।
गुम तापसँ शिथिल होएब। मडुआ गुमल-ढेरीक तापसँ शिथिल भेल, आब मिड़ल जाएत।
घुम भ्रमण। पण्डितजी घुमैत रहैत छथि।
जुम प्राप्ती होएब। अन्नप जुमैत अछि-प्राप्तय होइत अछि। देव झा काशी जुमलाह-प्राप्ता भेलाह।
डुम निमज्ज न। नाओ पानिमे डुमल आछि-डुबल अछि। डुम धातुक प्रयोग उत्तम व्याक्तिक व्य वहारमे नहि।
दोम झमारब। एक्का। सवारकेँ बड़े दोमैत अछि-झमारैत अछि।
रोम पशुपक्षीक निवारण। गुलेतीसँ कौआ-बानर रोमैत छी-निवारित करैत छी।
जनम उत्पतत्ति। कोठापर पीपरक गाछ जनमल अछि-उत्पपत्र भेल अछि।
बिलम विलम्ब करब। अहाँ अएबामे बिलमू जनु-विलम्बप जनु करी।
कर करण (साधन)। कार्य करैत अछि, कार्य कएलक।
गर द्रववस्तुतक वस्त्रामदिसँ विच्यु्ति। खीचल नुआसँ पानि गरैत अछि-च्युदत होइछ।
चर बूलि-बूलि तृणादि-भक्षण। माल चरैत अछि-लागल तृण दाँतसँ काटि 2. खाइत अछि।
जर दग्ध होएब। नुआ जरल-दग्धख भेल।
झर पत्रफलादिक बहुत खसब। आम झरत-अधिक खसत।
टर सोझाँसँ अण्ठाुएकेँ चल जाएब। ओ एहिठामसँ टरल-लगए चल गेल।
ठर शीत होएब। हाथ-पाएर ठरल अछि-शीत अछि। जाड़मे परसल भात ठरैत अछि, खाए लिअ।
ढर पात्रसँ पतन। घैलमे पानि कम्म अछि, बिना घैल उठओने लोटामे नहि ढरत-खसत नहि।
तर 1. तेल आदिमे व्यनञ्जनादिक पाक।
2. पार होएब। 1. तिलकोड़ाक पात तरैत छथि-तेलमे वा घृतमे सिद्ध करैत छथि।
2. जे भगवानकेँ सेबलल से तारि गेल-संसारसमुद्रसँ पार भए गेल।
दर कोनहुमे गणित होएब। विष्णुेकान्तए झा पढ़ने कम्मेत छथि किन्तुे पण्डितमे दरल छथि-परिगणित छथि।
धर स्थातपन। अलमारीमे पुस्तेलक धरू-राखू।
बर मृत्तिकाशिवलिङ्ग निर्माण। महादेव बरैत छी-माटिक शिवलिङ्ग बनबैत छी।
भर 1. पूरण ।
2. दण्ड देब। 1. जलसँ पोखररि भरल-पूर्ण भेल।
2. हम दश रुपैआ भरला, हमरा दुष्टव भरओलल।
मर प्राणवियोजन। विष खएने मनुष्यद , कोचिला खएने कुकुर मरैत अछि-प्राणसँ वियुक्त् होइत अछि।
लर अति शिशुक चलब। आब जयलालक नेना लरैत अछि-किछु-किछु चलैत अछि।
हर अपहरण। हमरा भगवान् सब धन हरि लेलैन्हि-अपहृत कएलैन्हि
गार निगालन। आमक रस गारैत छी-आँठीसँ वियोजित करैत छी।
छार छादन (शीतातपनिवारणार्थ तृणादिक प्रसारण)। जनसब घर छारैत अछि-खढ़सँ आच्छाघदित करैत अछि।
जार डाहब। ई नेना नूआ जारलक-डाहक।
झार विधूनन। धोतीमे माटि लागल अछि, तेँ धोती झारैत छी-विधूनित करैत छी।
टार हटाएब। एहि ठामसँ सबकेँ टारल-पृथक् कएल, हटाओल, आब एकान्तर भेल। अहाँक बात हम टारल-हटाओल, अर्थात् नहि मानल।
ठार ठंढा करब। जाड़ मास परसल अत्र किएक ठारैत छी, खाउ गए।
ढार द्रववस्तु क पात्रासँ खसाएब। सोनार सोन गलाए ढारैत अछि-भूमिपर खसबैत अछि। हम लोटामे घैलासँ पानि ढारल।
तार तप्त पानिसँ नीचामे धानकेँ संयुक्त करब। धार तारैत अछि-नीचाँमे तप्त पानिसँ युक्ता करैत अछि।
धार 1. गृहीत ऋणक अपरिशोधन ।
2. शुभप्रद होएब। 1. हम भवदेव झाक एक सए रुपैआ धारैत छिऐन्हि-हम भवदेवसँ गृहीत एक सए रुपैआ ऋण परिशोधित नहि कएल अछि, अर्थात् आदाय नहि कएल अछि। 2. हमरा महीसि नहि धारैत अछि-शुभप्रद नहि होइत अछि। हम अनेक महीसि किनल किन्तुि मरि-मरि गेल।
पार 1. पातन ।
2. करब। 1. जनसभ खेतमे कोदारि पारैत फारैत अछि।
2. अहाँकेँ सोर पारैत अछि-सोर करैत अछि।
फार विदारण। बाँस फारैत अछि-विदलित करैत अछि।
बार त्या गब। 1. हम माछ बारने छी-त्य।क्तक कएने छी अर्थात् नहि खाइत छी।
2. भवदत्त बारल गेलाह-समाजसँ त्यअक्त् भेलाह अर्थात् समाज हुनकसँ भोलनादि व्यनवहार त्याक्तस कएलक।
भार भिजाओल धानकेँ अग्रिद्वारा पात्रमे शुष्कक करब। धान भारैत अछि-भिजाओल धान अग्निद्वारा पात्रमे शुष्कल करैत अछि।
मार 1. ताड़न।
2. प्राणवियोजन। 1. हमरा एक थापड़ मारलैन्हि।
2. माछ मारलैन्हि।
न्या.र इच्छा । हम न्यावरैत छी-इच्छाह करैत छी जे काशी जाइ।
लार दाबिसँ सञ्चालन। भात लारू-दाबिसँ वा करछुसँ भातक संचालन करू।
हार 1. काँतिमे अपन स्वरत्वचक निवर्तनपूर्वक परस्व त्वक उत्पातदन ।
2. युद्धमे अभिभूत होएब। 1. युधिष्ठिर जुआमे राज्यभ हारलैन्हि ।
2. भवदेव जयसिंह दुहू गोटे कुस्ती लड़लाह, ताहिमे भवदेव हारलैन्हि-पराजित भेलाह।
चिर विदारण। बाँसक खडि़का चिरैत अछि-विदीर्ण करैत अथ्छ़।
तिर खैँचब। चाम तिरलासँ-घैचलासँ नमरेत अछि। एहि नेनाक ठोर तिरलकैक-पकडि़ खैचलकैक।
भिर संयुक्त होएब। हमरामे अहाँ भिरलहु-संयुक्तै भेलहुँ ।
घुर फिरब। देवदत्त जाएकेँ घुरलाह-फेर आबि गेलाह
चुर चूर्ण करब। लवंग चूरल-चूर्णित कएल।
थुर थकुचब। दाँतमनिक मुह थुरि दिऔक-थकुचि दिऔक।
फुर स्फू।र्तिं होएब। हमरा किछु ने फुरैत अछि-किछु स्फु र्ति नहि होइत अछि।
हुर हूरसँ युक्त करब (दरीमे माटि दए मुसरसँ मारब)। खाम मुसरसँ हूरि दिऔक जे डोलमाल नहि करए।
घेर वेष्टरन। बाड़ी टाटसँ घेरू-वेष्टित करू।
छेर पातर पुरीषक त्यादग। ई नेना बड़े छेरैत अछि-पातर पुरीषक त्यानग करैत अछि।
टेर 1. गुदानब।
2. बंसी बजाएब। 1. अहाँकेँ अपन नेना टेरैत अछि-नहि गुदानैत अछि, अर्थात् अहाँक बात नहि मानैत अछि।
2. कृष्ण भगवान् वृन्दा वनमे वंशी टेरैत छलाह-भग्नण भए बजबैत छलाह।
पेर घुमैत यन्त्र सँ निष्पी ड़न। तेलक हेतु तेलि सरिसब पेरैत अछि-निष्पीेडि़त करैत अछि।
फेर 1. उलटाएब।
2. आपस करब।
3. घोड़ाकेँ अभ्यािसार्थ चलाएब। 1. सड़ए नहि तेँ पानकेँ फेरैत छथि-उनटबैत छथि।
2. फुटल रुपैआ फेरि देलक-आपस कएलक।
3. घोड़ाकेँ सबार फेरैत अछि-चलबैत अछि।
हेर ताकब (देखब)। हे भगवान् दीन जनकेँ हेरू-ताकू।
गोर पकबाक हेतु निमुत्र करब। केरा ओ आम गोरैत अछि-निमुत्र करैत अछि जे पाएक।
घोर 1. जलादिमे मिलाएब।
2. खाअ आदिकेँ नेवार-सुतरीसँ आच्छखन्ने करब। 1. चीनी पानिमे घोरैत अछि-मिलबैत अछि।
2. खाट धोरैत अछि-नेबार वा सुतरी वा जौरसँ आच्छात्र करैत अछि।
छोर लागल तृणक काटब। जनसब खढ़ छोरैत अछि-कटैत अछि।
झोर रञ्जक द्रवमे वस्त्रा दिक डुमाएब। जंगलकेँ शिकारक हेतु झोरैत अछि-सञ्वालित करैत अछि।
मोर संकुचित करब। बिछाओन छोट अछि, पाएर मोरिकेँ-संकुचित कएकेँ सुतब।
ढौर घून आदिसँ छछारब। कोठा चूनसँ ढौरल अछि-लिप्तम अछि।
पौर परिणामार्थ दुग्धअक पात्रमे पातन। दूध पौरैत अछि-दहीक हेतु पात्रमे दैत अछि। दही पौरैत छी एहिठाम भाविनी संज्ञाक आश्रयण जानब।
थकर ककबाप्रभृतिसँ केशक विभाग। केश थकरैत छथि-ककबासँ केशक विभाग करैत छथि ।
दकर दकचिकेँ खाएब, यत्कित्र्चिद्धागक त्याशगपूर्वक पैघ वस्तुा (आम्रादि) क भक्षण। आम दकरैत छथि-किछु खाइत छथि फेकैत छथि ।
चिकर जोरसँ बाजब। जयलाल चिकरैत छथि-जोरसँ बजैत छथि।
थुकर थूशब्दचपूर्वक उगिलब। पान थुकरैत छथि-थू शब्दसपूर्वक उगिलैत छथि।
सुकर नाकसँ कफादि विकारक वायुरेचनद्वारा त्यावग। कफ सुकरू-वायुरेचनद्वारा त्याजगू।
हुकर अचैतन्या वस्थानमे आन्ततर आर्तिसूचक मन्द मन्द् शब्द करब। पासी तारक गाछसँ खसल, चोट अधिक छैक, हुकरैत अछि-आन्तचर वेदनासँ तत्सूतचक मन्दत-मन्दच शब्दन करैत अछि।
ढेकर उदगार करब। भोजनोत्तर लोक ढेकरैत अछि-ढेकरैत अछि-ढेकार करैत अछि।
बोकर बान्ति (वमन)। देवदत्त ज्वोरमे बोकरैत छथि-वमन करैत छथि।
झखर 1. वार्द्धक्यमजन्ये विकारक प्राप्ति।
2. सकल फलसँ वियुक्त होएब। देव झा आब झखरलाह-वार्धक्ययजन्या शरीरक ह्रास प्राप्तँ कएलैन्हि।
धोखर जलसंयोगसँ अपगम। पोथी भिजल, आखर धोखरि गेलैक-अपगत भए गेलैक।
उगर उर्वरित होएब (शेष रहब)। मधुर दश सेर उगरल-खर्च कए शेष रहल।
ओगर समीपस्थितिपूर्वक रक्षण। हम नेनाकेँ ओगरैत छी-लगमे बेप्ति रक्षा करैत छी।
खँघर जलप्रवाहसँ कटब। उपर देने पानि खसलैक, तेँ पोखरि खँधरल-कटल।
उधर उद्घटित होएब। अधलाह सतरञ्जीक आँचर जाइत छैक-उद्घटित भए जाइत छकै, अर्थात् बानसँ विमुक्तद होइत अदि। ताग उधरल।
मोचर ऐँठब। हाथ मोचरलैन्हि-ऐंठलैन्हि।
पछर 1. पराजित होएब।
2. श्रमसँ अक्षम होएब। देवदत्त पछरलाह-पराजित भेलाह।
पजर प्रज्वतलन। आगि पजरल-प्रज्वषलित भेल।
बजर प्रवृत्ति। आइ मधुकान्तलक ओहिठाम चोरसब बजरल-प्रवृत्त भेल।
मजर जञ्र्जारत होएब। आम मजरल-मञ्जारित भेल।
उजर बन्धजनसँ सिद्ध वस्तुोक विघटन। घर उजरल-बन्ध्विमुक्तत भेल।
कड़र मालक दाँत कड़कड़एब। ई बड़द कड़रैत अछि-दाँत कड़कड़बैत अछि।
खड़र 1. हाँइ हाँइ लिखब ।
2. बाँटब।
3. परिष्कृँत करब। चीठी खड़रैत छथि-हाँइ हाँइ लिखैत छथि। 2. जौड़खड़रैत अछि-हाँइ 2. बटैत अछि। 2. दरबाजा खड़रल अछि-खड़रासँ संशोधित कएल अछि।
गुड़र क्रोधजन्यं आँखिक आस्फाजलन। आँखि गुड़रैत अछि-आस्फारलित करैत अछि।
भुड़र शुष्कग खाद्य वस्तुसक साक्षात् अग्रिमे पाक। बदाम भुड़रैत अछि। लवंग भुड़रलक-अग्निपक्वर कएलक।
उढ़र स्वािमिभावपत्र आन पुरुषक सङ्ग चल जाएब। रुपनाक स्त्रीर उढ़रि गेलैक-आन पुरुषक सङ्ग ओकर अधीन भए चलि गेलैक। ई स्त्री उढ़री थिक।
कतर कीँचीसँ काटब। कागज कतरैत अछि-कैँ चीसँ कटैत अछि।
चतर वृक्षक पसार। फुटाह गाछ अधिक चतरैत अछि-अधिक बढि़ पसरैत अछि। चतरी गेन्हबरी चतरिकेँ अर्थात् पसरिकेँ परस्प र संबद्ध भए जाइत अछि।
लतर लतीक पसार। लत्तीसभ टाटपर वा गाछपर लतरैत अछि- पसरैत अछि।
सतर शीघ्रतया सिद्धि। अहाँकेँ काज नहि सतरैत अछि-शीघ्रतया कएल नहि होइत अछि।
सुतर सफलता प्राप्ति। हमर उद्योग सुतरल-सुफल भेल।
बिथर प्रसरण। वस्तुणजात बिथरल अछि, तकरा ओरिआएकेँ राखू।
थोथर 1. घार मूर्छित होएब।
2. बालकक अतिचुम्बएन। 1. बसिलाक धार थोथरि गेल-मुरछि गेल, ओकरा पिजाउ।
2. देवदत्त नेनाकेँ थोथरैत छथि-ओकरामे वारंवार मुख संयुक्तँ करैत छथि।
ओदर वियुक्त होएब। मुइल चमरा देहसँ ओदरैत अछि-वियुक्तर होइत अछि।
सुधर 1. यथोचित क्रियामे प्रवृत्ति। 2. बाधासँ विनिर्मुक्त होएब। 1. ई नेना आब सुधरल-यथोचित क्रियामे प्रवृत्त भैल ।
2. कार्य सुधरल-बाधासँ रहित भेल।
उनर आकर्षणसँ अधिक फानक भए जाएब। माठा उनरत-खँचलासँ अधिक फानक होएत, तखन हाथमे पहिरल होएत।
धफर (ड़) डेग पैघ करब1 धफरि (डि़) केँ चलू-डेग पैघ कए चलू।
सफर मालक सर्पदष्टि होएब। महीसि सफरल अछि-सापसँ दष्टू अछि, मतीकेँ बजाउ।
झबर अधिकक नम्र भए रहब। वेश्यानक देहमे गहना झबरल अछि-नमरल अधिक-नमरल अधिक अछि।
अभर कित्र्चित् अङ्गमे संयुक्तत होएब। हमरा पाएमे साप अभरल-कित्र्चिरत् भीरल, तेँ हम हटलहुँ।
भभर शिशिलावयव भए खसब। बलाह माटिक महादेव पूजाक काल भभरि गेलाह-शिथिलावयव भए खसि पड़लाह।
लेभर (ड़) अधिक लागब। वर्षामे अएलहुँ तेँ पाएरमे माटि लेभरल अछि-अधिक अछि।
नमर नम्र होएब। आमक गाछ फलक भारसँ नमरल अछि-नम्र भेल अछि।
पलर कोमलताप्रयुक्त पसरब। केराकेँ पकना बहुत दिन भेलैक तेँ पलरल अछि-पलपल भए पसरल अछि।
ओलर आधिक्यछप्रयुक्त उपरसँ खसब। लत्ती ओलरि गेल ।
पसर प्रसरण। खरिहानमे धान पसरल अछि-प्रसृत भेल अछि।
ससर कित्र्चित् घुसकब। एक्का्पर मोटा ससरल जाइत अछि-कित्र्चित् घुसकल जाइत अछि, खसए ने।
बिसर विस्म्रण। हम जे पढ़ल से बिसरलहुँ-विस्मृवत कएल। रेलगाड़ीपर छाता बिसरल, उतारल नहि।
उसर 1. क्रियाक शीघ्र संपत्ति।
2. प्रवृत्त क्रियाक निवृत्ति। 1. अहाँकेँ लिखब उसरैत अछि-शीघ्र होइत अछि।
2. नाच-तमासा आइ उसरल-निवृत्त भेल।
घोँसर विस्म रण (निन्दाआशब्दा)। ई पढ़ब-गुनब सभ घोँसरलैन्हि-बिसरलैन्हि, अर्थात् छोड़लैन्हि।
कहर क्लेलशसूचक शब्दअ। ई गाछसँ खसल, चोट अधिक छैक, कहरैत अछि-अन्तशर्वेदनासूचक शब्दि करैत अछि।
झहर सशब्दअ पतन। वर्षा झहरैत अछि-सशब्दर ऊपरसँ पतित होइत अछि।
हहर क्षीण होएब। हमर देह दु:खसँ हहरि गेल अछि-क्षीण भए गेल अछि।
सिहर 1. विशरण (कित्र्चित् फाटब)।
2. शीतविकार । 1. कच्चाक देबाल सिहरल-कित्र्चित् फाटल1 2. जाड़सँ देह सिहरैत अछि-शैत्य जन्यक विकारविशेष (रोमाञ्चादि) प्राइज़ करेत अछि।
कुहर क्लेइशसूचक शब्दय करब। अधिक ज्वसरमे लोक कुहरत अछि-क्लेइशसूचक शब्दव करैत अछि।
सम्हइर विघटित नहि होएब। आब सब काज सम्हबरल-विघटित नहि भेल अर्थात्त संपत्र भेल।
नेआर इच्छार। हम नेआरैत छी-इच्छार करैत छी जे काशीवास करी।
सकार स्वीवकार। ओ हजार रुपैआ देब सकारलैन्हि-स्वीाकृत कएलैन्हि।
घोँकार अतिसञ्चालनसँ मलिन करब। पोखरिक पानि घोकारूजनु-अतिसंचालन सँ तरक मल उखाडि़ मलिन जनु करी।
अखार प्रक्षालन। थारी अखारैत अछि-पखारैत अछि, अर्थात् प्रक्षालित करैत अछि।
खखार कण्ठाक भीतरसँ नि:सारण। अहाँ कफ खखारू-कण्ठअक भीतरसँ निस्साफरित करू।
पखार धोएब (प्रक्षालन)। थारी पखारैत अछि-प्रक्षालित करैत अछि।
तेखार तेसरबेर हरसँ विदारण। हरबाह खेत तेखारैत अछि-तेसरबेर हरसँ विदीर्ण करैत अछि।
धोखार जलद्वारा हटाएब (जलटारिकेँ हटाएब)। घाटमे माटि लागल अछि तकरा धोखारू-जलसँ साफ करू जे धोती खिचबाक योग्य- हो।
उगार उर्वरित करब (अवशेष राखब)। काजक हेतु एक लाख रुपैआ छल ताहिसँ एकह हजार हम उगारल-उर्वरित कएल।
खँघार जलग्रवाहसँ काटब। जलक वेग माटिकेँ खँधारलक-कटलक जाहिसँ जगह गहीँ जगह गहीँड़ भए गेल।
उधार आच्छाँदनरहित करब। देह उघारू-आच्छाकदनरहित करू1 हम मुह उघारिकेँ सुतैत छी।
उङार उद्वर्त्तन। नेनाकेँ सबदिन उङारबाक चाही-उकटन लगएबाक चाही।
कचार अखारब (प्रक्षालन)। धोती कचारल-अखारल।
बिचार विचारण। अहाँ एहि विषयकेँ बिचारू-एहि विषयक विचार करू।
खेँचार बाँससँ हुरेठब। अछिआमे जरल मुर्दाकेँ खोचारलहुँ-बाँसक अग्रसँ ताडि़त कएलहुँ जे शीघ्र जरए।
अछार पानिमे बीआ खसाएब। हम धानक बीआ अछारल-पानिमे बाओग कएल।
SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE
SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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डाॅ. देव शंकर नवीन (जन्म: 2 अगस्त 1962) मैथिली तथा हिन्दी मे एम.एण्, पी-एच.डी., भौतिकी मे एमए स-सी. तथा पुस्तक प्रकाशन एवं अनुवाद मे पी.जी. ...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...