भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, May 04, 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी(आठम कड़ी)

साँझ मे हम चाह s s जखैन्ह घर मे घुसलहुं s आराम करैत छलाह मुदा हमरा देखैत देरी उठि s केबार बंद s लेलथि हमरा लग आबि बैसैत कहलाह "अहाँ s हमरा किछु आवश्यक गप्प करबाक अछि" हम किछु बजलियैन्ह नहि मुदा मोन मे पचास तरहक प्रश्न उठैत छलs चाह पीबि कप राखैत कहलाह "अहाँ सच मे बड़ सुध छी, अहाँ हमर बुची दाई छी" हम तखनहु किछु नहि बुझलियैन्ह नय किछु बजलियैन्ह, मोने मोन सोचलहुं बुची दाई के छथि। हम सोचिते रही जे हिनका s पुछैत छियैन्ह, बुची दाई के छथि ताबैत धरि उठि s एकटा कागज s हमरा लग बैसि रहलाह। हमरा s पुछलाह हरिमोहन झा s नाम सुनने छी? हम सीधे मुडी हिला s नहि कहि देलियैन्ह, ठीके हमरा नहि बुझल छलs ठीक छैक हम अहाँ के बुची दाई हरी मोहन झाक विषय में दोसर दिन बतायब। पहिने कहू, अहाँ के s हमरा देखि s खुशी आशचर्य दूनू भेल होयत। हिनका देखि s हमरा खुशी आश्चर्य s ठीके भेल छलs मुदा हिनका कोना कहितियैन्ह हमरा कहय में लाज होयत छलs, तथापि पुछि देलथि s मुडी हिला s हाँ कहि देलियैन्ह। अपन हाथ महक कागज़ हमरा दिस आगू करैत कहलाह, अहाँ के लेल हम किछु सम्बोधानक शब्द लिखने छी, अहाँ के अहि मे s जे नीक लागय वा अहाँ जे संबोधन करय चाहि लिखी सकैत छी, मुदा आब चिट्ठी अवश्य लिखब। कोनो तरहक लाज, संकोच करबाक आवश्यकता नहि अछि। बादक गप्प के कहय हम s सुनतहि लाज s गरि गेलहुँ। हम सोचय लगलहुं हिनका हमर मोनक सबटा गप्प कोना बुझल s जायत छैन्ह। थोरबे काल बाद हमरा अपनहि कहय लगलाह हम अहाँक किताब देखैत छलहुँ s ओहि मे s हमरा चिट्ठी भेटल जे अहाँ हमरा लिखने छलहुँ। ओहि मे अहाँ हमरा संबोधन s नहि कयने छी मुदा हमरे लेल लिखल गेल अछि से हम बुझि गेलहुँ। कोनो कारण वश अहाँ नहि पठा सकल होयब सोचि हम पढि लेलहुँ। पढ़ला पर दू टा बात बुझय मे आयल, पहिल जे अहाँक मोन एकदम सुध निश्छल अछि, दोसर जे अहाँ मोन s चाहैत छलहुँ जे हम आबि, देखू हम पहुँची गेलहुँ। अहाँ हमरा चिट्ठी एहि द्वारे नहि लिखी पाबैत छी नय जे अहाँ के सम्बोधनक शब्द नहि बुझल अछि, कोनो बात नहि।एहि मे लाजक कोनो बात नहि छैक, अहाँ के जे किछु बुझय मे नहि आबय आजु s अहाँ हमरा s बिना संकोच कयने पुछि सकैत छी। ओहि दिन नहि जानि कियाक, हमरा बुझायल जे बेकारे लोक के घर वाला s डर होयत छैक। पहिल बेर हुनक जीवन मे हमर महत्व स्थान केर आभास भेल हमरा मोन मे संकोचक जे देबार छलs से ओहि दिन पूर्ण रूपेण हटि गेल। नहि जानि कियाक, बुझायल जेना एहि दुनिया में हमरा सब s बेसी बुझय वाला व्यक्ति भेंट गेलैथ।


जाहि दिन हमर विवाह भेल छलs ओहि समय हमर बडकी दियादिन केर सेहो द्विरागमन नहि भेल छलैन्ह। राँची अपन नैहर मे छलिह। दोसर दिन साँझ मे कहलाह जे काल्हि भौजी s भेंट करय लेल जयबाक अछि ओकर बाद परसु मुजफ्फरपुर चलि जायब। आजु चलु राँची(राँची केर मुख्य बाज़ार मेन रोड के लोग राँची कहैत छैक) दुनु गोटे घूमि s अबैत छी। बरसातक मास बादल सेहो लागल छलैक तथापि हम सब निकलि गेलहुँ। रिक्शा किछुएक दूर आगू गेला पर भेंट गेल। घर s मेन रोड जयबा मे करीब आधा घंटा लागैत छलैक। हम सब आगू बढ़लहुं ओकर १५ मिनट केर बाद s पानि भेनाइ आरम्भ s गेलैक। विष्णु सिनेमा हॉल s किछु पहिनहि हम दूनू गोटे पूरा भीजि गेलहुँ। सिनेमा हॉल लग पहुँची कहलाह, भीजि गयबे केलहुं,चलू सिनेमा देखि लैत छी s आपस घर जायब, कपड़ा सिनेमा हॉल में सुखा जायत।


राति में अचानक माथक दर्द प्यास s नींद खुजि गेल, बुझायल जेना हमर देह सेहो गरम अछि। उठि s पानि पीबि फेर सुति गेलहुँ भोर में मोन ठीक नहि लागैत छलs मुदा हम किनको s किछु कहलियैन्ह नहि, भेल कहबैक s बेकार में सब के चिंता s जयतैन्ह। मोन बेसी खराब लागल s जा s सुति रहलहुं। जखैन्ह आँखि खुजल s देखैत छी डॉक्टर हमरा सोंझा मे अपन आला लेने ठाढ़ छलथि। हमरा ततेक बुखार छल जे चादरि ओढ़ने रही तथापि कांपति छलहुँ।डॉक्टर की कहलैथ से हम किछु नहि बुझलियैक। हमरा थोर बहुत बुझय मे आयल जे कियो हमर तरवा सहराबति छलथि, कियो गोटे पानिक पट्टी s रहल छलथि , मुदा हम बुखारक चलते आँखि नहि खोलि पाबति छलहुँ, हम बुखार मे करीब करीब बेहोश रही। जखैन्ह हमरा होश आयल आँखि खुजल s प्यास s हमर ओठ सुखायत छल, मुदा साहस नहि छलs जे उठि s पानी पिबतहुं। जहिना करवट बदललहुं s हिनका पर नजरि गेल। हिनका हाथ मे एकटा रुमाल छलैन्ह बिना तकिया सुतल छलथि। हमरा बुझैत देरी नहि भेल जे हमरा रुमाल s पट्टी दैत दैत सुति रहल रहथि। हमरा हिम्मत s नहि छल तथापि हम चुप चाप उठि जहिना हिनकर माथ तर तकिया देबय चाहलियय उठि गेलाह। हमरा बैसल देखि तुंरत कहि उठलाह अहाँ कियाक उठलहुं अहाँ परल रहु। सुनतहि हम फेर तुंरत परि रहलहुं।


भोर मे उठलहुं कमजोरी s छलs मुदा बुखार बेसी नहि छल। मौसी s पता चलल जे चाय पिबय के लेल जखैन्ह मधु उठाबय गेलीह s हम बुखार s बेहोश रही। देखि तुंरत डॉक्टर के बजायल गेलैक। डॉक्टर के गेलाक बाद बड राति तक माँ दूनू गोटे बैसल रहथि ठंढा पानी s पट्टी s बुखार उतारबाक प्रयास मे लागल रहथि। माँ के बाद मे सुतय लेल पठा देलथि अपने भरि राति जागल रहथि कियाक s बुखार कम भेलाक बादो हम नींद में बड़ बड़ करैत छलियैक। दोसर दिन s हमर बुखार कम होमय लागल मुदा हमरा पूर्ण रूप s ठीक होयबा में एक सप्ताह लागि गेल। हिनका कतबो कहलियैन अहाँ चलि जाऊ, क्लास छूटैत अछि मुदा कहलाह, अहाँ ठीक s जाऊ तखैन्ह हम जायब।


एक सप्ताह कतहु नहि गेलाह हमरे कोठरी में बैसि s अपन पढ़ाई करथि। साँझ में काका लग बैसि s खूब गप्प होयत छलैन्ह। ओहि एक सप्ताह में काका सेहो हिनका s बहुत प्रभावित s गेलथि इहो काका के स्वभाव s परिचित भेलाह। साँझ में परिचित सब हिनका s भेंट करय लेल आबथि। एहि तरहे पूरा सप्ताह बीमार रहितहुँ हमरा खूब मोन लागल।


आइ भोर s हमरा एको बेर बुखार नहि भेल। काल्हि भोर मे हिनका मुजफ्फरपुर जयबाक छैन्ह भरि दिन हमरा सँग गप्प करैत रहलाह। साँझ मे काका ऑफिस s अयलाह s हुनका लग बैसि हुनका s गप्प करय लगलाह हम अपन कोठरी मे छलहुँ। माँ मौसी जलखई के ओरिआओन करैत छलिह बाकी भाई बहिन सब बाहर खेलाइत छलैथ। हमरा सोचि s एको रति नीक नहि लागैत छलs जे काल्हि चलि जेताह ओकर किछु दिनक बाद माँ सेहो चलि जयतीह।


राति मे सुतय काल कहलाह भोरे s हम जा रहल छी मुदा हमर ध्यान अहीं पर ता धरि रहत, जा धरि अहाँक चिट्ठी नही भेंटत जे अहाँ पूरा ठीक s गेलहुँ अछि। एहि बेर माँ के जाय काल नहि कानब, बड दूर रहति छथि हुनको अहिं पर ध्यान लागल रह्तैन्ह। अहि बेर रोज एकटा s चिट्ठी अवश्य लिखब, हमरा दिस देखैत मुस्की दैत कहलाह आब s अहाँ के चिट्ठी लिखय मे सेहो कोनो तरहक दिक्कत नहि हेबाक चाहि। हमहु हिनकर मुस्कीक जवाब मुस्की s s देलियैन्ह।


क्रमशः ......

संबंध- श्यामल सुमन


साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।
वेदना अछि हृदय मे सुनावैत छी।।
साँच जिनगी----------

कहू माता के आँचर मे सुख जे भेटल।
चढ़ैत कोरा जेना सब हमर दुख मेटल।
आय ममता उपेक्षित कियै राति दिन।
सोचि कोठी मे मुँह कय नुकाबैत छी।।
साँच जिनगी----------

खूब बचपन मे खेललहुँ बहिन भाय संग।
प्रेम सँ भीज जाय छल हरएक अंग अंग।
कोना संबंध शोणित के टूटल एखन?
एक दोसर के शोणित बहाबैत छी।।
साँच जिनगी----------

दूर अप्पन कियै अछि पड़ोसी लगीच।
कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच।
बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान सँ।
स्वयं दर्पण स्वयं केँ देखाबैत छी।।
साँच जिनगी----------
 

Sunday, May 03, 2009

पंचसती - पंचउपसती- आशीष अनचिन्हार


इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक।
कविता
पंचसती - पंचउपसती
सती खंड


अहिल्या
सूनू गौतम
ओहि भोर जखन अहाँ
चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल
आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए
हमर देहक लेल
ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम
इ इन्द्र छथि
मुदा इ मोने छैक
सूनू गौतम
हम भासि गेल रही
अहाँक नजरि मे
मुदा
इ अर्धसत्य थिकैक
सत्य त इ थिक
आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण
दूनू फराक- फराक गप्प छैक
सूनू गौतम
हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ
अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ
आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि
सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰

तारा
इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम
बालिक कनियाँ छलहुँ

बालिक पश्चात अहाकँ
इहो सत्य छैक
जतबे हम
बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक
ततबे अहुँ सँ करैत छी
मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक
जे
अहाकव मृत्युक पश्चात
हम तेसरोक कनियाँ हेबैक
ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक
अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी.

इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग
त्रेतायुग
सतयुग
द्वापर
आ कलियुग
सभ युग मे ॰

मंदोदरी
राज्यक संग-संग
विजेताक
रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक
मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम
विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक
हँ
एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक
जे
हमरा
अर्थात मंदोदरी के
ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक
जँ बाँकी होइक
त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ
मुदा
तैओ हम विभीषणक कनियाँ
नहि भए सकैत छियैक
विभीषणक संग
संभोगरत रहितो ॰

कुंती
योनि हरदम योनि होइ छैक
चाहे ओ
अक्षत हो वा क्षत
लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो
साधन नहि छैक जे
योनिक की अवस्था छैक
इ त पुरुषक मोन छैक
जे
योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि
स्त्री के गुलाम बना लेलकै
कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग
लोक लाज छल
मुदा आब नहि
संतान हरदम संतान होइत छैक
चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक
आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम
मने कुंती
अर्थात
कर्ण आ पांडवक माए
५द्रौपदी

जखन कोनो जीवक
जिनगी
पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक
त हमर सोहाग
पंचपति सँ किएक नहि ?
उपसती-खंड

सीता
राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह।
अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा
देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल,
हम असमय प्राण त्यागलहुँ।
ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰

अनूसूया
नाम थिक हमर अनूसूया
मुदा
एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल
आर्यगण शूद्र स्त्री पर
किएक मोहित होइत रहलाह
घरक स्त्री उपेक्षित
रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल
इ बड्ड बादक गप्प थिक जे
आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक
रक्षाक लेल
शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि
मुदाहाय रे हमर कपार
हम
महासती त बनि गेलहुँ
मुद स्त्री नहि ॰

दमयंती
जंगल मे नल हमरा छोड़ि
पड़ा गेलाह
इ कोनो बड़का गप्प नहि
जखन ओ नाङट रहथि
हम अपन नूआ फाड़ि
हुनक गुप्तांग झाँपल
मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि
बड़का गप्प त इ छैक जे की
मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि
स्त्री पुरुषक नहि
जँ नहि
त हम कोना केलियैक ?

राधा
अच्छर-कटुआ हमरा
कृष्णक घरवाली बुझैए
साक्षर कुमारि
आ हम राधा
एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे
फसँल
एकटा नारि मुदा अबला नहि
कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक
सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै
ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे
बिआहक बादे संभोग कएल जाए
आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए
बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से
विवेचना मिमांसक करताह
मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि
जकरा संग मोन नहि मानैत हो
ओकरा संगक संभोग
बलात्कार सँ कम नहि ॰

गांधारी
हमरा एक सए एक पुत्र छल
अर्थात
लोकक नजरि मे
हमर पति हमरा संग
एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह
मुदा हम जनैत छी
ओ संभोग नहि
बलात्कार छल
एहन बलात्कार जाहि मे ने त
स्त्री चिचिआ सकैत अछि
आ ने केकरो कहि सकैत अछि
सुनिगबाक अतिरिक्त
लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल
आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर
मुदा
पट्टी बान्हल हमर आँखि मे
अबैत रहल कतेक रास सपना
इ केओ कोना देखत ?

Saturday, May 02, 2009

कॉलेज देखलक बौआ -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'


अपने छी हम मैट्रिक
गरीबीक चक्की मे पिसा क'
फेल भेल हमर बैटरी
चिंता सं हम पेरायल छलहुं
मुदा तइयो भरोस भेल
कॉलेज देखलक बौआ
टिभी केबल छल कटल
घरक राशन छल घटल
बुझि सकै छी, की कहू ?
अभावो कें देखि ओ
फैशनक हिसाबे
कीनलक जींस झमकौआ
किछु दिन कॉलेज क'
बढौलक ओ हिप्पी
अप्पन उमेर देखि
सधलहुं हम चुप्पी
खा गेल ओ हमरो तहिये
जहिया ओकर मोंछ कटलकै नौआ
एकदिन छागुनता लागल
ओकर जेंसक पतलून सं गुटखा बहरायल
बुझय मे आबि गेल
करैत होयत ई कत्ते
नशाक सेवन नुकौआ
घींच-घाचि क' थर्ड ईयर मे अछि
हे उच्चैठक महरानी, अहीं पर लगबियौ
भरोस एक्को रत्ती नहि अछि
मैया अहीं कें गोहरबै छी
जं भेल ई पास त'
चढायब छागर हम जौआ
खर्चक पहाड़ सं देलक ई नमरा
बेचीं घरारी आ की बेचीं हम डबरा
कर्जो नहि भेटै छै , कहियौ हम ककरा
ई त' कुपात्र भेल, ठेस लागल हमरा
एकरा सं किछु छुटल नहि छै
कए खेप ई चिखने होयत पौआ
फैशन सं लैस भ'
जेबी मे किछु कैश ल'
चलैए अनबिसेख एना
हो शाहरुख़ , सलमान जेना
आब ने उजियाएत ई
हमर मोन भेल कौआ
आब हम नियारल
बियाह करा दी एकर
घट्टक अबैए ढेर -ढाकी
कनिया हम चिक्कन ताकी
दिन-दुनिया ठीक करबा वास्ते
दहेज़ लेबै मोटकौआ


Blog : http://www.rkjteoth.blogspot.com/


E-mail : rkjteoth@gmail.com

बहुत गलत बात अछि --


समस्त मैथिल और मिथिला पाठक गन के चर्ण स्पर्श अछि ---
हम आए से कुछ दिन पहिने एकटा रचना '' ''
बहुत महत्त्व अछि ""
से पाठक गन के सामने उपस्थित केने रही , एकटा फेर छोट छीन
शब्द कोष डिक्सनरी से लके हम आय
मैथिल और मिथिला में पुनः
""
बहुत गलत बात अछि "" से लके पाठक गन के सामने हाजिर छि ,

प्रेम सं कहू जय मैथिल जय मिथिला ---

""
बहुत गलत बात अछि ""

दूध में पैन के , दुश्मनी में आईंन के , गाम में डैन के ,
बहुत गलत बात अछि --------
बर्बाद करै में मुस के , नोकरी मे घुस के , बनिया में मखीचूस के ,
बहुत गलत बात अछि --------
भाई में बैमान के , कर्म में अभिमान के , मनुष्य में सैतान के ,
बहुत गलत बात अछि --------
नशा में दारू के , आदमी में भारू के , मिया - बीबी संग झारू के ,
बहुत गलत बात अछि --------
मेला में जेवर के , डैविटिज में मिठाई घेवर के , बदमाशी में देवर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
पूजा -पाट बिना पीपल के ,श्रधकर्म बिना पीतल के , बरी -भात बिना जूरी शीतल के ,
बहुत - गलत बात अछि ---------------
नारी गर्दन बिना अठन्नी के, समान बेचनाय बिना पन्नी के , पेंटिंग बिना मधुबनी के ,
बहुत - गलत बात अछि ---------------
डिगरी बिना ईग्न्नु के , खिसा -पिहानी बिना गन्नू के , लेन - देन में भीख मग्न्नु के
बहुत - गलत बात अछि ---------------
आदमी में दुराचारी के , फल में मह्कारी के , इंडिया में बेरोजगारी के ,
बहुत गलत बात अछि --------
समाज में काम चोर के , आदमी में सुईद खोर के , लराई में लातखोर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
ब्यबसय में मन मर्जी के , सिग्नेचर में फर्जी के , फोज में बिना बर्दी के ,
बहुत गलत बात अछि --------
बस में जेब कत्तर के , हर बात में अक्तर के , गंदगी में बत्तर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
सरक पर भीख माँगा के , सहर में लफंगा के , शरीर में बिना अंगा के
बहुत गलत बात अछि --------
चलें में मटकैत के , जंगली एरिया में डकैत के , गाम में लठैत ,
बहुत गलत बात अछि --------
नशा में सिकरेट के , हर बात में डारेकट के , आदत में क्रिकेट के ,
बहुत गलत बात अछि --------
इंडिया में बिना टेक्स के , दफ्तर में बिना फेक्स के , फॉरनर में सेक्स के ,
बहुत गलत बात अछि --------
विराद्धा अबस्था में बिना लाठी के , चिता पर बिना काठी के , सीरियल में बिना मराठी के ,
बहुत गलत बात अछि -----
शरक पर क्च्चरा के , बारादरी में झगरा के , कागज - पत्तर में लफरा के ,
बहुत गलत बात अछि -----
गाम में बिना भोज के , मजदूरी में बिना रोज के , साइंस में बिना खोज के ,
बहुत गलत बात अछि -----
यात्रा बिना मंगल के , प्रोग्राम बिना दंगल के , व्रत में अंजल के ,
बहुत गलत बात अछि -----
विदियार्थी बिना मास्टर के , हॉस्पिटल बिना डाक्टर के , फिल्म बिना डारेक्टर के ,
बहुत गलत बात अछि -----
उग्रवादी बिना तालिवान के , कुस्ती बिना पहलवान के , अतिथि के बिना जलपान के,
बहुत गलत बात अछि -----
मनोरंजन बिना खेल के , बिजनेस बिना सेल के , कैदी बिना जेल के ,
बहुत गलत बात अछि -----
रेड लाइट बिना अक्सिडेंट के , हॉस्पिटल बिना पेशेंट के , दाँत बिना पेप्सोडेंट के ,
बहुत गलत बात अछि -----
जनौऊ संस्कार बिना बरुवा के , मैथिल भोजन करेनाय बिना तरुवा के , आराम केनाय बिना गेरुवा के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
अध्ययन बिना कम्पूटर के , पंखा बिना रेगुलेटर के , नियूज बिना प्रेशरिपोटर के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
भगवन पूजा बिना माला के , घर छोरी बिना ताला के , सासुर जेनाय बिना साला के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
शहर में बिना लाइट के , लराई में बिना फाइट के , जींस पेंट बिना टाईट के ,
बहुत गलत बात अछि -----
नागरिकता बिना मतदान के , जिनगी बिना कन्यादान के , परोपकर बिना रक्तदान के ,
बहुत गलत बात अछि -----------
महाभारत में शोक्न्नी के , शहर में बिना पत्त्नी के , आ रचना में बिना टिप्पणी के ,
बहुत गलत बात अछि -----


मदन कुमार ठाकुर ,
पट्टीटोल , भैरव स्थान , झंझारपुर ,मधुबनी , बिहार - ८४७४०४
Mo - 9312460150 ,E-mai - madanjagdamba@yahoo.com

अन्हरिया- कांचीनाथ झा ‘किरण’

की रविकर प्रहार पीड़ित धराक

निवास धूम भरि रहल व्योम?

की रविपतिक अस्त

लखि, भयें त्रास्त

तिमिर चीर

झाँपल शरीर

अवनी अनाथिनी

की रवि दूर गेल

शशि अन्ध भेल

बुझि, अन्धकार

पटकेर ओहार

लगा, व्योम संग विहार

करैत अछि वसुधा भएकाकार?

की कारी कोसी अछि उत्फाल भेल

तकरे जलसँ करैछ

भू-नभकें एकाकार?

की निसि रमैत अछि कलिक संग

तें भेल एकर अछि कृष्ण रंग?

झड़ैत खुदिया खद्योत भास

उड़ैत चमकी उडुगण प्रकास?

मानव समाजमे वर्ण भेद

सुरुहेसँ अनलक अहंकार

करैत आएल अछि अनाचार अत्याचार

तेंॅ तकरा मेटबै लेल

दलित उपेक्षित मानव जातिक हृदय-वह्नि गिरिसँ

समुभूत तामस तमोपुंज

बढ़ि रहल भरैत अम्बर दिगदिगन्त?

की कांग्रेसी शासनगत अनाचार

अन्धकार बनि अछि व्यक्त भेल?

की अणुबमक पहाड़

देखि मानव जातिक भविष्य

साकार थिक ई अन्धकार?

नताशा 05 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

माँ मिथिला ताकय संतान- दयाकान्त


माँ मिथिला ताकय संतान

ससरी गेल कतेको टाट
खसि परल कतेको ठाठ
नहि अछि कतहु पर्दा टाट
नहि राखल दलान पर खाट
कतेको घर साँझ-प्रात सं बंचित
कतेको घर ताला सं संचित
जतय रहै छल जमाल दलान
आई बाबा बिन सुन्न दलान
माँ मिथिला ताकय संतान

सगर देश मे भय रहल पलायन
मिथिला सन नहि दोसर ठाम
बी०ए०, एम०ए० घर बैसी के
कहिया धरि देता इम्तिहान
जीबिकाक नहि बचल कोनो साधन
नहि रोजगारक कोनो ठेकान
गाम बैसी करता की बैउया
कोना बचेता घरक प्राण
माँ मिथिला ताकय संतान

पढ़ल लिखल बौक बनल अछि
धुरफंदी सब मौज करैत अछि
एक आध जे पोस्ट निकलैत अछि
भाई-भतीजा छापि लैत अछि
सबतरि बन्दर बाँट मचल अछि
कोनो विभाग नहि आई बांचल अछि
बिना पाई कियो बात नहि करताह
कतेक सहत सज्जन अपमान
माँ मिथिला ताकय संतान

हमर बुद्धि-विवेकक लोहा
देशे नहि विदेशो मानैया
हमर मेहनत-लग्नक वल पर
आई कियो बाबु कह्बैया
हमर उन्नति देखि के आई
सब प्रांत हमरा सं जरैया
करितहु प्रतिभाक सदुपयोग
रहिता जँ मिथिलामे ओरियान
माँ मिथिला ताकय संतान

                दयाकान्त

Friday, May 01, 2009

सृजन- अंतिम खेप- सतीश चन्द्र झा

पैध होइते शिशु केना ओ
किछु बनै छै दुष्ट दानव।
अंध मोनक वासना में
होइत अछि पथ भ्रष्ट मानव।

बुझि सकल नहि गर्भ मे ओ
भावना नारी हृदय केँ।
बनि असुर निज आचरण सँ 
क’ देलक लज्जित समय कँे ।

होइत अछि नारी ‘बलत्कृत’
अछि पुरूष ओ के जगत कँे ?
गर्भ नारी सँ धरा में 
जन्म नहि लेलक कहू के ?

छी! घृणित कामी, कुकर्मी
छै पुरूष पाथर केहन ओ।
यंत्राणा दै छै केना क’ 
आइ ककरो देह कँे ओ।

भरि जेतै ओ घाव कहियो
देह नोचल , चेन्ह चोटक।
जन्म भरि बिसरत केनाक’, 
ओ मुदा किछु दंश मोनक।

मोन नहि भोगल बिसरतै, 
ज्वार पीड़ा के उमड़तै ।
लाल टुह टुह घाव बनिक 
जन्म भरि नहि आब भरतै।

पढ़ि लितय जौं भाग्य ममता
अछि अधर्मी ई जगत के।
नहि करत ओ प्राण रक्षा
पेट मे बैसल मनुख के ।

जन्म द’ क’ ओहि पुरुष के
अछि कहू के भेल दोषी ?
देव दोषी ? काल दोषी ?
गर्भ अथवा बीज दोषी ?

छै नियति नारी के एखनहुँ
हाथ बान्हल, ठोर साटल।
के देतै सम्मान ओकरा
छै कहाँ भव धर्म बाँचल।

ग्रन्थ के उपदेश ज्ञान क
अछि जतेक लीखल विगत मे।
भेल अछि निर्माण सभटा
मात्रा नारी लय जगत मे।

क’ सकत अवहेलना नहि
दृष्टि छै सदिखन समाजक।
नहि केलक विद्रोह कहियो
धर्म छै बंधन विवाहक।

जन्म सँ छै ज्ञान भेटल
धर्म पत्नी के निभायब।
स्वर्ग अछि पति के चरण मे
कष्ट जे भेटय उठायब।

ध्यान, तप, सेवा, समर्पण
जन्म भरि नहि बात बिसरब।
प्राण नहि निकलय जखन धरि
द्वारि के नहि नांघि उतरब।


नहि हेतै किछु आब कनने,
शक्ति चाही खूब जोड़क।
नोर मे सामथ्र्य रहितै...
नहि रहैत ओ ‘वस्तु भोगक’।

छीन क’ ओ ल’ सकत जँ
किछु अपन सम्मान कहियो।
चुप रहत भेटतै केना क’
दान मेे अधिकार कहियो ।

Thursday, April 30, 2009

घसल अठन्नी- काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’


 

जेठक दुपहरि

बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला

आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि

पछबा प्रचण्ड

बिरड़ो उदण्ड

सन सन सन सन

छन छन छन छन

आगिक कण सन

सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल।

खोंतामे पक्षी संच मंच

हिलबए न पाँखि

खोलए न आँखि

तरुतर पशु हाँफै सजल नयन

चरबाह भागि घर गेल विमन

इनहोर बनल पोखरीक पानि

जलचर-थलचर काँपए थर थर

टाटी, फड़की, खिड़की, केवाड़ लागल घर-घर

ई अग्निवृष्टि!

नहि कतउ बाटमे बटोहीक हो एखन दृष्टि

संहार करत की प्रकृति सृष्टि-

ई अग्निवृष्टि!

श्री मान लोकनि

जे तुन्दिल बनि

मसलंगमे ओंगठल

शरबत छनि-मिसरी बदाम बरफें घोरल

नर्तित बिजुली पंखा तर छथि

सेहो अशान्त बाजथि हरि! हरि!!

की कथा सजीवक

छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि

जेठक दुपहरि!

 

ई समय यदपि

बुचनी घर आँगन छोड़ि तदपि

गिरहस्थक कोड़ए खेत एखन

की करति बेचारी!

आठ पहर दुर्दैवक डाँगें अछि पीटलि

विधवा परिवारहीन बिलटलि

छौ मासक एके टा बच्चा

भाविक सम्बल

जे कानि रहल छै धूर उपर

परिबोध कोना ककरति तकर?

शोणितोक आब नहि छैक शेष

पुनि दूधक हएत कोना सम्भव?

सहि तीनि सांँझ ई आइ आएल

बनि मजदुरनी अठ अन्नी पर

सूर्योदयसँ सूर्यास्त तक्क

करतैक काज

नहि पनिपिआइयो पाबि सकति!

 

सन्ध्याक समय

संसार अभय

उगि चान सदय

शीतल ज्योत्सनासँ कएल मुदित ब्रह्माण्ड सकल

नेरूक हित दौड़लि हुँकरि गाय

टुन-टुन-टुन-टुन

टन-टन-टन-टन

घण्टीक शब्द

घर-घरसँ बाहर भेल धूम

तैयो भूखलि-प्यासलि बुचनी

आँचल तर झपने पुत्रा अपन

कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन

हड्डी जागल

सौन्दर्य गरीबीसँ दागल

भूखक ज्वालासँ जरक डरें

तारुण्य जकर अबितहिं भागल

पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल

पीयर ओ दूबर-पातर तन

फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर

आमक फाड़ा सन नयन

खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर

चिन्ता-चुड़ैल केर चढ़ल कोर

झरकाइ रहल छै आंग जकर

प्रतिपल हा! आशा बनि अंगोर

दे कने अन्न-जल प्राण जकर

अछि बाजि रहल छलसँ नोरक,

से बनि कातरि

कहुना कडरि

कर जोरि कहल:

ओ घसल अठन्नी चलि न सकल

हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि

छी आबि रहलि

करु कृपा अठन्नी ददोसर

एसकरुआ हम

गेल राति

गिरहत, न आब देरी लगाउ

भूखें-प्यासें हम छी मरैत

लेबै बेसाह

कूटब-पीसब

बच्चा भोरेसँ कानि-कानि

छट-पट करैत अछि जान लैत।

 

ई फेर आएल भुकबकपार

कहुँ असल अठन्नी अदलि-बदलि

रहलि चलाकी साफ-साफ

रौ! ठोंठ पकड़ि ककर न कात

ई डाइनि अछि

देखही न आँखि

अछि गुड़रि रहलि

अबिताहिं बुधना सन स्वामीकें

चट चिबा गेलि

लक्ष्मीक बेरिमे महाजनी

अछि चुका रहल

क्यो अछि नहि ?

एहन अलच्छीकें कदेत कात ?

 

मालिक!

हम कर्ज न छी मँगैत

अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु

उपजले बोनि टा देल जाए

हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत

कै बेरि एलउँ

टुटि गेल टाँग

अन्नक मारल अछि हमर आँग

जरलहा दैव मरनो न दैछ

की समय भेल

हा! देह तोड़ि ककएल काज

सुपथो न बोनि अछि भेटि रहल

तें जगमे ई पड़लै अकाल

उठबितहिं डेग लागए अन्हार

मरि जाएब एतइ

ककरा कहबै?

हित क्यो ने हमर

अनुचितो पैघ जनकें शोभा

भगवान! आह!

 

गै छौक न डर?

कै खून पचैलनि ई बण्डा

रोइयों न भंग

युग-युग दारोगाजी जीबथु

देबौ खून

गै भाग भाग

बनिहारकें दउचित बोनि

कुलमे लगाएब की हमहिं दाग?

ई अपन भभटपन आनक लग

तों देखा

थिकहुँ हम काल नाग

ई ओना जाएत?

यम माथ उपर छै नाचि रहल

रौ, की तकैत छें मूँह हमर

छोटका लोकौक एते ठेसी?

 

चट-चट-चट-चट

कुलिशहँुसँ कर्कश भीमकाय

मखनाक चाटसँ निस्सहाय

भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत

गेलि बेहोश

तैयो सरोष

बज्रनाद

भुटकुनबाबू उठलाह गरजि:

मखना! मखना!

केलकौक भगल

ला बेंत हमर

नारिक चरित्रा तों की बुझबें?

जीवने बितौलहुँ ऐ सबमे।

दन-दन-दन-दन

मूचर््िछतो देह पर बेंत वृष्टि

बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन

शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि!

सविषाद हासमे चन्द्रमाक

ओ घसल अठन्नी बाजि उठल:

हम कतजाउ

अवलम्ब पाउ

के शरण?

घसल जनिकर अदृष्टि!

Help Alexa Learn Maithili

  Helping Alexa Learn Maithili:   Cleo Skill:  Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...