भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).

ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

 

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Sunday, August 12, 2012

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART V



१. राजदेव मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डलक कवि‍ता संग्रह राति‍-दि‍नक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस')
१
राजदेव मण्‍डल
जगदीश प्रसाद मण्‍डलक कवि‍ता संग्रह
राति‍-दि‍न
:: समीक्षक राजदेव मण्‍डल

मैथि‍लीक नव कवि‍ताक नि‍रन्‍तर वि‍कास भऽ रहल अछि‍। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल पूर्ण नि‍ष्‍ठा आ तल्‍लीनताक संग ऐ वि‍कास कर्ममे संलग्‍न छथि‍। आ तेकर प्रति‍फल सम्‍मुख अछि‍- कवि‍ता पोथी- राति‍-दि‍न। ऐ पोथीमे 52 गोट कवि‍ता संकलि‍त अछि‍।

कवि‍ता भाव, बुधि‍ कल्‍पना आर शैलीक समन्‍वि‍त परि‍णाम थीक।
ऐ गुण आदि‍सँ अलंकृत मानस सृजनक गम्‍भीर, सचेत प्रक्रि‍यासँ संचालि‍त भऽ सकैत अछि‍। तइ कारणे कवि‍ अत्‍यधि‍क सवेंदनशील होइत अछि‍। हरेक कालावधि‍मे मनुखक अन्‍तसमे अभीप्‍सा पालि‍त-पोषि‍त होइत रहै छै आ ओइपर जखन तुषारापात होइ छै तँ जन मानस आन्‍तरि‍क वेदनासँ भरि‍ जाइत छै। मोह भंग भऽ जाइत छै। बेकतीक अन्‍तसँ उपजै छै। वि‍द्रोह, कंुठा, आक्रोश, संत्रास, क्षुब्‍धता, आत्‍म रक्षाक सबालादि‍। अही सबहक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ मैथि‍लीक नव कवि‍ता थीक।
मण्‍डलजी सन सवेंदनशील कवि‍ जे ऐ यथार्थकेँ भोगने छथि‍ से केना चुप्‍प रहि‍ सकैत छथि‍। हुनका लेखनीसँ तँ संघर्षक स्‍वर नि‍कलबे करतैक।
“जि‍नगीक होइत संघर्ष।
सीमा बीच जखन अबैत
मचबए लगैत दुर-घर्ष।
घर्ष-दुरघर्ष बीच जखन
जि‍नगी करए रस्‍सा-कस्‍सी।
बीच समुद्र सि‍रजि‍ मथान
पकड़ए लगैत अपन-अपन रस्‍सी।”
(संघर्ष)

कवि‍ अखण्‍ड राज भोगी सभपर व्‍यंग्‍य प्रहार करैत कहैत छथि‍-
“मुसक खुनल बील पकड़ि‍
नाग-नागि‍न कहबए लगैए।
नागे तँ धरती टेकने छै
अखण्‍ड राज भोगै छै।”
(मानव गुण)

कि‍छु लोक बहुरूपि‍या बनल अछि‍। हरेक क्षण गि‍रगि‍ट जकाँ रंग बदलैत रहैत अछि‍। समाजकेँ दि‍शा भ्रमि‍त करैत अछि‍। ऐ सम्‍बन्‍धमे कवि‍क उक्‍ति‍ अछि‍-
“गि‍रगि‍टि‍या मनुक्‍खो तहि‍ना
दि‍न-राति‍ बदलैत चलैए
गीरगि‍टेक जहर सि‍रजि‍-सि‍रजि‍
बीख उगलैत चलैए।
भेद-कुभेद मर्म बि‍नु बुझने
देखा-देखी ओढ़ैत चलैए
ओढ़ि‍-ओढ़ि‍ ओझरा-पोझरा
डुबकुनि‍या काटि‍ मरैए।”
(घोड़ मन, भाग-२)

मनुखक रीत-नीत आ बेवहारमे कतेक परि‍वर्त्तन भऽ गेलैक अछि‍। बदलैत जुग-जमानापर हि‍नकर कहब छन्‍हि‍-
“जुग बदलल जमाना बदलल
बदलि‍ गेल सभ रीति‍-बेवहार।
चालि‍-ढालि‍ सेहो बदलि‍ गेल
बदलि‍ गेल सभ आचार-वि‍चार।
मुदा, राति‍-दि‍न एको ने बदलल
नै बदलल चान, सूर्ज, अकास।
पूरबा-पछबा सेहो ने बदलल
नै बदलल जि‍नगीक बि‍सवास।”
(जुग बदलल जमाना बदलल)

अंग्रेजी भाषापर शब्‍दक प्रहार करैत कहैत छथि‍-
“अंग्रेजी पढ़ि‍ अंग्रेजि‍या बनि‍-बनि‍
पप्‍पा-मम्मी आनत घर।
बाप-दादाक कि‍ भेद ओ बुझत
अड़ि‍-अड़ि‍ बाजत नि‍डर।”
(घरक लोटि‍या बुड़ले अछि)

समाजक रूप वर्णन ऐ पाँति‍सँ लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍-
“अगम-अथाह रूप समाजक
असथि‍र भऽ सागर कहबैए।
बर्खा बुन्नी बीच-बीच
ओला-पाथर बरि‍सा दइए।
पबि‍ते पाबि‍ पृथ्‍वी पसरि‍
धरि‍या-चालि‍ धड़ए लगैए।
उट्ठी-बैसी खेल खेलैत
मोइन-धार बनबए लगैए।
टूक सुपारी समाज कटि‍-कटि‍
टुकड़ी जाति‍ बनल छै।”
(अपनेपर)

नव बि‍म्‍वक प्रयोग संवेदनशीलता आ मार्मिकताकेँ संगे होएबाक चाही। आ से मण्‍डल जीक कवि‍तामे वि‍षयक अनुरूप बि‍म्‍बक प्रयोग भेल अछि‍।
“झि‍लहोरि‍ झील खेलाइत रश्‍मि‍
आकर्षित-आकर्षण करैए।
प्रेमास्‍पद पबि‍ते पाबि‍
प्रेम-प्रेमी कहबए लगैए।

पाबि‍ प्रेमी प्रेमी जखन
सागर गंगा मि‍लए चाहैए।
बॉसक पुल बना समुद्र
गंगा-सागर स्‍नान करैए।”
(शील)

“अजस्र धार भवसार सजल छै।
नाओं एक खाली पड़ल छै।”
(संघर्ष)

स्‍थि‍ति‍क अनुकूल बि‍म्‍ब, नव उपमान, प्रतीक नव कवि‍ताक लेल साधन मानल गेल अछि‍। आ से ऐ संग्रहक सभ कवि‍तामे परि‍लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍।
“जहि‍ना धरती अकास बीच
गाछ-वि‍रीछ लहलह करैत।
तहि‍ना वि‍वेक वि‍चार संग
सदि‍ हँसि‍-गाबि‍ कहैत।”
(प्रि‍य)

मण्‍डलजी प्रि‍य कवि‍तामे शैली आ भाषाक सम्‍बन्‍धमे कहने छथि‍-
“सम्‍पन्न शब्‍द, शैली सम्‍पन्न
शब्‍द कोष सि‍रजए लगै छै।
जड़ि‍-छीप पकड़ि‍ भाषाक
संसार-साहि‍त्‍य गढ़ए लगै छै।”

राति‍क अवसान भेलापर दि‍नक आगमन नि‍श्चि‍ते होइत अछि‍। जे कटुसत्‍य अछि‍। राति‍-दि‍न सर्वजन परि‍चि‍त शब्‍द अछि‍। शब्‍दमे व्‍यापकता सेहो अछि‍। राति‍-दि‍न कवि‍ता संग्रहक शीर्षक अनुकूल अछि‍। कवि‍ता सबहक भाव, वि‍षय, उद्देश्‍य इत्‍यादि‍ ऐ शीर्षकमे छि‍पल अछि‍।
साँझ-भोर कवि‍तामे कवि‍क कथन उजागर भेल अछि‍-
“केकरो साँझ केकरो भाेर छी
केकरो उदय केकरो अस्‍त छी।
दि‍नक अस्‍त साँझ अगर छी
राइति‍क तँ उदये छी।
बारहे घंटा दि‍नो चलै छै
ततबे टा ने राइति‍यो होइ छै।”

पुरान ठाठ आ खूँटा वि‍छि‍न्न भऽ रहल छै। नवका-नवका जि‍नगीक खूँटा आ घर ठाठ करए पड़तै। तँए कवि‍ “चेतन चाचा” कवि‍ताक माध्‍यमे कहने छथि‍ जे ई काल चेतबाक थि‍क-
“चेत-चेत चलू चेतन चाचा
सरसड़ाइत समए ससरैए।
समए छोड़ि‍ कतबाहि‍ जखने
ठहकि‍-ठहकि‍ नक्षत्र कहैए।
आगू डेग उठबैसँ पहि‍ने
चारू दि‍शा देखैत चलू।
चारू कोण ठेकना-ठेकना
आगू डेग बढ़बैत चलू।”

तँए जि‍नगीमे सीखबाक उपक्रम होएबाक चाही। बि‍नु सीखने कि‍छु नै भऽ सकैत अछि‍।
“जि‍नगीमे कि‍छु करब सीखू
जि‍नगीमे कि‍छु लड़ब सीखू।
सभ जनै छी, सभ देखै छी
अज्ञान-अबोध बनि‍-बनि‍ अबै छी।
सज्ञान-सुबोध तखने बनब
संघर्षक बाट जि‍नगी धड़ब।”
(कि‍छु सीखू कि‍छु करू)

“मुँहक झालि‍” कवि‍तामे कवि‍ ललकारि‍ कऽ कहि‍ रहल छथि‍-
“मुँहक झालि‍ बजौने कि‍ हएत,
काजक झालि‍ बजबए पड़त।
फोकला-खाख अन्ने की
सुभर दाना उपजबए पड़त।”

कहबाक तातपर्य ई अछि‍ जे सि‍रि‍फ गाल बजौने कि‍छु नै होएत। कर्म करै पड़त। जइसँ देस-दुनि‍याँक कल्‍याण संभव भऽ सकत। तँए कर्मशील होएब परमावश्‍यक अछि‍। तखने अपन इति‍हास लि‍खि‍ सकैत छी।
“कर्मक स्‍वरलहरी सीखू
अपन इति‍हास अपने हाथसँ
स्‍वार्णाक्षरमे लि‍खनाइ सीखू।”

अपन इति‍हास अपनेसँ सृजन करब बहुत कठि‍न कर्म अछि‍। ऐ लेल सतत कर्म आ वश्‍वास चाही तखनहि‍ संभव भऽ सकैत अछि‍।

हम अज्ञ छी तथापि‍ एतबा धरि‍ जरूर कहब जे प्रस्‍तुत “राति‍-दि‍न” पोथीमे बोधक अनुकूल नव बि‍म्‍ब, प्रतीक, नव उपमान इत्‍यादि‍क प्रयोग भेल अछि‍। भाषा-शैलीमे आंचलि‍कता अछि‍। मि‍थि‍लांचलक गंध समाहि‍त अछि‍। सुधी पाठकगण स्‍वागत करताह। आ संगहि‍ नवाकुंरक लेल पाथेय बनत।

२
डॉ. धनाकर ठाकुर
समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस')
समीक्षक –- डॉ. धनाकर ठाकुर
३.६.२०१२क श्री सियाराम झा 'सरस'क पोथी ‘फूल तितली आ तुलबुल’क लोकार्पण रांचीमे भेलन्हि जाहिमे श्रीरमणजी, पटना मुख्य अतिथि छलाह।
पोथी बै नी आ ह पि ना ला -१ यानी सतरंगी इन्द्रधनुषक रंगक जकां आबयबला सात कड़ीमे ई प्रथम अछि तकर विशेष संकेत पृष्ठ ४८मे (बाबा दिनकरमे पनिबोडा गीतके भीतर सातो रंग फरिछा देबाक छल).
पोथीक अनेक पन्ना रंगीन अछि , बालोपयोगी अछि आ संस्कारवर्धक (पृ. २०मे अंटी-बँटी नहि कहू), आ ज्ञानवर्धक प्रायः सब पन्ना अछि जेना दिनक नाम(पृ. ३८), गाडीक प्रकार(पृ. ३९-४०), बापूक चरखा, सचिन, धोनी, विद्यापति, मंडेला, आवश्यकता आ आविष्कारमे मेट्रो रेलसँ मिसाइल कंप्यूटर तक, टाकाक लाथे (पृ.४२-४३मे) रूपाक नव निशान, खेल-खेलमे(पृ.४४-४५) कुश्तीस ओलम्पिक तक.
विज्ञान लेखकक प्रिय विषय अछि (पृ.१८-१९,बिजली रानीमे पवन बिजली तकके चर्चा अछि संगही मिथिला-मैथिलीस प्रेमवर्धक (नेनाक मायस पृ. ६-७ मे नीक बात कहल गेल अछि जे मैथिली बाजय पढयबला सेहो नीक पद पर पहुँचैत अछि), मिथिलाक्षरहूँ अछि अंतमे. मिथिलाक एक नक्शा कतहु रहितय से नीक (अगिला कड़ीमे देल जाय), खेल -खेलमे सेहो राम, कृष्णक चर्चा(पृ. ४४-४५), जगदीशचन्द्र बसुक हँसैत-कनैत गाछक रूपमे ऋतु वर्णन(पृ.४९), सागरक वैविध्य वर्णन(पृ.६३-६४), विज्ञान प्रश्नोत्तरी(पृ. ६८), आविष्कारक माय आवश्यकता(पृ ७२) मे भारतक अंक- शून्यक अवदान आदि.
म स मिथिला आर लेखक क गाम मेहथसँ आर की की नै ( पृ.६५)- एक कड़ी एहिना अ, आ सँ ज्ञ तक बनायल जा सकैत छैक बच्चाके अपन संस्कृतिक ज्ञान दैत.
सब पन्ना सचित्र अछि ताकि नेना बुझि सकय
अधिकाश गीत गेय अछि
लगैत अछि बालोपयोगी जानि बहुत ठाम व्याकरणक नियम पालन नै भेल - जेना पोथीक नाममे फूलक बाद अल्पविराम (कोमा)
बच्चा चुलबुलक नामके नेना भुटकाक उच्चारण तुलबुल
आ एहेन अनेक ठाम (पृ.१४,.... )
बालक -बालिकाक जे चित्र मुखपृष्ठ पर देखावल गेल अछि ओहिमे कोनो गामक नहि, शहरीआ विकासकक परिचायक (पृ.२४) जखन की गामक चीज पर बहुत चर्चा अछि -चेत कबड्डी(पृ.५०), सोचु, सोचु(पृ.५१)मे किसानक महिमा) आ पर्यावरण(पृ.१२,२२,२३),आ रंगीन आर्ट पेपर पार्क फूलआ तितली, टून मून रे क जंतु संसार छपर छैयांक पनिबोडाक रंग, गाछ रोपिह फलदार, दादा-दादीक रोपल गुलाबक फूल(?) आ आन फूल पर बहुत चर्चा अछि, सौरमंडल , दुतियाक चान, (पृ.२५)क चुन्मुनी, २६, २७, २९ क आम, पृ.३३क बगुला, पृ.३५क फूलवती, बाबा दिनकर, ई धरती, सागरक संपदा, धरतीक सिगार चिडी-चुन्मुनी, गीध जकां दुर्लभ चिड़ी के बचबयके आग्रह, जाडक रौद, ऋतू वर्णनमे गाछ (पृ.४९), गाछ रोपीह (पृ.५७), सागरक सैर (पृ.६३),चिंता कचड़ास बचाब जल-नभ-स्थलके(पृ.६६), कछ्मछी(पृ.६७). एही लेल आ स्वतंत्रता हेतु, बाबा पोता गीत(पृ. ७१) मे अछि पर्यवरण, जल जीवन अछि (पृ.७६-७७ )मे जल संचय आ जल छाजनक बात अछि,बाघ मारक विरोध(पृ. ७९-८०) आदि.
मुदा 'हैप्पी बल्थ डे'(पृ.१४)आआर्ट पेपर पर पर सेहो शुभ जन्मदिन आ तहिना दू-ददू बेर हैप्पी दिवाली आ हुक्का लोली(पृ.५४मे) मुदा भरदुतिया आ होली नहि भेटल जे सबस अधिक प्रिय बच्चाके
स्वास्थ्य संबंधी नीक जानकारी(पृ.१५) संतुलित आहार (पृ.५५) नीक अछि जे नून आ चीनी कम खेबाक अछि आ फल फूल साग खेबाक आ पौष्टिक आहारक (पृ.१५,) मुदा टाफी चर्चा नै रहितय त नीक (पृ.२८), आमा माइक पेटारीमे (पृ.५२) ग्रामीण नुश्खा मे तुलसी, नेबो आदि ठीक मुदा धात्री फलं सदा पथ्यम नै देखल .
संस्कार लेल अनेक बात अछि ((पृ.१६,३४) नब जटा - जटीन, विद्यार्थीक पञ्च लक्षणक सचित्र विवरण(पृ.५९), सर-कुटुम (पृ.४८), सीखक लेल भीख(पृ.८२), बालश्रमक विरोध(पृ.८३) ई ठीक बात नै .
समाजक बिविध भागक जानकारी लेल मुस्लिम लेल अलीखान (पृ.६०), कारीगर (पृ. ६१-६२),
राहुलक माता यशोधरास प्रश्न मार्मिक अछि (पृ.६९ )पिताजी कत गेलाह? आखर यागक धुआं मे शिक्षाक महत्ता अछि (पृ. ७०), मूलमंत्र(पृ. ७३-७४मे) सत्यनिष्ठा, समर्पणस गांधी, सचिन, कलाम बनक गाथा चिरई,चुट्टी, मूसक सतत कर्म जकां.
भारत भक्तिक संग संगीतक वर्णन (पृ.७७), प्रकृति चित्रण अछि(पृ. ७८) आबी गेले अलेदाले भोर आ अनेक बालसुलभ गीत यथा (पृ.८१),
अनेक सुधार अगिला संस्करणमे संभव अछि-
बै नी आ ह पि ना ला क मैथिली पूरा रूप देनाई नीक जे केवल पीअ र लेल लिखी देलासँ भयजाइत (पि नहि)
पृ.९- 'मात्रा के यात्रा' नहि 'मात्रक यात्रा'मे (आ तहिना बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) 'बाबा के अंगुरी' क जगह), दीर्घे कीस दादीजी नीक रहैत -(स्कूलमे आब मिस पढ्बैत छथि दीदी कहाँ ?)
पृ.१० एम् एल अ क उदहारण सटीक नै
पृ.११- चटापटा शब्द ?
पृ.४७- 'बड़े- बड़े' सपनामे, पृ.६३ सागरक 'सैर' मे हिन्दीक छाप अछि ( से आन अनेक आनो ठाम अछि)
पृ.१२- स्कूलमे जाईबला बच्चा लेल हाती आ एहिना सब शब्द कियैक- या त नर्सरीक बच्चा लेल केवल अलग अध्याय हो (बादक बच्चा लेल ई अनुपयोगी गलत उच्चारण सीखबयबला जेना बिरस्पति(पृ. ३८) ?
पृ. ३८- ६० अलीखानक इम्तिहान छनि त हुनक पिताजी नै अब्बाके आबक छल आ मायके नै अम्मीके आ तपक हुनका प्रयोजन?
एहिना बहुत ठाम
ध्यान राखी जे कोनो किताबक पाठकवर्गक आयु यदि तय अछि तखनहु ओकर विशेष आयु वर्ग लेल चीज बाँटल होयबाक चाही
इन्द्रधनुषक सात रंग नै सात वर्ष तकके बच्चा लेल पोथी हर वर्ष लेल अलग अध्यायमे रहक छल आ जाहीमे पहिल माय लेल दोसर तुलबुल लेल आ एहिना होइत पांचम छठम लेल लिखैत काल शंकरक 'अपूर्णे पंचमे वर्षे.' जरूर याद राखक चाही -
कार्यक्रममे गीतके प्रस्तुत करयबला जे बालक-बालिका छलथि ओहिमे अधिकांश शुद्ध उच्चारण कय सकयबला आयुवर्गक छलथि (पृ. ३०, ३१, ३७) ई ध्यान रखैत अध्यायभाजन अगिला कड़ीमे जरूर हो.
लगैत अछि एतेक परिश्रमसँ तैयार किताबक ठीक सम्पादन नहि कयल गेल आ जे कियो सरसक गीतक प्रशंसक छलाह ओ सब एकर गीत बेर-बेर सुनि-सुनिकय सेहो केवल नीक -नीक बात बजयबला मुदा समाजमे स्वस्थ आलोचकक सेहो कमी नै
पोथी लेखक सरस भनही दादा नहि भेलाह अछि (जे बादमे बात केला पर मालूम भेल) हमरा लागी रहल छल जे ई सरस ककाक(पृ.५ )नहि सरस दादाक उपहार अछि नेना भुटका लेल जे अनेक ठाम आयल अछि - बाबा, पोता संवाद(पृ. ७१), बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) ('बाबा के अंगुरी' नहि).
८४ पृष्ठ + २४ आर्ट पृष्ठ पोथीक मूल्य १०१ रूपा अधिक नै अछि (जे कियो २०० रूपा राखि सकैत छल)- सरसजीक संपर्क – 9931346334, 0651-2560786
(NOTE-टाकाक जगह बेगुसरायक रूपा लिखब हमरा नीक लगैत अछि जे रानी विक्टोरियाक चांदीक/ सिक्का/ रूपा चाल जाहीस एक टाका बनल अछि)

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै  २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि‍ भरना

१
जवाहर लाल काश्यप
विहनि कथा
जमाना बदलि गेलै
रमेश बाबा दलान पर बैसल रहैत आ रामायण गाबैत छलाह। बाहर दू टा बच्चा खेल रहल छल । ओ दुनु  बहुत हल्ला कऽ रहल छल जइ लेल बाबा केँ बहुत दिक्कत भऽ रहल छल ।
ओ बेर- बेर बच्चा केँ चुप रहय लेल कहैत छलाह मुदा बच्चा चुप नहि भऽ रहल छल। ई देखि हमरा सेहो तामस आबि गेल । हम दुनु बच्चा केँ दु थापर लगा देलियै । बच्चा कानैत आंगन चलि गेल ।  आंगन मे बच्चा केँ माय पुछलखिन्ह "के मारलकौ"?
बाबा हमरा कहलथि  बौआ जमाना बदलि गेलै । पहिले जे बच्चा आंगन मे कानैत पहुँचैत छल तँ माय पुछैत छल किएक मारलखुन्ह ? अर्थात कि गलती केलहीं, आब पुछैत अछि   के मारलकौ"? मतलब ककर अतेक हिम्मत भेलै जे तोरा मारलकौ ।

२
जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी

दूटा विहनि कथा

१. मसोमात
चारि बरखक बाद, गामक माटि-पानि जेँ देह में बहि रहल अछि हिलकोर मारलक  तँ सभ काज-बाज छोरि नोकरी सँ सात दिनक छुट्टी लय कए गाम बिदा भेलहुँ | जेना-जेना गामक दुरी  कम भेल जए तेना-तेना हृदयक बेग आओर गामक माटिक गंध दुनू तेज भेल जए | ट्रेन आ बसक यात्रा क्रमसँ  खत्म भेला बाद गामक चौक सँ पएरे गाम हेतु बिदा भेलहुँ जेकर दुरी करीब एक किलोमीटर रहै | ओनाहितो असगर, समानक नाम पर कन्हा पर एकटा बैग आ दोसर गाम देखक लौलसा, रिक्सा छोरि पएरे चलैक लेल प्रेरित कएलक |
अपन  टोल में प्रबेश करिते सभसँ पहिले छोटकी काकी पर नजैर परल | ओना गामक सम्बन्ध में ओ हमर बाबी लगैत छलथि मुदा गाम में सभ कियो हुनका छोटकी काकी कहि सम्बोधित करैत छलनि तइँ हमहुँ हुनका छोटकी   काकी कहैत छलियैन | उज्जर पढिया सारी पहीरने आँचर सँ माथ आ एकटा खूट सँ नाक तक मुह झपने | रस्ता सँ आँगन जाईत  घरक कोन्टा पर ओहो हमरा देखलथि, जा हुनका गोर लागि आशीर्वाद लेलहुँ |
"केँ... बच्चू" छोटकी काकी केँ मुह सँ खडखराइत अबाज निकलल
"हाँ काकी "
"कहीया एलअ"
"एखन आबिए रहल छी काकी "
"एसगरे एलअ हेँ "
"हाँ "
"आ दिल्ली में कनियाँ, धिया-पुता सब ठीक"
"अहाँक आशीर्वाद सँ सभ कुशल-मंगल, अहाँक की समाचार नीके छी ? "
ई प्रश्न सुनिते हुनका आँखि सँ नोर झहरअ लगलनि नोर रोकैक असफल प्रयास करैत -" कि बौआ, एहि मसोमात केँ की नीक आ की बेजए, बेजए तँ ओहि दिन भय गेलहुँ जहिया अहाँक काका नबाडिये में छोरि स्वर्ग चलि गेला, आब तँ एहि बुढ़ारी में कियोक धूओ नहि देखए चाहैए, देखला सँ सभ केँ अमंगल होएत छैक | नहि जानि बिधाता एहि अभागनि केँ आओर कतेक ओरदा देने छथि | आई महीनों केँ बाद ककरो सँ दूमुह गप्प केलहुँ आ कियो हमरो द पुछलक ....."
ई  कहैत काकी अपन नोर केँ नुकबैत कोन्टा सँ अँगना दीस चलि गेली आ हमहुँ गामक जिनगीक, बिधबा, मसोमात, बुढ़ारी सोचैत आगु  बढि गेलहुँ |  
२. रहस्य
बाबा-बाबीक विवाहक चालीसम बर्खगांठ | दुनू गोटे अपन सम्पूर्ण परिवार केँ बिच घेरएल  बैसल | चारूकात एकटा खुशीक वातावरण बनल | सभ केँ मुह पर हँसी, खुशी आ प्रशन्ता झलकि रहल छल | बाबीक पंद्रह बरखक पोती, बाबीक गरदनि पर पाछू सँ लटकि कए झुलति पुछलक -"बाबी एकटा गप्प पुछू |'
बाबी -" हाँ पूछै"
पोती -"बाबा-बाबी हम अहाँ दुनू केँ कहियो झगडा करति नहि देखलहुँ, एकर की रहस्य छैक |"
बाबी लजाईत अपन पोती केँ कन्हा सँ उतारैत -"चल पगली, एकरा ई की फुरा गेलै |"
बाबीक छोटका बेटा -"नहि मए ई तँ हमरो बुझैक अछि, ओनाहितो हमर नव-नव विवाह भेलए ई मन्त्र तँ  चाहबे करी |"
बाबी -" चल निर्लज, सब एक्के रंग भए गेलै, अपन बाबू सँ पूछै हुनका सब बुझल छनि |"
छोटका बेटा बाबू सँ -"हाँ बाबू अहीँ कहु न अपन सफल विवाहिक जीवनक रहस्य | हमहुँ अहाँ दुनू में कहियो झगडा नहि देखलहुँ, ई मन्त्र हमरो दिय न ' ( अपन कनियाँ दिस देख क') देखू ने निर्मल तँ  सदिखन हमरा सँ लडिते रहैत अछि |"
बाबा, एकटा नमहर  साँस लैत जेना अतीत केँ देखैक प्रयास कए रहल छथि | छोटका केँ माथ पर स्नेह सँ हाथ सहलाबैत बजला -"एकरा कियो झगडा कहैत छैक ? अहाँ दुनू में जे स्नेह अछि ओहि  में किछु नोक-झोंक भेनाई सेहो आवश्यक छैक | जेना भोजन में चटनी, जीवन में सब पक्ष केँ अपन-अपन महत्व छैक मुदा हाँ ई मात्र नोक-झोंक तक रहवा चाहि झगडा नहि, नहि तँ  एहि सँ आगू जीवन नर्क भए जाईत छैक | पती पत्नीक  बिचक आपसी सम्बन्ध नीक अछि तँ  स्वर्गक कोनो जरुरी नहि आ यदि सम्बन्ध नीक नहि अछि तँ  नर्कक कोनो आवश्यकता नहि ओहि अवस्था में ई जीवने नर्क अछि |"
सभ कियो एकदम चूप एकाग्रता सँ हुनक गप्प सुनैत | चुप्पी केँ तोडैत  बाबा आगू बजलाह -"रहल हमर आ तोहर मए केँ बिचक सम्बन्ध तँ  ई बहुत पुरान गप्प छैक, जखन हमर दुनू केँ विवाह भेल आ हम दुनू एक दोसर केँ पहिल बेर देखलहुँ तखने हम तोहर मए सँ वचन लेलहुँ जे जखन हमर मोन तमसे ' तँ  ओ नहि तमसेती आ जखन हुनकर मोन तमसेतनि तखन हम नहि तमसाएब | बस ओ दिन आ आई तक हमरा दुनू केँ बिच नोक-झोंक भेल झगडा कहियो  नहि |"
*****

३
सुजीत कुमार झा

मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड

मिथिला पेन्टिङ्गकेँ देश विदेशमे मांग भऽ रहल समयमे पेन्टिङ्ग व्यावसायीसभ नयाँ नयाँ चीजमे पेन्टिङ्ग बना कऽ बजारमे आनए लागल अछि ।
एहि क्रममे जनकपुरक नारी कला केन्द्र कुवा छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग पारि बजारमे आनएकेँ तैयारी कऽ रहल अछि । केन्द्रक प्रमुख संतोष मिश्रक अनुसार जल्दीए अन्तराष्ट्रिय बजारमे मात्र नहि जनकपुर सहित सभ ठाम एहन छत्ता भेटत । साढे तीन सय रुपैया सँ साढे चारि सय रुपैयामे ओ छत्ता उपलब्ध हएत । नारी कला केन्द्रक मंजुला ठाकुरक नेतृत्वक कलाकार मिथिला पेन्टिङ्ग बला छत्ताकेँ आकृति देने छथि ।
केन्द्रक प्रमुख मिश्रक अनुसार छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग राखएकेँ सल्लाह अष्ट्रेलियन नागरिक टोनी सेन्ड्रेस देने छलथि । हुनके सल्लाह अनुसार छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्गक रुप देल गेल ओ कहलन्हि ।
मिथिला पेन्टिङ्ग बला छत्ता अमेरिकाक सन्ताफेमे होबएबला सांस्कृतिक प्रदर्शनीमे सेहो राखल जाएत । १९८९ ई. मे जनकपुर नगरपालिका १२ कुवामे स्थापित नारी कला केन्द्रमे मिथिला पेन्टिङ्ग सँ जुडल विभिन्न आकृतिसभ बनाओल जाइत अछि ।
जनकपुरमे बनल मिथिला पेन्टिङ्गकेँ अन्तराष्ट्रीय स्तरमे बहुत मांग रहल अछि । एहि ठाम नेपाली कागजमे मिथिला पेन्टिङ्ग, अएना, कप, सिलाई कढाई, सेरामिक्सक सामानसभ बनाओल जाइत अछि ।
अमेरिकी नागरिक क्लियर वर्कटद्वारा शुरु कएल गेल नारी कला केन्द्रकेँ एखन अष्ट्रेलियन दूतावास सहयोग कऽ रहल अछि ।
४
श्री जगदीश प्रसाद मण्डल
लघुकथा
सूदि‍ भरना

बालपनमे लागल चोट जहि‍ना अधवेशू वा बुढ़ाड़ीमे उपकि‍ जाइत तहि‍ना डोमीकाकाकेँ बेटी बि‍आहक चोट मास दि‍नक पछाति‍ उपकलनि‍। रोगाएल अवस्‍थामे जखन कि‍यो जि‍नगी-मृत्‍युक मचकीपर झुलए लगैत तखन जहि‍ना धर्मराजक दरवार लगैत तहि‍ना हुअए लगलनि‍। नि‍ष्‍पक्ष समीक्षक जहि‍ना साहि‍त्‍यक कोण-कोणक समीक्षा करैत तहि‍ना डोमीकाका सेहो करए लगलाह। अन्‍तो-अन्‍त अही ि‍नर्णएपर पहुँचलाह जे गाममे रहने जीवन-यापन नै कऽ पाएब तँए बि‍नु परदेश गेने जीब असंभव अछि‍। केना नै असंभव होएत? पाँच बीघा जमीनबला डोमीकाकाकेँ दू बीघा घर-घराड़ीसँ लऽ कऽ गाछी-बि‍रछी, खरहोरि‍मे बरदाएल बाकी तीन बीघा जोतसीम। समाजोक देखा-देखी आ कुटुमो-परि‍वारक स्‍तरक अनुकूल तँ करए पड़तनि‍। जहि‍ना धरमोक स्‍वरूप समायानुसार बदलि‍ जाइ छै तहि‍ना ने समाजोमे जे बेसी लाम-झामसँ बेटीक बि‍आह आ माए-बापक सराध करैत ओ समाजमे ओते ऊपर होइत। ततबे नै जइ समाजमे दोससँ बेसी दुश्‍मन रहैत तइ समाजमे ईहो पुरौनाइ तँ जरूरि‍ये होइत जे अनकासँ कि‍ मोर छी।

दलानक ओसारक दछि‍नबरि‍या चौकीपर चि‍त्त भेल पड़ल, दहि‍ना हाथ मोरि‍ दुनू आँखि‍पर लेने डोमीकाका परि‍वारक बदलैत स्‍वरूपपर आँखि‍ गड़ा सोचि‍ रहला अछि। मनमे उठलनि‍ गलती अपनो भेल। ई तँ नजरि‍पर आएल जे समाज आ कुटुम-परि‍वारक देखौंस करब जरूरी अछि‍ मुदा ई नै आबि‍ सकल जे ओहूमे पति‍आनी लगल अछि‍। एकठाम सभ समटल कहाँ छथि‍। भैयारि‍योमे तँ होइते अछि‍ जे संगे-संग जि‍नगी बनौनि‍हारि‍ पि‍ति‍औत बहि‍नक बीच एककेँ इंजीनि‍यर, डाॅक्‍टर संगी भेटैत तँ दोसरकेँ ऑफि‍सक कि‍रानी वा स्‍कूलक शि‍क्षक भेटैत अछि‍। भूल भेल, आगू दि‍स तकलौं मुदा पजरबािह आ पाछू दि‍स नै तकलौं। एकरा के उचि‍त कहत जे एक-ओद्रक बेटा-बेटीक बीच इमान-बेइमान बनि‍ जाउ। पाँच बीघा जमीन अछि‍ चारू भाए-बहि‍न हि‍स्‍साक संग पाँचम अपनो दुनू परानीक हेबे करत। जँ से नै हएत तँ अपन जि‍नगी अनका हाथमे जेबे करत। मुदा गलती भेल, धड़फड़ी केने। तहूमे पत्नी आरो मन घोर कऽ देलनि‍। ई कहू जे अर्द्धांगि‍नी भऽ केहेन वि‍चार देलनि‍ जे ऐ गाममे कर्ज नै भेटत तँ हम नैहरसँ आनि‍ देब। एकटा मुर्गी जँ दसठाम हलाल हुअए तँ ओकरा की कहबै?
एक तँ ओहि‍ना परि‍वार महजालमे ओझराएल अछि‍ तइपर हमरा कि‍रतबे समाजक ऊपर आन समाजक कर्ज आबि‍ जाए, एहेन काज जीता-जि‍नगी नै करब। मुदा तइमे कनी औगताइ भेल। औगताइ ई भेल जे पच्‍चीस-तीस हजार रूपैये कट्ठाक चीज पाँचे हजार रूपैये भरना लगा देलि‍ऐ। मुदा बीतलकेँ बि‍सरबे नीक। जँ से नै करब तँ भूतलग्‍गू जकाँ अपन देह-हाथ अपने नोचए पड़त। फेर मन भरना जमीनपर घुमलनि‍। केना लोक पावनि‍-ति‍हारमे सेर-पसेरी लऽ खेतो भरना लगबैए आ बेचबो करैए। मनमे खौंझ उठलनि‍, कानूने बनने कि‍ सुथनी हएत जे आठ बर्खक पछाति‍ भरना जमीन घूमि‍ जाएत, मुदा होइ कि‍ अछि‍। ततबे कि‍अए, जहि‍ना महाजनीक सूदि‍केँ सीमामे बान्‍हि‍ देल गेल जे दोबरसँ बेसी कहि‍यो ने हएत, तहि‍ना बैंकक कर्जकेँ कि‍अए ने बान्‍हल जाइए, जे ग्रामीण-दशा (गामक लोकक जि‍नगी) आगू मुँहे नै ससरि‍ पाछुए मुँहे ससरि‍ रहल अछि‍। जइठाम एते महग पढ़ाइ भऽ गेल अछि‍, लाखक इलाज (शरीरक) भऽ गेल अछि‍, लाखक घर बनि‍ रहल अछि‍ तइठाम, कि‍ उपाए अछि‍। हँ एते जरूर हेबाक चाही जे जखन सभ अपने छी तखन बीचमे इमान-बेइमान नै बनए। जहि‍ना बरसातक मासमे एक दि‍सुका पानि‍केँ दोसर दि‍सुका रोकि‍ तेसर दि‍सक रास्‍ता पकड़ैत तहि‍ना घीचा-तीरीमे डोमीकाकाक मन असथि‍र भेलनि‍। पड़ले-पड़ल पत्नीकेँ सोर पाड़लखि‍न।

आंगनक ओसारक शीतल पाटीपर बैसि‍ दायरानी बि‍आहक उनटा गि‍नगी करैत रहथि‍। फल्लांक करौछ हरा गेलइ, ओकरा तँ कहब जरूरी अछि‍। जँ से नै कहबै तँ अनेरे ओ दस ठाम बाजत जे फल्‍लाँ करौछ राखि‍ लेलक। कोन चीज छी जखन एते खर्च भेबे कएल तखन एकटा करौछे कि‍ छी। जहि‍ना जि‍नगी बनबैमे जि‍नका जेहेन कठि‍न मेहनति‍ भेल रहैए तहि‍ना ने ति‍नकर जि‍नगीयो ठाढ़ होइए। जँ से नै तँ लाखक जि‍नगी केना पाँच-दसमे हारि‍ मानत। फेर दायरानीक मनमे खुशी एलनि‍, अपना जँ बौको डाँड़ लागल तैयो बैहरी दादीकेँ नफे भेलनि‍।
टुटल चंगेरा लेलि‍यनि‍, नवका कीनि‍ कऽ देलि‍यनि‍। केना नै दैति‍यनि‍ ओ थोड़े बुझलखि‍न जे हमरा चंगेरामे केरा-आम छोड़ि‍ दोसर चीज जाइबला नै अछि‍। ओना हमरो तँ काज चलि‍ऐ गेल भने पुरना गेल नव आएल से नीके भेल। पति‍क अवाज सुनि‍ ओसारेपर सँ एते जोरसँ बजलीह जे डोमीकाकाकेँ बूझि‍ पड़लनि‍ जे लगमे नै कनी हटल छथि‍।

डोमीकाका लग तँ दायरानी काकी पहुँचि‍ गेली मुदा मनमे अपने घि‍रनी नचैत रहनि‍। एक चालि‍ चलि‍ जहि‍ना घि‍रनी वि‍श्राम लैत तहि‍ना काकीकेँ सेहो भेलनि‍। आँखि‍ उठा तकलनि‍ तँ देखलखि‍न जे ग्रीष्‍मकालीन घास-पात जकाँ कुम्‍हलाएल मुँह, जेठुआ गरेक मेघ जकाँ चि‍न्‍तासँ लादल आँखि‍, नि‍रजन वनमे हेराएल बटोही जकाँ देखि‍ मन सहमि‍ गेलनि‍। अपन कर्तव्‍यक एहसास भेलनि‍। पि‍यासल लेल जहि‍ना पानि, तबधल लेल पंखाक हवाक जरूरति‍ होइत तहि‍ना चि‍न्‍ताएल मनक लेल सेहो मीठ बोलक जरूरत होइत अछि‍। आँचरसँ ढबढबाएल पति‍क दुनू आँखि‍ पोछैत बजलीह-
“एहेन सकल-सूरत कि‍अए बनौने छी?”
सि‍कीक वाण सदृश पत्नीक बोल डोमीकाकाक हृदैमे बेधि‍ देलकनि‍। छटपटाइत बजलाह-
“उपाये कि‍ अछि‍ जे.....?”
दायरानी- “तखन?”
डोमीकाका- “परदेश जाएब। दुनू बेटोकेँ नेने जाएब, नहि‍यो कमा कऽ देत पेट तँ पालत ने। जँ दसो हजार महीना कमाएब ते एक बरखे नै दू बरखे, पाँचो बरखे ते खेत छोड़ाइये लेब।”
दायरानी- “तइ बीच?”
डोमीकाका- “अहाँकेँ जाबे धरि‍‍ बरदास हएत ताबे धरि‍ रहब नै तँ भाएकेँ नैहर समाद पठा देबनि‍।”
नैहरक नाओं सुनि‍ते दायरानी बजलीह-
“अहाँ सभ जखन चलि‍ऐ जाएब तखन घरमे कोठि‍ये-भरली लऽ कऽ की करब। मसोमातक चुड़ी जकाँ कि‍अए ने ओकरो सभकेँ फोड़ि‍-फाड़ि‍ कऽ फेकि‍ये देबइ।”
पत्नीक बातकेँ डोमीकाका ताड़ि‍ गेलाह। कहलखि‍न-
“हँसी-ठठा छोड़ू एहेन गरूगर समए केना टपब, से वि‍चार दि‍अ। आखि‍र अहूँ तँ अर्द्धांगि‍नि‍ये छी कि‍ने?”
पति‍क वि‍चार सुनि‍ वि‍चारवान पत्नी जकाँ दायरानी कहलखि‍न-
“पच्‍चीस-तीस हजार रूपैये कट्ठाक जमीन अछि‍। दस-बारह कट्ठा बेचि‍ लेब, भरना छूटि‍ जाएत। बुझबै जे तीन बीघा जोतसीम नै अढ़ाइये बीघा अछि‍।”

अखाढ़क पहि‍ल बरखाक पहि‍ल बुन पड़लासँ जे जमीनक सुगंध नि‍कलैत ओहने सुगंध डोमीकाकाकेँ पत्नीक वि‍चारमे लगलनि‍। मुस्‍की दैत आँखि‍-पर-आँखि‍ गड़ा धन्‍यवाद देलखि‍न।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ।

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART IV




मुन्नाजी              
विहनि कथा संसार
अदौ कालसँ चलि आबि रहल अछि कहबाक परिपाटी। कहबाक लेल समाद होइ छै। मुदा ओ क्षणिक सूचना मात्रा होइछ। कहबाक बेगरताक मूलमे यदि कथ्य वा कथानक हुअए। कहबाक लेल समादक विस्तार हुअए ओ कोनो फलकपर विस्तार लऽ कहऽ बलाक पूर्ण विचारकंे संप्रेषित करए, सएह कथाक नाम पबैछ। कथा एक लोकसँ दोसरा लोक धरि एक पीढ़ीसँ दोसरा पीढ़ी धरि मौखिक रूपेँ हस्तान्तरित होइत रहल। से तहिया भेल जहिया लिखबाक जनतब वा सरंजामक अभाव छल।
कथा लेखनक प्रारम्भमे कथ्यकेँ सोझाँ-सोझी राखि देल जाइत छल। ओकर मूल बातकेँ बढ़ा-चढ़ा प्रस्तुत कएल जाइत छल, मुदा हुबहु। जेना पहिने मौखिक हल तकरे प्रतिरूप। ई प्रतिरूप समायन्तरे क्रमिक स्तरपर परिवर्तित होइत रहल। कथाक लेल अंग्रेजीमे स्टोरी शब्द अछि। आगू एकरा गढ़बाक प्रक्रिया आ पछाति मढ़बाक प्रक्रिया शुरू भेल, जे शैलीक रूपेँ सोझाँ आएल। फेर विकासक क्रमे एकरा अगिला चरणमे एकटा औसत सीमामे बान्हल जाए लागल, ओहो कथा रहल मुदा अंग्रेजी शब्द परिवर्तन कऽ नाम फरिछाएल शॉर्ट स्टोरी।
मैथिली सहित अन्यान्यो भाषामे शॉर्ट स्टोरीक शाब्दिक अर्थ लघुकथा कहि प्रारम्भ भेल छोट-छोट कथा रचना। आ ओइ लघुकथाक छोट आकारकेँ सेहो लघुकथाक नामे लिखल आ प्रकाशित कएल जाए लागल। आब लोककेँ व्यस्ततामे ई छोट-छोट कथा सोहाए लगलै। आ पाठकीय उत्साह रचनाकार मनोबल बढ़बैत आत्मविश्वासकेँ दूना केलक। परिणाम स्वरूप ध्ुरझार लिखाए लागल अतिलघुकथा।
‘लघुकथा’ अछि हिन्दी भाषासँ लेल गेल शॉर्ट स्टोरीक उधारी शब्दकोषीय अनुवाद। तकर कारण रहल-पहिल, एकटा नव विधा देखिते मैथिली रचनाकार सब देखाउँसे लिखऽ लगला छोट अकारक कथा। दोसर, जेना हिन्दी साहित्य लेखन अंग्रेजी साहित्यसँ प्रभावित हेबाक संकटसँ उबरि नै पबैए तहिना मैथिली साहित्य रचना, विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलसँ पहिने, बहुत लग धरि (पूर्णतः नै) हिन्दी साहित्य लेखनसँ आच्छादित छल। तेँ मैथिली रचनाकारकेँ कखनो एकर मैथिली शब्द जेना हिन्दीक ‘कहानी’ मैथिलीमे ‘कथा’ अछि, (हिन्दीयोमे ठाम ठीम स्टोरीकेँ ‘कथा’ शब्देँ प्रयुक्त देखल जाइए) से नै फुराएल हेतन्हि। तेँ ओ अपने अतिलघुकथाकेँ लिखैत रहलाह लघुकथा। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे ई नव विधा जहन मैथिलीमे हस्तान्तरित भेल तखन सनातनीये अतिलघु आकार-मात्राक कथा छल । एकर विकसित रूप तँ बीसम सदीक अन्तिम दशकमे देखाए लागल। जहन कि तकनीकी शिक्षा वा व्यावसायिक शिक्षासँ लगीच एवं वैश्विक परिवर्तनसँ प्रभावित नवका लोकक नव सोच विकसित भेल।
अइ विधाक स्वतंत्र रूपक फरिछौट भेलाक पछाति बेगरता भेल ऐ विधा लेल अपन माटि-पानिसँ जुड़ल, अप्पन भाषिक शब्दक। वर्ष १९९५ मे ‘सहयात्री मंच’ लोहना, मध्ुबनीक साहित्यिक विमर्श प्रस्ताव रखलौं। जकरा हुलसैत सहृदये मैथिलीक कवि, कथाकार श्री राज द्वारा समर्थन कएल गेल। उपस्थित सम जन समवेते स्वीकार कएलनि। उपस्थित जन छलाह- श्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, कुमार राहुल, विजयानन्द हीरा, सच्चिदानन्द सच्चू एवं अन्यान्य।
विहनि कथा (सीड स्टोरी), बीज कथा; स्वयंमे कथाक पूर्ण रूप अछि विहनि कथा। ई ने छोट अकारक कथा छी, आ ने कोनो कथाक छेँट। सामान्येतया कथा कतेको बिन्दुकेँ छुबैत बिरड़ो जकाँ उधियाइत पाठककेँ अपन उद्वेश्य कहबामे सक्षम भऽ पबैए। मुदा विहनि कथा माने  बीज कथा स्वयंमे संपूर्ण कथा अछि। जे पाठककेँ एक मात्र अपने खुटापर खुटेसल सन राखि अपन उद्देश्यक पूर्णताकेँ एक क्रममे बिकछा लेखकीय मनस्थितिकेँ फरिछा दैए। आ पाठक ओइ सोचकेँ हुबहु मगजमे समा स्थिर भऽ जाइए।  
विहनि कथा एकटा बीया सन छोट की पैघ संपूर्ण गाछ हेबाक सामर्थ्य रखैए। तहिना विहनि कथा आकारेँ लघु होइतो कथाक सभ पक्ष, कथ्य, शिल्पकेँ एक खास बिन्दुपर समेटि कथाक संपूर्णता प्रदर्शित करबामे सक्षम अछि। जेना बीया पारबाक पछाति अँकुराइए, फेर दुपतिया सन देखाइत एकटा गाछक रूपमे अपन संपूर्णता पबैए तहिना विहनि कथा भूमिका, कथ्यक स्पष्टीकरणक संग सोद्देश्ये गढ़ल आ मढ़ल जाइए आ लेखकक समस्त विचारकेँ छोट आकारमे सोद्देश्यपूर्ण बना उजागर करबामे सक्षम होइए। जेना कोनो बीया अंकुरा कऽ गाछक सभ पक्ष यथा डारि, पात आदिसँ युक्त होइछ एकटा ठुट्ठ गाछ मात्र नै। तहिना विहनि कथा समस्त गुणेँ भरल-पूरल कथा छी। एहेन कथा नै जे दृष्टांत मात्र भऽ ठमकि जाए। एहेन कथा नै जकर कोनो ओर-छोड़ नै हुअए। विहनि कथा एहनो कथा नै अछि जकरा पूरा पढ़लाक पछाति लेखकक लेखन उद्देश्य बुझबाक लेल कात-करोट मुरियारी देबऽ पड़ए। एकर उद्देश्य सोझाँ सोझी फरिछाएल होइछ।
विहनि कथा लघु अकारे शुरू भेल। आइ ई लघुकायमे ओइ लघुकथाक एकटा विकसित रूप अछि जे संभवतः मैथिलीमे बीसम सदीक अन्तिम दशकमे अपन स्वतंत्र रूपक वा विधाक फरिछौट करबामे सक्षम भऽ सकल। विहनि कथाक संपूर्णताकेँ ऐ तरहँे कहल जा सकैछ- विहनि कथा कथाक संपूर्ण गुणक संग ओइसँ ऊपर उठि, अपन लघुकायमे समेटल एक निश्चित बिन्दुपर ठाढ़ भेल लेखकक उद्देश्यक पूर्ति करबाक संग पाठकक मगजक भरपूर खोराक अछि।
विहनि कथा २१म सदीमे रचनाकार, सम्पादक संग-संग पाठकक बीच सेहो फरिछाएल अछि। तकरे कारण अछि जे आब विहनि कथा छोट गातमे अपन सभ संपूर्णता नेने कागजपर उतरि सोझाँ अबैए। आबक समयमे दृष्टि विहीन नै, दृष्टि सम्पन्न रचनाकार सभ अइ विधाक विकासमे लागल छथि। तेँ ई आब नहिये चुटुक्का कहाइए आ नहिये कथाक छेँट वा दृष्टांत। हम पुनः ई स्पष्ट करैत कहब जे- विहनि कथा ठोस कथ्य, माँजल शिल्पमे कोनो विषयपर वर्णित ओ वौस्तु थिक जे पाठकक मन-मस्तिष्कपर चोट कऽ ओकरा सम्वेदित कऽ चिरकालिक छाप छोड़ि सकबामे सामर्थ्यवान होइए। विहनि कथा, मात्र गुदगुदी करैबला वा चुट्टी काटि बिसबिसी दैबला वौस्तु नै रहि गेल आब। ई रचनाकार आ पाठकक मोनमे समा स्थिर भऽ जाइ बला कथा थिक।
आजुक व्यस्त जीवन मध्य लोककेँ कखनो ओतेक पलखति नै भऽ पबै छै जे ओ आब घंटा-घंटा भरि बैसकी लगा एके रचना पढ़ि मोनकेँ सांत्वना देत। क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति, बदलैत छेब-छटा आ तइ हेतु अधिकसँ अधिक अर्थक जोगार मध्य कटि जाइछ लोकक जिनगी। आजुक लोककेँ मीडियासँ क्षण-क्षण नव आ रोमांचित करएबला खोराक भेटि जाइत अछि तेँ साहित्यक प्रति बहुत रूचि नै बाँचब स्वाभाविक अछि। ओना आइयो उपन्यासकेँ खूब पढ़ल जाइछ। मुदा ओकरा आम पाठक मात्रक खोराक नै कहि सकै छी। तेँ रचनाकारकेँ सेहो आब सम्हरि कऽ सशक्त आ अल्प पलखतिक बीच सामंजस्य बैसाबऽ बला रचना करब आवश्यक अछि। रचनाकार, विशेष कऽ विहनि कथाकारक ई पहिल दायित्व बनैए जे ओ समयक संग चलि पाठकक समय संग भेल व्यस्तताकेँ देखि ओज आ सरल भाषिक रचनासँ विहनि कथा संसारमे योगदान सामर्थ्य हासिल करथु।
पाठकक आजुक क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति मध्य विहनि कथाकारो जिबैत छथि। तँ ओ यदि आजुक बेहाल अर्थ तंत्र, मशीनी युगक मध्य लोकक मशीन सन हएब परिस्थितिकेँ गसिया कऽ पकड़थु। आ अही परिस्थितिकेँ पाठकक सोझाँ परसि कऽ पाठककेँ मजगूती देबामे अपनाकेँ सक्षम करबाक शक्ति अर्जित कऽ रचनारत रहथु। तहन विहनि कथा, विहनि कथाकार आ पाठकक मध्य सामंजस्य बैसि पाओत। पाठकक प्रत्येक क्षणक व्यस्तता, किछु नव करबाक सनक, अर्थोपार्जनक पाछाँ भगैत रहलासँ उपजल तनावसँ मुक्तिक साधन सेहो अछि विहनि कथा। पाठक जखन सभसँ विलग अल्पावधिक लेल खाली भेटल समयक उपयोग करऽ चाहैए तँ ओकर संग देबामे सक्षम अछि विहनि कथा। ऐ सभ बेगरता पूर्ति करबामे सक्षम विहनि कथा अपन फराक जगह छेकबामे सक्षम भेल अछि।
आब विहनि कथाकार जखन समय संग चलि पाठकक मनोस्थितिक अनुकूल रचना देबामे सामर्थ्यवान छथि। ओ अपन पहिल दायित्व पाठकक मोनकेँ भाँपि तदनुकूल रचनासँ पाठककेँ बन्हवामे सक्षम भेल छथि। तहन बेगरता उठै छै एकर मूल्यांकनक। वर्तमानमे एहेन कोनो दृष्टि फरिच्छ समीक्षक वा समालोचक देखार भऽ ऐ विद्यापर काज करबामे सक्षम नै भऽ पौलाह अछि। तकर ठोस कारण अछि बदलैत समय आ परिस्थिति मध्य ओहने सोचक सामंजस्य। जे स्थापित समीक्षक छथि से दू तीन दशक पछातिक नजरिये रचनाकेँ देखबाक प्रयास करताह। हुनका ऐ मे भऽ सकैए किछु नै देखाइन। कारण जे ओ सभ कथाक जइ मूलकेँ देखैत भोगैत एलाह अछि विहनि कथा ओइसँ ऊपरक सोच आ फराक शैलीमे अछि। एकर सत्य आ पूर्ण गात तहिया फरिछाएल जहिया मठाधीश समीक्षक सबहक सोच ओइ कथा, ओकर प्राचीन चरित्र मध्य सन्हिया बैसि गेल। समाजक एकटा समस्या मँहगाइ उदाहरण स्वरूप सनातनी आ चिरायु अछि। ई कहियो खत्म होइबला चीज नै अछि। मुदा तैयो एकर चरित्र आ चेहरा सीढ़ी दर सीढ़ी बदलैत रहैए। आ ओइ संग ओइ मँहगाइक प्रतिफल सेहो ओहिना बदलैत नजरि अबैए। यथा यात्रीजीक कवितामे वर्णित मँहगाइ साहित्यमे चर्चित अछि। आइ ओहेन कोनो नव ठोस रचना मँहगाइपर नै अछि। तहिया लोक भूखे मरैत छल, पेट काटि कऽ जिबैत छल। गदैली ओढ़ि सर्दी कटै छल। आजुक मँहगाइ मध्य कियो भूखे नै मरैए। आ सामान्यो वर्गक लोक कम्मल ओढ़ि आ हीटर जरा सर्दी बितबैए। की ई फर्क सनातनी समीक्षक फरिछेबामे सफल भऽ सकताह? किन्नहुँॅ नै। किएक तँ अइ बदलल स्थितिपर ध्यान देबाक पलखति कहाँ छनि। ओ तँ प्रतिक्षा करै छथि रचनाकारकेँ जुएबाक, रचना चाहे खिज्जा रहि जाउन।
कथासँ जुड़ल लोक विहनि कथा मादे विचार कऽ सकैत छलाह। मुदा हुनकर सभक दृष्टि ‘विहनि कथा’क प्रति फरिच्छ नै छनि, उदाहरणतः रंगकर्मी कुणाल, जे नाटकक संभ्रान्त, परिपक्व ज्ञाता छथि ओहो कथापर लिखबा काल विहनि कथाकेँ अस्तित्वहीन कहि बेरा दै छथि। मायानन्द मिश्र मैथिली कथा धाराक मजगूत खाम्ह छथि, ओ लघुकथा (विहनि कथा)केँ चुटुक्काक संज्ञा देलनि। माया बाबूक सोच समीचीन अछि किएक तँ ओ जइ दशकक सोचक लोक छथि तइमे लघुकथा (विहनि कथा) विद्या फरीछ नै छल। तेँ हुनको ऐ प्रति दृष्टि फरीछ नै हएब स्वाभाविक। ओ कथा विकासक आलेखमे लघुकथा (विहनि कथा)क चर्चे केलन्हि सएह बहुत अछि। [मैथिली कथाक विकास नामक आलेख, साहित्य अकादमी दिल्ली सँ प्रकाशित पोथी -‘मैथिली कथाक विकास’- सं. वासुकी नाथ झा, २००३].
विहनि कथा वा कथाकारक मूल्यांकन हेतु विहनि कथाकार स्वयं ऐ दिशामे कान्ह उठाबथि तँ सही मूल्यांकन संभव भऽ पाओत। मैथिली समीक्षाक एकटा कमजोर तत्व ईहो रहल जे ओ रचनात्मक दृष्टियेँ सड़क छाप होइत छथि। फरिछेबाक ई जे ओ अपन गुणगान मात्रा सुनऽ चाहै छथि। आलोचनामे कमी नै वाह वाही हेबाक चाही। जँ समीक्षक द्वारा हुनकर रचनात्मक दोष वा कमीकेँ उघारि सभक सोझाँ कऽ देल गेल तँ समीक्षक भऽ गेला हुनक कट्टर दुश्मन। आ तकर पछाति हुनका, रचनाकारक मुँहे, अज्ञानी, उदण्ड, स्वार्थी आदि संज्ञासँ जानए लागब। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे मैथिली समीक्षामे किछु गोटे कृतित्वसँ पहिने व्यक्तित्वकेँ प्राथमिकता दऽ समीक्षा लिखि रइल छथि। तँ जा धरि रचनाकारमे आलोचनात्मक विचार वा कमी सहबाक सामर्थ्य नै हएत, स्वथ्य आलोचना कतऽ सँ टंाग पसारि सकत वा अपन बैसकीपर बैसि अराम कऽ सकत? ओहने किछु रचनाकार सभ द्वारा समीक्षाकेँ ओलि सधेबाक सूत्रक रूप सेहो ठाम-ठीम प्रयुक्त होइत देखाइत रहल अछि।
आजुक विहनि कथा पहिने हिन्दी भाषासँ उधारी लेल शब्द ‘लघुकथा’ नामे लिखाइत रइल। अखन धरिक मौखिक जनतब अनुसारे लघुकथा शब्द प्रयोगे छपल पहिल कथा १९६८ मे मिथिला मिहिर मे काली कुमार दास लिखित ‘बुड़िबक वर’ छल। अइसँ पहिने छेँट कथा, कटपीस कथा, मिनी कथा, फिलर कथा........आदि नामे ई छपैत रहल छल। एकर पछाति जे रचनाकार विहनि कथामे सक्रिय भेला ओ नाम अछि- डॉ हंसराज, ए. सी. दीपक, तकर पछाति लिली रे, राजमोहन झा, एम. मणिकान्त, अमरनाथ, रामलोचन ठाकुर आदि। अइ नाममे सँ बेशी गोटे विहनि कथा लिखबाक प्रयोगधर्मिता मात्रक निर्वहन केलनि। हँ एम. मणिकान्त मिथिला मिहिरक माध्यमे कतेको वर्ष धरि विहनि कथा लेखनक नियमितता बनौने रहला। मुदा दुखद वा हास्यास्पद बात ई जे वर्त्तमानमे हुनक एको टा रचना उपलब्ध नै अछि। डा. हंसराज जी क मैथिलीक पहिल विहनि कथा संग्रह ‘जे की ने से’ (प्रकाशित १९७२ ई.) मैथिली विहनि कथा पेटारक पहिल सनेस कइल जा सकैए। ऐमे हास्य व्यंग्यसँ भरल लघुकायक कुल ३५ गोट विहनि कथा संग्रहित अछि। पन्नापर अंकित वर्षक अधारे एकर सभ रचना १९६३ सँ १९७२ मध्य लिखल रचना अछि। एकर कथा सभ तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक कुव्यवस्थापर चोट करैत लिखल गेल अछि। किछु रचना आइयो प्रासंगिक अछि। हंसराज निश्चित रूपसँ विहनि कथा आन्दोलनक बीया बाउग केलनि आ तेँ आइ विहनि कथाक गाछ झमटगर होइत देखाइए।
किछुए वर्ष पछाति हिनकर अगिला पीढ़ीक श्री अमरनाथ अपन ‘क्षणिका’ विहनि कथा संग्रह प्रस्तुत केलन्हि (वर्ष १९७५ ई. पुर्नप्रकाशन २०११ ई.) आ एकरा एक सीढ़ी आओर ऊपर लऽ जेबाक ठोस प्रयास केलनि। ऐ संग्रहक कथा सभ खलील जिब्रानक कथाक लगीच बुझाइए आ सभ बिन्दुकेँ छुबैत रचना कएल गेल बुझाइए। एकर अधिकांश रचना आइयोक समयसँ मेल खाइत बुझाइए। मुदा लेखकसँ दूरभाषिक वार्तालापक अनुसार राजहंस जकाँ हिनको कोनो रचना तत्कालीन पत्रिकामे प्रकाशित नै भऽ सोझे संग्रहित अछि।
वर्ष १९७५ विहनि कथाक स्वर्णिम शुरूआत वर्षक रूपमे देखार भेल बुझाइए जखन ‘मिथिला मिहिर’ (पाक्षिक) अपन विहनि कथा विशेषांक (लघु कथा विशेषांक नामसँ) निकालि मोकाम तँ नै मुदा बाट अवश्ये देखार केलक। ई साहसिक काज भेल कविक द्वारा ऐ नव विधाक लेल। मिथिला मिहिरक अइ विशेषांकक समय सम्पादक छलाह आदरणीय भीमनाथ झा। ओना तँ ‘अन्हरीक गाए बियेलै तँ सभ डाबा लऽ कऽ दौड़ल’ बला कहावत चरितार्थ होइत देखाएल। फेर २३ बर्ख बीति गेल। खएर! बाँझ गाए गाभिन तँ भेबे कएल.....।
कथानकक नब्जक सुन्नर पकड़ि रखनिहार श्री विभूति आनन्द जी जेबी पत्रिका ‘कुश’ क नवम अंक वर्ष-१९७८ मे पत्रिकाक गातक अनुसार छओ गोट विहनि कथाक समावेश कऽ निकाललनि विहनि कथा विशेषांक (लघुकथांक विशेषांक नामसँ)। अही वर्ष १९७८ जुलाइमे साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा कथापर आयोजित सेमिनारमे परिचित कथाकार श्री रामदेव झा, कथापर प्रसंगे विहनि (लघु) कथाकेँ शामिल कऽ एक अनुच्छेद लिखि एकर विशिष्टता जतौने छलाह। जइमे विहनि (लघु) कथाक वैश्विक पटलपर खलील जिब्रानक चर्चा आ तुलना एवं मैथिली विहनि (लघु) कथाकार मे सँ अमरनाथ जीक योगदानक चर्चा कएने छलाह।
आठम दशक विहनि कथाक संगोरसँ वंचित रहल। मुदा ई विहनि कथा लिखनिहारक एक टा पैघ हेँज तैयार केलक, जइमे प्रमुख नाम अछि- विभूति आनन्द, शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, प्रेमकान्त झा, वैकुण्ठ झा, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, ताराचन्द्र वियोगी, चण्डेश्वर खाँ आदि। ई समूह रचनाक दृष्टिये नव अँाखि पाँखिबला छल। साम्यवादी विचारसँ प्रभावित मुदा आपत कालक दुर्दशासँ प्रेरित आ पीड़ित। विहनि कथाक पहिल संग्रह १९७२ मे बहराएल दोसर १९७५ ई. मे आ तकर पछाति अकाल! किएक? २२ वर्षक एहेन खालीपन विहनि कथाक इतिहासकेँ ठमकि जेबाक लेल बाध्य केलक। एकर बाधक छलाह तत्कालीन  संपादक, सरकारी आ निजी समिति-संस्था आ प्रकाशक। मुदा तहूँसँ बेशी जिम्मेवार ऐ पीढ़ीक रचनाकार छला जे अपनाकेँ दुनू विधापर कलम चला भरमा लेलनि वा गद्यक ऐ प्रकारक उस्सर खेत देखि डरि कऽ अपनाकेँ कतिया लेलनि। अइ पीढ़ीक कतिपय रचनाकार ऐ विहनि कथा विधाक राशि नवका रचनाकार सभकेँ पकड़ा निश्चिन्त भऽ सुस्ताए लगलाह। कारण छल जे एकर फरिछाएल रूप मध्य अपन अस्तित्व वा कोनो लाभक जोगार वा प्रतिष्ठिा नै नजरि एलनि। अही बीच आएल तन्त्रनाथ झा समग्र, ओइमे सेहो किछु विहनि कथा संकलित अछि।
मैथिली साहित्यक जिरात मध्य विहनिकथाक प्रसंस्कृत बीया नव रूपे बाउग केलनि अइ पीढ़ीक नवतुरिया। जइमे नाम छल ज्योति सुनीत चौधरी, दुर्गानन्‍द मंडल, कपि‍लेश्वर राउत, धीरेन्‍द्र कुमार, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, भारत भूषण झा, मानेश्वर मनुज, उमेश मण्‍डल, जगदीश प्रसाद मण्‍डल (बाल विहनि कथा संग किछु सुन्दर विहनि कथा जेना थल-कमल/ घरडीह/ खाता-खेसरा/ सबूत/ कौआक मैनजन), रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू', परमेश्वर कापड़ि, रघुनाथ मुखिया, ऋषि वशिष्ठ, शिव कुमार झा “टिल्लू”, मिथिलेश कुमार झा, सत्येन्द्र कुमार झा, नवनीत कुमार झा, कौशल कुमार, अनमोल झा, कुमार मनोज कश्यप, विनीत उत्पल, धनाकर  ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, सतीश चन्द्र झा, गजेन्द्र ठाकुर, भवनाथ भवन, राम वि‍लास साहु, मुन्‍नी कामत, शंभु कुमार सिंह, संजय कुमार मंडल, मि‍थि‍लेश मंडल, लक्ष्‍मी दास, अमित मिश्र, जगदानन्द झा 'मनु', चन्दन झा, ओमप्रकाश झा, सन्दीप कुमार साफी, जवाहर लाल कश्यप, मिहिर झा, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, प्रेमचन्द्र पंकज, अखिलेश मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, मध्ुकर भारद्वाज, श्रीधरम, देवेन्द्र झा, सच्चिदानन्द सच्चु, मिथिलेश कुमार झा, कुमार राहुल, दिलीप कुमार झा “लूटन”, मुन्नाजी आदिक। ऐ पीढ़िक समूह द्वारा विहनिकथा पर ध्ुरझार काज भेल। अइ ठामसँ असली फरिछौट भेल विहनि कथाक। आ हिन्दीक उधारी शब्द लघुकथा सँ विलग खाँटी शब्द- विहनिकथा स्थापित भेल।
बीसम सदीक अन्तिम दशकक पहिल काज भेल स्व. ए. सी. दीपक जी द्वारा ‘विविध विहनि (लघु) कथा विशेषांक (मार्च-१९९४ मे)। तकरा पछाति नवका पीढ़ी सेहो कान्हपर वीरा उठेलक आ शुरू भेल वैश्विक बदलल सामाजिक परिदृश्य, तकनीकीय भेल नव-नव क्रान्तिक संग जनमल नव अवधरणाक संग विहनि कथा लेल नव-नव काज।
१९७५ ई.मे आएल ‘क्षणिका’ क दू दशक बाद १९९५ ई. केँ विहनि कथाक स्मृतिवर्ष कहि सकैत छी। २० फरवरी १९९५ केँ मुन्नाजी एवं मलयनाथक संयोजनमे हटाढ़ रूपौली, मध्ुबनीमे आयोजित भेल विहनि कथा गोष्ठी, जकर अध्यक्षता केलनि पं यन्त्रनाथ मिश्र आ एकर मंच संचालन कुमार राहुल द्वारा भेल। ऐ अवसरपर उपस्थित विहनि कथा पाठ केनिहार छलाह- भवनाथ भवन, मलययाथ मण्डन, प्रेमचन्द्र पंकज, मुन्नाजी, शैलेन्द्र आनन्द, प्रभु कुमार मंडल, मतिनाथ मिश्र, उमाशंकर पाठक, श्यामाचन्द्र ठाकुर, कुमार राहुल, मीरा कर्ण, ललन प्रसाद, सुनील कर्ण, सच्चिदानन्द सच्चु एवं करणजी। पढ़ल गेल रचना सभपर समीक्षीय टिप्पणीकार छलाह- शैलेन्द्र आनन्द, मुन्नाजी, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथाक ई पहिल गोष्ठी छल। ५ मार्च १९९५ केँ सहयात्री मंच लोहना, मध्ुबनी द्वारा मुन्नाजीक विहनि कथा ‘नामरद’ क एकल पाठ आ अइ पर ‘बहस’ क आयोजन कएल गेल। अइमे प्रमुख विचारक छलाह- श्रीराज, शैलेन्द्र आनन्द, विजयानन्द हीरा, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथा आ कथाकारपर एहेन ‘बहस’ केर ई पहिल आयोजन छल। जुलाइ १९९५ मे कानपुर सँ बहराइत नवतुरिया त्रैमासिक पत्रिकाक विहनि कथा विशेषांक आएल, संपादक छलाह- प्रेमकान्त झा एवं वैकुण्ठ झा। अइमे १९ गोटेक कुल १९ गोट विहनि कथाक समायोजन छल, आ अइ विहनि कथा विधाक फरिछौट कऽ एकरा नव दिशा देखेबाक प्रयास करैत मुन्नाजीक आलेख अछि, जे कि कोनो विहनि कथा विशेषांकमे ऐ तरहक पहिल आलेख थिक। अही दशकमे प्रारम्भ भेल कथा गोष्ठी सेहो विहनि कथाक बाट बनेबा वा फरिछेबामे उत्प्रेरकक काज करैत रहल। कथा गोष्ठीक जुलाइ १९९७ क महिषीक आयोजनमे एके संग दु गोट पोथीक लोकार्पण भेल, ‘खंड-खंड जिनगी’ (प्रदीप बिहारी) आ ‘शिलालेख’ (तारानन्द वियोगी, जइमे कुल ३५ गोट रचना संकलित भेल अछि)।
२१म सदीमे समय आ परिस्थितिकेँ अकानैत सभ रचनाकार खुलि कऽ विहनिकथा दिस जुमल छथि। पत्रिकाक संपादक सभ किछु कोना अइ लेल समर्पित करऽ लगलाह। अइ नव सदीक नव सोचक पहिल विहनि कथा संग्रह आयल- ‘बुझनूक’ (२००२ ई.), एकर रचनाकार श्री वैकुण्ठ झा जी अपन ३६ गोट रचना लऽ ऐ विधाकेँ बाट देखेबाक ठोस प्रयास केलन्हि। एकर बाद तँ संग्रहक झड़ी लागि गेल बुझू। अगिला संगोर हिन्दी मैथिलीक संयुक्त रचनाकार विहनिक कथाक दिशावाहक श्री देवेशंकर नवीन जी अपना कथा संग्रह-‘हाथी चलय बजार’ (२००४ ई. मे ३१ गोट विहनि कथाक संगोर) संग उपस्थिति दर्ज करौलनि। तँ २००५ ई. मे पुरान सोचक ठोस कथाकार श्री मनमोहन झा जी अपन विहनि कथाक संगोर, मिथिलाक निशापुर मे’ आनि एकरा एक डेग आओर आगाँ बढ़ेबाक प्रयास कएलनि। एकर आमुखमे श्री विजय मिश्र जी एकरा गद्य काव्यक संज्ञा देलनि अछि। वास्तवित रूपेँ तँ गद्य काव्य, काव्यक गद्यात्मक शैली थिक। ईहो सत्य अछि जे विहनि कथा गद्य रहि कविताक पूर्णतः लगीच मानल जाइए। मुदा अइमे संकलित २४ गोट रचना विहनि कथे थिक, आन किछु नै। वर्ष २००७ मे “अहींकेँ कहै छी” (सत्येन्द्र कुमार झाक ५१ गोट विहनि कथाक संग्रह) आएल। ई संग्रह विहनि कथाक प्रति पूर्ण सोझराएल आ दृष्टि फरीछ रचना सबहक संगोर थिक। युवा पीढ़ीक बहुविध, प्रतिभा संपन्न लेखक ओ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन रचना समग्र- कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- मे लघुकथाक संग १६ गोट ठोस आ कथ्य ओ शिल्पगते फरिछाएल विहनि कथा आनि विहनिकथा संसारमे श्रीवृद्धि केलनि अछि। अखन धरि एक लिखे चलैत विहनि कथाक लिख सँ हँटि २०१० ई. मे श्री जगदीश मण्डल जी सभसँ इतर बाल मनोवैज्ञानिक विहनि कथा संग्रह ‘तरेगन’ क संग आन रचनाकार केँ सम्मोहित केलनि। २१ म सदीक पहिल दशकक अन्तिम चरणमे मैथिली ई पाक्षिक ‘विदेह’ अइ विहनि कथाक नव इतिहास लिखबा वा बनेबामे अग्रणी मानल जाएत। अपन ६७म अंक विहनि कथा समायोजनमे देशी आ विदेशी ठोस रचनाक संगोर, एवं अइ विहनि कथाक शास्त्रीय विवेचन कऽ अएना स्वरूप झलका एकर बाटकेँ मोकामक लगीच अनबामे ई पूर्णतः सफल भेल अछि। अइ अंकमे कुल ३२ रचनाकारक ७९ गोट रचना अइ विधाकेँ पूर्णतः फरिछा, सभक सोझाँ अनबामे सौ प्रतिशत सक्षम भऽ देखार भेल अछि। संपादकक अलाबे एकर सफलताक श्रेय छन्हि अइ अंकक अतिथि संपादक-मुन्नाजीकेँ। मुन्नाजी जी बड गम्भीरता पूर्वक सभक समायोजन एवं अपन आलेखेँ दोसरो रचननात्मक प्रकृतिकेँ फरिछेबाक सफल प्रयास केलनि अछि।
लगभग दू दशकसँ अइ विधामे रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करबैत रहलाह, आ परिणाम “समय साक्षी थिक” २०११ मे आएल, ई संग्रह श्री अनमोल झा जीक कुल १५० रचनाक अपन जिनगीक भोगल यर्थाथक अएना थिक। २०१२ मे “टेक्नलजी” (अनमोल झा) एवं “टीस” (मिथिलेश झा) संग्रह सेहो विहनि कथाक बखारी भरबामे समर्थ बुझना जाइछ। अनमोल जीक १४९ रचनाक संग्रह सनातनी यथार्थ परसैए। ततै मिथिलेश झा जीक ‘टीस’ क ४५ गोट रचना पाठकक मानसिकताकेँ झंकृत करैए। जे कि विहनि कथाक थाती वा धराउ सदृश अनुभव करैए।
१० दि‍सम्बर २०११केँ ‘सगर राति‍ दीप जरय’क ७५म कथा गोष्ठीुक आयोजन पटनामे कएल गेल, ऐ अवसरपर मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी कएल गेल छल।
ऐ तरहंे विहनि कथा संसारक परिदृश्य पूर्णतः भरल पूरल भऽ गेल अछि। आइ सभ दिन कियो ने कियो स्वाभाविक रूपेँ जुड़ि अपन योगदान दैत एकरा मोकामक ड्योढ़िपर आनि पट खुलबाक प्रतिज्ञामे ठाढ़ देखाइत छथि। मोकाम भेटि गेलै तँ घर पैसैमे समय नै लगतै।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१९ जुलाइ २०१२ केँ आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार
आ. अनचि‍न्‍हार-      काल्हि‍ चेतना सम्मानसँ सम्मानि‍त भेलौं, तइ लेल वि‍देह परि‍वार दि‍ससँ बधाइ।
ज.प्र. मण्‍डल-        आशीषजी, एकरा अहाँ व्‍यक्‍ति‍गत नै वि‍देह परि‍वारक चेतनताक प्रतीक बुझि‍यौ। जे चेतना समि‍ति‍क पत्रि‍का (घर-बाहर) दोसरे पन्नामे जीवि‍त-मृत्‍युक सूची प्रकाशि‍त करैत अछि‍, ओइ सूचीसँ वि‍देह परि‍वार (ई-पत्रि‍का) अखनो धरि‍ काते रहल अछि‍, भलहि‍ं गाम-घरक संस्‍कृति‍मे कि‍अए ने लोहोक इंजन दूबि‍-धान, सि‍नुर-पीठारसँ सुशोभि‍त होइत हुअए। वि‍देह परि‍वार दि‍ससँ आग्रह (चेतना समि‍ति‍केँ) करैत छन्‍हि‍ जे समाजक बदलैत स्‍वरूप (सामाजि‍क, आर्थिक, बौधि‍क, वैचारि‍कपर) नजरि‍ दथि‍ तइ लेल सुझाव अछि‍ जे मैिथली साहि‍त्‍यक जते सम्‍पादक छथि‍, ओ अपना हाथसँ अपन पत्रि‍काक इति‍हास लि‍खि‍ अपन-अपन परि‍चय दथि‍। एक दि‍स मि‍थि‍लाक उद्धारक वि‍चार रखै छि‍ऐ दोसर दि‍स पत्रि‍का सभ पाछू मुँहेँ घुसुकि‍ रहल अछि‍। ऐ लेल के करताह? आइ कोनो समारोहमे धोती-कुर्तासँ लऽ कऽ चुस्‍त पेंट धरि‍क आगमन भऽ रहल अछि‍, धोतीबला तरेतर गुम्हरै छथि‍ जे देखू ने कि‍रदानी। तँ दोसर दि‍स चुस्‍त पैंटबला अँखि‍या-अँखि‍या सुसकारी दइ छथि‍ जे शुभ काजमे पीड़ा धोती पहि‍रि‍ये कऽ नै आएल छथि‍। खैर जे होउ, हमरा सभकेँ वि‍चार कऽ एकटा रास्‍ता बनबए पड़त जे वस्‍त्रक बदलाव समायानुकुल होइत रहल अछि‍। पुरुषोत्तम राम बलकल धारी छलाह। आब ओ युग रहलै।

आ. अनचि‍न्‍हार-      अहाँकेँ चेतना समि‍ति‍ सम्मान सुनि‍ हृदए गद्गद् भऽ गेल। आरो बुझैक जि‍ज्ञासा जगल। सूचना केना भेटल?
ज.प्र. मण्‍डल-        चेतना समि‍ति‍क स्‍थापना दि‍वस १८ जुलाइ छी। १९५४ ई.क १८ जुलाइकेँ कि‍छु संगीक संग यात्रीजी चेतना समि‍ति‍क स्‍थापना केलनि‍। ओना आनो-आन समारोह समि‍ति‍क बीच होइते रहैए मुदा स्‍थायी रूपे १८ जुलाइ स्‍थापना दि‍वसक अवसरपर सभ साल कि‍छु वि‍शेष रूपमे होइते अछि‍। आठ-दस दि‍न पहि‍ने वि‍वेका बाबू (वि‍वेकानन्‍द ठाकुर) जे समि‍ति‍क सचि‍व छथि‍, फोन केलनि‍ जे १८ जुलाइकेँ चेतना समि‍ति‍क स्‍थापना दि‍वस छी जाहि‍ अवसरपर समि‍ति‍ कि‍छु गोटेकेँ सम्मानि‍त करैक ि‍नर्णए केलनि‍ अछि‍। अहाँक आएब अनि‍यार्य अछि‍। ओना डाक द्वारा लि‍खि‍त सूचना सेहो पठा देने छी, मुदा पोस्‍ट–ऑफि‍सक जे क्रि‍या-कलाप छै ताहि‍मे समैपर नहि‍यो पहुँचए। वि‍वेकानन्‍द जीसँ गुआहाटीमे छह मास पूर्व दि‍सम्‍बरमे धर्मशालामे भेँट भेल छल। कि‍छु प्रश्नपर गपो-सप भेल रहए। ममताजी (श्रीमती ममता ठाकुर) दूटा सोहरो गौलनि‍। श्री राम भरोस कापड़ि भ्रमर‍, राजाराम सि‍ंह राठौर एवं नेपालक आरो कतेक लोक सभ रहथि‍ हुनको सभसँ पहि‍ल भेँट भेल छल।
                जखन वि‍वेकानन्‍द जी फोनपर जानकारी देलनि तखन हम गुआहाटीक धर्मशालामे पहुँच गेल रही। जबाव देलि‍यनि‍ जे जरूर आएब। मुदा दू-तीन दि‍नक पछाति‍ संगी सभ फोन केलनि‍ जे बि‍ना लि‍खि‍त सूचनाक जाएब उचि‍न नै। ओ सभ चेतना समि‍ति‍क क्रि‍या-कलापसँ नाखुश छथि‍। प्रश्न उठल जे आब हम कि‍ करब? एके बात कवि‍ता आ कथामे दू-ि‍वधामे बँटि‍ जाइए। एक तँ रौदि‍याह समए भेने कि‍सानक मन ओहि‍ना तबधल अछि‍ तइपर सँ आरो तबधि‍ गेल। जाइ कि‍ नै जाइ, वि‍चि‍त्र ओझरी लागि‍ गेल। मनमे हुअए जे वि‍वेका बाबू कि‍छु करए चाहै छथि‍ तइठाम सहयोग नै करब उचि‍त नै हएत? मुदा जखन संगी सबहक दोहरा-दोहरा फोन आबए लगल तखन ओरो मन दुबि‍धमे पड़ए लगल। १८ जुलाईक ६ बजे सुबह। हम वि‍वेकानन्‍द जीकेँ फोन केलि‍यनि‍ जे अपनेक कार्यक्रममे कोनो व्‍यवधान तँ नै भेल अछि‍? ओ भरि‍सक ओछाइनेपर रहथि‍। आँखि‍ मीड़ि‍ते कहलनि‍ जे नै, ई तँ सभ सालक कार्यक्रम छी हेबे करत। ओना ऐ बीचमे दि‍ल्‍ली चल गेल रही तँए दोहरा कऽ सम्‍पर्क नै भऽ सकल। परसुए एलौं‍ आ काजमे लागल छी।
                पुछलि‍यनि‍- समए केहेन अछि‍? ऐठाम (गाम) पानि‍ भऽ रहल अछि‍।
ओ कहलनि‍- मेघौन तँ एतौ अछि‍ मुदा बून्न नै पड़ैए। हुनकर जबाब सुनि‍ मन मानि‍ गेल एहेन खुशनुमा मौसममे भोज-भात नै हुअए तँ केहेन समैमे हुअए। फोनपर वि‍वेका जी ईहो कहि‍ देलनि‍ जे न्‍यायमूर्ति कि‍शोर कुमार मण्‍डल वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ रहताह। तइ संग न्‍यायमूर्ति राजेन्‍द्र प्रसाद जी, डाॅक्‍टर सहाएब, वि‍जय बाबू, सभ रहबे करताह। हि‍नके सबहक काजो छि‍यनि‍। एक तँ रौदि‍याह समए दोसर भि‍नसुरका झकास रहने सुहावन मौसम रहबे करए, तैयारीक वि‍चार केलौं। झमटगर परि‍वार रहने संगी भेटि‍ये जाइए।फेर कहि‍ देलि‍यनि‍ जे आठ-नअ बजेक बस पकड़ि‍ लेब।

आ. अनचि‍न्‍हार-      कते समए गामसँ पटना जाइमे लगैए?
ज.प्र. मण्‍डल-        आशीषजी, की कहब। ऐबेर हवाई सफरक मौका भेटल। एते-एते दूरीक बीच एको मि‍नटक हेर-फेर नै देखलि‍ऐ। मुदा अपना सबहक तँ भगवाने ने मालि‍क छथि‍। जेना कऽ रखबह भोला तहि‍ना ने हम रहबह। गाड़ीक (ट्रेन) रास्‍ता एहेन बनि‍ गेल अछि‍ जे डेढ़ दू दि‍न तक लागि‍ जाइए। मुदा एन.एच भेलासँ थोड़े सुवि‍धा बढ़ल अछि‍ मुदा तैयो पाँच-छह घंटा तँ लगि‍ये जाइए।

आ. अनचि‍न्‍हार-      जखन पानि‍ होइत रहए तखन बस स्‍टेण्‍ड जाइमे तँ दि‍क्कत भेल हएत?
ज.प्र. मण्‍डल-        दि‍क्कत कि‍ दि‍क्कत भेल। ओना गाड़ीक (दू पहि‍या) सुवि‍धा अछि‍, मुदा पीच्‍छड़मे तँ चारि‍ पएरबला हाथी पि‍छड़ि खसि‍ पड़ैए आ दू पहि‍याक कोन ठेकान। पएरे तीन कि‍लो मीटर जाइक वि‍चार कऽ लेलौं। तखन मन भेल जे छत्ता लऽ लेब। मुदा कते बेर छत्ता बि‍सरि‍ये गेलौं आ कते बेर हराइये गेल। तँए छत्ता नै लऽ जेबाक वि‍चार भेल पानि‍यो कमलै। बूंदा-बुन्‍दीपर आबि‍ गेल रहए।

आ. अनचि‍न्‍हार-      कते बजे पटना पहुँचलि‍ऐ?
ज.प्र. मण्‍डल-        सवा चारि‍ बजे पहुँचलौं। जलखैये कए कऽ चलल रही। भूखो लगि‍ गेल रहए। पुले (गाँधी पुल) लग उतरि‍ पहि‍ने खेलौं। खेलाक पछाति‍ टेम्‍पू पकड़ि‍ एकटा वि‍द्यार्थी डेरापर पहुँचलौं। ओ नि‍रमलि‍येक छथि‍ रवि‍न्‍द्रजी। ओइठाम देह-हाथ पोछि‍ फ्रेश भेलौं। पौने छह बजे राजेन्‍द्र नगर वि‍द्यापति‍ भवन लग पहुँच गेलौं। गेटपर पहुँचलौं आकि‍ आनन्‍दजी (आनन्‍द कुमार झा) सेहो भेट गेलाह। नीक भवन नीक बेवस्‍था। जेना राजधानीक हेबाक चाही तइमे कमी नै। पंखा ताकि‍ बैसलौं। पाँच मि‍नटक पछाति‍ चुन्नूजी (कमल मोहन चुन्नू, घर-बाहर पत्रि‍काक सहयोगी सम्‍पादक) देखलनि‍। देखि‍ते दोसर ठाम बैसा पुछलनि‍ जे कि‍छु खेबो-पीबो करबै। कहलि‍यनि‍ जे रस्‍तेमे खा नेने छी। पानि‍ पीलौं।
समए छहसँ आगू बढ़ि‍ गेल। छह बजे शुरू होइक समए रहैक, गप-सप करैले आनन्‍दजी लगेमे रहथि‍, मुदा बूझि‍ पड़ल जेना चुन्नूजी आ वि‍वेका बाबू काजमे जमि‍ कऽ जुटल छथि‍। पुछलि‍यनि‍- चुन्नूजी, रमणजी (डाॅ. रमानन्‍द झा रमण) केँ नै देखै छि‍यनि‍? कहलनि‍ ओ कथा गोष्‍ठीमे गेल छथि‍। कहि‍ अपन हेमलेट, बैगक जि‍म्‍मा सुमझा कहलनि‍ जे कने एकटा काज केने अबै छी। चुन्नू जीक काज बाधि‍त करैक अर्थ होएत जे काजमे (समारोह) बाधा उपस्‍थि‍त करब। कहलि‍यनि‍, हम कतौ पड़ाएल जाइ छी, अखन जे काज लाधल अछि‍ पहि‍ने ओकरा सम्‍हाररू। चुन्नूजी तँ उठि‍ कऽ चलि‍ गेलाह, मुदा मनमे एकटा नव प्रश्न आबि‍ गेल। ओ ई जे ‘घर-बाहर’ पत्रि‍काक सम्पादक रमणजी छथि‍, तखन अपन जबाबदेहीक काज छोड़ि‍ मद्रास चलि‍ गेलाह, आ गोष्ठी तँ १४-१५ जुलाइक रातिमे रहै, १५ तारीखकेँ बिदा भेने १७ धरि तँ आबिये गेल हेता। खएर ! एना कि‍अए भेल? जखन कि‍ चेतना समि‍ति‍क स्‍थापना दि‍वस १८ जुलाई छी, भरि‍सक यात्रीयो जी (ठीकसँ मोन नै अछि मुदा अनुमान करै छी‍) जखन माँ मि‍थि‍लाकेँ प्रणाम कए पड़ा कऽ अकासमे उड़ैत ओइ चि‍ड़ै जकाँ जे उड़ि‍ते-उड़ि‍ते अंडो दैत अछि‍ तहि‍ना केलनि‍। प्रश्न घुरि‍आए लगल जे अपनो बेटाक मूड़न वा बि‍आह रहए आ साढ़ूओ बेटाक एक्के दि‍न होइ तखन कि‍ कएल जाएत? कि‍यो अपन घर सम्‍हारत आकि‍ भोज खाइले जाएत। मुदा ऐठाम तँ अँटावेसक संभावना छल। चेतना समि‍ति‍क ति‍थि‍ अट्ठावन वर्षसँ मनकेँ पकड़ने अछि‍, कथा गोष्‍ठीक ति‍थि‍ ि‍नर्धारि‍त कएल जाइत अछि‍, तइठाम समए आ दूरीक वि‍चार केने बि‍ना, जँ ति‍थि‍ ि‍नर्धारि‍त कएल जाए तँ कि‍ कहबै? एक तँ ओहि‍ना हम सभ मि‍थि‍लांचलक काजक दौड़मे पछुआएल छी तइपर जँ काजे काजक बाधा बनत तँ कते दूर जा सकब, से तँ सभ बुझि‍ते छी।  तइ बीच वि‍वेकाजी तीन-चारि‍ गोटेक संग आबि‍ कि‍छु-कि‍छु काजक बात पुछलनि‍। कहलि‍यनि‍। तइ बीच अध्‍यक्षा प्रमीला झा सेहो एलीह।
चुन्नूजी धड़फड़ाएल आबि‍ हेलमेट हाथमे लैत चि‍न्‍हा देलनि‍। ओना चेतना समि‍ति‍क सदस्‍य सबहक जानकारी अछि‍, मुदा चेहरासँ चि‍न्‍हारए नै छल‍। तँए अनभुआर जकाँ रही। मुदा कार्यकर्ताक अभाव जरूर बूझि‍ पड़ल वि‍लंबोसँ शुरू भेने बहुत बढ़ि‍या कार्यक्रम भेल।

आ. अनचि‍न्‍हार-      वि‍धि‍वत् कते बजे कार्यक्रम शुरू भेल?
ज.प्र. मण्‍डल-        ऐ प्रश्नक उत्तर ठीक-ठीक नै दऽ सकब। कि‍एक तँ ने अपने घड़ी रखै छी आ ने मोबाइल। मुदा बैसकसँ बूझि‍ पड़ल जे एक-डेढ़ घंटा बि‍लंबसँ कार्यक्रम शुरू भेल। हँ तइ बीच दूटा बात आरो भेल। इन्‍द्रकान्‍त बाबू (डॉ. इन्‍द्रकान्‍त झा) दोसर कतारक कुर्सीपर आगूमे बैसल रहथि‍, ओ अपन चि‍न्‍हारए देलनि‍। मनमे रहबे करए मुदा ओहन बीच रहने गुम रही। हुनकासँ पहि‍ल परि‍चय ओइ दि‍न भेल छल जइ दि‍न मि‍थि‍ला दर्शनमे छपल कथा चुनवाली पढ़ि‍ पहि‍ल बधाइ देलनि‍। गपे-सपक बीच अखि‍लेश बाजल जे लालकक्का (उमेश मण्‍डल) फोन केलनि‍ जे साढ़े दस बजेक बसक टि‍कट कटा लेलौं। तेरह-चौदह नम्‍बर सीट अछि‍।

आ. अनचि‍न्‍हार-      कार्यक्रम केहेन भेल?
ज.प्र. मण्‍डल-        पहि‍ल सम्मान कार्यक्रम भेल। यात्री जीक स्‍थापि‍त चेतना समि‍ति‍क सम्‍मान पाबि‍ बहुत खुशी भेल। उच्‍च न्‍यायालयक न्‍यायमूर्ति कि‍शोर कुमार मण्‍डलक हाथसँ सैकड़ो गण्‍यमान्‍य लोकनि‍क बीच, जइमे बि‍हार सरकारक पूर्व मुख्‍यमंत्री वि‍धान परि‍षदक पूर्व अध्‍यक्ष, उच्‍च न्‍यायालयक पूर्व मुख्‍य न्‍यायमूर्तिक संग माननीय पूर्व सांसद, माननीय वि‍धान पार्षद, अधि‍वक्‍ता, अध्‍यापक, डॉक्‍टर इत्‍यादि‍ चेतना समि‍ति‍क सभ छलाह।

आ. अनचि‍न्‍हार-      साहि‍त्‍यि‍क माहौलमे कार्यक्रम भेल हएत?
ज.प्र. मण्‍डल-        आशीषजी, ई बहुत गंभीर प्रश्न अछि‍। ओना साहि‍त्‍यि‍क माहौल अवश्‍य छल मुदा राजनीति‍क बेसी बूझि‍ पड़ल। अध्‍यक्ष जीक (चेतना समि‍ति‍क अध्‍यक्ष) वक्‍तव्‍य वि‍धि‍वत् छलनि‍, नीक छलनि‍। मुदा मंचक वक्‍ता लोकनि‍ साहि‍त्‍यकेँ मोड़ि‍ राजनीति‍ दि‍स घुसका देलखि‍न। जे गोष्‍ठीक अनुकूल नै रहल। मुख्‍य वक्‍ता छलाह पंडि‍त ताराकान्‍त झाजी (वि‍धान परि‍षदक पूर्व अध्‍यक्ष) जे तेना कऽ वि‍चार मोड़ि‍ देलखि‍न जे बादक वक्ताकेँ बेकावू भऽ गेलनि‍। ओना पूर्व मुख्‍यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मि‍श्र, वि‍धान पार्षद आ चेतना समि‍ति‍क संरक्षक वि‍जय बाबू (श्री वि‍जय कुमार मि‍श्र) वि‍धि‍वत अपन वि‍चार रखलनि‍। यात्री जीक स्‍थापि‍त चेतना समि‍ति‍क वि‍चार वि‍न्‍दु गौण पड़ि‍ गेल। तहूमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक बीच, टैगोर साहित्य सम्मान पहि‍ल-पहि‍ल भेटल, जेकर चरचो नै भेल। माननीय न्‍यायमूर्ति राजेन्‍द्र प्रसादजी, अपन वक्‍तव्‍यकेँ कि‍छु हद-तक मोड़लनि‍। ओ यात्री जीक वि‍चारकेँ पकड़ि‍ चेतनाक वि‍षद व्‍याख्‍या केलनि‍। भाषो मनोरंजक छलनि‍। मनोरंजक ऐ लेल जे मैथि‍ली-मगहीक सीमापर रहने कखनो मैथि‍ली कखनो मगही आ कखनो मैथि‍ली-मगही मि‍ला कऽ बजलाह। मुदा अंग्रेजी माहौलमे रहनि‍हार एको शब्‍द अंग्रेजीक प्रयोग नै केलनि‍, ई सभसँ आश्चर्य लागल। समए सेहो बेशी भऽ गेल छलैक। तहूमे बसक टि‍कटक नाओं सुनि‍ आरो मन दोसर दि‍स जाए लगल। हुअए जे बस ने छूटि‍ जाए।
आ. अनचि‍न्‍हार-      अहाँ कि‍ सभ बजलि‍ऐ?
ज.प्र. मण्‍डल-        आभारो व्‍यक्‍त करैक अवसर नै भेटल।

आ. अनचि‍न्‍हार-      भोजन भात केहेन रहलै?
ज.प्र. मण्‍डल-        नीक रहलै। स्‍पष्‍ट शब्‍दमे वि‍वेकाजी कहि‍ देलखि‍न जे अल्‍पाहारक बेवस्‍था अछि‍। मुदा खीर-पूड़ी खुआएब।

आ. अनचि‍न्‍हार-      कते बजे सभा भवनसँ नि‍कललौं?
ज.प्र. मण्‍डल-        दससँ ऊपर बजि‍ गेल। मन छटपटाए लगल जे एक तँ गली-कुच्‍ची रस्‍ता, दोसर थाल-कीच सेहो, रि‍क्‍शा-टेम्‍पू भेटत नै। हारि‍-थाकि‍ बस स्‍टेण्‍ड वि‍दा भेलौं। सरकारी बसक टि‍कट, तँए हुअए जे बस नहि‍ये पकड़ाएत। मुदा कि‍छु दूर गेलापर रि‍क्‍शा भेट गेल। ओ कहलक जे हमरा बूझल अछि‍, बस नि‍श्चि‍त पकड़ाएत। संगमे आनन्‍द कुमार झाजी सेहो रहथि‍, हुनका टि‍कट नै भेलनि‍। भोर होइत घरपर पहुँच गेलौं।

आ. अनचि‍न्‍हार-      छुटल-बढ़ल जे भेल होइ, तइ संबंधमे कि‍छु कहि‍यौ?
ज.प्र. मण्‍डल-        ओना चेतना समि‍ति‍क ि‍नर्णयानुसार चारि‍ गोटेकेँ सम्मानि‍त करैक वि‍चार छलनि‍। पहि‍ल, टैगोर साहि‍त्‍य सम्मानसँ सम्मानि‍त हम (जगदीश प्रसाद मण्‍डल), दोसर, साहि‍त्‍य अकादेमीसँ सम्मानि‍त कवि‍ वि‍नोद जीक (श्री उदय चन्‍द्र झा वि‍नोद), तेसर, युवा साहि‍त्‍यकार आनन्‍द जीक आ चारि‍म, अनुवादक खुशीलाल बाबूकेँ (श्री खुशी लाल झा)। मुदा ओ दुनू गोटे (वि‍नोदजी आ खुशीलाल बाबू) नै पहुँच सकल छलाह।
चेतना समि‍ति‍क सभ नै, मुदा कि‍छु गोटे एहेन सक्रि‍य छलाह जि‍नका वि‍षयमे कि‍छु कहने बि‍ना नै रहि‍ सकै छी। ओ छलाह वि‍जय बाबू (श्री वि‍जय कुमार मि‍श्र), जे खेबा काल घूमि‍-घूमि‍ देखैत रहलाह। दोसर छलीह श्रीमती प्रमीला झा। जे एते उमेर भेलोपर, तहूमे जेहेन परि‍वारक छथि‍, क्रि‍याशील जि‍नगी बना जीवि‍ रहली अछि‍। जे धन्‍यवादक पात्र छथि‍। वि‍वेका बाबू आ चुन्नूजी हृदैसँ चाहि‍तौ, नीक जकाँ नै कऽ पाबि‍ रहल छलाह, तेकर कारण छल दुनू गोटे नव छथि‍ (कार्यक्रमक भारक खि‍यालसँ) मुदा जे जि‍ज्ञासा करैक ललक आ उत्‍साह छन्‍हि‍, जँ सही दि‍शामे बढ़ाबथि‍ तँ जरूर कि‍छु कऽ देखौता। तइ लेल दुनू गोटेकेँ धन्‍यवाद दैत छि‍यनि‍। वि‍वेका बाबूक ई गुण स्‍पष्‍ट देखाएल जे स्‍पष्‍टवादी छथि‍। इमानदारीक अनेको कारणमे स्‍पष्‍ट बाजब सेहो एकटा कारण होइत छैक। सभसँ अंति‍म दृश्य आरो रोचक अछि‍। दस बजैत रहए। कतारबंदी भोजन शुरू भेल। धड़फड़ाएल रहबे करी, जा कऽ पाँति‍मे लगि‍ गेलौं। पाँति‍ नमहर, तैयो पान-सात मि‍नट घुसुकि‍ कऽ कि‍छु आगू बढ़लौं। तीनू गोटे ( हम, आनन्‍दजी आ अखि‍लेस) एके ठाम रही। तही बीच धड़फराएल घुमैत चुन्नूजी पहुँचलाह। देखि‍ते पाँति‍सँ नि‍कालि‍ कुर्सीपर बैसा देलनि‍ आ कहलनि‍ जे नेने अबै छी। गेला तँ धड़फड़ाएले मुदा गरे ने अँटनि‍। दोसर ठाम गरे ने भेटनि‍। हमर मन छनगल जाए जे बस छूटि‍ जाएत। नहि‍ये खाएब तँ कि‍ हेतै, गाड़ी-बसमे अधपेट्टे चलब नीक होइ छै। हुअए जे चुपे-चाप उठि‍ कऽ वि‍दा भऽ जाइ। फेर हुअए जे नाँहक हंगामा ठाढ़ भऽ जेतैक जे दुनू गोटे बीचेमे सँ हेरा गेला। वि‍चार ठमकि‍ गेल। मन पड़ि‍ गेल, बरि‍आती। अपेछि‍त बेटाक बि‍आहमे बरि‍आती गेल रही। ओहन बरि‍आती जि‍नगीक पहि‍ल छल। खाइले बैसलौं, नीक-नीक वि‍न्‍यास बनल रहै। शुरूहेमे भरि‍ पेट चढ़ा देलि‍ऐ। चढ़ौलाक बाद चारू कात चकोना हुअए लगलौं जे कि‍यो एको गोटे उठताह तखन ने उठब। से कि‍म्‍हरो देखबे ने करि‍ऐ। गर-फेरि‍-फेरि‍ बैसए लगलौं। आसन नमहर तँए गर लगा सुति‍यो सकै छी। मुदा जखने सूतब कि‍ अनेरे हल्‍ला हेतै जे एक गोटे खाइते-खाइते ओंघरा गेलाह। अपनेपर खौंझ उठए जे अनेरे एते कि‍अए खेलौं। मुदा करि‍तौं की। चारि‍ घंटा खाइमे बरि‍आती लगौलनि‍। अधमौगति‍ भऽ गेल। हुअए जे ऐसँ नीक जहले जे भुखलो तँ लोक आेंघरा-ओंघरा सुतैए। एतबे नै ऐसँ आगू भेल जे खाइकाल तेहेन गप-सपक ठाहाका चलै जे हुअए कहीं पेटक गुदगुदीक संग खेलहो ने नि‍कलए लगए। कहुना-कहुना कऽ अपनाकेँ दाबि‍-दुबि‍ पार लगेलौं। हाथे धोइकाल ओही भि‍जलाहा हाथे कान पकड़ि‍ सप्पत खेलौं जे एहेन बरि‍आती नै जाएब।
कुल मि‍ला कऽ समारोह प्रशंसनीय रहल। अगि‍ला साल आरो बेसी नीक होइ, ई शुभकामना। देखैक हकार भेटए, तेकर प्रतीक्षा रहत।    
‍    
             

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART III




१.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास
१
योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’


लघुकथा- देववाणी

हम ई नवका पंडितजी’क कने परीक्षा लऽ रहल छी। पंडित जी जे पुरना छलाह से तँ कहिया ने स्वर्गवासी भेलाह।ओ परोपट्टा मे नामी लोक छलाह पंडित संस्कार नाथ मिश्र। पंडितजी व्याकरणाचार्य, साहित्याचार्य, आयुर्वेदाचार्य आर नहि जानि कोन कोन विषयक आचार्य छलाह। हमरा गाम अर्थात् माहीपुर मे महामाया संस्कृत विद्यालय हुनके प्रयासे ँ स्थापित भेल छल जाहि मे सुनैत छियैक महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह स्वयं उद्घाटन करबा लेल आएल छलखिन्ह आ विद्यालय प्रांगण मे एकटा आम आ एकटा पीपर के गाछ रोपने छलखिन्ह। आमक गाछ तँ सन् सत्तावन के बाढ़ि मे सुखा गेलैक मुदा पीपर तँ एखनहुँ छैके जे अहूँ सब देखिते छियैक।
नवका पंडित जी भेलाह हुनकर प्रपौत्र।पंडित संस्कार नाथ मिश्र जी के ँ चारिम बियाह मे एकटा बालक भेलखिन्ह। ताहि सँ पहिने तीन बियाह मे चारि चारि टा कन्या रत्न प्राप्त भेलन्हि जेना लक्ष्मी सरस्वती सीता गौरी सब अपन अपन सखी बहिनपा’क संग अवतरित भेल होथि।पंडित जी जिद्दी लोक।चारिम बियाह सँ पूर्व जखन किछु आत्मीय सब हुनका बुझबए गेलखिन्ह जे “ देखू आब वयसो भऽ गेल। एहि बारह टा बेटी के पालन पोषण आ कन्यादान आदि मे अपनेक जे दशा भऽ रहल अछि से तँ अपनहि जनैत छिऐक। ते ँ हमरा सबहक कहब जे फेर बियाह करबाक ई विचार छोड़ि दियौक। मानि लिअऽ जे बेटा भाग्य मे नहि अछि।” तँ पंडित जी खिसिया कए बाजल छलखिन्ह “ देखू ई भक्त आ भगवान के लड़ाइ छियैक।यदि भगवान के ँ जिद्द लागल छन्हि जे बेटा नहिए दऽ कए परीक्षा लियैक तँ भक्त के सेहो प्रतिज्ञा छन्हि जे बेटा लइए कए रहताह। हमरा ई लड़ाइ लड़ए दिअऽ आ अहाँ सब कात सँ तमासा देखैत रहू।” अस्तु, जेना कि पौराणिक काल सँ होइत रहलैक अछि, सुच्चा भक्त’क सोझाँ भगवाने हारि मानैत रहलखिन्ह अछि, सएह भेलैक एहू बेर आ चारिम बियाह’क बाद करीब पचपन वर्षक उमेर मे पंडितजीक तपस्या सफल भेलन्हि आ आइमाइ सब गौलन्हि सोहर “ललना रे घर घर बाजे बधाई कि कृष्णजी जन्म लेल रे…” ।
नवजात’क नाम पंडित संस्कार नाथ मिश्र अपनहि चुनलन्हि।परोपट्टाक लोक तँ हुनका सँ नामकरण करबैत छल, ओ कतए जइतथि। से नाम राखल गेल भूजानाथ। आब जे सूनए सएह हँसए। सब बूझए लागल जे सत्ते मे पंडितजी सठिया गेलाह’ए। कियो कियो ईहो अर्थ लगाबए जे पंडितजी के ँ भूजा बड़ पसिन्न छन्हि। किछु ईहो बाजए जे एहि सँ नीक तँ ‘अनाथ’ नाम होइतैक, किछु अर्थ तँ रहितैक। जखन चारू कात खिधांस होअए लगलन्हि तँ नवकी पंडिताइने एक दिन टोकलखिन्ह जे बारह टा बेटीक बाद तँ एकटा बेटा भेल तकर की नाम राखि देलियैक जे सौ ँसे गाम हँसैत अछि। पंडितजी कने दुअनियाँ मुसकी दैत नवकी के ँ बुझेलखिन्ह “ लोक की बुझतैक ? ओकरा सब के ँ ज्ञाने कतेक छैक ? देखू ई नाम अपूर्व छैक। एकरा एनाकए बुझियौक : भू ट्ट जा ट्ट नाथ। भू माने पृथ्वी, जा माने ताहि सँ उत्पन्न अर्थात् भूजा भेलीह सीता आ भूजानाथ भेलाह साक्षात् भगवान राम। अहीं सोचियौक यदि सोझे राम नाम राखि दितियैक बच्चा’क तँ संस्कार नाथ मिश्र’क ज्ञान’क कोन काज ? फेर ओहेन नाम तँ हरेक टोल परोस मे भेटत आ थोड़बे दिन मे राम भऽ जइतथि रमुआ।रमुआ ककरो हरबाह, रमुआ कोनो बोनिहर, रमुआ ककरो चाकर आ रमुआ कोनो पंडित’क बच्चा। फेर अन्तर की भेलैक ?”
आब जे ई व्याख्या सूनए सएह कहए वाहवाह, पंडित संस्कार नाथ मिश्र सन व्याकरणाचार्य के ँ छोड़ि के एतेक सुन्दर नाम सोचि सकैत छल ? नामकरण मे हुनकर ख्याति आर वेशी बढ़ि गेलन्हि।
मुदा सब किछु होइतो एहि परिवार मे आगू दू पुस्त तक व्याकरण आ साहित्य के ँ के कहए संस्कृत पढ़बो बन्द भऽ गेल। भेलैक एना जे संस्कार नाथ मिश्र भगवान सँ एकटा बाजी तँ जीत गेलाह परन्तु पूरा खेल तँ हुनका बूझल छलन्हि नहि।
भूजानाथ के ँ तीन टा बड़का माए आ बारह टा बहीन।सब मिला कए एहि सोलह स्त्रीगण’क ओ अति दुलारू बच्चा। लीखब पढ़ब सँ ओ तहिना पड़ाथि जेना नबका बियाह भेला पर पंडितजी पुरना कनियाँ सबसँ पड़ाथि। एहि शोक सँ बूझू आ कि उमेरक गुण दोष, पंडितजी अस्वस्थ रहए लगलाह। पाँचम वर्ष मे भूजानाथ’क उपनएन भेलन्हि आ तकर किछुए दिनक बाद पंडितजी भगवान सँ भेंट करए स्वर्ग चल गेलाह। भूजानाथ भठ्ठा नहिए धेलन्हि।
भूजानाथ बढ़ैत गेलाह आ ओतबे बेशी अबंड होइत गेलाह। हुनका पहुनाइ करऽ मे आ तिलकोर तोरै मे वेश आनन्द अबन्हि। जमीन जाल तँ पिताजी बारह टा कन्यादान मे प्रायः शेषे कऽ देने छलखिन्ह ते ँ घर गृहस्थीक चिन्ते कोन। बारह टा बहिन’क सासुर आ चारि टा मात्रिक मे बूलि बूलि ओ पहुनाइ करथि। भरदुतिया मे ओ बेशी परेशान भऽ जाथि। एक दिन मे बारह गाम कोना जेताह ? कोन बहिन सँ नोत लेथिन्ह आ किनकर उपराग सुनताह ? मुदा एकरो संयोगे कही जे पंडितजी अपन बारहो बेटीक बियाह जाहि गाम सब मे केलन्हि से सबटा गाम रेलबे लाइन के दूनू कात सकरी सँ निरमली के बीच आ कि सकरी सँ जयनगर के बीच एक कोस सँ कमे दूर पर।फेर बहीने सब अपना मे विचार क कए हुनका रस्ता बता देलखिन्ह जे एक बरख मे ओ चारि ठाम जाथि। भरदुतिया सँ एक दिन पहिने एक गोटे ओतए पहुँचि जाथि आ ओतए अगिला दिन एकदम सकाल नोत लऽ कए दोसर गाम पहुँचि जाथि। ओतए नोत लऽ कए फेर बरहबजिया गाड़ी पकड़ि बाकी दू बहिन के गाम जा कए नोत लेथि। एवम् प्रकारे ँ दिन अछैते ओ सब ठाम पार पुरि लेताह। एहि प्रकारे ँ हर चारिम बरख मे सब बहिन के ँ भाइ के ँ नोतबाक सऽख पूर होइत रहतन्हि। एहि मे भूजानाथ के ँ एकटा नफा ई भेलन्हि जे भार दोर के झंझट खतम भऽ गेलन्हि। चारि चारि ठामक भार तँ एक संगे लऽ जइतथि नहि। मुदा पैघ घाटा ई भेलन्हि जे भरि दिन एक गाम सँ दोसर गाम दौड़ैत रहला सँ कत्तौ इच्छा भरि तिलकोर नहि खा पबैत छलाह।
अस्तु, उचित समय पर भूजानाथ के बियाहो भेलन्हि। अबंड छलाह आ कि संस्कृत नहि पढ़लन्हि तै सँ की ? मिथिला मे ने कोनो वर कुमार रहलैक’ए आ ने कोनो कन्या कुमारि रहलैक’ए। लूल्हि नाङर कनियाँ आ आन्हर बहीर आ कि ढहलेल बकलेल वर, सबहक बियाह भेबे केलैए, घटक टा होशियार रहल चाही। तखन भूजानाथ तँ पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क पुत्र छलखिन्ह। घटक दरिद्र नारायण चौधरी एहि काज मे सहायक भेलखिन्ह। कोसिकनहा कात’क एकटा मसोमात’क लूल्हि किन्तु सुन्दरी कन्या स्वर्गीय पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क पुतोहु बनिकए माहीपुर एलीह। ओ फेर घूरि कए नैहर तँ नहि गेलीह, माइए मास दू मास पर खोज खबरि लेबा लेल आबि जाइत छलखिन्ह।
समय पाबि भूजानाथ के ँ पहिले प्रयास मे पुत्र भेलन्हि। हुनका पिता जकाँ तपस्या नहि करए पड़लन्हि। मुदा एहि समय एकटा दोसरे विचित्र घटना भेलैक।सौरी सँ बहराइते एकटा अगलटेंट छौंड़ी बाजि उठल जे उएह मुसरी भेलैक। ई मात्र ओहि बच्चा’क लिंग निर्धारण सूचक शब्द छलैक। मुदा से ओहि बच्चा के नामकरणे भऽ गेलैक आ. ओ मुसरीए भऽ कए रहि गेल। नाम किछु विचित्र तँ जरूर छलैक मुदा मिथिलाक गौरवमय इतिहास मे कतेको मुसरी भऽ गेल छथि से तँ अहूँ सब जनिते छिऐक। आ नामो सब एक सँ एक विचित्र जेना कि खुद्दी, फुद्दी, तिनकौड़ी, पलटू सलटू आदि। ते ँ एहि बात पर कोनो बेशी ध्यान नहि देल गेलैक। ओना स्वर्ग मे पंडित संस्कार नाथ मिश्र अपन पौत्रक एहि नामकरण पर की सोचने होएताह से हमरा सब कहियो बूझि नहि सकब।
मुसरीक माए लूल्हि जरूर छलखिन्ह मुदा छलखिन्ह होशियार। हुनका अपना बच्चा के ँ पढ़ेबा पर बेशी ध्यान छलन्हि। मुसरी स्कूल जाए लगलाह। संस्कृत विद्यालय नहि, गाम’क सरकारी प्राथमिक विद्यालय। रजिष्टर मे नाम लिखाएल मुसरी नाथ मिश्र। आ तकर बाद हुनकर नाम लिखाएल गेल माहीपुर सँ करीब डेढ़ कोस दूर सरपतिया चऽर के पुबरिया सीमा पर स्थित गाम कनकटोली के माता यशोदा हाई स्कूल जे हमरा सबहक नवका एम एल ए यादव जी किछुए बर्ष पहिने स्थापित कएने छलाह। मुसरी गामहिं सँ स्कूल जाइत अबैत छलाह।
मुसरी पढ़बा मे कोनो वेशी कुशागबुद्ध्रि नहि छलाह। लागल लागल कहुना दशवीं पास केलन्हि। आगू पढ़बाक ने इच्छा रहन्हि आ ने साधन। रोजीक ताक मे गामैक किछु लोक’क संग ओ पहिने कलकत्ता एलाह आ ओतए सँ एकटा ठीकेदारक संग कोरबा चल गेलाह जतए बड़का बड़का थरमल पावर स्टेशन बनि रहल छलैक। एतए ओ ठीकेदार’क मुन्सी के असिस्टेंट भऽ गेलाह आ नाम भऽ गेलन्हि श्री एम एन मिसरा जी। नाम छोट करैक ई अंगरेजिया तरीका सेहो कमाल के छैक।
हमर एम एन मिसरा के ठीकेदार मकान आदि बनबैत छलाह। मिसराजी’क काज भेलन्हि मजदूर सब के पाछू रहब। मजदूर सब ठीक सँ काज करए, सूति बैसि नहि रहए आ किछु सामान चोरा नहि लिअए तकरे देखभाल करब भेल काज हुनक। मुन्सी अपने तँ टेन्ट मे आराम करथि आ एम एन मिसरा के ँ रौद बसात पानि बिहारि मे मजदूर’क संगे रहए पड़न्हि।
गाम मे खबरि गेलैक जे भूजानाथ’क बेटा के ँ नीक नौकरी भेटि गेलन्हि। घटक दरिद्र नारायण चौधरी बूढ़ो भेला पर सक्रिय छलाहे। ओ आबि भूजानाथ के ँ मनौलन्हि आ किछु साधारण टाका’क लोभ दऽ कए हुनक बेटाक बियाह ठीक करा देलखिन्ह।
समय पर मुसरी अर्थात् एम एन मिसरा’क बियाह भेलन्हि आ फेर पितामह’क तपस्या’क फले ँ पुत्ररत्न के प्राप्ति सेहो। नाम राखल गेल दिलीप कुमार। नब परम्परा’क अनुसार पारिवारिक नाम ‘मिश्र’ हटा देल गेल।
× × × × × × ×
आब आउ असली खिस्सा पर जे पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क प्रपौत्र एहि आधुनिक कम्प्यूटर युग मे पंडित कोना भऽ गेलाह।
एम एन मिसरा जखन कोरबा मे रौद बसात पानि बिहारि मे मजदूर सबहक ओगरबाही करैत रहथि तखन हुनका डेराक बगल मे हरलाखी लगहक कोनो गाम के एकटा पाँड़ेजी रहैत छलखिन्ह जे ओतए पंडिताई करैत छलाह। पाँड़ेजी कम्मे पढ़ल लिखल किन्तु व्यावहारिक लोक।अपन पंडिताई मे संस्कृत कम हिन्दीए सँ बेशी काज चलबैत छलाह। हनुमान चालीसा पढ़ि कए ओ महादेवक पूजा सेहो कऽ दैत छलखिन्ह आ कतेक ठाम कन्यादान सेहो। मुदा तैयो खूब व्यस्त रहैत छलाह आ नीक टाका कमा लैत छलाह। एम एन मिसरा जी दसवीं पास आ ठीकेदार’क मुन्सी के असिस्टेंट मात्र पाँच हजार कमाइत छलाह आ पाँड़ेजी सुखारो ऋतु मे पचीस तीस हजार उठा लैत छलाह। भादव, कातिक, माघ, बैसाख आदि मास मे तँ पचासो हजार पार कऽ लैत छलाह।टाका तँ जे से, मान सम्मान सेहो खूब बेशी। यजमान सब अपन अपन वित्तक अनुसार रिक्सा वा गाड़ी पठा हुनका बजबैत छलखिन्ह। ते ँ रौद बसातक झंझट हुनका कहियो नहि परेन्हि।
पाँड़ेजीक कमाई आ मान सम्मान सँ एम एन मिसरा जी बहुत प्रभावित भेलाह। एक दिन पाँड़ेजी हुनका लऽग अपन विचार व्यक्त केलखिन्ह “ देखियौ मिसरा जी, आइ कालि सबहक बेटा बेटी कम्प्यूटर इंजिनीयर भऽ रहलैक’ए। सब बंगलोरे मे नौकरी करए चाहैत अछि आ कि अमेरिके जाए चाहैत अछि। मुदा पंडित’क संख्या कतेक कम भऽ गेलैक अछि। एतेक टा कोरबा मे हम सब मात्र दश गोटे छी आ हरदम एक यजमान सँ दोसर के ओहि ठाम दौड़ैत रहैत छी। पंडित सब कम्प्यूटर इंजिनीयर सँ कोन कम कमाइत छथि यदि अपने ठीक सँ जोरियौक। सुनै छी अहाँक पितामह नामी पंडित छलाह से अहूँक परिवार सँ ई परम्परा उठि गेल। हमरा तँ लगैत अछि अगिला पुश्त मे पंडित जातिए विलुप्त भऽ जाएत।”
एम एन मिसरा जी’क पुत्र दिलीप कुमार गामहि मे सरकारी प्राथमिक विद्यालय मे पढ़ैत छलखिन्ह आ अगिला साल हुनकर विचार छलन्हि माता यशोदा हाइ स्कूल मे भर्ती करेबाक।एही समय पाँड़ेजी सँ प्रभावित भए ओ एकटा क्रांतिकारी निर्णय लेलन्हि जे बेटा के ँ महामाया संस्कृत विद्यालय मे पढ़ौताह आ अपन पितामहक सुयश के ँ पुनः स्थापित करताह।
दिलीप कुमार महामाया संस्कृत विद्यालय मे भर्ती भऽ गेलाह आ लगलाह लघु सिद्धान्त कौमुदी आ अमर कोष रटए। मुदा हुनक प्रपितामह’क युग सँ एहि युग तक बहुत परिवर्तन भऽ गेल छलैक जाहि मे संस्कृत विद्यालय आ मदरसा आदि मे सरकार नवका पाठ्यक्रम लागू करा देने छलैक। नवका पाठ्यक्रम’क अनुसार विद्यार्थी के ँ आनो बिषय जेना गणित, इतिहास आ विज्ञान आदि सेहो पढ़ए पड़ैत छलन्हि। उचिते, संस्कृत’क प्राथमिकता कने कम भऽ गेल छलैक।
मध्यमा पास केलाक बाद दिलीप कुमार आबि गेलाह कोरबा आ पाँड़ेजीक संरक्षण मे लगलाह पंडिताइ के व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करबा मे। अथवा कहू अपरेन्टिस भऽ कए प्रशिक्षण लेबए लगलाह।
पाँड़ेजी दिलीप कुमार के पढ़बा लिखबाक ज्ञानक परीक्षा किछुए क्षणक गपसप मे लऽ लेलखिन्ह। तकर बाद ओ एक प्रकारक क्रैश कोर्स के पाठ्यक्रम बनौलन्हि जाहि मे सत्यनारायण पूजा आ दुर्गा शप्तशती पाठ मूल संस्कृत मे छलैक। आ सब देवी देवता’क प्रार्थना सेहो संस्कृते मे। बाकी हनुमान चालीसा आ रामचरित मानस के विभिन्न उद्धरण छलैक। एकर अतिरिक्त किछु छिटफुट वेदपाठ सेहो। ई सब दिलीप के ँ कण्ठस्थ करबाक छलन्हि।
एहि किताबी ज्ञान के अतिरिक्त व्यावहारिक ज्ञान’क लेल पाँड़ेजी दिलीप के ँ अपना संगे किछु किछु ठाम आयोजन सब मे लऽ जाए लगलखिन्ह। ओतए दिलीप हुनकर असिस्टेंट जकाँ काज करथि, जेना यजमान सँ विभिन्न वस्तुक ओरिआओन कराएब, पूजाक सामग्री सजाएब, आदि। पाँड़ेजीक अनुभव छलन्हि जे जतेक विस्तृत रूपे ँ सामग्री सजाओल जाए, यजमान वर्ग पर ओतबे वेशी प्रभाव पड़ैत छैक। विन्यास’क लूड़ि सीखब मंत्र सीखब सँ वेशी महत्वपूर्ण। एकर अतिरिक्त दिलीप पूजा’क समय पाँड़ेजीक प्रत्येक भाव भंगिमाक सूक्ष्म अध्ययन करथि। सत्यनारायण पूजा मे कथा’क समय भाषा टीका द्वारा हिन्दी मे लोक के ँ ओकर महत्त्व बुझाएब पाँड़ेजीक विशेषता छलन्हि। समय जरूर वेशी लगैत छलैक मुदा एहि सँ पाँड़ेजीक पांडित्यक धाख बढ़ैत छलन्हि। ओ दिलीप के ँ गर्व सँ सुनबथिन्ह “गाम पर पूजा होइत छैक तँ कथा’क समय यजमान आ आनो लोक सब बैसल बैसल ओंघाए लगैत छथि, मात्र पुरहित जी अपने कथा बँचैत रहैत छथि। हमरा कथा बँचैत काल अहाँ देखियौक, लोक आनन्द सँ झूलैत रहैत अछि। बीच बीच मे हमरा संगे सत्यनारायण भगवान के जयजयकार सेहो करैत रहैत अछि। कारण स्पष्ट छैक। संस्कृत मे कथा भेला सँ ककरो किछु बूझऽ मे तँ अबैत नहि छैक। पुरहितजी’क सस्वर पाठ ओहने होइत छन्हि जेना बच्चा के ँ सुतबै कालक लोरी गीत। कथा एहेन भाषा मे कहियौक जे लोक बूझए। बस, अपनहि सब अहाँक संगे एकाकार भऽ जाएत।”
दिलीप एक दिन मन्द विरोधक स्वर मे कहलखिन्ह जे संस्कृत तँ देववाणी छिऐक। तै पर पाँड़ेजी हुनका बड़ नीक जकाँ बुझेलखिन्ह “ देखियौक, संस्कृत देववाणी तखन छलैक जखन सब लोक संस्कृते बजैत छल। देवता’क कोनो वाणी नहि छन्हि। हमरे अहाँक वाणी सँ देवता बजैत छथि।वाल्मीकि रामायण छैक संस्कृत मे आ तुलसीदास रामयण लिखलन्हि हमरा अहाँक भाषा मे। लोक ककरा वेशी पढ़ैत छैक ? एखन अहाँ भगवान’क आरती गबैत छी कि लक्ष्मीजी’क आरती कि आन कोनो देवता’क आरती। सबटा तँ हिन्दी मे छैक आ कतेक आनन्द अबैत छैक लोक के ँ आरती गबैत। एकरे संस्कृत मे बना दियौक, कम्मे लोक बचत अहाँ के ँ संग दै बला। ”
दिलीप बूझि गेलाह असली गप्प। एवम् प्रकारे ँ ओ ट्रेन्ड होबए लगलाह। छोटछीन आयोजन सब मे यजमानक हैसियत देखि पाँड़ेजी दिलीप के ँ एकसरे पठबए लगलखिन्ह। हुनका अतीव खुसी छलन्हि जे लुप्तप्राय पंडित प्रजाति मे एकटा सदस्य जोड़ा रहल अछि।
एक दिन पाँड़ेजी एम एन मिसरा जी सँ दिलीप कुमारक भविष्य के लेल विचार विमर्श केलन्हि। हुनकर विचार छलन्हि जे दिलीप कोरबा छोड़ि कोनो नव जगह चल जाथि। एतए ओ पंडिताइ सिखलन्हि अछि। बारीक पटुआ तीत होइते छैक। अपना इलाका मे कोनो विद्वान के ँ यश नहि भेटैत छन्हि। ते ँ विद्वान के ँ विदेश मे अपन विद्वत्ताक प्रचार करबाक चाही। तहिना पंडित के ँ अपरिचित जगह मे यजमनिका’क प्रसार करबाक चाही। शूरवीर के ँ अनचिन्हार लोक’क बीच जा कए राज करैक चाही। बाहरक लोक के गुण अवगुण’क थाह जल्दी नहि लगैत छैक। ते ँ ई सब दीर्घायु होइत छैक जेना अपना देश मे अंग्रेजक राज।
करीब दू साल तक व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त केलाक बाद पंडित दिलीप कुमार पहुँचि गेलाह सिलबासा जे एकटा नवका औद्योगिक केन्द्र भऽ रहल छलैक। ओतए किछु दिन स्थानीय हनुमान मन्दिर पर एकसरे दिन राति हनुमान चालीसा., किछु रामायण’क उद्धरण आ विभिन्न देवी देवता’क प्रार्थना संस्कृत मे सस्वर पाठ करैत रहलाक बाद शनैः शनैः यजमान सब भेटए लगलन्हि। एतए ओ नवका पंडितजी नाम सँ विख्यात भऽ गेलाह।
× × × × × × ×
हम सब सिलबासा आएल छी जतए हमर जमाए एकटा फैक्ट्री मे इंजीनियर छथि। ओ एकटा नवका फ्लैट लेलन्हि अछि तकरे गृहप्रवेश’क पूजा छिऐक। एही आयोजन मे नवका पंडितजी बजाओल गेल छथि। हमर बेटी कहलन्हि जे नवका पंडित छथि हमरे ग्रामीण दिलीप कुमार, स्वर्गीय पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क प्रपौत्र। ओना मुम्बई मे हमर दीर्घ प्रवास मे गामक ई एकटा परिवत्र्तन हमरा बूझल नहि भेल छल।
हम पूरा आयोजन मे हुनका सँ नजरि बचा कए हुनकर व्यवहार’क अध्ययन कऽ रहल छी। हुनका ईहो नहि बूझल छन्हि जे हम हुनकर ग्रामीण छिएन्हि। ओ अपन काज एकटा नीक प्रोफेसनल जकाँ सम्पादित करैत छथि जाहि मे संस्कृत कम हिन्दीए बेशी रहैत छैक। एकटा आमंत्रित बूढ़ व्यक्ति हुनका टोकैत छथिन्ह “ पंडितजी, हिन्दी मे जे अर्थ बुझेलियैक से तँ नीक लागल मुदा संस्कृत मे पूजा पाठ’क विशेषता किछु भिन्ने छैक। हमरा बुझने तँ संस्कृते वेशी रहितैक तँ नीक।” पंडितजी बड़े संयत भावे ँ हुनका कटलखिन्ह “एतए प्रायः साठि सत्तरि लोक छी। बताउ कते गोटे संस्कृत बूझैत छी ?” सब चुप। पंडितजी आगू बजलाह “ देखू देववाणी सँ लोकवाणी वेशी प्रमुख होइत छैक। इएह बात तँ कवि विद्यापति कहि गेलाह। जे बुझियैक सएह वाणी। नहि तँ हम संस्कृत मे पूजा करी आ कि तमिल मे, दूनू एक्के।” नवका पंडितजी अपन पांडित्यक प्रभाव बना लेलन्हि।
हमरा ई देखि खुसी होइत अछि जे अपन प्रपितामह’क पंडिताइ के किछु अंश जरूर दिलीप कुमार जी बचा रहल छथि। ओना हमरा ई नहि बूझल अछि जे देववाणी’क ई परिवर्तित रूप स्वर्ग मे विराजमान पंडित संस्कार नाथ मिश्र के ँ केहन लागल हेतन्हि।

२
नवेंदु कुमार झा
बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास
बिजलीक संकट झेलि रहल बिहार के अगिला पांच वर्ष मे आत्म निर्भर बनैबाक लक्ष्य राखल गेल अछि। एहि वास्ते सरकार पुरान बिजली घरक मरम्मति संगहि नव बिजली घर बनैबाक दिस डेग उठौलक अछि। ऊर्जा मंत्री विजेन्द्र प्रसाद यादव जनतब देलनि जे प्रदेश मे एखन बिजलीक पैघ कमी अछि। सरकार एहि दिस डेग उठा रहल अछि। पुरान बिजली घरक मरम्मति आ नव बिजली घर सेहो बनाओल जा रहल अछि। एकर अलावा बिजलीक खरीदक लेल निजी कम्पनी सभ सॅ पैघ अवधिक समझौता कयल गेल अछि। उम्मीद अछि जे अगिला तीन वर्ष मे प्रदेश के मांगक अनुरूप बिजली भेटय लागत। सरकारक प्रयास अछि जे अगिला पांच वर्ष मे मांग सॅ बेसी बिजली उत्पादन कयल जाय। ओना प्रदेश मे गोटेक 3500 मेगावाट बिजलीक आवश्यकता अछि। केन्द्रीय पुल सॅ बिहार के गोटेक 1300 मेगावाट बिजली भेटि रहल अछि। श्री यादव जनौलनि जे वर्तमान स्थिति सॅ निपटबाक लेल खुलल बजार सॅ बिजलीक खरीद कयल जा रहल अछि। सरकार प्रदेश मे तीनटा नव बिजली घर बनाओल जा रहल अछि। औरंगाबाद नवीनगर मे एनटीपीसीक संग 2000 मेगावाटक बिजली घर बनाओल जा रहल अछि जे 2015 धरि चालू भऽ जायत। एहि ठाम सॅ 75 प्रतिशत बिजली बिहार के भेटत। बरौनी आ कांटी स्थित बिजली घटक क्षमता बढ़ाओल जा रहल अछि। कांटी मे 195 मेगावाटक आ बरौनी मे 200 मेगावाटक दू-दूटा इकाई स्थापित कयल जा रहल अछि।
      प्रदेश के बिजली संकट सॅ मुक्ति देयैबाक लेल सरकार पुरान बिजली घर सभक मरम्मति सेहो करा रहल अछि। एहि दिस तेजी सॅ काज भलि रहल अछि। उम्मीद अछि जे अगिला वर्षक अंत धरि कांटी आ बरौनी बिजली घरक मरम्मतिक काज पूरा भऽ जायत। एहि सॅ प्रदेश के गोटेक 400 मेगावाट बिजली भेटत ओतहि सरकार आब खुलल बजार सॅ सेहो बिजलीक खरीद कयल जा रहल अछि। मंत्री जनतब देलनि जे सरकार एनटीपीसी आ अदाणी पावर सॅ बिजली खरीद रहल अछि हालांकि एहि वास्ते सरकार के प्रति यूनिट 4.10 टाका बेसीक दाम लागि रहल अछि। पैघ अवधिक बिजली खरीदक समझौता सेहो कयल गेल अछि। एकर अंतर्गत तिलैया स्थित रिलांयंस पावरक मेगा थर्मल पावर प्रोजेक्ट सॅ बिजली खरीदक निर्णय लेल गेल अछि आ लातेहार स्थित एस्सा पावरक निर्माणाधीन बिजली घर सॅ 1000 मेगावाट बिजलीक खरीद कयल जायत। प्रदेशक कारोबारी बिजलीक क्षेत्र मे सरकार द्वारा कयल जा रहल प्रयास सॅ खुश छथि। हालाकि किछु कारोबारी बिहार राज्य विद्युत बोर्डक पारेषण क्षमता पर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ कऽ रहल छथि।
       

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल

१
 अमित मिश्र
बाल गजल: कोमल करेजक आखर

आइ समाज के भेद-भाव ,ऊँच -नीच . जाति-पाति गसिया क' पकड़ने अछि । सब काज मे छल-कपट भ' रहल अछि मुदा इ जातिसँ अलग एकटा और जाति अछि । जहिना गाछमे अरहुल-गेँदा -गुलाब आकर्षित करैत अछि ओहिना इ जाति समाजक सब वर्ग के चुटकी मे अपन बना लैत अछि । इ ओ जाति अछि जै सँ जँ लोकक वश चलत त' कहियो बाहर नै हएत । इ जाति अछि "बाल जाति" । एहि दुनियासँ फराक बाल-मोनक एकटा अलगे दुनियाँ अछि । एत' ए .सी बला कार त' नै मुदा घुरकुन्ना अछि , एत' पुआ -पकवानसँ बेसी स्वादिष्ट तिलकोर पातक पूरी . जनेरक कुट्टी के तरकारी आ बालुक चिन्नी अछि । एहि दुनियाँ मे खेलक अंदाज अजुबा अछि , खेल बेसी अछि  आ सबसँ बेसी अछि आपसी प्रेम ।
                                                         
                         कोनो खेल होइ मिल-जुलि क' खेलै छथि । कखनो बाबा जकाँ खैनी चुनाबै छथि त' कखनो मास्टर जीक नकल करै छथि । कखनो हँसैत ,रूसैत  छथि त' कखनो रूसल मे हँसै छथि ।
हिनकर हँसनाइ , कननाइ ,रूसनाइ , खेलनाइ सब नीक लागै छै आ इएह कारण छै जे लोक एहि दुनियाँ मे बेर-बेर आब' चाहै छथि । आखिर किएक नै औता , कहल गेलै यै ,"बच्चा भगवानक रूप होइ छथि ।"
जहिना भगवानक महिमा अपार छै तहिना बाल मोन के कोनो सीमासँ नै बान्हल जा सकै यै ।
बाल मोन के शब्द मे बन्हनाइ जतबे आसान छै ओतबे कठीन सेहो छै ।बच्चाक करेज बड कोमल होइ छै तेँए एहन बात लिखबाक चाही जैसँ हुनक मोन प्रसन्न होइ , जे ओ सब दिन अपन दैनिक जीवन मे करै छथि । दोसर बात हम कह' चाहब जे बाल-विधा के सदिखन आशावादी हेबाक चाही ।

किएक त' जँ नेनपन सँ आशा लागल रहतै त' जीवनक सब वाधा के हँसैत-खेलैत पार कएल जा सकै यै । बाल विधाक शब्द सदिखन सरल हेबाक चाही । एहन पाँति जे सरल होइ आ जल्दीए भाव समझ मे आबि जाई . बाल मोन के क्षण मे प्रसन्न क' दै अछि । संगे जँ राइम्स मे लिखल गेल होइ त' नेनाक जीभ पर एहन चढ़त जे वयस्क भेलोपर नै उतरत ।
ऐ के लेल गजल उपयुक्त विधा अछि किएक त' गजल मूल रूपसँ राइम्से के खेला अछि । काफिया , रदीफ सब तुकान्ते के पालन करैत अछि । हरेक  दोसर पाँति एहि नियम के पालन करैत अछि ।
कविता मे पाँतिक संख्याँ निश्चित नै अछि मुदा गजल मे कमसँ कम दस टा पाँति हेबाक चाही आ एते पाँति के इयाद करब कठीन नै अछि । एकटा बात और मोन राखू जे बाल-गजल मे गजलक व्याकरण मे कोनो परिवर्तन नै होइ छै । बाल-गजल मे मतल , मकता , काफिया , रदीफ आ बहर ओनाहिते रहतै जेना वयस्क गजल मे रहैत अछि ।
बाल मोनक सटीक आखर लिखबाक लेल , आँखि मुनि अपन नेनपन इयाद करू , इयाद करू जँ अहाँ की सब करै छलियै नेनपन मे , आ जे दृश्य देखाइ पड़ैए ओकर गजलक रूप मे शब्दबद्ध क' लिअ , नै त' अपन आस-पड़ोसक नेनाक आचरण देखू हुनक दैनिक क्रिया देखू , ओ की करै छथि देखू आ ओकरा शब्दसँ बान्हि लिअ  । बाल मोनक कोनो सीमा नै अछि तेँए जे मोन अछि से लिखू मुदा शब्द सरल राखू । अपन रचना मे ग्यान-विग्यानक तड़का लगाबैत रहू आ कोमल करेजक आखर रचैत रहू ।

२
मिहिर झा
बाल गजल

कसीदा केर एक हिस्सा होएत छैक  "नसीब"  | "नसीब" मे कवि के केन्द्रविंदु ओकर अदम्य चाह, ओकर अपन प्रेमिका सों अगाध प्रेम, अपन प्रेमिका सों विरह आ ओहि विरह सों उत्पन्न असह्य विरह पीडा | एहि "नसीब" से जन्म भेल गजल के | गजल शुरुआत मे आ बहुत दिन धरी एहि विषयवस्तु (सृंगार, प्रेम,विरह आदि) पर आधारित छल | भौतिक रूप से छोट रहबाक कारण आ मनुखक सब सों आकर्षणक विषय वस्तु रहबाक कारण गजल सब से लोकप्रिय भ गेल आ धीरे धीरे कसीदा मृतप्राय भ गेल |
गजल जखन विकसित भेल, सृंगार, प्रेम आ विरह के अलावा अपना मे नव नव आयाम जोडैत चल गेल | सामाजिक, भक्ति, राजनीतिक, व्यंग्य एकर अंग बनैत चल गेल | एतबहि ने, ई फ़ारसी, अरबी, उर्दू होइत अँग्रेज़ी आ आन पश्चिमी भाषाक संग हिन्दी, मराठी, गुजराती आ मैथिली मे अपन आत्मा के अक्षुण्ण रखने अपन रूप परिवर्तित करैत चल गेल |गजल के प्रभाव एतेक तीक्ष्ण रहल जे भाषा कोनो होउक, लोकक करेज मे ई सीधा स्थान बना लेलक |

मैथिली गजल मे किछु मास पूर्व ग़जालकार लोकनि एक टा नव प्रयोग शुरू केलन्हि - "बाल गजल" | हमरा ज्ञातव्य मे एखन धरी कोनो भाषा मे बाल विषय वस्तु पर गजल नहि लिखल गेल अछि | शायद ई प्रयोग मात्र मैथिली गजल मे पहिल बेर शुरू भेल आ विदेह पर बहुत रास बाल गजल लिखल आ सराहल गेल | ई बाल गजल सब सरल वार्णिक बहर आ अरबी बहर दुनु मे समान मात्रा मे लिखल गेल | किछु बाल गजल बच्चा लोकनि के एतेक प्रिय लगलन्हि जे ओ सब अपन धुन मे ओहि गजल के घर पर गुनगुनाबय लगलाह |

गजल के कोनो भाषा मे प्रवेश कय अपन स्थान बनेनाइ आब बहुत महत्वपूर्ण घटना नहि रहि गेल | लेकिन गजल विधा मे नया आयाम देनाइ एखनहु महत्वपूर्ण घटना छैक आ मैथिली और विशेष कय विदेह लेल ई सम्मान के वस्तु छैक जे ई गजल मे ई नव आयाम अनलक | सब बाल गजलकार के हार्दिक अभिनंदन आ धन्यवाद विदेह के जे बाल गजल विशेषांक निकाललथि |


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
श्री राज
यात्राीक कवितामे गाम
स्थानीयतासँ सार्वभौमिकता तकक निरंतर कविता-यात्रा केनिहार, लेखन आ देखनमे अति साधरण लगनिहार अति विशिष्ट, असाधारण आ अप्रतिरूत कविक नाम-ए यात्री। श्रेष्ठतम रचनाकारे नै श्रेष्ठ नवमानवतावादी युगक उन्नायक, उद्गाता आ शलाका पुरूष। यात्रीक कविता गम्हारिक शील भेल करैए जे देखबामे तँ सभसँ अनुपयोगी लकड़ी पिट्ठाक समतूल लगैए मगर उपयोगितामे एके ठाम विविध काठक गुण आ वैशिष्ट्य उपलब्ध करा दैए। कोनो अतिरिक्त मानस संवेदनक बिना। हुनकर कविता सभक लेल भेल करैए। जत्ते आ जतबे जकर ग्राह्यता आकि अभिरूचि। जै तीमनमे अपने स्वाद गुण छै, ओइमे बेसी मर-मसल्लाक कोन खाँहिंस। जे वास्तविक रूपमे बिना अतिरंजनक ‘सत्यम्’ छै ओ अनारोपित ‘सुन्दरम’ हेबे करतै। ज्ञान आ अनुभवक काशीमे लोक अस्सी बरिस सोझे बिताइयो लेत तैयो कि दूनूमे सँ किछु बिना प्रयासक थोड़बे भेट सकतै। तैं बहुतो भौतिक प्राप्तिक भट्टीमे भँाडे़टा झोंकैत रहि जाइ-ए। बर्तज बाबा यात्रीयेक ‘चानन बुझि देहमे किदन लेपैत रहि जाइए’ आकि कथीदन पर फूल-घी चढ़ा-औंसि पुण्य लाभक दुराशा आ भ्रमक परसादी लेने घुमि-फिरि अबैए। यात्राी बाबा अपन कथ्यकेँ कोनो सँाचमे गढ़ि कऽ पाठकक आगू नै राखि सोझ-सोझ बिना कोनो रंग-टीप क उपस्थित कऽ दै छथि, तैं पाठक हुनकर कविताक कथ्यसँ सोझे जुटि जाइ छथि। आलंकारिकता आकि कल्पनाशीलतामे बोरिया पाठक बाम-बूच नै जा सकैए। यात्री अपन कवितासँ सम्पूर्ण रूपसँ मिथिलांचलक किसान आ गमैया मजदूर आ मुख्यतः ओही नजैर सँ पूरा भारतीय समाज केँ ओकर प्रबलता आ दुर्बलता संग देखैत उजागर करै छथि। तैं हुनक कवितामे वर्णित सामग्री सोझे समाजसँ ओतऽ गेल रहैए आ हमरे बात कहैए। अपन परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थकेँ टोहियेबाक एगो चेष्टा यात्राीक कवितामे सभतैर भेटैए। जिनगीक यथार्थ सँ सरोकार रखनिहार एगो खँाटी रचनाकार मात्रा ऐन्द्रिक सुन्नरते केँ नै चित्रित करैए अपितु ओ जिनगीक कुरूपताकेँ सेहो अँाकैए। ओजह ई छै जे जिनगीमे सभ किछु सुढब-सुन्नरे नै छै। ओइ जघ सुन्नरताक पीठ-पाछू कुढब, चँाछल आ धोखाधरियोक अस्तित्व छै। यदि एक दिस गामक अपार आ असीमित सुन्नरता छै तँ दोसर दिस गाममे बसनिहार लोक टोला-परोसक उधेसल- पुधेसल, उजरल-अपटल जिनगीक दर्दनाक कुरूपता सेहो। एतेक थाकल-हारल आ थकुचल जिनगी कि सुखक सभ बात गामक रहरहँा लोकक लेल रूप कथे बुझाइत रहै छै। फेर मुट्ठी-दू मुट्ठी भात आकि किछु टुक्का-साबुत सोहारी आ दालि कि तीमनक झोर जुमि गेलापर ओ दिल्लीक दरबार आकि रंगमहलक सुध किए लेत? यएह तँ अछि ऐ जिनगीक असीमित विरोधभास। यात्री अपन कविताकेँ ग्रामीण परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थ केँ देखैक प्रयास निरंतर करै छथि। सभसँ खास बात तँ यात्राीक कविता मे ई ऐ जे ओ कविकर्म केँ प्रतिष्ठामूलक नै, अपन विशिष्ट संवेदनशीलताक दायित्व पूर्वक व्यवहार करब मानैत रहल छथि। यात्री जेहन काव्य युगक निर्माण केलनि, ओकर तरूमे नै जा बेसी रचनाकार ओकर आकृतिकेँ स्वीकार आकि खारिज करैत रहलाह। ऐ फाँटक रचनाकार लग गामक अति जरूरी मुदा उपेक्षित थीतिक खबैर तँ रहै छनि बलू गोबर केँ गणेश आकि पाथर केँ भगवान बनेबाक मुद्रा आ चेष्टामे। यात्रीक कवितामे पाथर बनि गेल लोकक सुधि आ संधान भेटैए। गाम घुरू (भुसपुतरा) आकि ठठरीक ‘फोटो’ जेकँा हुनकर कविता मे नै अबैए। जेतऽ यथार्थ युग-सत्य बनि जेबाक ओजह सँ विज्ञापनी मंडीमे थोक रूपसँ उतरैए जरूर, बलू ओइमे नै तँ गामक आम जनक थीते उजागर भऽ पबैए, आने खास लोकक चरित्रो उघारल-उधेसल जा सकैए। जहिना वर्तमान समयमे वैश्विकता सुनबामे तँ वसुध्ैव कुटुम्बकम् अथवा मार्क्सक दुनिया भरिक मजदूरक एकताक आह्वान सन उदात्त बूझि पडै़ए बलू क्रिया आ असैर मे एकर विपरीत एक छत्रा साम्राज्यवादिक सूत्र सौन्दर्यवादी सुकुमार कविक गाम सँ फराक यात्रीक गाम तखने ऐ जे मूल रूप सँ किसान आ खेत-मजदूरक पक्षधरता हिनकर कविताक गामक प्रतिबद्धता ऐ, कोनो ‘फैशन’ नै। आ अही ओजह सँ अपन जिनगीक सभसँ कम, जटिल आ आरंभिके काल खंड अपन जनमथान तरौनी मे बितबितो हुनक कवि ओकर गुरूत्त्वाकर्षण सँ मुक्त नै भऽ पबैए। देश-विदेश सभतरि सर्वाधिक रहनिहार ई यात्री कवि कोनो शहरी उद्यान; पार्कमे ब्योंतल आ करतब, ड्रिल कराओल मौसमी फूल आकि पत्ताबहार, क्रोटन क चाक-चिकपर आकृष्ट नै होइ छथि बलू ओत्तौ गामक चर-चाँचरमे अगराइत भेंट-कुमुदिन, माछ-मखान, लीची आ आम सभ कथूक नैसर्गिक सुन्दरता केँ नै बिसरि पबै छथि- कत्ते दीब लगैए हमरा अपन ओ तरौनी गाम। मोन पड़ैए लीची आ आम। मोन पडै़ए कुमुदिनी आ ताल मखान। गाम सँ दूर रहबाक कचोट स्पष्ट रूप सँ व्यक्त करैत अपन विवशताकेँ फरिछाकऽ रखै छथि यात्री अपन कवितामे। खाहें तन सँ कतौ रहथु बलू मोन मैथिल जातीय भारतीयता सँ हेंठ नै भऽ पबैए। होइ कोनहुँ ठाम। किछु भै जाइ। रही बहुतो दूर वा लगीच। बंधुगण बरू दुरदुराबथु किंतु। जननि राखब भाव अँह जननीक। एकरा आर फरिछाबैत एक ठाम ओ कहै छथि- किंतु की हम बिसैर पाएब। तरौनी सन गाम? गड़हरा सन आम? दीदिक इनारक पानि। अपन पोखरिक ओ ठुट्ठ पातर जाठिं।... धनरूर बाध कोसक कोस। हुनकर अनुराग सिन्दूर तिलकित भाल पर केन्द्रिते रहैए। आकृष्ट करैए कवि केँ नेनाक थोंथ हँसी, जेकरामे महज सुन्नरते नै, संजीवनी शक्तिक संचारक छेमता ओ पबै छथि। अहल भोरे जाड़ मासमे गाममे ओरियाओल छूराकेँ तपैत, जिनगीक सुख-दुःख मादे निष्कपट बतियैत, घूराक सोन्हगर गमैया गंधक पता ओहन आत्मीय भाव सँ कोनो यात्राीये सन माटि-पानिक कवि केँ भऽ सकै छै। आंचलिक बोलीक मिज्झरक, मिक्सचर अर्थात् संकीर्णता सँ हेंठ अनगढ़ बोली कोनो कवि यात्राीयेक कान जुरा सकै छै। जूता-मोजाक टीप-टाप पर नै ठेला आ बेमाय फाटल गोर पर कोनो कवि यात्राीयेक नजैर जा सकै छै। दू-गो बिम्ब जे खँाटी गमैया ऐ, आम लोकक आशा-आकंाक्षाक प्रतीक ऐ- दूधिया शीश आकि बालि ओ श्रमक फलाफल सोनिम पाकल शीश अधिक ठाम श्रमक गायक ऐ कविक कविता मे अबैत रहै-ए।
वर्तमान व्यवस्थापक प्रतीक ध्ूरू (भुस्सा भरल झामलाल बिजुका) क माध्यम सँ तँ कवि पूरा व्यवस्थापक चरित्र ओ थीत केँ बेपर्द करै छथि। चेतना हीन जनतंत्रक मालिक जनता साकांक्ष नै भऽ गफलैत मे पड़ल रहैए आ ओकर ओगरबारू प्रतिनिधि अपनेमे टर्र भाँजटा पूरैत रहै-ए। उपरका जँ सरङमे बिचरैत रहैए तँ निचलका दिन-दिन पताले धँसल जा रहल-ए। दूनू फँाट अपचक शिकार। बेसी कदन्न सँ तँ कम अधिक पौष्टिकता सँ। प्रतिनिधिक मगज आ करेज मे भुस्सा भरल बुझा पडै़-ए जै पर खद्धर, स्वदेशीक आङरक्षक खाल चढ़ल ऐ। अकालक ओजह सँ स्वतंत्र गामक अस्सी प्रतिशत लोकक त्रासदीक केहन सजीव चित्र यात्राीक कवितामे संभव भेल ऐ-’ बिना पजारक मन्हुवाएल चूल्हि, कामहि जँात-चकरी, अन्नदाताक संग समान जिनगी बसर तै त- बरतैत आश्रिता कनही पिलिया, लाभर-जीभर अहरा प्राप्त केनिहार गिरगिट, मूसआ कौवा सभक उदासी, हतासी आ फेर आंशिक जरूरैत पूर्ति सँ टुकटुकाएल ओकर सभक चेष्टा आ चुहुल केँ भला कोन ‘फेन्सी’ कवि एते कममे एते विराटताक संग प्रस्तुत करबाक सामरथ राखि सकैए।
भाखा केँ हम अभिव्यक्तिक माध्यम टा मानैत रहल छी तैं यात्राी आ नागा जनमे अंतर करबामे असोकर्जक अनुभव करैत छी। मूल वस्तु तँ छिऐ कथ्य। गोल कऽ दियौ तँ लालमोहन, नाम तँ गुलाबजामुन। हलवाइ तँ एकेगो- यात्री कहियौ कि नागार्जुन। गरीब-गुरबा, किसान आ मजूरक आत्मीय समाङ। कतौ पं वैद्यनाथ मिश्र नै कलगणारक रूप मे। मनुख तँ वास्तविक रूपमे अगबे मनुखेटा रहै छै। दोखी तँ भेल करै छै कोनो व्यवस्था माने संचालन तंत्र। जँातक  काज छिऐ पिसनाइ। अखियासबाक तँ एतबे छै कि ओइमे ढारल की जा रहल छै- कोदो-मरूवा आकि चाउर-गहूम। सद्यः व्यवस्थाकेँ खेलौड़िया मुद्रामे लुल्हुवा देखेबामे बाबा यात्राी-नार्गाजुन हिन्दीक माध्यमसँ भाव व्यक्त्त केनिहार किसान कवि त्रिलोचन आ केदारनाथ अग्रवालो सँ सहज आ पटु देखनामे अबै छथि।
जनसंकुल टीसनो पर कवि गामेक अँाखिक प्रयोग करैत देखल जाइ छथि। ओइ लोक वरक अपार भीड़ोमे लोक-मन अर्थात निम्नवर्गीय ग्रामीणे परिवेशक दुरगमनियँा कनियँा-बरे पर कविक अँाखि जाइए। पारंपरिक रङल-टीपल बाकस पर ओङठलि घोघ-मरद काढ़ने नवकनियँा आ ओकर रछिया लेल बहाल लोकनियाँ चानीक टकहीक हर पहिरने, माङुर माछ सन काठी आ सिमरताइवाली आँखिसँ गामेक अनगढ़ सुन्नरताक पारखी कोनो कविक अँाखिटा देखि सकैए। तेज सबारीक बिरड़ो आ घटाटोपक अछैतो भदबारिक भीजल घोंघा सन (सूक्ष्म गमै उपमा) मंद ससरैत ट्रामे पर कविक अँाखि जाइ छनि। गामक हरेक मोर्चा पर यात्राीक कवि साकंक्ष ठाढ़ भेटैए। माटिक सभ स्पंदन हुनकर कवितामे निनादित होइए। तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभ प्रकारक विद्रूपताक खबैर यात्री लैत चलैत छथि, संगे गामक सम्पूर्ण जिनगीकेँ रूपायित सेहो करै छथि। गामक लोकक सभ आशा-आकांक्षा, दुःख दरेग, हँसी-खुशी, सौन्दर्य-कुरूपता, जय-पराजय, उत्थान-पतन, कमजोरी-मजगूती, समटा समभाव सँ हुनकर कविता-यात्रा मे सरीक रहैए। कविकर्म हुनकर धर्म छनि, जिनगीक मर्म छनि। कतौ लौल, सौख आकि प्रदर्शनकामिता नै।
यएह ओजह ऐ जे प्रगतिशीलताक प्रर्दशन मे ओ अपन मैथिल समाजक ;स्थानीयताक सभसँ ज्वलंत आ अपरिहार्य समस्या वैवाहिक दुर्गुण सभसँ सेहो मुँह नै मोडै़ छथि। ‘यत्-यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, स्थानीयता सँ सार्वभौमिकता हुनक आदर्श बुझा पडै़ए। सरजमीन सँ कटि अकासक गप्प कखनौं नै। तैं मिथिलांचलमे व्याप्त बेमेल बियाह, बहु बियाह आदि दुर्गुण सार्वभौमिकताक हुनक विशद दृष्टिक अछैतो ओत नै भेल ऐ। तत्कालीन मैथिल समाजक खाहें बेमेल बियाहक स्पष्ट चित्रण हो आकि चरित्रक उद्घाटनक संग तहियाक पेशेवर घटकक सजीव आकलन जेना यात्रीक कवि कऽ सकल ऐ, निस्संदेह मिथिला केन्द्रित आन कोनो कवि सँ संभव नै भऽ सकल। संस्कृतिक एहन सम्यक आ निठुर व्याख्याक संयम अंतऽ कतौ भेटब दुर्लभ।
गामक-घर, माटि-पानि सँ केहन संव्यक्त्त छला ओ एकर परिचय तँ सुगमताक संग जेतऽ–तेतऽ भेटते ऐ, तैयो बानगी सरूप किछु पतियानी उदघृत करबाक इच्छा केँ नै रोकि सकबाक विवशताक संग एतऽ राखऽ चाहै छी जे बाल-विधवाक दुःख दैन्यकेँ सूक्ष्मताक संग उजागर करैए ‘‘भुस्साक आगि जेकँा नहूँ-नहूँ। जरै छी मने-मने हमहूँ। फटै छी कुसियारक पोर जेकँा। चैतक पछबा मे ठोर जेकँा। काते रहै छी जनु घैल छुतहर.....।’’
यात्राी अपना केँ कतौ विशिष्ट नै, अपन कवित्त्व केँ सामान्ये मानैत रहल छथि।  जहनि कि सभ मतक माननिहार सारस्वत चेतनाक सर्वोपरि सिद्धि मानैत रहल छथि, तेनाहितियो मे यात्री अवसरक अनुकूलते केँ आने सफलता जेकँा सर्वोपरि मानै छथिथ। परम मेधवी कते बालक जेतऽ। मूर्ख रहि गायटा चरबैत छथि। .......कालिदास कते। विद्यापति कते। छथि हेरायल महिंसबारक हेंड़मे। यात्राीक शिल्पी गामक ‘कमर्शियल’ सौन्दर्य केँ प्रस्तुत करब मात्र अपन अभिष्ट किन्नौं ने रखने ऐ। ओ यथार्थक एहन समतल भूमि तैयार करैत चलै छथि कि ओ अनायास ‘सुन्दरम्’ भऽ कवितामे प्रकट भऽ जाइए, वनफूलक महमही जेकँा। जौं एक दिस हुनका फसिलक मंजरीक दुर्लभ महमही अभिभूत करै छनि तँ दोसर दिस जेठक तिक्ख आतप केँ सहैत कृषि कर्म मे साधनारत बीया बाउग केनिहार हाथ ओ मुँहक दूरीक सुरता सेहो सतबैत रहल छनि। ग्रामीण क्षेत्र दऽ’ बुलैतहैत तीरभुक्त्तिक माला हुनका नै सिहाबै छनि। थलहा कृषि –कर्मसँ लऽ जल-कृषक मलाहक जिनगी तकक शैली ओ संास्कृतिक चेतनाक सूक्ष्म ज्ञान बाबाक ओतऽ जतबा ऐ, आनठाम एहन आ एते दुर्लभ ऐ। एकर संगे नदी सभक प्रलयंकारी ताण्डव आ ओइसँ उपजल ओबा-टुनकी, मरकी-फौती सँ सेहो छगाइत छथि बाबा यात्री।
एकर विभीषिका सँ कोन फाँट पर कोन असैर पडै़ छै नीमन जगती बूझल छनि कवि यात्राीकेँ। एकेगो थीत केना ककरो गोटी लाल करैए, ककरो उफँाटि तँ ककरो पबन्नी लगबैए आ ककरो खेले उसरि दैए।
सहज सपर्द भाखामे विराट शब्द अभिव्यंजना जे यात्राीक ओतऽ भेटैए ओ कोनो खँाटी ग्रामीणे संस्कारक कवि ओतऽ संभव छै। नव निर्मित मुलकी व्यवस्थाक प्रति मोह- भंगक मादे स्पष्ट आ संधानल कसगर चोट करितो फूलगेना सँ प्रहारक मुद्रा ऐ महान कविक अपन विशेषता रहल-ऐ। यात्री अपन लोकदृष्टिकेँ गमैया संस्कारक ओजहसँ घोघटामे बादरिक चान सन भँापि, अपवाद थीतिकेँ छोड़ि, प्रस्तुत करैत रहल छथि जे निश्चित रूपसँ ग्राम्य संस्कारेक असरि ऐ। स्वदेशी त्रुुटिपूर्ण आ जंगलशाही वर्त्तमान व्यवस्थापक प्रति मोहभंग केँ यात्री सोझ-सहज हाड़ तक छूबऽ बला शुरमे व्यक्त्त करबाक सामरथ रखै छथि तै पर थोड़ेक दीठि देल जाय - चानन बुझि हम किदन लेपल देह मे। वाहरे ! महान कविक शब्द अभिव्यंजना। आम लोक केँ उमेद रहै चाननक शीतलताक, बलू भेटलै वएह निर्घिन अवशिष्ट-नव व्यवस्थाक चरित्र केँ केहन मर्यादित गमइ संस्कारक संग उधेसबामे सफल होइ छथि- पूँछ उठाकर नाच रहे हैं ‘पार्लिया-मेन्ट्री मोर’। बिखिन-बिखिन बिम्बक प्रयोगक अनिवार्यताक अछैतो भारतीय ग्राम्य संस्कारक केहन निर्वहन। अखारा पर दम प्रदर्शन सँ बेसी दम पचेबाक प्रक्रिया बेसी कुशलताक मानल जाइ छै। ई बात भिन्न जे ऐ ग्राम्य सहज चेतना केँ गरियेबाक उदेस सँ गमार आकि भदेसी विशेषण सँ अभिहीत किए ने कएल जाउक। यात्री नव मानवताकेँ आकृतिक आधार पर छोट-पैघ आङुरक छपाटि हाथकेँ सुरुब बनेबाक दलील देनिहार मिथ्याकार सभक फाँटक नै भऽ सकै छथि, ओजह जे हाथ ‘स्वस्ति-स्वाहा’ सभ कथूमे सक्षम आ मूल भेल करैए जहनि कि सुरूब अनुकृति मात्र। ओ कोनो प्रणालीक संचालनक सामरथ नै राखि चमचा चालन मात्र कऽ सकैए। साम्यक अर्थ युगकवि यात्री सभंजन जेकि भारतीय दर्शनोक मूलाधार ऐ, सएहटा लगबैत रहल छथि। कोनो वायवीय अर्थक आधारपर सत्यकेँ खारिज करबाक कुप्रयास ओहन महामना कवि भला किए करत?
एतावता जनवादी चेतना आ ग्रामीण सौंदर्य-बोध महान कवि यात्राीक जिनगीक सहज उच्छवास आ ऊर्जा, करेजक ध्ुकध्ुकी आ धमनीक प्रवाहित रक्त्त रहल ऐ।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) PART II




गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

२.गद्य
२.१.१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल


२.२.१.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास

२.३.१.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल

२.४.श्री राज- यात्रीक कवितामे गाम

२.५.मुन्नाजी-विहनि कथा संसार

२.६.आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार

२.७.१. राजदेव मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डलक कवि‍ता संग्रह राति‍-दि‍नक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस')

२.८.१.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै  २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि‍ भरना

१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल


१.
मुन्नाजी
बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा


घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग,नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए।
पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि "जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए।


अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रिती ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि-----------------
१) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल।
२) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल।
३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल।
४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल।
संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए।

२.
ओमप्रकाश झा
मैथिली बाल गजलक अवधारणा
जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिलि गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि।
आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः-
कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी
जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी
ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत।
मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत।

३.
जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी

बाल गजलक अवधारणा

बाल गजलक अवधारणा कोनो बेसी पुरान नहि अछि | आँखिक देखले- देखले चारि महिना  भेल होएत | मुदा जेना कहल जाई छैक, कोनो कार्यक अथबा अबधारनाक सुरुवात कतौ नहि कतौ सँ होएते छैक | आ हम सब एखुनका समकालीन गजलकार (विशेष कए विदेह आ अनचिन्हार आखर सँ जुरल ) शोभाग्यशाली छी जे एहि महान घटनाक्रम केँ परोक्ष अपन आँखि सँ देख रहल छी आ इतिहास में धारनाक गवाह बनि कए आएब |
ओना कोनो कार्य केँ हरदम दूगोट पक्ष होएत छैक एकटा पक्ष में  तँ  दोसर बिपक्ष में | बहुत रास बिपक्षक लोक केँ एखन तक मैथिली में गजल, सेहो नहि पचि रहल छैन आ अगुलका पीढी हुनका सब केँ सामने मैथिली में बाल गजल लए कँ उपस्थित भए गेल | ई हुनका सब केँ लेल अविश्वसनीय आ अपच भेनाई तँ स्वभाबिक छनि | किएक   तँ  बाल गजलक अब्धारनाक उत्पति एखन तक उर्दू आ हिंदीयो में चुप्पे अछि, ओहि ठाम मैथिली में गजल नहि पचबै बला सब केँ सोँझां में करीब चारि महिना में लगभग सय सँ बेसी सुन्नर-सुन्नर नेनपन सँ भरल बाल गजल हुनका सब लेल आश्चर्ज मुदा हमरा सबहक लेल प्रश्नताक विषय अछि | किछु लोक साँप केँ गेलाक बाद लाठी पितै में लागल रहैत छथि   तँ  किछु लोक एकटा सार्थक श्रीजन में, मुदा इतिहास बनाबै बला में नाम सदिखन श्रीजनकर्ता केँ अबैत छैक | हम सब केँ सब एखनका समय केँ श्रीजनकर्ता छी  |
बाल गजलक अबधारना कोना सम्भब भेलै आ कोन-कोन महिना में एकर पूर्ण जानकारी चन्दन झा जीक आलेख में नीक सँ अछि मुदा हम एतेक जरुर कहब जें एहि अबधारनाक जन्म आशीष अनचिन्हार जीक मोन  सँ भेलैंह आ बहुत जल्दीए ई अपन स्वतंत्र छाप जन-जन केँ मोन पर छोरत |
बाल मोनक कल्पना केँ कोनो सीमा नहि छैक, बस ओ कल्पना ओ चरित्र जे जीवनक भागमभाग में कतौ हमरा सब सँ हरा गेल, कनी काल केँ लेल सब किछ बिसरि कए बच्चा बनि कलम चलेने बाल गजल | एहि सन्दर्भ में गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता " |
बिनु पानिक  नाउ चलाएब हम
बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम
नहि बिना पानिक नाऊक कोनो प्रयोजन आ नहि बिनु चक्काक गाड़ीक कोनो प्रयोजन मुदा उपरका शेर में बाल मोनक परिकल्पना अछि आ ओ बाल मोन किछो कए सकैत अछि | बिनु पानिक नाऊ चला सकैत अछि, बिनु चाक्कक गाड़ी बना सकैत अछि, बाबा केँ घोरा बना सकैत अछि | ओहे बाल मोन जखन गंभीर होएत अछि  तँ परदेश में बसल काका बाबु केँ बजाबैक हेतु चीत्कार करैत अछि -
'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु
नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब

४
आशीष अनचिन्हार
की थिक बाल गजलः


किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ "बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य। आ विदेह एकर विशेषांक निकालल ताहि लेल हम एकरा धन्यवाद नै दए सकैत छीऐ कारण विदेह हमहूँ छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत।


जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै।


आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक ई अंक जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास ( खास कए गजलकारे सभ द्वारा ) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै।


की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः


जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल।


बाल गजलक पूर्व भूमिकाः


तारीखक हिसाबें बाल गजलक उत्पति  २४.०३.२०१२ केँ मानल जाएत मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। ०९ दिसम्बर २०११ केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए ( बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------



शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी
मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी


टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल
पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी


बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस
शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी


नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी
दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी


सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती
अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी


ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र
मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी


"शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी
बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी


..................वर्ण २२................




तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू--------------


होइत छैक बरखा आ रे बौआ
कागतक नाह बना रे बौआ

देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे
हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ

तोरे पर सभटा मान-गुमान
माएक मान बढ़ा रे बौआ

छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे
प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ

नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग
देशक लेल माथ कटा रे बौआ


तेनाहिते ४ अक्टूबर २०१०केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि-----


बानर पट लैले अछि तैयार
बिरनल सभ करू ने उद्धार


गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने
दुहै समऐँ जनताक कपार


पुल बनेबाक समचा छैक नै
अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार


कोरो बाती उबही देबाक लेल
आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार


डरक घाट नहाएल छी हम
से सहब दहोदिश अत्याचार


ऐरावत अछि देखा - देखा कए
सभटा देखैत अछि ओ व्यापार




ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि।






1


बाल गजल




ई छौंड़ी थिक बिढ़नी सन
सौंसे नाचै घिरनी सन


बदमाशीकेँ तगमा छै
मूँहक लागै हिरणी सन


बैसल भूतक नानी बनि
लागै छै मुँहचिरनी सन


बच्चा लग बच्चा लागै
बुढ़िया लग बततिरनी सन


ई दुनियाँ झाँपै तैओ
बेटी चमकै किरणी सन


हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ


2
बाल गजल




भोरे उठि मैदान गेलै बौआ
ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ


पोखरिमे नीकसँ नहेतै धोतै
चिक्कन चुनमुन बनि क' एतै बौआ


सरिएतै पोथी पहिरतै अंगा
इस्कूलो खुब्बे तँ जेतै बौआ


नै रखतै दोस्ती खरापक संगे
पढ़ि बड़का डाक्टर तँ बनतै बौआ


सभहँक करतै मदति सोना बेटा
सदिखन नीके बाट चलतै बौआ






हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ

५.

 चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल
मैथिली साहित्यक इतिहास करीब ८०० बरख पुरान छैक आ' से एकर समृद्धि विश्व-साहित्य जगत मे अपन फराक आ' बेछप स्थान बनौने अछि ताहि मे कोनो दू मत नहि.मुदा, जखन मैथिली साहित्यक एहि समृद्धि केँ ध्यान मे रखैत मैथिली बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करैत छी वा' आन-आन भाषाक बाल-साहित्य सँ एकर तुलना करैत छी तऽ फेर ई नगण्यप्राय बुझना जाइत अछि.मैथिली भाषा मे बाल-साहित्य बहुत कम लिखल गेलैए एखनधरि. लेकिन, एकटा बात जरूर छैक जे मिथिला क्षेत्र मे घरक बुढ़-पुरान द्वारा धिया-पुता सभकेँ विभिन्न तरहक प्रेरणादायी खिस्सा पिहानी सुनयबाक प्रचलन बहुत पुरान छैक मुदा, एकरा बाल-साहित्य केऽ अंतरगत मान्यता नहि देल जायत किएक तऽ ई लिखित रूप मे नहि उपलब्ध अछि. बिभिन्न जगह पर एकर विभिन्न स्वरूप मे कथानक बदलैत रहैत छैक.लिखित रूप मे नहि हेबाक कारणेँ ई खिस्सा-पिहानी सुनब आ' सुनेबाक परंपरा सेहो विलुप्त भेल जाऽ रहल छैक.
मैथिली बाल साहित्यक प्रादुर्भावकाल प्रायः बीसम शताब्दीक उत्तरार्ध केँ मानल जायत.ओना हमरा लग एखनधरि एकर कोनो प्रामाणिक तारीख तऽ उपलब्ध नहि अछि मुदा, बाल-साहित्य लिखनिहार पुरान साहित्यकार सभक रचनाकाल केँ धेयान मे रखैत हम ई बात अपन अनुमानक आधार पर कहि रहल छी.एहि समय मे पं.चंन्द्रनाथ मिश्र "अमर", पं. गोविन्द झा, मुरलीधर झा,कालीकान्त झा "बुच", रामलोचन ठाकुर सदृश मुर्धन्य विद्वान, स्थापित साहित्यकार आ' मैथिलीसेवी सभ अपन कलमक मोसि पिया मैथिली बाल-साहित्य केँ पोसलनि.फेर जीवकांत, सियाराम झा "सरस", सन लोकप्रिय साहित्यकार एकरा अपन आंगुर धरा डेगा-डेगी चलौलनि.एकैसम सदीक शुरुआत मे तारानन्द वियोगी,ले.क. मयानाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल,गजेन्द्र ठाकुर आ' प्रिती ठाकुर, ईत्यादि सँ मैथिली बाल-साहित्य केँ बेश दुलार-मलार भेटि रहल छैक.वर्तमान मे ऋषि वशिष्ठ आ' डा. शशिधर कुमरक बाल-साहित्यक लेल कयल जा रहल अवदान सेहो उल्लेखनीय अछि.तखन आब ई आशा निश्चित रुपेँ कयल जाऽ सकैत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य सेहो क्रमशः जवानी आ' प्रौढ़ावस्था केँ प्राप्त करत आ' चिरंजीवि बनत.एकर एहने उज्जवल भविष्य केँ देखैत साहित्य अकादमी दिल्ली सेहो मैथिली बाल-साहित्य केँ मान्यता दैत एकरा लेल पुरस्कारक प्रावधान कयलक अछि.अस्तु.
मैथिली साहित्य जगत मे गजल सेहो कमोवेश नवके विधा कहल जायत.ओना एकर उद्भव मैथिली मे करीब सय बरख पूर्व भेल रहैक आ' फेर कहियो गजल तऽ कहियो गीतल के रुप मे ई अड़ल रहल मुदा, एहि गीतल-गजल सभ मे गजलक व्याकरण केँ कमोवेश एकात कऽ देल गेलैक.परिणामस्वरूप, मैथिली गजल आ' गजलकार मैथिली काव्यधारा सँ सभदिन कतिआएले रहल आ गजल सेहो सभदिन अपन अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत रहल अछि. एकैसम सदीक एखनधरिक बारह बरख मैथिली गजलक इतिहास मे अन्यतम स्थान रखैत अछि. एहि समयावधि मे श्री गजेन्द्र ठाकुर आ' आशीष अनचिन्हारक अवदान अविस्मरणीय अछि. गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक. वर्तमान मे मैथिली गजलक लेल आशीष अनचिन्हारक समर्पण वर्णनातीत अछि. आशीष जी उर्दू आ' अरबीक समृद्ध गजल व्याकरण केँ मैथिली भाषाक आवश्यकतानुसार जाहि तरहेँ सरलीकरण केलथि आ' फेर अनचिन्हार आखरक माध्यम सँ आम जनमानस मे बहर आधारित गजल कहबाक (लिखबाक) लेल रुचि जगा रहल छथि से जा'धरि मैथिली गजल इतिहास रहत ता' धरि हिनकर एहि अवदानक चर्चा अवस्से कयल जायत.
मैथिली मे बाल-गजल एकदम टटका परिकल्पना अछि.आन भाषाक बाल-साहित्य सभ मे सेहो बाल-गजल किन्साइते हेतैक.उर्दू मे गजल माने प्रेमालापे बुझल जाइत छलैक पहिने मुदा, फेर गजलकार सभ एकरा विस्तार दैत एहि मे सामाजिक सरोकार केs सेहो समावेशित कयलनि लेकिन बाल-गजल ओत्तहु जनमल हेतैक ताहि मे हमरा शंके बुझना जाइत अछि. मैथिली मे बाल-गजलक परिकल्पना सर्वप्रथम २४ मार्च २०१२ केs आशीष अनचिन्हार द्वारा कयल गेल आ' फेर २७ मार्च केs आशीष जी सूचना देलनि जे २५ वा २६ मार्च केs मैथिलीक पुरान आ' स्थापित गजलकार मुन्ना जी द्वारा एकटा बाल-गजल लिखल गेल अछि.एहि तरहेँ मुन्नाजीक ई बाल-गजल मैथिली बाल-गजलक इतिहास मे प्रथम होयबाक गौरव पौने अछि.आशा करैत छी जे विदेहक एहि बाल-गजल विशेषांक मे ई बाल-गजल प्रकाशित होयत. बाल-साहित्य सृजनकाल मे बाल मनोविज्ञान केँ धेयान मे राखब परमावश्यक.एकटा उत्कृष्ट साहित्य लेल जरुरी छैक जे ओ' सरल, बोधगम्य आ' प्रेरणास्पद हो.जखन बाल-गजलक परिकल्पना मैथिली गजलकार सभक सोझाँ एलनि तऽ स्वाभाविक रुपेँ हुनका सभक मोन मे ई प्रश्न उठलनि जे एकर रुपरेखा केहन हेतइ.....एकर व्याकरण आ' भावपक्ष केहन हेबाक चाही...ईत्यादि.हुनकर सभक एहि जिज्ञासा केs शांत करैत गजेन्द्रजी कहलखिन्ह जे कायदा-कानून तऽ सामान्ये गजल जेकाँ रहतैक मुदा भावपक्ष एहन हेबाक चाही जे छोट-छोट धिया-पुता के रुचई.ओकर सभक मन-मस्तिष्क केँ पचई आ' तइँ जे गजलकार जतेक बच्चा बनि बाल-गजल कहताह(लिखताह) ओ' ओतेक सफल हेताह.
उत्साह आ प्रतिभा सँ भरल अमित मिश्र,पंकज चौधरी "नवलश्री",जगदानन्द झा "मनु",रुबी झा, मिहिर झा,ईत्यादि सन नवगजलकार सभ गजेन्द्रजीक उपरोक्त कहल बात के पुर्णतः आत्मसात कयलनि.फलस्वरुप, २४ सँ ३१ मार्च २०१२ अबैत-अबैत, एक्के सप्ताह के भीतर गोट दसेक सँ बेशी बाल-गजल हमरा सभक सोझाँ आयल.एहि क्रम मे हमहू एक-दूटा बाल-गजल लिखबाक प्रयास कयलहुँ.मुदा,एहिठाम उल्लेखनीय बात ई जे मैथिली बाल-गजल प्रायः सोइरीये सँ अपन रूप आ भाव सँ आम जनमानस के आकर्षित-प्रभावित करय लागल.बहर आ'व्याकरणक मापदण्ड पर सोंटल आ' बिम्ब आ' भावसँ ओत-प्रोत मैथिली बाल-गजल अपन जन्महि कालसँ संकेत देमय लागल जे मैथिली बाल-साहित्य मे ओकर भविष्य बेश उज्जवल छैक आ'से लगभग चारिए मासक अल्पावधि मे एकसय सँ बेशी बाल-गजल एहि बातक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि.
अमित मिश्र एखन जीवनक छात्रावस्था मे छथि आ'से एखन हिनकर एकटा पएर नेनपन तऽ दोसर जुआनीक सोपान पर छन्हि आ' तकरे प्रतिफल छैक जे हिनका बाल मनोभावक सागर मे डूबकी लगबैत देरी नहि लगैत छन्हि.यैह कारण छैक जे ई बाल-गजलकारक पाँति मे सभसँ आगू ठाढ़ भेटैत छथि.एखनधरि गोट तीसेक सँ बेशीए बाल-गजल रचि चूकल छथि आ तइमे अधिकांश अरबी बहर पर आधारित अछि जे हिनकर गजलकारक रूप मे प्रतिभाक परिचायक अछि.ई दरभंगा मे रहैत छथि से हिनकर बाल-गजल सभ मे शहरी आ' ग्राम्य परिवेश मे बच्चा सभक मनोभावक अद्भुत चित्रण-वर्णन भेटैत अछि.ई कतहु-
माटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै
माटिक चुल्हा पर खीर रान्हि,तरकारी बनेबै
आ'
बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूडा़ हेतै
घैलक (खपटा) चकला संठी के बेलना से पूड़ी बनेबै ....कहैत भेटताह त' कतहुः-
पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल
लाल पियर ड्रेस चमके भरल इस्कुल
नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा
आब छै कंपुटर सिखा रहल इस्कुल....आ' फेर व्यस्त माय-बाप आ' एकाकी होइत बचपन दिशि इशारा करैत कहैत छथि -
नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कुल माँ
तू जाइ छैँ बदलै घर त' वनवास मे
पंकज चौधरी "नवलश्री" सेहो प्रवासी छथि आ' गाम सँ दूर हिनका बेर-बेर नेना मे बितायल दिन इयाद अबैत छन्हि.तैँ सहजहि कहैत भेटताहः-
देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुख-सुख सभटा लोप भेलै
भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ
होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" ई मायक माया-तृष्णा
भेर निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ.....आगाँ कहैत भेटताह...

मोन पड़ल ई किये अनेरे बात पुरनगर बचपन के
आँखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के
बाबुक कनहा मायक कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ
ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन केँ.
रूबी झा एकटा गजलकारि हेबाक संग-संग माय सेहो छथि से हिनकर बाल-गजल मे मायक ममता स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि.जेनाः-
रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए
निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए...फेर आगाँ कहैत भेटतीहः-
चलल ठुमकि बौआ कते सोहावन लागै छै
बाजल बौआ तोतल माँ मनभावन लागै छै.
मनुजी बेशीकाल बालमन के अपन प्रेरक बाल-गजल सभक माध्यम सँ प्रेरित करैत भेटताह से अहूँ सभ देखू:-
मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि
अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब
आ' फेर...
हमरा कहैत अछि "मनु" मूर्ख चरबाहा
पढ़ि कए सभ चरबाहा के पढ़ेबौ हम
माय नहि चरबै लेल गाय जेबौ हम
पठा हमरा इस्कुल कॉपी पेन लेबौ हम.
उपरोक्त शेर वा गजलांश सभ तऽ एकटा बानगी मात्र अछि.एखनधरिक बाल-गजल शतक पर यदि दृष्टिपात करब तऽ माय-बापक दुलार-मलार,भाय-बहिनक झगड़ा-झाँटी सँ लऽ के लक्ष्यप्राप्ति हेतु प्रेरणा आ संकल्प सभ किछु भेटि जायत. आ' फेर ई कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि रहत जे मैथिली बाल-गजल अपन छठिहारे सँ जीवकांत,सरसजी सन-सन निसन्न कवि सभक बाल-कविताक समकक्षी बनि गेल अछि अछि.
अंत मे कहय चाहब जे विदेह जे ई बाल-गजल विशेषांक बहार करबाक नेयार केलक अछि से निःसंदेह मैथिली बाल-गजल आ' बाल-साहित्य इतिहासक विकास मार्गपर एकटा माइलक पाथर साबित होयत.एकरा आरो ठोस रूप देबाक मादेँ हमर सुझाव रहत जे एहि अंक मे सम्मिलित बाल-गजल आ' बाल-गजल सँ संबंधित आलेख केँ संग-संग एखनधरिक किछु उल्लेखनीय बाल-गजल सभकेँ एकठ्ठा कऽ एकटा छोट-छीन पोथीक रूप मे विदेह परिवार प्रकाशित कराबय आ' संपूर्ण मिथिला क्षेत्रक विद्यालय आ' पुस्तकालय सभमें उपलब्ध कराबय जाहि सँ बाल-गजलक परिकल्पना अपन उद्देश्य के प्राप्त करत.गाम-घरक नेना-भुटका बाल-गजल सँ परिचित हेताह आ' हुनका सभ मे मैथिली बाल-साहित्य पढ़बाक प्रति रुचि जगतैन संगहि मैथिली बाल-साहित्यक गजलकार सभक मेहनति सोकाज लगतनि.एहिठाम हम मिथिला क्षेत्रक ओहन विद्यालय,सामाजिक आ' शैक्षणिक संस्था,गायक,संगीतकार,ईत्यादि, सभ जे आर्थिक रुपेँ सबल छथि,सँ नेहोरा करब जे ओ बाल-गजल के ऑडियो-विडियो कैसेट,सीडी,डीविडी बना गामघरक अंगना-घर मे पहुँचेबाक प्रयास करथि.मैथिली बाल-गजलक भविष्यमे विकासक मादेँ हमर मनोरथ अछि जे ई धिया-पुताक ठोर पर ओहिना सजय जेना मैथिलानीक ठोर पर गोसाउनिक गीत,सोहर,चौमासा,बारहमासा,समदाउन बसल छैक.अस्तु.



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE

SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE   I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...