भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

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Sunday, January 04, 2009

रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक मृत्यु


रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक मृत्यु- हिन्दुस्तानी संगीतक गायक, शिक्षक आ वाग्यकार/ शास्त्रकार श्री रामाश्र झा “रामरंग” जीक मृत्यु १ जनवरी २००९ केँ कोलकातामे भऽ गेलन्हि। ओ ८० बरखक छलाह। संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्लीक २००५ मे पुरस्कार प्राप्त श्री रामरंग केँ यू.पी. संगीत नाटकक फेलोशिप सेहो प्रदान कएल गेल छलन्हि।
श्री रामाश्रय झा “रामरंग”क जन्म १९२८ ई. मे मधुबनी जिलाक खजुरा गाममे भेलन्हि। हिनका संगीतक प्रारम्भिक शिक्षा अपन पिता सुखदेव झा सँ भेटलन्हि। बादमे ओ वाराणसीमे नाटक कम्पनीमे बहुत दिन धरि संगीत देलन्हि फेर पं भोलाराम भट्टसँ एलाहाबादमे संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। एलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागमे ई प्रोफेसर आ हेड रहलाह।
रामरंग ढेर रास खयाल रचना बनओलन्हि आ कतेक रास नव रागक निर्माण कएलन्हि। हिनकर पाँच खण्डमे नव आ पुरान रागक वर्णन आ समालोचना “अभिनव गीताञ्जलि” हिनक बड्ड प्रसिद्दि प्रदान कएलकन्हि आ ई “अभिनव भातखण्डे” नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेलाह। अपन ध्रुपद आ खयाल रचनाक आधारपर श्री “रामरंग” हनुमानकेँ समर्पित “संगीत रामायण”क रचना सेहो कएलन्हि।
मैथिलीमे “विदेह” ई पत्रिका लेल पठाओल हिनकर “राग विद्यापति कल्याण”, “राग तीरभुक्ति”, “राग वैदेही भैरव” आदि नव राग आ ओहिपर आधारित मैथिली भाषाक रचना पाठकक मोनमे एखनो अछि।
हुनकर स्मरण: एहि पंक्तिक लेखकक संग वार्तालापमे रामरंग जी अपन जीवनक समस्त अनुभव कहि सुनेने रहथि। ओहि आधारपर हुनक जीवनी विस्तृत रूपमे “मैथिल आर मिथिला ब्लॉग” मे मिथिला विभूति-१ केर अन्तर्गत देखल जाऽ सकैत अछि।
रामरंग जीकेँ हजारो रचना कंठस्थ मोन छलन्हि मुदा बादमे हुनकर हाथ थरथड़ाइत छलन्हि आ ओ वार्ताक क्रममे कहनहिओ छलाह जे- के सीखत आ के लिखत।

२०म शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ मिथिला रत्नकेँ “मैथिल आर मिथिला” ब्लॉग दिससँ श्रद्धांजलि।

Saturday, January 03, 2009

मजाक - कथा - जितमोहन झा (जितू)

हमरा गाम मे एगो पंडीजी काका छलाह, ओ एतेक मजाकिया छला जुनि पुछू .... मजाक करै मे दूर - दूर तक हुनक चर्चा होइ छन्हि ! सच पुछू तँ मजाक करै मे ओ किनको नञि छोड़ैत छथिन्ह !

एक दिनक बात छल हुनक अर्धांग्नी (पंडीतैन) हुनका कहलखिन अहाँ सभसँ मजाक करै छी ... एतऽ धरि जे मजाकक मामला मे दूर - दूर तक अहँक चर्चा होइत अछि ! मुदा अहाँ हमरासँ कहियो मजाक नञि केलहुँ ......

पंडीजी काका बजलाह ... देखू सुनेना के माय, ई बात सत्य अछि जे हम सभसँ मजाक करै छी ! एकर मतलब ई थोड़े ने की हम अहूँसँ मजाक करी ?

ताहि पर पंडीतैन कहलखिन- से नञि हएत, एक दिन अहाँ हमरासँ मजाक कs ई देखाबू ताकि हमहूँ तँ देखी जे अहाँ कोना मजाक करैत छी ?

पंडीजी काका हारि क्s बजलाह- ठीक अछि। जहिया मौका भेटत हम अहूँसँ मजाक करब ......

किछु दिनक बाद पंडीजी काका अपन सासूर पहुँचलाह , सासुर मे हुनकर खूब मोन आदर भेलन्हि, भोजन - भातक बाद ओ जाय लेल निकलश ताबे मे हुनकर छोटका सार सुनील बाबु हुनका आग्रह कs कए कनि देर बैसे लेल कहलखिन !

सुनील बाबु ... झाजी बहुत दिनक बाद आयल छलहुँ, किछु गाम - घरक समाचार सुनाबू !

पंडीजी काका मूह बनबैत बजलाह की कही सुनील बाबु किछ दिनसँ हम बहुत परेसान छी ....

सुनील बाबु ... झाजी की बात अछि अहाँ बहुत दुखी लागैत छलहुँ, कनि खोइल के कहू अहाँ केँ कोन परेसानी अछि ? हम अपनेक कुनू काज आबी तेँ ख़ुशी हएत !

सुनील बाबु बात ई अछि जे घरमे आधा राति केँ एक प्रेत सुन्दर युवतिक रूप मे अर्धनग्न अवस्था मे दलान पर आबैत छलीह आ जतेह अनार, लताम, नेबो सभ गाछ में रहैत अछि सभ टा तोड़ि कs चलि जाइत छलीह ! हम रोज ओकरा देखैत छलहुँ मुदा हिम्मत नञि होइत अछि जे ओकरा रोकी ! आब अहीं कहू जे हमरा ई अनार, लताम आ नेबोक गाछ लगेनेसँ कोन फायदा ? परेसान भs कs आब सोचने छी जे सभ टा गाछ केँ काटि देब .... जखन फल खेबे नञि करब तँ गाछ राखिये कs कोन फायदा ?

सुनील बाबु हँसैत - हँसैत बजलाह ... बस एतबे टा बात सँ अहाँ परेसान छी ? अहाँ चिंता जुनि करू । काल्हि हम आबय छी, काल्हि राति हम ओ प्रेत केँ देखब .. आब अहाँ जाऊ, हम काल्हि आबए छी !

पंडीजी काका ठीक अछि, कनि सांझे केँ आयब हम अहाँक बहिन केँ कहि देबनि भोजन - भात तैयार रखतीह।

ई कहि केँ पंडीजी काका बिदा भेलाह ......

घर पहुँचते चौकी पर चारि-चित पड़ि रहलाह ।

पंडीतैन हुनका चौकी पर चारि-चित परल देख कए दौगल अएलीह .... नाथ की भेल अहाँ केँ ? अहाँ किछु परेसान लगै छी !

पंडीतैन केँ परेसान देखि कऽ पंडीजी काका उदास मने बजलाह ... हाँ पंडीतैन, बाते किछु एहेन अछि जै सँ हम परेसान छी !

पंडीतैन .... देखू हमरासँ किछ छुपबई के प्रयास नञि करू अहाँक ई हालत हमरासँ देखल नञि जएत, जल्दी कहू की बात छल ..?

-की कही पंडीतैन आय हम अहाँक नैहर गेल छलहुँ, अबैत घरी रस्ता मे एगो ज्योतिष महाराज जबरदस्ती हमर हाथ देखलन्हि .......

-की भेल सेतँ कहू ?

-भेल ई जे हुनकर कहब छनि, हम आब खाली ५ दिनक मेहमान छी .......

पंडीतैन जोर - जोर सँ छाती पिटैत कानए लगलीह- हे कालि मैया हम ई की सुनय छी ....... नाथ अहाँ चिंता नञि करू हम कुनू निक ज्योतिष सँ अहाँ केँ देखाएब । यदि कुनू कलमुहीक छाया अहाँ पर अछि तs ज्योतिष महाराज कुनू ने कुनू उपाय ओकर निकालताह.....

पंडीजी काका ... भाग्यवान उपाय तँ इहो ज्योतिष महाराज बतेल्न्हि......

पंडीतैन.. की उपाय बतेलक से कहू ?

-किछ नञि, हुनक कहब छन्हि जे आमावस्याक रातिमे यदि कुनू सुहागिन नारी अर्धनग्न अवस्था मे आधा राति केँ यदि कुनू नेबोक गाछसँ नेबो तोड़ि केँ आनथि आ यदि सूर्योदय सँ पहिने हमरा ओकर सरबत पीएय लेल देल जाय तs ई बिघ्न दूर कएल जाऽ सकैत अछि !

पंडीतैन..... नाथ तखन अहाँ चिंता किए करै छी, काल्हि अमावस्या छी आ अपने दलान पर नेबोक गाछ अछि, काल्हि हम अपने ई काज करब अहाँ चिंता नञि करू ! राति भ्s गेल, चलू सुइत रही, काल्हि सभ ठीक भऽ जएत ......

दुनु प्राणी सुतए लेल चली गेलाह मुदा पंडीतैन केँ भरि राति निंद नञि भेलनि ..... ओ भोरक इंतजार करए लगलीह ! भोर भेल आब ओ रातिक इंतजार करए लागलीह .... ताबे धरि सांझ के सुनील बाबु पहुँचलाह ....

पंडीतैन ... भैया आय अहाँकेँ बहिन कोना मोन पड़ल ... कहीं रस्ता तs नञि बिसरि गेलहुँ ?

सुनील बाबु ... बहिन आय दफ्तरक छूटी छलए तँ सोचलहुँ जे अपन गुडियांक हाल - समाचार लs आबी !

बाद मे बहुत देर तक हाल समाचारक बाद सभ भोजन केलक । भोजनक बाद सुनील बाबु सुतए लेल दलान पर चलि गेलाह !एम्हर पंडीजी - पंडीतैन सेहो सुतए लेल चलि गेलाह .... किनको निंद नञि आबैत छन्हि .... पंडीजी काका अपन मजाकक बारे मे सोचैत छलाह तँ पंडीतैन अपन जीवन साथीक जीवनक लेल .... सभसँ हटि कs सुनील बाबु बहुत खुश छथि ! कियेकी हुनकर सोचब छन्हि जे ई अनार, लताम, नेबो तोरब कुनू प्रेतक काज नञि ई कुनू परोसिनक काज थीक ! आय ओ मने मन सोचलथि जे कियो भी होए हम ओकरा नञि छोड़ब, किये की ओ हमर झाजीक जिनाय हराम कए देने अछि ! ओ एखने सँ नेबोक जड़िमे जाऽ कए बैसि गेलाह ! देखते - देखते राति सभ केँs अपन कोरमे लs लेलक ....

पंडीतैन धरफड़ाएले उठलीह, अपन कपड़ा उतारलन्हि, माथ झुका कालि मैया केँ प्रणाम कs कए विनती केलन्हि जे हे मैया हमर पतिक रक्षा करिहैथ....

आ ओ चलि देल्न्हि नेबो तोड़ए लेल .....

पंडीतैन जहिना नेबो गाछ तर पहुँचलीह सुनील बाबु भरि-पाँज हुनका पकड़ि लेलखिन आ मूह दबेने दलान दिस चलि देलन्हि .... ताबे धरी पंडीजी काका हाथ मे लालटेन लेने दौगल अएलाह ....

-सुनील बाबु ssssss, सुनील बाबु रुकू ssssss रुकू, ई कियो आर नञि अहींक बहिन छलीह ......

ई सुनिते सुनील बाबु भोर होए के इन्तजारो नञि केलन्हि, भागलाह अपन गामक दिस .....

एम्हर पंडीतैन पंडीजी काकासँ लिपटि केँ कलपि-कलपि कऽ कानए लगलीह ..... नाथ अहाँ हमरा संग एहेन मजाक किये केलहुँ ......?

‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिकाक २५ म अंक


अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर २५ टा अंक http://www.videha.co.in/
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। "वि दे ह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आऽ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि, ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। विदेहक सालाना २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो आएत।
अहाँसँ सेहो "विदेह" लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
२.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
“विदेह” पढबाक लेल देखू-
http://www.videha.co.in/

आऽ अपन रचना-सुझाव-टीका-टिप्पणी ई-मेलसँ पठाऊ-
ggajendra@videha.com पर।

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।


२.संदेश

१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।

२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|

३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।

४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।

५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।

७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।

१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।

१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।

१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि, आऽ एहिमे मैथिली, संस्कृत आऽ अंग्रेजीमे मिथिला आऽ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। विदेहक नवीन अंक सभ मासक ०१ आऽ १५ तिथिकेँ ई-प्रकाशित कएल जाइत अछि। ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।http://www.videha.co.in/

"विदेह" ई- पत्रिका डाटाबेसक आधारपर प्रकाशित पोथी सभ:-

१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव

५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर

६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर

७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”

९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)

स्पॉनसर केनिहार प्रकाशक : श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com

मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि:
http://www.videha.co.in/ "विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

राजमोहन झा केँ एहि बरखक प्रबोध सम्मान




श्री राजमोहन झा केँ एहि बर्खक प्रबोध सम्मान देल जएतन्हि। मैथिली साहित्य सभसँ प्रतिष्ठित सम्मानमे एक लाख भा.रु. देल जाइत छैक।

श्री राजमोहन झाक जीक जन्म २७ अगस्त १९३४ केँ । शिक्षा- मनोविज्ञानमे एम.ए. । कृति : “एक आदि : एक अन्त” (१९६५) , “झूठ साँच” (१९७२) , “एक टा तेसर” (१९८४) , “आइ काल्हि परसू” (१९९३) , “अनुलग्न” (१९९६) कथा संग्रह आ “गल्तीनामा” (१९८३) , “टिप्पणीत्यादि” (१९९२) , “भनहि विद्यापति” (१९९२) , आलोचनात्मक निबन्ध संग्रह प्रकाशित। प्रायः तीन गोट पोथी जोगर लेख , संस्मरण , टिप्पणी आदि पत्र-पत्रिकामे छिइआयल छन्हि । “आइ काल्हि परसू” कथा संग्रहपर १९९६ क साहित्य अकादेमी पुरस्कारक अलावा वैदेही पुरस्कार एवं कथा एवार्ड प्राप्त । मैथिली पत्रिका “आरम्भ” केर सम्पादक ।

हुनकर स्मरण : २४-२५ साल पहिलका हुनकर सुनाएल स्मृतिक स्मृति मोन पड़ैत अछि। राजमोहन जी अपन पिता हरिमोहन झा जीक स्मृति सुना रहल छलाह। हरिमोहन बाबू अपन गाम बाजितपुर जाऽ रहल छलाह। बसमे एक गोटे पुछलखिन्ह, - “अहाँ डी.पी. मे कतए जाऽ रहल छी”।
हरिमोहन बाबूकेँ डी.पी. केर फुल फॉर्म नहि बुझल रहन्हि से पुछलखिन्ह- “डी.पी. माने की”।
ओ सज्जन उत्तर देलखिन्ह- “डी.पी. माने दुर्गापूजा”।
हरिमोहन बाबू अब उत्तर देलखिन्ह- “हम डी.पी. मे बी.पी. जाऽ रहल छी”।
आब ओ सज्जन प्रश्न केलखिन्ह- “बी.पी. माने की”?
हरिमोहन बाबू उत्तर देलखिन्ह- “बाजितपुर”।

प्रबोध नारायण सिंह (1924-2005) क स्मृतिमे देल जाएबला प्रबोध सम्मान स्वास्ति फाउंडेशन द्वारा हुनका जीवन कालहिमे 2004 सँ शुरू कएल गेल । एहि पुरस्कारकेँ प्राप्त केनिहार छथि:










प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )












प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )












प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )











प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )












प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )












प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )









साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)
१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)
१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)
१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)
१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)
१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)
१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)
१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)
१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)
१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)
१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)
१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)
१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)
१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)
१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)
१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)
१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)
१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)
१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)
१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)
१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)
१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)
१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)
१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)
१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)
१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)
१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)
१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू)
१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)
१९९८- जीवकांत (तकै अछि चिड़ै, पद्य)
१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)
२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)
२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)
२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)
२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)
२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)
२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)
२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)
२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा
२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा))


साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार



१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)
१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)
१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)
१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)
१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)
१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)
१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)
१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)
२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)
२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)
२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)
२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)
२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)
२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)
२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)
२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)

Saturday, December 27, 2008

बहादुरगंजक लोककथा-तीन मूड़ी बला लोक- उमेश कुमार महतो "वियोगी"




बहादुरगंजक लोककथा-तीन मूड़ी बला लोक

एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए।
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले।
राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक।
राजकुमार राजा बनि गेल।
पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल।
१.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचला मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल।
२.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देल आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल ले राखि देलक।
३.ओ सभटा बैरक गाच्ह काटि कऽ हटा देलक।
४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए।

एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते करिते राजपाट खतम भऽ रहल च्हलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक।
गामक एक बुजुर्ग सं ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तं ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सं पुछू।
चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही आदमी सं पुछलक जझमरा तं तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल।
बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख से ८० बरखक आदमी कें तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसै ये तं ओकर मूरी झुकि जाइ च्है आ घुटना ओपार उठि जाइ छैक आ से ओ तीन मूरी जकां भऽ जाइ छैक।
राजा एहेने एकटा मनुक्ख सं पुछलक।
“पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक।
राजा कहलक।
“ओ बतेलथि-
१.फी कोरमे सीरा खाइले।
२.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”।

“पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा के खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटल।
दोसराक मतलब घूर लगा देबा लऽ जाहिसं द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत।
तेसर के मतलब झगड़ा-झांटि से दूर रहि दोस्ती मिलान सं रहए लेल।
चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलब”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक।
एकरापर अमल केलापर ओकर राजपाट वापस आबए लगलैक।

Wednesday, December 24, 2008

गप नहि मानलहुं

अहां दोषी छी
अहां अपराधी छी
अहां चोर छी
अहां अभागल छी
अहां देशद्रोही छी
अहां स्वार्थी छी

ई गप हम नहि
काल कहि रहल अछि
ई गप हम नहि
इतिहास कहि रहल अछि
ई गप हम नहि
अहांक आत्मा कहि रहल अछि

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
समाजक फूइसगर
प्रतिष्ठाक पाछु भागैत रही
ताहि लेल छी दोषी

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
फूइसगर ठाठ-बाट लेल
घुइट-घुइट कए जिलहूँ जिनगी
ताहि लेल छी अपराधी

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
ख़ुद क नीक कहबाक लेल
अपन चैन चुराबैत छी
ताहि लेल ची चोर

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
ख़ुद कए भाग्यवादी देखबाक लेल
अभागल बनल रही
ताहि लेल छी अभागल
अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
देश सेवाक जज्बा रहैत
देशकए लूटलहुं
ताहि लेल छी देशद्रोही

अहां कहियो
आत्माक गप
नहि मानलहुं
समाजक सेवा करैत-करैत
अपन सेवा करय लगलहुं
ताहि लेल छी स्वार्थी।

Tuesday, December 23, 2008

नीक लोक

नीक लोक ओ
जे रहैत छैक ईमानदार
बेइमानी जखन धरि
रहैत अछि नुकायल

नीक लोक ओ
जे रहैत छैक सत्यवादी
पकड़ल नहि जाइत छैक
जखन धरि झूठ

नीक लोक ओ
जे रहैत छैक संस्कारी
जखन धरि आगू नहि
आबैत अछि राक्षसी प्रवृति
नीक लोक ओ
जे रहैत छैक विश्वासी
जखन धरि मुंह नहि
खोलैत अछि धोखा पाउल लोक
नीक लोक ओ
जे नहि करत अश्लील गप
जखन धरि आगू नहि
आबैत अछि कामक प्रस्ताव

नीक लोक ओ
जे करत लोक संग मीठ गप
जखन धरि आगू नहि
आबैत छैक प्रताड़ित पत्नी.

Saturday, December 20, 2008

मिथिलांचलक विकास

मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो स पैघ कारण एहि इलाका के मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी के लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक के बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासक मिथिला के सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई और पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि।
मिथिलांचलक ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकट पैघ हमरा हिसाब सं आधा से बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या के निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सं नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार के नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। पिछला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आंखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सं मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत।
बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रलेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि।
किछु गोटाके कहब छन्हे जे बिहार मे उद्योग धंधा के जाल बिछाक एकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे पिछला अविकासके चक्रक फलस्वरुप आबादीके बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै खोजल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सं ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोग के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गांव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि। कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुं,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकर इलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि, ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40 प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च हुए।

तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक।

किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी -अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि।

मिथिला के विकास के माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनतौ किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प।

मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकर महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहे ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घर के पास कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना हुए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव केल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सं ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी।

Thursday, December 18, 2008

रेडिमेडक जमाना - मदन कुमार ठाकुर

( रेडिमेडक मतलब जे काम चलाऊ, कमसँ कम समय मे, कमसँ कम खर्चा मे, कमसँ कम मेहनत मे, निकसँ निक समान, निकसँ निक व्यवस्था निकसँ निक मनोरंजन होइत अछि ! रेडिमेड सभ तरहे सभ लोककें अपना तरफ आकर्षित करैत अछि ! जकर किछ उदहारण हम मैथिल आर मिथिला (मैथिली ब्लॉग) पाठक गन के बिच प्रस्तुत करे चाहय छी ) ....




() हमर विवाह छल पंडितजी के देखलियैन डेढ़ घंटाक अन्दर s विवाह दान सब करा' देलथि ! हम पंडितजी सँ कहलियनि पंडितजी हम छंदोगी ब्रह्मण छी, हमरा सभक विवाह कमसँ कम छः सात घंटा मेs समाप्त होइत छैक ! मुदा अहां दुई घंटाक भीतर सब किछ कोनाक करबा देलियइ ? पंडितजी बजलाह .... सुनु जमाय बाबु " आब अहां के नै बुझल अछि जे रेडिमेडक जमाना छैक " तहि द्वारे झट मंगनी पट विवाह होइत छैक !




() हमर काकाक एगो बेटा लंदन मे रहैत छल ! पढाई लिखाई मे बहुत होनहार छल ! ओकरा पर सभके विस्वास छल जे एक दिन खान्दानक नाम रोशन जरुर करत ! दुई सालक बाद गाम आयल संग मे ऐगो फोर्नर लड़की के सेहो s s आबी गेल छल ! तेँ ओकरा बाबु पुछलखिन्ह जे रौ बोउवा तू विवाह हमरा बिना कहने पंडितजी के बिना दिन तकेनै कोनाक s लेला ? बोउवा बजल ... "बाबु आहां के आब नै बुझल अछि जे रेडिमेडक जमाना छैक " बाबु हमर विवाह नै भेल हन हमर गर्लफ्रेंड छी !




() हम दिल्ली नए - नए आयल छलहुँ ! हम आर हमर भैया एगो विवाह मे सामिल भेल छलहुँ ! विवाह मे देखलहुँ सभकियो नाचैत छल ! सब कियो ठारे - ठार भोजन करैत छल ! हम भैयासँ पूछलहुँ भैया अहिठाम की s रहल छैक ? भैया कहलक ... रे बुरबक " आब तोरा नै बुझल छो जे रेदिमेडक जमाना छैक " आब लोकक पास ओतेक समय नै छैक जे बैस के भोजन चारि घंटा बैस के प्रोग्राम देखता !




() साउथ अफ्रीका मे क्रिकेट मैच चलैत छल ! धोनीक टिम मैच खेलैत छल ! तहिसँ सभ टी.वी. समाचार चेनल पर धुवा - धार जय - जय कार होइत छल ! कियेकी २० - २० क्रिकेट मेच इंडिया जीत गेल छल ! हम अपन काका से पुछलियनि काका पहिने ५० - ५० ओभरक क्रिकेट मेच होइत छल ! आब २० - २० ओभरक खेल किये होइत अछि ? काका बजलाह ... बोउवा " आब अहाँ के नै बुझल अछि जे आब रेडिमेडक जमाना छैक " लोगक पास आब ओतेक समय नै छैक जे बैस केs पूरा ५० ओभर के खेलक आनंद लेता !




() एगो हमर साथी छलथि हुनकर विवाह के मात्र पाँचे महिना भेल छलनि ! ताहिक उपरांत हुनकर घरवाली के एगो बच्चा जनमलनि ! ओही बातसँ आस - पासक जतेक पड़ोसी छलनि सभ केs लगलनि कोना केs s गेल यो एखन विवाह के मात्र पाँचे महिना भेल हएँ ! हमर साथी बजला ... " आब अपने सभ के नै बुझल अछि जे रेडिमेडक जमाना छैक " जे जन्मल धिया पुता बसायल घर सब के मिलैत छैक !




() एक दिनक बात अछि ... बाबा आर हम दुनु आदमी दिल्ली गेलो ! लालकिला कुतुबमीनार देखैक लेल ! आबैत काल मे बाबा के लघुसंका लागी गेलनि ! बाबा हमरा कहलथि जे कनी पानिक व्यवस्था s दिअ जे हम लघुसंका करब ! हम एगो दूकान से १० रुपैया मे पानिक बोतल लेलहुँ बाबा के रोडक साइड मे जगह देखा देलियनि ! बाबा पानि s केs रोड के साइड मे बैस के लघुसंका करैय लागला ! ताबे मे किम्हरो से ऐगो सफाई करैय बला जमेदार आबिगेल बाबासँ कहलकनि ... आपको " अब मालूम नहीं हैं जो अब रेडिमेड का जमाना हैं " जो आप रोड को गन्दा करते हो ! इसके लिए सरकार ने रेडिमेड सुलभ सौचालय का व्यवस्था किया हैं !


(७) इलहाबादक एगो हमर पड़ोसी शर्माजी छलथि ! हुनका एगो २५ वर्षक लड़की छलनि जे डिग्री प्राप्त कs केs घर मे बैसल छलथि ! मुदा शर्माजी के अपन काज धंधा सँ फुरसते नै भेटैत छलनि जे ओ अपन बेटी मुन्नी के लेल वर तकता ! ओ बार बार हमरा परेसान करैत रहैत छलाह जे मदनजी कतौ हमरा मुन्नीक लेल योग्य लड़का देखियो ...... हम कहलियनि .... अपने केs " आब ई नै बुझल अछि जे आब रेडिमेडक जमाना छैक " आब इन्टरनेट के 'Shadi.com' पर वर आ कनियाँ रेडिमेड भेटैत छैक ! मुन्नी से कहबई जे अपन योग्य लड़का ताकि लेट !


(८) एकटा हमर डॉक्टर काका छलथि ! हुनका दिल्लीमे घर आँगन नै छलैन तहि सs ओ अपन परिवारक लेल काफी परेसान रहैत छलैथ ! एक दिन ओ हमरा कहलैथ जे मदनजी हमरा कतौ जमीं खरीद दिअ जे हम दू सालमे अपन घर आँगन बनबा लेब कियेकी आब हमहूँ वृद्ध अवस्थामे आयल जायत छी ..... हम कहलियनि .... काका जी अहाँ के " आब ई नै बुझल अछि जे रेडिमेडक जमाना छैक " कतेक आदमी के रेडिमेड घर आँगन रियल स्टेट कम्पनी द्वारा मिलैत छैक !


(९) हम टी.वी. पर आजतक समाचारक चेनक देखैत छलहुँ ! विषय छल मंत्री परिषद् मे चिंता .... कांग्रेस के पूर्ण रूपसँ बहुमत प्राप्त भs गेल छल ! मुदा विरोधी दल बी.जे.पी. ओही के समर्थन नै करैत छल ! कहैत छल जे विदेशी नेता सोनिया गाँधी हमर मंत्री आ हमर सरकार नै बनि सकैत अछि ! ओही सम्मेलन मे श्री लालू प्रसाद यादव सेहो बैसल छलथि ! लालू जी अंत मे बजलाह ... " आपलोगों को मालूम नहीं हैं की अब रेडिमेड का जमाना हैं " बहुमत किसी को भी मिले मंत्री कोई भी बन सकता हैं ! जैसे मैं जब चारा घोटाला के केस में जेल जाने वाला था तो अपनी पत्नी को मुखमंत्री का कुर्शी पर बैठा कर जेल गया था !


(१०) किछ दिन पहिनेक बात अछि ! हम गामे मs रही हमर काका अपन बेटिक कन्यादान ठीक केलथि ! मुदा वर पक्ष बला कहलकनि जे सरकार हमरा दहेजक पाई काल्हि साँझ तक चाही तखने हम विवाह करब ! नै तेँ दोसर गाम के घटक तैयार छथि ! ई बात शनिक साँझ के छी ! सब कियो परेसान भोs गेला कारण की काल्हि रवि छले आ रवि के बैंक बंद रहैत अछि, साँझ तक एक लाख रुपैया के कोना व्यवस्था हेत ! दोसर दिन काका गाम मे दुई चारी आदमी के पुछल्खिन सभ कियो कहलकनि जे हम सोम दिन बैंक सs पाई आनी के देब ! मुदा वर पक्षक शर्त रवि दिनक साँझ तक छलनि ! अंत मे हम कहलियनि.... " अहां सभ के ई नै बुझल अछि जे आब रेडिमेडक जमाना छैक " आब पाई मशीन सs निकलैत अछि ! तखने हम दू आदमी झंझार पूर ATM मशीन पर गेलहुँ आ चारि टा कार्ड के एक लाख रुपैया निकाली के आबि गेलहुँ सब गाम मे देखते रही गेल ....



जय मैथिली, जय मिथिला,


मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोल, झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४,

मोबाईल +919312460150 , ईमेल - madanjagdamba@rediffmail.com

Wednesday, December 17, 2008

११ टा कथा- १.मराठी,२.थेथर,३.हिजड़ा, ४.बेटी ,५.गोरलगाइ,६.इंटेलीजेन्ट,७.जाति,८.कम्पेशनेट अप्वाइन्टमेन्ट,९.डकैती,१०. उद्योग,११.उद्योग-२










११ टा कथा- गजेन्द्र ठाकुर











1.मराठी

“ऐँ यौ ई की देखैत छी , ऑफिसमे अफसर सेहो मिथिलाक आ बिहारक आ रिक्शाबला, खेनाइ बनबए बला सेहो सभ मिथिलाक आ बिहारक । से कोन गप भेल”।

पुणे मे सिंहजी केँ एक गोट मराठी सज्जन पुछलखिन्ह। बात सेहो ठीक रहए मुदा बाहरी लोककेँ बुझबामे नहि आबए ।

सिह साहेब भारतीय पुलिस सेवा मे रहथि आ हुनकर सहोदर भिखना-पहाड़ीमे प्रिंटिंग प्रेसमे क-ट सभ जोड़ैत छलाह, से हुनका कनेको अनसोहाँत नहि लागलन्हि। मैथिली साहित्यमे देखैत आएल छथि मात्र मैथिल ब्राहाण आ कर्ण कायस्थक लेखनीकेँ चमकैत। रिक्शाबला तँ दरभंगाक होए आकि कटिहारक, खेनाइ बनबएबला झौआ रहबे टा ने करैत अछि।ई मराठी सभकेँ पता नहि किएक अनसोहाँत लगैत छैक।

बड्ड जातिवादी सभ अछि ई मराठी सभ।

 2.थेथर

 

दू दिनसँ परबा असगरे बैसल रहए । ओकर कनियाँ उढ़रि कए कतहु चलि गैलैक । बच्चा सभ कतेको बेर ओकर खोपड़ीमे पानि आ दाना दऽ आएल रहए । मुदा आइ भोरे ओ खोपड़ी उजारि कतहु चलि गेल”।

“किए यै नानी । ओहो किएक नहि दोसर बियाह कऽ लेलक । बेशी प्रेम करैत रहए कनियाँसँ”।

“अहाँ नेना छी । ई कोनो थेथर मनुक्ख थोड़े छी जे कनियाँ मरए, माय-बाप मरए , बेटा-पुतोहु मरए , सर-समाज मरए , चारि दिन मुँह लटकाएत आ पाँचम दिनसँ फेर थेथर मऽ जाएत “।

 3.हिजड़ा

 

मरि गेलि बेचारी “। गौआँ सभ फलना बाबूक तेसर कनिआँक मुइलापर कहलन्हि ।

“फलना बाबू तेसर कनियाँक गरदनि काटि लेलन्हि “। एक गोटे कहलान्हि ।

“से ठीके कहैत छी । पहिल कनियाँमे बच्चा नहि भेलैक तँ दोसर बियाह कएलक । मुदा जखन दोसरोमे बच्चा नहि भेलैक तँ बुझबाक चाही छलए ने”।- दोसर गोटे कहलन्हि ।

“हँ आ उनटे तेसर कनियाँकेँ कहैत रहथि जे भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तेँ भगवान बच्चा नहि देलन्हि । बुझू”?-तेसर गोटे कहलन्हि ।

“हिजड़ासार”।- चारिम गोटे सभा समाप्त  करैत बाजल ।

मुदा चारि गोटेक ई महा-सम्मेलन एहि गपपर सहमति मे छल जे पहिल दू टा बियाह करब उचित रहए।

 4.बेटी

“बाबूक संगे खाएब”।-बुचिया बाजलि ।

“हे आब तूँ छोट नहि छेँ, एम्हर बैस”। माए कहलन्हि ।

फेर भाए सभ खेनाइ खेलक आ आब बुचिया आ बुचिया माएक बेर आएल । तरकारी सठि जेकाँ गेल रहए , दूध तँ बाबू आ भाएकेँ  मात्र भेटलैक । माए बुचियाकेँ सठल जेकाँ तरकारी लोहियामेसँ छोलनीसँ जेना –तेना निकालि ए देलन्हि आ अपने भात आ नून –तेल लए बैसलीह। दूधक बर्तनसँ दाढ़ी खखोड़ि कए बादमे बुचिया खेलक।


 - ई खिस्सा सुनबैत मनोहर बजलाह जे हमरा सभ आब ई कऽ सकैत छी की ?

पहिने खेनाइ-पिनाइसँ लऽ कऽ पढ़नाइ-लिखनाइ धरि बेटीक संग अन्याय होइत रहए। अपाला-गार्गी-मैत्रेयीक समय तँ आब जाऽ कऽ फेरसँ आएल अछि ।

 5. गोरलगाइ

जमाय पएर छूबि कए प्रणाम कएलन्हि तँ ससुर सए टका निकालि एक टाकाक नोटक सिक्काक लेल कनियाँकेँ सोर केलन्हि। खूब खर्च-बर्च कएने छलाह बेटीक बियाहमे पाइ अलग गनने छलाह आ नगरक चारि कठ्टा जमीन सेहो बेटीक नामे लिखि देने छलाह।

“नञि बाबूजी। ई गोर-लगाइक कोन जरूरी छैक”?

तावत कनियाँ आबि गेल रहथिन्ह, एक टकाक सिक्का लऽ कए।

एक सए एक टाका जमायक हाथमे रखैत ससुर महराज बजलाह- –

“राखू-राखू । ई तँ पहिनहियो ने सोचितियैक”।

6.इंटेलीजेन्ट

मसूरीमे आइ.ए.एस. आ आइ. पी. एस. प्रोबेशनर सभक दारु पार्टी चलि रहल छल ।

“हम सभ एतेक तेज छी एक सय प्रश्नक सेट बना कऽ तैयारी कएलहुँ तखन जा कए सफल भेलहुँ । के अछि हमरासँ बेशी तेज?”।

“रौ दिनेसबा । सतमामे तूँ पास नहि भेलँह , अठमामे सेहो एक बेरे पास नहि भेलँह । दसमामे द्विती श्रीणी भेलापर तोरा स्कूलसँ निकालि देलकऊ। प्रश्नक पैटर्नक हम आ तूँ प्रैक्टिस केलहुँ आ सफल भेलहुँ तँ एहिमे तेजी केर कोन बात आएल”।

7.जाति

 

हैदराबाद पुलिस एकेडमीमे दारूक पार्टी चलि रहल छल ।

“क्यो किछु नहि बाजत, बस हमही टा बाजब”।

छाती पिटैत- “राजपूतक छाती छी ई, क्यो किछु नहि बाज “।

“:भाइ यैह तँ अंतर छैक, दुनू गोटे आइ.पी.एस.छी , दुनू गोटे पीने छी। मुदा की हम ई कहि सकैत छी छाती पीटि कए- जे हम डोम छी, क्यो किछु नहि बाज”!: 


8.कम्पेशनेट अप्वाइन्टमेन्ट

 “बड्ड दर्द भऽ रहल अछि बाबू, आब बर्दास्त नहि भऽ रहल अछि” ।

पता नहि कोन घाव रहैक । पुकार कुहरि रहल छथि । पिता स्वतंत्रता सेनानी रहथि, जखन डाक्टर आ कम्पाउन्डर मना कऽ देलक घाव छुबएसँ तँ अपने हाथे सेवा कऽ रहल छथि । उजरा पाउडरकेँ नारिकेरक तेलमे मिला कऽ घावक खपलौया हटा कऽ ओहिमे लगाबथि। पीजकेँ पोछथि। बाप आ छोट भाए दुनू सेवामे लागल रहथि ।

परूकाँ प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण भेल छलखिन्ह पैघ बेटा, सत्यनारायण भगवानक पूजा भेल रहए।

बूढ़ बापक पैघ आश रहथि बड़का बेटा। छोटका बेटा कोनो तेहन तेजगर नहि रहथिन। मुदा रोग एहन रहए जे एक दिन बड़का बेटाक प्राण लए लेलक अंग्रेजसँ लड़ैत खुशी-खुशी जेल गेल रहथि मुदा तखन युवा रहथि। बुढ़ारीमे ई शोक हुनका तोड़ि देलकन्हि । गुमशुम आ अपनेमे मगन रहए लगलाह । स्वतत्रता सेनानी पेंशनसँ घर चलाबथि । हँ छोटका बेटा पैघ भाएक सटिर्फिकेट लऽ कलकता गेलाह आ ओहि सटिर्फिकेटक आधारपर हुनका एकटा प्राइवेट कम्पनीमे नीक नोकरी भेटि गेलन्हि। माने मात्र नाम बदलि गेलन्हि।

लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक , हुनका भाएक मरलापर भेटलन्हि । 


9.डकैती

नगरमे डकैतीक घटना भेल । नूतन मीडिया अपन-अपन चैनलमे सर्वप्रथम ओकरे चैनलपर एकर सूचना देल जा रहल अछि ई ब्यौरा दैत, दू-दिनमे एकोटा गिरफतारी नहि होएबाक आ पुलिसक अक्षमताक-चर्च करैत गेलाह।

पुलिस हेडक्वार्टरमे बैठकी भेल । सभ टी.वी. चैनल कहि रहल छल जे चारि गोटे मिलि कए डकैती केलन्हि मुदा एखन धरि एको गोटेक गिरफतारी नहि भेल अछि। एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट बजाओल गेलाह। जेना सभ बेर होइत रहए एहि बेर सेहो ओ एक गोटेँ पकड़ि कए अनलन्हि। चारि डाँग पड़बाक देरी छल आकि ओ अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलक। फेर एनकाउन्टर स्पेशलिस्टक संग ऑफिसर लोकनि कैमराक सोझाँ  फोटो खिचबेलन्हि। ओ डकैत अपन डकैत होएबाक गप सेहो स्वीकार कएलक।

चारि दिन आर बीतल। सभ दिन तरह-तरह सँ ओहि कथित डकैतकेँ पीटल जाइत रहल,

-“बता अपन तीन संगीक नाम जकरा संगे डकैती कएने छलह”।

-“सरकार चारिए डाँगमे अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलहुँ, हम डकैत रहितहुँ तँ ई करितहुँ। मुदा आर तीनटा संगीक नाम कतए सँ आनू आ ककरा फुसियाहींकेँ फसाऊ”।

सप्ताह भरिक बाद मीडिया एकटा बम विस्फोटक अन्वेषणमे बाँझि गेल । मुख्य डकैत तँ पकड़ाइये ने गेल से आब डकैतीक कॉवरेज दर्शक नहि ने देखए चाहैत छथि! पब्लिक डिमान्ड नहि छैक से ओहि डकैतकेँ बेल भेटलैक आकि नहि से कोनो समाचार नहि आएल।


  10.उद्योग

गममे चौधरीजीक बड्ड रूतबा, डरे सभ सर्द रहैत छल । ककर दीन अछि जे हुनकर गम्हरायल धान काटि लेत आकि ... ।

ओ एकटा बस खोललन्हि-

“दरभंगासँ गाम धरि चलत । सेकेंड हैंडमे भेटल अछि । पुरनका मालिकक लाइसेंस काज देत। संगमे बसक पुरनका मालिक तीन मासक लेल अपन ड्राइवर आ खलासी सेहो देलक अछि, तकर बाद अपन ताकि लेब”

चौधरीजी मन्दिरपर बसक पूजा करैत काल गौआँ सभ़सँ बजलाह ।

“सुनैत छिऐक बस-स्टैण्डमे बड़ बदमस्ती करैत जाइत छैक”। एक गोटे गौआँ बजलाह

“धुर, चौधरीजीक बस आ आदमीकेँ के छुबाक साहस करत”। दोसर गोटे प्रसाद लैत बजलाह।

 

बसक रूट आकि रस्ता यात्रीगणक लेल सुभितगर रहैक से ओहि गाड़ीमे पैसेन्जर भरि जाइत रहए। दोसर बसबला सभ दबंग सभ। शाहीजी आ मिश्राजीक स्टाफ सभ बड़ सञ्जत! से चौधरीजीक स्टाफकेँ गरगोटिया दऽ बस स्टैण्ड सँ बाहर निकालि देलकन्हि।

पोखरिक महारपरसँ चौधरीजीक बस खुजए लागल तँ ओतहु यात्री पहुँचए लगलाह।

 

आब तँ बस-स्टैण्डक दादा सभकेँ बड्ड तामस उठलन्हि । दुनु ड्राइवर आ खलासीकेँ पुष्ट पीटल गेल आ ईहो कहल गेल जे फेर एहि रूटपर चलताह तँ बसक एक्सीडेन्ट करबा देल जएतन्हि। शाही आ मिश्रा जीक तँ पचासो टा गाड़ी छन्हि एकटा थानामे एक्सीडेन्टक बाद पड़ले रहत तँ की।

 

गामक रोआब –दाब बला कौधरीजी बस-स्टेण्डक दादा सभक सोझाँ जेना बकड़ी बनि गेलाह। गाममे मन्दिरपर गाड़ी ठाढ़ छन्हि, ओहि पर कदीमाक लत्ती चढ़ि गेल अछि पैघ-पैघ कदीमासँ बस झपा गेल अछि।खूब फड़ल छैक। गौआँसभ हँसीमे कहि रहल छथि-

“चौधरीजीक बसक पाइ तँ एहि बेर कदीमा बेचिये कऽ उप्पर भऽ जएतन्हि”।

दरभंगाक इन्डस्ट्रीयल स्टेटमे सेहो फैक्ट्री सभ एहिना बन्द अछि आ ओकर देबाल सभपर एहिना तर-तीमनक लत्ती सभ भरल छैक”।- दोसर गौआँ कहलक।

 

11.उद्योग-२

मिथिलाक बोनमे रहनिहार जीव-जन्तु सभ आपसमे विचार कएलक- –

“अपन क्षेत्रक दादा सभ उद्योगक विनाश कएने अछि ओतुक्का भीरू लोक सभ उद्योग लगेबासँ परहेज करैत अछि”।- गीदड़ बाजल।

“तखन अपनहि सभ किएक नहि फैक्टरी खोलैत छी , कोन दादाक मजाल जे हमरा सभ लग आओत”।-बाघ कड़कल।

प्रस्ताव पास भेल जे आब जंगलमे फैक्ट्री खुजत आ नगर जा कए उद्योग विभागसँ एकर पंजीकरण करबाओल जाएत। ओतय भीरू मैथिल सभक राज अछि जे बड्ड ओस्ताज होइत अछि। गीदड़, बानर , लोमड़ि, नीलगाय संग गदहा सेहो पंजीकरण लेल अपन सेवा देबाक लेल अगू बढ़लाह। सभसँ पहिने लोमड़िकेँ मौका भेटल कारण ओ सेहो जंगलक ओस्ताज अछि।

किछु दुनुका बाद भागि,–दौग-बड़हा केलाक बाद ओ हारि मानि लेलक।

“यौ बाघ महाराज। बड्ड कोन-कोन तरहक दस्तावेज मँगैत अछि नहि भऽ सकत हमरा बुते”।

 

फेर एक – एक कए सभ जाइत गेलाह आ घुरि कए अबैत गेलाह । गदहा कहैत रहल जे एक मौका हमरो देल जाए मुदा सभ सोचथि जे बुझू एहेन पेंचीला सभ विफल भऽ आबि गेलाह मुदा फैक्टरीक पंजीकरण नहि करबाए सकलाह आ ई गदहा जे मूर्खताक लेल आ बोझ बहबाक लेल प्रसिद्ध अछि की कऽ सकत ?

“ठीक छैक”। अन्तमे हारि कए बाघ कहलन्हि- –

“जाउ अहूँ देखि आउ एक बेर”।

मुदा ई की ? साँझ होइत देरी गदहा महाराज जे छलाह से फैक्ट्रीक पंजीकरण प्रमाणपत्र लऽ सोझाँ हाजिर भऽ गेलाह।

बाघ पुछलन्हि- –“औ जी गदहा महाराज ! एतेक कलामी जन्तु सभ जतए विफल भऽ गेलथि ओतए अहाँक सफलताक मंत्र की”?

गदहा महाराज उत्तर देलन्हि,

“महाराज एकर मंत्र अछि जातिवाद आ भाइ-भतीजावाद। उद्योग विभागमे हमर सभ सरे-सम्बन्धी लोकनि छथि ने”!    

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